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00:00:05:15 अच्छा अब बात आ जाती है कि जो एक बहुत कई बार हम लोगों की इस पूरी बातचीत में बात आई कि अ गलत प्रक्षिप्त हो गया या मिलावट हो गई या भाष्य उसमें गलत कर दिया तो मैं ये पूछना चाहता हूं कि जो आर्य समाज है इसकी गुरु परंपरा क्या है? ऐसा है कि आर्य समाज जो हमारी वैदिक मान्यता है वह तो परमपिता परमात्मा सबका गुरु है। एक तो यह है वो अलौकिक गुरु है वो ही है और गुरु के लिए तो गुरु का जो शिक्षा प्रदान करता है और एक मनुष्य को कई गुरुओं के वो होता है। हम दयानंद जी के बिल्कुल बताए हुए मार्ग से इधर का उधर नहीं जाएंगे। ऐसा नहीं है और हम क्योंकि लेकिन उन्होंने एक वह रास्ता दिखाया जिसको लोग भूल चुके थे। हर किसी बात को ही सनातन के साथ जोड़ रहे थे। तो इसलिए हमारा लौकिक जगत में वो एक हमारे गुरु हैं। उसके बाद में हम जो आज जो गुरु परंपरा तो आप ये इसको फुल स्टॉप तो लगता ही नहीं।

00:01:20:28 तो जो ईश्वर का ज्ञान है वेद हमारे सोच का और हमारा आधार वही है। कोई व्यक्ति विशेष हमारा गुरु तो भाव से नहीं है। नहीं नहीं वेदादि शास्त्र आज से कई अनेकानेक वर्ष पूर्व मंत्र दृष्टा बनते हैं हमारे ऋषि का गण। हां हां वहां से लेके स्वामी दयानंद जी तक वो वेद मंत्र कैसे आए जिन्हें उन्होंने प्रमाण माना सनातन का। श्रुति नाम सुना है। ठीक है। श्रुति का अर्थ क्या हुआ? श्रुति जो सुना जाता है इस प्रकार से आज भी आप चले जाइए दक्षिण भारत में चारों सुन सुन के याद है उनको नहीं नहीं मैं वही कह रहा हूं तो दयानंद जी ने किससे सुने स्वामी जब दयानंद जी ने जब सुने नहीं दयानंद जी ने जब पढ़े जब तक तो वो उनको लिपिबद्ध कर दिया गया था किसी से वेरीफाई तो करवाएंगे वो थे ना फिर हां थे ना अपने क्या नाम गुरु विजानंद अच्छा विजानंद जी के गुरु पूर्णानंद जी पूर्णानंद जी के गुरु अब ये इतनी लंबी परंपरा नहीं वो स्वामी जी ने लिखा होगा कहीं सत्यार्थ प्रकाश में कहीं हमने काफी ट्राई किया पर मिला नहीं नहीं वो सत्यार्थ प्रकाश में जरूर होगा कहीं ना क्योंकि बात यह है ना कि स्वामी जी के सुनो स्वामी जी के जीवन उसमें मिलेगा कहीं ना कहीं उन मतलब हमें मालूम नहीं है नहीं हम

00:02:36:24 उसमें जो उनका जीवन चरित्र है उसमें इसका उल्लेख होना चाहिए क्योंकि पूर्णानंद जी तक हुआ तो तो क्या नहीं हुआ तो इसका कोई वो बात है क्या हम ये कैसे माने कि ये जो वेद मंत्र हैं ये वही मेन मंत्र हैं जो परमेश्वर ने दिए क्योंकि हमें पूर्णानंद जी से पहले का गुरु मालूम ही नहीं है। तो इससे क्या होता है? उस उस सुनिए वो जो वेद मंत्र है उसको ये देखो कि यहां इसमें गलत बता रहे हैं। कुछ गलत है क्या? वेद तो अपने आप में उनके भावार्थ जो है नहीं नहीं जो वेद है हमने ये जैसे वेद मार्केट से हम लेकर के आए। मान लीजिए कुछ छपा हुआ है कि ऐसे ही नहीं हो गया है। तो वो वो बताएं। वेद के बारे में आपको मालूम है वेद को अशुद्ध कोई इसलिए नहीं कर सका कि वेद को याद करने की और पढ़ने की विधि आठ प्रकार से है। कई प्रकार से है इसलिए उसमें कोई मिलावट नहीं कर सकता। वो आप सही कह रहे हैं। मैं ये कह रहा हूं कि उस आठ प्रकार की वो जो श्लोक है उसके साथ वो वेदा आदि मंत्र हम तक पहुंचे कैसे? यदि हमें ये नहीं पता। व्याकरण के प्रकांड विद्वान थे। प्रकांड विद्वान थे। उन लोगों ने सब देख के पूर्णानंद जी ने मान लीजिए कहीं से वेद लिए पढ़ने के लिए। मान लीजिए। उन्होंने भी किसी से सीखे ही होंगे तो वो किससे सीखे कैसे प्रमाणित यह तो एक विषय अलग है इसको देखना पड़ेगा यह हमें इसको होगा इसकी जानकारी

00:03:51:25 ऐसा नहीं है कि नहीं होगी बिल्कुल काफी आर्य समाज के रिसर्च भाई ऐसे बहुत से ऐसे स्कॉलर हैं जिन्होंने इस पर रिसर्च किया है वो कहीं ना कहीं मिल सकती है कहीं ना कहीं मिलेगी ऐसा नहीं है हमने इसने अभी तक आर्य समाज से इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है और इसका मैं कहता हूं कि चलो जो कुछ है वो कुछ ऐसा है क्या जो सनातन के विरुद्ध है मैं वही उसी पे आ रहा हूं। बात ऐसी है कि जो गुरु शिष्य परंपरा जिसके बारे में हमें सामग्री प्राप्त है वो इनकी है। शंकराचार्य नारकाचार्य इन सबकी गुरु परंपराओं की सामग्री हमें प्राप्त है। कौन से सन में कौन गुरु हुए? आदि शंकराचार्य जी के होगा ना ये मैं मना नहीं कर रहा। बात ऐसी है कि हमने ये माना कि मेरे पास जानकारी नहीं है इसकी। और ऐसा ही आप कह रहे हैं कि इसकी जानकारी कहीं नहीं मिलेगी। ये अभी मैं नहीं सहमत मिल जाएगी। मैं वो नहीं कह रहा। मैं आपको प्रयास करके बता दूंगा। आप मेरे पास में है ऐसे लोग बात बताइए। अभी समस्या क्या है? वो समस्या यह है कि अगर हमें यह नहीं पता कि पूर्णंद जी के गुरु कौन है। है कि अगर हमें पूर्णानंद जी के जो गुरु हैं उनके बारे में कुछ नहीं पता कि उनको वेद कहां से पता नहीं नहीं ऐसा मत बोलो पता नहीं है ऐसा मत बोलो आपको विश्वास पता कर बिल्कुल मिल जाएगा कोई दिक्कत मगर आपको पता नहीं है मगर विश्वास मेरी व्यक्तिगत जानकारी में नहीं है लेकिन आज आप सुनिए आर्य समाज की

00:05:06:28 जानकारी और आर्य समाज के मतलब पूरे विस्तार से मैं बहुत बड़ा कुछ वो हूं ऐसा मत समझना मैं तो बहुत छोटा सा एक आर्य समाज का कार्यकर्ता हूं जी जी मैं समझ गया मैं विद्वान भी नहीं हूं मैं कुछ बात बोलना चाहता हूं हां तो इसलिए कि जैसे कि प्रॉब्लम ये है कि जिनकी सामग्री हमें प्राप्त है कि शंकराचार्य के कौन शिष्य हुए उनके शिष्य कौन हुए उनके शिष्य कौन हुए आज तक के वो पूरी वंशावली हमें प्राप्त है। अब हमें अगर पूर्णानंद जी अगर मैं ये नहीं कह रहा कि नहीं है वो आप देंगे तो मिल जाएगी। अगर पूर्णानंद जी के गुरु के बारे में हमें नहीं पता और हम यह कह रहे हैं कि यह जो वेद मंत्र है जो वेद मंत्र शंकराचार्य जी की गुरु परंपरा के द्वारा यहां तक आ रहे हैं तो वेद मंत्रों का अर्थ तो हम मान रहे हैं अर्थ अपना दे रहे हैं और वेद मंत्र उनके मान ले रहे हैं उनके द्वारा दिए हुए अब बात ऐसी है यदि शंकराचार्य परंपरा या निंबारकाचार्य परंपरा या रामानुजाचार्य परंपरा गुरु शिष्य परंपरा जिसकी वंशावली हमें प्राप्त है वो आपको गलत अर्थ दे रही है क्योंकि उनके अर्थों को हमने नहीं माना शायन के अर्थ को आर्य समाज ने नहीं माना तो शायनाचार्य के अर्थ को जब हम नहीं मान रहे हैं तो उनकी ही परंपरा के द्वारा आने वाले वेद मंत्रों को हम कैसे विश्वास कर ले रहे हैं कि वही वेद मंत्र हैं जो ईश्वर के हैं। ऐसा है कि महर्ष स्वामी दयानंद ने जब पढ़ा उनको तो उन्होंने कहा

00:06:22:09 प्रत्येक एक जैसे संस्कृत की तो ये है कि एक शब्द के कई अर्थ हैं। जी प्रसंग के अनुसार नहीं है। हम अब जैसे मान लीजिए कि आपने सेंधो शब्द का उपयोग किया। आप सेंधव शब्द के अर्थ विषय कुछ है और वहां पर होना चाहिए नमक की बात और वहां आप घोड़े की बातचीत कर रहे हैं। ठीक है? तो इस प्रकार के अनर्गल जो बातें थी नहीं वो ठीक है। मेरा कहने का मतलब आपका कहना यह है कि पूर्णानंद जी ने किससे सीखा? पूर्णानंद जी ये पहला प्रश्न आप कर रहे हैं। मेरे ख्याल से आज तक दुनिया में किसी ने किया नहीं था। लेकिन ये वो प्रश्न जिसका कोई महत्व नहीं है। मेरी मैं बता रहा हूं महत्व। मैं नहीं जैसे आपने कहा कि जो ईश्वर का ज्ञान है वह जो दयानंद जी ने भाष्य किया है वो सही भाष्य ठीक है अब यह जो अच्छी बातें हैं मैं कह रहा हूं वो दयानंद जी ने जो बातें बताई है ईश्वर के विषय में सब अच्छी है मगर ये जो अर्थ बताया है उन्होंने ये उन्हीं मंत्रों का अर्थ है जो मंत्र हम सुन लीजिए आप स्वामी दयानंद के जब कई कई बार जब विपक्षियों ने विरोधियों ने जब शास्त्रार्थ करने के लिए और सनातन धर्म के ऊपर आक्षेप लगाए और दयानंद के वेद के मंत्रों का गलत अर्थ था वह बताया केवल आर्य समाज के पंडितों ने जाकर वहां पर वो किया है नहीं यह तो अच्छी बात है केवल और सुनो मेरे पिताजी मेरे

00:07:37:25 उन्होंने ये कहा कि हम लोगों ने फिर कहा कि तुम तो दया का भाष्य मानते ही नहीं हो मेरे पिताजी बस में बैठकर के जा रहे थे कोहनी बाहर निकली हुई थी ट्रक से उनका जो हाथ है वो रगड़ गया बस वाले ने निर्ममता से उनको जो है सड़क पर उतार दिया अपना चला गया वो तड़प रहे थे कि मुझे बचाओ मुझे बचाओ उस समय उनकी सहायता एक मुस्लिम ने की तो ऐसा हो सकता है कि कोई जिसके जो मूल में अह सिद्धांत अलग-अलग हों मगर फिर भी वह अच्छा कार्य करे तो इस क्योंकि उन्होंने एक जगह अच्छा कार्य किया इसलिए उनकी वो जो बात है बिल्कुल प्रमाण के रूप में हम मान ले तो ये तो नहीं हो सकता ना लेकिन देखिए बात सुनो जी स्वामी दयानंद का रिकॉर्ड है जी विश्व में कोई व्यक्ति उनको चुनौतियों से उनको पराजित नहीं कर सका जब वो जाते थे अपने बनारस में तो वहां पर पोस्टर लगवाते थे ये सभी सभी लोग कहते सुनिए तो काशी के पंडित काशी की वह भी किताब छपी है जिसमें वह साथ-साथ में हारे बाद में उसने मांगी मानी है हारे नहीं है उसने क्षमा मांगी है उस उसे उस उसने राजा ने स्वामी जी को बाद में बुलाया और बोले ये पंडितों के बेवकूफ हमारे को मतलब षड्यंत्र में हम आ गए थे उसने क्षमा मांगी है और स्वामी जी को लेके गया वो आप सही थे कोई उनको निरुत्त जो बातें है ना इनका हम लोग वो नहीं निकाल पाएंगे आप सही बोल रहे

00:08:53:01 नहीं मेरे पास नहीं मेरी बात सुन स्वामी जी के जैसे प्रभु मैं ये पूछ रहा हूं कि अगर हमें यही सही अर्थ है जो आप बता रहे हैं ईश्वर और ब्रह्म और धर्म के बारे में अधातु धर्म जिज्ञासा अधातु ब्रह्म जिज्ञासा इसके बारे में आप जो बोल रहे हैं वही सही है। मगर ये उन मंत्रों का अर्थ है जो मंत्र में गुरु शिष्य परंपरा शंकराचार्य आदि से हां तो क्या हुआ तो गलत तरीके से भी तो उसका भाष्य करें तो जो नारायण मधर और मैक्स मिलर ये सब गलत कर सकते हैं तो पहले भी कर सकते मैं वही पूछ रहा हूं मैं मेरा सवाल ये है जो व्यक्ति हमें गलत अर्थ दे सकता है किसी लोभ वश लालच वश द्वेष वश वो व्यक्ति हमें गलत मंत्र क्यों नहीं दे सकता और यदि वह सही अर्थ वो वो सही मंत्र दे रहा है तो उसके अर्थ गलत क्यों है गलत देखिए अभी मैंने एक उदाहरण दिया था आपको एक प्रक्षेप हुआ ईशा वास मिधम की जगह श की जगह उन्होंने सा कर दिया देखिए उनके पास भी अपने पक्ष हैं अपनी चीजों को नहीं ईसा कर दिया अब कैसे पक्ष वो ईसा मसीह से जोड़ रहे थे पादरी लोग उसका प्रचार कर रहे थे मैं आपको ये पूछ रहा हूं तो ठीक है वो अलग चीज है मगर अगर हम जैसे मान लीजिए ये भाई साहब बैठे हैं सामने और इनसे मैं एक किताब ले रहा हूं और मैंने कहा ये किताब बिल्कुल प्रमाणिक है क्योंकि इसने कहा है कि परमेश्वर से आइए।

00:10:08:09 ठीक है? अब मैं इस किताब को मान रहा हूं। अब इस किताब में इसने अर्थ भी लिखे हैं। मैं कह रहा हूं इसने लालच वश अज्ञानता वश इन अर्थों को बदल दिया है। तो जब इसके ज्ञान पर मुझे भरोसा नहीं है कि ये सही ज्ञान दे रहा है या द्वेष वश या लालच वश ज्ञान पर भरोसा नहीं है। तो इसके मंत्रों पर मैंने भरोसा क्यों किया? मंत्र बात अलग है। देखिए ऐसा एक मंत्र के भावार्थ करने का तरीका अलग है। और भावार्थ वही कर सकता है जिसने कि उसको गढ़ता से मतलब कि उसमें अष्टाध्याय और जो उसके तरीका सरल है। देखो मैंने ये कैसे माना? सुनिए अब मैं उदाहरण से। एक गणित है। जी गणित करने को मैंने भी करा दूसरे ने भी करा। मैंने अपने हिसाब से किया। दूसरे ने दूसरे से हिसाब से कर दिया। अच्छा तो मतलब मैंने जो किया वो जो उत्तर है उसको सही मानेंगे क्या? वो ये तो देखना पड़ेगा कहीं ना कहीं उसका प्रमाण होना चाहिए कि किस कारण से ये सही है और किस कारण से ये गलत है। ठीक है। किसी भी कारण से अगर आप कहना क्या चाह रहे हो कि मतलब आप पूर्णानंद जी की बात पे आए थे बस वहां आ जाओ आप तो वापस किसी भी कारण से अगर ये निकल रहा है कि ये जो अर्थ है इस व्यक्ति ने अज्ञानता वश लिख दिया है तो हम ये क्यों मान रहे हैं कि इसने जो मंत्र हमें दिया लिखा हुआ मंत्र तो वही है मंत्र में परि मंत्र तो वही है। मंत्र तो अज्ञान समता कोई से किसी में हमें क्यों विश्वास है कि मंत्र वही है। करो हम मानते हैं उसको आप

00:11:23:10 अच्छा मतलब विश्वास है बस समय मान मंत्र वही है लेकिन उसके भावार्थ उसके उसमें परिवर्तन हुआ है ये है मंत्र कोई मंत्र तो कोई परिवर्तन कर ही नहीं सकता आनंद आया चर्चा में और हमें वर्ण व्यवस्था पे भी बात करनी थी पर भाई साहब अभी आपके पास समय कम है कि यहां नहीं अब 5:30 बजे 5:00 बजे का समय दिया हुआ था विवाह संस्कार है विवाह संस्कार भी दूसरे एक मीटिंग भी रखिए थोड़ी इसके बाद में सारे डॉक्टर मह के वो आने वाले हैं यहां अच्छा अच्छा कुछ कार्यक्रम ऐसा है जो आपने की मैं ऐसा है कि मैं कोई बहुत विद्वान नहीं हूं लेकिन मैं इस संबंध में और अच्छा इसके बारे में मेरा निवेदन है कि अगर पूर्णानंद जी के पीछे के कुछ गुरु पांच 10 मिनट अगर प्राप्त हो पाए तो आप थोड़ा सा कृपा करिए ठीक कुछ आपको कोट किए कि वेदों में ये दिया है या उपनिषदों में ये दिया है तो आपने कहा कि आपने गलत वो किसी और का भाष्य पढ़ लिया गलत भाष्य पढ़ लिया है तो इसमें बात ये आती है कि आर्य समाज की गुरु परंपरा क्या है

00:12:22:26 गुरु तो सबसे आदि गुरु तो हमारा वही परमात्मा ही है जिसे योग दर्शन में इधर से जैसे जो दयानंद जी हैं इनके गुरु विजानंद जी फिर विजानंद के गुरु ये फिर इनके गुरु ये तो ऐसे ऋषियों तक जाने वाली वो परंपरा क्या है गुरु परंपरा को मानता है आर्य समाज की नहीं जैसे शंकराचार्य गुरु परंपरा रामानुजाचार्य गुरु परंपरा या निंबारकाचार्य गुरु परंपरा है तो क्या आर्य समाज गुरु परंपरा को मानता हां गुरु जिनसे ज्ञान लेते हैं गुरु मतलब वही जो हमें हां अज्ञान से हमें अंधकार से हमें जो प्रकाश की ओर ले जाता है उसको ही गुरु कहते हैं ना गुरु माने अंधकार से रूह जो प्रकाश की ओर हमें ले जाए हमारा पथ प्रदर्शन करें हमारा मार्गदर्शन करें हमें सही सही दिशा दिखाए वही गुरु होता है और आर्य समाज जो है सबसे प्राचीन गुरु जो है वह परमपिता परमात्मा को ही मानता है। सा पूर्वेशा गुरु कालेना वदात वो सबसे पुरातन गुरु है। उसको काल से भी अवच्छेदित नहीं किया जा सकता। और उसके बाद जो हमें सैद्धांतिक

00:13:38:02 रूप से जो ज्ञान दिया वो हमारे गुरु महर्षि दयानंद सरस्वती नहीं इधर से गुरु परंपरा थोड़ी सी बताइए कि परंपरा वहां तक कैसे जाती है ऋषियों तक जैसे दयानंद सरस्वती जी फिर उनके गुरु विजानंद फिर उनके गुरु कौन फिर उनके थोड़ा थोड़ा पीछे ऐसे तो ऋषि दयानंद के गुरु थे विजानंद जी और फिर ऋषि दयानंद जी तो है वो हम सबके गुरु हैं। नहीं नहीं जी के पीछे भाई परंपरा परमेश्वर तक है ना तो परमेश्वर से यहां तक जो आई है मध्यकाल के वो एक बहुत एक लंबा सिस्टम और उतना थोड़े से दो चार कुछ पीछे के कुछ पीढ़ियों पहले के गुरु के नाम जैसे विजानंद के ये थे इनके ये थे ऐसे कुछ थोड़ा दो चार ऐसे तो हमारे सब जो ये वेद शास्त्र है ये जो ऋषियों के ग्रंथ हैं ये सब हमारे गुरु ही है ऐसे नाम बद्ध कि भाई विजानंद को इन्होंने पढ़ाया इन्होंने वेद मंत्र सिखाए फिर उनको इन्होंने उन्होंने वेद मंत्र सिखाया। ऐसे पांच छह पीढ़ी तो हमें तो ऋषि दयानंद ऋषि दयानंद से तो बहुत दो धाराएं फूटी। दो तरह के इनके शिष्य तैयार हुए। एक नहीं ऋषि दयानंद जी नहीं ऋषि दयानंद जी के पीछे इधर का नहीं ऋषि दयानंद जी के पास वेद मंत्र कहां से आए? कैसे आए?

00:14:53:08 ऋषि दयानंद जी ने तो गुरु विजानंद जी से ज्ञान ग्रहण कियांद जी के वो गुरु थे पूर्णानंद जी नहीं वो तो वेदों के विद्वान थे तो पूर्णानंद जी के गुरु पूर्णानंद जी के गुरु का नहीं इतनी लंबी परंपरा का स्मरण नहीं है इस समय नहीं लंबी नहीं कुछ पांच छ जैसे हमें मध्यकालीन पूर्णानंद जी तक का मुझे सुल्तान का स्वामी विजानंद जी के गुरु गुरु पूर्णानंद जी उसके पहले के गुरुओं का नाम स्मरण स्मरण नहीं है। पढ़ा तो है। स्मरण नहीं है। मतलब किसी शास्त्र में दिया गया है ऐसा। हां। तो गुरु परंपरा जब चली आ रही है तो सबके होंगे ही। नहीं नहीं कुछ पांच छह पीढ़ी पहले के गुरुओं के जितना था वो मैंने बता दिया। कुछ और पूछिए। अच्छा तो इसमें ये बात आती है कि पूर्णानंद जी को वेद मंत्र किससे मिले? ये हमें ये नहीं पता है। तो हम ये कैसे माने कि जो वेद मंत्र हैं जो पूर्णानंद जी ने इनको दिए। वो वही वेद मंत्र हैं जो परमात्मा दे रहा है ऋषियों को।

00:15:52:12 वही है नहीं नहीं वही है वो सही है मगर पूर्णानंद जी ने वही वेद मंत्र दिए हैं जो परमात्मा ने निष्कासित किए वही पूर्णानंद जी ने विजानंद जी को दिए तो ये किस आधार पर है ऐसा है क्योंकि या तो हमें गुरुओं का नाम मालूम हो हम आपको बता रहे हैं ऐसा है कि परमपिता परमात्मा ने सृष्टि के आदिकाल में चार ऋषियों के पवित्र अंतःकरण में वेद रूपी सूर्य का प्रकाश किया नहीं नहीं अग्नि वायु आदित्य अंगरा ठीक है तो उसके बाद ब्रह्मा ऋषि ने उन चारों वेदों को लिखा क्योंकि वेद का नाम था श्रुति और श्रुति का अर्थ होता है श्रुयते इति श्रुति जिसको सुना जाता है उसको श्रुति कहते हैं। तो पहले जब यह श्रुति का पाठ होता था तो लोग सुन लेते थे और उनको स्मरण हो जाता था याद हो जाता था तो श्रवण श्रवण परंपरा से वेद सुरक्षित थे फिर कुछ समय बाद वो स्थिति आई कि लोग विस्मृत करने लगे तो यह हुआ कि ना श्रवण श्रावण परंपरा से तो पठनपाठन परंपरा से हमारे वेद जो हैं वो सुरक्षित

00:17:07:22 रहे तो इसलिए ब्रह्मा नामक ऋषि ने उन चारों वेदों को लिपिबद्ध किया। ठीक है? और उसके बाद ब्रह्मा ऋषि से लेकर के अब तक ऋषि दयानंद पर्यंत नहीं तो इसमें ब्रह्मा ऋषि से लेकर ऋषि दयानंद पर्यंत गैप नहीं है। बहुत सारे गुरुओं मैं पीछे नहीं जाऊंगा। जैसे हमें मध्यकाल का इतिहास अपना पता है कि टीपू सुल्तान ऐसा था या फलाना व्यक्ति ऐसा था। मध्यकाल का इतिहास हमें पता है। तो हमें अपने गुरुओं का मध्यकालीन गुरुओं का इतिहास तो पता होना चाहिए। क्योंकि ऋषि दयानंद जी 100 150 साल पहले और उनके विजानंद जी और 100 मान लीजिए। उसके पहले का इतिहास मान लीजिए 50 और मान लीजिए पूर्णानंद जी। अब थोड़ा ये मध्यकालीन हम लोग एलेक्जेंडर का इतिहास जानते हैं हम लोग। टीपू सुल्तान का अकबर का इतिहास जानते हैं। 500 साल पहले का इतिहास। बहुत लंबी चली। वो गुरु परंपरा महर्षि दयानंद तक चली है। उसमें कहा था तो तमाम हमारे जो शाहित थे वो सब जला दिए गए। जी जिनके पास रखा हुआ है मनुष्य में बताया जाता है वो तो सब हमारे जला दिए मतलब अंदाजे से चल रहे हैं कि हां ये वही परमात्मा के दिए हुए ग्रंथ होंगे वेद नहीं वेद के ज्ञान से वेदों के भाष्य से भाष्य जो है आजकल महाभारत युद्ध के बाद जो है सब गलत नहीं नहीं वो ठीक

00:18:22:24 है निघंटू के हम लोग निगंटू को मानते हैं तो वो निगंट जैसे सा वो क्या करता है वो आज के आधुनिक जो है वो जो निघंटू है वो हमारे पास कैसे आया वो 5000 लोग वो महर्षि व्यास ने लिखा ना वो भी ऋषि थे तो बस व्यास से यहां तक लोग होंगे व्यास मतलब एक अंदाजा है कि हम जो पढ़ रहे हैं वो व्यास हमारे ऋषि बहुत हुए अंगरा ऋषि अरबों नहीं पिछले 500 साल का तो इतिहास हमें मालूम होना चाहिए साल कहां है ये तो सब जला दिए गए ये तो वेद ही भी नहीं था नहीं नहीं कहने का अर्थ ये है कहने का अर्थ यह है कि जो अन्य परंपराएं हैं गुरु गुरुओं की जैसे नबार्क परंपरा जी या आगे कर लीजिए या रामानुजाचार्य परंपरा या शंकराचार्य परंपरा इनकी परंपरा में लिपिबद्ध बिल्कुल गुरुओं का नाम एक-एक पता है जी तो आदि शंकराचार्य जी से आए तो अब बात ये आती है कि अगर हमारे पास तो वेदों की प्रशंसा किया वेदों ने ही तो माना हां वेदों को माना अब बात ये आती है कि अगर हमें इन गुरु परंपराओं से वेद प्राप्त होना हम स्वीकार करते हैं तो इन गुरु परंपराओं के अर्थ को हम स्वीकार क्यों नहीं करते? और अगर इनके अर्थ को स्वीकार नहीं करते तो इनके वेद मंत्र पर हमें हम क्यों स्वीकार करते हैं? मतलब

00:19:37:27 जिनसे हम वेद मंत्र ले रहे हैं अगर हमें उस पर भरोसा नहीं है तो फिर हम उसके उसका जो उसका कारण है। उसका कारण यह है कि दो संस्कृत दो तरह की है। एक लौकिक संस्कृत, एक वैदिक संस्कृत। जी जी तो वैदिक संस्कृत को पढ़ने की जो कुंजी है वो है निघंटु और निघंटु वैदिक शब्दकोश है और उसके जो निर्वचन है वो महर्षि यास्क ने निरुक्त में किए हैं। तो जब तक निघंटु और निरुक्त का हम स्वाध्याय नहीं करेंगे तब तक वेद मंत्रों के वास्तविक अर्थ हम नहीं कर सकते। वो ठीक है। निघंटु हमारे पास किसने दिया? कैसे आया? गुरु परंपरा से। अब गुरु परंपरा कह रही नहीं इसका अर्थ है। और हम लोग मना कर रहे हैं। एक एक मिनट। हम लोग मना कर रहे हैं कि नहीं इसका यह अर्थ नहीं है। तो जब हम ऐसा कह देते हैं कि हमें इस पर विश्वास नहीं है तो उससे प्राप्त होने वाले मंत्रों पर विश्वास कैसे? और अगर उससे प्राप्त होने वाले मंत्रों पर विश्वास है तो फिर उसके अर्थों पर विश्वास कैसे? तो जब ये बात अटल है कि इसके इसको पढ़ करके ही वेदों का अर्थ किया जा सकता है। साक्षात्कृत धर्माणु ऋषभ। तो हम ये भी तो कह सकते हैं जिन्होंने ईश्वर और धर्म का साक्षात्कार किया है उनको ही तो ऋषि कहा जाता है। ठीक है। हम ये कह हम ये कह सकते हैं कि हमने जो अर्थ किया है वो सही है। जरूरी

00:20:53:06 नहीं कि ये जो मंत्र है वेद का इसका ही ये अर्थ है। यही होगा ना फिर। नहीं। मतलब उसको वेद से जोड़ना जोड़ किस तरह से रहे? क्योंकि जो जैसे जो हमको गलत अर्थ दे सकता है वो हमको गलत मंत्र भी तो दे सकता है। मंत्र जो है वह ऋषियों के बनाए हैं। मंत्र में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसीलिए वो आठ विकृतियां बनाई गई जिनके माध्यम से आज तक कोई वेद में मिलावट नहीं कर पाया और ना कर पाया है ना भविष्य में कर पाएगा। माला रेखा दंडो अष्टो विकृत पूर्वा मनीष जिसको मिलावट करनी है वो अष्टाविकृति वाले श्लोक को ही मिटा देगा कैसे मिटा देगा वो सुरक्षित है प्रतिलिपि है पूरी उनकी नहीं जब आपको आप मुझसे अगर वेद मंत्र ले रहे हैं मुझे पता है कि इसमें जटा वाला है से समझ जाएगा तो मैं उसको मिटा के आपको मुझसे कैसे वेद मंत्र ले लेंगे वेद तो एक मैं वहां पर रख रहा हूं जैसे गुरु परंपरा से अगर हम तक आया तो हमें जो इतिहास प्राप्त है जिसका वो ये सारी गुरु परंपराएं आदि शंकराचार्य की प्राचीनतम मान लेते हैं बस वो भाष में ही त्रुटि होती है वेद के मंत्रों तो वेद के मंत्रों पर हमें विश्वास क्यों है कि ईश्वरी वाणी वही है जो उसने दिया था को जो है लोगों ने जलाया ने जलवाया

00:22:08:16 वो कौन थी वो नगरी थी थी सब नहीं नहीं वो वो सही कह रहे हैं आप मैं ये पूछ रहा हूं कि हमें अगर उसके अर्थ पर विश्वास नहीं है तो उन मंत्रों पर विश्वास क्यों है कि ये वही मंत्र है जो परमात्मा ने दिए हैं हां परमात्मा की जो चीज अनादि काल से चली आ रही है मगर उसमें बीच में वो है ना पाखंडी आपके अनुसार शंकराचार्य पाखंडी है ना नहीं आज जो नकली शंकराचार्य बन रहे हैं वो पाखंडी है जिनके अंदर पाखंड भरा है वो पाखंडी है वो वो पूजा वो शंकराचार्य जी उन्होंने विग्रह पूजन भी माना है जगन्नाथ पुरी का वो किया स्थापना की शंकराचार्य आदि आदि शंकराचार्य उन्होंने मूर्ति पूजा मानी है पुस्तक पढ़ी है परा पूजा पढ़े मैंने प्रबोध सुधाकर पढ़ी है। उनका पूरा जीवन दर्शन शंकर दिग्विजय पढ़ा है। मैंने उनकी प्रश्न पढ़ी है। नहीं तो उन्होंने केवल परा पूजा नहीं लिखी ना। उन्होंने काफी कुछ लिखा है। एक केवल उसी को क्यों पढ़े जिसमें उन्होंने निराकार की व्याख्या कर दी हो। उन्होंने मूर्ति पूजा का भी बात की। प्रश्न जो मणि प्रश्न माला है उनका ग्रंथ उसमें उससे पूछ पूछते हैं उनके शिष्य के अब मैं जीवन इस तरह की जब असद्धांतिक बात करते हैं शंकराचार्य जी लोग तभी तो जो प्योर ज्ञान है वेद उसके आधार पर ही तो हम लोग चैलेंज करते हैं

00:23:23:20 कि भाई उनको ज्ञान चारों वेदों का है उपनिषदों का है। सब चीज का है। अच्छे विद्वान है। ऐसे नहीं उनको शंकराचार्य जी की उपाधि मिलती है। लेकिन जब उसमें वह मिश्रित करके और कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा बताएंगे, तो फिर चैलेंज किया ही जाएगा और कितने बार उनको चैलेंज किया? जैसे हम यह मानते हैं। नहीं वेद शास्त्रों की ऋषियों की बात को हम झुठला नहीं सकते। नहीं नहीं वो ठीक है। और देखो हम ही नहीं हम ही नहीं। विदेशी विद्वान तक भी वेदों की महिमा को स्वीकार कर रहे हैं। वो भी कह रहे हैं ऋग्वेद इस द ओल्डेस्ट बुक इन द लाइब्रेरी। जी वो तो ठीक है मगर अगर हमें मालूम है अज्ञानी है या फिर यह अपने लालच वश कोई गलत बात फैला सकता है तो वो लालच वश आपके मंत्रों को भी तो गलत दे सकता है आपको तो गलत दे सकता है तो वो उनकी प्रवृत्ति है वो ऐसा जैसे भद्राचार्य जी की प्रवृत्ति है कि ऐसा लिखा नहीं ऋषि दयानंद ने तब भी उनको कह रहे हैं तो एक चर्चा में बने रहने के लिए वो कुछ भी कपोल कल्पना से कह के और मतलब हम यह माने कि आदि शंकराचार्य हमारे मंत्रों को नहीं बदल सकते। मंत्रों को नहीं बदल सकते। भाष्य बदल सकते है ना? वो

00:24:38:24 मतलब इतने इतने तो इतने अच्छे हैं। इतने ज्ञानी है वो मंत्रों को नहीं बदलेंगे। इतने तो अच्छे हैं। मगर वो अर्थ गलत बता रहे हैं। ईश्वरी वाणी को कौन बदल सकता? कोई नहीं बदल सकता। चलिए ईश्वरी वाणी को कोई अब मैं लास्ट में इसको चर्चा को समाप्त करते हुए एक छोटा सा प्रश्न करूंगा। जैसे तिलक आदि को पाखंड बताया गया है। है ना? सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार आर्य समाज के अनुसार पाखंड नहीं है जी जी चंदन लगा सकते हैं ये तो तिलक लगाना भस्म लगाना ये पाखंड नहीं है तिलक लगा सकते हैं चंदन लगा तो चंदन वगैरह का लगा सकते हैं शीतलता देता है मस्तिष्क को ठंडक प्रदान करता है तो जैसे आपने बिंदी लगाई है तो ये तो चंदन नहीं है अरे तो महिलाओं के लिए नहीं नहीं इसका इसका वर्णन वैदिक वैदिक है कैसे है इसको कैसे माना आर्य समाज का प्रारूप क्या है इस बिंदी के लिए वो पूछो आप हां ये तो यह तो चंदन नहीं है। केवल चंदन का ही टीका आपने स्वीकार किया। श्रृंगार जो होता है महिलाओं को वो अपने पति के लिए करती हैं। इसका कोई अर्थ और यह है कि एक प्रामाणिकता होती है जैसे सिंदूर लगाते हैं, बिंदी लगाते हैं कि भाई इनके इनके कोई रक्षक पोषक हैं। यह विवाहित हैं। एक वो चिन्ह होता है तो यह भी एक धार्मिक चिन्ह है। तो चंदन आप लगा सकते हैं। भस्म वगैरह

00:25:54:02 नहीं चंदन भस्म लगा सकते हैं। शिख आप रखे हैं तो ये हमारे यजो पवित है। तो यह हमारे वैदिक संस्कृति के एक चिन्ह है नहीं जैसे आपने कहा कि चंदन का ही टीका लगाना चाहिए तो यह तो बिंदी है तो यह फिर इसको किस उसमें अर्थ में ले रहे है कि एक प्रतीकात्मक मगर इसका शास्त्रों वर्णन नहीं है। शास्त्रों ने ऐसे ही स्वीकार किया है क्या बिंदी को? नहीं स्वीकार तो किया है श्रृंगार पति के लिए। मतलब बता सकते हैं थोड़ा सा किस ग्रंथ में? यह है कि विवाह संस्कार आदि में है। विवाह संस्कार तो उनका लौकिक प्रक्रियाएं होती हैं। लोकाचार में थोड़ा सा अच्छा लोकाचार में भस्म नहीं लगा सकते। बिंदी लगा सकते हैं। सिंदूर बना देते हैं। सिंदूर कहीं नहीं बनाते हैं। नहीं नहीं ऐसे नहीं कि इधर-उधर का सब जैसे होली को विकृत कर दिया कि कीचड़ पोतो तो वो रूप नहीं। जिस चीज का जो शुद्ध रूप है उसको कहता है आर्य समाज। भस्म लगाना जो हवन की बची हुई भस्म होती है यज्ञ की उसको नहीं लगाना चाहिए पर बिंदी लगा सकते हैं लोकाचार उसकी औषधियां होती है विदेशों में जो है नहीं नहीं माथे पे लगाने की बात कर रहा हूं माथे पे मतलब लगा के क्या वो साबित करना चाहते हैं जैसे आपने प्रतिकार किया अब आपने एकाग्रता देता है यहां पे कुछ हम लगाए तिलक

00:27:09:10 यहां अपना जैसे ध्यान भी करते हैं तो एकाग्रता प्रदान करता है और एक यह भी है कि भाई हम कोई यज्ञ आदि का सूचक चिन्ह है या कोई श्रेष्ठ कार्य वह यह कह सकता है नहीं अब यह थोड़ी अब भस्म में आप यह कीचड़ लपेट लो कहो कि भाई बिंदी लगा सकते कीचड़ नहीं लगा सकते वही बात है अब ईश्वर के लिए भी बहुत लोग एक डायलॉग बोलते हैं कि मानो तो ईश्वर नहीं तो पत्थर तो हम भी कहते हैं भाई मानो तो हलवा नहीं तो गोबर है ना नहीं वो सही है जैसे हम अपनी इच्छा अनुसार ये तय कर रहे हैं कि लोकाचार के अनुसार हमने भले ही लौकिक रीतियां होती है उनको किया लोकाचार के अनुसार हमने बिंदी यूज़ ली जिसमें कि चंदन नहीं है। मगर लोकाचार के अनुसार अगर कोई व्यक्ति भस्म यूज़ कर रहा हैंगार नहीं तो वह अपने ईश्वर के प्रति श्रृंगार हां नहीं तो ये कौन तय कर रहा है? शास्त्रोक्त है। जी मतलब कि जो ये कपड़े की बिंदी है जिसमें गोंद होता है ये शास्त्रोक्त है। ये लगाई जा सकती है। ठीक है। चलिए।

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