1
00:00:02,620 --> 00:00:07,360
[घंटी की आवाज़][संगीत] मुख्य विषय पर बाबा की

2
00:00:07,360 --> 00:00:11,440
सन्यास और गृहस्थ के विषय में बाबा मुझे लग

3
00:00:11,440 --> 00:00:15,680
रहा है कि आज तक समझ नहीं पाया कि उसको चूज किसे करना है,

4
00:00:15,680 --> 00:00:19,680
विरक्तता को चूज़ करना है या फिर गृहस्ती को चूज़ करना है।

5
00:00:19,680 --> 00:00:23,680
इसलिए बाबा ने ऐसा इसमें अह क्या

6
00:00:23,680 --> 00:00:27,760
कहेंगे भाई? पंचर कर देने वाला ज्ञान दिया है। दिमाग को पंचर कर देने वाला

7
00:00:27,760 --> 00:00:32,000
ज्ञान कि आप फिर से झंडू बाब इत्यादि ले लीजिए

8
00:00:32,000 --> 00:00:36,560
हाथ साथ में। तो भैया बाबा सबसे पहले मैं

9
00:00:36,560 --> 00:00:40,560
संक्षेप में बता दूं बुलेट पॉइंट स्टार्ट

10
00:00:40,560 --> 00:00:44,640
हो रहे हैं यहां से कि सबसे पहले बाबा कहता है कि कर्म

11
00:00:44,640 --> 00:00:48,720
सन्यास या फिर कर्म सन्यास दो

12
00:00:48,720 --> 00:00:53,360
है। एक घर में रहकर हठ पूर्वक इंद्रियों पर संयम रखते हुए

13
00:00:53,360 --> 00:00:57,840
व्यक्ति रहे वो भी कर्म सन्यास है और या फिर वह जंगल में जाकर के

14
00:00:57,840 --> 00:01:02,160
रहे वो भी कर्म सन्यास है। और ये दोनों शास्त्र विरुद्ध है।

15
00:01:02,160 --> 00:01:06,480
अब देखते जाना बाबा ने क्या रायता फैलाया है। अब

16
00:01:06,480 --> 00:01:08,640
देखो

17
00:01:08,640 --> 00:01:12,640
इसके बाद कर्म योगी क्या है? कर्म योगी वो

18
00:01:12,640 --> 00:01:17,040
है जो घर में शास्त्र विधि पूर्वक भक्ति करे। यहां पे

19
00:01:17,040 --> 00:01:17,760
इंद्रियों का

20
00:01:17,760 --> 00:01:22,320
निग्रह नहीं है। बस वो शास्त्र विधि पूर्वक भक्ति करे।

21
00:01:22,320 --> 00:01:26,400
यानी कि वह अगर नाम जप कर रहा है शास्त्र विधि पूर्वक

22
00:01:26,400 --> 00:01:30,400
कुल मिलाकर के एक ही बात है। नाम जप यानी कि वह

23
00:01:30,400 --> 00:01:34,560
यदि भक्ति कर रहा है तो वो घर में रह के

24
00:01:34,560 --> 00:01:38,960
कुछ भी कर रहा हो वो जो है कर्म योगी कहलाएगा। भले ही वह चोर हो।

25
00:01:38,960 --> 00:01:43,200
चोर कैसे सिद्ध होता है? क्योंकि यह पेज

26
00:01:43,200 --> 00:01:47,200
नंबर 103 पर यही कहते हैं आगे कर्म योगी के बारे में बताते हुए

27
00:01:47,200 --> 00:01:51,200
कि जो व्यक्ति शास्त्र विधि के शास्त्र विरुद्ध तरीके से

28
00:01:51,200 --> 00:01:56,560
भी घर पर रह के और जो है अ

29
00:01:56,560 --> 00:02:02,560
क्या लिखा है 103

30
00:02:02,560 --> 00:02:06,800
हम दूसरी प्रकार के कर्म योगी वह होते हैं जो बाल बच्चों

31
00:02:06,800 --> 00:02:10,800
में रहते हैं तथा शास्त्र साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते

32
00:02:10,800 --> 00:02:16,160
हैं। यानी कि शास्त्र विधि विरुद्ध

33
00:02:16,160 --> 00:02:21,120
जो साधना कर रहे हैं वह भी कर्म योगी हैं। और

34
00:02:21,120 --> 00:02:25,360
शास्त्र विधि सहित जो साधना कर रहे हैं वह भी कर्म योगी हैं।

35
00:02:25,360 --> 00:02:29,520
तो अब अगर यह कहें ये लोग यानी कि सबसे पहले क्या सिद्ध

36
00:02:29,520 --> 00:02:34,400
हो गया कि व्यक्ति यदि रामपाल से नाम दीक्षा लेकर के चोरी भी कर रहा है।

37
00:02:34,400 --> 00:02:38,400
चोरी कर रहा है, व्यभचार कर रहा है, बलात्कार कर रहा है, कुछ भी कर रहा है। जैसे

38
00:02:38,400 --> 00:02:42,400
कि झूठ बोलना इत्यादि जो राघव दास इत्यादि अभिषेक का अभी

39
00:02:42,400 --> 00:02:46,400
हमने देखा तो यह लोग भी कर्म योगी हैं बाबा के

40
00:02:46,400 --> 00:02:50,560
जो राइफल लेकर खड़े होते हैं इनके यहां पर जो पकड़े जाते

41
00:02:50,560 --> 00:02:54,720
हैं जिन पर देशद्रोह का मुकदमा लगता है। ये सब ये सब जो है कर्म योगी है क्योंकि इन्होंने बाबा

42
00:02:54,720 --> 00:02:58,880
से नाम दी इच्छा ले रखी है। तो आपको अपने नाम के साथ कर्म योगी लिखने लगो।

43
00:02:58,880 --> 00:03:04,160
अब अच्छा लगेगा अलंकारिक। तो यह सब कर्म योगी है बाबा के अनुसार।

44
00:03:04,160 --> 00:03:08,480
शास्त्र विधि के अनुसार घर में रहकर साधना करने वाला उसको

45
00:03:08,480 --> 00:03:12,560
इंद्रिय निग्रह नहीं करना है। केवल शास्त्र विधि के अनुसार यदि वो

46
00:03:12,560 --> 00:03:16,720
घर में रह के वो कर रहा है तो भी वो कर्म

47
00:03:16,720 --> 00:03:17,680
योगी है।

48
00:03:17,680 --> 00:03:21,680
और शास्त्र विरुद्ध अगर वह घर में साधना कर रहा है तब

49
00:03:21,680 --> 00:03:25,760
भी वो कर्म योगी है। यह बाबा का ज्ञान है। ठीक है?

50
00:03:25,760 --> 00:03:29,840
और ऊपर क्या कह रहा है कि कर्म

51
00:03:29,840 --> 00:03:34,240
सन्यास वो है जिसमें कि शास्त्र विरुद्ध कर्म

52
00:03:34,240 --> 00:03:38,240
सन्यास वह है जो घर में रहे या जंगल में

53
00:03:38,240 --> 00:03:42,480
जाकर रहे मगर वह शास्त्र विरुद्ध है।

54
00:03:42,480 --> 00:03:46,800
कर्म सन्यास दो प्रकार का होता है। एक सन्यास तो वह होता है जिसमें साधक परमात्मा

55
00:03:46,800 --> 00:03:51,120
प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्याग कर हटकर के जंगल में बैठ जाता है तथा शास्त्र

56
00:03:51,120 --> 00:03:55,200
विधि रहित साधना करता है। यह भी कर्म सन्यास है। शास्त्र विधि रहित

57
00:03:55,200 --> 00:03:59,440
भी कर्म सन्यास है। शास्त्र विधि रहित कर्म

58
00:03:59,440 --> 00:04:03,600
सन्यास भी है। शास्त्र विधि रहित कर्म योग भी है।

59
00:04:03,600 --> 00:04:08,080
सब कुछ है। शास्त्र विधि रहित कर्म योग भी है। और

60
00:04:08,080 --> 00:04:10,320
शास्त्र

61
00:04:10,320 --> 00:04:14,320
शास्त्र विधि के अनुसार भी कर्म सन्यास भी है। शास्त्र

62
00:04:14,320 --> 00:04:18,320
विधि के अनुसार भी कर्म योग भी है। यह इस बाबा का ज्ञान

63
00:04:18,320 --> 00:04:22,400
है। तत्व ज्ञान सब कुछ है। सब कुछ है और कुछ

64
00:04:22,400 --> 00:04:26,800
भी नहीं है। देखो ध्यान से सुनो। कर्म सन्यास दो प्रकार के होते हैं।

65
00:04:26,800 --> 00:04:31,040
एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर

66
00:04:31,040 --> 00:04:32,880
घर त्याग कर हट करके जंगल

67
00:04:32,880 --> 00:04:36,880
में बैठ जाता है तथा शास्त्र विधि रहित साधना करता है। दूसरा घर पर

68
00:04:36,880 --> 00:04:41,040
रहते हुए भी हठ योग करके घंटों एक स्थान पर बैठकर शास्त्र विधि त्याग कर

69
00:04:41,040 --> 00:04:45,280
साधना करता है। यह दोनों ही कर्म सन्यासी हैं। यानी कि

70
00:04:45,280 --> 00:04:49,680
कर्म सन्यासी कौन है? जो शास्त्र विरुद्ध चल रहा है। ठीक है?

71
00:04:49,680 --> 00:04:53,680
अब जब कर्म योगी की बात आएगी तो कम से कम कर्म योगी को तो शास्त्र विधि

72
00:04:53,680 --> 00:04:57,840
के अनुसार चलने वाला मानना चाहिए ना। मगर कर्म योगी में शास्त्र

73
00:04:57,840 --> 00:05:02,080
विधि के अनुसार यह दोनों काम करें जंगल में रह के या घर पर रह के वह भी कर्म

74
00:05:02,080 --> 00:05:06,240
योगी है और फिर कर्म योगी वो भी है जो शास्त्र विधि विरुद्ध ये दोनों

75
00:05:06,240 --> 00:05:10,320
काम करे जंगल में रह के या घर पर रह के अरे कहना क्या चाहते

76
00:05:10,320 --> 00:05:14,320
हो कर्म योगी और कर्म सन्यासी में कोई अंतर नहीं है ये कहना

77
00:05:14,320 --> 00:05:18,400
चाहते हो और शास्त्र विधि में और शास्त्र विरुद्ध में कोई अंतर नहीं है ये

78
00:05:18,400 --> 00:05:22,640
कहना चाहते हो बाबा जी कहना क्या चाहते हो नहीं

79
00:05:22,640 --> 00:05:26,800
पता आगे देखिए इसका का क्या मामला होता है?

80
00:05:26,800 --> 00:05:31,520
एक इन्होंने वो बहुत फैलाई हुई है।

81
00:05:31,520 --> 00:05:35,760
ज्ञान गंगा का मैं एक पेज बता रहा हूं। वो

82
00:05:35,760 --> 00:05:40,640
आप निकालिए।

83
00:05:40,640 --> 00:05:44,800
196 देखिए इस बाबा ने कितना तत्व ज्ञान

84
00:05:44,800 --> 00:05:48,960
दिया है। 196 197 पेज नंबर ज्ञान

85
00:05:48,960 --> 00:05:53,200
गंगा निकालिए। ठीक है? तब तक मैं पढ़ रहा हूं। तो कर्म

86
00:05:53,200 --> 00:05:57,280
योगी का समझ लिया आपने यानी कि कुल मिलाकर बाबा के अनुसार

87
00:05:57,280 --> 00:06:01,360
शास्त्र विधि के अनुसार करने में और शास्त्र विरुद्ध करने में कोई

88
00:06:01,360 --> 00:06:05,520
अंतर नहीं है और ना कर्म सन्यास में कोई अंतर है ना कर्म योगी में कोई अंतर है क्योंकि

89
00:06:05,520 --> 00:06:09,920
शास्त्र विधि द्वारा पूजा करने वाले को भी यह कर्म योगी कर्म सन्यासी

90
00:06:09,920 --> 00:06:14,160
दोनों कह रहा है और शास्त्र विधि विधि विरुद्ध

91
00:06:14,160 --> 00:06:18,160
शास्त्र विधि के अनुसार चलने वाले को कर्म सन्यासी कर्म योगी

92
00:06:18,160 --> 00:06:22,240
दोनों कह रहा है और शास्त्र विधि विरुद्ध चलने का चलने ने वाले को भी यह

93
00:06:22,240 --> 00:06:26,800
कर्म योगी और कर्म सन्यासी दोनों कह रहा है। ठोको ताली।

94
00:06:26,800 --> 00:06:30,800
ठीक है? अब यह तो इसकी खिचड़ी हमने देख ली। अब हम देखते हैं एक

95
00:06:30,800 --> 00:06:34,960
इनके द्वारा बहुत एक बात फैलाई जाती है। रुचि ऋषि की जो कथा है

96
00:06:34,960 --> 00:06:38,960
197 पेज नंबर एक बहुत बड़ा खुलासा होने वाला है रुचि

97
00:06:38,960 --> 00:06:42,960
ऋषि को लेकर के यहां पर। तो आप चाहे तो यहां से कट लगा लें। एक घंटा 20

98
00:06:42,960 --> 00:06:46,960
मिनट दिखाई दे रहा है। तो यहां से रुचि ऋषि वाले चैप्टर को

99
00:06:46,960 --> 00:06:52,960
आप लोग लेकर के डालिए। रुचि ऋषि के बारे में क्या किया है?

100
00:06:54,480 --> 00:06:58,560
गीता ज्ञान ये श्राद्ध क्या

101
00:06:58,560 --> 00:07:02,880
श्राद्ध का विरोध कर रहा है यहां पर ये पेज नंबर 215

102
00:07:02,880 --> 00:07:06,960
हां शास्त्र विधि विरुद्ध इसमें नीचे चलिए

103
00:07:06,960 --> 00:07:12,960
नीचे चलिए इसमें आएगी रुचि ऋषि की कथा

104
00:07:16,720 --> 00:07:21,840
श्राद्ध वाला आया कोई और आगे चलिए

105
00:07:21,840 --> 00:07:26,400
ऊपर जाइए ऊपर हां हां हां हां हां हां हां नीचे नीचे नीचे

106
00:07:26,400 --> 00:07:30,800
नीचे जाइए ये इसी का प्रमाण मार्कंडेय

107
00:07:30,800 --> 00:07:35,200
पुराण में मार्कंडेय पुराण में निकलता है जिसमें

108
00:07:35,200 --> 00:07:39,520
कि एक रुचि नाम का साधक ब्रह्मचारी रहकर वेदों के अनुसार साधना

109
00:07:39,520 --> 00:07:43,680
कर रहा था देखिए ब्रह्मचारी रहना वेदों के अनुसार मान

110
00:07:43,680 --> 00:07:47,680
लिया इसने पहली बात तो ब्रह्मचारी का मतलब क्या हुआ ब्रह्म के

111
00:07:47,680 --> 00:07:51,760
लिए आचरण करने वाला ठीक। तो ब्रह्म के

112
00:07:51,760 --> 00:07:55,760
लिए जो आचरण कर रहा है वेदों के अनुसार है आचरण यानी कि वेद विरुद्ध

113
00:07:55,760 --> 00:08:00,000
भक्ति नहीं है। अब यहां पर क्या है कि वो विवाह नहीं करना चाहते।

114
00:08:00,000 --> 00:08:04,160
इसका मतलब वो विरक्त है। तो यहां अभी क्या कह रहा है कि जो सन्यास होता है जंगल

115
00:08:04,160 --> 00:08:09,040
में जाकर के सन्यासी बनता है। वो जो है गलत है।

116
00:08:09,040 --> 00:08:10,240
ठीक है?

117
00:08:10,240 --> 00:08:15,440
उसको यह गलत कह रहा है। और मार्कंडेय

118
00:08:15,440 --> 00:08:19,440
पुराण में जब पितर उसको कह रहे

119
00:08:19,440 --> 00:08:23,600
हैं अपने पुत्र को प्रकट हो के कि भाई तू विवाह के मार्ग पर चल। विवाह

120
00:08:23,600 --> 00:08:27,920
के द्वारा होते हुए भी अगर तू अनासक्त भाव से संयम पूर्वक धर्म

121
00:08:27,920 --> 00:08:31,920
का निर्वाह करते हुए यदि तू वहां गृहस्ती का निर्वाह

122
00:08:31,920 --> 00:08:36,080
करेगा तब भी तू मुक्त हो जाएगा। यह पितर वहां पर कह रहे हैं तो यह उनका खंडन

123
00:08:36,080 --> 00:08:40,240
कर रहा है कि देखो एक व्यक्ति वेद विरुद्ध वेद के अनुसार चल रहा था

124
00:08:40,240 --> 00:08:44,240
तो उसके पितर आकर के उसको गलत दिशा में ले जा रहे हैं। उसका विवाह करवा रहे

125
00:08:44,240 --> 00:08:48,320
हैं। यानी कि विवाह करने की शिक्षा गलत है। रुचि ऋषि

126
00:08:48,320 --> 00:08:52,400
वाले प्रकरण में रामपाल ने यह माना है। और फिर यहां पे

127
00:08:52,400 --> 00:08:56,640
बार-बार कह रहा है कि विरक्त रहना गलत है और ब्रह्मचारी आजीवन रहना

128
00:08:56,640 --> 00:09:01,040
गलत है। जो विवाह करके जो चलेगा और वो नाम दीक्षा

129
00:09:01,040 --> 00:09:05,040
लेकर के जाप करते हुए वो सही है। वो बात और है कि उसमें आगे उसने

130
00:09:05,040 --> 00:09:09,920
ये भी माना कि चोरी भी करेगा वो भी सही है।

131
00:09:09,920 --> 00:09:13,920
कर्म योगी कहा है उसको इसने। तो यह इसकी खिचड़ी है। अब देखिए अब

132
00:09:13,920 --> 00:09:17,920
इसको इसी किताबों से पहले दिखाता हूं कि इसने यहां पर यह कहा

133
00:09:17,920 --> 00:09:22,080
है कि पितर अगर तुम्हें विवाह करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि तुम जो है विवाह

134
00:09:22,080 --> 00:09:26,080
कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए गृहस्थ होते हुए भी तुम जो

135
00:09:26,080 --> 00:09:30,080
है वहां आगे पहुंच सकते हो। क्रमिक अभिव्यक्ति हो

136
00:09:30,080 --> 00:09:34,320
सकती है तुम्हारे जीवन में। क्रमिक विकास हो सकता है अध्यात्म का।

137
00:09:34,320 --> 00:09:38,400
तो यह पितर समझाने का प्रयास वहां पर कर रहे हैं रुचि ऋषि को। तो यह वहां पर

138
00:09:38,400 --> 00:09:42,480
पितरों का खंडन करने के लिए कह रहा है कि देखो देखो वो वेद के अनुसार चल रहा

139
00:09:42,480 --> 00:09:47,040
था तो यह उसको वेद के विरुद्ध ले जा रहे हैं। ठीक पितर

140
00:09:47,040 --> 00:09:51,040
पितरों को गलत साबित करने उसके चक्कर में खुद ही को गलत साबित कर लिया। इसका

141
00:09:51,040 --> 00:09:55,040
मतलब इसके अनुसार मार्कंडेय पुराण की

142
00:09:55,040 --> 00:09:59,200
जो रुचि ऋषि की कथा है उसमें इसने माना है कि विरक्तता

143
00:09:59,200 --> 00:10:03,200
ही सही है और जो गृहस्थ वाला आश्रम है वो गलत है। विवाह

144
00:10:03,200 --> 00:10:07,600
करना गलत है। अब यह जगह-जगह पर अपनी इस बात का खंडन करता है। देखिए कहां-कहां

145
00:10:07,600 --> 00:10:10,470
पे करेगा।

146
00:10:10,470 --> 00:10:16,470
[गला साफ़ करने की आवाज़]

147
00:10:16,720 --> 00:10:21,760
कहां-कहां पर करेगा

148
00:10:21,760 --> 00:10:27,200
पेज पेज नंबर 36 निकालिए

149
00:10:27,200 --> 00:10:33,200
पेज नंबर 36 इसी का गरिमा गीता की

150
00:10:41,680 --> 00:10:46,720
पेज नंबर 36 में इस व्यक्ति ने विरक्तता

151
00:10:46,720 --> 00:10:50,880
को सही भी माना है और गलत भी माना है। जैसे मार्कंडेय पुराण में विरक्तता

152
00:10:50,880 --> 00:10:54,880
को सही माना है। तो पेज नंबर पेज नंबर

153
00:10:54,880 --> 00:10:59,120
33 पहले 33 निकालिए। 33 तो पेज नंबर 33

154
00:10:59,120 --> 00:11:05,120
में यह जो है फिर से

155
00:11:06,640 --> 00:11:11,440
सन्यास का समर्थन कर रहा है। पेज नंबर 33

156
00:11:11,440 --> 00:11:15,760
इतनी ज्यादा बेईमानी की है ना इस व्यक्ति ने। इतनी ज्यादा

157
00:11:15,760 --> 00:11:20,000
इतनी ज्यादा भ्रष्टता इतनी ज्यादा धूर्तता इतने झूठ बोले हैं कि

158
00:11:20,000 --> 00:11:24,240
उसमें यह निर्णय करना कठिन हो जाता है

159
00:11:24,240 --> 00:11:28,240
कि शुरू करें तो कहां से करें? किसको पकड़ के बात करें? किस बात

160
00:11:28,240 --> 00:11:32,480
को पकड़ के बात करें? यह निर्णय करना कठिन हो जाता है। इतना झूठ भरोसा

161
00:11:32,480 --> 00:11:36,560
है इसमें। सब कुछ कह दिया भाई। ए बी सी डी एफ जी एच आई जे

162
00:11:36,560 --> 00:11:40,560
के एल एम एन ओ पी क्यू आर एस टी यू वी डब्ल्यू एक्स वाई जेड। तो

163
00:11:40,560 --> 00:11:44,560
यह जब एप्पल की स्पेलिंग पूछी गई किस अक्षर से शुरू होती है तो मैंने पूरी ए बी सी

164
00:11:44,560 --> 00:11:48,960
डी पढ़ दी। उसी तरीके से इस बाबा ने हर चीज बोल दी जिससे

165
00:11:48,960 --> 00:11:53,760
कि कोई भी चीज मेरी सब कुछ मान ले। मैंने तो यह भी बोला है। तो इसने जो है

166
00:11:53,760 --> 00:11:57,760
घर गृहस्ती को जो है विरोध किया है। सन्यास

167
00:11:57,760 --> 00:12:01,760
को माना है रुचि ऋषि की कथा में। तो अब सबसे पहले तो

168
00:12:01,760 --> 00:12:06,160
हमने वहां पर देख लिया पृष्ठ संख्या 103 पे इसने

169
00:12:06,160 --> 00:12:10,240
ग्र गृहस्ती को श्रेष्ठ माना है और कर्म जो सन्यास है उसको

170
00:12:10,240 --> 00:12:14,400
जो है गलत माना है वहां पर वो ऐसे ही विरक्त हो के रह रहे हैं रुचि ऋषि

171
00:12:14,400 --> 00:12:18,480
तो उनको सही कह रहा है और यहां पर कह रहा है कि ऐसे रहना जो है वो गलत

172
00:12:18,480 --> 00:12:21,680
है घर में रहो घर में रह के इंद्रिय निग्रह

173
00:12:21,680 --> 00:12:26,160
मत करो इंद्रिय निग्रह मतलब अपने आप को संयमित रखने का प्रयास मत करो बस भक्ति करो

174
00:12:26,160 --> 00:12:30,320
यानी कि रामपाल ऐसे ही रहता होगा बबिता इत्यादि ऐसे

175
00:12:30,320 --> 00:12:34,400
ही रहता होगा। वहां पर संयम की आवश्यकता कोई नहीं है। इसीलिए ऐसे कह रहा है। इसीलिए

176
00:12:34,400 --> 00:12:38,480
जो वीडियो का टाइटल है वो यह रखा गया कि भाई क्या काम वासना अभी भी बाकी है

177
00:12:38,480 --> 00:12:42,480
या अभी जो शारीरिक बदलाव होते हैं, वृद्धावस्था आ जाती है।

178
00:12:42,480 --> 00:12:46,640
उसमें जो है कई विषयों को लेकर के असामर्थ्यता

179
00:12:46,640 --> 00:12:50,720
आ जाती है। उसके कारण क्या वो चीजें नहीं है कि अभी भी वही है क्योंकि

180
00:12:50,720 --> 00:12:55,280
इसके लेख को देख के ऐसा लगता है गरिमा गीता की में जो इसने

181
00:12:55,280 --> 00:12:59,280
वो हुआ दिया है ज्ञान तत्व ज्ञान उससे ऐसा समझ में आता है

182
00:12:59,280 --> 00:13:03,280
कि इस इसका जो चरित्र है ना वो समझ में आता है इसका खुद का चरित्र

183
00:13:03,280 --> 00:13:07,440
कैसा है कभी यह सोचता है कि विरक्त हो जाओ कभी ये सोचता है गृहस्थ हो जाओ

184
00:13:07,440 --> 00:13:11,440
कभी यह सोचता है कि इंद्रियों का निग्रह करो कभी यह सोचता है ना करो तो

185
00:13:11,440 --> 00:13:15,440
जब ये पढ़ाने बैठता है तो करो इंद्रियों विषयों का इंद्रियों

186
00:13:15,440 --> 00:13:19,600
का निग्रह मगर जब ये जो है घर जाता होगा या फिर जो इनके

187
00:13:19,600 --> 00:13:23,600
जो कुछ क्या-क्या मिले थे कोई कोई कहता है गुफा है मीडिया में ऐसा कुछ

188
00:13:23,600 --> 00:13:27,600
बताया गया कि इसका कुछ अपना एक कमरा था तो उसमें जाता होगा तो इंद्रियों का

189
00:13:27,600 --> 00:13:31,600
निग्रह मत करो ये सब चीजें शायद होती होंगी जिस कारण से इसने

190
00:13:31,600 --> 00:13:36,480
बार-बार अपनी ही बात को काटा है। रुचि ऋषि में इसने

191
00:13:36,480 --> 00:13:37,040
सन्यास

192
00:13:37,040 --> 00:13:41,120
का समर्थन और गृहस्थ का विरोध किया है। अब यह क्या कह

193
00:13:41,120 --> 00:13:45,120
रहा है? सबसे पहले तो पृष्ठ क्रमांक 103 पे

194
00:13:45,120 --> 00:13:49,200
इसने सन्यास का विरोध और गृहस्थ जीवन का समर्थन

195
00:13:49,200 --> 00:13:54,160
किया है। हालांकि जो संयमित जीवन के अनुसार और

196
00:13:54,160 --> 00:13:58,400
शास्त्रोचित जो निर्देश दिए गए उनके अनुसार चलने पर हमारी

197
00:13:58,400 --> 00:14:02,560
गीता हमारे शास्त्रों के अनुसार दोनों ही मार्ग फलदायक है। ये गीता में भी लिखा

198
00:14:02,560 --> 00:14:06,720
हुआ है। मगर इसने जो है क्या किया है? सन्यास का समर्थन

199
00:14:06,720 --> 00:14:11,040
रुचि ऋषि वाली में और गृहस्थ का विरोध और पृष्ठ क्रमांक

200
00:14:11,040 --> 00:14:15,120
103 गरिमा गीता की वहां पर इसने क्या किया है कि सन्यास का

201
00:14:15,120 --> 00:14:19,200
विरोध और गृहस्थ का समर्थन इसके बाद ये यहां पे नहीं रुकता

202
00:14:19,200 --> 00:14:23,280
है। इसने जो है फिर से एक तरफ

203
00:14:23,280 --> 00:14:27,520
ये हट पूर्वक इंद्रिय निग्रह करना मना करता है।

204
00:14:27,520 --> 00:14:31,680
यही कर्म कर्म योगी वाले में और और भी जगह-जगह मगर फिर यह पेज

205
00:14:31,680 --> 00:14:36,480
नंबर 33 पे गरिमा गीता की पेज नंबर 33

206
00:14:36,480 --> 00:14:40,640
वहां क्या होता है ये पेज नंबर 33 है ना हां ये ये

207
00:14:40,640 --> 00:14:44,720
जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला वह परमात्मा के स्मरण में स्थिर नहीं हो सकता क्योंकि उसका

208
00:14:44,720 --> 00:14:48,960
मन वश में नहीं है। मन वश में होना चाहिए। पहली बात यह ध्यान रखिए इंद्रिय

209
00:14:48,960 --> 00:14:52,080
निग्रह मन वश में होना चाहिए। उस अयुक्त यानी

210
00:14:52,080 --> 00:14:56,480
परमात्मा पर ना टिके। मन वाले पुरुष में अब देखिए एक जगह

211
00:14:56,480 --> 00:15:00,480
विरक्तता का विरोध करता है। फिर एक जगह समर्थन करता है। फिर एक

212
00:15:00,480 --> 00:15:04,560
जगह इंद्रिय निग्रह का विरोध करता है। फिर दूसरी जगह समर्थन करता है।

213
00:15:04,560 --> 00:15:08,720
यह तत्व ज्ञानी बाबा हैं। अच्छा तो उसकी

214
00:15:08,720 --> 00:15:13,440
बुद्धि स्थिर नहीं है। उस

215
00:15:13,440 --> 00:15:17,920
देखो यहां इसके ही अगले पैराग्राफ में ये कह रहा है क्योंकि

216
00:15:17,920 --> 00:15:22,000
पूर्ण संत रूपी केवट नाव के साथ नहीं है तो उस नाव को जल में वायु हर

217
00:15:22,000 --> 00:15:26,160
लेती हैं। यानी अपनी इच्छा अनुसार भटकाती हैं। वैसे ही पूर्ण संत के अभाव

218
00:15:26,160 --> 00:15:30,160
में तत्व ज्ञान ना होने से जल में नाव की भांति विषयों में

219
00:15:30,160 --> 00:15:34,720
विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ लगा है वह एक ही इंद्रिय

220
00:15:34,720 --> 00:15:38,960
उस अभक्त की बुद्धि को हर लेती है। तो यहां क्या हुआ? इंद्रिय निग्रह

221
00:15:38,960 --> 00:15:43,120
करना चाहिए। यहां बाबा जी ये मान रहे हैं। वहां पे कह रहे हैं नहीं नहीं इंद्रिय

222
00:15:43,120 --> 00:15:47,280
निग्रह नहीं होना चाहिए। इंद्रिय निग्रह नहीं करना केवल नाम जपो। यहां इंद्रिय निग्रह

223
00:15:47,280 --> 00:15:51,440
का समर्थन कर रहा है कि इंद्रिय निग्रह होना चाहिए। अब मैं आपसे पूछता

224
00:15:51,440 --> 00:15:55,760
हूं सब बातें छोड़ दो। अगर क्या नाम जब जप रहे हो

225
00:15:55,760 --> 00:16:00,240
अपने ईश्वर का नाम जप रहे हो तो क्या फ्रीलांस रहने चाहिए क्या फ्री? चाहे

226
00:16:00,240 --> 00:16:04,480
जहां पे जिस भी इंद्रिय को विषय देना है उसका भोग का विषय

227
00:16:04,480 --> 00:16:07,200
है उसको करने का प्रयास करना चाहिए। बाबा ऐसा

228
00:16:07,200 --> 00:16:11,360
ही रहता है क्या? मैं रामपालियों से पूछ रहा हूं। क्या अपने घर में ऐसे ही रहते

229
00:16:11,360 --> 00:16:15,440
हो? कहीं पर भी संयम नहीं करते हो। किसी भी

230
00:16:15,440 --> 00:16:19,600
क्षेत्र में संयम नहीं करते हो। बाबा का तो नहीं पता है। उसके बारे में तो बहुत सी चीजें

231
00:16:19,600 --> 00:16:23,600
हैं। मगर तुम लोग क्या करते हो? तुम बताओ। इंद्रिय निग्रह

232
00:16:23,600 --> 00:16:29,040
करते हो ना? संयम करते हो ना?

233
00:16:29,040 --> 00:16:33,360
ठीक है? ये हो गया। अब देखिए विरक्तता का विरोध,

234
00:16:33,360 --> 00:16:37,520
विरक्तता का समर्थन। इंद्रिय निग्रह का विरोध, इंद्रिय निग्रह

235
00:16:37,520 --> 00:16:43,120
का समर्थन। अब

236
00:16:43,120 --> 00:16:47,280
अब मैं आपको दिखाता हूं इसी में 36 पेज नंबर पे देखिए। अब मैं आपको सन्यास

237
00:16:47,280 --> 00:16:51,280
का यहां पर समर्थन दिखाता हूं। देखिए इसमें देखिए क्या लिखा

238
00:16:51,280 --> 00:16:56,480
है? इसमें लिखा है

239
00:16:56,480 --> 00:17:01,040
36 इसमें लिखा है [गला साफ़ करने की आवाज़]

240
00:17:01,040 --> 00:17:04,480
कि

241
00:17:04,480 --> 00:17:08,480
रात्रि में दो प्रकार के व्यक्ति जागते हैं। एक तो सांसारिक भोगों की इच्छा

242
00:17:08,480 --> 00:17:12,480
वाला सोते हुए भी स्वप्न में उन्हीं में भटकता रहता है। दूसरा परमात्मा की भक्ति

243
00:17:12,480 --> 00:17:16,880
में लगा स्थिर बुद्धि वाला साधक रात्रि में स्वप्न में भी परमात्मा में विचार

244
00:17:16,880 --> 00:17:21,200
विचार करता है। आगे क्या लिखा है? भावार्थ जो सांसारिक व्यक्ति भौतिक

245
00:17:21,200 --> 00:17:25,200
पदार्थों की प्राप्ति के लिए दिन भर भटकता है। यह जो भौतिक पदार्थों की प्राप्ति

246
00:17:25,200 --> 00:17:29,280
है ना यही जो माया के पीछे पड़े रहने का खंडन

247
00:17:29,280 --> 00:17:33,680
किया है गीता में वही है भौतिक पदार्थों की जो भक्ति करते हैं माया की भक्ति करते हैं

248
00:17:33,680 --> 00:17:37,840
माया को ढूंढते रहते हैं वो खंडन किया तो उसको ये लोग बनाते ब्रह्मा विष्णु

249
00:17:37,840 --> 00:17:41,920
महेश की भक्ति मना की गई है हालांकि खैर इधर आ जाते तो जो

250
00:17:41,920 --> 00:17:46,000
सांसारिक व्यक्ति भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए दिन भर भटकता है यानी नहीं भटकना चाहिए

251
00:17:46,000 --> 00:17:50,000
भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए नहीं भटकना चाहिए संयमी

252
00:17:50,000 --> 00:17:54,160
साधक की इच्छा उन पदार्थों की नहीं होती ठीक है? यानी

253
00:17:54,160 --> 00:17:58,240
कि विरक्तता भौतिक पदार्थों के लिए विरक्तता का यहां समर्थन आ

254
00:17:58,240 --> 00:18:02,240
गया। उसके लिए वह दिन भी रात्रि के समान है। अन्य लोग तो सांसारिक

255
00:18:02,240 --> 00:18:06,400
पदार्थों की प्राप्ति के लिए सजग रहते हैं। परंतु स्थिर बुद्धि

256
00:18:06,400 --> 00:18:10,480
वाला उनसे मुख मोड़े रहता है। अब भाई भौतिक पदार्थों से मुख मोड़ने

257
00:18:10,480 --> 00:18:14,880
वाला विरक्त हो गया ना। भौतिक पदार्थों से मुख मोड़ने

258
00:18:14,880 --> 00:18:19,040
वाला विरक्त हो गया। तो भौतिक पदार्थ तो भोजन भी है। तो भोजन

259
00:18:19,040 --> 00:18:23,200
से मुंह मोड़ने वाला व्रत हो गया। व्रत का तो खंडन है पर

260
00:18:23,200 --> 00:18:27,200
तू तो समर्थन कर रहा है यहां पर तेरे जूता ही तेरा ही जूता सदैव

261
00:18:27,200 --> 00:18:31,200
तेरे सर पर मारूंगा जो जो आएगा ना हमारे धर्म का अपमान करने

262
00:18:31,200 --> 00:18:36,480
हमारे भगवान का अपमान करने उसी का जूता उसके सर पर पड़ेगा ये देख

263
00:18:36,480 --> 00:18:40,640
और जिसने भी अपनी मां जिसको भी उसकी माता जी ने निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया

264
00:18:40,640 --> 00:18:46,640
है वो आकर के बात करे सामने से

265
00:18:48,800 --> 00:18:52,880
तो यहां पे इसने व्रत का अविरक्तता का पुनः समर्थन कर दिया। अब इस बाबा

266
00:18:52,880 --> 00:18:57,040
से कोई पूछे भाई तू विरक्तता का समर्थन करता है कि विरोध करता है? क्या

267
00:18:57,040 --> 00:19:01,280
ऐसा है कि बबिता के सामने आते ही तुझे गृहस्ती याद आने लगती है

268
00:19:01,280 --> 00:19:05,280
और जैसे ही जनता को बेवकूफ बनाता बनाना होता है मंचों से तो तुझे

269
00:19:05,280 --> 00:19:09,360
वहां पर विरक्तता याद आ जाती है। कर्म योगी में तू कहना क्या चाहता

270
00:19:09,360 --> 00:19:13,440
है कि शास्त्र विरुद्ध कर शास्त्र विरुद्ध चीजें करने वाला तो कर्म सन्यासी

271
00:19:13,440 --> 00:19:17,520
हो गया। मान लिया तो इसका मतलब कर्म योगी क्योंकि कर्म योगी और कर्म सन्यासी

272
00:19:17,520 --> 00:19:21,680
में अंतर है तो कर्म योगी अगर तूने कर्म सन्यासी शास्त्र विरुद्ध

273
00:19:21,680 --> 00:19:25,840
वाले को माना है तो भैया कर्म योगी तू उसको मान ले भाई हमें

274
00:19:25,840 --> 00:19:30,000
झंडू बाम नहीं लगाना पड़ेगा सर पे तो कर्म योगी तू उसको मान

275
00:19:30,000 --> 00:19:34,080
ले जो शास्त्र विधि के अनुसार तेरी वाली अभी तो तेरी वाली के अनुसार बात कर रहा हूं तो

276
00:19:34,080 --> 00:19:38,320
तू उसको मान ले कर्म योगी जो शास्त्र विधि के अनुसार चले मगर तू कर्म

277
00:19:38,320 --> 00:19:43,520
योगी में भी यह घुसेड़ दे रहा है कि कर्म योगी में इसने क्या घुसेड़ दिया

278
00:19:43,520 --> 00:19:47,520
103 कर्म योगी में फिर तू कह रहा है कर्म योगी दो

279
00:19:47,520 --> 00:19:51,760
प्रकार के हैं। एक तो बाल बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्र विधि अनुसार

280
00:19:51,760 --> 00:19:56,000
भक्ति साधना करता है या ना शादी करवा के घर पर या किसी आश्रम में रहता

281
00:19:56,000 --> 00:20:00,000
हुआ सांसारिक कर्म अथवा सेवा करता

282
00:20:00,000 --> 00:20:04,000
हुआ शास्त्र विधि अनुसार भक्ति करता है। यानी कि विरक्त और

283
00:20:04,000 --> 00:20:08,240
गृहस्थ दोनों कर्म योगी हैं। और ऊपर वाले पैराग्राफ में विरक्त

284
00:20:08,240 --> 00:20:12,240
और गृहस्थ दोनों कर्म सन्यासी हैं। बस यहां दोनों

285
00:20:12,240 --> 00:20:16,400
पैराग्राफ में अंतर यह है कि ऊपर वाला शास्त्र विधि विरुद्ध साधना कर रहा है और

286
00:20:16,400 --> 00:20:20,720
नीचे वाला शास्त्र विधि सहित साधना कर रहा है। मगर इसने क्या किया?

287
00:20:20,720 --> 00:20:25,440
तीसरा एक पैराग्राफ और लिखा। 103 नंबर का पेज दिखा दो आप यहां।

288
00:20:25,440 --> 00:20:29,520
103 नंबर। इसने क्या किया? यहां पे कर्म योग में नीचे लिखा

289
00:20:29,520 --> 00:20:33,520
है। दूसरी प्रकार के कर्म योगी वह होते हैं जो बाल बच्चों में

290
00:20:33,520 --> 00:20:37,600
रहते हैं तथा साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते हैं। अरे मेरे भाई तो

291
00:20:37,600 --> 00:20:41,760
वो तो कर्म सन्यासी है ना। शास्त्र विरुद्ध वाला तो कर्म सन्यासी

292
00:20:41,760 --> 00:20:46,080
है ना तो यहां पर भी घुसेड़ दिया कर्म शास्त्र विरुद्ध विरोध को पागल

293
00:20:46,080 --> 00:20:50,080
है क्या भांग खा के लिखी है क्या ये किताबें इसका विवरण लिखा है ना ये

294
00:20:50,080 --> 00:20:54,080
देखिए इसका घोंचूपन देखिए कर्म सन्यास का विवरण कर्म

295
00:20:54,080 --> 00:20:58,320
सन्यास दो प्रकार के होते हैं एक तो सन्यास वह होता है जिसमें साधक परमात्मा

296
00:20:58,320 --> 00:21:02,400
प्राप्ति के लिए प्रेरित होकर घर त्याग कर हटके जंगल

297
00:21:02,400 --> 00:21:06,400
में बैठ जाता है। यानी कि घर त्याग

298
00:21:06,400 --> 00:21:10,400
कर नहीं रहना चाहिए। यह वह वाला खंडन है। जो वहां पर रुचि ऋषि की

299
00:21:10,400 --> 00:21:14,960
तपस्या में रुचि ऋषि का समर्थन कर रहा है। पितरों का विरोध करने के लिए यहां पर

300
00:21:14,960 --> 00:21:19,280
रुचि ऋषि पितरों का समर्थन कर रहा है व्यक्ति। पित पितर कह रहे हैं ना गस्थ

301
00:21:19,280 --> 00:21:23,280
ग्रस्त हो जाओ। विवाह करके कर लो। कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए कर लो। तो

302
00:21:23,280 --> 00:21:27,440
यहां पे पितरों का समर्थन कर रहा है। क्या कह रहा है? घर त्याग कर हट के जंगल

303
00:21:27,440 --> 00:21:31,520
में बैठ जाता है तथा शास्त्र विधि साधना करता है। दूसरा घर पर रहते

304
00:21:31,520 --> 00:21:35,520
हुए भी हठ योग करके घंटों एक स्थान पर बैठकर शास्त्र विधि त्याग कर साधना

305
00:21:35,520 --> 00:21:39,520
करता है। दोनों ही कर्म सन्यासी यानी कि शास्त्र विरुद्ध तरीके से चलना

306
00:21:39,520 --> 00:21:43,760
कर्म सन्यास है। तो जाहिर सी बात है कि कर्म योगी की जब बात बताओगे

307
00:21:43,760 --> 00:21:47,840
तो शास्त्र विधि सहित चलना कर्म योगी होगा। मगर वहां ये क्या कह रहा है?

308
00:21:47,840 --> 00:21:51,840
यह भी दो प्रकार का होता है। एक तो बाल बच्चों सहित सांसारिक कार्य करता हुआ शास्त्र

309
00:21:51,840 --> 00:21:56,080
विधि अनुसार भक्ति साधना करता है या ना शादी करता करवा करके

310
00:21:56,080 --> 00:22:00,400
घर पर या किसी आश्रम में रहता हुआ सांसारिक कर्म अथवा सेवा करता हुआ शास्त्र

311
00:22:00,400 --> 00:22:04,880
विधि अनुसार साधना करता है। ये दोनों कर्म योगी हैं। मगर अब दूसरी

312
00:22:04,880 --> 00:22:09,040
प्रकार के कर्म योगी वह होते हैं जो बाल बच्चों में रहते हैं तथा शास्त्र

313
00:22:09,040 --> 00:22:13,600
विधि विरुद्ध शास्त्र साधना शास्त्र विधि विरुद्ध करते हैं

314
00:22:13,600 --> 00:22:17,680
या शादी ना करवाकर किसी आश्रम में सेवा करते हैं तथा साधना भी

315
00:22:17,680 --> 00:22:22,320
शास्त्र विधि के विपरीत करते हैं पागल है क्या

316
00:22:22,320 --> 00:22:26,560
फिर कर्म सन्यास कहां ले जाएगा अलग से तूने कर्म योगी में भी कर्म सन्यास

317
00:22:26,560 --> 00:22:30,480
वाली चीजें डाल दी

318
00:22:30,480 --> 00:22:34,880
ठीक है बुलेट पॉइंट्स में आगे चलते हैं

319
00:22:34,880 --> 00:22:38,960
अब बुलेट पॉइंट्स में हम लोग आ जाते हैं। आगे चलते हैं। तो पांच दो की

320
00:22:38,960 --> 00:22:42,960
व्याख्या करते हुए यह व्यक्ति यह व्यक्ति

321
00:22:42,960 --> 00:22:47,360
पांच दो की व्याख्या करते हुए कहता है कि भाई यहां पे

322
00:22:47,360 --> 00:22:51,360
पांच दो के उसमें इसने लिखा है कि 16 से 23 तक गीता

323
00:22:51,360 --> 00:22:56,000
अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा है शास्त्र विधि अनुसार ये वो

324
00:22:56,000 --> 00:23:00,000
तो जो साधना त्यागने की है पांच दो के उसमें लिखा

325
00:23:00,000 --> 00:23:04,240
है अर्थात ना करने वाली है तथा जो करने वाली है उनके लिए शास्त्र

326
00:23:04,240 --> 00:23:08,400
को प्रमाण मानना चाहिए तो यहां पर जो त्यागने की साधना है वो गीता हमारे

327
00:23:08,400 --> 00:23:12,400
शास्त्रों में बताई गई रामपाल के अनुसार तो बात यह है कि जिसको त्यागने को कहा

328
00:23:12,400 --> 00:23:16,400
गया है उसको करने को कहां पे कहां कहां पर कहा गया है यह बात

329
00:23:16,400 --> 00:23:20,640
फिर बाबा जी को बतानी होगी विद प्रूफ जो वो बता नहीं पाएंगे

330
00:23:20,640 --> 00:23:24,720
वो अपने जीवन भर की पाइप बांट दें खीर बांट

331
00:23:24,720 --> 00:23:28,800
दें किडनी बेच के बांट दे गुर्दा बेच के बांट दें जो भी कर ले

332
00:23:28,800 --> 00:23:34,800
मगर वो बता नहीं पाएंगे आगे आ जाइए पृष्ठ संख्या 108

333
00:23:35,040 --> 00:23:39,360
फिर इसने पांच [गला साफ़ करने की आवाज़] तीन में सन्यास का समर्थन किया। देखिए

334
00:23:39,360 --> 00:23:43,840
पांच तीन में सन्यास का समर्थन कैसे किया है।

335
00:23:43,840 --> 00:23:46,000
अह

336
00:23:46,000 --> 00:23:46,500
पांच

337
00:23:46,480 --> 00:23:50,560
तीन में इसने सभी का समर्थन कर दिया। सन्यास का भी, जंगल में रहने वाले का भी,

338
00:23:50,560 --> 00:23:54,640
विरक्त का भी, गृहस्थ का भी सबका समर्थन कर दिया। जबकि एक तरफ कहता है

339
00:23:54,640 --> 00:23:58,800
कि जंगल में रह के साधना करना ये शास्त्र विरुद्ध है। त्याग कर साधना

340
00:23:58,800 --> 00:24:02,880
करना। जबकि मार्कंडेय वाले में कहता है कि भाई रुचि जी सही कर रहे

341
00:24:02,880 --> 00:24:06,880
थे रुचि ऋषि। यह कहना क्या चाहता है? यह सोचने में ही आप

342
00:24:06,880 --> 00:24:11,040
पागल हो जाओगे। तो 108 पर पृष्ठ संख्या

343
00:24:11,040 --> 00:24:15,200
और सबसे नीचे से सेकंड पैरा सेकंड लास्ट पैराग्राफ यह भावार्थ

344
00:24:15,200 --> 00:24:19,360
कर रहा है अध्याय पांच श्लोक तीन में शास्त्र विधि अनुसार साधना

345
00:24:19,360 --> 00:24:23,440
करने वाले कर्म योगी का विवरण है। ये अब ध्यान से सुनिएगा यहां पर ये

346
00:24:23,440 --> 00:24:27,520
बात क्योंकि बहुत दिमाग लगाना पड़ेगा क्योंकि इसने इतने झूठ बोले

347
00:24:27,520 --> 00:24:31,520
हैं ना उन झूठों को समझने में भी उन असत्य भाषणों को

348
00:24:31,520 --> 00:24:35,680
समझने के लिए भी बहुत आपको ब्रेन चाहिए। ये सामर्थ्यवान जो उनको

349
00:24:35,680 --> 00:24:39,760
धारण कर पाए क्योंकि इसने इतने झूठ बोले हैं कि आप यह नहीं समझ

350
00:24:39,760 --> 00:24:43,760
पाओगे कौन सी जगह से झूठ को पिक करना है। तो इस अब

351
00:24:43,760 --> 00:24:48,160
ये क्या कह रहा है 5 तीन में शास्त्र विधि अनुसार साधना

352
00:24:48,160 --> 00:24:52,400
करने वाले कर्म योगी का विवरण है। जो श्रद्धालु भक्त

353
00:24:52,400 --> 00:24:56,800
चाहे बाल बच्चों सहित या रहित यानी गस्त

354
00:24:56,800 --> 00:25:01,840
या विरक्त या किसी आश्रम में रहकर

355
00:25:01,840 --> 00:25:02,400
सतगुरु

356
00:25:02,400 --> 00:25:06,480
व संगत की सेवा में रहत है। सर्वथा सर्वथा राग द्वेष

357
00:25:06,480 --> 00:25:10,560
रहित होता है। वास्तव में वही सन्यासी है। यह लिख दिया।

358
00:25:10,560 --> 00:25:14,800
यानी कि इसने गृहस्थ वाला विरक्त वाला दोनों को इसने अब यहां मान लिया।

359
00:25:14,800 --> 00:25:18,960
दोनों ठीक है। एक तरफ गलत कहता है। एक तरफ सही कहता है। आगे पांच

360
00:25:18,960 --> 00:25:23,280
श्लोक चार में कहता है ज्ञान योगी व गृहस्ती। यहां पे ज्ञान योगी यानी ईशांख

361
00:25:23,280 --> 00:25:27,280
योगी यानी वो बात हो रही है सन्यास और वो कर्म योगी की अपनी

362
00:25:27,280 --> 00:25:31,280
गीता के अनुसार। तो अब यह कह रहा है पांच श्लोक चार में

363
00:25:31,280 --> 00:25:35,520
ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई गई है। यह

364
00:25:35,520 --> 00:25:39,840
रामपाल खुद कह रहा है श्लोक पांच चार की व्याख्या करते समय

365
00:25:39,840 --> 00:25:44,080
कि गीता में ज्ञान योगी यानी कि कर्म

366
00:25:44,080 --> 00:25:48,320
सन्यास वाले की और कर्म योगी यानी गृहस्थ की एक ही उपलब्धि

367
00:25:48,320 --> 00:25:52,480
बताई है गीता में। रामपाल के अनुसार इसको नोट कर लो आप। अभी आगे

368
00:25:52,480 --> 00:25:56,480
मजा आएगा। फिर यदि कोई कहता है कि ज्ञान योगी

369
00:25:56,480 --> 00:26:00,720
श्रेष्ठ या गस्थ श्रेष्ठ है तो वह पंडित नहीं है। अब यहां पर देखो इसको चयन

370
00:26:00,720 --> 00:26:04,800
नहीं पड़ रहा है। इसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि ज्ञान योगी शास्त्र विरुद्ध है

371
00:26:04,800 --> 00:26:08,960
या गृहस्ती शास्त्र विरुद्ध है। यानी कि इसमें ऐसा कहीं नहीं लिखा

372
00:26:08,960 --> 00:26:13,120
कि ज्ञान योगी जो होता है यह ज्ञान योगी जो होता है वो

373
00:26:13,120 --> 00:26:17,280
शास्त्रों के विरुद्ध साधना करने वाला होता है। यह नहीं लिखा गीता में। मगर

374
00:26:17,280 --> 00:26:17,780
इसने

375
00:26:17,600 --> 00:26:21,600
दोनों को ही बेकार कह दिया। ना ही इसमें यह लिखा है कि गस्ती जो होता

376
00:26:21,600 --> 00:26:25,600
है वह शास्त्र विरुद्ध साधना करने वाला होता है। मगर इसने गस्त को भी अमान्य कर दिया।

377
00:26:25,600 --> 00:26:29,680
फिर खुद कहता है कि यदि भक्ति शास्त्र विधि अनुकूल नहीं

378
00:26:29,680 --> 00:26:34,000
है तो वह चाहे गस्ती हो या ज्ञानी हो दोनों ही असफल है। यानी कि अगर शास्त्र

379
00:26:34,000 --> 00:26:38,000
के अनुसार होगी तो चाहे

380
00:26:38,000 --> 00:26:42,240
वो गस्ती हो और चाहे वो विरक्ति हो दोनों ही फिर

381
00:26:42,240 --> 00:26:46,240
सही हो जाएंगे। तो भाई इसमें मना कौन कर रहा है कि यहां उन

382
00:26:46,240 --> 00:26:50,480
गस्तों की बात हो रही है जो शास्त्र विधि विरुद्ध है। मगर इसको तो अपना पेच लड़ाते चलना

383
00:26:50,480 --> 00:26:56,480
है। अच्छा फिर से आगे जाकर के कह रहा है कि

384
00:26:57,760 --> 00:27:01,840
अब देखिए पहले इसने माना कि दोनों की एक ही उपलब्धि बताई है।

385
00:27:01,840 --> 00:27:06,160
ठीक है? फिर आगे आगे बता रहा है इसी

386
00:27:06,160 --> 00:27:10,400
श्लोक में पांच चार में ही यह कह रहा है कि पांच श्लोक

387
00:27:10,400 --> 00:27:14,480
चार में दोनों की उपलब्धि एक बताइए। फिर आगे कह रहा है स्वयं

388
00:27:14,480 --> 00:27:18,800
भगवान कह रहे हैं कि शास्त्र विधि रहित साधना

389
00:27:18,800 --> 00:27:22,800
कर्म सन्यासियों से कर्म योगी उत्पन्न है। अब यहां पर

390
00:27:22,800 --> 00:27:27,680
दोनों की उपलब्धि अलग-अलग मान रहा है।कि कर्म सन्यास

391
00:27:27,680 --> 00:27:31,760
कर्म सन्यास में त्याग का अभिमान होना स्वाभाविक है। इसका कोई प्रमाण नहीं है। कर्म

392
00:27:31,760 --> 00:27:36,160
सन्यास में त्याग का अभिमान होता है। कोई सन्यास नहीं। कोई प्रमाण नहीं है।

393
00:27:36,160 --> 00:27:40,240
ठीक है? अध्याय पांच के श्लोक पांच में कहा है कि ज्ञान योगी तथा कर्म योगी एक ही

394
00:27:40,240 --> 00:27:44,240
स्थान प्राप्त करते हैं। यह इसने माना है अध्याय

395
00:27:44,240 --> 00:27:48,480
पांच के श्लोक चार और पांच में इसने यह माना है कि कर्म

396
00:27:48,480 --> 00:27:52,880
योगी और ज्ञान योगी यानी कि कर्म सन्यासी एक ही स्थान

397
00:27:52,880 --> 00:27:57,440
प्राप्त करते हैं। जिनकी साधना यदि शास्त्रानुकूल

398
00:27:57,440 --> 00:28:01,760
है और जो कोई ऐसा जानता है उसे ही ज्ञान कहते हैं। उसे ही ज्ञान।

399
00:28:01,760 --> 00:28:05,760
ठीक? अब इसने आगे क्या कहा है? इसी बात के

400
00:28:05,760 --> 00:28:11,200
बारे में अगले प्रश्न पर आइए आप 109

401
00:28:11,200 --> 00:28:14,880
109 में नीचे आ जाइए विशेष

402
00:28:14,880 --> 00:28:18,960
अब ये विशेष में क्या कह रहा है विशेष में ये कह

403
00:28:18,960 --> 00:28:23,440
रहा है कि गीता जी के अन्य अनुवादकर्ताओं ने जो गीता

404
00:28:23,440 --> 00:28:27,600
अध्याय पांच श्लोक चार में लिखा है कि सन्यास और कर्म

405
00:28:27,600 --> 00:28:31,840
योग द्वारा एक ही फल मिलता है। ठीक है? यह

406
00:28:31,840 --> 00:28:35,840
गलत अनुवाद है क्योंकि अध्याय पांच श्लोक छ के आधार से गलत

407
00:28:35,840 --> 00:28:40,080
सिद्ध होता है। भाई तूने ही तो अनुवाद

408
00:28:40,080 --> 00:28:44,880
किया है। दोनों की उपलब्धि एक है। हालांकि वही अनुवाद सही है।

409
00:28:44,880 --> 00:28:49,440
अनुवाद से अनुवाद क्यों काट रहा है भाई तू? दोनों की उपलब्धि

410
00:28:49,440 --> 00:28:53,520
एक है। तूने उसमें बड़ा छोटा किया है। दोनों से एक ही दोनों को एक ही उपलब्धि

411
00:28:53,520 --> 00:28:57,600
पे ले जाने वाला बताया गया है। ठीक है? गीता के अनुसार। अगर तूने खुद

412
00:28:57,600 --> 00:29:02,000
अभी कहा कि ये पांच श्लोक चार में

413
00:29:02,000 --> 00:29:06,080
ज्ञान योगी व गृहस्ती दोनों की एक ही उपलब्धि बताई गई है। फिर इसी प्रश्न में

414
00:29:06,080 --> 00:29:10,560
ऊपर कहा है 109 में ऊपर दिखाइए। देखिए इसके पंचर

415
00:29:10,560 --> 00:29:14,880
दिमाग को पंक्चर कर देने वाला ज्ञान सबसे पहला पैराग्राफ

416
00:29:14,880 --> 00:29:19,360
उसकी लास्ट की दो लाइनें

417
00:29:19,360 --> 00:29:23,440
अध्याय पांच। यह अध्याय पांच लिखा है। सेकंड लाइन उसको

418
00:29:23,440 --> 00:29:27,520
अंडरलाइन करिए जरा। यह तू अनुवाद कर

419
00:29:27,520 --> 00:29:31,600
रहा है फड़ कहीं के। यह देख यह रामपाल

420
00:29:31,600 --> 00:29:36,000
ने अनुवाद क्या किया है? अध्याय पांच के श्लोक

421
00:29:36,000 --> 00:29:40,160
पांच में कहा है कि ज्ञान योगी तथा कर्म योगी एक ही

422
00:29:40,160 --> 00:29:44,160
स्थान प्राप्त करते हैं। यह कहा है। यह माना है रामपाल ने।

423
00:29:44,160 --> 00:29:50,160
अब नीचे विशेष में यह क्या कह रहा है?

424
00:29:50,800 --> 00:29:55,440
ही स्थान प्राप्त नहीं करते।

425
00:29:55,440 --> 00:29:59,760
ठीक है? अध्याय पांच के श्लोक चार और पांच

426
00:29:59,760 --> 00:30:04,080
दोनों में रामपाल ने माना कि दोनों कर्म योगी और कर्म सन्यासी

427
00:30:04,080 --> 00:30:08,080
एक ही स्थान पे आप प्राप्त करते हैं या ज्ञान योगी और गृहस्थ दोनों एक ही स्थान प्राप्त

428
00:30:08,080 --> 00:30:12,480
करते हैं। यह मान लिया रामपाल ने। फिर खुद रामपाल ही कह रहा है

429
00:30:12,480 --> 00:30:16,480
कि गीता के जो अनुवादक हैं अन्य उन्होंने गलत किया है क्योंकि दोनों

430
00:30:16,480 --> 00:30:20,560
एक ही स्थान प्राप्त नहीं करते। सन्यास मार्ग तो शास्त्र विरुद्ध

431
00:30:20,560 --> 00:30:24,720
है। अब यहां सन्यास मार्ग शास्त्र विरुद्ध हो गया। यानी रुचि

432
00:30:24,720 --> 00:30:30,320
ऋषि वहां पर पितरों की बात ना मान के सही कर रहे थे। ठोको ताली।

433
00:30:30,320 --> 00:30:34,720
ठोको ताली। आवाज नहीं आ रही तालियों की।

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00:30:34,720 --> 00:30:38,960
तो भाई यह इसका सब पंचर कर देने वाला दिमाग वह है।

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00:30:38,960 --> 00:30:44,960
इसमें जाते-ते कुछ तर्क और दे दूं मैं कि यदि

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00:30:46,160 --> 00:30:50,640
आप किसी के अनुवाद पर निर्भर हैं तो आपको बाद वाला अनुवाद

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00:30:50,640 --> 00:30:54,720
कुछ और लग रहा है। यह वाला कुछ आपने यह निर्णय कैसे लिया कि बाद वाले

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00:30:54,720 --> 00:30:58,800
के अनुसार इसको बदलना है। यह यह क्यों नहीं हो सकता कि इसके अनुसार बाद

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00:30:58,800 --> 00:31:02,800
वाले को समझे? यह निर्णय कैसे होगा? इसीलिए कहा है ना

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00:31:02,800 --> 00:31:06,960
अर्ध कुकुट नय नहीं कर सकते। सभी शति स्मृति शास्त्रों

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00:31:06,960 --> 00:31:11,200
में सामंजस्य की शिक्षा साधु सम्मत धर्म है। एक भी श्लोक

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00:31:11,200 --> 00:31:17,040
को काट नहीं सकते। श्लोक को काटोगे तो उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न आ जाएगा।

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00:31:17,040 --> 00:31:21,120
सब कौन समझाया इन भुओं को? इनको समझाते समझाते मेरे सर में दर्द हो जाता

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00:31:21,120 --> 00:31:27,120
है।

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00:31:29,040 --> 00:31:33,360
तो ये आज का रुचि ऋषि वाला हो गया। राघव ने जो चैलेंज

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00:31:33,360 --> 00:31:37,520
के बारे में बेवकूफ बनाया गवर्नरों को वो हो गया। और

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00:31:37,520 --> 00:31:41,760
जो जिन बातों को लेकर के हम लड़ रहे हैं इस तंत्र

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00:31:41,760 --> 00:31:45,760
से अपराधिक तंत्र से उन चीजों

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00:31:45,760 --> 00:31:49,840
को डिफेंड करने के लिए जो उसने अपने गवर्नरों को मूर्ख बनाने के लिए उल्टे

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00:31:49,840 --> 00:31:53,920
सीधे प्रमाण प्रस्तुत करें उसका निराकरण हो गया। साथ

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00:31:53,920 --> 00:31:58,000
ही साथ जो पिछले सप्ताह हमने एपिसोड जो नाइन

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00:31:58,000 --> 00:32:02,080
है इस श्रृंखला का उसमें जो अध्ययन किया था उसके बुलेट पॉइंट्स आज

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00:32:02,080 --> 00:32:06,080
मैंने आपको यहां सुना दिए। तो एक पुतला दहन कार्यक्रम वो आप सबको पता चल

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00:32:06,080 --> 00:32:11,040
गया। एक बात फिर से बोल दूं रामपाल को नहीं

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00:32:11,040 --> 00:32:15,440
रामपालियों को पकड़ो। यह मन में डाल लो आप।

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00:32:15,440 --> 00:32:19,680
इस तंत्र को नष्ट करना है हिंदू विरोधी तंत्र को

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00:32:19,680 --> 00:32:23,760
तो रामपाल को नहीं रामपालियों को पकड़ो। अपने

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00:32:23,760 --> 00:32:27,840
घर के आसपास रहने वाले रामपालियों का टोटल

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00:32:27,840 --> 00:32:31,920
बहिष्कार करो। टोटल बॉयकॉट रामपाल बॉयकॉट

460
00:32:31,920 --> 00:32:36,160
मूवमेंट उसको समर्थन देने वाला व्यक्ति जहां

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00:32:36,160 --> 00:32:40,320
भी किसी आप जैसे किसी धर्मनिष्ठ व्यक्ति के पास रह

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00:32:40,320 --> 00:32:44,080
रहा है उसके घर के पास जाकर के आप विरोध

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00:32:44,080 --> 00:32:48,320
प्रदर्शन करिए उसके बारे में वहां के समाज को बताइए वहां के समाज

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00:32:48,320 --> 00:32:52,640
को अपील करिए उसका बहिष्कार करने की क्रांति आएगी

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00:32:52,640 --> 00:32:56,640
आप ला सकते हो उसके घर के आसपास आपको

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00:32:56,640 --> 00:33:01,040
केवल यह जानकारी वाले पर्चे चिपकाने हैं कि रामपाल

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00:33:01,040 --> 00:33:05,120
कौन है? वह क्या कर रहा है? और यह व्यक्ति उससे जुड़ा है। और

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00:33:05,120 --> 00:33:09,360
इस प्रकार इस व्यक्ति से जुड़ने वाला व्यक्ति कौन सिद्ध होगा? यह आपको

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00:33:09,360 --> 00:33:13,440
केवल बताना है। अपने घर के आसपास दुर्गा मां को

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00:33:13,440 --> 00:33:18,240
गाली देने वाले का समर्थन करने वाला चैन से नहीं रहना चाहिए।

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00:33:18,240 --> 00:33:22,560
उसको रात में चैन से नींद नहीं आनी चाहिए। और उसके

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00:33:22,560 --> 00:33:26,560
लिए लाठी भाले की नोक पर नहीं गोली

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00:33:26,560 --> 00:33:30,560
बारूद के नोक पर नहीं केवल संविधान की सीमा में रहते

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00:33:30,560 --> 00:33:34,640
हुए आपको अपनी बात को रखना है। ध्यान रखिए

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00:33:34,640 --> 00:33:39,280
आपके घर के पास आपके गली मोहल्ले में आपकी जानकारी में

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00:33:39,280 --> 00:33:43,600
दुर्गा मां को गाली देने वाले का समर्थक चैन से नहीं रहना

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00:33:43,600 --> 00:33:47,840
चाहिए। अभी से प्रण ले लो सारे के सारे

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00:33:47,840 --> 00:33:52,880
और यह टॉपअप है सोने पर सुहागा। यदि वहां के दल

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00:33:52,880 --> 00:33:56,880
इत्यादि आपके साथ हो जाते हैं तो आप एक अच्छा सा प्रदर्शन

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करिए और इसका पुतला अच्छा मत

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बनाना। ऐसा ही सड़ा हुआ सा बनाना। पुतला बहुत सुंदर मत बना

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देना। तो ऐसे ही पुतला बनाइए और उसको जो है

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00:34:08,080 --> 00:34:12,240
जलाइए। अपना विरोध दिखाइए। अपना रोष प्रकट करिए।

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00:34:12,240 --> 00:34:16,240
ठीक है?
