Used:
SRT: ⬇ SRT ⬇ Original file

.srt or .vtt (Hindi). The old file is backed up. After that the match for this video is rebuilt (may take a few minutes, keep the page open).

⬜ Not used yet · 00:00:00:04 – 00:00:12:09 (0:12)

00:00:00:04 फाइनली इस जाइन किया। एक रूप में शिव जी वैष्णव हैं। शिव की कृपा से यहां के जो जीव हैं कई मुक्त हो गए। [संगीत] वैष्णव व्यक्ति भगवान विष्णु की भक्ति

✅ This part is already used · 00:00:12:09 – 00:00:18:07 (0:06)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 32:46 ↗

00:00:12:09 हमारे यहां ऐसा मैंने सुना नहीं अभी तक ऐसा नहीं जो आपके यहां के प्रामाणिक लोग हैं जो अगर जो कह रहे

⬜ Not used yet · 00:00:18:07 – 00:07:28:02 (7:10)

00:00:18:07 हैं मैं तो आचार्य नहीं हूं ना पर इस पर मैं जो हमारे वैष्णव ने जो हमको बताया है आचार्य ने अपने की अपनीपनी टीका है भागवत लोगों के लिए यही है ना कि शिवाज द्विवेदी ने अपना नाम बताया शिवाजी नारायण द्विवेदी [संगीत] भगवान बुद्ध आए क्यों बोल रहे हैं तो मैं मानता हूं इस बात को सभी को जय श्री राम। इस समय हम बैठे हैं ईस्ट ऑफ कैलाश इस मंदिर में और हमारे साथ यहां के एक ब्रह्मचारी जी हैं। अ इस को लेकर के आज तक कई सारे वाद विवाद आपने हमारे चैनल पर देखे होंगे और कई सारे प्रश्न हैं जो इस द्वारा प्रचारित की जाने वाली शिक्षाओं पर जाते हैं। तो उन्हीं सब शिक्षाओं के बीच में मेरे पास एक बार एक महानुभाव है। इनका कॉल आया। उन्होंने कहा कि कई बातें ऐसी हैं जो कुछ लोगों के द्वारा बदल करके प्रचारित की जा रही है प्रभुपाद जी के ही नाम से अथवा इस के ही नाम से। तो आप उन बातों को मैं आपको बताना चाहता हूं कि वो कौन सी बातें हैं और वो बात भी आप अपने चैनल से बताइए लोगों को जिससे कि लोगों में भ्रम दूर हो। शिव और विष्णु की जो लड़ाई चल रही है उसको लेकर के चीजें

00:01:35:08 लोग समझ पाए कि वास्तविकता क्या है। तो आज हम इनके पास पहुंचे हैं इनके कहने पर तो प्रभु जी आप सबसे पहले थोड़ा सा परिचय दे दीजिए हमारे दर्शकों मैं आपको एक बात बता दूं कि आज हम कुछ पर्टिकुलर विषयों पर ही बात करने वाले हैं और कुछ विषयों पर हम आने वाले समय में बात करेंगे। जैसे कि चैतन महाप्रभु जी की परंपरा को लेकर के जो बात है और और भी जो दार्शनिक पक्ष हो सकते हैं इस को के वो बातें हम फिर किसी दूसरे अंश में करेंगे मगर फिलहाल आज हम कुछ सीमित विषयों पर बात करने वाले हैं तो प्रभु जी सर्वप्रथम आप थोड़ा सा परिचय दे दीजिए अपना हरे कृष्णा जय श्री राम आवाहन चैनल वालों को मेरी तरफ से जय श्री राम तो मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे ब्राह्मण हमारे समक्ष से आए हैं और शास्त्रों में कहा गया नमो ब्राह्मण देवाय कि ब्राह्मण तो भगवान को बहुत प्रिय है और मेरा परिचय यह है कि मेरा नाम है लक्ष्मी नरसिंह दास। मैं पिछले 13 सालों से इस नई दिल्ली में स्टॉप कैलाश इस मंदिर में सेवा कर रहा हूं। प्रचार कर रहा हूं और भगवान का भजन कर रहा हूं।

00:02:50:28 तो आप आए यहां पर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आपका बहुत-बहुत स्वागत है। नहीं नहीं आपने आमंत्रित किया तभी हम पहुंच पाए हैं और एक अच्छे व्यक्ति के रूप में मेरे मन में आपकी एक छवि बन गई क्योंकि आपने ऐसी बातें कुछ मुझे बताई जो मैं भी चकित रह गया कि आज तक इस कौन का ये पक्ष तो हमें पता ही नहीं था भाई। इस कौन ऐसी बातें भी कह रहा है। तो सबसे पहली बात हम लोग अगर शुरू करेंगे थोड़ा सा मैं यह पूछ रहा था कि आपने अपना आध्यात्मिक जीवन में आने के बाद का नाम बताया थोड़ा सा पूर्व का नाम क्या था? कहां से बिलोंग? थोड़ा सा परिचय दे सकते हैं। मेरा जन्म हुआ था उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में हम और मेरे पिताजी जो हैं इंडियन आर्मी में थे और मैं क्षैत्रिय परिवार में मेरा जन्म हुआ है। अच्छा और मेरा नाम है पूर्व आश्रम का नाम है लक्ष्मण रावल। लक्ष्मण रावल। अह हम लोग क्षत्रिय हैं। वर्णाश्रम धर्म के दृष्टि से देखा जाए और मेरे पिताजी क्षत्रिय धर्म निभाते हुए आर्मी में रहे हैं। अभी रिटायर हो चुके हैं। वो भी आ इस्कॉन

00:04:06:04 से काफी पहले से जुड़े हुए हैं। तो वो जुड़े थे। फिर हम भी बचपन से इस से जुड़ने का सौभाग्य मिला। हम्। 93 में मेरा जन्म हुआ। और फिर 2013 में मैं दिल्ली आ गया। इस मंदिर ज्वाइन किया और मन में यह भाव आया कि अब पूरी तरह भगवान के भजन में निमग्न रहना है। जैसे प्रहलाद महाराज जी कहते हैं दुर्लभम मानुषम जन्म ये मनुष्य जीवन बड़ा दुर्लभ है। क्षणभंगुर है। कोमारम आश्रित प्रज्ञ प्रहलाद महाराज जी का यही उपदेश है कि पांच वर्ष की उम्र से भगवान का भजन किया जाए। तो प्रह्लाद महाराज जी के इन उपदेशों को भगवत गीता के उपदेशों से प्रभावित होकर मुझे भी कृष्ण भक्ति करने का एक उत्साह आया मन में। यद्यपि उत्तराखंड जो है देवभूमि है। वहां देवताओं का बड़ा बोलबाला है। बलि प्रथा बहुत है उत्तराखंड में और वहां भगवत गीता भगवान कृष्ण के संदेश के विषय में लोग नहीं जानते हैं। बचपन में जब मैंने भगवत गीता पढ़ी

00:05:21:10 तो भगवत गीता का वह श्लोक मुझे बहुत मेरे मन को भाया। जिसमें भगवान कहते हैं याती देवता देवान पित्त पितृता भूतान याती भूतजाज्या याती मध्य जिनोपिमा भगवान इस श्लोक में बता रहे हैं कि जो देवताओं की पूजा करते हैं वह देवताओं के पास जाते हैं। जो पितरों की पूजा करते हैं वो पितरों के पास जाते हैं। जो भूतों की पूजा करते हैं उन्हीं के पास जाते हैं और या मध्या जिनोपमा और जो मेरा भजन करते हैं वह मेरे धाम को आते हैं। तो उत्तराखंड में देवताओं का बोलबाला था तो मुझे बड़ा प्रभावित किया कि भगवान यहां पर उपासना पद्धति का इतना भेद कर रहे हैं कि देवताओं के उपासक स्वर्ग लोक जाएंगे। पितरों के उपासक पितरलोक जाएंगे और मेरे उपासक मेरे धाम को आएंगे। स्पष्ट भगवान ने कहा गीता में। फिर गीता का दूसरा श्लोक मुझे और भाया। वो क्या था? मन मना भव मद भक्तो मध्याजीमाम नमरु कि मेरे भक्त बनो मुझे नमस्कार करो मेरी पूजा करो गीता के इस संदेश से फिर मैं बचपन से कृष्ण भक्ति भगवान के नामों का जप ये सब करना प्रारंभ किया और कॉलेज में जब जॉइ हुआ तो

00:06:36:16 फिर संसार के प्रति तीव्र वैराग्य हुआ कि यह मृत्यु कभी भी आ सकती है। जातस्य ही ध्रुव मृत्यु भगवान कहते हैं गीता में कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है। तो बार-बार यह मन में बार-बार यह मेरे मन में आता था कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। तो इसलिए मैंने सोचा क्यों ना मैं हर समय भगवान का भजन में लगूं। नाम जप करूं। क्योंकि भगवान गीता में कहते हैं अंतकाले च मामेव स्मरण मुक्त कलेवरम। अंत समय में भगवान का नाम ही काम आएगा। तो उसी के अभ्यास के लिए फिर मैं फाइनली इस जाइन किया श्री प्रभुपाद जी के ग्रंथों को पढ़कर अपने गौ वैष्णव आचार्यों के ग्रंथों को पढ़कर हम तो यही छोटा सा परिचय है मेरा नहीं बहुत अच्छा लगा बस इसमें से ही हमारा जो पहला विषय है वो निकल के बाहर आ गया जैसे आपने

✅ This part is already used · 00:07:28:02 – 00:25:04:07 (17:36)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 2:04 ↗

00:07:28:02 कहा कि देवताओं में की जो पूजा करते हैं तो एक बात देखने में आती है कि शिव जी को भी देवता माना गया है। है ना? हम् अह अह क्या कहते हैं शिव जी की जो तो वहां पर कहा गया एक तरीके से इसको भी मना किया जाता है कि शिव जी के नाम को जो है कृष्ण के नाम के समान समझने वाले मूर्ख हैं और ऐसा करना अपराध बताया गया है। तो सबसे पहली बात तो यह है कि इस शिव जी को भगवान के रूप में स्वीकार नहीं करता जबकि हमारे शास्त्र करते हैं। और यदि यह कहा जाए कि कहीं-कहीं पर देवता कहा गया है तो कहीं-कहीं पर तो सभी को देवता कहा गया है। है ना? परंतु उन्हीं शास्त्रों में जिनमें इनको देवता कहा गया है वो कार्य कारण के भेद से कहा गया है। है ना? कारण के रूप में वो कारण ब्रह्म है और कार्य करने वाले के रूप में वो देवता है कि फलाना डिपार्टमेंट में वो दिखाई दे रहे हैं किसी एक में। तो इस बारे में इस का क्या पक्ष है? क्या इस मानता है कि शिव की पूजा करने पर भी कृष्ण जैसा जैसा कृष्ण का परमधाम प्राप्त हो रहा है वैसा ही परमधाम प्राप्त हो जाएगा अथवा नहीं आपका बहुत अच्छा प्रश्न है जी

00:08:43:03 शिव जी के विषय में शिव जी के विषय में हमारे शास्त्रों ने हमारे वैष्णव आचार्यों ने गौ वैष्णव आचार्यों ने शीला प्रभुपाद ने बहुत विस्तार से बताया आया है। हम दो पक्ष हैं। एक रूप में शिव जी वैष्णव हैं। एक रूप में शिव जी परम भगवान है। हमारे शास्त्रों में युगल जोड़ी उपासना का विधान है। कोई चाहे तो राधा कृष्ण की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो सीता राम की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो लक्ष्मी नारायण की उपासना कर सकता है। कोई चाहे तो शिव पार्वती की उपासना कर सकता है। तो यह युगल जोड़ी की उपासना शास्त्रों में दिया गया है। तो जो वैष्णव आचार्य हैं या जो वैष्णव परंपरा है उन वैष्णव परंपरा में अनन्यता रखते हुए एक निष्ठता रखते हुए जी या तो राधा कृष्ण की उपासना की जाती है। जो राधा कृष्ण के उपासक हैं। जो सीताराम के उपासक हैं वो सीताराम की उपासना करते हैं। जैसे तुलसीदास जी महान भक्त हुए भगवान राम के उन्होंने भी राम से मानस में और दोहावली इत्यादि ग्रंथों में शिव जी को गुरु

00:09:58:09 रूप में ही स्वीकार किया है और उनसे भगवान राम की भक्ति को ही मांगा है। तो वैष्णव आचार्यों ने शिव जी को गुरु रूप में वैष्णव रूप में देखा है और अगर कोई उनको भगवान के रूप में देख रहा है। कोई भगवान के रूप में उनकी उपासना कर रहा है। सदा शिव रूप में तो यह बिल्कुल शास्त्रीय आधार है। शास्त्र के अनुसार है। और वैष्णवों के अनुसार शिव जी भगवान भी हैं। एक रूप में और दूसरे रूप में वह वैष्णव भी है। जैसे भागवत इत्यादि में कहा गया कि वैष्णवा नाम यथाशंभू शास्त्रों में ऐसे वचन भी हैं और दूसरे वचन भी है कि शिव जी स्वयं भगवान हैं। तो दोनों विचार ठीक है और जो वैष्णव की बात है क्योंकि वो अनन्यता रखने के लिए वो शिव जी से गुरु भाव में वैष्णव भाव में क्या करते हैं? अह आशीर्वाद लेते हैं। जैसे हम लोग अह हमारे संप्रदाय के एक महान आचार्य हुए हैं। सनातन गोस्वामी जी। उन्होंने शिव जी को गुरु रूप में माना है। श्री धाम वृंदावन में गोवर्धन के तट पर चकलेश्वर महादेव के पास रहकर वो हरि नाम लेते थे। जी तो उनको वहां मच्छर काटने लगे। तो उस स्थान को छोड़कर वो कहीं और जाने लगे। तो रात्रि में शिव जी उनके सपने में प्रकट हुए।

00:11:13:20 बोले सनातन तुम इस स्थान को छोड़कर मत जाओ। जी मैं तुम्हारा संग चाहता हूं। कल से तुम्हें यहां मच्छर नहीं लगेंगे। तो शिव जी के साथ ऐसा संबंध रहा है हमारे वैष्णव आचार्यों का उन्होंने वैष्णव रूप में देखा है। और जो वैष्णव नहीं है वो अगर साक्षात भगवान के रूप में उनकी उपासना कर रहे हैं। वो निश्चित रूप से मुक्त होंगे। जैसा कि सनातन गोस्वामी जी ही ब्रद भागवतामृति में कह रहे हैं कि कृष्णा विचस भेदक्षा महा दोषकारी मता आगो भगवता स्वामिन क्षमतेन शिव कृतम भगवान श्री कृष्ण से श्री शिव को प्रथक देखना भी महा दोष है ऐसा बोल रहे हैं सनातन गोस्वामी जी वृद भागवतामृत में और जहां तक कई लोग कहते हैं कि शिव की भक्ति करने से मुक्त नहीं होंगे उनके लिए भी सनातन गोस्वामी जी ब्रद भागवतामृति में कह रहे हैं अहो सर्वो अपीते मुक्त शिव लोक निवासिन मुक्तस कृपया कृष्ण भक्तस कति नाभवन श्रीपाद सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि जो शिवलोक में वास करते हैं वे सभी मुक्त हैं। शिव की कृपा से न जाने कितने जीव मुक्त हो गए और कितनों को कृष्ण भक्ति

00:12:28:24 प्राप्त हो गई। ऐसा सनातन गोस्वामी जी वर्णन कर रहे हैं। तो शिव जी कौन है? अह भगवान भी हैं सदा शिविव रूप में और वैष्णव भी हैं। क्योंकि शिव जी अपने एक स्वरूप में वैष्णव जैसे हनुमान जी हैं वो भक्त रूप में हैं। तो भगवान की उपासना सिखाते हैं। जी तो शिव जी क्या है? महाजन है। 12 महाजनों में शिव जी का नाम भी आता है। शंभू नारद शंभ शंभू कुमारो कपिलो मनु प्रहलादो जनको भीष्मो बलि वया सखिर वयं जो बार महाजन है उसमें शिव जी भी हैं। शिव जी ने भी एक परंपरा शुरू की है। और किसकी परंपरा शुरू की? भगवान राम की भक्ति की। भगवान कृष्ण की भक्ति की। इसीलिए तो तुलसीदास जी कहते हैं कि महामंत्र जे जपत महेशु काशी मुक्ति हेतु उपदेशु तो राम का नाम शिव जी लेते हैं जी तो इसीलिए इसमें कोई संशय नहीं है। अगर कोई शिव पार्वती की उपासना करता है वो शिवलोक जाएगा और मुक्त होगा। परव्यम बिरजा नदी के उस पार है शिवलोक जहां से कभी उसको लौट के नहीं आना पड़ेगा। मतलब शिवलोक भी परमधाम है। परमधाम है। बिल्कुल परमधाम है। जो आपने अभी यहां पे वर्ष कोट किया है ना गोस्वामी

00:13:44:04 जी का तो उसमें क्या है कि जो इस वाले लोग हैं कई ऐसे दुष्प्रचारक भी मैं कहूंगा आप सज्जन हैं जो आप साफ-साफ बात बता रहे हैं कि नहीं भाई जो क्या कहते हैं कि शिव की भक्ति से भी मुक्ति प्राप्त होगी। उसके सनातन गोस्वामी सनातन गोस्वामी जी का आप कोट कर रहे हैं। मगर वो इसका अर्थ यह लेते हैं कि भाई वहां जाकर जैसे आपने जो पढ़ा है ना कि मुक्त वहां से वो मुक्त होने के लिए वहां जाएंगे। तो वो लोग परमधाम ना मान करके जैसे इसमें भी आया है ना कि वो लोग वहां नहीं जाएंगे। नहीं इसमें ऐसा नहीं आया है। इसमें कहा कि शिव लोक में वास करते हैं वो सभी मुक्त हैं। क्यों? आगे क्या लिखा है? शिव की कृपा से यहां के जो जीव हैं, कई मुक्त हो गए। कईयू को कृष्ण भक्ति मिल गई। ऐसा मतलब कृष्ण भक्ति यहां के अगली स्टेज है ना नहीं यहां के लोगों को वहां तो मुक्त है शिव लोक में जो शिव जी के अनन्य भक्त हैं वो शिव शिव धाम में वहां पे दो बातें हो रही है एक वो कह रहे हैं वो शिव धाम में मुक्त है क्यों है तो वहां आशय ये नहीं मुझे लग रहा है शायद आप इसको समझ नहीं पाए होंगे मैं एक बार मैं एक प्रश्न पूछ लूं क्योंकि वहां पर वो ये कहते हैं कह रहे हैं जो मैंने सुना कि वो शिव धाम में है वो भी मुक्त है क्योंकि शिव की कृपा से कई लोगों को कृष्ण भक्ति प्राप्त हुई है वो इस संसार की बात हो रही है वहां की बात नहीं हो रही है। इस संसार में जीव है जो शिव जी

00:14:59:08 से कृष्ण भक्ति मांग रहे हैं। तो इस की किसी बुक में जैसे कि परमधाम माना गया है इस गोलोक को श्री कृष्ण को ऐसे शिवलोक को परमधाम माना गया है। जहां से वो वापस नहीं आएंगे। बिल्कुल माना गया है। हमारे हमारे जो इस में एक गोलोक चार्ट आपको मिलेगा जिसमें पूरा सिद्धांत समझाया गौ वैष्णव परंपरा का इस से पब्लिश है वो भक्ति वेदांत बुक ट्रस्ट से उसमें विजा नदी के उस पार परब्यम में शिवलोक को दिखाया है यानी इस में वो चार्ट मिलता है चार्ट मिलेगा आपको तो उसमें क्या लिखा गया है परबम यानी वो शिव धाम जो है बैकुंठ में है वीरजा नदी को से नीचे है बराबर में है या केवल इतना है कि अभी भी गोलोक बाकी है। ऐसा तो नहीं है। उसमें हमारे शास्त्रों में तो ये क्रम है। पहले बिरजा नदी के उस पार नहीं नहीं गोलोक अभी भी बाकी है या नहीं बाकी है? बाकी है। गोलोक है। वैकुंठ है। मथुरा द्वार भेद नहीं है। उपासना का भेद है केवल लक्ष्य का भेद है। चलिए ठीक है। तो वो बैकुंठ है। इसमें एक एक बात तो ये हम समझ गए कि आप कहना नहीं चाह रहे हो। मगर थोड़ा सा है। अभी बिल्कुल भेद नहीं है। नहीं तो और शिवलोक में गोलोक बाकी है कि नहीं? नहीं गोलोक बाकी मैं समझा नहीं शिवलोक पहुंचने के बाद भी गोलोक बाकी है कि नहीं यह प्रश्न करो

00:16:14:09 ना आप जो शिवलोक जा रहा है जो शिव जी का भक्त है वो गोलोक क्यों जाएगा वो तो शिव जी का भक्त है ना वो वही रहेगा तो शिव की कृपा से फिर जो शिव की भक्ति करेगा उनकी कृपा से फिर भक्ति शिव कृष्ण की क्यों प्राप्त होगी वो तो उनकी भक्ति रहेगी नहीं होगी ना कौन बोल रहा है ऐसा आप ही तो ये ये कह रहे हैं कि अगर कोई शिव जी से प्रार्थना करे कि मुझे कृष्ण की भक्ति दे दो तब शिव जी उनको कृष्ण की भक्ति दे देते हैं। ये कह रहे हैं। यह नहीं कह रहे हैं कि शिव जी मतलब कि शिव जी को प्राप्त कर लेने पर मुक्ति है। हां जी मुक्ति है। उसमें फिर और अगली कोई स्टेज स्टेज नहीं है। चलो ये बात बहुत अच्छी लगी। आपने बताई किसके लिए जो शिव जी के अनन्य भक्त हैं उनके लिए शिव जी के जो अनन्य भक्तों के लिए आगे जाने की आवश्यकता नहीं है। नहीं है। हां। जैसे राम के अनन्य भक्त हैं वो अयोध्या ही जाएंगे। स्वाभाविक बात है जो कृष्ण के साकेत अयोध्या एक ही है और जो कृष्ण के उपासक है वो ब्रज में जाएंगे वृंदावन गोलोक तो स्वाभाविक है जो जिसका भक्त होगा वो उसी धाम में जाएगा उसके लिए वो सर्वस्व है तो शिव जी की भक्ति करने पर भी मुक्ति है मुक्ति है निश्चित है तो इस के जो भक्त है जो आजकल कार्य काफी सोशल मीडिया इत्यादि पर जो फेमस हो रहे हैं और वो लोग कहते हैं कि नहीं शिव जी की भक्ति करने पर आपको मुक्ति उनका ज्ञान अधूरा हो सकता है उनको जरूरत है कि शास्त्रों को पढ़े अच्छा

00:17:29:18 और हमारे जो सनातन गोस्वामी जी हैं हम या जो गौ वैष्णव हैं हम या जो मूल ग्रंथ है उनको पढ़ने की आवश्यकता है। अच्छा एक चीज़ और आपने कही है कि शिवजी अह को जो है जो भेद वाली बात है ना कि भेद करता है वह गलत है। शिव और विष्णु है। मगर बात वहां पे ये लिखी है कि ना एक मानो इनको ना अलग मानो ना अलग मानो। तो आपने आधी बात बोली है तो एक मानना है या अलग मानना है। मतलब बहुत अच्छा प्रश्न किया। श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर हमारे एक महान आचार्य हुए हैं जिन्होंने श्रीमद् भागवतम पर सार्थ दर्शनी टीका लिखा हुआ है। बहुत भगवत गीता पे भी लिखा है। भगवत गीता पर सार्थ वर्ष टीका लिखा हुआ है। तो ऐसे विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी ने एक ग्रंथ लिखा है माधुर्य कादंबरी। हम्म। उस ग्रंथ में इस प्रश्न का वो उत्तर दे रहे हैं कि शिव ब्रह्मा शिव को और विष्णु को एक माने तब भी अपराध हो रहा है। अलग माने तब भी अपराध हो रहा है। तो क्या माने? हम ये प्रश्न उठाया उन्होंने। वहां पर ये प्रश्न किया गया कि शिव ब्रह्मा को भगवान विष्णु से अलग मानना ये भी अपराध है। तत्व की दृष्टि से एक मानो। व्यवहार रसगत नहीं नहीं मैं इसको पूरा करना चाहता हूं।

00:18:44:19 जी इस प्रश्न को जैसा उन्होंने समझाया है। शिव ब्रह्मा को भगवान विष्णु के समान मानना यह अपराध अलग मानना तब तब भी अपराध तो माने क्या अब विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उत्तर देते हैं कि किसी किसी कल्प में ब्रह्मा जी की पोस्ट पर जीव बैठता है। कोई पुण्यवान जीव जिनको वैराज ब्रह्मा कहते हैं। और किसी किसी महाकल्पों में ब्रह्मा जी की पोस्ट पर स्वयं भगवान बैठते हैं। जिनको हिरण्यकर्भ ब्रह्मा कहते हैं। हम जब ब्रह्मा और शिव के पोस्ट पर स्वयं भगवान विराजमान है। उनको अलग समझना वो अपराध है। जब इनके पदों पर कोई जीव बैठा पुण्य कर्म के बल पर शास्त्रों में आपको पता होगा ऐसे विधान है जो ब्रह्मा के पद को प्राप्त कर सकता है। जैसे 100 असमद यज्ञ करने से ब्रह्मा का पद प्राप्त होता है। तो किसी ने ऐसे पुण्य कर्म कर लिए कुछ ऐसा विधान कर लिया शास्त्रों का जिसको ब्रह्मा का पद प्राप्त हो गया। ऐसे जीव ब्रह्मा को भगवान के समान समझना वो अपराध होगा। ऐसा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर वर्णन करते हैं।

00:19:59:22 जब किसी किसी कल्प में भगवान को नहीं दिखता कि कोई पुण्यवान जीव ब्रह्मा के पद पर बैठने योग्य नहीं मिल रहा है तो खुद संभालते हैं उस पद को फिर ब्रह्मा। इसीलिए शास्त्रों में भगवान ब्रह्मा शब्द प्रयोग होता है उनके लिए किन के लिए जो हिरण्य गर्भ ब्रह्मा है। बहुत अच्छी बात बताई है आपने। अच्छा इसमें एक यह वाली बात आती है कि कोई भी व्यक्ति जब भगवान की बात कर रहा होता है कोई भी सामान्य व्यक्ति जिसको हम ये बात बता रहे हैं सामान्य व्यक्ति है हम तो कोई भी सामान्य व्यक्ति जब शिव और विष्णु की बात कर रहा होता है तो कभी नहीं सोचता है कि पता नहीं कौन सा जीव यहां का महापुरुष वो बन गया है ब्रह्मा और अब मैं ब्रह्मा और शिव विष्णु को एक कर रहा हूं तो ये बात तो होती नहीं वो जब भी वो जब भी सोचता है वो सरस्वती माता के जो अह अधिष्ठान अधिष्ठान यानी ब्रह्मा जी उनहीं के बारे में सोच रहा होता है जो क्या कहते हैं उनका जो लोक है वहां पर बैठते हैं जो उन्हीं के बारे में सोच रहा होता है जब भी ब्रह्मा की बात करता है या फिर जब भी वो शिव जी की बात करता है तो वो जो पार्वती वाले जो शिव जी हैं उनकी बात कर रहा होता है ना कि शिव जी के पद को प्राप्त करने वाले यहां के किसी महापुरुष जो मुक्त होने के बाद वहां पहुंच गए हैं उसकी बात कर रहा होता है। अच्छा दूसरी बात एक ये आती है कि जैसे कई बार ये होता है कि वैष्णव हैं इसलिए वो ऐसा मानते हैं।

00:21:15:10 कौन? जैसे वो वैष्णव है इसलिए वह तो उनको वो देखते हैं शिव जी को। अच्छा शिव जी को क्या कहते हैं ये जो वैष्णव जन है वो वैष्णव के रूप में परम वैष्णव मानते हैं। तो इसमें एक ये बात आती है कि वैष्णव व्यक्ति भगवान विष्णु की भक्ति चालू करने के बाद वैष्णव माना जाएगा या उस पे कोई बाउंडेशन होती है कि तुमने वैष्णव कुल में जन्म लिया है। इसलिए तुम वैष्णव हो। जो भगवान विष्णु का उपासक है। यानी जब उसने उपासना शुरू कर दी उपासना जब उसने स्वीकार कर ली तब वैष्णव है ना उससे पहले तो उस पर वैष्णवता का वो नहीं ठोक सकते कि तुम वैष्णव हो इसलिए तुम्हें ये करना है। नहीं तो फिर जो हमारी शिक्षा होनी चाहिए वो तो स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए ना कि भाई शिव और विष्णु शिव जी भी जो है भगवान ही है। वो यहां रोल निभा रहे हैं दास का। हमारी शिक्षा जो है वो स्वतंत्र रूप से होनी चाहिए। फिर इसमें इस हिसाब से नहीं होनी चाहिए कि वैष्णव की क्या शिक्षा है। शास्त्रों में जो चार वैष्णव संप्रदाय दिए हुए हैं संप्रदाय विहीनाय मंत्र निष्फला मता श्री ब्रह्म रुद्र सनका वैष्णवा पावन पद्म पुराण का ये वचन है तो चार वैष्णव परंपरा हमारे शास्त्रों में वर्णन है और

00:22:30:19 चारों वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु की उपासना है। उनके नाम लेने की उपासना उनके उनका लक्ष्य यानी विष्णु पद प्राप्त करने का लक्ष्य है। तो अब जो वैष्णव हैं वो क्या करेंगे? वो विष्णु भक्ति का ही प्रचार करेंगे। नहीं आप वो मैं जो शैव हैं वो शिव जी का प्रचार करेंगे। जैसे हम सिद्धांत दे रहे हैं। सिद्धांत इस रूप में दे सकते हैं कि अगर आप शिव जी की उपासना आप शिव जी की भक्ति करना चाहते हो आप करिए। हम् आपकी इच्छा है। आप राम की उपासना करना चाहे तो आप करिए। यह तो इस रूप में हम शिक्षा दे सकते हैं। वह तो उसके ऊपर निर्भर है कि वह किसकी उपासना करना चाहता है। तो इस के द्वारा छापी गई कौन सी किताब है जिसमें ये लिखा हो? प्रभुपाद जी या हमारे आचार्यों ने तो एक निष्ठता दिखाई है। मैं इस की बात कर रहा हूं। इस के द्वारा कोई छपी हुई पुस्तक हो जिसमें इसन के द्वारा तो मैं तो प्रभुपाद जी के अलावा और जो नए ग्रंथ हैं उनको तो पढ़ा नहीं। मैं इस की बात कर रहा हूं। क्या इस के द्वारा कोई पुस्तक प्रभुपाद जी के नाम से ही सही ऐसी है जिसमें ये लिखा है? इसकी जानकारी मुझे नहीं है क्योंकि प्रभुपाद जी के ग्रंथ के अलावा मैंने इस में जो नए ग्रंथ छपे हैं उनका अध्ययन

00:23:45:22 मैंने तो प्रभुपाद जी का कोई ग्रंथ है जिसमें ये लिखा हो जो इस से प्राप्त है। बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल भगवत गीता में उन्होंने बोला है। भागवतम में बोला है। चैतन्य चरितामृत में बोला है। वो मैं अभी मुझे इसका स्मरण नहीं है। लेकिन प्रभुपाद जी बोले हैं कि राम कृष्ण नरसिंह किसी एक की हम उपासना कर सकते हैं। नहीं नहीं शिव जी की भी कर सकते हैं। शिव जी की भी उपासना कर सकते हैं। सनातन गोस्वामी जी लिखे हुए हैं। ब्रद भागवतामृत्य में हमारे परंपरा के आचार्य हैं। अगर कोई शिव जी प्रभुपाद जी ने बोला है क्योंकि कुछ अंशों में मुझे लगता है कि हमारे जो इस या जो हमारा वैष्णव परंपरा है वो अनन्यता दिखाता है। तो हम लोग क्या करते हैं कि नहीं अनन्यता दिखाता है वो ठीक है मगर सिद्धांत तो बताना पड़ेगा ना हां सिद्धांत बता सकते हैं आप जैसे हम देखिए मैं अपनी बात बताऊं शंकराचार्य जी का शिष्य हूं मुझे क्या बताया गया हां पांचों रूप एक है अन्यता के लिए क्या करिए कि एक को आप ईश्वर के रूप में देखिए अन्यों को उनके परिकर के रूप में देखिए अन्यों से उनकी भक्ति मांग लीजिए अन्यों में भी अपने ही भगवान को देखिए कि देखिए यहां पर मेरे राम भगवती बनकर प्रकट हो गए यहां पे मेरे राम शिवजी बनकर प्रकट हो गए ये भाव रखिए भगवान के प्रति तत्वत सब एक हैं। है ना? पांचों एक हैं। तो ये तो हमें सिखाया गया। अनन्यता

00:25:01:06 की रक्षा भी हो गई कि अपने भगवान को ही सब में देखो।

⬜ Not used yet · 00:25:04:07 – 00:26:31:03 (1:27)

00:25:04:07 अब मैं एक बार आलोपी मंदिर है वहां पर। मुझे आज की वो घटना याद है। बहुत थकने चूरने थक के चूरचूर हो गया था और उसके बाद जो है मैं पहुंचा वहां पर प्रयागराज में। गंगा स्नान करने के बाद। इतना थकान हो गई थी। मैं कई दिनों से यात्रा पे था। तो थकान हो गई थी। शरीर का रोम रोम मेरा कांप रहा था। और अब वहां पर आलोपी माता का मंदिर है वो जो शक्तिपीठ है वो हां तो किसी ने कहा आलोपी माता के दर्शन कर लो आए हो इतनी पास में खड़े हो वहीं पर चौराहे पर ही बाईपास पर आदि शंकराचार्य जी की वो भी है विग्रह लगा हुआ है वहां पर हम तो मैंने कहा चलो दर्शन कर लेते हैं तो आप विश्वास नहीं करेंगे कि वो ढम ढम ढम डम डम डम उनके मंदिर के पास जाते-जाते वहां आरती हो रही थी तो वहां वो नगाड़े बजने की आवाज शुरू हुई कि वो जो सारा सारा दर्द था मिटने लगा ढम ढम ढम ढम ढम ढम ऐसी गजब की वो स्वर सुनाई दिया दिव्यमय हो गया वातावरण एकदम सब बदलने लगा और जब मैंने माता मां भगवती के दर्शन किए इतने मतलब इतने मतलब वहां पर ऐसे दर्शन पाए मैंने एकदम ऐसा ही लग रहा था राम जी खड़े हो गए माता के रूप में और अश्रुत तक निकल आए थे उस दिन उनको देख के अब वो क्यों हुआ था वो मैं नहीं जानता मगर उस दिन ऐसी शांति

00:26:19:13 मिली थी मां भगवती के दर्शन करके इतनी शांति यद्यपि वो मेरी ईस्ट नहीं है। मगर उन्होंने भी मुझ पर कृपा की और एक जो मां वाला उनका पार्ट होता है भगवती मां का तो उन्होंने वो निभाया। तो

✅ This part is already used · 00:26:31:03 – 00:34:16:26 (7:46)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 19:33 ↗

00:26:31:03 यह शिक्षा हमको मिलती है भगवतपाद आदि शंकराचार्य जी से प्राप्त होती है। मगर जब हम यह कहते हैं ना कि तुम वैष्णव हो इसलिए ऐसा मानो। तो वैष्णव भगवान विष्णु को स्वीकार करने से पहले हो तो ऐसा मानना है या फिर पहले हमें पूरी शिक्षा प्राप्त करनी है। फिर अपना चयन करना है कि हम वैष्णव बनेंगे कि शैव बनेंगे कि राम भक्त बनेंगे कि हनुमान भक्त बनेंगे। तो ये एक दिक्कत आती है। मतलब वैष्णवता को वैष्णव होने से पहले हम किसी पर कैसे थोप सकते हैं? हां थोप नहीं सकते। जैसे सामान्य व्यक्ति आ रहा है। अभी ना वह वैष्णव है ना शैव है। फिर भी हम कहे नहीं जो है शिव जी को तो भगवान का दास मानो। ऐसा उपदेश नहीं दे सकते हैं किसी सामान्य व्यक्ति को। हां क्योंकि अभी बन गया है। अभी तो उसको कुछ ज्ञान ही नहीं है। उसने उसने स्वीकार कर लिया है। जब वो आपकी परंपरा में दीक्षित हो जाए तब आप कहो कि अब आपका कर्तव्य है इस रूप में इस रूप में ही शिव जी को देखो। तब तो ठीक है मगर स्वतंत्र रूप से जो व्यक्ति है उसको सनातन ज्ञान देने की बजाय किसी देश काल परिस्थिति से प्रभावित ज्ञान देना ये तो ठीक नहीं है। देखो अपने संप्रदाय करते हैं। हां अपने संप्रदाय का विचार उसका प्रचार जी हर संप्रदाय का एक कर्तव्य है। जैसे रामानुज जी वैष्णव का वो अपने संप्रदाय अपने उपासना

00:27:46:09 अपनी पद्धति का प्रचार करेंगे। आदि जगतगुरु शंकराचार्य जी अपने उसका प्रचार करेंगे। सिद्धांतों का अपने उपासना पद्धति का तो हर वैष्णव आचार्य की क्या है प्रचार करने का वो है अधिकार है करने से अब इसमें क्या है ना शुरुआत में पहले तो अपने ही संप्रदाय के विचार बताए जाएंगे अब व्यक्ति अगर जिज्ञासा करेगा मान लीजिए वो जिज्ञासा करता है कि मुझे क्या मैं शिव जी की उपासना कर सकता हूं हां फिर उसको बता देगा आप कर सकते हो ये आपकी इच्छा है आप देखो ये हमारे वैष्णव संप्रदाय हैं मतलब मतलब कहना चाहिए कि शिव जी और विष्णु जी में भेद बुद्धि ना रखना या ये कहना चाहिए कि शिव जी और विष्णु जी में भेद बुद्धि रखना ये सनातन सिद्धांत नहीं है। नहीं है बिल्कुल अपराध और ये हम तब कर रहे हैं जब कोई वैष्णव बन गया है। वैष्णव नहीं उसके बाद भी हम भेद नहीं रख रहे हैं। केवल हम उनको अरे व्यवहारिक रसगत भेद तो कर ही रहे हैं ना। रसत रसगत भेद तो कर ही रहे तो जो शिव और विष्णु में भेद करना ये सनातन सिद्धांत नहीं है ये पर्टिकुलर देश काल परिस्थिति से प्रभावित वैष्णव संप्रदाय का सिद्धांत है वो जब आपने वैष्णवता हासिल कर ली है वैष्णव आप हो गए हो डिसिप वो क्या कहते हैं डिसाइपल कहते हैं जब आप डिसाइपल हो गए

00:29:01:10 हो तब जो है आप उस चीज को ग्रहण करो वरना आप सनातन सिद्धांत लो तो सनातन सनातन सिद्धांत यही है कि आप राधा कृष्ण की उपासना करना चाहते हो करो आप सीताराम की उपासना करना चाहते हो करो आप लक्ष्मी नारायण की उपासना करना चाहते हो करो। आप शिव पार्वती की उपासना करना चाहते हो करो। अरे सनातन सिद्धांत तो और भी है। भगवान कहते हैं गीता में याती देवता देवाने पित्त पितवता। अरे आप देवताओं की उपासना करते हो वो भी करो। नहीं मगर वो वहां ये तो बता रहे हैं कि करो वो भी मगर ये भी बता रहे हैं कि देवताओं से आपको मोक्ष प्राप्त। यस बिल्कुल वो करने को तो आप अब देखो भगवान ने सब कुछ बता दिया भगवत गीता में। उसके बाद का तो मैं अपनी मर्जी से लेकिन मूल बात यही है अगर मैं सार रूप में कहूं तो अगर कोई शिव पार्वती की उपासना करता है जी वो मुक्ति प्राप्त करेगा शिवलोक जाएगा कैलाश धाम जाएगा वहां से आगे कुछ बाकी तो नहीं कुछ वो आगे जाएगा नहीं क्योंकि उसकी अनन्यता उसकी निष्ठा शिव जी पर है नहीं मतलब वो मुक्त हो गया मुक्त हो गया मुक्त हो गया तो वो तो नहीं गोलोक की सेवा अभी बाकी नहीं नहीं मुक्त हो गया उसके लिए वही सर्वस्व है ना मतलब गोलोक की सेवा के बिना भी मुक्ति है बिल्कुल है जैसे हनुमान जी तो अयोध्या वासी है ना साक्षात उसके लिए जो है शिवलोक ही गोलोक है। सब कुछ है उसके लिए। सर्वस्व है। जैसे हनुमान जी के लिए अयोध्या सर्वस्व है। जी और गोपियों के लिए वृंदावन सर्वस्व है। जी जी

00:30:16:16 और गरुड़ जी के लिए वैकुंठ सर्वस्व है। एक ड्रॉबैक रह गया कि इसन के द्वारा कौन सी किताब ऐसी है। प्रभुपाद जी की कौन सी चीज ऐसी है जिसमें उन्होंने कहा है कि शिव जी को भी मान सकते हो। शिव जी के द्वारा मुक्ति होगी। ये कहीं स्वीकार किया हो। ये नहीं। दूसरी बात आपने कहा कि सब नहीं मुझे अभी उन्होंने बताया। मैं आपको प्रमाण दूंगा। अभी मुझे स्मरण नहीं है। तो ये आप लोग ध्यान रखिएगा कि भैया जो है प्रभु जी हमें वो प्रमाण देंगे और हम उसको यहां पे लगा आपको मैंने सनातन गोस्वामी का तो प्रमाण दे दिया जो हमारे परंपरा के आचार्य हैं। वो कई मामलों में इस और गौडियम में ये भी गौ वो अलग विषय है। भेद है तो और दूसरी बात थोड़ा सा प्रभुपाद जी कहां पर ये बोले हैं मैं उसका प्रमाण आपको वो आप देंगे तो उससे थोड़ा मैच हो जाएगा क्योंकि इसके क्या है ना दोहरे अर्थ निकल रहे हैं। दोहरे अर्थ में दूसरा वाला व्यक्ति जो है नहीं सनातन गोस्वामी तो हमारे परंपरा के हैं। जीव गोस्वामी हमारे परंपरा के हैं। परपाजी के परंपरा के हैं ना कहते हो कि हम गौडिया वैष्णव हैं। मगर कई गौडिया वैष्णव ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस हमसे नहीं है भाई। मैं तो मैंने कभी नहीं सुना ऐसा आज तक गौडिय वैष्णव हमारे हमसे बहुत परिचित हैं। कई लोग हैं। नहीं तो परिचित हमसे भी हैं। हां इसीलिए [हंसी] गौर हमारे हमारा जो इस संस्था है वो गौ मठ से प्रकट हुआ है। क्या है कि जैसे

00:31:32:02 गौड़िया मठ की बात तो ऐसे सुनने में आई थी कि गौड़िया वैष्णव संप्रदाय से मिलती जुलती एक संस्था डाली गई थी। गौ वैष्णव मठ गड मठ जो गौ मठ की स्थापना शपाद मतलब वो इसलिए डाला गया था कि लोग यह सोचना भूल जाए कि प्रामाणिक है कि नहीं समझ रहे हैं गौडिया वैष्णव परंपरा है और गौडिया वैष्णव मठ एक संस्था डाल दी गई अब उस पर कोई क्लेम नहीं कर पाया नहीं उसने ध्यान दिया सोचा कि अच्छा है प्रचार कर गौ अब आज ये लोग भूल ही गए कि भैया अब हम लोग गौडिया वैष्णव मठ से निकल के आ रहे हैं ना कि गौडिया वैष्णव परंपरा से नहीं नहीं गौ मठ और गौ वैष्णव परंपरा दोनों दोनों एक ही है अलग एक नित्यानंद वो नित्यानंद परिवार शाखाएं हैं बहुत सारी नित्यानंद परिवार के हैं गौडिया वैष्णव जैसे राधा रमण वाले हैं गौडिया वैष्णव परंपरा के नित्यानंद परिवार के एक हैं

00:32:20:09 रघुनाथ दास शास्त्री जी आचार्य जी उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा है कि इस जो है बहुत सारी शास्त्री वो उनका विचार हो सकता है बट गौ मठ प्रामाणिक आचार्य ये आपके लिए शोध का विषय है बाकी गौ मठ इस्कॉन और गौ वैष्णव परंपरा एक ही है। जी ने यह बात स्वीकार है कि नहीं यह जो शिव जी की भक्ति पर भी मोक्ष है। तो इस बारे में आप मुझे प्रमाण दे दीजिएगा। मैं इस वीडियो में लगा दूंगा। अब आगे बात ये आती है कि जैसे केशवदास जी हैं। मोहन प्रभु हैं कोई आपके यहां के अमोग लीला है। ये लोग बहुत हास्य वाला वातावरण इस पर टिप्पणी नहीं करो। नहीं मैं वो नहीं कह रहा। ये लोग कई बार इनमें भेद करते हैं और कहीं ना कहीं शिव जी की चीजों को जो है उपहास पूर्वक बताते हैं कि भाई वो दास हैं या उन और एक बार तो मैंने देखा था कि अमुक लीला जी का एक इंटरव्यू आया था जिसमें वो कह रहे थे कि भाई अगर शिव और विष्णु एक हैं तो क्या पार्वती पार्वती के पति वही है क्या विष्णु जी तो फिर मैंने उनको कहा था कि ऐसे तो कृष्ण और राम भी एक हैं तो सीता माता के पति कृष्ण कहोगे क्या आप मतलब वो ये कहने लगे थे अगर शिव और विष्णु एक है तो पार्वती के पति आप विष्णु को कहने लगोगे तो वो व्यवहार में वो जो आध्यात्मिक वो उनका विचार है। उनका विचार का समर्थन

00:33:35:27 उनके विचार की व्याख्या वो स्वयं कर पाएंगे। आप सहमत नहीं है। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर पाऊंगा। अगर वो अगर वो शिव जी को भगवान नहीं मान रहे हैं या शिव जी की भक्ति करने से मोक्ष नहीं मिलता। मुक्ति दाता नहीं मान मुक्तिदाता नहीं मान रहे तो हम इसके पक्ष में नहीं है। हम हम इसके समर्थन में नहीं है। हां तो कई बार कई लोग हैं केशवदास जी हैं और भी खैर अच्छा जो एक इस के हमारा वो हुआ था इस के ही वो थे वो इंदौर के जोनल सेक्रेटरी उनका नाम नहीं याद है। महामना दास हम काफी वृद्ध थे वो सीधे प्रभुपाद जी के नहीं नहीं वो मुझे उस पर चर्चा नहीं करनी है।

⬜ Not used yet · 00:34:16:26 – 00:34:43:27 (0:27)

00:34:16:26 अब ये तो इसका हो गया ना चलिए ठीक है। तो इसमें अब क्योंकि क्या है ना उन लोगों का विषय उनसे पूछोगे तो ज्यादा क्लियर होगा जो ऐसे बयान दे रहे हैं या जो ऐसी बातें कर रहे हैं आएगी ना मैं वही उसी पे आ रहा हूं देखो मैं भी इस को सी हूं तो आप मुझसे जो पूछ रहे हो हम शायद मुझे लग रहा है कि आप मेरी बातों से विचारों से सहमत होंगे हम तो मैं अपने विचार अपना कुछ बातें हैं सहमत है कुछ बातें ऐसी है जो अभी बाकी है और कुछ बातों से सहमत भी हैं

✅ This part is already used · 00:34:43:27 – 00:41:32:19 (6:49)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 27:21 ↗

00:34:43:27 जो जो मेरा अनुभव है जो मेरा अध्ययन है जो मेरा विचार है। मैंने प्रस्तुत किया। हां। अब मैं अपने विचारों की व्याख्या तो कर सकता हूं। हम लेकिन जो दूसरा व्यक्ति कब क्या कहां क्या बोल रहा है हम उसकी सफाई उसका इसमें एक दिक्कत आएगी हम कि आप भी स्कॉन से हो। हां और अमोग लीला भी स्कॉन से है। मान लीजिए वो कह रहे हैं ए। आप कह रहे हो बी। मैंने सुना नहीं है ना। क्लियर नहीं सुना है उनके लेक्चरों को। मैं सुन नहीं पाता हूं। तो मैं आपको बता रहा हूं ना कि वो ऐसा कह रहे हैं। अब कैसे कह रहे हैं? क्या कह रहे हैं? कब कह रहे हैं? किस आप इसलिए हां मैं अगर एक सिद्धांत बोलूं शिव जी को अगर वह मुक्ति दाता नहीं मानते हैं हम तो मैं उसका समर्थन नहीं करता तो दिक्कत दिक्कत ये है कि देखिए शिव जी को अगर वैष्णव मान रहे हैं एक पक्ष में वो तो ठीक है वो अच्छा है हां लेकिन मुक्ति दाता नहीं मान रहे हैं हां वो कह रहे हैं कि शिव जी की पूजा करने से मुक्ति प्राप्त नहीं होगी वो मेरे मैं उसका समर्थन इस विचार में नहीं करता हूं तो फिर इसमें एक दिक्कत आती है कि इस से ही वो भी हैं

00:35:56:12 किसकी बात को मान लिया जाए कि स्कॉन यह मानता है कि यह मानता है क्या कहता है इस कैसे माना जाए जो प्रभुपाद जी बोलते हैं जो हमारे गौ वैष्णव बोलते हैं वो हमको मानना है तो प्रभुपाद जी तो अभी नहीं है ना यहां पे बताने के लिए उनके ग्रंथों में है उनके उनके ग्रंथों के आधार पे ही वो कुछ बोल रहे हैं ना प्रमाण अगर वो ऐसा बोल रहे हैं तो कुछ प्रमाण दें तब ना माने तो या हमारे गौ आचार्यों के ग्रंथों से या प्रभुपाद के ग्रंथों से कुछ ऐसा प्रमाण दे तो चीज के ना होने का प्रमाण नहीं आवश्यक होता है किसी चीज के होने का प्रमाण आवश्यक होता है। अगर वो कह रहे हैं कि शिव की वो जब कह रहे हैं ना अगर वो कह रहे हैं किस आधार पर कह रहे हैं मैं बता तो रहा हूं जैसे शिव की भक्ति से मोक्ष नहीं मिलेगा। किस आधार पर कह रहे हैं? सुनिए तो तो वहां पर विष्णु की भक्ति कृष्ण की भक्ति से मोक्ष तो लिखा है। ग्रंथों में साफ-साफ वो तो वैष्णव तो बोलेंगे ही। सुनिए तो शास्त्र ही बोल रहे हैं। नहीं उनके ग्रंथों में लिखा है तो वो उस बोल रहे हैं। मगर यदि कोई कह रहा है कि शिव की भक्ति से भी मिलेगा। हां तो उसको प्रमाण देना होगा कि शिव की भक्ति से मिलने के प्रमाण ये है। तो प्रमाण वो प्रमाण तो मैंने आपको दे दिया सनातन गोस्वामी जी का हमारे ग वैष्ण के ये मानता है कि नहीं इस मतलब प्रभुपाद जी मैं तो प्रभुपाद जी को मानता हूं। इस को नहीं मानते नहीं इस के फाउंडर सारे प्रभुपाद जी है ना नहीं तो भाई हमें क्या पता

00:37:11:18 इस का कोई व्यक्ति विशेष क्या बोल रहा है वो मेरे लिए प्रमाण सुनिए इस के द्वारा ही हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं इस की किताबों के द्वारा ही हम उनको जान रहे हैं इस आपको प्रोवाइड करा रहा है तो इस मानता है कि नहीं ये आपको बताना पड़ेगा क्योंकि इस के माध्यम से हम प्रभुपाद जी को जान रहे हैं। बिल्कुल इस के कोई व्यक्ति विशेष अ अगर अपूर्ण अध्ययन किया हो या कुछ ऐसे बोल रहे हैं तो उसका समर्थन मैं नहीं करता आपको वो प्रमाण देना होना होगा ना कि इस यहां पे क्लेम कर रहा है कि शिव की भक्ति से भी मुक्ति मिलेगी हां मैं दूंगा मैं दूंगा आपको मैं प्रभुपाद के ग्रंथों से आपको दूंगा और एक बात ये भी आती है कि यदि आपको आपका ये मानना है कि जो ऐसे लोग हैं जो ये गलत बात बोलते हैं इसकी ओर से मंचों पे खड़े हो करके बोलते हम तो इस इनको प्रोत्साहित क्यों कर रहा है? उसे इनको हटाना चाहिए इनके पद से। जैसे कि देखो सुनिए तो जैसे कि विवेकानंद के बारे में इन्होंने अमोग लीला जी ने एक टिप्पणी कर दी थी विवेकानंद जी के बारे में। ठीक है? तो इस ने संज्ञान लिया हम और इस ने उन्हें एक महीने के लिए लगा दिया लगाम। हम अब इस इस इन्होंने अमोग लीला ने आदि शंकराचार्य जी की मरती हुई मां पर एक्टिंग की। हम ठीक है? हम् और वह

00:38:26:19 एक्टिंग कर करके बता रहे हैं कि शंकर तू आ गया शंकर तू मुझे भगवान के स्वरूप का वर्णन कर दे तो पहले मजाक बना रहे हैं हंस रहे हैं। वहां लोग बैठ के ठाके लगा रहे हैं। नहीं मेरा विषय वो नहीं है। पर वो या कोई और नहीं देखिए मेरा विषय यह है कि इस क्या सही चीजें फैला रहा है कि नहीं फैला रहा है। अब वो प्रभुपाद जी की चीजें हैं कि नहीं है वो डजंट मैटर मेरे लिए। मैं ये कह रहा हूं कि क्या इस शास्त्र है सनातन धर्म फैला रहा है या कुछ और फैला रहा है? अधिकतर लोग इस के जो अनुयाय हैं वो सनातन धर्म का ही वास्तविक प्रचार कर रहे हैं। अधिकतर लोग कुछ अपवाद हो सकते हैं। कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो जिनका अपूर्ण ज्ञान हो जो कर जो कर रहे हैं उस पे इस कौन संज्ञान क्यों नहीं ले रहा है? वो तो मैनेजमेंट का विषय है। वो मेरा विषय है। यदि नहीं ले रहा है तो उतने अंश में तो फिर वो गलत कर रहा है ना। हां गलत है। अगर कोई गलत प्रचार कर रहा है, कोई गलत फिलोसफी बोल रहा है, अगर उस पर कोई संज्ञान नहीं ले रहा है तो गलत है। वो तो है ही। तो इस को ऐसा नहीं करना चाहिए। ये चीजें आपको समझ में आ रही होंगी। खैर अब थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। अच्छा कई बार ये भी सुनने में आता है कि इस द्वारा जो है राम और कृष्ण में भी भेद किया जाता है। यद्यपि मैंने वो वीडियो देखा है जिसमें प्रभुपाद जी ऐसा बोल रहे हैं। अच्छा इस पे आने से पहले मैं एक बात पूछूंगा।

00:39:41:25 श्रीमद् भागवतम में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो लोग शिव के नाम को भगवान श्री कृष्ण के नाम के समान समझते हैं वो लोग मूर्ख हैं और वो लोग ऐसा करना 10 अपराधों में से एक अपराध है। तो क्या ये लाइन गलत है? यह तो मैंने आपको समझा दिया विश्वनाथ चौथी ठाकुर जी के माध्यम से हां अह जो दसनामा अपराध है पद्म पुराण में इसका वर्णन है उसी की तो व्याख्या हमने पहले की है ना वो जो जीव अगर शिव शिव के रूप में है हां अगर उस पोस्ट में है मगर आपके यहां तो कहा जाता है कि कोई भी जीव ब्रह्मा बन सकता है मगर शिव नहीं बन सकता बट विश्वनाथ ठाकुर ऐसा वर्णन किए हैं नहीं नहीं आपके यहां ये कहा जाता है गलत कहा जाता है कि सही हमारे यहां ऐसा मैंने सुना नहीं अभी तक ऐसा नहीं जो आपके यहां आगे प्रामाणिक लोग हैं जो अगर जो कह रहे हैं वो गलत होंगे इस मामले में क्योंकि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जो जो बता रहे हैं आपको नहीं आप ऐसी संस्था का साथ दे रहे हो जो कई गलत लोगों का साथ दे रही है अपने मन में अध्यक्ष बना करके बिठा रही हो देखो मेरा वो विषय नहीं है कोई कौन क्या कर रहा है इस में बहुत सारे अच्छे प्रचारक भी हैं अच्छे सिद्धांत जानने वाले इस के बनार भी तो है भाई साहब और अच्छा बोलने वाले हैं हम भी इस में तो मुझे लगता है कि शायद आप भी मेरी

00:40:56:26 बातों से सहमत हो ही रहे होंगे कुछ बहुत जी जी तो नहीं मेरा कहने का मतलब है कि फिर इस ही क्यों फिर तो इस के बाहर भी बहुत कुछ है अच्छा अच्छा इसलिए है ना कि इस एक गौ वैष्णव संप्रदाय का ब्रांच है तो इसीलिए वो गलत कर रहा है ना जो गलत कर रहा है वो गलत है उसका विरोध होना चाहिए और उसको रोकना चाहिए जो विरोध कर रहे हैं वो ठीक मानते हो आप अब आप किस रूप में विरोध कर रहे हो क्या विरोध जिन बातों का आपसे पूछ रहे हैं आप कह रहे हैं जो आपका विरोध है जो मान लो आपका विरोध है जी जिनसे भी आपका विरोध है एक बार आप उनके पास जाकर ना और अच्छे से इसको वो कर सकते हो

⬜ Not used yet · 00:41:32:19 – 00:41:50:19 (0:18)

00:41:32:19 आप आप अमोग लीला जी से हमको समय दिलवा दीजिए हां मैं मैं कोशिश करूंगा बताने का जी जी कि ताकि क्योंकि वो उन्होंने अपना विचार रखा हुआ है। अपने तरीके से उन्होंने आपको समझाया है। लोगों को समझाया है। तो मुझे लगता है कि वो अपनी बात को ज्यादा अच्छे से आपको हम समझा पाएंगे।

✅ This part is already used · 00:41:50:19 – 00:44:24:07 (2:34)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 33:55 ↗

00:41:50:19 और आप मेरे पास आए तो मैं तो जो प्रभुपाद के सिद्धांत हैं जो हमारे गौ वैष्णव के सिद्धांत हैं मैं अपने अनुभव अपने अध्ययन अपने उससे आपको बता अपने से कुछ मत बताइए आप प्रमाण दीजिए प्रमाण ही वो शिव जी को कहां उन्होंने मुक्ति वाला माना प्रमाण ही दे रहा हूं आपको एक प्रमाण तो आपको मैंने दिया ही सनातन गोस्वामी इसमें इसमें ये फेल हो गया ना मामला आप जो ये कह रहे हैं कि जो ब्रह्मा जी की पोस्ट पे चला जाएगा उसके लिए मना किया है मगर शिव जी की पोस्ट पे तो कोई जा ही नहीं सकता। ऐसा बताया जाता है इस में हमें शिव जी की पोस्ट पे अच्छा इस [हंसी] की दृष्टि से फेल हो गया है। ऐसा बोल रहे हो? हां देखो विश्वनाथ जी हमारे लिए प्रमाण है। हमारे आचार्य है ना गौ वैष्णव में वो क्या बोल रहे हैं वो महत्वपूर्ण है। कोई आलतू-फा फालतू व्यक्ति क्या बोल रहा है वो महत्वपूर्ण नहीं है मेरे लिए। इस बोल रहा है ना? अब वो अज्ञानी होंगे जो बोल रहे होंगे ऐसा। उन्होंने पढ़ा नहीं होगा। यानी कि इतने अंशों में आप इस के उन लोगों के साथ नहीं है। हां अगर वो शास्त्र के हटकर कुछ बोल रहे हैं तो मैं उनके पक्ष में कैसे हो सकता? अगर नहीं वो यह बोल रहे हैं यह वाली बात मैंने आपको बता दी वो बोल रहे हैं नहीं वो ठीक है लखनऊ का एक व्यक्ति है पर श्यामदार कोई भी हो वो बोल रहे हैं शिव जी की पोस्ट पे कोई नहीं जा सकता कोई भी व्यक्ति अच्छा विष्णु की पोस्ट पे लोग जा सकते नहीं जा सकते विष्णु के पोस्ट को कोई नहीं ले सकता शिव जी की पोस्ट पे जा सकते हैं विश्वनाथ जी ऐसा वर्णन

00:43:05:20 किए हैं शिव जी की पोस्ट पे जा सकते हैं कभी-कभी शिव के पद पर जीव भी बैठता है बहुत डिटेल में वर्णन नहीं किया हुआ है वो प्रमाण मैं आपको भेज दूंगा उसको स्क्रीन में आप लगा देना जी और नहीं मुख्य मुझे चाहिए होगा कि प्रभुपाद जी ने माना है कि नहीं क्योंकि वैष्णव संप्रदाय और इस में काफी सारे अंतर आ कोई अंतर नहीं है अगर आप ग्रंथों को देखिए आज आपने मना किया है कि वर्णाश्रम पर बात नहीं करेंगे नहीं तो मैं अभी वर्णाश्रम दूंगा तो [हंसी] आप आपको जो गौ वैष्णव संप्रदाय से अंतर समझ में आ जाएगा नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है वर्णाश्रम पर मैं इसलिए चर्चा नहीं करना चाहता हूं कि उस पर बहुत सारे कंट्रोवर्सी विरोधाभास हो जाते हैं बाकी जो ये विषय है जो शिव जी का विषय है। हां जी। तो मैंने आपको समझा दिया है। हां प्रमाण आप दीजिएगा कि प्रभुपाद जी ने कहां माना है। उनको मुक्ति दाता हम और और ये वाली लाइन में भी आप ये कह रहे हैं कि वहां पे जीव रूप वाले शिव जी के लिए मना किया गया है। मतलब आपका कहने का मतलब दूसरा प्रश्न था एक तो भेद अभेद वाला। मैंने लास्ट बात ये पूछी ना आपसे कि अलग मानना और एक मानना। नहीं नहीं लास्ट बात मैंने यही पूछी आपसे कि भागवतम में भाष्य करते समय जो उन्होंने ये भागवतम में कहां पर लिखा 25 तीन 1525 में ऐसा लिखा हुआ है

⬜ Not used yet · 00:44:24:07 – 00:44:51:20 (0:27)

00:44:24:07 श्रीमद् भागवतम हिंदी वाला खुल गया हां यहां पर नेट चल नहीं पा रहा है अरे सीधे Google पे डाल देते। Google नहीं Google में कई सारे वो वेदाभेश आता है ना? नहीं नहीं इसमें आपका ही है वो वेदाभेश इसमें आ जाएगा वो उसमें क्या लिखा है?

✅ This part is already used · 00:44:51:20 – 00:47:50:26 (2:59)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 36:28 ↗

00:44:51:20 क्या लिखा है उसने बोला? 10 अपराध बताए जा रहे हैं। ऐसे 10 अपराध हैं जिनको नहीं करना चाहिए। उसमें से शिव और विष्णु को शिव काली या दुर्गा के नाम को श्री कृष्ण के नाम के समान समझना क्योंकि ये सभी समान है। ऐसा सोचने वाले मूर्ख हैं। ऐसा करना अपराध है। हां मूर्खता तो है। अगर कोई जीव वहां बैठा है जो विश्वनाथ जी बोल रहे हैं कि उनको भगवान के समान समझ रहे हो वो तो मूर्खता है। वो तो जीव है ना। अगर वो भगवान बैठे हैं। ये जीव वाली बात प्रभुपाद जी ने मानी है। ये कहां से प्रमाण मिलेगा? परपाद जी जो लिख रहे हैं ना वो वहां पर एक पक्ष लिख रहे हैं। इतना विस्तार से उन्होंने नहीं समझाया। भाष्य करते समय भी विस्तार से नहीं लिखेंगे तो कब लिखेंगे? वो भक्तों के लिए वो व्याख्या है प्रभुपाद जी की। अगर विस्तार से समझना है। प्रभुपाद जी अपने ग्रंथों में लिखे हुए हैं। किसी को बहुत विस्तार से समझना है तो सनातन गोस्वामी जी की ग्रंथ पढ़ें। विश्वनाथ ठाकुर जी के ग्रंथों को पढ़ें विस्तार से। क्योंकि प्रभुपाद जी का इतना समय नहीं था। वो प्रचार भी कर रहे थे। नहीं मगर उन्होंने सारे ग्रंथों पर नहीं किया मगर जिस पर किया है तो उन्होंने 18 भागों में किया। इसमें जो उन्होंने अनुवाद किया ना सबसे वृहद व्याख्या तो उन्होंने ही की है भागवतम की। नहीं नहीं बहुत विस्तार से भी नहीं किया है। उनसे बड़ी व्याख्या है कोई? हां हां विश्वनाथ ठाकुर जी की है। कितनी है? कितना? सारा अर्थ दर्शनीय टीका है। बहुत विस्तार से

00:46:06:24 भागवत पे है। भागवत पर है। अच्छा विश्वनाथ। उन्होंने ये माना है कि जीव रूप वाले शिव जी जो होते हैं उनको जीव रूप वाले शिव ब्रह्मा को अगर समान समझेंगे तो वो अपराध है। ये स्वीकार किया है। और जो जीव रूप वाले शिव जी नहीं है उनको अलग समझेंगे तो वो अपराध है। अच्छा एक चीज और आ रही थी शिव जी वाली आप कह रहे हैं कि शिवजी को जो है मत समझो। सदा शिव जो है वो तो भगवान है। ही विश्वनाथ जी जैसा बोल रहे हैं। सदा शिव स्वयं भगवान है। यहां हां तो सदा शिव जी के कई रूप है। तो सदा शिव किस सदा शिव की बात कर रहे हैं? जो परम भूम में है यानी बैकुंठ में जो बिरजा के उस पार जो सदाशिव धाम है। शिव पार्वती सदा शिव धाम मतलब पार्वती वाले जो शिव जी हैं सदा वो मुक्ति दाता हैं। वो मुक्ति कौन से वाले नहीं है? नहीं मुक्ति दाता वही है। एक ही थे शिव और दो शिव कहां से आ गए? नहीं आपने कहा ना कि जो वो वाले जो शिव जी हैं नहीं सुनिए आपने ये कहा ना कि जो शिव और सदा शिव दो रूप तो शिव को अगर आप मुक्ति दाता नहीं मानते भगवान नहीं मानते सदा शिव को मानते हैं नहीं शिव जी जो शिव है वो सदा शिव रूप में मुक्ति दाता है ये वही सदा शिविव है वही एक रूप में शिव जी है कैलाश में इस भोम वो जो उनका कार्य वाला

00:47:22:00 जो रूप है जो वैष्णव वाला रूप जो त्रिगुण अवतार है वो अलग है जो परव्यम में सदा सदा शिव है शिव पार्वती उस रूप में वो भगवान है भगवान है साक्षात भगवान है उनको अलग समझना वो अपराध है वो साक्षात भगवान है तो ठीक है तो वो आप प्रमाण में दीजिएगा और मैं चाहूंगा कि इस बारे में भी खुल के सामने चीजें आनी चाहिए कि प्रभुपाद जी अगर ये कह रहे हैं कि भैया शिव दुर्गा काली के नाम को कृष्ण के नाम के समान समझना मूर्खता है पाप है पाप नहीं मूर्खता है पाप नहीं

⬜ Not used yet · 00:47:50:26 – 00:50:16:26 (2:26)

00:47:50:26 पाप भी है 10 अपराध है ना नहीं पाप 10 अपराध में अपराध और पाप में अंतर होता है अंतर होता है पाप पाप पाप का संबंध शरीर और मन से होता है। अपराध का संबंध आत्मा से होता है। तो ये विवरण कहां से ये है विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर माधुर्य कादमनी में बड़े विस्तार से इसको समझाते हैं। का संबंध हां पाप का फल कौन भोगता है? ये शरीर मन शरीर में बीमारी आना मन में चिंताएं मन पागल होना ये पाप का परिणाम है। हम अपराध क्या होता है? अपराध तब होता है जब भगवान के प्रति, उनके परिकरों के प्रति, उनके भक्तों के प्रति जब हम कोई निंदा करते हैं, उनको मारते हैं, उनको पीटते हैं, उनकी हिंसा करते हैं, वो अपराध कहलाता है। चोरी करना अपराध नहीं है। चोरी करना पाप है। अपराध नहीं अपराध नहीं कहा जाएगा। उसको पाप कहा जाएगा। अच्छा और जितना भी ये शारीरिक संसार में जितनी भी चीजें हैं वो सब पाप में आएगा। भगवान से संबंधित जो भी चीजें हैं समझना उनको गलत। गलत समझना, उनकी निंदा करना, उनकी हिंसा करना हम वह अपराध में आएगा। अच्छा अपराध का अर्थ ही होता है अप यानी शास्त्रों तो वर्णन में भी है। हां मतलब विश्वनाथ विश्वनाथ जी के अलावा और जगह भी होगा बट विश्वनाथ जी ने इसको विस्तार से उन्होंने बताया

00:49:05:27 विस्तार से समझाते हुए ये दिया होगा वहां कहां पे है ये? उन्होंने जैसे हमारे जो आचार्य होते हैं वो कोई भी सिद्धांत बता रहे होते तो वो बताते हैं मैं इसके आधार पे बता रहा हूं। उन्होंने प्रमाण तो नहीं दिया है। उन्होंने समझाया है अपराध और पाप खुद की एक बुद्धि हो सकती है। हो सकता है शास्त्र में होगा। आचार्य होता है। वो शोध का विषय कई बार आचार्य जो है अपनी भाई अपराध को ऐसे देखो पाप को ऐसे देखो ऐसा हो सकता है। हां देखो इसमें क्या है ना सार्वभौम सिद्धांत नहीं मान सकते। नहीं शास्त्रों में भी होगा क्योंकि आचार्य जो बोलते हैं वो शास्त्रों के आधार के लिए बोलते हैं। फिर वो हमें चाहिए क्योंकि देखिए आपके लिए विश्वनाथ जी [हंसी] विश्वनाथ देखो विश्वनाथ ठाकुर का परमार्थ मैं आपको भेज सकता हूं। जहां तक शास्त्रों का प्रमाण है उसको अगर आप स्वयं ढूंढो तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि जो प्रमाण मेरे पास उपलब्ध है नहीं मैं तो ये मानता हूं ना कि इस कौन जब गलत कर रहा है तो मुझे उसके समर्थन में कुछ क्यों ढूंढना वो तो जो उसको समर्थन करता हो वो ढूंढ के लाके देगा ना हां बट मैं तो जो ये बता रहा हूं पाप अपराध का विचार वो तो विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के आधार बता रहा हूं खैर अपराध तो बोला ही गया एक कॉमन भाषा में ऐसा बोल दिया जाता है लेकिन जैसे बुद्धिमान और विवेकवान दो शब्द हैं। नहीं नहीं मैं वो नहीं कह रहा। मैं कह

✅ This part is already used · 00:50:16:26 – 00:56:22:24 (6:06)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 39:27 ↗

00:50:16:26 रहा हूं कि अपराध तो बोला गया। पाप नहीं बोला गया तो अपराध तो बोला गया। किस चीज को? कि शिव, दुर्गा, काली इनके नामों को समान समझना अपराध है। अपराध है। है ना? और ऐसा करने वाले मूर्ख हैं। हां। तो फिर अब जो नाम है वो तो शिव का ही नाम है ना? जैसे जो नाम है वो तो शिव का ही नाम है ना? उसमें तो कोई ये वाली बात है नहीं कि भाई जो क्या कहते हैं? जीव जो शिव पद को प्राप्त कर लिया मैं उसके नाम की बात कर रहा हूं। शिव का नाम तो शिव का ही नाम है। हां शिव उसको एक समझने के बारे में क्यों लिखा हुआ है कि शिव के नाम की बात नहीं कर रहे हैं। शिव जी की बात नहीं वहां शिव के नाम की बात है। शिव के नाम हरे कृष्ण करो या शिव दुर्गा काली के नाम का जप करो। नाम आया है वहां। अंतर है। अंतर क्या है कि भाव का अंतर है। भाव का बहुत बड़ा अंतर है। फिर वही वाली बात है। क्या आप वैष्णव पहले हो या पहले एक जिज्ञासु हो क्या हो पहले। भाई कोई भी व्यक्ति जब जन्म लेता है तो यह डंका पीटा जाता है। मैं तो आपके सामने वही पक्ष रखूंगा जो हमारे वैष्णव आचार्यों ने दिया है जो उन्होंने माना है जो उन्होंने स्वीकार किया तो मैं आपसे ये पूछ रहा हूं ना ये वाली जो लाइन है ये गलत है कि सही है कि शिव दुर्गा काली को काली के नाम को भगवान कृष्ण के नाम के समान समझना अपराध है ये सही बात है सही बात है तो फिर यहां तो शिव के नाम शिव का ही भेद हो गया

00:51:31:27 ना भेद शिव सुनिए शिव पद को किसी जीव ने प्राप्त किया हो या स्वयं शिव जी आके शिव पद पे बैठे हो ठीक है? उनका नाम तो वही रहेगा ना। नाम तो वही रहेगा। देखो तो शिव के नाम कृष्ण के नाम के ऐसा नहीं होगा क्योंकि जैसे मेरा नाम भी लक्ष्मी नरसिंह है। तो क्या मैं भगवान हो गया? नहीं मैं क्या कह रहा हूं? मैं यही तो कह रहा हूं भगवान होने की बात नहीं कर रहे। वहां नाम को ही मना कर दिया गया। नाम को मना वो वो जो विषय है वो थोड़ा गहराई से देखने का विषय है वहां पर। क्या विचार दिया और भी डिटेल में आचार्यों ने। लेकिन ठीक है। एक तो आप प्रभुपाद जी का प्रमाण देंगे। हां। एक कौन ऐसा क्यों कर रहा है कि उनका प्रोत्साहन कर रहा है तो इस पे हम लोग खुद बात करेंगे आप संपर्क स्थापित करेंगे और एक जो है ये गहराई का विषय ये वाला जो क्योंकि मैं तो मैं तो आपके सामने वही पक्ष रखा है कि जो हमारे आचार्य बोले हैं बाकी तो उसमें बहुत सारे विचार हो गया ना कि गहराई से हां वो गहराई फिर शोध का विषय है और भी देखने का विषय है वो उसमें क्या और क्या है तो अब आगे बात आती है कि जो श्री राम जी हां और इनको लेकर के भी काफी सारे लोग इस के ही हैं जो भेद करते हैं। बताते हैं कि पूर्णिमा का चांद और यह चांद और वो

00:52:46:28 चांद बहुत सारी बातें करते हैं। भाई वो वो पूर्णिमा में पूरा दिखता है। तो यहां पे जब पूर्णिमा में दिखता है मतलब एक वो है केशवदास जी करके हैं। वो बड़ा बोलते हैं उनका एक वीडियो। हम बोलते हैं कि जैसे पूर्णिमा में पूरा चांद होता है और बाकी सारे टाइम पे चांद जो है अधूरा दिखता है ऐसे ही यह जो राम राम है नरसिं है ये सब जो है वो पूर्ण नहीं है वो पूर्णिमा का चांद तो श्री कृष्ण है एक एक मिनट तो अब इसमें क्या कर दिया इन्होंने इन्होंने स्वयं ही जो शंकराचार्य जी की शिक्षा है ना उसका ही समर्थन कर दिया वो कैसे किया वो ऐसे किया कि चांद तो हमेशा चांद ही था तुम्हारी दृष्टि भ्रम भ्रमवश उस चांद को अलग-अलग देख रही है तो भ्रम आ गया ईश्वर के अन्य रूपों को ही सही माया तो समझ लिया ना माया के कारण तो देख लिया ना आपने तो वो खुद ही उनको नहीं पता है कि उन्होंने इस तरीके से शंकराचार्य के सिद्ध अच्छा दूसरी बात ये भी है कि किसी का मन ही लगता है ईश्वर के उसी रूप में जो दूसरा रूप है धनुषधारी वाला किसी का मन ही लगता है ईश्वर के बांसुरी वाले रूप में इसीलिए तो ईश्वर ने इतने सारे रूप लिए तो फिर भी वो कहते हैं कि नहीं राम जी वगैरह जो है ये तो एक्सप सस्पेंशन है। मैं आपको बता रहा हूं लखनऊ के इस मंदिर के

00:54:02:09 अध्यक्ष के द्वारा गीता सेशन होता है। हर हफ्ते 500 से 600 लोग मुझे लगता है अब ज्यादा जुड़ते होंगे और वहां पर यही शिक्षा दी जा रही है कि राम की राम के नाम का जाप करने पर आपको जो है मुक्ति नहीं मिलेगी। बहुत बड़ा अपराध है। बहुत बड़ा अपराध है। मैं समझ रहा हूं। मैं आऊंगा आपके पास। तो मैं एक बार मुझे किसी मेरे परिचित ने जोड़ दिया था उसमें और मैं हरे कृष्ण महामंत्र का जप करता हूं क्योंकि शंकराचार्य जी ने कहा है कि जिनका दोष हो गया हो यज्ञ इत्यादि से हुआ हो भ्रात संध्या लगी हो वो इस नाम का जप करें महामंत्र का जप करें यद्यपि भगवान की अन्य नामों का जप करने से भी भ्रात दोष से मुक्ति मिलती परंतु गुरु मुख से मैंने वो सुना हरे कृष्णा तो मैं हरे कृष्णा का जप करता हूं हरे कृष्णा हरे राम का तो मैं कर रहा था और मेरे किसी परिचय के कारण मैं उसमें गया आज से 5 छ साल पहले की बात है। तो मैं उसमें जब गया तो मैंने वहां पर अपने भाव बता दिए कि मैं हरे कृष्ण का जो जप करता हूं वो तो मैं राम को देख के करता हूं। कृष्ण को देख के नहीं करता हूं। तो भाई वहां के मंदिर के अध्यक्ष बोल रहे हैं मुझसे क्या बोल रहे हैं? अच्छा तुम ऐसा करते हो तीन महीने बाद देख लेना तुम्हारे साथ क्या होगा? मैंने कहा क्या होगा भाई? राम की भक्ति करने पे एक्सीडेंट हो जाएगा मेरा। [हंसी] ये ये थोड़ी सी इस बारे में बताइए। ये तो अज्ञानता है। इस बारे में तो मैं

00:55:17:13 भी ये समझता हूं कि प्रभुपाद जी का पक्ष कुछ और रहा होगा और ये जो मूर्ख लोग हैं ऐसी बातें और उस व्यक्ति ने बोला भी ये महामूर्ख की पराकाष्ठा है। ऐसा बोलना ये ऐसे मूर्खों को मंदिर का कार्य वो तो बात का वाद है। सिद्धांत पक्ष में आते हैं जब राम और कृष्ण की बात आपने किया। राम और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। स्वयं भगवान है। वो परम भगवान है। इसलिए हमारे इस मंदिरों में शीला प्रभुपाद जी ने सीताराम की स्थापना करवाई इस मुंबई दिल्ली और अन्य मंदिरों में यहां तक कि हमारे इस के कई मंदिर रामनवमी के दिन ही उसका उद्घाटन हुआ है। तो भगवान राम स्वयं भगवान है। राम कृष्ण में कोई भी अंतर नहीं है। भगवान के जितने स्वरूप हैं भगवान के जितने नाम हैं उनमें कोई अंतर नहीं है। नाम कार्य बहुदा निज सर्व शक्ति चैतन्य महाप्रभु कहते हैं राम नरसिंह वामन कुर्म ये सब भगवान के नाम है कोई अंतर नहीं है केवल रसगत विचार से अंतर है तत्वगत दृष्टि से इनमें कोई भी भेद नहीं है

⬜ Not used yet · 00:56:22:24 – 00:57:06:12 (0:44)

00:56:22:24 कोई सीताराम की जिसको सीताराम की भक्ति करनी है भाई किसी को राम जी पसंद आ गए जैसे तुलसीदास जी राम के अनन्य भक्त हैं जब वृंदावन आए तो वृंदावन आकर क्या बोलते हैं तुलसी मस्तक तब नवे जब धनुष बाण लो हाथ यह तुलसीदास तो आपको तब नमस्कार करेगा जब आप बंसी को छोड़कर धनुष बाण हाथ में लेंगे ऐसी अनन्यता जी तो राम कृष्ण में अंतर ही नहीं है केवल भाव से भक्तों की तरफ से अंतर है भगवान भाव ग्राही जनार्दन अब किसी को अनार का जूस पसंद है तो वो अनार जूस खाए किसी को आम का जूस पसंद है वो आम का खाए है तो फलों का ही जूस वो है तो फल ही तो भगवान दास

✅ This part is already used · 00:57:06:12 – 00:57:20:12 (0:14)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 45:34 ↗

00:57:06:12 वगैरह ये जो बोलते हैं गलत बोलते हैं। गलत है। रामकृष्ण में भेद करना ये गलत है। देख लो भैयागत दृष्टि से स्कॉन के जो प्रामाणिक ये ब्रह्मचारी हैं यहां पर निवास भी है इनका वो ये बोल रहे हैं केशवदास जी के लिए है

⬜ Not used yet · 00:57:20:12 – 00:57:43:10 (0:23)

00:57:20:12 ये बात सुन लीजिए क्या बोल रहे हैं आपकी बात रसगत दृष्टि से हमारे आचार्यों ने बहुत विस्तार से अंतर किया है। रूप गोस्वामी जी ने लघु भागवतामृत में बड़े विस्तार से वर्णन किया है कि राम कृष्ण नरसिंह वामन इनमें क्या तारतम्य है इनमें क्या भेद है रस की दृष्टि से तत्व दृष्टि से कोई भेद नहीं है रस की दृष्टि से भेद है तो

✅ This part is already used · 00:57:43:10 – 00:58:07:06 (0:24)

→ Used in: B · Video इस्कॉन के हरिहर भेद की सच्चाई क्या है ? at 45:50 ↗

00:57:43:10 उपासना की दृष्टि से से भेद है और तत्व की दृष्टि से नहीं है ये बात हमारे शास्त्रों में मतलब इस से छपने वाली किताबों में है बिल्कुल है परपाद के ग्रंथों में है कहां पर भगवत गीता में भागवतम में चैतन्य में दो बार मैं आपको भेजूंगा भगवत गीता में 2.2 में लिखा हुआ है कि विष्णु भगवान नारायण भी स्वयं को भगवान नहीं कह सकते क्योंकि वो पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है।

⬜ Not used yet · 00:58:07:06 – 00:58:42:07 (0:35)

00:58:07:06 वो रस की दृष्टि से ये विचार किया गया तत्व की नहीं रस की रस की दृष्टि से तो अगर जैसे रस की दृष्टि से भगवान राम ने एक गुण मानो प्रकट नहीं किया वेणु माधुर्य वेणु बजाना लेकिन वो गुण भगवान कृष्ण ने प्रकट किया लेकिन वही कृष्ण जब मथुरा में होते हैं या द्वारिका में होते हैं वहां भी वो बंसी नहीं बजाते हैं। तो इसलिए द्वारका के कृष्ण क्या है? पूर्ण और मथुरा के कृष्ण क्या है? पूर्णतर और वृंदावन के कृष्ण क्या है? पूर्णतम। ये भी आपका परंपरा के अंतर्गत अंतर्गत है। ये स्वतंत्र व्यक्ति के लिए नहीं है।

✅ This part is already used · 00:58:42:07 – 01:05:03:10 (6:21)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 0:00 ↗

00:58:42:07 तो इसमें अब एक बात आती है। तो कहने का अर्थ ये है कि जैसे ये ये बातें तब के लिए है जब व्यक्ति आपका हो गया। हां जो परंपरा में जुड़ गया जो आ गया। पब्लिक में ये बात नहीं करनी चाहिए। नहीं करनी चाहिए। उनके लिए अब इसी पे बात आ रही है कि आपकी जो बात वो भगवत गीता है उसमें ही यह 262 में लिखा हुआ है कि ऐसासा है दो 62 में हम और तो आपने अभी पहले भी ये बात कही थी कि जैसे आपने अभी बोला कि भाई पब्लिक में ये बात नहीं करनी जो आपसे जुड़ गया जो वैष्णव हो गया जो इस वाला हो गया उससे बात करो तो आप फिर भगवत गीता ऐसी जिसमें कि वो बातें लिखी हुई जो अंदर आने के बाद की है वो आप क्यों रोते हो? हमें तो अपनी परंपरा के सिद्धांत का प्रसार करना ही है। जिसको स्वीकार करना है वह करे। इसमें दिक्कत यह है कि वो नहीं जानता ना कि आपकी परंपरा वो नहीं जानता है तो आके पूछे वो। सुनिए तो वो ये नहीं जानता है कि ये परंपरा के अंतर्गत वाले सिद्धांत है या फिर सनातन सिद्धांत हैं। वही उसको आके पूछना है। यहां आके पूछिए जैसे आप आके पूछ रहे हो। हां। तो वैसे वही पूछ सकता है। कोई अगर जिज्ञासा बात आप उसमें लिखते हो कि इसमें कई सिद्धांत हमारे कई सारी चीजें ऐसी जैसे मैंने गीता पढ़ी। मैं इसमें देखिए थोड़ा सा झोल आ रहा है। मैं स्पष्ट बात करूं थोड़ा थोड़ा सा अगर आप मेरी बात मेरी सुनना चाह एक मिनट 1 मिनट

00:59:57:15 इसमें क्या है कि हमने क्या किया कि बड़े ही तरीके से उसको अपनी परंपरा के अंतर्गत वाली बातें सनातन सिद्धांत के नाम पे दे दी ठीक है और उसको ये बताया ये आरोप जो है ना हम विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर पे भी लगा सकते हैं। उन्होंने भी ऐसे ही लिखा हुआ 1 मिनट 1 मिनट भाई साहब हमने दे दी रोड पे जा के जबकि उसमें कई ऐसी बातें हैं जिसके लिए उसको उन बातों को समझना होगा यहां आ करके कि वो परंपरा के अंतर्गत है। तो यदि ऐसी बातें हैं तो आपको अपनी भगवत गीता में लिखना चाहिए कि इसमें कई बातें सनातन धर्म के अनुसार हमारे किसी ने आचार्य ने शंकराचार्य जी जैसे उन्होंने भी गीता पर भाष्य दिया है। उन्होंने उन्होंने कहीं पर भी परंपरा के अंतर्गत होने की वजह से कोई सिद्धांत नहीं दिया। ऐसे माधवाचार्य उन्होंने वो सिद्धांत दिया जो सार्वभौम है। सार्वभौम हमें कहीं पर यह नहीं कहना पड़ता कि हम ऐसे हैं इसलिए ऐसा कर रहे हैं। हम तो वह वही बात करते हैं जो सार्वभौम है। भगवत गीता धर्म की धर्म की व्याख्या करते समय हम कहीं ये नहीं कहते कि भैया हमारे आचार्य ने कहा है इसलिए या फिर हमारी परंपरा में कहा गया इसलिए हम ये कहते हैं। देखो हर व्यक्ति को क्या है ना अपनी परंपरा अपनी परंपरा के विचार नहीं आपने कहा ना शंकराचार्य जी भी ऐसा करते हैं। नहीं हर परंपरा के आचार्य ने भाष्य दिया श्रीचार

01:01:12:24 ने भाष्य दिया आप समझ नहीं तो उनके उसमें कमेंट्री विचार भाष्य तो दिया है मगर ये वाला नहीं है कहीं पे भी क्योंकि हमारी परंपरा में ऐसा है अब जैसे प्रभुपाद जी ने जो गीता लिखी है ना भगवत गीता एज इट इज उसके दो आधार है एक तो श्री बलदेव विद्या भूषण जी एक विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी हम उनके आधार पर उन्होंने भगवत गीता का भाष्य किया है अपने अनुसार नहीं जो पूर्ववर्ती आचार्य वो ठीक है वो ठीक है और अब उसमें इसमें क्या है ना प्रभुपाद जी ने अनुवाद तो दे दिया अब जो तात्पर्य है जो भाष्य है भाष्य तो अपनी परंपरा के आधार पर ही किया जाएगा ना अनुवाद तो मूल रखा जाएगा जो सार्वभौम है जो भाष्य है जो कमेंट्री है वो अपने परंपरा के आधार पर ही किया जाएगा उस पर हम यही विशेषता है गीता परंपरा के अनुसार अनुसार ही होता है हां ये नियम है वो बात ठीक है भाष्य आप करो मगर यदि आप में अगर उसमें उसमें यह बात आ रही है कि उसमें सनातन नहीं सार्वभौम नहीं परंपरा के अंतर्गत आने वाले भेद युक्त बातें हैं तो या तो उसको आप क्लेरिफाई करते हुए दो सामने वाले को ये तो ये तो किसी भी आचार्य ने ऐसा नहीं किया है तो इस पर हम क्या बोल सकते हैं किसी और के ना करने से हमारे द्वारा की जाने वाली गलत चीज सही नहीं हो जाती मैं तो आचार्य नहीं

01:02:27:25 हूं ना प्रभुपाद जी आचार्य हैं विश्वनाथ जी आचार्य हैं बलदेव विद्यार जी आचार्य हैं तो फिर ऐसे तो रामपाल भी कह सकता है कि भैया कबीर ने कहा है ये चीजें मैंने थोड़ी ना इसमें अंतर है उसके कहने में और इसके कहने में अंतर है वो अंतर जो आचार्य जो भाष्य लिख रहे हैं ना हम उनका भगवान के साथ गुरु परंपरा के साथ संबंध है वो वो इसलिए लिख पा रहे अच्छा भैया एक और दूसरा भाष्य लिखने का अधिकार उसी को है जो भागवतीय परंपरा में प्रमाणिक संप्रदाय के अंतर्गत जो दीक्षित हो जो उस परंपरा में हो। अब रामपाल तो किसी परंपरा में नहीं है। अच्छा एक बात बताइए परंपरा की बात आपको करनी नहीं तो मैं फिर वो करता। चार वैष्णव आचार्य तो है ही नहीं परंपरा में चार वैष्णव आचार्य हैं। उसमें बात ये है कि आप किसी को भी किसी परंपरा का प्रामाणिक आचार्य किस आधार पर मानेंगे? जैसे कि जैसे कि शंकर आचार्य उसको कहा गया है परंपरा में जो तीन प्रस्थान पर भाष्य देता हो। श्रृति प्रस्थान यानी लिख देगा नहीं लिख पाएगा। और लिख भी लेगा तो उसका आधार होना चाहिए। बेस होना चाहिए। तो बेस होना चाहिए। हां अब मैं ये पूछ रहा हूं किसी भी परंपरा का प्रामाणिक प्रतिनिधि के रूप में हम किसी को तब स्वीकारते हैं जब पूर्वाचार्य ने उसको जैसे विद्या भूषण जी हैं वो तो ब्राह्मण नहीं थे विश्वनाथ जी ब्राह्मण नहीं थे

01:03:42:28 मुझे करने दीजिए ना तो किसी भी परंपरा का प्रामाणिक प्रतिनिधि तब किसी को माना जाएगा जब उसको उसके पूर्वाचार्य के द्वारा नियुक्त किया नियुक्त किया जाएगा बिल्कुल ठीक है तो अब मुझे आप ये बताइए कि प्रभुपाद जी को किसने नियुक्त किया उनके गुरुदेव ने क्या नाम था इनका नाम श भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद नियुक्त किया और उनको उनके गुरु ने नियुक्त किया वो क्या नाम भक्ति विनोद ठाकुर अच्छा उनके उनके गुरु थे श्री जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज अच्छा ठीक है उनके गुरु थे श्री विश्वनाथ चतुर्व बलदेव विद्याभूषण मधवाचार्य से कनेक्शन कहां पे आ रहा है ईश्वरपुर पाद ईश्वर पुरपाद माधुनपुर पाद लक्ष्मी तीर्थ एक मिनट ईश्वरपुर पाद से पहले कौन है माधुनपुर पाद जी हां उससे पहले कौन है लक्ष्मी तीर्थ लक्ष्मी तीर्थ लक्ष्मी तीर्थ के समय में जो आनंद तीर्थ थे आनंद तीर्थ की गद्दी पे बैठे थे यानी कि मधवाचार्य जी की गद्दी पर बैठे थे हम वो कौन थे माधवाचार्य के आज मैं मैं आपको बताता हूं जैसे आज के टाइम में शंकराचार्य हैं ठीक है पूरी के शंकराचार्य मान मैं उनसे दीक्षित भी हूं हम परंतु क्या मैं बिना शंकराचार्य की परमिशन के हम है ना शंकराचार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं क्या शंकर परंपरा का बिल्कुल नहीं कर सकता

01:04:58:07 वो तो गुरु तो आगे नियुक्त करता उस समय मधवाचार्य की गद्दी थी ना

⬜ Not used yet · 01:05:03:10 – 01:05:29:10 (0:26)

01:05:03:10 माधवाचार्य ने अपनी गद्दी दिया पद्मनाभ तीर्थ को पद्मनाथ तीर्थ ने अपनी गद्दी दी नरहरी तीर्थ को नरहरी तीर्थ ने अपनी गद्दी दी माधव तीर्थ को और माधव तीर्थ ने अपनी गद्दी दिया अक्षोभ तीर्थ को उन्होंने जय तीर्थ को फिर उन्होंने ज्ञान सिंधु को फिर दयानिधि को फिर विद्यानिधि को फिर राजेंद्र तीर्थ को उसके पश्चात फिर

✅ This part is already used · 01:05:29:10 – 01:31:43:25 (26:14)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 6:22 ↗

01:05:29:10 आपके पास कौन आया है? मधवाचार्य परंपरा से सीधे माधुन पाद जी आए हैं। वो वो उस समय जगतगुरु मधवाचार्य की गद्दी पर थे। देखो वैष्णव परंपरा क्या नियम है कि एक वैष्णव के कई शिष्य हैं। एक शिष्य नहीं है। तो शिष्य कई है तो और वही वो गुरु उनको नियुक्त करते हैं। मैं आपको बता रहा हूं। मेरा प्रश्न ये है कि जो आपके पास आए हैं क्या बताया आपने? श्रीपाद माधुन्य पुरपाद माधुन्य पुरपाद तो ये स्वयं तो आनंद तीर्थ की गद्दी पे नहीं थे। जगतगुरु मधवाचार्य की गद्दी पे जो मधवाचार्य भाई साहब मैं प्रश्न पूछ रहा हूं जो जगतगुरु मधवाचार्य उनकी गद्दी पे ये नहीं थे। ठीक है अब बात ये है कि अगर ये नहीं थे तो क्या मधवाचार्य जी के प्रतिनिधि के रूप में ख्यापित होने के लिए इन्होंने उस समय के जगतगुरु मधवाचार्य जी की परमिशन ली थी कि नहीं? हां बिल्कुल जो जिन जिन आचार्य से उन्होंने दीक्षा लिया उन्हीं आचार्यों ने इनको नियुक्ति किया कि आप देखिए मैं इसमें सवाल ये क्यों कर रहा हूं समझ लीजिए मैंने शंकराचार्य जी से दीक्षा शंकर परंपरा में थोड़ा अलग नियम हो सकता है नहीं मैं नहीं वो नहीं कह रहा हूं मैं तर्कपूर्ण बात कर रहा हूं मैं शंकर परंपरा का नियम नहीं पूछ रहा हूं मैंने शंकराचार्य जी से दीक्षा ले ली अभी मैं शंकर का प्रतिनिधित्व कर सकता हूं कि नहीं और मैं सही चीजें कर सकता हूं नहीं इसकी मुझे परमिशन

01:06:44:16 लेनी होगी लेनी होगी बिल्कुल और जब परमिशन शिवश नारायण द्विवेदी हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे तब मैं शिवश नारायण द्विवेदी के रूप में करूंगा। अच्छा ये हो तो ये भी सकता है कि मैंने दीक्षा ले ली उसके बाद मैं अपने मन की बात करूंगा ये नहीं होगा तो तो इसलिए परमिशन अनिवार्य है परमिशन वो परमिशन कहां है? वो परमिशन दिया माधवीपुर पाद जी को फिर माधवी नहीं वो परमिशन कहां है जो परमिशन हुई है मधवाचार्य वाले वो परमिशन लेटर है कोई अपने पास नहीं ये तो या मधवाचार वाले आपको बता रहा हूं वो तो मैं अपनी परंपरा से जो चली आ रही हमारी प्रणाली है और जो हमारे गौ वैष्णव अभिया ग्रंथ में जो लिखा हुआ है मैं तो उसके अनुसार बता रहा हूं नहीं अब उसमें क्या है उन्होंने आपको ये परमिशन बताई है कि नहीं ये वाली हां बिल्कुल बताइए परमिशन अब जैसे हम ही लोग हैं अब हम लोग गुरु नहीं हो सकते हैं जब तक हमारे गुरुदेव हमें अथुराइज हां तो इसी प्रकार से जो माधुन्यपुरी तीर्थ हैं इन्होंने तत्कालीन जगतगुरु मधवाचार्य जी से परमिशन िशन ली थी कि नहीं? बिल्कुल लिया था। वो परमिशन कहां है? अब वो परमिशन तो मेरा काम नहीं ढूंढना। वो तो आप लोग ढूंढो। लेकिन जो हमें बताया गया है परंपरा बताया गया मगर आपको वो परमिशन लेटर दिखाया नहीं है। लेटर हर चीज का क्या है ना गुरु शिष्य परंपरा होता

01:07:59:20 है। जैसे मैं मैं बता मैं उसके लिए भी बता रहा हूं। अगर परमिशन लेटर नहीं है। आज के जो वर्तमान के प्रामाणिक मधवाचार्य की गद्दी पर बैठे हुए हैं। क्या वो ये परमिशन दे रहे हैं। उन्होंने हमारे गुरुदेव को तो आचार्य स्वीकार किया जब हम उड़ीपी गए थे। कहां लिखा है? अब उन्होंने लिख के तो नहीं दिया लेकिन उन्होंने सामने बोला हमारे हम लोग सब बैठे थे वो आए थे बात तो यहां तक कि वो आज के जो वर्तमान माधवाचार्य में जो बैठे हैं गद्दी में वो हमारे मंदिर भी आ चुके हैं गौम भी जा चुके हैं मंदिर राघवाचार्य जी भी आ चुके हैं मगर राघवाचार्य जी ने नहीं मतलब वो स्वीकार करते हैं मंदिर तो आज मैं भी आया हूं नहीं तो आप कल को ये भी कहने लगोगे शिवा नारायण भी ऐसा नहीं मेरा उद्देश्य ये है कहने का कि वो हमारी परंपरा को हमारे आचार्यों को उन्होंने एक्सेप्ट किया है नहीं नहीं किया मेरी जानकारी में नहीं किया है। लेना देखिए मैं आपको एक बात बता मैं कंफर्म भी करूंगा मगर देखिए मैं फिर बता रहा हूं। किसी के ना होने का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं होती है। किसी के होने का प्रमाण देखो मैं जो बोल सकता हूं ना मैं अपनी परंपरा का जो हमारी परंपरा चली आ रही है उसका बोल सकता हूं। कहीं पे तो स्टेटमेंट आज के उनके द्वारा दे दिया जाए। ऑफिशियली वो रूप से वो आपका विषय है। मेरा विषय तो अपनी परंपरा को बता मेरे पास ऐसे लेटर मुझे प्राप्त है जहां पर मधवाचार्य परंपरा जैसे आपने पूछा कि परपाद को

01:09:14:24 आचार्य कृष्ण ने घोषित किया उनके गुरु ने किया उनके गुरु को उनके गुरु ने किया तो ये परंपरा चली आ रही मधवाचार्य परंपरा जो आज के प्रामाणिक वो हैं आनंद तीर की गद्दी पे बैठने वाले उन्होंने ऑफिशियली स्टेटमेंट दिया है कि इस हमारे से जुड़ा हुआ नहीं है। हां उपासना में अंतर है। नहीं हमारा वो नहीं है वो परंपरा में नहीं है इसको नहीं ऐसा नहीं है आचार्य वैष्णव संप्रदाय की एक उपशाखा भी हुई है चारों वैष्णवों की नहीं तो हमें सुनिए तो हमें यह प्राप्त है कि आप उनकी परंपरा में नहीं हो अब हो अब यदि हो तो आपको प्रोवाइड करानी चाहिए हमें वो चीज हां परंपरा मैं आपको गिना रहा हूं आप अगर स्वीकार करो नाम बोलने से नहीं आज के जो वो वो ढूंढना आपका काम है मैं तो नाम गिना सकता समर्थक आप हो ना इसको मैं तो नाम नहीं गिना सकता हूं आपको तो यानी कि हमारे पास कोई ऐसा प्रमाण नहीं है जिसके कारण हम मान सके मधवाचार परंपरा इसको अपना मानती है। बहुत सारे प्रमाण है। मैं आपको प्रमाण दे दूंगा। अच्छा यह बताइए कि यदि आज के जो आनंद तीर्थ की गद्दी पर बैठने वाले मैं आज की बात नहीं कर रहा हूं। माधव संप्रदाय से गौ वैष्णव सुनिए सुनिए मधवाचार्य जी ने क्या माना है क्या नहीं माना है ये हमें कौन बताएगा आज के टाइम में? उनका जो प्रामाणिक गद्दी पे बैठा होगा वही तो बोलेगा। मैं ये इसको और क्लियर करता हूं। जो मधो संप्रदाय

01:10:30:00 है ना उसकी उपशाखा है गीय संप्रदाय जैसे बिना बिना मधवाचार के आपकी गौ संप्रदाय का अस्तित्व भी सिद्ध नहीं होगा चैतन्य महाप्रभु ने इसको स्थापित किया ऐसे तो बुद्ध को भी मान लो फिर अगर भगवान के नाम पे मानना है तो बुद्ध को मान लो चैतन्य महाप्रभु यज्ञ का ही विरोध हो गया नहीं चैतन्य महाप्रभु ने जो हमको बताया है जो अच्छा इसमें भी एक दिक्कत है कि चैतन्य महाप्रभु ने क्या बताया क्या नहीं बताया इस पे भी बहुत सारी बातें हो सकती है क्योंकि उनका [हंसी] खुद का चैतन्य चरितामृत चैतन्य उन्होंने खुद लिखा है उनके शिष्य हैं वृंदा दास ठाकुर तो फिर हमें पहले शिष्यों पर विश्वास करना होगा उनके परिकर हैं जैसे उनके एक उनके साथ में ही है परबंद सरस्वती सरो दामोदर राम राय चलिए परंपरा परंपरा वाली बात तो अभी हमारी होनी है ना नहीं अब इसमें तो हम इतना ही बोल सकते हैं क्योंकि आपने कहा इसको और डिटेल दी स्टडी तो किया ही हुआ है स्वामी से भी आए हैं ना चेतन प्रभु नहीं नहीं उनसे नहीं आए हैं श्रीधर स्वामी से नहीं आए हैं अच्छा ठीक शेर स्वामी से कोई संबंध नहीं उनका इस पे भी बात करें अगली बार करेंगे कर सकते हैं इस बार तो आपने कहा कि चैतन महाप्रभु हां तो चैतन्य महाप्रभु ने भागवतम कहां से पढ़ी चैतन्य महाप्रभु ने भागवत जो सुनते थे वो सुनते थे गदाधर पंडित जी के मुख से ये

01:11:45:06 में चैतन्य चरितमृत में अच्छा और उन्होंने ये कहा है कि मैं भगवान कृष्ण को जान पाया हूं भागवत को जान पाया हूं श्रीधर स्वामी के कारण हां इसमें गलत क्या है ये इसके पीछे रहस्य है ना वो क्या रहस्य श्रीपाद वल्लभाचार्य हम अपनी सुबोधनी टीका लेकर गए थे चैतन्य महाप्रभु के पास हम तो उन्होंने महाप्रभु को अपनी सुबोधनी टीका दिखाई हम और उन्होंने यह वचन बोल दिया कि मैंने पूर्ववर्ती आचार्यों से मतलब उन्होंने ऐसे ही बोल दिया था ये वो वो मानते नहीं थे ऐसा मगर उन्होंने बोल दिया था उन्होंने बोला कि हे महाप्रभु देखो मैंने श्रीधर स्वामी से भी और अच्छी व्याख्या से भी नहीं हां श्रीधर स्वामी जी से भी अच्छा उन्होंने लिखा वल्लभाचार्य जी ने तो ऐसा कहा मगर मैं यह कह रहा हूं नहीं इसको पूरा सुनोगे तब कनेक्ट कर पाओगे आप तो श्रीधर स्वामी तो प्रमाणिक है ना भागवत के प्रथम टीकाकार हैं श्रीधर स्वामी उनको तो कोई उनका तो कोई विरोध ही नहीं कर सकता है वो तो मतलब भागवत के प्रथम टीकाकार है श्रीधर स्वामी श्रीधर स्वामी ने भागवत पर भावार्थ दीपिका नामक टीका लिखी हुई है अब वल्लभाचार्य जी ने ऐसे वचन बोले तो तब महाप्रभु बोले कि श्रीधर स्वामी अनुगत कर भागवत श्रवण जगतगुरु श्रीधर गुरु कर

01:13:00:07 मानी कि श्रीधर स्वामी के अनुग में अगर भागवत सीख रहे हो समझ रहे हो तो वही प्रमाण है उसी को मैं प्रमाण मानता हूं क्योंकि श्रीधर स्वामी जगतगुरु हैं वो भागवत पर उन्होंने सबसे पहले भाष्य दिया है नहीं उन्होंने कहा कि मैं उनकी वजह से ही भागवत को जान पाया हूं उनके उनसे ही ऐसा ही पढ़ा है ऐसा भी कहा है तो गलत नहीं कहा है वो ब्रह्मांड के गुरु हैं हां हां बिल्कुल जगत गुरु बोला श्रीधर स्वामी अनुगत कर भागवत श्रवण जगुरु बोला यानी शंकराचार्य को जगतुगुरु बोला नहीं अब ये तो आप बोल रहे हो लेकिन चैतन्य चरितामृत में जो लिखा है वो मैं बता रहा हूं वहां पर ये तो आपका मानना है श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड क्या है नहीं पहले मैं इसको डिटेल कर लेता हूं श्रीधर स्वामी जी के लिए महाप्रभु ने ऐसा कब बोला क्यों बोला वही मैं आपको बता रहा हूं क्योंकि श्रीधर स्वामी तो सबके लिए आदरणीय है हम भी उनकी टीका पढ़ते हैं भावार्थ दीपिका आदरणीय होना गुरु मानने में अंतर गुरु भी हैं आदरणीय भी हैं आचार्य भी हैं सब कुछ हमारे लिए वो उनकी कृपा से हम भागवत समझ सकते हैं। वो तो हम भी स्वीकार करते हैं। हम भी मानते हैं। हम भी इसको मानेंगे। क्योंकि श्रीधर स्वामी का यानी यानी विरोध करेंगे। मतलब जो श्रीधर स्वामी से जो भागवत है वो नहीं ली उन्होंने। किन्होंने? चैतन्य महाप्रभु। चैतन्य महाप्रभु ने भागवत लिखा ही नहीं। लेने की क्या बात है?

01:14:15:08 श्रीधर स्वामी चैतन्य महाप्रभु के समय में मुख्य रूप से श्रीधर स्वामी जी की ही भागवत अवेलेबल थी। उसके बाद अनेक आचार्यों ने भाषण दिया भागवत पर। श्रीधर स्वामी से ही पढ़ा भागवत हां बिल्कुल श्रीधर स्वामी के आप ये कह रहे हो कि गिरधर जी से लिया था किनसे लिया था गिरधर जी से सुना था नहीं गदाधर पंडित के मुख से सुनते थे मगर थी वो श्रीधर स्वामी की श्रीधर स्वामी ने जो भाष्य लिखा था वो उनके मुख से सुना था गदाधर पंडित बात वही हो गई श्रीधर स्वामी से ही हां हां इसमें विरोध किया है इस विरोध ये है कि जिससे हम श्री कृष्ण को तात्विक रूप से समझ पा रहे हैं तो वही तो हमारा गुरु सिद्ध हुआ हां श्रीधर स्वामी सबके गुरु इस क्या है सबके तो चैतन महाप्रभु के गुरु हुए ना शिक्षा गुरु हुए ना दीक्षा गुरु कहां हुए दीक्षा गुरु तो माधुनिपाद हुए आप जो कहते अब मैं कहता हूं जैसे मेरे गुरु माधवाचार्य भी मेरे गुरु वल्लभाचार्य जी भी हैं जिनसे मैं शिक्षा ले रहा हूं जिनसे मैं सीख रहा हूं वो मेरे गुरु हैं सर यही हमारे क्या बताया गया है गुरु चार प्रकार के हैं शास्त्रों में जीव गोस्वामी लिखते हैं पहले हैं दीक्षा गुरु शिक्षा गुरु श्रवण गुरु पथ प्रदर्शक गुरु चेत गुरु पांच प्रकार के गुरु का वर्णन शास्त्रों में दिया आप सीधा उनको जीव गोस्वामी जीव गोस्वामी के शास्त्र अब मैं आपको तीन गुरुओं का वर्णन बता रहा हूं हां हो सकता है सुनिए सुनिए

01:15:30:16 भागवत में लिखा है होगा भागवत में दसव स्कंध में लिखा है तीन प्रकार के गुरु पहले माता-पिता जो जन्म दे हां दूसरे जो संस्कार करें वो और तीसरे वो गुरु जो आपको तात्विक ज्ञान दे ज्ञान दे भी ठीक है तो परम गुरु कौन कहा गया है जो तात्विक ज्ञान दे तात्विक ज्ञान दे ठीक है तो तात्विक ज्ञान किसने दिया गुरु देते हैं नहीं उनको किसने दिया चैतन्य महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु को ज्ञान दिया ईश्वर पुरपाद जी नहीं श्रीधर स्वामी की टीका से तात्विक ज्ञान आया उनके पास वो भी गुरु बोला किसी ने भी हो वो भी गुरु हैं तात्विक ज्ञान उन्हीं से आया श्रीधर स्वामी भी गुरु हैं तत्व का ज्ञान किससे आया कौन से तत्व का ज्ञान भागवत तत्व श्रीधर स्वामी भाई श्रीधर स्वामी तो सबके गुरु है सब उन्हीं से सीख रहे हैं वो तत्व का ज्ञान किससे आया तत्व शिक्षा गुरु के रूप में उनको स्वीकार किया शिक्षा गुरु नहीं पूछ रहे हैं मैं पूछ रहा हूं तत्व का ज्ञान किससे आया नहीं आप वो ये कह रहे हैं मैं तो शास्त्र के अनुसार बोलूंगा ना आपको शिक्षा गुरु बोल रहे हो आप दीक्षा गुरु बोल रहे हो मैं ये नहीं बोल रहा पथ गुरु बोल क्या बोल रहे हो मैं ये बोल रहा हूं कि भागवत में कहा गया है जो तत्व का ज्ञान दे ब्रह्म का ज्ञान दे तो तत्व का ज्ञान भागवत से आता है और भागवत श्रीधर स्वामी जी से आया इसमें गलत क्या है हां तो आया ठीक है इसमें गलत श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड क्या है वो कौन देखो उनका जो बैकग्राउंड है वो

01:16:45:22 तो बहुत विस्तार का विषय है उसमें विद्वानों के मतभेद है वो अलग विषय है आपके अनुसार क्या है मेरे अनुसार श्रीधर स्वामी वैष्णव संप्रदाय में है और वैष्णव है। ठीक है। तो वो जीव गोस्वामी और हमारे आचार्य के अनुसार कहां रहते थे? इस पर मैं विस्तार से आपको अभी नहीं बता पाऊंगा क्योंकि मुझे याद नहीं है। आपके संप्रदाय में भी उनको शंकराचार्य की गद्दी पे बैठा हुआ माना गया है कि नहीं? नहीं माना गया है। माना गया है। आपके यहां पर लिखा हुआ है। कहां पे लिखा हुआ है? मैं आपको ये यहां स्क्रीन पे लगा दूं। मुझे लगा देना आप। ठीक है। मुझे दिखा देना। कि ये वाली कई सारी चर्चाएं हैं कि भाई मायावादी के सिद्धांत को क्यों माना? ऐसे टाइटल है उन चर्चाओं का और वो यहां पे मैं लगाऊंगा। मुझे हमारे गौ वैष्णव जो आचार्य है ना उनके ग्रंथोचार एक बार दिखा। मैं इस से दिखाऊंगा ना इस क्या कह रहा है? इस के कई सारे लेख प्राप्त है मुझे। आपकी दृष्टि में स्कॉन और घोड़े वैष्णव अलग हो सकते हैं। लेकिन मेरी दृष्टि में दोनों वर्णाश्रम को लेकर के तो बिल्कुल अलग हैं। वो आपकी दृष्टि में शिव जी वाली बात आपने मान ली है। शिव जी वाली बात आपने मान ली है तो बात अलग है। नहीं तो आपके यहां के लोग ही कहते हैं चातुर वर्ण मया सष्टम और विवाह तो कर्म के हिसाब से जो जो करेंगे नहीं नहीं आप जो है ना विषय को ऐसे घुमा रहे हो। मूल बात ये है कि श्रीधर स्वामी को हमारे आचारों ने क्या माना है वो मैंने आपको बताया। ठीक है ठीक और चैतन्य महाप्रभु ने उनको

01:18:00:26 क्यों बोला स्वामी को आपने वैष्णव मान लिया वैष्णव है वो शंकराचार्य नहीं थे वैष्णव थे शंकराचार्य कुछ विद्वान उनको शंकर संप्रदाय मानते हैं अरे भैया आपके विद्वान प्रामाणिक विद्वान हमारे विद्वान तो गौ जो हमारे विद्वान है उनको वैष्णव मानते हैं तो आपके इस के कौन लोग नहीं यार इस तो जानता ही नहीं उनको इसन नहीं जानता इस में उनको कौन जान रहा है इसन सीधा स्वामी को नहीं जानता कितने लोग जान रहे हैं प्रभुपाद को जान ले वो बहुत बड़ी बात है। आप यह बताइए कि कि गौडिया वैष्णो मैं तो गड़िया वैष्णव की बात कर रहा हूं। यहां हमारे आचार्य हैं। तो अभी मैं कहां बैठा हूं? स्कॉन में बैठा हूं। गौ वैष्णव आप गय परंपरा और इस दोनों में बैठे हो। स्कॉन ही गण इसन है ना? हां तो इस मतलब अलग क्यों कर रहे हो? इसन मतलब प्रभुपाद जी। तो अभी मैं कहां बैठा हूं? प्रभुपाद के पास, गौ वैष्णव के पास कि इस के पास? तीनों के पास। तीनों के पास। तो फिर मैं इस से रिलेटेड सवाल कर सकता हूं ना? हां जब तीनों यहां पे लेकिन जो इस से रिलेटेड सवाल आप कर रहे हो जो मैं बता रहा हूं उसको आपको एक्सेप्ट करने का प्रयास करना चाहिए। अरे भैया जब आप जब कोई दूसरा कुछ बोल रहा है ना उससे प्रमाण मांग लो आप जाके कोई अगर कुछ बोल रहा है इस कौन क्या नहीं मैंने प्रमाण मांगा उसने दिया है भाई किसने दिया कि हम उस उनके जो है प्रमाणिक लोग हैं वही तो मैंने आपसे शुरू में प्रश्न कर रहा था आपने उसको छोड़ दिया मैं प्रश्न कर रहा था कि भाई

01:19:16:00 जब दो लोग हैं दोनों कह रहे हैं मैं इस कौन का हूं दोनों कह रहे हैं मैं गौ वैष्णव हूं तो हम किसी एक की बात को कैसे मानेंगे जो प्रमाण दे सके तो आपने प्रमाण क्या दिया दूंगा आपको इस बारे में कि वो शंकराचार्य नहीं थे मैं ये प्रमाण दूंगा कि वो वैष्णव थे शंकराचार्य नहीं थे इस बारे में क्या प्रमाण है इस पर मैं जो हमारे वैष्णव ने जो हमको बताया मैं वो दे सकता हूं ठीक है दुर्जन तो उसने फिर वही वाली बात है कि [हंसी] जो वैष्णवों ने बताया वो मैं आपको बता रहा हूं जो हमारे आचार्य नेता वही बात हो जाएगी रामपाल कह देगा जो कबीर ने बताया वो मैं आपको बता रहा हूं फिर आप कहोगे प्रस्थान पे जो भाष्य लिखेगा वो होगा अब मैं आपसे प्रश्न कर रहा हूं कि आप बात अब जो मेरे पास ज्ञान आ रहा है 1 मिनट 1 मिनट अब ये बताइए कि प्रभुपाद जी ने प्रस्थान त्रय पर भाष्य लिखा है या नहीं लिखा है लिखा हुआ है किस-किस पर लिखा है बताइए शीशोपनिषद पर भगवत गीता पर मतलब मतलब किसी भी एक उपनिषद में लिख दें कि वो प्रस्थान में भाष्य में हां बिल्कुल हां बिल्कुल होता है किसी भी एक उपनिषद पर क्योंकि उपनिषद क्या है वो प्रस्थान में आता है हां बिल्कुल अच्छा चलिए ठीक है तो अब दूसरी एक बात ये आ जाती है कि ये वाली जो बात चल रही है ना ये क्या कहते हैं ये अ क्या चल रही थी अभी बात भाई श्रीधर स्वामी जी की श्रीधर स्वामी हां उसमें

01:20:31:06 दुर्जन तो उस न्याय पे आते हैं कि आपने आपने कह दिया कि वैष्णव थे। मैंने नहीं कहा हमारे गौर वैष्णव देखिए मैंने आपसे चर्चा के पहले ही पूछा था कि आप अगर यह कहने वाले हैं कि हमारे आचार्य ने कहा है तो फिर चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है। आपने नहीं कहा हम आपके आचार्य से बात कर लेंगे। फिर आप क्यों हमारे आचार्य आप विश्वनाथ जी तो अभी है नहीं। तो है नहीं तो फिर उनकी बात आप उनकी बात बोल रहे हो तो उनकी बात को आपको सार्थक सिद्ध करना पड़ेगा ना। मैं प्रमाण दे रहा हूं ना। तो आप ये मत कहो उन्होंने कहा हम तो ये आपको प्रमाण दे तो रहा हूं। नहीं तो ये कहां दे रहे हो आप कि वो शंकराचार्य हम आपको प्रमाण दे रहे हैं। शंकराचार्य हैं। आपके खुद के इस के लोग कह रहे हैं वो शंकराचार्य थे। आप कह रहे हो शंकराचार्य नहीं थे। मगर फिर भी अब मैं एक बात ले लेता हूं आपकी कि वो जो है वैष्णव थे। ठीक है? तो अब ये बताइए कि उनके गुरु कौन थे वैष्णव में? देखो श्रीधर स्वामी के विषय में हम जो हमारे वैष्णव आचार्य ने बोला है ना मैंने उतना ही पढ़ा हुआ है। आप डिटेल में पढ़ना है नहीं डिटेल में मैं आपको भेज दूंगा। देखिए सुनिए एक बात आ रही है जैसे वैष्णव हैं इसलिए ऐसा मानते हैं। एक मिनट आप फोन रख लीजिए तो मेरा ध्यान भटक रहा है तो नहीं नहीं कोई नहीं आप बोल दीजिए। आप वैष्णव हैं इसलिए हम ऐसा मानते हैं। वो हमारे आचार्य हैं इसलिए हम ऐसा ये बहुत बड़ा ये बहुत बड़ा एक ड्रॉबैक होता है। ऐसा नहीं है। सुन लीजिए।

01:21:46:19 दे रहा हूं। मैं मैं क्या कह रहा हूं सुनिए। सुनिए। ड्रॉबक तब होता है जब प्रमाण ना दो। मैं एक मिनट आप रख दीजिए। मेरी बात सुन लीजिए। मैं बताता हूं आपको एक चीज। हम हम वैष्णव भक्ति करने से पहले कोई वैष्णव नहीं है तो उसको वो बात मत कहिए कि वैष्णव है तो ये मान लो। ठीक है? ऐसे ही जब तक कोई आचार्य सिद्ध नहीं हो रहा है तब तक उसको आचार्य के रूप में मानकर उसका शब्द प्रमाण कैसे जो हमारे वैष्णव आचार्य ने दिया ना प्रमाण आपको मैं आपको मैं आपको बता रहा हूं। कोई भी व्यक्ति आचार्य तब हो सकता है जब वो आचार शास्त्रों में लिखे हुए आचरण को अपने शिष्य में प्रतिष्ठित करे। श्रीधर स्वामी के विषय में प्रभुपाद जी ये लिखे हुए हैं। चैतन्य चरितामृत क्या लिखे हुए हैं? आगे पढ़ सकते हो इसको थोड़ा जोर से पढ़ना चाहो। नहीं आप पढ़िए ना आप आप पढ़ो ज्यादा अच्छा लगेगा। मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूं। मैं आंग्ल भाषा कम पढ़ पाता हूं। श्रीमद् भागवतम हैज़ मेनी टीकास और कमेंट्रीज फॉलोइंग द परंपरा सिस्टम। हम बट श्रीधर स्वामी इज फर्स्ट टू द कमेंट्रीज ऑफ ऑल द अदर आचार्य फॉलो ह द परंपरा सिस्टम डज नॉट अलाउ वन टू डिवाइडेड फ्रॉम द कमेंट्रीज ऑफ द प्रीवियस आचार्य बाय डिपेंडिंग अपॉन द प्रीवियस आचार्य वन कैन राइट ब्यूटीफुल कमेंट्रीज

01:23:03:03 हॉरवेवर ऑन कैन नॉट डेफी द प्रीवियस आचार्य मतलब प्रभुपाद जी बहुत सारे चीज दिए हुए हैं और नहीं वो क्या है कि वो क्या था उनका बैकग्राउंड हां वही मैं बता रहा हूं जैसे हमारे सुनिए तो सुनिए सुनिए मैं एक बहुत आसान कर देता हूं आप बैकग्राउंड बोल मैं बता रहा हूं मैं एक मिनट मैं आसान कर दूं हमने अपनी परंपरा प्रभुपाद जी से लेकर कृष्ण तक गिना दी बीच में श्रीधर स्वामी आ रहे हैं जो आपको भागवतम का ज्ञान दे रहे हैं। ठीक है तो पहली बात तो यह है कि हमें श्रीधर स्वामी के गुरु का नाम क्यों नहीं पता है वह कृष्ण उसी परंपरा से तक कैसे जा रहे हैं अगर वैष्णव है तो उसी परंपरा में जानी चाहिए ना क्योंकि उनसे हम भागवतम ले रहे हैं तात्विक ज्ञान ले रहे हैं और परम गुरु वही है जो तत्व का ज्ञान दे ब्रह्म का ज्ञान दे भागवत के अनुसार हां थोड़ा जो हमारे आचार्य बोले मैं थोड़ा आपको सुनाना चाहता हूं हां ठीक है सबसे पहले तो चैतन्य महाप्रभु बोलते हैं श्रीधर स्वामी प्रसाद भागवत जानी जगतगुरु श्रीधर स्वामी गुरु कर मानी हम श्रीधर अनुगत कर भागवत व्याख्यान अभिमान छाड़ी भज कृष्ण भगवान हम श्री चैतन्य महाप्रभु कह रहे हैं श्रीधर स्वामी की कृपा से ही ये आप ना मामले को थोड़ा सा बढ़ा रहे हो आप काफी आप डिटेल में आप सुनना चाह रहे

01:24:18:04 थे आप हम लोग यहां पे आ चुके हैं कि श्रीधर स्वामी का बैकग्राउंड बताइए वहां पे वार्तालाप हो चुका है श्रीधर स्वामी का जन्म गुजरात प्रदेश में हुआ था हां उनके के आविर्भाव काल के संबंध में कोई प्रमाणिक सामग्री ना होने के कारण कुछ अधिक कहने का उपाय नहीं। हम्म फिर भी इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि अद्वैतवादियों ने उनकी स्थिति काल के संबंध में जो अटकलें लगाई हैं वह बिल्कुल निराधार हैं। मध मुनि ने अपने ग्रंथों में उनका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। केवल इसी के आधार पर उनका समय मध्य के बाद स्थिर करना युक्ति युक्त नहीं है। श्रीधर स्वामी ने वेदांत या उपनिषद आदि का कोई भाष्य नहीं लिखा है। यही कारण है कि माधवाचार्य जी ने अपने ग्रंथों में उनका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। अन्यथा वे अवश्य ही श्रीधर स्वामी का उल्लेख करते। श्रीधर स्वामी ने अपने गीता भाष्य में एक शंकर का ही उल्लेख किया है। इससे प्रतीत होता कि वे शंकराचार्य शंकर के पश्चात और माधवाचार्य से पूर्व किसी समय में प्रकट हुए शंकराचार्य के पश्चात

01:25:33:15 और से पूर्व श्री रामानुजाचार्य ने प्रधानतः विष्णु पुराण का अवलंबन कर अपने श्री भाष्य की रचना की है। आचार्य श्रीधर स्वामी ने भी विष्णु पुराण की एक टीका लिखी है। यदि श्री रामानुज को उनकी टीका का पता होता, तो वे अवश्य ही अपने ग्रंथों में उनका उल्लेख करते तथा उसके वचनों को प्रमाण तथा उनके वचनों को प्रमाण स्वरूप उद्ध्रित करते। किंतु देखा जाता है कि ना तो रामानुजाचार्य जी ने श्रीधर स्वामी का तथा ना ही श्रीधर स्वामी ने रामानुजाचार्य का कहीं उल्लेख किया है। ऐसी अवस्था में यह निश्चित रूप से हम कैसे कह सकते हैं कि इनमें कौन आगे व कौन पीछे? मायावादी लोग आज भी उनको अपने संप्रदाय के अंतर्भूत बनाने के लिए खींचातानी कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि श्रीधर स्वामी ने पहले पहल किसी अद्वैतवादी के संघ के प्रभाव से अद्वैत मत ग्रहण किया था। इस बात का कुछ-कछ आभास उनकी रचित टीकाओं से मिलता है। हम उस समय परमानंद तीर्थ नामक एक वैष्णव सन्यासी शुद्धा द्वैत मत का प्रचार करते थे। यह श्री नरसिंह देव के उपासक

01:26:48:28 हम शुद्धा द्वैत के आदि आचार्य श्रीमद् विष्णु स्वामी का स्थिति काल शंकराचार्य से बहुत पहले है। वे आदि विष्णु स्वामी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इन्हीं की शिष्य परंपरा में परमानंद तीर्थ एक सन्यासी प्रचारक थे। इन्हीं की कृपा से श्रीधर स्वामी ने अद्वैत मत का परित्याग कर शुद्धाद्वैत मत में दीक्षा ग्रहण की। अब इनको इस बात का विश्वास हो गया था कि अद्वैत ज्ञान द्वारा यथार्थ मोक्ष प्राप्त करना कठिन ही नहीं असंभव है तथा भगवत भक्ति ही मोक्ष का एकमात्र उपाय है और उपय दोनों हैं। उन्होंने गीता की टीका में लिखा हुआ है श्रुति स्मृति पुराण वचनाम सती समजानी भवंती तस्माद भक्ति रेव मुक्ति हेतु रीति सिद्धम परमानंद श्री पादार रज श्री धारणी धना श्रीधर स्वामी यतिना कृता गीता सुबोधना यदि मायावादियों का यह कथन सत्य मान भी लिया जाए कि श्रीधर स्वामी मायावादी संप्रदाय के हैं तो क्या अद्वैतवादी उनके गीता के उपरोक्त सिद्धांत सिद्धांत को स्वीकार कर सकते हैं। यदि वे स्वीकार जो मैंने अभी आपको श्लोक सुनाया श्लोक बताइए कि परमानंद इसका अर्थ

01:28:04:12 यही है कि परमानंद श्रीपाद रजि इसमें श्रीदेव स्वामी यही कह रहे हैं कि मैंने उनसे ही उनकी कृपा प्राप्त किया। किनसे परमानंद तीर्थ जो उनके संप्रदाय में किनके विष्णु स्वामी परमानंद तीर्थ हां इस श्लोक का बाद में अनुवाद करते रहना आप इस श्लोक का बाद में अनुवाद करते रहना आप तो उनके गीता के उपरोक्त सिद्धांतों को स्वीकार कर सकते हैं। यदि वे स्वीकार नहीं करते गीता का सिद्धांत नहीं है तो उनके अपने साथ घटित हुई गीता में जो ये उन्होंने लिखा हुआ है ये वचन जो लिखा हुआ है इस विचार को हां वो क्या स्वीकार कर पाएंगे या नहीं ऐसा बोल रहे हैं यदि वे स्वीकार नहीं करते तो उनको मायावादी संप्रदाय के अंतर्गत घसीटने का व्यर्थ चेष्टा ही क्यों करते हैं श्रीधर स्वामी की गीता के टीका के संबंध में एक आश्चर्यजनक इतिहास है वह घटना इस प्रकार है एक समय श्रीधर स्वामी समस्त तीर्थों का भ्रमण करते-करते काशी में पधारे। उन्होंने वहां कुछ दिनों तक ठहर कर गीता की सुबोधनी टीका लिखी और सर्वप्रथम वहां के पंडित समाज ने उसे चालू करने के लिए प्रयत्न किया। किसने? श्रीधर स्वामी जी ने। तो अब टीका के सिद्धांतों को अद्वैतवाद बैकग्राउंड। हां गुजरात। वही हां काफी लंबा हो गया। हम बहुत विस्तार से समझाया। ये हमारे आचार्यों

01:29:19:13 का तो वही बता रहा हूं। इसमें पहली बात ये कि आ जाती है आचार्य। अब इस पर क्या है ना इस पर या तो आप इनकी मानो या उनकी मानो। विद्वानों का मतभेद है। नहीं नहीं नहीं ऐसे नहीं है। इसमें हम बहुत सी चीज़ हैं। इन्होंने जो तर्क दिए हैं उसको उस पे बात करेंगे। तो पहली बात तो यह है कि किसी ने क्या अपने उसमें उनका उल्लेखित किया कि नहीं किया वो तो एक अलग बात है। मगर अब उस पे आ जाए कि जो एक कृपा वाली बात उन्होंने कही है कि भाई उनकी कृपा है मुझ पर। तो मुझ पे भी जो श्री संप्रदाय के जो माधवाचार्य शास्त्री जी हैं उनकी कृपा है। उन्होंने क्यों नामक ग्रंथ ग्रंथ में बहुत मदद की है हम हिंदुओं की। है ना? और वो भी कहते हैं कृपात्री जी महाराज जो शंकर संप्रदाय के हैं उन्होंने बहुत मदद की है। कई अंशों में वो जो है उनके गुरु हैं तो वो कृपा वो कृपा मानते हैं। तो कृपा किसी की भी हो सकती है। कई वैदिक संप्रदाय हैं प्रामाणिक हैं। अब आगे की बात ये आती है कि हम ये मान लेते हैं कि भाई जो हिस्ट्री वाली बात है कि इसकी हिस्ट्री क्या है? वो शब्द प्रमाण पे चलती है। हमारे जो आचार्य हैं वो ये कह रहे हैं कि वो हमारे थे। शंकर संप्रदाय के थे। अपने समय के वो शंकराचार्य की गद्दी पे बैठे थे। शंकराचार्य। ठीक है? आपका कहना है कि वो गद्दी की बात तो हुई नहीं कि वो बैठे थे कि नहीं बैठे थे। गद्दी की बात नहीं हुई ना? अच्छा ठीक है। तो दूसरी बात ये है कि अब पहली बात ये आ जाती है कि अगर वो

01:30:34:16 विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे हां। तो आप चैतन्य महाप्रभु को विष्णु स्वामी संप्रदाय का क्यों नहीं मानोगे? पहली बात। दूसरी बात। दूसरी बात कि आपके पास वह जो अह भागवत का ज्ञान आया है यदि सीधा स्वामी का तो आपके यहां वो गीता वो भागवत क्यों नहीं रखी है बुक बुक स्टॉल्स में सीधा स्वामी की है ना और तीसरी बात कि श्रीधर स्वामी ने स्पष्ट कई जगहों पर भगवान शिव को ही परमेश्वर के रूप में उसमें स्वीकार किया है और यह बात आप भी कह रहे हो कि कई जगह मायावादी टच मिलता है। वह मायावादी टच आपके यहां एज़ इट इज़ क्यों नहीं है? अगर आपका ज्ञान एज़ इट इज़ है तो। यह दिक्कत आ जाती है। अह चैतन्य महाप्रभु और आपने एक बात और कही थी कि कही संप्रदाय में भाष्य में तो अंतर होगा। अनुवाद में नहीं होगा मगर है अनुवाद में अंतर है भगवत गीता आपके यहां की जो वो है 4 24 उसमें जो है ब्रह्म का अर्थ जो है कृष्ण भावना भावित कर दिया है हां कृष्ण पर व्याख्या करते हैं तो तो इसका मतलब वो भाष्य अपने भाष्य को अनुवाद में भी डाल रहे हैं आपकी वाली बात वो वाली बात गलत है कि अनुवाद के साथ छेड़छाड़ नहीं होती 90% नहीं होती है थोड़ा बहुत

⬜ Not used yet · 01:31:43:25 – 01:32:15:13 (0:32)

01:31:43:25 तो अब आप अपनी कही हुई बातों से ढुलमल हो जाते हो नहीं ऐसा नहीं है अपनी कही बात नहीं है ये बात है ही नहीं हां तो अब उन दो प्रश्नों का आप जवाब चैतन्य महाप्रभु कि अगर वह विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे तो आप चैतन्य महाप्रभु को विष्णु स्वामी संप्रदाय का मान चैतन्य महाप्रभु गुरु हैं ईश्वरी पूरीपाद तो उनको विष्णु स्वामी समझ व्याख्या किसने दी है तात्विक व्याख्या ईश्वरी प्रपाद से उन्होंने ये पंडरपुर में ईश्वरी प्रभुपाद ने उनको ईश्वरपाद भागवत समझाना ही एकमात्र वो नहीं है

✅ This part is already used · 01:32:15:13 – 01:34:01:22 (1:46)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 33:17 ↗

01:32:15:13 दीक्षा गुरु मंत्र कहां से मिला यह महत्वपूर्ण है मंत्र मिला है ईश्वर गुरुपाल जी से हां यानी कि आपका जो परंपरा प्राप्त ज्ञान है वो आ रहा है विष्णु स्वामी संप्रदाय से। नहीं हां हमारा ज्ञान सभी वैष्णव आचार्य से आ रहा है। हम लोग श्रीधर स्वामी की भी भागवत टीका लेते हैं। हम लोग श्रीपाद वल्लभाचार्य की सुबोधनी टीका भी लेते हैं। हम क्योंकि वैष्णव के जो भाष्य है मतलब आप आपकी कोई एक परंपरा नहीं है। ज्ञान के मामले में यस भागवत की टीका के मामले में। क्योंकि टीका है तो हम सबका लेते हैं। भागवत की टीका नहीं ज्ञान के मामले ज्ञान तो बहुत है। गीता का ज्ञान भी है, भागवत का ज्ञान भी है। ज्ञान के मामले में आपका ज्ञान किस परंपरा का? कौन से ज्ञान का? धर्म का ज्ञान, ईश्वर का ज्ञान। धर्म ब्रह्म का ज्ञान। ऐसा नहीं है। टीकाओं की बात जहां की बात हो रही है। भाई आपके आगे दो मुख्य ग्रंथ कौन से हैं? हमारे जो मुख्य ग्रंथ है वो श्रीमद् भागवत और भगवत गीता है। यही है ना? उसमें से एक जो भगवत गीता है। यानी कि मान लीजिए आधे से भी बड़ा हिस्सा क्योंकि वो एक वृहद ठीक है। ग्रंथ है। भागवत। तो भागवत जो है आपके यहां आ रही है विभिन्न परंपराओं से बल्कि श्री स्वामी से आ रही है। मूल भागवत तो सुखदेव गोस्वामी से आ रही है हमारी परंपरा में। टीका किसका आ रहा है? सुखदेव गोस्वामी तो सबके हैं। हां। सुखदेव गोस्वामी को कौन

01:33:30:28 डिनाई कर रहा है? जितने संप्रदाय हैं सब में श्रीधर स्वामी की टीका सबसे पहले आती है। उसके बाद अन्य आचार्य ने अपने अपनी-अपनी टीका है भागवत पे। वल्लभाचार्य जी की अपनी टीका है भागवत पे। हमारी परंपरा में तीन टीकाएं हैं। जीव गोस्वामी की वैष्णवतोषणी विश्वनाथ जी की सार्थ दर्शनी हम वो तो बाद में आए ना जीव गोस्वामी महाप्रभु ने उनको आदेश दिया महाप्रभु के पास जो आई थी टीका उस समय तो एक ही टीका थी श्रीधर स्वामी जी की तो ये कोई सनातन सिद्धांत नहीं है कि वो एक ही टीका है तो उसको आपने मान लिया फिर भी वो आपका गुरु नहीं

⬜ Not used yet · 01:34:01:22 – 01:34:21:27 (0:20)

01:34:01:22 माना जाएगा गुरु तो है ही कौन बोल रहा नहीं है वो तो गुरु है सबके क्या होता है सबके गुरु है अब कौन से गुरु हम तो शिक्षा गुरु बोलेंगे शिक्षा गुरु नहीं ये शास्त्र में कहां दिया है जीव गोस्वामी लिख रहे हैं शास्त्र शास्त्र में भी जीव गोस्वामी उधित कर रहे हैं। मैं आपको भेजूंगा प्रमाण। पूछो ना अपने आचार्य से। नहीं भेजूंगा मैं आपको। प्रमाण प्रमाण वो वो तो आप जीव गोस्वामी का भेज रहे हैं। उन्होंने जो उध गुरु का अर्थ जो

✅ This part is already used · 01:34:21:27 – 01:36:19:25 (1:58)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 34:20 ↗

01:34:21:27 शास्त्र में दिया है अद्वैतका उपनिषद में वो है जो आपके गुरु बहुत सारे हैं। ऐसे तो उन्होंने 24 गुरु बनाए भागवत में। हम्म तो गुरु जो है मैं आपको बता रहा हूं ना जो मुख्य गुरु कौन है? जो आपको तत्व की व्याख्या दे और तत्व की व्याख्या है भागवत में। श्रीधर स्वामी जी से डायरेक्ट तो नहीं सीखा उन्होंने। तो किससे? तो जिससे भी सीखा वह सीधा स्वामी का हुआ। भाई जिससे भी सीखा जैसे उन्होंने जैसे देखो आप एक बात आप छोड़ो मत वल्लभाचार्य जी की मैं आप विषय मत करो अभी अभी मैं पहले बात नहीं वो आपने बात की सुनिए तो आपने कहा श्रीधर स्वामी से नहीं सीखा तो जिससे सीखा वो अगर श्रीधर स्वामी का ग्रंथ पढ़ा रहा है तो श्रीधर स्वामी का हुआ तो परंपरा आपकी उधर चली गई ऐसा नहीं है वैष्णव आचार्यों की टीकाओं को आप प्रमाण के रूप में ले सकते हो कि ये हमारे इन आश्रय ने ऐसा कहा है। उन्होंने ऐसा कहा है। जैसे हम श्रीपाद बल्लवाचार्य की टीका लेते हैं। तो एक श्लोक पर तो यह बताइए कि इसका मतलब यह माना जाए कि आपके पास जो भागवत है सभी आचार्यों की जो भागवत का ज्ञान है वो परंपरा प्राप्त नहीं है। वो ऐसे ही किसी से भी ले लिया। ऐसा नहीं है। चारों परंपरा चारों परंपरा सुखदेव गोस्वामी जिन्होंने जो भाष्य दिया है वो सब हमारे पास है। हम उसी कहां है? श्रीधर स्वामी

01:35:37:03 आ गए ना? हां प्रभुपाद ने लिखा हुआ है भागवतम में। श्रीधर स्वामी आ गए ना बीच में। श्रीधर स्वामी आए हैं। जीव गोस्वामी आए हैं। वल्लभाचार्य गोस्वामी तो बाद में भैया मैं पूछ रहा हूं जो महाप्रभु हैं उनसे पहले की बात हां श्रीधर स्वामी तो सबके गुरु हैं। सभी वैष्णवों के हैं वो तो गुरु एक शंकराचार्य के भी गुरु हैं। सबके गुरु हैं वो उसमें मायावारी टच है। नहीं वो तो आपने माना है। वो तो मैंने नहीं माना है। मैं तो नहीं बोल रहा हूं। माना है जो आप प्रभुपाद जी को नहीं मानते। ये तो हमारे गौ वैष्णव लिखा हुआ है। आचार्य आप मानते हो कि नहीं? अब मायावाद टच है कि नहीं है तो फिर यह जो पढ़ा है मैंने जो पढ़ा जिसको जिसको प्रमाण के रूप में कर रहे हैं उसी के ऊपर आशंका नहीं नहीं जो प्रमाण है मतलब जो हिस्ट्री उसकी हिस्ट्री सही है मगर उसका ये वाला बात गलत है

⬜ Not used yet · 01:36:19:25 – 01:36:43:22 (0:24)

01:36:19:25 कि उसमें मायावादी टच पूरी बात नहीं सुनना चाह रहे हो वो गीता की बात कर रहे थे वहां पे भागवत की टीका की बात नहीं कर रहे थे मायावा टच वो गीता की टीका की बात यानी कि एक व्यक्ति अपने गीता में अलग तात्विक व्याख्या करता है और भागवत में अलग तात्विक व्याख्या वो इसलिए कर रहा है बोल रहा है कि पहले वो अतवादी थे। बाद में तो ये मेंशन किया है कि गीता पहले लिखा है और भागवत बाद में अब ये तो शोध का विषय है। ये तो शोधत का ये गलत बात है। ये

✅ This part is already used · 01:36:43:22 – 01:38:14:04 (1:30)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 35:30 ↗

01:36:43:22 तो शोध का विषय है। तो उन्होंने कहीं मेंशन किया कि मैंने अपनी गीता में गलत लिख दिया है। ये ये तो अब उन आचार्यों से का विषय है। तो ये मानना पड़ेगा ना हमें कि उन्होंने अपनी गीता को लास्ट तक गीता रखा। मतलब जैसे मैंने कहीं कुछ कह दिया और बाद में मुझे पता चला कि भाई मैंने गलत कह दिया तो फिर बाद में बताऊंगा ना। अगर मैं सार रूप में कहूं श्रीधर स्वामी की टीका को सभी वैष्णव आचार्य ने ग्रहण किया है। नंबर एक नंबर दो नहीं मधवा संप्रदाय में नहीं किया गया और मधवा संप्रदाय वालों की एक तरीके से नाराजगी इसीलिए है क्योंकि चैतन महाप्रभु अगर मधवा संप्रदाय के हैं यानी कि उनके वो गुरु माधुर्य क्या नाम मेरे पास उनका क्या नाम था मेरे पास जितना प्रमाण था मैंने आपको दे दिया है नहीं अब इस पर जो डिटेल है जो तर्क वितर्क है वो नहीं मधवाचार्य परंपरा की नाराजगी इसीलिए है कि आप भैया श्रीधर स्वामी का टीका लिख ले इसका प्रमाण कहां है वो मुझे बताइए आप ये जो आप बोल रहे हो आप अपना प्रमाण बताइए मैं तो बता ही रहा हूं आपको ये वाला आनंद तीर्थ जी से कनेक्टेड ये तो मैंने गिनाया आपका नाम ये तो आपने फोटो लिखा है उसके नीचे नाम लिखा गिनाया मैंने और मैं ये लेटर थोड़ी ना है कि आप जिन आप देखिए मैंने आपसे वो तर्क भी किया कि मैं शंकराचार्य जी का शिष्य हूं मगर मैं तब तक शंकराचार्य जी का प्रतिनिधि बन के बात नहीं कर सकता जब तक वो अलऊ

01:37:58:24 नहीं करे मुझे अलऊ वाला प्रमाण चाहिए होगा वो अलऊ वाला प्रमाण कहीं पर हो किसी ने मेंशन किया हो जैसे मेरे गुरुदेव है मान हम मेरे गुरुदेव ने मुझे आचार्य पाठ के लिए नहीं किया और दीक्षा नहीं मैं बात पूरी कर लेता हूं सुनिए एग्जांपल

⬜ Not used yet · 01:38:14:04 – 01:38:38:09 (0:24)

01:38:14:04 बता रहा हूं एक छोटी सी बात दीक्षा वाली बात आप कह रहे हैं कि दीक्षा गुरु कौन है दीक्षा गुरु यदि मधवाचार्य जी है तो फिर आपका गौ वैष्णव अलग से कैसे बन जाएगा इसलिए हमारे संप्रदाय का नाम है ब्रह्म मध गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय क्यों अंतर क्यों आ रहा है एज इट इज आना चाहिए ना अंतर नहीं आप अपनी गीता भाव के अनुसार अंतर आप अपनी गीता को क्या कह रहे हो बताओ हम भाव के अनुसार कह रहे हो कि एज इट इज कह रहे हो भाव के अनुसार है तो वो तो लिखा तो एज इट इज है

✅ This part is already used · 01:38:38:09 – 01:38:45:18 (0:07)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 36:29 ↗

01:38:38:09 हमारे आचार्यों ने हर आचार्यों ने गीता पर भाष्य लिखा है भक्ति में ठाकुर जी ने भक्ति सिद्धांत ठाकुर जी ने बलदे

⬜ Not used yet · 01:38:45:18 – 01:39:06:24 (0:21)

01:38:45:18 विद्या भूषण जी ने दूसरा किया विश्वनाथ जी ने सभी ने भाष्य लिखा ने दूसरा किया है आप कह रहे हो एज इट इज है जो वहां था वही एज इट इज मतलब होता है जो वहां था वो जो वहां था वही आया ठीक है मगर आप क्या कर रहे हो कि वहां से मंत्र आया फिर हम लोग हो गए ब्रह्म गौड या वैष्णव संप्रदाय यानी कुछ उसमें ऐड ऑन वगैरह किया ऐड ऑन कुछ नहीं किया हुआ है जो मधवाचार से आ रहा है वही आ

✅ This part is already used · 01:39:06:24 – 01:39:30:00 (0:23)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 36:43 ↗

01:39:06:24 रहा है। वही आ रहा है। अच्छा और वह चैतन्य महाप्रभु ने केवल उपासना पद्धति भाव पद्धति को ऐड किया बस उसमें। यानी ज्ञानी की कुछ है जो नहीं है वहां पे। यस तो एज इट इज़ नहीं है फिर। कुछ चीजें एज इट इज़ नहीं है लेकिन अलग भी नहीं है। ये कह सकते हो आप। ऐसे तो दुनिया में कुछ भी अलग नहीं है। हां। देखिए जैसे एक स्वान है वो दांतों से चबा के खाना खाता है। इसीलिए वर्णन

⬜ Not used yet · 01:39:30:00 – 01:39:50:14 (0:20)

01:39:30:00 आया गया कि चारों वैष्णव संप्रदाय की शाखा हुई है। ये वाली जो जैसे सीताराम की उपासना है। सुनिए सुनिए जो जो रामानंद वैष्णव है आपने कहा ना कुछ चीजें अलग हैं। कुछ चीजें नहीं भी है। तो उसका कारण है। उसका कारण आप सुनना ही नहीं चाह रहे हो। मैं कैसे बताऊंगा? नहीं मैं मैं उस नहीं मैं पहले कारण तो बताऊं क्यों अलग है? हां ठीक है। ठीक है। ठीक है। आप वो सुनना ही नहीं चाह रहे हो आप। ठीक ठीक है। रामानंदी

✅ This part is already used · 01:39:50:14 – 01:40:39:20 (0:49)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 37:05 ↗

01:39:50:14 वैष्णव आपने सुना होगा। जी जिसमें तुलसीदास जी आते हैं। हां हां तो राम जींदी वैष्णव किसके उपासक हैं? राम जी के। सीताराम के उपासक है ना? हां। और जो रामानुज वैष्णव है वो किसके उपासक हैं? विष्णु के। वो लक्ष्मी नारायण के उपासक हैं। हां। लेकिन जो रामानुज संप्रदाय है उसी की तो उपशाखा रामानंदी संप्रदाय है। वो उन्होंने सिद्ध कर दिया। एक शास्त्रार्थ में उज्जैन में हुआ था। उसमें उन्हें विजय प्राप्त हुई थी। उन्होंने अपने आप को अलग कर लिया था। उनकी उत्पत्ति बिल्कुल स्वतंत्र रूप से है। वो हो सकता है आजकल ऐसा विचार आया हो जो जो संप्रदाय वाले भी स्वीकार किए उस बात को और रामानंदियों ने भी स्वीकार किया उस बात को। दोनों ने स्वीकार किया। अलग है। उन्होंने सिद्ध किया। एक शास्त्रार्थ हुआ उज्जैन में मेरे ख्याल से अभी कुछ शताब्दियों पहले हुआ होगा। उसमें वो सिद्ध कर लिया। वो स्वतंत्र है। अलग है। हो सकता है लेकिन जो हमने पढ़ा जो

⬜ Not used yet · 01:40:39:20 – 01:41:42:26 (1:03)

01:40:39:20 हमारे आचार्य ने बताया मैं आपको बता रहा हूं। उस आधार पर सही ना फिर तो बात ही ये हो जाएगी। हमारे आचार्यों ने ये कहा है आपके आचार्यों ने। वो अलग है। वो अलग है। खैर वो बात यह हो रही है कि अगर कहीं पे कुछ हो भी गया है उसको हम उदाहरण नहीं ले सकते। तस्मा शास्त्र प्रमाण गौर वैष्णव जो चैतन्य महाप्रभु को मध्य संप्रदाय में स्वीकार सभी ने किया है। उनके जो अनुगत प्रियजन है विशेषकर षट गोस्वामीियों ने षड गोस्वामी हमारे परमा देखिए मैं मैं आपको वो लेटर यहां लगा भी दूंगा। वो लेटर हमें प्राप्त है जिस लेटर में जो मध्य संप्रदाय उन्होंने स्टेट ये बिल्कुल स्टेटमेंट दिया है इस हमारे यहां से नहीं है इस हमसे कनेक्टेड नहीं हां उन्होंने एक पत्र और जारी किया है जिसमें उन्होंने इस की प्रशंसा की है इतने अंशों में तो हम भी करते हैं प्रभुपाद जी की प्रशंसा कई अंशों में भैया अच्छा लगता है कहीं-कहीं पे कुछ कुछ चीजें हैं ऐसी जैसे अभी मैं मंदिर में आया तो मंदिर में मुझे आपने बताया कि भाई जहां यहां पे स्त्रियों का यज्ञ पवित नहीं होता तो भैया इतनी तो कृपा की ना इस ने वहां वहां आर्य समाज वाले तो स्त्रियों का भी जनेऊ करा रहे हैं। है ना? तो उतनी तो कृपा की। अब यहां पे

✅ This part is already used · 01:41:42:26 – 01:42:40:00 (0:57)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 38:01 ↗

01:41:42:26 कम से कम भगवान मेरा सार में यही कहने का तात्पर्य है कि जीव गोस्वामी जी जो हमारे गय वैष्णव के तत्वाचार्य कहलाते हैं। हम जिन्होंने 4 लाख श्लोक लिखे हुए हैं। इतने बड़े विद्वान है वो। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को मध्य संप्रदाय में स्वीकार किया है। अब वो हमारे लिए प्रमाण है। अब इस पर मैं विस्तार नहीं बोल सकता हूं। बात यह है कि अगर श्रीधर स्वामी वैष्णव थे और विष्णु स्वामी संप्रदाय के थे तो आपको यह कहना चाहिए कि हमारा भागवत का जो ज्ञान है वो विष्णु स्वामी संप्रदाय का ज्ञान है। नहीं हमारा जो भागवत का ज्ञान है और और जहां से आप यह मेंशन कर रहे हैं ना यह कहानी खिचड़ी जो सुनी अभी हमने उसी में वह व्यक्ति कह रहा है कि मायावादी टच है उसमें भागवत में तो आप अपनी भागवत में मायावादी को क्यों नहीं ले रहे मायावादी सिद्धांत को हमारे जो भागवत है हमारे भागवत और उनका उनका जो सरनेम है तीर्थ हमारे भागवत में चार आचार्य

⬜ Not used yet · 01:42:40:00 – 01:42:59:13 (0:19)

01:42:40:00 गुरु का हां हमारे आ भागवत में ये सन्यासी का जो टैग है परमानंद तीर्थ वो दूसरा विषय हिस्टोरिकल उस पर मैं चर्चा नहीं करना चाहूंगा तो मैं अपने भागवत की बात बता रहा हूं। मैं विष्णु स्वामी वो अलग विषय है। भागवत जो हमारी परंपरा में है उसमें मनगढ़ंत लिखा है क्योंकि ये मायावादी वाली बात को तो ये भी नहीं मान रहे हैं।

✅ This part is already used · 01:42:59:13 – 01:43:39:18 (0:40)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 38:40 ↗

01:42:59:13 पांच आचार्यों के भाष्य उनके विचार लिए हैं। श्रीधर स्वामी श्रीपाद वल्लभाचार्य श्री जीव गोस्वामी श्री विश्वनाथ चक्र ठाकुर श्रीपाद सनातन गोस्वामी जी और माधवाचार्य जी इन आचार्यों के विचारों का समन्वय है भागवत की भाष्य में और जो मूल अनुवाद है वो पहले से चली आ रही है श्रीधर स्वामी जी ने जो मूल अनुवाद किया है वो सार वैष्णव संप्रदाय में वही भागवत पढ़ी उसमें एक बात और लिखी है चैतन्य चरितामृत में कि जो कोई भी श्रीधर स्वामी स्वामी के विरुद्ध जाकर के हां वो वैश्य वैश्य तो अब यह बताइए कि आपके व्यक्ति कह रहे हैं कि

⬜ Not used yet · 01:43:39:18 – 01:44:20:12 (0:41)

01:43:39:18 सीधा स्वामी के भाष में कहीं-कहीं मायावादी टच मिलता है वो उनसे वो इस तरह मैं नहीं जाऊंगा डिटेल में आप प्रश्न को घुमाइए मत अभी इस प्रश्न पर आइए रखा है ना लेकिन वो प्रस्तुत किया आपने नहीं उनको माने कि नहीं मानते वो आपकी मर्जी है अगर मुझसे आप पर आप मानते हैं कि नहीं मानते मैं तो मानता हूं तो मायावादी वाली बात को मानते हैं बिल्कुल मानता हूं तो फिर मायावादी टच लिया कि नहीं लिया अब ये मैंने पढ़ा नहीं है ना उसमें लिया क्या आपने अपनी भागवत को नहीं पढ़ा नहीं हमारी भागवत में नहीं लिया हुआ है। भागवत में तो कहीं भी मायावा वो आप जिसको प्रमाण गीता की बात कर आप जिसको प्रमाण मानते हैं वो कह रहा है कि उनके भाषण में मायावादी टच है। वो गीता की बात कर रहे हैं। गीता लिखते समय तो वो मायावादी से वो पहले अद्वति बात थी ना पहले मायावा ये बात उन्होंने कही है कि वो गीता का भाषण मेरा गलत है। वो थोड़ा डिटेल में शोध का विषय है।

✅ This part is already used · 01:44:20:12 – 01:45:21:06 (1:01)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 39:20 ↗

01:44:20:12 पहले क्या लिखा? तो अभी तो राइट नाउ तो आप उसकी उनकी गीता को उनका ही मानेंगे ना। मतलब जब मैं मेरा जब तक यह नहीं प्राप्त है कि मैंने जो पहले कहा था वो गलत कहा था तब तक तो मेरी उस बात को भी मेरी बात मानेंगे ना मैं समझा नहीं जैसे मैंने कुछ कह दिया कि मेरा नाम शिवशु नारायण द्विवेदी है तो आप जो समझे नहीं मैं समझा तो रहा हूं हां मैंने कहा मेरा नाम शिवशु नारायण द्विवेदी है 10 साल बाद मुझे पता लगा मेरे नाम में नारायण गलत था नारायण नहीं है तो मैं घोषित घोषित करूंगा ना कि शिवश द्विवेदी नाम है पहले मैंने गलत कहा था जब तक मैं घोषित नहीं करूंगा तब तक लोगों के लिए यही है ना शिवश द्विवेदी ने अपना नाम बताया शिवाश नारायण द्विवेदी इसी प्रकार से क्या उन्होंने कहीं घोषित किया कि मैं अपनी भागवत की जो भगवत गीता है वो गलत लिख रहा हूं उसमें मायावादी टच है गलत नहीं लिख रहा हूं का अरे मायावादी टच उन्होंने घोषित किया गलत था कि उन्होंने घोषित किया मैंने वो लिखा था गलत कर दिया था अब वो तो शोध का विषय है ना तो अभी राइट नाउ तो वही प्रमाण माना जाएगा ना कि मैं मैं मानूंगा आप भले मानो ना मानो आप समझे नहीं अभी आपने स्वीकार किया कि जो मैंने पहले कह दिया है जब तक मैं घोषित करके उसका खंडन नहीं करता

⬜ Not used yet · 01:45:21:06 – 01:45:36:26 (0:16)

01:45:21:06 हूं तब तक कि मैंने अपना नाम शिवश नारायण द्विवेदी जी का मैं कह रहा हूं कि जो मैंने अभी आपको श्रीधर स्वामी जी के इसमें जीता आपने ये बात मानी ना कि मैं अगर अपना नाम पूर्व में शिवशना आप मेरा उत्तर मैं आपका उत्तर प्रश्न समझ गया मैं ये कह रहा हूं कि श्रीधर स्वामी के

✅ This part is already used · 01:45:36:26 – 01:45:43:06 (0:06)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 39:58 ↗

01:45:36:26 विषय में जो मैंने आपको प्रमाण दिया हां मैं उसको सत्य मान रहा हूं तो उसमें ही लिखा है ना कि

⬜ Not used yet · 01:45:43:06 – 01:46:00:19 (0:17)

01:45:43:06 मायावादी टच लिख रहे थे वो भी सत्य मान रहा हूं तो फिर आपने आपको मानना है कि नहीं मानना वो आपके ऊपर है आपने अपने ग्रंथों में मायावादी टच लिया कि नहीं हमारे ग्रंथ में नहीं है तो फिर यहां पे गुरु विरोध हो गया अब वो आप आपकी मर्जी है। आप क्या सोच रहे हो? अरे गुरु विरोध हो रहा है कि नहीं? नहीं वो आपकी भी विचार है। मैं इसका खुद ही बोलूंगा। तो यहां पे आप भी छोड़ रहा हूं मैदान। हां, यहां

✅ This part is already used · 01:46:00:19 – 01:46:19:03 (0:18)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 40:10 ↗

01:46:00:19 पे छोड़ रहा हूं मैं। मैं तो भैया परंपरा में जो बोला है जो आचार्य बोले हैं मैं उसको मान सकता हूं। बाकी आप क्या मान रहे हो, क्या स्वीकार कर रहे हो, क्या नहीं कर रहे हो? कुछ नहीं मानिए। आप जो समाज में बताएंगे, उस पे हम कुछ समाज में तो हम आप समाज में बता रहे हैं कि हम परंपरा से आ रहे हैं। मगर जब आपको देखा जा रहा है

⬜ Not used yet · 01:46:19:03 – 01:46:41:22 (0:23)

01:46:19:03 तो आपकी परंपरा छिन्न-भिन्न हो रही है। फिर आप कह रहे हो कि मैं मानता हूं। वो आपका विचार हो सकता है बट हमारे कहीं ना बोले चीज को जो आप क्लेम कर रहे हो उसमें आप उत्तर नहीं दे रहे हो ना आप कह रहे हो बस मैं मानता हूं नहीं भाई हम तो मानेंगे ना शेरदेव सही पहले अद्यतवादी थे वो तो मान ही रहे हैं हम हां अद्वैतवादी थे तो इसलिए उस प्रभाव में आकर उन्होंने मायावाद टच लिखा ये कहां लिखा है कि अब ये तो विस्तार में जाने से पता चलेगा कहां

✅ This part is already used · 01:46:41:22 – 01:48:26:19 (1:45)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 40:31 ↗

01:46:41:22 लिखा है कि उस प्रभाव में आकर के उन्होंने लिखा बाद में उन्होंने वही वो शोध का विषय है अभी के लिए मैं इतना मानता हूं ये शोध का विषय है कहां लिखा है विचार इस बात का प्रमाण कहां है इस बात का प्रमाण अब विस्तार से देखना पड़ेगा कहां लिखा है वह शोध का विषय है। हां तो फिर शोध का विषय तो यह है जो यह व्यक्ति कह रहा है। मेरी बात शोध का विषय नहीं है। आपकी बात शोध का विषय है। आपकी बात भी शोध का विषय है। मेरी बात भी शोध का विषय है। क्योंकि आपकी बात से ही निकल के आ रहा है ना कि मायावादी टच लिखते थे। हम आपकी बात से ही तो निकल के आ रहा है। तो बात ये वाली शोध का विषय है। वही मैं कि वो जो कह रहा है वो सत्य है कि नहीं। हां वही शोध का विषय है ना। दूसरी बात यह वाली बात रही जा रही है कि अगर वह विष्णु स्वामी संप्रदाय के भी थे तब भी वह विष्णु स्वामी संप्रदाय का ज्ञान क्यों नहीं माना जाएगा? जब विष्णु स्वामी संप्रदाय की टीका आ रही है। मान सकते हैं कि नहीं मान सकते? तो विष्णु स्वामी संप्रदाय का मिक्स आपकी परंपरा मिक्स टीका है। मिक्स टीका है। सभी आचार्यों को लिया हुआ है प्रभुपाद जी ने अपने तात्पर्यों में। नहीं एक कोई कोट ले लेना और पूरा पूरा ग्रंथ लेना पूरा तात्विक विवेचना लेना और उन्होंने प्रभुपाद उन्होंने कहा है मैं उनके कारण ही कृष्ण को जान पाया हूं भागवत को समझ पाया हूं तो पूरा का पूरा तात्विक विवेचना ही उनसे हो गई चैतन्य महाप्रभु ये जो बात कह रहे हैं ना ये जगन्नाथ पुरी में कह रहे हैं उससे पहले भी वो कृष्ण को जान रहे थे

01:47:56:24 उससे पहले भी वो कृष्ण की विरे में डूब रहे थे तो वो ये बता रहे हैं ना कि मैं जो है जान पा वो अपना पुराना बता रहे उसका जो भाव है ना पुराना नहीं पूरा मतलब उससे पहले तो श्रीधर स्वामी का जिक्र ही नहीं किया उन्होंने। वो तो वल्लभाचार्य ने ऐसी बात बोल दी तब कहना पड़ा। नहीं तो यानी उन्होंने झूठ बोला। झूठ नहीं बोला। वल्लभाचार्य जी हां वल्लभाचार्य जी के अहंकार को वो करने के लिए झूठ ही तो हुआ। झूठ नहीं हुआ। नहीं अहंकार को करने के लिए सत्य बोला या झूठ बोला? सत्य बोला है क्योंकि आप पूर्ववर्ती आचार्य को क्रॉस नहीं कर सकते हो

⬜ Not used yet · 01:48:26:19 – 01:48:50:28 (0:24)

01:48:26:19 ना। आप अब मैं बोल दूं मैंने परपाधि से अच्छे लिखा है। तो मतलब ये तो मर्यादा का उल्लंघन हो गया ना। मैं बोलूंगा हां प्रभुपाद जी के अनुगति मैंने लिखा है क्योंकि प्रभुपाद जी आपकी परंपरा में है इसलिए नहीं बोलोगे ना वो तो उनकी परंपरा में नहीं है ना आचार्य तो है ना नहीं उनकी परंपरा में तो नहीं उनकी परंपरा में चैतन्य महाप्रभु की वल्लभाचार्य जी की बात कर रहा हूं मैं चैतन्य महाप्रभु की बात उनकी बात अभी नहीं कर रहा हूं ये बात आई क्यों अभी

✅ This part is already used · 01:48:50:28 – 01:49:16:07 (0:25)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 41:35 ↗

01:48:50:28 क्या कहा कि अगर मैं कह दूं कि मैं जो है प्रभुपाद जी की टीका के विरुद्ध लिख रहा हूं यही तो वल्लभाचार्य लिख के गए थे ना उनके पास कि मैंने उनसे भी अच्छी टीका लिखी है तो प्रभुपाद जी जो श्रीधर स्वामी जी हैं वो चैतन्य महाप्रभु की परंपरा के गुरु नहीं थे। हमारी परंपरा के दीक्षा गुरु नहीं। आप प्रभुपाद जी के विरुद्ध इसलिए नहीं जाओगे क्योंकि प्रभुपाद जी आपकी परंपरा के आचार्य हैं। आपके हिसाब से प्रभुपाद जी की नहीं मैं

⬜ Not used yet · 01:49:16:07 – 01:49:34:28 (0:19)

01:49:16:07 श्रीधर स्वामी किसी के विरुद्ध नहीं जाऊंगा क्योंकि वो आचार्य हैं। आपके मायावादी भाष मायावादी भाष्य नहीं नहीं उनके विरुद्ध नहीं जाऊंगा मैं कभी। वो तो उनके टीका ले रहे हैं। हम कहां विरुद्ध हैं भैया? नहीं विरुद्ध उनके हम। वो तो वैष्णव हैं। वो तो भागवत के जगतगुरु हैं। वो कैसे जाएंगे? शंकराचार्य के विरुद्ध जा रहे हो कि नहीं? नहीं जा रहे हैं। शंकराचार्य महान वैष्णव है।

✅ This part is already used · 01:49:34:28 – 01:51:09:20 (1:35)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 41:57 ↗

01:49:34:28 आप मानते हो अद्वैत है। कौन? अंतिम सत्य अद्वैत है। मानते हो? शंकराचार हां वेदों में कहा गया है अद्वैत। आप मानते हो कि नहीं? अद्वैत है। अंतिम सत्य हम अद्वैत ही मानते हैं। हमारा ब्रह्म एक हो जाएगा। नहीं हम नहीं मानते। नहीं मानते हो ना? तो फिर यहां विरुद्ध हो गए ना। विरुद्ध नहीं हो गए। हां। क्या हुआ? विरुद्ध कैसे हो गए? तो क्या हुआ? शंकराचार्य सीमा से बाहर हो गए। हां। तो फिर इसका मतलब ये नहीं कि हम उनका अपमान कर रहे हैं या मैं कहां कह रहा हूं? अपमान कह रहा हूं। तो बात ये चल रही है जैसे शंकराचार्य का बात खत्म ही नहीं होने दे रही शंकराचार्य जी के जैसा हम फिलॉसफी का खंडन कर रहे हैं ना श्रीधर स्वामी की फिलोसफी का खंडन हम नहीं कर रहे हैं वो तो महान वैष्णव श्रीधर स्वामी श्रीधर स्वामी महान वैष्णव हैं तो उनकी परंपरा क्या थी उनके गुरु का नाम क्या था उनकी परंपरा उनके गुरु कौन थे इसकी जानकारी मुझे नहीं है लेकिन चैतन्य महाप्रभु के वो गुरु नहीं है वो शिक्षा गुरु हैं चैतन्य महाप्रभु के जो दीक्षा गुरु हैं वो ईश्वर प्रिपाद अरे भैया आप यह बताइए भागवत को मानेंगे कि नहीं? भागवत को मानेंगे तो तो भागवत में लिखा है परम गुरु वो है जो आपको तात्विक ज्ञान दे। अरे यार आप किसी भी गौ वैष्णव के पास जाओगे ना चलो आप मुझे मत मानो। देखिए कई लोगों के कह देने से वो बात सत्य नहीं होती है। आपको शास्त्रीय प्रमाण देना होगा। नहीं थोड़ी देर पहले आपको भागवत दे रहा हूं आप मुझे। कई लोग दे रहे हैं। नहीं गौ वैष्णव

01:50:50:14 चैतन्य महाप्रभु को हम ज्यादा जानते हैं कि या और ज्यादा जानते हैं? कौन? चैतन्य महाप्रभु को गौ वैष्णव ज्यादा जानेंगे कि या अन्य लोग ज्यादा जानेंगे उनको जो लोग चैतन्य महाप्रभु के प्रमाण कर रहे हैं प्रामाणिक षट गोस्वामी प्रमाणिक गोस्वामी षट गोस्वामी नहीं जहां से चैतन महाप्रभु जिसको कह रहे हैं कि ये प्रमाणिक है उसके रूप

⬜ Not used yet · 01:51:09:20 – 01:51:38:07 (0:29)

01:51:09:20 गोस्वामी सर दामोदर अपना नाम नहीं है चैतन महाप्रभु यस बिल्कुल रात दिन उनके संग सनातन शिक्षा लिखा है चैतन महाप्रभु ने चैतन्य चरितामृत में चैतन्य चरितामृत को कैसे माना जाए तो अब जब शास्त्री आप प्रमाण नहीं मानते आप बोले कैसे आप अपने आचार्य के मतांतर्गत लिखी हुई बातों को शास्त्र कह रहे हैं। नहीं ऐसा नहीं है। और हमने तो नहीं कहा शंकर भाष ले लो। नहीं हमारे चैतन्य चरितामृत चैतन्य भागवत अगर इनको ही आप प्रमाण नहीं मान रहे हो लेकिन मैं किस आधार पर मैं प्रमाण की बात नहीं कर

✅ This part is already used · 01:51:38:07 – 01:51:57:22 (0:20)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 42:59 ↗

01:51:38:07 रहा हूं। मैं देखो आपने कहा कि वो वैष्णव थे। आपको अपने चैतन्य महाप्रभु की परंपरा कृष्ण भगवान तक पता है। ठीक है? मगर जस्ट जिसकी आप भागवत पढ़ रहे हो। वो तो हम किसी की पढ़ सकते हैं। वल्लभाचार्य की पढ़ सकते हैं। हम लोग राम भैया जिसकी बात आप जिससे आप भगवान को जान रहे हो भागवत को जान हम सभी से जान रहे

⬜ Not used yet · 01:51:57:22 – 01:52:33:08 (0:36)

01:51:57:22 हैं। भागवत ये बात चैतन महाप्रभु ने कही है क्या रसोस बाद में तारीफ की सुबोधनी टीका की अद्भुत उन्होंने बाद में उन्होंने ये बात कही है क्या कि मैं सभी से जान रहा हूं। बाद में सब कुछ उन्होंने उन्होंने यह बात कही है क्या कि मैं सभी से जान रहा हूं। भाई जो भी प्रमाणिक आचार्य है जो भी प्रमाणिक क्या कह रहा हूं भाई साहब उन्होंने ये कहा कि मैं सभी से जान रहा हूं किन्होंने उन्होंने तो कहा मैं ईश्वर प्रपाद जी की कृपा से मैं भगवान को जान पाया गुरु आमी मूर्ख देखी करिया सा भागवत को तो उनसे जाने किनसे वो तो सभी जाने उनसे वही जाने वो तो सभी जाने श्रीधर स्वामी से हम भी जान रहे हैं किसने कहा मधवाचार्य जी ने कहा है कि मैं वो आपका विषय है लेकिन

✅ This part is already used · 01:52:33:08 – 01:53:06:16 (0:33)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 43:26 ↗

01:52:33:08 मैं मानता हूं कि श्रीधर स्वामी जो चैतन्य महाभू कह रहे हैं सभी माने यानी कि आप सनातन सिद्धांत नहीं अपने सिद्धांत से चलते चैतन्य महाप्रभु मतलब सनातन सत सिद्धांतों से चैतन्य महाप्रभु ने जो बोला वही हमारे लिए प्रमाण है। तो ऐसे तो ब्रह्मा कुमारी वाले भी कहते हैं जो ब्रह्मा जी आकर के रोज आप चैतन्य महाप्रभु को नहीं मानते वो आपका विषय है। लेकिन नहीं हम मानते हैं तब तक जब तक वो जो परंपरा से वेद चले आ रहे हैं। हम तो पूरा मानते हैं आप तब तक लेकिन किंतु ये आपका विषय है। क्यों मानते हो अच्छा उन्हें? क्योंकि वो वो भगवान कृष्ण की भक्ति का प्रचार

⬜ Not used yet · 01:53:06:16 – 01:53:26:24 (0:20)

01:53:06:16 किए। हरि नाम का प्रचार ऐसे तो बहुत से अच्छे लोग हैं जो अच्छी काम कर रहे हैं तो उनको क्यों नहीं मानते? चैतन्य शंकराचार्य शंकराचार्य ने बौद्धों का खंडन करके सनातन धर्म की स्थापना की महाप्रभु ने इसका उनको क्यों नहीं मानते हैं प्रमाण क्यों नहीं मानते प्रमाण मानते हैं प्रमाण भाई मानते हैं भैया झूठ बोल रहे हो क्या बात कर रहे हो शंकराचार्य को कौन नहीं मानते अभी आप कह रहे हो कि मैं मायावाद को नहीं

✅ This part is already used · 01:53:26:24 – 01:55:17:25 (1:51)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 43:53 ↗

01:53:26:24 मानता हूं आप कह रहे हो मानते हैं आप बुद्धू को मानते नहीं मानते नहीं मानते भगवान बुद्ध को नहीं मानते भगवान मानते हैं उनकी शिक्षा को नहीं मानते वही है फिर शंकराचार्य को मानते हैं तो मैं वही कह रहा हूं आप उनकी शिक्षा को मानते हैं सारी शिक्षा को नहीं मानते हां तो जो वैष्णव पर है वो मानते हैं तो आप अच्छे काम करने के नाते चैतन्य महाप्रभु की सारी शिक्षा को मानते हैं। तो अच्छे काम करने के नाते इसलिए मानते हैं कि चैतन्य महाप्रभु की कोई भी शिक्षा में मायावाद नहीं है। इसलिए मानते हैं और वो स्वयं भगवान है इसलिए मानते हैं। अच्छा ठीक है। स्वयं भगवान भगवान बुद्ध भी स्वयं भगवान है। 1 मिनट 1 मिनट। भगवान बुद्ध स्वयं भगवान है। आपने दो बातें कही है क्योंकि वो स्वयं भगवान है। और उनकी में मायावाद नहीं है। ठीक है। अच्छा ठीक है। दो बातें हो गई। अब बात आती है कि इसको तो मैं ऐसे काट सकता हूं। भगवान है तो भगवान होते हुए बुद्ध के रूप में उन्होंने वेदों का ही खंडन कर दिया। उनको मानेंगे क्या? लेकिन भगवान बुद्ध आए क्यों? इसका भी तो वर्णन शास्त्र में है ना। लेकिन इसका मतलब सारे अवतार इसीलिए आएंगे। नहीं मैं ये नहीं कह रहा। भगवान होने के नाते उनकी बात को नहीं माना जा सकता। मैं ये कह रहा हूं। भगवान होने के नाते उनकी बात को नहीं माना जा सकता। जब उनकी बात वेद सम्मत होगी तभी माना जा सकता। हां तो चैतन्य महाप्रभु की सारी बातें वेद तो जब कभी हम क्वेश्चन करेंगे कि यहां पे दिक्कत आ रही है वेदों से मैच नहीं हो रहा तो आपको

01:54:41:27 मैच को सिद्ध करना होगा ये नहीं कि चैतन महाप्रभु कह रहे हैं इसलिए मान रहे हैं फिर वहां पे उनकी बात को वेद से मैच कराना होगा है ना पहली बात तो ये हुई दूसरी बात ये हो गई कि मायावाद नहीं था चैतन महाप्रभु की में इसलिए मानते हैं। अब ये बताइए मायावाद क्या है? मायावाद का अर्थ होता है जो भगवान के विग्रह को हम भगवान के स्वरूप को भगवान के धाम को हम भौतिक मानता है मायिक मानता है इसी को मायावाद कहा है वैष्णवा आचार्यों ने अच्छा ये बताइए मतलब और शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि वो भगवान का भौतिक है ये नहीं वो अब क्या कहते हैं

⬜ Not used yet · 01:55:17:25 – 01:55:34:26 (0:17)

01:55:17:25 ये तो पता नहीं जो वैष्णव आचार्य बोले हैं वो मैं बता आपके प्रभुपाद जी ने शंकराचार्य जी के बारे में कुछ बताया है कि नहीं उन्होंने यह बताया है कि शंकराचार्य जी महान वैष्णव हैं और भाई साहब आप इतना घुमाते हो ना घुमाने की बात ही नहीं आप आप कह रहे हो कि मैंने जो सत्य है वही बता रहा हूं मैं मैं बता रहा हूं घुमाने की क्या बात है इसमें यार

✅ This part is already used · 01:55:34:26 – 01:55:40:26 (0:06)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 44:57 ↗

01:55:34:26 उन्होंने शंकराचार्य को मायावादी कहा है कि नहीं कहा है मैं कह रहा हूं कि दोनों चीज कहा है ना दोनों कहा है तो मायावादी कहा है कि

⬜ Not used yet · 01:55:40:26 – 01:56:01:13 (0:21)

01:55:40:26 नहीं कहा है दोनों चीज कहा है अरे तो मायावादी को मायावादी भी कहा है वैष्णव भी कहा है मायावादी भी कहा है मायावादी भी कहा है वैष्णव भी कहा है तो मायावा मायावादी की शिक्षा को आप मानते हो नहीं मानते नहीं मानते तो मायावा तो मायावाद होता क्या है वो वो बताओ वही तो मैंने बताया आपको जब भगवान के शरीर को उनके धाम को तो यह माना जाएगा ना कि ये शिक्षा शंकराचार्य जी देते हैं तो वो

✅ This part is already used · 01:56:01:13 – 01:57:20:09 (1:19)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 45:11 ↗

01:56:01:13 गलत है ना वही तो कह रहे हैं वैष्णवाचार्य ये ये शिक्षा शंकराचार्य देते ही मानते हैं तो उनकी वो शिक्षा गलत है वैष्णवाचार्य अब आप ये बताओ क्या इसके द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान है बिल्कुल है अच्छा ठीक है तो ये बताइए यदि वो सर्वशक्तिमान है हां तो क्या वो अपने स्वरूप का नाश कर सकता है जो शरीर है शरीर शरीर की बात कर रहा हूं जिस शरीर में भगवान आते हैं लीला करते हैं उस शरीर का नाश कर सकते हैं भगवान भगवान तो अघटन घटन पटी जैसी कुछ भी कर सकते हैं नाश कर सकते हैं नाश भी कर सकते यानी कि उनके उस शरीर के अलावा भी उनका कोई रूप है हां भागवत में कहा गया भगवान के तीन स्वरूप है निर्गुण निराकार ब्रह्म स्वरूप मतलब अंतिम स्वरूप ये नहीं है गीता के 12वा अध्याय के आप पढ़ो भगवान बोलते हैं सगुण साकार की उपासना श्रेष्ठ है मेरा सगुण रूप श्रेष्ठ है स्वयं भगवान खुद बोल रहे हैं निर्गुण निराकार स्वरूप क्लेश वाला मैं आपसे क्या पूछ रहा हूं कि क्या वो जो भगवान का रूप है भगवान का निर्गुण निराकार स्वरूप को मानना ये गलत नहीं है भगवान के सगुण साकार स्वरूप को माइक कहना ये गलत है ये किसी भी शास्त्र में नहीं बोला है माया माइक होने का अर्थ क्या होता है ये माइक

01:57:16:24 होने का अर्थ है कि हमारी तरह है भौतिक तो कहां पे कहा

⬜ Not used yet · 01:57:20:09 – 01:57:39:10 (0:19)

01:57:20:09 है उन्होंने कि भौतिक है ये वैष्णो आचार्य बोल रहे हैं मैंने नहीं बोल रहा हूं। ठीक है? तो मायक होने का अर्थ आपने बताया कि भौतिक है। भौतिक है। हां। मतलब जैसे हम लोगों का है कुल मिलाकर के वो माया नहीं है। वो वो शाश्वत रूप है। वो शाश्वत रूप है। तो आप कह रहे हो वो नष्ट हो सकता है। नष्ट नहीं हो सकता। वो तो आप कह रहे हो मैं कहां कह रहा हूं। अरे अभी आपने कहा मैंने कहा। तो फिर मैं

✅ This part is already used · 01:57:39:10 – 01:58:08:26 (0:30)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 45:59 ↗

01:57:39:10 दोबारा पूछ रहा हूं। क्या जो भगवान श्री कृष्ण है वो अपने शरीर का नाश कर सकते हैं नाश नहीं कर सकते हैं वो अपने शरीर को कई रूपों में प्रकट कर सकते हैं अंतर्दान कर सकते हैं नाश भी कर सकते हैं लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि वो रूप शाश्वत नहीं है ऐसा नहीं है नहीं तो नाश भी कर सकते नाश किस कंटेंट में कह रहे हो किस कंटेंट में आप बताओ ना मैं तो नाश मतलब नष्ट हो जाए नष्ट भगवान का स्वरूप आज तक तो नष्ट नहीं हुआ तो मतलब नहीं कर सकते ना अब ये तो आप जब ये तो आप निर्णय लो अरे

⬜ Not used yet · 01:58:08:26 – 01:58:25:06 (0:16)

01:58:08:26 फिर वही बात तो आपने ने बुलाया कि मुझे ही निर्णय लेना मैं तो मैं कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका शास्त्र आधार हो तो शास्त्र आधार इसका आधार कोई शास्त्र आधार है है ना भगवा 12व स्कंध में लिखा है क्या लिखा है कि भागवत का एकमात्र उद्देश्य है जीव और ब्रह्म की एकता जीव ब्रह्म की एकता का अर्थ क्या

✅ This part is already used · 01:58:25:06 – 01:58:30:12 (0:05)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 46:22 ↗

01:58:25:06 है वैष्णव ने क्या माना है भगवान देखिए शास्त्र आधार मैंने बता दिया अब आपने आचार्यों का आधार

⬜ Not used yet · 01:58:30:12 – 01:59:04:07 (0:34)

01:58:30:12 आप वही उसी को भाष्य कहते हैं नहीं वो भाष्य आपने शास्त्र कहा आप कहेंगे तो जब आप शंकराचार्य भाष्य को मान सकते हो तो क्या हम वैष्णवा आचार्य के भाष्य को ना मान तो मैं वहां पे ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध करने के लिए मान रहा हूं ना आप करिए उनके द्वारा किन के द्वारा मैं कह रहा हूं आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध शक्तिमान है भगवान हमारे वैष्णवा आचार्य बोल रहे हैं नहीं सर्वशक्तिमान है तो ऐसे तो सर्वशक्तिमान मुसलमान भी कहता है कि अल्लाह है मगर वो अवतार नहीं ले सकता बाधित है नहीं हमारे वैष्णव आचार्य ऐसा नहीं बोलते हैं वो तो कहते हैं अवतार लेते हैं ऐसे ही यहां पे एक जगह आप बाधित कर रहे हो कि वो अपने स्वरूप का नाश नहीं कर सकता

✅ This part is already used · 01:59:04:07 – 01:59:51:10 (0:47)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 46:42 ↗

01:59:04:07 ये प्रश्न जो है शास्त्र पर आधारित नहीं है इसलिए इसका उत्तर मैं नहीं दे सकता हूं क्योंकि इसको को मैं बोलूंगा तो फिर उसमें आप मायावाद घुसाओगे। ये कहां लिखा है कि शास्त्र पे आधारित प्रश्न का ही जवाब दिया जाए। ये हमारे शास्त्र कहते हैं। कहां लिखा है बताइए? शास्त्र में जितने प्रश्न है वो बेतु के नहीं है। ये कहां लिखा है? शास्त्र पे आधारित प्रश्न का ही जवाब दिया जाएगा। और अगर दिया जाएगा तो इसका मतलब इस के पास नास्तिकता का खंडन है ही नहीं। क्योंकि नास्तिक तो शास्त्र के बाहर है। तो उसका जवाब तो दिया ही नहीं जाएगा। तो नास्तिकता का खंडन कौन करेगा? नास्तिकता का खंडन जो कर सकते हैं करेंगे। लेकिन मेरा जो विचार है तो ईश्वर है ये कैसे सिद्ध होता है प्रभुपाद जी के अकॉर्डिंग ईश्वर है वो कैसे सिद्ध होता है यानी कि कुल मिलाकर के आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं कर सकते बस टैग दे सकते हो कि हां ईश्वर हमारा सर्वशक्तिमान ईश्वर सर्वशक्तिमान क्यों नहीं है

⬜ Not used yet · 01:59:51:10 – 02:01:24:26 (1:34)

01:59:51:10 तो शास्त्र बोल रहे हैं वो अपने शरीर का नाश कर सकते हैं बिल्कुल कर सकते हैं कर सकते हैं तो फिर आप क्यों कह रहे हो वो शाश्वत है नाश कर आपको मानना पड़ेगा कि वो लीला रूप में आते हैं और वो अपना शरीर प्रकट करते हैं और उसी लीला को वो खत्म भी कर सकते इसीलिए और हमारे लिए इसीलिए मैं ऐसा नहीं बोलना चाहता क्योंकि आप फिर से मायावाद लाओगे उसमें क्योंकि मायावाद को आपको मानना पड़ेगा ना नहीं मान सकते ना कैसे मानेंगे आप सर्वशक्तिमान सिद्ध करो अपने वैष्णव आचार्य बोले सब ऐसा तो भगवान अपने शरीर को नष्ट करने का मतलब यह नहीं है कि हमारे द्वारा नष्ट हो जाएगा वो शरीर ऐसा नहीं है उसका मतलब जो भी हो आप शंकराचार्य के बाहर जाकर के ना तो नास्तिकता को हरा पाएंगे ना धर्म की स्थापना विषय को चेंज कर रहे हो आप तो आप ही तो कह रहे हो मैं उनको नहीं मानता मायावाद को किनको अगर सर मैं मायावाद का खंडन करने यहां नहीं बैठा हूं। मायावाद का खंडन अलग विषय है। अच्छा खंडन का अर्थ क्या होता है? खंडन का अर्थ होता है मैंने किसी बात के लिए मना कर दिया। वो आप कर चुके हो। फिर कह रहे हो मैं खंडन बैठा हूं। आप मायावाद पर चर्चा ही मत करो। आप ही तो लाए हो। नहीं मैं कहां लाया हूं? मतलब आप ही लाए। आप लाए। मायावाद पर चर्चा। श्रीधर स्वामी से बात आई थी। श्रीधर स्वामी जी को मैं वैष्णव मानता हूं। हमारे आचार्य वैष्णव मानते हैं। अरे भैया आपके में जहां से आपने उन्हें वैष्णव माना है उसी में वो कह रहे हैं वो वो मायावादी भाष्य लिख रहे हैं। नहीं हां वो बोल रहे हैं तो मैं

02:01:06:14 मानता हूं इस बात को। कौन बोल रहे हैं जो हमारे आचार्य बोल फिर आपके यहां पे एज इट इज ज्ञान नहीं आ रहा है। क्यों नहीं आ रहा है? मायावादी भाष्य लिख रहे हैं। आपके मायावादी है। श्रीधर स्वामी जो भागवत लिख रहे हैं उससे मायावाद नहीं है। उसमें भी है। उसमें तो नहीं है। उसमें भी है। पढ़ी है आपने उनकी जो भाष्य हमारे पास तो है। हम तो पढ़ते हैं आज भागवत। उसमें भी

✅ This part is already used · 02:01:24:26 – 02:01:48:07 (0:23)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 47:52 ↗

02:01:24:26 आपकी जो आपकी जो भागवतम है उसमें चौथे स्कंध में लिखा हुआ है कि जो है जहां पर वो मायावाद नहीं है वो आपने समझ लिया मायावाद वो मायावाद नहीं है नहीं समझने का तरीका अलग है नहीं चौथे स्कंध में श्रीधर स्वामी लिख रहे हैं कि भगवान जो शिव है वो परम ब्रह्म है बिल्कुल है गलत और यहां पर जो प्रभुपाद जी है वो लिख रहे हैं कि नहीं वो परम ब्रह्म नहीं है वही उसी जगह पे हां

⬜ Not used yet · 02:01:48:07 – 02:02:19:06 (0:31)

02:01:48:07 हां हर वैष्णव ने अलग-अलग भाव दिए हैं ना भाव के अनुसार एज इट इज़ नहीं रहा फिर ये आरोप फिर आप वल्लभाचार्य जी पर भी लगाओ। यह आरोप लगा किसी और के गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। आप अपने बारे में आप जब आरोप लगा रहे हो तो सारे वैष्णव पर लगाओ ना। वल्लभाचार्य जी वर्णाश्रमी है और अगर अगर वो शंकराचार्य का उपास उड़ाएंगे। अरे भैया वर्णाश्रम बात बीच में कहां से आ गई? मैं अभी इस बात कह रहा हूं कि जो आप टीका बोले ना चौथे स्कंध में वो बोल रहे हो। उसी श्लोक पर और आचार्य ने अलग-अलग भाव दिए हैं। मैं ये कह रहा हूं। ठीक है। वो ये नहीं कह रहे हैं कि

✅ This part is already used · 02:02:19:06 – 02:02:22:28 (0:04)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 48:19 ↗

02:02:19:06 हमने जो भागवत पढ़ी है वो श्रीधर स्वामी से पढ़ी है। आप कह रहे हो? हम भी नहीं कह

⬜ Not used yet · 02:02:22:28 – 02:02:47:10 (0:24)

02:02:22:28 रहे हैं। आप कह रहे हो? हम कहां कह रहे हैं? चेतन महाप्रभु कह रहे हैं। चैतन्य कहां कह रहे हैं? कह तो रहे हैं। मैं भागवत समझ पाया उनसे। अरे इसका मतलब देखिए उन्हीं से ही पढ़ा हुआ उन्होंने दूसरे से व्याख्या तो दूसरे से पढ़ा हुआ बताइए। अगर पंडित से पढ़ा उन्होंने आपने तो कहा कि वो उन्हीं के मुख से सुनी मगर सीधा स्वामी का भाष्य ऐसा नहीं है। आपने ही तो कहा इसका कोई प्रमाण नहीं है। इसमें रिकॉर्ड में आपने कहा है भाई साहब। नहीं इसका प्रमाण उस समय ध्यान नहीं दे पाया। इसका कोई प्रमाण नहीं है। आपने सीरियस हो के कहा था। नहीं नहीं उस समय ध्यान नहीं। किसका

✅ This part is already used · 02:02:47:10 – 02:03:46:21 (0:59)

→ Used in: B · Video क्या है इस्कॉन की प्रामाणिक परंपरा ? at 48:34 ↗

02:02:47:10 भाष्य था उस समय? उस समय किसका भाष्य था यह भी प्रमाण नहीं मिलता। यानी कि आपके यहां पर प्रामाणिक शिक्षा नहीं है। ऐसा भी नहीं कह सकते हैं। [हंसी] ऐसा कैसे कह सकते हो आप? चलिए खैर बहुत लंबी चर्चा हो गई। ऐसा नहीं कह सकते। वातावरण भी गर्म हो गया है। गरम वाली बात है। बड़ी अच्छी चर्चा हुई लंबी। ठीक है फिर आप लोग और आप मुझे कुछ प्रमाण देंगे कि प्रभुपाद जी ने जो है शिव जी को मुक्ति दाता माना है उस संबंध में और हमारी हो सकता है अब तो वो चैतन महाप्रभु को लेकर के चर्चा हो चुकी है आप लोग बताइएगा कि वर्णाश्रम पे आपको हमारी चर्चा देखनी है कि नहीं हो सकता है दोबारा हम लोग कभी आए तो वर्णाश्रम पे हमारी चर्चा हो कभी कि वर्णाश्रम वर्णाश्रम पर तो मैं कोई चर्चा नहीं करना चाहूंगा क्योंकि वो विषय बहुत विरोधाभास वाला है विरोधाभास नहीं वो तो क्या कहते हैं? बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड विषय है। कॉम्प्लिकेटेड विषय है क्योंकि हमारे आचार्यों ने जो बोला है हम तो उसको मानते हैं और जहां तक बारिश हो

⬜ Not used yet · 02:03:46:21 – 02:04:07:00 (0:20)

02:03:46:21 रही है क्या? चलिए ओके ठीक है। आप सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। हरे कृष्णा। जय श्री राम। [संगीत]

Plans for this video (0)

No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.

🤖 Ask AI for suggestions

AI reads the remaining (unused) parts of this video and gives ideas for new videos: from where to where, hook, and what to remove from the middle. Suggestions follow the RULES and appear here as "AI Suggestion". You can review, edit or approve them.

  • ⬜
    Hindi SRT Required

    YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)

  • ⬜
    English SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.

  • ⬜
    Title (per Rules)

    Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.

  • ⬜
    Description

    YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.

  • ⬜
    End Screen

    YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.

  • ⬜
    Cards

    YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.

  • ⬜
    Playlist Automatic

    YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.

  • ⬜
    Thumbnail

    YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.

"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.

Playlists

Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).

A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 2:04:08 · 14 Dec 2025

इस्कॉन ऐसा क्यों कर रहा है? Discussion with brahmachari Lakshmi Narasimha Das

0%
☁️ Drive Not in Drive yet

Notes

Description

(empty)

History

No changes yet.

✂️ Clip Cutter

⌨️ Keyboard shortcuts

Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop

▶

Start

End

🔍 zoom
Already used Plan clips
⚠️ () of this clip is already used in another video (green part). Fine if on purpose, otherwise change the times.
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)

Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".

Clips () · Total

Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.

Hook, full note for editor, status