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00:00:06:07 तो सभी को जय श्री राम। जैसा कि आप जानते हैं अ जो विभिन्न आध्यात्म को लेकर के विचारधाराएं हैं उनको लेकर के हम उनका जो पक्ष है उनका जो उनकी जो विचारधारा है उसको आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं। तो इसी क्रम में आज हम आए हैं ब्रह्मा कुमारीज सरोजनी नगर लखनऊ में यह सेंटर स्थित है और हमारे साथ यहां पर जो यहां की शिक्षिका हैं दीदी हैं जो यहां मार्ग निर्देशन का कार्य करती हैं तो वो हमारे साथ हैं। तो सबसे पहले दीदी आपको जय श्री राम। तो दीदी थोड़ा सा अपना एक संक्षिप्त परिचय थोड़ा सा आप हमारे दर्शकों को दे दीजिए। मेरा नाम बी के सुनीता है। मां कुमारी सुनीता बहन। मुझे यह आध्यात्मिक ज्ञान 95 में मिला। आज लगभग 30 वर्ष पूरे पूरे हो गए हैं सब। अच्छा और अभी तक इसी ही मार्ग पे मैं चल रही हूं। और सदा मेरा मन का उद्देश्य है और सदा ही चलती रहूंगी इस ईश्वरी मार्ग पे समाज की सेवा में सभी की सेवा
00:01:21:15 में ताकि सभी के अंदर जो परमात्मा ने हमें उजाले का मार्ग दिखाया है प्रशस्त किया है आगे बढ़ाया है वो सभी को मिल सके मैं सभी के अंदर वो दिया जला सकूं जिसे तीसरा नेत्र कहते हैं सभी को लाभ हो सके इसलिए मेरा यह संपूर्ण जीवन है यह मेरा संक्षिप्त छोड़ा का परिचय है। बहुत सुंदर। बहुत सुंदर। थोड़ा सा एक बेसिक जो ब्रह्माकुमारीज की जो एक जो स्पिरिचुअल बेसिक छोटा सा तो वो थोड़ा सा आप हमें बताएंगी कि क्या है? देखिए यहां आध्यात्म मतलब ही अध्यन आत्मा। जिस धर्म में जिस ज्ञान में जिस अध्यात्म में आत्मा का पाठ पढ़ाया जाता उसके बारे में बताया जाता है जैसे कि हमारी गीता में भी जी बहुत समय से द्वापर युग से जब से गीता आई उसमें भी आत्मा के ही बारे में बताया गया है और आज ब्रह्मा कुमारी संस्था भी आत्मा परमात्मा सृष्टि चक्र स्वयं का ज्ञान और कर्मों की गहन गति के ऊपर विषय ध्यान खिंचाया जाता है जिसमें हम हम लोग यही हमारा उद्देश्य रहता है, एक लक्ष्य भी रहता है कि हर आत्मा जो मनुष्य
00:02:36:26 है वह श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करें और प्राप्त करके कहते हैं हमारे भारत में नर ऐसी करनी करे जो नारायण बने और नारी ऐसी करनी करे जो लक्ष्मी बने। मनुष्य से देवता बनाने की पढ़ाई है। लेकिन पढ़ना हर एक को पड़ता है। अब वो कितने प्रतिशत वो पढ़ाई करता? कितने प्रतिशत इसका अध्ययन करता है? कितनी इसकी अध्यात्म के धरातल में जाता है यह उस पर निर्भर करता है। बाकी हम लोगों का एक यही लक्ष्य रहता है कि हर आत्मा आगे बढ़े और इसकी गहराइयों में जाए और उस जब हमें आत्मा का परिचय हो जाता आत्मा का ज्ञान यथार्थ हो जाता है। ज्ञान तो सभी को था। हमारे शास्त्रों में पुराणों में सभी हमारे बड़े बड़े-बड़े विद्वानों ने दिया लेकिन अमल करना एक अलग बात होती है। इसको बहुत तरीके अंदर से जाना उसकी डीपली में जाना गहराई में जाना ये एक अलग बात है। तो ब्रह्माकुमारी संस्था में परमात्मा ने आकर के प्रजापिता ब्रह्मा के तन में आकर के दादा लेखकराज के तन में आकर के यह बहुत ही डीपली ज्ञान और ये कहने ही तक नहीं रखा बल्कि व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए हमेशा प्रेरित किया और प्रेरित आज भी हम ब्रह्मा आज दादा लेखराज में
00:03:51:27 नहीं है। फिर भी हम ब्रह्मा हमारी बहने यही कहते जब तक आत्मा का ज्ञान नहीं होगा तब तक परमात्मा का ज्ञान नहीं हो सकता और कहते भी हैं कि आत्मा के ज्ञान बिन परमात्मा मिलता नहीं और पत्ता पत्ता सींचने से फूल कभी खिलता नहीं तो मेरा जड़ में पानी डालना पड़ेगा जी जड़ परमात्मा है और जब तक उस तक नहीं जाए और उसके पहले स्वयं का ज्ञान कहते हैं कि आप सुनार की दुकान पे जाए तो मुझे ऐसा नहीं लगता है कि मिट्टी का तेल रखा होगा या वो अनाज बेचेगा। हम ठीक है? तो जब आप सुनार की दुकान पे जाते तो हमेशा यही रहता कि सुनार की दुकान में सोना, चांदी, हीरे, मड़े कुछ भी मिल सकता है। और आप परचून की दुकान पे जाएंगे तो संभवत मुझे लगता है कि अन्य चीजें बहुत कम ही उपलब्ध होंगी। जैसे हीरा जवाहरात रखता हो। ऐसा अभी तक तो नहीं मुझे दिखा है। तो परमात्मा जड़ है और हम कई बार कई जगह तलाशते हैं क्योंकि हमारी प्यास होती परमात्मा कैसा है? उसका रूप क्या है? नाम क्या है? गुण क्या है? धाम क्या है? और कर्तव्य क्या है? तलाशते रहते। आज भी दुनिया तलाशती रहती है। पूरी तरीके से उसे वो चीज प्राप्त नहीं हो पाई। कहते हैं ना कि रामपुर में
00:05:06:28 एक हाथी आया। सबने देखा उसमें सात अंधे थे। तो जब किसी ने उसमें से एक सज्जे ने पूछा एक आंख जिसकी थी भाई कैसा हाथी था बताओ आप लोग? तो उसने कहा हाथी तो सांप जैसा था। हाथी तो रस्सी जैसा था और हाथी तो ढोलक जैसा था। हाथी तो सूप जैसा था। हाथी तो खंभे जैसा था। सब ने एक-एक उसके भाग्य को छुआ और भाग को छूने बाद उसको वर्णन किया कि हाथी ऐसा था। लेकिन जिसने देखा जिसने सूर को जिसने सूर को छुआ उसे सांप नजर आया। जिसने पूछ को छुआ उसे रस्सी नजर आई और जिसने उसके पांव को छुआ उसको खंभा नजर आया। पिलर्स नजर आया। जिसने कान को छुआ उसे सूप नजर आई। जिसने उसके पेट को छुआ उसको ढोलक नजर आई। ऐसे ही हमारे सनातन एक है। सब कुछ है। लेकिन उसकी जब तक गहराई तक नहीं गए तो यही लगता है कि भगवान ऐसा होगा। क्यों? तो दीदी इसमें इसमें यह था कि यह तो हो गया कि ठीक है हमें गहराई में जाना है। जी तो
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00:06:10:26 अभी हम ब्रह्मा कुमारीज में क्या कर रहे हैं और हमें मतलब जैसे हमें पता चल गया कि आत्मा का ज्ञान ये है। ज्ञान पता चल गया कि हम आत्मा है। आत्मस्वरूप है। फिर हम ब्रह्माकुमारी में क्या प्रैक्टिसिंग करते हैं? और उस प्रैक्टिसिंग से हमें मिलना क्या है? फाइनल गोल क्या है हमारा? फाइनल जो लक्ष्य है मैंने पहले ही बताया। मनुष्य से देवता बनाने की पढ़ाई परमात्मा पढ़ाने के लिए आया है। ये जैसे हमारा दुनिया के भी मतलब हम देवता बनते हैं। देवता बना पढ़ाई पढ़ा रहा। अब अगर आप पढ़ेंगे तो ही बनेंगे। नहीं पढ़ेंगे। जितना पढ़ेंगे देवताओं की भी कैटेगरी होती है। शनि का अपना काम। इंद्र का अपना काम है। विष्णु का अपना उसकी कैटेगरी ऊंची है। विष्णु जी की कैटेगरी ऊंची है। ब्रह्मा जी की ऊंची है। शंकर जी की ऊंची है। और उससे भी थोड़ा कैटेगरी स्तर कम होता है। जो जैसा यहां अध्ययन करता पढ़ाई करता है आत्मा के बारे में परमात्मा के बारे में। वो उसी तरह की कैटेगरी वाले देवत्व में पहुंचता है। उसी तरीके से उसकी पूजा भी भक्ति में होती है। अच्छा उसके बाद देवता बनने के बाद भी कोई गोल आ गया। भैया जैसे हम डीएम बन जाए तो फिर मुझे नहीं लगता कि डीएम पद पाने के बाद कोई दूसरा कोई और मतलब फाइनल गोल यही है कि देवत्व को प्राप्त करना है। मैंने कहा ना
00:07:26:00 इस पढ़ाई से मनुष्य देव पद को प्राप्त करता अगर पढ़ता है सही तरीके से तो जो भगवान के नियम के अनुसार चलता है तो अन्यथा नहीं फिर वो कोई भी हो तो जो मोक्ष का कांसेप्ट है वो अधूरा नहीं लगता आपको मुझे नहीं लगता है इसलिए क्योंकि जैसे आपने कहा ना डीएम डीएम वाली बात जैसे आपने कही वो एक अलग बात है लक्ष्य की आपसे कही थी लक्ष्य और लक्ष्य में फर्क है जी जी मोक्ष क्या मोक्ष जैसे आवागमन से हमारा छुटकारा होना। तो देवता जब बन जाएंगे तो उसके बाद आवागमन नहीं होना है। हां होना है। वही तो मिलता है। मोक्ष कभी किसी प्राणी को नहीं मिलता। क्यों? कई बताएं मोक्ष ऐसा क्यों कहा गया है? जैसे कई बार होता है ना कि आप मोक्ष कभी किसी प्राणी को नहीं मिलता है। हम मैं बताती हूं कैसे केवल बेहतर होता है बस। हां हां मैं बताती हूं। जीवन एक तरीके से छुटकारा कभी नहीं से मान लीजिए हमारी आपकी कोई लड़ाई हुई तो हम परेशान होके क्या बोलते आपसे मोक्ष छुटकारा मिल जाए भगवान मुझे इस धरती पे नहीं भेजना प्रभु क्यों क्यों परेशान हो के ऐसे शब्द अगर किसी का बहुत प्रेम है अच्छा अच्छा व्यवहार है तो शायद उसके मुंह से कभी निकले कि ना प्रभु धरती पे भेजना आदमी को चाहे नफरत व जिससे जिसका
00:08:41:13 अच्छा अथवा बुरा हिसाब है उसे चुने के लिए इस धरती पे आना ही पड़ता है। वो मोक्ष का सवाल नहीं उठता। अगर आपने किया है तो भी उसे आप चुने करने के लिए आए। उसकी प्रालब्ध आपको भोगने के लिए आना ही पड़ा है। नहीं ऐसा इसमें एक क्वेश्चन बनता है। हां जी। कि अ जैसे आपने कहा कि उसको किसी व्यवहार के साथ चुकता करना है तो उसको आना पड़ता है। वो एक अलग बात है कि जब तक हमारे को कोई दुख देने वाला मौजूद है अगर दुख देने वाला ही नहीं होगा तो हमें क्यों ऐसा लगेगा कि हम यहां से जाएं। मगर अगर अगर हम किसी से हमारी बैरभाव है भी नहीं। फिर भी हमारी अपनी बॉडी की कई ऐसी चीजें हैं जिनके कारण हम लोग कई बार ऐसा फील कर जाते हैं कि भाई हमें जो है यहां से बेहतर कहीं पर पहुंचना चाहिए। जैसे कि जैसे कि भूख लगना समय पर भोजन नहीं मिल रहा है। मान लीजिए नदी है। नदी नहीं मिल रही है हमें। पानी नहीं मिल रहा है पीने के लिए या फिर वो जो बूढ़ापन आता है, वृद्धावस्था आती है। चल नहीं पा रहे हैं। उठा ले भगवान उठा ले। ये कहते हैं। वहां पे हमारा कोई दुश्मन नहीं है। हम स्वतः अपनी स्थिति में वो स्थित हो रहे हैं। तो हम चाहते हैं कि हम ये जो त्रिविध ताप है दैहिक
00:09:56:19 दैविक भौतिक इन तापों से हमारी मुक्ति हो जी परंतु जैसे आपने कहा कि हम देवता ही बन रहे हैं और देवता के बाद आगे कुछ नहीं देवता बन के रह जाएंगे फिर से ये चक्र चलेगा तो यानी कि देव मैं बता किस स्टार्ट कर रहे हैं देखिए क्या होता है जैसे हम कभी-कभी क्या घर में कई बार बहुत परेशान हो जाते हैं तो कहते बस हो गया अब इससे बात नहीं करनी मतलब नहीं फिर जब उसे सिर्फ सुख मिलता या किसी से थोड़ा समय में रिस्पेक्ट भी कोई कह दे देता फिर हम भूल जाते रहने दो कोई बात नहीं है अभी अच्छा है हमें जीना है इसके साथ जब स्वयं से बहुत ज्यादा त्रस्त हो जाते तब भी व्यक्ति कहता है कि मोक्ष दे परमात्मा लेकिन उस समय तक एक ही जीवन तक ऐसा होता है लेकिन उससे बेहतर एक हमको जब जीवन मिलता है तब हम ये भूल जाते हैं अगर हमें याद रहे तो हम बार-बार वही रिपीट करें यह एक और भी प्रकृति किसी हमें प्रदत्त एक चीज है भूल जाने की एक चीज में तंग तंग होके हम भविष्य का निर्माण कर पाना, सोच पाना ये बहुत मुश्किल क्योंकि कुछ चीजें अनचाही हमारे जीवन में होंगी और कुछ चीजें मनचाही। प्रभु कुछ और चाहता है और हम आप कुछ और। हम चाहते मोक्ष मिल जाए लेकिन हमारे कर्मों का जो हिसाब है वो हमें वापस आना ही पड़ता। चुप करने के लिए धरती पे
00:11:11:22 आना पड़ता। दूसरे जन्म में हम भूल गए। बात खत्म हो गई जा के। फिर एक नया अच्छा जन्म मिला। तो यानी कि एक तरीके से हम ऐसा नहीं लग रहा कि हम स्पिरिचुअल लाइफ जी के हमें बेवकूफ बेवकूफ बनाया जा रहा है कि हम भूल गए अपनी चीजों को। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। क्योंकि आप किसी के जीवन से किसी के शब्दों में चेहरे पे ना जाकर के उसके व्यवहारिक जीवन को नहीं नहीं जैसे आपने कहा ना कि वो दूसरे जन्म में आप ये भूल जाएंगे कि आप मोक्ष ले आए हैं। अच्छा बात बताइए। तो आपका मोक्ष जी जैसे मान लीजिए आपकी किसी से दुश्मनी है। ठीक? और आपको अगला जन्म याद हो जाए कि फलाने भेजे एक करोड़ नहीं दुश्मनी नहीं फॉर एग्जांपल और आपको याद आ जाए उस जन्म में भी तो आप क्या करोगे आप उस जीवन को जी नहीं पाओगे जो आपको मिला है जिस घर में आपको वो जीवन याद रहेगा कि उसने मुझे कष्ट दिया था। अब मुझे उससे बदला लेना मैं वो नहीं कह रहा हूं। इसलिए भूलना जरूरी होता है। मैं वो नहीं कह रहा हूं भूलना। मैं यह कह रहा हूं जैसे कि अपने शरीर की अवस्था ऐसी होती है जिसमें हमको जरूरतें पड़ती हैं और वो जब जरूरत जैसे हम कहते हैं कि हम जब हम किसी को स्पिरिचुअल मार्ग पे लाते हैं तो हम ये हमारा एक क्लेम होता है होना चाहिए जितनी भी आध्यात्मिक संस्थाएं हैं कि भाई हम आपको जो आपको दुख हो रहे हैं उससे हम मुक्ति दिलाएंगे
00:12:27:01 हम जो आपको अभी दुख हो रहे हैं तो उसमें अभी ये आता है कि जैसे भाई आप ऐसा कौन सा सुख देने वाले हैं जो कि हमें यहां नहीं मिल रहा है मूवी देखने में नहीं मिल रहा है या मिठाई खाने में नहीं मिल रहा है। भोजन खाने करने में नहीं मिल रहा है। तो हम ऐसा सुख आपको देने वाले हैं जो शाश्वत हो जिसमें ब्रेक ना आए। जी जिसमें कि बीच में बाधा ना उत्पन्न हो वो लगातार आप जो है स्थित प्रज्ञ हो जाए। आत्म स्थित हो जाए। आत्मस्वरूप हो जाए। तो ये हम कहेंगे अच्छा अगर हम ये कहें कि ये जो सुख तुम्हें मिल रहा है इससे बेहतर सुख होगा मगर ब्रेक तो उसमें भी आएगी। जी है ना? अनंत सुख नहीं होगा। वहां शाश्वतता नहीं होगी। तो फिर वो कहेगा भाई ठीक है फिर मैं अपना जो प्रैक्टिकल कर रहा हूं उसमें ही ठीक हूं खुश हूं फिर हम जब उसको वो दे नहीं रहे दूसरी बात यह है कि जैसे हमने कहा कि दूसरा दूसरा जन्म मिलता है वहां पर भी मोक्ष मिलता है मतलब मोक्ष नहीं मतलब वो देवत्व की प्राप्ति होती है तो कहने का मतलब है इन शॉर्ट कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार मोक्ष नहीं है जी देवत्व की प्राप्ति है और देवत्व की प्राप्ति होने के बाद आप यह भूलते हुए कि आप यह जीवन पहले काट चुके हैं दोबारा दोबारा वही जीवन आपको जीना है। देवत्व की प्राप्ति के बाद नहीं जीवन बेहतर जीना है। जीवन जीना नहीं देवत्व से पतित होना है ना दोबारा। नहीं
00:13:42:14 पतित साइकिल चलेगी ना बहुत समय बाद जब हमें विस्मृति हो जाती है। जब अजंता एलोरा वगैरह में गुफाओं में ऐसी चीजें आती तो विकृति आती मन के अंदर होती है। तब हमारा तो लास्ट तक बहुत अच्छा जन्म होता। द्वापर के अंत तक हमारा बहुत देवत्व बना रहता। मतलब एक मतलब एक बड़े टाइम की अब कोई नहीं 16 कला फिर आठ कला कम हो जाते हैं ना जैसे आप बचपन जैसे जेल में पेरोल मिलता है ना आप 8 दिन के लिए घुमाओ जाके ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी पेल जैसी शब्द तो नहीं कहूंगी लेकिन हां लास्ट में मुझे लगता आप शायद सुना होगा अपने बड़ों से अभी तक 100 साल के अंदर जितनी गिरावट हुई नैतिक पतन हुआ है चारित्रिक पतन हुआ हमारी सोच नीचे आई है उतनी तो पहले भी नहीं थी नहीं नहीं थी तो कहां गिरा था मनुष्य कुल मिला के अब एक चीज़ समझ ले कि यह जो आवागमन है इससे हमारा छुटकारा नहीं है। अगर एक जैसे मान लीजिए किसी चीज का नहीं नहीं वो ठीक है मैं आपकी बात मान गया भाई बी के जो ब्रह्माकुमारी है उसकी विचारधारा यह है कि जो ये आवागमन है इससे मुक्ति नहीं है हां इससे बेटर में आप जाओगे मुक्ति नहीं जीवन मुक्ति मिलेगी एक अच्छा जीवन मिलेगा जैसे अभी आपने कहा था ना बीच में अपने से इंसान परेशान हो जाता है तो मोक्ष तो वहां अपना जीवन बहुत ही
00:14:57:18 बेहतर जीवन होगा जिसको जीने के लिए मन करेगा कि मैं इस जीवन को जीू जिस बेहतर जीवन देखिए कोई रोग नहीं होगा मैं वही मैं आपको कह रहा हूं। पहली बात तो ये है कि वो बेहतर जीवन भी शाश्वत नहीं होगा। नहीं उसमें भी एक ना एक दिन हम गिरावट आनी है। अपना जीवन छ साल के थे। अभी आप जो भी हो गए हो हां तो सबका मतलब वो मुक्ति नहीं होनी है। जो यहीं जैसा रहना है आगे बस ये लंबे समय के लिए अच्छा जीवन मिल जाएगा। मुक्ति नहीं मिलेगी। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसमें एक चीज यह भी है कि जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति पर निर्भर हैं तब तक हम अपने आप को पूर्ण रूप से सुखी नहीं मान पाते। जैसे कि अगर मैं पानी पर निर्भर हूं। मुझे प्यास लग रही है तो मैं कभी-कभी सोचता हूं मुझे उठा के ना लाना पड़े। ये भी सोचता हूं। और भोजन के लिए मुझे पकाना ना पड़े, कुक ना करना पड़े। जी और मुझे बढ़िया स्वादिष्ट भोजन भी मिल जाए। या फिर इसके अलावा और भी आप समझ रही होंगी कि काफी काम वासना इत्यादि ये सब इच्छाएं भी होती हैं। तो ये सारी चीजें जो होती हैं जब तक हम अपने से किसी द्वैत भाव पे निर्भर रहते हैं। द्वैत मतलब किसी देश काल परिस्थिति पे हमारी सुख की निर्भरता जब तक होगी तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं हो सकते। जैसे किसी क्रिया की ही जरूरत हो गई। क्रिया मतलब कि किसी के मतलब
00:16:12:19 रमण करना ये सब इस इसमें ही हमारी जरूरत हो गई। या फिर हमारी भोजन पे आवश्यक भोजन पे हम निर्भर हो गए। ये भी हम किसी सामग्री पर निर्भर है कि वो वहां रख के मुझे उठा के लानी है। तो मेरे अंदर ये है कि मैं क्यों जाऊं कोई मुझे अपने आप दे दे। तो जब तक हम किसी देश काल परिस्थिति पर निर्भर हैं तब तक हम पूर्ण रूप से सुखी नहीं तो हम ये मान सकते हैं कि जो बीके को फॉलो कर रहे हैं यहां पर उसको देवत्व की प्राप्ति होनी है। यहां से बहुत बेटर जीवन मिलना है और बहुत सालों तक वो चलना है। बहुत समय तक वो चलना है। आप ये भूल ही जाओगे कि आपने कभी दुख देखा भी था। मगर एक दिन यह दुख वापस भी आएगा। ये भैया जैसे सतयुग कलयुग आता है ना ये तो शाश्वत सत्य है ना प्रमाणिक है सभी में है तो ऐसे हर चीज हमारी आपकी बाल्यावस्था और फिर किशोरी युवा और फिर क्या होता है वृद्धि मतलब पूर्ण रूप से मुक्ति नहीं है कोई चीज नहीं है क्योंकि जो चीज बनी है जो इसमें सर्किल में है सोमवार मंगल बुध बृहस्पत आता है ना ऐसे [गला साफ़ करने की आवाज़] चार ऋतुओं का है 12 महीनों का है सभी का एक तो है हमें हमें एक लंबे समय की मुक्ति दे रहे हैं व्यक्ति को यहां से लंबे समय की लंबे समय की परंतु यह नहीं है कि मुक्ति है ही मुक्त ही हो गए। अच्छा
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00:17:25:25 एक चीज इसमें ये आती है कि जैसे अ जो ईश्वर का अस्तित्व है जी वो किस मतलब जैसे क्या ब्रह्मा कुमारी ये मानता है कि जैसे आपने कहा ना कि जिन लोगों से हमें दुख मिल रहा है जी है ना तो उसका कारण भी ईश्वरी है। मतलब हमें जो दुख देने वाले लोग हैं मैं नहीं मानती। जी जी ये नहीं पढ़ी तो मैं कैसे हम उसको दोष नहीं दे सकते उसने ज्ञान समझा गीता के माध्यम से रामायण के माध्यम से किस माध्यम किस धर्म आत्मा को नहीं भेजा उसने धारा धाम पे सभी को बेच के हम बच्चों के सुधार के लिए उसने हर प्रयास किया लास्ट में आता है जब कहते हैं कि धर्म की ग्लानी होती है परमात्मा तब आता है वो दुख कभी नहीं देख सकता क्या पिता कोई अपने क्या आप भी अगर आप शादीशुदा है आपके बच्चे हो गए क्या आप चाहेंगे हमारे बच्चे को दुख कोई पिता नहीं चाहता ना ही वो नहीं इसमें इसमें कांसेप्ट ये होता है कई कांसेप्ट है तो उसमें से एक कांसेप्ट मैं बताता हूं एक कांसेप्ट ये है कि जैसे कि बच्चा जो है वो किसी बलून के लिए रो रहा है जी लाल कलर के मुझे चाहिए जी पिता जानता है कि बैलून के लिए बेकार में रो रहा है इसके पास तो उससे बहुत अच्छी बॉल है तो पिता मुस्कुराता है उसको बैलून नहीं दिलाता है बच्चे के हिसाब से वो जो बैलून
00:18:41:01 ना मिलना है वो बुरे बुरी चीज है और पिता के हिसाब से वो व्यर्थ है जी जी तो नैनम छिंदती शस्त्राण नैन धरती पावका न चैनम क्लेदंत न शषति मारुता तो जब हम भय खा रहे हैं हमें लग रहा है कि भैया हम मरने वाले हैं इसलिए हम भय खा रहे हैं मगर हमारे पिता जो परमेश्वर हैं उनको पता है इसको कुछ नहीं होने वाला तो वहां पर पिता की स्थिति क्या होगी कि भाई मुझे पता है इसको कुछ नहीं होने वाला तो वहां पे वो उन कर्मों का जो मेरे साथ घटित होने वाली घटना है उनको करने वाला होते हुए भी वो अकर्ता है जैसे भगवान ने कहा भगवत गीता है कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तुम मुझे अकर्ता जानते क्यों जब उसकी याद में हो तो अकर्ता हो जाओगे क्योंकि जैसे आप बच्चे को बेटा तुम यह नहीं करना फिर अगर तुम किसी से झगड़ा नहीं अगर कोई और करे तो मुझे बताना नहीं ये तो खैर विषय अलग हो रहा है बात बता रही थी कि जब वो समर्थ सर्वशक्तिमान है और उसने कह दिया है तो फिर हम कोई भी कर्म कर रहे हैं उसके अनुसार अपने अनुसार कर्म करना माना विकर्म को जन्म देना उसके अनुसार करना मतलब शास्त्र सम्मत तेरे लिए कर्तव्य और कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है। ठीक है? अच्छा तो अब यह बात आती है कि ईश्वर जो है वो जो नेगेटिविटी है, तामसिक कार्य हैं, बुराई उनसे दूर है।
00:19:56:09 उनसे अलग है ईश्वर। उसके उसकी सत्ता में वह चीज नहीं हो रही है। वह प्राकृतिक हो रहा है। तो ईश्वर का अस्तित्व किसी के समक्ष हम कैसे प्रूव करते हैं कि ईश्वर है। जैसे हमने कहा कि हम ब्रह्माकुमारी आ रहे हैं और हम स्पिरिचुअलिटी को फॉलो कर रहे हैं और हमें मुक्ति नहीं मगर एक बहुत बेटर जीवन मिल रहा है बहुत लंबे समय तक के लिए देवत्व वाला 16 कला वाला। उसके बाद वो घटेंगी कलाएं। फिर हम आठ कला में फिर आएंगे। आठ कला से हम लोग तो और गिरे हुए होंगे। मेरे ख्याल से वो भी कम होंगी। तो हम जब ये कहते हैं कि कोई है जो हमें ऐसा प्रोवाइड कराएगा अगर हम इस उसके रास्ते पर चलेंगे तो वो है ये हम कैसे माने? जैसे सूर्य को आप मानते हो हां देखते हो हां और ग्रहण लग जाए ना दिखे तो ना दिखे तो अनुमान प्रमाण से मानते हैं मानते हैं लेकिन अस्तित्व में तो है ना नहीं अस्तित्व भले ही ग्रहण लग गया लेकिन है वो नहीं तो अनुमान प्रमाण है ना वहां पे अनुमान वही अनुमान प्रमाण क्या है क्योंकि जिस समय हमें यह ज्ञान होता है मैं आत्मा हूं तो जब गहराई से ज्ञान होने के बाद फिर परमात्मा को याद करना उससे जुड़ना उस प्रमाण जाहिर कर देगा आपके जीवन में परिवर्तन। परमात्मा का यह अस्तित्व है। वह है वह पढ़ा रहा है। अगर आया आप उससे जुड़े हुए तो आप में पूरा
00:21:11:13 परिवर्तन हो जाएगा। जिस प्रकार अर्जुन को जब गीता का ज्ञान दे उसके पहले अर्जुन एक सामान्य व्यक्ति एक योद्धा थे। ठीक है? क्षत्रिय योद्धा थे। लेकिन जब उसका सानिध्य आया। उसकी छत्रछाया में उसके प्रकाश की किरणें बनी। उसको ज्ञान मिला तो उसमें परिवर्तन आया। हम ठीक ऐसे जब मनुष्य में परिवर्तन आता है बहुत आत्मिक स्तर पर आता आ जाता है तो यह उसका सबसे बड़ा परिवर्तन ये प्रमाण है कि परमात्मा का अस्तित्व क्योंकि जो कुछ वो दे रहा है वो ग्रहण करके अपने आप को प्रमाणित करता है दुनिया के सामने शुद्ध करता है जाकर के वो आप सही कह रही हो अर्जुन के जीवन में परिवर्तन तो तब आया जब उसने परमात्मा पर विश्वास कर लिया साक्षात्कार कराया तब परमात्मा पे उस विश्वास कर लिया तब परिवर्तन आया अभी क्या है परमात्मा के मार्ग पर चलने के लिए हम क्या उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं? अनुमान प्रमाण। जैसे जो सूर्य है ग्रहण लग जाता है। उसके बाद भी अनुमान प्रमाण है। क्योंकि यहां पर पेड़ पौधे जो है आगे बढ़ रहे हैं। हमें भी एनर्जी मिल रही है। इसका मतलब कोई है जो हमें एनर्जी दे रहा है। सूर्य से हमें एनर्जी मिलती है। तो अनुमान प्रमाण से और भी कई सारे प्रमाण हैं। उससे हमें पता चलता है। तो हम यहां पर वो अर्जुन की बात तो ये है कि उसने विश्वास किया उस पथ पे चला। विश्वास बाद में किया जब उसने साक्षात्कार
00:22:26:19 किया जब देखा अर्जुन ने उसके दिव्य विराट रूप को तब विश्वास किया है ऐसे नहीं शब्दों से कभी अर्जुन ने विश्वास नहीं किया इतने समय तो ज्ञान देते रहे श्री कृष्ण जी जब दिखाया बोला नहीं संभल रहा अभी भी नहीं संभल रहा मोह नहीं खत्म हो रहा तब विराट रूप को तुमने दिखाया तब बोला बस प्रभु मैं समझ गया तो परिवर्तन ही परमात्मा का एक सबसे बड़ा प्रमाण है कि वो है नहीं नहीं कोई जो स्पिरिचुअल पे चल के बदल गया वो तो बाद का प्रमाण है। हम पहले क्या प्रमाण दे रहे हैं? जिससे वो उसके मार्ग पे चले वो प्रमाण क्या है? मतलब अनुमान प्रमाण हमारा है। एक अनुमान प्रमाण ये दिया जाता है कि दुनिया में सभी चीजें जो है किसी ना किसी चीज पर निर्भर है। इसलिए जो जो प्रकृति काम कर रही है तो इस ये स्वयं से नहीं कर सकती क्योंकि जड़ है प्रकृति। तो क्योंकि यह किसी ना किसी पर निर्भर है। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि कोई ऐसा स्त्रोत है जिसके ऊपर यह निर्भर है और जो स्वयं पर निर्भर है वो किसी पर निर्भर नहीं है। यह मानना पड़ेगा हमें कि कहीं से इसकी शुरुआत हो रही है। कह रहा है जब परमात्मा ने उसके पहले भी उसका प्रमाण नहीं नहीं मतलब कैसे सिद्ध कह रहे हैं कि परमात्मा नहीं ना होने के बाद भी वो चला रहा है। नहीं नहीं नहीं मैं ये नहीं कह रहा। मैं तो यह कह रहा हूं जैसे हमने कहा कि
00:23:41:20 ब्रह्मा कुमारी से हमें यह वाला कांसेप्ट मिलता है देवत्व वाला। ठीक है? और ब्रह्मा कुमारी ये भी नहीं मानती कि ईश्वर पर ही ईश्वर इनका भी अधिष्ठान है। किनका? जो तामसिक कार्य हो रहे हैं उनका अधिष्ठान ईश्वर नहीं है। बुराई जो हो रही है उनका अधिष्ठान ईश्वर नहीं है। तो ईश्वर को सिद्ध करने के केवल दो ही तरीके हैं। एक कि हमारे अंदर सच्चिदानंद की प्यास है। तो इसका मतलब है कि दुनिया के अंदर कोई सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है। और उसके साथ एकत्व को प्राप्त करके हम सच्चिदानंद हो जाएंगे। मगर ब्रह्मा कुमारी ने इस इस कांसेप्ट को काट दिया यह कहते हुए कि भाई मुक्ति है ही नहीं। सच्चिदानंद है ही नहीं। सच्चिदानंद आनंद अनंत अबाध्य मुक्ति है। अनंत अबाध्य मुक्ति नहीं है। तो यह कांसेप्ट कट गया। अब दूसरा कांसेप्ट है कि सारी चीजों सारी चीजें जिस पर निर्भर हैं जो सभी चीजों का अधिष्ठान है वो ईश्वर है। ये दूसरा कांसेप्ट है। तो ये ऐसे कट गया कि बुराई का अधिष्ठान ईश्वर नहीं है। देखो मैं बताती हूं संक्षिप्त। जी। परमात्मा सने का पिता हो। अच्छा हो, बुरा हो, कातिल हो, जुल्मी हो, पापी हो। बस पिता है। पिता सबका है। लेकिन जिस प्रकार आपके दो बच्चे हैं, सब
00:24:56:26 कुछ है। लेकिन पढ़ाई तो आपको पढ़ना पड़ता। जीवन आपको जीना पड़ता। पिता आपको एक समय तो उंगली पकड़ कर चला सकता, बता सकता, शिक्षित कर सकता है, समझा नहीं दे सकता। लेकिन उसके बाद जब हम बड़े होते जो भी कार्य करेंगे उस कारण के अच्छे अथवा बुरे परिणाम के हकदार हम हैं। हमारा पिता नहीं है। अगर इनवॉल्व नहीं है तो इनवॉल्व है तो वो एक अलग बात हो जाती। नहीं वो नहीं बात ये है कि पिता जब बुराई को कंट्रोल नहीं कर सकता है जी इसका मतलब कि बुराई का अधिष्ठान वो नहीं है जैसे उसने बना के छोड़ दिया मान लीजिए और उसका कंट्रोल नहीं है अब तो इसका मतलब वो कंट्रोलर नहीं है बुराई का तो बुराई का यदि कंट्रोलर नहीं है यानी कि बुराई अपने आप एग्जिस्ट कर रही है बुराई जो है वो अपने आप एक्सिस्ट कर रही है उसका उसको भगवान ने नहीं बनाया वो अपने आप इवॉल्व हो रही है तो जब हम ऐसा कह देंगे कि दुनिया में कुछ है जो अपने आप एक इवॉल्व हो रहा है। अपने आप काम कर रहा है। वह किसी पे निर्भर नहीं है। वह ईश्वर पे भी निर्भर नहीं है। बुराई अपने आप में स्वतंत्र है। तो ईश्वर पे निर्भर नहीं है। तो ये जो ईश्वर की सिद्धि वाले जो दो कांसेप्ट हैं कि या तो ईश्वर ऐसे सिद्ध होता है कि हर आत्मा के अंदर सच्चिदानंद की प्यास है तो मुक्ति से कट गया। और दूसरा कांसेप्ट ये वाला है कि हम लोग दुनिया में सभी
00:26:12:04 चीजें किसी ना किसी पर निर्भर है। मगर आप कह रहे हो कि जो बुरा हो रहा है दुनिया में वो ईश्वर पर निर्भर नहीं है। तो फिर यहां से भी ईश्वर की सिद्धि नहीं हो इसीलिए मैंने पूछा कि फिर बी के ईश्वर की सिद्धि के कैसे करता है? क्या मैंने बताया ना आपको जैसे जिस प्रकार आपने देखा कई बीज होते हैं समय पर अंकुरित होते हैं। धरती में रहते हैं लेकिन जैसे नीम है इस समय अंकुरित संभवता नहीं होगी। जैसे बरसात गिरेगी नीम अंकुरित होगी। कुछ सीजन भर चलते रहते हैं। ऐसे ही पर जैसे मैंने फिर उसके बाद बताया कि एक बच्चे का आपको उदाहरण दिया था कि जो बुराई है उसका भी बीज कहीं ना कहीं सूक्ष्म में बहुत पिछले हिसाब के उसमें कोई चीज आपको पता है तो संसार में नष्ट नहीं होती है। बीज सबका होता है। पड़ा रहता है। बीज सबका पड़ा रहता है। लेकिन जैसे जिसका सीजन आता है, जैसे उसका वातावरण आएगा, जैसे ही लोग उस पे कंट्रोल नहीं है ना ईश्वर का। नहीं जैसे मान लीजिए कहीं चोरी हो रही है। एक बात बताओ जैसे चोर अगर घंटा चुरा लेता कहते मंदिर में भगवान बचाने नहीं आए जबकि वो भगवान का ही मंदिर है। बराबर क्यों? क्यों नहीं? इसलिए क्योंकि मैं बताता हूं। इसलिए क्योंकि भगवान को घंटा चुराने से फर्क नहीं पड़ता। सुनिए। जैसे जैसे आपने वो कहानी सुनी होगी दयानंद जी की। दयानंद जी आर्य समाज वाले जानते
00:27:27:06 हैं ना? उसमें उन्होंने एक तर्क दिया कि मैं शिवलिंग की पूजा क्यों करूं? ये तो खुद अपनी ही रक्षा नहीं कर पा रही। इस पे चूहे कूद रहे हैं। जी। तो उसमें बात ये बनती है कि हमें बुरा लग रहा है कि चूहे उस पे कूद रहे हैं। भगवान के तो बच्चे हैं वो। उनको तो गुदगुदी हो रही है। हो सकता है। मासूमियत देख रहे हो चूहों की। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो घंटा चुराना बुरा हमारे लिए है। जैसे कि ईश्वर को तो पता है कि मुझे दोबारा आना है। आपने अभी यहां लिखा हुआ आपके पोस्टर में कि मैं आज से पहले 5000 साल पहले यहां इसी समय आ चुका हूं। लिखा है। ये चीज मैं नहीं जानता हूं। मेरे लिए सच्चाई क्या है कि मैं तो आज ही आया हूं। यह सच्चाई ईश्वर जानते हैं आपके हिसाब से। जी। तो ईश्वर को ईश्वर जानता है घंटा चुराना बुरा नहीं है। क्यों बुरा नहीं है? क्योंकि 4:24 में लिखा हुआ है सब कुछ ब्रह्म ही है। घंटा भी ब्रह्म है। क्रिया भी ब्रह्म है। और फल स्वरूप जो प्राप्त होने वाला है वो भी ब्रह्म है। अलग मैं उसमें बता रहा हूं। तो जब उस कांसेप्ट को हम लेते हैं सब कुछ ब्रह्म ही है। तो ब्रह्म ये जानता है कुछ हो ही नहीं रहा है। ये घंटा चुराना ये सब होना तो यह समझ रहा है। वास्तविकता तो क्या है? कुछ हो ही नहीं रहा है। तो ये ये बताना चाहूंगी क्योंकि वो क्यों मना नहीं कर मैं पूरा कर लूं। एक मिनट तक मैं पूरा कर लूं। तो क्या है कि इस पे आ जाते हैं घंटा चुराने पे कि भगवान को घंटा चुराना
00:28:42:07 बुरा लग रहा है। भगवान को क्षति पहुंचा इसका मतलब भगवान भी दुखी हो सकता है। यदि उसको कोई चीज बुरी लग रही है तो इसका मतलब वो भी दुखी हो सकता है। तो फिर वो परम मुक्त नहीं कहलाएगा। परम मुक्त नहीं कहलाएगा तो हमें कहां से मुक्ति देगा? तो हमें मानना पड़ेगा वो परम मुक्त है। उसको कोई चीज प्रभावित नहीं करती। घंटा चुराना चूहों का कूदना उसको प्रभावित नहीं करता। तो चूहे कूद के कूदा के ले जा रहे तो अपना आनंद ले रहा है उससे। उसने सत्य और असत्य का बोध बहुत पहले दे दिया। ऋषि मुनियों के माध्यम से भी। बात ब्रह्मा कुमारी इसकी नहीं है कि आज ब्रह्मा कुमारी कह रही है। सबको पता है अच्छे और बुरे का ज्ञान है। क्या चोर को नहीं पता? पता है सब कुछ पता है अच्छे बुरे का लेकिन वह पिता है क्योंकि जिसने मंदिर बनवाया क्या पता उसमें जिसने पैसा उसने भी चोरी का हो रिश्वत का हो जब एक चोर बनवा सकता है साहूकार जो भी हो उससे कोई लेना देना लेकिन बात ये है उसको एक बात हंसी मैं एक हंसी में कहूंगी कि पिता परमात्मा है और उसे इस बात का जिसके पास जो कमी हो बेटा ले जाओ तुम मैंने इसका मतलब है वो मना नहीं क्योंकि बच्चा है तुम ले जाओ बाकी ताकि उसका परिणाम लोगे तो परिणाम नहीं मिलना नहीं मिलना है। वो इसलिए परे है इसलिए दूर रहता है क्योंकि उसने
00:29:57:18 सब चीज का बोध दिया है। आप जो करेंगे उसका परिणाम उस तक नहीं जाने वाला है। इसका इसका मतलब ये है कि सब कुछ का आधार तो ईश्वर ही है। चाहे वो अच्छा दिख रहा है, बुरा दिख रहा है, आधार उसका ईश्वर ही होगा। यह हमें मानना पड़ेगा। हां ये बात अलग है कि जैसे एक बच्चा होता है ना उसको जब डॉक्टर इंजेक्शन लगाता है तो बच्चे के अकॉर्डिंग वो बुरी चीज है इंजेक्शन लगना। मगर डॉक्टर जानता है कि मैं इसके भले के लिए वो लगा रहा हूं। तो हमारी जानकारी यानी हमारा जो पर्सपेक्टिव है उसमें ऐसा हो सकता है कि भगवान बुराई करता हुआ दिखे। यानी कि फिर वही बात आ गई कि दुनिया में अगर जैसे कोई नवजात शिशु हुआ और सुनामी आ गई। भगवान के कहर से वो नहीं जी पाया। तो हमें यह मान हमारी दृष्टि में वही बहुत बुरा हुआ। एक नवजात शिशु खत्म हो गया। मगर जब ईश्वर की दृष्टि से मानेंगे तो उसने उसको एक और बेहतर जन्म दे दिया। उसके जरा से पाप बचे होंगे। उसको देवत्व प्राप्त करना होगा। तो उसने उसको तुरंत ही उसके इस जीवन में जो उसको कष्ट भोगने थे उससे बचा लिया। ईश्वर के नजरिए से। जैसे हम आप मंदिर जाते तो दो चीजें पहले भी देखती थी। मैं कई मंदिरों में गई हूं। तो चमड़ी और चमड़ी की कोई चीज अलाउ नहीं होता। हम हम चीजें जिन नेत्रों द्वारा जो कुछ देखते हैं उसी बारे में सोचते हैं। संभवत सुनते तो सोचते, पढ़ लिया तो सोचते।
00:31:12:26 बस इस इतने तक हमारी सीमित है। जैसे आपने कई फिल्में देखी होगी लाइफ में। हमने भी देखी उस पुरानी दुनिया में तो एक जगह मैंने देखा कई बार देखते जैसे हम आप जब कभी टीवी नहीं हुआ करती तो किसी घर जाते थे और अपने घर में कोई आराम से अपना सीरियल देख रहा है और उसका एंड हो सीरियल का। तो हम चिल्लाते फिर भाई आप मेरे से थोड़ी बात कर लो मेरे को जरूरत तो बोल आप चुप हो बोले इसमें क्या है क्यों हो रहा है क्या हो रहा है कहता आप चुप रहिए चुप रहिए चुप रहिए आपको कुछ नहीं पता मैं आपको बाद में बताऊंगा और वो कितने मजे से मजा लेता ताली बजाता हंसता है या रोता जो भी उस समय उसको लग रहा हो तो उसके अनुसार वो प्रेडिक्शन करता है देख के लेकिन हम बेकार में ये सोचा करते पता नहीं इसमें क्या मजा ले रहा है उसको मार रहा है वो रो रहा है ऐसा हो रहा जब पूरी मूवी खत्म हो जाती है। बस यही का्सप्ट जब पूरी मूवी खत्म एक सेकंड सेकंड तब हम बताता आपको नहीं पता ये मेरा बहुत समय सीरियल चल रहा था। मैं देख रहा था इसको आज इसका एंड होना था। आज मजा आज हीरो उसको मारना था क्योंकि इसने उसकी बहन को चुराया था। मां को तंग किया था। इसलिए उसको मारना था। जिसने पूरी फिल्म देखी थी। जिसने पूरी फिल्म देखी थी। चिल्लाए क्यों? क्योंकि जिसने पूरा देखा उसे ही ज्ञान होगा। जिसने अधूरा देखा
00:32:28:07 अधल गगरी छलक जाएगी। व्यवधान पैदा करेगा। ठीक ऐसे हम आप दो नेत्रों से वही देख सकते हैं। वही सुन सकते हैं जितनी हमारी एक कैपेसिटी है। उसे हम कहे दिल्ली देख ले। हम देख नहीं सकते। हम सोच सकते दिल्ली के बारे में। ठीक परमात्मा हमारी सारी फिल्मों को देखता है। हमारे सारे जीवन के कालचक्र को उसने जाना है। इसलिए वो साइलेंट है। इसलिए चुप है। उसके बावजूद भी फिर भी ज्ञान देता है कि बच्चे सुधार हो जाए। परिवर्तन हो जाए। नहीं करते हैं तो उससे फिर कोई लेना देना नहीं। उसका हिसाब किताब परिणाम का हमें ही मिलना है। अच्छा तो तो इसका मतलब ये तो क्लियर हुआ ना कि जो हमें दिखते तो चिल्लाना है। नहीं नहीं जैसे जो हमें बुराई दिख रही है जी हमें जो बुराई दिख रही है वो असल में उसका भी अधिष्ठान भगवान है। वो बात अलग है। वो बुराई है ही नहीं। वो वो सब जानता है किसके साथ अगर मैं मान लीजिए फॉर एग्जांपल जैसे मैंने अभी आपको ये जो आपने फिल्म का उदाहरण दिया ना ये बिल्कुल परफेक्ट है इसके लिए। जैसे मैंने आपको मारा और हमें मार दिया आपको। ठीक है? आप हमें नहीं मार पाए किसी कारणवश अगला जन्म लिया। मैं बन गई साधु आप नॉर्मल इंसान रहे। अब मैं भगवान के मंदिर में गई भगवान मैं 20 सालों से सन्यासी बन गया हूं। मेरे सारे पाप नष्ट कर देना। मेरा कोई दुश्मन ना हो। मुझे कुछ ना हो। हम कह रहे
00:33:43:08 ना हम वर्तमान जीवन को देख रहे हैं। और आप भी कहते हे मालिक जिसने मुझे कष्ट दिया हो। बड़ी पीड़ा दी हो किसी तरीके से मेरे परिवार को या मुझे जो कुछ कह रहे हो आप भी तो भगवान सामने कह रहे हो और हम बन गए सन्यासी अब हम चाहते हैं सन्यासी बन गए तो पूरा दोष मुक्त हो जाए लेकिन आप भी भगवान के हम भी भगवान के तो उसने ज्ञान तो मुझे दे दिया साधु तो मुझे बना दिया लेकिन आपके साथ कभी नाइंसाफी नहीं कर सकता कई बार साधु संत होने बावजूद गिरे क्यों लोग जेल में क्यों लोग गए क्यों उनके साथ कई घटनाएं कभी रेल से कट गए या गैस सिलेंडर फट गया या जल गए या मर्डर हो गया। कई साधु संतों का भी मर्डर हो गया। वर्तमान आप थर्ड ने देखा कि ये तो साधु था 40 साल से। इसका मर्डर क्यों हो गया? उसका मर्डर इसलिए नहीं हुआ कि वो साधु है। वो वर्तमान उसने कुछ और ऐसा किया जिसकी वजह से हुआ है। वो भी भगवान का बच्चा। आप भी भगवान के बच्चे। आपका इंसाफ वो कहते हैं ना जब मरा तो उसने कहा ऊपर वाला देखेगा। तो उसने कहा तुम साधु बन गए तो वर्तमान के हो। लेकिन जो पिछला हिसाब है जो मेरे बच्चे के साथ इसके साथ किया था उसका तो तुम्हें साधु बन करके भी चुकाना पड़ेगा ही और आपने कहानी सुनी थी ना मैं इससे संक्षिप्त कहूंगी कि उसने कहा था एक साधु जेल में चला गया बोला जब आप
00:34:58:09 जज ने उससे दोष मुक्त वरी कर दिया तो उसने कहा कि किसी ने पूछा आप कुछ भी नहीं किए तो फिर आपको ये तीन साल या एक साल जेल में क्यों रहना पड़ा बोला इस जन्म का थोड़ी ना पिछले जन्म का वो तो तो बस यही है हम नेत्रों से तो कहने का मतलब मतलब सिद्धांत यही प्राप्त हुआ कि दुनिया में जो भी कुछ हो रहा है उसका दृष्टांत भगवान ही है। वो बात अलग है कि हमें जो बुरा दिख रहा है वो बुरा है ही नहीं। उसके पीछे भी कोई अच्छाई है। कारण है ना? हिसाब की तरह। हां मतलब जैसे मान लीजिए कहीं अगर चोरी भी हुई है तो हमारे लिए वो चोरी बुरी चीज है तो हम तो वो हमारे लिए बुराई है मगर ईश्वर के मतलब ईश्वर का वहां पे भी ईश्वर की सत्ता है चोरी होने में भी उसकी स्वीकृति है स्वीकृति नहीं है हमारे कर्मों का रोल है नहीं जैसे अभी आप जैसे अभी आपने कहा ना कि उसको सजा दे दी ईश्वर ने दूसरे को कर्मों का फल हिसाब उसके पास रहता सजा प्रकृति देती प्रकृति के द्वारा ईश्वर कर्मों का फल नहीं देता है नहीं बिल्कुल नहीं देता हम जो कर रहे हैं ना उसका अपने आप समय आने पर अपने आप आपको मिलना है। सेट है कई चीजें होती है। यह जो जो भी हम कर रहे हैं यह ईश्वर की सत्ता के अंदर है या नहीं है? सत्ता के अंदर है लेकिन वो साइलेंट साक्षी भाव साक्षी हो सकता है। नहीं वो कंट्रोल कर सकता है कि नहीं? कंट्रोल तब कर सकता है जब आप उसके अनुसार हो। अर्जुन से श्री कृष्ण ने कहा क्या
00:36:13:18 मैं जानता हूं किसने मतलब जैसे जो ईश्वर को नहीं मानता है उसको ईश्वर कंट्रोल नहीं कर सकता? नहीं मैं बताती हूं। जैसे जुआ किसने खेला? क्या श्री कृष्ण से पूछ के जुआ खेला गया? नहीं खेला गया और जब वो मांगने गए तो मांगने गए सुनिए तो तो बताया कि मैं क्यों नहीं युद्ध में एक सवाल आप युद्ध में क्यों नहीं लड़ेंगे क्यों नहीं उठाऊंगा है ना क्यों क्योंकि वो पांडवों को भी जानता है उसने जब उसके उसके अनुसार जब आप नहीं चले जब आपने जुआ खेला तब तो उससे पूछकर नहीं खेला तो युद्ध में आपका साथ क्यों दें तो वो साक्षी हो के वो खड़ा रहा सारथी होकर बनकर रथ को चलाता रहा और चुपचाप देखता रहा ज्ञान भी देता रहा। उसने सद विवेक का भी ज्ञान दिया। लेकिन उसके बावजूद अगर कोई परिवर्तन होता तो ठीक और नहीं हुआ। दुर्योधन को भी समझाया। सब कुछ किया। जब सब कुछ होने के बाद व्यक्ति नहीं सुधरता है तो वो उसका मालिक नहीं होता है। जब हम भी आपको भी समझाएं। आप हमें समझा दे। नहीं समझेंगा तो उसका कोई दोष नहीं है। उसका कोई रोल नहीं है। बताना उसका कर्तव्य है। बड़े होने पर कई बच्चे भी मां-बाप से कहते आप चुप रहिए। हम कोई छोटे थोड़ी ना हमें जो करना है हम करेंगे और पीछे जो कुछ होगा उसे देख लिया जाएगा। हम आप बोलते ऐसे ईश्वर से बोलते कई तो हम लोगों से जवाब देते हैं। बहन जी आप मुझे मत समझाइए जो
00:37:28:19 कुछ होगा हम देख लेंगे। मैं ईश्वर को नहीं मानता हूं। मैं ही उसका मालिक हूं और आप मुझे इसका कोई भय ना करें। धर्म के लोग ऐसे हैं। कोई भय की सवाल नहीं। बस सुधरात्मक दृष्टिकोण से कहा जाता है। नहीं यहां पे ना दो बातें हो गई। एक बात तो यह हो गई कि जो परमात्मा है वही सबका अधिष्ठान है। अच्छाई बुराई सबका अधिष्ठान मतलब उसकी सत्ता में ही है। उसके कंट्रोल में ही है। वो बात अलग है कि उसके पर्सपेक्टिव से वो बुराई बुराई है ही नहीं जो हमें बुराई दिख रही है। मगर जो हमें बुराई दिख रही है हमें ये मानना पड़ेगा। वो भी ईश्वर की सत्ता में ही है। वो फिर आप ये ये एक तो ये कांसेप्ट हो गया। फिर आपने दूसरी बात ये कही है कि नहीं ईश्वर कुछ नहीं करता है। आपको आपके कर्मों का फल मिलता है। स्वतः जो प्रकृति देती रहती है आपको। ईश्वर उसमें केवल दृष्टा भाव है। ईश्वर की सत्ता नहीं है। तो इसमें से कौन सा लेना है? ईश्वर की सत्ता है कि नहीं है? नहीं उसने जब आपको ज्ञान ईश्वर की सत्ता का मतलब मैं बता दूं पूरे संसार का मालिक वही मैं एक मिनट ईश्वर की सत्ता का मतलब यह बता दूं जैसे हम कहते हैं कि सर्वशक्तिमान यानी कि समस्त कार्यों को करने की शक्ति उसमें क्षमता रख क्षमता है तो दुनिया में जो भी कुछ घटित हो रहा है वो उसका जो मूल है वो ईश्वर ही है। अगर ये हम मानेंगे कि सब कुछ का ईश्वर मूल है तो ही
00:38:43:27 ईश्वर की सिद्धि वाला जो दो कांसेप्ट मैंने आपको बताए थे ना कि ऐसे ईश्वर को हम सिद्ध कर सकते हैं। उस कार्य का वो मूल नहीं है। वो मूल है हम मनुष्यों की जो पिता है वो जड़ है। वो मैं मैं बता रहा हूं कैसे कैसे मूल नहीं है। जैसे कि मेरे पास मेरे सामने एक व्यक्ति चोरी कर रहा है और मैं वहां खड़ा हूं। जी और मेरे पास ताकत है कि उसको मैं रोक सकूं। ठीक है और मैं नहीं रोक रहा हूं। मैं नहीं रोक रहा हूं। जैसे कि भीष्म पितामह चाहते तो द्रोपदी का चरण रुक जाता। परंतु भीष्म पितामह ने अपनी जो प्रतिज्ञा है उसको वरीयता दी कि मैं तो राजगद्दी के साथ खड़ा रहूंगा। मैं विरुद्ध नहीं जाऊंगा। तो सबसे पहले विवेकी का दायित्व ज्यादा होता है तो उनको ही सजा दी भगवान ने। क्योंकि तुम तो जानते थे अधर्म और अधर्म क्या है? हां रोक तो सकते। बात कह तो सकते थे। हां तुम वहां पे ऑब्जेक्शन कर सकते थे। तो तुम मौन मौन स्वीकृति थी तुम्हारी। तो भगवान की सत्ता अगर हम सब जगह मान रहे हैं। अब मैं और एक मिनट भगवान की सत्ता हम सब जगह जब मान रहे हैं और फिर वहां पर ये हो रहा है कि भाई कुछ हो रहा है तो हमें ये मानना पड़ेगा कि भगवान की सत्ता तो है वो बुराई हमें दिख रही है। भगवान के अनुसार वो बुराई नहीं है। इसलिए भगवान का मन है। वो उसका हिसाब किताब है कि कहां पे वो बोले, कहां पे ना बोले वो उसका हिसाब किताब है। वो हिसाब किताब हम नहीं जानते हैं।
00:39:59:01 उसके हिसाब किताब में उसने तो इसलिए हम भगवान को दोष नहीं दे सकते। तो एक बड़ा है और बड़े के नाते उसने एक संस्कार का और इस संसार में कईयों का निर्माण किया जज का पुलिस का कोर्ट कचहरी जो भी डीएम एसडीएम जो भी हो उनका भी तो इस संसार को जिस प्रकार से संसार चलता है उस प्रकार के उसने उच्च अधिकारी भी दिए। इस संसार को कंट्रोल करने के लिए उसने अपने बच्चों को बिठाया है ताकि आराम से ये सुचारू रूप से सही कह रहे हैं मगर जब बेस में जाएंगे मूल में तो मूल में तो हमें मानना पड़ेगा कि सबका आधार वही है इसलिए क्यों जब आप जैसे आप दो भाई लड़ जाए और आपके पिता समझाएं खूब समझाए बचपन से समझाते हैं लेकिन आप तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है ना पिता नहीं लेकिन एक समय ऐसा आएगा लड़का बड़ा हो जाएगा अपने पिता को धक्का दे देगा सर्वशक्तिमान होने का अर्थ नहीं है कि वो छोटी-छोटी बातों में में आकर छोटी-छोटी चीजों में आके वो आए और आपको कहे आकर आपको समझाए आपको क्यों क्योंकि इसलिए नहीं बोला मैंने अभी आपको कि भाई वो सबकी रील को जानता है वो जो गाली हमें कोई प्यार कर रहा है वो दोनों को जान रहा है कि इसका पास्ट और कितने जन्म का क्या हिसाब है इसलिए बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल इसका मतलब जैसे छोटी-छोटी बातों में पिताजी नहीं बोलते हैं इसका मतलब है कि वहां पे उनकी वो होने देना
00:41:14:07 चाह रहे हैं क्योंकि वो जानते हैं इसका क्या हिसाब किताब है वो वो रोक सकते हैं मगर वहां वो छोटी-छोटी बातें हैं क्योंकि उनको व्यर्थ लग रही है। रोक दे वो तो फिर आपके साथ अन्याय नहीं हो रहा। मैं रोकने की बात नहीं कह रहा हूं कि वो रोक दें मगर उनकी सत्ता में हो रहा है ये तो मानना पड़ेगा। उनकी साक्षी हो करके देख नहीं उनकी उनकी सत्ता उनकी स्वीकृति में हो रहा है। स्वीकृति नहीं। स्वीकृति हमेशा आपने कहा मैं छोटी-छोटी बातों में नहीं बोलूंगा तो इस मौन स्वीकृति तो हो गई। स्वीकृति इसलिए नहीं कहेगी कि समझाने के बाद नहीं सुलझा मामला तो वहां पर फिर अपने आप इंटरफेयर नहीं करता क्योंकि वो फिर पास्ट को देखता है इसलिए देखता कि हिसाब किताब जो कुछ चुकता तो मैं कह तो रहा मैं इस बात को मान रहा हूं आपकी कि वो मैं इस मैं आपकी ये बात मान रहा हूं कि उसकी मौन स्वीकृति इसलिए होती है क्योंकि उसने पूरी पिक्चर देखी है। हां इसलिए यहां पर और हम लोग ऐसा इसलिए कहते हैं कि सबका अधिष्ठान वही है तो बुराई बुराई दुनिया में एकिस्ट ही कहां करती है वास्तविकता तो यह है क्योंकि जो जिसने जैसा किया उस जैसे जैसे वो वाली बात है नैनम चिंताती अब कोई मर रहा है वो दुखी हो रहा है अब वो भगवान को दोष दे इसका भी कारक जो है भगवान ही है अब भाई तू मर ही नहीं रहा है तू तो आत्मा है तू मर ही नहीं सकता तू क्यों सोच रहा है कि तू मर रहा है तो कहने का मतलब ईश्वर जानता है कि तुम आत्मा हो
00:42:29:08 तुम नहीं जानते हो कि तुमने अभी अब अगर थ्योरिकली पढ़ भी लिया है तो हमने अभी महसूस नहीं किया है कि हम अमर हैं। है ना? तो ईश्वर जानता है कि तुम अमर हो। तो इसलिए ईश्वर वहां नहीं बचा रहा तुमको। अब तुम दोष दे दोष दे रहे हो। देखो ईश्वर तो हमारे पर्सपेक्टिव से जो बुराई हो रही है वास्तव में बुराई हो ही नहीं रही कहीं। कहीं कुछ है ही नहीं। मगर हमारे पर्सपेक्टिव में यदि कोई लिखा ना जो कुछ हो रहा है सब अच्छा है। सब कुछ सबका अधिष्ठान। क्योंकि जो जिसको ये ज्ञान हो गया आत्मा का दृष्टि से वो समझा तो सकता है। अब इसमें इसमें एक चीज और है। जैसे उन्होंने कहा सातवें अध्याय में कि समस्त भूतों का सनातन बीज मैं हूं। ठीक है? अब हमने कहा कि सब कुछ उत्पन्न उसी से हुआ है। पर फिर उसके बाद लोगों ने अपने-अपने मन के अनुसार काम कर लिया। तो इसमें फिर ये मानना पड़ेगा क्या भगवान को मालूम नहीं था कि मैं किसको बना रहा हूं। चोर को बना रहा हूं। डकैत को बना रहा हूं कि लुटेरे को बना रहा हूं। तो वहां पे मानना पड़ेगा ईश्वर ने अपनी सत्ता, ईश्वर की स्वीकृति के साथ ही है जो भी है। हां। मगर यह है कि भाई वो क्या कहां पे मौन है, कहां पे एक्टिव है, कहां रोक रहा है। यह हम इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि उसने पूरी पिक्चर देखी और हमें इतनी दिखाई दे रही है। और रही भैया यानी कि वही वाली बात कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। और रही उसकी चोरच के जब हमारे मां-बाप हमें जन्म देते तब ये थोड़ी ना सोचते हमारा बच्चा चोर चक्का अच्छा बुरा
00:43:44:09 निकल जाएगा। वो बच्चे की भावना से ही सदैव देखते हैं और निकल जाए तो उसके बीज पर निर्भर करता है। उसकी अपनी जैसे जैसे रहा होगा संस्कार उसके अनुसार वो चल रहा है। तो परमात्मा किसी को पैदा नहीं करता। वो सिर्फ बच्चा समझ के सृष्टि पे आता है। वही बच्चा समझ के ही देखता है उस बच्चे को बाकी उसका अपना भी केवल सारे काम करे तो फिर हमें जन्म क्यों दिया सृष्टि पे भेजा। सब कुछ उसे ही करना पड़ेगा। तो फिर होने का मतलब ऐसे पिता ही हमारा सारे काम करे तो कहते भैया तुम्हारे होने का फायदा क्या है? तो परमात्मा ने हमें अपने जैसी संरचना जानवर नहीं बनाया है। जानवर को भी समझ हमें आहार विहार और आचार दे दिया परमात्मा ने तो अपनी जैसी समक्ष रचना दो वो कांसेप्ट आ गए निकल के समक्ष रचना बनाई अपने जैसा हमें बनाया विवेक दिया समझ दिया सब कुछ फिर भी हम गलती करे तो उसे दोष देना ये मिथ्या है मेरे सामने जी बाकी कौन कैसे सोचता है वो दो कांसेप्ट आ गए निकल के एक कि हमारी मुक्ति कैसी है ब्रह्माकुमारीज की और दूसरा कि अह क्या कहते हैं ईश्वर ही अच्छाई बुराई सबका मूल है नहीं मूल नहीं मौन है वहां मूल तो मैं जड़ क्यों चलिए इसमें इसमें इसको ऐसे ही इसको जो है हमारे पिता ने हमें समझाया जब पिता हमारा समझा सकता है उसे दोष नहीं दे सकते तो हम इसमें आगे बढ़ जाते हैं इसको छोड़ के अब
00:44:59:15 इसमें एक अगली चीज ये आती कि जैसे हमने कई जगह कहा कि वो ये नहीं है तो क्या ब्रह्मा कुमारीज के द्वारा जो ईश्वर जिसे माना जा रहा है वो सर्वशक्तिमान है देखो आपको मैं एक बात समझाना चाहती हूं जी इसे मक्का मदीना में संज्ञा नाम का काला पत्थर रखा क्या अपने हम उसको शिवलिंग बोलते हैं छोटा पत्थर रखा है शालिग्राम शिव जो भी वो मानते हैं पत्थर पत्थर है उसको निराकार को मानते हैं मानते हैं बराबर जी काशी विश्वनाथ में शिवलिंग है हम अपने सनातन ने मानते हैं अमरनाथ में बरफ की शिवलिंग बनती है मानते हैं उन्होंने भी मान्यता दी सन्यासियों ने सनातनियों ने पशुपतिनाथ नेपाल में भी शिवलिंग है मानते हैं 12 ज्योति ज्योतिर्लिंग है। हां नहीं राम को भी राम ने भी शिवलिंग को स्थापित किया पूजित किया माना बराबर गोपेश्वर नाथ का मंदिर मथुरा में है। नहीं नहीं मैं मैं ये कह रहा हूं ईश्वर सर्वशक्तिमान केवल ब्रह्मा कुमारी ना कहते कि वो जो मान रही जिस ईश्वर को वो मान रही है वही सत्य है। मैं उसके फॉर एग्जांपल दे रहा हूं। नहीं नहीं ईश्वर मेरा क्वेश्चन मेरा क्वेश्चन आप समझ नहीं पाए। एक्चुअली क्या है? ईश्वर तो सब लोग मानते हैं जी कि क्रिश्चियंस भी कहते हैं गॉड है।
00:46:14:24 मुस्लिम भी कहते हैं गॉड है। मैं बता रही थी। जी मैं वही कह रहा हूं। मगर क्या है कि ईश्वर की जो थ्योरी देते हैं वो सबकी अलग-अलग हो जाती है। कहीं पे कुछ ईश्वर के बारे में जैसे मोक्ष की थ्योरी अभी आप मैंने रामपुर का हाथी था ना जिससे देखा उसका वर्णन विज्ञान वैसे ही तो फिर वो चेक करना पड़ेगा कि इसमें से अंधा कौन है और देखने वाला कौन है। यह चेक करना पड़ेगा। तो खैर वो तो एक अलग बात हो गई चेक करने वाली बात। मगर जैसे हम बात कर रहे हैं कि थ्योरी अलग-अलग है। अब क्या है कि अ ब्रह्मा कुमारीज ये मानता है कि जैसे आपने कहा कि हम मौन है यहां पर तो और ब्रह्मा कुमारीज मेरे ख्याल से ये भी नहीं मानता कि ईश्वर अवतार लेते हैं। ईश्वर पर काया प्रवेश करते हैं। ऐसा मैं जानता हूं। तो अवतार आपकी दृष्टि में अवतार क्या है? स्वयं ईश्वर ऐसे ऐसा रूप धारण कर ले जो आंखों का विषय बन जाए। यह अवतार है। अवतरित माने क्या होता है? अवतरित मतलब अपने अपने नीचे उतरता है। जो उतरता है उसे शंभू भी कहते हैं। खुदा भी कहते हैं। खुदा तो आप कहते हैं मैं नहीं कहता। नहीं देखिए शब्द जो होता है भैया वो किसी धर्म के लिए नहीं बना होता। मैं मैं उस हम लोग इस बात अभी बदल जाएगा टॉपिक। तो कहने का मतलब अवतरित मतलब जो ऊपर से नीचे की ओर आता
00:47:30:04 है फिर वो परकाय प्रविष्ट देवताएं जन्म लेते हैं। वो भी आते हैं। लेकिन मनुष्यों जैसा उनका वैसा जन्म कष्टदायक जन्म नहीं जैसे हम जैसे एक मान्यता है कि भगवान के भगवान जो हैं वो राम कृष्ण इत्यादि रूपों में अवतरित होते हैं। बिल्कुल मनुष्यों जैसे ही हमारे बीच में आकर के रहते हैं। और ब्रह्मा कुमारी इसकी मान्यता है कि वो अवतार नहीं लेते। स्वयं मतलब मनुष्यों जैसा रूप नहीं धारण करते। शरीर वो किसी और के शरीर में प्रवेश करके बात इत्यादि कर सकते हैं। यह बात है। तो यहां पे फिर वो जो वाली मान्यता आपने कहा था ना कि सब जगह भगवान ही है। फिर ब्रह्मा आपने कहा नहीं आपने ये कहा कि क्या कहते हैं ये जो बात आई थी ना कि केवल ब्रह्मा कुमारी का ईश्वर नहीं है वो। हां मैं बता रहा हूं। है ना? तो ईश्वर तो सबका एक ही है। मगर ईश्वर को लेकर के सबने अपनी-अपनी मान्यताएं अलग कर रखी हैं। भी बताने जा रहा हूं। हां। तो अब यदि हम यह कहते हैं कि क्या ब्रह्मा कुमारी के द्वारा जो माना जाने वाला ईश्वर है कि यह ईश्वर है ब्रह्मा कुमारी इसकी वहां पर डेफिनेशन है ईश्वर की जो धारणा है तो उस धारणा के अनुसार जो है क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान है? अभी मैं बता रही हूं अगर केवल ब्रह्मा कुमारी नहीं क्योंकि आप ये मान लीजिए जो सत्य है वही सर्वमान्य
00:48:45:25 है और जो सर्वमान्य है वो सत्य है और बहुत सूक्ष्म भी है जिसे इन नेत्र द्वारा नहीं देखा जा सकता जी तो आप जापान में भी ले लीजिए स्टैंड पर उन्होंने लाइट को जलाया उन्होंने भी प्रकाश कोष निराकार को माना आप बौद्ध धर्म में भी ले लीजिए कहीं पर भी उन्होंने ही लाइट को ही ज्यादातर महत्व दिया है हमने नहीं बल्कि जब आप ये हेतु मंत जब सारे धर्म चारों पांचों धर्म जितने भी धर्म है छोटे बड़े भी है ना वैसे तो चार ही बड़े-बड़े हैं अन्य सभी धर्मों ने जब उसकी स्वीकृति दी है स्वीकृति दी है तो फिर निश्चित रूप से वो सत्य इसका मतलब क्योंकि जो बात कई लोग कह रहे हैं जो उसके अनुसार वो चीज वही कई लोग कह रहे हैं मान्य है और जो मान्य है वो सत्य है भाई अब कोई ना कोई एक धर्म को मानने वाला होता है और उसमें भी प्रकाश का निराकार का वर्णन किया गया है और जहां तक आप गीता में भी एक जगह वर्णन लिया उन्होंने कहा मैं नहीं करा रहा हूं कोई और सत्ता हमारे पास शायद कटिंग अभी नहीं मौजूद होगी कभी संभवत कटिंग मिली तो मैं दिखाऊंगी कोई और करा रहा है श्री कृष्ण देखो देवताएं मां से जन्म लेते हैं थोड़ा विषय बदल जाएगा जो विषय चल रहा है बड़ा इंटरेस्टिंग चल रहा है कि मान्यता जी बस मैं इतना क्योंकि धर्म
00:50:01:06 के विषय में जितनी भी मान्यताएं हैं उनमें जो चीज इक्वल आ रही है कि निराकार निराकार निराकार तो हम निराकार तो मानते हैं पर अवतार वाला कांसेप्ट सब में नहीं है तो इसलिए हम नहीं मानते हैं। एक तो यह बात हो गई। अच्छा एक चीज ये क्लियर कर दीजिए थोड़ा सा कि वेद ने यह कहा है कि जो उसका अनुसरण करेगा यजुर्वेद 31 19 में है ना नंबर बदल सकता है उसमें उन्होंने कहा है वेद ने कि नान्यापनथा कि मेरे अलावा और कोई मार्ग नहीं है यह जीवन मरण के चक्र से छूटने का छूटने का जीवन मरण में नहीं आएगा दोबारा छूट ही जाएगा मुक्त हो जाएगा परम मुक्ति वो जो कैवल्य मोक्ष है तो क्या क्या आप वेद की इस बात को मानते हैं? देखिए रही जीवन मरण मैंने कहा कहा ना आपको मुक्ति किससे चाहिए? इंसान आपने बहुत पीछे अभी आधा घंटा पहले आपने कहा इंसान कभी-कभी अपने आप अपनी बीमारियों से या कोई कई ऐसी चीज शास्त्रों में ये लिखा है कि तुम्हारा जन्म होगा ही नहीं किसी रूप में। देव देवता के रूप में भी नहीं। एक मुक्ति की बात चली थी वहां पे तो मुक्ति वो इंसान किससे चाह रहा आखिर वो छुटकारा किस चीज से चाह रहा है? यह समझना होगा। वह स्थित प्रज्ञ होना चाह रहा है। मैं किसी के भी
00:51:16:07 किसी के ऊपर निर्भर ना रहूं। मैंने इसको कहते हैं इसको कहते हैं परम स्वतंत्र मोक्ष। पर परिस्थिति बस कई बात कई इंसान कई बातें कहता है। लेकिन अगर मैंने पहले कहा ना फिर वही अगर व्यक्ति को सही कर दिया सुख हो जाए सब कुछ हो जाए फिर वह बदल जाता है। ये मनुष्यों की अपनी सोच है। वो तो परमात्मा को गाली भी देता है और अच्छा अगर हो जाए तो उसकी सराहना भी करता है। वो भी करता है। ठीक ऐसे ही मैं शास्त्रों की बात कह रही हूं। मुक्ति ऐसे कहा है ना कि उसमें लिखा है कि मुक्ति नहीं होगी। उसमें बोला है ना कि वो इंसान कह रहा है शास्त्रों के अनुसार। इंसान नहीं कह रहा है। अलग जी। हां जी शास्त्र में वर्णन आया है कि वेद के अलावा परम मुक्ति ये दो चीजें एक तो आपने कहा कि मुक्ति है ही नहीं मगर शास्त्र कह रहे है मुक्ति है दूसरा दूसरा आपने कहा मुक्ति मुक्ति अर्थात वो चलिए ठीक है वो वाली मुक्ति आपकी जो देवत्व वाली मुक्ति है उसका वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि भाई जो यह वाली मुक्ति प्राप्त करते हैं वो स्वर्ग में जाएंगे देवता स्वरूप हो जाएंगे देवता जैसा जीवन जी लेंगे मगर एक परम मुक्ति की बात वहां की गई है शास्त्रों में बहुत बार की गई है कैवल्य मोक्ष की बात की गई है सायुज्य मोक्ष की बात की गई है। सामिप्य मोक्षी परम मुक्ति की बात की गई जहां से वापस नहीं आना है। मुक्त ही हो गए। तो एक तो यह बात की गई केवल्य मुक्ति की। तो एक तो यह है कि इधर ब्रह्माकुमारीज
00:52:31:25 ने माना कि मुक्ति वो वाली नहीं है केवल्य वाली। वो देवता बनेंगे। बहुत लंबे समय के बाद जो है उन्हें आना ही पड़ेगा। मगर शास्त्रों में ये कहा गया है कि बहुत लंबे समय के बाद तक भी नहीं आना पड़ेगा। एक तो ये बात। दूसरी बात ये वेद स्वयं श्वेता शत्रु उपनिषद और वेद घोषणा कर रहे हैं। मेरे अलावा दूसरा कोई मार्ग नहीं है। यानी कि किसने? ये कौन कह रहा है कि मेरे अलावा कोई मार्ग नहीं है। ये श्रुति शास्त्र है ना हमारे वेद। नहीं वेद को किसने उच्चारित किया ये बात? उच्चारित तो हम अगर जैसे आपने कोई भी बात कही। आपने जैसे कहा कि जो पान कह रहा है कि मेरे अलावा कोई भी आपको मतलब जो कर नहीं सकता। भगवान ने भी कहा है। भगवान ने भी कहा है। शास्त्रों में भगवान ने भी कहा है। वेद ने भी कहा है। गीता में भी कहा गया है ये कि मेरे परमधाम जाने के बाद वापस आने की जरूरत नहीं। वो मेरा परमधाम जहां से कोई वापस नहीं आता। ये बार-बार घोषणा की गई है। तो एक तो मुक्ति है। एक तो वो वाली मुक्ति है ही नहीं। फिर ये वापस आते कहां से हैं? जब उसने कह दिया मेरी चले गए। परमधाम में वापस नहीं आएंगे जो कुछ फिर ये आते कहां से मनुष्य भैया? अगर सब वही बैठ जाए तो सृष्टि कैसे चलेगी? सृष्टि नहीं चल सकती। ये ये एक अलग विषय हो जाएगा। नहीं अभी अभी अभी मैं ये पूछ रहा हूं। अभी मैं ये पूछ रहा हूं कि शास्त्र
00:53:47:06 ये घोषणा कर रहे हैं कि जो मुक्त हो जाएगा वो वाली मुक्ति केवल वाली ये वाली नहीं बता दूं यहां पे संक्षेप कौन मेरा मेरा जो प्रश्न है ना वो क्लियर हो जाए एक बार कि शास्त्र ये घोषणा कर रहे हैं कि एक तो वो केवल वाली मुक्ति जहां से वापस नहीं आना पड़ता और दूसरी ये बात हो जाती है कि वो ये भी घोषणा कर रहे हैं मेरे अलावा और कोई मार्ग नहीं है। तो मैं बस इतना जानना चाह रहा हूं कि इस लाइन पर वेद की गीता की या जो शास्त्रों की ये जो पंक्ति है इस पर इसको मान रहा है ब्रह्मा कुमारी कि नहीं मानता है देखिए इस पंक्ति को अगर ईश्वर ने कहा मेरे अलावा कोई मार्ग नहीं है हां किस चीज का? मुक्ति का परम मुक्ति का केवल मुक्ति का हां आवागमन से छुटकारा पर ईश्वर ने कहा ईश्वर ने ही कहा है ईश्वर ने कहा ठीक है उसमें कोई हस्ताक्षर तो ईश्वर के है नहीं भाई ठीक है इंसान ने ही यानी कि बिलीव नहीं है हां इंसान ने ही लिखी है अभी और मत और मतांतर जैसे आप मुस्लिम धर्म में ऐसे अपने सनातन में भी देखो नहीं तो मैं मैं ये नहीं कह रहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि आप क्यों नहीं मानते किस स्थिति में उस उन्होंने लिखी कौन सी अवस्था में लिखी हुई है ठीक किस परिस्थिति को देख के उन्होंने लिखा है वो उस समय उनके सामने कैसी रही होगी कौन सी मनुष्य की वृत्ति
00:55:02:07 कैसा समाज कैसा क्या रागा उसके अनुसार लिखा होगा ठीक है मैं मैं उसपे नहीं जा रहा कि आप उसे क्यों नहीं मान रहे मैं बस ये जानना चाह रहा हूं मानते हैं कि नहीं तो नहीं मानते इस बात को नहीं मानते मुक्ति अगर उसने अपने करीब रख लिया मुक्त कर दिया है किससे मुक्ति है विकर्मों से मुक्ति उसने एक साफ कहा है कैवल्य मुक्ति जिसके बाद तुम्हारा जन्म मरण नहीं होगा दोबारा भैया कई जगह अगर जन्म मरण नहीं है तो ये आत्मा मैं ये नहीं मैं ये नहीं मैं तर्क मैं वहां पे वो नहीं पूछ रहा कि आप क्यों नहीं मानते मैं बस आपको जानना चाह रहा हूं कि आप इस शास्त्र की ये वाली बात मानते हैं कि नहीं मानते नहीं मैं तो प्रैक्टिकल देखूंगी ये वाली बात नहीं मानते मैं ये भी नहीं कह सकती मैं प्रैक्टिकल देख रही हूं मनुष्य आ रहे हैं धरती नहीं तो वेद की जो नाना नाना पंथ्या वाली बात जो है वो हमें छोड़नी पड़ेगी कि ये जो है किसी गलत स्थिति में या ऐसी स्थिति स्थिति में नहीं उनकी की क्या परिस्थिति रही होगी? कैसी हम नहीं मान रहे ना। वहां पे रहा हो तो उस स्थिति में उन्होंने लिखा तो ठीक लिखा होगा। ठीक है? उन्होंने उस नहीं तो फिर वेद ये भी घोषणा वेद मैं बता रहा हूं। वेद ये भी घोषणा करते हैं कि वेद के द्वारा दी गई जो शिक्षा है वो देश काल परिस्थिति से प्रभावित नहीं है। नहीं सनातन है। देखिए अब जो परिवेश है अब जो इस समय है हर
00:56:17:10 चीज परिवर्तन होती है और हर चीज कई चीजें मैंने देखा तो ब्रह्माकुमारी का जो नियम है वो भी परिवर्तित हो सकता है नियम नहीं परिवर्तन होते नहीं जो ये देवत्व वाला कांसेप्ट है ये नहीं कहा कि गलत है या परिवर्तन हो गए कई बार क्या होता है जो मानने वाले लोग होते हैं उनको धारण करने वाले लोग होते हैं उनकी मानसिक परिस्थितियां चेंज होती रहती है परिवर्तन उन्होंने अपनी उस स्थिति में लिख दिया उन्हें कैसी जो रहे होगी उन्होंने उस हिसाब से बहुत अच्छा लिखा होगा। तो इसमें इसमें दिक्कत यह है। इसमें दिक्कत यह है इसमें दिक्कत यह है कि वेद के द्वारा दी जाने वाली जो शिक्षा है उसके लिए जगह-जगह पे आया है। सनातन मतलब वो सनातन का मतलब जो शाश्वत है। मतलब वो किसी देश काल परिस्थिति से प्रभावित नहीं है। वो शाश्वत सत्य उन्होंने लिखा है। तो अगर हम यह कहेंगे कि उन्होंने किसी परिस्थिति में लिख दिया होगा। अच्छा पहली बात तो यह है कि ये क्लियर है कि उस पंक्ति को हम हम अभी फिलहाल नहीं मानते। स्थिति जैसे शब्द भी नहीं लगाएंगे। क्या जरूरत रही होगी? वो परिस्थिति तो कहते हैं उसे। एक परिस्थिति एक हमारे हिसाब से होती है। जैसे एक कि हमें जरूरत पड़ी हमारी जैसे जैसे अभी क्या हुआ? अभी यहां पे गर्मी लगी। ये हो गई परिस्थिति। अब हमारी जरूरत हो गई पंखा चला दो। ये जरूरत हो गई। तो हो सकता है वहां परिस्थिति ना करके कि जरूरत
00:57:32:12 वैसी जरूरत को कि नहीं। उसी भविष्य को सोच के उसी को परिस्थिति कहा मतलब कहने का मतलब यह है कि हमारे जो सनातन शास्त्र है उनको सनातन कहा ही इसलिए गया है कि वो देश काल परिस्थिति से प्रभावित हो के नहीं लिखे गए वो बिल्कुल शाश्वत सत्य के रूप में लिखे गए ये मान्यता है अब वो तर्क अब वो तर्क के रूप में कितना खरी उतरती है वो एक अलग विषय हो जाएगा मगर अभी वेद को मानने वाले उसको जो पंक्ति है उस पे ये नहीं लगाएंगे ये आरोप नहीं लगा सकते कि वो किसी जरूरत के कारण वो लिख दिया गया वो तो उन्होंने हर देश काल परिस्थिति में काम आने वाली बात उन्होंने लिखी। एक तो ये बात हो गई। दूसरी बात अब इस पे आते हैं कि जैसे हमने कहा ना सभी धर्म मानते हैं इसको। जी है ना? इसलिए हम वो वाली बात तो मानते हैं। ठीक है? मगर इसमें एक चीज एक क्लू छूट रहा है कि जैसे हमने कहा सर्वज्ञ। सर्वज्ञ का मतलब क्या हुआ? जो मतलब जो सत्य है वही सर्वमान्य और जो नहीं सर्वज्ञ हां सभी को जो ज्ञात है ज्ञात है सभी को नहीं सर्वज्ञ जैसे मैंने कहा कि यह सर्वज्ञ है जैसे मैंने कहा आप सर्वज्ञ हो तो यानी कि आप सर्वज्ञाता हो मैंने कहा ना ज्ञात सर्व को जिसके बारे में सबका सभी को ज्ञान जिसको सबका ज्ञान है देखो चाहे हमें ज्ञान हो और वो
00:58:47:15 उसको भी ज्ञान हो हमें भी ज्ञान रहता है दोनों को ही ज्ञान रहता है ईश्वर सर्वज्ञ है ना सब उसको जानते हैं इसका का मतलब और वो सभी को भी जानता है। नहीं तो ईश्वर सर्वज्ञ तो है कि नहीं? सर्वज्ञ है मतलब वो सब कुछ जानता है। सब जानता है। सब कुछ जानता है। सब कुछ ऐसा उसकी है। ऐसा जानेंगे क्यों? आपको आपके बच्चे पिताजी ने जन्म दिया तो आपको आपके जब तक जीवित रहेंगे उस पूरे जीवन काल को वो जानेंगे ही। नहीं मेरे पिता मेरे जो ब्लड है उसका ब्लड का वो ग्रुप नहीं जानते। बात भी ब्लड ग्रुप की नहीं बात। मैं वही कह रहा हूं। क्या ईश्वर ऐसा पिता ऐसा पिता है या वो सर्वज्ञ वाला कि उसको मेरा ब्लड ग्रुप भी मालूम है। नहीं एक बात और ये ये भौतिक शरीर आपके पिता ने जन्म दिया पिता से बार-बार तुलना होती है तो पिता तो पंच भौतिक वाले हैं। उनको वो कई जगहों पे वो एग्जांपल तो जो चीज इस स्तर की है वो इस स्तर की। परमात्मा छोटी-छोटी चीजें अगर जानने के लिए बैठेगा तो उसके लिए और भी हो सकता है शायद कार्य हो। है ना? अब ब्लड ग्रुप जानेगा मुझे कब जुकाम हो रहा। देखिए तो यहां पे परमात्मा भी मुक्त नहीं है। सुनिए उसको मैंने कहा ना उस साक्षी हो के शुभ रहता है। वही पे मालूम है कि नहीं उसको सब कुछ पता होती है। उसको सब पता है। सृष्टि उसने बनाई है। तो सब
01:00:02:24 कुछ उसकी स्क्रीन पे दिन भर घूमता रहता है। दिन भर चलता रहता है। यानी कि उसको पता सब है। वो कहीं पे मौन है, कहीं पे बोल रहा है वो अलग बात है। वो वो सब कुछ पता है। तो यानी कि यानी कि सर्वज्ञ का मतलब हुआ कि सब कुछ जानने वाला यानी कि सर्व का मतलब हुआ सब कुछ यही हुआ ना है ना सब यानी कि हम यह नहीं कह सकते हम ये नहीं कह सकते कि भाई नाली के अंदर क्या है वो उसे नहीं पता उसको वही पता है वो बात अलग है वो वहां पे मौन है कि क्या कर रहा है और उसको पता है यानी सर्व का अर्थ हम ले रहे हैं सब कुछ तो जब हम कहते हैं सर्वशक्तिमान तो वहां पे सर्वशक्तिमान अलग है और सर्वज्ञ अलग
01:00:44:07 अर्थात कोई बात नहीं मतलब जिसके पास सभी कार्यों को करने की क्षमता है सबके पास तो फिर हम ये कहते कि क्योंकि मुसलमान ने ये माना है या बुद्ध ने ये माना है या क्रिश्चियनिटी ने ये माना है इसलिए भगवान अवतार नहीं ले सकता जबकि वो तो हम कह रहे हैं कि सर्वशक्तिमान है नहीं अवतार ऐसा ये किसने कहा अवतार अवतार लेने की उससे जरूरत क्या है भाई वो पावरफुल है वो पावर जैसे कई देवताओं उसको दुनिया बनाने की क्या जरूरत है कुछ भी कुछ भी पकड़ा दिया देवताओं के हाथों में मैं ये कहती हूं देवताओं जब देवताओं में अपनी खुद की चरित्र की पावर है उससे बड़ी कोई पावर नहीं है वो एक बार दृष्टि ऐसे डाले सब कुछ परिवर्तन हो सकता है लेकिन फिर भी उसके त्रिशूल पकड़ा दिया कुछ भी दिखा दिया जा के तो उसको ये सब करने की या पावरफुल दिखाने के लिए सब कुछ दुनिया मैं ये नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा कि वो ले लेता ही है लेगा ही मैं उस पे नहीं जा रहा मैं अभी ये कह रहा हूं ले सकता है कि नहीं क्योंकि अगर हम बात करें कि उसको आवश्यकता क्या है तो उसको तो आवश्यकता धर्म ग्लानी के समय ईश्वर आता है इसलिए संभोग उसको कहते हैं वो धर्म ग्लानी के समय आते हैं ठीक है धर्म ग्लानी के समय आते हैं परमात्मा एक मिनट एक मिनट इस कह रहे हैं भैया अपना कार्य करते हैं
01:02:00:21 अच्छा अच्छा हां बस ठीक है कोशिश करते हैं जी [गला साफ़ करने की आवाज़] तो परमात्मा जो है धर्म वाणी के समय आते हैं और अगर वो होते तो ये भैया दुनिया मैं वो नहीं होती है। सर्वशक्तिमान था तब भी मैं वो नहीं कह रहा। अब वो अलग बात है कि वो क्यों आते हैं वो अलग अलग विषय है। हम कह रहे हैं कि सर्व का मतलब है सब कुछ मगर जब हम सर्वशक्तिमान कह रहे हैं तो हम कह रहे हैं कि वो अवतार नहीं ले सकता। या तो ये माने कि अवतार ले सकता है पर लेता नहीं है। ऐसा नहीं लेता है। हमारा आप जैसा मैं पूछ रहा हूं ले सकता है। मैं पूछ नहीं मतलब ले सकता है कि नहीं? नहीं ले सकता। जरूरत नहीं है मनुष्य ज्यादा खुद ताकतवर वो शरीर ले क्या अपनी ताकत मैं वो नहीं कह रहा हूं मैं कह रहा हूं कि बाधित है ना यहां पे फिर कोई उसे आवश्यकता नहीं है इसलिए नहीं आवश्यकता तो उसे दुनिया बनाने की भी नहीं है वो तो परम मुक्त है नहीं हम उसके आप कह दो परमात्मा का पिता कौन है वो एक अलग सब्जेक्ट हो गया नहीं सब्जेक्ट अलग नहीं आवश्यकता है नहीं हम उसपे उंगली नहीं उठा सकते उन्हें आवश्यकता होगी तो वो उनकी इच्छा होगी वो खुद करेंगे उन्हें जब सृष्टि को परिवर्तन करना होगा वो खुद करेंगे यानी उनकी अपने यानी उनका कोई यानी कि उनका निजी कोई स्वार्थ नहीं है दुनिया को बनाने में। फिर भी वह करते हैं। उनकी इच्छा है। हां। तो जैसे बिना इच्छा के वो दुनिया बना
01:03:15:22 रहे हैं। जैसे बिना इच्छा के उनको कोई जरूरत नहीं है कि वो किसी के शरीर में आके भी बोले। उनको कुछ नहीं पड़ी है। वो तो परम मुक्त हैं। उनको आवश्यकता तो नहीं है। आवश्यकता होगी तब किसी में प्रवेश हो। उनको आवश्यकता है कि नहीं? नहीं। जब बच्चे त्राहिमाम हो जाते हैं। आवश्यकता पूछ रहा हूं। हां, मैं वही यानी वह दुखी होते हैं। दुखी नहीं होते हैं। हमारी दुख की करुणा पुकार सुनते हैं। दुखी कभी आवश्यकता नहीं होती ना? आवश्यकता उन्हें सुनिए। मैं वही उत्तर दे रही हूं। क्योंकि जब हम उनको लगता है हमारे बच्चे दुखी हो गए हैं। तब तब उस समय आवश्यकता होती है। आते हैं अपने ईश्वर की। ईश्वर की। हमारी आवश्यकता होती है। वो हमारी होती है। उनकी अपनी क्या आवश्यकता है? आते हैं आता है। नहीं नहीं आता है। आवश्यकता अगर नहीं संसार को परिवर्तन करने की है तो वो फिर क्यों आता है धर्म? मैं मैं बताता हूं क्यों आता है? क्योंकि जैसे जो ईश्वर के द्वारा जो सृष्टि का रचित होना है वो ईश्वर की शक्ति का परिणाम है। जैसे मैं बताता हूं। जैसे क्या है? जैसे अभी हम लोग बात कर रहे हैं। बात करते बीच में कई बार आपका अंगूठा हिला। कई बार मेरे पैर हिले। क्यों हिले? क्योंकि मेरे अंदर वो एनर्जी है। मुझे उसकी आवश्यकता नहीं थी। ऐसे ही ईश्वर जो है बिना किसी आवश्यकता के ही दुनिया निर्माण करते हैं और दुनिया संचालित करते हैं। उसका नाश भी करते
01:04:30:26 हैं बिना किसी आवश्यकता के। और यह बात भी लिखी हुई है श्वेता चतुरपनिषद में चौथे अध्याय के पहले ही उसमें मंत्र में ये बात आई है। ईश्वर बिना अपने किसी निजी स्वार्थ के सृष्टि का निर्माण अगर हम ये कहेंगे ना कि ईश्वर को आवश्यकता थी। इसका मतलब ईश्वर में भी कुछ एक अभाव था। स्वार्थ और आवश्यकता दो अलग है। अलग शब्द है। आवश्यकता एक अलग चीज होती है। किसी किसी को आवश्यकता मदद करना अलग है। उसके तो मदद करने का भाव भी उसका सुनना और स्वार्थ नहीं। उसका कोई संसार से स्वार्थ नहीं है। बच्चों से बस हम बच्चों यानी उसका अपना उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है। फिर भी वो आता है। ऐसे ही उसका ऐसे ही उसको कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी वो अवतार ले सकता है। नहीं अवतार एक शब्द है। मदद करना आना अवतार लेना मनुष्य। तो फिर सर्व का क्या करेंगे जो सर्वशक्तिमान है अवतार का आप यहां पे हमारे आपके पास थोड़ा भिन्नता है अवतार मतलब जैसे हमारे आप परकाया प्रवेश कर रहे हैं हां परकाया प्रवेश करते हैं अवतार मतलब दुनिया में मान्यता होती है कि उनका भी देवों जैसा शरीर होगा और कहने का मतलब है कहने का मतलब है परकाया कहने का मतलब है कांसेप्ट समझ लें कि परकाया प्रवेश के भी लिए भी उसकी कोई आवश्यकता नहीं होती है मगर वो करता है मगर ब्रह्मा [गला साफ़ करने की आवाज़] कुमारी फिर भी यह मानता है कि अवतार के
01:05:45:27 लिए आवश्यकता नहीं होती इसलिए वो नहीं करता है। देखो इसलिए वो करता है क्योंकि किसी में प्रवेश इसलिए करता है क्योंकि मनुष्य अब वो गधे को समझाएगा तो उसका उत्तर गधा कैसे चिल्ला के उत्तर देगा वो आप समझ नहीं सकते तो मनुष्य के तन में इसलिए आ करके उसको आवश्यकता होती है कुछ समय के लिए आता करके अपना कार्य चला जाता है। मनुष्य की सुलभता के लिए ना। ताकि मनुष्य ही उसकी भाषा को समझ सकता है। वो ठीक है। तो इसीलिए वो जब अवतार ले लेगा तो भाषा ही क्या? तो उसका रूप देख के भी मुक्ति पा लेगा इंसान। किसके तन जो जिसके तन में आएगी? नहीं जैसे उसने अगर स्वयं से अवतार लिया सच्चिदानंद स्वरूप अवतार अपना नहीं लेगा। मैं ये नहीं कह रहा कि लेगा ब्रह्मा कुमारी के अनुसार नहीं लेगा। मगर ये वाली जो बात है कि वो साधु भक्तों के उद्धार के लिए परित्राणाय साधु नाम उद्धार के लिए परकाया प्रवेश करते हैं। ठीक है? तो जब हम ये मान रहे है किध बिना आवश्यकता के साधु भक्तों के उद्धार के लिए वो परकाया प्रवेश करते है तो बिना आवश्यकता के वो साधु भक्तों के उद्धार के लिए स्वयं अवतरित हो जाते है ये भी तो माना जा सकता है नहीं स्वयं अवतरित नहीं हो सकता वो आधार लेना ही तो फिर फिर वहां पे सर्व का क्या करेंगे देखिए मैं वो वो मान ली मैंने बात फिर सर्व का क्या करेंगे देखिए यहां पे सर्व का मतलब ज्ञाता आपने कहा था ज्ञाता सर्व का मतलब क्या है सब कुछ है कि नहीं सब कुछ सब कुछ
01:07:01:01 वो जानता है बस यही हुआ नहीं अभी ज्ञाता हटा दी। अभी जो सर्व विशेषण यह एक विशेषण है। सर्वज्ञाता सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक जो भी है मगर सर्व एक विशेषण है। विशेषण है ना? सर्व विशेषण का मतलब है सब कुछ। तो हमने जब जैसे सर्वज्ञ में सर्व लिया तो हमने कहा सब कुछ। तो जब यहां पे सर्वशक्तिमान में लेंगे तो सब कुछ करने की शक्ति माननी पड़ेगी। लेकिन है शक्ति। सब कुछ करने की शक्ति है। लेकिन वह दूसरों का भी हिसाब देख करके ही उसको उचित वो नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं कर सकता है कि नहीं? आवश्यकता वो अवतार ले सकता है कि नहीं? मेरे हिसाब से तो नहीं ले सकता। तो फिर सर्व विशेषण बाधित सर्व देखिए मेरे जरूरत होगी। मैं प्रवेश मैं वो नहीं कह रहा हूं। कैपेबिलिटी की बात कर रहा हूं। लेकिन यहां पर हम क्यों जब उसने अच्छा इसको एक दूसरे तरीके से समझ सकते हैं। इसको एक दूसरे तरीके से समझ सकते हैं। जैसे हमने कहा कि वो अवतार नहीं ले सकता है मगर फिर भी वो सर्वशक्तिमान है। ठीक है? अब ये मान के चलिए कि मान लीजिए कि कोई ऐसी शक्ति है जो अवतार ले सकती है। तो उसको हम फिर क्या कहेंगे? जैसे जो अवतार नहीं ले पा रहा है वह भी सर्वशक्तिमान है। भैया उससे बड़ा सर्वशक्तिमान हम लोग कई बातें अलंकार
01:08:16:14 में करते हैं ना अलंकार में करते हैं ना परमात्माकि मान लिया जाए जैसा मैं मैं वो नहीं कह रहा मैं वो नहीं कह रहा मान लिया जाए मैं मान लिया जाए वाली बात नहीं कर रहा कि जैसे कि अह हमने कहा कि अवतरित नहीं हो सकता मगर वो सर्वशक्तिमान है। हालांकि सर्व सर्व विशेषण में अवतरित बोला तो होता है अवतरित नहीं वो स्वयं से स्वयं का रूप शरीर नहीं ले सकते लेते हैं वो लेते नहीं ठीक है वो आपकी मान्यता है बीके की हां इसलिए फिर उसको भी दुख सुख में आना पड़ेगा फिर हम सुख से क्यों मुक्त कोई करेगा नहीं तो वो तो परकाया में प्रवेश करके तब भी तो दुख में आ रहे हैं दुख में नहीं जैसे आपके जैसे आपके तन में कोई कई आपने देखा सूक्ष्म में भी कोई आत्माएं आ जाती है मानते हैं आप अरे आत्मा है बहुत सारे कीटाणु है अभी भी वो वाली नहीं है ना हां वो भूत प्रेत बाधा आ जाती है। उसमें कोई दुख सुख फर्क नहीं बॉडी में कोई किसी को मारा बाद में हो रहा है। उसको पेन है तो परमात्मा अपना कुछ समय के लिए आते हैं अपना कार्य कराते हैं और फिर वापस चले जाते हैं। मगर जब हम ये मान रहे हैं कि वो परकाया प्रवेश में उसको दुख सुख नहीं हो रहा है तो हम ये क्यों मान रहे हैं कि अवतार लेने पर उसको दुख सुख होगा। नहीं देखिए दुख क्योंकि हमारी जो अपनी बॉडी होती है तो उसकी हमें संभाल भी तो करनी पड़ती है। अब तो यही तो बात है ईश्वर के अवतार लेने में हमारे में
01:09:31:20 अंतर यही है कि ईश्वर का अवतार जो सच्चिदानंद होता है जैसे अथर्ववेद में श्वत शत्रु उपनिषद में बात आई कि जो ईश्वर के भागवत में भी आई है ईश्वर के जो अवतार होते हैं वो सदैव 16 वर्ष की आयु वाले बने रहते हैं। अजर अजरता रहती है उनमें वो कभी आपने देखा होगा राम और कृष्ण की कभी दाढ़ी मूछ शास्त्रोक्त रूप से नहीं है लोग फिल्मों में दे दे वो बात अलग है क्योंकि क्योंकि उनमें इतना देवत्व होता है उसमें हार्मोन डेवलप इस तरीके से तो उनके तो उनके शरीर का उनका शरीर वैसा शरीर होता ही नहीं है। और देवता एक जैसे मैंने कहा देवता अवतार इसलिए क्योंकि वो डिग्री है। देवता जो पढ़ाई हो पढ़ाई तो कहने का मतलब है कि हम हम यह मान रहे हैं कि वो अह परकाया प्रवेश करता है और वो अवतार नहीं ले सकता मगर हम फिर भी उसको सर्वशक्तिमान कहते हैं। सर्व विशेषा में बाधा भले ही आ रही है फिर भी हम सर्वशक्तिमान कहते हैं। और एक चीज और है कि यदि कोई ऐसी एंटिटी जो अवतरित हो जाए है ना? तो उसको हम क्या कहेंगे? ये विषय नहीं है। वो अलग हो जाएगी। भूत प्रेत भी अपने को बहुत समझते हैं। मैं मैं यह हूं वो हूं। बहुत सारे अब इसमें एक जो कई सारे कां्सप्ट कई सारे कां्सप्ट क्लियर हुए। जी हां हां बस बस हो रहा है। कई सारे
01:10:46:24 कांसेप्ट क्लियर हुए। अच्छा बहुत जानने को मिला चीजें। अच्छा इसमें अब हमने कहा एक बात ये कि कई लोग मानते हैं इसलिए हमने माना है। तो हम किसी को भी किसी भी मान्यता को कई लोग मानते हैं। वो एक अलग हो गया। धार्मिक धार्मिक वो मानते हैं। हां। हां। प्रैक्टिकल देखिए मेरा अपना जीवन व्यक्तिगत बता दूं एक अनुभव मैंने लाइफ में जो चीज प्रैक्टिकल देखी अपने मतलब आंखों से या छूते हुए मन को लगी मतलब तो उसको स्वीकार करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई तो ये तो ये जो प्रैक्टिकल वाली बात है इसमें दिक्कत ये आती है जैसे जैसे आपने कहा कि प्रैक्टिकल आपने देखा और ये है इसलिए आप ये मान रहे हो तो ऐसे कोई दूसरा व्यक्ति कहेगा कि मैंने भी प्रैक्टिकल देखा है और मैं इसलिए मान रहा हूं अपनी धारणा ठीक है अब वो क्या करेगा कि मैंने प्रैक्टिकल देखा है के नाम पे कहेगा कि मैं निठारी की तरह बच्चों को उबाल के खाना चाहता हूं। फिर वो देखो भैया हम उसे रोके कि ना रोके? हमारा काम है समझाना। बाकी नहीं मांगता है तो वो नहीं रोकेंगे कि नहीं रोकेंगे? बिल्कुल रोका तो भाई मना तो तो फिर इसका मतलब प्रैक्टिकल के नाम पे किसी की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे नहीं कुछ चीज़ होती हमें भी प्रैक्टिकल देखनी पड़ती है। नहीं जैसे हमारे वो नहीं अभी भी है भाई अमरनाथ अभी है बराबर है आंखों से अभी भी है मौजूदा हालत में पशुमंतनाथ नेपाल में मौजूदा
01:12:02:07 हालत में मौजूदा हालत में देखा केवल माना नहीं बल्कि मौजूद भी है चीज आप मक्का मदीना मौजूद है ठीक है गुरु नानक का गुरुद्वारा जो भी अमृतसर तो जैसे जो लेखराज जी आ रहे हैं जिस शरीर में जैसे हम अमरनाथ लेखराज जो बाबा परमात्मा परमात्मा उनके शरीर में आते थे। अब अभी अभी अभी और किसी के में आ रहे होंगे। अभी तो किसी के दिन में नहीं आ रहे हैं। वो उनकी मुरलियां वही है जो चल रही हैं। हां जी जो उनके द्वारा ज्ञान दिया गया तो इसको भी तो कुछ कुछ ही लोग देख रहे हैं। जैसे अमरनाथ हैं जैसे आपने देखा मैंने भी देखा। है ना? और भी कई जीवंत चीजें जिनको मैंने देखा आपने भी देखा। पर जो ब्रह्मा कुमारीज में जो ये जो चमत्कारिक चीजें हो रही हैं इसको सब नहीं देख रहे। किसी के कहने पे माना जा रहा है केवल। जिन्होंने जैसे कई जैसे अब तमाम से वही वेद पुराण बहुत सारी चीजें हमने नहीं देखी किसने लिखी कहते भगवान ने उचारी मान लिया हमारे हिंदुस्तान में एक चीज है हम तिथि भी मानते तारीख भी मानते हम पहर भी मानते हम घड़ी भी मानते घड़ी की हमको ये दिखाने की किसने जहमत की अंग्रेजों ने फिर भी हम पहर पहले चलते दोनों को मानते हैं कि नहीं मानते हैं बरोबर तो कुछ चीजें होती हैं कि ऐसे मानी इसलिए जाती है क्योंकि इसे लगता है कुछ दिखती है कि हां भाई ये हो रहा है इसने कहा मानना पड़ रहा है कुछ
01:13:17:15 देखो लोकाचार की दृष्टि से तो भी अच्छा चुप रहो मैं तो पहर से ही चलता था कौन सी घड़ी आई लेकिन घड़ी से हम थोड़ा कार्य अच्छी तरीके से कर सकते हैं हमें हर चीज पता होती है एक घंटा 2 घंटा गाड़ी कब आएगी अगर मुझसे कह दे शाम के पहर गाड़ी आएगी तो मैं कब समझूं शाम के हो सकता है 4:00 से 6 7:00 बजे तक शाम में रहती हो तो जब गाड़ी आई तो हमें एकदम बिल्कुल डिट्टो टाइम पता होगा 5:00 बजे आएगी हम अपना कार्य सहज तरीके से कर सकते हैं तो मान्यता देखो देखो भारत में दोनों चीजों की है और अपनी मत है और अपना मतांतर है। कोई कुछ मानता है भैया नहीं जैसे जैसे आपने कहा कि प्रैक्टिकल जैसे हमारे शास्त्र में कहा गया कि बहन से विवाह मत करो। अब इसमें व्यक्ति प्रैक्टिकल कैसे देखेगा? नहीं बहन से विवाह ना करो। वर्जित है जाकर के। ठीक है। मनु शत्रूपा ने भी एक बार ये कहा होगा शायद ज्ञान होगा। मैं कह रहा हूं इसका प्रैक्टिकल कैसे करें? शादी करने का। उन्होंने भी मैं कह रहा हूं इसमें प्रैक्टिकल कैसे करें? जब शादी है ही नहीं तो प्रैक्टिकल करेंगे क्या? अरे भाई कि मुझे इससे दुख मिलेगा अगर मैं कर लूंगा तो इसमें प्रैक्टिकल क्या है भैया आज आप देख तो रहे हो अखबारों में पढ़ रहे हो ना ये तो दुख मिल रहा है तो यानी कि हमें किसी और के प्रैक्टिकल से मान लेना चाहिए नहीं प्रैक्टिकल क्या आप करके देख लो अपना प्रैक्टिकल करके देख लो आपकी निंदा होगी तो आपको नहीं लगता कि सबके
01:14:32:24 प्रैक्टिकल से ही वो मान लिया जाएगा अगर सबको सबके प्रैक्टिकल पे छोड़ दिया जाए तो विप्लव आ जाएगा जैसे जैसे एक मिनट जैसे जैसे मैंने कहा ना कि निठारी का कहना है कि मैं बच्चे कुकर में उबाल के खाऊंगा तो वह वहां से मुझे मुक्ति मिलेगी। मान लीजिए तो क्या उसके प्रैक्टिकल को हम स्वीकार करेंगे या उसको रोकेंगे? नहीं नहीं जिससे हमारी सामाजिक व्यवस्था बिगड़ जाए। वहां नहीं यानी कि बहन यानी कि बहन भाई में विवाह को हम रोकने जाएंगे। व्यवस्था के अंतर्गत मेरे पड़ोस में यदि बहन भाई का विवाह हो रहा होगा तो मैं वहां रोकूंगा। भाई गलत हो रहा है। समझा सकते हम रोक जबरदस्ती नहीं कर सकते क्योंकि आज मामले की गंभीरता के आधार पे करेंगे। जैसे पाकिस्तान हम पर अटैक कर रहा है तो हम वहां पे गोला बारूद भी चलाएंगे। अध्यात्म का विषय चलना हमारा गोला विषय हमारे नहीं नहीं वहां पे भी धर्म है दुनिया में कोई भी चीज धर्म अधर्म से बाहर है ही नहीं वो लोग हमें क्यों मारना चाहते हैं कि भाई उनको चचेरी ममेरी फुफेरी बहनों से विवाह करना है हमें नहीं करना है नहीं मूल में तो यही है ना नहीं नहीं कईयों की लड़ाई की भी वजह अपनी-अपनी होती है जरूरी नहीं कि उनको फुफेरी बहन से शादी करने मैम मैं उस मैं उसी पे आ रहा हूं थोड़ा सा भैया आप थोड़ा सा हमें समय थोड़ा सा थोड़ा सा समय दे दे अच्छा बस 235
01:15:42:24 आपने अगर बताया होता तो मैं थोड़ा टाइम लेके आता। हां देखिए कौन किस लिए लड़ाई कर रहा है धर्म के लिए अगर नहीं मैं वो लड़ाई छोड़ दीजिए तो हम अपने धर्म को लड़ाई वो लड़ाई छोड़ दीजिए हो सकता है किसी चीज के लिए लड़ाई कर रहा हो तो वहां पे फुफेरी नरेरी का नहीं नहीं मैं वो लड़ाई लड़ाई छोड़ दीजिए मैं ये कह रहा हूं कि हम किसी भी मान्यता को धर्म रूप से मैंने कहा घड़ी और पहर का जवाब दिया कुछ चीजें देखी जाती है मूल क्या है? मूल क्या है? उससे सामाजिक दृष्टि से वो सही है तो मान्यता है। ठीक है? कोई कई चीजें ऐसी होती है नहीं नहीं मेरा कहने का मतलब यह है कि जैसे हमने कहा कि देवत्व को प्राप्त हो जाएगा। ठीक है? तो देवत्व को एक एक मिनट 1 मिनट। देवत्व को प्राप्त कराने वाली जो नियमावली है वह धर्म है। तेरे लिए कर्तव्य कर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है। तो देवत्व को प्राप्त हो जाएगा। उसके लिए जो प्रोसेस बताई गई है वो धर्म है। अब हमने कहा कि मुसलमान भी धर्म है। आपके ही अनुसार बता रहा हूं। फिलहाल इस्लाम धर्म इस्लाम भी धर्म है। ठीक है। इस्लाम भी धर्म है और क्रिश्चियनिटी भी धर्म है और जो है आप बुद्ध को भी धर्म कह रही हैं। अब इसमें दिक्कत ये है कह नहीं रही। बुद्ध क्या धर्म आप नहीं मानती? मैं मैं पूछ मैं एक मिनट मेरा मेरा प्रश्न है। उसमें यह है कि क्या
01:16:58:04 इस्लाम ये मान रहा है कि 5000 वाली जो आपका जो देवत्व प्राप्त होने वाली जो क्वालिटी है वह मिलेगा। उसको उसकी चीजों को मानने से मतलब धर्म का मतलब क्या है? धर्म का मतलब है महाभारत में आया है कि धर्म का मतलब है वह विधि जिससे मोक्ष प्राप्त हो। अब मान लीजिए आपका वाला मोक्ष आपका वाला मोक्ष। एक और जगह मैं आपको धर्म का मतलब है धारण। हां। जो चीज नहीं धारणा नहीं धारण जिसको धारण किया जाए। यहां पर आप धारण किया सब 60 में बताया। धारण मतलब धारण करना जो कुछ उसमें कहा गया अपने जीवन में धारण धारण करना। ठीक है मैं अन्य चीजों की व्याख्या नहीं धर्म के बारे में इतना सिंपल सी बात तो तो बात यह है अगर अपने जैसे किसी को किसी ने चोरी करना अपने में उतार लिया तो क्या इसको धर्म कहेंगे नहीं वो उसकी धर्म धारणा वाला धर्म कौन सा है जिसको हम चोरी करने से हमको मिलेगा दुख तो चोरी करने से दुख मिलेगा इसलिए हमें चोरी करना छोड़ना पड़ेगा तो धारणा के अंतर्गत जो चीज की जाती है वो धारणा की वो तो वो तो फिर वो वो धर्म डिसाइड कहां से हो रहा है कर्म वो वो उसका जो कर्म कर रहा है वो एक अलग चीज है। नहीं नहीं मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं जैसे मुसलमानों की धारणाएं कुछ और हैं और हमारी धारणाएं कुछ और हैं। का अपना
01:18:13:08 धर्म है वो अपने धर्म के बारे में जाने उन्होंने लिखा तो वो सब तो फिर आप उसे धर्म क्यों मान रही हो? माना नहीं मैंने। आपने कहा ना जो अलग-अलग धर्मों में ये बात है इसलिए हमने ले ली। मैंने नहीं कहा धर्म नहीं। मैंने कहा वो भी निराकार ईश्वर को मानते हैं। तो उनको हमने धर्म क्यों माना? जो कट्टर विरोधी हैं सनातन के वो भी हमारे निराकार परमात्मा जिसके बारे में एक वर्णन है कि बिन पग चले सुने कर बिन कर्म करे विधि रहित सकल रस भोगी बिन वाणी वक्ता ऐसा कितनी देर की है क्लास को भी तो एक घंटे में आ जाए क्या दोबारा उस निरा उस निरा सुनिए मैं आपको बता दे उस निराकार को भी उन्होंने माना है मैं ये कह हम लोग अभी टाइम हो गया आपका छोड़िए अभी अभी छोड़ दिए उसकी बात सुनिए टाइम कि अपनी धारणा है और मैं किसी भी धर्म को गलत कभी नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा वो क्या कर रहे हैं क्या नहीं कर रहे हैं मैं ये नहीं कह रहा धर्म हम किसे कहते हैं ये क्लियर नहीं है जो हमें सदमार्ग पे चलाए ठीक है उसे ही और सदमार्ग क्या है सदमार्ग आप खुद पढ़े हुए हैं आपकी गीता भी है रामायण भी है वेद है शास्त्र उसमें बड़ी अच्छी उसके विपरीत उसके विपरीत
01:19:28:09 है इस्लाम देखिए भैया मैंने कहा था सुनिए जैसे अगर अगर गीता में सन्मार्ग है क्यों ले रहे हो मैं अपने धर्म की बात कर तो नहीं आपने आपने आप बात कही है बाकी वो हमारे आपने उनको आधार बनाया ना ये मानने का कि अवतार नहीं लेता है ईश्वर ये पूछ रहा हूं मेरी बात को समझ पाए कहने का मतलब सब कितना भी कोई कट्टरी हो कितना भी कोई धारणाओं पर कितना भी व्यभचारी दुराचारी हो फिर भी उनके भी जो बड़े रहे होंगे श्रेष्ठ रहे होंगे अब की मान्यताओं को नहीं कह रहे थोड़ा अब तो बहुत मतलब अंतर आ उन्होंने भी उस निराकार को कर लिया अवधारणाएं मतलब उनमें लिखा गया हिंसा करना कोई बुरा उन्होंने निराकार को स्वीकार किया ये हम जानते हैं ये हम कैसे जानते हैं जो अभी उनके परमात्मा को स्वीकार करना अलग बात में बता रहे मैं वो नहीं कह रहा था नारायणणा को आपने कहा कि वो क्योंकि उन्होंने निराकार को स्वीकार किया था अभी वह अंतर आ गया है तो उन्होंने निराकार को स्वीकार किया था ये अभी वालों से ही पता चला उसकी बात को उसने स्वीकार नहीं कर किया उन्होंने मैं यह कह रहा हूं उन्होंने निराकार को स्वीकार स्वीकार किया था या नहीं किया था। यह जो अभी वाले लोग हैं उनसे ही हमें पता चला। उन्होंने क्या किया था हमें नहीं पता। उनके जो अभी वाले लोग हैं उन वही हमें बता रहे हैं कि हमारे लोगों ने यह कहा है। तो जब यही हमें यह बता रहे हैं कि उन्होंने निराकार को स्वीकार किया।
01:20:43:22 यही हमें यह बता रहे हैं कि उन्होंने वेद विरोधी चीजें कही तो फिर हम उसको धर्म कैसे अगर वेद अगर वेद गीता धर्म है आपने कहा कि धर्म आप जानते हो क्या है? तो अगर वेद गीता धर्म है तो वेद गीता के विरोध में बहुत सारी चीजें हैं। अब हम कह रहे हैं कि जिनसे हमको ये पता चला है कि कहते हैं वो क्यों विरोध कर रहे हैं? या कोई विरोध किया निजी स्वार्थ जब आता है तो व्यक्ति विरोध करता है। किसी को मांस मदिरा खाना आप अगर मना कर रहे हो तो आपका विरोध करेगा। जबकि उसे भी पता है कि यह गलत है। तो फिर भी कर रहे हैं। बात यह है कि उन्होंने एग्जैक्ट कहा क्या है ये तो हमें इनसे ही पता चल रहा है ना जो अभी के लोग हैं। किसी चीज का विरोध कर रहे हैं तो वो उनकी अपनी निजी धारणा हो गई। अब नहीं नहीं बात ये हो रही थी कि धर्म है कि नहीं उनके द्वारा बताई गई बातें। देखिए उनके द्वारा उनका धर्म जाने मैं सीधी सी बात कह तो यह कह दे ना कि हमें नहीं पता तो फिर हम उनके आधार पे ये क्यों नहीं चेक कर यह क्यों कह रहे हैं कि सर ईश्वर अवतार नहीं मैं उनके उनकी किसी भी बात को मैं ये उनको गलत भी नहीं कह सकती हूं और पीछे भी किसी धर्म को नहीं तो आप मौन मौन रह जाइए ना वहां फिर आप ये क्यों कह रहे हैं कि वो जो है अवतार को नहीं मानते इसलिए हम भी नहीं मान रहे अवतार की बात वो नहीं मानते नहीं वो निराकार को मानते इसलिए हम निराकार को मानते हो मैंने पूछा कि जो वो नहीं मानते सब लोगों में इक्वल नहीं होगी वो हम नहीं मानेंगे हमारा मतलब था कि संसार का कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो परमात्मा को उस निराकार
01:21:59:22 में ना मानता हो। धारणा कई लोग हैं जैसे आपने अभी बुद्ध की बात की। बुद्ध की बात की। हां। रही उसकी वो भी कहीं ना कहीं जैसे आपने बुद्ध की बात की ना। बुद्ध ने तो ईश्वर को ही नहीं माना। नास्तिक नहीं ईश्वर नहीं माना। लेकिन कहीं ना कहीं प्रकाश को तो माना। नहीं माना। शून्य माना। उन्होंने कुछ नहीं माना। जरा चित्र दिखाते हैं आपको जी जरा दिखाना चित्र हां वो प्रकाश स्वरूप देखो है यहां पर नहीं दिखा कई चित्र है वो परमेश्वर नहीं है ना सुनिए उन्होंने कहा कि कोई भी मुक्त है ही नहीं परम मुक्त मैंने कहा ना प्रकाश को मानो तो है जैसे आपके यहां पर परमेश्वर परम मुक्त है ना वो कह रहे हैं परमेश्वर है ही नहीं मुक्त परम मुक्त वाला लेकिन प्रकाश को उन्होंने भी आप जापान में उनके ही धर्म का मान्यता है हां हां ज्यादातर तो वो भी एक देखिए ऐसा है मैंने ये प्रश्न किया क्यों मैं आपको क्लियर कर दूं बस क्लियर हो जाएगा मैं अरे दीदी सुनिए तो दीदी सुनिए तो क्लियर हो जाएगा एंडिंग कर दें ऐसा है मैंने ये प्रश्न इसलिए किया क्योंकि धर्म का मतलब है कि वो व्यवस्थाएं वो नियमावली जो हमें हमारे द्वारा मान्यता वाला मोक्ष दिलाए जैसे आपकी मान्यता है कि वो वो देवत्व की प्राप्ति हमारी मान्यता है कि कैवल्य मोक्ष आवागमन बंद ठीक है तो जो इस कैवल्य
01:23:14:24 की प्राप्ति कराएगा वो धर्म है अब जहां पर ये कैवल्य की प्राप्ति नहीं करा रहे हैं वो खुद कह रहे कैवल्य की प्राप्ति नहीं या फिर जहां पे वो खुद कह रहे हैं कि हमारी द्वारा की गई बातों से यह दैवत्व की प्राप्ति नहीं है। वो खुद कह रहे हैं। तो फिर उनके द्वारा चीजों को जो बताई गई हैं उनको धर्म नहीं कह सकते। एक मिनट जब धर्म नहीं कह सकते तो फिर हम जिसको हम सही नहीं मान रहे क्योंकि वो सही है नहीं। हमारी मान्यता ये है और वो लोग ये कह रहे हैं उल्टा कह रहे हैं। तो जब वो लोग धर्म नहीं जब उनका वो धर्म सिद्धि नहीं हो रही वहां पे तो हम उसको प्रमाण नहीं ले सकते। अगर हम ऐसे ही किसी का भी प्रमाण ले लें तो फिर आईएस आईएस वाले भी कुछ ऐसी चीजें करेंगे उनका भी हमें प्रमाण लेना पड़ेगा क्योंकि दुनिया में बहुत लोग हैं। दुनिया में नास्तिक है बुद्ध है। बुद्ध उन्होंने कहा परमेश्वर है ही नहीं। आपको ये करोगे तो ये मिलेगा केवल कर्म की फिलोसफी रही धारणाओं की वर्तमान जीवन में अच्छा कुछ और इंटरेस्टिंग चीजें हैं जो ब्रह्माकुमारी से रिलेटेड है। वन सेकंड बस वन सेकंड जैसे अब दीदी का निर्णय होगा तो कहेंगी तो स्टॉप होगा नहीं तो चलता रहेगा। चार चार उसमें है ना हमारा कहते हैं पहले ब्रह्मचर फिर होता है गृहस्थ हां जी हां जी फिर होता है सन्यास फिर होता है वारदस्थ अब आप हमें जैसे कई लोग हमसे सवाल उठते हैं कि आप लोग तो है ना ऐसे ही आपने कोई चीज अपनाई नहीं आपको भगवान सूली पे कई बार हमको सामने
01:24:29:27 बोलते हैं सूली पे लटका देगा आपने कोई आश्रम का नियम का पालन नहीं किया मैं सिर्फ इतना कहूं अगर धर्म की बात चल रही है ना ये भी तो लिखा है ना चार आश्रमों को पार करके ही मुक्ति मुक्ति मिल जाएगी जो भी हो जो भी उनकी सोच हो सनातन में ठीक है हमारे सनातन में लेकिन क्या कोई व्यक्ति इन चारों पहली बात किसी की सीमा नहीं रही मृत्यु की कब कौन मर जाए क्या चारों चीजें कोई पालन कर रहा है अगर कर रहा हो हजार लोग तो भी मैं मान लूंगी शायद मुश्किल में दो चार 10 लोग जो जीवित रहे तो माना भी जा सकता क्या ये तो वो वाली बात है कि जैसे कि हमने बरसात से बचने के लिए अगर मान लीजिए एक मिनट कंडीशन ही बदल गई है नहीं तो वही मैं कह रहा हूं। वही मैं कह रहा हूं कि हम बरसात से बचने के लिए एक एक मिनट हमने बरसात से बचने के लिए एक बालकनी के नीचे अगर खड़े हो गए तो हमने उसको अपना घर मान लिया। यानी कि आज की परिस्थितियों में हम पालन नहीं कर पा रहे। इसका मतलब ये थोड़ी ना धर्म गलत हो गया। मोक्ष तो गलत नहीं है। इसका मतलब ये है मोक्ष तो वही नियमावली दिलाएगी जो हम जिसको मान रहे हैं। हम कर पा रहे हैं कि नहीं कर पा रहे वो तो एक अलग मैटर है। मगर मोक्ष तो वही दिलाएगा जैसे हमारी मान्यता है कि वेद ही दिलाएगा। नाना पंथिया अरे इनकी अपनी मान्यता है उसमें डिबेट करने की कोई आवश्यकता नहीं अपने मानने पर हम
01:25:44:28 जबरदस्ती ब्रह्मा कुमारी किसी को मनवा नहीं सकते इस ज्ञान को और जब तुमको भी नहीं भाई इस्लाम को किसी को मनवा सकते और रही अगर धर्म के अनुसार कोई चलता हो मुझे नहीं लगता कितने परसेंट लोग चलते हैं वो अब ये जैसे आपने ना लगता वाली बात कही जैसे आपने कहा मैंने प्रैक्टिकल किया है सुनिए तो क्योंकि मुझे मुझे लोग जब कहते हैं ना सनातन के ही लोग कहते हैं कि आपने पूरे पूरे नियम नहीं किए हैं कि चारों आश्रम पार नहीं किए आपको सूली पे भगवान लटका देगा। ठीक है? हम कोई जवाब नहीं देते क्योंकि मुझे सत्य पता है एक ब्रह्मचर्य में मैंने चारों आश्रम संभाल लिए हैं और जो लोग कहते हैं क्या वो पालन कर रहे हैं सवाल उठता है ये वहां पे मिलता है ना। नहीं तो इसमें ये वाली बात है जैसे अभी जैसे जैसे अभी आपने ये वाली बात कही कि मैंने प्रैक्टिकल किया है तो ऐसे कोई आके कह दे कि नहीं सुनिए आप देख रहे हैं सुनिए तो तो जैसे आपको जो लगता है जैसे आपको लगता है कि सब लोग गलत है नहीं कर रहे पालन पालन नहीं कर रहे पालन नहीं कर रहे पालन पालन नहीं कर रहे मतलब ये थोड़ी ना कि व्यक्ति गलत है यार और क्या हमने आप किस जो जो अच्छा सच बोलना चाहिए इसका पालन नहीं किया तो झूठ हो गया ना हम नहीं नहीं बात चलिए ठीक है बंद करो
01:27:00:02 ठीक है बंद कर वो नहीं है हम किसी कल कर ले बंद करो मान लीजिए आप हमारी बात नहीं मान ले तो इसका मतलब आप गलत नहीं हो हम आपको गलत नहीं कहने का हमें राइट नहीं है वो अपनी सोच है अरे दीदी दीदी अगर मेरे बगल में कोई गलत कार्य हो रहा होगा तो मैं वहां रोकूंगा उसको गलत होने से अभी बाहर में आ रहा था वो भगदड़ हो रही थी लड़ाई हो रही थी हम लोग उसको रोकते कि नहीं रोकते कोई कार में पत्थर मारेगा तो नहीं हां रोकना अलग अलग बात है लेकिन वो परिस्थिति वश रोकना परिस्थिति वश नहीं जब जो गलत है वो गलत है उसमें हम ऐसी डिप्लोमेटिक बात कैसे कर सकते हैं नहीं मान लो मेरे सामने कोई किसी कन्या के साथ गलत दुष्कर्म कर रहा है तो वहां ये कहूं मैं नहीं हो सकता इसको गलत कहने वाला बिल्कुल रोकना वहां पर पड़ेगा लेकिन हर बात में जो है छोटी-छोटी बात हर बात में नहीं कह रहा हूं हर बात में नहीं हर बात में नहीं कह रहा हूं मूल में किसी भी कार्य के लिए करने में मूल में धर्म है अब वो बात अलग है कि धर्म का अनुकरण ना कर पाना और धर्म का अनुकरण ना कर पाने में मेरी व्यवस्था होनी चाहिए। चैन नहीं चयन पूर्वक धर्म का अनुकरण त्याग नहीं करना चाहिए और व्यवस्था में अगर हो गया तो उसका पश्चाताप नहीं करना चाहिए। देखिए वो आपातकालीन मर्यादा नष्ट कहा गया कब कैसी परिस्थितियां बन जाए आपको डांटना भी पड़ेगा
01:28:15:10 और कहीं पर मुंह बर भी रहना पड़ता है। कहते हैं ना पड़ोसी के घर में बेवजह कूदेंगे से आप लीजिए ना परमिशन ठीक है।
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क्या ब्रह्माकुमारी वालों को मोक्ष मिलेगा?
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