1
00:00:00,560 --> 00:00:01,060
जैसे

2
00:00:01,040 --> 00:00:05,040
आपने WhatsApp मैसेज में किया था। किसी ने कोई कहता है हम

3
00:00:05,040 --> 00:00:09,200
ऋषियों का या प्राचीन महापुरुष का अपमान करते हैं। तो इसके लिए जानकारी दे दूं।

4
00:00:09,200 --> 00:00:13,680
मेरे पीछे जो लगा है पृष्ठभूमि देखेंगे। सबसे

5
00:00:13,680 --> 00:00:18,240
ऊपर चार ऋषि अग्न वायु आदि तंगरा है चित्र

6
00:00:18,240 --> 00:00:22,400
उनके नीचे ब्रह्मा जी है एक साइड में मनु जी है एक साइड

7
00:00:22,400 --> 00:00:27,360
में अत मदास जी है एक साइड में महर्षि वाल्मीकि जी है

8
00:00:27,360 --> 00:00:31,840
और उधर वो महर्षि वेदव्यास

9
00:00:31,840 --> 00:00:36,320
जी है महादेव जी भी है विष्णु जी भी है

10
00:00:36,320 --> 00:00:40,560
श्री राम सीता जी है कृष्ण जी अर्जुन और एक साइड में महर्षि

11
00:00:40,560 --> 00:00:46,320
दयानंद जिस भवन में बैठा हूं उसका नाम है महर्षि

12
00:00:46,320 --> 00:00:50,400
महावैज्ञानिक ब्रह्मा अनुसंधान भवन जिस

13
00:00:50,400 --> 00:00:54,640
कक्ष में बैठा हूं इसका नाम है भगवान शिव कक्ष महान वैज्ञानिक परम

14
00:00:54,640 --> 00:00:58,640
योगी भगवान शिव कक्ष जो मेला कक्ष है उसका नाम है महान

15
00:00:58,640 --> 00:01:02,800
वैज्ञानिक अमित पराक्रमी भगवान विष्णु कक्ष सब ऋषि

16
00:01:02,800 --> 00:01:06,960
मुनियों के नाम है यहां शारल हमारे यहां भगवान मनु भवन नाम

17
00:01:06,960 --> 00:01:11,120
से है [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] लोपा मुद्रा जी के नाम से

18
00:01:11,120 --> 00:01:16,000
है श्री राम के नाम से है कृष्ण जी के

19
00:01:16,000 --> 00:01:16,500
तो

20
00:01:16,320 --> 00:01:20,880
ये हमारा परिचय है और हमारी जो प्रार्थना होती है सत्संग में

21
00:01:20,880 --> 00:01:26,160
उसमें अग्नि वायु से लेकर के ऋषि दयानंद परंपरा जिसमें

22
00:01:26,160 --> 00:01:30,240
आदि शंकराचार्य जी का भी नाम है। सभी

23
00:01:30,240 --> 00:01:34,480
महापुरुषों देवियों वीरांगना

24
00:01:34,480 --> 00:01:39,280
वीरों और वैज्ञानिकों का स्मरण हम करते हैं।

25
00:01:39,280 --> 00:01:43,680
सत्संग तो यह परिचय है महर्षि ब्रह्मा

26
00:01:43,680 --> 00:01:48,160
से लेकर ऋषि दयानंद परंत जो भी ऋषि हुए हैं

27
00:01:48,160 --> 00:01:52,720
जो भी वेद के लिए समर्पित रहे हैं मानवता के लिए समर्पित

28
00:01:52,720 --> 00:01:57,280
रहे हैं उसी परंपरा का मैं एक छोटा सा अनुय हूं।

29
00:01:57,280 --> 00:01:59,760
जी

30
00:01:59,760 --> 00:02:04,080
मुझे एक चीज कहनी थी यहां पर आचार्य जी कि शायद कोई

31
00:02:04,080 --> 00:02:08,320
गलत सूचना पहुंची है। मैंने उसमें जो WhatsApp मैसेज आपको भेजा

32
00:02:08,320 --> 00:02:12,320
था उसमें कहीं भी बात नहीं लिखी थी कि आपकी ओर से ऋषियों का अपमान हो

33
00:02:12,320 --> 00:02:16,400
रहा है। किसी का किसी का कमेंट था एक का ज्यादा नहीं थे कमेंट एक का

34
00:02:16,400 --> 00:02:20,800
किसी का। अच्छा हां वो किया होगा। दूसरी बात ये है कि एक

35
00:02:20,800 --> 00:02:24,960
चीज मेरे पास जो WhatsApp में आई थी उसमें कुछ ऐसा लग रहा था। इसीलिए मैं मुझे

36
00:02:24,960 --> 00:02:28,960
लगता है कि मैं चर्चा शुरू होने से पहले उसको बता दूं उस बात

37
00:02:28,960 --> 00:02:31,440
को कि जो WhatsApp मैसेज मुझे प्राप्त हुआ था

38
00:02:31,440 --> 00:02:35,600
तो उसमें ये कहा गया था कि भाई आप जगह-जगह जाकर के आर्य समाज

39
00:02:35,600 --> 00:02:39,760
से आर्य समाज मंदिरों में जाकर के इंटरव्यू लेते हैं। तो उसमें ऐसा प्रतीत

40
00:02:39,760 --> 00:02:43,840
हो रहा था कि शायद लिखने वाले को यह नहीं ज्ञात है कि मैं

41
00:02:43,840 --> 00:02:47,920
सिर्फ आर्य समाज मंदिरों में ही नहीं गया। मैं इस मंदिर में भी गया हूं। मैं ब्रह्मा कुमारियों के

42
00:02:47,920 --> 00:02:52,080
यहां भी गया हूं। मैं रामपाल के यहां भी गया हूं। रामपाल वाले पे तो मुकदमा कर रखा है। हाई

43
00:02:52,080 --> 00:02:56,400
कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। पेंडिंग है उस समय और यहां लखनऊ स्तर पर बहुत अच्छी कारवाई

44
00:02:56,400 --> 00:03:00,960
हुई है। उसमें लखनऊ में उसका जो आश्रम है वो सीज हो गया है।

45
00:03:00,960 --> 00:03:04,960
हां इतनी सारी चीजें चल रही है। तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ आर्य समाज को ही लेकर

46
00:03:04,960 --> 00:03:09,680
कोई ऐसा पर्सनल कोई टारगेट करना ऐसा कुछ नहीं था। और मेरा जो

47
00:03:09,680 --> 00:03:13,920
पर्सनल वो रहा है कि मैं एक बहुत बड़े जीवन के दौर में

48
00:03:13,920 --> 00:03:18,000
इन सब चीजों से गुजरा हूं कि हमारे सनातनी

49
00:03:18,000 --> 00:03:22,000
भाई बहुत सारे मतों में बटे हुए हैं। भले ही वो कहने

50
00:03:22,000 --> 00:03:26,400
को हिंदू हैं या सनातनी है या वैदिक हैं, आर्य हैं। मगर उन

51
00:03:26,400 --> 00:03:30,400
अगर 10 लोगों को भी हम बिठा दें ना थोड़ी देर के लिए तो उन 10 लोगों के बीच में भी कोई

52
00:03:30,400 --> 00:03:34,560
एक बात डाल देंगे तो 10ों का मत भिन्न हो जाएगा। उस कोई एक बात ऐसी

53
00:03:34,560 --> 00:03:39,280
नहीं जिसको लेकर के हम एकत्रित हो सके। तो मेरा जो ये

54
00:03:39,280 --> 00:03:43,360
हिंदुओं से संबंधित जो संस्थाएं हैं, संगठन है उनमें जाकर के

55
00:03:43,360 --> 00:03:46,480
चर्चा करने का मुख्य उद्देश्य यह रहता है कि जो मूल तत्व

56
00:03:46,480 --> 00:03:50,960
है वो बाहर आए और यदि कोई भ्रांति फैल रही है तो वो शोधित हो जाए।

57
00:03:50,960 --> 00:03:55,040
तो ऐसा नहीं होता है कि कहीं कोई पर्सनल अटैक करना है या प्रहार करना है

58
00:03:55,040 --> 00:03:59,040
जिससे कि हम संगठित हो। हमारा समाज जो है बिखरा हुआ है उसके कारण

59
00:03:59,040 --> 00:04:03,120
ही ये होता है। जी ये तो ठीक है। एकता होनी चाहिए।

60
00:04:03,120 --> 00:04:08,480
जी ऋषि दयानंद ने बहुत प्रयास किया था कि वेद के नाम पर

61
00:04:08,480 --> 00:04:12,560
उन्होंने तो पादरियों मौलवियों को भी बुलाया था। वेद के नाम पर

62
00:04:12,560 --> 00:04:16,800
एक होने चाहिए क्योंकि वेद हम तो मानते

63
00:04:16,800 --> 00:04:20,960
हिंदुओं का ग्रंथ है लेकिन जो अब तक मानते हिंदुओं का ग्रंथ है लेकिन वास्तव

64
00:04:20,960 --> 00:04:25,120
में ये ब्रह्मांडी ग्रंथ है ये मैंने अपनी थ्योरी वैदिक

65
00:04:25,120 --> 00:04:29,440
रश्म सिद्धांत सृष्टि उत्पत्ति कहा मेरा नहीं है ऋषियों का ही है

66
00:04:29,440 --> 00:04:33,520
उसमें सिद्ध वेद ब्रह्मांड का ग्रंथ है केवल हिंदुओं

67
00:04:33,520 --> 00:04:38,640
का नहीं भारत का नहीं धरती का भी नहीं है और वेद मंत्रों से सृष्टि बनी है

68
00:04:38,640 --> 00:04:43,620
तो वेद मन वेद साधारण नहीं बहुत असाधारण है।

69
00:04:43,620 --> 00:04:47,760
[गला साफ़ करने की आवाज़] इसी पे एक हो जाने चाहिए। मनुष्य मात्र का

70
00:04:47,760 --> 00:04:51,920
जो धर्म है वेद का ही धर्म है। बस बस मनुष्य चाहे इस लोक

71
00:04:51,920 --> 00:04:56,080
का है चाहे दूसरे लोकों में रहता हो जो मननशील प्राणी है वो मनुष्य है।

72
00:04:56,080 --> 00:05:00,480
और उस सबका धर्म वैदिक ही है। वेद

73
00:05:00,480 --> 00:05:01,520
धर्म का भी ग्रंथ

74
00:05:01,520 --> 00:05:07,120
है। विज्ञान का भी ग्रंथ है। वैसे विज्ञान धर्म दोनों पर्यायवाची है।

75
00:05:07,120 --> 00:05:11,200
जी हां जी। तो अब उस पर चर्चा अवतार

76
00:05:11,200 --> 00:05:15,200
पर अवतार पर शुरू करें। तो अवतार पर मेरा यही

77
00:05:15,200 --> 00:05:19,440
कहना है कि जैसे जब ईश्वर सर्व सामर्थ्यवान है,

78
00:05:19,440 --> 00:05:23,680
अनंत समर्थवान है, सर्वशक्तिमान है, वो

79
00:05:23,680 --> 00:05:27,840
सृष्टि को बनाता है, स्थिति कर रखता है, लय करता

80
00:05:27,840 --> 00:05:31,920
है। तो एक उसको अवतार लेने में ही आर्य समाज

81
00:05:31,920 --> 00:05:36,160
को क्या आपत्ति हो जाती है? क्या आर्य समाज के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान

82
00:05:36,160 --> 00:05:40,400
नहीं है? जो यहां पर जो है अवतार लेने बाधा बाध्य करता है कि नहीं अवतार

83
00:05:40,400 --> 00:05:44,400
नहीं ले सकता। जैसे कहते हैं ना कि ईश्वर अबाध्य है तो यहां पर ईश्वर

84
00:05:44,400 --> 00:05:48,640
बाधित हो जाता है कि वो अवतार नहीं ले सकता या व्यवहारिक नहीं हो सकता। सगुण साकार स्वरूप

85
00:05:48,640 --> 00:05:52,720
नहीं धारण कर सकता। तो यह मेरा बस है। जी यही आपका

86
00:05:52,720 --> 00:05:57,520
प्रश्न बार-बार रहता है। मैंने लिखा है। जी जी तो [गला साफ़ करने की आवाज़] पहले

87
00:05:57,520 --> 00:06:03,520
प्रमाण से प्रारंभ ना करके तर्क से प्रारंभ कर रहे हैं आप तो भी ठीक है।

88
00:06:04,320 --> 00:06:09,520
सर्व का अर्थ हमें समझना चाहिए।

89
00:06:09,520 --> 00:06:15,520
मीमासा दर्शन एक सूत्र है। सर्वाधिकार

90
00:06:15,840 --> 00:06:20,400
जिसके अधिकृत जो कार्य है

91
00:06:20,400 --> 00:06:24,400
वो सारे कार्य जिसके अधिकृत जो कार्य

92
00:06:24,400 --> 00:06:28,480
जैसे हम यज्ञ करते हैं क्या कहते

93
00:06:28,480 --> 00:06:32,560
सर्वम व पूर्णम स्वाहा सबको समर्पण

94
00:06:32,560 --> 00:06:36,880
कर रहे हैं। इसका अर्थ क्या है? इसका थोड़ी सारा ब्रह्मांड

95
00:06:36,880 --> 00:06:41,040
समर्पित कर रहे हैं। वहां सर्व मतलब मेरे जो अधिकार में मेरे पास जो सामग्री रखी

96
00:06:41,040 --> 00:06:45,120
है इसको मैं सारे समर्पित करता हूं। मीमासा दर्शन का

97
00:06:45,120 --> 00:06:50,000
प्रमाण भी वो दे दिया है। उसका सावर भाष सुना सकता हूं। जरूरत समझे तो

98
00:06:50,000 --> 00:06:54,080
तो सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि ईश्वर के जो पूर्ण

99
00:06:54,080 --> 00:06:58,400
कर्म स्वभावों के अनुकूल जितने भी कार्य है उन सबको

100
00:06:58,400 --> 00:07:02,560
बिना किसी सहायता के करता है। मनुष्य कोई

101
00:07:02,560 --> 00:07:08,160
भी कार्य बिना ईश्वर की सहायता के नहीं कर सकता। जैसे

102
00:07:08,160 --> 00:07:12,160
हम रोटी बनाएंगे ईश्वर नहीं दूसरों की भी सहायता

103
00:07:12,160 --> 00:07:16,800
चाहिए। मनुष्य होंगे गेहूं किसी से लेंगे

104
00:07:16,800 --> 00:07:19,520
गेहूं भी जो किसान है वो मिट्टी से पैदा करेगा

105
00:07:19,520 --> 00:07:23,760
वहां ईश्वर का सेवक चाहिए हल चाहिए

106
00:07:23,760 --> 00:07:27,840
बैल चाहिए मशीन चाहिए चक्की चाहिए पानी चाहिए

107
00:07:27,840 --> 00:07:31,840
बहुत कुछ चाहिए ईश्वर केवल उपादान

108
00:07:31,840 --> 00:07:35,920
कारण प्रकृति से बिना किसी की सहायता से सृष्टि

109
00:07:35,920 --> 00:07:41,120
रचता है कर्ता के लिए करण चाहिए

110
00:07:41,120 --> 00:07:45,120
लेकिन उसके लिए करण नहीं चाहिए साधन नहीं चाहिए हमें साधन

111
00:07:45,120 --> 00:07:49,120
चाहिए हमें तो इंद्रियाित चाहिए हमें शरीर भी चाहिए

112
00:07:49,120 --> 00:07:53,200
पूरा अंतकरण चाहिए उसको नहीं चाहिए हमें

113
00:07:53,200 --> 00:07:57,280
मशीनरी चाहिए दूसरे लोगों का सहयोग चाहिए जानवरों का

114
00:07:57,280 --> 00:08:02,000
सहयोग चाहिए उसको नहीं चाहिए अब ये देख अपन

115
00:08:02,000 --> 00:08:06,400
पहले अपन सृष्टि को समझे

116
00:08:06,400 --> 00:08:10,640
हमारे जैसे आठ अरब लोग भी धरती पर रहते हैं

117
00:08:10,640 --> 00:08:14,720
और लाखों प्रकार की योनिया है।

118
00:08:14,720 --> 00:08:20,720
40 हजार किलोमीटर धरती का घेरा है और

119
00:08:20,720 --> 00:08:24,960
सूर्य से 13 लाख गुना बड़ा है। ऐसे

120
00:08:24,960 --> 00:08:29,120
10 खरब सूर्य है अपनी गैलेक्सी में। उन सबके

121
00:08:29,120 --> 00:08:34,080
अलग-अलग पृथ्वीयां ग्रह उपग्रह आदि है। उल्कापिंड आदि।

122
00:08:34,080 --> 00:08:38,240
ऐसी अरबों गैलेक्सियां है। ये बनी किससे?

123
00:08:38,240 --> 00:08:42,720
उस प्रकृति से जो साम्य अवस्था में पदार्थ था

124
00:08:42,720 --> 00:08:47,920
ना एनर्जी थी ना मास था ना चार्ज था ना वेद कुछ भी नहीं था

125
00:08:47,920 --> 00:08:52,160
उससे बनाया उसके पास उपादान कारण

126
00:08:52,160 --> 00:08:57,200
तो था जिससे बनाना है पर कर कारण कुछ नहीं था साधन कुछ नहीं

127
00:08:57,200 --> 00:09:01,280
इतना बड़ा ब्रह्मांड बिना किसी सहायता के बनाया हम

128
00:09:01,280 --> 00:09:05,360
प्रत्येक कार्य सहायता के बिना नहीं कर सकते किसी की सहायता किए वो बिना किसी

129
00:09:05,360 --> 00:09:09,520
सहायता इसलिए वो सर्वशक्त अगर ऐसा कहने लग जाए कि कुछ भी

130
00:09:09,520 --> 00:09:14,080
करना ये तो मीमांसा दर्शन के विरुद्ध है और फिर तर्क के विरुद्ध भी बताया

131
00:09:14,080 --> 00:09:18,400
प्रमाण छोड़िए अगर मैं कहूं

132
00:09:18,400 --> 00:09:21,520
कि ईश्वर तैमूर बन के भी आ

133
00:09:21,520 --> 00:09:25,920
सकता है भारत में रक्तपात करने के लिए ईश्वर औरंगजेब

134
00:09:25,920 --> 00:09:29,920
तोड़ने औरंगजेब बनने बन के मंदिर तोड़ने भी आ सकता

135
00:09:29,920 --> 00:09:34,720
है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ईश्वर बाबर बनके राम जन्मभूमि तोड़ने आ सकता है।

136
00:09:34,720 --> 00:09:38,720
ईश्वर जनरल डायर बन के भारतीयों की हत्या करने आ सकता है? क्या

137
00:09:38,720 --> 00:09:42,720
ईश्वर चोरी भी कर सकता है? क्या ईश्वर किसी से दुष्कर्म भी कर सकता है?

138
00:09:42,720 --> 00:09:47,360
तो आप कहेंगे नहीं कर सकता। और वेद भी कहता अपापवि

139
00:09:47,360 --> 00:09:51,600
पाप से विध नहीं हो सकता। इसलिए और

140
00:09:51,600 --> 00:09:56,800
देखिए कार्य दो प्रकार के होते हैं सृष्टि में। एक सामान्य और विशेष

141
00:09:56,800 --> 00:10:01,840
सामान्य कार्य क्या होते हैं? जिनमें समान नियम कार्य करते हैं। स्वाभाविक

142
00:10:01,840 --> 00:10:05,840
क्रियाएं कार्य करती है। स्वाभाविक ज्ञान बल कार्य करता है।

143
00:10:05,840 --> 00:10:10,000
श्वेताश्वर उपनिषद कहता है स्वाभाविक ही जान क्रिया।

144
00:10:10,000 --> 00:10:14,000
इतनी बड़ी सृष्टि मैंने बताई उस सृष्टि में एक जैसे नियम काम कर

145
00:10:14,000 --> 00:10:18,240
रहे हैं। ईश्वर ऐसा नहीं करता ये कैसा होता है? करतुम

146
00:10:18,240 --> 00:10:22,480
अकर्तम अन्यथा करत। ये करूं नहीं

147
00:10:22,480 --> 00:10:26,960
करूं उल्टा करूं सीधा करूं। ये मेरा अधिकार है। इसलिए मैं करता हूं।

148
00:10:26,960 --> 00:10:31,040
वो ऐसा नहीं कर सकता। उसके सामान्य कार्य है

149
00:10:31,040 --> 00:10:35,760
और सा दर्शन क्या कहता है? त सनधाना

150
00:10:35,760 --> 00:10:36,800
अधित

151
00:10:36,800 --> 00:10:40,960
मणवत उस पुरुष का उस परमेश्वर का ब्रह्म

152
00:10:40,960 --> 00:10:45,680
का प्रकृति से सनधान संपर्क से वह अधष्ठित्व

153
00:10:45,680 --> 00:10:49,680
सिद्ध होता है वो अधाता है उसका सृष्टि का क्योंकि

154
00:10:49,680 --> 00:10:53,840
पूरी प्रकृति से उसका नेक है उसके निकटता है

155
00:10:53,840 --> 00:10:58,560
वही कंट्रोल कर रहा है फिर आगे लिखते हैं भगवान कबीर

156
00:10:58,560 --> 00:11:02,720
विशेष कार्य [खांसने की आवाज़] विशेष कार्यों में जीवो

157
00:11:02,720 --> 00:11:07,840
का ही दृष्टित होता है तो जन्म लेना

158
00:11:07,840 --> 00:11:13,040
लौकिक कार्य करना यह विशेष कार्य

159
00:11:13,040 --> 00:11:17,040
इसके लिए करण चाहिए ये जीवो का अधात जीवो का क्षेत्र

160
00:11:17,040 --> 00:11:21,120
आ जाता है म ब्रह्म का नहीं ब्रह्म का सामान्य

161
00:11:21,120 --> 00:11:25,680
कर्म है और जीव का विशेष कर्म मैं हूं

162
00:11:25,680 --> 00:11:29,760
मैं आपसे बात कर रहा हूं नहीं भी करूं आप मेरे से बात कर

163
00:11:29,760 --> 00:11:34,400
नहीं भी करें उल्टा करें सीधा करें ये हमारे हमारे विशेष कार्य हो गए।

164
00:11:34,400 --> 00:11:38,400
जन्म लेना, मरना, दुख होना, रोग होना।

165
00:11:38,400 --> 00:11:42,480
ये नहीं हो सकता। अब शंकराचार्य जी का ब्रह्म

166
00:11:42,480 --> 00:11:46,480
सूत्र पढ़ लीजिए कि अगर उसका

167
00:11:46,480 --> 00:11:50,640
शरीर हो तो क्या भोग आदि से ग्रस्त होगा? इसलिए

168
00:11:50,640 --> 00:11:52,240
वो ब्रह्म निराकार

169
00:11:52,240 --> 00:11:56,240
ही है। शंकराचार्य जी महाराज कह रहे हैं। तो

170
00:11:56,240 --> 00:12:00,240
विशेष कार्यों में हमारा अधिकार है। सामान्य कार्यों में जो

171
00:12:00,240 --> 00:12:04,240
सब जगह एक नियम से कार्य कर रहे हैं। स्वाभाविक ज्ञान बल क्रिया कर रहे

172
00:12:04,240 --> 00:12:08,480
हैं। वह परमेश्वर का ब्रह्म का कार्य है। तो वो ब्रह्म अपने सारे कार्य कर

173
00:12:08,480 --> 00:12:12,480
लेता है। यही सर्वशक्तिमान है। ठीक है।

174
00:12:12,480 --> 00:12:16,720
अब मैं आपने एक बार में काफी सारी चीजें दे दी है। तो मैं

175
00:12:16,720 --> 00:12:20,720
जो जो स्मरण में आएगा तो मैं उनको बात करूंगा। पहली बात

176
00:12:20,720 --> 00:12:24,720
तो यह है कि यहां पर आपने सर्व का जो अर्थ लिया है वो जो जो हमारे

177
00:12:24,720 --> 00:12:29,040
अधिकार में आता है उसकी उसके लिया है। उसके लिए आपने आधार भी बताया मीमांसा दर्शन

178
00:12:29,040 --> 00:12:33,120
का कोई वाक्य और इसमें पहली इसमें बात ये आ जाती

179
00:12:33,120 --> 00:12:38,000
है और अगला ही आपने बताया कि क्या वो

180
00:12:38,000 --> 00:12:42,320
जनरल डायर के रूप में आ सकता है? औरंगजेब के मोहम्मद साहब के रूप मोहम्मद

181
00:12:42,320 --> 00:12:46,480
के रूप में आ सकता है। ईसा के रूप में आ सकता है क्या? एक एक वही मैं अब

182
00:12:46,480 --> 00:12:51,120
इसमें क्या है? दो बातें आ जाती हैं कि जैसे कि हम जब सर्वशक्तिमान

183
00:12:51,120 --> 00:12:55,200
का अर्थ यह नहीं लेते हैं कि वह सब कुछ कर सकता है। अगले ही पल जब

184
00:12:55,200 --> 00:12:59,200
हम कहते हैं कि वो सर्वज्ञ है अगले ही पल जब हम कहते हैं कि वो

185
00:12:59,200 --> 00:13:03,200
सर्वव्यापक है तो हम सर्वव्यापक कहते समय वो ये नहीं कहते कि वो

186
00:13:03,200 --> 00:13:07,360
नाली में नहीं है। जब नहीं सब में उसमें भी है। मैं

187
00:13:07,360 --> 00:13:11,520
जब बोल रहा हूं तो आप मुझे आप मुझे आप मुझे

188
00:13:11,520 --> 00:13:15,520
जब हम कहते हैं कि सर्व्यापक है तब हम यह नहीं कहते कि यहां पर सर्व्यापक का अर्थ ये

189
00:13:15,520 --> 00:13:19,600
नहीं है कि वो नाली में भी है। हम कहते वो नाली में भी है। हम सर्वव्यापक का

190
00:13:19,600 --> 00:13:23,600
अर्थ ये नहीं मान लेते कि वो नाली में नहीं है। है ना? इसी प्रकार

191
00:13:23,600 --> 00:13:27,600
से वह सर्वज्ञ भी है। तो हम सर्वज्ञ का अर्थ लेते हैं कि जो

192
00:13:27,600 --> 00:13:32,080
भी कुछ है वह जानता है। जो जिसकी भी जो भी कुछ है उसको

193
00:13:32,080 --> 00:13:36,240
उसकी नॉलेज है। ऑल नोइंग है। सर्वज्ञ है। हम यह नहीं कहते कि कहीं

194
00:13:36,240 --> 00:13:40,560
पर कोई महिला स्नान कर रही है कपड़े उतार करके वो ईश्वर नहीं जानता है।

195
00:13:40,560 --> 00:13:44,800
हम यह नहीं कहते कि कहीं पर कोई दुराचार हो रहा है। वो ईश्वर की ईश्वर नहीं जानता

196
00:13:44,800 --> 00:13:49,040
है। या कोई भी ऐसी चीज जिसको जानना और जानने पर चुप रहना

197
00:13:49,040 --> 00:13:53,040
अपराध माना जा सके वो ईश्वर जानता है। हम यह ईश्वर नहीं जानता

198
00:13:53,040 --> 00:13:57,360
है। हम यह नहीं कहते। हम सर्वज्ञ का अर्थ सर्वज्ञ ही लेते हैं। अब इसी

199
00:13:57,360 --> 00:14:01,440
इसी में छुपी हुई यह जो जनरल डायर और औरंगजेब वाली इत्यादि वाली बातें वो भी आ

200
00:14:01,440 --> 00:14:05,760
जाती है। अगर हम सामान्यत हमारे सामने कोई दुराचरण हो रहा है

201
00:14:05,760 --> 00:14:09,920
और हम लोग वहां पर शांत बैठे हैं तो वहां पर हम पर भी दोष आता है। अगर कोई

202
00:14:09,920 --> 00:14:13,920
ऐसा दुराचरण जिसमें हमारे पास सामर्थ्य है कि हम उसे रोक सकते हैं। मगर वो

203
00:14:13,920 --> 00:14:18,080
हो रहा है। परंतु जब ईश्वर सर्वज्ञ है

204
00:14:18,080 --> 00:14:22,160
और उसकी उसकी नॉलेज में सब कुछ पाप आचरण वगैरह हो रहा है तो उस पर यह

205
00:14:22,160 --> 00:14:22,660
वाला दोष

206
00:14:22,560 --> 00:14:26,720
जा रहा है शांत रहने वाला मगर हम वहां पर पीछे की तात्विक व्याख्या देख लेते

207
00:14:26,720 --> 00:14:30,720
हैं। तात्विक व्याख्या देख लेते हैं कि ईश्वर कर्म बंधन है। उसने फ्री विल

208
00:14:30,720 --> 00:14:34,720
दी है जीवों को। यहां पर तात्विक व्याख्या के आधार पर हम उसको दोषों से

209
00:14:34,720 --> 00:14:38,880
मुक्त कर लेते हैं। दोष लगते हुए भी उसके निर्दोष होना उसका सिद्ध

210
00:14:38,880 --> 00:14:42,880
कर लेते हैं। इसी इसका मतलब क्या है? कि जब हम तात्विक व्याख्या

211
00:14:42,880 --> 00:14:46,960
देखेंगे तब तो यह सिद्ध हो जाएगा कि दोष जो दिखाई दे रहे हैं वह दोष

212
00:14:46,960 --> 00:14:51,040
वस्तुत है नहीं। परंतु जब तक हम तात्विक व्याख्या

213
00:14:51,040 --> 00:14:55,200
देखेंगे नहीं तो ऐसी प्रतीति बिल्कुल हो सकती है कि ईश्वर भी

214
00:14:55,200 --> 00:14:59,440
पाप आचरण से लिप्त हो रहा है। तो यही जो प्रतीति है ना

215
00:14:59,440 --> 00:15:03,680
ये जो जब हम इसको उस प्रपंच रूपी संसार को देखते हैं

216
00:15:03,680 --> 00:15:08,480
तो ईश्वर इसमें जो है वास्तविकता वस्तुतः देखते हैं तो ईश्वर

217
00:15:08,480 --> 00:15:12,560
अवतरित नहीं होता। उसकी प्रतीति है। परंतु व्यवहारिक सत्य होने के कारण वो

218
00:15:12,560 --> 00:15:16,640
हमारे लिए सत्य हो जाता है। एक है परमार्थ कि वस्तुतः क्या हो रहा है

219
00:15:16,640 --> 00:15:20,880
और एक है व्यवहार। तो जितना मेरे लिए संसार सत्य है पहाड़ सत्य है।

220
00:15:20,880 --> 00:15:25,120
उसमें ईश्वर का जो आना जाना है उसकी जो वो परमार्थ

221
00:15:25,120 --> 00:15:29,200
की दृष्टि से प्रतीति मात्र है। परंतु यहां से वो सत्य हो जाता है कि हां ईश्वर

222
00:15:29,200 --> 00:15:33,200
आया। उसने अवतार लिया। अब जो यह जनरल डायर और औरंगजेब वाली

223
00:15:33,200 --> 00:15:37,280
बात है तो इसमें भी वही वाली बात आती है कि जिस प्रकार

224
00:15:37,280 --> 00:15:37,840
से नाली

225
00:15:37,840 --> 00:15:41,840
में होते हुए भी हम उसकी तात्विक व्याख्या लेते हुए हम यह मान लेते

226
00:15:41,840 --> 00:15:46,400
हैं कि ईश्वर पर नाली में होने का दोष नहीं लग रहा है। बलात्कार

227
00:15:46,400 --> 00:15:50,400
का साक्षी होते हुए भी उस पर यह वाला दोष लगते हुए कि

228
00:15:50,400 --> 00:15:54,640
वो समर्थवान है। परंतु वो रोक नहीं रहा है। फिर भी उसकी तात्विक व्याख्या

229
00:15:54,640 --> 00:15:59,280
जान के हम यह समझ लेते हैं कि ईश्वर पर दोष नहीं लग रहा है। उसी प्रकार से

230
00:15:59,280 --> 00:16:03,360
ईश्वर तो यहां पर सब कुछ करता हुआ प्रतीत प्रतीत हो सकता है क्योंकि वह

231
00:16:03,360 --> 00:16:07,680
अनंत है अबाध्य है। परंतु जब हम उसकी तात्विक व्याख्या जान लेंगे

232
00:16:07,680 --> 00:16:11,840
कि भैया ईश्वर पर ये दोष क्यों नहीं जा रहे? क्योंकि ईश्वर के लिए तो ये प्रपंच मात्र

233
00:16:11,840 --> 00:16:16,000
है या माया मात्र है या जो भी है उसके पीछे की कोई एक तात्विक

234
00:16:16,000 --> 00:16:20,160
व्याख्या हमारे पास भी है जिसके कारण ईश्वर प्रतीत तो हो सकता है

235
00:16:20,160 --> 00:16:24,160
सब कुछ करता हुआ जो व्यवहारिक सत्य के अनुसार सत्य हो जाएगा। परंतु

236
00:16:24,160 --> 00:16:28,480
जब हम उसकी तात्विक व्याख्या जानेंगे तो वह सारे दोष ईश्वर उन दोषों

237
00:16:28,480 --> 00:16:32,480
से मुक्त हो जाता है। तो जिस प्रकार वही नाली वाली बात या

238
00:16:32,480 --> 00:16:36,560
दुराचरण का साक्षी होने वाली बात से हम ईश्वर की तात्व व्याख्या के

239
00:16:36,560 --> 00:16:40,720
आधार पर उसको दूर हटा लेते हैं। प्रतीति को हम स्वीकार करते हैं कि हां ऐसी प्रतीति

240
00:16:40,720 --> 00:16:44,880
हो सकती है जब तक तात्विक व्याख्या ना हो। और इसके बाद आपने

241
00:16:44,880 --> 00:16:49,280
क्या कहा है? एक तो यह हो गया था कि वो अपने कार्य कर सकता है।

242
00:16:49,280 --> 00:16:53,040
इसलिए वो सर्वशक्तिमान था। अच्छा इसमें एक बात यह भी आती है कि

243
00:16:53,040 --> 00:16:57,120
ईश्वर को अनंत समर्थवान भी कहा गया है। सर्वशक्तिमान

244
00:16:57,120 --> 00:17:01,280
में हमने इससे कहा कि भाई सर्वज्ञ में आप सब कुछ मान रहे हो। सर्वव्यापक

245
00:17:01,280 --> 00:17:05,440
में आप सब कुछ मान रहे हो। परंतु सर्वशक्तिमान में आप सब कुछ नहीं मान रहे। वहां पर आपने एक

246
00:17:05,440 --> 00:17:09,520
अपनी डेफिनेशन दे दी। मगर साथ ही साथ अनंत समर्थवान भी है। तो यहां पर

247
00:17:09,520 --> 00:17:13,680
तो उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है ना। अगर कहीं भी जाकर के अंत

248
00:17:13,680 --> 00:17:17,840
होगा जैसे कि अबाध्य तो अगर किसी भी कारण से कारण

249
00:17:17,840 --> 00:17:21,840
लॉजिकली हो सकता है वह बाद की बात है मगर किसी भी कारण से यदि

250
00:17:21,840 --> 00:17:26,000
बाधा आ रही है किसी भी कारण से यदि आप ये स्वीकार कर रहे हो कि

251
00:17:26,000 --> 00:17:30,160
वो उसकी सामर्थ्य का अंत हो रहा है तो फिर उसको वहां अनंत नहीं कहेंगे ना

252
00:17:30,160 --> 00:17:34,240
उसको कहेंगे नियमों के कारण ईश्वर भी अनंत सामर्थवान नहीं है

253
00:17:34,240 --> 00:17:38,240
तो फिर यह वाली बात अटक जाएगी तो ये दो तीन चीजें वो चौथी पांचवी चीज आपने

254
00:17:38,240 --> 00:17:43,440
क्या कही थी मुझे याद नहीं है कुछ आपने और भी बताया था जी

255
00:17:43,440 --> 00:17:47,840
तो इसका अर्थ ये हुआ एक तो कि आप

256
00:17:47,840 --> 00:17:52,080
जनरल डायर और भगवान श्री कृष्ण में कोई अंतर नहीं मानते। ये तो प्रपंच

257
00:17:52,080 --> 00:17:56,320
दिख रहा है। नहीं व्यवहारिक सत्य है। व्यवहारिक व्यवहारिक सत्य

258
00:17:56,320 --> 00:18:00,320
है। मानते हैं। व्यवहारिक सत्य ये है कि जनरल डायर

259
00:18:00,320 --> 00:18:04,960
हां। मोहम्मद ईसा कुरान और वेद

260
00:18:04,960 --> 00:18:08,080
इनमें कोई अंतर नहीं है। नहीं अंतर है

261
00:18:08,080 --> 00:18:12,160
ना? व्यवहारिक व्यवहारिक अंतर है मैं बता रहा हूं क्या मैं बता

262
00:18:12,160 --> 00:18:16,240
सुनिए सुनिए पहले तात्विक सत्य तो यही है ना सब प्रपंच है

263
00:18:16,240 --> 00:18:22,160
तात्विक सत्य है जी मैं और आप बात कर रहे हैं ये भी प्रपंच है

264
00:18:22,160 --> 00:18:27,200
हां माया है जी माया है ये माया क्या चीज है

265
00:18:27,200 --> 00:18:31,280
माया इससे थोड़ा सा विषयंतर हो जाएगा एक एक चीज

266
00:18:31,280 --> 00:18:35,920
है जैसे पहला माया लाए हो माया के कारण

267
00:18:35,920 --> 00:18:40,240
मैं कब लाया हूं मैं कब लाया हूं बात को सुनिए। मैंने उसको बता दिया इसलिए जिससे

268
00:18:40,240 --> 00:18:44,240
जनता यदि आपके पक्ष को सुन रही है पूरा तो वो यह भी जानती जाए कि मेरे

269
00:18:44,240 --> 00:18:48,560
पक्ष मेरे पास तात्विक व्याख्या क्या है। मेरा माया मूल

270
00:18:48,560 --> 00:18:52,720
यहां पर कहना नहीं है। मेरा कहना है कि जिस प्रकार से नाली में होते

271
00:18:52,720 --> 00:18:56,800
हुए भी आप एक तात्विक व्याख्या के आधार पर वो तात्विक व्याख्या आपकी

272
00:18:56,800 --> 00:19:00,880
माया नहीं है। ठीक है? वो क्या है? मैं अभी उस पर नहीं जा रहा। मगर एक तात्विक

273
00:19:00,880 --> 00:19:04,880
व्याख्या है जिसके कारण नाली में होने के बावजूद भी आप

274
00:19:04,880 --> 00:19:09,040
ईश्वर को निर्दोष मान रहे हैं। विशुद्ध मान रहे हैं। एक तात्विक व्याख्या आपके पास है।

275
00:19:09,040 --> 00:19:13,040
मेरा यहां कहने का मतलब ये है। दूसरी एक एक ये पूरा कर

276
00:19:13,040 --> 00:19:17,600
लूं ये वाला। उसी प्रकार से बलात्कार का दृष्टा

277
00:19:17,600 --> 00:19:21,920
ठीक है बिना कपड़ों के नहाती हुई महिला और ना जाने कितना कितना दुष्कर्म

278
00:19:21,920 --> 00:19:23,280
से दुष्कर्म उसका

279
00:19:23,280 --> 00:19:27,600
साक्षी होने वाला होते हुए भी आपके पास एक तात्विक व्याख्या

280
00:19:27,600 --> 00:19:31,920
है इसलिए आप उसको इन दोषों से भी निर्दोष मानते हैं। इसी

281
00:19:31,920 --> 00:19:36,160
प्रकार से मेरे पास भी एक तात्विक व्याख्या होती है जिसके आधार पर

282
00:19:36,160 --> 00:19:40,240
मैं सब जगह सब कुछ करने वाला होते हुए भी ईश्वर पर कोई दोष

283
00:19:40,240 --> 00:19:44,400
ना लगने वाला उसे सिद्ध कर सकता हूं। वो तात्विक व्याख्या खोलना अभी जरूरी

284
00:19:44,400 --> 00:19:48,400
नहीं है। अभी यह है कि ईश्वर यदि अनंत सामर्थवान है तो फिर

285
00:19:48,400 --> 00:19:52,400
उसके सामर्थ्य का अंत क्यों हो रहा है? ईश्वर अगर हम अगर हम

286
00:19:52,400 --> 00:19:56,640
ईश्वर का सर्वज्ञ का ले रहे हैं सब कुछ जानने वाला सर्व्यापक का ले रहे हैं सब

287
00:19:56,640 --> 00:20:00,640
सब जगह होने वाला तो फिर हम सर्वशक्तिमान का मतलब सब कुछ कर सकने वाला

288
00:20:00,640 --> 00:20:04,880
क्यों नहीं ले रहे? जी देखिए सर्वज्ञ का अर्थ

289
00:20:04,880 --> 00:20:10,400
सब कुछ जानने वाला। लेकिन ये पूछे कि ईश्वर अपनी

290
00:20:10,400 --> 00:20:15,280
अपनी मृत्यु भी जानता है क्या कि कब मरेगा तो आप क्या कहेंगे

291
00:20:15,280 --> 00:20:19,760
वो तो अलीक पदार्थ है ना हां तो कहेंगे मृत्यु होती

292
00:20:19,760 --> 00:20:23,840
मृत्यु होती नहीं तो जानेगा कैसे जी अली पदार्थ हुआ कि नहीं बाधित

293
00:20:23,840 --> 00:20:27,920
हुआ कि नहीं नहीं बाधित नहीं हुआ मैं बता मैं बता रहा हूं कैसे मैं बता रहा हूं

294
00:20:27,920 --> 00:20:33,440
कैसे बाधित नहीं हुआ बाधित नहीं हुआ और दूसरी बात दूसरी बात

295
00:20:33,440 --> 00:20:37,680
एक परीक्षा वाले में विद्यार्थी बैठे हैं परीक्षा देने के लिए।

296
00:20:37,680 --> 00:20:39,760
ठीक है?

297
00:20:39,760 --> 00:20:42,960
एक निरीक्षक है।

298
00:20:42,960 --> 00:20:46,960
कोई कॉपी मांगता है, कॉपी दे देता है। और उसमें एक

299
00:20:46,960 --> 00:20:51,440
गाली लिख रहा है। एक सही उत्तर कर रहा है। गाली

300
00:20:51,440 --> 00:20:55,520
लिखते हुए देख के भी उसको टोकता नहीं है। रोकता नहीं है। वो

301
00:20:55,520 --> 00:21:00,000
कहता है एक और कॉपी चाहिए एक और ले ले।

302
00:21:00,000 --> 00:21:04,160
रोकता रोकता नहीं है। जब कॉपी उसके पास जाती है तब अंक देता

303
00:21:04,160 --> 00:21:08,240
है। अगर रोकने लग जाए तो जीव की सत्ता ही

304
00:21:08,240 --> 00:21:12,800
समाप्त हो जाए। स्वतंत्रता भंग हो जाए। स्वतंत्र करता और फिर

305
00:21:12,800 --> 00:21:17,520
हर काम में टोकना सृष्टि नहीं चलेगी। सृष्टि क्यों बनी?

306
00:21:17,520 --> 00:21:21,600
जीवों के कर्म के आकर्षण से ही प्रकृति में सृष्टि होने की

307
00:21:21,600 --> 00:21:26,240
सृष्टि बनने की प्रवृत्ति हुआ करती है। सा दर्शन कहता है

308
00:21:26,240 --> 00:21:30,320
अगर वो रोकने लग जाएगा तो हमारा क्या अस्तित्व है? हम

309
00:21:30,320 --> 00:21:34,560
कुछ है कि नहीं? वो तो दंड देगा। कर्मण अधिकार

310
00:21:34,560 --> 00:21:38,560
माले गीता में आप भी पढ़ते हैं। हम कर्म

311
00:21:38,560 --> 00:21:42,560
करने में हमारा अधिकार है। फल देने में उसका अधिकार नहीं है। उसको रोकने का अधिकार नहीं

312
00:21:42,560 --> 00:21:46,560
है। उसको तो दंड देने का अधिकार है। और रोकता भी है। जब

313
00:21:46,560 --> 00:21:50,640
भी कोई व्यक्ति गलत काम करता है उसके मन में भय, लज्जा, शंका

314
00:21:50,640 --> 00:21:54,880
होती है कि ऐसा मत कर। फिर भी करता है तो

315
00:21:54,880 --> 00:22:00,720
फिर दंड मिलता है। तीन सत्ता अनादि ईश्वर की प्रकट।

316
00:22:00,720 --> 00:22:05,200
अब उसकी अनंत सामर्थ तो जब भंग होगी जब अवतार लेना पड़ेगा उसको।

317
00:22:05,200 --> 00:22:09,280
रावण को मारने के लिए अवतार लेना पड़ेगा।

318
00:22:09,280 --> 00:22:13,280
इतने बड़े सूर्य को बनाया, सारे ब्रह्मांड को बनाया, तारों को बनाया, रावण

319
00:22:13,280 --> 00:22:17,280
को पैदा भी किया तब नहीं शरीर धारण किया और मारने के लिए शरीर धारण करेगा।

320
00:22:17,280 --> 00:22:21,280
वो तो उसके अंदर ही बैठा था। यसत्म आत्म

321
00:22:21,280 --> 00:22:26,960
यसत्म शरीर क्या वो रावण के शरीर में नहीं बैठा था? क्या वही

322
00:22:26,960 --> 00:22:30,960
नहीं मार सकता था? उसके लिए तो नाटक करना पड़ेगा और नाटक करने से

323
00:22:30,960 --> 00:22:35,200
क्या होगा कि वो विकार विकारी

324
00:22:35,200 --> 00:22:40,000
हो जाएगा। एक जगह

325
00:22:40,000 --> 00:22:44,080
एक जगह अलग स्पेशल क्रिया करेगा तो वो

326
00:22:44,080 --> 00:22:48,320
विकारी हो जाएगा और ब्रह्म सूत्र पढ़िए। ईश्वर

327
00:22:48,320 --> 00:22:52,720
विकारी नहीं हो सकता। वो निर्विकार है।

328
00:22:52,720 --> 00:22:57,360
इसलिए अवतार लेना अवतार लेने की जरूरत पड़ेगी।

329
00:22:57,360 --> 00:23:01,360
पृथ्वी को बनाने में, पृथ्वी को चलाने में, सूर्य को बनाने में, सूर्य को

330
00:23:01,360 --> 00:23:05,520
घुमाने में, सारी गैलेक्सी घुमाने में और हमें सबको जन्म

331
00:23:05,520 --> 00:23:09,760
देने में, हमें सबको मारने में, बड़े-बड़े भूकंप लाने में,

332
00:23:09,760 --> 00:23:13,760
बड़े-बड़े तारों में विस्फोट करने में, उसको हाथ पैरों

333
00:23:13,760 --> 00:23:18,080
की जरूरत नहीं पड़ती। और वहां हाथ पैरों की जरूरत पड़ेगी। उपन कहता है अपाणि

334
00:23:18,080 --> 00:23:21,360
पादो जवनो गहिता

335
00:23:21,360 --> 00:23:25,600
वहां बिना हाथ के ग्रहण करता है बिना पैरों के चलता है

336
00:23:25,600 --> 00:23:29,600
और वहां रावण को मारने के लिए शरीर लेना पड़ेगा क्यों

337
00:23:29,600 --> 00:23:33,680
भाई वैसे नहीं मरता रावण भूकंप इतने आते

338
00:23:33,680 --> 00:23:37,760
हैं और फिर कहते हैं कि जन्म लेता

339
00:23:37,760 --> 00:23:41,760
क्यों अधर्म के नाश के लिए आज से बड़ा अधर्म कब हुआ आज

340
00:23:41,760 --> 00:23:45,760
जितना धरती पर अधर्म हो रहा है मंदिर तोड़े श्री

341
00:23:45,760 --> 00:23:49,920
राम के श्री राम जी प्रकट नहीं हुए थोड़ा सा

342
00:23:49,920 --> 00:23:54,240
थोड़ा सा थोड़ा सा इसमें एक बात एक निवेदन करना चाहूंगा आप अपनी एक्सप्लेनेशन

343
00:23:54,240 --> 00:23:55,120
जारी करिए वो

344
00:23:55,120 --> 00:23:59,600
है क्या कि कुछ चीजें ऐसी होती है जिसमें हम

345
00:23:59,600 --> 00:24:03,680
अगर उनको संक्षिप्त में भी कह देंगे तो काम चल जाएगा मगर जब विस्तार से कहते हैं

346
00:24:03,680 --> 00:24:08,640
तो जैसे उसमें क्या होता है कि भावनाएं

347
00:24:08,640 --> 00:24:12,880
लोगों की होती है उससे जुड़ी हुई होती है अब क्या होगा कि भले ही मेरे

348
00:24:12,880 --> 00:24:17,120
पास उसका बहुत अच्छा उत्तर है उन भावनात्मक प्रश्नों तो मुझे

349
00:24:17,120 --> 00:24:21,280
एक एक्स्ट्रा अलग से समय निकालना पड़ेगा। जरूर मतलब

350
00:24:21,280 --> 00:24:25,440
जरूरत पड़नी करनी पड़ेगी कि आपकी उन भावनात्मक बातों का भी उत्तर दूं। जबकि

351
00:24:25,440 --> 00:24:29,520
उनका बहुत ज्यादा महत्व नहीं है। तो आप वो जो एक्सप्लेनेशन है कि ऐसा भी हो

352
00:24:29,520 --> 00:24:33,520
रहा है। बहुत ज्यादा वो जो आपका क्योंकि ये मैंने देखा है जो

353
00:24:33,520 --> 00:24:37,520
आर्य समाज का पक्ष होता है वहां से कहा जाता है कि यहां ये लूटा गया सोमनाथ में

354
00:24:37,520 --> 00:24:41,600
ये हुआ वो हुआ। इस तरह से बहुत सारे उदाहरण दे आप एक भी दे देंगे चल

355
00:24:41,600 --> 00:24:45,600
जाएगा। जो सिद्धांतिक प्रश्न है वो कर दीजिए। जी कब आता है

356
00:24:45,600 --> 00:24:49,600
अधर्म के नाश के लिए आता है परमात्मा आना पड़ता है जी

357
00:24:49,600 --> 00:24:53,600
तो सतयुग में अधर्म नहीं था सबसे ज्यादा अवतार सतयुग में हुए

358
00:24:53,600 --> 00:24:57,680
समझ गया वो एक से ही हो गया जी तो फिर ये बताइए और सारे अवतार

359
00:24:57,680 --> 00:25:01,760
भारत में हुए यही पापी था क्या भारत ही असल में किसी

360
00:25:01,760 --> 00:25:06,400
मनुष्य को मारने के लिए ईश्वर को अवतार लेना [हंसी] पड़े

361
00:25:06,400 --> 00:25:10,960
तो ईश्वर की गरिमा नहीं बढ़ती उसका सामर्थ उसका

362
00:25:10,960 --> 00:25:15,200
सिद्ध नहीं होता सिद्ध उसका सामर्थ होता है जो मरा रावण का सामर्थ

363
00:25:15,200 --> 00:25:19,360
सिद्ध हो रहा है कि उसे मारने के लिए सारी सृष्टि के स्वामी

364
00:25:19,360 --> 00:25:23,600
को आना पड़ा। कंस का सामर्थ सिद्ध हो रहा है

365
00:25:23,600 --> 00:25:27,600
कि उसको मारने के लिए सारी सृष्टि को बनाने वाले को

366
00:25:27,600 --> 00:25:33,600
आना पड़ा। ये उनका सामर्थ बढ़ा रहे हम। परमात्मा को नहीं बढ़ा रहे। जी

367
00:25:33,920 --> 00:25:38,080
ठीक है। मैं बोलता हूं। आपने एक बात तो पहले ही कही है कि

368
00:25:38,080 --> 00:25:42,080
क्या वो अपना अंत बता सकता है? है ना? तो यहां पर उसकी सामर्थ्य का

369
00:25:42,080 --> 00:25:46,480
अंत हो रहा है। तो इसमें क्या होता है? यह बहुत सारी ऐसी लॉजिकल फैलेसी

370
00:25:46,480 --> 00:25:50,560
होती हैं जो ईश्वर का खंडन करने के लिए नास्तिक इस्तेमाल करते हैं। अब जैसे इसके

371
00:25:50,560 --> 00:25:54,560
उत्तर में मैं अगर यह कह दूं कि मैं इसका जो उत्तर है उस

372
00:25:54,560 --> 00:25:58,720
व्यक्ति को समझा सकता हूं। इस इस प्रश्न का उत्तर वही व्यक्ति समझ

373
00:25:58,720 --> 00:26:03,520
सकता है जो अपना प्रश्न मुझे इस प्रकार से बोले कि मैं समझ ना पाऊं।

374
00:26:03,520 --> 00:26:07,760
इस प्रश्न का उत्तर मैं उस व्यक्ति को समझा सकता हूं जो अपना प्रश्न मुझसे

375
00:26:07,760 --> 00:26:12,000
इस प्रकार से बोले कि मैं समझ ना पाऊं। तो ये क्या है? एक लॉजिकल फैलेसी

376
00:26:12,000 --> 00:26:16,240
मैंने भी एक जवाब में एक दे दी। इसके अलावा और भी चीजें हैं। दूसरी

377
00:26:16,240 --> 00:26:20,320
बात अगर हम व्यवहार और परमार्थ मानते हैं। अगर इस जगत

378
00:26:20,320 --> 00:26:24,320
को प्रपंच मात्र मान लेते हैं तो ईश्वर की बाधा कहीं भी हो ही नहीं

379
00:26:24,320 --> 00:26:26,000
सकती। कैसे नहीं हो सकती? कि

380
00:26:26,000 --> 00:26:30,000
ईश्वर जब यहां पर राम रूप में आएंगे, कृष्ण रूप में आए तो आएंगे तो वो घोषित

381
00:26:30,000 --> 00:26:34,160
कर सकते हैं। इस व्यवहारिक लीला को मैं कब समाप्त करूंगा? बता सकते हैं अपना अंत

382
00:26:34,160 --> 00:26:38,160
व्यवहार में। परमार्थ में नहीं जो पारमार्थिक सत्ता है हम उससे नहीं कह रहे

383
00:26:38,160 --> 00:26:42,160
कि ईश्वर अवतार लेता है। व्यवहारिक सत्ता के अनुसार हम कह रहे हैं कि ईश्वर अवतार लेता है।

384
00:26:42,160 --> 00:26:46,240
परमार्थ में ईश्वर अवतार नहीं लेता है। वास्तविकता में जो पारमार्थिक सत्य

385
00:26:46,240 --> 00:26:50,320
है उसके अनुसार नहीं। जैसे व्यवहार में हमने कोई हमारी माता नहीं है।

386
00:26:50,320 --> 00:26:54,720
कोई हमारी बहन नहीं है। कोई हमारा पिता नहीं है। सब जीवात्मा मात्र हैं। यह पारमार्थिक

387
00:26:54,720 --> 00:26:58,880
सत्य है। परंतु व्यवहार में हमने स्वीकार किया है कि ये हमारी माता जी है। हमारी बहन

388
00:26:58,880 --> 00:27:03,280
जी हैं। और उसके अनुसार हम बिहेव भी कर रहे हैं। जैसे कि पृथ्वी वैज्ञान

389
00:27:03,280 --> 00:27:07,280
के आधार पर गोल मानी जाती है। ठीक है? परंतु हमारे व्यवहार

390
00:27:07,280 --> 00:27:11,280
में पृथ्वी चपटी आती है। तो हम पृथ्वी के साथ चपटा व्यवहार करते हैं यह

391
00:27:11,280 --> 00:27:15,360
जानते हुए कि कि पृथ्वी गोल है। थ्योरिकली वो गोल है। तो एक तो ये

392
00:27:15,360 --> 00:27:19,360
वाली बात हो गई कि ईश्वर किस प्रकार से कर सकता है। दूसरी बात अलीक पदार्थ कैसे है?

393
00:27:19,360 --> 00:27:23,440
अलीक पदार्थ ऐसे है कि जैसे हमने कहा ईश्वर क्या ईश्वर

394
00:27:23,440 --> 00:27:27,680
अपना अंत बता सकता है। अब मैं उसकी बात कर रहा हूं परमार्थ पारमार्थिक सत्ता की।

395
00:27:27,680 --> 00:27:31,760
तो ईश्व क्या ईश्वर यह बता सकता है कि उसका अंत कहां पर है? जब हमने खुद ही

396
00:27:31,760 --> 00:27:35,840
यह स्वीकार किया है कि ईश्वर वो है जिसका कोई

397
00:27:35,840 --> 00:27:40,400
अंत नहीं है तो फिर ईश्वर पर अंत बताने का हम वो करके

398
00:27:40,400 --> 00:27:41,120
अपने प्रश्न

399
00:27:41,120 --> 00:27:45,280
में जो ईश्वर शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं उसका खंडन खुद ही कर रहे हैं। मतलब

400
00:27:45,280 --> 00:27:49,360
हमने पहले कुछ बोला और बाद में खुद ही उस चीज को काट दिया।

401
00:27:49,360 --> 00:27:53,440
एक ऐसा वाक्य बोला जिसमें पहले जो भी हमने बोला है बाद में

402
00:27:53,440 --> 00:27:57,440
उसका खुद ही खंडन कर दिया। तो हमारे वाक्य का निचोड़ यह आया जब हम यह

403
00:27:57,440 --> 00:28:01,760
वाक्य बोल रहे हैं। क्या ईश्वर अपना अंत बता सकता है? तो हम अप्रत्यक्ष

404
00:28:01,760 --> 00:28:05,760
रूप से कह रहे हैं क्या ईश्वर ऐसा कुछ बता सकता है कि कुछ भी

405
00:28:05,760 --> 00:28:10,080
पता ना लगे क्योंकि उस प्रश्न का जब हम निचोड़ निकालेंगे

406
00:28:10,080 --> 00:28:14,160
ईश्वर भी आ गया और हमने उस पर अंत भी थोप दिया ईश्वर भी आ गया और

407
00:28:14,160 --> 00:28:18,480
उस पर हमने अंत भी थोप दिया यानी अंत थोपने से हमने उसे ईश्वर नहीं माना

408
00:28:18,480 --> 00:28:22,640
और ईश्वर कहने से हमने उसे ईश्वर मान लिया यानी हमने एक एक

409
00:28:22,640 --> 00:28:26,640
पंक्ति में दो बातें बोल दी और पहली वाली बात से दूसरी वाली बात काट

410
00:28:26,640 --> 00:28:30,720
दी दूसरी वाली बात से पहली वाली बात काट दी तो हम अंततवा

411
00:28:30,720 --> 00:28:34,720
अपने इस पंक्ति में यह पूछ रहे हैं कि क्या

412
00:28:34,720 --> 00:28:39,440
ईश्वर हमें कुछ ऐसा बता सकता है कि कुछ हमें कुछ भी ना सुनाई दे तो बिल्कुल

413
00:28:39,440 --> 00:28:43,840
ईश्वर ऐसा कर सकता है ईश्वर मौन रहेगा हमें कुछ भी सुनाई नहीं देगा

414
00:28:43,840 --> 00:28:47,920
हो गया एक मिनट मैं आगे पूरा कर दूं अच्छा फिर

415
00:28:47,920 --> 00:28:52,720
आगे आपने कहा तात्विक व्याख्या आपने बताई वो जो वो जो

416
00:28:52,720 --> 00:28:56,240
क्या कहते हैं इस्लाम वाले भी यही वो रखते हैं कि

417
00:28:56,240 --> 00:29:00,240
भाई ईश्वर हस्तक्षेप क्यों नहीं करता तो वो एक अलग तात्व व्याख्या हो जाएगी। मैंने तो पहले

418
00:29:00,240 --> 00:29:04,240
ही स्वीकार किया कि नाली में रहते हुए भी हम ईश्वर को

419
00:29:04,240 --> 00:29:08,400
विशुद्ध मानते हैं। सबसे पवित्र मानते हैं। नाली में भी है तब भी हर

420
00:29:08,400 --> 00:29:12,480
कण में है तब भी हम पवित्र मानते हैं ईश्वर को। तो हमारे

421
00:29:12,480 --> 00:29:16,720
पास क्योंकि उसके लिए एक तात्विक व्याख्या है। परंतु जब तक वो तात्विक

422
00:29:16,720 --> 00:29:21,040
व्याख्या हम बता नहीं रहे हैं तब तक ऐसी प्रतीति हो सकती है कि ईश्वर

423
00:29:21,040 --> 00:29:25,200
एक अशुद्ध अशुद्धि अशुद्धि से जुड़ा

424
00:29:25,200 --> 00:29:29,360
जुड़ा हुआ है। ठीक है? उसी प्रकार से मैंने कहा है कि प्रतीति में

425
00:29:29,360 --> 00:29:33,440
ये जो व्यवहारिक प्रतीति है हमारी इसमें ईश्वर का अवतार हो सकता है। उसी आधार

426
00:29:33,440 --> 00:29:37,440
वो सब कुछ करने वाला हमें प्रतीत हो सकता है। इसीलिए भगवान ने कहा

427
00:29:37,440 --> 00:29:41,680
मैं अजन्मा अविनाशी होते हुए भी अपनी योग माया को अधीन करके

428
00:29:41,680 --> 00:29:45,680
प्रकट होता हूं। इसीलिए वेद में भी इस तरह के वाक्य आए हैं कि यद्यपि वे

429
00:29:45,680 --> 00:29:50,160
अजन्मा है अविनाशी है। फिर भी वो नाना रूपों में माया के द्वारा उत्पन्न होता है।

430
00:29:50,160 --> 00:29:54,800
कौन सा वेद मंत्र है? मैं मैं अभी बता दूंगा। मैं वो जो है ना

431
00:29:54,800 --> 00:29:58,800
जो प्रमाण वाली बात है उसको एक सेकंड सेशन में

432
00:29:58,800 --> 00:30:03,600
चालू रखना चाहता हूं। इसीलिए मैंने आपके किसी भी प्रमाण में प्रमाण नहीं दिया।

433
00:30:03,600 --> 00:30:07,840
अच्छा अब विकारी वाली बात भी मैंने आपको बता दी नाली वाली बात और

434
00:30:07,840 --> 00:30:11,440
दुराचरण का दृष्टा होने पर भी मौन रहने वाली बात। यानी कि

435
00:30:11,440 --> 00:30:15,680
जब तक मैं आपसे आपकी तात्विक व्याख्या नहीं पूछूंगा तब तक मुझे

436
00:30:15,680 --> 00:30:19,840
ईश्वर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हां ईश्वर विकार से

437
00:30:19,840 --> 00:30:24,000
जुड़ा हुआ है। यह प्रतीति हो सकती है। तो वही वाली बात है कि

438
00:30:24,000 --> 00:30:28,480
समस्त कर्मों को करते हुए भी गीता के अनुसार तू मुझे अकर्ता जान।

439
00:30:28,480 --> 00:30:32,560
क्यों अकर्ता? क्योंकि ना ही मैं उनसे वो जो कर्म हो रहे हैं उनसे मिलने वाले

440
00:30:32,560 --> 00:30:36,560
फल में मेरी आसक्ति है। और वास्तविकता तो है कि कहीं कुछ हो ही नहीं रहा

441
00:30:36,560 --> 00:30:40,560
है। चार 24 भगवत गीता। तो मेरे पास एक तात्विक व्याख्या होती

442
00:30:40,560 --> 00:30:44,720
है जिसके कारण वो जो प्रतीति हो रही है भगवान की वो जो प्रतीति हो रही है भगवान

443
00:30:44,720 --> 00:30:48,800
की समस्त उसमें होने वाली उस तात्विक व्याख्या के आधार पर उस जो

444
00:30:48,800 --> 00:30:52,880
दोष लग सकता है भगवान पर वो हम उससे निर्दोष उसे सिद्ध कर

445
00:30:52,880 --> 00:30:56,960
लेते हैं। तीसरी बात अब अब आई सबसे वो वाली बात

446
00:30:56,960 --> 00:31:01,040
कि कंस को मारने क्यों नहीं आए और सारे अवतार जो है भारत में ही क्यों हुए? तो

447
00:31:01,040 --> 00:31:05,200
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ईश्वर बाध्य है कंस को मारने के लिए अवतार

448
00:31:05,200 --> 00:31:09,680
लेने के लिए। ईश्वर बाध्य नहीं है। जैसे कि ईश्वर ने

449
00:31:09,680 --> 00:31:13,760
ईश्वर ने वेदों में अलंकार क्यों दिए? वेदों में जगह-गह

450
00:31:13,760 --> 00:31:18,240
पर अलंकार माना गया है। तो ईश्वर ने अलंकार क्यों दिए? बाध्य

451
00:31:18,240 --> 00:31:22,320
नहीं है। मगर हम यह कहेंगे कि ईश्वर जो है ऐसे

452
00:31:22,320 --> 00:31:27,120
बहुत से प्रश्न उठ जाएंगे कि उसने पेड़ों का कलर हरा ही क्यों चुना?

453
00:31:27,120 --> 00:31:31,200
या उसने अमुक व्यवस्था क्यों की? तो ईश्वर अवतार के लिए बाध्य नहीं

454
00:31:31,200 --> 00:31:35,200
है और अवतार का जो मुख्य प्रयोजन है वह किसी को मारना ही नहीं है।

455
00:31:35,200 --> 00:31:39,520
ऐसी लीला में आना इस तरह का रूप धारण करना कि उस

456
00:31:39,520 --> 00:31:43,760
रूप के प्रति इस प्रपंच रूपी अविद्या रूपी संसार में जुड़ा हुआ व्यक्ति

457
00:31:43,760 --> 00:31:48,080
उस रूप के प्रति आकृष्ट हो सके। उसमें अपनी निष्ठा ला सके और उसमें

458
00:31:48,080 --> 00:31:52,400
ध्यान केंद्रित करके अपना भगवत भजन करते हुए मुक्त हो सके। भक्ति

459
00:31:52,400 --> 00:31:56,400
कर सके भगवान। एक और है। तो अब यह वाली बात है

460
00:31:56,400 --> 00:32:00,560
कि जो है उसको अवतार लेने की आवश्यकता क्या है? तो इसमें बहुत

461
00:32:00,560 --> 00:32:04,720
सी बातें फिर आ जाएंगी कि उसको जो है बहुत सी ऐसी चीजें उसने की है कि उसको अपना

462
00:32:04,720 --> 00:32:08,880
ज्ञान विज्ञान मंत्र के रूप में देने की आवश्यकता ही क्या है? उसमें भी अलंकार देने की आवश्यकता

463
00:32:08,880 --> 00:32:12,960
ही क्या है? बहुत सी चीजें उसमें आती जाएंगी और अंत में अंत में ये आएगा

464
00:32:12,960 --> 00:32:17,120
कि ईश्वर की अपनी आवश्यकता तो कुछ है ही नहीं। वह तो सच्चिदानंद है। उसको

465
00:32:17,120 --> 00:32:21,440
तो कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। तो यह वाली बात है। और

466
00:32:21,440 --> 00:32:25,520
अगली बात है सारे अवतार भारत में ही के हुए। तो ये प्रश्न तो

467
00:32:25,520 --> 00:32:29,600
आर्य समाज से भी किया जा सकता है कि वेद मंत्र केवल भारत के ऋषियों को ही

468
00:32:29,600 --> 00:32:33,600
प्राप्त क्यों हुए? ये भी हो सकता है। दूसरी बात सारे अवतार

469
00:32:33,600 --> 00:32:37,600
भारत में नहीं हुए हैं। जहां पर भगवान ने अवतार लिए हैं

470
00:32:37,600 --> 00:32:42,160
उसे भारत कहा गया। इसको थोड़ा सा देखने का नजरिया जहां पर भगवान के

471
00:32:42,160 --> 00:32:46,160
एक मिनट सारे एक मिनट सारे अवतार भारत में नहीं हुए

472
00:32:46,160 --> 00:32:50,240
हैं। जहां पर भगवान के अवतार होते हैं उसे भारत कहा गया। एक चीज और है आपकी

473
00:32:50,240 --> 00:32:54,400
वो रह गई जो आपने कहा कि पाप आचरण होता है तो वो आता है।

474
00:32:54,400 --> 00:32:58,400
पाप जब बढ़ जाता है तो आता है। ये प्रश्न आर्य समाज से भी किया जा सकता है कि

475
00:32:58,400 --> 00:33:02,560
वो कर्मों का फल देता है। वो कर्मों का फल देता है। तो अब और कब

476
00:33:02,560 --> 00:33:07,440
कौन से कर्म का इंतजार है? दुनिया मैं नहीं कह रहा मैं नहीं कह रहा

477
00:33:07,440 --> 00:33:12,880
है नहीं नहीं आपने ये कहा ना कि ईश्वर जो है

478
00:33:12,880 --> 00:33:16,880
आप कहते हैं आप कहते हैं यदा परित्राण साधु नाम तो

479
00:33:16,880 --> 00:33:21,440
ये तो ये तो ये वाली बात आप कहते हैं ना कि ईश्वर कर्मों का फल देता है

480
00:33:21,440 --> 00:33:25,760
कर्म उसके लिए शरीर धारण की जरूरत नहीं एक एक मिनट

481
00:33:25,760 --> 00:33:29,840
एक मिनट वो बात ये आ रही है कि अगर कर्मों का फल ईश्वर देता है

482
00:33:29,840 --> 00:33:34,400
तो कब देगा भाई निर्भय हत्याकांड हो रहा है लोग लुट रहे हैं भूखे मर रहे

483
00:33:34,400 --> 00:33:38,880
फाइल हो रही है दुनिया में ना जाने आप ही के चैनल पर मैंने देखा कितनी सारी वामपंथी

484
00:33:38,880 --> 00:33:43,040
साजिशें षड्यंत्र हो रहे हैं और कब देगा ईश्वर कर्मों का फल बस अब

485
00:33:43,040 --> 00:33:47,280
ये तो ये हां ठीक है जी बोलिए आपके

486
00:33:47,280 --> 00:33:51,760
एक बात सबके मूल में आ रही है ये जगत प्रपंच है पारमार्थिक

487
00:33:51,760 --> 00:33:57,200
तात्विक ये शब्द जाल में मतल उलझाइए सुनिए

488
00:33:57,200 --> 00:34:01,920
जगत प्रपंच नहीं है जगत वास्तविकता है ब्रह्म

489
00:34:01,920 --> 00:34:06,160
सूत्र का दूसरा दूसरा सूत्र क्या कहता है?

490
00:34:06,160 --> 00:34:10,170
अ पहला सूत्र है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा दूसरा

491
00:34:10,170 --> 00:34:14,480
[गला साफ़ करने की आवाज़] कहता है जन्मादेशत प्रपंच का जन्म नहीं होता।

492
00:34:14,480 --> 00:34:18,480
अच्छा जगत प्रपंच क्या है? प्रपंच मतलब है नहीं पर

493
00:34:18,480 --> 00:34:23,040
दिख रहा है। किसको दिख रहा है? देखने वाला कौन है? एक

494
00:34:23,040 --> 00:34:27,920
आपको मैं एक एक छोटी सी चीज बस छोटा सा पहले

495
00:34:27,920 --> 00:34:32,160
जी बोलिए बोलिए बोलिए पूरा लेक्चर दिया। बोलिए जगत प्रपंच

496
00:34:32,160 --> 00:34:36,480
नहीं है। जगत वास्तविक है। जगत मिथ्या नहीं है।

497
00:34:36,480 --> 00:34:40,960
ईश्वर जीव प्रकृति तीनों अनादि है। सुपर्णा सजा सखाया

498
00:34:40,960 --> 00:34:44,080
समान वृक्षम परिजाते

499
00:34:44,080 --> 00:34:48,080
ये वेद मंत्र कहता है इस प्रकृति

500
00:34:48,080 --> 00:34:52,160
रूपी वृक्ष पर दो पक्षी है। एक फल खाता

501
00:34:52,160 --> 00:34:56,160
है, देखता है, खाता है, उछल कूद

502
00:34:56,160 --> 00:35:00,480
करता है। एक साक्षी भाव से [हंसी] साक्षी भाव वाला है।

503
00:35:00,480 --> 00:35:05,920
जीव कर्म फल करता और भोगता है। वैसे

504
00:35:05,920 --> 00:35:10,640
योग दर्शन कहता है व्यास भाष्य में महर्षि व्यास जी ने

505
00:35:10,640 --> 00:35:12,400
लिखा है कि उस ईश्वर

506
00:35:12,400 --> 00:35:17,200
का अपना कोई प्रयोजन नहीं सृष्टि बनाने में। सब जीवो के

507
00:35:17,200 --> 00:35:21,360
अनुग्रह के लिए सब जीवो को के उपकार के लिए वो

508
00:35:21,360 --> 00:35:25,520
सृष्टि रचना करता है। जब जीव ही नहीं है वो भी प्रपंच

509
00:35:25,520 --> 00:35:29,600
है। वो भी ब्रह्म रूप है। तो सृष्टि क्यों बनाई? किसी भी ऋषि ने

510
00:35:29,600 --> 00:35:34,000
इसको प्रपंच नहीं कहा है और सरपंच हो भी नहीं सकता।

511
00:35:34,000 --> 00:35:38,240
प्रपंच हो भी नहीं सकता है। अगर एक ही ब्रह्म मानेंगे

512
00:35:38,240 --> 00:35:42,240
बाकी सब प्रपंच मानेंगे तो प्रपंच देखने वाला भी ब्रह्म अज्ञानी

513
00:35:42,240 --> 00:35:46,400
सिद्ध हो जाएगा। एक ही ब्रह्म है। दूसरा है नहीं।

514
00:35:46,400 --> 00:35:50,560
ये कहां लिखा है? कोई भी वेद मंत्र ही नहीं सिद्ध कर। किसी वेद मंत्र

515
00:35:50,560 --> 00:35:55,120
में किसी उपनिषद में नहीं है। नाली नाली वाली बात कर रहे हैं।

516
00:35:55,120 --> 00:35:59,120
अब पहले कीचड़ होता क्या है? कीचड़ कुछ मॉलिक्यूल्स

517
00:35:59,120 --> 00:36:03,520
का समूह है। मॉलिक्यूल बहुत बड़ा होता है। मॉलिक्यूल

518
00:36:03,520 --> 00:36:08,000
एटम से बना होता है। एटम इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन से बना होता है।

519
00:36:08,000 --> 00:36:12,000
और ये क्वारक आदि से बने होते हैं। और ये सूक्ष्म रश्मियों

520
00:36:12,000 --> 00:36:16,720
से बने होते हैं। बीच में बहुत सारा गैप होता है। आकाश होता है।

521
00:36:16,720 --> 00:36:21,040
दुर्गंध जैसे मीठा है। शक्कर है। शक्कर

522
00:36:21,040 --> 00:36:25,040
के अंदर जो मॉलिक्यूल है वो मीठे हैं। लेकिन मॉलिक्यूल

523
00:36:25,040 --> 00:36:27,520
से जाएंगे तो मिठास खत्म हो जाएगी। उनके

524
00:36:27,520 --> 00:36:32,240
अंदर जो आकाश आकाश ना मीठा खट्टा है फिर भी वो प्रभावित नहीं होता।

525
00:36:32,240 --> 00:36:36,320
लेकिन परमात्मा तो आकाश से भी सूक्ष्म है। मैं हम

526
00:36:36,320 --> 00:36:40,400
यहां बैठे हैं कमरे में। कमरे में दुर्गंध हुई। कमरे में आकाश भी है। क्या आकाश भी

527
00:36:40,400 --> 00:36:44,400
दुर्गंधित होगा? ईश्वर तो छोड़िए। ईश्वर तो बहुत आगे की चीज है। आकाश

528
00:36:44,400 --> 00:36:48,560
पर भी सुगंध दुर्गंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आकाश का ये गुण

529
00:36:48,560 --> 00:36:52,640
ही नहीं है तो ईश्वर तो बहुत सूक्ष्म है तो ईश्वर उस गंदगी

530
00:36:52,640 --> 00:36:56,960
से प्रभावित कैसे हो जाएगा ईश्वर तो उनके अंदर है ऐसे ही

531
00:36:56,960 --> 00:37:01,200
जब आकाश प्रभावित नहीं होता हमारे अंदर मेरे

532
00:37:01,200 --> 00:37:05,200
शरीर के अंदर मैं आत्मा हूं मैं मेरे

533
00:37:05,200 --> 00:37:09,680
अंदर दो प्रकार की क्रिया हो रही है एक ऐच्छिक क्रियाएं एक अनैच्छिक

534
00:37:09,680 --> 00:37:14,000
क्रियाएं हृदय का धड़कना भोजन का पचना रक्त

535
00:37:14,000 --> 00:37:18,240
संचरण होना ये सारे जो फिजियोलॉजी हो रही है,

536
00:37:18,240 --> 00:37:22,400
फिजियोलॉजी काम है, ये ईश्वर का है। ईश्वर के बिना नहीं हो सकता। सारे

537
00:37:22,400 --> 00:37:26,880
फोर्सन काम कर रहे हैं। लेकिन मैं भोजन करता हूं।

538
00:37:26,880 --> 00:37:30,960
ये मेरा काम है। करूं नहीं करूं। लेकिन भोजन करने के

539
00:37:30,960 --> 00:37:34,960
बाद पेट में जाने के बाद मेरा काम समाप्त हुआ। फिर परमात्मा संभाल लेता

540
00:37:34,960 --> 00:37:38,960
है। तो इच्छा जो काम इच्छा

541
00:37:38,960 --> 00:37:42,720
से हो रहे हैं। मैं करूं या नहीं करूं? स्वतंत्रता से करता हूं। इसका मैं फल

542
00:37:42,720 --> 00:37:46,880
भोग रहा हूं। लेकिन अंदर जो काम हो रहे हैं वह ईश्वर के कारण है। तो ईश्वर

543
00:37:46,880 --> 00:37:51,040
उससे प्रभावित इसलिए है क्योंकि वो ईश्वर का क्षेत्र नहीं है।

544
00:37:51,040 --> 00:37:56,800
ईश्वर तो मुझे मेरे कामों का दंड आप कह रहे हो कि कब दंड देगा?

545
00:37:56,800 --> 00:38:00,960
हमारे हजारों लाखों जन्मों के संस्कार आते हैं। उसके

546
00:38:00,960 --> 00:38:04,800
सामने हमारा जीवन कुछ भी नहीं है।

547
00:38:04,800 --> 00:38:09,040
जन अगर इसी जन्म में संस्कार समाप्त हो जाए तो आगे सृष्टि बंद हो जाएगी।

548
00:38:09,040 --> 00:38:13,120
कर्मों का फल देने के लिए सृष्टि रचता है। इसलिए ये मत कहिए कि

549
00:38:13,120 --> 00:38:17,600
कब कब जन्म कब दंड देगा

550
00:38:17,600 --> 00:38:21,600
जब उसके यहां से चला जाएगा यहां भी दंड मिल सकता है आगे भी मिल

551
00:38:21,600 --> 00:38:25,920
सकता है। इसलिए इसके लिए हम उत्तरदाई

552
00:38:25,920 --> 00:38:30,000
है। तो सारा प्रपंच तात्विक और पारमार्थिक ये व्याख्या

553
00:38:30,000 --> 00:38:34,080
ही गलत है। ये वेद विरुद्ध है। ये दर्शन विरुद्ध है। ब्रह्म सूत्र के विरुद्ध भी

554
00:38:34,080 --> 00:38:38,240
है। अलग-अलग मत करिए क्या तात्विक है व्यवहारिक

555
00:38:38,240 --> 00:38:42,320
है। ठीक है? हो गया। और दूसरी बात आप कहते हैं कि अवतार

556
00:38:42,320 --> 00:38:46,480
ले वो लीला करता है। बताता नहीं है। अच्छा लीला

557
00:38:46,480 --> 00:38:50,640
करने वाला झूठा होता है कि सत्यवादी होता है? मैं लीला

558
00:38:50,640 --> 00:38:54,720
करूं। लीला करने वाला मिथ्यावादी हुआ कि सत्यवादी

559
00:38:54,720 --> 00:38:57,760
हुआ? मैं हूं नहीं वो दिखाऊं। और

560
00:38:57,760 --> 00:39:01,840
जो हूं जो हूं उसे दिखाऊं नहीं। ये मिथ्याचरण हुआ।

561
00:39:01,840 --> 00:39:05,840
तो ब्रह्म मिथ्याचरण नहीं कर सकता।

562
00:39:05,840 --> 00:39:09,920
जहां भी प्रमाण में बाद में आएंगे कहीं भी वेद में नहीं

563
00:39:09,920 --> 00:39:14,000
है कि ईश्वर अवतार लेता है। [हंसी] ले सकने की बात

564
00:39:14,000 --> 00:39:18,160
है। अनंत ईश्वर का अवतार लेने का वो सोचेगा भी

565
00:39:18,160 --> 00:39:22,160
तो भी उसका अनंत सामर्थ्य भंग हो जाएगा कि

566
00:39:22,160 --> 00:39:26,320
सारी सृष्टि में बसते हुए भी सारी सृष्टि में रहते हुए भी रावण को नहीं मार

567
00:39:26,320 --> 00:39:30,320
सकता या किसी को खुश नहीं कर सकता। खुश क्या करेगा? इतनी सृष्टि

568
00:39:30,320 --> 00:39:34,480
इतनी बड़ी सृष्टि में मैं चाहूं कि भगवान मुझे दर्शन दे दे उसके

569
00:39:34,480 --> 00:39:38,640
लिए मुझे प्रसन्न करने के लिए आ जाए प्रकट हो जाए यही ईश्वर का काम

570
00:39:38,640 --> 00:39:42,720
रहे क्या ईश्वर का काम जन्मादेश तो शंकर आचार्य शंकर जी का भाष

571
00:39:42,720 --> 00:39:46,720
पढ़िए जगत की जन्म स्थिति प्रलय करना उसका काम है ना कि

572
00:39:46,720 --> 00:39:50,800
किसी को खुश करना किसी को नाराज करना ये उसका काम नहीं है उसका

573
00:39:50,800 --> 00:39:55,200
काम है जगत की सृष्टि करना संचालन

574
00:39:55,200 --> 00:39:59,360
करना समय पर प्रलय करना सबके कर्मों के अनुसार फल

575
00:39:59,360 --> 00:40:03,520
देना ये ईश्वर का कार्य है और ये वो करता है बिना किसी

576
00:40:03,520 --> 00:40:08,080
की सहायता करता यही उसका अनंत सामर्थ्य है बताइए

577
00:40:08,080 --> 00:40:12,160
सारे ब्रह्मांड को बनाने वाला सारे ब्रह्मांड को चलाने वाला उसका ये कम

578
00:40:12,160 --> 00:40:12,880
सामर्थ्य माना

579
00:40:12,880 --> 00:40:17,360
जाएगा क्या यही तो अनंत है हो गया हां हो गया आपका

580
00:40:17,360 --> 00:40:22,000
ठीक है पहली बात तो ये है कि तात्विक पारमार्थिक इनको अलग-अलग मत करिए

581
00:40:22,000 --> 00:40:27,520
मैं अभी आ रहा हूं मैं अभी आ रहा हूं तात्विक पारमार्थिक पे ही आ रहा हूं जी

582
00:40:27,520 --> 00:40:31,600
पहली बात तो ये है कि जैसे मैंने कहा था कि

583
00:40:31,600 --> 00:40:35,680
आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है। मैं इसको एक्सप्लेन करूंगा पूरा।

584
00:40:35,680 --> 00:40:39,680
जैसे मैंने कहा था कि आपके पास एक तात्विक व्याख्या होती है। जब ईश्वर पर दोष

585
00:40:39,680 --> 00:40:43,680
की प्रतीति होती है तो आप उसको बचा लेते हो। उसी प्रकार से एक तात्विक

586
00:40:43,680 --> 00:40:48,160
व्याख्या होती है। जब ईश्वर पर दोष की प्रतीति होगी तो हम उसे सिद्ध करेंगे निर्दोष।

587
00:40:48,160 --> 00:40:52,320
मगर अब आपने जैसे उसको खोला ही है कि भाई माया

588
00:40:52,320 --> 00:40:56,480
कहा गया है कि नहीं कहा गया। माया है कि नहीं है। तो इसमें यह वाली बात आती

589
00:40:56,480 --> 00:41:00,720
है। इसमें मैं इसको अलग से रख लेता हूं माया वाले मामले को खोलने के लिए।

590
00:41:00,720 --> 00:41:04,800
पर इसमें सबसे पहली बात एक ये आती है कि आपने कहा कि वो बहुत कुछ कर रहा है।

591
00:41:04,800 --> 00:41:08,880
बहुत कुछ कर रहा है। पर एक चीज करने ना करने के लिए बाधित है तो यहां अंत

592
00:41:08,880 --> 00:41:12,960
हो रहा है ना। चाहे एक मेरे को पूरा कर ले दीजिए। चाहे एक

593
00:41:12,960 --> 00:41:16,960
सुई के बराबर की कमी रह रही है। मगर अंत हो रहा है उसकी

594
00:41:16,960 --> 00:41:20,960
सामर्थ्य का। पहली बात। दूसरी बात यह आती है आपने उसको

595
00:41:20,960 --> 00:41:25,040
बचाने के लिए कहा कि नाली मॉलिक्यूल वगैरह आपने उसकी डेफिनेशन

596
00:41:25,040 --> 00:41:27,920
दी कि उसमें क्या होता है। मगर जैसे

597
00:41:27,920 --> 00:41:32,000
कि हम यह कहते हैं कि अगर हम मल से स्पर्श हो जाएगा

598
00:41:32,000 --> 00:41:36,160
तो हम अपवित्र मानेंगे खुद को और अपने को शुद्ध शुद्ध करेंगे। यानी

599
00:41:36,160 --> 00:41:40,240
कि मल से स्पर्श होने पर हमारा मल में होने पर मल से लिपट जाने

600
00:41:40,240 --> 00:41:44,480
पर हम अपवित्र मान रहे हैं अपने आप को। मगर वहीं पर मल से

601
00:41:44,480 --> 00:41:48,560
एक ही भूत होते हुए भी भगवान को हम उस मल से उत्पन्न होने वाली

602
00:41:48,560 --> 00:41:52,560
विकृति से विकृत नहीं मान रहे। ठीक है? इसी प्रकार से

603
00:41:52,560 --> 00:41:56,560
आपने और भी चीजें कही कि वो गंदगी प्रभावित इसी प्रकार से एक चीज और है शुरू

604
00:41:56,560 --> 00:42:00,960
में ही आपने कहा कि जो जो

605
00:42:00,960 --> 00:42:04,960
मनुष्य जो भी काम करता है हम जो भी काम कार्य करते हैं उसमें अंतत गतवा

606
00:42:04,960 --> 00:42:09,040
हमें ईश्वर की सहायता लेनी पड़ती है। ईश्वर को किसी की सहायता यानी कि

607
00:42:09,040 --> 00:42:13,360
दुनिया में जो भी कार्य हो रहे हैं अच्छे बुरे उसमें मनुष्य

608
00:42:13,360 --> 00:42:17,520
ईश्वर की सहायता ले रहा है। यह प्रतीति हो गई। ठीक है? अब इसमें

609
00:42:17,520 --> 00:42:21,520
बात यह आती है कि जिस जिस पदार्थ के साथ एक

610
00:42:21,520 --> 00:42:25,520
ही भूत होने पर स्पर्श हो जाने पर मनुष्य को दोष लग

611
00:42:25,520 --> 00:42:29,520
रहा है उसी पदार्थ के साथ एक ही भूत हो जाने पर ईश्वर को आप दोष नहीं

612
00:42:29,520 --> 00:42:33,760
दे रहे। एक एक दो पॉइंट ले लीजिए। एक एक पॉइंट हां ये हो गया। एक मिनट नहीं आपने

613
00:42:33,760 --> 00:42:38,720
चार पांच पॉइंट दिए ना। शुरू से सारे पॉइंट आप ले चल रहे हो इसलिए लेने के लिए ले चल।

614
00:42:38,720 --> 00:42:42,720
तो दूसरी बात जिस कार्य को करने

615
00:42:42,720 --> 00:42:43,220
में

616
00:42:42,960 --> 00:42:47,040
निमित्त होने के बाद मनुष्य पर दोष लग रहा है उसी

617
00:42:47,040 --> 00:42:51,120
कार्य में निमित्त होने के बावजूद भी ईश्वर को आप दोष मुक्त मान रहे

618
00:42:51,120 --> 00:42:56,880
हैं। ठीक है? तो एक ये वाली बात हो गई। दूसरी बात आपने कहा कि

619
00:42:56,880 --> 00:43:00,880
वो आएगा आने से जो है हां ये वाली

620
00:43:00,880 --> 00:43:04,960
बात आप नहीं कह सकते कि वो कब देगा कर्मों का फल। आज नहीं

621
00:43:04,960 --> 00:43:08,960
मिलेगा तो कल मिल जाएगा। तो यह बात तो हम भी कह सकते हैं। यह बात आप भी नहीं

622
00:43:08,960 --> 00:43:12,960
कह सकते कि अवतार कब लेगा। वो उसकी इच्छा पर आधारित है। उसको कब

623
00:43:12,960 --> 00:43:17,120
उचित लग रहा है? कब क्या कौन सा अवतार लेना है। तो हम बाधित थोड़ी ना कर सकते

624
00:43:17,120 --> 00:43:21,280
उसको कब लेगा वो अवतार। जी हां

625
00:43:21,280 --> 00:43:25,440
जी जी ये हो गया। तो यानी कि जैसे कर्म जैसे कर्मों का फल देने

626
00:43:25,440 --> 00:43:29,680
के लिए ईश्वर स्वतंत्र है कि उसकी अपनी मर्जी वो कब देगा और कब वो

627
00:43:29,680 --> 00:43:33,840
उसके चीजों को अप्लाई करेगा। उसी तरीके से ईश्वर

628
00:43:33,840 --> 00:43:37,920
के पास भी अवतार लेने की भी स्वतंत्रता है कि वो कब लेगा उसके लिए उसको बाधित मत

629
00:43:37,920 --> 00:43:42,320
करिए कि कब आएगा ये फिर आप मत करिए। दूसरी बात अ

630
00:43:42,320 --> 00:43:47,680
मिथ्यावादी हां आपने कहा कि ईश्वर मिथ्यावादी नहीं हो सकता। ठीक है?

631
00:43:47,680 --> 00:43:52,000
जैसे किसी व्यक्ति को दंड दे रहा है ईश्वर। है ना?

632
00:43:52,000 --> 00:43:56,000
किसी व्यक्ति को दंड दे रहा है और दंड स्वरूप अभी घर

633
00:43:56,000 --> 00:43:58,160
से व्यक्ति बाहर निकला और उस पर कोई

634
00:43:58,160 --> 00:44:01,680
उल्का पिंड आकर के गिर गया

635
00:44:01,680 --> 00:44:06,000
तो ये कार्य ईश्वर का है कि नहीं इस तरह से दंड दे देना ईश्वर का है

636
00:44:06,000 --> 00:44:11,680
ईश्वर का है तो यहां पर ईश्वर ने उसके साथ छल किया कि नहीं किया

637
00:44:11,680 --> 00:44:15,840
वो व्यक्ति वो व्यक्ति घर से बाहर देख के निकला वेदर की रिपोर्ट वगैरह हर

638
00:44:15,840 --> 00:44:20,160
चीज बिल्कुल सही है और मौसम भी बिल्कुल साफ है अचानक से बिल्कुल

639
00:44:20,160 --> 00:44:24,160
मौसम के विपरीत उसको को दंड मिल गया।

640
00:44:24,160 --> 00:44:28,720
अब अब रुक जाइए। इनका उत्तर देता हूं। रुकिए। जी जी

641
00:44:28,720 --> 00:44:32,880
अब जो गंदगी वाले हमने मल से हाथ लगा दिया तो हम

642
00:44:32,880 --> 00:44:37,280
अशुद्ध हो गए ना। आत्मा शुद्ध नहीं होता। ध्यान रखिए

643
00:44:37,280 --> 00:44:42,160
हमारा हाथ शरीर अशुद्ध होता है। ईश्वर का शरीर नहीं अशुद्ध कैसे होगा?

644
00:44:42,160 --> 00:44:47,920
ईश्वर सारा ब्रह्मांड शरीर है। उसके अंदर सब भरा हुआ है।

645
00:44:47,920 --> 00:44:52,080
हमारा हम इसलिए अशुद्ध हुए क्योंकि हम हम शुद्ध नहीं हाथ

646
00:44:52,080 --> 00:44:56,160
अशुद्ध हुआ था आत्मा शुद्ध नहीं होता तो आत्मा में कोई

647
00:44:56,160 --> 00:45:00,240
फर्क पड़ेगा आत्मा कहीं भी जाएगा वो अशुद्ध नहीं होगा ध्यान रखिए

648
00:45:00,240 --> 00:45:04,320
दूसरी बात ईश्वर की इच्छा होगी जब जन्म पर जन्म तो

649
00:45:04,320 --> 00:45:08,400
लेता ही नहीं है कर्म फल तो देने वाला है कर्म फल तो देना

650
00:45:08,400 --> 00:45:12,480
उसकी अनिवार्यता है कर्म फल देना उसका कार्य है अवतार लेना उसका कार्य नहीं

651
00:45:12,480 --> 00:45:14,080
है

652
00:45:14,080 --> 00:45:18,320
सब जगह जन्मा अायमान और

653
00:45:18,320 --> 00:45:22,640
फिर भी आप जन्म दिला रहे हैं उसको और कोई प्रयोजन नहीं है।

654
00:45:22,640 --> 00:45:26,720
क्या प्रयोजन है बताइए? किसी दुष्ट को मारना भी

655
00:45:26,720 --> 00:45:32,080
प्रयोजन नहीं है। धर्म की रक्षा भी प्रयोजन नहीं है। कुतहल के लिए

656
00:45:32,080 --> 00:45:36,080
आप जो मेरे से बातचीत कर रहे हैं ये कुतल के लिए है या किसी प्रयोजन के लिए है?

657
00:45:36,080 --> 00:45:40,080
ये बताइए। प्रयोजन के लिए और वो

658
00:45:40,080 --> 00:45:44,160
बिना प्रयोजन के जब चाहे प्रकट हो जाएगा। और अपने

659
00:45:44,160 --> 00:45:48,160
सृष्टि नियम जो उसके नियम है उनके विरुद्ध प्रकट हो जाएगा। उनके विरुद्ध

660
00:45:48,160 --> 00:45:51,360
प्रकट हो जाएगा।

661
00:45:51,360 --> 00:45:56,160
अब उल्का पिंड गिर गया। उल्का पिंड

662
00:45:56,160 --> 00:46:01,280
गिरा उसके पीछे उसके कितने संस्कार होंगे अंदर?

663
00:46:01,280 --> 00:46:05,360
रामायण पढ़िए। रामायण श्री राम राजतिलक

664
00:46:05,360 --> 00:46:09,840
होने वाला वनवास हो गया। तो श्री राम कहते इसी को दव कहते हैं।

665
00:46:09,840 --> 00:46:14,000
जो सोचा था वह ना होवे। और जो

666
00:46:14,000 --> 00:46:18,000
नहीं सोचा था हो जाए इसी को दव कहते हैं। तो ये दवश

667
00:46:18,000 --> 00:46:22,080
हुआ। प्रारब्ध यही प्रारब्ध है नहीं तो प्रारब्ध की

668
00:46:22,080 --> 00:46:28,080
धारणा ही समाप्त हो जाएगी फिर तो कर्म फल व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी

669
00:46:30,000 --> 00:46:34,080
ठीक है अब एक एक बिंदु रखिए एक बिंदु संक्षेप में फिर

670
00:46:34,080 --> 00:46:38,240
उसका उत्तर फिर उसके बाद ऐसे कई एक साथ हो जाते है तो मालूम नहीं पड़ता

671
00:46:38,240 --> 00:46:42,240
हां वही दिक्कत आ जाती है सबसे पहली बात तो प्रपंच

672
00:46:42,240 --> 00:46:46,320
वाली बात वो इस वाले इस वाले मैंने प्रपंच बोला

673
00:46:46,320 --> 00:46:50,400
नहीं वैसे फिर भी आप बोल नहीं पर आप बार-बार पारमार्थिक तात्विक प्रपंच

674
00:46:50,400 --> 00:46:54,400
शब्द है ना यही वेद विरुद्ध है ये विज्ञान विरुद्ध है

675
00:46:54,400 --> 00:46:58,800
व्यवहार विरुद्ध है ठीक है और ये दार्शनिक

676
00:46:58,800 --> 00:47:03,040
सबसे बड़ी बुराई अद्वैतवादी है अद्वैतवाद का मतलब

677
00:47:03,040 --> 00:47:07,120
ये आप निर्णय निर्णय निर्णय पे ना जाए बुराई

678
00:47:07,120 --> 00:47:11,120
है ऐसा ना करें प्लीज निवेदन है निर्णय पे ना जाए नहीं तो

679
00:47:11,120 --> 00:47:15,200
निर्णय कर लेंगे उस पर भी कर लेंगे निर्णय निर्णय करेंगे अभी जब तक तर्क वितर्क

680
00:47:15,200 --> 00:47:19,520
चल रहा है तब तक घोषणा ना हां इसी पे चलिए। हां।

681
00:47:19,520 --> 00:47:24,640
अब आपकी सबसे लास्ट बात ही मैं पहले ले लेता हूं। प्रपंच वाली। आपने कहा

682
00:47:24,640 --> 00:47:28,720
आपने खुद कहा कि हम अ क्या

683
00:47:28,720 --> 00:47:32,720
कहते हैं? उससे लिप्त हो जाते हैं। जब मल से स्पर्श में

684
00:47:32,720 --> 00:47:37,360
आ जाते हैं तो हमारा शरीर होता है। इसलिए हम मानते हैं कि हम हो गए अपवित्र।

685
00:47:37,360 --> 00:47:41,600
परंतु हमारी आत्मा अशुद्ध नहीं होती है। आत्मा नहीं होती है। पर

686
00:47:41,600 --> 00:47:45,120
फिर भी हम अपनी शुद्धि का लिए कार्य करते हैं। उसमें आत्मा भी लिप्त होती

687
00:47:45,120 --> 00:47:49,280
है कार्य में। यही है व्यवहार और परमार्थ का अंतर।

688
00:47:49,280 --> 00:47:54,240
शरीर के कारण हम लोग अपवित्र हो भी रहे हैं और जबकि हमारी आत्मा

689
00:47:54,240 --> 00:47:58,240
जो है वो अभी भी शुद्ध है। इसी इसी

690
00:47:58,240 --> 00:48:02,480
एक मिनट इसको पूरा कर लूं। व्यवहार परमार्थ इसी

691
00:48:02,480 --> 00:48:06,880
को कहा है मैंने व्यवहार और परमार्थ या फिर प्रपंच रूपी संसार और तात्विक व्याख्या

692
00:48:06,880 --> 00:48:11,120
तात्विक व्याख्या क्या है कि आत्मा को कभी कुछ नहीं होता। नैन चंद श्राण नैन

693
00:48:11,120 --> 00:48:15,120
दहति पावक ना चैन क्ल मारता

694
00:48:15,120 --> 00:48:19,120
और यह जो जड़ है जो इसमें संपर्क में आ रहा है शरीर हमारा

695
00:48:19,120 --> 00:48:23,120
है ना जो गंदा हो रहा है जो अपवित्र हो रहा है उसके कारण हम अपने

696
00:48:23,120 --> 00:48:27,120
को मान रहे हैं कि हम गंदे हो गए है ना ये हमारा व्यवहार हो गया उसके कारण

697
00:48:27,120 --> 00:48:32,080
हम परेशान भी होते हैं हम अपने आप को साफ भी करते हैं जाकर ये व्यवहार हो गया

698
00:48:32,080 --> 00:48:36,160
हो गई एक मिनट एक मिनट तो तो इसी प्रकार से जब जब ईश्वर

699
00:48:36,160 --> 00:48:40,240
आप कह रहे हैं कि ईश्वर आएगा तो उस पर ये दिखाई दिखाई देगा वो दिखाई देगा तो

700
00:48:40,240 --> 00:48:44,240
वह यहां होते हुए भी लिप्त इसलिए नहीं होगा क्योंकि वास्तविकता

701
00:48:44,240 --> 00:48:48,560
में वह भी अशुद्ध नहीं हुआ है। वास्तविकता में वो भी प्रतीति

702
00:48:48,560 --> 00:48:52,960
मात्र है। जिस प्रकार से मेरा इस शरीर से जुड़ा होना प्रतीति मात्र है।

703
00:48:52,960 --> 00:48:57,200
उसी प्रकार से उसका अवतार भी प्रतीति मात्र है जो व्यवहारिक सत्य है।

704
00:48:57,200 --> 00:49:00,240
इससे इससे अवतार सिद्ध नहीं हुआ। इससे अवतार

705
00:49:00,240 --> 00:49:04,480
सिद्ध नहीं हुआ। इससे तो वो कीचड़ वाला उदाहरण सिद्ध हो रहा है। कीचड़ वाला इससे

706
00:49:04,480 --> 00:49:08,480
इससे अगर इससे अवतार इससे अवतार अगर सिद्ध नहीं हुआ तो मेरी ना

707
00:49:08,480 --> 00:49:12,720
तो कोई माता सिद्ध होगी ना मुझे कोई जन्म देने वाला सिद्ध होगा। अगर तात्विक

708
00:49:12,720 --> 00:49:16,800
व्याख्या ही दे क्योंकि आत्मा का तो कोई जन्मदाता नहीं है। तो ना तो मेरा कोई पिता

709
00:49:16,800 --> 00:49:21,120
एक मिनट ना तो मेरा कोई पिता है ना कोई मेरी मां है ना कोई मेरा ना

710
00:49:21,120 --> 00:49:25,120
मैं गंदा हुआ हूं मल से स्पर्श होने के कारण है ना मगर ये सब

711
00:49:25,120 --> 00:49:29,200
बातें अगर जितनी ये सब बातें सत्य है उतना ही भगवान का हमारे बीच में

712
00:49:29,200 --> 00:49:33,760
आना सत्य है सुनिए जब हां जी

713
00:49:33,760 --> 00:49:37,920
जहां ये ना आत्मा शुद्ध रहते हुए भी कैसे

714
00:49:37,920 --> 00:49:42,080
मान लेता है मैं गंदा हो गया इसलिए मान लेता है कि आत्मा

715
00:49:42,080 --> 00:49:46,080
का साधन है हमारा साधन मोटरसाइकिल पर जाएंगे

716
00:49:46,080 --> 00:49:50,400
मोटरसाइकिल खराब होगी पीड़ा हमें होगी मोटरसाइकिल को नहीं होगी परमात्मा का कोई साधन

717
00:49:50,400 --> 00:49:54,400
नहीं है उपनिषद ये भी तो कहता है ननम सिंध तो कहता है

718
00:49:54,400 --> 00:49:58,480
लेकिन ननम गीता कहती है और उपनिषद भी

719
00:49:58,480 --> 00:50:02,480
ए दृष्टा स्पष्ट सोता जाता मनता बोधा

720
00:50:02,480 --> 00:50:06,720
ये ईश्वरी स्पर्श करने वाला है यही

721
00:50:06,720 --> 00:50:10,720
बोलने वाला है यही सोचने वाला है ये सब सुनने वाला है सूंघने

722
00:50:10,720 --> 00:50:14,720
वाला चखने वाला यही सब है क्यों ये इन करण से

723
00:50:14,720 --> 00:50:15,360
शुरू करता

724
00:50:15,360 --> 00:50:19,360
है ईश्वर ईश्वर में हम में अंतर है क्या

725
00:50:19,360 --> 00:50:24,320
ईश्वर अपने लिए संसार नहीं बनाता हमारे लिए बनाता है ईश्वर

726
00:50:24,320 --> 00:50:28,320
जन्म लेकर के विभिन्न योनि में घूमता हुआ अपने फलों को नहीं भोगता और मोक्ष

727
00:50:28,320 --> 00:50:32,400
को प्राप्त नहीं करता क्योंकि वो मुक्त ही है। लेकिन हम

728
00:50:32,400 --> 00:50:36,800
जन्म जन्मों में जाते हैं योनियों में जाते हैं। ये हम में उनमें अंतर है।

729
00:50:36,800 --> 00:50:40,880
ईश्वर के लिए नहीं कहा। वास जी यथाई ये ईश्वर

730
00:50:40,880 --> 00:50:45,040
के लिए नहीं कहा है। इसीलिए माने शरीर ईश्वर

731
00:50:45,040 --> 00:50:49,200
के लिए नहीं कहा। हम जीवो के लिए कहा है। इसलिए

732
00:50:49,200 --> 00:50:53,280
इसलिए क्या कह रहे हो? तो ईश्वर अवतार लेगा तो उसके लिए भी यही

733
00:50:53,280 --> 00:50:57,280
बात। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि ये ये अंतर है ईश्वर और जीव

734
00:50:57,280 --> 00:51:01,360
में। इसीलिए जिन कार्यों से जिन कारणों से जीव

735
00:51:01,360 --> 00:51:05,360
वो मनुष्य रूप में अपवित्र सिद्ध हो रहा है उनहीं कारणों से

736
00:51:05,360 --> 00:51:09,360
उन्हीं विषयों से जो ईश्वर है वो अवतार रूप में अपवित्र सिद्ध

737
00:51:09,360 --> 00:51:13,360
नहीं होगा इनहीं कारणों से अवतार अच्छा जीव और ब्रह्म

738
00:51:13,360 --> 00:51:16,320
अलग-अलग है

739
00:51:16,320 --> 00:51:20,400
ये फिर एक फिर विषय होगा अभी आप इसका आप इसका उत्तर दे

740
00:51:20,400 --> 00:51:24,800
दीजिए देखिए इसका जिस समय अवतार में आता है अवतार में आता है

741
00:51:24,800 --> 00:51:30,400
ब्रह्म रूप मैं मैं एक चीज कह रहा हूं मैं एक चीज चीज कह रहा हूं आपको कि

742
00:51:30,400 --> 00:51:30,900
लास्ट

743
00:51:30,640 --> 00:51:34,640
के जो चार पॉइंट पे हमारी बात हुई थी उसके इसको मैं कर लूं। उसके बाद फिर आप एक-एक

744
00:51:34,640 --> 00:51:38,640
करके उस पर हम लोग जब तक खत्म नहीं हुई तब तक बात करते रहेंगे। इस पर एक बार

745
00:51:38,640 --> 00:51:42,640
करिए। हां इसमें एक है आपने कहा कि ईश्वर

746
00:51:42,640 --> 00:51:46,880
का शरीर नहीं है इसलिए वो वो नहीं होता। ये मैंने दे दिया। अवतार लेना उसका कार्य

747
00:51:46,880 --> 00:51:50,880
नहीं है। तो अवतार लेना उसका कार्य नहीं है। उसी जिस प्रकार से

748
00:51:50,880 --> 00:51:54,960
पत्थर गिराना किसी दुष्ट पर उसका कार्य नहीं है। पर गिराया। उसको दंड

749
00:51:54,960 --> 00:51:59,040
देना था। पत्थर गिरा कर गिरा दिया। उसका कार्य नहीं है। वह और तरीकों

750
00:51:59,040 --> 00:52:03,080
से भी मार सकता है। पत्थर गिरा के ही मारना जरूरी नहीं है। वो केवल अपनी

751
00:52:03,080 --> 00:52:07,120
[गला साफ़ करने की आवाज़] एक एक मिनट वो केवल अपनी शब्द शक्ति से भी किसी

752
00:52:07,120 --> 00:52:11,280
को उसके कर्मों का दंड दे सकता है। ठीक है? और तो और

753
00:52:11,280 --> 00:52:15,600
ये जिस रूप में हमको ज्ञान विज्ञान प्राप्त हो रहा है जो वैदिक

754
00:52:15,600 --> 00:52:19,680
विज्ञान है जो हमें मंत्रों के रूप में प्राप्त हो रहा है तो वो भी उसका

755
00:52:19,680 --> 00:52:23,680
जरूरी नहीं है कि मंत्रों के रूप में ही दे। केवल वो अपने मन में सोचे और हमारे मन में वो ज्ञान

756
00:52:23,680 --> 00:52:27,760
आ जाएगा। उसको मंत्र के रूप में कि भाई वह इतने नंबर का सूक्त

757
00:52:27,760 --> 00:52:31,920
है। फिर उसमें इतने नंबर के सूक्त में इतने नंबर का मंत्र में यह लिखा है। इस रूप में देने

758
00:52:31,920 --> 00:52:35,920
की कोई आवश्यकता नहीं है। वो केवल अपने स्मरण करेगा और कर देगा। और आपने

759
00:52:35,920 --> 00:52:40,080
कहा सृष्टि नियम के विरुद्ध इसको मैं लास्ट में ले लूंगा सृष्टि नियम

760
00:52:40,080 --> 00:52:44,160
के विरुद्ध वाला कि जैसे आपने कहा सृष्टि नियम के विरुद्ध तो सृष्टि नियम के विरुद्ध

761
00:52:44,160 --> 00:52:45,680
मैं यही समझता हूं कि जैसे ईश्वर

762
00:52:45,680 --> 00:52:49,840
का जो स्वरूप है वो है वो सर्व व्यापक है। फिर

763
00:52:49,840 --> 00:52:53,920
वो एक देश कैसे हो सकता है? ये सृष्टि उसका जो स्वाभाविक नियम आ गया

764
00:52:53,920 --> 00:52:58,080
तो इसमें बात ये आती है कि जो ईश्वर सब जगह है वो किसी एक देश

765
00:52:58,080 --> 00:53:02,240
काल परिस्थिति में कुछ चार ऋषियों के लिए व्यवहारिक कैसे हो गया जो ईश्वर सब

766
00:53:02,240 --> 00:53:06,240
जगह है वो भूर भुवा स्वाहा जब हम

767
00:53:06,240 --> 00:53:10,320
गायत्री मंत्र पढ़ते हैं तो हम कहते हैं हमें बुद्धि दो तो यह माना

768
00:53:10,320 --> 00:53:14,320
जाता है कि जो व्यक्ति गायत्री मंत्र पढ़ेगा उसको ईश्वर बुद्धि प्रदान करेंगे यदि वो

769
00:53:14,320 --> 00:53:18,320
योग्य हुआ तो तो वो सेलेक्टिव हो के लोगों को ज्ञान कैसे दे रहा है

770
00:53:18,320 --> 00:53:22,640
बुद्धि कैसे दे रहा है या व्यवहारिक हो रहा है और जहां व्यवहारिक होगा वहां विशेष होगा।

771
00:53:22,640 --> 00:53:26,720
जहां विशेष होगा तो वो अनंत रूप से तो हो नहीं सकता क्योंकि उसको किसी को ज्ञान देना है,

772
00:53:26,720 --> 00:53:30,880
किसी को नहीं देना है। तो वहां पर भी उसका एक देश हो के ही उस व्यवहार

773
00:53:30,880 --> 00:53:34,880
करना होगा। अगर वो एक देश होकर के व्यवहार नहीं करेगा तो अनंत जो

774
00:53:34,880 --> 00:53:38,880
उसका रूप है उसके साथ व्यवहार करेगा। फिर तो बुद्धि सबको चली जाएगी। सबको दे देगा

775
00:53:38,880 --> 00:53:42,960
बुद्धि। और तीसरी बात एक एक करके बोलिए। एक

776
00:53:42,960 --> 00:53:47,120
एक करके एक एक करके बोलिए पहले वो कुछ चीजें

777
00:53:47,120 --> 00:53:51,440
रह जाती है तो आपने कहा कि उसके संस्कार होंगे

778
00:53:51,440 --> 00:53:55,440
इसलिए उसके ऊपर गिरा तो इसी प्रकार से जिसको वो ईश्वर

779
00:53:55,440 --> 00:53:59,520
के पास ये वाली चीजें हैं कि उसको किसको ऋषि बनाना है और

780
00:53:59,520 --> 00:54:00,960
ऋषि बना के बिना यज्ञ

781
00:54:00,960 --> 00:54:05,200
पवित के भी उसको वैदिक ज्ञान विज्ञान दे देना है और उसके बाद उसी षष्ठी

782
00:54:05,200 --> 00:54:09,200
क्रम में आगे चलकर के विधान करना है कि आप जब यज्ञ पवित हो जाएगा उपनीत

783
00:54:09,200 --> 00:54:13,200
हो जाओगे तब जाकर के आपको जो है वेदों का अधिकार प्राप्त होगा तो ये ईश्वर की

784
00:54:13,200 --> 00:54:17,360
अपनी चुनाव होता है कि किसको किस योग्य वो समझता है। तो जो

785
00:54:17,360 --> 00:54:21,520
जब हम कर्म फल देने के लिए उस पर यह लागू नहीं कर रहे कि भैया अगर कर्म फल देना

786
00:54:21,520 --> 00:54:25,520
है तो आज की तारीख में क्यों नहीं दे रहा अभी क्यों नहीं दे रहा हो सकता है वह अपने तरीके से दे

787
00:54:25,520 --> 00:54:30,000
रहा होगा कर्म फल उसको पता नहीं कौन सी बीमारी उसने लगवा दी हो कौन सी उसको परेशानी

788
00:54:30,000 --> 00:54:34,000
गैस की प्रॉब्लम हो उसको एड्स हो गया हो कैंसर हो गया हो जो दुराचारी है जो हमको

789
00:54:34,000 --> 00:54:38,080
पता ही नहीं चल रहा तो इसी प्रकार से भगवान भी अपनी इच्छा अनुसार

790
00:54:38,080 --> 00:54:42,400
अवतार लेंगे जब उनका मन होगा लेंगे नहीं मन होगा तो पत्थर गिरा के मार देंगे

791
00:54:42,400 --> 00:54:46,480
नहीं जिसको मारना होगा उसको नहीं भी मारेंगे जिसको वेद का

792
00:54:46,480 --> 00:54:50,720
ज्ञान कराना होगा समाधि अवस्था में कराएंगे और जिसको जिसको

793
00:54:50,720 --> 00:54:54,800
व्यवस्था के अनुसार वेद का ज्ञान विज्ञान देना होगा वैसे देंगे। अच्छा

794
00:54:54,800 --> 00:54:58,800
अब बंद करिए जो अब इसमें जो पहला इसमें जो पहला पॉइंट है उसको ले लेते हैं।

795
00:54:58,800 --> 00:55:04,640
अनंत सामर्थ्यवान इस पर चलिए अब आप अब इसको बता दीजिए। जी

796
00:55:04,640 --> 00:55:08,640
अनंत सामर्थ्यवान सृष्टि कितनी बड़ी मानी समझे

797
00:55:08,640 --> 00:55:12,640
इस बात को। एक दांत का डॉक्टर सारी जिंदगी दांतों

798
00:55:12,640 --> 00:55:16,080
की चिकित्सा कर ले। नहीं जानता दांत के बारे में सब कुछ उसे पूछो

799
00:55:16,080 --> 00:55:20,240
सब जानते हो नहीं जानता सारे जीवों को बनाया सारे ब्रह्मांड

800
00:55:20,240 --> 00:55:24,320
को बनाया अनंत नहीं है क्या ये ब्रह्मांड का विस्तार भी तो अनंत ही है प्रकृति अनंत

801
00:55:24,320 --> 00:55:28,320
है उस सब में व्यापक है सबको जानता है इसलिए वो अनंत सामर्थ अनंत

802
00:55:28,320 --> 00:55:34,080
ज्ञानवान है अन सामर्थ्यवान है इसका अर्थ नहीं है कि उल्टा भी करे

803
00:55:34,080 --> 00:55:38,080
आप वेद को मानते हैं कि नहीं मानते बताओ वेद कह रहा

804
00:55:38,080 --> 00:55:42,080
अपापम पाप में विध नहीं हो सकता आप कह रहे हो सकता है

805
00:55:42,080 --> 00:55:46,080
व्यवहार में हो सकता आपके द्वारा भी तो हो रहा है। हां

806
00:55:46,080 --> 00:55:52,000
कैसे हो रहा है? स्त्री स्त्रियां नहा रही है। वो देख रहा है कि नहीं देख रहा है?

807
00:55:52,000 --> 00:55:56,320
स्त्रियां नहा रही है। देख रहा है कि नहीं देख रहा? तो कैसे हो गया? वो तो स्त्रियों को स्त्रियों

808
00:55:56,320 --> 00:56:00,720
को नहाते हुए देखना पाप है कि नहीं? ये हमारे लिए पाप है। बस

809
00:56:00,720 --> 00:56:04,960
बस यही मैं भी कह रहा हूं कि जो हमारे लिए पाप है उसके लिए पाप नहीं है। दुराचार

810
00:56:04,960 --> 00:56:08,960
नहीं करता। वही मैं कह रहा हूं। जो हमारे लिए पाप है, जो हमारे लिए पाप

811
00:56:08,960 --> 00:56:13,120
है, उसके लिए पाप नहीं है। वही तो मैं भी कह रहा हूं। सुनिए। जी ये बताइए

812
00:56:13,120 --> 00:56:17,680
पहले कोई प्रमाण दीजिए अवतार का प्रमाण में आइए ये कुतर्क

813
00:56:17,680 --> 00:56:22,160
मन जाइए प्रमाण पे आ जाऊं तर्क को छोड़ अवतार

814
00:56:22,160 --> 00:56:26,240
का लाओ तर्क को छोड़ दे तर्क नहीं कर रहे कुतर्क कर

815
00:56:26,240 --> 00:56:30,400
रहे हो अरे अब आप चलिए अगर हम अगर

816
00:56:30,400 --> 00:56:31,200
हम मैं प्रमाण

817
00:56:31,200 --> 00:56:35,440
दे देता हूं मैं प्रमाण अगर हम केवल आत्मा होते तो पाप नहीं होता

818
00:56:35,440 --> 00:56:39,440
केवल आत्मा होते मैं कह रहा हूं जिस जिस

819
00:56:39,440 --> 00:56:43,440
पाप के मनुष्य द्वारा होने पर हम उस पाप नहीं मान रहे उसी के द्वारा

820
00:56:43,440 --> 00:56:47,680
ईश्वर के द्वारा उसको होने पर हम उसे पाप से अलग कर रहे हैं और वही चीज मनुष्य

821
00:56:47,680 --> 00:56:51,920
के द्वारा होने पर हम उसे पाप से वि मान रहे हैं यानी जिस

822
00:56:51,920 --> 00:56:56,080
कार्य से लिप्त होने जिस कार्य से सुनिए ये लाइन पूरी

823
00:56:56,080 --> 00:57:00,160
मैं मुक्त आत्मा होता तो सारे ब्रह्मांड को देखता मुझे कोई पाप नहीं

824
00:57:00,160 --> 00:57:04,160
लगता इसका मतलब जिन कार्यों से मनुष्य को पापी माना जाएगा उनहीं कार्यों

825
00:57:04,160 --> 00:57:08,160
से ईश्वर को पाप नहीं पापी नहीं माना जाएगा यही तो मेरा कहना कार्य कर रहा है ईश्वर

826
00:57:08,160 --> 00:57:12,320
कार्य कर ही नहीं रहा है वो वो तो बाद की बात है। अभी

827
00:57:12,320 --> 00:57:16,400
मैंने पूछा अनंत सामर्थवान अनंत तो अनंत सामर्थ बता दिया।

828
00:57:16,400 --> 00:57:20,560
अनंत ब्रह्मांड को रचने वाला है। आपने उसमें दो धारण करने वाला है।

829
00:57:20,560 --> 00:57:24,640
आप ब्रह्मांड को जानते हो नहीं कुछ। अनंत ब्रह्मांड को रचने वाला। अनंत

830
00:57:24,640 --> 00:57:28,640
ब्रह्मांड को धारण करने वाला। अनंत ब्रह्मांड का प्रलय करने वाला।

831
00:57:28,640 --> 00:57:32,880
आपको ब्रह्मांड की जानकारी है ही नहीं वास्तव में। और नहीं है जानकारी कि वेद की उत्पत्ति

832
00:57:32,880 --> 00:57:36,880
होती कैसे? चार ऋषियों को दे दिया। कैसे दिया मालूम है आपको? ये

833
00:57:36,880 --> 00:57:40,880
अतिरिक्त बातें हैं आचार्य जी। नहीं आपने कहा

834
00:57:40,880 --> 00:57:44,960
किसी को दे दिया ज्ञान दे दिया चार को नहीं आपने कहा कि किसी

835
00:57:44,960 --> 00:57:46,320
को ज्ञान दे दिया ऐसा नहीं

836
00:57:46,320 --> 00:57:50,480
देता है जान उसकी प्रक्रिया है ज्ञान देने की प्रक्रिया

837
00:57:50,480 --> 00:57:54,720
अगर अलग से समझे तो कोई वही समझा दे पहले ज्ञान कैसे देता है ईश्वर और वेद

838
00:57:54,720 --> 00:57:59,520
है क्या आपसे निवेदन है विनम्र मेरा कि आप ऐसे

839
00:57:59,520 --> 00:58:03,760
आपको प्रमाण देता हूं प्रमाण

840
00:58:03,760 --> 00:58:08,560
तो प्रमाण मैं दे देता हूं पहले मैं प्रमाण दू

841
00:58:08,560 --> 00:58:13,600
आपने तो दिए ही अभी तक बहुत सारे मैं केवल दो चार प्रमाण दे देता हूं बस

842
00:58:13,600 --> 00:58:15,780
दीजिए

843
00:58:15,780 --> 00:58:18,960
[हंसी]

844
00:58:18,960 --> 00:58:24,960
हम

845
00:58:28,160 --> 00:58:32,480
एक तो यजुर्वेद में है 319 यद्यपि वह जन्मा

846
00:58:32,480 --> 00:58:37,520
है पर विभिन्न रूपों में प्रकट होता है 319

847
00:58:37,520 --> 00:58:41,680
जी मंत्र क्या है वो आप देख लीजिए मैं मंत्र बोलता

848
00:58:41,680 --> 00:58:46,240
मतलब 19 ठीक है ठीक प्रजापति चरति

849
00:58:46,240 --> 00:58:50,240
जी वो देखता हूं [हंसी] इसमें

850
00:58:50,240 --> 00:58:53,920
क्या लिख रहा है

851
00:58:53,920 --> 00:58:57,920
हां ये रहा इसमें क्या लिखा हुआ है

852
00:58:57,920 --> 00:59:02,960
आप बताइए

853
00:59:02,960 --> 00:59:07,520
प्रजापति चरत ग अंतर दृश्य मानो विश्व

854
00:59:07,520 --> 00:59:09,680
भवन

855
00:59:09,680 --> 00:59:13,680
यस कम सकेतु इसमें अवतार कहां

856
00:59:13,680 --> 00:59:16,560
सिद्ध हो रहा है

857
00:59:16,560 --> 00:59:20,560
गर्व है गर्व क्या होता है प्रमाण अर्थ क्या अर्थ क्या

858
00:59:20,560 --> 00:59:25,040
लिखा है उसका नहीं अर्थ किसका लोगे अर्थ

859
00:59:25,040 --> 00:59:29,200
का लाओ किसका लाओ अर्थ की प्रमाणिकता तो चाहिए

860
00:59:29,200 --> 00:59:33,760
ठीक है वो मैं देखो अर्थ आपके यहां क्या लिखा है वो बता दो आप

861
00:59:33,760 --> 00:59:37,760
प्रजाओं का पति ब्रह्मांड के गर्भ के अंदर मेरा

862
00:59:37,760 --> 00:59:41,760
अर्थ नहीं मानोगे मैं तो और ही अर्थ कर मैंने विचर रहा है

863
00:59:41,760 --> 00:59:45,760
ना दिखता हुआ वह बहुत प्रकार से विविध रूपों में प्रकट होता है

864
00:59:45,760 --> 00:59:50,000
हां प्रकट होता है हां सुन लिए कहां कहां प्रकट होता है

865
00:59:50,000 --> 00:59:54,160
सुनिए सूर्य के रूप में प्रकट हो रहा है यानी वो है

866
00:59:54,160 --> 01:00:00,160
यानी सूर्य ईश्वर है नहीं नहीं नाभ्यासी अंतरिक्ष

867
01:00:00,640 --> 01:00:04,880
यस भूम प्रंतरिक्ष ये है ये उसका ब्रह्मा

868
01:00:04,880 --> 01:00:09,360
ये विराट यानी सूर्य ईश्वर है। नहीं सूर्यश्वर

869
01:00:09,360 --> 01:00:14,160
नहीं बिजली कैसे प्रकट हो रही है? एसी चला

870
01:00:14,160 --> 01:00:18,560
लाइट आ गई। हीटर चला लाइट आ गई। पंखा हवा चली

871
01:00:18,560 --> 01:00:22,560
लाइट आ गई। विविध रूपों में कार्य कर रही है। वैसे ईश्वर विविध रूपों में

872
01:00:22,560 --> 01:00:26,880
कार्य कर रहा है। पर बिजली ना तो ठंडी है ना बिजली गरम है।

873
01:00:26,880 --> 01:00:32,000
ठीक है। सुनिए वैसे ईश्वर विविध रूपों में कार्य कर रहा है।

874
01:00:32,000 --> 01:00:36,160
वहां रूपों में प्रकट होना माना गया है ना प्रकट हो रहा है। प्रकट होने का अर्थ

875
01:00:36,160 --> 01:00:40,160
यही है कि जब साम्य अवस्था थी तब सब प्रकट

876
01:00:40,160 --> 01:00:44,240
नहीं था। उसको कोई नहीं आ सकता था। लेकिन ये सब बन गए। प्रकट

877
01:00:44,240 --> 01:00:48,560
हो गया। देखो कैसा सुंदर ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर कैसा प्रकाश

878
01:00:48,560 --> 01:00:52,640
दे रहा है। ये न तत्र सूर्य भात न चंद्र

879
01:00:52,640 --> 01:00:55,360
तारकम ने

880
01:00:55,360 --> 01:00:59,360
ये प्रकट हो रहा है ईश्वर अर्थात कार्य प्रकट हो रहा है। कार्य को

881
01:00:59,360 --> 01:01:03,360
देख के कर्ता का अनुमान होता है। अगर यह नहीं है तो अनुमान भी नहीं होगा कि

882
01:01:03,360 --> 01:01:07,520
ईश्वर है भी कि नहीं। ठीक है। कार्य को देख के का अनुमान

883
01:01:07,520 --> 01:01:11,760
होता है। ये प्रकट हो रहा है ईश्वर। जैसे जैसे आपने मेरे व्यवहार और परमार्थ

884
01:01:11,760 --> 01:01:15,760
पर वो किया था ना प्रश्न कि व्यवहार और परमार्थ को आप अलग मत करिए। यहां पर

885
01:01:15,760 --> 01:01:19,760
भी देखिए आपकी बात से व्यवहार परमार्थ सिद्ध हो रहा है कि एक समय था जब

886
01:01:19,760 --> 01:01:23,920
ईश्वर को जानने वाला कोई नहीं था। वो हो गया ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला।

887
01:01:23,920 --> 01:01:27,920
ईश्वर व्यवहार में नहीं आ रहा है। हम उसे जान ही नहीं सकते। किसी प्रकार से इंद्रियों

888
01:01:27,920 --> 01:01:32,160
का विषय है ही नहीं। एक एक मिनट मैं कह लू और उसके बाद ईश्वर प्रकट

889
01:01:32,160 --> 01:01:36,160
हो रहा है। व्यवहार आपकी अभी अभी आपकी बात रख रहा हूं। ईश्वर व्यवहार में प्रकट हो

890
01:01:36,160 --> 01:01:40,160
रहा है। ठीक है? व्यवहार में आ रहा है। यानी कि उसका मौलिक स्वरूप क्या था?

891
01:01:40,160 --> 01:01:44,320
स्वाभाविक स्वरूप क्या था? व्यवहार में ना आ सकने वाला।

892
01:01:44,320 --> 01:01:49,520
मगर उसने अवतार लिया। ये क्या है? प्रकट होना क्या है?

893
01:01:49,520 --> 01:01:54,240
सुनिए। उसका एक एक मिनट मैं वो वो नहीं दिख रहा।

894
01:01:54,240 --> 01:01:58,400
भावना को सूर्य में वह है। यानी प्रकट नहीं हो रहा है। नहीं है।

895
01:01:58,400 --> 01:02:02,400
वह है वो प्रकट नहीं हो रहा है। प्रकट अपने कार्यों

896
01:02:02,400 --> 01:02:06,400
के कार्यों के माध्यम से प्रो कार्य कर रहा है। दिखाई दे रहा है उसके।

897
01:02:06,400 --> 01:02:10,480
व्यवहार में यानी व्यवहार में आ रहा है ना व्यवहार

898
01:02:10,480 --> 01:02:14,560
व्यवहार में तो आ ही रहा है हां तो मौलिक स्वरूप क्या है उसका

899
01:02:14,560 --> 01:02:18,720
शरीर ठीक है अभी अभी शरीर धारण नहीं अभी मैं अवतार की बात कर रहा हूं आपको अवतार

900
01:02:18,720 --> 01:02:22,880
बताता हूं उसका मौलिक स्वरूप क्या है स्वाभाविक स्वरूप क्या है व्यवहार

901
01:02:22,880 --> 01:02:26,960
में ना आ सकने वाला ये उसका मौलिक स्वरूप है नहीं नहीं ये नहीं

902
01:02:26,960 --> 01:02:30,880
है हां क्या है अशब्दम अशोत्रम अशब्द

903
01:02:30,880 --> 01:02:34,960
अरूपम अशब्दम अरूपम ये उसका स्वरूप है ठीक है इसका

904
01:02:34,960 --> 01:02:39,120
निचोड़ ये निकलेगा व्यवहार में ना अभी आपने बोला ना पहले वो किसी के जानने

905
01:02:39,120 --> 01:02:43,200
में ना आ सकने वाला था तो मौलिक मौलिक स्वरूप हो गया ना जानने में

906
01:02:43,200 --> 01:02:47,440
ना आ सकने वाला अभी भी नहीं जान सकते उसको उसके कार्यों को देख रहे हैं

907
01:02:47,440 --> 01:02:51,520
यानी कार्यों के अनुसार कुछ कुछ हम उसको जानने में आ सकने वाला

908
01:02:51,520 --> 01:02:55,680
हो गया ना बिल्कुल अनुमान होता है यानी यानी कि कार्यों के

909
01:02:55,680 --> 01:02:59,920
कारण हम उसे अब जान सकते पहले नहीं जान पा रहे थे हां पहले नहीं जान पा रहे यानी

910
01:02:59,920 --> 01:03:03,920
कि उसका मौलिक स्वरूप तो व्यवहार में ना आ सकने वाला था ना नहीं अभी

911
01:03:03,920 --> 01:03:08,080
भी वही स्वरूप है उसका अब जो दिख रहा है वो वो तो

912
01:03:08,080 --> 01:03:12,160
अरूप ही है। मैं मैं रूप मैं रूप की बात नहीं कर

913
01:03:12,160 --> 01:03:16,320
रहा हूं। मैं हम इस मैं इसकी बात कर रहा हूं कि बिना दिखाई देते

914
01:03:16,320 --> 01:03:20,320
हुए भी अभी वो हमारी कुछ कुछ इंद्रियों का विषय बन रहा है। व्यवहार में आ

915
01:03:20,320 --> 01:03:24,480
रहा है। हम उसे जान पा रहे थोड़ा बहुत। मगर एक समय ऐसा था जब हम

916
01:03:24,480 --> 01:03:28,560
उसे बिल्कुल नहीं जान सकते। वो रूप है एक ऐसा। जब हम उसे बिल्कुल नहीं जान

917
01:03:28,560 --> 01:03:32,720
सकते। मनुष्य सो रहा है ना कुछ नहीं कर रहा तो उसके व्यवहार का पता नहीं लगता।

918
01:03:32,720 --> 01:03:37,360
जाग जाता है व्यवहार का पता लगता है। उसका जागरण ब्रह्मा का रात्रि

919
01:03:37,360 --> 01:03:41,600
थी ब्रह्मा का दिन है सुनिए सुनिए जो वचनित होता है जो वचन

920
01:03:41,600 --> 01:03:45,680
है वो यह नहीं है कि सोने वो उसको कोई देख नहीं रहा था वचन ये है कि

921
01:03:45,680 --> 01:03:46,180
एक

922
01:03:45,920 --> 01:03:50,000
समय था जब वो किसी के जानने योग्य नहीं था किसी के

923
01:03:50,000 --> 01:03:54,000
सोने से किसी के सोने से किसी का अव्यवहारिक व्यवहार में ना

924
01:03:54,000 --> 01:03:58,000
आ सकने वाला सिद्ध नहीं होता है व्यवहार में ना आ सकने वाला तभी सिद्ध होगा

925
01:03:58,000 --> 01:04:02,080
जब वो व्यवहार में ना आ सकने वाला होगा तो स्वरूप से ईश्वर के लिए मैं भी

926
01:04:02,080 --> 01:04:06,080
यही कह रहा हूं कि वो व्यवहार में ना आकने वाला है मगर एक समय ऐसा आता है

927
01:04:06,080 --> 01:04:10,640
जब सृष्टि रचना होती है तो वो व्यवहार में आने लगता है कुछ कुछ

928
01:04:10,640 --> 01:04:14,880
इंद्रियों का अनुमान के द्वारा ही सही मगर वो जानने योग्य होता

929
01:04:14,880 --> 01:04:18,960
है तो ये उसका प्रथम अवतार ही सिद्ध हो रहा है तो इसको मानो

930
01:04:18,960 --> 01:04:23,120
ना सारे ब्रह्मांड को मानो उसका शरीर ये तो वेद ही कहता है दूसरी बात

931
01:04:23,120 --> 01:04:27,360
मानो मनुष्य रूप में नहीं किसी दूसरी बात

932
01:04:27,360 --> 01:04:31,600
अच्छा इसका अर्थ बताओ अर्थ बताओ इसका क्या अर्थ है

933
01:04:31,600 --> 01:04:36,240
31 31 19 इसका मेरा बता रहा हूं बता रहा हूं।

934
01:04:36,240 --> 01:04:40,480
इसका मेरा अर्थ है कि यद्यपि जो

935
01:04:40,480 --> 01:04:44,880
ईश्वर है पढ़ रहे हैं आप किसका का शायण का

936
01:04:44,880 --> 01:04:49,440
शंकराचार्य परंपरा पढ़िए यद्यपि ईश्वर अजन्मा

937
01:04:49,440 --> 01:04:53,680
है अजन्मा होते हुए भी वो उत्पन्न

938
01:04:53,680 --> 01:04:59,680
होता है विविध रूपों में

939
01:05:01,840 --> 01:05:05,920
सुनिए जी बोलिए बोलिए हां ना और

940
01:05:05,920 --> 01:05:08,400
सुनाओ

941
01:05:08,400 --> 01:05:14,400
एक मिनट सुना रहा हूं।

942
01:05:15,280 --> 01:05:19,280
दो तीन बातें हो जाती है ना उससे क्या होता है जो एक मूल कोई बात चल रही होती है वो

943
01:05:19,280 --> 01:05:25,280
रह जाती है फिर सुनाइए उसका हां सुना

944
01:05:34,320 --> 01:05:38,320
परमात्मा सब पदार्थों के अंदर विचरता है वह कभी जन्म लेने

945
01:05:38,320 --> 01:05:43,200
वाला ना होकर के भी अनेक प्रकार से प्रकट होता है उसके

946
01:05:43,200 --> 01:05:47,440
मूल स्वरूप को ज्ञानी जन देखते हैं।

947
01:05:47,440 --> 01:05:49,920
हां

948
01:05:49,920 --> 01:05:54,000
तो अनेक प्रकार से अनेक जीवों के रूप में

949
01:05:54,000 --> 01:05:58,000
प्रकट होता है। ये तो बात बाद की बात हो गई। वो प्रकट

950
01:05:58,000 --> 01:06:02,160
हो रहा है ना। वो अप्रकट था प्रकट हो रहा है ये भी ये भी उसके स्वाभाविक मौलिक स्वरूप

951
01:06:02,160 --> 01:06:06,160
में अंतर आ रहा है उसने अवतार है सुनिए उसने प्रकृति

952
01:06:06,160 --> 01:06:10,320
से सृष्टि को रचा है जैसे मैं मैं मैं पूछ रहा हूं आपसे

953
01:06:10,320 --> 01:06:14,320
कौन से रूप में प्रकट हुआ है ये बता दीजिए यहां प्रकट होना है ना कई रूपों में

954
01:06:14,320 --> 01:06:17,040
प्रकट होता है कौन से रूप में प्रकट उसने उसका ज्ञान

955
01:06:17,040 --> 01:06:21,200
प्रकट हो रहा है ब्रह्मांड के रूप में उसका ज्ञान प्रकट हो रहा है प्रकृति से उसने

956
01:06:21,200 --> 01:06:25,200
जान कुल मिला के बात यही आ रही है कि यहां पे आप इसका एज इट इज अर्थ ना ले

957
01:06:25,200 --> 01:06:30,000
के अपना कुछ उसमें मिक्स कर रहे है सुनो पहले तो ये बात बताओ आपको

958
01:06:30,000 --> 01:06:34,080
गर्व [गला साफ़ करने की आवाज़] का क्या अर्थ होता है? मैं ऋषियों की बात करता हूं। अनषियों

959
01:06:34,080 --> 01:06:40,080
की बात नहीं करता। सूर्यति

960
01:06:40,560 --> 01:06:44,560
गर्भ वह गर्भ है वह सूर्य लोकों

961
01:06:44,560 --> 01:06:48,720
में विचरता है हिरण्य गर्भ में विचरता है या

962
01:06:48,720 --> 01:06:53,040
गर्भ का अर्थ सूर्य आदि तेजस्वी लोक है उनमें विचरता है

963
01:06:53,040 --> 01:06:57,280
और उन सबको प्रकट करता है ये इसका अर्थ है और सबको

964
01:06:57,280 --> 01:07:01,520
प्रकट करता है प्रकट होता नहीं है हां उन सबको प्रकट करता है वो थोड़ी आएगा

965
01:07:01,520 --> 01:07:07,040
स्वरूप लेकर के ठीक है ठीक है और सुनिए आचार्य शण का एक मैं मंत्र बताता हूं आपको

966
01:07:07,040 --> 01:07:11,200
जो आपकी परंपरा बता रहे है ना एक मंत्र ऋग्वेद

967
01:07:11,200 --> 01:07:15,280
का तुम सुकरस दरदर ही तब

968
01:07:15,280 --> 01:07:21,280
दरदर तू सुकरस रायसी

969
01:07:22,480 --> 01:07:27,920
निशुप ये आचार्य श ने अर्थ किया है

970
01:07:27,920 --> 01:07:32,480
हे सार सार मतलब कुत्ता तुम

971
01:07:32,480 --> 01:07:37,040
सुकरस वराहस तुम वराह सुकर को ददरी

972
01:07:37,040 --> 01:07:41,200
फाड़ो काटो आप देखिए आप गलत जा रहे हैं इसका विषय

973
01:07:41,200 --> 01:07:45,280
से कोई मतलब नहीं है आप ये आप ये सिद्ध कर रहे फिर आप ये

974
01:07:45,280 --> 01:07:49,760
सिद्ध कर रहे हैं कि शायन का भाष्य क्यों नहीं माना जाना चाहिए हां

975
01:07:49,760 --> 01:07:53,840
ये सिद्ध कर रहा हूं की परंपरा ही गलत है अगर शायन का

976
01:07:53,840 --> 01:07:58,080
भाष्य आपका कहने का मतलब है पहली बात तो उस पर भी मैं आऊंगा शायन की परंपरा गलत है

977
01:07:58,080 --> 01:08:02,160
मतलब कुल मिला के आपका कहने का यह है कि क्योंकि शायन के भाष्य में कहीं पर

978
01:08:02,160 --> 01:08:07,040
गलती हो गई इसलिए पूरी तरीके से नकार दो कि शायन मानने योग्य नहीं है। आपने

979
01:08:07,040 --> 01:08:11,120
सुनिए सुनिए आपने खुद ऋषि दयानंद जी के द्वारा आपके आप जो

980
01:08:11,120 --> 01:08:15,200
मानते हो ऋषि तो दयानंद जी की जो सत्यार्थ प्रकाश है उसमें आपने खुद

981
01:08:15,200 --> 01:08:19,280
गलतियां मानी है। आपने खुद माना है कि नियोग में उन्होंने गलत कर दिया। ज्यादा

982
01:08:19,280 --> 01:08:23,440
बात कर दी। इस कारण से उनकी एक भी बात नहीं माननी चाहिए। पहली बात। दूसरी बात

983
01:08:23,440 --> 01:08:27,440
अगर सायण को आप गलत मान भी लो। मान लो शण गलत है

984
01:08:27,440 --> 01:08:31,440
उनका क्योंकि भाष्य गलत है। मैं इसलिए ये कर रहा हूं क्योंकि मुझे अपने विषय

985
01:08:31,440 --> 01:08:35,520
को बचाना है। विषय चल रहा है। ईश्वर अनंत सामर्थवान है तो उसके अवतार

986
01:08:35,520 --> 01:08:37,680
में क्या दिक्कत है? अब आप अब आप ये वाली बात

987
01:08:37,680 --> 01:08:41,920
ले आए कि शायन ने वहां पर कुछ गलत ऐसी चीज लिखी है जो हमारी हमारे तर्क

988
01:08:41,920 --> 01:08:46,000
के अनुसार लॉजिक्स के अनुसार गलत बैठ रही है। एक अगर एक

989
01:08:46,000 --> 01:08:50,000
मिनट रुकिए एक मिनट रुकिए। एक पूरी बात कर लीजिए। पूरी बात कर लीजिए। पूरी बात कर

990
01:08:50,000 --> 01:08:54,080
लीजिए कि अगर आप शायन को गलत मान भी रहे हैं तो मुझे

991
01:08:54,080 --> 01:08:58,960
आप यह बता दीजिए आपके पास वेद मंत्र आए कहां से

992
01:08:58,960 --> 01:09:03,280
सुनिए पहले एक बात सुनिए हां मैंने आपको

993
01:09:03,280 --> 01:09:07,360
जानकारी है कि नहीं एत ब्राह्मण का वैज्ञानिक भाष्य क्या है वेद विजान

994
01:09:07,360 --> 01:09:11,600
आलोक नाम से विश्व में पहली बार जी और आचार्य शण

995
01:09:11,600 --> 01:09:17,040
का मेरे पास भाष्य है [हंसी] शण के

996
01:09:17,040 --> 01:09:21,040
ऋणी हम इसलिए आचार्य शण क्योंकि उन्होंने वेद मंत्रों

997
01:09:21,040 --> 01:09:25,520
को बचाए रखा उल्टा सीधा अर्थ किया भले ही किया

998
01:09:25,520 --> 01:09:29,520
लेकिन उन्हें बचाए रखा नहीं तो आप आप अपनी प्रामाणिकता बताएं मुझे

999
01:09:29,520 --> 01:09:33,840
सायन के अपनी प्रामाणिकता तो सायन ने पशु

1000
01:09:33,840 --> 01:09:37,920
बलि आप मुझे अपनी प्रामाणिकता बताएं आप मुझे अपनी

1001
01:09:37,920 --> 01:09:42,240
प्रामाणिकता बताएं मेरी प्रामाणिकता जी मेरी प्रामाणिकता

1002
01:09:42,240 --> 01:09:46,400
ये है मेरी प्रामाणिकता जब समझ में आएगी जब आप मेरे ग्रंथ

1003
01:09:46,400 --> 01:09:51,200
पढ़ोगे अभी तो कुछ पढ़ा नहीं अच्छा मेरी प्रामाणिक

1004
01:09:51,200 --> 01:09:52,720
इसका इसका मतलब यह है

1005
01:09:52,720 --> 01:09:56,960
इसका मतलब यह है मैं भी आपको एक गट्ठर दे दूं आप इसको पढ़िए तब आप मेरी प्रमाणिकता

1006
01:09:56,960 --> 01:10:01,760
समझेंगे तो सुनिए मेरे हमारे ग्रंथों में

1007
01:10:01,760 --> 01:10:05,920
कहीं भी हिंसा नहीं मिलेगी कहीं नरबली नहीं मिलेगी

1008
01:10:05,920 --> 01:10:10,000
देखिए देखिए इसका इसका जो उत्तर है ना इसका जो इसका

1009
01:10:10,000 --> 01:10:14,080
जो इसका जो उत्तर है ना इसका उत्तर पहली बात आपकी सत्यार्थ प्रकाश में ही

1010
01:10:14,080 --> 01:10:18,400
लिखा गया है वो मैं बता देता हूं नियोग विषय में बात करते समय मैं

1011
01:10:18,400 --> 01:10:22,400
वो बात नहीं कर रहा। नहीं बात क्यों नहीं कर रहे? आप ला रहे हैं ना बार-ब आप बार-बार

1012
01:10:22,400 --> 01:10:26,640
पशुलि ला रहे तो नियोग लाने दीजिए ना मुझे। मैं अपनी यही होता है विषय

1013
01:10:26,640 --> 01:10:30,640
यही विषय होता है। मैं अपनी कह रहा हूं। आप अगर पशु बलि की तुलना कर रहे

1014
01:10:30,640 --> 01:10:35,520
हैं ना पशु बलि की तुलना कर रहे तो मैं भी आपको बता रहा हूं। कुछ

1015
01:10:35,520 --> 01:10:39,520
आप अवतार के लाइए प्रमाण। हां। तो अवतार का प्रमाण यही मैं बता

1016
01:10:39,520 --> 01:10:44,000
रहा हूं अवतार की बात। मैं एक ये वाली बात पूरी कर लूं। नियोग में उन्होंने यह

1017
01:10:44,000 --> 01:10:48,000
शतपद ब्राह्मण नियोग में एक एक मिनट मुझे एक अच्छी बात है उसमें

1018
01:10:48,000 --> 01:10:52,240
मैं अवमानना नहीं करूंगा दयानंद जी की जब शतपद ब्राह्मण मैं

1019
01:10:52,240 --> 01:10:56,480
दयानंद जी का दोष नहीं बता रहा हूं आपको उनका एक लॉजिक बता रहा हूं वो सुनिए

1020
01:10:56,480 --> 01:11:01,200
उन्होंने एक लॉजिक दिया है उन्होंने कहा जब यह कहा

1021
01:11:01,200 --> 01:11:05,280
पूर्व पक्ष में उन्होंने ये रखा मायानंद जी ने कि भाई ये जो नियोग

1022
01:11:05,280 --> 01:11:08,080
है इसके बारे में आपने बहुत सारी बातें बता दी मगर अंतत

1023
01:11:08,080 --> 01:11:12,080
गतत्वा यह मुझे व्यभचार लग रहा है पाप लग रहा है ये पूर्व पक्ष रखा उन्होंने उन्होंने

1024
01:11:12,080 --> 01:11:16,480
दयानंद जी तो उन्होंने उस उन्होंने जवाब वहां बहुत अच्छा दिया है

1025
01:11:16,480 --> 01:11:20,480
कि किसी पराई स्त्री को तुम जब अपना मान लेते

1026
01:11:20,480 --> 01:11:24,560
हो विवाह के बाद तो किन कारणों से उसको अपना मानते हो जो अभी

1027
01:11:24,560 --> 01:11:28,640
तक तुम्हारे लिए अभोज्ञा थी वो भोग्ञा कैसे हो गई तुम्हारे लिए क्योंकि

1028
01:11:28,640 --> 01:11:32,960
तुमने शास्त्र से उसको अपने लिए भोग्या बनाया ठीक है

1029
01:11:32,960 --> 01:11:37,200
तो इसका मतलब यह है कि शास्त्र की दृष्टि से अच्छा और बुरा देखना

1030
01:11:37,200 --> 01:11:41,440
पड़ता है अगर हमें अपनी दृष्टि से वो गलत दिखाई दे रहा है क्योंकि धर्म

1031
01:11:41,440 --> 01:11:45,680
और ब्रह्म में हमारी इंद्रिय गति बहुत सीमित होती है। इसलिए यदि शास्त्र

1032
01:11:45,680 --> 01:11:49,760
की दृष्टि वहां पर आ जाती है तो वहां पर शास्त्र की दृष्टि से देखना पड़ता है।

1033
01:11:49,760 --> 01:11:53,840
अच्छाई और बुराई में। तो इसी प्रकार से जो क्या

1034
01:11:53,840 --> 01:11:58,000
कहते हैं? शास्त्रों के द्वारा वर्णित जो चीजें हैं पहली बात तो ये है कि आपने उसका परंपरा

1035
01:11:58,000 --> 01:12:02,080
से अध्ययन नहीं किया है। आपने स्वा अध्ययन किया है। मैं

1036
01:12:02,080 --> 01:12:06,240
परंपरा को परंपरा एक मिनट मुझे मुझे

1037
01:12:06,240 --> 01:12:10,400
पूरा करने दीजिए। शायण जी जैसे आपके यहां पर यह नहीं माना

1038
01:12:10,400 --> 01:12:14,800
गया कि नहीं गुरु शिष्य परंपरा कोई एक चली हो मगर शायण

1039
01:12:14,800 --> 01:12:18,800
जी गुरु शिष्य परंपरा में मानते उनके बड़े भ्राता का नाम था विद्या्य स्वामी उन्होंने

1040
01:12:18,800 --> 01:12:22,880
ही उनको वेद भाष्य करने के लिए कहा था और विद्याण्य स्वामी जो है अपने

1041
01:12:22,880 --> 01:12:23,380
समय के

1042
01:12:23,200 --> 01:12:27,280
शंकराचार्य थे शंकराचार्य परंपरा से ही चला आ रहा है शायण भाष्य तो शायण

1043
01:12:27,280 --> 01:12:31,520
जो है वो परंपरा को मानने वाले हैं। उन्होंने अपने भाष्य में यह तक लिखा है कि मैंने

1044
01:12:31,520 --> 01:12:35,520
प्रमाण और परंपरा परंपरा से प्राप्त ज्ञान विज्ञान के आधार पर

1045
01:12:35,520 --> 01:12:39,680
ही भाष्य किया है। वो परंपरा को मानते हैं। तो यदि आप सायण को जानने

1046
01:12:39,680 --> 01:12:43,680
की बात कह रहे हैं कि मैं सायन ने क्या भाग प्रस्तुत किया है तो

1047
01:12:43,680 --> 01:12:47,760
उनका अध्ययन आपको प्रामाणिक रीति से करना चाहिए ना कि बाजार में बुक खरीद

1048
01:12:47,760 --> 01:12:51,840
करके जहां पर भी क्वेश्चन आ रहे हैं वहां पर उनके जो प्रामाणिक उत्तराधिकारी हैं

1049
01:12:51,840 --> 01:12:55,840
उनके पास जाए कि यहां पर मुझे जो है जो है संशय हो रहा है तो उसमें मुझे

1050
01:12:55,840 --> 01:12:59,840
उत्तर चाहिए। तब तो आप बता दो ना। आप तो परंपरा वाले हो ना मैं बता रहा हूं।

1051
01:12:59,840 --> 01:13:03,920
मैं बता रहा हूं। आप तो परंपरा वाले हो। मैं बता रहा हूं। मैं दोनों चीजें बता रहा हूं। मैं दोनों चीज

1052
01:13:03,920 --> 01:13:07,920
आरती बता दीजिए इस मंत्र का। मैं मैं दोनों मैं दोनों चीजें बता

1053
01:13:07,920 --> 01:13:12,080
रहा हूं। मैं दोनों चीज़ बता रहा हूं। मैंने दोनों तरीके से आपका उत्तर दिया है। अब मैं पूछ

1054
01:13:12,080 --> 01:13:16,240
रहा हूं। अब मैं अब मैं पूछ रहा हूं कि अगर शायण भी

1055
01:13:16,240 --> 01:13:20,480
गलत है। आपके पास वेद मंत्र किसके द्वारा आए हैं?

1056
01:13:20,480 --> 01:13:24,560
ये बताइए। सुनिए। गलत है। उनका

1057
01:13:24,560 --> 01:13:28,560
अर्थ गलत है। वेद मंत्र थोड़ी गलत है। यानी

1058
01:13:28,560 --> 01:13:32,720
शाय अज्ञानी थे ना एक तरीके से। हां बहुत पढ़ा है। अज्ञानी

1059
01:13:32,720 --> 01:13:36,960
थे। बहुत पढ़ा लेकिन समझा नहीं। यानी शायन हमारे लिए

1060
01:13:36,960 --> 01:13:38,400
ठीक है ठीक है ठीक है यानी

1061
01:13:38,400 --> 01:13:42,480
शायण हमारे लिए अज्ञानी है तो जो अज्ञानता कर सकता है वो

1062
01:13:42,480 --> 01:13:47,200
वेद मंत्र नहीं बदल सकता नहीं बदल सकता बताइए

1063
01:13:47,200 --> 01:13:51,360
क्यों नहीं बदल सकता इसको तो उनको परंपरा को हमने माना अब इसमें

1064
01:13:51,360 --> 01:13:55,680
मत जाइए पहले इस मंत्र का अर्थ बताइए जो आपने प्रमाण दिया देखिए

1065
01:13:55,680 --> 01:13:59,760
वो जो है आप जो मंत्र का अर्थ पूछ रहे हैं इसी प्रकार से फिर मैं नियोग

1066
01:13:59,760 --> 01:14:04,160
पे बात करूंगा वो एक एडिशनल चीजें हैं जो आप ला रहे हैं विषय चल रहा है

1067
01:14:04,160 --> 01:14:08,240
मंत्र आपने अवतार के लिए अवतारवाद के लिए मंत्र प्रस्तुत किया

1068
01:14:08,240 --> 01:14:11,600
है उस

1069
01:14:11,600 --> 01:14:15,760
अर्थ मैंने बता तो दिया वो गलत है तो आप मुझे अपना प्रामाणिकता

1070
01:14:15,760 --> 01:14:19,760
बता दीजिए फिर इनके विरुद्ध जा अर्थ क्या बताया आपने उसमें भी ये नहीं आ रहा कि

1071
01:14:19,760 --> 01:14:23,840
परमात्मा जन्म लेता है इसमें प्रकट होता है आपने कहा मान

1072
01:14:23,840 --> 01:14:28,080
लिया प्रकट होता है बताइए किस रूप में प्रकट होता है सूर्य के रूप में

1073
01:14:28,080 --> 01:14:32,720
चंद्र के रूप में परमात्मा है नहीं है परमात्मा

1074
01:14:32,720 --> 01:14:36,800
प्रकट बताइए ना किसके रूप बिजली प्रकट हो रही है पंखे में पर पंखा बिजली

1075
01:14:36,800 --> 01:14:40,800
थोड़ी है हां तो फिर इसका मतलब इसका मतलब यह उदाहरण सही नहीं है

1076
01:14:40,800 --> 01:14:45,120
ना प्रकट कहां हो रहा है क्या उदाहरण यही सही है

1077
01:14:45,120 --> 01:14:49,120
यही प्रकट हुआ बिजली पंखा आप यानी यानी कि आप

1078
01:14:49,120 --> 01:14:53,120
यहां ये मान रहे हो उसका कार्य प्रकट हुआ कार्य प्रकट होता है मगर

1079
01:14:53,120 --> 01:14:53,620
मगर

1080
01:14:53,440 --> 01:14:57,680
मंत्र में कार्य प्रकट होना नहीं आया उसमें आया है वो प्रकट हुआ और जो हमारे

1081
01:14:57,680 --> 01:15:01,760
परंपरा प्राप्त है सायण और जो हमारी शंकराचार्य परंपरा है जो प्रामाणिक है

1082
01:15:01,760 --> 01:15:05,760
वो ये मानते हैं कि यहां पर ईश्वर के अवतार की बात हो रही है। अब बात आती है आप

1083
01:15:05,760 --> 01:15:10,240
अब आप इसको प्रमाणिक नहीं मानते तो मैं कह रहा हूं

1084
01:15:10,240 --> 01:15:14,640
जो प्रामाणिकता ब्राह्मणों को मांसाहारी बता रही है

1085
01:15:14,640 --> 01:15:18,640
मानने के लिए कह रही है उसको कैसे प्रामाणिक तो जो प्रामाणिकता स्त्रियों का देवर

1086
01:15:18,640 --> 01:15:23,040
के साथ नियोग करा रही है उसको हम प्रामाणिक कैसे मान ले जो है

1087
01:15:23,040 --> 01:15:27,120
विषय पे अलग चर्चा कर सकता हूं तो फिर बलि विषय पे मैं अलग से चर्चा कर सकता

1088
01:15:27,120 --> 01:15:31,120
हूं आप अवतार पे रहिए सांड की बात कर ऋषि की बात नहीं करण

1089
01:15:31,120 --> 01:15:35,280
की बात कर रहा हूं तो मैं दयानंद जी की बात करूंगा ना

1090
01:15:35,280 --> 01:15:39,360
आप छोड़ दीजिए आर्य समाज मैंने ध्यान की बात आप आर्य समाज छोड़ दीजिए

1091
01:15:39,360 --> 01:15:43,360
अच्छा वेदव्यास जी नियोग से पैदा नहीं हुए वेदव्यास जी

1092
01:15:43,360 --> 01:15:47,600
अरे भाई मैं बात जिस समय जिस समय

1093
01:15:47,600 --> 01:15:51,680
वही लिखा है आप आपने खुद आपने खुद कहा

1094
01:15:51,680 --> 01:15:55,840
कि आपने खुद माना अपने वीडियो में कि सत्यार्थ प्रकाश में नियोग पे

1095
01:15:55,840 --> 01:16:00,000
ज्यादा बात कर दी इतनी बात नहीं करनी चाहिए इतनी यानी गलत माना ना ये नहीं लिखा

1096
01:16:00,000 --> 01:16:04,080
ये नहीं कहा मैंने गलत कर दिया ज्यादा जो जहां पे

1097
01:16:04,080 --> 01:16:06,400
नहीं

1098
01:16:06,400 --> 01:16:08,560
आपसे देखिए देखिए अगर

1099
01:16:08,560 --> 01:16:12,640
हमारे को अवतार के निष्कर्ष पर पहुंचना है तो बहुत सरल सी बात है तर्क पे हमने

1100
01:16:12,640 --> 01:16:17,520
बहुत देर बात करी अभी आप प्रमाण पे आए अब आप प्रमाण पे आए

1101
01:16:17,520 --> 01:16:21,680
मैं प्रमाण दे रहा हूं मुझे आप ये बता दीजिए अगर सायण का अर्थ आप नहीं मान

1102
01:16:21,680 --> 01:16:25,920
रहे हैं तो आपके पास वेद मंत्र कैसे आया मैं साय का भी लाऊंगा

1103
01:16:25,920 --> 01:16:30,400
अर्थ साण का भी अर्थ लाऊंगा भाई साहब आचार्य काऊंगा

1104
01:16:30,400 --> 01:16:34,480
मैं मैं पूछ रहा हूं कि आपके पास वेद मंत्र कैसे आया अगर आप सांड को प्रमाण नहीं

1105
01:16:34,480 --> 01:16:38,800
मान रहे तो एक व्यक्ति ने कोई बात कह दी

1106
01:16:38,800 --> 01:16:42,800
और उसने उसको कह दी इसका अर्थ नहीं है कि वो सुना रहे वेद पाठी ब्राह्मण ने वेद मंत्र

1107
01:16:42,800 --> 01:16:46,960
सुना दिया इसका अर्थ नहीं वो वेद मंत्र जानता भी है अर्थ भी जानता है तो वेद के विषय

1108
01:16:46,960 --> 01:16:51,520
में हमारे पास प्रमाण क्या है कि ये ईश्वर की ही वाणी है ये तो मनुस्मृति

1109
01:16:51,520 --> 01:16:55,600
प्रमाण है मनुस्मृति कहां से प्रमाण है वो कहां से

1110
01:16:55,600 --> 01:16:59,760
ये मत पूछिए कहां से आई मत पूछिए आप मनुस्मृति में ही आपने सारा घोटाला कर दिया

1111
01:16:59,760 --> 01:17:04,000
है अरे आप बताइए ना कहां से आया कहीं से आया कहां

1112
01:17:04,000 --> 01:17:09,120
से आया? उसका अर्थ पर बात करिए। आप

1113
01:17:09,120 --> 01:17:13,120
आप अर्थ को ठुकरा रहे हैं ना। आप जिस जिस एक सोर्स को

1114
01:17:13,120 --> 01:17:17,200
प्रमाणिक मान रहे हैं मंत्र के लिए उसी सोर्स को अप्रामाणिक

1115
01:17:17,200 --> 01:17:21,520
मान रहे हैं उसके अर्थ के लिए। बात ये है अपना प्रमाण दीजिए।

1116
01:17:21,520 --> 01:17:23,920
दूसरा कहां से आया वो छोड़िए। ये

1117
01:17:23,920 --> 01:17:28,000
आया जो आया देखिए मूल तो आया उनसे साण से

1118
01:17:28,000 --> 01:17:32,160
लेकिन अर्थ उन्होंने सारा गड़बड़ कर दिया। यानी कि यानी कि सायण

1119
01:17:32,160 --> 01:17:36,240
अज्ञानी थे। उन्होंने गलती की है ना भाष्य में? सारी गलती है।

1120
01:17:36,240 --> 01:17:40,560
सब गलती नहीं पर बहुत सारी गलती है। तो जो जो

1121
01:17:40,560 --> 01:17:44,640
कहीं पर वेदों का अर्थ करते समय गलती कर सकता है वो वेदों का मंत्र लिखते

1122
01:17:44,640 --> 01:17:48,640
समय भी तो गलती कर सकता है। नहीं कर सकता। क्यों? मंत्र तो

1123
01:17:48,640 --> 01:17:52,720
जैसे तैसे कंप्यूटर भी सुना सकता है। अर्थ नहीं कर सकता कंप्यूटर। तो

1124
01:17:52,720 --> 01:17:56,800
कंप्यूटर तो कंप्यूटर तो कंप्यूटर से लेने के बाद हम उसको वेद मंत्र

1125
01:17:56,800 --> 01:18:01,040
को वेद मंत्र नहीं मानते। हम किसी गुरु के पास जाकर सत्यापित करते हैं ना कि वेद है कि नहीं।

1126
01:18:01,040 --> 01:18:05,040
जैसे आपके यहां पर जर्मनी से वेद आए थे तो आपने कहीं पर मैंने सुना है केरल

1127
01:18:05,040 --> 01:18:09,360
में जाकर किसी सत्यापित करवाए थे। देखिए जी अगर वेद

1128
01:18:09,360 --> 01:18:13,360
की बात कर रहे है ना परंपरा से मैं प्रेरण करता हूं एक मंत्र देता हूं अर्थ करवा

1129
01:18:13,360 --> 01:18:17,760
दीजिए आप अपनी परंपरा से। चैलेंज देखिए आप अपनी प्रामाणिकता बताइए।

1130
01:18:17,760 --> 01:18:21,760
परंपरा की बात मत करिए। मैं अगर आपको मेरा मेरा वेद अर्थ

1131
01:18:21,760 --> 01:18:25,920
आपको प्रामाणिक नहीं लग रहा है तो आप अपनी प्रामाणिकता बता दीजिए। कहां से आए वेद मंत्र? तो

1132
01:18:25,920 --> 01:18:30,240
आप सायन की प्रमाणिकता बता दीजिए। बता तो रहा हूं। सायन की प्रमाणिकता

1133
01:18:30,240 --> 01:18:34,640
जब सुनिए जब महर्षि याजवल कह रहे हैं कि गर्भ सूर्य को कहते हैं।

1134
01:18:34,640 --> 01:18:38,960
सायण की सुनिए। गर्भ गर्भ को नहीं कहते। गर्भ गर्भ को नहीं कहते।

1135
01:18:38,960 --> 01:18:43,040
वेद के गर्भ सूर्य को भी कहते। गर्भ सूर्य को भी कहते हैं। गर्भ गर्भ को भी तो

1136
01:18:43,040 --> 01:18:47,040
कहते हैं। वेद के पद योगिक है। वेद

1137
01:18:47,040 --> 01:18:52,400
के पद योगिक है। वो गर्भ क्यों? बात आ गई। बात आ गई है प्रमाण।

1138
01:18:52,400 --> 01:18:56,400
बात आ गई प्रमाण आप जिनसे वेद के मंत्र ले रहे हैं उसके अर्थ

1139
01:18:56,400 --> 01:19:00,400
को स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो बेकार में वो और मंत्र देना वो

1140
01:19:00,400 --> 01:19:04,400
फिर व्यर्थ रुक गया नहीं नहीं दीजिए मंत्र दीजिए मंत्र दीजिए दे तो

1141
01:19:04,400 --> 01:19:08,400
रहा हूं इतने सारे अभी तो एक दिया है वो भी अर्थ गड़बड़ है

1142
01:19:08,400 --> 01:19:10,640
उसका

1143
01:19:10,640 --> 01:19:14,720
मैं जो भी मैं जो भी दूंगा उसका अर्थ आपके लिए गड़बड़ ही होगा याव जी की बुक

1144
01:19:14,720 --> 01:19:19,200
आपके पास कहां से आई कहां से ये क्यों पूछ रहे हो आपके

1145
01:19:19,200 --> 01:19:23,280
अरे अरे भैया या पता नहीं किसी मोहम्मद से जाकर ले ली किससे

1146
01:19:23,280 --> 01:19:27,440
ले ली बताइए मुझे मोहम्मद से तो आपने ली या पशु बली हमने नहीं ली आपने

1147
01:19:27,440 --> 01:19:31,440
दिए मोहम्मद को आप अपने पूर्वजों का बात बता दीजिए ना मेरे

1148
01:19:31,440 --> 01:19:35,440
पूर्वज मैं श्री राम का वंशज हूं अरे वो पूर्वज

1149
01:19:35,440 --> 01:19:40,160
नहीं विद्या में सुनिए विद्या में मुंडकोपनिषद पढ़िए

1150
01:19:40,160 --> 01:19:44,160
विद्या विद्या के मामले में एक से ले पहले ही अध्याय में

1151
01:19:44,160 --> 01:19:48,320
एक से ले चौथे मंत्र तक वहां पर ऋषि अपनी परंपरा

1152
01:19:48,320 --> 01:19:52,320
बता रहे विद्या कैसे आई आप मुझे मुझे बताइए आपकी परंपरा

1153
01:19:52,320 --> 01:19:54,240
परंपरा अच्छा आप बताइए

1154
01:19:54,240 --> 01:19:58,720
हां बताइए शंकराचार्य जी के गुरु कौन थे बता दे रहा हूं

1155
01:19:58,720 --> 01:20:02,960
बताओ शंकराचार्य को व्यास जी तक जोड़िए व्यास

1156
01:20:02,960 --> 01:20:08,960
हां जोड़ रहा हूं जोड़ रहा जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं जोड़ रहा हूं अभी जोड़ दे रहा हूं

1157
01:20:09,440 --> 01:20:13,440
पहले है अगर पीछे चलते हुए चले तो उनसे पहले

1158
01:20:13,440 --> 01:20:17,600
वाले हैं गोविंद योगिन गोविंद योगेंद्र मत्स्य

1159
01:20:17,600 --> 01:20:21,920
उनसे पहले गॉड फाद उससे पहले सुखदेव जी उससे पहले व्यासदेव जी उससे पहले पाराशर

1160
01:20:21,920 --> 01:20:25,920
जी उससे पहले शक्ति उससे पहले वशिष् एक मिनट उससे पहले पद्म भव

1161
01:20:25,920 --> 01:20:29,920
उससे पहले नारायण जी कितने कितने खा गए बीच में आप व्यास

1162
01:20:29,920 --> 01:20:34,480
जी और शंकराचार्य जी की चार पीढ़ी बताई आपने देखिए

1163
01:20:34,480 --> 01:20:38,480
यहां पे दो बातें होती है मैं बताता हूं दो बीच में टूट गई

1164
01:20:38,480 --> 01:20:42,640
परंपरा दो दो आंसर है ना टूटेगी नहीं टूटेगी

1165
01:20:42,640 --> 01:20:46,960
चार पीढ़ी चार पीढ़ी पहले ठीक है ठीक है एक होता है मतानुज्ञा

1166
01:20:46,960 --> 01:20:51,200
निग्रह स्थान कि अगर मैंने ने कहा कि आप अंधे हो तो आपने

1167
01:20:51,200 --> 01:20:55,200
कह दिया तू भी तो गूंगा है। मेरे गूंगे होने से आपका अंधा ना होना सिद्ध नहीं होता।

1168
01:20:55,200 --> 01:20:59,440
पहली बात मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। आप

1169
01:20:59,440 --> 01:21:03,680
मेरे को अप्रामाणिक कह रहे हैं मगर आप अपनी प्रामाणिकता के लिए भी मेरी अप्रामाणिकता

1170
01:21:03,680 --> 01:21:07,680
को ही आधार बता रहे हैं। अगर मैं अप्रामाणिक हूं इसका मतलब बिना क्वेश्चन किए आपको मान

1171
01:21:07,680 --> 01:21:09,760
लेना चाहिए।

1172
01:21:09,760 --> 01:21:13,840
पहली बात अभी आंसर नहीं पूछना चाहिए।

1173
01:21:13,840 --> 01:21:17,920
आंसर आंसर आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा नहीं हुआ है।

1174
01:21:17,920 --> 01:21:22,000
आंसर पूरा आंसर पूरा नहीं हुआ है। आंसर पूरा नहीं हुआ है। बातें बंद कर

1175
01:21:22,000 --> 01:21:26,000
अर्थ की बात करिए। पूरी बात बता रहा हूं। ये बातें बंद क्यों करें? ये

1176
01:21:26,000 --> 01:21:30,160
बातें मैं मंत्र ला रहा हूं। भाई वो मंत्र लाने का कोई मतलब नहीं है ना। इसीलिए

1177
01:21:30,160 --> 01:21:34,880
तो परंपरा पूछता हूं। पूछता हूं। मेरी

1178
01:21:34,880 --> 01:21:38,880
मेरी मेरी मेरी दूसरी बात भी सुन लीजिए। दूसरी

1179
01:21:38,880 --> 01:21:43,040
पहली तो ये हो गई। मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। दूसरी बात

1180
01:21:43,040 --> 01:21:47,120
यह आती है कि इसको थोड़ा सा

1181
01:21:47,120 --> 01:21:51,200
मैं समझा देता हूं आपको कि मान लीजिए इसमें ये बताइए मैं

1182
01:21:51,200 --> 01:21:55,200
परंपरा से पूछ रहा हूं सबगा शुक्र परंपरा हमारे

1183
01:21:55,200 --> 01:21:59,280
यहां पर ईश्वर को निराकार सगुण निराकार और सगुण साकार तीनों रूपों

1184
01:21:59,280 --> 01:22:04,320
में स्वीकार किया गया है। पहला है एक एक मिनट

1185
01:22:04,320 --> 01:22:08,400
एक मिनट जिन मंत्रों का बताइए क्या

1186
01:22:08,400 --> 01:22:12,560
किया है आचार्य जी जिन मंत्रों का अर्थ जिन मंत्रों का अर्थ ईश्वर

1187
01:22:12,560 --> 01:22:16,560
के निराकार रूप में सिद्ध है उनको हम स्वीकार करते हैं। जिन मंत्रों का

1188
01:22:16,560 --> 01:22:20,560
अर्थ ईश्वर के सगुण निराकार होने में सिद्ध है उसको भी हम स्वीकार करते हैं।

1189
01:22:20,560 --> 01:22:24,560
ऐसा मंत्र ऐसा मंत्र बताइए कि आचार्य जी

1190
01:22:24,560 --> 01:22:25,060
आचार्य

1191
01:22:25,040 --> 01:22:29,120
राम आचार्य जी थोड़ी तीन बातें हो गई

1192
01:22:29,120 --> 01:22:33,200
हमने बहुत देर तक तर्क पे बात की थी उसके बाद प्रमाण पे आए और फिर

1193
01:22:33,200 --> 01:22:37,200
उसके बाद प्रमाण की प्रमाणिकता परंपरा अब एक आपने बात

1194
01:22:37,200 --> 01:22:41,360
कही थी कि अगर आपके पास तर्क नहीं होगा तो आपको घोषणा करनी होगी कि आपके आर्य समाज

1195
01:22:41,360 --> 01:22:45,360
के पास तर्क नहीं है पहले आप वो घोषणा कर दीजिए फिर मैं प्रमाण बात करता हूं

1196
01:22:45,360 --> 01:22:49,520
अच्छे से सारी बातें तर्क से हमने खत्म की आपकी कहां तर्क से सारी बातें

1197
01:22:49,520 --> 01:22:53,680
तर्क से उत्तर दिया आप आप आप गंदगी को

1198
01:22:53,680 --> 01:22:58,320
ईश्वर से जोड़ रहे हो आपको उस गंदगी आप आप जिस आप

1199
01:22:58,320 --> 01:23:02,800
जब ईश्वर को आप जब ईश्वर को जिस कार्य के कारण

1200
01:23:02,800 --> 01:23:06,960
जिन कार्यों के द्वारा मनुष्य लिप्त हो जाएगा जिन कार्यों से उन कार्यों के कारण

1201
01:23:06,960 --> 01:23:10,960
आप ईश्वर को पापी नहीं मान रहे हो और वहीं पर अगर वह अवतार ले रहा

1202
01:23:10,960 --> 01:23:14,960
है तो पापी मान रहे हो जैसे कि जैसे कि जब स्त्रियां नहा रही है सरोवर में

1203
01:23:14,960 --> 01:23:20,320
तब भी ईश्वर देख रहा है मगर उसने कृष्ण बनकर अगर देख लिया तो पापी हो गया

1204
01:23:20,320 --> 01:23:24,400
यह बात है आप अगर उसने रूप ले लिया अगर उसने रूप

1205
01:23:24,400 --> 01:23:28,720
ले लिया तो पापी हो गया तो आपका तर्क कटा मैंने कहा अनंत एक पॉइंट

1206
01:23:28,720 --> 01:23:32,880
भी अगर वो रुकेगा तो अंत है उसकी सामर्थ्य का अंत

1207
01:23:32,880 --> 01:23:37,280
है अनंत सामर्थ्यवान सिद्ध करिए उसे अनंत वरना

1208
01:23:37,280 --> 01:23:40,240
वरना ये कहिए कि वो अनंत सृष्टि

1209
01:23:40,240 --> 01:23:44,720
रच सकता है वो अनंत ये फला काम कर सकता है उसके अंदर अनंत

1210
01:23:44,720 --> 01:23:48,720
मगर वो अनंत सामर्थ्यवान नहीं है उसके सामर्थ की सीमा है

1211
01:23:48,720 --> 01:23:52,880
कुरान पुराण का उपदेश भी कर सकता है। नहीं तो उसकी अनंता भंग होगी।

1212
01:23:52,880 --> 01:23:57,040
बाइबल का उपदेश भी करेगा नहीं तो अनंता भंग। आपने खुद कहा कि आपने खुद

1213
01:23:57,040 --> 01:24:01,040
कहा आपने आपने खुद कहा मनुष्य कोई भी कार्य बिना ईश्वर की सहायता से कर

1214
01:24:01,040 --> 01:24:05,120
ही नहीं रहा है। यानी कुरान भी देने में ईश्वर की सहायता तो आपने भी सुनिए ये नहीं

1215
01:24:05,120 --> 01:24:09,200
होता है। जी जी ऐच्छिक क्रिया अनैच्छिक क्रियाएं हृदय की धड़कन

1216
01:24:09,200 --> 01:24:13,440
ईश्वर का काम है। लेकिन अच्छे बुरे कर्म करना मेरा काम है।

1217
01:24:13,440 --> 01:24:17,600
ईश्वर की सहायता है ना उसमें? ईश्वर की सहायता इसमें थोड़ी है अच्छे बुरे कर्म

1218
01:24:17,600 --> 01:24:21,760
करने में। उसके शरीर को चलाने में ईश्वर की सहायता है। वो पाप

1219
01:24:21,760 --> 01:24:25,760
करने में थोड़ी ईश्वर की सहायता है। अगर उसका अरे भाई

1220
01:24:25,760 --> 01:24:30,080
वही तो मैं कह रहा हूं। आप मानना पड़ेगा कि मोहम्मद भी राम दोनों ही अवतार

1221
01:24:30,080 --> 01:24:34,320
हैं। कैसे अंतर करेंगे? आप जब ये चलिए ठीक है।

1222
01:24:34,320 --> 01:24:38,320
अंतर ठीक है। ठीक है। ठीक है। मैं बता रहा हूं। आपने कहा कि ईश्वर नाना रूपों में प्रकट

1223
01:24:38,320 --> 01:24:42,400
होता है। ठीक है? सूर्य को माना, चंद्रमा को माना। इसका मतलब नाली भी

1224
01:24:42,400 --> 01:24:46,640
ईश्वर है। सब में ईश्वर है। नाली ईश्वर नहीं है।

1225
01:24:46,640 --> 01:24:50,880
नाली नाली नाली नाली क्या होती है? नाली नाली मॉलिक्यूल

1226
01:24:50,880 --> 01:24:54,960
है। उनमें भी ईश्वर है। हां उनमें नहीं नाली के रूप में भी

1227
01:24:54,960 --> 01:24:55,460
ईश्वर ने

1228
01:24:55,280 --> 01:24:59,360
अपने आप को प्रकट किया है। नाली नाली मल

1229
01:24:59,360 --> 01:25:03,600
हां सब में ईश्वर है। मॉलिक्यूल को बस बस ऐसे मल मल भी ईश्वर

1230
01:25:03,600 --> 01:25:07,600
है। सब में ईश्वर है। आर्य समाज का ईश्वर मल भी मल के रूप में भी अपने

1231
01:25:07,600 --> 01:25:11,680
आप को प्रकट करता है। नहीं करता बस ऐसे

1232
01:25:11,680 --> 01:25:15,920
ही है। अब सुनिए सुनिए सुनिए अब अब

1233
01:25:15,920 --> 01:25:20,080
सुन लीजिए एक चीज़ प्रमाण लाइए कुतर्क मत करिए मैं आपको जो है मोहम्मद

1234
01:25:20,080 --> 01:25:24,320
वाला मोहम्मद कुतर्क आपका मोहम्मद कुतर्क नहीं है। मेरी नाली कुतर्क है। आपका

1235
01:25:24,320 --> 01:25:28,320
मोहम्मद कुतर्क नहीं है। आपकी कुरान कुतर्क नहीं है। आपकी आपकी

1236
01:25:28,320 --> 01:25:32,400
कुरान कुतर्क नहीं है। मगर मेरा जो मल है वो कुतर्क है। आपने कहा कि कृष्ण

1237
01:25:32,400 --> 01:25:36,640
बनके नंगे दर्शन कर सकता है तो मोहम्मद बन के मार भी सकता है लोगों को।

1238
01:25:36,640 --> 01:25:40,720
मैंने कहा मैंने कहा मैंने कहा आपका ईश्वर नहीं देख रहा है क्या जहां वो नहा

1239
01:25:40,720 --> 01:25:44,800
रही है ईश्वर ईश्वर ईश्वर तो उनके अंदर भी

1240
01:25:44,800 --> 01:25:48,880
है उसको देख मैं कह रहा हूं ईश्वर देख रहा है ना उसकी आंख नहीं

1241
01:25:48,880 --> 01:25:52,960
है वो देखता नहीं है बिना आंखों के सब देखता है ईश्वर ईश्वर देखता

1242
01:25:52,960 --> 01:25:56,960
है ना वही मैं कह रहा हूं मैं क्या कह रहा हूं आंखों से देखेगा देख रहा है

1243
01:25:56,960 --> 01:26:00,960
ना आप जो कुतर्क है वो भी देख रहा है ये आप

1244
01:26:00,960 --> 01:26:05,280
कहां लिखा है बता दीजिए कुत मेरे जो पुत ये कहां लिखा है कि वो उनको ईश्वर

1245
01:26:05,280 --> 01:26:09,520
देख रहा तो नहीं देख रहा है ये आपकी परंपराएं पाप लिखे

1246
01:26:09,520 --> 01:26:10,400
उसमें कृष्ण भगवान का

1247
01:26:10,400 --> 01:26:14,400
दोष आपके आर समाज में पाप लिखे हुए हैं उसमें दोष है आप आपने लिखे

1248
01:26:14,400 --> 01:26:19,280
हैं पाप आपने लिखे हैं ठीक है आप व्यक्तिगत हो रहे हैं ठीक है

1249
01:26:19,280 --> 01:26:23,280
आप जा सकते हैं आप अपना काम करिए आचार्य

1250
01:26:23,280 --> 01:26:27,280
जी आप व्यक्तिगत हो रहे हैं आप आप विषय कर

1251
01:26:27,280 --> 01:26:31,360
रहे हैं आपको हर तरह का तर्क दिया है मैंने हर आपके

1252
01:26:31,360 --> 01:26:32,960
पास तर्क नहीं है तभी आप प्रमाण पे

1253
01:26:32,960 --> 01:26:37,760
आए

1254
01:26:37,760 --> 01:26:43,760
आपकी भागवत आप अपनी माला जपते रहिए आप नहीं आप अपनी जपिए

1255
01:26:44,000 --> 01:26:48,000
जय श्री राम तो आप

1256
01:26:48,000 --> 01:26:52,080
सभी ने देखा होगा हां तो सभी देख रहे हैं जी

1257
01:26:52,080 --> 01:26:56,080
ठीक है अब देखिए सबसे पहले हमारी तर्क पर बात हुई

1258
01:26:56,080 --> 01:27:00,240
आप लोगों ने देखा तर्क से जब चीजें नहीं बनी तो प्रमाण को लाए प्रमाण मैंने रखा

1259
01:27:00,240 --> 01:27:04,560
प्रमाण बहुत सारे हैं मगर बात अक्सर ऐसा लोग कहते हैं प्रमाण

1260
01:27:04,560 --> 01:27:08,880
में बात नहीं है। प्रमाण से होना कुछ नहीं है। मैं बताऊंगा वो कहेंगे अर्थ गलत है। और जब मैं उन

1261
01:27:08,880 --> 01:27:13,280
अर्थ मैं परंपरा बताऊंगा तो दूसरी चीज लाएंगे। उससे क्या होगा? विषयंतर होता जाएगा।

1262
01:27:13,280 --> 01:27:17,280
आर्य समाज के पास तर्क नहीं है अवतार के लिए और प्रमाणिकता

1263
01:27:17,280 --> 01:27:21,360
तो आप लोग आर्य समाज की जानते ही हैं। अपने मन से जो भाष्य किया है। दूसरी बात

1264
01:27:21,360 --> 01:27:26,160
अब इन्होंने मोहिनी वाली बात कही है। उसको मैं पूरा कर दूं। मोहिनी वाली बात। तो

1265
01:27:26,160 --> 01:27:31,120
जो एक बहुत अच्छे वैष्णवाचार्य हुए हैं

1266
01:27:31,120 --> 01:27:35,200
उनका वो होता क्या है जब हॉट टॉक होने लगता है तो खामखा में गरमा

1267
01:27:35,200 --> 01:27:39,280
गर्मी होने लगती है कुछ उधर से ऐसी बात निकले कि मैं उनका उत्तर दूं बड़े हैं मुझसे

1268
01:27:39,280 --> 01:27:43,280
इसलिए वहां रहना उचित नहीं रह जाता है फिर व्यक्तिगत हो रहे विषय उन्होंने

1269
01:27:43,280 --> 01:27:47,600
छोड़ ही दिया कि अवतार की सिद्धि हो रही है कि नहीं हो रही है अब वो मेरे प्रमाण को मान नहीं रहे

1270
01:27:47,600 --> 01:27:48,100
बात यह

1271
01:27:48,000 --> 01:27:52,160
नहीं कि कौन वेद को मानता है कौन वेद को नहीं मानता है बात यह है कि वेद के

1272
01:27:52,160 --> 01:27:56,240
दयानंद जी के अर्थ को कौन मानता है और परम परंपरा प्राप्त अर्थ को कौन मानता है? बात

1273
01:27:56,240 --> 01:28:00,240
यह है। लोग ये आरोप लगाते हैं ना कि आप वेद को नहीं मानते। यहां वेद को मानने ना

1274
01:28:00,240 --> 01:28:04,400
मानने वाली बात नहीं है। यहां बात है तर्क की। तर्क और प्रमाण

1275
01:28:04,400 --> 01:28:08,560
की। तर्क के ऊपर आधारित बात है कि भैया अगर सायनाचार्य आपके लिए अच्छा

1276
01:28:08,560 --> 01:28:12,640
दूसरी बात कि सायणाचार्य को भी आप जो है प्रमाणिक सिद्ध कर लो। तो अपना जो

1277
01:28:12,640 --> 01:28:17,120
प्रमाणिकता है वो तो लाके दो ना। आपको वो तो देना पड़ेगा ना।

1278
01:28:17,120 --> 01:28:21,280
अपनी प्रामाणिकता। पहली बात। दूसरी

1279
01:28:21,280 --> 01:28:25,600
बात यह है कि आपके पूर्वज हम हैं। मंत्रों के मामले में, वेद

1280
01:28:25,600 --> 01:28:29,600
लाने के मामले में आपके पूर्वज हम हैं। तो हम ये आपसे स्वतंत्र होकर के कह सकते

1281
01:28:29,600 --> 01:28:33,760
हैं आप अप्रामाणिक नहीं आपके अप्रामाणिक होने से हमारा कुछ नहीं जाएगा। हम भी अप्रामाणिक

1282
01:28:33,760 --> 01:28:37,760
सिद्ध हो जाएंगे तो आपका जो वैदिक होना है शून्य हो जाएगा। खत्म। आप

1283
01:28:37,760 --> 01:28:42,640
लाइए या तो स्वतंत्र रूप से हम हमारा विरोध करते हुए अपना अर्थ। और यदि

1284
01:28:42,640 --> 01:28:47,360
प्रमाण है तो मैंने आपको दिया। मैंने यह भी पूछा कि भाई वो क्या कहते हैं? सूर्य

1285
01:28:47,360 --> 01:28:52,320
जो है यह सूर्य

1286
01:28:52,320 --> 01:28:56,720
के रूप में प्रकट होता है। यह वाली बातें चली प्रमाण पर और प्रमाण बहुत सारे हैं।

1287
01:28:56,720 --> 01:29:00,800
बात ये नहीं होती है प्रमाण किसके पास है? किसके पास नहीं है। बात यही है कि उसमें ये वाली बात आ जाती

1288
01:29:00,800 --> 01:29:03,040
है। उनके तो अर्थ गलत है। अर्थ क्यों गलत है?

1289
01:29:03,040 --> 01:29:07,120
क्योंकि उन्होंने अमुक जगह पर कहीं पर जो है उनके अनुसार गलती की

1290
01:29:07,120 --> 01:29:11,440
है। अब मैं मोहिनी वाला रूप जो है पूरा कर देता हूं। मोहिनी

1291
01:29:11,440 --> 01:29:14,320
वाला रूप क्या है?

1292
01:29:14,320 --> 01:29:20,320
मोहिनी वाला रूप है कि

1293
01:29:20,480 --> 01:29:24,800
ऐसा हुआ था

1294
01:29:24,800 --> 01:29:29,280
वहां पर पहली बात तो प्रतीकात्मक व्याख्याएं होती हैं। ऐसे बहुत से भगवान

1295
01:29:29,280 --> 01:29:33,360
के अच्छा ये देखिए कितनी सुंदर बात है। जहां पर स्त्रियों

1296
01:29:33,360 --> 01:29:37,360
को निर्वस्त होकर के नहाना नहाते हुए देखना ये निराकार ईश्वर

1297
01:29:37,360 --> 01:29:41,520
के साथ तो स्वीकार करते हैं। मगर वहीं पर अगर ईश्वर ने अवतार ले लिया रूप ले लिया तो पापी

1298
01:29:41,520 --> 01:29:45,520
हो जाएगा। क्यों भाई भाई वह तो ईश्वर है ना उसके ऊपर दोष नहीं लग रहा ना वह तो पहले

1299
01:29:45,520 --> 01:29:49,680
से ही उन स्त्रियों के अंदर भी है ना वह तो केवल एक रूप में व्यवहारिक हो गया है सामने

1300
01:29:49,680 --> 01:29:53,920
वह तो अंदर भी है तो फिर जब निराकार रहते हुए ईश्वर के द्वारा निर्वस्त्र

1301
01:29:53,920 --> 01:29:57,920
स्त्रियों को देखना गलत नहीं मानते तो फिर साकार होकर के देखने में गलत क्यों

1302
01:29:57,920 --> 01:30:01,920
मानते हो क्योंकि साकार से दिक्कत है मूर्ति से दिक्कत है तो

1303
01:30:01,920 --> 01:30:05,920
खैर ये वाली बात तो हो गई बहुत बढ़िया से और मैं उनसे

1304
01:30:05,920 --> 01:30:10,320
झगजिगिक बाजी नहीं करना चाहता था वो बात उसी पे जा रही थी कि अब वो दूसरी अश्लील

1305
01:30:10,320 --> 01:30:14,560
कुछ पशु बलि लाएंगे कुछ ऐसा लाएंगे जिसमें कि जो है हॉट

1306
01:30:14,560 --> 01:30:18,400
टॉक हो। फिर मैं भी नियोग पे बात करूं या कुछ ऐसी चीजें होंगी जिसमें

1307
01:30:18,400 --> 01:30:23,440
इस तरह से खत्म हो। तो ठीक है मैं हट गया वहां से। अब मैं आपको

1308
01:30:23,440 --> 01:30:27,520
वो दे देता हूं। उसका उत्तर जो उन्होंने अंत में कहा है। उन्होंने

1309
01:30:27,520 --> 01:30:31,440
अंत में कहा है कि

1310
01:30:31,440 --> 01:30:35,520
अ

1311
01:30:35,520 --> 01:30:39,600
उन्होंने अंत में कहा है ये मोहिनी रूप वाला। तो मोहिनी रूप

1312
01:30:39,600 --> 01:30:43,840
में पहली बात तो प्रतीकात्मक व्याख्या है कि

1313
01:30:43,840 --> 01:30:48,000
जो ये जो आचार्य माधवाचार्य शास्त्री जी हुए उन्होंने अपने

1314
01:30:48,000 --> 01:30:52,480
ग्रंथ क्यों में लिखा पुराण दिग्दर्शन में इसकी व्याख्या की है

1315
01:30:52,480 --> 01:30:56,640
पृथ्वी और जो राज जो स्वर्ण और रजत इत्यादि जो धातु

1316
01:30:56,640 --> 01:31:02,480
है उनको उनका निर्माण कैसे होता है तो सर्वप्रथम

1317
01:31:02,480 --> 01:31:06,560
जो सब जो निर्गुण निराकार सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर

1318
01:31:06,560 --> 01:31:10,640
है वो जब माया जो संयोग में आते हैं तो दो रूपों

1319
01:31:10,640 --> 01:31:14,640
में प्रकट होते हैं। एक हो गया मोहिनी बनके और एक शिव जी के रूप में

1320
01:31:14,640 --> 01:31:18,880
वो प्रकृति और पुरुष वाला मामला और उनके संयोग से इस दुनिया का निर्माण

1321
01:31:18,880 --> 01:31:24,880
होता है। ये हो गई सिंबॉलिक एक्सप्लेनेशन। है ना?

1322
01:31:25,680 --> 01:31:30,720
पहली बात। दूसरी बात हो गई सिंबॉलिक एक्सप्लेनेशन।

1323
01:31:30,720 --> 01:31:35,920
और दूसरी बात हो गई कि

1324
01:31:35,920 --> 01:31:40,480
एक मिनट। हां। पहले मैं कुछ बातें रह गई हैं।

1325
01:31:40,480 --> 01:31:44,720
मैंने की नहीं वहां पर वह विषयंतर ना हो इसलिए देखिए किसी भी चर्चा

1326
01:31:44,720 --> 01:31:48,800
में ना विषय को बचाना बड़ा आवश्यक कार्य होता है। मुझे लगता है कि

1327
01:31:48,800 --> 01:31:54,000
मैं उसमें सफल रहा क्योंकि बार-बार माया पे जाना अभी माया की बात भी करूंगा।

1328
01:31:54,000 --> 01:31:58,000
पहली बात तो यह आ जाती है कि एक अल्लाह वाली बात हुई थी कि अल्लाह और उनके रूप में आप

1329
01:31:58,000 --> 01:32:02,720
सबको एक मानते हो। तो नहीं एक नहीं मानते। होता क्या है कि

1330
01:32:02,720 --> 01:32:07,040
ईश्वर तो सब जगह सर्वत्र समान रूप से है। वो

1331
01:32:07,040 --> 01:32:11,040
फ्रिज, टीवी, कूलर, पंखा सब कुछ है। सब में ईश्वर है। सब कुछ

1332
01:32:11,040 --> 01:32:15,120
ईश्वर ही है। ईश्वर ही सबके रूप में प्रकट है। ठीक है? अब

1333
01:32:15,120 --> 01:32:19,200
बात ये आती है तो फिर हमारे लिए कृष्ण और जो है मोहम्मद में अंतर नहीं

1334
01:32:19,200 --> 01:32:23,280
है। अंतर है। किस तरह से अंतर है? जिस प्रकार जल जो है वह

1335
01:32:23,280 --> 01:32:27,600
सर्वत्र व्याप्त है। परंतु

1336
01:32:27,600 --> 01:32:32,000
हमारे जो हमारी जो प्यास है जल की वो प्यास वही बुझा

1337
01:32:32,000 --> 01:32:36,160
पाता है जो हमारे जो पात्र होता है हम मुख से पिए कर पात्र

1338
01:32:36,160 --> 01:32:40,240
होकर के पिए कर पात्र बनाकर के पिए जो हमारे पात्र के व्यवहार की सीमा

1339
01:32:40,240 --> 01:32:41,200
में आ जाए।

1340
01:32:41,200 --> 01:32:45,360
तो उसी प्रकार ईश्वर तो सर्वत्र व्याप्त है। परंतु हमारे

1341
01:32:45,360 --> 01:32:49,680
लिए अनुगम में वही ईश्वर है जो हमारे वेद रूपी पात्र के व्यवहार

1342
01:32:49,680 --> 01:32:53,680
की सीमा में आ जाए। उससे होकर के हमें प्राप्त हो। तो हमारे जो सनातन

1343
01:32:53,680 --> 01:32:57,840
धर्म शास्त्र है उनके व्यवहार की सीमा में वैदिक वांगमय की सीमा में जो होकर

1344
01:32:57,840 --> 01:33:02,080
के जो हमें भगवान के रूप प्राप्त होते हैं वो हमारे लिए अनुकरणीय भजनीय

1345
01:33:02,080 --> 01:33:06,160
और अनुगम्य होते हैं। पहली बात। दूसरी बात थोड़ा

1346
01:33:06,160 --> 01:33:10,640
सा लिंक दे दीजिए। किसी को आना हो तो आ सकता है। दूसरी

1347
01:33:10,640 --> 01:33:13,760
बात है कि

1348
01:33:13,760 --> 01:33:17,920
इन्होंने कहा था कि भाई इन्होंने खुद ही कहा था अपनी उसमें कि यदि

1349
01:33:17,920 --> 01:33:21,920
जब तर्क नहीं होगा तो घोषणा करेगा। इनके पास तर्क समाप्त हो गया। ये प्रमाण

1350
01:33:21,920 --> 01:33:26,080
मांगने लगे। प्रमाण दो प्रमाण दो। तो इन्होंने घोषणा नहीं की कि तर्क नहीं है आर्य

1351
01:33:26,080 --> 01:33:30,080
समाज के पास। ठीक है? तीसरी बात क्या है कि अभी-अभी ये

1352
01:33:30,080 --> 01:33:34,240
मोहिनी वाला आरोप लगा रहे थे मोहिनी के रूप में। तो मैंने एक सिंबॉलिक व्याख्या पहले दे दी कि ईश्वर

1353
01:33:34,240 --> 01:33:38,240
किस तरीके से कार्य करता है। इन्होंने अभी जो ओम छंद रश्मि इत्यादि माना है ना

1354
01:33:38,240 --> 01:33:42,320
वो काल है ना? तो वो बिल्कुल एग्जैक्ट वही व्याख्या है जो शंकराचार्य

1355
01:33:42,320 --> 01:33:46,320
परंपरा में हो रही है। कि ईश्वर से सबसे पहले क्या होता है? प्रकृति निकलती

1356
01:33:46,320 --> 01:33:50,320
प्रकृति जिसको ये ओम जिसको प्रणवाक्षर कहते हैं हमारे यहां भी प्रणव कहा गया कई

1357
01:33:50,320 --> 01:33:54,480
जगह शंकराचार्य परंपरा में उसके साथ वो उसके साथ ही

1358
01:33:54,480 --> 01:33:56,240
योग करके जो है इस सृष्टि का

1359
01:33:56,240 --> 01:34:00,400
विस्तार होता है तो यही तो है निर्गुण निराकार ईश्वर से एक रूप आया

1360
01:34:00,400 --> 01:34:04,400
शिव बना एक रूप आया मोहिनी बना अब शिव और मोहिनी

1361
01:34:04,400 --> 01:34:09,360
के बीच में योग हुआ और उसके कारण सृष्टि का आगे विस्तार हुआ यह हो गई आधी

1362
01:34:09,360 --> 01:34:13,600
जो पारमार्थिक व्याख्या है आदि दैविक व्याख्या अब इसकी जो है आदि

1363
01:34:13,600 --> 01:34:17,600
आदि भौतिक व्याख्या भी वह क्या है कि सबसे पहले

1364
01:34:17,600 --> 01:34:21,600
जो सर्वत्र व्याप्त होता है जो अग्नि वाष्प होती

1365
01:34:21,600 --> 01:34:25,600
है वह सर्वत्र व्याप्त होती है गर्म वो संगीभूत होती

1366
01:34:25,600 --> 01:34:29,840
है ठीक है संगीभूत होने के कारण पृथ्वी बनती है उधर शीतलता

1367
01:34:29,840 --> 01:34:34,080
वाला चंद्रमा प्रकट होता है तत्व और चंद्रमा उनका

1368
01:34:34,080 --> 01:34:38,240
एक बड़ा प्यारा सा वहां पर दृष्टांत दिया है माधवाचार्य शास्त्री

1369
01:34:38,240 --> 01:34:42,400
जी ने चंद्रमा जो है फिर आकर्षित होता है पृथ्वी की ओर और पृथ्वी

1370
01:34:42,400 --> 01:34:46,480
के चक्कर लगाता है तो चंद्रमा का जो चक्कर चक्कर लगाना है वह है उधर शिव जी

1371
01:34:46,480 --> 01:34:51,440
का मोहिनी के पीछे दौड़ना। ठीक है?

1372
01:34:51,440 --> 01:34:56,640
एक ये हो गया। जी आर्यन यादव जी

1373
01:34:56,640 --> 01:35:00,720
एक ये हो [गला साफ़ करने की आवाज़] गया। चंद्रमा के पृथ्वी के पीछे दौड़। अब जो चंद्रमा की जो

1374
01:35:00,720 --> 01:35:04,960
जो शीतलता है जो पृथ्वी के प्रति आकर्षण

1375
01:35:04,960 --> 01:35:09,200
है चंद्रमा का इसके कारण चंद्रमा का जो चंद्रमा की शीतलता इत्यादि

1376
01:35:09,200 --> 01:35:11,520
है वह पृथ्वी पर आती

1377
01:35:11,520 --> 01:35:15,520
है और फिर यह जो तत्व है शीतलता

1378
01:35:15,520 --> 01:35:19,520
और पृथ्वी की जो अग्नि वह तो स्वयं अग्नि से ही बनी है वहां पर

1379
01:35:19,520 --> 01:35:23,680
गर्माहट से तो यह जो तत्व है शीतलता चंद्रमा की और अग्नि

1380
01:35:23,680 --> 01:35:27,840
की जो गर्माहट है ये इत्यादि तत्व मिलकर के जब बहते हैं पृथ्वी पर

1381
01:35:27,840 --> 01:35:31,920
तो अलग-अलग जगह पर कहीं पर चांदी बनती है कहीं पर स्वर्ण

1382
01:35:31,920 --> 01:35:35,920
बनता है तो वहां पर जो है स्वर्ण के बनने का जो मामला है वो भी

1383
01:35:35,920 --> 01:35:40,080
यहां पर आता है। स्वर्ण में देखिए आप कि जो

1384
01:35:40,080 --> 01:35:44,080
तरलता होती है वह भी होती है और जो अग्नि की चमक होती है वह

1385
01:35:44,080 --> 01:35:48,080
भी होती है और जो शीतलता होती है जल की वो भी होती है

1386
01:35:48,080 --> 01:35:52,240
तीनों तरह के तत्व होते हैं स्वर्ण में तो उस वो जो व्याख्या है कुछ वहां पर बताई

1387
01:35:52,240 --> 01:35:56,400
गई है माधवाचार्य शास्त्री जी की बुक है अभी वर्ड टू वर्ड मुझे याद नहीं है तो

1388
01:35:56,400 --> 01:36:00,960
उसमें सारी चीजें क्लियर क्लेरिफाई हो रही है तो ये थी हमारी

1389
01:36:00,960 --> 01:36:05,840
चीजें आज आर्य समाज के एक बहुत

1390
01:36:05,840 --> 01:36:09,840
प्रसिद्ध है ये आचार्य जी इनके साथ हमारी आज बातचीत हो

1391
01:36:09,840 --> 01:36:14,320
गई है। जी आदित्य जी नारायण

1392
01:36:14,320 --> 01:36:18,320
भैया नारायण ऐसा है

1393
01:36:18,320 --> 01:36:22,320
कि जब वेदों वेदों की बात आती है कह देते हैं योगिक अर्थ होते

1394
01:36:22,320 --> 01:36:26,320
हैं। वेदों के सामान्य अर्थ नहीं लिए जाते। सब योगिक है। तो पुराणों के

1395
01:36:26,320 --> 01:36:30,880
प्रसंग योगिक क्यों नहीं हो सकते? हम लोग तो कहते हैं ना कि भाई वेदों

1396
01:36:30,880 --> 01:36:34,880
वेदों की भांति पुराण अनादि है हां और पुराण

1397
01:36:34,880 --> 01:36:38,880
वेदों का ही विस्तार है तो पुराणों का योगिक अर्थ लगाने में ये सब पीछे हट

1398
01:36:38,880 --> 01:36:42,880
जाते हैं और वेदों में जहां पर सब स्पष्ट है वहां भी अलंकार लगा

1399
01:36:42,880 --> 01:36:47,200
देते हैं वेदों वेदों में वेदों

1400
01:36:47,200 --> 01:36:51,360
के अर्थ अपने अनुसार ले लेंगे उसमें तरह तरह की अलंकारी व्याख्या मान करके मगर

1401
01:36:51,360 --> 01:36:55,360
पुराणों में वही अलंकारी व्याख्या ढूंढने का प्रयास नहीं करते हैं। भाई

1402
01:36:55,360 --> 01:36:59,520
एक जो राम मनोहर जी आए हैं उनको भी ले लीजिए ऊपर मुझे लगता

1403
01:36:59,520 --> 01:37:03,760
है कि आंखें खोल देने वाली चर्चा हो है यह

1404
01:37:03,760 --> 01:37:07,760
जो भी प्रबुद्ध जन जो भी प्रबुद्ध वर्ग है वो इस

1405
01:37:07,760 --> 01:37:11,920
चर्चा को अवश्य सुने और देखे कि किस प्रकार से अवतार की सिद्धि होती

1406
01:37:11,920 --> 01:37:17,280
है [गला साफ़ करने की आवाज़]

1407
01:37:17,280 --> 01:37:23,280
जय श्री राम जय श्री राम जी जय श्री राम जी जी

1408
01:37:24,320 --> 01:37:28,560
हमने हमने सोचा था कि ये कोई प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन्होंने बहुत सारे वैदिक फिजिक्स

1409
01:37:28,560 --> 01:37:33,040
के ग्रंथ लिखे हैं। ये कुछ विशेष बताएंगे। कुछ नई चीज रिसर्च करके बताएंगे।

1410
01:37:33,040 --> 01:37:37,040
परंतु जहां पर सब फंस जाते हैं व भी फंस गए। कुछ विशेष दिखा ही नहीं

1411
01:37:37,040 --> 01:37:41,680
इनकी चर्चा सुनके। हम हम बिल्कुल बिल्कुल

1412
01:37:41,680 --> 01:37:45,920
क्योंकि जिस जिस चीज को ये कुतर्क कह रहे थे जब शिवश जी ने उदाहरण

1413
01:37:45,920 --> 01:37:50,080
दिया नाली वाला तो भैया जब इन्होंने इन्होंने बोला कि भैया

1414
01:37:50,080 --> 01:37:54,160
यह चीज यह कुतर्क है। तो जब आप मोहम्मद का उदाहरण दे रहे हैं वह कुतर्क नहीं है।

1415
01:37:54,160 --> 01:37:58,320
तो वहां पर वो फस गए थे। एक्चुअली ये बहुत बड़ा पॉइंट था। वो

1416
01:37:58,320 --> 01:38:02,320
जब तर्क पर फंस रहे थे तो प्रमाण की बात कर रहे थे। प्रमाण पर फंस रहे थे तो फिर वहां

1417
01:38:02,320 --> 01:38:06,400
पर वो उस पर जा रहे थे। अश्लीलता पशु इत्यादि। वहां वहां ये अलंकार

1418
01:38:06,400 --> 01:38:11,760
नहीं ढूंढेंगे। वहां उनका तात्पर्य समझ समझने नहीं जाते हैं।

1419
01:38:11,760 --> 01:38:15,840
सबसे सुंदर बात जो आपने कही शिवश भैया आपने

1420
01:38:15,840 --> 01:38:20,160
जो बात कही ना सबसे सुंदर जो लगा जो वही आपने पहले

1421
01:38:20,160 --> 01:38:24,240
तीन पॉइंट कि सर्वज्ञ का मतलब होता है सब कुछ जानने

1422
01:38:24,240 --> 01:38:28,240
वाला। ठीक है? [गला साफ़ करने की आवाज़] जब

1423
01:38:28,240 --> 01:38:32,800
सर्वज्ञ का मतलब होता है सब कुछ जानने वाला। तो सर्वशक्तिमान का मतलब

1424
01:38:32,800 --> 01:38:37,360
सब कुछ करने वाला क्यों नहीं है भाई? मैटर यहां ये है।

1425
01:38:37,360 --> 01:38:41,360
है ना? ये जो तीन पॉइंट है कि

1426
01:38:41,360 --> 01:38:45,760
ईश्वर जो है सर्वशक्तिमान है सनातन के ईश्वर तो फिर वहां बाधित

1427
01:38:45,760 --> 01:38:50,160
तो किसी भी कारण से हो बाधित तो हो रहे है ना अगर वो अवतार नहीं ले रहे

1428
01:38:50,160 --> 01:38:54,160
हो [गला साफ़ करने की आवाज़] सिंपल बात है और वो भी तब जब शास्त्र

1429
01:38:54,160 --> 01:38:58,240
में प्रमाण है जो आपने उदाहरण दिया [गला साफ़ करने की आवाज़] 31 से 19 का तो

1430
01:38:58,240 --> 01:39:02,240
वहां पर लिखा हुआ है कि बहुत बहुत रूपों में प्रकट होता

1431
01:39:02,240 --> 01:39:06,320
ठीक है बहुत रूपों में अब इसकी वो क्या कह रहे हैं व्याख्या बदल

1432
01:39:06,320 --> 01:39:10,320
दे रहे हैं कह रहे हैं ये जो बहुत रूपों में लिखा है एक्चुअली वो ईश्वर के लिए नहीं लिखा

1433
01:39:10,320 --> 01:39:15,200
है कि ईश्वर बहुत रूप लेकिन वो मंत्र तो ईश्वर के लिए है कि ईश्वर बहुत रूपों में प्रकट होता है।

1434
01:39:15,200 --> 01:39:19,200
जी सायन सायन का जो आप एग्जांपल दे रहे थे तो फिर सायन का

1435
01:39:19,200 --> 01:39:23,680
उनको पसंद नहीं है उनके मुताबिक अर्थ नहीं है तो भाई नहीं हम इसको नहीं मानते

1436
01:39:23,680 --> 01:39:28,720
अर्थ गलत है ये कैसे हो गया आपके अनुकूल जो अर्थ

1437
01:39:28,720 --> 01:39:32,800
जब नियोग को मानना होगा और व्यक्ति प्रश्न करेगा ये मुझे अच्छा नहीं लग

1438
01:39:32,800 --> 01:39:37,760
रहा देखने में तब वहां पर ये कह दोगे नहीं भैया शास्त्र ने कहा है तो मानना पड़ेगा

1439
01:39:37,760 --> 01:39:41,920
तो अगर आपको कोई शास्त्र की बात अच्छी नहीं लग रही तो उसको तर्क से कैसे काट

1440
01:39:41,920 --> 01:39:46,080
रहे हो वहां पे भी यही नियम लागू करो ना कि भैया शास्त्र की दृष्टि से देखो

1441
01:39:46,080 --> 01:39:48,720
शास्त्र का तो मानना पड़ेगा

1442
01:39:48,720 --> 01:39:52,880
या तो जाकर के शायन परंपरा जो है उनकी परंपरा से जाकर

1443
01:39:52,880 --> 01:39:57,120
के उसका अर्थ पूछो और इससे मतलब क्या है अगर शायन की परंपरा

1444
01:39:57,120 --> 01:40:01,200
से गलत अर्थ आ रहा है तो मंत्र भी तो गलत आ सकता है तो इस विषय में कोई जवाब ही नहीं

1445
01:40:01,200 --> 01:40:05,360
है आप ये आप ये प्रश्न मत पूछो अथ तो धर्म जिज्ञासा

1446
01:40:05,360 --> 01:40:10,400
अथातो ब्रह्म जिज्ञासा अथातो धर्म जिज्ञासा में प्रश्न भी आ गया

1447
01:40:10,400 --> 01:40:16,400
संशयात्मा विनति क्यों ना पूछे प्रश्न

1448
01:40:18,080 --> 01:40:22,480
प्रमाणों से प्रमाणों से

1449
01:40:22,480 --> 01:40:26,560
प्रमाणों को तर्क से वो व्यक्ति काट रहा है जो व्यक्ति तर्क से अपने

1450
01:40:26,560 --> 01:40:31,310
मत को सिद्ध करने में असमर्थ होकर प्रमाणों की ओर भाग रहा है।

1451
01:40:31,310 --> 01:40:35,440
[हंसी] सही कहा। प्रमाणों से

1452
01:40:35,440 --> 01:40:39,600
वो व्यक्ति जो प्रमाणों से वो व्यक्ति तर्कों को काट रहा है जो व्यक्ति तर्क

1453
01:40:39,600 --> 01:40:43,760
से पलायन करके और जो प्रमाणों पर भागा था। हां तर्क

1454
01:40:43,760 --> 01:40:48,400
से प्रमाणों को वो व्यक्ति काट रहा है जो व्यक्ति तर्क तर्क से अपने

1455
01:40:48,400 --> 01:40:54,230
मत को अुद्ध करने में सिद्ध करने में असमर्थ हो के प्रमाणों की ओर भागा था

1456
01:40:54,230 --> 01:40:58,240
[गला साफ़ करने की आवाज़] तर्क तर्क तुम्हारे पास बचा नहीं है तर्क से तुम नष्ट हो गए

1457
01:40:58,240 --> 01:41:02,400
तर्क से तुम पराजित हो गए अब तुम प्रमाण की ओर भाग रहे हो तो फिर प्रमाण

1458
01:41:02,400 --> 01:41:03,760
को तर्क के आधार पर कैसे

1459
01:41:03,760 --> 01:41:07,840
काटोगे तर्क तो खत्म है ना मर गया ना

1460
01:41:07,840 --> 01:41:12,000
तर्क तो पहले ही छोड़ आए थे बिल्कुल तर्क में जब टूट गए थे तभी तो प्रमाण आए

1461
01:41:12,000 --> 01:41:16,240
थे और इसीलिए क्योंकि यह जो चीज है ना यह जानी है इसमें परंपरा

1462
01:41:16,240 --> 01:41:20,240
में यह जो शास्त्रों में जो लिखा है यह अंतत गतवा जाना

1463
01:41:20,240 --> 01:41:24,240
है यह अपना अर्थ बताएंगे हम अपना अर्थ बताएंगे तो वहां पे कभी भी निष्कर्ष नहीं

1464
01:41:24,240 --> 01:41:28,320
आ पाएगा ईश्वर अवतार नहीं ले सकता कि ले सकता है इसलिए पहले मैं तर्क पे

1465
01:41:28,320 --> 01:41:32,320
बात करता हूं भाई आपके पास जितने आपकी झोली में तर्क हो आप देते जाओ अब

1466
01:41:32,320 --> 01:41:36,320
क्या-क्या इन्होंने दिया अच्छा इन्होंने एक जगह माया पे और बात कही थी तात्विक

1467
01:41:36,320 --> 01:41:40,480
व्याख्या पे और बात कही थी वो भी आपको बता दूं कि एक आदमी है जो पेपर

1468
01:41:40,480 --> 01:41:44,720
ले रहा है भाई भाई अगर कोई व्यक्ति परीक्षा ले रहा है

1469
01:41:44,720 --> 01:41:48,880
तो जिस छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है उसका दुष्कर्म

1470
01:41:48,880 --> 01:41:52,960
हम स्वीकार कर लें। वो उसको बुरा नहीं लगना लगेगा क्या? अगर

1471
01:41:52,960 --> 01:41:57,040
किसी व्यक्ति का भाई ये तुम्हारी प्रॉब्लम है कि तुम पेपर ले रहे हो।

1472
01:41:57,040 --> 01:42:01,680
जिस छोटी बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है वो तो पूछेगी ना मैंने क्या किया था?

1473
01:42:01,680 --> 01:42:05,840
हम तो वहां पर तो ये मानना पड़ेगा ना कि भाई प्रतीति में ऐसा हमें

1474
01:42:05,840 --> 01:42:10,000
दिख सकता है कि ईश्वर जो है लिप्त हो रहा है। फिर हम उसे अलिप्त क्यों मानेंगे? आत

1475
01:42:10,000 --> 01:42:14,160
गतवा आपकी जो तात्विक व्याख्या वो भी काम नहीं आनी है। वो व्याख्या काम तभी

1476
01:42:14,160 --> 01:42:18,320
आएगी कि यह जो दुष्कर्म है ये माया मात्र हो ही नहीं रही है।

1477
01:42:18,320 --> 01:42:18,880
प्रतीति

1478
01:42:18,880 --> 01:42:23,760
मात्र है। नहीं तो आप दोष मुक्त नहीं कर पाओगे ईश्वर को।

1479
01:42:23,760 --> 01:42:28,320
यही यही तो जो है अब्राहमी कल्ट वाले यही तो बताते हैं

1480
01:42:28,320 --> 01:42:32,400
कि जो है उनके उनके द्वारा जो प्रदत ईश्वर है वो

1481
01:42:32,400 --> 01:42:36,480
जो है यहां पर ले रहा है अरे भाई जब परीक्षा

1482
01:42:36,480 --> 01:42:42,240
परीक्षा लेने वाला तर्क वहीं से उठ के आता है उस जगह तभी तो मैचिंग मैचिंग

1483
01:42:42,240 --> 01:42:46,240
हमने थोड़ी ना परीक्षा चुनी थी भाई उस बच्ची ने परीक्षा नहीं चुनी

1484
01:42:46,240 --> 01:42:50,320
है ना अच्छा एक बात और है तात्विक व्याख्या की बात कर इन्होंने माया पे प्रश्न

1485
01:42:50,320 --> 01:42:54,880
उठाया था वैसे तो भरभ के इंद्र मायावी वाला तो वो मैं अगला प्रमाण देता ही

1486
01:42:54,880 --> 01:42:59,520
कि माया क्या है। खैर अब माया की बात करूं। इनके अनुसार

1487
01:42:59,520 --> 01:43:01,680
जो

1488
01:43:01,680 --> 01:43:05,520
महाप्रलय होती है उसमें

1489
01:43:05,520 --> 01:43:09,680
स्पेस वगैरह कुछ नहीं होता है। प्रकृति होती नहीं है। प्रकृति भी

1490
01:43:09,680 --> 01:43:13,920
ईश्वर के अंदर अदृश्यमान होती है। ठीक है? और

1491
01:43:13,920 --> 01:43:17,920
जो मुक्त जीव होते हैं वह विचर रहे होते हैं। और जो यह वाले

1492
01:43:17,920 --> 01:43:22,800
होते हैं ना जिनके अभी मुक्त नहीं हुए वह वहां पर बेहोश पड़े होते हैं।

1493
01:43:22,800 --> 01:43:28,160
तो अब ये जो कहीं पर बेहोश पड़े हैं और यह जो

1494
01:43:28,160 --> 01:43:32,240
क्या कहते हैं जो प्रकृति है वो भी उसके

1495
01:43:32,240 --> 01:43:33,920
अंदर है। ब्रह्म के अंदर

1496
01:43:33,920 --> 01:43:37,920
है। ठीक है? प्रकृति भी उसके अंदर है। और तीसरा

1497
01:43:37,920 --> 01:43:41,920
क्या है? कि कुछ जो है मुक्त जीव वो विचर रहे हैं। अब यह बताओ जब

1498
01:43:41,920 --> 01:43:47,680
स्पेस है ही नहीं तो यह मुक्त जीव कहां पर विचर रहे हैं?

1499
01:43:47,680 --> 01:43:51,920
कहां विचर रहे हैं? भाई गति कहां हो रही है? ट्रेवलिंग कहां हो रही है? तो मानना

1500
01:43:51,920 --> 01:43:56,160
पड़ेगा कि जो ट्रेवलिंग है, जो स्थितियां है, यह ज्ञानार्थक है।

1501
01:43:56,160 --> 01:44:00,240
यह ट्रेवलिंग ज्ञानार्थक है। ठीक है? यानी

1502
01:44:00,240 --> 01:44:04,320
कि माया और क्या कहते

1503
01:44:04,320 --> 01:44:08,800
हैं? सत। सत और माया का अंतर आ गया ना? व्यवहार और परमार्थ आ गया।

1504
01:44:08,800 --> 01:44:12,880
इनकी खुद की व्याख्या में ही अच्छा ब्रह्म के अंदर कौन

1505
01:44:12,880 --> 01:44:16,880
सी दीवार है जिसके कारण जो जो प्रकृति ब्रह्म

1506
01:44:16,880 --> 01:44:20,960
के अंदर है दिख नहीं रही है। दिखने योग्य नहीं है। और इनका एक

1507
01:44:20,960 --> 01:44:25,120
वो वाला वो वाली बात भी है कि उस समय उसको देखने वाला कोई नहीं होता है। तो

1508
01:44:25,120 --> 01:44:29,600
किसी देखने वाले ना होने के कारण किसी का अव्यवहारिक होना सिद्ध नहीं होता है।

1509
01:44:29,600 --> 01:44:33,680
कोई भी अव्यवारिक तब होगा जब वो अव्यवहारिक होगा। चाहे भले

1510
01:44:33,680 --> 01:44:38,320
ही उसका उसका दृष्टा हो चाहे ना हो। हां जी

1511
01:44:38,320 --> 01:44:42,320
बिल्कुल बिल्कुल और [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां पर तो अर्थ भी भिन्न नहीं

1512
01:44:42,320 --> 01:44:46,640
है जो दयानंद सरस्वती जी ने भी अर्थ किया है बहुत प्रकारों से विशेषकर प्रकट

1513
01:44:46,640 --> 01:44:49,120
होता हूं तो ये तो दयानंद जी भी वही लिख

1514
01:44:49,120 --> 01:44:53,120
रहे हैं साय भी वही लिख रहे हैं बस ये यहां पर यहां पर अर्थ

1515
01:44:53,120 --> 01:44:57,120
में नहीं उसमें अपना भाव ले रहे हैं अपना भाव

1516
01:44:57,120 --> 01:45:01,200
ले रहे हैं मैंने तरह से कहा अंतत तो गतवा मैंने ये भी बताया ना ईश्वर को

1517
01:45:01,200 --> 01:45:05,520
आप ये मानो उसका स्वभाव है कि वो जो है व्यवहार में ना आ सकने वाला है

1518
01:45:05,520 --> 01:45:09,600
अप्रकट है। उसका स्वभाव है। वो अप्रकट है। किसी प्रकार से जानने में ना

1519
01:45:09,600 --> 01:45:13,760
आने वाला है। फिर वो प्रकट हो रहा है ना तो आप अगर स्वभाव विरुद्ध कार्य मानेंगे

1520
01:45:13,760 --> 01:45:17,840
तो जो प्रकट होना है ये भी तो स्वभाव विरुद्ध हो गया। जानने वाला

1521
01:45:17,840 --> 01:45:21,840
अगर वो हो रहा है तो यहां पर भी अवतार मानना पड़ेगा। क्योंकि अगर अवतार नहीं

1522
01:45:21,840 --> 01:45:25,840
मानेंगे तो ईश्वर में परिवर्तन मानना पड़ेगा और ईश्वर में परिवर्तन मान लेंगे

1523
01:45:25,840 --> 01:45:30,400
तो ईश्वर की शाश्वतता भंग हो जाएगी। फिर वो ईश्वर ही नहीं रह जाएगा।

1524
01:45:30,400 --> 01:45:34,400
तो अवतार मानना पड़ेगा कि ईश्वर का जो शुद्ध रूप था वो है। अब वो एक और रूप

1525
01:45:34,400 --> 01:45:38,720
में प्रकट हुआ। अब यहां इस रूप में वो जानने वाला हो गया। यह सगुण निराकार

1526
01:45:38,720 --> 01:45:42,880
अवतार है भगवान का। जी और ब्रह्मांड

1527
01:45:42,880 --> 01:45:46,960
को भी अगर आप ये बोल रहे हो कि जो पूरा ब्रह्मांड है वो भी एक शरीर है।

1528
01:45:46,960 --> 01:45:51,280
ऐसा बोलते हैं तो उस रूप में भी तो व्यवहार में आ रहा है ईश्वर। थोड़ा सा

1529
01:45:51,280 --> 01:45:55,280
अवतार सिद्ध हो रहा है। आचार्य जी शुरू से जो है थोड़ा रहने की कोशिश कर रहे थे।

1530
01:45:55,280 --> 01:45:59,600
पर अंत में आते आते वो थोड़ा सा व्यक्तिगत होने लगे। थोड़ा सीधे-सीधे

1531
01:45:59,600 --> 01:46:03,600
आरोप इत्यादि पर आने लगे। पर यह मैंने एक्सपेक्ट नहीं करा था इनसे।

1532
01:46:03,600 --> 01:46:04,160
सही बताऊं।

1533
01:46:04,160 --> 01:46:08,240
मुझे नहीं मुझे यह था कि यह विषय से नहीं भाग के बात करेंगे।

1534
01:46:08,240 --> 01:46:12,240
मतलब विषय पर रहेंगे। ये मैं सोच रहा था। लेकिन अंत में जब वो बोलने लग गए कृष्ण और यह

1535
01:46:12,240 --> 01:46:16,400
बात तो वही मेरे को दृश्य हुआ कि अक्सर आर्य समाज जी हमेशा

1536
01:46:16,400 --> 01:46:20,400
भगवान श्री कृष्ण के ऊपर वो करने लग जाते हैं कि देखो आपने चरित्र

1537
01:46:20,400 --> 01:46:24,480
बिगाड़ दिया। ये सब वही व्यवहारिक चीजें आने लग गई। तो कोई नई चीज नहीं लगी

1538
01:46:24,480 --> 01:46:28,560
मुझे यहां पर। मैं आचार्य जी से तो कम से कम एक्सपेक्ट नहीं कर रहा था कि वो इस तरह से

1539
01:46:28,560 --> 01:46:34,560
मतलब करेंगे

1540
01:46:35,760 --> 01:46:40,160
आज मैं सुबह से ही मतलब आप आज डिबेट ही देख रहा हूं एक नास्तिक नास्तिक

1541
01:46:40,160 --> 01:46:44,640
से आप डिबेट कर रहे थे राटा वो कैसे अमूर्ख

1542
01:46:44,640 --> 01:46:49,040
नास्तिक से आप डिबेट कर रहे थे उसके पास मतलब

1543
01:46:49,040 --> 01:46:53,200
गधा को घोड़ा और घोड़े को गधा कर रहा था

1544
01:46:53,200 --> 01:46:58,720
शास्त्र जी जी

1545
01:46:58,720 --> 01:47:02,800
एक मूर्ख नास्तिक से आज देख रहा था वो इतनी लंबी गई डिबेट

1546
01:47:02,800 --> 01:47:06,800
और मतलब पांच मिनट के चीज को घुमा के उतने दूर तक

1547
01:47:06,800 --> 01:47:11,280
ले गया जो मतलब कि क्या सामान्य जो पारिवारिक

1548
01:47:11,280 --> 01:47:15,600
व्यवहार है माता पत्नी और पुत्री के लिए जो दृष्टि का

1549
01:47:15,600 --> 01:47:19,600
जो विधान है सनातन को उसको ही वो चुनौती दे रहा है बेवकूफ

1550
01:47:19,600 --> 01:47:25,200
के जैसे कि नहीं ये तो सामाजिक रूल

1551
01:47:25,200 --> 01:47:29,200
एक बात आपने देखी मैंने कहा कि भाई

1552
01:47:29,200 --> 01:47:33,360
एक तो तर्क है नहीं तर्क तो हो गया खत्म ठीक है

1553
01:47:33,360 --> 01:47:37,440
और दूसरी बात फिर वहां पर आई कि क्योंकि

1554
01:47:37,440 --> 01:47:41,600
शायण ने शायण की कोई बात हमको नहीं समझ में आ रही इसलिए हमने सायण को छोड़ रखा है

1555
01:47:41,600 --> 01:47:45,680
ठीक है तो जो आर्य समाज की कोई बात यदि आपको समझ में नहीं आ रही

1556
01:47:45,680 --> 01:47:50,240
आप आर्य आर्य समाज को छोड़ दो घोषित कर दो मैं आर्य समाजी नहीं हूं

1557
01:47:50,240 --> 01:47:54,480
यही तो हमको वास्तविकता बाहर लानी है हम यही

1558
01:47:54,480 --> 01:47:58,680
चीज तो आपने बोली कि उसके बाद मैटर ही खराब हो गया

1559
01:47:58,680 --> 01:48:03,040
[हंसी] सायल का नहीं समझ में साहिल को छोड़ दो तो ये आदि समाज

1560
01:48:03,040 --> 01:48:07,120
की कोई चीज समझ में नहीं आ रही तो आप कह दो कि आप समाधि नहीं हो बात यही तो अटक

1561
01:48:07,120 --> 01:48:11,120
गई फिर उसके बाद हो गया मामला हम समझ गए थे कि

1562
01:48:11,120 --> 01:48:15,050
लगभग सभी लोग यही करते

1563
01:48:15,050 --> 01:48:19,520
[हंसी] लगभग सभी लोग यही करते हैं मुझे नहीं लगता कि ये भी यही करेंगे

1564
01:48:19,520 --> 01:48:23,520
एंड में जाकर थोड़ा हाइपर हो जाएंगे और फिर व्यक्तिगत हो जाएंगे लेकिन ये भी वही

1565
01:48:23,520 --> 01:48:27,600
कर गए। वही कर गए। ऐसे उनका

1566
01:48:27,600 --> 01:48:30,000
तो स्टार्टिंग

1567
01:48:30,000 --> 01:48:34,080
भैया को अद्वैत पर लेकर के अद्वैत विषय पर आए लेकर के और अद्वैत विषय

1568
01:48:34,080 --> 01:48:38,160
पर उनका माया ब्रह्म इन सब का खंडन करने का वो शायद प्रयास कर रहे थे स्टार्टिंग में

1569
01:48:38,160 --> 01:48:42,560
ही। लेकिन क्या है भैया का जो विषय पकड़ का जो है ना

1570
01:48:42,560 --> 01:48:46,720
कैपेबिलिटी [हंसी] उसमें उनको भागने नहीं दिया। भैया ने तुरंत

1571
01:48:46,720 --> 01:48:51,040
तुरंत उसको नहीं विषय पर रहिए। विषय पर रहिए। फिर

1572
01:48:51,040 --> 01:48:56,480
विषय पर अवतार [गला साफ़ करने की आवाज़]

1573
01:48:56,480 --> 01:49:00,720
मैं बस ये बता रहा था मैं बस ये बता रहा था कि जैसे

1574
01:49:00,720 --> 01:49:04,720
आपके पास कुछ चीजें ऐसी है जो प्रतीति हो सकती है यहां पे गलत होगा मगर आपके पास

1575
01:49:04,720 --> 01:49:08,880
एक तात्विक व्याख्या होती है पीछे हमारे पास भी हर चीज के लिए तात्विक व्याख्या

1576
01:49:08,880 --> 01:49:12,960
है अच्छा मैंने एक चीज और बोली कि जब

1577
01:49:12,960 --> 01:49:16,960
उसे अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है तो पत्थर गिराने की आवश्यकता भी

1578
01:49:16,960 --> 01:49:21,680
नहीं है [हंसी] वो वो सही था

1579
01:49:21,680 --> 01:49:25,280
सही

1580
01:49:25,280 --> 01:49:29,520
आपने तो भैया वहां पर माया का माया का जो स्टार्टिंग में बात

1581
01:49:29,520 --> 01:49:33,760
वहां पे आपने माया को खोला नहीं था वहां पे आपने ये बात इतना ही बोला था

1582
01:49:33,760 --> 01:49:37,840
कि जिस भी प्रकार से आप ईश्वर को निर्दोष मानते हैं हम लोग

1583
01:49:37,840 --> 01:49:42,000
इस आधार पर मानते हैं आप उस आधार पर मानते हैं तो वो आप बता रहे थे वहां पर लेकिन उन्होंने

1584
01:49:42,000 --> 01:49:46,160
माया को पकड़ा तो बोला अब इसको अब विषय बदलेंगे और इनको विषयांतर

1585
01:49:46,160 --> 01:49:50,400
पे ले जाएंगे तुरंत आपने बोला कि आप माया को छोड़िए आप इधर

1586
01:49:50,400 --> 01:49:54,640
बताइए जिस भी कारण से आप रखते हैं मानते हैं ईश्वर को निर्दोष

1587
01:49:54,640 --> 01:49:58,720
कारण से अनंत मैंने कहा मैंने एक पकड़ा अनंत पे

1588
01:49:58,720 --> 01:50:01,680
बात करो अनंत पे

1589
01:50:01,680 --> 01:50:06,000
बात ही नहीं पे आ गए और मैंने वाला भी दिया

1590
01:50:06,000 --> 01:50:10,000
मैंने मैंने वो वाला भी दिया हां मैंने वो

1591
01:50:10,000 --> 01:50:13,600
वाला भी दिया है क्या कहते हैं कि

1592
01:50:13,600 --> 01:50:17,680
व्यवहार विशेष व्यवहार कर रहा है ना ईश्वर अनंत है

1593
01:50:17,680 --> 01:50:23,280
मगर विशेष हो तो रहा है माना भी उन्होंने

1594
01:50:23,280 --> 01:50:27,280
विशेष हो रहा है तो वहां पर विशेष रूप धारण कर रहा है। दिखाई देने वाला नहीं

1595
01:50:27,280 --> 01:50:31,280
है। परंतु अभी वो जो था एक रस सर्वव्यापी उससे

1596
01:50:31,280 --> 01:50:35,280
वो जो है एक वाले रूप में आकर के व्यवहार कर रहा है।

1597
01:50:35,280 --> 01:50:39,760
बिल्कुल दिखाई देने वाली बात तो बाद की है। अगर वो बात चलती तो फिर मैं धक्का लेके आता।

1598
01:50:39,760 --> 01:50:40,320
वो फिर बाद

1599
01:50:40,320 --> 01:50:44,400
में लाता। हां ये ये धक्का रह गया बीच में। ये धक्का रह गया।

1600
01:50:44,400 --> 01:50:48,560
[हंसी] वो पहले ही प्रमाण पे आ गए ना।

1601
01:50:48,560 --> 01:50:52,720
पहले प्रमाण आ गए ओम रश्मि वाला सुनना चाह रहे थे फिर वही है बात

1602
01:50:52,720 --> 01:50:56,880
ओम रश्म आपने वहां पर दूसरी बात भैया आपने वहां

1603
01:50:56,880 --> 01:51:00,960
पर ये बात बोला था आपके पास कहां से [गला साफ़ करने की आवाज़] है

1604
01:51:00,960 --> 01:51:04,960
वो मंत्र कहां से आएगा आप किसको मानते हैं या मनुस्मृति पे कुछ बात पता नहीं यही

1605
01:51:04,960 --> 01:51:09,040
कुछ हो रहा था कि आप पूछ रहे थे कि कि कहां से आए तो बाद में वो ये स्वीकार

1606
01:51:09,040 --> 01:51:13,040
करते हैं कि मूल तो सायन ही है ठीक है जब भाई तुम सायन मान

1607
01:51:13,040 --> 01:51:17,280
रहे हो आप रहे हो तो फिर आप क्यों उसका फिर विरोध कर रहे हो अगर आप विरोध

1608
01:51:17,280 --> 01:51:21,600
कर रहे तो आपके पास उचित नहीं है ना फिर आपका परंपरा

1609
01:51:21,600 --> 01:51:26,080
नहीं है ना आपको प्रमाणिकता और तीसरी बात

1610
01:51:26,080 --> 01:51:30,320
कर दिया उन्होंने केवल मनमानी लगा वेद का जो मंत्र

1611
01:51:30,320 --> 01:51:34,480
लिया वो वेद का मंत्र ही बदल दिया अजयमानु जाते वाला में

1612
01:51:34,480 --> 01:51:38,560
उन्होंने मंत्र गलत उच्चारण किया उन्होंने उन्होंने उस मंत्र का गलत उच्चारण

1613
01:51:38,560 --> 01:51:42,560
किया शिवा जी ने बोला भी कि मंत्र नहीं उच्चारण करना उन्होंने गलत उच्चारण किया तो

1614
01:51:42,560 --> 01:51:48,080
फिर वो गलत ही है ना वेद भगवान का अपमान होता है ऐसे गलत मंत्र का उच्चारण किया

1615
01:51:48,080 --> 01:51:52,560
क्या है मैं क्या है मैं क्या आप लोगों को

1616
01:51:52,560 --> 01:51:55,520
एक बात बताऊं ये उनके

1617
01:51:55,520 --> 01:51:59,840
लिए नहीं है मैं अपने जीवन का एक घटना बता रहा हूं हुआ क्या था मुझे बहुत सारे लोगों ने पकड़

1618
01:51:59,840 --> 01:52:04,080
लिया था युवा अवस्था की बात है जब मैं युवा था अभी भी कुछ लोग मुझे युवा

1619
01:52:04,080 --> 01:52:08,240
समझते पर मैं मेरी आयु जो है युवा वाली है नहीं तो

1620
01:52:08,240 --> 01:52:12,240
जब मैं युवा था तो कहीं पर तो कहीं

1621
01:52:12,240 --> 01:52:16,400
पर कुछ बात हुई थी तो किसी से मेरा मेरा क्या है सदैव

1622
01:52:16,400 --> 01:52:20,400
यह हमेशा भगवान की कृपा से रहा कि मैं कितना भी क्रोध आए

1623
01:52:20,400 --> 01:52:24,400
पर मैं विवेक को खोता नहीं हूं। मैं विवेक में रहता हूं। मतलब ऐसी चीजें नहीं करने

1624
01:52:24,400 --> 01:52:28,640
लगता कि गाली गलौज पर उतर आए या मतलब अपने

1625
01:52:28,640 --> 01:52:32,720
स्तर को गिरने नहीं देता मैं कठिन से कठिन परिस्थिति में। तो किसी

1626
01:52:32,720 --> 01:52:37,520
ने मुझे गाली दे दी थी कहीं पे और उसके लोग वहां पर मौजूद थे।

1627
01:52:37,520 --> 01:52:41,600
हां वो मुझसे जो है शतरंज में हार गया था। वो शतरंज

1628
01:52:41,600 --> 01:52:45,600
में हार गया था। और लगातार मैंने जो है उसको शतरंज में चार छह

1629
01:52:45,600 --> 01:52:49,680
बार हरा दिया था और बहुत वैसा वो प्रतियोगिता

1630
01:52:49,680 --> 01:52:53,680
थी मतलब जैसे आज आज हम लोग शत इस पर बैठे हैं ना ऐसा ही

1631
01:52:53,680 --> 01:52:57,760
दिन वो भी था तो शतरंज में वो हार गया था तो तो जब

1632
01:52:57,760 --> 01:53:01,840
वो हार गया तो लास्ट में जब मैं जाने लगा तो उसने मुझे कुछ अश्लील शब्द

1633
01:53:01,840 --> 01:53:05,840
कह दिए जैसे अश्लील शब्द भागवतानंद के यहां पर उसके उसने कहे थे

1634
01:53:05,840 --> 01:53:09,920
पांडे ने जाते जाते कुछ बड़बड़ा दो कुछ तो कुछ तो भस निकाल

1635
01:53:09,920 --> 01:53:10,640
लो

1636
01:53:10,640 --> 01:53:15,280
तो जब वो हार गया तो उसने ऐसे कह कह दिया तो मैंने कहा मैंने कहा भाई यह क्यों बोल रहे हो?

1637
01:53:15,280 --> 01:53:19,360
हां तुम हार गए इसलिए अपनी वो ऐसे करके चालू हुई बात तो वो तुरंत

1638
01:53:19,360 --> 01:53:23,360
और हावी हो गया और जो है उसके लोग भी मेरे आसपास आ गए।

1639
01:53:23,360 --> 01:53:27,520
अब जब उसके लोगों ने मुझे घेर लिया 10 20 लोगों ने घेरा हुआ था

1640
01:53:27,520 --> 01:53:31,840
तो मुझे वो 10 20 लोग नहीं दिख रहे थे। मैं अपना टारगेट

1641
01:53:31,840 --> 01:53:35,920
ढूंढ रहा था वो कहां है। है ना? और मैंने भीड़ में

1642
01:53:35,920 --> 01:53:39,920
से निकल के उसको वो कुछ हो रहा है मेरे पीछे। वो हाथ पैर चल रहे हैं

1643
01:53:39,920 --> 01:53:43,920
लोगों के और मैं उसको देख रहा हूं। वो कहा उसको पकड़ लिया।

1644
01:53:43,920 --> 01:53:48,080
भीड़ में से हाथ निकाल के उसको पकड़ा उसको मारा और उसको मतलब

1645
01:53:48,080 --> 01:53:52,640
जो अपनी चीज थी वो मैंने कर ली। तो यही होता है विषय। विषय

1646
01:53:52,640 --> 01:53:56,800
विषय को ढूंढते रहिए। विषय को पकड़ के रखना बहुत जरूरी

1647
01:53:56,800 --> 01:54:00,800
है किसी भी चर्चा में। [गला साफ़ करने की आवाज़] विषय से हम घूमते चले जाते। घूमते

1648
01:54:00,800 --> 01:54:05,040
चले जाते हैं। जी। ये जो तीन पॉइंट जो है ना जो तीन पॉइंट अपना

1649
01:54:05,040 --> 01:54:09,040
रहता है कि सर्वज्ञ है सब कुछ जानने

1650
01:54:09,040 --> 01:54:13,280
वाले हैं और सर्वज्ञानी

1651
01:54:13,280 --> 01:54:18,560
है हर ज्ञान का उनके ईश्वर को पता है और सर्वशक्तिमान

1652
01:54:18,560 --> 01:54:23,280
सर्वव्यापक सर्वज्ञ

1653
01:54:23,280 --> 01:54:27,280
सर्वव्यापक तो मुझे अभी उन्होंने एक एग्जांपल

1654
01:54:27,280 --> 01:54:31,440
भी जो उन्होंने बीच में दिया था कि सब कार्य करने का

1655
01:54:31,440 --> 01:54:35,760
मतलब मतलब जो है कि ऐसा नहीं है कि ये कार्य भी वो कार्य भी उन्होंने

1656
01:54:35,760 --> 01:54:40,480
जो एग्जांपल जो दिया था ना वो ध्यान देने योग्य बात है जो सुन रहे होंगे उस वक्त

1657
01:54:40,480 --> 01:54:44,480
वो मानव कृत कार्यों के लिए है और मानव की क्षमता के हिसाब से

1658
01:54:44,480 --> 01:54:48,480
बताया गया कार्य है कि मुझे कह दिया गया कि राम मनोहर तुम फलाना सारा

1659
01:54:48,480 --> 01:54:52,480
काम कर लेना तो भाई मेरी एक सामर्थता की सीमित है मैं

1660
01:54:52,480 --> 01:54:56,560
सीमित हूं कि उससे ज्यादा मैं नहीं कर सकता तो सामने वाले

1661
01:54:56,560 --> 01:55:00,640
के सब कहने का मतलब है कि मेरे सामर्थ के अंदर लेकिन ईश्वर के सामर्थ

1662
01:55:00,640 --> 01:55:05,280
की तो सीमा नहीं है तो उस पर ये लागू कैसे होएगा? नहीं हो सकता ना लागू।

1663
01:55:05,280 --> 01:55:09,280
जब वो सर्वव्यापक का मतलब हम ऐसा नहीं मानते कि नाली में नहीं है, इस

1664
01:55:09,280 --> 01:55:13,280
कटोरी में नहीं है, आकाश में नहीं है, पेड़ के पत्ते में नहीं है, शरीर में नहीं

1665
01:55:13,280 --> 01:55:17,360
है। हम ये मानते हैं कि सब जगह है मतलब वो कटोरी भी है। वो एक छोटा से

1666
01:55:17,360 --> 01:55:21,680
छोटा जीव भी है। अच्छा एक और चीज आप देखिएगा डिबेट के समय शिवश

1667
01:55:21,680 --> 01:55:25,760
भैया सब लोगों को भी कह रहा हूं ध्यान से ध्यान रखेंगे कि जैसे

1668
01:55:25,760 --> 01:55:30,240
डिबेट होता है ना तो एक कहते हैं ना कि आप लोग मूर्ति बोल के

1669
01:55:30,240 --> 01:55:34,400
उसके उनके ओहदे को आप छोटा कर रहे हैं। अरे

1670
01:55:34,400 --> 01:55:38,480
भाई कैसी मूर्खता पूर्ण बात है। एक जो वैसा जीव जो हम अपनी

1671
01:55:38,480 --> 01:55:42,640
नगन्य आंखों से नहीं देख रहे हैं। उसको भी बनाने वाले ईश्वर है। उसके

1672
01:55:42,640 --> 01:55:47,040
भी जन्म उसका भी जन्म देने वाले ईश्वर है। तो जब उतने छोटे से जीव

1673
01:55:47,040 --> 01:55:51,040
जिसको हम देख भी नहीं पा रहे हैं। उसको पैदा करने के लिए ईश्वर जब

1674
01:55:51,040 --> 01:55:55,520
अपनी शक्ति लगाता है तब वहां क्यों नहीं कहते कि भाई इतना तुच्छ कार्य क्यों कर रहा है ईश्वर?

1675
01:55:55,520 --> 01:56:00,240
हम मैंने ये वाले क्वेश्चन किए तो ये तर्क है नहीं।

1676
01:56:00,240 --> 01:56:03,360
मैंने ये वाले

1677
01:56:03,360 --> 01:56:07,440
मैंने वहां पे ये वाले क्वेश्चन किए तो थे कि भाई अगर

1678
01:56:07,440 --> 01:56:11,520
आप क्या कहते हैं ये उसके

1679
01:56:11,520 --> 01:56:15,760
द्वारा आप छोटे वाले कार्य होने में वो मान रहे हो तो उसके द्वारा जो वेद जो वेद

1680
01:56:15,760 --> 01:56:20,000
का ज्ञान है वो एक मिनट अपने मन में सोचेगा सबको वेद का ज्ञान हो जाएगा फिर क्यों

1681
01:56:20,000 --> 01:56:24,640
मंत्र के रूप में देता है वेद क्यों दृष्टा होते है फिर उसके

1682
01:56:24,640 --> 01:56:28,880
तो उन्होंने कोई जवाब थोड़ी ना दिया है मैंने जितने क्वेश्चन रेज किया कोई भी व्यक्ति

1683
01:56:28,880 --> 01:56:32,960
होगा कोई जवाब नहीं दिया नहीं अच्छा एक चीज और बता दूं पशु बलि

1684
01:56:32,960 --> 01:56:37,200
इत्यादि के बारे में बता दूं तो जो हमारे शास्त्रों में

1685
01:56:37,200 --> 01:56:41,520
पशु बलि इत्यादि का जहांजहां पर रेफरेंस आया है पहली बात तो ज्यादातर

1686
01:56:41,520 --> 01:56:45,600
प्रतीकात्मक है और जहांजहां पर यह है ही कि हां

1687
01:56:45,600 --> 01:56:50,400
इसमें यहां पर पशु का उपयोग है तो सबसे पहली बात है वहां विवशता अथवा

1688
01:56:50,400 --> 01:56:53,520
प्रवृत्ति अब विवशता और प्रवृत्ति की

1689
01:56:53,520 --> 01:56:58,240
बात क्या है कि जो ये जो चीज है

1690
01:56:58,240 --> 01:57:02,240
पशु पशु का उपयोग पहली बात जो गाय इत्यादि के आरोप लगते हैं वो तो करपात्री जी

1691
01:57:02,240 --> 01:57:06,400
का उसमें समाधान है। वहां पर जो गाय

1692
01:57:06,400 --> 01:57:10,480
इत्यादि को यज्ञ में उपयोग में लेने की बात कही गई है। पहले भी

1693
01:57:10,480 --> 01:57:14,800
बता चुका हूं। वहां पर गाय की बात नहीं हो रही है। वहां पर मानसिक आहुति

1694
01:57:14,800 --> 01:57:18,800
की बात है। गाय को लेकर के उसका वध करना यज्ञ के निमित्त वो कहीं पर भी

1695
01:57:18,800 --> 01:57:22,800
स्वीकार्य नहीं है। हमारी परंपरा में। दूसरी बात

1696
01:57:22,800 --> 01:57:26,880
कि वेदों के अंदर जो जहां पर अगर ऐसे अर्थ प्राप्त

1697
01:57:26,880 --> 01:57:31,520
हो भी जाते हैं कि हां भाई पशु है ही तो वो वहां पर विवशता

1698
01:57:31,520 --> 01:57:35,600
अथवा प्रवृत्ति से निवृत्ति के निमित्त है उसका पर्यावसान

1699
01:57:35,600 --> 01:57:40,080
जो मांसाहार है उसकी उसके प्रोत्साहन में ना होकर उसकी न्यूनता

1700
01:57:40,080 --> 01:57:44,080
में कि यदि खाना अनिवार्य

1701
01:57:44,080 --> 01:57:48,080
अगर ग्रहण करना अनिवार्य हो जिस स्थिति में तो उस स्थिति में

1702
01:57:48,080 --> 01:57:52,240
किस विधि के द्वारा ग्रहण किया जाए जिसके कारण उसमें कहीं उसकी

1703
01:57:52,240 --> 01:57:56,240
प्रवृत्ति से निवृत्ति होती जाए अथवा यदि व्यवस्थावश यदि उसका उसको

1704
01:57:56,240 --> 01:58:00,240
ग्रहण किया भी जाए तो हम उसी को अपना स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल ना मान ले उसी

1705
01:58:00,240 --> 01:58:04,240
को जीवन ना मान ले सिर्फ इतने भर के लिए वो वाक्य है जैसे

1706
01:58:04,240 --> 01:58:08,560
कि अगर अल्कोहल की बात करें खांसी होने पर आज के टाइम में

1707
01:58:08,560 --> 01:58:12,560
निर्विवाद रूप से निर्भीक होकर के व्यक्ति अल्कोहल पीता है कि नहीं पीता

1708
01:58:12,560 --> 01:58:16,320
है उसमें कोरेक्स में

1709
01:58:16,320 --> 01:58:20,880
अल्कोहल का और ना जाने कितनी दवाइयों के नाम

1710
01:58:20,880 --> 01:58:25,120
कितनी दवाइयों में पशु का [गला साफ़ करने की आवाज़] उपयोग हो ही रहा है। मगर वहां पर कोई विधि नहीं है।

1711
01:58:25,120 --> 01:58:29,520
मगर हमारे यहां पर यदि पशु को ग्रहण करने की

1712
01:58:29,520 --> 01:58:33,600
जो है अंतिम व्यवस्था भी हो जाए तो वहां पर भी विधि वाक्य इसलिए

1713
01:58:33,600 --> 01:58:38,000
दिए गए हैं जिससे कि उसमें हम लिप्त होकर ना रह जाए। उससे निवृत्ति

1714
01:58:38,000 --> 01:58:42,080
भी पाए। तो उसका मतलब क्या हुआ कि ऐसे वाक्यों

1715
01:58:42,080 --> 01:58:46,080
का जो पर्यावसान है वो मांसाहार की न्यूनता में है।

1716
01:58:46,080 --> 01:58:50,160
उसके प्रोत्साहन में नहीं है। उसको प्रोत्साहित नहीं किया गया है। बस इतनी सी बात

1717
01:58:50,160 --> 01:58:54,240
है कि हमारे यहां पर जो प्रामाणिक परंपराएं हैं

1718
01:58:54,240 --> 01:58:58,480
वो वो अस्पताल है जहां बाहर ये नहीं लिखा हुआ है कि यहां पे जो है रोगी

1719
01:58:58,480 --> 01:59:02,640
नहीं आ सकता है। अस्पताल के बाहर हम यह लिख दें कि भैया यहां पे रोगी

1720
01:59:02,640 --> 01:59:06,640
नहीं आएगा। तो उस अस्पताल की क्या वैल्यू? उसी प्रकार से जो धर्म है

1721
01:59:06,640 --> 01:59:10,800
जो प्रामाणिक परंपराएं हैं वो मनुष्य को धार्मिक बनाती हैं।

1722
01:59:10,800 --> 01:59:14,880
मनुष्य मनुष्य को पशुत्व से मुक्त कराती है। मनुष्य

1723
01:59:14,880 --> 01:59:18,880
बनाती हैं। तो उसको एज इट इज उस रूप में ग्रहण करेंगी जिस

1724
01:59:18,880 --> 01:59:22,880
रूप में वो है और कई प्रकार के रूप वाले मनुष्य हैं। ग्रहण करने के

1725
01:59:22,880 --> 01:59:24,160
बाद ऐसी विधियां

1726
01:59:24,160 --> 01:59:28,240
ऐसे उपाय किए जाएंगे कि धीरे-धीरे उसके अंदर की जो विकृतियां जो

1727
01:59:28,240 --> 01:59:32,240
दोष है उससे वो दूर हो और वो अपने मुक्ति पथ पर आगे बढ़े।

1728
01:59:32,240 --> 01:59:36,320
तो यह पशु बल इत्यादि का महत्व है। हालांकि अवतार विषय से इसका

1729
01:59:36,320 --> 01:59:40,320
कोई रिलेशन नहीं था। कोई रिलेशन नहीं था। दूसरी बात यदि

1730
01:59:40,320 --> 01:59:44,400
आपको कोई चीज गलत लग भी रही है अपनी इंद्रिय चीजों से अगर आपको कोई चीज

1731
01:59:44,400 --> 01:59:48,400
गलत लग भी रही है तब भी यदि वहां पर शास्त्र वाक्य वहां पर प्रधान है तो वहां पर

1732
01:59:48,400 --> 01:59:52,560
उसको प्रधानता देनी पड़ेगी। और यदि शास्त्र वाक्य को प्रधान नहीं मानेंगे

1733
01:59:52,560 --> 01:59:56,560
अपनी इंद्रियों को प्रधान मानेंगे तो फिर शास्त्र वाक्य को ला क्यों रहे हो? सीधी सी बात। फिर

1734
01:59:56,560 --> 02:00:00,640
तर्क पे ही बात करते रहो। जी लेकिन नियोग के विषय

1735
02:00:00,640 --> 02:00:04,640
में प्रवृत्ति से निवृत्ति वाली बात नहीं है। नियोग का जो विषय है इनका

1736
02:00:04,640 --> 02:00:09,040
वहां पर ऐसा नहीं है कि आपको निवृत्ति की तरफ जाना है। नहीं नहीं नहीं

1737
02:00:09,040 --> 02:00:13,040
इनका वहां पर ये इनका वहां पर नियोग के मामले में भी परंपरा प्राप्त सिद्धांतों के

1738
02:00:13,040 --> 02:00:17,280
विरुद्ध कई है। नियोग के मामले में एक अलग से पूरा वीडियो बनाएंगे। करपात्री जी ने नियोग

1739
02:00:17,280 --> 02:00:21,360
पर भी बहुत बात की है। तो नियोग का जो मामला है उसमें मोटी मोटी

1740
02:00:21,360 --> 02:00:25,680
अगर बात बता दूं। पहली बात तो आपत धर्म है। है ना? जब व्यवस्था दूसरी

1741
02:00:25,680 --> 02:00:30,480
बात उसमें प्राथमिकता होती है मानसिक नियोग की प्राथमिकता

1742
02:00:30,480 --> 02:00:34,560
हमेशा वो दहिक नियोग नहीं होता है ये लोग उसको दहिक बना मतलब जो वही वाली

1743
02:00:34,560 --> 02:00:38,640
बात जो अभी आदित्य नारायण जी कह रहे थे कि वेदों के मंत्रों को तो योगिक मान करके उनके

1744
02:00:38,640 --> 02:00:39,200
दूसरे अर्थ

1745
02:00:39,200 --> 02:00:43,200
निकालेंगे जहां पर क्लियर होगा और जो ये वाले मंत्र होंगे जहां पर जो

1746
02:00:43,200 --> 02:00:47,280
है जहां पर उनके अर्थ निकालने की जरूरत है वहां पर उनका वैसा ही अर्थ ले

1747
02:00:47,280 --> 02:00:51,440
लेंगे जो वो कह रहे हैं ये वाली बात तो नियोग पहली प्रथम तो

1748
02:00:51,440 --> 02:00:55,520
क्या है वो जो है जो मनो मनोगत होता था। मनोगत

1749
02:00:55,520 --> 02:00:59,520
व्यवहार। दूसरी बात जो दहिक वाला भी है तो वो उसमें

1750
02:00:59,520 --> 02:01:03,680
है जहां पर ऐसी प्रज्ञा शक्ति वाले लोग थे जो कि

1751
02:01:03,680 --> 02:01:07,840
अगर उसमें लिप्त होते हुए भी लिप्त ना हो उसको धारण ना कर ले उन भावनाओं

1752
02:01:07,840 --> 02:01:12,080
से ग्रसित ना हो जाए। तो आज के टाइम में तो नियोग बिल्कुल सर्वथा बैन है। इसलिए

1753
02:01:12,080 --> 02:01:17,200
क्योंकि आज वो प्रज्ञा शक्ति वाले लोग बचे ही नहीं है। तो आप क्यों सिखा रहे हो नियोग लोगों को?

1754
02:01:17,200 --> 02:01:21,280
ये सारी बातें फिर भी नियोग पे तो एक अलग से वीडियो ले ही आएंगे। जी शास्त्रवाद जी आप

1755
02:01:21,280 --> 02:01:27,280
कुछ कह रहे थे। जी

1756
02:01:36,000 --> 02:01:42,000
आवाज आ रहा है हां हां बोलिए बोलिए

1757
02:01:42,560 --> 02:01:46,640
जी भैया वही हम देख रहे थे कि वो तो हर समय अपने विषय से भागे हैं हर

1758
02:01:46,640 --> 02:01:50,720
प्रकार से वो जब बलि खोल रहे हैं आप भी नियोग खोल दे रहे [हंसी] जो उनका हाल

1759
02:01:50,720 --> 02:01:54,800
हो रहा था देखने लायक था वो अच्छा प्रहार था क्योंकि जब वो अपना अस्तर

1760
02:01:54,800 --> 02:01:59,040
निकाल रहे थे तो इन्होंने भी अस्तर यूज़ किया और वो उससे निष्फल हो गया। हालांकि मैं इसको

1761
02:01:59,040 --> 02:02:03,200
मैं इसको अपनी कमजोरी समझता हूं। मैं इसे ठीक नहीं समझता कि

1762
02:02:03,200 --> 02:02:07,280
सामने वाले ने आपको अंधा कहा आप उसे गूंगा कह रहे हो। यह मेरा तरीका नहीं

1763
02:02:07,280 --> 02:02:11,360
है। मगर वहां पे है लेकिन वहां पे उनको मैं स्मरण करा रहा हूं कि हम

1764
02:02:11,360 --> 02:02:15,440
लोग यह विषय से भटक रहे हैं। आप अवतार सिद्ध करिए और इन्होंने खुद कहा था

1765
02:02:15,440 --> 02:02:19,680
कि अगर किसी के पास तर्क नहीं होंगे तो वो वो कहेगा कि हमारे आर्य

1766
02:02:19,680 --> 02:02:23,760
समाज में तर्क नहीं है अवतार को काटने के विषय में। वो कहेगा मगर

1767
02:02:23,760 --> 02:02:27,760
वो अपनी बात से ही मुकर गए। भाई तर्क खत्म हो रहे तो आप कहोगे

1768
02:02:27,760 --> 02:02:32,240
ना कि तर्क नहीं है। क्योंकि क्योंकि प्रमाण तो विवादित है ना।

1769
02:02:32,240 --> 02:02:36,320
प्रमाण विवादित है। उस पर कभी निष्कर्ष पहुंचेंगे ही नहीं। आप कहोगे इसका अर्थ इसका अर्थ

1770
02:02:36,320 --> 02:02:40,480
अवतार नहीं है। हम कहेंगे है कहां से उस पर होगा? आप तर्क

1771
02:02:40,480 --> 02:02:44,640
लाइए इस पर इस पर ही भैया उन्होंने कहा

1772
02:02:44,640 --> 02:02:48,640
ना कि अभी आप कुतर्क कर रहे हैं। अब आप प्रमाण पे आ जाइए

1773
02:02:48,640 --> 02:02:51,120
क्योंकि वो ये स्पष्ट रूप से कह नहीं सकते भाई

1774
02:02:51,120 --> 02:02:55,760
मेरे पास तर्क खत्म हो गया। अब तुम प्रमाण पर आइए।

1775
02:02:55,760 --> 02:02:59,840
हां और प्रमाण दे दिया बहुत सही है कि प्रमाण दे दिया। अगर शिवश

1776
02:02:59,840 --> 02:03:04,000
भैया ने प्रमाण दे दिया। अब वो जो भी प्रमाण देंगे वो बोलेगा यह गलत

1777
02:03:04,000 --> 02:03:08,240
है। वो अच्छा वही मैं बोला ना आपको भैया यह सब लोग जितने भी है ना यह सब एंड में वही

1778
02:03:08,240 --> 02:03:12,240
आ जाते हैं। एंड में वही आ जाते हैं घूम

1779
02:03:12,240 --> 02:03:16,640
के मैं नहीं मानूंगा नहीं मानूंगा नहीं मानूंगा।

1780
02:03:16,640 --> 02:03:21,280
अच्छा प्रमाण कुछ और भी दे दूं। वैसे तो बहुत सारे प्रमाण है पर

1781
02:03:21,280 --> 02:03:26,400
कुछ और प्रमाण भी दे दूं मैं।

1782
02:03:26,400 --> 02:03:31,520
एक वो है तीन 53 आठ ऋग्वेद का इंद्र मायावी

1783
02:03:31,520 --> 02:03:35,680
है ना 3 53 आठ है ना और एक है 6 47 18

1784
02:03:35,680 --> 02:03:39,920
ऋग्वेद का याद है आपको 6 47

1785
02:03:39,920 --> 02:03:44,080
18 और तीन 53 आठ ये सब ऋग्वेद के है 6 47

1786
02:03:44,080 --> 02:03:48,160
18 में क्या है माया द्वारा ईश्वर अनेक रूप बनाता है वो रूपम

1787
02:03:48,160 --> 02:03:52,400
रूपम वाला माया इंद्र माया रूपम हां और नहीं

1788
02:03:52,400 --> 02:03:56,480
रूपम वाला दूसरा है वो तीन 53 आठ है परमात्मा नाना प्रकार के रूपों में प्रकट होता है वो

1789
02:03:56,480 --> 02:04:00,720
है रूपम रूपम ठीक है तो ये है जो

1790
02:04:00,720 --> 02:04:04,880
भी आ रहे हैं अगर वह नोन पर्सन है तो अपनी पहचान बताते हुए आए और अननोन

1791
02:04:04,880 --> 02:04:09,200
है तो अपना चेहरा लेकर के आए और मैं बता दूं मांडकोपनिषद में सातवें

1792
02:04:09,200 --> 02:04:13,680
नंबर में ईश्वर को व्यवहार में ना आ सकने वाला बताया गया है

1793
02:04:13,680 --> 02:04:17,920
ईश्वर व्यवहार में नहीं आ सकता तो यह उसका मौलिक स्वरूप

1794
02:04:17,920 --> 02:04:22,000
है। अगर वो किसी भी प्रकार से व्यवहार में आएगा आपको ज्ञान देने वाला होने के

1795
02:04:22,000 --> 02:04:26,320
रूप में आपके अंतःकरण का विषय बनेगा। किसी भी प्रकार से यदि वह व्यवहार

1796
02:04:26,320 --> 02:04:30,320
में आएगा तो वह पहला अवतार है ईश्वर का नहीं तो

1797
02:04:30,320 --> 02:04:34,560
उसको परिवर्तनशील मान लो दैट्स इट फिर वो शाश्वत

1798
02:04:34,560 --> 02:04:38,560
नहीं रहेगा फिर वो ईश्वर नहीं रहेगा इसलिए बात को समझने का अच्छा इन्होंने

1799
02:04:38,560 --> 02:04:41,520
तर्क में एक भी उत्तर दिया नहीं वो रिपीिटेटिव रहा और उसके

1800
02:04:41,520 --> 02:04:45,600
बाद प्रमाण पे आ गए मैंने ये देखा जी हम

1801
02:04:45,600 --> 02:04:50,240
बिल्कुल बिल्कुल और जिस मंत्र को लेकर आ रहे थे ना अपराग अपरागच्छु

1802
02:04:50,240 --> 02:04:54,320
का करके जो मंत्र है जिसमें मतलब मुझे स्मरण नहीं आ रहा कौन सा वो कह रहे थे जिसमें

1803
02:04:54,320 --> 02:04:58,560
वो कह रहे थे कि भाई ईश्वर नस नाड़ी के बंधन में नहीं आता है। वो 40 का

1804
02:04:58,560 --> 02:05:03,680
दो है या क्या है? 40व अध्याय का यजुर्वेद का हम

1805
02:05:03,680 --> 02:05:07,840
ईश्वर आठ है। हां 40

1806
02:05:07,840 --> 02:05:11,840
का आठ है। तो ये बात तो आत्मा के विषय में भी जो

1807
02:05:11,840 --> 02:05:16,160
है वो कही जाती है कि आत्मा जो है वो नस नाड़ी के बंधन में नहीं आता है।

1808
02:05:16,160 --> 02:05:20,320
है ना? जो आत्म तत्व है मैंने कहा हम

1809
02:05:20,320 --> 02:05:25,040
ईश्वर को हम ईश्वर को निराकार मानने से कहां मना कर रहे हैं

1810
02:05:25,040 --> 02:05:29,040
हम ईश्वर के निराकार रूप की व्याख्या होती है तो

1811
02:05:29,040 --> 02:05:33,120
ये वाली व्याख्या है साकार रूप की व्याख्या होती है तो इंद्र माया भी

1812
02:05:33,120 --> 02:05:37,120
है रूपम रूपम है अजन्मा

1813
02:05:37,120 --> 02:05:41,280
होते हुए भी प्रकट होते हैं। फिर प्रकट कहां हो रहे हैं? उनके

1814
02:05:41,280 --> 02:05:45,280
कार्यों से अनुभूति हो रही है। उनकी अनुमान प्रमाण मिल रहा है।

1815
02:05:45,280 --> 02:05:49,360
प्रकट कहां हो रहे हैं? अच्छा कार्य करने वाले रूप में भी

1816
02:05:49,360 --> 02:05:53,440
अगर प्रकट हो रहे तो वह तो एक देसी कार्य कर ही नहीं सकता क्योंकि वह एक देसी है नहीं मेरी

1817
02:05:53,440 --> 02:05:56,640
तरह है नहीं कि मेरा कहीं पर हाथ है मेरा कहीं पर सिर है मैं एक देसी कार्य

1818
02:05:56,640 --> 02:06:00,720
कर सकता हूं मगर जो सर्वत्र एक समान है वो कार्य कैसे करेगा एक

1819
02:06:00,720 --> 02:06:04,720
देसी वो तो अनंत कार्य करेगा ना एक देसी कार्य कर ही नहीं

1820
02:06:04,720 --> 02:06:08,720
सकता वो तो सर्वव्यापी कार्य करेगा तो ऐसा कार्य करेगा जो कार्य हो

1821
02:06:08,720 --> 02:06:12,880
हीएगा ही नहीं शुरू ही नहीं होगी क्रिया कभी यहां पे भी

1822
02:06:12,880 --> 02:06:17,120
वो ईश्वर प्रकट ही तो हो रहा है अगर इसको भी मान लो कि वो जो उसके कार्यों

1823
02:06:17,120 --> 02:06:21,120
के रूप में प्रकट होता है। वह कार्य में भी उसका अवतार है। ठीक

1824
02:06:21,120 --> 02:06:25,280
है? तो सभी को चर्चा अच्छी लगे। अच्छा कन्हैया जी बताएं

1825
02:06:25,280 --> 02:06:28,000
जय श्री राम।

1826
02:06:28,000 --> 02:06:32,000
हां जय श्री राम आप लोगों को। अच्छा कल परसों की मैंने भविष्यवाणी

1827
02:06:32,000 --> 02:06:36,120
की थी।

1828
02:06:36,120 --> 02:06:41,040
[हंसी] परसों की मैंने भविष्यवाणी की थी कुछ।

1829
02:06:41,040 --> 02:06:45,200
जी। मैंने आपसे कहा था ना? और दूसरी बात मैं

1830
02:06:45,200 --> 02:06:49,280
ये कहना चाह रहा हूं जिन प्रश्नों को आज उठा रहे हैं ये तो मैं 2011 से उठा रहा हूं

1831
02:06:49,280 --> 02:06:53,280
50ों वीडियो मेरी कम से कम YouTube पर पड़ी हुई है इस चीज के मैटर में जैसे मैंने अभी

1832
02:06:53,280 --> 02:06:57,440
बताया कि सर्वव्यापक जब सर्व शब्द लग जाता

1833
02:06:57,440 --> 02:07:01,440
है सर्व लगाया ही इसीलिए जाता है कि सब कुछ जैसे कि हम कहते हैं

1834
02:07:01,440 --> 02:07:05,440
कि ईश्वर सर्वव्यापक है। सर्व्यापक का अर्थ तो उनके जब

1835
02:07:05,440 --> 02:07:09,600
आर्य समाज जी कहते हैं सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं है कि वह

1836
02:07:09,600 --> 02:07:13,600
सब कुछ कर सकता है बल्कि यह है कि वह अपना कार्य करने के लिए किसी की

1837
02:07:13,600 --> 02:07:17,840
सहायता नहीं लेता। तो सर्वव्यापक में भी फिर हमको ये डेफिनेशन लेनी पड़ेगी

1838
02:07:17,840 --> 02:07:22,160
कि ईश्वर सर्व व्यापक का अर्थ यह है कि वह व्यापक

1839
02:07:22,160 --> 02:07:26,960
होने के लिए किसी की सहायता नहीं देता। इसका मतलब यह नहीं कि वो मेरे अंदर भी है।

1840
02:07:26,960 --> 02:07:31,920
यह मेरा वीडियो बनाया हुआ है ऑलरेडी। इसमें कई चीजें बनाई हुई है मैंने।

1841
02:07:31,920 --> 02:07:36,160
हम जैसे सर्व कहते सर्वे भवंत सुखिन

1842
02:07:36,160 --> 02:07:40,320
हम यह लगाते हैं तो सर्व इसलिए लगाया गया है गया है इसका मतलब यह सभी

1843
02:07:40,320 --> 02:07:44,400
सुखी हो जाए इसका मतलब ये नहीं है कि सभी सुखी हो जाए तो इसका मतलब मैं भी सुखी हो जाऊं जब सब

1844
02:07:44,400 --> 02:07:48,400
लगा सर्व लगा दिया तो सभी सुखी हो गए ना अलग से बोलने की जरूरत नहीं है

1845
02:07:48,400 --> 02:07:51,440
क्या मैं सुखी हो सर्व तो सबके लिए आ गया अब जैसे गीता

1846
02:07:51,440 --> 02:07:55,440
में श्लोक आया सर्वे युद्ध विशारदा सर्व युद्ध विशारदा इसका

1847
02:07:55,440 --> 02:07:59,520
मतलब ये है कि भीमसेन में जो है जो है

1848
02:07:59,520 --> 02:08:03,520
बलशाली है बाकी तो कोई है ही नहीं यानी पांडव कौरव पांडव वही है बाकी जो

1849
02:08:03,520 --> 02:08:07,520
भगदत्त हुए और श्ली हुई है ये विशार नहीं है इसका मतलब अरे

1850
02:08:07,520 --> 02:08:11,680
जब सर्व लगा दिया तो सब का अर्थ हो गया कि सब कुछ

1851
02:08:11,680 --> 02:08:15,680
हो सकता है उसमें और फिर दूसरी बात ये है सबसे बात है कि ये कहते हैं कि

1852
02:08:15,680 --> 02:08:19,680
सर्वशक्तिमान का अर्थ ये है कि ईश्वर किसी की सहायता नहीं लेता तो मुझे आज

1853
02:08:19,680 --> 02:08:23,680
तक यह समझ में नहीं आया कि अवतार लेने के लिए वो किसकी सहायता लेता है भाई क्या मेरी सहायता

1854
02:08:23,680 --> 02:08:27,760
लेने आया था शिव जी आपकी सहायता लेने आया था क्या नहीं नहीं सनातन शंकर

1855
02:08:27,760 --> 02:08:31,760
जी जब ईश्वर भगवान श्री कृष्ण का अवतार ईश्वर ने लिया था तब वो आपकी सहायता ली

1856
02:08:31,760 --> 02:08:35,760
थी उन्होंने नहीं बिल्कुल भी नहीं ली थी वो तो

1857
02:08:35,760 --> 02:08:40,000
मुझे ये समझ में नहीं आ रहा तो वो वो सहायता लेता किसकी है अवतार

1858
02:08:40,000 --> 02:08:44,000
अवतार लेते समय भाई किसकी सहायता लेगा भाई वो जब वो पूरा ब्रह्मांड बना सकता है

1859
02:08:44,000 --> 02:08:48,080
तो अवतार लेने में किसी की सहायता क्यों लेगा हां लेकिन जब आर्य समाज की

1860
02:08:48,080 --> 02:08:52,080
बात आती है अभी वो पॉइंट आया नहीं हमारे पूज्य गुरुदेव भी यही कहते हैं कि

1861
02:08:52,080 --> 02:08:56,160
आर्य समाज जो है यह कहता है कि जो यह महापुरुष के रूप में राम

1862
02:08:56,160 --> 02:09:00,560
और कृष्ण है यह मुक्त आत्मा का अवतार है और धर्म की स्थापना

1863
02:09:00,560 --> 02:09:04,720
के लिए ईश्वर इन मुक्त आत्माओं को पृथ्वी पर भेजता है।

1864
02:09:04,720 --> 02:09:06,880
तो यह जो मोक्ष इनका है अनित्य

1865
02:09:06,880 --> 02:09:11,360
मोक्ष उस अनित्य मोक्ष के अनुसार राम और कृष्ण जो है वह मुक्त

1866
02:09:11,360 --> 02:09:15,360
आत्माओं के अवतार हैं। तो यानी कि ईश्वर ने धर्म की स्थापना

1867
02:09:15,360 --> 02:09:20,320
के लिए यहां पर एक मुक्त जीव का की सहायता ली। सहारा लिया।

1868
02:09:20,320 --> 02:09:24,400
हां। तो इनकी अपनी ही बात जो है कंट्राडिक्ट हो जाती है जो यह कहते हैं कि ईश्वर अपने कार्य

1869
02:09:24,400 --> 02:09:28,400
करने में किसी की सहायता नहीं लेता। अरे और ले लो। इन्होंने तो

1870
02:09:28,400 --> 02:09:32,400
माना है कि ईश्वर खुद नहीं करता। रश्मि से करवाता है।

1871
02:09:32,400 --> 02:09:36,720
है ना? सहायता ले रहा है। दूसरी बात

1872
02:09:36,720 --> 02:09:40,960
ईश्वर को वेद का ज्ञान देना था। दुनिया को चार ऋषियों की सहायता ले ही रहा है।

1873
02:09:40,960 --> 02:09:45,040
हम महावीर भी सहायता ले रहा है। मुक्त आत्माओं की सहायता ले ही

1874
02:09:45,040 --> 02:09:49,280
रहा है। वो सब ठीक है। और कोई मेरे ख्याल

1875
02:09:49,280 --> 02:09:53,360
से अब एक बात ये आती है कि भाई ये बात उठ सकती

1876
02:09:53,360 --> 02:09:57,520
है कि मैं छोड़ के क्यों आया? तो क्या करूं? उनसे फिर वहां पे वो जो वही तू तू

1877
02:09:57,520 --> 02:10:01,520
वाला सींस शुरू हो जाए। फिर वही करूं मैं। हां फिर वो

1878
02:10:01,520 --> 02:10:05,840
नहीं नहीं नहीं बिल्कुल मैं बताऊं मैंने आपने सही किया। रीजन क्या होता है? किसी देखो

1879
02:10:05,840 --> 02:10:09,920
किसी वृद्ध व्यक्ति से कोई तू तू में करना सही भी नहीं है। वो

1880
02:10:09,920 --> 02:10:13,920
अम्र में काफी बड़े हैं आपसे। कोई अगर मान लो आपसे मुंह से कुछ गलत निकल जाता है तो

1881
02:10:13,920 --> 02:10:17,920
वो आप कोई अपराध लगता है। वो इसलिए बढ़िया है कि वहां से निकल आए। कोई दिक्कत वाली बात नहीं है।

1882
02:10:17,920 --> 02:10:22,160
मेन बात अवतार बोल के निकल गया है। अवतार अवतार

1883
02:10:22,160 --> 02:10:26,240
बात हो रही है। अवतार आपने छोड़ दिया है। अवतार पहले तर्क

1884
02:10:26,240 --> 02:10:30,240
आपने छोड़ा। प्रमाण पे आए। प्रमाण पे आए। मैंने प्रमाण दिया। आपने कहा

1885
02:10:30,240 --> 02:10:34,320
भाई यह प्रमाण नहीं मेरा प्रमाण मान्य यह अर्थ नहीं मेरा अर्थ मान्य होगा। मैंने वहां

1886
02:10:34,320 --> 02:10:38,400
पर पूछा कि आपके पास वेद मंत्र आए कहां से? अगर आप शायन आपके लिए गलत है। उसमें

1887
02:10:38,400 --> 02:10:42,400
उनका पास कोई उत्तर नहीं था। अब उसमें वो ये आया सायण ने ये लिखा है वो लिखा

1888
02:10:42,400 --> 02:10:46,560
है। तो यह हमारा विषय नहीं है कि सायन ने क्या लिखा है? क्या नहीं लिखा है। विषय

1889
02:10:46,560 --> 02:10:50,640
यह है आपके पास वेद मंत्र कैसे आए? यदि आप शायद शायण को नहीं मानते हैं। आपके

1890
02:10:50,640 --> 02:10:54,800
पास वेद कैसे आए? उसको बताइए पहले। अब मैं उसको सही सिद्ध

1891
02:10:54,800 --> 02:10:58,880
करने में जाऊंगा। फिर एक नया चैप्टर खुल जाएगा कि भैया उसमें आप जो अर्थ बता रहे हो

1892
02:10:58,880 --> 02:11:03,040
वो क्यों माना जाए? हम जो अर्थ निकाल रहे हैं वो क्यों ना माना जाए। अच्छा मैंने बता भी दिया

1893
02:11:03,040 --> 02:11:07,040
कि अर्थ जो है आप शायन की परंपरा से उसको पढ़ो और फिर बताओ कि

1894
02:11:07,040 --> 02:11:11,280
कहां संतुष्ट हो वो भी नहीं पढ़ रहे हैं और खामखा विषयंतर

1895
02:11:11,280 --> 02:11:15,280
करने के लिए ला रहे हैं। जब विषय चल रहा है अवतार तो आप मुझे बताओ ना कि आप शायन

1896
02:11:15,280 --> 02:11:19,440
के द्वारा आपको जो अश्लील लग रहा है वो क्यों ला रहे हो? और तो और केवल

1897
02:11:19,440 --> 02:11:23,440
ला ही नहीं रहे। उसको खोल के बोल भी रहे हो। अभी मेरे पास इतना वो नहीं है कि मैं

1898
02:11:23,440 --> 02:11:27,440
वहां पर नियोग खोल करके बोलूं। मेरे अंदर दिक्कत होती है वो चीजें

1899
02:11:27,440 --> 02:11:31,600
बोलने में। मगर आप आप उसमें एक्सपर्ट हो भाई। आप बोलोगे मैं वहां पे ये सब

1900
02:11:31,600 --> 02:11:35,760
करना नहीं चाहता तो मुझे हटना पड़ेगा। अवतार को मैंने सिद्ध किया। मेन

1901
02:11:35,760 --> 02:11:37,280
बात जो थी तर्क और

1902
02:11:37,280 --> 02:11:41,360
प्रमाण से अवतार को सिद्ध किया। उनके पास ना तर्क था विरोध में ना प्रमाण था

1903
02:11:41,360 --> 02:11:45,360
विरोध में। प्रमाण जो मैंने दिया उस पर भी उन्होंने क्या कहा कि

1904
02:11:45,360 --> 02:11:49,680
वो तो उसके कार्य वहां कार्य नहीं लिखा है वेद में। कार्यों

1905
02:11:49,680 --> 02:11:53,680
से प्रकट हो रहा है। कार्य नहीं वह तर्क आप छोड़ के आ

1906
02:11:53,680 --> 02:11:58,160
चुके हो तो आपकी बात क्यों मान ली जाए कि कार्य एज इट इज़ मानो ना वेद का अर्थ

1907
02:11:58,160 --> 02:12:02,560
हम हम तो तर्क छोड़ के नहीं आए थे अर्थ भी उसको

1908
02:12:02,560 --> 02:12:06,800
बताना पड़ेगा जिसको संस्कृत नहीं आती है पर उस मूल अर्थ अगर वेद

1909
02:12:06,800 --> 02:12:10,800
मंत्र को ही पढ़ लो तो वहां पर भी यही ईश्वर जो है बहुत रूपों में प्रकट होता है वहां

1910
02:12:10,800 --> 02:12:14,960
पर कार्य नहीं आता है तो उस रूप में अर्थ हम उसको बताएंगे जिसको अर्थ

1911
02:12:14,960 --> 02:12:19,120
नहीं पता है ना लेकिन जब मूल मंत्र में ही समझ

1912
02:12:19,120 --> 02:12:23,200
में आ जा रही है बात अच्छा आप ये भी देख ले आप ये भी देख

1913
02:12:23,200 --> 02:12:27,600
लेना कि शुरुआत कौन कर रहे हैं व्यक्तिगत कटाक्ष की कि आप कुतर्क

1914
02:12:27,600 --> 02:12:31,600
कर रहे हो आपको कुछ पता नहीं है आपने कुछ पढ़ा नहीं है ये

1915
02:12:31,600 --> 02:12:35,600
सब चालू वही कर रहे हैं मैं नहीं कर रहा हूं मैं तो कृष्ण का

1916
02:12:35,600 --> 02:12:39,600
चरित्र बिगाड़ दिया हां कृष्ण कृष्ण का चरित्र

1917
02:12:39,600 --> 02:12:43,600
बिगड़ गया वहां पर लेकिन अदृश्य रूप में ईश्वर सब कुछ देख रहा है वहां पर ईश्वर के ऊपर

1918
02:12:43,600 --> 02:12:47,840
कोई दोष नहीं आ रहा है लेकिन यहां दोष आ जा रहा है जी जी जी चलिए

1919
02:12:47,840 --> 02:12:53,840
ठीक है फिर मुझे लगता है सभी ने अपनीप बातें रख ली। शास्त्रवाद जी आपको कुछ कहना है

1920
02:12:56,560 --> 02:13:00,640
भैया वो दोष को खाली शरीरगत मान रहे थे कि जो शरीर रूप है

1921
02:13:00,640 --> 02:13:04,640
वो दोष के अधीन हो सकता है। बाकी कोई शरीर वो नहीं हो सकता दोष के

1922
02:13:04,640 --> 02:13:09,040
अधीन। इसलिए वो ईश्वर को निर्दोष बताने लग रहे हैं। जबकि

1923
02:13:09,040 --> 02:13:13,040
भाई जब ईश्वर देख रहा है जब दृष्टा है तो फिर वो भी तो उस इस बात का

1924
02:13:13,040 --> 02:13:17,040
दोषी हो जाएगा ना नियम अनुसार। यह आप लोगों ने

1925
02:13:17,040 --> 02:13:21,120
आज नया नया सुना होगा मेरे मुख से स्त्रियों को नहाते हुए देख

1926
02:13:21,120 --> 02:13:25,440
रहा है कि नहीं [हंसी] बिल्कुल टू द पॉइंट

1927
02:13:25,440 --> 02:13:30,240
बात थी बिल्कुल टू द पॉइंट

1928
02:13:30,240 --> 02:13:34,400
फिर वो आ जाते हैं कि आंख से नहीं देख रहा है आंख से नहीं देख रहा लेकिन देख

1929
02:13:34,400 --> 02:13:38,480
रहा है ना [हंसी] देख रहा है ना अब कहे

1930
02:13:38,480 --> 02:13:42,480
तो क्या कहे उन्होंने माना उन्होंने माना देख रहा है लेकिन दोष नहीं आता बोला

1931
02:13:42,480 --> 02:13:46,480
ईश्वर के ऊपर साफ बोला उन्होंने हां हां एक चीज है

1932
02:13:46,480 --> 02:13:50,480
कि जहांजहां फस रहे थे ना थोड़ा सा उग्र हो रहे थे। दिख रहा था। ऐसे ही

1933
02:13:50,480 --> 02:13:54,480
कृष्ण ऐसे ही कृष्ण जैसे तुम कह रहे हो कि वो देख रहा है वो तो उनके अंदर भी है।

1934
02:13:54,480 --> 02:13:58,480
तो मैं भी तो वही कह रहा हूं कृष्ण जी यहां पे दिख रहे हैं अवतार में मगर वो उनके

1935
02:13:58,480 --> 02:14:02,560
अंदर भी है तो दोष नहीं लगेगा। जिन कर्मों से आप उनका दोषी होना मान रहे हो उनसे

1936
02:14:02,560 --> 02:14:07,280
उन्हें दोष नहीं लगेगा। कुब्जा के साथ ये किया वो किया। कुब्जा के अंदर भी तो वही है।

1937
02:14:07,280 --> 02:14:11,360
पहली बात तो आपकी जो कुब्जा को जानने वाली वही गलत है। क्या हुआ

1938
02:14:11,360 --> 02:14:15,440
क्या नहीं हुआ? मगर कुब्जा के अंदर भी वह है। उस क्रिया में भी वह है। चार

1939
02:14:15,440 --> 02:14:19,440
24 पढ़िए। करने वाला भी ब्रह्म है। प्राप्त होने वाला भी

1940
02:14:19,440 --> 02:14:23,680
ब्रह्म है। और जो हवन सामग्री डाली जा रही है

1941
02:14:23,680 --> 02:14:27,840
यज्ञ में वो भी ब्रह्म है। फल स्वरूप प्राप्त भी ब्रह्म होता है। क्रिया भी ब्रह्म

1942
02:14:27,840 --> 02:14:32,080
है। क्रिया वो जो क्रिया जिसका आप आरोप लगा रहे हो ना ईश्वर पे वो भी ब्रह्म

1943
02:14:32,080 --> 02:14:36,160
है। बताइए। फिर कहां से उनको अलग

1944
02:14:36,160 --> 02:14:40,400
कर रहे हो? केवल वो व्यवहार में आपको एक जगह दिख रहे तो बुरे हो गए। और वही सब कार्य आपका

1945
02:14:40,400 --> 02:14:45,600
ईश्वर कर रहा है तो बुरा नहीं हुआ। तो वहां पर सारे लॉजिक आप बैठल ले रहे हो।

1946
02:14:45,600 --> 02:14:49,760
फिर वो बात आ जाती है कि कौन सी चीज अनुकरणीय है कौन सी नहीं है अनुकरणीय है मनुष्य

1947
02:14:49,760 --> 02:14:53,840
के लिए तो वो फिर वेद मंत्रों को मानना है और पुराण आदि को

1948
02:14:53,840 --> 02:14:58,000
नहीं मानना है। है ना? हां [गला साफ़ करने की आवाज़] मुझे लगता था मैं इस

1949
02:14:58,000 --> 02:15:02,160
मंशा से गया था कि वो जो है इसको ना बोल करके इस

1950
02:15:02,160 --> 02:15:06,640
तरह से इस पर ना जाकर के वो इस पर आएंगे कि भाई जो है

1951
02:15:06,640 --> 02:15:10,720
ईश्वर का स्वभाव है और स्वभाव विरुद्ध में वो आता जो बल वाला

1952
02:15:10,720 --> 02:15:14,800
मामला है ना रश्मि और वो वाला वो सारा सारा पैटर्न खुलता

1953
02:15:14,800 --> 02:15:19,120
पर वो पहले ही जो है थोड़ा सा उग्र होकर के और जो व्यक्तिगत कटाक्ष इत्यादि

1954
02:15:19,120 --> 02:15:22,640
पे आ गए तो मैंने कहा छोड़

1955
02:15:22,640 --> 02:15:25,200
चलिए

1956
02:15:25,200 --> 02:15:29,440
ठीक है। फिर उनसे बात नहीं देखो मुझे मुझे मुझे एक लास्ट बात और कहनी है।

1957
02:15:29,440 --> 02:15:33,440
मुझे एक लास्ट मुझे लास्ट बात और कहनी है। एक ये कि जैसे बहुत से कहते

1958
02:15:33,440 --> 02:15:37,440
थे कि भाई कि के अनुकरणीय है या अनुकरणीय है

1959
02:15:37,440 --> 02:15:41,440
तो वो कहते हैं कृष्ण का चरित्र कोई अनुकरणीय है। अरे कृष्ण भगवान ने तो सृष्टि भी की थी तो फिर आप

1960
02:15:41,440 --> 02:15:45,440
क्या सृष्टि कर लोगे क्या? हम तो यह मानते हैं ना कि भगवान श्री कृष्ण

1961
02:15:45,440 --> 02:15:49,600
तो सृष्टि भी करते हैं। वो वो अनंत जीवों

1962
02:15:49,600 --> 02:15:53,760
को साल अनंत जीवों को प्रलय काल में मार भी देते हैं। क्या तुम मार दोगे क्या

1963
02:15:53,760 --> 02:15:58,160
किसी को? इनका ईश्वर के संबंध में एक एक जो

1964
02:15:58,160 --> 02:16:02,320
सिद्धांत है उसकी धज्जियां उड़ उड़ेंग अगर तरीके से बात करते

1965
02:16:02,320 --> 02:16:06,400
चले जाए। ये कहते हैं कि ईश्वर की उपासना से क्या मिलता है? ये कहते

1966
02:16:06,400 --> 02:16:10,400
हैं ईश्वर के गुण आते हैं। ईश्वर का गुण है न्यायकारी होना। क्या

1967
02:16:10,400 --> 02:16:14,720
वास्तविकता में मनुष्य न्यायकारी हो सकता है? नहीं हो सकता। ईश्वर न्यायकारी

1968
02:16:14,720 --> 02:16:18,880
क्यों है? क्योंकि वह भूत सब कुछ जानता है। इसने पिछले जन्म में क्या किया

1969
02:16:18,880 --> 02:16:22,880
था? क्या वो जान सकता है मनुष्य? तो न्यायकारी सिद्ध

1970
02:16:22,880 --> 02:16:27,200
नहीं होगा। जो जो गुण है जो जो गुण है वो सब कटते

1971
02:16:27,200 --> 02:16:31,440
चले जाएंगे। तात्विक व्याख्या से तो मानना पड़ेगा कि व्यवहार में यानी

1972
02:16:31,440 --> 02:16:35,760
प्रपंच रूपी संसार में मनुष्य जो है न्यायकारी हो सकता है। तात्विक

1973
02:16:35,760 --> 02:16:37,840
में होगा कि नहीं होगा नहीं पता।

1974
02:16:37,840 --> 02:16:42,000
उसके उस व्यवहारिक न्याय से तात्विक न्याय हुआ कि नहीं हुआ नहीं

1975
02:16:42,000 --> 02:16:46,000
पता। जैसे मैंने किसी को कपड़े दिए पता नहीं वह कपड़े के

1976
02:16:46,000 --> 02:16:50,880
योग्य था कि नहीं था। फ्री विल से दिए ना

1977
02:16:50,880 --> 02:16:55,920
भाई उसने कपड़ों का कर्म किया था कि नहीं किया था पिछले जन्म में।

1978
02:16:55,920 --> 02:17:00,240
है ना? तो मैं न्याय कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं वो नहीं हो सकता।

1979
02:17:00,240 --> 02:17:05,280
तो ईश्वर के गुण भी मुझ में नहीं आ सकते जो उपासना से तो आएगा क्या?

1980
02:17:05,280 --> 02:17:09,280
ईश्वर ले दे के एक बौद्ध मत के अनुसार जो सिस्टम है ना प्रकृति

1981
02:17:09,280 --> 02:17:13,440
रूपी उसमें ईश्वर नहीं है। यह करोगे तो होगा। यह करोगे तो यह होगा।

1982
02:17:13,440 --> 02:17:18,000
आपको ईश्वर कुछ देने वाला नहीं है। तो वो इन्होंने क्या है केवल उसको

1983
02:17:18,000 --> 02:17:22,080
उस सिस्टम को अपना रखा है बौद्ध वाले को और उसमें जो है एक नाम

1984
02:17:22,080 --> 02:17:26,400
दे दिया। हम ईश्वर को मानते हैं। है बिल्कुल वैसा ही उसी

1985
02:17:26,400 --> 02:17:30,720
सिस्टम जैसा है ना जी जी बिल्कुल

1986
02:17:30,720 --> 02:17:34,880
चलिए फिर बिल्कुल भैया बहुत बार आज यहां पे फसे

1987
02:17:34,880 --> 02:17:39,280
बार-बार भागे हैं ये आज बहुत अच्छा ये चर्चा रहा जिसमें बार-बार जो

1988
02:17:39,280 --> 02:17:43,520
उनका चेहरा देखने लायक हो रहा था जहां विषय में अटक रहे हैं वहां से अगला

1989
02:17:43,520 --> 02:17:47,680
पे भाग रहे कभी इस पे कभी उस पे कूद रहे हैं [हंसी] नहीं

1990
02:17:47,680 --> 02:17:51,680
हमारी तरफ से संतोषजनक चर्चा है उन्होंने शुरुआत की थी तो उसका तो

1991
02:17:51,680 --> 02:17:53,600
फिर कुछ कर नहीं सकते

1992
02:17:53,600 --> 02:17:57,760
हां ठीक है सभी को जय श्री राम राम

1993
02:17:57,760 --> 02:18:01,760
नहीं बहुत सही किया भैया बहुत सही किया खाली बीच में

1994
02:18:01,760 --> 02:18:05,840
बहुत सही किया बहुत सही जय श्री राम जय श्री राम जय हां हटने की बात

1995
02:18:05,840 --> 02:18:09,840
कर रहे है ना छोड़ दिया जो ठीक है जय जय श्री राम ठीक है जी

1996
02:18:09,840 --> 02:18:15,840
जय श्री राम जय श्री राम भैया जय श्री राम

1997
02:18:37,280 --> 02:18:41,280
[संगीत]
