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00:00:00:02 हां तो इसमें अब एक बात आती है तो कहने का अर्थ यह है कि जैसे यह यह बातें तब के लिए जब व्यक्ति आपका हो गया हां जो परंपरा में जुड़ गया जो आ गया पब्लिक में ये बात नहीं करनी चाहिए नहीं करनी चाहिए उनके लिए तत्व विचार अब इसी पे बात आ रही है कि आपकी जो बात वो भगवत गीता है उसमें ही ये 262 में लिखा हुआ है कि ऐसा-सा है 262 में हम और तो आपने अभी पहले भी ये बात कही थी कि जैसे आपने अभी बोला कि भाई पब्लिक में ये बात नहीं करनी चाहिए जो आपसे जुड़ गया जो वैष्णव हो गया जो इस वाला हो गया उससे बात करो तो आप फिर भगवत गीता ऐसी जिसमें कि वो बातें लिखी हुई जो अंदर आने के बाद की हैं वो आप क्यों रोड़ते हो हमें तो अपनी परंपरा के सिद्धांत का प्रचार करना ही है जिसको स्वीकार करना है वो करे इसमें दिक्कत ये है कि वो नहीं जानता ना कि आपकी परंपरा वो अगर नहीं जानता है तो आके पूछे वो सुनिए तो वो ये नहीं जानता है कि ये परंपरा के अंतर्गत वाले सिद्धांत है या फिर सनातन सिद्धांत वही उसको आके पूछना है यहां आके पूछिए जैसे आप आके पूछ रहे हो हां तो वैसे वही पूछ सकता है कोई अगर जिज्ञासा बात आप उसमें लिखते हो कि इसमें कई सिद्धांत हमारी कई सारी चीज़ ऐसी होती जैसे मैंने गीता पढ़ी मैं अपना थोड़ा सा झोल आ रहा है थोड़ा थोड़ा अगर आप मेरी बात मुझे सुनना चाहते हो 1 मिनट

00:01:15:03 1 मिनट इसमें क्या है कि हमने क्या किया कि बड़े ही तरीके से उसको अपनी परंपरा के अंतर्गत वाली बातें सनातन सिद्धांत के नाम पे दे दी ठीक है और उसको ये बताया ये आरोप जो है ना हम विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर पे भी लगा सकते हैं। उन्होंने भी ऐसे लिखा होगा। 1 मिनट 1 मिनट भाई साहब हमने दे दी रोड पे जा के। जबकि उसमें कई ऐसी बातें हैं जिसके लिए उसको उन बातों को समझना होगा यहां आ के कि वो परंपरा के अंतर्गत है। तो यदि ऐसी बातें हैं तो आपको अपनी भगवत गीता में लिखना चाहिए कि इसमें कई बातें सनातन धर्म के अनुसार हमारे आचार्य ने शंकराचार्य जी जैसे उन्होंने भी गीता पर भाष्य दिया है। उन्होंने उन्होंने कहीं पर भी परंपरा के अंतर्गत होने की वजह से कोई सिद्धांत नहीं दिया। ऐसे माधवा उन्होंने वो सिद्धांत दिया जो सार्वभौम है। सार्वभौम हमें कहीं पे यह नहीं कहना पड़ता कि हम ऐसे हैं इसलिए ऐसा कर रहे हैं। हम तो वो वही बात करते हैं जो सार्वभौम है। भगवत गीता धर्म के धर्म की व्याख्या करते समय हम कहीं ये नहीं कहते कि भैया हमारे आचार्य ने कहा है इसलिए या फिर हमारी परंपरा में कहा गया इसलिए हम ये कहते हैं। देखो हर व्यक्ति को क्या है ना अपनी परंपरा अपनी परंपरा के विचार नहीं आपने कहा ना शंकराचार्य जी भी ऐसा करते हैं नहीं हर परंपरा के आचार्य ने भाष्य दिया श्रीमद

00:02:30:16 आचार्य ने भाष्य दिया है आप समझ नहीं रहे तो उनके उसमें कमेंट्री विचार भाष्य तो दिया है मगर ये वाला नहीं है कहीं पे भी क्योंकि हमारी परंपरा में ऐसा है अब जैसे प्रभुपाद जी ने जो गीता लिखी है ना भगवत गीता एज इट इज उसके दो आधार है एक तो श्री बलदेव विद्या भूषण जी एक विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी उनके उनके आधार पर उन्होंने भगवत गीता का भाष्य किया है। अपने अनुसार नहीं जो पूर्ववर्ती आचार्य वो ठीक है वो ठीक है और अब उसमें क्या है ना प्रभुपाद जी ने अनुवाद तो दे दिया अब जो तात्पर्य है जो भाष्य है भाष्य तो अपनी परंपरा के आधार पर ही किया जाएगा ना अनुवाद तो मूल रखा जाएगा जो सार्वभौम है जो भाष्य है जो कमेंट्री है वो अपने परंपरा के आधार पर ही किया जाएगा उस पर हम यही विशेषता है गीता के परंपरा के अनुसार अनुसार ही होता है वह बात ठीक है। भाष्य आप करो मगर यदि आप में अगर उसमें यह बात आ रही है कि उसमें सनातन नहीं सार्वभौम नहीं परंपरा के अंतर्गत आने वाले भेद युक्त बातें हैं तो या तो उसको आप क्लेरिफाई करते हुए दो सामने वाले को। ये तो ये तो किसी भी आचार्य ने ऐसा नहीं किया है। तो इस पर हम क्या बोल सकते हैं? किसी और के ना करने से हमारे द्वारा की जाने वाली गलत चीज सही नहीं हो जाती। मैं तो आचार्य

00:03:45:22 नहीं हूं ना। प्रभुपाद जी आचार्य हैं। विश्वनाथ जी आचार्य हैं। बलदेव विद्या जी आचार्य हैं। तो फिर ऐसे तो रामपाल भी कह सकता है कि भैया कबीर ने कहा है ये चीज़ मैंने थोड़ी लेकिन इसमें अंतर है। उसके कहने में और इसमें कहने में अंतर है। वो अंतर जो आचार्य जो भाष्य लिख रहे हैं ना हम उनका भगवान के साथ गुरु परंपरा के साथ संबंध है। वो वो इसलिए लिख पा रहे हैं। भैया एक और दूसरा भाष्य लिखने का अधिकार उसी को है जो भागवतीय परंपरा में प्रमाणिक संप्रदाय के अंतर्गत जो दीक्षित हो जो उस परंपरा में हो। अब रामपाल तो किसी परंपरा में नहीं है। अच्छा एक बात बताइए परंपरा की बात आपको करनी नहीं तो मैं फिर वो करता। चार वैष्णव आचार्य तो है ही परंपरा में चार वैष्णवाचार्य हैं। उसमें बात ये है कि आप किसी को भी किसी परंपरा का प्रामाणिक आचार्य किस आधार पर मानेंगे? जैसे कि जैसे कि शंकर आचार्य उसको कहा गया है परंपरा में जो तीन प्रस्थानंतर पर भाष्य देता हो शरति प्रस्थान यानी लिख देगा नहीं लिख पाएगा और लिख भी लेगा तो उसका आधार होना चाहिए बेस होना चाहिए तो बेस होना चाहिए अब मैं ये पूछ रहा हूं किसी भी परंपरा का प्रामाणिक प्रतिनिधि के रूप में हम किसी को तब स्वीकारते हैं जब पूर्वाचार्य ने उसको जैसे विद्या भूषण जी हैं वो तो ब्राह्मण नहीं थे विश्वनाथ जी भी ब्राह्मण नहीं थे जन्म से

00:05:01:01 मुझे करने दीजिए ना तो किसी भी परंपरा का प्रामाणिक प्रतिनिधि तब किसी को माना जाएगा जब उसको उसके पूर्वाचार्य के द्वारा नियुक्त किया नियुक्त किया जाएगा। तो अब मुझे आप यह बताइए कि प्रभुपाद जी को किसने नियुक्त किया? उनके गुरुदेव ने क्या नाम था? इनका नाम श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद नियुक्त किया। और उनको उनके गुरु ने नियुक्त किया। वो क्या? श्री भक्ति विनोद ठाकुर। अच्छा उनके उनके गुरु थे श्री जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज। अच्छा ठीक है। उनके गुरु थे श विश्वनाथ चतुर्वती बलदेव विद्याभूषण मधवाचार्य से कनेक्शन कहां पे आ रहा है? ईश्वरपुर पाद ईश्वरपुर पादुपुरी पाद लक्ष्मी तीर्थ एक मिनट ईश्वरपुर पाद से पहले कौन है? माधुनपुर पाद जी हां उससे पहले कौन लक्ष्मी तीर्थ लक्ष्मी तीर्थ लक्ष्मी तीर्थ के समय में जो आनंद तीर्थ थे आनंद तीर्थ की गद्दी बैठे थे यानी कि मधवाचार्य जी की गद्दी पर बैठे थे वो कौन थे माधवाचार्य के आज मैं मैं आपको बताता हूं। जैसे आज के टाइम में शंकराचार्य हैं। हां। ठीक है? पूरी के शंकराचार्य मान लीजिए। मैं उनसे दीक्षित भी हूं। हम परंतु क्या मैं बिना शंकराचार्य की परमिशन के हम है ना? शंकराचार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं क्या शंकर परंपरा का? बिल्कुल नहीं कर सकता।

00:06:16:07 वो तो गुरु तो आगे वो नियुक्त करते हैं। उस समय मधवाचार्य की गद्दी थी ना। आपके पास कौन आया? मधवाचार्य परंपरा से सीधे। माधुनिपाद जी आए। वह वह उस समय जगतगुरु मधवाचार्य की गद्दी पे थे। देखो वैष्णव परंपरा क्या नियम है कि एक वैष्णव के कई शिष्य हैं। एक शिष्य नहीं है। तो शिष्य कई है तो और वही वो गुरु उनको नियुक्त करता है। मैं आपको बता रहा हूं। मेरा प्रश्न ये है कि जो आपके पास आए क्या बताया आपने? श्रीपाद माधुन्य पुरपाद माधुन्य पुरीपाद। तो ये स्वयं तो आनंद तीर्थ की गद्दी पे नहीं थे। जगतुगुरु मधवाचार्य की गद्दी पे जो माधवाचार्य है ना मैं प्रश्न पूछ रहा हूं। जो जगतगुरु मधवाचार्य उनकी गद्दी पे नहीं थे। ठीक है? अब बात यह है कि अगर ये नहीं थे तो क्या मधवाचार्य जी के प्रतिनिधि के रूप में ख्यापित होने के लिए इन्होंने उस समय के जगतगुरु मधवाचार्य जी की परमिशन ली थी कि नहीं? हां हां बिल्कुल जो जिन जिन आचार्य से उन्होंने दीक्षा लिया उन्हीं आचार्यों ने इनको नियुक्ति किया कि आप देखिए मैं इसमें सवाल ये क्यों कर रहा हूं समझ लीजिए। मैंने शंकराचार्य जी से शंकर परंपरा में थोड़ा अलग नियम हो सकता है। नहीं वो नहीं कह रहा हूं। मैं तर्कपूर्ण बात कर रहा हूं। मैं शंकर परंपरा का नियम नहीं पूछ रहा हूं। मैंने शंकराचार्य जी से दीक्षा ले ली। अभी मैं शंकर का

00:07:31:13 प्रतिनिधित्व कर सकता हूं कि नहीं और मैं सही चीजें कर सकता हूं नहीं इसकी मुझे परमिशन लेनी होगी। लेनी होगी और जब वो परमिशन ख्यापित कर शिवश नारायण द्विवेदी हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे तब मैं शिवश नारायण द्विवेदी के रूप में वो कर करूंगा। अच्छा ये हो तो ये भी सकता है कि मैंने दीक्षा ले ली उसके बाद मैं अपने मन की बात नहीं ये नहीं होगा तो तो इसलिए परमिशन अनिवार्य है बिल्कुल परमिशन वो परमिशन कहां है वो परमिशन दिया माधवे प्रभुपाद जी को फिर माधवी नहीं वो परमिशन कहां है जो परमिशन हुई है मधवाचार वाले वो परमिशन लेटर है कोई अपने पास नहीं ये तो मधवाचार जो मैं आपको बता रहा हूं वो तो मैं अपनी परंपरा से जो चली आ रही है हमारी प्रणाली है और जो हमारे गौ वैष्णो अभिधान में या ग्रंथ में जो लिखा हुआ है मैं तो उसके अनुसार बता रहा हूं। नहीं नहीं अब उसमें क्या उन्होंने आपको यह परमिशन बताई है कि नहीं यह वाली हां बिल्कुल बताइए परमिशन अब जैसे हम ही लोग हैं अब हम लोग गुरु नहीं हो सकते हैं जब तक हमारे गुरुदेव हमें अथराइज हां तो इसी प्रकार से जो माधुन्यपुरी तीर्थ हैं इन्होंने तत्कालीन जगदगुरु मधवाचार्य जी से परमिशन ली थी कि नहीं बिल्कुल लिया था वो परमिशन कहां है अब वो परमिशन तो मेरा काम नहीं ढूंढना वो तो आप लोग ढूंढो लेकिन जो हमें बताया गया है

00:08:46:14 परंपरा से आपको बताया गया मगर आपको वो परमिशन लेटर दिखाया नहीं लेटर हर चीज का क्या है ना गुरु शिष्य परंपरा होता है जैसे मैं मैं बता मैं उसके लिए भी बता रहा हूं अगर परमिशन लेटर नहीं है आज के जो वर्तमान के प्रामाणिक मधवाचार्य की गद्दी पर बैठे हुए हैं क्या वो ये परमिशन दे रहे हैं उन्होंने हमारे गुरुदेव को तो आचार्य स्वीकार किया जब हम उड़ीपी गए थे कहां लिखा है अब उन्होंने लिख के तो नहीं दिया लेकिन उन्होंने सामने बोला हमारे हम लोग सब बैठे थे वो आए थे तो और यहां तक कि वो आज के जो वर्तमान माधवाचार्य में जो बैठे हैं गद्दी में वो हमारे मंदिर भी आ चुके गौ मठ भी जा चुके हैं। मंदिर मंदिर राघवाचार्य जी भी आ चुके हैं। मगर राघवाचार्य जी ने नहीं मतलब वो स्वीकार करते हैं। मंदिर तो आज मैं भी आया हूं। नहीं तो आप कल को ये भी कहने लगोगे शिवा नारायण द्विवेदी भी ऐसा नहीं है। मेरा उद्देश्य ये है कहने का कि वो हमारी परंपरा को हमारे आचार्यों को उन्होंने एक्सेप्ट किया है। नहीं नहीं किया है। मेरी जानकारी में नहीं किया है। कंफर्म कर लेना। देखिए मैं आपको एक बात बता रहा हूं। मैं कंफर्म भी करूंगा। मगर देखिए मैं फिर बता रहा हूं। किसी के ना होने का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं होती है। किसी के होने का प्रमाण देखो मैं जो बोल सकता हूं ना मैं अपनी परंपरा का जो हमारी परंपरा चली आ रही है उसका बोल सकता हूं कहीं पे तो स्टेटमेंट आज के उनके द्वारा दे दिया जाए ऑफिशियली रूप से वो आपका विषय है मेरा विषय तो अपनी परंपरा

00:10:01:20 को बता पास ऐसे लेटर मुझे प्राप्त है जहां पर मधवाचार्य परंपरा जैसे आपने पूछा कि परपाद्य को आचार्य कृष्ण ने घोषित किया उनके गुरु ने किया उनके गुरु को उनके गुरु ने किया तो ये परंपरा चली आ रही है परंपरा जो आज के प्रामाणिक वो हैं आनंद तीर की गद्दी पे बैठने वाले उन्होंने ऑफिशियली स्टेटमेंट दिया है कि इस हमारे से जुड़ा हुआ नहीं है हां उपासना में अंतर है नहीं हमारा वो नहीं है वो परंपरा में नहीं है इस ऐसा नहीं है चार वैष्णव संप्रदाय की एक उपशाखा भी हुई है चारों वैष्णवों की नहीं तो हमें सुनिए तो हमें यह प्राप्त है कि आप उनकी परंपरा में नहीं हो अब हुआ अब यदि हो तो आपको प्रोवाइड करानी चाहिए हमें वो चीज हां परंपरा मैं आपको गिना रहा हूं। आप अगर नाम बोलने से नहीं आज के जो वो ढूंढना आपका काम है। मैं तो नाम गिना सकता समर्थक आप हो ना इसको मैं तो नाम ही गिना सकता हूं आपको। तो यानी कि हमारे पास कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जिसके कारण मान सके कि मधवाचार परंपरा इसको अपना मानती है। बहुत सारे प्रमाण है। मैं आपको प्रमाण दे दूंगा। अच्छा ये बताइए कि यदि आज के जो आनंद तीर्थ की गद्दी पर बैठने वाले आज की बात नहीं कर रहा हूं। माधव संप्रदाय से गौ वैष्णव की बात सुनिए सुनिए। मधवाचार्य जी ने क्या माना है? क्या नहीं माना है यह हमें कौन बताएगा आज के टाइम में उनका जो प्रामाणिक

00:11:17:01 गद्दी पे बैठा होगा वही तो मान बोलेगा मैं ये इसको और क्लियर करता हूं जो मधु संप्रदाय है ना उसकी उप शाखा है गौ संप्रदाय जैसे बिना बिना मधवाचार्य के आपकी गौ संप्रदाय का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होगा। चैतन्य महाप्रभु ने इसको स्थापित किया। ऐसे तो बुद्ध को भी मान लो। फिर अगर भगवान के नाम पे मानना है तो बुद्ध को मान लो। चैतन्य महाप्रभु यज्ञ का ही विरोध हो गया। नहीं चैतन्य महाप्रभु ने जो हमको बताया है जो अच्छा इसमें भी दिक्कत है कि चैतन्य महाप्रभु ने क्या बताया क्या नहीं बताया इस पर भी बहुत सारी बातें हो सकती है क्योंकि उनका खुद इसके लिए चैतन्य चरितामृत चैतन्य भगवान उन्होंने खुद लिखा है उनके शिष्य हैं वृंदा दास ठाकुर तो फिर हमें पहले शिष्यों पर विश्वास करना होगा उनके परिकर हैं जैसे उनके एक उनके साथ में ही है परंद सरस्वती स्वरूप दामोदर राम राय चलिए परंपरा परंपरा वाली बात तो अभी हमारी होनी है ना नहीं अब इसमें तो हम इतना ही बोल सकते हैं क्योंकि आपने इसको और डिटेल भी स्टडी तो किया ही होगा स्वामी से भी आए हैं ना चेतन महाम नहीं नहीं उनसे नहीं आए हैं श्रीधर स्वामी से नहीं आए हैं अच्छा ठीक है श्रीधर स्वामी से कोई संबंध नहीं है उनका इस पे भी बात करें अगली बार करेंगे कर सकते हैं इस पर तो आपने कहा कि चैतन्य महाप्रभु हां तो चैतन्य महाप्रभु ने भागवतम कहां से पढ़ी? चैतन्य

00:12:32:02 महाप्रभु ने भागवत जो सुनते थे वह सुनते थे गदाधर पंडित जी के मुख से ये में चैतन्य चरितामृत में अच्छा और उन्होंने ये कहा है कि मैं भगवान कृष्ण को जान पाया हूं भागवत को जान पाया हूं श्रीधर स्वामी के कारण हां इसमें गलत क्या है ये इसके पीछे रहस्य है ना वो क्या रहस्य है श्रीपाद वल्लभाचार्य हम अपनी सुबोधनी टीका लेकर गए थे चैतन्य महाप्रभु के पास हम तो उन्होंने महाप्रभु को अपनी सुब बोध ने टीका दिखाई हम और उन्होंने यह वचन बोल दिए कि मैंने पूर्ववर्ती आचार्यों से मतलब उन्होंने ऐसे ही बोल दिया था ये वो वो मानते नहीं थे ऐसा मगर उन्होंने बोल दिया था उन्होंने बोला कि हे महाप्रभु देखो मैंने श्रीधर स्वामी से भी और अच्छी व्याख्या से भी नहीं हां श्रीधर स्वामी जी से भी अच्छा उन्होंने तो ये लिखा हुआ है वल्लभाचार्य जी ने तो ये ऐसा कहा मगर मैं ये कह रहा हूं नहीं इसको पूरा सुनोगे तब कनेक्ट कर पाओगे आप जी तो श्रीधर स्वामी तो प्रमाणिक है ना भागवत के प्रथम टीकाकार हैं श्रीधर स्वामी उनको तो कोई उनका तो कोई विरोध ही नहीं कर सकता है। वह तो मतलब भागवत के प्रथम टीकाकार है श्रीधर स्वामी। श्रीधर स्वामी ने भागवत पर भावार्थ दीपिका नामक टीका लिखी हुई है। अब वल्लभाचार्य जी ने ऐसे वचन बोले तो तब महाप्रभु बोले कि

00:13:47:08 श्रीधर स्वामी अनुगत कर भागवत श्रवण जगतगुरु श्रीधर गुरु कर मानी कि श्रीधर स्वामी के अनुगति में अगर भागवत सीख रहे हो समझ रहे हो तो वही प्रमाण है। उसी को मैं प्रमाण मानता हूं क्योंकि श्रीधर स्वामी जगतगुरु हैं। वो भागवत पर उन्होंने सबसे पहले भाष्य दिया है। नहीं उन्होंने कहा कि मैं उनकी वजह से ही भागवत को जान पाया हूं। उनकी उनसे ही ऐसा ही पढ़ा है। ऐसा भी कहा है तो गलत नहीं है। वो ब्रह्मांड के गुरु हैं। हां बिल्कुल जगतगुरु बोला। श्रीधर स्वामी अनुगति कर भागवत श्रवण श्रीधर जगदगुरु बोला यानी शंकराचार्य को जगदगुरु बोला नहीं अब ये तो आप बोल रहे हो लेकिन चैतन्य चरितामृत में जो लिखा है वो मैं बता रहा हूं। वहां पर ये तो आपका मानना है। श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड क्या है? नहीं पहले मैं इसको डिटेल कर लेता हूं। श्रीधर स्वामी जी के लिए महाप्रभु ने ऐसा कब बोला? क्यों बोला वही मैं आपको बता रहा हूं क्योंकि श्रीधर स्वामी तो सबके लिए आदरणीय है। हम भी उनकी टीका पढ़ते हैं। भावार्थ दीपिका आदरणीय होना गुरु मानने में अंतर गुरु भी हैं, आदरणीय भी हैं, आचार्य भी हैं। सब कुछ हमारे लिए वो उनकी कृपा से हम भागवत समझ सकते हैं। वो तो हम भी स्वीकार करते हैं। हम भी मानते हैं। हम भी इसको मानेंगे। ठीक है। क्योंकि श्रीधर स्वामी का यानी यानी विरोध करेंगे। मतलब जो श्रीधर स्वामी से जो भागवत है वो नहीं लिए उन्होंने।

00:15:02:19 किन्होंने? चैतन महाप्रभु। चैतन्य महाप्रभु ने भागवत लिखा ही नहीं लेने की क्या बात है? श्रीधर स्वामी चैतन्य महाप्रभु के समय में मुख्य रूप से श्रीधर स्वामी जी की ही भागवत अवेलेबल थी। उसके बाद अनेक आचार्यों ने भाष्य दिया भागवत पर। जैसे जीव श्रीधर स्वामी से ही पढ़ा भागवत। हां बिल्कुल श्रीधर स्वामी की जो आप ये कह रहे हो कि गिरधर जी से लिया था। किनसे लिया था? जी से सुना था। नहीं गदाधर पंडित के मुख से सुनते थे। मगर थी वो श्रीधर स्वामी की। श्रीधर स्वामी ने जो भाष्य लिखा था वो उनके मुख से सुना था गदाधर पंडित बात वही हो गई श्रीधर स्वामी से ही जा हां इसमें विरोध क्या है इसका नाम विरोध ये है कि जिससे हम श्री कृष्ण को तात्विक रूप से समझ पा रहे हैं तो वही तो हमारा गुरु सिद्ध हुआ हां श्रीधर स्वामी सबके गुरु हैं इसमें क्या है सबके तो चैतन महाप्रभु के गुरु हुए ना शिक्षा गुरु हुए ना दीक्षा गुरु कहां हुए दीक्षा गुरु तो माधुनिपाद हुए आप जो कहते अब मैं कहता हूं जैसे मेरे गुरु माधवाचार्य हुए मेरे गुरु वल्लभाचार्य जी भी जिनसे मैं शिक्षा ले रहा हूं, जिनसे मैं सीख रहा हूं, वह मेरे गुरु हैं सर। यही हमारे शिक्षा गुरु क्या बताया गया है? गुरु चार प्रकार के हैं। शास्त्रों में जीव गोस्वामी में लिखते हैं। पहले हैं दीक्षा गुरु, शिक्षा गुरु, श्रवण गुरु, पथ प्रदर्शक गुरु, चैत्य गुरु पांच प्रकार के गुरु का वर्णन शास्त्रों में दिया गया है। आप सीधे

00:16:18:00 जीव गोस्वामी जीव गोस्वामी के शास्त्र अब मैं आपको तीन गुरुओं का वर्णन बता रहा हूं। हां हो सकता है। भागवत में लिखा है। होगा। भागवत में दसव स्कंध में लिखा है तीन प्रकार के गुरु। पहले माता-पिता जो जन्म दे हां दूसरे जो संस्कार करें और तीसरे वह गुरु जो आपको तात्विक ज्ञान दे ज्ञान दे भी ठीक है तो परम गुरु कौन कहा गया है जो तात्विक ज्ञान दे तात्विक ज्ञान दे ठीक है तो तात्विक ज्ञान किसने दिया गुरु देते हैं नहीं उनको किसने दिया चैतन महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु को ज्ञान दिया ईश्वर पाद जी ने नहीं श्रीधर स्वामी की टीका से तात्विक ज्ञान आया उनके पास बोला किसी ने भी हो वो भी गुरु है तात्विक ज्ञान उन्हीं से आया श्रीधर स्वामी भी गुरु है तत्व का ज्ञान किससे आया कौन से तत्व का ज्ञान? भागवत तत्व श्रीधर स्वामी भाई श्रीधर स्वामी तो सबके गुरु हैं। सब उन्हीं से सीख रहे हैं। वो तत्व का ज्ञान किससे आया? तत्व शिक्षा गुरु के रूप में उनको स्वीकार किया। शिक्षा गुरु नहीं पूछ रहा। मैं पूछ रहा हूं तत्व का ज्ञान किससे आया? नहीं आप वो ये कह रहे हैं। मैं तो शास्त्र के अनुसार बोलूंगा ना आपको। शिक्षा गुरु बोल रहे हो। आप दीक्षा गुरु बोल रहे हो। मैं नहीं बोल रहा। पथ गुरु बोल रहे क्या बोल रहे हो? मैं ये बोल रहा हूं कि भागवत में कहा गया है जो तत्व का ज्ञान दें। ब्रह्म का ज्ञान दें। हां तो तत्व का ज्ञान भागवत से आता है और भागवत श्रीधर स्वामी जी से आया। इसमें गलत क्या है? हां तो आया। ठीक है।

00:17:33:01 इसमें गलत श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड क्या है? वो कौन देखो उनका जो बैकग्राउंड है वो तो बहुत विस्तार का विषय है। उसमें विद्वानों के मतभेद हैं। वो अलग विषय है। अभी के अनुसार क्या है? मेरे अनुसार श्रीधर स्वामी वैष्णव संप्रदाय में है और वैष्णव है। ठीक है। तो वो जीव गोस्वामी और हमारे आचार्य के अनुसार कहां रहते थे? इस पर मैं विस्तार से आपको अभी नहीं बता पाऊंगा क्योंकि मुझे याद क्या आपके संप्रदाय में भी उनको शंकराचार्य की गद्दी पर बैठा हुआ माना गया है कि नहीं? नहीं माना गया है। माना गया है। आपके यहां पर लिखा हुआ है कहां पे लिखा हुआ है? मैं आपको ये यहां स्क्रीन पे लगा दूं। मुझे लगा देना आप। ठीक है। मुझे दिखा देना। कि ये वाली कई सारी चर्चाएं हैं कि भ मायावादी के सिद्धांत को क्यों माना? ऐसे टाइटल है उन चर्चाओं का और वो यहां पे मैं लगाऊंगा। मुझे हमारे गौडय वैष्णव जो आचार्य है ना उनके ग्रंथों से एक बार दिखा। मैं इस से दिखाऊंगा ना। इस क्या कह रहा है? इस के कई सारे लेख प्राप्त है मुझे। आपकी दृष्टि में इस और गौ वैष्णव अलग हो सकते हैं। लेकिन मेरी दृष्टि में दोनों वर्णाश्रम को लेकर के तो बिलकुल अलग हैं। वो आपकी दृष्टि में शिव जी वाली बात आपने मान ली है। शिव जी वाली बात आपने मान ली है तो बात अलग है। लेकिन आपके यहां के लोग ही कहते हैं चातुर वर्णमया सष्टम औरतम विवाह तो कर्म के हिसाब से जो जो करेंगे नहीं नहीं आप जो है ना विषय को ऐसे घुमा रहे हो। मूल बात ये है कि श्रीधर स्वामी

00:18:48:07 को हमारे आचरण ने क्या माना है वो मैंने आपको बताया। और चैतन्य महाप्रभु ने उनको स्वामी सीधा स्वामी को आपने वैष्णव मान लिया वैष्णव है वो शंकराचार्य नहीं थे वैष्णव थे शंकराचार्य कुछ विद्वान उनको शंकर संप्रदाय मानते हैं। अरे भैया आपके विद्वान प्रामाणिक विद्वान हमारे विद्वान तो गौर जो हमारे विद्वान हैं उनको वैष्णव मानते हैं। तो आपके इस के कौन लोग नहीं यार हम इस तो जानता ही नहीं उनको इस नहीं जानता। इसन में उनको कौन जान रहा है? इसन सीधा स्वामी को नहीं जानता। कितने लोग जान रहे हैं? प्रभुपाद को जान ले वो बहुत बड़ी बात है। आप ये बताइए कि कि गौडिया वैष्णव मैं तो गौ वैष्णव की बात कर रहा हूं। यहां हमारे आचार्य हैं। तो अभी मैं कहां बैठा हूं? इस में बैठा हूं। ग वैष्णव आप गौ परंपरा और स्कॉन दोनों में बैठे हो। इस ही गॉन इस है ना? तो इस मतलब अलग क्यों कर रहे हो? स्कॉन मतलब प्रभुपाद जी। तो अभी मैं कहां बैठा हूं? प्रभुपाद के पास गौ वैष्णव के पास कि इस के पास? तीनों के पास। तीनों के पास। तो फिर मैं स्कॉन से रिलेटेड सवाल कर सकता हूं ना। जब तीनों यहां पे लेकिन जो इस से रिलेटेड सवाल आप कर रहे हो जो मैं बता रहा हूं उसको आपको एक्सेप्ट करने का प्रयास करना चाहिए। अरे भैया जब आप जब कोई दूसरा कुछ बोल रहा है ना उससे प्रमाण मांग लो आप जाके कोई अगर कुछ बोल रहा है इसको क्या मैंने प्रमाण मांगा उसने दिया है भाई किसने दिया कि हम उनके जो है प्रमाणिक

00:20:03:18 लोग हैं वही तो मैंने आपसे शुरू में प्रश्न कर रहा था आपने उसको छोड़ दिया मैं प्रश्न कर रहा था कि भाई जब दो लोग हैं दोनों कह रहे हैं मैं इस कौन का हूं दोनों कह रहे हैं मैं गौ वैष्णव हूं तो हम किसी एक की बात को कैसे मानेंगे जो प्रमाण दे सके तो आपने प्रमाण दिया दूंगा आपको इस बारे में कि वो शंकराचार्य नहीं थे मैं ये प्रमाण दूंगा कि वो वैष्णव थे शंकराचार्य नहीं थे इस बारे में क्या प्रमाण है इस पर मैं जो हमारे वैष्णव ने जो हमको बताया मैं वो दे सकता हूं ठीक है दुर्जन तो उसने फिर वही वाली बात आ गई कि जो वैष्णवों ने बताया वो मैं आपको बता रहा हूं जो हमारे आचार्य नेता वही बात हो जाएगी रामपाल कह देगा जो कबीर ने बताया वो मैं आपको बता रहा हूं फिर आप कहोगे प्रस्थान पे जो भाष्य लिखेगा वो होगा अब मैं आपसे प्रश्न कर रहा हूं कि आप बात अब जो मेरे पास ज्ञान आ गया 1 मिनट 1 मिनट अब ये बताइए कि प्रभुपाद जी ने प्रस्थान त्रई पर भाष्य लिखा है या नहीं लिखा है लिखा हुआ है किस किस पर लिखा इसपनिषद पर भगवत गीता पर मतलब मतलब किसी भी एक उपनिषद पर लिख देंगे वो प्रस्थान में भाषण में हां बिल्कुल हां बिल्कुल होता है किसी भी एक उपनिषद पर क्योंकि उपनिषद क्या है वो प्रस्थान थ्रे में आता है हां बिल्कुल अच्छा चलिए ठीक है तो अब दूसरी एक बात ये आ जाती है कि ये वाली जो बात चल रही है ना ये क्या कहते हैं ये अ क्या

00:21:18:24 चल रही थी अभी बात भाई सिरधर स्वामी जी श्रीधर स्वामी हां उसमें दुर्जन तो उस न्याय पे आते हैं कि आपने आपने कह दिया कि वैष्णव थे मैंने नहीं कहा हमारे ग्वालियर वैष्णव देखिए मैंने आपसे चर्चा के पहले ही पूछा था कि आप अगर यह कहने वाले हैं कि हमारे आचार्य ने कहा है तो फिर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है आपने नहीं कहा हम आपके आचार्य से बात कर लेंगे फिर आप क्यों हमारे आचार्य आप विश्वनाथ जी तो अभी है नहीं तो है नहीं तो फिर नहीं अगर आप उनकी बात बोल रहे हो तो उनकी बात को आपको सार्थक सिद्ध करना पड़ेगा ना प्रमाण आपको प्रमाण दे रहा हूं ना तो आप यह मत कहो तो उन्होंने कहा हम तो मैं आपको प्रमाण दे तो रहा हूं। नहीं तो यह कहां दे रहे हो आप कि वो शंकराचार्य हम आपको प्रमाण दे रहे हैं। शंकराचार्य हैं। आपके खुद के इस के लोग कह रहे हैं वो शंकराचार्य थे। आप कह रहे हो वो शंकराचार्य नहीं थे। मगर फिर भी अब मैं एक बात ले लेता हूं आपकी कि वो जो है वैष्णव थे। ठीक है? तो अब ये बताइए कि उनके गुरु कौन थे वैष्णव में? देखो श्रीधर स्वामी के विषय में हम जो हमारे वैष्णव आचार्य ने बोला है ना मैंने उतना ही पढ़ा हुआ है। आप डिटेल में पढ़ना है। नहीं डिटेल में मैं आपको भेज दूंगा। देखिए सुनिए एक बात आ रही है जैसे वैष्णव हैं इसलिए ऐसा मानते हैं। एक मिनट आप फोन रख लीजिए तुम मेरा ध्यान भटक रहा है तो नहीं नहीं कोई ना आप बोल। आप वैष्णव हैं इसलिए हम ऐसा मानते हैं। वो हमारे आचार्य हैं

00:22:33:25 इसलिए हम ऐसा ये बहुत बड़ा ये बहुत बड़ा एक ड्रॉबैक होता है। ऐसा नहीं है। सुन लीजिए। मैं प्रमाण दे रहा हूं। मैं मैं क्या कह रहा हूं सुनिए ड्रॉबक तब होता है जब प्रमाण ना दो मैं एक मिनट आप रख दीजिए मेरी बात सुन लीजिए मैं बताता हूं आपको एक चीज हम हम वैष्णव भक्ति करने से पहले कोई वैष्णव नहीं है तो उसको वो बात मत कहिए कि वैष्णव है तो ये मान लो ठीक है ऐसे ही जब तक कोई आचार्य सिद्ध नहीं हो रहा है तब तक उसको आचार्य के रूप में मानकर उसका शब्द प्रमाण कैसे जो हमारे वैष्णव आचार्य ने दिया ना प्रमाण आपको मैं मैं आपको मैं आपको बता रहा हूं कोई भी व्यक्ति आचार्य तब हो सकता है जब वो आचार शास्त्रों में लिखे हुए आचरण को अपने शिष्य में प्रतिष्ठित करें। श्रीधर स्वामी के विषय में प्रभुपाद जी ये लिखे हुए हैं। चैतन्य चरितामृत लिखे हुए हैं। आगे आप पढ़ सकते हो इसको। थोड़ा जोर से पढ़ना चाहो। नहीं आप पढ़िए ना। आप आप पढ़ो ज्यादा अच्छा लगेगा। मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूं। मैं आंग्ल भाषा कम पढ़ पाता हूं। श्रीमद् भागवतम हैज़ मेनी टीकास और कमेंट्रीज फॉलोइंग द परंपरा सिस्टम। हम बट श्रीधर स्वामी इज फर्स्ट टू द कमेंट्रीज ऑफ ऑल द अदर आचार्य फॉलो ह द परंपरा सिस्टम डज नॉट अलाउ वन टू डिवाइडेड फ्रॉम द कमेंट्रीज ऑफ द प्रीवियस आचार्य बाय

00:23:48:26 डिपेंडिंग अपॉन द प्रीवियस आचार्य वन कैन राइट ब्यूटीफुल कमेंट्रीज हॉरवर ऑन कैन नॉट डेफी द प्रीवियस आचार्य मतलब प्रभुपाद जी बहुत सारे चीज दिए हुए हैं और नहीं वो क्या है कि वो क्या था उनका बैकग्राउंड हां वही मैं बता रहा हूं जैसे सुनिए हमारे सुनिए तो सुनिए सुनिए मैं एक बहुत आसान कर देता हूं आप बैकग्राउंड पे बोल मैं बता रहा हूं मैं एक मिनट मैं आसान कर दूं हमने अपनी परंपरा प्रभुपाद जी से लेकर कृष्ण तक गिना दी बीच में श्रीधर स्वामी आ रहे हैं जो आपको भागवतम का ज्ञान दे रहे हैं। ठीक है तो पहली बात तो यह है कि हमें श्रीधर स्वामी के गुरु का नाम क्यों नहीं पता है? वह कृष्ण उसी परंपरा से तक कैसे जा रहे हैं? अगर वैष्णव है तो उसी परंपरा में जानी चाहिए ना क्योंकि उनसे हम भागवतम ले रहे हैं। तात्विक ज्ञान ले रहे हैं और परम गुरु वही है जो तत्व का ज्ञान दे। ब्रह्म का ज्ञान दे। भागवत के अनुसार हां थोड़ा जो हमारे आचार्य बोले मैं थोड़ा आपको सुनाना चाहता हूं। ठीक है। सबसे पहले तो चैतन्य महाप्रभु बोलते हैं श्रीधर स्वामी प्रसाद भागवत जानी जगतगुरु श्रीधर स्वामी गुरु कर मानी हम श्रीधर अनुगत कर भागवत व्याख्यान अभिमान छाड़ी भज कृष्ण भगवान हम श्री चैतन्य महाप्रभु कह

00:25:03:27 रहे हैं श्रीधर स्वामी की कृपा से ही ये आप ना मामले को थोड़ा सा बढ़ा रहे हो आप काफी अभी आप डिटेल में आप सुनना चाह रहे थे हम लोग यहां पे आ चुके हैं कि श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड बताइए चलो ठीक है वार्ता इसमें हो चुका है। श्रीधर स्वामी का जन्म गुजरात प्रदेश में हुआ था। हां उनके आविर्भाव काल के संबंध में कोई प्रमाणिक सामग्री ना होने के कारण कुछ अधिक कहने का उपाय नहीं। हम फिर भी इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि अद्वैतवादियों ने उनकी स्थिति काल के संबंध में जो अटकलें लगाई हैं वह बिल्कुल निराधार हैं। मध्य मुनि ने अपने ग्रंथों में उनका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। हम केवल इसी के आधार पर उनका समय मध्य के बाद स्थिर करना युक्ति युक्त नहीं है। हम्म। श्रीधर स्वामी ने वेदांत या उपनिषद आदि का कोई भाष्य नहीं लिखा है। यही कारण है कि माधवाचार्य जी ने अपने ग्रंथों में उनका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। अन्यथा वे अवश्य ही श्रीधर स्वामी का उल्लेख करते। श्रीधर स्वामी ने अपने गीता भाष्य में एक शंकर का ही उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता है कि वे शंकराचार्य

00:26:19:03 शंकर के पश्चात और माधवाचार्य से पूर्व किसी समय में प्रकट हुए शंकराचार्य के पश्चात और से पूर्व श्री रामानुजाचार्य ने प्रधानतः विष्णु पुराण का अवलंबन कर अपने श्री भाष्य की रचना की है। आचार्य श्रीधर स्वामी ने भी विष्णु पुराण की एक टीका लिखी है। यदि श्री रामानुज को उनकी टीका का पता होता, तो वे अवश्य ही अपने ग्रंथों में उनका उल्लेख करते। तथा उसके वचनों को प्रमाण तथा उनके वचनों को प्रमाण स्वरूप उद्ध्रित करते। किंतु देखा जाता है कि ना तो रामानुजाचार्य जी ने श्रीधर स्वामी का तथा ना ही श्रीधर स्वामी ने रामानुजाचार्य का कहीं उल्लेख किया है। ऐसी अवस्था में यह निश्चित रूप से हम कैसे कह सकते हैं कि इनमें कौन आगे व कौन पीछे? मायावादी लोग आज भी उनको अपने संप्रदाय के अंतर्भूत बनाने के लिए खींचातानी कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि श्रीधर स्वामी ने पहले पहल किसी अद्वैतवादी के संघ के प्रभाव से अद्वैत मत ग्रहण किया था। इस बात का कुछ-कुछ आभास उनकी रचित टीकाओं से मिलता है। हम उस समय परमानंद तीर्थ नामक

00:27:34:09 एक वैष्णव सन्यासी शुद्धा द्वैत मत का प्रचार करते थे। यह श्री नरसिंह देव के उपासक थे। हम शुद्धाद्वैत के आदि आचार्य श्रीमद विष्णु स्वामी का स्थिति काल शंकराचार्य से बहुत पहले है। वे आदि विष्णु स्वामी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इन्हीं की शिष्य परंपरा में परमानंद तीर्थ एक सन्यासी प्रचारक थे। इन्हीं की कृपा से श्रीधर स्वामी ने अद्वैत मत का परित्याग कर शुद्धाद्वैत मत में दीक्षा ग्रहण की। अब इनको इस बात का विश्वास हो गया था कि अद्वैत ज्ञान द्वारा यथार्थ मोक्ष प्राप्त करना कठिन ही नहीं असंभव है तथा भगवत भक्ति ही मोक्ष का एकमात्र उपाय है और उपय दोनों हैं। उन्होंने गीता की टीका में लिखा हुआ है श्रुति स्मृति पुराण वनाम सती समजानी भवंती तस्माद भक्ति रेव मुक्ति हेतु रीति सिद्धम परमानंद श्री पादा रज श्री धणी धुना श्रीधर स्वामी यतिना कृता गीता सुबोधना यदि मायावादियों का यह कथन सत्य मान भी लिया जाए कि श्रीधर स्वामी मायावादी संप्रदाय के हैं तो क्या अद्वैतवादी उनके गीता के उपरोक्त सिद्ध सिद्धांत को स्वीकार कर सकते हैं।

00:28:50:04 यदि वे स्वीकार जो मैंने अभी आपको श्लोक सुनाया श्लोक बताइए परमानंद इसका अर्थ यही है कि परमानंद श्रीपाद रजि इसमें श्रीधर स्वामी यही कह रहे हैं कि मैंने उनसे ही उनकी कृपा प्राप्त किया। किनसे परमानंद तीर्थ जो उनके संप्रदाय में किनके विष्णु स्वामी परमानंद तीर्थ हां इस श्लोक का बाद में अनुवाद करते रहना आप इस श्लोक का बाद में अनुवाद करते रहना आप तो उनके गीता के उपरोक्त सिद्धांतों को स्वीकार कर सकते हैं। यदि वे स्वीकार नहीं करते गीता का सिद्धांत नहीं है तो उनके अपने साथ घटित हुई गीता में जो ये उन्होंने लिखा हुआ है ये वचन जो लिखा हुआ है इस विचार को हां वो क्या स्वीकार कर पाएंगे या नहीं ऐसा बोल रहे हैं यदि वे स्वीकार नहीं करते तो उनको मायावादी संप्रदाय के अंतर्गत घसीटने का व्यर्थ चेष्टा ही क्यों करते हैं श्रीधर स्वामी की गीता के टीका के संबंध में एक आश्चर्यजनक इतिहास है वह घटना इस प्रकार एक समय श्रीधर स्वामी समस्त तीर्थों का भ्रमण करते-करते काशी में पधारे। उन्होंने वहां कुछ दिनों तक ठहर कर गीता की सुबोधनी टीका लिखी और सर्वप्रथम वहां के पंडित समाज ने उसे चालू करने के लिए प्रयत्न किया। किसने? श्रीधर स्वामी जी ने। तो अब टीका के सिद्धांतों

00:30:05:15 को अद्वैतवाद बैकग्राउंड हां गुजरात वही हां काफी लंबा हो गया। बहुत विस्तार से समझाया। ये हमारे आचार्यों का तो वही बता रहा हूं। पहली बात ये कि आ जाती है। आचार्य अब इस पर क्या है ना इस पर या तो आप इनकी मानो या उनकी मानो। विद्वानों का मतभेद नहीं नहीं नहीं ऐसे नहीं है। इसमें हम बहुत सी चीजें हैं। इन्होंने जो तर्क दिए हैं उसको उस पे बात करेंगे। पहला तर्क इन्होंने दिया है कि फलाने ने अपनी टीका में उसका उपयोग नहीं किया। ये अकाट्य तर्क नहीं होता है। इससे हम अनुमान थोड़ा बहुत लगा सकते हैं। मगर ये कोई सनातन सिद्धांत नहीं होता है कि अगर उस समय के तत्काल के लोगों ने उनका संदर्भ लिया है तो उनके अस्तित्व को माना जाए और नहीं लिया है तो उनके अस्तित्व को अस्तित्व तो माना है बट कब हुए? आगे हुए कि पीछे हुए ये संशय है। हां। क्योंकि जो भी आचार्य होता है ना दूसरी बात ये है वो हमेशा वो करता है दुर्जन तोष न्याय से हम लोग बात कर रहे हैं यहां पे अच्छा दूसरी बात आगे ये वाली बात मानिए कि उन्होंने कहा है कि कृपा ठीक है तो ऐसे तो मेरे ऊपर भी मधवाचार्य जी की कृपा है माधवाचार्य शास्त्री जी की श्री संप्रदाय की तो मैं हो गया श्री संप्रदाय का क्यों है क्योंकि सुनिए भाई साहब आपने बहुत लंबा बोला नहीं नहीं मैं ये कह रहा हूं मैंने प्रमाण देना था आपने पढ़ा है ना तो मैं उसको मैं उसमें काउंटर कर रहा हूं नहीं ये उनके लिए करो मेरे तो आप उनकी बात मुझे मत बताओ तो

00:31:20:16 आप प्रमाण मत मानो तो फिर आप मत बुलाओ यहां इस मंदिर नहीं मैं इसकी बात कर रहा हूं मैं तो मैं नहीं आप इस मंदिर बुला के मुझे बता रहे हो मैं कह रहा हूं मैं जब प्रमाण दे रहा हूं मैं आपको दे बताना चाहता हूं आपने प्रमाण मांगा आपने प्रमाण हां वो बाहर बाहर ही खड़ा होगा वो नंबर देख के आप कॉल कर लो उन्हें नंबर दिया था ना आपने जो है ना प्रमाण मांगा तो मैंने प्रमाण दे दिया मैंने आपको प्रमाण देना था दे दिया अब इस पर रिसर्च का विषय हुआ आपका नहीं नहीं नहीं आप मुझे वो रिसर्च वो रिसर्च किस आधार पे होगी वो मैं आपको बता दूं फिर मैं रिसर्च करूंगा अब क्या है कि ये जो परमा मेरी रिसर्च सुन लीजिए मैं क्या है पहली बात तो ये है कि किसी ने क्या अपने उसमें उनका उल्लेख किया कि नहीं किया वो तो अलग बात है मतलब उसपे आ जाए कि जो कृपा वाली बात उन्होंने कही है कि उनकी कृपा है उसप भी जो श्री संप्रदाय के महालचार्य शास्त्री जी हैं उनकी कृपा उन्होंने क्यों ग्रंथ में बहुत मदद की है उनकी है ना और वो भी कहते हैं कृपा जी महाराज जो शांति संप्रदाय हैं उन्होंने बहुत मदद की है कई अंशों में वो जो है तो वो कृपा कृपा मानते हैं तो कृपा किसी की भी हो सकती है कई वैदिक संप्रदाय हैं प्रामाणिक है अब आगे की बात ये आती है कि हम ये मान लेते हैं कि जो हिस्ट्री वाली बात है कि हिस्ट्री है क्या है वो शब्द प्रमाण चलती है हमारे जो आचार्य वो ये कह रहे हैं वो हमारे थे शंकर संप्रदाय के थे तो अपने समय के वो शंकराचार्य की गद्दी पे बैठे थे शंकराचार्य आपका कहना है कि वो गद्दी की बात हुई नहीं बैठे थे बैठे थे गंदी बात नहीं तो दूसरी बात ये है कि अब पहली बात ये आ जाती है कि अगर वो विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे तो आप चैतन महाप्रभु को विष्णु स्वामी संप्रदाय क्यों नहीं मानो पहली बात दूसरी बात दूसरी बात कि आपके पास वो जो भागवत का ज्ञान आया है यदि स्वामी का तो आपके यहां वो गीता भागवत

00:32:35:20 क्यों नहीं लिखी है वो बुस्ट में सीधा स्वामी है ना और तीसरी बात की श्री स्वामी ने स्पष्ट कई जगहों पर भगवान शिव को ही परमेश्वर के रूप में उसको स्वीकार किया और ये बात आप भी कह रहे हो कई जगह मायावादी टच मिलता है वो मायावादी टच आपके यहां एज इट इज क्यों नहीं है अगर आपका ज्ञान सर ये दिक्कत आ जाती है। हां चैतन्य महाप्रभु और आपने एक बात और कही थी कि संप्रदाय में भाष्य में तो अंतर होगा अनुवाद में नहीं होगा अनुवाद में अंतर है भगवत गीता आपकी यहां की जो वो है चार 24 उसमें जो है ब्रह्म का जो है जो कृष्ण भावना कर दिया है हां कृष्ण व्याख्या करते हैं तो इसका मतलब वो भाष्य अपने भाष अनुवाद भी डाल रहे हैं वो वाली बात गलत है कि अनुवाद के साथ चर्चा नहीं होती 90% नहीं होती है थोड़ा बहुत कई बात ऐसा नहीं है आपने कई बात है ये बात आई थी तो उनको प्रश्न का जवाब दिया चैतन्य महाप्रभु की अगर वो विष्णु स्वामी समप्रदाय के थे तो आप चैतन्य महाप्रभु को विष्णु स्वामी समप्रदाय चैतन्य महाप्रभु ईश्वरी तो उनको विष्णु स्वामी सम्या किसने दीक्षा ईश्वरी प्रकाश उन्होंने ईश्वरी प्रपा ने उनको भागवत समझाना ही एक मात्र वो नहीं दीक्षा गुरु मंत्र कहां से मिला ये महत्वपूर्ण है मंत्र मिला दीक्षा यानी कि आपका जो परंपरा प्राप्त ज्ञान है वो आ रहा है विष्णु संप्रदाय हमारा ज्ञान वैष्ण आचार्य द्वारा है हम लोग श्री स्वामी जी भागवत टीका लेते हैं हम लोग आशी लेते हैं हम वैष्णव का जो भाष्य है मतलब आपकी कोई परंपरा नहीं है ज्ञान के मामले यस भागवत टीका के मामले में क्योंकि टीका तो भागवत टीका नहीं ज्ञान के मामले ज्ञान तो बहुत है गीता का ज्ञान भी है भागवत का ज्ञान ज्ञान के मामले में आपका ज्ञान कौन से ज्ञान का धर्म का ज्ञान ईश्वर का धर्म का ज्ञान ऐसा नहीं है टीकाओं की बात की बात आपके आगे दो मुख्य ग्रंथ कौन से हैं हमारे जो मुख्य ग्रंथ है वो श्रीमद् भागवत और भगवत गीता है यही है ना उसमें से एक जो भगवत गीता है यानी कि मान लीजिए आधे से भी बड़ा हिस्सा क्योंकि वो एकद ग्रंथ है भागवत तो भागवत जो है आपके यहां आ रही है विभिन्न परंपराओं से बल्कि सीधा स्वामी से आ रही है। मूल भागवत

00:33:50:24 तो सुखदेव गोस्वामी से आ रही है। हमारी परंपरा में टीका किसका आ रहा है? सुखदेव गोस्वामी तो सबके हैं। सुखदेव गोस्वामी को कौन है? जितने संप्रदाय है सब में श्री स्वामी की टीका सबसे पहले आती है। उसके बाद अन्य आचार्य की अपनी टीका है भागवत में। वल्लभाचार्य की अपनी टीका है भागवत। हमारी परंपरा में तीन टीका है। जयव गोस्वामी की वैष्णव गोणी विश्वनाथ जी की सार्थक वो तो बाद में आएगा ना गोस्वामी महाप्रभु के पास जो आई थी टीका। उस समय तो एक ही टीका थी स्वामी जी की। तो ये कोई सात सिद्धांत नहीं है। एक ही टीका है तो उसको आपने मान लिया। फिर भी वो आपका गुरु नहीं मान। गुरु है। कौन बोला नहीं है? वो गुरु है। सबके गुरु हैं। कौन से गुरु? हम तो शिक्षा गुरु बोलेंगे। ये शास्त्र में कहां दिया? गोस्वामी लिख शास्त्र में भी जीवो का उन्होंने जो शास्त्र में दिया है अद्वैत का उपनिषद में वो है जो आपने गुरु बहुत सारे हैं ऐसे तो उन्होंने 24 गुरु बनाए भागवत में तो गुरु जो है मुख्य गुरु कौन है जो आपको तत्व की व्याख्या दे दी और तत्व की व्याख्या ना भागवत में स्वामी जी से डायरेक्ट तो नहीं सीखा उन्होंने तो किससे जिससे भी सीखा वो सीधा स्वामी का हुआ भाई जिससे भी सीखा जैसे उन्होंने छोड़ो मतलब मत करो अभी नहीं वो आपने स्वामी तो आपने सीधा स्वामी से नहीं सीखा तो जिससे सीखा वो अगर सीधा स्वामी का ग्रंथ पढ़ा रहा है तो सीधा स्वामी का हुआ तो परंपरा चली गई ऐसा नहीं है वैष्णव आचार्यों की टीकाओं को पर रूप में ले सकते हो कि हमारे इन आश्र ने ऐसा कहा है। उन्होंने ऐसा कहा है। जैसे हम श्री बलसा की टीका लेते हैं। तो ये बताइए कि इसका मतलब ये माना जाए कि आपके पास जो भागवत है भागवत का ज्ञान है वो परंपरा प्राप्त नहीं है। वो ऐसे ही किसी से भी ले लिया। ऐसा नहीं है। सार्व परंपरा सार परंपरा श्रुति गोस्वामी जिन्होंने जो भाष्य दिया है वो सब हमारे पास है। हम सीधा स्वामी आए ना लिखा है भागवत में। सीधा स्वामी आ गए ना बीच में। श्री स्वामी आए हैं। जीव गोस्वामी आए हैं। तो बात हुई है। मैं पूछ रहा हूं जो महाप्रभु उनसे पहले की बात है। हां श्रीधर स्वामी तो सबके गुरु हैं। सब वैष्णवां

00:35:06:24 गुरु हैं। मायावा टच है। वो तो मैंने नहीं माना है। मैं तो नहीं बोल रहा हूं। जी को नहीं मानते। ये तो हमारे बॉडी वैष्णव लिखा हुआ है। आप मानते हो कि नहीं? मायावा टच है कि नहीं है तो मैंने जिसको जिसको प्रमाण है वो मदद कर रहे उसके ऊपर आंश जो प्रमाण है मतलब जो हिस्ट्री में उसकी हिस्ट्री सही है मगर उसका ये वाला बात गलत है पूरी बात नहीं सुना वो गीता की बात कर रहे थे वहां पे भागवत की ठीक बात करते टच गीता की ठीक बात यानी एक व्यक्ति अपनी गीता में अलग तात्विक व्याख्या करता है और भागवत में अलग तात्व्या इसलिए बोला कि पहले अधिवादी थे बाद में ये मेंशन किया कि गीता पहले लिखा है और भागवत ये तो शोध का विषय है ये बात है उन्होंने मेंशन किया कि मैंने अपनी गीता में गलत लिख दिया तो ये मानना पड़ेगा ना हमें कि उन्होंने अपनी गीता को लास्ट तक गीता रखा मतलब जैसे मैंने कहीं कुछ कह दिया और बाद में मुझे पता चला कि मैंने गलत कह दिया तो फिर बाद में अगर मैं सार में कहूं श्रीधर स्वामी की टीका को सभी वैष्णव आचार्य ने ग्रहण किया है। नंबर एक नंबर नहीं मधवा संप्रदाय में नहीं किया गया और मधवा संप्रदाय वालों की एक तरीके से नाराजगी इसलिए है क्योंकि चैतन महाप्रभु अगर मधवा संप्रदाय के हैं यानी कि उनके गुरु ने मेरे पास मेरे पास जितना प्रमाण था मैंने आपको दे दिया है इस पर जो डिटेल है वो नहीं मधवा चार परंपरा की नाराजगी इसीलिए है कि आप भैया सीधा स्वामी का लिखिए प्रमाण कहां है मुझे बताइए आप ये जो बोल रहे हो आप अपना प्रमाण बताइए बताइए ये वाला जी से रहते हैं ये तो मैंने गिना है आपको ये तो फोटोना आप देखिए मैंने आपसे भी किया कि मैं शंकराचार्य जी का शिष्य हूं अगर मैं तब तक शंकराचार्य का प्रतिनिधि बन के बात नहीं कर सकता जब तक कोई अलाऊ नहीं कर रहा मुझे अलऊ वाला प्रमाण चाहिए होगा अलऊ वाला प्रमाण कहीं पर हो किसी ने मेंशन किया होगा जैसे मेरे गुरुदेव मानो मेरे गुरुदेव ने मुझे आचार्य पूण किया और दीक्षा मैं बात पूरी कर लेता हूं सुनिए बता दीक्षा वाली बात आप कह रहे हैं दीक्षा गुरु कौन है दीक्षा गुरु यदि मत आचार्य है तो फिर आप गौ वैष्णव अलग सेल सेल सेल सेल सेल सेल सेल सेल सेल कैसे बन इसलिए हमारे संपर्क का

00:36:21:25 नाम है ब्रह्मा गौरी वैष्णव क्यों अंतर क्यों आ रहा है एज इट आना चाहिए ना अंतर नहीं भाव के अनुसार अंत गीता को क्या कह रहे हो बताओ कह रहे हो इट कह रहे हो भाव के अनुसार है हमारे आचार्यों ने हर आचार्य ने गीता पर भाष लिखा है भक्त ठाकुर जी ने भक्ति सिद्धांत ठाकुर जी ने किया विश्वनाथ जी ने सभी ने भाष दूसरा किया है आप कह रहे हो एट इज जो वहां था मतलब होता है जो वहां था वहां था ठीक है मगर आप क्या कर रहे हो वहां से मंत्र आया फिर हम लोग ब्रह्मा गौरव समुदाय यही कुछ किया जो मनचार आ रहा है वही आ रहा है और चैतन्य महाप्रभु ने केवल उपासना पद्धति भाव पद्धति को ऐड किया उसमें यानी ज्ञानी की कुछ है जो नहीं है वहां पे एज इट इज़ नहीं है कुछ चीज़ एज इट नहीं है लेकिन अलग नहीं है कह सकते हो आप ऐसे तो दुनिया में कुछ भी अलग नहीं है देखिए जैसे एक स्वान है वो दांतों से खाना खाता है इसीलिए वर्ण आएगा कि चारों वैष्णव है वैसे सीता राम की भाषा है राम वैष्णव आपने कहा ना कुछ चीज़ अलग है कुछ चीज़ नहीं है उसका कारण उसका कारण सुना चाह रहे हो मैं कह सकता हूं नहीं क्यों अलग है ठीक है ठीक आप वो सुना रहे राम वैष्णव आपने सुना होगा जिसमें तुलसीदास जी आते हैं तो राम वैष्णव किसके उपासक हैं राम जी के सीताराम के उपासक है ना और जो राम वैष्णव है वो किसके उपासक है वो वो लक्ष्मी नारायण के पास लेकिन जो रामानुज संप्र संप्रदाय है उसी भी तो का रामानंद संप्रदाय वो सिद्ध कर लिया शास्त्रार्थ में हुआ था उसमें उन्हें विजय प्राप्त हुई थी उन्होंने अपने को अलग कर लिया था उनकी उत्पत्ति बिलकुल स्वतंत्र रूप से वो हो सकता है आजकल ऐसा जो बड़ा वाले ने भी स्वीकार किया उस बात को और राम जी ने भी स्वीकार किया उस बात को दोनों ने स्वीकार किया अलग उन्होंने सिद्ध किया कि शास्त्र कोन में मेरे ख्याल से अभी भी कुछ शताब्दी पहले हुआ होगा उसने सिद्ध कर दिया स्वतंत्र अलग हो सकता है लेकिन जो हमने पढ़ा था हमारे आचार्य बताया तो बात ही हो जाए हमारे आचार्य ने कहा है आपके आचार्य ने वो अलग है खैर वो बात ये हो रही है कि अगर कहीं पे कुछ हो भी गया है उसको आधार नहीं ले सकते शासन प्रमाण

00:37:37:08 चैतन्य महाप्रभु को मत संप्रदाय में स्वीकार सभी ने किया उनके जो अनुप के लिए जन विशेषकर गोस्वामी नहीं देखिए मैं आपको लेटर यहां लगा दूंगा वो लेटर में प्राप्त है जिस लेटर में जो संप्रदाय उन्होंने बिलकुल स्टेटमेंट दिया है इस हमारे यहां से नहीं है उससे कनेक्ट नहीं उन्होंने एक और जारी किया है इसमें उन्होंने इस प्रशंसा की है इतने में तो हम करते हैं प्रपा जी की प्रशंसा अच्छा लगता है कहीं कहीं पे कुछ चीजें हैं ऐसी जैसे मंदिर में आया तो मंदिर में मुझे आपने बताया कि भयं स्त्रियों का योग नहीं होता तो इतनी तो कृपा की ना इसने समाज के स्त्रियों का है ना तो उतनी तो कृपा की अब यहां पे कम से कम से कम से कम से कम से कम से कम से कम भगवान मेरे साथ में कहने का तात्पर्य है कि जीव गोस्वामी जो हमारे बॉडी के तत्वचार्य कहलाते हैं जिन्होंने 4 लाख श्लोक लिखे हुए हैं इतने बड़े विद्वान है वो उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को मध्य संप्रदाय में स्वीकार किया है अब वो हमारे प्रमाण है। अब इस पर मैं विस्तार नहीं बात ये है कि अगर श्रीधर स्वामी वैष्णव थे और विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे तो आपको ये कहना चाहिए कि हमारा भागवत का जो ज्ञान है वो विष्णु स्वामी संप्रदाय का ज्ञान है। हमारा जो भागवत का ज्ञान है और जहां से आप मेंशन कर रहे हैं ना कहानी खिचड़ी सुनी अभी हमने उसी में व्यक्ति कह रहा है मायावादी का उसमें भागवत में तो आप अपनी भागवत में मायावादी को क्यों नहीं ले रहे माया हमारे जो भागवत है हमारे भागवत उनका जो सर नेम है तीर्थ हमारे भागवत में चार आचार्य हमारे भागवत सन्यासी का परमानंद चाहूंगा विषय है भागवत जो हमारी परंपरा है उसमें पांच से लिखा है क्योंकि मायावा नहीं मान रहे पांच आचार्यों के भाष्य उनके विचार लिए हैं श्रीधर स्वामी श्रीपाद वल्लभाचार्य श्री गोस्वामी श्री विश्वनाथ ठाकुर श्रीपादन गोस्वामी और माधवाचार्य जी इन आचार्यों के विचारों का समन्वय है भागवत की भाषा और जो मूल अनुवाद है वो पहले से चली आ रही है। श्रीधर स्वामी जी ने जो अनुवाद किया

00:38:52:12 है वो सात वैष्णव संप्रदाय में वही भाग उसमें एक बात और लिखी है चेतन चितम कि जो कोई भी श्रीधर स्वामी के विरुद्ध जा के तो अब ये बताइए कि आपके व्यक्ति कह रहे हैं कि श्रीधर स्वामी की भाषा में नहीं मायावा में आप प्रश्न को घुमाइए मत रखा है ना आपकी मर्जी मानते हैं कि नहीं मानते तो मायावादी वाली बात मानते तो मायावादी का चाहिए कि नहीं भाग नहीं हमारी भागवत नहीं लिया है भागवत आप जिसको आप जिसको प्रमाण मानते हैं वो लिखा है कि उनके भाई का है वो गीता गीता के समय तो मायावा उन्होंने कही गीता सो पहले क्या लिखा तो अभी तो राइट नाउ तो आप उसकी उनकी गीता को उनका ही मानेंगे ना मतलब जब मेरा जब तक ये नहीं प्राप्त है कि मैंने जो पहले कहा था गलत कहा था तब तक तो मेरी उस बात को मेरी बात मानेंगे ना मैं समझा नहीं जैसे मैंने कुछ कह दिया कि मेरा नाम शिवाय तो समझे नहीं मैं समझा तो रहा हूं मैंने कहा मेरा नाम शिवा नारायण द्विवेदी है 10 साल बाद मुझे पता लगा मेरे नाम में नारायण गलत है नारायण नहीं है तो मैं घोषित घोषित करूंगा ना शिवाने मैंने गलत कहा जब तक घोषित नहीं कहूंगा तब तक लोगों के लिए यही है ना शिवाज दवेदी अपना नाम बताया शिवा नारायण द्वेदी उसी प्रकार से क्या उन्होंने कहीं पे घोषित किया कि मैं अपनी भगवती जो भगवत गीता है वो गलत लिख रहा हूं मायावती है गलत नहीं लिखा मायावती से उन्होंने घोषित किया गलत मैंने वो लिखा गलत कर दिया वो तो सोच भी है ना तो अभी राइट नाउ तो प्रमाण माना जाएगा ना मैं मानूंगा आप समझे नहीं अभी आपने स्वीकार किया कि मैंने पहले कह दिया जब तक मैं घोषित करके उसका खंडन नहीं कि मैंने अपना नाम शिवाय देवी मैं कह रहा हूं कि जो मैंने आपको सिद्ध स्वामी जी के मेरी बात मानी ना कि मैं अगर अपना नाम है शिव समझ गया मैं यह कह रहा हूं कि सिद्ध स्वामी के विषय में जो मैंने आपको बना दिया मैं उसको सत्य मान रहा हूं तो उसमें ही लिखा है ना मायावती का थे सत्य मान रहा हूं उसमें आपको मानना है कि मैं आपने अपने को मायावती का चिन्हा में तो यहां पे गुरु हो गया अब वो आपकी मर्जी आप क्या सोच रहे हो

00:40:08:04 आपकी विचार है यहां पे आप छोड़ रहा हूं मैं यहां पे छोड़ रहा हूं मैं तो परंपरा में जो बोला है जो आचार्य बोला है मैं उसको मान सकता हूं बाकी आप क्या मान रहे हो क्या स्वीकार कर रहे हो क्या आप जो जो समाज में बताएंगे उसपे हम समाज में तो हम आप समाज में बता रहे हैं परंपरा से आ रहे हैं मगर जब आपको देखा जा रहा है तो आप तो परंपरा चिन्ह आप मानता हूं आपका विचार हो सकता है बट हमारे को जो आप कर रहे हो उसमें आप उत्तर नहीं दे रहा हूं ना मैं मानता हूं हम तो पहलेवादी थे वो मान रहेवादी थे तो इसलिए उसका प्रभाव में उन्होंने मायाव का सीखा ये कहां लिखा है विस्तार से लिखा है कि उस प्रभाव में आकर उन्होंने लिखा बाद में वो शोध का विषय है अभी मैं इतना मानता हूं ये सोच का विषय है कहां लिखा है इस बात का प्रमाण कहां है इस बात का प्रमाण विस्तार से देखना पड़ेगा कहां लिखा है वो शोध शोध का विषय तो ये जो व्यक्ति कह रहा है मेरी बात शोध का विषय नहीं है आपकी बात का विषय है आपकी बात भी शो शो शो शो शो शो शो शो शो शोध का विषय है मेरी बात भी सोच का विषय है क्योंकि आपकी बात से ही निकल के आ रहा है ना आपकी बात से तो निकल के आ रहा है तो बात ये वाली सोच का विषय है वो जो कह रहा है वो सत्य है कि नहीं हां वो सोच का विषय है दूसरी बात ये वाली बात रही है कि अगर वो विष्णु स्वामी संप्रदाय के भी थे तब भी विष्णु स्वामी संप्रदाय का ज्ञान क्यों नहीं माना जाएगा जब विष्णु स्वामी संप्रदाय मान सकते हैं विष्णु स्वामी समप्रदाय में मिक्स आपकी परंपरा में टिका है ठीक है सर ये आराश लिया है प्रपा ने अपने तात्पर्य में नहीं एक कोई कोट ले लेना पूरा ग्रंथ लेना पूरा विचना लेना उन्होंने उन्होंने कहा है मैं उनके कारण ही कृष्ण को जान पाया भाव को समझ पाया हूं तो पूरा पूरा तात्विक विचना ही उनसे महाप्रभु जो बात कह रहे है ना ये जगन्नाथ में कह रहे हैं उससे पहले वो कृष्ण को जान रहे थे उससे पहले वो कृष्ण की डूबे तो वही बता रहे है ना कि मैं जो है जान पाऊंगा अपना पुराना उसका जो भाव है ना पुराना नहीं पूरा उससे पहले तो श्रीधर स्वामी का जिक्र ही नहीं किया उन्होंने वो तो बलवाचार्य ऐसी बात बोल दी तब कहना पड़ा नहीं तो झूठ नहीं बोला बलवाचार्य बलराचार्य के अहंकार वो झूठ तो हुआ नहीं अंकल करने के लिए सत्य बोला झूठ बोल सत्य बोला क्योंकि आप पूव्ती आचार्य को क्रॉस नहीं कर सकते

00:41:23:08 ना अब मैं बोल मैंने अच्छा लिखा है तो मतलब ये तो बोलना हो गया ना मैं बोलूंगा जी के अनुपा जी आपकी परंपरा है ऐसे नहीं बोले ना वो तो उनकी परंपरा नहीं आचार्य थे ना नहीं उनकी परंपरा तो परंपरा है चेतन प्रभु की बलवाचार्य की बात चैतन प्रभु की बात उनके बारे में बात अभी क्या कहा कि अगर मैं कह दूं कि मैं प्रपा जी की टीका के विरुद्ध ले यही तो बलवाचार्य लिख गए थे ना उनके पास मैंने उनसे कैसे टीका लिखी है तो प्रपाद जी जो सीधा स्वामी जी हैं वो चैतन महाप्रभु की परंपरा के गुरु नहीं थे हमारी परंपरा के गुरु आप प्रपा जी के विरुद्ध नहीं जाओगे क्योंकि प्रपाद जी आपकी परंपरा के आचार्य प्रपा जी की नहीं मैं स्वामी दूंगा आप नहीं उनके दूंगा मैं कभी टीका ले रहे हैं कहां भैया नहीं उनके वो तो वैष्णव है वो तो भागवत के वो क्या कह रहे शंकराचार्य नहीं जा रहे हैं महा वैष्णव आप मानते हो अद्वैत है कौन अंतिम सत अद्वैत मानते हो शंकराचार्य वेदों में कहा गया मानते हो अद्वैत है अंतिम सत्य में मानते हैं मानते हो तो यहां पे ना विरोध नहीं कैसे हो गए तो क्या हुआ शंकराचार्य से बाहर हो गए तो इसका मतलब कि उनका अपमान कर रहे हैं या कह रहा हूं तो बात ये चल रही है जैसे शंकराचार्य शंकराचार्य के चाचा फिलॉसफी का खंडन कर रहे हैं ना स्वामी फिलोसफी खंड कर रहे हैं वो तो महान स्वामी स्वामी महान वैष्णव है तो उनकी परंपरा क्या थी। उनके गुरु का नाम क्या था? उनकी परंपरा उनके गुरु कौन थे? इसकी जानकारी मुझे नहीं है। लेकिन चैतन्य महाप्रभु के वो गुरु नहीं है। वो शिक्षा गुरु हैं। चैतन्य महा दीक्षा गुरु है। ईश्वर गुरु। अरे भैया आप ये बताइए भागवत को मानेंगे कि नहीं? भागवत को मानेंगे। भागवत में लिखा है परम गुरु वो है जो आपको तात्विक ज्ञान दे। अरे यार यार आप किसी भी गौ वैष्णव के पास जाओगे ना चलो आप मुझे मत। कई लोगों में कह देने से वहां सत्य नहीं होगी। आपको शास्त्री प्रमाण थोड़ी देर भागवत कई गौ वैष्णव चैतन्य महाप्रभु को हम ज्यादा जानते नहीं या और ज्यादा जानते हैं। चैतन्य महाप्रभु को गौ वैष्णव ज्यादा

00:42:38:09 जानने के लिए जानने। जो लोग चेतन महाप्रभु के प्रामाणिक गोस्वामी गोस्वामी नहीं जहां से चेतन महाप्रभु जिसको कह रहे हैं कि ये प्रमाणिक है उसके गोस्वामी के उनके सनातन शिक्षा चेतन प्रभु चैतन चिता को कैसे माना जाए प्रमाण अपने आचार्यों के मातांतर लिखी हुई बात को शास्त्र हमने तो नहीं हमारे चैतन्य चैतन्य भागवत इनको ही आप प्रमाण नहीं मान रहे हो की बात नहीं कर रहा हूं मैं देखो आपने कहा कि वैष्णव थे आपको अपने चैतन्य महाप्रभु की परंपरा कृष्ण भगवान पता है मगर जस्ट जिसकी आप भागवत पढ़ रहे हो किसी पढ़ सकते हैं बल्लार पढ़ सकते है हम लोग भैया जिसकी बात आप जिससे आप भगवान को जान रहे हो सभी से जान रहे भागवत ये बात कही बात की अद्भुत उन्होंने उन्होंने ये कही है कि मैं सभी से जान रहा हूं बाद में सब कुछ उन्होंने कही सभी से जान रहा हूं जो भी प्रमाणिक आचार्य है जो उन्होंने कहा कि मैं सभी से जान रहा हूं कि उन्होंने कहा की कृपा से मैं भगवान को जानता हूं मूल देख भागवत को तो उनसे जानेंगे वो सभी जानने सभी ने कहा है वो आपका विषय लेकिन मैं मानता हूं कि सिद्ध स्वामी जो चैतन्य को कह रहे हैं यानी कि आप सनातन सिद्धांत नहीं अपने सिद्धांत से चलते चैतन्य सनातन सिद्धांत चैतन्य महाप्रभु ने जो बोला है तो ऐसे ब्रह्मा बारी कहते ब्रह्मा जी आप चैतन्य महा को नहीं मानते वो आपका विषय हम मानते हैं तब तक वो जो परंपरा से वेद चले हम तो पूरा मानते हैं। आप तब तक तो याद कर सकते। क्यों मानते हो अच्छा उन्हें? क्योंकि वो वो भगवान कृष्ण की भक्ति का पैसा दिए। ऐसे बहुत से लोग हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं। उनको क्यों नहीं मानते? शंकराचार्य ने बुद्धों का खंडन करके सनातन धर्म की स्थापना की। उनको क्यों नहीं मानते? मानते हैं। मानते हैं मानते हैं भैया। क्या बात कर रहे हो? शंकर को अभी आप कह रहे हो मैं बात को नहीं मानता

00:43:53:10 हूं। आप मानते हैं आप बुद्ध को मानते मानते हैं। मानते भगवान को नहीं मानते। भगवान मानते हैं। उनकी शिक्षा को नहीं मानते। वही शंकराचार्य को तो मैं वही कह महाप्रभु की शिक्षा को मानते हैं। सारी शिक्षा को मानते हैं। तो आप अच्छे काम करने के नाते चैतन्य महाप्रभु की सारी शिक्षा को मानते हैं। तो अच्छे काम करने के इसलिए मानते हैं कि चैतन्य महाप्रभु की कोई शिक्षा मायावा नहीं है। इसलिए मानते हैं और स्वयं भगवान है इसलिए मानते हैं। अच्छा ठीक है। स्वयं भगवान स्वयं भगवान है। एक मिनट एक मिनट भगवान बुद्ध स्वयं भगवान है। आपने दो बातें कही क्योंकि वो स्वयं भगवान है और उनकी मायावा नहीं है। दो बातें हो गई। अब बात आती है कि इसको तो मैं ऐसे काट सकता हूं। भगवान है। तो भगवान होते हुए बुद्ध के रूप में उन्होंने वेदों का ही खंडन कर दिया। उनको मानेंगे। भगवान बुद्ध आए क्यों? इसका भी तो वर्णन शास्त्र में ना। लेकिन इसका मतलब उन्होंने सारे अवतार इसलिए आएंगे। मैं ये नहीं कह रहा। भगवान होने के नाते उनकी बात को नहीं मान सकता। मैं ये कह रहा हूं। भगवान होने के नाते उनकी बात को नहीं मान सकता। जब उनकी बात समझ तब तो चैतन्य महा सारी बातें जब कभी हम क्वेश्चन करेंगे कि यहां पे दिक्कत आ रही है मेरे से मैच नहीं हो रहा तो आपको मैच क्वेश्चन करना होगा कि चैतन्य कह रहा है इसीलिए मान रहे हैं फिर उनकी बात को मैच कराना होगा है ना पहली बात तो ये दूसरी बात हो गई मायावाद नहीं था चैतन्य में इसलिए मानते अभी बताइए मायावाद क्या है मायावाद का अर्थ होता है जो भगवान के विग्रह को भगवान के स्वरूप को भगवान के धाम को भौतिक मानता है मालिक मानता है किसी को मायावाद का है वैष्णव आचार्य अच्छा ये बताइए मतलब और शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि वो भगवान का भौतिक है ये है नहीं वो अब क्या कहते हैं ये बताइए तो वैष्णव आचार्य बोले आपके प्रपाद जी ने शंकराचार्य के बारे में कुछ बताया है कि नहीं उन्होंने ये बताया कि शंकराचार्य महान वैष्णव है भाई साहब आप घुमाते हो घुमाने की बात आप कह कह रहा हूं मैंने बता रहा हूं क्या उन्होंने शंकराचार्य को मायावादी कहा है कि नहीं कहा है मैं कह रहा हूं कि दोनों चीज कहा है ना दोनों कहा तो मायावादी कहा है कि नहीं कहा है अरे मायावादी को मायावादी कहा है मायावादी भी मायावादी भी है वैष्णवी मायावादी की शिक्षा को आप मानते हो नहीं मानते नहीं मानते तो माया तो मायावाद होता है क्या बोलता है वही तो बताया भगवान के शरीर को उनके

00:45:08:14 धाम को तो ये माना जाएगा ना ये शिक्षा शंकराचार्य देते हैं तो गलत है ना वही तो ये शिक्षा शंकराचार्य देते मानते हो ना शिक्षा गलत है बताओ अब आप ये बताओ क्या इसके द्वारा प्रभावित होने वाला ईश्वर सर्व शक्तिमान है अच्छा ठीक है तो ये बताइए यदि वो सर्वशक्तिमान है तो क्या वो अपने स्वरूप का नाश कर सकता है जो शरीर है शरीर शरीर की बात कर रहा हूं जो शरीर में भगवान आते हैं लीला करते उस शरीर का नाश कर सकते हैं भगवान भगवान तो घट पति से कुछ भी कर सकते हैं नाश कर सकते हैं नाश भी कर सकते यानी उनके उस शरीर के अलावा भी उनका कोई रूप है हां भागवत में कहा गया है भगवान के तीन स्वरूप है निर्गुण निराकार ब्रह्म अंतिम स्वरूप ये नहीं है गीता के 12 अध्याय क्या पढ़ो भगवान बोलते हैं सगुण साकार के कारण श्रेष्ठ है मेरा सर्व रूप श्रेष्ठ है सब भगवान खुद बोल रहे हैं निर्गुण निराकार स्वरूप मैं आपसे क्या पूछ रहा हूं कि क्या वो जो भगवान का स्वरूप रूप भगवान के निर्गुण निराकार स्वरूप को मानना ये गलत नहीं है। भगवान के सगुण साकार स्वरूप को माइक कहना ये गलत है। ये किसी ने शास्त्र में नहीं बोला है। माया माइक होने का अर्थ क्या होता है? माइक होने का अर्थ हमारी तरह है। भौतिक तो कहां पे कहा उन्होंने भौतिक ये वैष्णवाचार्य बोल रहे हैं मैं नहीं बोल रहा ठीक है तो माइक होने के कारण आपने बताया कि बहुत ही मतलब जैसे कुल मिला करके वो माया नहीं है वो वो शाश्वत आप कह रहे हो ना हो सकता है ना आप कह रहे हो मैं कह रहा हूं अभी अभी आपने कहा मैं दोबारा पूछ रहा हूं क्या जो भगवान श्री कृष्ण है वो अपने शरीर का नाश कर सकते है नाश नहीं कर सकते वो अपने शरीर को कई रूप में प्रकट कर सकते हैं अंतरदान कर सकते है ना ही कर सकते है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि बस रूप शाश्वत नहीं है ऐसा नहीं नहीं तो नाश भी कर सकते हो नष्ट भगवान का स्वरूप आश्र तो नष्ट नहीं हुआ तो मतलब नहीं कर सकते ना अब ये तो आप ये तो आप निर्णय लो बात तो आपने बुलाया कि मुझे निर्णय लेना चाहिए मैं कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका शास्त्र आधार हो तो शास्त्र आधार शास्त्र आधार है ना स्कंध में लिखा है ये भागवत का एक मात्र उद्देश्य है ब्रह्म की एकता जी ब्रह्म के क्या है वैष्णव ने क्या माना है भगवान

00:46:23:18 देखिए शास्त्र आधार बता दिया आपने आचार्यों का आधार भाष्य कहते हैं आपने शास्त्र कहा आप कहेंगे जब आप शंकराचार्य का मान सकते हो तो क्या वैष्णवाचार्य भाषा को मान मैं ईश्वर को शक्तिमान से सिद्ध करने के लिए मान रहा हूं ना उनके द्वारा किनके द्वारा शक्तिमान है भगवान वैष्णचार्य बोल रहे हैं नहीं शक्तिमान है तो ऐसे तो शक्तिमान अवतार नहीं ले सकता है हमारे वैष्णचार ऐसे ही यहां पे एक जगह आप बात करोगे अपने स्वर कोनाश नहीं ये प्रश्न जो है शास्त्र पे आधारित नहीं है इसलिए इसका उत्तर मैं नहीं दे सकता हूं क्योंकि इसको मैं बोलूंगा तो फिर उसमें हमारा जवाब होगा ये कहां लिखा है कि शास्त्र पे आधारित जवाब दिया हमारे शास्त्र कहते हैं वहां लिखा है शास्त्र में जितने प्रश्न है वो कि नहीं है ये कहां लिखा शास्त्र पे आधारित प्रश्न का जवाब दिया जाएगा। अगर दिया जाएगा तो इसका मतलब उसके पास नास्तिकता का खंडन ही नहीं क्योंकि नास्तिक शास्त्र के बाहर तो उसका जवाब तो दिया जाएगा। तो नास्तिकता का खंडन कौन करेगा? नास्तिकता का खंडन जो कर सकते हैं करेंगे। लेकिन मेरा तो ईश्वर कैसे सिद्ध होता है? प्रपा जी के ईश्वर कैसे सिद्ध होता? यानी कि कुल मिला के आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं कर सकते। बस स्टैट दे सकते हो कि हां ईश्वर हमारा सर्वक्तिमान ईश्वर सर्वशक्तिमान क्यों नहीं है? वो अपने शरीर का नाश कर सकते हैं। बिलकुल कर सकते हैं। क्यों कह रहे हो शाश्वत नाश आपको मानना पड़ेगा कि वो लीला रूप में आते हैं। अपना शरीर प्रकट करते हैं और उसी लीला को खत्म नहीं कर सकते। और हमारे लिए मैं ऐसा नहीं बोलना चाहता था कि आप कैसे मायावत लोग उसमें? क्योंकि माया को आपको मानना पड़ेगा। नहीं मान सकते ना कैसे मानेंगे आप सत्य मान सकते हैं बोले सर ऐसा भगवान शंकराचार्य को नाश्त करने का मतलब यह नहीं है कि हमारे साथ ना हो जाएगा फिर ऐसा नहीं समझदार जो भी हो आप शंकराचार्य के बाहर जाकर के ना तो नास्तिकता हरा पाएंगे ना आप विषय को चेंज कर रहे हो आप तो आप मेरे को नहीं मानता मायावाद को अगर मैं मायावाद का खंडन करने यहां नहीं बैठा हूं माया का खंडन अच्छा खंडन क्या होता है खंडन का अर्थ होता है मैंने किसी बात के लिए मना कर दिया वो चुप हो आप मायावाद का चर्चा मत करो आप ही तो लाए हो नहीं मैं कहां लाया हूं आप लाए मायावा सीधा स्वामी से बात आई थी स्वामी जी को मैं वैष्णवा मानता

00:47:38:19 हूं आचार्य वैष्णवा जहां से आपने वैष्णव माना उसी को कह रहा हूं वो मायावासी नहीं वो बोल रहा है तो मैं मानता हूं उस बात को कौन बोल रहे हैं जो हमारे आचार्य तो फिर आपके ज्ञान नहीं क्यों मायावासी स्वामी जो भागवत लिख रहे हैं उसमें मायावाद नहीं उसमें भी है उसमें भी है पढ़ी है आपने उनकी भाषा है हम उसमें भी है आपकी जो आपकी जो भागवतम है उसमें चौथे स्कंध में लिखा हुआ है कि जो है जहां पर मायावा नहीं है वो आपने समझ लिया माया वो मायावा नहीं है चौथे स्कंध में है सीधा स्वामी लिख रहे हैं कि भगवान जो शिव है वो परब्रह्म है और यहां पर जो प्रभुपाद जी लिख रहे हैं वो ब्रह्म नहीं है वही उसी जगह पे हर वैष्ण अलग भाव दिया नहीं ये आरोप वल्लभाचार्य लगाओ ये आरोप किसी और गलत होने से आपका सही होने से नहीं होता अपने आरोप लगाओ वल्लभाचार्य है और अगर अगर वो शंकराचार्य को उड़ाएंगे आ गई मैं इस इस बात को उसी श्लोक पर और आचरण में अलग भाव दिया वो यह नहीं कह रहे कि हमने जो भागवत पढ़ी है सीधा स्वामी से पढ़िए आप कह रहे हैं हम भी नहीं कह रहे आप कह रहे चैतन कह रहे हैं चैतन कहावत इसका मतलब उनहीं से पढ़ा हुआ पढ़ा हुआ आपने तो कहा कि सुनी रिकॉर्ड में आपने कहा उस समय ध्यान नहीं दे पाया इसका प्रमाण आपने सीरियस हो कहा था उसका भाष्य था उस समय उस समय किसका भाष्य था ये प्रमाण यानी कि आपके यहां पे प्रामाणिक शिक्षा नहीं है ऐसा नहीं ऐसा बहुत लंबी चर्चा हो गई गरम हो गया अच्छी चर्चा हुई लंबी ठीक है फिर आप लोग और आप मुझे प्रमाण देंगे कि प्रपा जी ने जो है शिव जी को मुक्ति दाता माना है उस संबंध में और हमारी हो सकता है अब तो वो चैतन्य को लेकर चर्चा हो चुकी है आप लोग बताइएगा कि वर्णश्रम पे आपको हमारी चर्चा देखने के लिए नहीं हो सकता हम लोग कभी आए तो वर्णाश्रम पे हमारी चर्चा हो कभी वर्णश्रम पर तो मैं कोई चर्चा नहीं करना चाहूंगा

00:48:54:00 क्योंकि वो विषय बहुत बड़ा भास वाला है भास नहीं वो क्या कहते हैं बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड विषय कॉम्प्लिकेटेड विषय है क्योंकि हमारे आचार्यों ने जो बोला है हम तो उसको मानते हैं और जहां तक बारिश हुई क्या चलिए ठीक है बहुत बढ़िया लगा बहुत अच्छा एक्सपीरियंस रहा आपके साथ बात करने का और मैं एक बात कहूंगा कि प्रभु जी अपना ध्यान कहीं नहीं पूजा चर्चा में हम सस्टेंड उसमें रहे हैं ये एक शिष्टाचार होता है एक मर्यादा होती है हम लोग संवाद कर रहे हैं विवाद कर रहे हैं यहां पे पहले के जमाने में ये साथ-साथ होता था और एक जज होता था तो फिर वो बाद में मिलते थे तू तड़ा गाली तो आप सभी बताइएगा तो आप सभी बताइएगा ये चर्चा आपको कैसी लगी और आप किस विषय पर हमारी चर्चा पुनः देखना चाहते हैं और मैं आपसे निवेदन करूंगा ये जो कन्वर्सेशन हमारा हुआ है इसको एज इट इज बिना एडिट किए बिना काटे इसको आप अपलोड करिएगा बिना काटे बिना बिना काटे इसको मैं चाहता हूं अगर करना चाहो तो पूरा अगर बिना काटे करना आप चलिए ये मेरा निवेदन है ठीक है आप सभी को जय श्री राम जय श्री हरे कृष्णा जय श्री राम

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 49:33 · 17 Jan 2026

क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ?

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A · Video इस्कॉन ऐसा क्यों कर रहा है? Discussion with brahmachari Lakshmi Narasi...
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