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00:00:01:22 मैं निग्रचार्य जी का समर्थक हूं। अच्छा और जब उड़ीसा में जन्म ही हुआ है तो शंकर सिद्धांत को तो नहीं मानने की बात नहीं है। हम लेकिन यदि आप कुछ समय मुझे देंगे तो एक स्वस्थ वार्ता के साथ एक विषय के ऊपर आपका ध्यान केंद्रित करना चाहूंगा। विषय किस विषय में मतलब निग्रचार का मैं भी समर्थन करने लगूं। नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है बस सा उपासना के ऊपर थोड़ी बहुत लगी कि आपकी बुद्धि कच्ची है थोड़ा आपके ऊपर मतलब क्या बोलूं थोड़ा कुछ आपके क्या बोलते हैं उसको ध्यान केंद्रित करना चाहिए मुझे परंपरा के अनुसार देखिए जो विषय आप लेकर आए हैं जी सात तो उपासना में मेरी बुद्धि कच्ची है जी ये विषय आप इस संबंध में लेकर आए हैं क्योंकि क्योंकि मैंने भागवतानंद की अप्रामाणिकता को सिद्ध किया है। नहीं आप सिद्ध किए हो या नहीं किए हो वह तो समय कहेगा वो उसके विषय को सुनिए पहले एक बात थोड़े सुनिए भैया हम कुछ हम कुछ अभी आपसे ये नहीं बोल अगर
00:01:16:24 आप ये चाहते हैं कि आप जो बोले वो मैं सुनू तो जो मैं बोलना चाह रहा हूं वो मुझे बोल लेने दीजिए मेरी आप मेरी लाइन आधी हो पाई उसमें आप टपक से बोल पड़े इस तरीके से तो सौहार्दपूर्ण वार्ता नहीं हो पाती ना जी जी जी हां अब बात आती है कि भागवतानंद की जो अप्रामाणिकता सिद्ध करने के निमित्त जो हमने बातें कही है जी सात उपासना के संबंध में हम वो शंकर सिद्धांत जो है ना शंकर परंपरा का जी उसका चश्मा लगाकर देखी गई बातें हैं क्योंकि क्योंकि वो व्यवहारिक रूप से शंकर परंपरा से संबंध सिद्ध होता है। जी और काल्पनिक रूप से स्वप्न की दृष्टि से स्वप्न की दीक्षा से वह कहां से सिद्ध होता है वह अभी तक पता ही नहीं है। तो इसलिए हम जो भी बात कह रहे हैं वो शंकर सिद्धांतों को मध्य में रखते हुए कह रहे हैं कि यह बात जो लिखी हुई है यह बात जो तुम कह रहे हो क्या वो शंकर परंपरा के द्वारा स्वीकार्य है क्योंकि तुम्हारी जो वेदोक्त परंपरा है वह शंकर परंपरा ही है। निश्चित ठीक है निश्चित और कुछ बोलना चाहेंगे तो अगर आप शंकराचार्य के विरोध में जा रहे हैं विरोध में जाकर के कोई सिद्धांत प्रतिपादित
00:02:32:07 कर रहे हैं तो वह स्वीकार नहीं हो सकता परंपरा के विरोध में है जी जी ठीक है ये हमारा वहां पर दृष्टिकोण है अब अब आप बताएं आप शक्ति पास जो देवी उपासना के संबंध में आप क्या बात लेकर आए? पहले तो एक उदाहरण के साथ प्रारंभ करना चाहूंगा। बाद में एक बात और मैं कह दूं आपको। आपने एक बात कही कि शायद मैं अकल का कच्चा हूं। नहीं नहीं अकल का कच्चा हूं। ये नहीं बोलना। नहीं नहीं उस शक्ति उपासना के संबंध में बस थोड़ा कच्ची जानकारी कच्ची है। जी जी और मैं आपको ये बताना चाहूंगा कि आपने जो शब्द यूज किया है एक स्वषित व्यक्ति के लिए निग्रहचार्य तो उस संबंध में आपकी जानकारी कच्ची है। ठीक है वो तो आपकी आपकी जानकारी लेने के बाद आपसे जो बात है शक्ति उपासना के संबंध में वह करने के बाद मैं फिर आपको ये भागवतानंद के निगराचार ना होने के संबंध में जानकारी दूंगा। ठीक वो तो समय कहेगा क्या है क्या नहीं नहीं नहीं आप वो सुनने में इंटरेस्टेड है तो अपनी बात बताएं मुझे निश्चित मुझे पहले आप बता दीजिए मैं सुन लूंगा फिर आपको बता दूंगा थोड़ी तो आप बताइए कि आपने जो भागवतानंद को निग्रहचार्य कहा तो किस आधार पे कहा बताइए ये समय
00:03:47:13 आने पर पता चलेगा भैया ये विवाद ठीक है तो मेरी जानकारी भी आपको समय आने पर पता चल जाएगी आप फोन रख सकते हैं। नहीं नहीं आपके कोई बात विवाद नहीं करना चाहता हूं आप ही तो कर रहे हैं। आप आप किसी को मेरे समक्ष यदि निग्रहचार्य कह रहे हैं तो उसका निग्रहचार्य तो आप सिद्ध करिए ना। जब आप चाहते हैं कि मैं आपकी बातें सुनू वो शक्ति उपासना के संबंध में। तो मैं आपकी बात ये वाली क्यों सुनूं? जब वो आदमी निग्रहचार्य नहीं है तो मैं क्यों सुनू निग्र आचार्य? वो ये बात छोड़ दीजिए। आप अभी निग्रहचारी जी की बात को बगल में रखिए। बस आपको थोड़ा ज्ञानवर्धन के लिए कुछ देना चाहता हूं। तो मैं तो मैं ज्ञानवर्धन क्यों लूं आपसे? मुझे तो आवश्यकता नहीं है। मेरे पास राम नाम का मंत्र है। मैं अपना मंत्र जप रहा हूं। और मुझे ज्ञान चाहिए होगा तो मैं शंकराचार्य के पास जाऊंगा। मेरे गुरु हैं वो। शंकराचार्य जी के पास जाएंगे। ये हम कहां नहीं बोल रहे कि आप नहीं जाएंगे। आप फिर आप क्यों ज्ञानवर्धन दे रहे हैं आप मुझे बताइए? परिपेक्ष क्या है? ज्ञानवर्धन देने का प्रयोजन क्या है? मुझे लगा यह कि आप जो भगवती की उपासना पद्धति जो सांतर्गत उपासना पद्धति है उस वो सा अंतर्गत जो उपासना पद्धति है क्या वो शंकराचार्य ने प्रतिपादित की है
00:05:03:06 निश्चित है मैं जो बता रहा हूं मैं जो बताना चाह रहा हूं वो भगवत भगवत पाद के द्वारा ही प्रतिपादित पोषित रक्षित है इसी कारण आपसे बोलना बताइए मैं जो अभी बताना चाह रहा हूं भगवत पाद भगवत पाद के अरे भाई बताइए अब वो बताइए आप जो बताना चाह रहे हैं वो लाइन मत दोहराइए अब वो बात बताइए जो आप बताना चाह रहे हैं। ठीक है पूरी जगन्नाथ मंदिर जो है वो बोलो वो किस आचार्य के अधिकार क्षेत्र में आता है? शंकराचार्य शंकराचार्य जी के अधिकार क्षेत्र में आता है। पूरी पूर्वाना गोवर्धन पीठा पीठ के जो भगवती है जो मूला अधिष्ठात्री है वो कौन है? भाई साहब आप मेरा इंटरव्यू मत लीजिए। आप अपना पक्ष मैं इंटरव्यू नहीं ले रहा भैया। आप आप अपना पक्ष रखिए। आप मेरे वस्तुनिष्ठ ज्ञान को वो वो मत करिए। एग्जाम मत लीजिए मेरा। आप अपना पक्ष रखिए। ठीक है। गोवर्धन पठ के मूलाधीश्वरी भगवती विमलांबा है। ये आप तो मानते ही होंगे। मानते ही होंगे। हां तो जो उत्कड़ी उपासना पद्धति है जो
00:06:18:28 मूल उपासना पद्धति है। उस उपासना पद्धति के मूलाधार है दुर्गा माधव उपासना। हां। उत्कड़ी पद्धति के मूलाधार है दुर्गा माधव उपासना। यह आदि शंकराचार्य जी के किस ग्रंथ में लिखा है जी जो आप विवरण देने वाले है जी आदि शंकराचार्य जी के किस ग्रंथ में यह विवरण लिखा है जो आप देने वाले है भैया बात कट रही है आपके मैं इस समय यात्रा में हूं फिर से दोहरा दीजिएगा हेलो आवाज आ रही है नारायण हेलो बात कट रही है भैया आपकी
00:06:59:10 हेलो बताइए हेलो नारायण हेलो जय श्री राम नारायण हां आप सर्वत्र ये विषय विरल सुनेंगे कि दुर्गा माधव उपासना कैसे सिद्ध हो गया भाई साहब मैं आपसे पूछ रहा हूं आप जो भी बात मुझे बता रहे हैं पहले आप ग्रंथ का नाम लेते जाए आदि शंकराचार्य जी के किस ग्रंथ का रेफरेंस के आधार पर आप बात कर रहे हैं ग्रंथ के आधार पर अच्छा मतलब आप जो प्रत्यक्ष में देख रहे हैं जो विमलांबा परमेश्वरी है आप ये आप खुद मानते हैं कि जगन्नाथ मंदिर के जो अधिकार क्षेत्र वो नहीं कह रहा हूं आगे जो विवेचना आप देने वाले हैं कि मैं उपासना के संबंध में जो मैंने कटाक्ष किए हैं यह भागवतानंद पर वह कटाक्ष जो है आदि शंकराचार्य जी के किस ग्रंथ के द्वारा उनका निराकरण मिलता अभी चारों धाम में जो जो मंदिर है जो तीर्थ क्षेत्र जो भाई साहब ग्रंथ का नाम बताएंगे आप ग्रंथ ये सब भैया ग्रंथ के आधार पर भगवत शंकराचार्य ने लिखे नहीं है जो अच्छा तो ठीक है मैं दूसरी बात पूछ रहा हूं
00:08:14:16 जी जी ग्रंथ नहीं है तो फिर आपने चारों शंकराचार्यों में से कौन से शंकराचार्य की परंपरा से ज्ञान अर्जित किया है पूरी क्या शंकराचार्य जी की परंपरा से हमारी क्योंकि उस परंपरा से दीक्षित है। नहीं दीक्षित नहीं हूं क्योंकि उस परंपरा से मेरा जन्म है। उनके लिए परंपरा से नहीं ऐसे नहीं होता है ना आपके पास तो पता है भैया कैसे होता है कुछ वो सब हम नहीं बोल रहे हैं आप झगड़ा के ऊपर मत जाइए हम आप जो है मुझे अपने मन मुताबिक व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हो जिसका कहीं कोई प्रमाण नहीं है मैं कैसे मान लूं आपकी बात तो जगन्नाथ मंदिर आपके लिए प्रमाण नहीं है आप मुझे ये प्रमाण दीजिए ना की भगवती को अपनी पत्नी के भगवती को अपनी पत्नी के रूप में देखने का प्रमाण दीजिए आदि शंकराचार्य जी के ग्रंथ से। नहीं नहीं मैं और किस लिए आए हैं यहां पर बात करने के लिए। अरे भैया क्या बोलना चाहूं यह तो पहले सुन लीजिए बात। आप एक काम करिए, आप एक काम करिए, पहले हेडलाइन क्लियर करिए कि आप क्या चीज सिद्ध करने वाले हैं? मैं यह सिद्ध करने वाला हूं कि अभी जो भगवती को आप बार-बार ये बोल रहे हैं कि निगमंद जी वो भगवती को पत्नी सिद्ध कर दिए, पत्नी सिद्ध कर दिए, यह गलत है। पत्नी वहां पर सिद्ध नहीं है। साहब, उनके कई ग्रंथों में यह तक लिखा है कि अभी मैं आने लाने वाला हूं और दूसरे नए ग्रंथों
00:09:29:18 के उदाहरण। उनके ग्रंथों में यह तक लिखा है कि जो भगवती है उनको आकर के जो है सुख प्रदान करके जाती थी। पत्नी के रूप में अरे भैया वो मौलिक ग्रंथ है क्या निगमानंद जी के? अच्छा ठीक है तो निगमानंद जी के मौलिक ग्रंथ कहां से छपते हैं? सारस्वत मठ से छपते नहीं। कहां से छपते हैं? कहां से गए? फस गए देखो फस गए आप फस गए। आप ऐसे ही फसता है व्यक्ति। तैयारी और करिए आप थोड़ी। हां मैं तो तैयार तैयार होके आपसे मैंने क्या पूछा है निगमंद के मौलिक ग्रंथ कहां से छपते हैं? सारस्वत मठ से छपते हैं तो सारसत मठ से छपे हुए दूसरे ग्रंथ मान्य नहीं होंगे यानी सारसत मठ एक ग्रंथ में ओरिजिनलिटी देगा और दूसरे ग्रंथ में वो देगा सारस्वत मठ के एक ग्रंथ पर आपको विश्वास है दूसरे ग्रंथ पर विश्वास नहीं है? अच्छा सारस्वत मठ के जो प्रतिष्ठा निगवानंद जी थे उनका जो बौद्धिक स्थिति था वो छपाने वाले बाद में लिखने वाले की बौद्धिक स्थिति भी वही था। अरे तो वो ये लिखेंगे ना कि भैया ये जो है सच नहीं है। वो ये तो लिखेंगे ना। निगमंद को ये तो विश्वास था कि ये जो 11 सदस्य जिनको मैं नियुक्त कर रहा हूं। ये अच्छे हैं या बुरे हैं। अच्छा जो 11 सदस्य परंपरा परंपरा की परिभाषा क्या है? 11 सदस्य
00:10:44:19 जो नियुक्त परंपरा की उपयोगिता क्या हैं। परंपरा की उपयोगिता क्या है? परंपरा की उपयोगिता क्या है? ये बात को इधर-उधर मत बोलिए। जहां से आपको सुनिए अगर उनकी बौद्धिक स्थिति सही नहीं थी। लालच वश या द्वेष वश वो गलत बात लिख सकते हैं तो वो निगमंद की जो जिन जिन किताबों को आप मौलिक कह रहे हैं, उनको भी बदल सकते हैं। उनमें भी गलत छाप सकते हैं। तो आप उन परे भी विश्वास मत करिए। हाय राम हाय राम भैया मैं क्या बोल रहा हूं वो तो पहले सुन लीजिए। आप इधर-उधर बात को क्यों घुमा दे रहे हैं? आप ऐसा करिए आप भागवतानंद के पक्ष से सामने आइए ठीक है। जय श्री राम। जो हमारा जो नंबर है जिस पर आपने प्रथम बार कॉल किया है। जी जी उस पर एक फॉर्म मिलेगा WhatsApp करने पर। वो फॉर्म आप भर दीजिए। प्रत्यक्ष चर्चा में। ठीक है? जिससे कि हम अपनी जब एनर्जी वेस्ट करें आपके साथ तो उसका कुछ हमें भी लाभ दिखाई दे। भाई लोगों को दिखाई दे कि आपका क्या पक्ष था। अगर वह निरस्त हुआ तो वह दिखाई दे लोगों को और अगर मेरा निरस्त होता है तो वो भी लोगों को दिखाई दे। ठीक है? फोन द्वारा की गई वार्तालाप व्यक्तिगत सुनिए सुनिए।
00:12:00:21 देखिए आप मेरी एक एक बात मैं बोल दूं। आपका कुतर्क कहां से चालू हो गया? जब मैंने आपसे पूछा कि भाई वो जो मौलिक ग्रंथ है वो कहां से छपते हैं? आपने कहा मठ उसके बाद मैंने कहा और यह दूसरी किताबें कहां से छप रही हैं? तो आपने जो है कहा कि भाई वह दूसरी किताबें उनके उनका भौतिक स्तर अलग था। वो अपने मन से छाप दी। पहली बात तो उनके मौलिक ग्रंथ में ही बहुत सारी आपत्तिजनक चीजें हैं। जिस पर उसने जो है प्रलाप किया है भागवतानंद में। दूसरी बात यह है कि अगर मौलिक ग्रंथ में उनकी बौद्धिक स्थिति बहुत अच्छी थी। तो वो जो छाप रहे है ना वही वहां पर बात अर्ध ज्ञान की या फिर ज्ञान को ना समझ पाने की नहीं है। वहां पर दूसरी किताबों में आप ये कह रहे हो कि झूठ लिखा हुआ है। सीधे-सीधे झूठा कह रहे हैं उनको कहने वाले उनको छापने वाले को तो जब आप उसको झूठा कह रहे हो कि वो अपने मन से छाप बात कट रही है। फिर यदि आप उनको झूठा कह रहे हो कि वो अपने मन से हेलो मैं यह
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भागवतानंद का समर्थक आया समझाने -उत्तर ना होने पर इधर उधर भागने लगा
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