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00:00:01:28 [संगीत] दूसरा दशक पहला समास मूर्ख लक्षण हे एकदंत त्रिनयन गजानन आपको नमस्कार है। आप भक्तों को कृपा की दृष्टि से देखें। हे वेद माता और ब्रह्मसुता शारदा आपको भी नमस्कार करता हूं। आप कृपा कर मेरे हृदय में स्फूर्ति रूप में निवास कीजिए। अब सद्गुरु चरणों की वंदना तथा रघुनाथ का स्मरण करके मूर्ख के लक्षण इसलिए बतलाता हूं जिसमें लोग उनका त्याग करें। इसको निषेध मुख भी कहते हैं। निषेध मुख से शिक्षा ग्रहण करना। मूर्ख दो प्रकार के होते हैं। एक साधारण और दूसरा पढ़ा लिखा। दोनों के लक्षण विचित्र हैं। श्रोताओं को वे लक्षण भलीभांति समझ लेने चाहिए। पढ़े लिखे मूर्खों के लक्षण अगले समास में बदलाए गए हैं। विचक्षण श्रोता सावधान होकर सुने। लक्षण तो अपार हैं पर उनमें से कुछ लक्षण तत्पर होकर सुनिए। पहले उनके लक्षण सुनिए जो प्रपंची हैं जिन्हें आत्मज्ञान नहीं है जो केवल अज्ञानी है। एक मूर्ख वह होता है जो उन्हीं से विरोध करता
00:01:17:03 है जिनके उदर से जन्म लेता है और पत्नी को ही मित्र मानता हो। एक मूर्ख वह होता है जो अपने सारे गोत्र को छोड़कर केवल स्त्री के अधीन होकर रहता हो और उसे मन की गुप्त बात बतलाता हो। एक मूर्ख वह है जो पराई स्त्री से प्रेम करता हो या ससुर के घर में रहता हो। या बिना कुल देखे किसी कन्या से विवाह करता हो। एक मूर्ख वह है जो समर्थ के सामने अभिमान करता हो। अपने आप को उसके बराबर समझता हो। और बिना शक्ति रहते हुए अधिकार जतलाता हो। एक मूर्ख वह है जो आप ही प्रशंसा करता हो। स्वदेश में रहकर विपत्ति भोगता हो या अपने बड़ों की कीर्ति बखानता हो। एक मूर्ख वह है जो अकारण हंसता हो। अच्छी बात बतलाने पर ना समझता हो। और बहुतों का बैरी हो। एक मूर्ख वह है जो अपने आदमियों से दूर रहता हो और पराए आदमियों से मित्रता करता हो या रात के समय दूसरों की निंदा करता हो। एक मूर्ख वह है जो बहुतों के जागते रहने पर भी उनके बीच में सोता हो और दूसरे के घर जाकर बहुत खाता हो। एक मूर्ख वह है
00:02:32:07 जो अपने मान या अपमान की बातें स्वयं सबसे कहता फिरता हो अथवा जिसके जिसके मन में सात प्रकार के व्यसन ड्यूट वैश्या गमन, चोरी, चुगली, परस्त्री गमन, लघु पक्षी क्रीडा और किन्नरी गायन। भगवत कृपा से मेरी जानकारी में तो यह सारे लक्षण ये जो अभी-अभी बोले हैं वो मुझे लगता है कि नहीं होंगे। हम सभी जो यहां पे उपस्थित हैं। रहते हो। एक मूर्ख वह है जो स्वयं प्रयत्न करना छोड़ दे और निश्चित निश्चिंत होकर दूसरों के भरोसे बैठा रहे अथवा अल्हा दीपन में ही संतुष्ट रहे। एक मूर्ख वह है जो घर में तो बहुत सी बातें सोचता हो पर सभा में जा बोलने में लजाता हो। एक मूर्ख वह है जो अपने से श्रेष्ठ लोगों के साथ मित्रता या बराबरी का संबंध स्थापित करता हो अथवा दिया हुआ उपदेश ना सुनता हो। एक मूर्ख वह है यहां पर किसी की याद आ रही है। मुझे अपने से श्रेष्ठ लोगों के साथ मित्रता या बराबरी का संबंध और दिया हुआ उपदेश ना सुनता हो।
00:03:46:12 जो एक मूर्ख वह है जो उपदेश देता हो। जो ऐसे लोगों को उपदेश देता हो जो उसकी बात ही ना सुनते हो। जो बड़ों के सामने अपना ज्ञान छांटता हो या श्रेष्ठ लोगों को धोखे में डालता हो। एक मूर्ख वह है जो विषय वासना में निर्लज्ज हो गया हो अथवा मर्यादा का उल्लंघन करके सब काम करता हो। एक मूर्ख वह है जो रोगी होने पर भी औषधि का सेवन ना करता हो। कभी पथ्य का संयम ना करता हो और सहज में मिलने वाले अच्छे पदार्थ को ग्रहण ना करता हो। एक मूर्ख वह है जो
00:04:27:08 बिना किसी संगी साथी के अकेला विदेश जाता हो। ये बिना समझे मूझे समझे बूझे अनजान आदमी के साथ हो लेता हो या बड़ी हुई नदी में कूद पड़ता हो। एक मूर्ख वह है जो ऐसी जगह बहुत अधिक आता जाता हो जहां उसका बहुत मान हो गया हो या जो अपने मान अपमान का ध्यान ना रखता हो। एक मूर्ख वह है जो अपने धनवान सेवक के आश्रम में जाकर रहता हो और सदा दुखी रहता हो। एक मूर्ख वह है जो कारण आदि का विचार ना करके बिना अपराध के ही दंड देता हो या जरा सी बात में कंजूसी करता हो। एक मूर्ख वह है जो देवताओं और पितरों को ना मानता हो। शक्ति ना होते हुए भी बहुत बढ़चढ़कर बातें करता हो और बहुत बकवाद करता हो। एक मूर्ख वह है जो घर के लोगों को तो खाने दौड़ता हो परंतु बाहर बिल्कुल सीधा सादा और बेचारा बना रहता हो। ऐसे तो कई होंगे यहां पर घर में एकदम
00:05:37:18 बिल्कुल किंग ऑफ द रिंग और बाहर सबके लिए मृदभाष। हां? ऐसे ज्यादातर लोग करते हैं। एक मूर्ख वह है जो नीच जाति के लोगों की संगत करता हो। पराई स्त्री के साथ एकांत में बातें करता हो या रास्ता चलते-चलते खाता हो। एक मूर्ख वह है जो परोपकार ना करता हो। दूसरे के उपकार का बदला अपकार से देता हो और जो काम करता हो पर बातें बहुत बगारता हो। काम करता हो पर बातें बहुत बगारता हो। यहां पर एक बात क्लियर करता चलूं। नीच जाति के लोगों की संगत करता हो। तो यह नीच जाति के लोगों की संगत विपरीतार्थक गुण दोष वाली। जो कुल परंपरा है उसकी संगत करने से संगत का अर्थ? कि रहन सहन आचार विचार का जहां पर लेनदेन हो रहा है तो वहां पर बहुत ज्यादा संभावना होती है कि वह जो विपरीतार्थक गुण दोष हैं वो आपके कुल परंपरा को विकृत कर करेंगे। आपके यहां के गुण दोष उसको और उसके
00:06:52:24 यहां के गुण दोष आपको तो जो शुद्ध परंपरा है उसमें विकृति आ सकती है। तो जो संगत है वो अपने समान जो अपनी कुल परंपरा है जो अपने गुण दोष वाले लोग हैं उन्हीं के साथ में संगत रखने से कम से कम विकृति उत्पन्न होती है। ठीक है? तो यहां पर वह वाला है द्वेष मूलक नहीं है। व्यवस्था मूलक बात है। जैसे कि ऑपरेशन थिएटर का कई बार मैंने उदाहरण दिया है कि ऑपरेशन थिएटर के अनुकूल डॉक्टर और डॉक्टर के जो
00:07:31:18 परिकर होते हैं उनको माना जाता है तो उनको प्रवेश का प्रवेश की आज्ञा होती है। परंतु वहीं पर जिनके बारे में हमें बोध नहीं है भले ही अंदर जो मर्जी मरीज है जिसकी वहां चिकित्सा हो रही है जिसका ऑपरेशन हो रहा है उसके घर वाले भी माना जाता है कि वह वहां के वातावरण के प्रतिकूल है। इस कारण से उनका प्रवेश निषेध होता है और विशेष स्थितियों में ही उनको अंदर जाने की अनुमति प्राप्त हो पाती है। तो इसी प्रकार से एक मूर्ख वह जो
00:08:11:25 क्रोधी पेटु या आलसी हो, मलन और कुटिल हो या मान आदि कुछ भी ना होने पर झूठा अभिमान करता हो। एक मूर्ख वह है जो क्षद्र झूठा, कपटी, बकवादी, कुकर्मी और उद्वत, उद्धत हो। या बहुत अधिक सोता हो। एक मूर्ख वह है जो ऊंचे स्थान पर चढ़कर कपड़े पहनता हो। बाहर चौरास्ते पर जाकर बैठता हो और सदा नंगा ही दिखाई पड़ता हो। एक मूर्ख वह है जो वैदति वैदति और व्यतिपात आदि बुरे मुहूर्तों में यात्रा करता हो और अपशगुणों से अपना घात करता हो। एक मूर्ख वह है जो क्रोध अपमान या कुबुद्धि के कारण स्वयं अपनी हत्या करता हो और जिसके दृढ़ बुद्धि ना हो। एक मूर्ख वह है जो अपने प्रिय लोगों को दुखी करता हो। सुखी करने वाला शब्द भी मुंह से ना निकालता हो और नीचों की बढ़ाई या वंदना करता हो। एक मूर्ख वह है जो अपनी रक्षा का तो बहुत यत्न करता हो पर अपने शरणागतों की ओर कुछ भी ध्यान ना देता हो अथवा लक्ष्मी का बहुत अधिक भरोसा करता हो। एक मूर्ख वह है जो स्त्री और पुत्र को ही सब कुछ मान बैठा हो और ईश्वर को भूल गया हो। एक मूर्ख वह है जो यह नहीं जानता है कि जैसा
00:09:27:01 करता है वैसा ही जो जैसा करता है वैसा ही भरता है। एक मूर्ख वह है जो यह समझता हो कि स्त्रियों को पुरुषों से अटगुनी काम वासना होती है इसलिए जिसके अनेक विवाह किए हो। जिसने अनेक विवाह किए हो। यहां पर अभी एक बात आई है कि एक जो जैसा करता है वैसा ही भरता है जो यह ना जाने यहां पर आप देखो समाज में कई ऐसी लोकोक्तियां मुहावरे और अ सिद्धांत लोकाचार में प्रासंगिक है प्रसिद्ध है जो हमें यदा कदा यहां वहां एन केन प्रकारन सुनाई देते ही रहते हैं और जितने भी ऐसे सिद्धांत है जिनका खंडन नहीं किया जा सकता है। उन सारे सिद्धांतों का जो मूल रूप है वह आपको कहीं ना कहीं हमारे सनातन धर्म ग्रंथों में मिल जाएगा। इसमें से ऐसा ही एक सिद्धांत है जो समाज में प्रचलित है। जैसी करनी वैसी भरनी। टिट फॉर टैट। तो टिथ फॉर टैट जो है हमारे सनातन शास्त्रों में कहां वर्णित है? कहां से निकल के आ रहा है?
00:10:42:24 महाभारत में सीधा सीधा बताया गया है कि जो व्यवहार अपने साथ स्वीकार ना हो वही व्यवहार दूसरे के साथ ना करना धर्म है। है ना? क्योंकि जो आप समाज को दे रहे हो वही आपको वापस प्राप्त होना है। तो इसलिए आप अगर ये चाहते हो कि मुझे दर्द ना मिले तो दर्द दो भी मत। तो यह उसका मूल प्राप्त हुआ ना जैसी करनी वैसी भरनी का टिट फॉर टेट का तो इस तरीके से आप देखिए जो समाज के लिए उपयोगी सिद्धांत हैं जो नियम है वो सारे हमें हमारे सनातन शास्त्रों से प्राप्त हो जाते हैं। हमें कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं होती। जैसे मैंने अपनी कुछ रील्स में भी बताया है ऐसे सिद्धांतों के बारे में जो छुपे तौर पर हमारे यहां पर पहले से ही वर्णित जैसे खाली दिमाग शैतान का घर ऐसा प्रचलित है ना यह लोग उत्तम मुहावरा खाली दिमाग शैतान का घर ये भगवत गीता में आप देख लीजिए इसका मूल आपको मिल जाएगा भगवत गीता में लिखा हुआ है कि मनुष्य
00:11:58:16 एक क्षण भी बिना कोई कर्म किए नहीं रह सकता तो ऐसे में यदि तुम शास्त्र सम्मत कर्मों को करने में बुद्धि नहीं लगाओगे तो क्योंकि तुम कुछ ना कुछ करोगे तो तुम्हारे द्वारा अशास्त्रीय चीजें होंगी यानी कि धर्म विरुद्ध चीजें तो क्या हो गया जब तुमने कुछ नहीं कर किया तो तुमसे क्या हुआ अधर्म हुआ तो खाली दिमाग शैतान का घर हो तो इसलिए आपको अपनी बुद्धि को शास्त्र सम्मत सिद्धांतों के पालन में लगाते रहना चाहिए क्योंकि यदि आप नहीं लगाएंगे तो आप कहीं ना कहीं तो लगाएंगे वही है खाली दिमाग शैतान देगा तो जब आप खाली होंगे तो आपसे शैतानी हो जाएगी तो ये मूल मिल गया तो इस तरह से संसार भर में परंपरा सारी दुनिया परंपरा पूछती है सर्टिफिकेट क्या है कहां से पढ़ाई की है तुम्हारी क्या क्वालिफिकेशन है यहां क्या पूछा जा रहा है मूल में क्या है परंपरा वो परंपरा ना कुरान में है ना बाइबल में है वो परंपरा हमारे यहां मुंडकोपनिषद निरुक्त में है शिव पुराण में है, महाभारत में है, परंपरा भरी पड़ी,
00:13:13:27 गीता में है, एवं परंपरा प्राप्तिम। तो संसार में जितनी भी उपयोगी चीजें हैं वो का मूल हमारे सनातन धर्म शास्त्रों में प्राप्त है। हमें। इसीलिए यह कहा जाता है कि जहां गुरुदेव एक बात कहते हैं कि दुनिया में जहां भी कहीं जरा सी भी चमक है तो उसके कारण है वेद। अब कुछ लोग कहते हैं कि भाई जैसे हम पूछते हैं कि भाई अगर तुम आस्तिक नहीं हो तो फिर तुम्हारे यहां पर यह जो मर्यादा है इसका आधार क्या है? नास्तिक लोग यह प्रश्न करते हैं कि भाई जिनके यहां पर वेद नहीं पढ़े जा रहे हैं तो उनके यहां पर माता को माता नहीं माना जाता है क्या? तो भाई जो सीधे तौर पर थॉमस अलवा एडिसन को नहीं जानता है उससे उसके बारे में कभी उसने सुना तक नहीं है तो क्या उसके घर में रोशनी बिना थॉमस अलवा एडिसन के दिए हुए बल्ब के हो जा रही है
00:14:11:15 उसके घर में जो बल्ब जल रहा है वो उसकी जानकारी में नहीं है कि वो बल्ब मुझे मेरे पास थॉमस अलवा एडिसन से ही आया है। इसी प्रकार से जो व्यक्ति जितने अंश में भी मानवता का प्रतिपादन कर रहा है, मानवता का अनुकरण अनुसरण कर रहा है, वो व्यक्ति उतने अंश में उसकी जानकारी के बाहर वेदों का ही पालन कर रहा है। वैदिक धर्म का ही पालन अनुसरण कर रहा है। ठीक है? ये मानना पड़ेगा। दुनिया में कहीं भी कोई भी जरा सी भी चमक है उसका आधार क्या है? वेद। वेद के बाहर कुछ है ही नहीं। तो जो कुछ भी बना है वेदों से मिलती जुलती चीजों के रूप में बना है बस क्योंकि उसमें अपना चीजें भी घुसेनी थी तो वेदों की चीज को कॉपी कर करके जरूरी चीजें लेते हुए अपने मन मुताबिक उसमें चीजें भरभर के नईनई थ्योरीज खड़ी कर दी गई। कारण कि जो मानवीय मानवोचित मर्यादा थी उसका उल्लंघन करना था। किसी को ज्यादा विवाह करने थे। किसी को अपने अनियंत्रित रूप से कुछ खाना पीना था। यह सारे कारण है दुनिया में। किसी को धर्म के नाम पर जो है धंधा चलाना था।
00:15:27:08 बैठ के खाना पीना था। इस कारण से वो जो वैदिक मर्यादा है उसका उल्लंघन करने के लिए वेदों की ही जो चीजें हैं उनको थोड़ा बहुत लेके उसमें फिर अपना ठप्पा लगा के अपना मैसेंजर बना के अपना प्रॉफिट बना करके और हो गया। चालू हो गया नया। मगर जब ऐसा करते हैं जब वेद की सीमा के बाहर जाते हैं तो वहां पर वह तीन चीजें वो सनातन सिद्धांत तो प्राप्त हो नहीं पाते और जब नहीं हो पाते हैं तो कोई एक चला आता है पूछने के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म वहीं पे फेल हो जाता है। जो परंपरा का जो शब्द है जो हमारा तीसरा सिद्धांत है ना शाश्वत धर्म यानी वैदिक धर्म जब हम किसी से परंपरा पूछते हैं तो उसमें वही सवाल है कि आपका धर्म जो है वो शाश्वत है जो नियम सिद्धांत आप अभी दे रहे हैं ये पहले भी थे ये कैसे सिद्ध होता है अगर परंपरा सिद्ध कर पाए वेदों से अपनी तो सिद्ध होगा नहीं सिद्ध कर पाए तो सिद्ध ही नहीं होगा आपका स्वकल्पित सिद्ध होगा यह बात ठीक है।
00:16:43:08 एक मूर्ख वह है जो दुर्जनों के कहने पर मर्यादा का उल्लंघन करता हो और जो किसी होती हुई बात को देखकर भी उस पर ध्यान ना देता हो। एक मूर्ख वह है जो माता-पिता, ब्राह्मण, स्वामी, देवता, गुरु आदि का द्रोही हो। गुरु का द्रोही कौन है? मूर्ख। एक मूर्ख वह है जो दूसरों को दुखी देखकर सुखी होता हो। दूसरों को सुखी देखकर दुखी होता हो या गई हुई वस्तु के लिए शोक करता हो। एक मूर्ख वह है जो बिना बोलाए बोलता हो। बिना पूछे साक्षी देता हो। निंदनीय वस्तु ग्रहण करता हो। एक मूर्ख वह है जो दूसरों का अपमान करने वाली बातें करता हो। ठीक रास्ता बे रास्ते चलता हो अथवा कुकर्मी लोगों के साथ में मित्रता करता हो। एक मूर्ख वह है जो कभी सत्य या मर्यादा का विचार ना रखता हो। सदा परिहास करता हो और दूसरों के परिहास करने पर लड़ने को तैयार होता हो। एक मूर्ख वह है जो व्यर्थ की होड़ लगाता हो। व्यर्थ बकवास करता हो अथवा जो सदा मुंह बंद किए बैठा हो और कभी कुछ बोलता ही ना हो। एक मूर्ख वह है जो ना तो वस्त्र ही अच्छे पहने और ना ही शास्त्रों का ही ज्ञान हो। पर फिर भी जो सभा में सबसे ऊंचे स्थान पर जाकर बैठता हो।
00:17:58:26 या अपने गोत्र वालों पर का विश्वास करता हो। एक मूर्ख वह है जो चोरों से अपनी जान पहचान बतलाता हो। देखी हुई वस्तु दोबारा देखने को मांगता हो और क्रोध में स्वयं अपना ही अनहित कर बैठता हो। एक मूर्ख वह है जो बराबर ही इन लोगों से साथ ही इन लोगों के साथ बातचीत करता हो या बाएं हाथ से भोजन करता हो। बाएं हाथ से भोजन तो नहीं करता ना कोई? हां।
00:18:34:16 तो एक मूर्ख वह है जो बड़े लोगों के साथ मत्सर रखता हो। अलभ्य वस्तु प्राप्त करना चाहता हो या स्वयं अपने घर की चीजें चुराता हो। एक मूर्ख वह है जो जगदीश्वर को छोड़कर मनुष्यों का भरोसा रखता हो या जो अपना जीवन सार्थक ना करके व्यर्थ ही गवाता हो। एक मूर्ख वह है जो सांसारिक दुखी से दुखों से दुखी होकर ईश्वर को गालियां देता हो। या अपने मित्र की हीनता लोगों को बतलाता हो। एक मूर्ख वह है जो थोड़े से अन्याय के लिए क्षमा ना कर सकता हो। सदा तेजी दिखलाता हो या विश्वासघात करता हो। एक मूर्ख वह है जो क्षण क्षण पर रंग बदलता हो। एक मूर्ख वह है जो पुराने नौकरों को निकालकर उनकी जगह नए नौकर रखता हो या जिसकी सभा बिना अध्यक्ष की हो। जिसकी सभा बिना अध्यक्ष की हो। यह बात बहुत गौर करने लायक है। हम लोग मूर्ख क्यों हैं? हिंदू मूर्ख क्यों हैं? हिंदू मूर्ख इसीलिए क्योंकि उसकी जो सभा है वह बिना अध्यक्ष की बिना कप्तान
00:19:50:02 की है। हमारी समस्याएं हमारी समस्या ये क्रिश्चियन मुस्लिम तंत्र नहीं है। हमारी समस्या है बहु नेतृत्ववाद। जो योग्य नहीं है उसको खड़ा करोगे तो किसी की आस्था होगी नहीं। किसी की निष्ठा होगी नहीं तो हमें नेतृत्व नहीं मिल पाएगा। जो योग्य है उसको तुम खड़ा नहीं करोगे तो हमें नेतृत्व नहीं मिल पाएगा। जब तक बहु नेतृत्ववाद है तब तक सनातन का उद्धार नहीं हो सकता। और भागवतानंद आर्य समाज या अमुक अमुक जो परंपरा पर टोट करने वाले जितने भी तंत्र हैं व्यक्ति हैं वो प्रत्यक्ष अथवा गुप्त रूप से यह बहु नेतृत्ववाद के पोषक हैं।
00:20:48:21 हम एक तरफ लोकतंत्र का विरोध करते हैं। राजतंत्र चाहते हैं। यानी बहु नेतृत्ववाद को खत्म करना चाहते हैं। दूसरी ओर जिसका आचरण होगा वही ब्राह्मण हो जाएगा। यह क्या है? बहु नेतृत्ववाद पीछे से सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है। कुल परंपरा का सीधे व्यक्ति क्लेम कर देगा कि मैं हूं ब्राह्मण। लो। तुम कौन होते हो मना करने वाले? कि मैं ब्राह्मण नहीं हूं। तुम कौन होते हो मना करने वाले? मैं आचार्य नहीं हूं। मैं कर्म से आचार्य हूं। कर्मणा आचार्य। करणा ब्राह्मण करुणा आचार्य
00:21:31:08 तो बहु नेतृत्ववाद की वजह से हम एकजुट नहीं हो सकते क्यों रामचरितमानस जलाई जा रही होगी एक कहेगा वो बेकार की पुस्तक है एक कहेगा अच्छी पुस्तक है जो अच्छी मानेंगे वो बचाने जाएंगे जो बेकार समझेंगे नहीं जाएंगे अच्छा बेकार वाले से प्रश्न क्यों किया जाए भाई तुमने कैसे कह दिया वो कह देगा मुझे भगवती ने सपना दिया है मैं खुद खुद से आचार्य बनाऊं। अब बताओ परंपरा प्राप्त आचार्य ही जब दूसरे आचार्य को खड़ा करेगा तो उसकी वही मान्यताएं होंगी जो हमारी पूर्वजों की मान्यताएं हैं। वरना कोई भी व्यक्ति आकर के क्लेम कर देगा। अच्छा भागवतानंद चलो वर्णाश्रमी है। मूर्ति पूजक है। उसको स्वीकार करने में दिक्कत क्या? उसको स्वीकार करने के नाम पे हम इन सबका पोषण कर देंगे ना।
00:22:23:06 आर्य समाज जैसी चीजों का पोषण कर देंगे ना। परंपरा विरोधियों का पोषण कर देंगे ना। वह भी तो बिना परंपरा के आया है। उसकी भी तो कोई परंपरा नहीं है। ब्रह्मा कुमारी भी कहेगा फिर। इसलिए जिस सिस्टम से जो चल रहा है वही शूद्र में यदि गुण दिखाई भी दे रहे हैं कि ब्राह्मणों जैसा विद्वान है सब कुछ है। मगर क्योंकि वो सिस्टम बिगड़ जाएगा। इसलिए शूद्र को अनुमति नहीं दी जाएगी कि वह जो है ब्राह्मणों के कार्य करें। लेफ्ट में चलना अगर नियम है राइट साइड में गाड़ी चलाने वाला दिखाई देगा कि बहुत अच्छी गाड़ी चला रहा है एक्सीडेंट नहीं कर रहा है। उसको ले लो अपने से मिला लो। मगर फिर भी हम क्यों नहीं मिलाएंगे? क्योंकि अगर उसको हमने अनुमति दे दी राइट साइड में रॉन्ग साइड में गाड़ी चलाने की तो विप्लव हो जाएगा। सब अपने मन से रॉन्ग साइड में गाड़ी चलाने लगेंगे। इसलिए नियम तो यही है कि लेफ्ट में ही गाड़ी चलानी है
00:23:21:13 तो इसलिए उसका पोषण नहीं किया जा सकता है। गुरु परंपरा से जो है वही आचार्य बनेगा। इसका जिसकी सभा बिना अध्यक्ष की हो यह बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है। आप लोगों को याद रखना है कि हमारी समस्या बहु नेतृत्ववाद है और हम लोग बहु नेतृत्ववाद से ही लड़ रहे हैं। पूरा आहान ही इसी बारे में है। हमारी लड़ाई बहु नेतृत्ववाद से है। धर्म को लेकर कम से कम हमारे बीच में बहु नेतृत्ववाद नहीं होना चाहिए। परम जो कल्याण वाली बात है परमार्थ वाली बात है उस वो तो व्यवहारिक धरातल पर उसका कोई कार्य है ही नहीं तो बहु नेतृत्ववाद से हमारी लड़ाई अजीत भारती ने एक वीडियो बनाया था काफी दिन पहले कि हमारे सनातन में सर्वोच्च की कोई अवधारणा है ही नहीं क्या हुआ इसका मतलब वो यह कह रहा है कि हमारे सनातन में कोई कप्तान बने ऐसा है ही नहीं कोई कप्तान होना ही नहीं चाहिए। कप्तान के बिना क्या है वो? मूर्खों की सभा। कप्तान के बिना जो झुंड है वो मूर्खों की सभा है।
00:24:36:28 अच्छा जो व्यक्ति ये कह रहा है कि सर्वोच्च है ही नहीं। तो उसने क्या किया? इनडायरेक्ट वे में सबकी सर्वोच्चता को जो जो लोग अपने आप को सर्वोच्च क्लेम कर रहे हैं। उनकी सर्वोच्चता को खंडित करके खुद को सर्वोच्च बना दिया कि नहीं। उसने कहा नहीं कि मैं सर्वोच्च हूं। मगर जितने लोग अपने आप को सर्वोच्च कह रहे हैं उनको निषेध कर दिया उसने तो उनसे ऊपर हो गया ना। भाई वह लोग गलत बात बता रहे थे। यह सही बात बता रहा है। इस रूप में वो सर्वोच्च हो गया। उसने कहा नहीं क्लेम नहीं किया, दावा नहीं किया। तो कप्तान ना होना, अध्यक्ष ना होना मूर्खता के लक्षण है। जो लोकतंत्र से हमको प्राप्त नहीं हो सकता है। करुणा आचार्य हमें नहीं चाहिए। कर्मणा ब्राह्मण हमें नहीं चाहिए। हमें जन्म से फिर कर्म से ब्राह्मण चाहिए। हमें परंपरा से फिर आचरण से आचार्य चाहिए। ठीक है। जिसकी प्रामाणिकता भी हो।
00:25:38:26 अच्छा। एक मूर्ख वह है जो अन्याय से द्रव्य एकत्र करता हो या धर्म नीति तथा न्याय का विचार छोड़कर अपने साथियों से अलग रहता हो। एक मूर्ख वह है जो घर की सुंदर स्त्री को छोड़कर सदा दूसरी स्त्रियों के फेर में पड़ा रहता हो। बहुतों की झूठन झूठन अंगीकार करता हो। एक मूर्ख वह है जो अपना धन दूसरों के पास रखता हो। दूसरों का धन स्वयं लेना चाहता हो या छोटे लोगों के साथ लेनदेन रखता हो। एक मूर्ख वह है जो अतिथि को कष्ट देता हो। बुरे ग्राम या स्थानों में रहता हो और सदा चिंतित रहता हो। एक मूर्ख वह है जो उस स्थान पर जाकर बैठता हो जहां दो आदमी बातें करते हो या दोनों हाथों से सिर खुजलाता हो। एक मूर्ख वह है जो पानी में कुल्ला करता हो। पैर से पैर खुजलाता हो या हीन कुल की सेवा करता हो। एक मूर्ख वह है जो स्त्रियों और बच्चों को मुंह लगाता हो। पागलों के पास बैठता हो। अपनी मर्यादा का विचार छोड़कर कुत्ता पालता हो। एक मूर्ख
00:26:54:04 वह है जो पराई स्त्री से लड़ाई झगड़ा करता हो। मूर्ख पशुओं को अचानक या छिपकर मारता हो और मूर्खों के साथ रहता हो। एक मूर्ख वह है जो चुपचाप खड़ा हुआ लड़ाई झगड़ा देखता हो और सच को छोड़कर झूठ का आदर करता हो। एक मूर्ख वह है जो धन पाकर अपनी पुरानी दशा भूल जाता हो और देवताओं तथा ब्राह्मणों पर अधिकार जमाना चाहता हो। एक मूर्ख वह है जो अपना काम पढ़ने पर तो बहुत अधिक नम्र बना बन जाता हो पर दूसरों का कोई काम ना करता हो। एक मूर्ख वह है जो पढ़ने में अक्षर छोड़ अक्षर छोड़ देता हो या अपनी ओर से मिला देता हो। एक और पढ़ते समय पुस्तक पर दृष्टि ना रखता हो। यहां तो मेरे से भी ये वाली मूर्खताएं हो गई पढ़ते-पढ़ते। एक मूर्ख वह जो ना तो स्वयं पुस्तक पढ़ता हो ना दूसरे को पढ़ने देता हो और उसे केवल बस्ते में बांधकर रख छोड़ता हो। बस यही सब मूर्खों के लक्षण है जिन्हें सुनकर मनुष्य चतुर हो सकता है। इसको कहते हैं निषेध मुख से सुनना। तो ये निषेध मुख हमने सुन लिया
00:28:09:06 तो इसका ज्यादा असर पड़ता है। एक बार विधि का पालन हो ना हो पर निषेध आज्ञा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। है ना? तो विधि निषेध में ज्यादा पावरफुल कौन हुआ? निषेध। मूर्खों के लक्षण तो अपार हैं। समझदार आदमी सदा इस तरह की बातें मन लगाकर सुन सुना करते हैं। मूर्खों के लक्षण तो अपार हैं। पर यहां थोड़े से लक्षण अपनी समझ के अनुसार लोगों के परित्याग के लिए दे दिए गए हैं। श्रोताग मुझे क्षमा करें। उत्तम लक्षण ग्रहण करने के लिए चाहिए। ग्रहण करने चाहिए और मूर्खों के लक्षण छोड़ देने चाहिए। अगले समास में उत्तम लक्षण बतलाए गए हैं। बढ़िया चैप्टर था ना जानने लायक है ना
00:29:18:01 [संगीत]
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क्या आप भी मूर्ख हैं? Dasbodh Lecture #9
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