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00:00:01:28 [संगीत] गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय जय जय गोपाल जय जय राधा रमण हरि हरि गोविंद जय जय राधा राधा रमण रमण जय जय जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय जय जय गोपाल जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय राधा राधा रमण हरि गोविंद जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय

00:01:18:26 गोविंद जय जय [संगीत] जय जय जय जय जय प्रभु दीन दयाल हरे हरे जय जय जय प्रभु दी जय जय प्रभु दीन दयाल हरे जय जय प्रभु प्रभु दयाल हरे गोविंद हरे गोपाल हरे गोविंद हरे गोपाल हरे हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरे जय जय

00:02:08:21 हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरे जय जय जय प्रभु प्रभु दीन दयाल हरे हरे अच्छा ये बताइए रघुपति राघव राजा राम जो शुद्ध वाला है गीत वो किसको सबको आता है ना? जी हां ठीक है तो वो कर लेते हैं। उसके बाद हम लोग कक्षा अध्ययन प्रारंभ करेंगे। है ना? ठीक है ना? जी भैया रघुपति राघव राजा

00:02:47:06 मैं मैं एक बार कर लूंगा तब आप उसे रिसेट करिएगा तो थोड़ा सा मैनेज लगेगा सुनने में ना। रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम रघुवर राजा राम पतित पावन सीताराम राम रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम

00:03:29:25 रघु रघुपति राधा राजा राम पतित पावन सीताराम भज प्यारे मन सीताराम सीताराम प्यारे सी रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम

00:04:10:16 रघुपति राजा राम पतित पावन सीताराम सुंदर विग्रह मेघा श्याम गंगा तुलसी शाल ग्राम सुंदर गंगा तुलसी गिरी सीताराम भगत जन प्रिया सीताराम

00:04:51:08 भक्तग गिरीश्वर सीताराम भगत जन प्रिय सीताराम जानकी रमणा सीताराम जय जय राघव सीताराम जय जानकी रमणा सीताराम जय जय राघव सीताराम रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम

00:05:32:00 रघुपति राधा रघुपतिना

00:05:42:16 पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की जय जय जय पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण चन् की जय पंच परमेश्वर ब्रह्मा विष्णु महेश भगवती और गणेश की जय भगवत आदि शंकराचार्य भगवान की जय धर्म सम्राट परम पूज्य गुरुदेव करपात्री जी महाराज की जय श्रीमद् जगतुगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर गुरुदेव भगवान की जय

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00:06:14:04 जय ठीक है तो प्रारंभ करते हैं। नर देह वंदना प्रारंभ करनी है हमें शायद। है ना? और एक स्विच हो गया था कि जो मूर्ख के लक्षण हैं जो हमको इधर पढ़ने थे। हमने आगे वाले चैप्टर के पढ़ लिए हैं और जब क्रमानुसार वह दोबारा आएगा तो हम यह जो छूट गया था यहां पर जो मूर्ख की बात हुई है वो हम वहां पर पढ़ लेंगे। ठीक है ना? और नरदेव वंदना रह गया था हमारा जो वंदना का क्रम चल रहा था उसमें

00:06:59:18 यही दसवां समास है। इसके बाद जो है दूसरा दशक पहला समास प्रारंभ होगा। उसमें मूर्ख के लक्षण अगला चैप्टर होगा। तो वह हम ना पढ़ के और जो है मूर्ख की जो इधर बात की गई है उसको हम पढ़ लेंगे। नरदेह वंदना नरदेह वंदना प्रारंभ करने से पहले मैं एक बात रखना चाहूंगा कि एक वक्तव्य हमें प्राप्त है। पूज्य ब्रह्मलीन स्वामी श्री स्वरूपानंद जी महाराज का वक्तव्य है। उसमें वह अपनी शैली में बड़ी विनम्रता से और बहुत धीरेधीरे करके आपको मुख्य जो उनका उद्देश्य होता है अपने वक्तव्य में वहां पर श्रोता को ले आते हैं और उन्होंने बड़ा मर्म के साथ वहां पर बताया है कि किस प्रकार 84 लाख योनियों में भटकता भटकता जीव कुंडी खटखटाता खटखटाता जैसे कोई अंधा हो वो गेट खटखटा रहा है। खटखटा रहा है। करते करते वो उस गेट पे आता है जिस गेट से आपकी मुक्ति हो सकती है। 84 लाख योनियों पे खटखटाता रहा। खटखटाता रहा और उसमें भी खटखटाते खटखटाते फिर वो आता है। मतलब उन्होंने क्रम बताया कि कैसे वो वहां तक पहुंचता है। फिर उसके बाद वो मनुष्य का शरीर प्राप्त करता

00:08:14:19 है। फिर उसके बाद वो मनुष्य में ब्राह्मण शरीर प्राप्त करता है। तो ऐसे करके क्रमानुसार उन्होंने वहां बहुत अच्छा किया है। तो आप सर्च करेंगे YouTube पर तो आपको वक्तव्य मिल जाएगा। तो जो मानवीय शरीर है मनुष्य शरीर वो बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। वो श्रवण करने के बाद आपको इसका बोध हो जाएगा। एक होता है कि हमें जानकारी जो है कई बार आप ये अपने जीवन में अनुभव करेंगे कि जो बातें आप अपने इर्दगिर्द यहां वहां सुनते रहते हैं। कई बातें उनमें से काम की होती है आपके बहुत जरूरी होती है। पर होता क्या है कि हम उन पर ध्यान नहीं देते हैं। हम उनकोेंस देते हुए भी वो हमारे जीवन में बदलाव नहीं ला पाती है। परंतु वही बात जब हम कभी गुरु मुख से सुन लेते हैं तो उस बात का वजन अलग हो जाता है और वह श्रवण करते ही उसका प्रभाव हमारे जीवन में कुछ अलग आ जाता है। इसी को कहते हैं ना गुरुदेव कहते हैं कि आप जो है बुलेट लो और सामने वाले में मार दो तो वो असर नहीं करेगी बुलेट। पर वही बुलेट जब रिवाल्वर के अंदर से आएगी तो सामने लक्ष्य को अपने भेज देगी। उसी तरीके से जो सिद्धांत होते हैं कई बार ऐसा होता है कि वह सिद्धांत या कुछ अच्छी

00:09:29:27 जीवन में परिवर्तनकारी जो सीखे हैं शिक्षाएं हैं वो हमें प्राप्त हो जाती है या हो सकता है हमारे चिंतन मनन से हमें समझ में आ जाता है हां ये ठीक है ये ठीक नहीं है मगर उसको ही जब एक दिन हम गुरु मुख से सुनते हैं जैसे मान लीजिए कि हम लोगों को पता है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठना कितना अच्छा होता है पर यही और और हम जानते हैं कितना अच्छा होता है पर हम उसको नहीं कर पा रहे और एक दिन हमने गुरु मुख से सुन लिया उस बात को उस बात के महत्व को अगले दिन से ब्रह्म मुहूर्त में उठने लगे या फिर संध्या वंदन त्रिकाल संध्या नहीं कर पा रहे हैं मालूम है कि त्रिकाल संध्या बहुत जरूरी है नहीं कर पा रहे हैं या सवा घंटे की भक्ति जरूरी नहीं है कि सब लोग मतलब जिनका जिनके जीवन में विपरीत परिस्थितियां हो रात की शिफ्ट हो काम करने की वो उनकी बात नहीं कर रहा हूं मैं एक उदाहरण मात्र ले रहा हूं कि आप आपको ज्ञात है कि सवा घंटे की भक्ति बहुत आवश्यक है। मगर एक दिन वही बात किसी दिन वृतांत में गुरुदेव के मुख से जब सुन लेता है व्यक्ति अपने गुरु मुख से केवल यह नहीं कि पूज्य जो जगुरु शंकराचार्य जी महाराज हैं उन्हीं के मुख से नहीं जो व्यक्ति उसके लिए उसके जो गुरु हैं उनके मुख से जब वो सुन लेता है तो वह बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। तो इसी प्रकार से यह

00:10:44:28 जो नरदेह वंदना है नरदेह के लिए मुझे याद आया कि मैंने उनका वक्तव्य सुना था बहुत प्रभावशाली वक्तव्य है तो वो आप अवश्य उसका श्रवण कर ले और जितनी भी जीवन की बातें होती है जैसे हमने कहीं से सुन रखी है फिर भी वो गुरु मुख से जब सुनते हैं ना तो उनका महत्व बदल जाता है तो आप अवश्य सुने कभी भी गुरुदेव के जो लेक्चर्स होते हैं उन्हें इस कारण से अरे यह बात तो हमें पता है इस कारण से उन लेक्चर्स को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्यों नहीं करना चाहिए? क्योंकि जब आप वह गुरु मुख से सुन रहे हैं तो वह श्रवण करना भी आपके लिए बहुत ज्यादा उसका महत्व हो जाता है। और इस प्रकार की चीजें देखिए अभी गुरुदेव का रिसेंट कोई वो था उसमें गुरुदेव ने वीडियो में कहा था जैसे कि जो मंत्र इत्यादि हैं संस्कृत के अर्थ नहीं आते हैं मंत्र हो रहा है उच्चारण हो रहा है अर्थ नहीं मालूम परंतु उसका जो श्रवण हो रहा है वह दवाई की तरह है दवाई के बारे में आपको ज्ञान हो ना हो गुरुदेव एक सिद्धांत बताते हैं वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं करती। तो वस्तु की जो शक्ति जैसे जो बीमारी से लड़ने के लिए टेबलेट है उसका काम है आपके बुखार वाले तत्व से लड़ना। है ना? तो आपको उसके बारे में ज्ञान नहीं पर आप अगर वो खाओगे तो उससे आपको जो

00:12:00:00 वो अपना काम करेगी। उसी प्रकार से जो श्रवण होता है संत महात्माओं का और शास्त्रों का श्रवण चिंतन मनन यह आप समझ में नहीं भी आ रहा है तब भी आप इसका यदि श्रवण करते हैं तो आपके लिए बहुत ज्यादा लाभदायक होता है। नरदेह वंदना प्रारंभ करते हैं। धन्य है यह नर देह। जरा इसकी अपूर्वता देखिए। इसके द्वारा परमार्थ के उद्देश्य से जो कुछ सिखाया जाता है उस सब की सिद्धि हो जाती है। इस नर देह के द्वारा ही कुछ लोग भक्ति में लगे हैं। कुछ लोग परम वीतराग होकर गिरि कंदराओं में रहते हैं। कुछ लोग तीर्थटन करते हैं। कुछ पुरचरण करते हैं और कुछ निष्ठावान होकर अखंड नाम स्मरण करते हैं। कोई तपस्या करता है। कोई बहुत बड़ा योगाभ्यासी होता है। कोई अध्ययन करके वेदों और शास्त्रों का परम पंडित होता है। किसी ने हठ योग किया और कोई अपने शरीर को बहुत पीड़ा पहुंचाई और किसी ने भाव के बल से ईश्वर की प्राप्ति की।

00:13:04:09 कोई प्रसिद्ध महापुरुष हुआ, कोई विख्यात भक्त हुआ। कोई सिद्ध होकर अकस्मात आकाश में विचरने लगा। कोई तो तेज में मिलकर स्वयं तेज ही हो गया। कोई जल में मिल गया। कोई देखतेदेखते वायु के समान अदृश्य हो गया। कोई एक से अनेक हो जाते हैं। कोई देखतेदेखते गायब हो जाते हैं। और कोई बैठे-बैठे अनेक स्थानों और समुद्रों में भ्रमण करते हैं। कोई प्रेत पर जा बैठते हैं। कोई अचेतन को चलाते हैं। कोई तपोबल से मुर्दे को जलाते हैं। कोई अग्नि को मंद करते हैं। कोई लोगों की प्राण वायु से मुर प्राण वायु रोकते हैं। ऐसे लाखों सिद्ध हट निग्रही और कृत बुद्धि हो गए हैं। जिन्हें नाना अब यहां निग्रही शब्द आ गया। यही है। निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता निग्रह शब्द आ गया ना हां प्रमाणिक प्रमाणिक हो गया समर्थ रामदास जी ने भी प्रमाणिक कर दिया भाई बहुत बढ़िया है ना जिन्हें नाना सिद्धियां प्राप्त हुई है ऐसे अनेक प्रकार के सिद्ध हुए हैं जिन्होंने मनो सिद्धि वाचा सिद्धि अल्प सिद्धि और सर्व सिद्धि प्राप्त हुई है। कोई नवधा भक्ति के राजमार्ग में चले और परमार्थ के साधक हुए और कोई

00:14:19:10 योगी गुप्त मार्ग में चलकर ब्रह्म भवन में पहुंचे। कोई बैकुंठ गए, कोई सत्यलोक गए, सत्यलोक में रह गए और कोई शिव रूप होकर कैलाश में जा बैठे। कोई इंद्र लोक में जाकर इंद्र हुए, कोई पितृ में जा मिले, कोई नक्षत्रों में जा बैठे तो कोई छर सागर में सलोकता, समीपता, स्वरूपता और सायोजता इन चारों प्रकार की मुक्तियों का वे मनमाना भोग करते हैं। ऐसे अनंत सिद्ध साधु और जी भैया। हम तो कोई इंद्रलोक में जाकर इंद्र हुए, कोई पितृ में जा मिले, कोई नक्षत्रों में जा बैठे और कोई छर सागर में सलोकता, समीपता, स्वरूपता और सायोजता इन चारों प्रकार की मुक्तियों का वह मनमाना भोग करते हैं। ऐसे अनंत सिद्ध साधु और संत अपने हित में लगे हैं। जिस नर देह की इस प्रकार की प्रसिद्धि है उसका किस प्रकार वर्णन किया जाए

00:15:21:15 उसका किस प्रकार वर्णन किया जाए इस नर देह के द्वारा ही बहुत से लोग अनेक प्रकार के साधनों और सारासार विचार से युक्त हुए हैं। इस नर देह की कृपा से बहुत बहुतों ने उत्तम पद पाया और अभिमान छोड़कर आत्मंद से सुखी हुए। नर देह से ही सब ने उत्तम गति प्राप्त की है और समस्त संशयों का समूल नाश किया है। सभी जगह कहा गया है कि पशु देह से गति नहीं होती। इसलिए नर देह से ही परलोक की प्राप्ति होती है। संत महंत ऋषि मुनि सिद्ध साधु समाधानी भक्त मुक्त ब्रह्म ज्ञानी विरक्त योगी तपस्वी तत्वज्ञानी योगाभ्यासी ब्रह्मचारी दिगंबर सन्यासी शद दर्शनी तापस सब इसी नर देह से हुए हैं। इसलिए नर देह सब देहों में देहों से श्रेष्ठ और बड़ा है। जिससे यम यातना का अरिष्ट दूर होता है। नर देह स्वाधीन है और सहसा पराधीन नहीं होता। पर इसे परोपकार में लगाकर संसार में कीर्ति प्राप्त करनी चाहिए। घोड़े, गौ, बैल, भैंस आदि पशुओं, स्त्रियों और दासियों को यदि कोई कृपा कर छोड़ भी देगा तो उन्हें कोई

00:16:36:19 ना कोई पकड़ लेगा। पर नर देह की यह बात नहीं है। यह अपनी इच्छा से चाहे रहे और चाहे जाए। पर दूसरा कोई इसे बंधन में नहीं रख सकता। नर देह यदि पंगू हो तो काम में नहीं आता। यदि लूला हो तो उससे परोपकार नहीं होता। यदि वह अंधा हो तो निरर्थक है। और यदि बहरा हो तो उससे निरूपण नहीं हो सकता। यदि गूंगा हुआ तो वह शंका आदि नहीं कर सकता। और यदि अशक्त रोगी या अपाहिज हुआ तो भी व्यर्थ है। यदि वह मूर्ख हो या फेफड़े की तरह रोगी हो तो भी अवश्य ही निरर्थक है। जिस नर देह में यह सब त्रुटियां ना हो और जो सब प्रकार से ठीक हो उसे तुरंत परमार्थ का पथ ग्रहण करना चाहिए। यह देखिए कितने मतलब वद एक विवेचन किया गया है कि आपको जो प्रारब्ध पूर्वक प्राप्त हो गया है उसकी कद्र करना आप सीखें उसे वैल्यू देना हम इसको पढ़ के आप लोगों के मन में आ रहा हो आपको क्या प्राप्त हो गया है ये इसीलिए श्रवण करना चाहिए किसी भी चीज जो संत है या ग्रंथ है उनको लेकर के ऐसी दृष्टि

00:17:51:25 नहीं रखनी चाहिए कि यह बात तो हमें ज्ञात है। जिस नर देह में यह सब त्रुटियां ना हो और जो सब प्रकार से ठीक हो उसे तुरंत परमार्थ का पथ धारण करना चाहिए। लोग सर्वांग पूर्ण नर देह पाकर भी परमार्थ का विचार भूल जाते हैं। वह मूर्ख माया जाल में कैसे फंसे हुए हैं। मिट्टी के बने हुए घर को इन लोगों ने निश्चित रूप से अपना मान रखा है। पर उन्हें नहीं ज्ञात कि यह घर बहुतों का है। चूहा, छिपकली, मक्खी, मकड़ी, चींटे, चीटियां, बिच्छू, सांप, गिलहरी, भोरे, बर्रे, बिल्ली, कुत्ते, नेवले, पिशु, खटमल, झींगुर, कन, खजूरे आदि सभी जीव इसे अपना ही घर समझते हैं। देखो यह बात चली है तो एक मुझे बात याद आ गई कि अभी पीछे पिछले कुछ दिनों

00:18:46:19 यह बात बहुत चली थी कि जो जो कलियों में रहने वाले जो कुत्ते हैं स्वान इत्यादि उन पर जो है उन उनका निग्रह किया जाए और उनको यथा स्थान पहुंचाया जाए और लोगों ने काफी बर्बरता भी दिखाई है। चलिए उनको व्यवस्थित रूप से कहीं पर पहुंचाने की बात तो अलग है। मगर कुछ लोग हत्या भी कर देते हैं मार मार के और तो हम लोग सिर्फ मानवीय दृष्टि से ही देखते हैं। एक हमें यह भी देखना चाहिए कि हमने कैसे विकास के नाम पर धीरे-धीरे हम लोग कंजशन जो कर रहे हैं प्रकृति का, धरती का, पानी का, वायु का तो हमारे उस कंजशन में हमको जैसे हमारा वो संसार है ऐसे ही पशुओं का भी है। तो हम कहीं ना कहीं यह भूल जाते हैं कि भाई ये हम सोचते हैं कि वह यहां क्यों है? हमारी गली में क्यों है? कहीं और हो कहीं किसी और सड़क पे हो। हालांकि जब वो कोई अगर ऐसा पशु है जिससे कि आने जाने वालों को दिक्कत हो रही है तो मैं उसके समर्थन में है कि उस पशु को जो है दंड दिया जाना चाहिए जिससे वो सीखे कि ऐसा नहीं करना है। परंतु केवल एक दृष्टि कि हमारी गली

00:20:01:22 में है ये है। इस तरह से एक दूसरी चीज भी सोचनी चाहिए कि वो जो जगह है उस पे हमने शहरीकरण करके और अपना जो है रजिस्टर्ड करवा लिया है। मकान पंजीकरण वहां पर एक व्यवस्था चालू की है और उसमें पंजीकरण करवा लिया और सोच रहे हैं यह हमारा है। नहीं यह सिर्फ हमारा नहीं है। यह वहां रहने वाले बहुत से जीव जंतुओं का है। यह बात अवश्य है कि नर देह क्योंकि इंपॉर्टेंट है तो उसको जितना ज्यादा व्यवस्थित रखने के लिए जिससे कि उससे हम परमार्थ को प्राप्त कर सके। इसलिए उसको बचा के रखना बहुत आवश्यक है। उस दृष्टिकोण से व्यवस्था के लिए उनको अमुक अमुक स्थानों पर भेज दिया जाए या उनका निग्रह कर दिया जाए शानों का तो वो उचित है मगर उनके प्रति ऐसी दृष्टि रखना चिन कुन द्वेष मूलक ना वो दृष्टि रख वो जो दृष्टि है उसको अपनी उसको विचलित ना होने दें क्योंकि ये ठीक ऐसे है जैसे मान लीजिए कि हमारे यहां पर खेती होती है भारत में अब अमेरिका ने क्या किया कि एक खेती करने का एक जो तरीका है उस तरीके को पेटेंट करा लिया। पेटेंट का कानून भी खुद ही बनाया और फिर उस कानून में उस खेती करने के उस तरीके

00:21:16:24 को पेटेंट करा लिया। रजिस्टर्ड कर लिया। अब हम टैक्स दे रहे हैं यहां पर उसी तरीके से खेती करने के लिए हमको वहां पर टैक्स देना पड़ रहा है। अमेरिका ने जिस पद्धति को पेटेंट कर लिया है अमेरिका को हम टैक्स दे रहे हैं। तो इसी तरीके से हमने खुद ही एक लॉ बनाया कि यहां पर जिसका यहां पंजीकरण होगा उसका यहां पे जमीन मानी जाएगी। हम यह भूल गए कि हमें लॉ बनाने का अधिकार किसने दिया था? पंजीकरण वाला। तो हम यह सोचते हैं ये हमारा मकान है तो यहां पे पशु इत्यादि नहीं होने चाहिए। तो सामंजस्य की स्थिति है। जीव जंतुओं का भी है। यद्यपि वह मानव जीवन में बाधित हो रहे हैं तो वहां पर प्रतिकार भी आवश्यक है। परंतु अपनी दृष्टि को विचलित ना होने दें। वो घृणा वो शत्रुता का मन में भाव नहीं होना चाहिए उनके प्रति। ठीक है? तो

00:22:10:16 मगर ऐसा नहीं है कि जो यह जो आवारा जानवर होते हैं दौड़ाते हैं कोई परिवार वाला जा रहा है अपनी मोटरसाइकिल पर पीछे जो है पत्नी है पति जो है गाड़ी चला रहा है उसकी गोद में पत्नी की गोद में जो है बिटिया है या कोई नवजात शिशु है और कुत्तों ने दौड़ाना चालू कर दिया सोचिए उस समय क्या हो सकता है वो गिर सकता है चोट लग सकती है तो ऐसे शानों का निग्रह भी करना चाहिए मगर अपनी दृष्टि वो वाली नहीं रखेगी ये हमारी जगह ये आंख क्या कर रहे हैं। ये विचार नहीं आना चाहिए। और ये सारे विचार तभी नहीं आते जो वो चार 34 भगवत गीता पढ़ते हैं ना तत्वदृष्टि तत्वदृष्टि से क्या मिलता है? पहले पूरे संसार में मुझे और पीछे स्वयं को देखेगा। तो जब आप अध्यात्म के मार्ग पर आते हैं तो आपकी अंदरूनी दृष्टि जो है गुरुदेव एक बात कहते हैं ना कि हम किसी को अपना शत्रु मानते ही नहीं है। इसीलिए कोई हमारा शत्रु होता नहीं है। कोई हमारा हमसे जीत नहीं पाता है। बजरंगबली भी जब बाली के सामने गए तो बाली को कहा था कि हम तुम्हारे शत्रु नहीं मित्र हैं। तो कहने का भाव यह है कि दुनिया को जीतना है तो उसमें यदि आप मित्रता का भाव रखेंगे और मित्रता का भाव आता है संतों की शरण से भगवत मार्ग अध्यात्म के मार्ग ठीक है। आगे चलते हैं।

00:23:26:16 तो सभी कहते हैं कि अवश्य ही यह घर हमारा है। पशु कहते हैं मेरा घर है। दासियां और घर की स्त्रियां कहती है हमारा घर है। मेहमान कहते हैं कि हमारा घर है। मित्र कहते हैं कि हमारा घर है। गांव में रहने वाले कहते हैं उसे अपना बतलाते हैं। चोर कहते हैं कि हमारा घर है। राजा के नौकर चाकर कहते हैं कि हमारा है। और अग्नि कहती है कि मेरा है। मैं इसे भस्म करूंगी। इस प्रकार सभी इसे अपना बतलाते हैं और यह मूर्ख मनुष्य भी इसे अपना ही बतलाते हैं और अंत में आपत्ति आने पर घर को कौन कहे स्वयं देह छोड़कर भाग जाते हैं। गांव उजड़ जाते हैं। उनमें जंगली जानवर आकर रहने लगते हैं। वस्तुतः यह घर कीड़े मकोड़ों, नेवलों और चूहों आदि का है। बेचारे मूर्ख प्राणी तो उसे छोड़ ही जाते हैं। अपने अनुभव से जाना कि घर की यही मिथ्या स्थिति है। यह जीवन दो दिनों का है। जहां कहीं हो रहकर बिताना चाहिए। इस बारे में एक व्यक्तिगत बात भी है। फिर किसी दिन इसको बताएंगे। यदि हम देह को अपना कहें तो इसका निर्माण भी व्यक्तिगत बात से मैं एक सैद्धांतिक तौर पर बता दूं कि लोग इस पर बहुत ज्यादा दृष्टि रखते हैं कि शहर में अपना एक मकान होना चाहिए। शहर में अपना एक मकान होना चाहिए। यद्यपि उसके

00:24:41:22 उस उद्देश्य का पर्यावसान इस बात में है कि मैं वहां रहकर के भक्ति कर पाऊं। मेरे पास अपनी भक्ति करने के लिए एक अच्छा कक्ष नहीं है। इसलिए एक घर ऐसा हो जहां जिससे मेरी भक्ति सुलभ हो पाए। इस दृष्टि इस भाव को अंतरात्मा से जब ये भाव आए तो अगर ऐसा भाव है कि मेरा घर होना चाहिए कहीं पर तो तो ठीक है। मगर जो लोग बहुत परेशान रहते हैं ना कि मेरा घर नहीं है। मेरा घर नहीं है। मैं यहां हूं। मैं रेंट पे हूं। तो उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। वो आसक्ति है भौतिकता के प्रति। आप भगवान के पीछे जाइए। घर मकान द्वार सब अपने आप आपको मिल जाएगा। जो भी आपके लिए अपेक्षित होगा वह आ जाएगा। क्यों? क्यों होगा? क्यों मिल जाएगा? नोवाइस तू मेरी शरण में आजा। तेरी प्राप्ति की रक्षा और अप्राप्ति की चिंता मैं करूंगा। तो इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि बहुत ज्यादा इसके पीछे परेशान नहीं होना है कि नहीं नहीं अपना एक मकान होना चाहिए, यह होना चाहिए, वह होना चाहिए। ठीक है? जो बेसिक चीजें हैं वह होनी चाहिए। वह जो हमारी जरूरत है जिससे कि हम जीवित रहे जिससे कि हम धर्म रक्षा कर सके अपने धर्म का पालन कर सके। पहले पालन फिर रक्षा पहले पालन कर सके फिर रक्षा कर सकें और उस उसके निमित्त जो जो आवश्यक

00:25:57:03 संसाधन है वो हमें प्राप्त होनी चाहिए। ये भाव रखेंगे तो जीवन बहुत सरल होगा और वो वाला भाव जब ले आएंगे कि मेरा मकान, मेरी दुकान, मेरी बिल्डिंग, मेरी कार, मेरी मोटरसाइकिल तो हो सकता है कि क्रमशः यह सब चीजें आपको प्राप्त भी होती रहे यदा कदा परंतु आप चैन की नींद कभी नहीं सो पाएंगे। यह निश्चित है। चैन की नींद सोनी है ना तो आपको अपना भाव भगवत प्राप्ति में लगाना चाहिए। भगवत प्राप्ति और उस रास्ते में आपको जो जो मिल मिल रहा है भगवान प्राप्त करवा रहे हैं वह आप एक फल की तरीके से वह भी उपभोग नहीं कर्मन्यवादी कारस्ते मा फले सुदा वो वाला पार्ट निकल चुका है या कई बार वीडियोस में बताया है कि अर्जुन के मन में अंतत गत्वा अगर जीतना जीतने की वह नहीं है चाह तो फिर वह ऐसा प्रहार कैसे कर पाएगा जिससे कि जीते तो हमें जीतना तो है लड़ना तो जीतने के पर क्यों जीतना है? क्योंकि शास्त्र ने कहा है, ईश्वर ने कहा है। अच्छा जीतने से भैया महल मिलेगा तो महल में नहीं रहना है क्या? तो महल में रहना है तो महल में रहना तो है पर इसलिए नहीं कि वहां से मुझे सुख मिले। उसमें

00:27:12:04 अंत में जो अंतिम जो लक्ष्य है वो सुख नहीं होना चाहिए। अंतिम लक्ष्य होना चाहिए कर्तव्य। ठीक है? तो उसी तरीके से यह आसक्ति अपने जीवन से हटाएं। और हटेगी कैसे? आसक्तियां कम कैसे होती हैं? भगवान नाम जप से। नाम जप करिए। भगवान का चिंतन मनन श्रवण करिए। सत्संग करिए। उससे आपको जो आसक्ति है वो कम होती है। सब इंटरकनेक्टेड चीजें हैं ये सब। अ हम जहां कहीं हो रहकर बिताना चाहिए। जहां भी हो जिस हाल में भी हो। सबसे ज्यादा जरूरी अपने जीवन का वह पार्ट है जब हम भगवान से बात करने बैठते हैं वह समय नहीं मिल पाता बड़ी दिक्कत होती है मगर जिस समय बैठ जाते हैं एक बार आप देखना आपको कितना वहां पर आत्मसंतुष्टि का अनुभव होगा जब आप भगवान जैसे आप आसन पे आकर बैठ तो नहीं रहे बहुत टाइम लगा रहे हैं बैठने में अरे ये कर लूं इसको भी फोन कर लूं यह वाला मैसेज कर दूं यह WhatsApp आया होगा उसको कॉल करना जरूरी है तब बैठूंगा बहुत सारे बहाने माया माया है ना माया वो उससे बहुत लड़ना पड़ता है भगवान के पास बैठने से बैठने से तो पहले तक की यात्रा बहुत कठिन होती है पर जब आप बैठ गए

00:28:27:10 और बैठ के जब सामने भगवान की मूरत है और जब वो उसको आप निहारते हैं वो आपको निहारती है तब आपको आत्मसंतुष्टि जो होती है वह पूरे दिन में दोबारा फिर कभी होने नहीं वाली है वह तभी होगी वह आत्मसंतुष्टि उसी समय फिर नहीं होने वाली है तो जहां कहीं हो रहकर आप भगवत प्राप्ति पर भगवत भजन का अवश्य ध्यान रखें। यदि हम देह को अपना कहें तो इसका निर्माण भी बहुतों के लिए हुआ है। जुए प्राणी के सिर में अपना घर बनाकर मस्तक खाती हैं। रोम रंध्रों में कीड़े पड़े खाते हैं। घाव होने पर उसमें कीड़े पड़ते हैं। प्राणियों के पेट में भी अनेक जंतु होते हैं। दांतों, कानों और आंखों में कीड़े पड़ते हैं और शरीर का मांस खाते हैं। अभी माघ में है। गुरुदेव से किसी व्यक्ति ने प्रश्न कर दिया था कि गुरुदेव एक शरीर में दो आत्माएं निवास कर सकती हैं क्या? क्योंकि लोग कहते हैं कि उसमें प्रेत आ गया है, भूत आ गया है। तो वो प्रेत आ गया, भूत आ गया वाली बात तो अलग हो गई। मगर जो मूल प्रश्न है कि एक शरीर में एक से अधिक आत्माएं निवास कर सकती है क्या? तो गुरुदेव ने यही आंसर दिया था। एक ही व्यक्ति के शरीर में ना जाने कितने जो जीव होते हैं वह रहते

00:29:42:14 हैं। वही बात यहां हो रही है। तो दांतों, कानों और आंखों में कीड़े पड़ते हैं। शरीर का मांस खाते हैं। मच्छर खून पीते हैं। और किलनिया मांस में घुसती हैं। पिसू काट कर भागते हैं। बर्रे और भरे काटते हैं। जो खून चूसती हैं। सांप बिच्छू आदि आदि दशते हैं। जन्म भर शरीर की रक्षा की और अकस्मात उसे बाग उठा ले गया। भेड़िया खा गया। चूहे और भेड़िया खा गया। चूहे और बिल्लियां काटती हैं। कुत्ते और घोड़े मांस नोचते हैं। भालू और बंदर मार डालते हैं। ऊंट काट खाते हैं। हाथी चीर डालते हैं। बैल अचानक सींगों से मार डालते हैं। चोर लाठियां बरसाते हैं। भूत डराकर मार डालते हैं। यही इस शरीर की स्थिति है। है तो यह शरीर बहुतों का पर मूर्ख समझते हैं कि हमारा है। पर आगे चलकर ताप तापत्रय नामक समास में बतलाया गया है कि यह शरीर अनेक प्रकार के जीवों का खाद्य है। यदि यह शरीर परमार्थ में लगाया जाए तब तो यह सार्थक होता है और नहीं तो अनेक प्रकार के आघातों के कारण व्यर्थ ही मृत्यु पथ में चला जाता है जो प्रपंची और मूर्ख है।

00:30:58:24 तो ये इस तरह से हमारी निर्देह वंदना भी कंप्लीट हो गई। करपात्री जी के द्वारा स्थापित जो उप पीठ के शंकराचार्य के साथ जो लाइव चर्चा किया था तो उसमें आपने कहा कि ईश्वर का सगुण साकार रूप भी नित्य है। तो ये तो मतलब थोड़ा सा बात समझ में नहीं आ रहा कि सगुण साकार रूप नित्य कैसे हो सकता है? व्यवहार में उसे अनित्य कैसे सिद्ध करेंगे? अनित्य कैसे सिद्ध करोगे व्यवहार में? उनका कंधा इधर से शुरू होगा। इधर खत्म हो रहा है। जहां खत्म होगा वहां भी वो आपको देखेंगे।

00:31:43:06 जहां पर खत्म होगा वहां पर है। भगवान सुनिए जब भगवान अपनी माया से दो और दो को पांच दिखा सकते हैं तो भगवान आपको ये फील नहीं करा सकते कि वो हर जगह है अपने स्वरूप से और जो कंधा इधर से शुरू हो रहा है इधर पे खत्म हो रहा है यह तो दृष्टिगोचर होना और और अगोचर होना है मात्र वहां पर भी वह है जहां कंधा खत्म हो रहा है बस वहां पर आंखों का विषय नहीं बनाया आपको

00:32:18:09 नहीं तो फिर ऐसे तो मतलब सगुण साकार के लिए सर्वव्यापी मतलब कह ही नहीं सकते। अगर आप कह दोगे कि उनका कंधा हर जगह है तो फिर आप उसे कंधा भी नहीं कह पाओगे। क्योंकि कंधे का एक सीमा है तभी हम उसे कंधा कह पा रहे। है ना। मैंने आपको दोनों तरीके से आंसर दिया है किरण जी उसमें आप मनन करिए। जब तक हम व्यवहार में है तब तक हम यह नहीं कह सकते वो नित्य नहीं है। नहीं वो शगुन साकार रूप की बात मैं नहीं कर रहा। मैं मैं तो ईश्वर को नित्य मानता ही हूं। लेकिन उस रूप को क्या माने सगुण साकार रूप को? नित्य मानना पड़ेगा। उस ईश्वर सिद्ध कर देंगे ना। जब तक आप माया में हो तब तक वो आपको हर वो चीज समझा दिखा सकते हैं जो आप जो वो हर वो चीज कर करके दिखा सकते हैं जो आप कहो। तो हम लेकिन वो भी माया ही होगा। असल में नहीं करेगा वो। तो फिर हमने कहा तो व्यवहार में आप सुनो तो पहले पूरी बात असल में नहीं करेगा तो हम भी तो तत्व से कुछ और बात कह रहे हैं।

00:33:18:00 यानी कि तत्व के दृष्टि से वो वो जो सगुण साकार रूप है वो अनित्य ही है। हां तो मानना ही पड़ेगा ना। जब भगवान ज्ञान स्वरूप प्राप्त हो रहे हैं, शरीर स्वरूप थोड़ी ना प्राप्त हो रहे हैं। यही बात मैं कह रहा हूं कि जितना सत्य निर्गुण निराकार है, उतना नित्य ये वाला नहीं है, सगुण साकार नहीं है। अरे तो भाई तत्व की दृष्टि से तो हमने कब कहा है? आप समझने का प्रयास करो। उसको दो चार बार रिपीट करके देखो। व्यवहार में भगवान का स्वरूप अनित्य है। ये हम सिद्ध कैसे करेंगे? भगवान तो जितनी बार अपनी देह का नाश करेंगे उसके बाद फिर प्रकट हो जाएंगे। तो इसका मतलब वो केवल प्रकट और अप्रकट हुआ। उसको अनित्य घोषित कैसे करेंगे? आपने उनका पैर पकड़ लिया मान लीजिए भगवान का। ठीक? अब पैर पकड़ने के बाद आपने कहा कि अब प्रभु आप जो है देह क्या कहते हैं? देह का नाश करके दिखाओ। उन्होंने देह का नाश भी किया। फिर भी आपको फील हुआ कि पैर पकड़ा हुआ है। वो दूर से खड़े होकर भी दिखाई दिए। आपको पता चला कि हमने तो कोई तना पकड़ा हुआ है। सिद्ध कैसे करोगे? वो हर वो काम करके दिखा देंगे। इसलिए व्यवहार में भगवान का जो स्वरूप होता है वो नित्य होता है।

00:34:33:18 उसको आप सिद्ध नहीं कर सकते। वो अनित्य है। नहीं सिद्ध में कर सकता हूं लेकिन ठीक है। कैसे करेंगे बताइए? उनका जो वो सगुण साकार रूप है वो वो खुद बना ही माया से है तो फिर यहां से माया से बनना तत्व माया से बनना तत्व दृष्टि की बात हो गई ना अभी आप एक भौतिक संसार में आप केवल भौतिक बातें करिए सिद्ध करिए भगवान का स्वरूप नित्य नहीं है केवल भौतिकता से तत्व की दृष्टि से तो मैं भी बोल रहा हूं ना कि नित्य नहीं है जब आप माया से बना होना बता रहे हैं तो आप तात्विक दृष्टि से बता रहे हैं ना

00:35:10:21 तो भौतिक संसार में जो हमें दिख रहा है सगुण साकार रूप वो क्या दिख रहा है वो तो वो तो हमें निर्गुण निराकार ब्रह्म तत्व पर डायरेक्ट नहीं दिख रहा वो तो भगवान सामने खड़े हैं उनको अनित्य अनित्य सिद्ध करो आप करो सिद्ध क्योंकि वो पंचभूतों से बने है इसलिए अनित्य है पंचभूत फिर तत्व पे जा रहे हो मैं कह रहा हूं भौतिकता से सिद्ध करो कि भगवान का स्वरूप नाशवान है अरे शिव जी पंचभूत कोई तत्व नहीं होता। पंचभूत कार्य ही है माया के।

00:35:48:19 पंचभूत से बना होना मालूम कैसे पड़ रहा है आप? गढ़ता में जा रहे हो तब ना। पंचभूत से बना होना तभी हम जान पा रहे हैं। क्योंकि जो रूप पंचभूत नहीं है। किरण जी आपने कहा माया के कार्य फिर माया का होना फिर आपने आप पहुंच गए तात्विक दृष्टि में। आपको बोल तो रहा हूं आप मनन करिए पहले। आप जब जब भगवान दो और दो को पांच आपके मन में डाल सकते हैं। भाई इस समय मैसेज मत करो आप प्लीज थोड़ा सा रुक जाइए। जब भगवान दो और दो को पांच डाल सकते हैं। अपनी माया शक्ति से आपके मन में तो आप अपने स्वरूप की नित्यता नहीं डाल सकते। सिंपल सी बात नहीं समझ रहे हो आप।

00:36:34:02 तो व्यवहार में ठीक है। मैं व्यवहार नहीं करूंगा मैं। व्यवहार में हम ये सिद्ध नहीं कर सकते। भगवान का स्वरूप अनित्य है। हां तात्विक दृष्टि से वो ज्ञान स्वरूप हमें प्राप्त होते हैं। परंतु व्यवहार में तो उनका अपनी देह का नाश करना हमें प्रकट और अप्रकट मानना पड़ेगा। उनका दृष्टिगोचर होना और अगोचर होना मानना पड़ेगा। तो वो अनित्य सिद्ध कहां हुए? नित्य हुए। तो जब तक हम व्यवहारिक हैं तब तक हमारे लिए वो स्वरूप हमारी जानकारी में व्यवहारिक जानकारी यही है कि वो नित्य है। वो स्वरूप नित्य है। उसको नित्य समझ के ही तो पूजा करते हैं हम।

00:37:15:13 समझ रहे हैं? अविनाशी जैसे मान लीजिए सिंपल सी बात है कि उन्होंने अपनी देह का नाश किया। पंच भौतिक देह है। उन्होंने अपनी देह का नाश किया। नाश हो गया। हम दोबारा प्रकट हो सकते हैं कि नहीं? हां वो तो हो सकते हैं। इसका मतलब क्या मानना पड़ेगा कि देह का नाश नहीं हुआ था। अगर हम यह कहेंगे दूसरा व्यक्ति दूसरा जन्म है तो हम लोग किन पैराटर्स से नापेंगे कि दूसरा है वो सारे पैराटर्स क्या होंगे? भौतिक यानी कि फिंगरप्रिंट्स, तिल, मस्सा, चोट का निशान। क्या वो सारे निशान, वो सारे फिंगरप्रिंट्स आ सकते हैं कि नहीं? उनकी नई बॉडी पर।

00:37:54:26 जी हां, आ सकते हैं। तो इसीलिए हम लोग अविनाशी सिद्ध नहीं कर सकते व्यवहार में। दो पक्ष है। एक आर्य समाज का पक्ष है जो यह कहता है कि भगवान व्यवहार में अनित्य है और तत्व से कहता है कि तत्व से भी अनित्य है और व्यवहार में भी अनित्य है। दूसरा पक्ष है ये रामपाल और ये इस टाइप का जो कहता है कि भगवान जो है तत्व में भी नित्य है और यहां भी नित्य है। तो ये वाला इसलिए गलत है क्योंकि ये तत्व को व्यवहार में डाल रहा है। तत्व की अनित्यता को व्यवहार में अनित्यता में डाल रहा है और यह वाला इसलिए गलत है क्योंकि यह अह क्या कहते हैं अह तत्व की नित्यता को व्यवहार में नित्यता में डाल रहा है। व्यवहार से नित्य है। व्यवहार व्यवहारिक जगत से वो नित्य है व्यवहारिक दृष्टि से और जो है तत्व की दृष्टि से अनित्य है। ठीक है? और सोचिए जो वो थोड़े समय के लिए जो तिरोभाव उनका हो गया। ठीक है? हम तो उस समय तो वो आंखों से ओझल हो गए ना। तो बात वहां ये आएगी कि वो आंखों से ओझल हुए कि आप अंधे हुए। आप समझिए बात को उन्होंने आपको अंधा किया है ना वहां। वो कहां प्रकट अप्रकट हुए? उन्होंने आपको अंधा बनाया। फिर उन्होंने

00:39:10:00 आपको आंखें दे दी। लो कैसे सिद्ध करोगे अनित्यता? तो जब तक आप जीव भाव को प्राप्त हो तो ईश्वर के जो स्वरूप है वह नित्य है। ठीक है। ऐसा ठीक है। वो तत्व की दृष्टि है कि माया से बना है। माया के कार्य हैं। वो सब तत्व की दृष्टि से जीवित हो मनुष्य हो भगवान नित्य है। सिंपल ठीक है। जी जी धन्यवाद। जय श्री राम। हां जी।

00:39:47:03 हेलो जय भैया मेरा एक प्रश्न था जैसे जैसे आपने बताया जीव की चाह का उद्देश्य सच्चिदानंद है मतलब इस दुनिया में जो भी जीव चाहता है सब सब कुछ ना कुछ व्यवस्था है जैसे भूख है तो खाना मौजूद जी आपसे कई बार बात कर चुके हैं क्या लगभग लगभग इसी टॉपिक पर बुद्ध इत्यादि के विषय में भी जी जी जी बस बस इसमें इसी में थोड़ा सा कन्फ्यूजन है बस उसी को क्लियर करना है मेरा इसमें प्रश्न है कि जैसे सब कुछ का है तो हम ये कैसे मान जो जीव का उद्देश्य है वो सच्चिदानंद है वो ईश्वर है ये भी कह सकते हैं कि वो जो पहले ये समझिए हां ठीक है बोल लीजिए आप बोल लीजिए हां मैं ये कह सकता हूं कि क्या पता जैसे बौद्ध लोग बौद्ध लोग कहते हैं कि वो निर्माण को प्राप्त करना है ठीक है मैं ये भी कह सकते हैं कि मान लीजिए कोई ऐसी जगह हो सच्चिदानंद एक जगह हो हम लोग एक ईश्वर कैसे डिफाइन कर सकते क्या पता वो एक ऐसी प्लेस हो उस प्लेस में जाके ईश्वर दुनिया के सारे मोह खत्म हो जाए या मतलब सच्चिदानंद को प्राप्त कर ले आप एक जगह को एक ईश्वर कैसे बना सकते हैं ये चीज पहली बात ये है कि आप यह मत देखिए कि जीव की

00:41:02:04 चाह से सिद्ध होता है कि भगवान क्या है पहले आप ये समझिए भगवान है क्या जो सच्चिदानंद स्वरूप हो अब हमारे अंदर चाह क्या है सच्चिदानंद की चाह है तो सच्चिदानंद की चाह का अवतार क्या है? व्यवहारिक जीवन में हमारे मन में चाह विद्यमान है सतचित आनंद की। यह चाह अवतार लेती है। किस रूप में? कि कोई अगर हमें मार रहा है तो हम भागते हैं। हमें कूदने से डर लगता है। यह अवतार है हमारी चाह का। सर्वाइवल जो चाह है ना हमारी उसका यह अवतार हो गया। कि हमें पता कैसे लग रहा है कि हमारे अंदर ये चाह है इनबिल्ट। यह चाह है। ये तो मानते हैं ना बुद्ध वाले भी। जी ठीक है तो हमारे अंदर इनबिल्ट चा जो है वह अवतार लेती है और वह दुनिया के हर कार्य को करने वाली होना चाहती है। जितनी भी विपरीत परिस्थितियां हैं जो हमें अपने अनुकूल नहीं लग रही है उन्हें अपने अनुकूल बनाना चाहती हैं। इतनी बात समझ में आ गई? जी। ठीक है। तो अब इस चाह का विषय कौन है? सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर। तो सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर होगा। यदि वह एक जगह मात्र होगा तो क्या उसका अवतरण ऐसा हो पाएगा जो दुनिया के समस्त कार्य कर सके? क्योंकि हमारी चाह का अवतार क्या है? हमारी चाह का अवतार

00:42:17:20 है कि हम दुनिया की जितनी अपने अनुकूल परिस्थितियां नहीं है उनको अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं। जितनी प्रतिकूल परिस्थितियां हैं उनको अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं। तो इसका मतलब जो सच्चिदानंद होगा वो ऐसा अवतार ऐसा रूप धारण कर सकेगा उसका अवतार हो जैसे हमारी चाह का अवतार है वैसे ही उसका भी अवतार हो जो सब कुछ कर सकता हो। अपने अनुकूल पूरी दुनिया को बना सकता हो। मगर यदि वो एक जगह मात्र है तो वह जगह बना सकती है। अपने अनुकूल ऐसा रूप धारण करके वह भी अवतरित हो सकती है जिससे कि हम पता लगा सके कि हमारी जिन इच्छाओं के मूल में सच्चिदानंद है उसका भी निवारण यही है जिसके मूल में सच्चिदानंद है। समझ पा रहे हैं जो कह रहा हूं बहुत कंफ्यूजन हो रही है। तो वो जो जगह है जब आप उसको केवल एक स्पेस तक सीमित रख रहे हैं तो यानी कि वो सर्वशक्तिमान नहीं है। कुल मिलाकर के बात आ जाती है सर्वशक्तिमान की। हमारी चाह है सर्वशक्तिमान की तो उस चाह का निवारण करने वाली जो जगह होगी अगर वह जगह मात्र स्थान मात्र है तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है और यदि वो सब कुछ कर सकती तो वही तो सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है। अगर वो सब कुछ अगर वो वास्तविकता में सच्चिदानंद है तो

00:43:32:26 वो उसका व्यवहारिक जो अवतरण होगा वो होगा सर्वशक्तिमान ईश्वर में। जैसे हमारी जो मूल चाह है उसका अवतरण है। सर्वशक्तिमान की चाह है कि नहीं है? बिल्कुल। है ना? तो तो जो हमारी चाह का विषय होगा उसका भी अवतरण होगा। किस रूप में? सर्वशक्तिमान में जो वहां व्यवहार में व्यवहार से टकरा पाए। हमारी चाह का अवतरण हुआ। सर्वशक्तिमान की चाह। तो इधर सच्चिदानंद का अवतरण हुआ सर्वशक्तिमान में। तो सर्वशक्तिमान की चाह का निवारण किसने किया? सर्वशक्तिमान ने। तो हमारी चाह के मूल में क्या था? सच्चिदानंद। सर्वशक्तिमान के मूल में क्या है? सच्चिदानंद। यहां पर जो क्या कहते हैं? पारमार्थिक धरातल पर इसको यह मिल गया। व्यवहारिक धरातल पर उसको वह मिल गया। व्यवहारिक धरातल पर हम सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल करना चाहते थे। तो हमें ऐसा कोई मिल गया जो सारी परिस्थितियों के अपने अनुकूल कर सकता है। तो वहां पर व्यवहारिक धरातल पर निराकरण मिला हमें और फिर उसके द्वारा हमने उस जगह को प्राप्त किया जहां पर हमारे मन के अंदर इस तरफ सच्चिदानंद की चाह है तो उसका निरा निराकरण करने वाला कौन है? सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर। ठीक है? अगर उसको स्थान मात्र तक सीमित कर देंगे तो वो

00:44:48:04 सर्वशक्तिमान व्यवहार जगत में आकर के सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध नहीं कर पाएगा। सर्वशक्तिमत्ता सिद्ध नहीं कर पा रहा है। यानी व्यवहारिक जगत में जो हमारी चाह का जो अवतरण हो रहा है उसका ही निराकरण हमें प्राप्त नहीं हो रहा है। तो फिर हम ऐसे जो आ ही नहीं रहा है जो हमारा निराकरण की शुरुआत ही नहीं दे रहा है तो उसको किसको प्राप्त करके हम सर्वशक्तिमान तक पहुंचेंगे। हम किसका आलंबन लेकर पहुंचेंगे? ठीक है। तो जैसे आपने कहा कि हमारे जैसे हमारे जो शास्त्र है वो सब कुछ शब्द प्रमाण पे वो है तो ये सिर्फ शब्द प्रमाण पे ही क्यों है? और कोई क्यों नहीं है और कोई कई बार बता चुका हूं। आप बार-बार एक ही प्रश्न करते हैं। तर्क की पराकाष्ठा है, आस्था भी है। मगर आस्था किस पर है? तर्क की पराकाष्ठा पर। ठीक है? जी इसको समझिए जाकर के हमारे हमारा भी एक आस्था से ही शुरुआत है कि हमें वेदों पर आस्था है। पर हमें जिस पर आस्था है वो ये क्लेम नहीं करते कि हमें भगवान ने रचा। वो ये क्लेम करते हैं कि हम अपुरुष हैं। सिंपल जब तक किसी और चीज का आलंबन लेना होगा किसी की

00:46:03:10 प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए तब तक दुनिया की कोई चीज प्रमाणिक सिद्ध हो ही नहीं पाएगी। कुछ भी ले आइए आप तो कोई ऐसी चीज होनी होगी जिसका वह स्वतः प्रमाण हो वही स्वयं को प्रमाणित करे। ठीक है जी बहुत ही लास्ट क्वेश्चन ये निर्गुण और निराकार अब आप अगली बार सेम क्वेश्चन सेम पृष्ठभूमि लेके नहीं आएंगे। कई बार आपका निराकरण कर चुका हूं। लगभग इसी के इर्दगिर्द घूमता है सारा। लास्ट क्वेश्चन और निराकर का मतलब क्या होता है?

00:46:39:01 हेलो देवांश जी को बोल देने दीजिए बोलिए भैया ये निर्गुण निराकार क्या होता है क्योंकि ये स्पॉन वाले कहते हैं जो व्यवहार में ना आ सकने वाला सीधी बात वो लाइट वो लाइट समझती है ईश्वर को सीधी बात समझ लीजिए जो व्यवहार का विषय ना हो सके इंद्रियों का विषय ना हो सके वो है निर्विशेष निर्गुण निराकार ठीक है धन्यवाद धन्यवाद हेलो

00:47:12:16 किसकी बारी है? किसकी बारी है? जी आप म्यूट करो म्यूट करो विशाल बोल रहे हैं भैया हां विशाल जी जय श्री राम आपको जय श्री राम जी मेरा प्रश्न भैया ये था कि जैसे कि मोक्ष में जो मोक्ष में भी हायरार्की होती है क्या जैसे कि केवल मोक्ष सायुज मोक्ष और एक जो होता है जो ईश्वर के जैसे निराकार रूप रूप को प्राप्त होना जितने भी ये जो मोक्ष हैं कैवल्य को छोड़कर के इनकी प्राप्ति का पर्यावसान भी कैवल्य में ही है। वहां पर आपकी अपनी इच्छा पर होता है कि प्रभु से यदि आप कुछ वहां ऐसा व्यवहार नहीं करना पड़ता। प्रभु आपको ज्ञान दे देते हैं। ज्ञान ज्ञान स्वरूप मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। ठीक है? जी मोक्ष तो जैसे थोड़ा सा जैसे मोक्ष तो नित्य होता है ना मोक्ष मिलने के बाद फिर वापस तो नहीं आना होता है इस बारे में हम लोग विचार काफी कर चुके हैं और दोबारा जब चैप्टर आएगा तो ठीक से बात करेंगे है ना काफी सारी बातें इस पर कर चुके हम लोग हां भैया ठीक है भैया तो एक दूसरा और प्रश्न है छोटा सा जैसे महाभारत

00:48:27:18 से रिलेटेड जैसे महाभारत जो हमारा ग्रंथ है तो उसकी प्रमाणिकता को लेकर अह जैसे कौन पब्लिकेशन का है जो वो प्रमाण देखिए कोई भी पब्लिकेशन प्रमाणिक नहीं है। किसी भी पब्लिकेशन को आंख बंद करके प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता। जिस पब्लिकेशन का जो ग्रंथ हमारे परंपरा प्राप्त आचार्य गण प्रमाणित कर दें। इस आधार पर कि उन्होंने अपने पूर्वाचार्यों से पढ़ा अपने सिद्धांतों के आधार पर वही प्रमाणिक होता है। अब काफी हद तक चौखंबा और गीता प्रेस के जो ग्रंथ हैं। उनके प्रामाणिक आचार्यों के द्वारा नाम सुझाए जाते हैं। तो आप उनको अध्ययन करें। परंतु यदि कोई कहीं ऐसी विपरीतार्थक बात आ जाती है तो उसके बारे में गुरुदेव से प्रश्न करें कि गुरुदेव हमारे सिद्धांतों के विरुद्ध जाती हुई ये बात दिख रही है। तो वह बताएंगे आपको कहीं कुछ मिक्स तो नहीं हो गया, कुछ नहीं हो गया या फिर इसमें जो आपको भ्रम उत्पन्न हो रहा है, वह क्यों हो रहा है? जैसे कभी किसी ने यही कह दिया। एक बार मैंने बताया था कि हनुमान जी की दृष्टि जो है वह सीता माता के विषय में मनन कर रहे हैं। उनके अंग प्रत्यंगों के बारे में विचार कर रहे हैं। सीता माता को जब अशोक वाटिका में जाते हैं सूचना देने श्री राम जी

00:49:42:19 की तो वहां माता के अंग प्रत्यंगियों के बारे में बहुत साफ-साफ लिखा है वाल्मीकि जी ने। सभी अंगों के बारे में। तो वहां पर यह विचार आ जाएगा अरे हनुमान जी तो बाल ब्रह्मचारी है। ऊपर से सीता माता के लिए कैसी-कसी बातें सोच रहे हैं। तो ये क्या हुआ? हमारे जो सिद्धांत है सिद्धांत क्या है? वो बाल ब्रह्मचारी हैं और वह उनकी माता के तुल्य हैं। फिर ऐसी बात क्यों आ रही है इनके मन में? तो सिद्धांतों के विपरीत जाता हुआ दिखेगा तो उस पर आपको मनन मनन की आवश्यकता है। अपने गुरु के सानिध्य की आवश्यकता है। गुरु आएंगे वो बताएंगे कि यहां पर हनुमान जी के द्वारा इस इस तरह के विचारों का अर्थ क्या है? तो अर्थ ये था कि जब भी हम किसी स्त्री को ढूंढने जाते हैं, भीड़ में देखने जाते हैं तो स्त्री की शुरुआत उसके शरीर शारीरिक संरचना से होती है। वो हमारे सतह कई परतों के बाद जो है वो फीड है। वो इंफॉर्मेशन कि हम एक अपनी माता जी को ढूंढने जा रहे हैं। बहन जी को ढूंढने जा रहे हैं। तो वो फीड है कि वो किसको ढूंढने जा रहे हैं। वो स्त्री है। उसका शरीर एक स्त्री है जैसा होगा। तो वह जो इतने अंदरूनी जो विचार हैं यहां पर होगा कि उनके शारीरिक संरचना भी का विचार भी बहुत गढ़ता के साथ आपके मनन में आएगा। परंतु

00:50:58:02 सतह स्तर पर ना होने से आप यह समझ नहीं पाएंगे कि आपने ये बात सोची कि नहीं सोची। तो वहां पर बहुत क्लेरिटी के साथ वो बात बताई गई है कि इस स्तर तक की बात वहां पर बताई गई। एक स्त्री को आप ढूंढने जाएंगे तो स्त्री की पहली पहचान क्या है? वो स्त्री जैसी लगे। तो स्त्री जैसी लगने के लिए जो अंग प्रत्यंगियों की संरचना की बात आएगी तो उस विचार होता है सबकॉन्शियस माइंड में कई लेयर्स के बाद और ऊपरी मस्तिष्क से हम ये सोचते हैं कि हमने तो केवल बहन जी को ढूंढा नहीं ढूंढ लिया केवल चेहरे से ढूंढ लिया। हम सर्वप्रथम वो एक स्त्री है। तो स्त्री के अनुकूल जो शारीरिक संरचना आती है मन में वो शारीरिक संरचना उनके आई थी। उनका कोई भाव ऐसा नहीं था कि कोई कु दृष्टि से उन्होंने वह विचार किए थे। तो यह हमको क्या हुआ कि एक विपरीत अर्थक कुछ सिद्धांतों के विरुद्ध जाती हुई कोई बात नजर आई तो हमने गुरु की शरण ली उसको सत्यापित करवा लिया कि भैया प्रक्षिप्त नहीं है यहां पर ये क्या है ये ऐसा ऐसा यहां पर अर्थ है इस बात का इसीलिए गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल ग्रंथ नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ ले लेंगे तो ग्रंथ को सत्यापित कौन करेगा केवल गुरु को ले लेंगे गुरु को सत्यापित कौन करेगा गुरु कोई भी कह रहा है मैं गुरु मान ले उसकी बातें हमारे ग्रंथों से मैच नहीं खा रही मान ले तो गुरु गुरु

00:52:13:10 की बातें ग्रंथ से और ग्रंथ की बातें गुरु से सामंजस्य से ये समझना होगा हमारे सनातन समाज को ठीक है चलिए प्रणाम शिवश भैया जय श्री राम बताइए भैया मैं राजस्थान से हूं और मेरा ये प्रश्न था कि जो राज की व्यवस्थाएं पहली थी वैसी अब वाणी क्या आप पॉसिबल है अब जो चल रहा है आजकल जो अभी पूरे हमारे देश में चल रहा है वै जो वैदिक था वैसा अभी आना क्या पॉसिबल है? हां जो पहली जो व्यवस्थाएं थी वैदिक काल में भैया वो पूछ रहे हैं कि वैदिक काल में जो व्यवस्था थी क्या वो पुनः आ सकती है आज के काल को देखते हुए ऐसा मतलब क्या पॉसिबल है कि वैसी ही व्यवस्था वैसा ही गुरुकुल आदि सब आचार विचार सब आ जाए इस कलयुग में इस बारे में करपात्री जी महाराज ने बहुत बढ़िया कहा है गर्मी का मौसम है यह ज्ञात होने पर भी हम गर्मी से बचने के उपाय करना नहीं छोड़ देते हैं। सर्दी का मौसम है यह ज्ञात होने पर भी हम सर्दी से बचने

00:53:28:14 का उपाय नहीं छोड़ देते हैं। तो उसी प्रकार कलयुग है। यह सब होगा ही। यह सोच करके हम कलयुग से बचने का उपाय करना नहीं छोड़ सकते। ठीक है। थैंक यू भैया। बस यही था। चलिए जी। भैया मेरा प्रश्न था अजपा जप तक कैसे पहुंचे? उस स्थिति तक कैसे पहुंचे और साथ ही साथ आत्मज्ञान के लिए किन ग्रंथों का अध्ययन करें।

00:54:01:06 आत्मज्ञान के लिए सर्वप्रथम आप ये जो पांच ग्रंथ बताए जा रहे हैं। पहला ग्रंथ है ज्ञानेश्वरी गीता उसका अध्ययन कर लीजिए। रामचरितमानस हिंदी दास बोध भक्ति सुधा गर्व से कायम हिंदु ये पांचों का अध्ययन कर लीजिए फिर आपकी गति सभी में हो जाएगी और जो दूसरा क्या था विधि विषयक प्रश्न था तो वह आचार्य श्री सेम इत्यादि क्या प्रश्न है आपका मेरा था कि अजपा जप की स्थिति तक कैसे पहुंचा जा सके उसमें क्या क्या बाधाएं आती है या क्या विशेष ध्यान रखा जाए कि वहां तक जल्दी से जल्दी पहुंचा जाए हम अजपा की स्थिति तक हम उसमें जल्दी से जल्दी पहुंचे किस प्रकार से उसमें क्या-क्या ध्यान रखें

00:54:56:04 वो आपका प्राप्तव्य है अपने जीवन को जितना ज्यादा संयमित रखिए और आहार की शुद्धि पर ध्यान दीजिए आहार की शुद्धि से ही चित्त की शुद्धि होती है जितना ज्यादा हो जितना ज्यादा अपने आचार विचार आपकी चित्त की शुद्धि होती जाएगी उतना ही ज्यादा आपकी गति इसमें होती जाएगी जो आप अनुशासन से भगवान की भक्ति करेंगे फिर वह अपना काम करेगी वह प्राप्तव्य में आ जाएगा जो आप जो अगले चरण होंगे वो सब प्राप्तव्य में आपको प्राप्त होने लगते हैं आपका कार्य बस इतना करना है कि अनुशासन से मन नहीं कह रहा है फिर भी जो है वो सवा घंटे की जो भक्ति है वो करते रहे फिर आपकी गति भगवान को जहां करानी होगी जिस रूप में करानी होगी वो कराएंगे ठीक ठीक है भैया बस बस इसमें एक ही दिक्कत आ रही है क्या है कि घर में प्याज लहसुन वगैरह कभी कभी बन जाता है हम उसमें ना नहीं कर पाते अब घर में पक रहा है कोई खा रहा है तो क्या करें बाकी जप वगैरह इत्यादि जितना भी भगवान की भक्ति बढ़ाएंगे अपनी तरह अपने घर वालों को भी भक्ति कराइए धीरे-धीरे उनके मन में शुद्धि होने लगेगी उनके मन में प्याज लहसुन या कोई भी और जो ऐसी चीजें खा रहे होंगे उनके प्रति घृणा वाले विचार आने लगेंगे तो

00:56:12:12 अपनी तरह अपने घर को बनाइए। यदि आप सवा घंटे की भक्ति कर पा रहे हैं तो अपने घर में किसी और को चालू करवाइए। दो लोगों को देखेंगे तो तीसरी माता जी या जो भी और परिवार के लोग होंगे वो भी प्रभावित होंगे। ठीक है वनखेड़े जी आप प्रश्न पूछ सकते हैं माइक ऑन करके जी भैया जी हेलो हम क्लियर आ रही है जी भैया आवाज आवाज क्लियर आ रही है हां क्लियर आ रही है जी भैया भैया जी मैं ये इसी विषय में और थोड़ा बात करना चाह रहा था कि सच्चिदानंद के इस विषय हम कि जैसे आपने सत्य के विषय में कहा कि सत का मतलब ऐसा है कि आप पूरे ब्रह्मांड में जितना नॉलेज है और धरती में जितना नॉलेज है वो सब जान जाते हो। तो मैं तो मतलब हम तो एक इंसान है। स्वरूप स्वरूप से मेरी आवाज रिटर्न आ रही मुझे।

00:57:23:03 जय श्री राम। वानखेड़े जी आपका माइक जो है वो आवाज रिपीट कर रहा है। अच्छा अब आ रही है ये आवाज? ठीक है अब बोलिए सत्य का मतलब है मेरा म्यूट हो जा रहा है पता नहीं क्यों हेलो आ रही है अभी आवाज जी हां बोलिए बोलिए भैया जी का अर्थ है स्वरूप से मृत्यु हो जाना चित का मतलब है अखंड ज्ञान जड़ताित

00:57:58:14 चित का मतलब है अखंड ज्ञान तो भैया मतलब वही हो गया ना मतलब पूरे ब्रह्मांड में जितना नॉलेज है और पूरे धरती में जितना नॉलेज है मतलब वो सब हमें पता चल जाता है तो अभी इंसान की दृष्टि से वो कैसा पॉसिबल मतलब हम कैसे मान ले कि मतलब वैसा हो सकता है नहीं हो सकता तो मान लेकिन जो चीज पे आपको विश्वास नहीं है कि अस्तित्व है तो उसे एक मिनट भैया वानखेड़े जी अपना माइक जो है उसको ऑफ रखें या एक बार आप लीव करके जॉइ करें वो रिपीट कर रहा है आवाज को आप समझ रहे हैं बार-बार मुझे म्यूट करना पड़ रहा है क्योंकि जिस चाह को आप छोड़ नहीं पा रहे हैं चाहकर भी नहीं छोड़ पा रहे हैं रोबोट जैसे बन जाइए मृत्यु से मत भागिए जड़ता से मत भागिए इससे तो आप है नहीं क्यों नहीं छोड़ पा रहे जब जब हमें मालूम है तो तो जिस चीज का अस्तित्व नहीं होता है उसको मांगने वाले को भौतिकवादी भी पागल कहते हैं पागल घोषित कर दीजिए अपने को तो ऐसा पॉसिबल है इसीलिए ज्ञान

00:59:13:22 स्वरूप भगवान होते हैं आप यही बैठे-बैठे अभी विचार करें तो आप अमेरिका के बारे में भी सोच सकते हैं सबके बारे में सोच सकते हैं बैठे-बैठे। अच्छा आपको एक बात बताता हूं। चलिए एक तरीके से बताता हूं। यह बताइए जैसे किसी व्यक्ति ने पहले कभी भी गुलाब जामुन नहीं खाया है। ठीक है। हां भैया जी। मेरी आवाज रिपीट हो रही है क्या? मतलब कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। कोई बात नहीं। अब उसने पहली बार गुलाब जामुन खाया। हां हम बंद कर दीजिए। अच्छा अब पहली बार उसने जब गुलाब जामुन खाया तो उसे एक सुख की अनुभूति हुई। वो सुख जो है पहले कहां था? क्या भाई उसने तो गुलाब जामुन खाया है। क्या वो जो सुख उसने फील किया उस सुख का जो ज्ञान था वो पहले कहां था? अधिष्ठान क्या था उसका पहले? रसगुल्ले में तो ज्ञान था नहीं। उसके पास तो रसगुल्ला आया है या कोई इंजेक्शन लगाया गया हो ज्ञान रूपी आपको ज्ञान आपके ही अंदर था। इसका मतलब क्या हुआ कि रसगुल्ले का भी ज्ञान रसगुल्ले से प्राप्त होने वाले सुख का ज्ञान भी आपको पहले से ही

01:00:28:24 था। बस उसके साथ आप कनेक्ट नहीं थे। अभी आप कनेक्ट मात्र हुए हो। ज्ञान तो पहले से था। और ऐसा बहुत बार होता है हमारे पास। हम लोग कई बार कहते हैं कि अरे यार मैंने उसको देखा तो है। देखा तो है याद नहीं आ रहा। याद नहीं आ रहा है। यानी वह आपके अंदर है वह जानकारी पर वह आपकी इंद्रियों के साथ कनेक्ट नहीं हो पा रही है। मन रूपी इंद्रिय के साथ वो कनेक्ट नहीं हो पा रही है। थोड़ी देर बाद एक घंटे के बाद याद आ जाता है। कहां थी उस समय? भाई अगर वह आपके ही अंदर थी। एक घंटे के बाद वो जानकारी आपको आ गई तो उस समय कहां चली गई थी? यानी कि संसार का समस्त जो ज्ञान विज्ञान है यह आपके अंदर ही है। इसीलिए आप जो है उसको मांग रहे हो क्योंकि मन यह बता रहा है मन जो है आपको यह कह रहा है कि नहीं है मगर क्योंकि आप स्वरूप से वही हो। ज्ञानी ही हो। इसलिए वह आवाज आ रही है अंदर से कि नहीं उसी उसी स्टेज को वापस पहुंचना है। इसीलिए आप मांग रहे हो वरना मांगते नहीं। अंशी हो ना सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर के इसलिए तो अंश हमेशा अंशी नहीं अंश हो तो अंश हमेशा अंशी की ओर आकृष्ट होता है

01:01:43:25 ठीक है तो आप अपूर्ण हो और अपूर्ण अपूर्ण जो है वो पूर्ण की ओर आकर्षित हो ठीक है अब आपका माइक काम नहीं कर रहा है फिर बात करेंगे जी भैया विनीत जी बोले हरे कृष्णा भैया हरे कृष्णा बताइए मैं पहले ना इस से कनेक्टेड था तो मैं ना महाराज माना करता था हरे राम हरे कृष्णा की तो मैं अभी मैं इस से कनेक्टेड तो नहीं हूं तो आपने बोला था कि सवा घंटा जाप करना चाहिए तो क्या मैं हरे कृष्णा हरे राम मां का कर सकता हूं जरूर करिए और कितनी माला करते थे पहले आप? 16 अभी भी 16 ही करता हूं। दो मालाएं बढ़ा दीजिए। ओके। ये मेरा आदेश समझ लीजिए और निवेदन समझ लीजिए और परामर्श भी समझ लीजिए। तीनों रूप में। परामर्श समकक्ष समझते हुए, आदेश वरिष्ठ समझते हुए और निवेदन कनिष्ठ समझते हुए। और एक बात और पूछनी थी कि

01:02:58:26 जैसे भगवत गीता में लिखा हुआ है कि कृष्णा बोल रहे होते हैं कि जो निरंतर मेरी भक्ति करेंगे वह मेरे धाम को प्राप्त होएंगे। तो जो उनका धाम है वहां पे ऐसे जैसे लाइक यहां पे है सब कुछ ऐसे लोग वहां पर होंगे कि कृष्णा भी वहां पर है सब कुछ ऐसे सोसाइटी बनी हुई है। ऐसा कुछ होगा या फिर वैसे ही है कि जैसे बैकुंठ धाम हो गया तो ऐसे कुछ सोसाइटी बनी हुई है। भगवान के जिस स्वरूप में उनका चिंतन करेंगे उस स्वरूप से वह प्राप्त होंगे। और और जो व्यवहार में ना आ सकने वाला रूप है उसकी भी यदि कामना होगी तो वह भी भगवान आपको प्राप्त कराएंगे। ठीक है। एक भैया एक क्वेश्चन और था लास्ट जैसे बुद्ध में बोलते हैं कि ना बस कर्म अच्छे करो भक्ति की जरूरत नहीं है। तो जो सिर्फ कर्म अच्छे कर रहा भक्ति नहीं कर रहा क्या उसको भी मोक्ष मिलेगा? उसके कर्म अच्छे सस्टेंड नहीं रह पाते हैं। जिसके पीछे राम है जिसके पीछे राम है उसी के कर्म अच्छे हो पाते हैं। क्योंकि राम से क्या होता है? हमें जो विपरीत परिस्थितियां होती हैं जो माया रूपी प्रपंच रूपी जगत है जो बार-बार यह विश्वास दिलाने पर तुला हुआ है कि भगवान जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। आपकी

01:04:14:07 इंद्रियों का काम दिन भर यही है। आपको ये इंफॉर्मेशन पहुंचाना कहां तुम लगे हुए हो भक्ति में। है ही नहीं ईश्वर। इंद्रियां दिनभर यही बता रही है। तो इंद्रियां जब आपको दिन भर यही बता रही हैं तो जो अती्द्रिय विषय के कर्म अच्छे करो अच्छा फल मिल जाएगा। अती्द्रिय विषय में भी उनकी गति तो है नहीं। झूठ ना बोलने पर जो है आपको कहीं साइंस से प्राप्त होकर फल मिलेगा। हम तो क्या होता है? इंद्रियां जब अपने दिन भर बता ऐसा कर रही हैं तो भक्ति से हमें सामर्थ्य प्राप्त होता है। इंद्रियों की उन इंफॉर्मेशन से लड़ने का। वो सामर्थ्य हमें नहीं मिल पाएगा भक्ति के बिना। ठीक है? तो कर्म करना अच्छा जो है वह सस्टेन तभी रह पाता है किसी भी व्यक्ति का जो भक्त भी हो भगवान में आस्था रखने वाला भी हो और भगवत भक्ति भी करता हो उसी के कर्म भी अच्छे होते हैं और उसी को ज्ञान भी होता है ये सब आपस में इंटरकनेक्टेड है एक भी खंबे को हटाएंगे और सब दूसरा चरमरा जाएगा फिर भैया अगर मानो किसी का कर्म है कि वह सस्टेन रख पा रहा है बिना भक्ति के तो क्या वह मोक्ष को प्राप्त होगा

01:05:27:03 देखिए कर्म अगर वह कर पा रहा है बिना भक्ति के तो वह कर्म भी उसकी भक्ति सिद्ध हो रही है ना जिसकी आस्था है भाई सही और गलत की पहचान कैसे हुई जिसका ईश्वर में अस्तित्व ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास है जिसका विश्वास जितना दृढ़ होगा वही तो सही और गलत में तय कर पाएगा कि मुझे गलत नहीं करना है तो वहां से भी उसकी भक्ति सिद्ध हो रही है तो कर्म करने के रूप में भी उसकी यदि भक्ति सिद्ध हो रही उसकी जो आस्था है वह डगमगाई नहीं। अब ज्यादातर यह होता है अधिकांशता यह होता है कि भक्ति करने से भगवान का अस्तित्व और दृढ़ होता चला जाता है। है है आस्तिकता बढ़ती है। हम लोग सभी मूल रूप से नास्तिक हैं। अगर वैसे देखेंगे तो क्योंकि हम लोग दिन भर में जितनी बार छिपाते हैं तो अपनी अंतरा अपने से कहते हैं हमें कोई नहीं देख रहा। छिपाने वाले काम दिन भर में कितनी बार करते हैं? जितना इंद्रिय भोग करते हैं उतना ज्यादा छिपाते हैं। जितना विषयों में चिंतन है उतना ज्यादा छिपाना है। जितनी बार छिपा रहे हैं उतनी बार कह रहे हैं कोई नहीं देख रहा है। उस रूप में भगवान का भी खंडन हो रहा है। चोर और बड़ा नास्तिक है। जो कह रहा है मुझे कोई नहीं देख पाए। भगवान देख रहा है। जो भगवान से डर नहीं रहा है कि भगवान उसको देख रहा है। तो वो नास्तिक

01:06:42:09 सिद्ध हो रहा है ना वहां पे। भले ही वो मंदिर जाता हो। तो भक्ति क्या कराती है? आपको यह विश्वास दिलाती है कि भगवान है। सारी लड़ाई इसी बात की है। जितना ज्यादा भक्ति करेंगे उतना ज्यादा आस्तिक बनेंगे। आस्तिक बनेंगे। आस्तिक बनने के कारण भगवान है के कारण आपके कर्म सुधरेंगे। छिपाने वाले काम कर्म होने लगेंगे। छिपाने वाली जो धारणा है वो कम होती चली जाएगी तो आपको मुक्ति मिलेगी। तो आस्तिक तो कर्म यदि कोई अच्छे कर पा रहा है तो इसका अर्थ है कि वह भक्त भी है। वह भक्त के बिना नहीं है। हां यह है कि वह नाम जप नहीं करता मगर दिन भर कर्म करते रहता है। अच्छे-अच्छे उसकी उसमें गति हो गई है। प्रारब्ध से उसको ऐसे ऐसा चित्त प्राप्त हो गया है। संतों की शरण प्राप्त हो गई है। उसका उसी में बीत रहा है। है ना? सद्गति मिलती है उसको भी। जी भैया भैया लास्ट क्वेश्चन एक और था कि ना मैं गुरु नहीं चूस कर पा रहा हूं कि मैं गुरु किसको बनाऊं मैं जिसको सुनता हूं मैं कौन ना वही अच्छा लगने लगता है गुरु के जो सिद्धांत है वह हम आपको बता सकते हैं बाकी आपका स्वयं का स्वाविवेक है आप किसको गुरु के रूप में स्वीकार करें पहला सिद्धांत है कि वह सन्यासी होना चाहिए

01:07:57:13 अंतिम निर्णायक अगर आपका कोई गृहस्थ गुरु के प्रति आकर्षण हो रहा तो वह गृहस्थ गुरु भी किसी सन्यासी आचार्य के अधीन उसकी सीमा में रह के आपको ज्ञान विज्ञान देगा। पहली बात। दूसरी बात है अब इसमें भागवतानंद तो फेल हो जाते हैं। क्योंकि वहां तो सन्यास है नहीं। अंतिम निर्णायक कौन हुआ? फिर अगर आप भागवतानंद को गुरु बनाएंगे तो। हां। अंतिम निर्णायक तो विरक्त को बताया गया ना। धर्म का अंतिम निर्णायक कौन है? सन्यासी। उसके पीछे तो कोई है ही नहीं। स्वयंभू है वह। तो पहला पहला कार्य है कि वह अंतिम निर्णायक ऐसा गुरु बनाइए जिसके द्वारा आपके आपका अंतिम निर्णायक सन्यासी सिद्ध हो रहा हो। दूसरा कि वो परंपरा से हो। तीसरा श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा दे। ऐसे नहीं यह मान लिया, वो नहीं माना, वो मान लिया, यह नहीं माना। और चौथा गुरु वही जो अपने शिष्य का संशय दूर कर दे। गुरु का मतलब अंधकार, रूह का मतलब निकालने वाला। और यदि वो अंधकार से निकालने वाला नहीं है, आपके संशय का निराकरण नहीं कर पा रहा है तो वो आपका गुरु नहीं है।

01:09:13:27 ठीक है? तो भैया मेरे को वही गुरु चूज़ करना चाहिए जो कृष्णा को ही भक्ति करवाते हो क्योंकि मैं कृष्णा के प्रति प्रेम ज्यादा है मेरा। कृष्ण की भक्ति तो शंकराचार्य जी भी करवाते हैं और कृष्ण की भक्ति जो है जो प्रामाणिक गौडिया वैष्णव है वो भी करवाते हैं और कृष्ण की भक्ति मधवाचार्य में भी संभवत प्राप्त होता है भगवान श्री कृष्ण का मंत्र और जो राधा वल्लभ संप्रदाय है वहां भी कृष्ण की भक्ति हो रही है। वल्लभाचार्य जी का संप्रदाय है वहां भी कृष्ण की भक्ति हो रही है। ठीक है? ओके भैया

01:09:50:14 ठीक है। जो शंकराचार्य हैं उनके पास भी जाते हैं जब आप तो आप बताते हैं कि मुझे कृष्ण भगवान का मंत्र चाहिए तो वहां से कृष्ण भगवान का ही मंत्र प्राप्त होता है। हां जी प्रज्वल जी आपका तो हो गया ना? जी भैया अभी रिपीट हो रहा है आवाज? नहीं रिपीट नहीं हो रहा है। जी भैया जी कैसा है? अभी मैं भी पूजा पाठ वगैरह करता हूं लेकिन कैसा है दिमाग के कॉर्नर में लेकिन फिर भी रहता है कि मतलब करते तो है पूजा पाठ लेकिन भगवान है नहीं है लेकिन वो अभी मैंने बताया ना आपको वो अभी मैंने बताया ना इंद्रियां आपको लगातार ये इंफॉर्मेशन दे रही है नहीं नहीं नहीं गलत कर रहा है तू तो उससे जीतने का तरीका ही यही है कि आप जो है शब्द प्रमाण पर ध्यान देते हुए और नाम जप करिए जितना का नाम जप करेंगे भगवान के प्रति आस्था हो जाएंगे। ठीक है? अच्छा और हर तरह से अकाट सिद्धांतों के द्वारा सिद्ध तो हमने कर ही दिया है। फिर भी थ्योरिकली आपको प्रूफ हो गया मगर जो है आपकी इंद्रियां मना कर रही है फिर भी। इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए राम की शरण

01:11:05:15 ले लीजिए। ठीक है। जी भैया। विनीत जी और प्रज्वल जी आप अपना हैंड डाउन कर लीजिए। करणजीत सिंह जी बताइए। भैया मुझे अभी 10 10 दिन पहले के गुरु के दर्शन हुए हैं स्वप्न में हम तो इसका क्या मतलब हो सकता है जो गुरु है वो बहुत बड़े और मैंने ना ही ज्यादा नाम जप किया और ऐसा कुछ नहीं बस मुझे आस्था थी गुरु के प्रति अब क्या ये किसका संकेत है कि स्वप्न में मुझे उनके दर्शन हुए और मैंने किसी एक बार जिनके दर्शन हुए हैं उन्हीं के पास जाकर के अपनी बात रखें संतों का दर्शन तो वैसे भी हितकारी होता है। तो हितार्थ चले जाए, दर्शनार्थ जाए और वहां इस बात को रख भी दे तो वही मार्ग प्रशस्त भी कर देंगे। ठीक है? और निमंत्रण तो है ही संकेत तो है ही। उनके दर्शन आपको स्वप्न में प्राप्त होना ये तो शुभ संकेत है। तो उनके साथ मुझे आपके भी दर्शन हुए उस स्वप्न में। तो मेरे से तो आपने बात कर ही ली। तो आप वहां पहुंचे जिनके दर्शन हुए थे। हां वो गुरु जी अभी विद्वान है जो उनसे आगे कोई नहीं है

01:12:20:21 उनके मुझे दर्शन हुए। ठीक है तो आप वहां जाए। चलिए फिर मुझे लगता है सभी के प्रश्न हो गए हैं और जय श्री राम। सभी को जय श्री राम। जी आ

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 1:13:03 · 15 Mar 2026

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