No part of this video is used anywhere yet.
SRT: ⬇ SRT ⬇ Original file

.srt or .vtt (Hindi). The old file is backed up. After that the match for this video is rebuilt (may take a few minutes, keep the page open).

⬜ Not used yet · 00:00:04:14 – 00:44:44:00 (44:40)

00:00:04:14 तो मैं आपको बता रहा था कि जो हमारा जो हम ज्ञानास्त्र का केंद्र बना रहे हैं यहां लखनऊ में वो काफी जो शहरी वातावरण है उससे काफी दूर है और वहां जाने आने में बीच में एक फ्लाई ओवर बन रहा है। निर्माणाधीन है जो और उसमें कोई डिस्प्यूट हो गया है। जिस कारण से उसका काम रुका हुआ है। उस कारण से आवागमन बहुत प्रभावित है। जो 20 मिनट की यात्रा है वो क्या कहते हैं एक घंटे में होती है वहां। तो यह भी है और क्या है कि वह जो ज्ञानाश्र केंद्र है वहां पर अभी प्रत्येक सप्ताह रविवारीय संगोष्ठी नहीं कर रहे हैं। अभी वहां मासिक संगोष्ठी कर रहे हैं। तो प्रत्येक माह द्वितीय रविवार को वहां पर संगोष्ठी होती है और काफी भव्य आयोजन होता है। तो अभी मैं वहीं से आ रहा हूं सीधे-सीधे और वही वो ट्रैफिक वगैरह झेलते हुए अभी बहुत सारी वहां पर कमियां है जैसे वहां की जो बिल्डिंग है बहुत गलत तरीके से बनाई गई है पूर्व में जिसका जहां मन हुआ मतलब जैसे बनवाने वाला व्यक्ति है उसको कोई ज्ञान नहीं है बनवाने का

00:01:19:20 तो वो अगर किसी मिस्त्री को लेकर आया मिस्त्री ने बताया कि ऐसे से ऐसे बना दें तो उसने वो बना दिया फिर अगली बार नया मिस्त्री लिया है तो उसने नए तरीके से बना दिया। तो ऐसे करके वो जो बिल्डिंग है वह फ्रेंकेस्टाइन जैसी बन गई। फ्रेंकेस्टाइन जानते हैं आप लोग क्या है? फ्रेंकिस्टाइन कोई जानता है क्या? जो हां हां मालूम जानता हूं भैया। जो ये ड्रैकुला की लोक कथाएं हैं ना उसमें एक पात्र आता है जो एक डॉक्टर ने मरे हुए लोगों की लाशें चुरा करके उनके अंग प्रत्यंग आपस में सी करके जोड़ा था और फिर उसमें जान डाल दी थी। तो उसकी आंख एक व्यक्ति की थी का एक आंख किसी व्यक्ति की एक आंख किसी व्यक्ति की एक कान किसी व्यक्ति का एक आंख एक कान किसी व्यक्ति का एक टांग किसी व्यक्ति की। इस तरीके से उसके शरीर का हर अंग अलग-अलग लाशों से लिया गया था। और उन सबको सी करके जोड़ करके वह व्यक्ति बना था। उसको नाम दिया गया था फ्रेंकेस्टाइन। तो वो जो बिल्डिंग हमें प्राप्त हुई है वह गुरुकुल के लिए तो कुछ फ्रेंकेस्टाइन की याद दिलाती है। है ना? कि कोई कोई कमरा

00:02:34:24 किसी मिस्त्री के अनुसार बना है। कोई कमरा किसी मिस्त्री के अनुसार बना है। कोई तो वो भी वहां पर बहुत सारे कार्य हैं। निर्वाणाधीन है जो पर कर्मण्यवादी कारस्त माफ सुदाचना वही से आ रहे थे। इस कारण से देर हो गई। और आप लोगों का सेशन देखा हमने वह जो भाषण प्रतियोगिता का था जो बहुत अच्छा था प्रभावित कर दिया। काफी प्रशंसा भी मिल रही है उसको और प्रयास रहेगा कि भविष्य में भी इस प्रकार के आयोजन कराते रह।

00:03:14:04 हमने पिछली बार कहां तक पढ़ लिया था? मां शारदा की स्तुति चालू होनी थी क्या नारायण समारंभाम शंकराचार्य मध्यमाम अस्मदाचार्य पर्यंतम वंदे गुरु परंपरा तो दास बोध हम पढ़ रहे हैं और हमने भूमिका बहुत रोचक तरीके से पढ़ ली है पिछली बार हमने कुछ स्तुतियां की थी ग्रंथारंभ निरूपण एक तरीके से यह भी भूमिका ही थी। उसके बाद गणेश जी की स्तुति और फिर हमने अब शारदा स्तुति पढ़नी है। तीसरा समास। अब मैं वेद का अब मैं वेद माता ब्रह्म ब्रह्मसता शब्द मूला वाग देवता महामाया वाग देवता वाग स्कलन वाला नहीं वाग देवता महामाया श्री शारदा की वंदना करता हूं। जो मुख से शब्द निकलवाती है। अपार वाणी कहलवाती है और जो निशब्द के मन का भाव भी भेदित कराती है। इससे मुझे याद आया कि कैसे

00:04:29:06 बातों का बतंगड़ बनाया जाता है। पूज्य कृपात्री जी महाराज से प्राप्त जो सिद्धांत था कि जीव की चाह का वास्तविक विषय ही ईश्वर है और ईश्वर स्वरूप मोक्ष या मोक्ष स्वरूप ईश्वर ज्ञान स्वरूप ईश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा का नाम धर्म है। यह सब मुझे इन आचार्यों के माध्यम से ही प्राप्त हुआ और इसी सिद्धांत को जब एक मतलब मैं किसी से भी मिलता हूं तो अगर कोई भी प्रसंग आ जाता है तो मैं इस सिद्धांत को जल्दी से जल्दी सामने वाले को देता हूं बताता हूं उसे कि यह सिद्धांत है सनातन का और ऐसे में मुझे ये विजयश्री जो तब रिदमम कपूर थी मेरे संपर्क में अभी-अभी आई थी और इनका कहीं पर इंटरव्यू होना था और मैंने पूर्व अपने आचार्यों से ली हुई जो वाणी थी वो वाणी एज इट इज उनको फॉरवर्ड कर दी कि जीव की चाह का वास्तविक विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त कराने वाली विधा का नाम ही ईश्वर है। विधा का नाम ही धर्म है। तो जब मैंने उनको

00:05:44:12 फॉरवर्ड कर दी और उन्होंने अपने और उन्होंने मुझसे पूछा था ये कोई प्रसंग वस नहीं है। उन्होंने मुझसे फोन करके पूछा था कि भाई मेरा इंटरव्यू होना है कहीं पर मुझे बुलाया गया है पडकास्ट के लिए तो हो सकता है कि वहां पर मेरे समक्ष ये सवाल आ जाए कि धर्म क्या है तो मैं मेरा क्या उत्तर होना चाहिए तो मैंने उनको ये उत्तर दिया था यही उत्तर एज इट इज जाकर के उन्होंने इंग्लिश में वहां पर बोला अब जब मैं मेरे आचार्य के द्वारा प्राप्त हमारे पूर्वाचार्य के द्वारा हमें प्राप्त जो सिद्धांत है वो जब हम किसी व्यक्ति के द्वारा सुन रहे हैं जिस जिसके बारे में हम जानते हैं कि उसकी गति अभी बहुत ज्यादा नहीं हुई है तो उसके प्रोत्साहन के लिए कि उसकी उसका और चिंतन हो आचार्यों की वाणी में उसके प्रोत्साहन के लिए और लोगों को यह बताने के लिए कि भाई ये जो बोल रहा है ये इसके पास कहां से आया है? मेरा कह देना यह कि आपके मुख से स्वयं श्री करपात्री जी महाराज ही बोल रहे हैं। यह कह देना कहां तक अनुचित है? इस बात का इतना पतंगड़ बनाया उस धूर्त व्यक्ति ने भागवतानंद ने कि अरे इसको तो करपात्री जी महाराज नजर आ रहे हैं। अब यह बताओ यहां पर क्या लिखा है? ये ग्रंथ में क्या लिखा है यहां पर?

00:06:59:27 हां। स्वयं सरस्वती माता नजर आ रही है कि नहीं? ग्रंथ के माध्यम ग्रंथ में स्वयं सरस्वती माता के द्वारा शब्द निकलवाए जा रहे हैं ना। कहां गया सिद्धांत? उसका लोग कह देते हैं कि अरे इसकी ऐसे गलत बातें नहीं बोला करते हैं। कभी दिन भर में कभी-कभी सरस्वती माता बैठ जाती। सरस्वती मां की माता की तुलना हो गई उस व्यक्ति से। हो सकता है मदिरापान करने वाला हो, हो सकता है मांसाहारी व्यक्ति हो, व्यभचारी व्यक्ति हो। तो क्यों कह देते हैं? और यहां यहां ये ग्रंथ ये समर्थ रामदास जी के समर्थ रामदास जी भी गलत हो गए। जो यह कह रहे हैं कि जो जो मुख से शब्द निकलवाती हैं करपात्र्री जी को भूल जाओ छोड़ दो आचार्य जी को छोड़ दो आप यहां तो स्वयं सरस्वती माता निकलवा रही हैं मुख से वचन तो क्या किसी निकृष्ट व्यक्ति के मुख से जो वचन निकलते हैं वो सरस्वती माता की सीमा के बाहर निकलते हैं क्या मूर्ख व्यक्ति अरे सरस्वती माता की सीमा के बाहर तो वह वचन भी नहीं होते हैं जो धर्म विरुद्ध हम और जो धर्म संगत वचन है उनके लिए तू विरोध कर रहा है

00:08:15:06 कि करपात्री जी नजर आ रहे हैं। इस बात का तू विरोध कर रहा है। यहां तो ग्रंथकार को सरस्वती माता नजर आ रही है। कर विरोध और हजारों लाखों जगह ऐसे और उदाहरण मिल जाएंगे। जहां पर इस तरह इस प्रकार से किसी ना किसी बड़े व्यक्तित्व का उदाहरण या बड़े व्यक्तित्व से तुलना की गई होगी किसी की वाणी की। हम खैर तो यहां पर समर्थ रामदास जी बोल रहे हैं कि जो मुख से शब्द निकलवाती है अपार वाणी कहलवाती है

00:08:55:13 जो मुख से शब्द कहलवाती है अपार अपार वाणी वो मिली नहीं निश्चय लोगों दृढ़ निश्चय लोगों की दृढ़ता है और जो विद्या होने के कारण अविद्या को नष्ट करती है जो महापुरुषों की तुरिया अथवा चतुरता अवस्था में परम निकट रहने वाली माया आया है। अब देख लो भैया यहां पर किस सिद्धांत का प्रतिपादन हो रहा है। अक्सर लोग यह कहते हैं कि जब सब कुछ माया है तो फिर वेद को क्यों मान रहे हो? फिर आप जो है भगवान का आलंबन क्यों ले रहे हो? अब भगवान के अवतार का आलंबन क्यों ले रहे हो? जब सब कुछ माया है तो धर्म का आलंबन क्यों ले रहे वह भी तो माया हुआ। यह अद्वैत के विरोध में इस तरह के आते हैं ना कुतर्क। तो यह देख लो यहां पर क्या जवाब आ रहा है।

00:10:10:16 जो विद्या होने के कारण अविद्या को नष्ट करती है। इसके आगे लिखा है जो महापुरुषों की तुरिया अथवा चतुरता अवस्था में परम निकट रहने वाली माया है। मुक्ति को प्राप्त होने की कगार पर हैं। उनके परम निकट जो माया रहती है। वह भी माया ही है। मगर माया का वह स्वरूप है जो आपको मुक्त कराएगी। इसी प्रकार से जो धर्म के रूप में हमें प्राप्त भेद है, वेद के रूप में प्राप्त जो हमें भेद है, शास्त्रों के रूप में प्राप्त जो हमें व्यवहारिक भेद है, वो भगवान की वही शक्ति है जो भगवान की शक्ति से निर्मित प्रपंच रूपी संसार में हम फंसे हुए लोगों को मुक्त कराएगी। ठीक है?

00:11:10:28 जिसके लिए साधु लोग बड़े-बड़े कार्यों में प्रवत्त होते हैं। जो महान लोगों की शांति ईश्वर की निज शक्ति अरे वाह अभी मैंने यह शब्द बोले ज्ञानियों की विरक्ति और निराशा की भी शोभा है जो अनंत ब्रह्मांडों की रचना करती और विनोद में ही उन्हें नष्ट करती है और जो स्वयं आदि पुरुष की आड़ में खड़ी रहती है जो केवल प्रत्यक्ष देखने से ही दिखाई पड़ती है और विचार करने से अदृश्य हो जाती है और ब्रह्मा आदि भी जिसका पार नहीं पाते जो जगत के सभी नाटकों के भीतरी कला है। सभी नाटकों के भीतरी कला यह ध्यान रखो ईश्वर वही है जो सब कुछ कर सकता है। सभी नाटकों के भीतर की कला ईश्वर है। सभी नाटक वो आप उसमें फिर सिलेक्टिव नहीं हो सकते। अच्छा बुरा सभी नाटक

00:12:09:03 जो निर्मल स्ूर्ति है और जिससे आत्मंद तथा ज्ञान शक्ति प्राप्त होती है जो लावण्य स्वरूप की शोभा है जो परम ब्रह्म सूर्य की शोभा है और जो शब्दों से बना बनाया संसार नष्ट करती है जो मोक्ष देने वाली लक्ष्मी और महामंगला है अब यहां देखिए यहां उनके व्यवहारिक स्वरूप की व्याख्या होने लगी अभी ये जो हो रही थी ना पारमार्थिक स्वरूप की व्याख्या हो रही थी तो अभी व्यवहारिक स्वरूप की व्याख्या होने लगी। महामंगला है जो 70वीं जीवन कला मनुष्य को अमर करने वाली ब्रह्म ब्रह्म रंद्र से निकलने वाली अमृत की धार सत लीला सुशी सुशीतला और लावण्य की खान है। जो अव्यक्त पुरुष की परम ब्रह्म की व्यक्त है। वाह अव्यक्त की व्यक्त कितना ऊंचा सिद्धांत

00:13:12:14 जो शंकराचार्य नहीं होते ना तो पता नहीं हम जैसे लोगों का क्या होता मेरे जीवन का बहुत समय जाता था इन सब बातों पर चिंतन करने में कि भगवान खड़े थे तो कहां खड़े थे कहां खड़े होकर के उन्होंने पृथ्वी बनाई ऐसे कठिन प्रश्नों का उत्तर शंकराचार्य जैसे महान आचार्यों के पास ही था। वरना सतई लेवल पर भी चिंतन करने वाले लोग होते हैं और उन्हें मिल जाता है थोड़ा बहुत जो उनके मन में सवाल आ रहे हैं। पर जो बहुत ज्यादा अंदर तक गढ़ता तक प्रश्न करने वाले या और जानने की इच्छा रखने वाले जो और ज्यादा सुतो मा सद्गमया पर ध्यान देने वाले लोग हैं वो कभी तृप्त नहीं हो सकते थे। शंकराचार्य जी भगवान का ऐसा आशीर्वाद रहा हमारे ऊपर उन लोगों के ऊपर जो आज हम संतुष्ट होकर के धर्म चर्चा शास्त्र चर्चा कर पा रहे हैं। वो इसी कारण से

00:14:20:26 अव्यक्त पुरुष की परम अव्यक्त पुरुष की परम ब्रह्म की व्यक्तता है। जो विस्तार से बड़ी हुई इच्छा शक्ति है जो कलिकाल का नियंत्रण करने वाली और सद्गुरु की कृपा है जो परमार्थ मार्ग का विचार सार और असार का निर्णय करने वाली और शब्द बल से ही भव सिंधु के पार पहुंचाने वाली इस प्रकार एक माता शारदा ने अनेक वेश धारण किए हुए हैं। वह स्वयं सिद्ध होकर अंतःकरण में चार प्रकार से परा पश्यती मध्यमा और वैकरी प्रकट होती है। परा पश्यती और मध्यमा इन तीन वाचाओं के द्वारा मन में जो बात आती है वह चौथी वाचा वैकरी के द्वारा प्रकट कराती है।

00:15:15:13 इसलिए कहते हैं कि जो कृतत्व तत्व होता है वह शार के कारण ही होता है। भैया हां कह रहे हैं ये थोड़ा समझा दीजिए जो परा पशती मध्यम और वैरी वाण होती है इनके विषय में थोड़ा सा ये जो शब्द के वो है ना ये गुरुदेव का एक वीडियो है उसमें गुरुदेव ने बताया है कि हम लोग जो जाप करते हैं वो किस-किस प्रकार से हो सकता है वो भी इसी रूप में होता है शब्द के रूप होते हैं पराप पश्यती और मध्यमा ये आगे आगे चैप्टर्स में इनका खुल के जो है आने वाला है। हम लोग तब बात कर लेंगे। वह चौथी जो कुछ कृत्व है होता है वह शारदा के कारण ही होता है। जो ब्रह्मा आदि की जननी है मेरा एक प्रश्न था। गुरुदेव से किया था अभी कुछ समय पूर्व। होता क्या है? जब हम जाप कर रहे होते हैं ना बहुत मगन हो जाते हैं तो कई बार क्या होता है जैसे मान लीजिए हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

00:16:30:14 ये मैंने शब्द से बोला है तो इसमें मुझे इतना टाइम लगा मगर इसका बहुत बड़ा हिस्सा केवल मैं हल्का सा अगर मन से ध्यान लगाऊं तो वो जाप हो गया समझ रहे हैं आप क्या कहना चाह रहा हूं मैं जब आप मन से बहुत ज्यादा ध्यान लगा के आप बोलेंगे तो इसका बहुत बड़ा हिश्ता केवल 0 पॉइंट समथिंग सेकंड्स में जाप हो जाएगा और जब उसी में आपका लेवल और बढ़ेगा तो ये पूरी दोनों पंक्तियां जो है हरे कृष्णा हरे कृष्ण कृष्ण कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे केवल स्मरण से वो भी जाप हो जाएगा तो मैंने पूछा था क्या इस तरह से गुरुदेव मेरा जो टाइमिंग है जो छोटी होती जा रही है जाप करने की तो क्या इस तरह से जाप करना क्या मतलब वह माना जाए कि ठीक से नहीं हो रहा है प्रॉपर बोल के ही करो तब गुरुदेव ने बताया था कि अलग ये प्रभेद होते हैं परा पश्यती मध्यमा और वैकरी वा तो इसके रूप में जो ये फैल के जो हो रहा है और जो सूक्ष्म हो रहा है दोनों ही ग्रह हैं यद्यपि आपने वो जो सूक्ष्म वाला किया है ना वो आपको ज्ञात होना चाहिए कि हां वो किया

00:17:45:20 मैंने क्योंकि क्योंकि मन ऐसा आपका है ना जो आप जो है मन से अगर करते हैं जाप बहुत कठिन होता है मन से जाप करना भगवान का नाम लेना मन ही मन केवल मतलब जीवा जो है वो आपकी गतिविधि ना करें वो जाप करना बहुत कठिन होता है तो जब वो करते हैं तो कई बार ऐसा होता है कि हम कर रहे हैं कर रहे हैं कर रहे हैं मगर फिर मिस हुआ अब मान लीजिए मैं माला जाप कर रहा हूं और जाप करतेकरते मेरा मेरा जो ये जो मोती है वो तो बदल रहा है दाना तो बदल रहा है माला का परंतु वो जो मैं मन से जाप कर रहा था वो नहीं हो रहा है उसकी जगह दूसरा विचार कोई चल रहा है हम छूट गया मगर हम लोग माला में आगे बढ़ गए तो ये नहीं होना चाहिए इस पर ध्यान देने की आवश्यकता यदि इतने आप बलवान हो गए हैं मन से जाप करते समय तब तो ठीक है तो आप फिर मन से जाप करिए और फिर अपनी वो बढ़ाइए कि और ज्यादा आप जाप में समय बिताएं। परंतु

00:18:55:20 इस तरह से जाप करना गलत नहीं होता है। जैसे कि गायत्री मंत्र का जाप करते समय मैं जो भूर भुहा स्वाहा है ना यह मेरा बिल्कुल सूक्ष्म हो गया है। बहुत जल्दी हो जाता है। बाकी उसके बाद का जो है उसमें अभी समय लग रहा है। मगर यह जो ये भूहा स्वाहा है यह बहुत सूक्ष्म हो चुका है। ठीक है? तो इसी तरीके से वह सूक्ष्मता के लिए मैंने पूछा था क्या सूक्ष्म हो जाने पर क्या उसको अशास्त्रीयता के रूप में देखा जाएगा तब गुरुदेव ने यही बताया था कि परापश्यती मध्यमा और वैकरी के रूप में होता है। अभी आगे आएगा चैप्टर में। हम लोग इस पर और विशेष अध्ययन करेंगे।

00:19:41:20 जो कुछ कर्तृत्व होता है वह शारदा के कारण ही होता है। जो ब्रह्मा आदि की जननी और अब देखिए वहां क्या कह रहे हैं भगवान गीता में समस्त कर्मों को करने वाला कौन? मैं यहां पर क्या कहा जा रहा है कि जो कुछ कर्तृत्व होता है वह शारदा के कारण होता है। तो एकत्व सिद्ध हो रहा है कि नहीं? अगर कारण दूसरा बना देंगे हेतु दूसरा बना देंगे कि ये लोग अलग-अलग है शारदा माता और भगवान श्री कृष्ण तो फिर किसी एक के कारण ही तो कर्तृत्व मानना पड़ेगा। यह सिद्धांत यहां से हमारा प्रतिपादित हुआ। जो ब्रह्मा आदि की जननी हरि और हर को उत्पन्न करने वाली है और जिसके विस्तार से सारी सृष्टि और तीनों लोक में जो परमार्थ का मूल और केवल सद विद्या ही है और जो शांत निर्मल निश्चल तथा स्वरूप स्थित है जो योगियों के ध्यान साधकों के चिंतन और सिद्धों के अंतःकरण में समाधि रूप में स्थित है। जो निर्गुण की

00:20:56:21 पहचान अनुभव का लक्षण और सभी घटों में पूर्ण रूप से व्याप्त है। शास्त्र पुराण वेद और श्रुति जिसका अखंड स्तवन करते हैं और प्राणी मात्र अनेक प्रकार से जिसकी स्तुति करते हैं। जो वेदों तथा शास्त्रों की महिमा और निरूपमों की उपमा है और जिसके कारण परमात्मा को लोग परमात्मा कहते हैं। क्या बात है? जो अनेक प्रकार की विद्याओं, कलाओं, सिद्धियों और अनेक प्रकार के निश्चयों की बुद्धि और सूक्ष्म वस्तुओं का शुद्ध ज्ञान स्वरूप है। अब देखिए ज्ञान स्वरूप आ गया यहां पर। देखिए सभी प्रकार से हो गई। सगुण साकार की व्याख्या भी आ गई। निर्गुण निराकार की व्याख्या भी आ गई। और यहां पर ज्ञान स्वरूप के रूप में नहीं सगुण निराकार की व्याख्या भी आ गई। सगुण साकार की व्याख्या भी आ गई। और यहां ज्ञान स्वरूप के रूप में निर्गुण निराकार की व्याख्या भी आ गई। जो हरि भक्तों की स्वयं भक्ति अंतर्निष्ठों की अंतर स्थिति जीव जीवन मुक्तों की मुक्ति और सायोजता है जो अनंत

00:22:11:27 माया और वैष्णवी है जिसकी लीला का कुछ भी पता नहीं चलता। और जो बड़े-बड़े लोगों को ज्ञान के अभिमान में फंसाती है। अब देखिए वहां पर निकालने वाली कौन थी? यही माया ही थी। और फसाने वाली कौन है? यही है। गायत्री माता का भी मंत्र इसीलिए सबसे बड़ा माना गया है कि नहीं? कि माया से आपको कौन छुड़ाएगा? माया ही छुड़ाएगी। तो इसीलिए गायत्री माता का मंत्र सबसे बड़ा है कि नहीं? और भगवान भी कहते हैं मंत्रों में मैं गायत्री हूं। तो हां तो फिर माया के सिद्धांत को कहां ले जाओगे आप ऐसे?

00:22:52:26 अच्छा आंखों से जो जो कुछ दिखलाई पड़ता है शब्दों के द्वारा जो कुछ जाना जाता है और मन में जिन सब बातों का अनुभव होता है वह सब जिसके भाव वह सब जिसके रूप है अनुभवी लोग इस बात का अभिप्राय जानते हैं कि स्तवन भजन और भक्ति भाव सभी में बिन बिना माया के कहीं ठिकाना नहीं लगता इसलिए जो बड़े से बड़ों से बड़ी और ईश्वर की भी ईश्वर है उन्हें स्वयं उन्हीं के अंश अर्थात माया के ही रूप में मेरा नमस्कार है। शारदा मां की इतनी अच्छी कृति मैंने जीवन में मतलब बहुत सारे अध्ययन किए मगर संभवत प्रारब्ध वश नहीं पढ़ पाया मैं कहीं पर बहुत अच्छा बहुत अच्छा है। अब आ जाती है भाई आहान का एक विशेष स्तंभ गुरु हां गुरु कौन है गुरु का मतलब अंधकार रू का मतलब निकालने वाला अज्ञानता

00:24:08:16 रूपी अंधकार से निकालने वाले को ही गुरु कहते हैं अद्वैत का उपनिषद सद्गुरु का वर्णन नहीं हो सकता जिसे माया भी स्पर्श ना कर सकती हो। उसका स्वरूप भला मेरे समान अज्ञान को कहां से विदित हो सकता है? जिसके संबंध में श्रुति नीति नीति कहती है अर्थात जिसका अंत श्रुति को भी नहीं मिलता। उस तक मुझ मूर्ख की मति भला कैसे पहुंच सकती है? वह मेरी समझ के बाहर है। इसलिए उस गुरुदेव के चरणों में मेरा दूर से नमस्कार है। दूर से कभी भी मठ में जाता हूं तो मेरी वहां पर जो स्थिति होती है ना ऐसी होती है कि जैसे भीगी बिल्ली

00:25:03:01 कभी आप लोग मुझे मठ में देखोगे गुरुदेव के आसपास तो मैं सदैव इस चिंतन में रहता हूं कि मेरे से कोई ऐसी गलती ना हो जाए जिसके कारण गुरुदेव को कोई कष्ट हो या कोई गुरुदेव आहत हो केवल इसी चिंतन में वहां पर लगा रहता है और कभी भी मैंने वहां पर यह प्रयास नहीं किया कि मैं गुरुदेव के साथ में फोटो खिंचवा लूं या फिर उनके इर्दगिर्द जो है किसी प्रकार से आ जाऊं। मतलब ऐसी जगह पहुंचने पर या तो गुरुदेव हो या कोई हमारा बहुत बड़ा कोई तीर्थ हो यद्यपि जो हमारे जो वैष्णवाचार्य राघवाचार्य जी और विद्या भास्कर जी भी इनके भी मतलब निकट जाने में एक ऐसे तुच्छता सी फील होती है कि प्रश्न उठते हैं बहुत सारे कि या मैं उस योग्य हूं जो मैं इतना निकट जा रहा हूं उनके तो वहां पर मतलब दूर का ही व्यवहार होता है और वही मेरे लिए संतोषजनक होता है। हो सकता है मैं पास जाता ज्यादा गुरुदेव के तो शायद वो उतना संतुष्ट ना रहता मैं जितना दूर से तो दूर से ही गुरुदेव कहते भी हैं

00:26:18:28 कि शिष्य गुरु और शिष्य के बीच में ऐसा संबंध होना चाहिए कि बहुत ज्यादा यह भी नहीं कि बैठ के आपस में गप्पे मार रहे हैं साथ में मिलकर के है ना ऐसा भी नहीं होना चाहिए भाई गप्पे चल रही है ह ठटठा चल रहा है गुरु और शिष्य के बीच में तो वह भाव यहां पर प्रस्तुत किया जा रहा है। दूर से दूर से ही नमस्कार है। हे गुरुदेव मुझे वह शक्ति दो जिससे मैं तुम्हारा पार पा सकू। मुझे आपके स्तवन की दुराशा थी पर अब माया से होने वाले वाला भरोसा नहीं रह गया। अतः हे सद्गुरु स्वामी तुम जैसे हो वैसे ही रहो। मैं माया के बल से उसका स्तवन करना चाहता हूं। पर जब स्वयं माया ही लज्जित हो गई तब मैं क्या कर सकता हूं? वास्तविक परमात्मा नहीं मिलता इसलिए प्रतिमा स्थापना करनी पड़ती है। बस इसी प्रकार से भी माया के योग से ही सद्गुरु की महिमा का वर्णन करूंगा।

00:27:20:16 यहां कोई मूर्ति पूजा का खंडन नहीं है। ये ध्यान रखिएगा। है ना? परंतु यहां पर वह सिद्धांत समझाने का प्रयास किया जा रहा है। जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर जी अपने एक वक्तव्य में बताते हैं कि अलजेब्रा में सही उत्तर तक पहुंचने के लिए मानक लिए जाते हैं ना। a² x² मान लेते हैं कि वह x है। इस तरह से काम करते हैं। और एक उदाहरण और देते हैं कि वास्तविक जो दीवार होती है वो प्राप्त करने के लिए पहले पहाड़ लगाई जाती है। नकली दीवार पहाड़ के आधार पर वास्तविक दीवार को प्राप्त कर लिया जाता है। तो इसी प्रकार से वह कह रहे हैं कि भाई मेरे पास आपके लिए वास्तविक चीजें तो नहीं है। माया ही है। तो मैं माया के माया का ही आलंबन लेकर के आपकी महिमा का वर्णन कर रहा हूं। जिस प्रकार अपने भाव के अनुसार मन में देवता का ध्यान किया जाता है, उसी प्रकार मैं भी सद्गुरु का स्तवन करूंगा। हे सद्गुरु राज तुम्हारी जय हो। हे विषंवर विश्व बीज परम पुरुष मोक्ष ध्वज दीन बंधु तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अभय रूपी हाथों से यह माया

00:28:36:07 उस प्रकार नष्ट उसी प्रकार नष्ट हो जाती है जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से अंधकार नष्ट हो जाता है। देखो यह लोग कितना भी कर ले मुझे नहीं लगता कि जैसे यह लोग ढोल पीटते हैं अलंकार समाजी कि भाई हमारे यहां प्रधानमंत्री आए प्रधानमंत्री ने हमको यह कहा वो कहा पहली बात तो क्या इनके या इस वाले भी इस तरह की चीजें करते हैं कि हमारे ये कर दिया। पहली बात तो यह सोचने वाली बात है कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जब इन जैसे तथाकथित संस्थाओं के यहां पहुंचते हैं तो वहां पर इनका किस प्रकार का व्यवहार होता है? क्या यह वहां पर किसी के चरण छूते हैं? चरण स्पर्श करते हैं? मैंने तो यह देखा है कि जो इस के बहुत बड़े वाले बाबूजी होते हैं उनसे हाथ मिलाया जा रहा है। तो मैंने यह नहीं देखा कि उनको कहीं दंडवत प्रणाम किया गया हो या चरण स्पर्श किया गया हो, शीश नवाया गया हो। अभी ये इनका अलंकारियों का बहुत बड़ा आर्य सम्मेलन हुआ। वहां पर किसके पैर छुए हो मुझे नहीं ज्ञात है। यद्यपि मैंने देखा नहीं है। पर एक बार आप कंफर्म कर लीजिएगा। है ना?

00:29:51:22 तो आर्य समाज में तो बहुत ही ज्यादा गुरु तत्व की कोई विवेचना है ही नहीं। वहां तो हम तो जब गुरु तत्व की विवेचना है ही नहीं। तो वहां पर ये कैसे संभव हो जाएगा कि आज भी कोई गुरु के रूप में उनके यहां मान माना गया हो। तो यह कैसे संभव हो जाएगा कि जब वह खुद जो वहां के बाशिंदे हैं जब वह वहां किसी को गुरु के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो वहां का वहां के जो अतिथि गण होंगे यानी कि ये प्रधानमंत्री इत्यादि वो कहां से किसी के पैर छुएंगे हम तो यह अभाव है वहां पर गुरु वंदना है ही नहीं क्योंकि खुद गुरु को गुरु की पीठ पीठ में जो है वार करके तब सिद्धांतों को स्थापित किया है ना तो गुरु वंदना कहां से आ जाएगी वहां गुरु की महिमा गान कहां से होगा कभी सुना है आपने गुरु की महिमा गान वहां पर आर्य समाजियों के इसीलिए और इसीलिए हर कोई व्यक्ति शेर बन के घूम रहा है कोई भी किसी के भी विरोध में बोल देगा अरे भाई है क्या आर्य समाज पहले तुम तो समझ लो क्या है जो तुम्हारे वो हैं आचार्य प्रशांत दीक्षित क्या धोया

00:31:07:01 है भाई उस व्यक्ति ने क्या धोया है आर्य समाज को ही धोया है एक तब भी धोया था आर्य समाज को जब ये कहा था कि दयानंद के दयानंद जी के द्वारा दिया गया जो मोक्ष का सिद्धांत है वो वो उससे मैं संतुष्ट नहीं हूं खत्म ही हो गया पूरा धर्म का पर्यवसान किस में है भाई मोक्ष में धर्म का पर्यवसान किस में है मोक्ष जब तुम मोक्ष से संतुष्ट नहीं हो तो तुम उस तक उस असंतुष्टि तक पहुंचाने वाली जो विधि विधान है उनको धर्म कैसे कह रहे हो और फिर उनको प्रचारित कैसे कर रहे हो तो क्या है आर्य समाज और वो क्यों क्यों ऐसा है आज हर व्यक्ति एक दूसरे पे ये कर रहा है वो कर रहा है क्यों ऐसा है आर्य समाज अपने ही मोक्ष से संतुष्ट नहीं मैं आर्य समाजी हूं मैं दयानंद को मानता हूं पर दयानंद ये कहते हैं कि भैया धर्म का परवसान मोक्ष में है पर मैं मोक्ष को नहीं मानता दयानंद के पर मैं आर समाजी हूं पर मैं जो है दयानंद को मान ऐसे ही ऐसे ही बिखराव पूर्ण जो वैचारिकता है उसका नाम है आर्य समाज हम

00:32:22:16 अरे भैया जो अद्वैती होगा जो शंकराचार्य को मानने वाला होगा वो ये कहेगा क्या कि मैं शंकराचार्य के मोक्ष को नहीं मानता ये कहां की बात आ गई भाई अपना स्टेटस ही तुम लोग तय नहीं कर पा रहे हो कि तुम हो क्या तुम अभी पहले खुद को समझ लो कि तुम हो क्या व्यवहारिक धरातल की बात कर रहा हूं पारमार्थिक की बात नहीं कर रहा हूं फिर तुम आ जाना फिर ये लोग क्या करते हैं कि भावुक बातें करने लगते हैं अरे सब सब जगह ईश्वर है तू भी तो मानता है ऐसी बातें करने लगेंगे तो इसलिए ध्यान दिलाना पड़ता है व्यवहारिक बातें हं पहले तुम लोग तो तय कर लो कि तुम क्या हो एक व्यक्ति आकर के कह रहा है मैं मोक्ष से संतुष्ट नहीं हूं फिर भी तुम वो आर्य समाजी है। कैसे आर्य समाजी है भाई? तुम उसको मोक्ष दो ना उसकी संतुष्टि का। और यदि उसकी संतुष्टि तुम्हारे मोक्ष में नहीं है तो उसको आर्य समाजी क्यों बता रहे हो? हां फॉलोअर्स ज्यादा है इसलिए या फैन फॉलोइंग है इसलिए या कम से कम तुम्हारे पक्ष में बोलने वाला कोई ठीक-ठाक व्यक्ति है इसलिए और फिर उसने जो अभी की बातें प्रासंगिक बातें बताई बिल्कुल सही बताई। प्रधानमंत्री वो उसका यह कहना था आचार्य प्रशांत जी का यह कहना था

00:33:37:22 कि वहां पर प्रधानमंत्री की ऐसे चापलूसी वगैरह हो रही है हां और बिल्कुल सही बात है भाई चलो मान लो वो आर्य समाज के सिद्धांत क्या है क्या नहीं है मगर आर्य समाज यदि स्वयं को एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक धर्म का पक्षधर या धर्म का प्रचारक मानता है और धर्म की स्थापना करने वाले आचार्यों को वो निर्गत करता है अपनी फैक्ट्री से तो कम से कम वहां पर राजनेताओं से ऊंचा स्थान होना चाहिए आचार्यों का मगर वहां तो समतुल्यता है बल्कि उनका ये कहना था आचार्य प्रशांत जी का कि भैया वहां तो जो है उनकी पूजा हो रही थी। ऐसा लग रहा था कि आर्य समाज के बारे में प्रधानमंत्री आर्य समाज को बता रहे हैं। यह सब कहना था। आचार्य प्रशांत जी का वीडियो देख लेना आप लोग जाकर के बहुत सुनाया बहुत धोया और कि तुम सब चापलूसी हो रही है राजनेताओं की आर्य समाज के द्वारा वो स्थिति है अच्छा यहां पर मेरा एक प्रश्न है आचार्य प्रशांत जी से जब हमारे धर्माचार्य जब हमारे शंकराचार्य

00:34:54:14 ठीक है उनका वो जो निर्णय था कि वो क्या था शास्त्रीयता उसमें आपका पक्ष कुछ और है उनका पक्ष है वो बात अलग है। मगर यदि उनको लगता है कि यह धर्म है और वह उसके लिए जब शासन के विरुद्ध चले गए थे तो तब उस समय आपने ध्यान दिया था कि देखिए यहां सिद्धांतों के लिए राजनीतिज्ञों की चापलूसी नहीं की जाती। वैसे जैसे आर्य सम्मेलन में आपके द्वारा राजनीतिज्ञों की चापलूसी की गई। है ना? तब आपको ध्यान देना चाहिए था। जब शंकराचार्य अशास्त्रीयता के विरुद्ध खड़े थे। खैर अच्छा लगा आपने साहस पूर्ण वक्तव्य दिया

00:35:35:13 और सबसे पहले आर्य समाज ये सब चर्चा इत्यादि ये सब नाटकबाजी करने से पहले पहले खुद समझ ले कि आर्य समाज ही किसको कहा जाए किसको ना कहा जाए इसी प्रश्न पे यदि बात करने लगेंगे ना इसी प्रश्न पे ये लोग पसीने छोड़ देंगे वो दार्शनिक बातों पे तो दूर की बात है इसी प्रश्न पे इनके पसीने निकल आएंगे क्यों क्यों? क्योंकि सिद्धांत है ही नहीं कोई। क्यों नहीं है? क्योंकि परंपरा है ही नहीं कोई। जब तक कोई एक व्यक्ति दृढ़ निश्चय यह बताने वाला नहीं बैठा होगा जहां पर कि भैया ये ये है। दयानंद जी ने ये बोला मैं तो जाता ना उनके अगर सम्मेलन में अगर बात बन जाती कुछ वो मैंने भी रिप्लाई देर से दिया। अगर मैं जाता तो मैं एक नकली सत्यार्थ प्रकाश छाप करके ले जाता। ग्ली डंडे से मोक्ष की बात लिखी होती उसमें दयानंद जी को मैं नहीं मानता मैं यह बोलता स्टेज पर जाकर मैं नहीं मानता दयानंद जी जो है एक बुद्धिमान व्यक्ति थे दयानंद जी किताब में लिख रहे हैं ग्ली डंडे से मोक्ष होगा अब वो कहते कहां लिखा दयानंद जी ने ये लिखा लो अब वो कहते ये तो नकली है कैसे नकली है बताओ कैसे नकली है कि हमारे पास तो ये है

00:36:50:19 तो तुम्हारा क्यों माना जाए इसका क्यों क्यों ना माना जाए फस जाते इसी में इसी में फस जाएंगे जिसके पास जो परंपरा के सिद्धांत को नहीं मानता है वो कैसे बताएगा कि सत्यार्थ प्रकाश यही वाली है असली और इसीलिए इनके यहां पर शेरों का झुंड है। खैर वो शेर भी कैसे हैं? शेर है कि गीदड़ है वह बाद की बात है। मगर अगर उनकी दृष्टि में वह शेर है तो वह शेरों का झुंड है। गैर अनुशासित शेरों का झुंड जिसकी लगाम किसी के हाथ में नहीं है। सब अपने मन के राजा हैं। जिसका जो मन आएगा वो करेगा। किसी को भी कोई भी क्रिटिसाइज कर देगा। क्यों? क्योंकि सार्वभौमत्व है ही नहीं। जिसको सब मानते हो कि हां भाई वो जो बात बोलेंगे वो सब मानेंगे। कोई व्यक्ति आकर के किसी भी वरिष्ठ से वरिष्ठ का खंडन करने लगेगा। यहां पर एक सिद्धांत है। ऐसा नहीं खंडन का प्रयास यहां नहीं होगा। यहां होगा मगर उसका मुंह बंद कराया जाएगा। कैसे? सिद्धांत के अनुसार परंपरा आदि शंकराचार्य ने क्या बोला? ये उनकी परंपरा में प्रतिष्ठित जो प्रामाणिक आचार्य होगा वही बताएगा।

00:38:06:28 तो परंपरा के प्रति जो शरणागति है बहुत आवश्यक है जो कि नहीं थी वहां पर और इसका एक अंतर है देखने को मिले देखिए एक तो चापलूसी एक तो पहली बात तो ये जो ढिंढोरा पीटते हैं कि यह प्रधानमंत्री हमारे यहां है तो आप देखो अगर हमारे हमारे यहां पर प्रधानमंत्री जी पहुंचेंगे, मुख्यमंत्री जी पहुंचेंगे तो वहां चरण स्पर्श होगा। वहां पर शीश नवाया जाएगा। आचार्य आचार्य रहेगा। और यदि ऐसा व्यवहार नहीं हो रहा है तो वहां से आचार्य दूरी बनाते हैं हमारे। और यही समस्या है आचार्य प्रशांत जी की जो वो कह रहे हैं अपने आर समाजियों को कि भैया धर्म जो जो धर्म धर्म का वक्ता है उसका स्थान ऊंचा होना चाहिए। जबकि आप चापलूसी कर रहे हो और वहां पर हो रही है तो आपका धार्मिक दल कैसे माना जाए वह तो आज का आधुनिक राजनीतिक दल माना जाए वो वाला भी नहीं राजनीतिक दल राजा रामचंद्र जी वाली राजनीति वो भी नहीं आज का जो ये तथाकथित राजनीति है उसका दल माना जाएगा तो दोनों ही चीजें एक जगह वो नहीं हो रही है व्यवहार अलग-अलग

00:39:22:09 है चापलूसी नहीं हो रही है और समय आने पर अशास्त्रीयता दिखने पर विरोध भी हो रहा है। यह होते हैं सिद्धांत। सूर्य से अंधकार अवश्य नष्ट होता है। पर हमारे स्वामी सद्गुरु की यह बात नहीं है। वह जन्म और मृत्यु तथा अज्ञान का जड़ से ही नाश कर देते हैं। जिस प्रकार सोना कभी लोहा नहीं हो सकता। उसी प्रकार सद्गुरु का दास कभी संदेह में नहीं पड़ सकता। देखो संशयात्मा विनश्यति संशय का निवारण कौन करते हैं? गुरु गुरु गीता में लिखा है वह कभी संशय में नहीं पड़ सकता। गंगा में जो नदी मिलती है वह भी गंगा ही हो जाती है। फिर वह नदी किसी प्रकार से गंगा से अलग नहीं हो सकती। पर जब तक वह नदी गंगा से नहीं मिलती तब तक वह नदी नदी ही कहलाती है। गंगा नहीं कहलाती। पर शिष्य की वह बात नहीं है। वह पूर्ण रूप से स्वामी हो जाता है। पारस किसी पदार्थ को अपने समान पारस नहीं कर सकता। सोना कभी लोहे का रूप नहीं बदल सकता। पर सद्गुरु का भक्त अपने उपदेश से बहुत से लोगों को

00:40:37:15 सद्गुरु बना देता है। शिष्य को गुरुत्व प्राप्त हो जाता है। पर पारस से बनाए हुए सोने से कोई चीज सोना नहीं बनाई जा सकती। इसलिए पारस के साथ गुरु की उपमा ठीक नहीं बैठती। यदि सागर से उपमा दी जाए तो वह भी बहुत ही खारा है। यदि छर सागर से उपमा दी जाए तो उसका भी कल्पांत में नाश हो जाना है। यदि मेरु से उपमा दी जाए तो वह जड़ और कठोर पाषाण है। पर सद्गुरु की वह बात नहीं है। वह दिनों के लिए बहुत कोमल है। यदि आकाश से उपमा दी जाए तो सद्गुरु का रूप आकाश से भी यदि सूक्ष्म तथा निर्गुण है। इसलिए यदि सद्गुरु की आकाश से उपमा दी जाए तो वह भी हीन ही ठहरती है। यदि धीरता में धीरता की उपमा के लिए वसुंधरा यदि धीरता में पृथ्वी के साथ उपमा दी जाए तो वह भी कल्पांत में नष्ट हो जाएगी। अतः धीरता की उपमा के लिए वसुंधरा भी हीन है। यदि सूर्य से उपमा दी जाए तो उसका प्रकाश ही कितना है? शास्त्र उसकी मर्यादा बतलाते हैं। पर सद्गुरु अमर्याद है।

00:41:54:14 देखिए शब्द का थोड़ा सा भेद है। अगर यह अमर्याद को अमर्यादित कहते तो दूसरा अर्थ दूसरा भाव प्रकट होने लगता। सद्गुरु अमर्यादित है। पर यहां पर अमर्याद करके उन्होंने वही अर्थ प्रयोग में ले लिया जो अपेक्षित था। इससे सूर्य भी उपमा के योग्य नहीं है। सद्गुरु ज्ञान का बहुत अधिक प्रकाश करने वाले हैं। अतः यदि शेषनाग से उनकी उपमा दी जाए तो वह भी भार ढूंढने वाले हैं। यदि जल से उपमा दें तो वह भी कालांतर में सूख जाता है। पर सद्गुरु निश्चल है। वे कभी नहीं कभी जा नहीं सकते। यदि सद्गुरु की उपमा अमृत से दी जाए तो अमर लोग भी मृत्यु के मार्ग का अवलंबन करते हैं। पर सद्गुरु की कृपा सचमुच अमर करने वाली है। यदि सद्गुरु को कल्पतरु कहे तो भी ठीक नहीं क्योंकि सद्गुरु का रूप कल्पनातीत है। तो भला कल्पवृक्ष की उपमा कौन ग्रहण करेगा? जहां मन में चिंता ही नहीं है वहां चिंतामणि को कौन भला पूछेगा? जो निष्काम है उसे कामधेनु के दूध से क्या मतलब? यदि सद्गुरु को लक्ष्मीवान

00:43:10:00 कहे तो लक्ष्मी भी नष्ट हो जाने वाली चीज है। और फिर मोह लक्ष्मी सदा स्वयं सद्गुरु के द्वार पर खड़ी रहती है। स्वर्ग लोक तथा इंद्र की संपत्ति का भी कालांत में नाश हो जाता है। पर सद्गुरु की कृपा सदैव बनी रहती है। ब्रह्मा विष्णु और महेश आदि सभी समय पाकर नष्ट हो जाते हैं। एक सद्गुरु के चरण ही सदा अभिनश्वर रहते हैं। फिर भला उनकी उपमा किससे दी जाए? सारी सृष्टि ही नष्ट हो जाती है। उसके सामने पंच भौतिक वस्तुओं का कुछ वश नहीं चलता। इसलिए मैं तो सद्गुरु का वर्णन यही कहकर करता हूं कि सद्गुरु का वर्णन हो ही नहीं सकता। मन की भीतरी दशा केवल अंतर्निष्ठ या अनुभव करने वाले लोग ही जान सकते हैं। यह थी सदगुरु की वंदना और जिन जो भी

00:44:12:12 गुरुदेव की शरणागत प्राप्त है तो उनको बड़ा अच्छा लगा होगा। बड़ा रस आया होगा। इस तरह के पाठ करने से हमारे चिंतन में हमारे चिंतन का विषय हमारे गुरु बन जाते हैं। सरस्वती माता बन जाती है। तो बहुत भाव विभोर कर देने वाला पाठ था। अब आप कुछ छोटे-मोटे प्रश्न एक या दो बस [संगीत]

Plans for this video (0)

No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.

🤖 Ask AI for suggestions

AI reads the remaining (unused) parts of this video and gives ideas for new videos: from where to where, hook, and what to remove from the middle. Suggestions follow the RULES and appear here as "AI Suggestion". You can review, edit or approve them.

  • ⬜
    Hindi SRT Required

    YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)

  • ⬜
    English SRT

    YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.

  • ⬜
    Title (per Rules)

    Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.

  • ⬜
    Description

    YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.

  • ⬜
    End Screen

    YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.

  • ⬜
    Cards

    YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.

  • ⬜
    Playlist Automatic

    YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.

  • ⬜
    Thumbnail

    YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.

"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.

Playlists

Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).

B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 44:44 · 22 Nov 2025

गुरु विहीन तंत्र Dasbodh Lecture #3

0%
☁️ Drive Not in Drive yet

Notes

Description

(empty)

History

No changes yet.

✂️ Clip Cutter

⌨️ Keyboard shortcuts

Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop

▶

Start

End

🔍 zoom
Already used Plan clips
⚠️ () of this clip is already used in another video (green part). Fine if on purpose, otherwise change the times.
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)

Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".

Clips () · Total

Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.

Hook, full note for editor, status