⬜ Not used yet · 00:00:01:28 – 00:41:02:00 (41:00)
00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] समारंभाम व्यास शंकर मध्यमाम अस्मदाचार्य पदताम वंदे गुरु परंपरा आप सभी ने हमारी एक सीरीज हमने अभी डाली थी शबरी जाति निर्णय पे और वो झूठे बेर खाए थे कि नहीं खाए थे इत्यादि विषयों में मैं आशा करता हूं आप सभी ने देखी हो वह क्रमबद्धता से और इसमें लगभग जितने भी पूर्व पक्ष हो सकते हैं सबको लेकर के उसका समाधान दिया गया है कि कोई घृणा मूलक नीच कुल की स्त्री ना ली जाए अथवा कुलहीन कुलहीनता में हम लोग यह देखें कि वो जो हमारे लिए अपेक्षित कुल हो सकता है उससे हीन है तो ऐसी स्त्री से विवाह नहीं किया करना चाहिए और यही परस्पर वहां भी लागू होगा। यदि कोई क्षत्रिय है तो उसके लिए कुलहीन स्त्री वह भी है जो ब्राह्मण कुल से हो क्योंकि वहां पर उसका कुल नहीं है अभाव है। उसको अपने समानांतर कुल में
00:01:17:01 ही विवाह करना ही उसके लिए अभीष्ट है। तो ऐसे में क्षत्रिय को छोड़ के क्षत्रिय वर्ण को छोड़ के जितने भी अन्य वर्ण कुल की स्त्रियां हैं वो सभी उसके लिए त्याज्य होनी चाहिए। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] इसका अर्थ हमें यह लेना चाहिए घृणा मूलक ना लेकर के व्यवस्था मूलक और बहुत आवश्यक है आज के समय में वर्णाश्रम का जो वास्तविक स्वरूप है उसको हम समाज में पहुंचाएं। हम युवा हैं। हमारा कार्य यही है। हमारा दायित्व है कि हम धर्म को यथावत उसके सही रूप में ही कोशिश करें कि समाज में प्रस्तुत हो। क्योंकि अनभिज्ञता के कारण समाज में बहुत सारी भ्रांतियां फैलती हैं। अभी आपने एक वीडियो देखा होगा उसमें उसको बुलाकर के उसने बिठाया कि ब्राह्मणवाद के आपने नारे लगाए। मुझे मैंने उपनिषद पढ़े हैं और प्रेस रिपोर्टर थी। मैंने वेद पढ़े हैं। आप जहां से बोलोगी वहीं से पूछूंगी और ब्ल ब्ल ब्ल तो क्या लगता है आप लोगों को? यदि वहां पर हम होते अगर इंटरव्यू में तो कैसा रहता मामला? तो बाजी
00:02:32:07 पलट जाती। हां। खैर उस पर प्रतिक्रिया देने वाले हैं हम लोग। देखा हो आपने शायद वो जो ब्राह्मणवाद के नारे लगाए थे किसी मातृशक्ति ने। उसको बुला के बिठा लिया किसी ने और अच्छे से मतलब उसका सारा पोस्टमार्टम कर डाला कि भाई तुम्हें मनुस्मति में तो यह लिखा है वो लिखा है। बहुत सी चीजें। ठीक है? तो अब आगे चलते हैं। जहां प्रीति ना हो। बिना किसी से पूछे कोई बात मुंह से ना निकालनी चाहिए और ना बिना समझे बुझे कोई काम करना चाहिए। बिना किसी से पूछे का मतलब आप जब कोई व्यक्ति पूछे परामर्श दे आपको परामर्श मांगे तभी परामर्श देना चाहिए। हां परंतु यह भी नहीं है कि अधर्म हो रहा है वहां पे आप मौन खड़े रहे भीष्म पिता मां की तरह या फिर द्रोणाचार्य जी की तरह ऐसा भी नहीं होना चाहिए।
00:03:38:03 [गला साफ़ करने की आवाज़] इसके आगे बिना [गला साफ़ करने की आवाज़] समझे बुझे कोई काम नहीं करना चाहिए। मर्यादा के बिना कोई काम नहीं करना चाहिए। जहां प्रीति ना हो वहां रूठना ना चाहिए। चोर से उसका नाम या पता ठिकाना पूछना ना चाहिए। और रात में रास्ता नहीं चलना चाहिए। नम्रता ना छोड़नी चाहिए। पाप से द्रव्य ना एकत्र करना चाहिए और कभी पुण्य मार्ग ना छोड़ना चाहिए।
00:04:10:26 [गला साफ़ करने की आवाज़] किसी की निंदा या किसी के साथ द्वेष ना करना चाहिए। बुरे लोगों का संग ना करना चाहिए। जबरदस्ती किसी का धन या स्त्री ना छीननी चाहिए। एकता ना तोड़नी चाहिए। विद्या का अध्ययन ना छोड़ना चाहिए। मुंह जोर से झगड़ना ना चाहिए। वाचाल से बात ना करनी चाहिए और संतों का साथ ना छोड़ना चाहिए। बहुत अधिक क्रोध या खेद ना करना चाहिए। और यदि कोई अच्छी बात बतलावे तो बुरा ना मानना चाहिए। जरा जरा सी बात पर रूठना ना चाहिए। अपने पुरुषार्थ का मिथ्या वर्णन ना करना चाहिए और पराक्रम की झूठी डींग नहीं आगनी चाहिए। देखिए अभी एक पंक्ति आई है जिसमें कहा जा रहा है कि बहुत अधिक यह कोई अच्छी बात बतलावे तो बुरा ना मानना चाहिए। अगर इसके मूल में जाकर के हम समझने का प्रयास करेंगे तो बहुत जटिल विषय है यह वाला। क्या जटिल विषय है? कि कोई अच्छी बात बतलावे तो बुरा ना मानना चाहिए। अब
00:05:26:09 उसने अच्छी बात बतलाई है। यह हम तय कैसे करेंगे? इसके निर्णायक हम कैसे हो सकते हैं? यदि कोई हमें अच्छी बात बतला रहा है तो इसका मतलब है कि जिस विषय में जिस क्षेत्र में वह अच्छी बात बतला रहा है उस क्षेत्र में हम अज्ञानी है। तभी तो उसको हमें बताना पड़ रहा है। हमें मालूम नहीं है। हां यदि हमें पहले से ही मालूम है उसने रिपीट की है तो वो हमारे लिए व्यर्थ है। ऐसे में भी उसका हमें बताने पर उसको अच्छा मानना बहुत उपयोगी सिद्ध नहीं होता है। हां स्मरण करा देना जैसे कि हम कोई सिद्धांत है जो हमें पता है पर किसी अवसर विशेष पर हमको वो सिद्धांत याद कराया गया कि भूल गए आपने ये निर्णय लिया था या फिर आप ऐसे हो जैसे बजरंगबली उनको याद दिलाया गया कि आप में इतनी अपार शक्तियां है तो यह स्मरण करा देने को आप यदि अच्छी बात बताने के संबंध में लेते हैं तो इसका अर्थ ऐसा लिया जा सकता है कि किसी के अच्छी बात बता बताने पर बुरा नहीं मानना चाहिए। पर यदि स्वतंत्र रूप से कोई व्यक्ति आपको कुछ बता रहा है कि एप्पल का अर्थ यह होता है। अब अर्थ बताना एक अच्छी बात बताना हो गया।
00:06:41:10 आपको ज्ञान देना। तो आपको तो एप्पल का अर्थ नहीं पता है ना। तो फिर आप ये निर्णायक कैसे हो सकते हैं कि वो अच्छी बात है कि नहीं? मैं ये बात पे जोर क्यों दे रहा हूं? इस बात पे जोर क्यों दे रहा हूं? अक्सर लोग कहते हैं कि जिसको ब्रह्म ज्ञान हो गया वह ब्राह्मण है। या फिर अमुक गुरु को यदि वो जो है यह इतनी इतनी चीजें जानता है तो इसका मतलब वो शास्त्रज्ञ है। इसका मतलब वो जगतगुरु है। वो करुणा जगतगुरु है। वो ऐसा जगतगुरु है। फलाना जगतगुरु है। ढिमका जगतगुरु है। तो इस इस पर मैं इसलिए जोर दे रहा हूं इस बात पर इसको आपको समझना होगा कि हम किसी के ज्ञान विज्ञान के आधार पर यह निर्णय नहीं कर सकते हैं कि वह विद्वान है या नहीं है। यदि हमें उससे अपने उस यदि हम उसको अपने से श्रेष्ठ और स्वयं को उसके अधीनस्थ मानने में इस निर्णय का पर्यावसान करने वाले हैं। क्यों? क्यों नहीं कर सकते? क्योंकि यदि हम उसकी विद्युता को जांच जांच रहे हैं। यदि हम उसकी विद्युता का आकलन कर पा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि जिस भी क्षेत्र में जिस भी अंश में हम उसकी विद्युता का आंकलन कर पा रहे हैं। उस अंश
00:07:56:16 में उस क्षेत्र में हम उससे ज्यादा विद्वान है। तभी तो हम आंकलन कर पा रहे हैं। मान लीजिए कि तात्विक विषय में उसका आंकलन कर रहे हैं कि उसको अद्वैत का ज्ञान है कि नहीं। हम ब्रह्मास्म ये सब पता है कि नहीं। अब हम उसका आंकलन करेंगे कैसे? पता है कि नहीं पता है भाई? हम किसी का जब पेपर लेने जाते हैं, जो भी टीचर किसी स्टूडेंट का पेपर लेता है, एग्जाम लेता है, परीक्षा लेता है तो वो टीचर पहले से उन विषयों में पारंगत होता है ना तो यदि हम किसी की विद्वता का परीक्षण कर रहे हैं और तब हम फैसला ले रहे हैं कि वह विद्वान है कि नहीं तो इसका अर्थ है कि हम पहले से ही उससे अधिक उस क्षेत्र में विद्वान होने चाहिए। तब हम फैसला कर सकते हैं। और यदि ऐसा है तो यहां पर आ गया कि भाई उसने अपनी आचरण से उसने अपने कर्मों से अपने आप को विद्वान सिद्ध नहीं किया बल्कि किसी पूर्व के विद्वान ने उसे विद्वान घोषित किया है। मेरा इशारा ऐसी ओर आ रहा है कि बिना किसी पूर्व के विद्वान के बिना किसी अधिकार जिसके पास सुरक्षित है विद्वान किसी को विद्वान किसी को जगतगुरु किसी को आचार्य घोषित करने का जिसके पास अधिकार सुरक्षित
00:09:12:07 है वही किसी को आचार्य जगत गुरु अथवा कोई इस प्रकार की उपाधि दे सकता है जिसको पूर्व से अधिकार उसके पास सुरक्षित है और यदि हम कहें कि भाई देखो उनको इतना ज्ञान है हमें मान लेना चाहिए कि वो आचार्य हैं। यानी कि हमको वो ज्ञान पहले होना चाहिए ना कि उन्होंने जो शास्त्र का अर्थ बताया है या शास्त्र की जो व्याख्या बताई है वो हमारे पास होनी चाहिए ना वो व्याख्या पहले से और यदि है तो हम उससे ज्यादा विद्वान तो हम हो गए तो हमें भी आचार्य मान लो फिर तुम जो जो व्यक्ति कर्मणा आचार्यत्व कर्म के आधार पर आचार्यत्व या ब्राह्मणत्व कर्म के आधार पर यह घोषित करने जाएगा जो जो व्यक्ति वो पहले से ही उससे ज्यादा विद्वान ब्राह्मण या फिर उससे ज्यादा बड़ा जगतगुरु होना चाहिए। तो यदि कोई अरुण पांडे जैसे हैं या अमुक अमुक जितने भी लोग हैं जो कर्मणा जगत गुरु खड़ा कर रहे हैं कर्मणा जगत गुरु आजकल तो उसमें जो व्यक्ति ये कहने वाला है कि उनके इतने अच्छे आचरण है उनको इतना अच्छा ज्ञान है तो इसका अर्थ है कि जो ये कह रहा है कि उनको इतना अच्छा ज्ञान है उसको वो ज्ञान पहले से पता है वो उससे बड़ा जगतगुरु है। इसलिए कर्मण कर्म के आधार पर केवल आचरण के आधार पर हम ये
00:10:27:08 तय नहीं कर सकते कि वो ब्राह्मण है कि नहीं। वो जगतगुरु है कि नहीं। वो क्या कहते हैं? फलाना आचार्य है कि नहीं। क्यों? क्योंकि हम अगर तय करने लगे तो इसका मतलब हम उससे ज्यादा अधिक ज्ञानी है। तभी तो हम तय कर पा रहे हैं कि वो आचार्य है कि नहीं। उसको ज्ञान है कि नहीं। यह परीक्षण हम तभी कर पा रहे हैं और तब भी वह नियम तो लागू हो ही गया कि उसको वह स्वयं से आचार्य नहीं बना। किसी और ने उसको घोषित किया तब भी वो नियम तो लागू होगा ही। उसके बिना तो चल ही नहीं सकते। तो कैसे कैसे होगा? ब्राह्मण घोषित होगा उसके पिता से कि भाई वो ब्राह्मण है। उसने ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है। अब उसके पास आचरण है कि नहीं? वो आचरण भी देखने वाले कौन होंगे? उससे विद्वान जो पूर्व से विद्वान है। परंपरा से विद्वान है। यानी कि परंपरा से ही घोषित होगा ब्राह्मणत्व। परंपरा से ही घोषित होगा जगत गुरुत्व। परंपरा से ही घोषित होगा आचार्यत्व। यह ध्यान रखने वाली बात कि कर्म के आधार पर हम किसी का आचार्यत्व, विद्वता, ब्राह्मणत्व इत्यादि सिद्ध नहीं कर सकते। वो परंपरा से घोषित होना चाहिए। उसको परंपरा से ब्राह्मणत्व प्राप्त होना चाहिए। परंपरा से आचार्यत्व प्राप्त होना चाहिए। परंपरा से उसको जगत गुरुत्व प्राप्त होना चाहिए। ठीक है? चलिए
00:11:42:24 अब आगे बढ़ते हैं। तो यह इस बात से कि कोई अच्छी बात बतलावे तो बुरा ना मानना चाहिए। तो अच्छी बात बतलावे। यहां पर जो अच्छी बात बतलाने का जो पर्यावसान है वो इसमें लेना चाहिए कि आपको पूर्व में पूर्व से वो बात याद है। किसी व्यक्ति ने आपके हित के लिए वो बात आपको याद दिला दी। बस है ना तो ठीक है। क्योंकि अच्छी बात वो है कि नहीं। फिर आपको निर्णय करना हां या फिर वहां पर अगर स्वतंत्र रूप से अच्छी बात बतलाई जा रही है आपको तो फिर वहां पर कोई निर्णायक हो यहां ये अच्छी बात बतलाई है भाई इसको जो है आप जो है इनको अभिनंदन करिए इनका जैसे कि मान लीजिए मैं अभी मार्ग में था तब मैंने रात को देखा कई बार ऐसा होता है कि कई लोगों का जो वास्तविक स्वरूप है वह बाहर नहीं आ पाता है वास्तविक स्वभाव बाहर नहीं आ पाता है मैंने उस दिन देखा रात के संभता 12:00 बज रहे थे। शिविर में मैं उस दिन पहुंचा ही था माघ में जो गुरुदेव का शिविर लगा हुआ था और काफी लेट पहुंचा था। तो व्यवस्थाएं इत्यादि वो जो वहां पर जो बिस्तर वगैरह मिलते हैं वहां अपना व्यवस्था करने के लिए उस समय काफी लेट हो गया था। तो 12:00 बजे की बात है।
00:12:58:12 मैं किसी कार्य से शिविर के गेट पर पहुंचा। तो वहां पर मैंने देखा जो गुरुदेव के मुख्य परिकर हैं, जो सचिव जी हैं स्वामी जी तो वह वहां पर बड़े चिंतित बड़े परेशान से घूम रहे थे। तो मैंने मैं वहां पर उनके चरण स्पर्श किए और उन्होंने मुझे आशीर्वचन प्रदान किए और वो उनका अपना एक कहीं पर ध्यान था कि भाई वो परेशान है किसी चीज को लेकर और मेरे साथ में कुछ मेरे साथ में कुछ सहयोगी भी थे वहां पर वो भी देखे कि स्वामी जी परेशान क्यों है? तो कुछ देर बाद स्वामी जी ने वहां के जो और कार्य करने वाले पटुक थे उनमें से किसी को बुलाया और आवाज लगाकर के कहा अरे सुनो अरे वो एक यादव जी आए हैं बहुत दूर से आए हैं वो आप देखो उन्होंने भोजन किया है कि नहीं किया है आप देखो उनको उनकी जो रहने की ठहरने की उचित व्यवस्था प्रॉपर हो गई है कि नहीं हो गई है तो मुझे बड़ा मतलब आश्चर्य हुआ कि स्वामी जी को इतनी रात को 12:00 बजे परेशान हो रहे हैं तो कितना इतना उनके अंदर जो है एक तो आश्चर्य भी हुआ और एक वो भी लगा कि इनका ये वाला जो पार्ट है ना वो कितने करुणा भाव है उनके अंदर। कई बार ऐसा होता है कि हम लोग विलंब से पहुंचे।
00:14:13:15 कई लोग विलंब से पहुंचे। वो भोजन के लिए पूछते हैं। अगर एन केन प्रकार किसी प्रकार से भोजन यदि खत्म ही हो गया होगा तो वहां पर पहुंचे हुए उनकी शरण में पहुंचे हुए गुरुदेव की शरण में पहुंचे हुए किसी व्यक्ति को भूखा नहीं सुने थे। एनी हाउ उनको भोजन कराना ही है। तो वह इतना परेशान थे 12:00 बजे रात को माघ में। और फिर हमसे काफी सारी बातें उनको कुछ मार्गदर्शन दे रहे हैं। दे रहे हैं दे रहे हैं। बीच-बीच में वह आवाजें लगा रहे हैं। वहां के बटों को बार-बार बता रहे हैं कि वो देखो यादव जी ने भोजन किया कि नहीं किया। ये सब हो रहा है। और मैं भी थोड़ा सा मेरे अंदर भी कौतुहल आ गया कि यादव जी हैं कौन? स्वामी जी इतना ज्यादा उनको इंपॉर्टेंस दे रहे हैं। तो इधर से एक हल्का सा कंपटीशन की भावना आ जाती है कि स्वामी जी जो हमारे गुरुदेव के मुख्य परिकर है या मतलब जलेसी ना भी कहे मगर एक भावना आ जाती है एक उत्सुकता जानने वो हिट करने लगी वो भावना कि भाई यादव जी होंगे बहुत कुछ महत्वपूर्ण व्यक्ति और बहुत ज्यादा मतलब उस समय तक ये भी नहीं मालूम था कि यादव जी का बौद्धिक स्तर क्या है या फिर अगर भौतिक वादिता से देखा जाए तो उनकी संपन्नता क्या है कुछ नहीं मालूम था ब्लैक होल था और मुझे तो यही लग रहा था
00:15:28:16 कि बहुत मतलब कोई बड़े विद्वान और इत्यादि इत्यादि या फिर कोई होंगे यादव जी तो काफी देर हो गई। उन्होंने हमें मार्गदर्शन भी दिया और बीच-बीच में यादव जी की खबर भी लेते रहे और यह भी कहा कि यादव जी ने भोजन कर लिया। उनको उचित व्यवस्था हो गई हो तो यादव जी को मेरे पास आप बुला ले। करीब 15 मिनट के बाद जब हमारा कोतवाल बहुत बढ़ चुका था। यहां पे भी कुछ लोग होंगे जो उस समय साथ में थे। तो जब बढ़ चुका था उसके बाद यादव जी सामने से आए। बहुत सामान्य सा उनका व्यक्तित्व था। सांवले कलर के सांवला रंग था उनका और वह भागते हुए आए और मैं कहूंगा कि बहुत ही सामान्य से उनके वस्त्र भी थे। ऐसा कोई वहां पर चिन्ह नहीं था जिसकी वजह से यह कहा जाए कि भाई इस कारण से स्वामी जी जो है इतना परेशान बहुत सामान और वो जैसे ही आए भागते हुए कि उनको स्वामी जी ने बुलाया। वह जैसे ही आए तो आते ही उन्होंने स्वामी जी को ना चरण स्पर्श करके और मेरे चरण स्पर्श करने लगे। अब मैं वहां पर आश्चर्यचकित भी हो गया। अरे भाई यादव जी को मैं जानना चाहता था इतनी देर से। है कौन जो हमारे स्वामी जी परेशान है उनके लिए
00:16:43:25 और वो आए तो आए वो सीधे मेरे पैरों में गिर पड़े। ऊपर से आश्चर्यचकित होने के साथ-साथ एक डर भी लगा क्योंकि वो सामने स्वामी जी खड़े हुए थे। डर इस बात का लगा कि स्वामी जी कहीं ये ना समझे कि ये जो है यहां से बाहर जो है फोरमैनी बकैती हैं दादागिरी करता फिरता है इसलिए लोग आकर के इनके पैरों में गिर रहे हैं तो मैंने जैसे ही वो मेरे पैरों की तरफ आ रहे थे आशीर्वाद लेने के लिए मैंने कहा अरे नहीं भैया पहले स्वामी जी खड़े हैं आप उनके आशीर्वाद लो तो मैं समझ नहीं पाया यादव जी मेरे पैर क्यों छू रहे हैं मैं तो उनको जानता भी नहीं था यादव जी ने स्वामी जी के चरण स्पर्श स्पर्श किए मैंने कहा तो तो जब वो चरण स्पर्श कर रहे हैं। अच्छा सोचिए स्वामी जी इतनी देर से परेशान थे। मैं नहीं परेशान था उनके लिए और चरण स्पर्श वो मुझे कर रहे हैं। प्राथमिकता मुझे दे रहे हैं। वो उतना स्वामी जी को नहीं जानते। ठीक है यादव जी उस समय तक अब स्वामी जी के उन्होंने चरण स्पष्ट तो स्वामी जी ने वहां पर क्या कहा कि आप इनको जानते हो शिवा जी को पहले से तो बोले हां प्रभु जी मैं जानता हूं महाराज जी मैं भी जानना चाहता भाई कैसे अच्छा वो मुझसे बोले आप इनको जानते मैं उस उस डर में था कि भैया अब व्हाट अब मार पड़ने वाली है [हंसी] ना मैं
00:17:58:26 उस डर में था तो स्वामी जी महाराज ने मुझसे पूछा कि आप इनको जानते हो यादव जी को पहले से मैंने कहा मैं नहीं जानता महाराज जी [हंसी] तो यादव जी बोले कि मैं इस में फंस गया था और प्रभु जी के वीडियोस देख देख के ही मैं वहां से बच पाया सही जगह आ पाया तो ये बात स्वामी जी ने प्रशंसा की अब जब देखिए मेरा अच्छी बात बताना हालांकि यादव जी के लिए स्वतंत्र रूप से जब यादव जी को ये बात मालूम ही नहीं है कि वहां पर क्या कहते हैं आना अच्छी बात है कि नहीं जब वो स्वतंत्र मतलब उसमें में शून्य है अभी ज्ञान विज्ञान में मान लीजिए और मैंने उनको वहां से यहां पहुंचाया तो वहां पर उनको एक शब्द प्रमाण चाहिए कि मैंने अच्छा कार्य किया उनके लिए कि नहीं किया तो वहां पर स्वामी जी ने कहा कि नहीं ब्राह्मण है आपके ये भी गुरु हैं यहां तक इन्होंने ही पहुंचाया है पैर छुओ उनके तब उन्होंने कहा तब वो आकर के जो है दोबारा से मेरे पैर छूए और आगे बात बढ़ी तो क्या हुआ वहां पर उन्होंने अच्छी बात मैंने उनको बताई है कि नहीं बताई है इस बारे में प्रमाण दिया तो कोई अच्छी बात बता रहा है तो या तो उसका पर्यावरण इसमें हो सकता है कि उसने मुझे कोई बात पहले से पता है तो उसने स्मरण करा दी या फिर अच्छी बात बता रहा है कब हो सकता है
00:19:14:09 कि जब कोई वहां पर निर्णायक हो तीसरा पक्ष कि हां ये अच्छी बात है। मुझे अगर नहीं पता है कि वो अच्छी बात है कि नहीं है। तो जिसमें मेरी प्रमाण्य बुद्धि है वो वहां पर खड़ा होकर के बता रहा है। हां ये अच्छी बात है। जैसे वहां पर स्वामी जी ने जिसके जिनके प्रति उसकी उस समय तक प्रमाण बुद्धि थी यादव जी की उनकी तो उन्होंने जब एक कहा कि हां इन्होंने आपको यहां तक पहुंचाया ये भी आपके गुरु हुए ब्राह्मण है आप इनके पैर छू लीजिए तो वहां उन्होंने निर्णय दिया कि हां ये अच्छी बात है तो ये अच्छी बात वाला सीन भी है और स्वामी जी का जो व्यवहार है आप लोग समझ सकते हैं कितना वात्सल्य भाव है उनके उनके पास मैंने जो ये चीजें देखी हैं ज्यादातर उनको ज्यादातर वहां जाने वाले लोगों को दिखाई कम पड़ पाती। क्यों? क्योंकि स्वामी जी का जो डिपार्टमेंट है वो है तीसरा वाला निग्रह है ना उत्पत्ति स्थिति संहार वाला। संहार वाला डिपार्टमेंट है। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] तो क्यों डिपार्टमेंट है? क्योंकि उनको सब कुछ संभालना रहता है तो उन्हें अपना एक कड़क नेचर बना के रखना पड़ता है कि उस नेचर के अंदर उस उसके अंदर वो जो नरमियत वाले नेचर के कारण कोई अंदर प्रवेश ना कर जाए। सहज वो सुलभता ना हो जाए
00:20:29:13 और वो जो है अनुशासन हीन ना हो जाए। अनुशासन यहां का जो है भंग ना कर दे। इसको आप ऐसे देख सकते हैं कि आप देखिए जो ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी हैं। कई बार आप लोगों को लगता होगा कि उनके जो साक्षात्कार हो रहे हैं। तो वह साक्षात्कार बहुत ज्यादा हो रहे हैं टू मीडिया ट्रायल बहुत ज्यादा हो रहा है। इतना नहीं होना चाहिए और उसमें वही सारी बातें रिपीट रिपीट रिपीट रिपीट क्यों हो रहे हैं? क्योंकि कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ इस तरह का घेरा जैसा घेरा यहां पर है इनका स्वामी जी का वैसा घेरा वहां पर शायद उनकी एक कार्य प्रणाली अलग होगी। पर यह वाला जो घेरा है कि हर व्यक्ति ना पहुंच पाए। आप देखो लल्लन टॉप का जो वीडियो हुआ था उसमें लल्लन टॉप मैंने वहां देखा था लल्लन टॉप वालों को कई दिन चक्कर काटने पड़े थे तब एक इंटरव्यू मिला था और आप देखो ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी के दनाद दिन बहुत सारे वीडियोस आते ही रहते हैं तो उसके कारण क्या होता है कि देखिए वो पक्ष हमारा मजबूत है निर्दोष है वो सब बातें अलग है मगर एक जो यह मीडिया ट्रायल में होता है अब सामने वाला मीडिया वाले को बात करने की संस्कार नहीं है हम् कैसे बात की जाती है? आप
00:21:44:19 ऐसे बात कर रहे हो जैसे आप राजा हो कहीं के और वह जो है आपके यहां का कोई सेवक हो। आपके आप उसका जो है आप उसके भरता हो या जो भी आप समझ ले तो वो बात करने का प्रेशर अच्छा यहां तो यह जो एक घेरा है सुरक्षा का घेरा यह स्वामी जी बना के रखते हैं। इतनी किसी इतना किसी का साहस ना हो पाए कि वह जो एक होता है ना टेकन ग्रांटेड वाली स्थिति में पहुंच जाए वह नहीं होने देते स्वामी तो इसलिए वह पहले से ही अपना एक जो वो जो शिवजी वाला डिपार्टमेंट है उसको बना के रखते हर व्यक्ति जो है टेकन ग्रांटेड ना होने लगे ऐसी चीजों से सरल व्यवहार से परंतु जब आप एक बार अंदर पहुंचते हैं जब उन्होंने आपको जांच पर रख लिया और जब आप उनके अंदर पहुंचते हैं तो तब वहां पर मिलता है वात्सल्य भाव तो वह वात्सल्य भाव आप देखिए यादव जी से उस दिन वह पहली बार मिले थे और रात में यादव जी वहां पहुंचे थे। यादव जी के लिए कितना परेशान यहां तक कि हम लोग पहले से वहां पर जा रहे हैं। स्वामी जी की नजरों में है। काफी समय हो चुका है। पर उतना ध्यान हमारी ओर नहीं है। यादव जी के लिए परेशान थे। है ना? तो
00:23:00:09 यह बात है। आगे चलते हैं। जरा जरा सी बात पर रूठना ना चाहिए। अपने पुरुषार्थ का मिथ्या वर्णन ना करना चाहिए और पराक्रम की झूठी डींग ना हाकनी चाहिए। कभी अपनी कही हुई बात ना भूलनी चाहिए। अवसर पड़ने पर सामर्थ्य दिखलाने से ना चूकना चाहिए और बिना कोई काम किए पहले से नहीं कहना चाहिए हम मैं यह कर दूंगा मैं वो कर दूंगा रामपाल वाले कहते हैं तू काल के लोक में जाने वाला है यह होने वाला है आजकल भागवतानंदी भी कह रहे हैं तुझको नरक में भी जगह नहीं मिलेगी यमराज के यहां क्या तर्क देगा तू अब इस पे आ गए हैं यमराज आज के यहां कौन सा तर्क देगा वहां तेरे तर्क नहीं चलेंगे।
00:23:54:26 ऐसेसे कमेंट आ रहे हैं। मतलब कुल मिला के कुछ है। भय तो है। अच्छा है। वो जो अधर्मियों के बेड़े में हम लोगों का भय होना चाहिए। छटपटाहट है। वही छटपटाहट जो स्कन में मिलती है। वही छटपटाहट जो आर्य समाज में मिलती है। वही छटपटाहट जो रामपाली में मिलती है। क्या करूं मैं इसका उत्तर कहां से दूं? ये कहां से ले आया सर्वशक्तिमान ईश्वर? हां। कहीं से नहीं लाए भैया। अपने ग्रंथों में ही है सर्वशक्तिमान ईश्वर। बस हमने तो स्मरण कराया है। और जब कोई अच्छी चीज स्मरण कराए तो बुरा नहीं मानना चाहिए। समर्थ रामदास जी कह रहे हैं। हां [हंसी] खैर
00:24:45:18 तो अपनी कही हुई बात ना भूलनी चाहिए। अवसर पड़ने पर सामर्थ्य दिखलाने से चूकना ना चाहिए और बिना कोई काम किए पहले से नहीं कहना चाहिए। आलस्य में सुख ना मानो। चुगली पर ध्यान ना दो और बिना समझे कोई काम ना करो। शरीर को बहुत आराम तलब ना बनाओ। प्रयत्न करना कभी ना छोड़ो और कष्ट से मत घबराओ। सभा में लज्जा मत करो। व्यर्थ बकवास ना करो और होड़ या बाजी मत लगाओ। बहुत चिंता ना करो। आलसी मत बनो। पराई स्त्री को पाप की दृष्टि से ना देखो। किसी का एहसान ना लो। और यदि कोई तुम्हारे साथ उपकार करे तो तुम उसका तुम भी उसका बदला चुका दो। देखो पराई स्त्री को पाप की दृष्टि से ना देखो। यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है। ऐसा होता है कि हम सारे सिद्धांत जान लेते हैं पर व्यवहार में उनको अप्लाई नहीं कर पाते। इसकी शुरुआत तो एक तो होती है भोजन से। जितना ज्यादा पवित्र आपका भोजन होगा सतोगुणी भोजन होगा उतना ज्यादा आपका जो चित्त है उसमें वह धारण करने की सात्विकता को धारण करने की शक्ति आएगी। अपनी इंद्रियों की इंद्रियों से लड़ने की शक्ति आएगी। सबसे एक तो भोजन है।
00:26:00:21 भोजन पे आप लोग बहुत ध्यान दो कि जितना हो सके घर का भोजन खाए। बाहर का नहीं। एक ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी ने एक बार कहा था कि जब हम किसी को दीक्षा देते हैं तो दो बातें कहते हैं। क्या कि शिख और चोटी नहीं शिख और चोटी नहीं। तिलक और चोटी। तिलक और चोटी और घर की रोटी। तो घर की रोटी पर ध्यान दीजिए। घर की रोटी खाइए। सबसे पहला नियम। फिर उसके बाद उसमें राज जो राजसिक पदार्थ है वो ना हो। तला हुआ कम खाइए। ये रोटी ज्यादा खाइए। पूरी कचौड़ी जिसमें ऐसे एकदम से मत करिए क्योंकि कठिन हो जाएगा। मगर भगवान से प्रार्थना करिए कि कम करवाइए और थोड़ा थोड़ा थोड़ा थोड़ा कम करिए। अब क्या है कि हमें मन में चिंतन किस तरह का रखना है वो मैं आपको बता रहा हूं। मन में चिंतन रखिए। सूक्ष्म लेवल पे सूक्ष्म मतलब वो वाला सूक्ष्म नहीं स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर वाला सूक्ष्म सूक्ष्म मतलब बहुत छोटे लेवल पे अपने आप से बात करना शुरू करिए अपने आप से बात किया करिए जैसे आज आपने निर्णय लिया कि मैं जो है क्या है क्या एक सामान्य व्यक्ति जैसे मान लीजिए मैंने आज से निर्णय
00:27:15:25 लिया कि मैं पेप्सी नहीं पऊंगा ठीक है और या कोल्ड ड्रिंक नहीं पऊंगा आजकल कोल्ड ड्रिंक की आदत तो बहुत फै फैल रही है समाज में तो कोल्ड ड्रिंक नहीं पऊंगा। मैंने आज ये निर्णय ले लिया क्योंकि अभी मैंने प्रवचन सुना गुरुदेव का गुरुदेव ने बोला अभी वृंदावन में तो मैंने उसको सुना। अब मैंने वो अपने अंदर धारण कर लिया कि मैं नहीं पऊंगा। ये मैंने निर्णय लिया। हुआ क्या कि जिस समय मुझे कोल्ड ड्रिंक दिखी रास्ते में कहीं पर विशेष रूप से तो कोल्ड ड्रिंक आपको कब दिखेगी? जब आप प्यासे होंगे जब आपने काफी देर से पानी नहीं पिया होगा तभी आपको कोल्ड ड्रिंक के प्रति आसक्ति होगी या इस तरह के जो अन्य पेय पदार्थ होते हैं हीन वाले उनके प्रति आपकी आसक्ति तभी होगी जब आप आप जो है प्यासे होंगे वो तो एक अलग साइंटिफिक चीज चली जाएगी मैं चिंतन की बात कर रहा हूं तो क्या होता है कि जब हमने जो निर्णय लिया है अपने आप से कि मुझे कोल्ड ड्रिंक नहीं पीनी है वो निर्णय हमें उस समय जिस समय हमें कोल्ड ड्रिंक दिखती है उस समय हमें हमें याद नहीं आता है। हम भूल जाते हैं क्षणिक विषय हार का क्षण में तू वो छाड़ दे। हम उस समय भूल जाते हैं कि हमने कोल्ड ड्रिंक ना पीने का वो निर्णय लिया हुआ है। और जब पी लेते हैं सब कर लेते उसके बाद
00:28:30:28 याद तो वहां पर अपने आप से बात करनी होती है आपको। और ये जो इतने सूक्ष्म स्तर पे छोटी-छोटी स्तर पर अपने आप से बात करने की जो योग्यता है ये कैसे आती है? छिपाने वाले कार्य कम से कम करिए। आप देखिए इन्होंने अभी तक जितने सब कार्य कहे हैं यह नहीं करना यह नहीं करना है। सारे कार्य वही है जिनमें छिपाने का भाव उत्पन्न हो रहा है। तो कोशिश करिए प्रयास करिए अपने जीवन में कि छिपाना बहुत कम पड़े। निंदा किस में आती है? छिपाने में। हम किसी के पीठ पीछे छिप निंदा करते हैं। अन्यथा तो हम सत्य बोलते अगर सामने बोलते निंदा कहां होती है? पीठ पीछे। चोरी करते हैं या जो भी करते जिस तरह की जितनी भी चीजें आई वो सब पीठ पीछे वाली। पीठ पीछे का मतलब छिपाना। तो छिपाने वाले कार्य कम करेंगे तो आपके चित्त की शक्ति बढ़ेगी। शक्ति बढ़ेगी तो आपको वह जो पिन पॉइंट है कि हमें यह कार्य नहीं करना है। उस समय आपको अपना वो निर्णय याद आएगा कि आपने निर्णय क्या लिया था और आपको जब वो निर्णय याद आ गया तो आप आप बहुत ताकतवर है। अब आसानी से अपनी वो जो इंद्रिय जो आसक्ति हो रही है उस पर आप कंट्रोल पा लेंगे। इसी तरह का एक निर्णय होता है। पराई स्त्री के लिए क्या चिंतन करें? पराई स्त्री के लिए अपने मन में धारण करें कि समकक्ष है तो हम जैसे ही किसी स्त्री
00:29:46:04 को देखेंगे तो अपनी बहन को याद कर लेंगे। अगर बहन है तो घर में या फिर हां वो तमोगुण की श्रेणी में आते हैं या अथवा या फिर हम अपने से बड़ी किसी स्त्री को देखेंगे तो तुरंत अपनी माताजी को याद करेंगे। हमारी माताजी ऐसी ही हैं। बिल्कुल वैसी लग रही है। और अगर अपने से छोटी है तो पुत्री का भाव ले आएंगे। भतीजी है घर में कोई छोटी बहन है घर में कोई तो यह जो भाव लाने वाली बात है ना इसका आपको ध्यान रखना है जिस समय हम किसी पराई स्त्री को देखते हैं पर पराई नारी को देखते हैं तो उस समय तुरंत याद करिए कि भाई माताजी ये ऐसे कर रही है ना तो ऐसे ही कर ये चिंतन आपको याद आने की आवश्यकता है फिर उसके बाद आसक्ति होगी नहीं बहुत इजी हो जाएगा नहीं तो कई बार मुझे फोन आते हैं कहते हैं कि भैया मैं वहां गया था एक गलत विचार आ गया मन में उनके प्रति अमुक के प्रति ये जो हुआ वो हुआ। क्यों हुआ? क्योंकि उन्होंने यह जो सिस्टमेटिक है यह नहीं बनाया है तो यह होना चाहिए पराई स्त्री के प्रति भावना मन में या तो वो माताजी है या बहन जी है या पुत्री है श्री राम ने क्या कहा था आनंद रामायण में कि मेरी तीन प्रतिज्ञा है उनमें से एक प्रतिज्ञा उनकी थी कि मैं
00:31:01:25 सीता के सीता को छोड़कर किसी अन्य स्त्री के प्रति जो है वैसी भावना नहीं ला सकता। सभी स्त्रियां मेरी माता के समान मैं सब में अपनी माता ही देखता हूं। माता कौशल्या ये उन्होंने प्रतिज्ञा ली हुई है। वो बात और है कि फिर ये लोग जो है उनको वही उसी व्यवहार जगत में ही क्या-क्या आरोप लगा रहे हैं वो एक बात अलग है। अगर ये उनकी प्रतिज्ञा थी। तो ऐसे शुरू करिए। थोड़ा सा छोटे-छोटे लेवल पर अपने आपको अपने आप से बात कर करना शुरू करिए। जो व्यक्ति अपने आप से बात करता है ना वह व्यक्ति उसका उसकी जो गुणवत्ता है वह अलग ही होती है। उसका स्तर अलग होता है। अपने आप से बात करना शुरू करिए। और यह जो आपने मेरी कविता देखी होगी उसमें एक पैराग्राफ पूरा वैसे तो पूरी कविता अपने आप से ही बात करने वाली है कि आपका लक्ष्य आपसे बातें कर रहा है। मगर उसमें एक पैराग्राफ इसी बात पे है। बैरी बड़ा तू आपका तू शीश धरती से काट दे। क्षणिक विचार हार का है। क्षण में तू वो चांट दे। डाल डाल पात पात वन घना पाट दे बाधा बना वो वृक्ष है जड़ से तू उखाड़ दे घातक तो तू ही जय को तेरा नाश चाहिए घातक तो तू ही जय को तेरा नाश चाहिए मुझे तेरा अंतिम वही प्रयास चाहिए वो अंतिम प्रयास जो है वो वहां पर होना चाहिए जहां
00:32:16:26 पेप्सी की याद है वो अंतिम प्रयास जो है वो वहां होना चाहिए जहां पराई स्त्री के प्रति आकर्षण वाली जगह है वो अंतिम प्रयास होना चाहिए बस आपको आपका अंतिम प्रयास याद रहेगा तो आप इस तरह तरह की जो विकृतियां है जीवन की उनसे दूर होते चले जाएंगे। आपका लास्ट एफर्ट वहां होना चाहिए। अब आपका जो निर्णय है वो आपके साथ होना चाहिए। ठीक है? चलिए आगे चलते हैं। [खांसने की आवाज़][हंसी]
00:32:51:10 किसी का एहसान ना लो और यदि कोई तुम्हारे साथ उपकार करे तो तुम भी उसका बदला चुका दो और ना तो किसी को कष्ट दो और ना किसी के साथ विश्वासघात करो। अशुद्ध या गंदे ना रहो। मैले वस्त्र ना पहनो और यदि कोई कहीं जाता हो तो यह मत पूछो कि तुम कहां जा रहे हो। व्यापकता या लोगों के साथ मेलजोल मत छोड़ो। पराधीन ना बनो। अपना बोझ किसी दूसरे पर मत ला दो। बिना लिखा पढ़ी के लेनदेन ना करो। हीन व्यक्ति से उधार मत लो। और बिना साक्षी साथ राजा के दरबार या न्यायालय में ना जाओ। झूठी बात पर ध्यान ना दो। सभा में झूठी बात ना करो। जहां तुम्हारा आदर ना हो वहां मत बोलो। किसी से मत्सर या डाह ना करो। जब तक कोई अन्याय ना करे तब तक उसे कष्ट मत दो। और बल के अभिमान में किसी के साथ अनीति या अन्याय ना करो। ना बहुत अधिक खाओ ना बहुत अधिक सो और चुगलखोर के पास बहुत अधिक समय तक ना रहो। अपने आदमी से गवाही ना दिलाओ। अपनी कीर्ति का बखान ना करो। स्वयं ही बात कहकर हंसने मत लगो। धूम्रपान मत करो। मादक द्रव्यों का सेवन ना करो और बहुत
00:34:06:21 अधिक यह अपनी ही बात अपनी ही बात कहकर हंसने मत लगो याद आया आपको मामा आ गए मामा आ गए अरे मामा आ गए मामा आ गए याद आया हां मामा आ गए मामा आ रहे हैं तो पहले से ही इतनी हंसी उड़ाने लगो कि मामा भूल जाए कि यहां कुछ चोरी हो रही वही वाली बात कि ये ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं तो अलंकारी लगे मामा आ गए मामा आ गए वाह वाह ईश्वर ईश्वर सर्वशक्तिमान को आप भूल जाओ खैर
00:34:46:21 कभी निकम्मे मत रहो नीच उत्तर मत रहो और बिना काम या परिश्रम किए अपने बड़ों का भी अन्न मत खाओ मुंह से गाली गलौज ना निकालो दूसरों को देखकर ना हंसो किसी कुलीन के संबंध में अपने मन में बुरे विचार ना लाओ। किसी की चीज मत चुराओ। बहुत कंजूसी ना करो। अब कुलीन का मतलब क्या है? कुलीन का मतलब यही नहीं है कि ब्राह्मण का ही कुल है। कुलीन मतलब जहां वर्णाश्रम धर्म के अनुसार जो कुल चल रहा है, जहां विकृतियां नहीं आई है, वो कुल अच्छा है। वो हो गया कुलीन। उस कुल में जन्म लेने वाला कुलीन हो।
00:35:26:26 बहुत कंजूसी ना करो। किसी की मत चीज मत चुराओ। बहुत कंजूसी ना करो। और अपने प्रिय व्यक्तियों के साथ कभी कलह मत करो। किसी का घात ना करो। झूठी गवाही मत दो। कभी मिथ्या व्यवहार ना करो। टोरी चुगली या पर स्त्री गमन ना करो। और किसी के पीछे उसकी निंदा ना करो। समय पर धैर्य ना छोड़ो। सत्वगुण का परित्याग ना करो। और यदि शत्रु शरण में आ जाए तो उसे दंड मत दो। थोड़ा सा धन पाकर उन्मत्त मत हो जाओ। ईश्वर की भक्ति करने में लज्जा ना करो। पवित्र व्यक्तियों में मर्यादा छोड़कर कोई काम ना करो। मूर्ख के साथ संबंध ना रखो। अंधेरे मूर्ख के साथ संबंध ना रखो। यह बहुत इंपॉर्टेंट है। ठीक है? हमारे आसपास हमारे साथ कोई हो ना हो चलेगा। मगर वो मूर्ख और अनुशासन हीन नहीं होना चाहिए। क्योंकि ले दे के हम जो है अपना कार्य तो कर ले मगर मूर्खता के कारण कई बार लेने के देने पड़ जाते हैं। तो मूर्खों से दूरी बनानी चाहिए। मूर्ख और अनुशासन हीन व्यक्ति हमारे कार्य के नहीं है। मूर्ख का मतलब यह नहीं कि वह अज्ञानता। अज्ञानी को ज्ञान दिया जा सकता है। मूर्ख का मतलब कि ज्ञान को वह समझ ना पा रहा हो। जैसे मेरा एक मित्र भी
00:36:41:27 था। उसको मैंने वह जो है दसवीं कक्षा में जब मैं उत्तीर्ण हो गया और वह रह गया अनुत्तीर्ण तो मैंने उसको व्यक्तिगत रूप से जाकर के वो जो गणित है वो समझाने का प्रयास किया कि गणित x² y² वाला मामला अलजेब्रा वगैरह तो मैंने उसको जब प्रयास किया तो मेरी बातों में हां हां तो करता रहा। मैंने बहुत सटीक तरीके से पढ़ाने का प्रयास किया उसको। मगर लास्ट में वह निकला वही तारे जमीन पर वाला। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा। उसको तो यही लग रहा था कि दो ने टक्कर मारी तीन में। तीन ने टक्कर मारी एक्स में हवाई जहाज और दस्तियां ये सब उसको तो मूर्ख जो होता है वो बात को समझ ना पाने वाला। अज्ञानी हो सकता है कि वह है समझदार और चीजें समझाई जाए तो समझ लेगा। [खांसने की आवाज़]
00:37:40:19 हम मूर्ख के साथ संबंध ना रखो। अंधेरे में ना हाथ डालो और घबराहट में अपनी चीज ना बोलो। स्नान और संध्या वंदन ना छोड़ो। कुल का आचार ना तोड़ो। आलसी बनकर अनाचार ना करो। हरी कथा ना छोड़ो। निरूपण ना छोड़ो। प्रपंच में पड़कर परमार्थ का नाश मत करो। देवता की मानी हुई मनौती ना तोड़ो। अपना धर्म ना छोड़ो। और बिना सोचे समझे व्यर्थ हर्ट ना करो। निष्ठुरता या जीव हत्या ना करो। वर्षा होती हुई देखकर अथवा बुरे समय में कहीं ना जाओ। सभा को देखकर मत घबराओ। समय पर उत्तर देने से ना चूको। किसी के धिक्कारने पर अधीर मत हो। बिना गुरु किए ना रहो। बिना गुरु किए ना रहो। नीच जाति के व्यक्ति को गुरु ना बनाओ। वैभव में भूलकर। अब यहां नीच शब्द बड़ा खराब लग रहा होगा। हम लोग इस पर काफी बार व्याख्या कर चुके हैं। नीच शब्द व्यवस्था मूलक शब्द है। ठीक है?
00:38:46:16 सत्य का मार्ग ना छोड़ो। असत्य मार्ग पर ना जाओ और कभी मिथ्याभिमान ना करो। अपकीर्ति से पीछा छुड़ाओ। सत्य कीर्ति बढ़ाओ और विवेक पूर्वक सत्य मार्ग पर दृढ़ता से जमे रहो। जो लोग उत्तम गुण ग्रहण नहीं करते वह बुरे लक्षणों वाले होते हैं। उनके लक्षण अगले समास में बतलाए जाते हैं। ठीक है? यह हो गया आज का हमारा उत्तम लक्षण। आज प्रश्नोत्तरी रहने दें
00:39:20:02 कि जब वो उस समय सब सत्य चल रहा था। राजा सत्यवादी था। आज के समय में सत्य के अनुसार चलना और जिस तरह से बताया गया चलना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है क्योंकि आजकल का जो न्याय व्यवस्था है वो चलने ही नहीं देगा व्यक्ति को सत्य पर हम तो जितना चल पा रहे हो उतना चलो आपके अंतरात्मा से ये पूछते रहो कि आपने अन्याय तो नहीं किया ऐसा करके बस हमारा सबसे बड़ा टीचर तो हमारा विवेक ही होता है ना हम उसमें संभवत ये रहता है ज्यादातर दिखता है कि ये करके मतलब नहीं है इसमें तो हार ही मिलने वाला है
00:40:06:07 किस में हार मिलने वाला सत्य पर चल सत्य पर चलने पे हमारा उद्देश्य जीत थोड़ी ना है हमारा उद्देश्य तो है धर्म का पालन करने का आनंद उठाना उसका जो आनंद है वही वही है बस हमारा लक्ष्य हमारा लक्ष्य मोक्ष भी नहीं है। हमारा लक्ष्य भौतिक जीत भी नहीं है और ना पारमार्थिक जीत है। हमारा लक्ष्य जो माइंड में होना चाहिए वह है धर्म का अनुकरण करने का आनंद। उसका आनंद लीजिए। मैं धर्मनिष्ठ हूं। मैं धर्मज्ञ हूं। यह है मेरा आनंद। इसी के साथ मैं चैन से सोता हूं और इसी के साथ सुबह उठता हूं और कई लोगों की रातों की नींद भी छीन लेता हूं। हां समझा। हां हां समझ गया। ये समझ गए। ठीक है। चलिए शुभ रात्रि सभी को और जय श्री राम।
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
पराई स्त्री के प्रति आकर्षण पर नियंत्रण कैसे करें? Dasbodh Session 10
🔗 This video is made from parts of these videos
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮