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00:00:07:13 अब मैं उन सज्जनों की वंदना करता हूं जो परमार्थ के अधिष्ठान या आधार है और जिनके द्वारा लोगों पर गुण ज्ञान प्रकट होता है जो वस्तु ब्रह्म वस्तु अर्थात यहां पर ब्रह्म से तात्पर्य परम दुर्लभ है यानी जो ब्रह्म परम दुर्लभ और कभी मिल ही नहीं सकती। वह संतों की संगति से सुलभ हो जाती है। वह वस्तु ब्रह्म रहती तो प्रकट ही है पर किसी को दिखाई नहीं पड़ती। अनेक प्रकार के उपाय करने पर भी वह नहीं मिलती। उसके सामने परीक्षा करने वाले स्तब्ध हो गए। आंखों वाले अंधे हो गए। अपनी ही वस्तु को देखते हुए भी धोखा खा गए। वह वस्तु दीपक से भी नहीं दिखाई पड़ती और अनेक प्रकार के देखते हुए भी धोखा खा गए। वह वस्तु दीपक से भी दिखाई नहीं पड़ती। भैया हो हां 16 16ों कलाओं से पूर्ण चंद्रमा और तीव्र कला राशि सूर्य। लो भाई 16 कला के चंद्रमा और यह बात यहां पर प्रदर्शित हो रही है। 16 कला क्यों कहा जाता है? चंद्रवंशी
00:01:22:16 श्री कृष्ण और सूर्यवंशी श्री राम अ माह को या फिर पक्ष को कृष्ण पक्ष को शुक्ल शुक्ल पक्ष को जो चंद्रमा के आधार पर चंद्रमा की स्थितियों के आधार पर बांटा जाता है। तो इस कारण से क्योंकि चंद्रमा का गुण है चंचलता। वह कभी-कभी अपनी स्थिति अधिक बार बदलता है और कभी-कभी अपनी स्थिति कम बार बदलता है। तो चंचलता का गुण उसमें भी प्रदर्शित होता है और वहीं पर सूर्य सूर्य की स्थितियां एक जैसी रहती है। वह 12 तरह से अपने स्थितियों को बदलता है। तो सूर्य की स्थितियों के आधार पर वर्ष की गणना होती है हमारे यहां। और चंद्रमा की स्थितियों के आधार पर हमारे यहां तिथियों की गणना होती है। अब क्योंकि चंद्रमा अधिक प्रकार से अपने अपने रूप दिखाता है। इस कारण से चंद्रवंशी होने के नाते श्री कृष्ण को 16 कलाओं वाला कहा जाता है। और वहीं दूसरी ओर अह सूर्य भगवान तो सूर्य भगवान क्योंकि 12 तरह की स्थितियां अपनी दिखाते हैं, प्रदर्शित करते हैं तो उस कारण से
00:02:38:04 सूर्यवंशी होने के नाते श्री रामचंद्र को 12 कलाओं का कहा जाता है। परंतु ऐसा नहीं है कि जो सूर्य है उसकी यहां पावर की बात हो रही है। उसमें सिर्फ 12 प्रकार की पावर है। चार प्रकार की पावर चंद्रमा में ज्यादा है। चंद्रमा का चंचलता का गुण हो जिस कारण से वो 12 से भी अधिक अपने रूप व्यक्त करता है। परंतु ऐसा नहीं वो वो जो चार रूपों को व्यक्त कर रहा है वह चार रूप सूर्य की स्थितियों में है नहीं वो शामिल है। जैसे ऐसे समझ लीजिए इसको क्योंकि सूर्य अपनी स्थिति 12 प्रकार से बदलता है तो इसलिए सूर्यवंशी होने के नाते अह भगवान श्री रामचंद्र जी को 12 कला का संबोधन कहीं-कहीं पर कर दिया गया। और क्योंकि चंद्रमा अपनी स्थिति 16 प्रकार से बदलता है। इसलिए चंद्रवंशी होने के नाते चंद्रवंशी होने के नाते
00:03:31:10 श्री कृष्ण को कहीं-कहीं पर 16 कला का कह दिया जाता है। अब ऐसा नहीं है कि वो जो स्थितियां बदल रहे हैं वो मतलब वहां पर कोई पावर की बात हो रही है। इसको ऐसे समझ सकते हैं। दो उदाहरण मैं दूंगा। पहला उदाहरण है कि यदि हम ₹1 की गणना अठन्नी के आधार पर करेंगे तो ₹1 के कितने टुकड़े हमें दिखाई देंगे? दो। और वहीं पे अगर चवन्नी के द्वारा ₹1 की गणना की जाएगी तो कितने टुकड़े दिखाई देंगे? चार। अब क्योंकि चवन्नी के आधार पर ₹1 के चार टुकड़े हुए हैं तो क्या यह माना जाए कि चवन्नी ज्यादा शक्तिशाली है? चार चवनियां दो अठनियों से ज्यादा शक्तिशाली हैं। यह माना जाए नहीं। दो अठनियां और चार चवनियां एक ही है। इसी तरीके से 16 16 बार स्थिति बदलना और 12 बार स्थिति बदलना एक ही है। क्योंकि उनके द्वारा जब वो विभाजन के बाद जो अह निष्कर्ष प्राप्त हो रहा है, परिणाम प्राप्त हो रहा है उनके योग से वह एक समान है। जैसे चार चवन्नियों का योग क्या प्राप्त हुआ? ₹1. दो अठनियों का योग क्या प्राप्त हुआ? ₹1 तो इस हिसाब से दोनों बराबर हो गए। एक दूसरा उदाहरण और है कि
00:04:46:21 हमने एक जगह पर अग्नि जलाई और अ संयोग से उस अग्नि की चपेट में एक सामान्य में जितनी भी चीजें आ सकती हैं, जल सकती है वो जल गई। और हमने एक दूसरी जगह पर अग्नि जलाई। उसकी चपेट में बहुत ज्यादा चीजें झुलस गई। तो क्या इस आधार पर हम यह कहेंगे कि जहां पर कम चीजें झुलसी हैं वहां पर जो अग्नि थी उसकी दाहक क्षमता कम थी। क्या ऐसा कहेंगे या फिर ऐसा कहेंगे कि उसके नजदीक में जलाशय अधिक पास था तो वो जितनी दूर तक चली उतनी दूर तक चली। जलाशय के कारण बुझ गई। और जो दूसरी अग्नि जली वो काफी देर तक इसलिए जली क्योंकि उससे कोसों दूर तक जलाशय नहीं था। उसकी चपेट में बहुत से चीजें आ गई। मगर जो दाहत क्षमता है जो गर्माहट है दोनों जगह प्रज्वलित होने वाली जो अग्नि है उसकी जो गर्माहट है वह तो एक ही जैसी है ना अग्नि तो अग्नि तभी कहलाएगी ना जब जलाएगी तो जलाने के स्तर के एक होने के कारण उन दोनों की दाहक क्षमता को एक माना जाएगा हां किसी की लीला ज्यादा देर तक चली हो किसी की किसी की लीला जलाने वाली कम देर तक चली हो मगर इसके कारण भेद करते हैं राम और कृष्ण
00:06:01:25 में हालांकि अब वो भेद बंद करने लगे हैं धीरे-धीरे शटर डाउन हो रहा है। इस अपनी चीजों को परिवर्तित कर रहा है। और हमारा भी तो उद्देश्य यही है कि भैया शोधन करते चलो। धीरे से वर्णाश्रम भी अभी भी कुछ है लेकिन हमारी नजर में हां हां वो वो धीरे-धीरे होगा। मगर हमने जब से ये बात उठाई मैं देख रहा हूं करीब 2000 21 कोरोना के बाद से लगातार देख रहा हूं। कोरोना के पहले अब समथिंग कोरोना के बाद से जब पहले बहुत जोर शोर से यह सब बातें होती थी इनके चैनल्स पर कि राम जो है पूर्ण है वो चंद्र पूर्णिमा का चांद है कृष्ण जी और ये दूसरे चांद है अन्य अवतार ये सब बातें होती थी। अब वो बातें गौर हो गई। अब प्रभुपाद जी का कोई वीडियो वायरल होता है जिसमें वह कहते हैं सब एक है। हरि हरि में तो भेद नहीं है। इतना करते हैं। वो बात और है कि प्रभुपाद जी जब हरि हरि में भेद नहीं मानते हैं। ठीक है? प्रभुपाद जी जब हरि हरि में भेद नहीं मानते हैं। फिर भी उन्होंने रसगत भेद को स्वीकार किया। वही व्यवहार वाला भेद रसगत भेद। अपने रस की दृष्टि से आपको किस में रस ज्यादा आ रहा है। तो रसगत भेद उन्होंने स्वीकार किया और रसगत भेद स्वीकार करते हुए उन्होंने अपनी भगवत गीता
00:07:17:01 में 2.2 में यह लिख दिया कि नारायण भी संपूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है। यद्यपि वो मानते नहीं है। ये देखिए आप पर अब वो मानते नहीं है पर उन्होंने लिखा। तो इस आधार पे उनके लोग आकर के कहेंगे कि नहीं देखो प्रभुपाद नहीं मानते थे कि उनमें कोई भेद है। वो तो उन्होंने रस की दृष्टि से लिख दिया। सही बात है तो रस की दृष्टि से क्या व्यास जी नहीं लिख सकते जो उन्होंने कहीं-कहीं पर ज्यादा बखान कर दिया है विष्णु भगवान का और कहीं-कहीं पर शिव भगवान का तो शिव भगवान वाले बखान को छोड़कर के महिमा मंडन को छोड़कर के अब विष्णु भगवान वाले महिमा मंडन को ही केवल पकड़ते हैं वहां ये नहीं सोच सकते कि वो रसग भेद कर दिया उन्होंने उस समय उनको उसमें रस आ रहा था विष्णु स्वरूप में तो उन्होंने उसका महिमा मंडन किया और उस समय उनको उसमें आ रहा था तो उन्होंने उसका महिमा मंडन कर दिया तो यह प्रभुपाद जी का पक्ष रखने के लिए तो आएंगे मगर व्यास जी का पक्ष रखने नहीं आएंगे वहां पर नहीं व्यास जी ने जो शिव जी के बारे में कहा है वो तो तामसिकों के लिए है और जो इनके बारे में कहा है वो सात्विकों के लिए है। अब दिक्कत यह है कि जब सात्विकों के लिए है तो आप अपने निमंत्रण पत्रों में यह लिखा करो ना कि
00:08:32:04 इस कौन वही आए जो सात्विक हो क्या मतलब क्या है आप कोई एक वो बनाओ एक मीटर वगैरह ले खड़े हो वहां के गेट पे स्कॉन के गेट पे और वहां पर जो है आप एक जो नहीं हथियार वगैरह चेक करते हैं आप कोई हथियार तो नहीं लाए साथ में ऐसा क्या कहते हैं उस मशीन को मेटल ल डिटक्टर हां हां तो ऐसे ही कोई मशीन डिटक्टर तो ऐसे ही मशीन मशीन तैयार करो क्या कहते हैं मेटल वो तामसिक डिटक्टर और उसी को लो अंदर भागवत उसके लिए है ना जो सात्विक है उसी को लो अंदर फिर सबको क्यों बांट रहे हो तुम तो मुसलमान को भी दे दे रहे हो वो चिकन खा के आ रहा है व्यक्ति वो कह रहा है मेरे हाथ गंदे वो श्रद्धा रख रहा है फिर तुम उसको भगवत गीता पकड़ा रहे अरे भैया वो तो सात्विक के लिए फिर तुम क्यों दे रहे हो तुम सिखों को मतलब क्या है इस बात का भाई इस बात का मतलब है नई वाली और इस बात नई वाली और पुरानी वाली गीता में ही भेद है पहले इस बात का मतलब ऐसा ही है कि जिसने जिसकी निष्ठा शिव में है उसके लिए विष्णु तत्व की महिमा करने वाले विष्णु विष्णु तत्व को प्रधान करने वाले शास्त्र तामसिक
00:09:47:15 कहलाएंगे और जिसकी निष्ठा विष्णु में है उसके लिए शिव तत्व के वर्णन करने वाले जो शास्त्र है वो तामसिक कहलाएंगे। तो तामसिक होते हुए भी ऐसा नहीं कि उसको पढ़ना नहीं है। परंतु उसको अपने जो विष्णु तत्व के महिमा मंडलन के सीमा में रहते हुए उस शास्त्र को पढ़ना है। सिर्फ इतनी सी बात है वहां तामसिक और सात्विक की। वरना खड़े हो जाइए। वो ट वो टर्मिनेटर नहीं आता था। जो अपनी आंखों से सब देख लेता था। पूरा स्कैन करता था। ऐसे ही खड़े हो भैया गेट पर इस के गेट पर फिर तो तुम हरे अल्लाह अरे अल्लाह करवा रहे हो हां फिर भूल गए कि तुम्हारी चीजें सात्विकों के लिए है अब तुम हरे अल्लाह अरे अल्लाह करवा रहे हो मतलब किसी एक बात पर तो ठहर जाओ भाई खैर कैसे ठहरोगे जब तुम राम को नहीं जान पाए तो कैसे ठहर पाओगे चलिए और उनके वहां अगर सब कोई सात्विक है तो फिर पार्टनर जैसे केस कैसे हो रहे हैं? हां वो तामसिक थे। उनको सात्विक समझ के भर्ती कर लिया उन्होंने। ऐसा माना जा सकता है। खैर आगे चलते हैं। तो ये वाला क्लियर है ना कि कृष्ण और ये जो श्री रामचंद्र
00:11:02:21 जी में क्या भेद कि ये जो बखान करते हैं लोग 16 कला 12 गला। तो जिस सूर्य के प्रकाश से रोआ तक दिखाई पड़ता है। अणु रेणु आदि अनेक प्रकार के सूक्ष्म प्रकाश दिखाई देता है। चिरे हुए बाल का अगला भाग भी दिखाई देता है। वह सूर्य का प्रकाश भी वह वस्तु नहीं दिखा सकता। ब्रह्म पर सज्जनों की कृपा से साधकों को वह वस्तु भी दिखाई पड़ती है। जहां आक्षेपों का अंत हो जाता है। प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं। तर्क मंद पड़ जाते हैं। अपनी वस्तु के संबंध में तर्क करते हुए जहां विवेक का भी वश नहीं चलता। शब्द लड़खड़ाते हैं। और मन की पहुंच नहीं हो सकती। सहस्त्र मुखी और परम वाचाल शेषनाग भी जिसका वर्णन करते करते थक गए वह भी नहीं बतला सकते कि वह वस्तु क्या है जिन वेदों ने सब कुछ प्रकाशित किया है और जिनके बाहर कुछ भी नहीं है वह भी किसी को वह वस्तु नहीं दिखा सकते वही वस्तु सत्संग और स्वानुभाव से समझ में आने लगती है। वही वस्तु सत्संग
00:12:18:00 और स्वानुभाव से समझ में आने लगती है। भला ऐसा कौन है जो वचनों द्वारा उसकी महिमा बतला सकता हो अनिर्वचनीय इस माया की कला विचित्र है पर यह भी उस वस्तु की पहचान नहीं बतला सकती पर संत लोग पर संत लोग उसी मायातीत अनंत का मार्ग बतला सकते हैं। जिस वस्तु का वर्णन नहीं हो सकता वह यही संतों का स्वरूप है। इसलिए वचनों की आवश्यकता नहीं। संत आनंद के स्थल सच्चे सुख के स्वरूप और अनेक प्रकार के संतोषों के मूल हैं। संत स्वयं विश्रांति की भी विश्रांति और तृप्ति की भी तृप्ति है। यहां तक कि वही भक्त का परिणाम है। संत लोग धर्म के धर्म क्षेत्र स्वरूप के सत्पात्र और पुण्य की पवित्र भूमि है। वे समाधि के मंदिर विवेक के भंडार और सायुज्य मुक्ति के मात्र ग्रह या अधिष्ठान है। वे सत्य के निश्चय सार्थक की जय प्राप्ति के समय अब देखिए यहां पे एक बात देखने को मिल रही है। जब
00:13:33:15 हम सज्जनों की वंदना कर रहे हैं तो बाकी सब चीजों को जितनी भी अन्य चीजें उनको हम उनके उसके सामने नगण्य बता रहे हैं। जैसे वेद के बारे में भी कहा वेद भी नहीं दिखा सकते और सज्जन दिखा सकते हैं। सज्जनों की वंदना चल रही है। तो सज्जन को भी यहां पर सद्गुरु के रूप में ही देखना चाहिए या जैसे सद्गुरु तक पहुंचाने वाले हो गए। सत्संग वहां करने वाले हो गए। पर यहां पर यह बात है कि हमारी चीजों को लेकर के सनातन धर्म से जुड़ी हुई घट सनातन धर्म से जुड़े हुए घटकों को लेकर के किस तरीके से समाज में समाज क्या विपक्षियों के द्वारा विरोधियों के द्वारा एक चवा बनाया जाता है। अरे माला फेरने से अगर भगवान मिल जाते या फिर पत्थर पूजने से यह हो जाता वह हो जाता या फिर क्या कहते हैं कुछ भी जो भी थोड़ा बहुत अब इसमें बात ऐसी है कि जैसे हम कहे कि हमें भोजन बनाना है भोजन बनाना है अब हम उसमें भोजन में आटा गथना भी है बर्नर को जलाना भी है रोटियां भी बेलनी है सब्जी भी छोंकनी
00:14:48:24 सब्जी को भी काटना है और भी इस तरीके के भोजन बनाने के लिए अमुक अमुक बहुत से छोटे-छोटे से अलग-अलग कार्य हैं। अब जब हम बहुत वृहद हर चीज की व्याख्या करने पर उतर आए तो एक समय ऐसा आएगा जब हम सब्जी काटने की महत्ता बता रहे होंगे। है ना? और काफी लंबे समय तक बता रहे होंगे सब्जी काटने की महत्ता। और उस बात को पकड़ के कोई कहने लगे कि सब्जी काटने से भोजन मिल जाएगा। सब्जी काटने से भोजन कैसे मिटेगा भाई? अरे भैया जो भी चीजें जरूरी है भूख आपको तृप्त करने के लिए आपकी भूख को पूरा करने के लिए उन सभी घटकों को मिलाकर के जो सामंजस्य की शिक्षा निकलेगी या जो सामंजस्य से जो परिणाम प्राप्त होगा परिणाम पूर्वक जो भोजन प्राप्त होगा उससे आपकी भूख पिटेगी। तो ये बकवास की बातें होती है। अरे भगवान आता क्यों नहीं है? तो माला फेरने से भगवान नहीं मिलता। मान लो आप माला कर रहे। अरे मैं तो मन से करता हूं। माला फेरने से क्या हो जाएगा? या इस तरीके से आप लोग समाज में रहते होंगे तो आए दिन आपको इस तरह की चीजें दिखती होंगी। जैसे कि हम लोग जिस
00:16:04:24 क्षेत्र में हमारी रुचि हो जाती है, जिस क्षेत्र में हमारी रुचि हो जाती है, तो उस क्षेत्र से जुड़ी हुई चीजें ही हमारे आसपास हमें दिखने लगती हैं। जैसे जब मैंने धर्म रक्षा का बीड़ा उठा लिया था तो नास्तिक विधर्मी हां और फिर जो है सनातना भाष और फिर वो जो है परंपरा भाष राम द्रोही शंकराचार्य द्रोही वो सब आए दिन टकराने लगे थे। अब इसका एक उदाहरण मैं आपको दूं। यदि आपने आप में से कई लोगों ने अपने घर में कोई वाहन खरीदा होगा कभी ना कभी है ना तो आप देखना कि जो वाहन लेने के लिए आप तैयारी करते हो ना मुझे यह वाला वाहन लेना है Pulsar लेनी है बुलेट लेनी है फिर आपको बुलेट के सारे मॉडल्स दिखने लगते हैं बाहर निकलते ही हां ये जा रही है ये आप उसको पीछे से ही देख के पहचान लोगे ये वो वाली है अभी तक नहीं जानते थे पता नहीं कितनी बार वो आंखें आंखों के सामने से गई होगी मगर जब आपकी रुचि हो गई ना बुलेट में या अमुक गाड़ी में तो आप उसके सारे मॉडल यह सेकंड मॉडल है यह फर्स्ट मॉडल है आप पूरा उसका देख लोगे क्योंकि अब आपको वो दिखाई देने लगेगा अपने आसपास तो उसी तरीके से क्या होता है कि अ जो
00:17:20:09 ये जो विरोधी पक्ष है वो हमारी चीजों पर इस तरह से कटाक्ष करता है। अरे सद्गुरु की गुरु की वंदना से भगवान कैसे मिल जाएगा? अरे भाई गुरु की वंदना भगवान को मिलने का मिलने का एक सत्य सहता की क्रमिक अभिव्यक्ति है। उसका एक पायदान है। ऐसे तो आप ये कह दोगे कि भाई हमने कहा कि सुबह उठकर के और जो है फ्रेश होने के बाद जो है स्टच इत्यादि के बाद आपको हाथों को स्वच्छ अवश्य करना चाहिए। धोना चाहिए हाथों को और यह पवित्रता के लिए अत्यंत आवश्यक है। इससे आप पवित्र हो जाते हैं। अब व्यक्ति कहे अरे बिना नहाए पवित्र कैसे हो जाएंगे? तुमने हाथ धोने से पवित्रता कैसे मान ली भाई? हां। तो यह वही वाली बात है कि आप एक छोटी सी चीज को उसकी पूरी जो सामग्री है उसको तो आपने देखा नहीं। और आप उस एक चीज पर क्वेश्चन उठाने लगे। और इसीलिए हमारे यहां का क्या कहा गया है? समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा ही साधु संत धर्म है। किसी एक चीज को पकड़ के उसके पीछे वो नहीं करना है। और सामंजस्य आपको कैसे लगेगा कि
00:18:35:20 आपने सनातन धर्म के सार्वभौम सिद्धांतों की सीमा में रहते हुए है ना जो आपके गुरुजन है परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्य द्वारा दिए गए सिद्धांतों की सीमा में रहते हुए आपने उन शास्त्रों का अध्ययन किया हो अथवा अध्ययन करने वाले को सुना हो तभी तो आप निचोड़ पाओगे कि शास्त्रों में अलग-अलग जगह अलग-अलग कई प्रकार की व्याख्या है तो उसका निचोड़ क्या आया व्हाट व्हाट टू डू एक्सजेक्टली जब भगवत पाद आदि शंकराचार्य जी अपने शिष्य के साथ बैठे तो ये संवाद उसमें है जो उनकी वो प्रश्न मालिका नाम का ग्रंथ है ना उसमें छोटा सा संवाद है बहुत सटीक उसमें शिष्य कहते हैं शंकराचार्य जी से कहते हैं कि अब मैंने सब समझ गया मैं अपने दिमाग का इस्तेमाल करके मैंने सब समझ लिया ब्रह्म माया दर्शन इत्यादि मैंने सब समझ गया अब ये बताओ मुझे करना क्या है व्हाट टू [हंसी]
00:19:35:25 वो बड़ा कॉमिक सीन है कि भाई हम उसको घुमा तो लाए पूरा ब्रह्म माया हां स्वरूप भूत लक्षण सच्चिदानंद सब घुमा लाए नास्तिक और ये वो सब अब उसके बाद वो लास्ट में कहता है भाई प्रभु मुझे ये बता दो करना क्या है भगवान क्या कहते हैं पाद शंकराचार्य जी क्या कहते हैं कहते हैं कि तू कंस के शत्रु कृष्ण में अथवा काम के शत्रु शिव का भजन कर। ये कहा बहुदा आदि शंकराचार्य जी ने। वो पगला कोई कह रहा था मथुरा की धरती से कि मैं चैलेंज करता हूं सभी शंकराचार्यों को राम भद्राचार्यों को कि किसी ने जो है कोई यह सिद्ध करके बता दे कि शंकराचार्य ने कहीं पर भी भगवान के अवतार को स्वीकार किया हो। हम वो चैलेंज कर रहे थे। मैं अभी जब मथुरा गया था तो मैंने फोन मिलाया था उसको उस व्यक्ति को। मथुरा की पावन धरती से जिसने चैलेंज किया था ना कुछ दिनों पहले माइक पे देखा होगा आप लोगों ने। तो मैंने फोन मिलाया था मैं आ गया। व्हाट टू डू? कहां मिलोगे? तो फोन ही नहीं उठाया उसके बाद।
00:20:52:04 उसने कहा मैं अभी थोड़ी देर सीधे डायरेक्ट वो व्यक्ति नहीं बोला था। वो नीचे उसके चैनल में जो पट्टी चलती है उस पर मैंने फोन किया था कि मैं मथुरा में हूं। बताइए कहां सिद्ध करना है अवतार को? बताइए मैं आ गया। तो बोला जो पट्टी पर जिसके पास फोन लगा था वो शायद व्यवस्थापक था उस कार्यक्रम का। उन्होंने कहा मैं अभी बताता हूं। उसने उसके बाद मैंने कई फोन मिलाए। बहुत फोन मिलाए। नो रिस्पांस। इसका मतलब केवल बातों के शेर बातों के शेर और हम बातों से ज्यादा काम करने में विश्वास रखते हैं कि भाई ऐसे नहीं कि हम आ जाएंगे हम आ जाएंगे हम पहुंच गए फिर फोन मिलाया मथुरा की पावन धरती से बताइए चलो ठीक है हो सकता है तुम मथुरा में नहीं हो तो बता दो कब रहोगे कब अरेंजमेंट हो सकता है तुमने गला फाड़ फाड़ के चिल्ला तो दिया मैं चैलेंज करता हूं चैलेंज करता हूं यह लोग यही है चुनौती चुनौती चैलेंज इसी पे ही टिके हुए थे। खैर
00:21:58:28 जिस वस्तु का वर्णन नहीं हो सकता है वह यही संतों का स्वरूप है। इसलिए वचनों की आवश्यकता नहीं। संत आनंद के स्थल है। देखिए अनिर्वचनीय चीज में मैं आपको एक बहुत जरूरी बात बता दूं कि लगभग सभी विचारकों ने दार्शनिकों ने एक बात अंत में जाकर के कही है कि भाई इसके बाद की जो चीज है वो आपको बताई नहीं जा सकती। है ना? किसी ने उसको अचिंत कह दिया। किसी ने उसको तो लीला है भगवान की वो अचिंतनीय विषय है। हर जगह जाकर के एक यह वाली बात कहनी जरूर पड़ती है। पर जब आपके सामने यह वाली बात आ जाएगी कि कोई व्यक्ति अपने गलत बातों को छुपाने के लिए आपसे यह कह देगा कि भाई वो उसको समझा नहीं जा सकता तो आप वहां पर क्या करेंगे? जैसे आपसे स्कॉन वाला कोई कह सकता है कि भाई आपके जो शंकराचार्य उन्होंने भी तो अनिर्वचनीय कहा है यदि हम कहते हैं तो उन्होंने अनिर्वचनीय कहां जाकर के कहा है यह चीज देखनी होगी क्या उनके अनिर्वचनीय कहने से क्या ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता
00:23:14:14 खंडित हो रही है नहीं हो रही सर्वशक्तिमान सिद्ध करते हुए आगे की एक स्थिति है कि गुड़ जब खाते हो तो कैसा लगता है बताओ कौन सी नस फड़कती है गुड़ खाने से बताओ बता सकता है कोई तो यह विषय होता है अनिर्वचनी उसको सिर्फ फील किया जा सकता है तो महसूस किया जा सकता है उसको वर्णन नहीं किया जा सकता है कि हम तुम्हें बता सके कि हमारी आंतों में कौन सी आंत फड़कती है कहां से वो रिसाव होता है रस का जिसके कारण गुड़ हमें मीठा लगता है होता है क्या ऐसा और भी बहुत सी चीजें हैं जो अनिर्वचनीय है तो और शंकराचार्य जब अनिर्वचनीय कहते हैं तो उस अनिर्वचनीय में वह ऐसा नहीं होता है कि वह इस बात का जवाब ना दे रहे हो कि भैया सर्वशक्तिमान ईश्वर कैसे सिद्धि नहीं हो रहा है सर्वशक्तिमान और अगर इस तरीके से अनर्वचनीय को कहीं भी एक्सेप्ट कर लेना फिर तो रामपाल को भी एक्सेप्ट कर लो कोई प्रश्न पूछने जाओगे रामपाल से कह देगा अनिर्वचनीय अचिंत है लो तो रामपाल की बातें मान लो फिर नास्तिक कह देगा अचिंत है आईएस आईएस वाले कहेंगे हम कहेंगे तुम गोली क्यों दाग रहे हो गलत नहीं है गोली
00:24:29:22 दागना अचिंत विषय है लो दाग दी गोली जाओ ये कोई बात है क्या तो उन्होंने कहां पर जाकर के निर्वचनीय का प्रयोग किया है ये भी समझना होगा सभी आचार्यों ने कहीं ना कहीं एक जगह जाकर के कहा है पर वो किस स्थिति में कहा है ऐसे नहीं कि जो सिद्धांत हम ही ने कहे कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसी को काट दिया अवतार नहीं ले सकता ऐसे नहीं हां एक बा एक हद तक जाकर के उसको वाणी के द्वारा उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है। उस बात के लिए उन्होंने निर्वचनीय कहा है। तो आपको यह क्वेश्चन वहां पर करना होगा कि शंकराचार्य जी का कौन सा सिद्धांत है जिसको वो क्लेरिफाई बिना किए हुए निर्वचनीय कह रहे हैं। इस बात को याद रखिएगा। ये बात कभी ना कभी आपके सामने आ सकती है। है ना?
00:25:19:06 तो इस बात को आप ध्यान रखिएगा। कि इस तरह की बात भी आ सकती है कि शंकराचार्य ने भी तो अनिर्वचनीय कहा है तो वहां पर हम कैसे उस चीज का अपना पक्ष रखेंगे। ठीक है? तो ये अनिर्वचनीय वाली बात बहुत रोचक रही आज की। भाई आपने जो जो क्लेम किए हैं ईश्वर सर्वशक्तिमान है परम स्वतंत्र मोक्ष है शाश्वत धर्म है आप ये इन क्लेम्स को क्लेरिफाई कर दो उसके बाद खूब कहो अनिर्वचनीय हमने तो कई बार कहा ना परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म सर्वशक्तिमान ईश्वर तीन चीजें दे दो हम आपके साथ भाई इन मामलों में तो हमको जाना ही जाता है कम से कम कि हमारे जो चीजें हैं बहुत क्लियर है। हमें क्या चाहिए? सब जानते हैं आवान को क्या चाहिए? एक आध व्यक्ति ने तो ऐसा वीडियो बनाया ऐसे करते हुए आवान को चाहिए सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म [हंसी] मेरी फोटो लगाई है
00:26:34:14 उसमें और एक व्यक्ति खड़ा कर दिया ऐसे करते हुए तो इतना तो जानते हैं ना क्लियर है थॉट्स हमारे हमें चाहिए क्या और छोटी-छोटी चीजों में अगर हम लोग जाएंगे कि ये ये सिद्ध करो यहां यह लिखा है या हिंदू शब्द जैसे उन्होंने कहा कि आप हिंदू शब्द में शास्त्रार्थ करिए हमें आर्य समाज को नीचा नहीं दिखाना है जो हम उसको उसको किसी छोटी सी बात पर जाकर के निरत्तर करके चले आए। हमें चाहिए वो सिद्धांत जिसको हम जहां रखें तो वहां पर हमारी बात कट ना पाए। बस जो जो व्यक्ति ऐसा सिद्धांत देता जाएगा वह सब हमारे साथ और जो जो व्यक्ति सनातन धर्म के नाम पर ऐसे सिद्धांत देगा जो कट रहे होंगे उन सब का हम प्रतिकार करेंगे। हां तो आप हमें वह सिद्धांत दीजिए। हम भी आर्य समाज है। क्या उसमें दिक्कत है? क्योंकि हमें लड़ना आपसे नहीं है। आर्य समाज से हमारी लड़ाई नहीं है। सनातन धर्म के शत्रुओं से हमारी लड़ाई है। और वहां पर अगर हम आपकी बातों को लेकर के जाएंगे तो वो
00:27:42:00 उधर कोई ठीक-ठाक व्यक्ति आ गया तो गई भैंस पानी में। ठीक है तो उनको लगता है कि हम जो है उनको नीचा दिखाने के लिए कर रहे हैं। ये बातें मैंने की है ना पहले भी नीचा दिखाने की लड़ाई नहीं है। लड़ाई है अकाट्य सिद्धांतों की। हमें अकाट्य सिद्धांत दीजिए और हम आपके साथ हैं। क्या समझ में वो समझना ही नहीं चाहते। हिंदू शब्द पे करो। सर्वशक्तिमान ईश्वर बने। अरे भैया मैं कह तो रहा हूं कि एक ये तीन चीजें मुझे दे दो। मैं तुम्हारे सब चीजें मान लूंगा। और हिंदू शब्द के मानने से तुम मेरी सब चीजें नहीं मान पाओगे। हां ये मान सकते हो मैंने हिंदू शब्द सिद्ध कर दिया या तुमने हिंदू शब्द सिद्ध कर दिया तुम्हारा पक्ष तो उसमें ये हो सकता है कि हां ठीक है इस मामले में तुम सही थे और अगर मैंने सिद्ध कर दिया तो इस मामले में तुम सोच सकते हो कि मैं सही था या फिर यह सोच सकते हो कि मैं अपनी चीज को रख नहीं पाया ये सोच सकते हो परंतु सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म तुम दोगे तो मुझे कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यही तीन मुख्य घटक है जिनके ऊपर धर्म खड़ा हुआ है तो ये सोच सोचने वाली बात
00:28:57:27 यहां तक कि वही भक्ति का परिणाम है। कौन? संत लोग। संत लोग धर्म के धर्म क्षेत्र स्वरूप के सत्पात्र और पुण्य की पवित्र भूमि है। वह समाधि के मंदिर विवेक के भंडार और सायुज्य मुक्ति के मात्र ग्रह या अधिष्ठान है। वह सत्य के निश्चय सार्थक की जय प्राप्ति के समय वह सत्य के निश्चय सार्थक की जय प्राप्ति के समय और सिद्ध स्वरूप है। वे ऐसे धनवान और संपन्न है जो मोक्ष स्त्री से अलंकृत है। इन्होंने असंख्य दरिद्र जीवों को राजा बना दिया है। जो दूसरे लोग बहुत समर्थ उदार तथा अत्यंत दानशूर हैं। वे किसी को यह ज्ञान नहीं दे सकते। बहुत से चक्रवर्ती महाराज हो गए हैं और आगे भी होंगे। पर वे भी किसी को यह सायुज्य मुक्ति नहीं दे सकते।
00:30:07:15 बहुत से चक्रवर्ती महाराज संत और सज्जन ऐसा दान देते हैं जो तीनों लोकों में और कहीं भी नहीं मिल सकता। भला ऐसे संतों की महिमा का वर्णन किस प्रकार किया जा सकता है? जो परम ब्रह्म परबह्म त्रैलोक्य न्यारा है जो वेदों तथा श्रुतियों से भी जाना नहीं जा सकता वह परबह्म इन संतों की बातों से हृदय में प्रकट होता है। संतों की ऐसी ही महिमा है। उनकी जितनी उपमा दी जाए सब थोड़ी है। उनके द्वारा स्वयं परमात्मा प्रकट होता है। तो इसको भी आप सद्गुरु की वंदना ही मानिए। अब श्रोताओं की वंदना आ रही है। अब उन श्रोताओं की वंदना करता हूं जो भक्त, ज्ञानी, संत, सज्जन, विरक्त, योगी, गुण संपन्न और सत्यव्याधि है। इनमें से कोई सत्वगुण के सागर, कोई बुद्धि के आगर और कोई अनेक प्रकार के शब्दों शब्द रत्नों की खान है। यह अनेक प्रकार के अर्थ रूपी अमृत का भोग करने वाले हैं। अवसर पड़ने पर वक्ताओं के भी वक्ता और अनेक प्रकार के संशयों का नाश करने वाले दृढ़ निश्चय है। यह अपार धारणा वाले ईश्वर के अवतार और प्रत्यक्ष
00:31:22:28 बैठे हुए देवता है अथवा यह शांत स्वरूप सात्विक ऋषि स्वरों की मंडली है। जिससे सभा स्थल परम सुशोभित है। इनके हृदय में परमात्मा और मुख पर सरस्वती विलास करती है। साहित्य विषयक बातें करने में यह साक्षात बृहस्पति हैं। यह पवित्रता में अग्नि के समान और स्फूर्ति किरणों के सूर्य हैं। इनकी ज्ञान दृष्टि के सामने ब्रह्मांड कोई चीज नहीं है। यह अखंड सावधान तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले, सदा अभिमान शून्य रहने वाले और आत्मज्ञानी है। ऐसी कोई चीज नहीं है जो इनकी दृष्टि में ना आई हो। इनके मन में पदार्थ मार मात्र का ज्ञान है। इन्हें जो कुछ स्मरण कराया जाता है वह सब पहले से ही इन्हें ज्ञात होता है। तब भला इनके सामने अपना ज्ञान दिखलाते हुए क्या कहा जा सकता है? एक तरीके से यह सद्गुरु सद्गुरु के साथ-साथ अब संत जो अन्य संतों की उनको सज्जन कहा गया है। संतों की वंदना हो गई। अब उसके साथ-साथ फिर जो और जो परिकर श्रोताओं इत्यादि मतलब मुख्य शिष्य मान लीजिए या संतों को सुनने वाले मान लीजिए जो यथार्थ ज्ञान देते हैं। प्रामाणिक
00:32:38:09 आचार्यों का यथार्थ ज्ञान नहीं देते। यथार्थ मार्गदर्शन करते हैं संतों के हेतु में। तब भला इन पर यह गुण गुण ग्राही है। मतलब यह चीजें सुनना चाहते हैं, समझना चाहते हैं। अतः निशंक होकर कहता हूं भला कौन सी ऐसी चीज है जिसका भाग्यवान लोग सेवन नहीं करते। वे भाग्यवान सदा अच्छे-अच्छे अन्न खाते हैं। पर फिर भी स्वाद बदलने के विचार से कभी रूखा सूखा अन्न भी खा ही लेते हैं। मेरे प्राकृत वचन भी इनके लिए उसी रूखे सूखे अन्न के समान है। अपनी शक्ति और भाव के अनुसार ईश्वर की पूजा की जाती है। यह कहीं नहीं कहा गया कि ईश्वर की पूजा ही ना की जाए। मेरी वाक शक्ति बहुत दुर्बल है और श्रोता स्वयं परमेश्वर है। अतः लड़खड़ाती हुई वाचा से ही इनका पूजन करना चाहता हूं। मुझ में विद्वता कला चातुर्य काव्य प्रबंधन की शक्ति भक्ति ज्ञान या वैराग्य आदि कुछ भी नहीं है। वचनों की मधुरता भी नहीं है। बस इसी प्रकार की मेरी बातें हैं। अब देखिए लिखने वाला अपने आप को दास्य भाव में प्रकट कर रहा है कि नहीं? अब
00:33:53:25 यहां पर कह दिया जाए कि भैया वह देखो समर्थ रामदास जी ने तो कहा है कि मेरे अंदर कुछ भी नहीं है तो उनकी क्यों सुने तो पता ही होगा आप लोगों को इसका जवाब क्या है रामपाल ये कहते हैं ना हां कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में स्वयं को तुच्छ कहा है गलत कहा है उल्टा सीधा कहा है तो क्या जवाब है उसका कि रामपाल ने भी स्वयं को कुत्ता कहा है। कि हम तो कुत्ते हैं। कबीर के ह? कुत्ते की बात क्यों सुने भाई? ह ये मैं नहीं कह रहा हूं। रामपाल ने ही स्वयं कहा है और फिर कबीर दास जी ने भी कहा है स्वयं को। तो ये दास्य भाव होता है। जिसका हम सम्मान कर रहे हैं उसके प्रति अपना दासता अपनी प्रकट करने के लिए जिससे कि उसको अपनी महानता दिखाई दे। समझ में आए। वचनों की मधुरता भी नहीं है। बस इसी प्रकार से मेरी बातें हैं। पर ईश्वर भाव का भोगता कहा गया है। अतः मैं स्वच्छंदता भाव से कुछ कहता हूं। हे श्रोताओं आप जगदीश की मूर्ति हैं। आपके सामने मेरी विद्या कुछ भी नहीं है। मैं बुद्धिहीन और अल्पमति आपके सामने दृष्टता करता हूं। संसार में समर्थ
00:35:08:26 का पुत्र चाहे जितना चाहे कितना ही मूर्ख क्यों ना हो तो भी उसमें कुछ सामर्थ्य होती ही है। यही समझकर आप संतों के सामने दृष्टता करता हूं। भयानक बाघों और सिंहों को देखकर लोग भयभीत होते हैं। पर उनकी संतान निशंक होकर उनके सामने खेलती है। इसी प्रकार मैं भी आप संतों का सेवक हूं और आप लोगों से कुछ कहता हूं। आप लोग मेरी दृष्टता पर ध्यान देंगे।
00:35:42:04 अपना आदमी जो कुछ कहता है उसका समर्थन करना ही पड़ता है। अतः मेरी बातों में जो न्यूनता हो। अब इसका अर्थ ये नहीं है अपना आदमी जो कुछ कहता है तो जो है वो रावण का साथ देना उचित है। हिरण्यकश्यप का साथ देना उचित है। हां। यहां पे रसगत बात कही जा रही है। अब यहां स्कॉल वाले एज इट इज मान ले। हिरण्याक्ष जो कहेगा हिरण्यकश्यप वही करेंगे प्रह्लाद वो उचित माना जाएगा ऐसे नहीं होता है या फिर जो बाली कहेगा वही सुग्रीव मानेगा ऐसे नहीं होता है तो यहां पर दासता प्रकट की जा रही है। उस भाव में बहते हुए ये बात कही जा रही है। अतः इसी प्रकार यह तो प्रीति का लक्षण है। अतः मेरी बातों में जो न्यूनता हो उसकी पूर्ति आप लोग कर लें। यह तो प्रीति का लक्षण है जो मन स्वभावतः कर लेता है। इसी प्रकार आप संत और सज्जन लोग विश्व के माता-पिता हैं। मेरा भाव जानकर जो उचित हो वह करें। अंत में यह दासानुदास यही कहता है कि आप लोग आगे कथा में ध्यान दें। अभी
00:36:57:13 हम श्रोताओं से बात की जा रही है। जो पढ़ रहे हैं ना उसके लिए यह सब कहा गया है। सोचिए पढ़ने वालों से कितनी उन्होंने वो की है। क्या कहेंगे इसे? प्रार्थना।
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→ Used in: B · Video कलियुग में कीर्तन ही सर्वोत्तम साधन है Dasbodh Lecture #5 at 0:07 ↗
00:37:12:00 अब मैं कवि ईश्वर की वंदना करता हूं जो शब्द सृष्टि के ईश्वर बल्कि स्वयं परमेश्वर और वेदों के अवतार हैं। यह सरस्वती के वास स्थान है। अथवा नाना कलाओं
⬜ Not used yet · 00:37:23:27 – 00:37:40:00 (0:16)
00:37:23:27 इसको अगले अगली बार कर देते हैं। थोड़े से प्रश्न उत्तर ले लेते हैं। और जो जिनजिन का प्रश्न है वह अपने हैंड रे कर ले। एक एक करके सारे प्रश्न हो जाए।
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कंस के शत्रु कृष्ण और काम के शत्रु शिव की भक्ति ही कर्म है
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