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00:00:01:15 जय श्री राम सभी को। एक छोटा बच्चा देखा है आपने कभी लॉलीपॉप वाला जो लॉलीपॉप चूसता है। ऐसा ही छोटा बच्चा मुझे कभी-कभी भागवतानंद भी दिखता है। और ऐसा लगता है कि या तो वो बिल्कुल ही बेवकूफ है। उसके मस्तिष्क में भूसा भरा हुआ है। या फिर वो चीजों को समझना ही नहीं चाहता है। जििद कर बैठा है। और या फिर वह बहुत बड़ा षड्यंत्रकारी है जिसके कारण वह जो तार्किक दृष्टिकोण से प्रामाणिक दृष्टिकोण से जो बातें हैं उनको एक तरफ करते हुए केवल अंधी चाल चल रहा है और यह सोच रहा है कि जो भी नियम है शास्त्रों के या जो भी नियम है जो भी तर्क हैं जो भी लॉजिक है या प्रमाण है उनको वहीं पर लागू किया जाए उतने ही अंश में जितने अंश में भागवतानंद चाहता है। इसीलिए वह जो पूरी सीरीज है ना निग्रह निकासिका उसमें एक बात बार-बार आई है। क्यों? क्योंकि भागवतानंद ने कहा है। अब क्या बात है? इसने एक वीडियो बनाया है। उसमें मेरा नाम ना लेते हुए कुछ चीजें कही है और कुछ मेरा नाम लेकर के कही
00:01:16:21 है। और उसमें सबसे पहले इसने बताया है कि कुछ लोगों को यह शिकायत है भागवतानंद से कि यह जो भी कार्यकर्ता है प्रामाणिक आचार्यों के संबंध में उनको सार्वजनिक तरीके से क्यों करता है? यदि कोई शोधन है भी तो उसको आंतरिक तौर पर सुलझाने की बजाय अ ये सार्वजनिक रूप से प्रतिकार क्यों करने लग जाता है? तो इसका उसमें उत्तर यह था कि भाई जो मैंने कोई भी ऐसी चीज सार्वजनिक नहीं की है जो पहले से सार्वजनिक नहीं थी। पहली बात और दूसरी बात यह है कि इसका यह भी आंसर था कि क्या मैंने 3 साल से प्रयास नहीं किया है? 3 साल से मैं क्या कर रहा था? प्रयास ही तो कर रहा था। अच्छा। तो पहली बात तो यह है कि जो आरोप तुमने लगाए सार्वजनिक रूप से
00:02:21:25 वो आरोप क्या सीधा आरोप है? क्या तुम उसको कहीं पर आकर के प्रूफ कर सकते हो जो मटेरियल तुमने सार्वजनिक किया है अपने सोशल मीडिया हैंडल से क्या तुम उसके आधार पर साबित कर सकते हो कि यह यहां पर ऐसी चीज है नहीं कर सकते तो मैं तुमको चुनौती दे रहा हूं विद्या भास्कर जी महाराज के यहां आ जाओ और बैठकर के आमने सामने बात कर लो और तुम अपनी उस सामग्री से सिद्ध कर दो कि जो तुमने दुराचरण दिखाने का प्रयास किया है पूरी पीठ के परिकरों में कर दो। मैं ठीक तुम्हारे द्वारा बनाई गई दिखाई गई जो सामग्री है वह ठीक तुम्हारे लिए वैसी सामग्री मैं प्रस्तुत कर दूंगा। सेम
00:03:07:13 फिर क्या होगा? इसका मतलब उस सामग्री से यह सिद्ध नहीं हो रहा है कि वह आरोप जो है आरोप जिस पर लग रहे हैं उस पर सिद्ध हो रहे हैं। तो तुम्हारी वो जो सामग्री है जिसके आधार पर तुम ये सोचते हो कि मैंने जो है आरोप सिद्ध किए वो आरोप लगाने के लिए उपयोग में हो सकती है कि हां भाई इससे ऐसा लग रहा है कि ऐसा हो सकता है। मगर फिर भी वह जांच का विषय ही हो जाएगा और उसके बाद जांच का विषय होते हुए तुमने कुछ सिद्ध नहीं किया। ठीक। तो यदि तुमको ऐसा लग रहा है कि वह जो आरोप सिद्ध है तो तुम आ जाओ विद्या भास्कर जी के यहां पर आकर के बैठ लो और उनके सामने सिद्ध कर दो। तुम जो तुमने अभी तक जो सामग्री दिखाई है उससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता है। उससे केवल प्रश्न खड़े होते हैं। ठीक? पहली बात। दूसरी बात तुमने कहा कि पहले से ही सार्वजनिक थी। किस स्तर पर सार्वजनिक थी वह बातें? क्या दो लोगों का आपस में बात कर लेना? तुम यह मानते हो कि प्रेस कॉन्फ्रेंस हो गई उसमें अखबार में छप गया या किसी बड़े सोशल मीडिया अकाउंट से उसको निर्गत कर दिया गया जानकारी को इसको तुम सार्वजनिक मानते हो। अगर पूरी पीठ के व्यवस्थापन कार्यों से कुछ लोग संतुष्ट नहीं है और वह आपस में चर्चा कर रहे हैं। किसी से कान्हा फूंसी कर रहे हैं।
00:04:22:24 जो बात अभी पूरे पूरे तौर पर मटके जो ऐसे शिष्य हैं जो न्यूट्रल है। किसी के पक्ष में नहीं है। और न्याय के पक्ष में है। जो बात अभी तक उनको भी फील नहीं हुई है। वह बात तुम कह रहे हो कि वह सार्वजनिक है। कौन से न्यूज़ चैनल पर आ गई थी वह बात? आज तक पर आ गई थी। जी जी न्यूज़ पर आ गई थी। कहां पर आ गई थी? अगर किसी ने वह बात वैसे तो मुझे नहीं लगता कि किसी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर डाली थी तुम्हारे चिल्लाने से पहले। मगर यदि डाली भी थी तो उसका सोशल मीडिया अकाउंट क्या कोई सामाजिक छवि रखने वाला व्यक्ति था वो? जिसको बहुत सारे लोग फॉलो करते हो। बहुत सारे लोग जिसकी बातें सुनते हो और
00:05:12:28 अंत में यह भी तर्क आएगा कि जो बालक पूरे वर्ष पढ़ाई नहीं करता है और अपने इम्तिहान के दिनों में वो पढ़ने बैठता है परीक्षा के दिनों में तो उस समय उसकी माताजी कहती है जाकर दूध लेकर के आओ। अब वो वो बालक कहता है कि मेरा इम्तिहान है मुझे पढ़ लेने दो। तो क्या वहां पर यह तर्क सही है कि पूरे वर्ष तो तू पढ़ा नहीं। अब बड़ा पढ़ने का ड्रामा कर रहा है। इसलिए तू अब दूध लेकर गया। क्या वहां पर यह कहना उचित होता है? तो अगर कोई चीज पहले से बिगड़ी हुई है, कितनी भी बिगड़ी हुई है, उसको और बिगाड़ना उचित होता है। अगर कोई चीज पहले से सार्वजनिक है, तो उसमें और उसको सार्वजनिक करना उचित होगा। यदि सार्वजनिकता से आपत्ति है तो यदि तुम्हारा यह तर्क है कि सार्वजनिक तो पहले से ही था। तो कितनी तरीके से कटा तुम्हारा यह तर्क? पहले नंबर बात कि सार्वजनिकता का स्तर क्या था? सार्वजनिक था ही नहीं। व्यक्तिगत तौर पर लोगों में कान्हा फूंसी हो रही थी। और कई लोग उस बात को मान रहे थे। तुम्हारे अनुसार बोल रहा हूं। तो कई लोग उस बात को मान रहे थे। कई लोग नहीं भी मान रहे थे। यह सार्वजनिक होना नहीं होता है। फिर
00:06:28:07 अगर किसी ने सार्वजनिक किया भी तो उसका स्तर क्या था? उसकी सार्वजनिकता का। और तीसरा कि चलो दुर्जन तोष न्याय से अगर मान भी लिया जाए कि वह सार्वजनिक था तो उसको तुम और सार्वजनिक करोगे। पहली बात। दूसरी बात क्या है कि गुप्तचर के आधार पर प्राप्त जो सूचनाएं होती हैं वह प्रमाण के रूप में उपयुक्त नहीं होती है। गुप्तचर के आधार पर प्रमाण जुटाए जा सकते हैं। तुमने गुप्तचर के आधार को ही प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हुए और आरोप असिद्ध आरोप बोल दिए। अरे भाई चलो बोलते भी चलो तुम दुश्मनी मान लो। मान लो कि तुम्हें कोई मतलब नहीं है परंपरा की रक्षा से धर्म की रक्षा से जो मैंने पहले कहा ना या तो कोई बच्चा है लॉलीपॉप वाला और या फिर वो ना समझने की कसम खा बैठा है जिद कर बैठा है कि अब जो बंदूक से निकली गोली और जुबान से निकली गोली वापस नहीं जाएगा। अगर मैंने विरोध कर दिया है तो अब मैं उसी पर डटा रहूंगा। तो अब उसको ऐसा अब उस बच्चे अब तुम्हें ऐसा लगने लगा है कि भाई मैंने अगर यह चीज का पक्ष ले लिया है तो अब मैं इसी चीज पर अटका रहूंगा। इसके लिए लड़ता रहूंगा। चाहे जितने निराधार कुतर्क करने पड़ जाए, पागलपन अपना सिद्ध करना पड़ जाए, लॉलीपॉप
00:07:43:18 वाला बच्चा स्वयं को सिद्ध करना पड़ जाए, मगर मैं उसको ही कुछ ना कुछ तरीके से उसको ही उसकी ही रक्षा करता रहूंगा। और या फिर कोई बहुत बड़ा षड्यंत्रकारी है जो जानबूझ के चीजों को समझने का प्रयास करने की बजाय और उसको एक साइड करते हुए तार्किकता को, लॉजिक को, प्रमाण को हर चीज को एक साइड करते हुए केवल उसका सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि कैसे धर्म पर आघात पहुंचाया जाए। क्योंकि कई ऐसे चीजें भी प्राप्त हो गई है कि जिससे कि तुम मलच्छराज के ही जो तुम्हारे द्वारा गाड़ा गया मलिच्छराज या फ्री मिशन के ही एजेंट साबित हो रहे हो। क्यों? क्योंकि भाई निगमानंद जिनके यहां आज भी उनके वहां पर इस वाले अतिथि के रूप में आते हैं। निगमंद इत्यादि के यहां पर है ना। तो फिर फ्री मिशन का एजेंट कौन सिद्ध हो रहा है? जो अपने को भगवान के रूप में पुजवा रहा है। माता को अपनी पत्नी के रूप में रख रहा है। छूने की कोशिश कर रहा है। और इस जैसे लोगों को वहां पर अतिथि के रूप में बुलाया जा रहा है। पूरी में ही
00:08:59:03 ह कौन कर रहा है फिर? अच्छा। तो फिर यह भी लगता है कि या तो छोटे बच्चे हो या फिर जििद कर बैठे हो या तो बुद्धू हो या जिद कर बैठे हो या फिर षड्यंत्रकारी हो। खैर तो अब दोबारा उस पर आ जाए कि सार्वजनिक पहले से नहीं थी। यदि थी तो उसका स्तर क्या था? और चलो मान लिया कि है भी तो तुम क्या और करोगे सार्वजनिक तो तुमसे पूछा जाएगा ना और तुमने जिनका भी नाम लिया है कि इन्होंने भी बोला था उन्होंने भी बोला था भाई जिसके जिसका हमारे संज्ञान में आएगा अगर हमें पता लगेगा कि इसके बोलने से कोई प्रभाव उत्पन्न हो रहा है तो हम अगर वो सार्वजनिक व्यक्तित्व होगा तो हम उसका सार्वजनिक विरोध करेंगे। अगर वह कोई सार्वजनिक व्यक्तित्व नहीं होगा और हमारे सामने या तो हमारे सामने पड़े ना और पड़ेगा तो हम उसका विरोध करेंगे। सीधी सी बात करेंगे विरोध और किया है। मगर यह नहीं है कि कोई जिसकी कोई सामाजिक छवि नहीं है और हमें पता लग गया कि भैया ये ऐसे ऐसी बात बोल रहा है जिससे कि प्रामाणिक आचार्यों के प्रति
00:10:14:04 अनास्था उत्पन्न होगी समाज में तो हम उस पर वीडियो बना दें। यह तुम्हारा काम है। तुम्हें चाहिए होता है मसाला। सबसे बड़ी तुम्हारी प्लस पॉइंट तुम्हारा क्या है? और मेरा ड्रॉबैक क्या है? कि तुम कभी भी पहली बात तो तुम्हारे पास बहुत टाइम है। अगर किसी ने तुम्हें कमेंट के माध्यम से भी कुछ कहा है तो तुम उस पर भी वीडियो बना करके एक एक बात का जवाब दोगे। क्योंकि तुम्हारे पास और कोई काम नहीं है। इसलिए तुम्हारे पास हर बात का जवाब देने के लिए टाइम है लंबा लंबा वीडियो बनाने का। क्योंकि तुम्हारे पास कोई धरातली अभियान नहीं है। जिसके पास अभियान होता है उसको परेशानी होती है। हर बात को लेकर के सामने बोले कि ना बोले और समय है कि नहीं। तुम्हारे पास टाइम बहुत है। यह तुम्हारा प्लस पॉइंट है। दूसरा कि तुम जो है बेलगाम घोड़े की तरीके से स्वतंत्र हो। कोई तुम्हारे ऊपर तुमको यह निश्चित करने वाला नहीं है कि तुमको यह नहीं करना चाहिए या वो नहीं करना चाहिए। तुम्हारे आगे कोई नहीं है। तुम स्वयंभू हो। तो तुम कभी
00:11:29:08 भी कहीं पर भी कपड़े फाड़ने लग जाते हो और स्वयंभू इसलिए भी हो क्योंकि तुम्हारा कोई उद्देश्य नहीं है। तुम्हारा कोई अभियान नहीं है धरातल पर। और धरातल पर अभियान से और क्या-क्या चीजें हैं वह आगे भी आएंगी। मगर अभी क्या है तुम्हारा प्लस पॉइंट इसलिए भी है कि तुम्हारा धरातल पर कोई अभियान नहीं है तो तुम कभी भी जटिल से जटिल मुद्दों पर कपड़े फाड़ने लग जाओगे। नग नंगे नंगपन दिखाने लगोगे। नग्न होने लग जाओगे। इसका जवाब दो। इसका जवाब क्यों नहीं दिया? यहां पे क्यों चुप रहे? वहां पे क्यों चुप रहे? असहज स्थिति में डालने लगोगे आचार्यों को। असहज स्थिति का मतलब समझते हो? जैसे कि कृपात्री जी महाराज ने जो वेदों के अनुसार परंपरा प्राप्त सिद्धांत है कि पृथ्वी घूमती है। पृथ्वी नहीं घूमती है। सूर्य घूमता है पृथ्वी के चारों ओर। यह उन्होंने कहा अब तुम्हारा अनुसार तुम्हारे अनुसार यह बात है। कि तुम जाकर के इसी विषय को भरे मंच पर पूछोगे। बार बार तो उससे होगा क्या? सब सब लोग जिनको सुन रहे हैं शंकराचार्यों को उनसे तुम यह बात पूछोगे। असहज स्थिति में डालोगे। अब असहज स्थिति क्यों है? कि आज का जो वातावरण है उसमें 90% लोगों का यह 95%
00:12:45:06 लोगों को इस बात में आस्था है कि पृथ्वी घूमती है सूर्य नहीं घूमता है। तो अब इस एक बात को असुतो मा सदगमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्युमा मृतम गमया यह जो सौंदर्यता है सनातन धर्म की यह सुनाने की बजाय फर्स्ट इंप्रेशन में श्रोताओं को यह सुनाया जाए सार्वजनिक मंच से कि पृथ्वी नहीं घूमती है सूर्य घूमता है जिससे कि वह समझे कि सना उनसे कि उनके मन में सनातन धर्म के प्रति अनास्था उत्पन्न हो जाए आचार्यों के प्रति अनास्था उत्पन्न हो जाए कि ये तो अरे ये तो गोबर बुद्धि वाली बातें वो जो फैलाई जाती है विरोधियों के द्वारा और फिर वह जो यह जो हमारे सनातन धर्म का मुख्य जो सौंदर्य है जहां पर सच्चिदानंद की प्यास की बात की गई है एकमात्र मोक्ष हमारे सनातन धर्म में है इस बात पर ध्यान इस बात से प्रभावित होने से पहले ही इस बात को आत्मसात करने से पहले ही वो इस जिसका नेगेटिव अर्थ निकाला जाता जा सकता है ऐसी बात को सुनकर के वो ना आस्थावान हो जाए तो या तो वो यह बोले कि भाई भैया अब अनास्थावान बनने से रोकना है क्योंकि उनको अपनी असतो सद्गमया वाली बात सुनानी है तो उसके लिए या तो वो ये बोले कि नहीं नहीं
00:14:00:12 पृथ्वी नहीं पृथ्वी घूमती है सूर्य नहीं घूमता है तो अब क्या हो गया शास्त्रों का विरोध हो गया हां और अगर वो यह सोचे कि नहीं शास्त्रों का पक्ष रखना है और यह बात नहीं शास्त्रों का पक्ष रखना है तो वो यह बोल दे कि भैया पृथ्वी घूमती है सूर्य नहीं घूमता। पृथ्वी नहीं घूमती है। सूर्य घूमता है। तो दोनों ही सिचुएशंस में सिचुएशन में क्या हो रहा है? असहज स्थिति उत्पन्न हो रही है। जीवन में दो श्रेष्ठ मार्ग में से अधिक श्रेष्ठ चुनना और दो निम्न मार्गों में से कम निम्न चुनना यह कठिन विषय होता है। बालक बुद्धि हो ना तुम? बालक बुद्धि हो अभी तुम 28 कितनी वर्ष की आयु है? 30 वर्ष मगर तुम्हारी बुद्धि अभी 14 15 से आगे नहीं बढ़ पाई है। अब तुम क्या होगा कि यदि वो यह कह देंगे या तो वो यह कह दे कि भैया वो धरती जो है नहीं घूमती है। सूर्य घूमता है या वो यह कह दे तुम्हें संतुष्ट कर दे। और जो 90% जनता है जिसको सुधारना है।
00:15:17:06 है ना? सच्चिदानंद का वो जो सिद्धांत है सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म का धर्म ब्रह्म का जो सिद्धांत है उसके द्वारा उनको हिंदू बनाने की बनाने का जो प्रयास है उस पर मिट्टी फेर दे क्यों क्योंकि ऐसा सिद्धांत जब वो सुनेंगे जिस प्रायोरिटी में यही बात वो सुनेंगे तो वो आएंगे ही नहीं आगे बात सुनने के लिए और पहले ही वो नकारात्मकता उनके मन में घर कर जाएगी और फिर कौन उसका फायदा उठाएगा तुम जानते हो किस प्रकार के तत्व है जो फायदा उठाएंगे मगर तुम्हें इससे मतलब नहीं है यदि वहां पर वो मौन रह गए अरे देखो शंकराचार्य मौन क्यों आत्म मुग्धता यदि वहां पर उन्होंने जो है ऐसी बात कह दी जिसका यह अर्थ भी निकाला जा सकता है वो अर्थ भी निकाला जा सकता है तो खंडन ये है तुम्हारी बेवकूफी तुम्हें क्योंकि धर्म स्थापना से मतलब नहीं है यदि तुम छोटे बच्चे नहीं हो बुद्धू भोंदू वो नहीं हो यदि तुम तो फिर इसका अर्थ है कि तुमको धर्म स्थापना से कोई मतलब नहीं है। जिसको कार्य करना होता है, व्यवहार में उतरना होता है वो सामाजिक प्रपंचों की जो बुराइयां होती हैं उनसे
00:16:32:19 छूता हुआ निकलता है। हीरा जब लेने जाते हैं ना तो सफेद कपड़े पहने होते हैं तो उस पर दाग लगते हैं तब हीरा निकलता है अंदर से। और धरती पर गिरा हुआ मनुष्य धरती का ही सहारा लेकर के उठ खड़ा होता है। तो तुमको कुछ भी समझने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि तुम्हारा धर्म है नहीं। तुम्हारा सनातन है नहीं। तुम्हारा कुछ नहीं है। तुम्हारा क्या है? निग्रह प्रवेशिका निग्रह प्रवेशिका लिखनी है मुझे सारे संप्रदायों का निग्रह कर दूंगा ब ये करना है तुम्हें खैर आगे क्या है
00:17:23:03 तो ये वाली बात हो ही गई कि धर्म को क्षति कैसे पहुंचेगी इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं फिर तुमने एक बात और कही कि 3 साल से मैं प्रयास ही तो कर रहा था। क्या प्रयास किया भाई? कितनी बार तुमने मंच जहां पर गुरुदेव बैठे हुए थे और उनको ये बताने का प्रयास किया कि मठ में ऐसा-ऐसा हो रहा है। तुम्हारे अनुसार क्या प्रयास किया तुमने? क्या तुमने ऐसा प्रयास किया धरातल पर भागवतानंद वीडियो बनाने के अलावा, चिल्लाने के अलावा, आरोप लगाने के अलावा? क्या प्रयास किया है बताओ? क्या प्रयास किया तुमने? ठेंगा तो यह तुम्हारा झूठ कि तुमने प्रयास बहुत किया कुछ प्रयास नहीं किया तुमने तुमने केवल यहां वहां की बातों को लेकर के वीडियो बनाए हैं और व्यूज कमाए हैं तुमने ये प्रयास नहीं किया इसको प्रयास नहीं कहते हैं प्रयास उसको कहते हैं कि जहां पर हमारी मां को गाली देने वाली किताबें बट रही हो छप रही हो वहां सीना तान करके विरोध करना आपत्तिजनक सामग्री को जला देना कोर्ट की कारवाई में घसीटे जाना और उस कीमत पर भी जब सामने वाला अर्थ
00:18:38:09 में सोर्स में संसाधनों में तुमसे कई 100 गुना ज्यादा अधिक है और तुम पर प्रत्येक हर प्रकार के आक्रमण कर रहा है। झूठे आरोप लगाते हुए मुकदमा कर रहा है। तरह-तरह के मुकदमे कर रहा है। दसियों बार मुकदमे कर रहा है। जान से मार देने का प्रयास कर रहा है तब भी डटे रहना अपने धर्म से नहीं होना यह प्रयास होता है वीडियो बना के पोस्टमार्टम करना और लथखोर कह देना प्रयास नहीं होता है वो भी सेलेक्टिव पॉलिटिक्स के अनुसार ये वर्ड तुम्हारा ही है ना सेलेक्टिव पॉलिटिक्स कि अपने पिता जब करेंगे उल्टी सीधी बातें तो मेरे पिता की प्रतिष्ठा मुझे जो है स्वयं की प्रतिष्ठा से भी ज्यादा प्रिय है। मैं उनको कुछ नहीं कह सकता। उनको लथखोर नहीं कह सकता। यह क्या है? सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। अब इन सब बातों का एक निचोड़ क्या निकला अभी तक? ये जो चीजें मैं समझा रहा हूं ऐसा नहीं है कि मैंने इस व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप से सब बातें करने की करने का प्रयास नहीं किया। किया। मैंने इसको इशारा किया कि भाई व्यक्तिगत रूप से बात कर लो। क्यों? क्योंकि धर्म को बचाने के
00:19:53:13 लिए धर्म रक्षा के लिए जो हमारी रणनीतियां हैं उनको मुझे सार्वजनिक करना पड़ेगा। मगर यह व्यक्ति उसको तो धर्म से कोई मतलब नहीं है। तो ये व्यक्ति ये चाहता है कि ये जो सारी रणनीतियां है इसको मैं जो मैं जो है ये ये व्यक्ति जो है कपड़े फाड़ फाड़ के चिल्लाएगा ये बताओ ये बताओ ये बताओ उसको बताओ भैया और ना बताने पर देखो देखो आंसर नहीं है शास्त्रार्थ से भाग गए ये है वो है ये नगणता करने के लिए तैयार है हर वक्त क्यों क्योंकि इसके पास समय है और इसके आगे पीछे कोई है नहीं स्वयंभू है और ना ही इसका कोई उद्देश्य जिसकी रक्षा करने के लिए इसको यह तय करना पड़े कि अगर दो गलत रास्ते हैं तो उनमें से कम गलत कौन सा है मैं उसको चुनूंगा और दो सही रास्ते हैं तो उसमें से ज्यादा सही कौन सा है मैं उसको चुनूंगा। इसको ये निर्णय करने की आवश्यकता नहीं है। अगर दो गलत रास्ते हैं कि अमुक आचार्य ने हमारी जिसमें आस्था है उसका खंडन कर दिया। उसको यह कर दिया। तो भैया इसका जो है इसको सबक सिखाना इस आचार्य के बारे में ये सब फलाना फलाना बोलना इसका खंडन करना बहुत आवश्यक है। यह अच्छा रास्ता है। हम या एक मान लो कि यह भी अगर आचार्य
00:21:08:24 है तो कुछ अन्य लोगों की जिस आचार्य में आस्था हो क्योंकि उस अमुक आचार्य ने इस जिसमें हमारी आस्था उसका खंडन किया है। तो भैया हमें तो क्योंकि उसने इसका खंडन किया तो हमें उससे बोलना है तो एक हो गया कि यह भी गलत है कि किसी आचार्य के प्रति तुम गलत बोलो यह भी गलत है और यह भी गलत है कि उस आचार्य से जुड़े हुए लोग जो वर्णाश्रमी है जो परंपरा प्राप्त हैं जो मूर्ति पूजा विश्वास रखते हैं और जो ऐसे रामपाल जैसे राक्षसों का नाश करने में साथ दे रहे हैं। ऐसे लोगों की जिनमें आस्था है उनका विरोध करके अपने इस रामपाल नामक राक्षस का जो वध होने वाला है उसमें तुम आग लगा दो। तो दोनों तरफ दोनों तरफ गलत रास्ते हैं। एक गलत रास्ता क्या है कि हमारे गुरु का विरोध हुआ है। तो हमें उसका भैया खंडन करना है। हमारे गुरु का विरोध हुआ है तो उसकी रक्षा में खड़े ना होना भी गलत रास्ता है। और एक तरफ रामपाल जैसे राक्षस का वध ना होना भी गलत रास्ता है।
00:22:24:00 तो कम गलत क्या है? कम गलत क्या है? यह पूछ कभी दर्पण में खड़े होकर के पूछो कि कम गलत क्या है? क्या रामपाल जैसे राक्षस के वध को नजरअंदाज कर दिया जाए? इसलिए क्योंकि हमारे गुरु पर जो है वह हुआ है जिसमें कि गुरुदेव स्वयं सामर्थवान है अपनी बात कहने के लिए नहीं मगर हमें एक-एक करके प्रत्येक शिष्य को जो है वो करना चाहिए विरोध भले ही हमारा जो धरातल पे जो कार्य है धरातल पर जो एक चीजें चल रही है जो अभियान चल रहा है वह भले ही छिन्न भिन्न हो जाए और अगर कोई व्यक्ति कम गलत रास्ते को चुने यानी कि ठीक है भाई हम रामपाल का जो ये सेक्ट जो है हम नाश करने वाले हैं इस इसको नहीं रोकेंगे हम भले ही वहां पर मौन रह जाएंगे तो यदि कोई ऐसा करे तो उस पर तू तुझ जैसा नंगा व्यक्ति आरोप लगा दे पैसा आ रहा है मठों से पैसा आ रहा है मठों में पैसा आ रहा है क्या बोल क्या बोलने की जरूरत है तो जिसके
00:23:39:03 पास उद्देश्य नहीं नहीं है। जिसके पास समय है और जिसका जो स्वयंभू है वह इस तरह से बार-बार नग्नता करने के लिए तैयार रहता है। जिसके पास उद्देश्य अभियान है उसको उसकी रक्षा करनी होती है। चुनना पड़ता है। क्या ज्यादा गलत होगा? रामपाल का जो ये तंत्र से लड़ाई लड़ रहे हैं उसको रोक देना ज्यादा गलत होगा या फिर वहां पर अमुक आचार्य का विरोध ना करना ज्यादा गलत होगा। क्या ज्यादा गलत होगा? और क्या ज्यादा सही होगा? अपने गुरुदेव के पक्ष में आकर के खड़े हो जाना सीना तान करके जबकि गुरुदेव वहां पर स्वयं अपना एक वाक्य बोलने से ही सारा तितर विितर कर देने में समर्थवान है। मगर प्रत्येक शिष्य को वहां पर आना चाहिए। ये अच्छी बात है भाई। अपने गुरुदेव के पक्ष में बोलना चाहिए। और जो व्यक्ति अपने गुरुदेव के पक्ष में इसलिए ना बोले कि वहां मां को गाली देने वाले लोग बच जाएंगे वो व्यक्ति खराब है। गलत है। उसके पास पैसा आ रहा है। हां तो यह है तुम्हारा या तो बुद्धूपन या जिद्दीपन या फिर षड्यंत्र रामपाल के ही भेजे हुए व्यक्ति हो सकता है मलेचराज द्वारा नियुक्त रामपाल भी हो सकता है
00:24:54:07 और मलेच मलेच राज द्वारा तुम भेजे हुए हो और तुम सिद्ध हो रहे हो क्योंकि तुम्हारा व्यक्ति भी तो फ्री में उसका एजेंट रह चुका है सदस्य रह चुका है थियोसफिकल सोसाइटी का अब तुम कहोगे वो किसी देश कालखंड में रहा था तो भाई और भी तो लोग हैं जिस पर तुमने आरोप लगाया वह किसी देश कालखंड में रहे थे यह सब बातें कर लो आ जाओ विद्या भास्कर जी के यहां पर आ जाओ बैठकर के बातें कर लेते हैं हम अच्छा अब आगे और क्या है कि अब दूसरी बात ये आती है कि इसका यह कहना है इसका इसने इसमें प्रकट किया कि भाई इससे आपत्ति किसको है आपत्ति इस बात की इसने सार्वजनिक क्यों किया और इसने आंतरिक प्रयास क्यों नहीं किया? नहीं केवल यह वो नहीं है। अच्छा इसमें एक बात और है सार्वजनिक करने की। यदि इसके घर की स्त्रियों पर कोई लांछन लगने लगेगा कि वह व्यभचारणी है या यहां गई है वहां गई है। भगवान ना करे कभी लगे। मेरी माताएं बहने हैं। मगर ऐसा कठोर उदाहरण मुझे देना पड़ेगा। है ना? प्रासंगिक है क्योंकि आवश्यकता है उसकी। इसके घर की माताओं बहनों पर यदि कोई उंगली उठाने लगेगा कि वह वहां से निकलती
00:26:09:10 हुई देखी गई वहां जाती हुई देखी गई वो व्यभचारणी है इस तरह का आरोप लगने लगेगा तो क्या यह अखबार में छाप करके उसका अनुसंधान करेगा शोधन करेगा या पहले आंतरिक तौर पर अनुसंधान करेगा उसके बाद चीजें जब प्रामाणिक रूप से प्राप्त हो जाएंगी तब वह कुछ करेगा उसको भी आंतरिक रूप से ही करेगा क्या करेगा अखबार में छपवाएगा कि फलाने फलाने स्वागोषित आचार्य की बीवी भाग गई किसी के साथ
00:26:44:00 ये सब तुझे अच्छा लगेगा ना यही है ना तेरी रणनीति ठीक है तो तेरी हो सकती है हमारी नहीं हो सकती खैर आगे चलते हैं अब क्या है आपत्त त्ति केवल एक बात से नहीं थी कि सार्वजनिक से क्यों पूछा और भी चीजें पहली बात असिद्ध आरोप क्यों भाई तुम शोधन करना चाहते हो किन चीजों का कि वहां पर ऐसा ऐसा हो रहा है वो ऐसा ऐसा हो रहा है कि नहीं हो रहा है उसको पहले सिद्ध तो करो और सिद्ध नहीं हो रहा है तो तुम सार्वजनिक रूप से विरोध क्यों कर रहे हो तुम पहले उसकी जांच पड़ताल करो यदि तुम्हें शोधन और यदि तुम्हें रक्षा की चिंता है तो तुमने तो किसी ने तुमसे खाना फूसी की और तुम लगे अपने सार्वजनिक चैनल पर बोलने बकबकाने भूखने और तो वही घर की स्त्री वाली बात कि अगर तुम्हारे घर की स्त्री पर आरोप लगेंगे तो तुम क्या करोगे? अपने डेढ़ लाख फॉलोवर्स होंगे। वहां बोलोगे कि मुझे किसी ने बताया है कि मेरी जो पत्नी है वो जो है वहां
00:27:59:01 गई है। ऐसे बोलोगे यदि तुम पर आरोप लगने लगेंगे वहां गई थी फलाने के साथ और उसने भी बताया उसने भी बताया उसने भी बताया। मान लो अभी कल को 10 अकाउंट खुल जाए एफबी पर। एक-ए दो-दो फॉलोअ वाले। तुमने कहा ना पहले से सार्वजनिक नहीं थी क्या जो मैंने सार्वजनिक कर दी। मान लो अभी आने वाले दिनों में 10 अकाउंट खुल जाए और किसी तरीके से तुम्हारे घर की किसी स्त्री के बारे में नाम पता था थोड़ा सा पता कर लिया जाए और फिर 101 अकाउंट खोल करके ये बोलने लग जाए लोग वहां पर कि भैया इसकी स्त्री तो यहां पर फलाने पराए पुरुष के साथ देखी गई है। फलाने पराए पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखी गई है। फलाने पराए पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखी गई है। ऐसे 15 20 लोग मैं कह रहा हूं 50 लोग क्या ये संभव नहीं है? अपनी भी अकाउंट खोल करके और Instagram अकाउंट खोल करके और कहने लग जाए WhatsApp करने लग जाएं एक दूसरे को। भाई देख ही गई है। तो अब तुम क्या करोगे? अपने ₹1.5 लाख या सवा लाख जो पेज है तुम्हारा उस पर फॉलोअर्स है तुम्हारे, वहां पर आकर कहोगे कि मेरी पत्नी पर ये 50 लोगों ने मुझसे कहा है कम से कम।
00:29:13:06 हैं? मैं तो शोधन की प्रयास कर रहा हूं। इतने सालों से यह कहोगे? नहीं कहोगे। पहली बात तो ऐसे टट पुजिया लोगों पर विश्वास ही नहीं करोगे जो अपना नाम पता तक नहीं बता सकते हैं सामने आकर। जो कहीं पर सत्य की रक्षा के लिए खड़े नहीं हो सकते। और दूसरी बात यदि प्रश्न हो भी गया है तो आंतरिक रूप से अनुसंधान करोगे। उसका समाधान भी करोगे तो आंतरिक रूप से करोगे। उसको भी नहीं तुम बताना चाहोगे कि नहीं? मेरे घर की स्त्री व्यभचारणी थी। मैंने अनुसंधान किया। अनुसंधान भी आंतरिक किया और उसको उसका जो समाधान है वह भी आंतरिक किया। उसको भी तुमने आकर के नहीं बताया।
00:29:56:07 तो क्यों? क्योंकि वहां पर डायरेक्ट तुमसे जुड़ी हुई चीजों पर चीजों की तुम्हें चिंता होगी कि अगर मेरी घर की किसी स्त्री के साथ ऐसा हो रहा है तो वहां पर जो उस स्त्री से जुड़े हुए उसके पति हैं उनका जो पौरुष है उन पर सवाल उठ जाएगा कि भाई उस स्त्री को किसी और पुरुष के पास जाना क्यों पड़ा? बहुत सी चीजें हो जाएंगी। भले ही वह स्त्री की ही गलती हो फिर भी उसमें जो है वह बदनाम हो जाएगा। कौन? जो उस स्त्री का पति होगा कि भैया उसमें पौरुष नहीं होगा। इसलिए पौरुष के कारण वो कहीं और गई। इसी तरीके से तुम कर रहे हो ना बदनाम।
00:30:37:06 तो यह ध्यान देने वाली बात है। फिर तुमने और क्या-क्या किया है? तो कुल मिलाकर के क्या है कि गुप्त चर गुप्तचर्य के आधार पर जो प्राप्त होने वाली सूचनाएं होती हैं उनको प्रमाण के रूप में उपयोग में नहीं लिया जाता है। तुमने क्या किया? गुप्तच वाली चीजों को असिद्ध आरोपों को प्रमाण के रूप में उपयोग करने लगे। अनुसंधान तो दूर की बात है। यानी तुमने सार्वजनिक रूप से ये भी नहीं कहा कि इसमें अनुसंधान होना चाहिए। तुमने तो सीधे-सीधे समाधान को ही सार्वजनिक कर दिया। तो सार्वजनिक असिद्ध आरोप अनुसंधान रहित और उसके बाद जो तुम्हारी प्रक्रिया है जो समाधान की वो भी सार्वजनिक। अब आगे और क्या है? उपहास जो दिव्य अलौकिक बातें होती हैं जो ऐसी बातें होती हैं जिनका तुम्हें तुमसे विरोध है जिनसे तुम्हारा विरोध है जिनका तुम विरोध करना चाहते हो उनका उपस उड़ाओगे उनकी जो ऐसी दिव्य दिव्यानुभूति वाली बातें होंगी उसका
00:31:52:14 हम और कहोगे अरे हिंदुओं के साथ छल है ये है वो है बहुत बड़ी-बड़ी बातें करोगे कौन ऐसा है तुमसे जुड़ा हुआ जिसके साथ कोई ना कोई दिव्य घटना ना जुड़ी जुड़ी हो बताओ तुमसे जुड़े हुए आचार्य हैं। उनके जो गुरु हैं हम मुझे बताया मुझे बड़ा अच्छा लगा कि उनको साक्षात डेली भगवान के दर्शन होते थे। उनकी जो माता थी वो 80 वर्ष की आयु में भी स्तनपान कराती थी। इतनी क्षमता थी उनके अंदर। अब इन बातों की तुम खिल्ली उड़ाओ बैठकर के। अरे भैया वहां दूध की नदियां बह रही है। यह है वह है। ऐसे ही तो हो तुम। जिसका विरोध करना है उसकी किसी भी बात को लेकर के और जो है उसी की लय ऐसी केवल उसकी जो क्या उसको कहेंगे केवल उसकी जो शैली है उसको बदल दो। उपस करने लगो। अपने ही आचार्यों का परंपरा प्राप्त आचार्यों का। करने लगो उपस मगर वहां नहीं करोगे। वहां की जो दिव्य बातें होंगी वह नहीं करोगे उन पर बात नहीं करोगे उन पर मौन रहोगे क्योंकि सेलेक्टिव पॉलिटिक्स है ना यही बात मैं कहता
00:33:07:15 हूं ना कि कहां पर किस नियम को लागू करना है कहां पर चुप रहना है ये सब तय कौन करेगा भागवतानंद तय करेगा क्योंकि भागवतानंद ने कहा है अच्छा ये सब छोड़ो कि अन्य आचार्यों के साथ भी दिव्यानुभूतिया जुड़ी हुई है यह सब छोड़ दो यह बताओ तुम्हारी खुद की आस्था नहीं थी क्या पूरी के शंकराचार्य जी में तुमने खुद अपना एक स्टेटमेंट दिया दैव बल से कर दे तो अलग बात है इसका मतलब उनके देव बल पर तुम्हें आस्था थी देवब बल का उपयोग कहां किसको कितना करना है ये वो ही तो तय करेंगे कि हम उसके आधार पर उन्हें आरोप लगाने लग जाए
00:33:48:07 भगवान सर्व सामर्थ्यवान है अभी आ करके सब गौ गंगा गीता की रक्षा कर डाले भगवान तो है ना क्यों नहीं कर रहे? धर्म स्थापना कर दे। क्यों नहीं कर रहे? यही तो आर्य समाज कहते हैं। वही तुम कह रहे हो। शैली वही है। केवल तुम परंपरा के अंदर रहने का पाखंड करते हुए वही कार्य कर रहे हो जो परंपरा के बाहर रह के आर्य समाज जैसे तंत्र करते हैं। अरे ऐसा है तो ऐसा क्यों नहीं कर देते? अरे ऐसा है तो ऐसा क्यों नहीं हुआ? जो अलौकिक प्रश्न है वो तुरंत कर दो। भगवान वहां पर हैं। वह चूहे कूद रहे हैं। उसमें भगवान है। क्यों नहीं भगवान अपनी रक्षा कर पा रहे हैं? दयानंद वही वैसे ही कार्य तुम कर रहे हो। भाई सर्व सामर्थ्यवान है। मगर कहां पर उनको उपयोग में लेना है वो दूर दृष्टि भी तो है उनके पास। किस तरीके से धर्म की स्थापना करनी है। किस किस को उसमें निमित्त बनाना है। यह सब भी तो देखेंगे।
00:34:49:18 ठीक। अच्छा चलो एक यह आ जाएगा चलो भगवान की तो सारी लीला ही है भगवान से प्रश्न नहीं करना चाहिए तो और अन्न ऋषि महर्षि ऐसे नहीं हुए सब छोड़ो तुम्हारे निगनंद तुम कह रहे हो कि उनको भगवती पत्नी के रूप में दिखती थी यद्यपि वो केवल दिखने तक सीमित नहीं था यद्यपि देखना भी अपराध है अरे भैया भगवती स्वयं क्यों दिख रही है आप यह क्लेम नहीं कर सकते हो भगवती ने उनकी पत्नी को उन्हें दिखाया बात खत्म हो गई तुम ये क्लेम क्यों कर रहे हो भगवती ही दिख रही पत्नी के रूप में क्योंकि मन में कहीं पाप है ना इसलिए और यद्यपि वह सीमित केवल वहां दिखने तक नहीं है तो छू भी रहे हैं छूना भी चाहते हैं। तब बाबा बाबा खेपा जी ने कहा कि आप किसी और गुरु के पास जाइए और तुम्हारे पास स्वयं भगवती आती है पढ़ाने हम और क्या कहते हैं ये
00:35:47:25 अध्ययन कराने आती है तुम्हें वरदान देने आती है इस सब बातों के लिए हिंदुओं के लिए हिंदुओं के साथ छल क्यों नहीं निकला निगमंद जी के लिए इतनी सारी चमत्कारिक बातें व्याप्त है वो मुक्त हो गए परमहंस को प्राप्त हो गए तुम ही ने कहा अपने वीडियो में मुक्त हो गए थे तो फिर बाध्यता तो रही नहीं लौकिक तो क्यों नहीं धर्म स्थापना कर गए अपने समय में अभी क्यों नहीं कर रहे हैं मुक्त हो गए वो तो बहुत सी बातें हैं फस जाओगे आके करोगे ना जब सामना खैर निगमंद को लेकर के बात ना करना स्वयं स्वीकार करने के बाद दब बल है फिर स्वीकार ना करना फिर उपास उड़ाना अन्य आचार्यों से जुड़ी हुई दिव्यानुभूतियों पर बात ना करना जिनसे समर्थन प्राप्त है यह क्या है? सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। तो तुमने ना केवल सार्वजनिक असिद्ध आरोपों के आधार पर प्रहार किया
00:36:44:07 बल्कि साथ ही साथ सीधे-सीधे जो मान्य आचार्य हैं उनका भी उपहास उड़ाया और उनका भी विरोध किया और ऐसी बातों में विरोध किया जिन जैसी बातों में तुम खुद आगे अभी बताऊंगा। ऐसी बातों में विरोध किया जैसी बातों में तुम खुद वहीं पर अपने आप को खड़ा कर लेते हो तुरंत और उपास और तीसरी बात क्या है? अब तीसरी बात आती है आपत्ति कि कोई व्यक्ति, कोई भक्त, कोई श्रद्धालु के पुराने जीवन को आधार बना के पीठ पर आक्रमण करना। निगमंद अपने किसी देश कालखंड में यदि थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े होंगे तो उनका अपराध नहीं माना जाएगा। उनको यह नहीं माना जाएगा कि वहीं के हो के रह गए। मगर विजय श्री अगर किसी देश कालखंड में थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े हुए किसी व्यक्ति की संस्था में अध्यक्ष चुन ली जाएगी एक दिन के लिए तो उसको माना जाएगा कि वो वहीं की होके रह गई। हम ये है सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। अब एक बात है जो मैं बार-बार कह रहा हूं कि भाई वहां आकर के तुम बात कर लो। हां हिंदुओं के साथ छल। हिंदुओं के साथ छल क्या है कि मैं शपथ लेकर के कह सकता हूं कि भगवती ने मुझे वरदान दिया है कि मेरे
00:37:59:10 से कोई गलत क्रिया नहीं हो सकती। मेरा बुद्धि विवेक जो है उसका नियंत्रण कर लेगा। जबकि तुम अब 50ों बार बता चुके हो कि मेरे से वाक छल हो गया। यह कर्मेंद्रिय है ना जीवा। कर्म कर रहे हो ना इससे बोल रहे हो ना? जीवा तुम्हारी कुछ कर रही है ना भाई। तो गलत हो रहा है ना तुम्हारी जीवा से असत्य भाषण हो रहा है तो किसी और तुमने एक बार नहीं बोला मंच पर बैठी थी वो पांच छह बार कम से कम बोला कि मंच साझा कर रही मंच साझा कर रही मंच साझा कर रही है और उस मंच साझा होने को पुष्ट करने के लिए तुमने किसी और स्त्री का वहां पर मंचन दिखा दिया और यह बोल दिया कि देखो मंच साझा कर रही है तो यह क्या है
00:38:48:24 हिंदुओं के साथ छल वाक स्खलन हो गया छह बार हो गया एक बार नहीं छह बार और तुम्हारा जो बुद्धि विवेक है उसको नियंत्रित नहीं कर पाया तुम्हारी जीवा को और भी ना जाने कितनी बार हुआ है जब ये अस्थाई पोस्ट और क्या होता है क्या है सत्य भाषण है असत्य भाषण है हटा क्यों रहे हो क्यों छिपा रहे हो ये सब उसी में आएगा और या फिर ये मानो कि हमारी भी एक रणनीति है क्या छिपाना है क्या हटाना है क्या दिखाना है। है ना? अगर सत्य है तो क्यों हटाना भाई? क्यों मौन रहना? क्यों अस्थाई पोस्ट है? यह भी रणनीति में आ गया। मगर जहां पर मुझे रणनीति अप्लाई करनी हो वहां तो मैं करूंगा। मगर आचार्य गण अगर कहीं करेंगे तो वहां नंगा होकर चिल्लाऊंगा। अच्छा आगे देखो क्या है कि
00:39:40:24 श्रृंगेरी पीठ का विरोध गुरुदेव ने किया था। ये तुम्हारा कहना है। उस विरोध का स्तर क्या था? व्यक्तिगत विरोध था या प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर के विरोध किया था। उस समय उनकी छवि क्या थी? कितना उनका प्रसिद्ध व्यक्तित्व था? कितनी ख्याति थी उनकी गुरुदेव की जो शंगेरी का विरोध करने का तुम डंका पी रहे हो। तुम्हें तो उससे और सीख लेनी चाहिए कि उन्होंने कोई सार्वजनिक विरोध नहीं किया। यदि गुरु को लेकर के कोई ऐसी विरोधाभासी जिज्ञासा आ रही है मन में तो उन्होंने कोई उसको इशू नहीं बनाया। पब्लिक में अनास्था का विषय नहीं बना दिया उस बात को। तुम पब्लिक में अनास्था का विषय बना रहे हो। उसके आधार पर उस और उदाहरण किसका ले रहे हो? उनका यहां से तो तुम्हें सीख लेनी चाहिए ना। क्या स्तर था उनके विरोध का? क्या उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला के विरोध कर दिया था। क्या कर दिया था? शंकराचार्य शंकराचार्य का विरोध क्यों करते? भाई शंकराचार्य शंकराचार्य का विरोध कर सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर एरागरा न्थू गहरा उनका विरोध करने लगे। क्योंकि शंकराचार्य और शंकराचार्य इक्वल है। दो भाई अगर घर के आपस में बात कर रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि राह चलने वाला हर तट पुंजिया
00:40:56:21 उस घर के भाई को मार मारने का प्रयास करने लगे क्योंकि दो भाई आपस में लड़ रहे हैं। उस प्रयास को स्वीकार कर लिया जाए। भगवान विष्णु और शिव में भी युद्ध हुए तो इसका मतलब यह है कि भस्मासुर या हिरण्यकश्यप द्वारा जो है उन पर आप जो प्रहार करना है उसको स्वीकार कर लिया जाए। वो बिल्कुल सही बात है भाई। फिर ना बोलो। तो अगर शंकराचार्य शंकराचार्य को कुछ कह रहे हैं या फिर आचार्य स्तर के पीठाधीश्वर आपस में कोई बात कर रहे हैं तो उसमें आवश्यक नहीं कि हम भी बोले। सभी बोले जब वह जबकि वह बात हो रही है सबके बोलने की आवश्यकता नहीं है वहां पर और फिर देखना भी पड़ेगा कि क्या बोलने से क्या हो जाएगा क्या दुष्परिणाम प्राप्त हो सकते हैं क्या नहीं होंगे यह सब वो सोचेगा जिसको कोई युद्ध लड़ना होगा जिसकी जिसका कोई अभियान होगा उसको स्ट्रेटजी बनानी पड़ती है कब किसके लिए अभी बोलना है किसके लिए बाद में बोलना है किसके लिए नहीं बोलना है और किसका बिना बोले कार्य हो जाएगा कई बार ऐसा होता जो परंपरावादी परंपरानिष्ठ लोग हैं, वर्णाश्रमी हैं, मूर्ति पूजक है, अवतारवाद में विश्वास
00:42:12:00 रखते हैं। उनके साथ मैंने अक्सर यह देखा है कि कई बार वो विरोधी होते हैं। मगर साथ में रहते रहते रहते रहते बातें सुनते सुनते सौंदर्य देखते देखते सार्वभौम सिद्धांतों का देखते देखते परचम वो स्वयं ही आस्थावान हो जाते हैं। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण विजय श्री ही है। विजया श्री भी मुझे ऐसी ही मिली थी। उनको यह नहीं मालूम था धर्म में क्या लिखा है क्या नहीं लिखा है। और ना ही मैंने कभी उनको यह कहा कि भाई तुम यहां पर सद्गुरु का वो क्यों कर रही हो प्रशंसा? यहां पर तुम विवेकानंद की प्रशंसा क्यों कर रही देख लेना आईडी में जाकर के सद्गुरु विवेकानंद इन भाई वो योग सिखाती थी पता नहीं वहां हरिद्वार में कौन-कौन से अप्रामाणिक लोग जो है उनके संपर्क में आए हो। उनका भूतपूर्व का जीवन तो ऐसा ही है। पर इनके भूतपूर्व के जीवन पर तुम जो है मसाला खींचोगे और निगमंद के भूतपूर्व के जीवन पर तुम कहोगे वो अपने किसी देश कालखंड में गए थे साधना मार्ग में आने से पहले थोड़ी ना थी। ये क्या है? सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। भाई यह भी तो शंकराचार्य के उसमें आने से पहले वह सब करती थी जो जिनका तुम आरोप लगा रहे हो। मगर इनको तुम खा लो उधेड़ लोगे और
00:43:27:06 निगमानंद जो साधना मार्ग में आने के बाद पत्नी रूप में भगवती को देख रहे हैं तो उसमें लोप करो खैर वो बात अभी खत्म नहीं हुई है मैं उस पर अंत तक जाऊंगा ये मत सोचना निगमंद से जुड़े हुए बहुत सारी चीजें प्राप्त हो रही है अभी वो इस वाला बता रहा हूं देख लेना यही दिखा देंगे तो तुम सोचना कि तुम्हारा वो वो चैप्टर भी खुल चुका है ना क्योंकि मैंने कहा था तुम डाल डाल तो हम पातपात तो जब शंकरा जो वर्तमान पुरी शंकराचार्य उन्होंने अगर तत्कालीन जब वो शंकराचार्य नहीं थे तब शरीर पीठ वालों का उन्होंने विरोध किया था वो विरोध नहीं था वो उनका प्रश्न था विरोध तब माना जाता जब वो प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहते अपना YouTube चैनल 1.5 लाख फॉलोअ वाला बना लेते 500 फॉलोअ वाला बना लेते वहां से वो बात कहते कि ये कैसे है तुम यहां ये गलत हो इसको विरोध कहते हैं वो तो शोधन कार्य था शोधन का प्रयास व्यक्तिगत रूप से अब उसमें गलत कौन था सही कौन था यह निर्णय मैं नहीं दे रहा हूं यदि उनके अनुसार तुम जो तुमने जो जानकारी दी है उनके अनुसार अगर वह गलत थे कोई गलत था तो वहां वो तो शोधन का प्रयास है ना उससे तो तुम्हें सीख लेनी चाहिए तुमको किसने मना किया जाकर के
00:44:42:09 फिर जाकर प्रश्न ना पूछो हिंदू राष्ट्र के बारे में जो तुम मधुमक्खी की सेना के बारे में मजाक उड़ाया करते हो किसने मना किया है जाओ पूछो जाकर के प्रश्न यह विरोध नहीं है। प्रश्न है। विरोध तुम्हारा है जो तुम सार्वजनिक मंचों से कर रहे हो। यह विरोध है। समझ रहे हो? और दूसरी बात कि शंकराचार्य शिष्य किसके थे? शंकर परंपरा के। अपने गुरु अपनी गुरु परंपरा में उनके कोई प्रश्न थे। वो उन्होंने किए। रखा उस बात को।
00:45:17:20 मगर इसका मतलब यह नहीं कि प्रत्येक बाहर के व्यक्ति को व्यक्ति द्वारा जो है विरोध करना वो प्रश्न करना तो छोड़ो शोधन करना तो छोड़ो विरोध करना आक्रमण करना वो उसको स्वीकार कर लिया जाए वहां तो कहा जाएगा ना अच्छा अच्छा अब एक बात आती है कि अमुक आचार्य ने जो है पूरी के शंकराचार्य जी का नाम ले खंडन किया है। वैष्णवाचार्य का नाम ले खंडन नहीं किया है। वैष्णवाचार्यों का खंडन नहीं किया है। सबका खंडन किया है। सबका मगर तेरी तूती वहां बंद हो जाएगी। वहां तेरा जो भूकना है वो बंद हो जाएगा। और वहां पर तू ही तो कहता है भाई तुम मजबूर कर देते हैं अच्छी भाषा में कैसे बोले? तो इसलिए तुम मजबूर कर देते हो। अच्छी भाषा में कैसे बोले? खैर
00:46:09:15 तो जिन आचार्यों का तुमको समर्थन प्राप्त है वो भी तो मौन है वो भी तो सार्वजनिक खंडन नहीं कर रहे हैं तो उनका क्या करोगे? नपुंसक कहोगे? तुम्हारे पिता भी तो नहीं कर रहे हैं। पिता तो तुम्हारे अनुसार कई बार गलत भी हो चुके हैं। तो तुम उनको नपुंसक मानोगे? यदि ऐसा मानोगे तो तुम्हारी उत्पत्ति पर ही प्रश्न हो जाएगा। कहोगे नपुंसक लतखोर कहोगे। अच्छा सब बातें छोड़ दो। विद्या भास्कर जी महाराज है परम आदरणीय
00:46:47:20 इस या रामपाल इत्यादि विषयों में मैंने उनका वक्तव्य लेने के लिए कहा कि एक छोटा सा कुछ विषय मैंने बताए थे। दे दीजिए। उन्होंने कहा उन्होंने उसमें रुचि अरुचि दिखाई। उसका कारण है। उसका कारण है। रणनीतिक कारण है कि भाई वह अगर यहां कुछ नहीं बोल रहे हैं तो क्यों नहीं बोल रहे हैं? क्योंकि उन्हें कुछ बचाना है। इसमें श्रद्धा मेरे जैसों की हो जाएगी। मगर तेरे जैसे कल को उनका भी प्रतिकार करेंगे। कुर्ता फाड़ के ये कैसे किया तुमने? क्यों नहीं बोले? भले ही उस बोलने से लाभ कम हानि ज्यादा हो रही हो। यही तेरी दिक्कत है। क्यों? क्योंकि तू तेरा कोई उद्देश्य नहीं है। धरातल पर कोई अभियान नहीं है। जिस दिन करने निकलेगा उस दिन रेलवे स्टेशन पर गया था ना तू
00:47:43:01 लाइव प्रपंच करने। वहां क्यों पुलिस वालों से परमिशन ले ली थी? उस विधान को तो तू मानता नहीं है ना। क्यों सहारा ले लिया था उससे? जैसे तू आरोप लगाता है कि पूरी शंकराचार्य जी जो है अपने आप को उन्होंने कोर्ट में साबित किया था। तो भाई तू जहां कथा कर रहा है, तू जहां अपने कार्य कर रहा है, वहां पुलिस की परमिशन के बिना कर लेगा। बड़े शहर में कोई राजधानी इत्यादि हो वहां पर कथा होगी तेरी। बता बिना परमिशन के हो जाए। परमिशन लेनी पड़ेगी ना। तो सिद्धांत सीख भाई छोटा है तू अभी। तेरी गति खाली इसी में है। यह नहीं खाना वहां यहां खाते हुए देख लिया गया। और कुछ लोग कहते हैं कि पहले सिद्धांत सीखने वाली बात है। सिद्धांत सीखो कि जिस हवाई जहाज को आसमान में उड़ना होता है, वह पहले धरती का ही सहारा लेता है उड़ने योग्य बनने के लिए। तो धरती पर गिरा हुआ व्यक्ति धरती का ही सहारा लेकर उठ खड़ा होता है। तो माया में फंसा हुआ व्यक्ति माया का ही सहारा लेकर के उठ खड़ा होता है। और सनातन विरोधी वातावरण में फंसा हुआ व्यक्ति सनातन विरोधी वातावरण का ही उपयोग करते हुए
00:49:00:02 सनातन विरोधी वातावरण को नष्ट कर देता है। सीखना होगा तुम्हें। सिद्धांत सीखो। मैंने कभी तुम्हारे दार्शनिकता में गति तो देखी नहीं है। यही सब गति देखी है जो तुम यह विधि विषयक जो लाते हो यह होना चाहिए। ये विधि विषयक जो चीजें होती हैं। दार्शनिकता में तुम्हारी कभी गति मैंने सुनी नहीं कि तुमने अवतारवाद के लिए लड़ा हो कि भगवान अवतार ऐसे ऐसे ले सकते हैं। इस पर तुमने अपना चिंतन प्रस्तुत किया हो। या आर्य समाजियों के जो कुतर्क होते हैं विधर्मियों के कुतर्क होते हैं मूर्ति पूजा इत्यादि को लेकर के बिना केवल प्रमाण नहीं उसमें दार्शनिक तर्क तार्किक व्याख्या भी वो सब तुमने कर दी हो ऐसी गति तो मैंने तुम्हारी देखी नहीं है ना और कुछ लोग ये कहते हैं कि भाई तुम्हारी मेरी शास्त्रों की लड़ाई है तुम्हारी मेरी शास्त्रों की लड़ाई है ही नहीं कहां से है तुमने अशुद्ध आरोप लगाए तुमने ये बात कही कि वो पहले ऐसा करती थी अभी भी ऐसा कर रही तुमने पहले की बातों को अभी यह सब चीजें हैं ना इसमें शास्त्र कहां है क्या शास्त्र में लिखा है कि उनके वो जो तुमने आरोप लगाया था सम लैंगिकता का वो वैश्या आगमन है वो वैभवीचारी शास्त्र में लिखा है तो शास्त्रों की लड़ाई कहां से हो गई शास्त्रों की लड़ाई तो तब होगी जब तुम इसको
00:50:15:06 पहले सिद्ध कर दो जो तुमने आरोप लगाए हैं और उसके बाद मैं यह कहने लगूं कि नहीं नहीं ये जो कार्य हुआ है सही हुआ है तो तुम उसको शास्त्रों से दिखाओगे कि ये ये गलत कार्य है और मैं कहूंगा मैं वहां पर गलत सिद्ध हो जाऊंगा। शास्त्रों की लड़ाई तब मानी जाएगी। ये शास्त्रों की लड़ाई नहीं है। ये तो लौकिक जानकारियों की लड़ाई है। तुम्हारा कहना है ये हुआ मेरा कहना है। नहीं हुआ। इसमें शास्त्रों लड़ाई कहां से आ गई? हां। बुद्ध और शबरी के विषय में है तो हम परंपरा प्राप्त आचार्य के शिष्य हैं। तुम्हारी चीज का खंडन हो के रहेगा। सामने से तुम उसको बचा नहीं पाओगे। क्योंकि तुम्हारे पास परंपरा नहीं है। यही तो जीत है परंपरावादियों की। तुम उसको बचा नहीं पाओगे। हारोगे उसमें क्योंकि तुम्हारे पास परंपरा नहीं है। ठीक है? और जो परंपरा है उसकी तो धज्जियां उड़ी ही रही है और आगे उड़ेगी भी। जो तुमने कपोल कल्पित परंपरा अपनी बनाई है जो ठीक है। आगे चलते हैं और क्या है?
00:51:19:15 तो अमुक आचार्य ने हमारे आचार्य का खंडन कर लिया। इसलिए हम सारे जितने भी अभियान है उनको छोड़कर के उसके खंडन के पीछे लग जाए। केवल हमारे गुरु को कैसे कुछ कह दिया? तू क्यों कर पा रहा है ये नग्नता? यह जो नगनता तुम कर रहे हो अपने चैनल में बैठकर क्यों कर रहे हो? क्योंकि तुम्हारा कोई कार्य नहीं है कि मुझे वहां फलाने से जाकर मिलना है। यह बात करनी है। और फिर यह काम करवाना है और है भी तो बहुत व्यक्तिगत स्तर के समष्टि वाले नहीं है। होता तो तुम्हें निर्णय लेना पड़ता कि क्या यह छोटा नुकसान है या यह छोटा नुकसान है। दोनों में से एक को चुनना पड़ता।
00:52:08:21 जब व्यक्तिगत जो लाभ है वह समष्टि पर हावी होने लगता है तो समष्टि वाला निर्णय लिया जाता है ना। मगर तुम यह सब बातों को कहां जानोगे? जैसे कोई अनाथ होता है ना अनाथ जिसका कोई पिता नहीं होता। कौन पिता है मालूम नहीं है। ऐसे ही तुम्हारी स्थिति धार्मिक उसमें है क्षेत्र में कौन गुरु है मालूम नहीं है। धार्मिक पिता तो गुरु ही होता है ना। तो कौन है पिता मालूम ही नहीं है। इसलिए अपना कपोल कल्पित परंपरा रच ली। वो स्थिति है इसलिए तुम्हारे ये सब चीजें हैं। ये इतने जटिल मुद्दे तुम्हारी बस के बाहर है। खैर फिर अमुक आचार्य का खंडन अगर कर रहे हो तो परोक्ष भाव से क्यों कर रहे हो? नाम लेकर खंडन क्यों नहीं कर रहे हो? कितने लोग बिगड़ जाएंगे? अब ये तुम्हारी अपनी वो है। कल्पना
00:53:02:16 तुमने नाम लेके कर लिया। कितने लोग सही हो गए? बताओ। कितने लोग बीजेपी और आरएसएस के हैं जो शंकराचार्य को मानने वाले हो गए? तुमने नाम ले बचा लिया। कुछ नहीं। कुछ नहीं। केवल तुमने अपने कुछ व्यूज और बढ़ा लिए। केवल तुमने अपने कुछ सब्सक्राइबर्स और बढ़ा लिए। क्यों? क्योंकि चैन से सोना है तो जाग जाओ। सनसनीखेज खबरें में लाओ के दूंगा। उसको सुनने के लिए मसालेदार लोग बैठे हैं। आहा ये ये बोल रहा है। ये सही है। ये किसी को नहीं छोड़ता है। ये सही है भाई। इसको सुनो। कोई अभियान नहीं। कुछ नहीं। कोई धर्म संस्थापना नहीं वो है। अच्छा
00:53:46:28 तो यहां पर एक बात है कि दो सही रास्तों में से ज्यादा सही और दो गलत रास्तों में से कम गलत चुनना होता है। कठिन होता है। माता सीता को वनवास भेजना भी कठिन था श्री राम के लिए। और अपनी वर्णाश्रमी स्वधर्म निष्ठ जनता को एक समस्या से जूझते रहने देना भी कष्टदायक था तो उन्होंने माता सीता को वनवास गमन देना उचित समझा क्योंकि वहां समष्टि का कष्ट हो रहा था और यह चुनना पड़ता है और यह जो बलि विधान है जो वेदों में दिया गया यह सब भी तो वही है ना कि इतनी बड़ी चीज को बचाना है तो इस एक चीज को उसमें उपयोग में ले लिया जाए। सब क्या है? मगर तुम्हें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं कि दार्शनिकता में तो गति है ही नहीं। वह तो बात ही मत करो। कभी देखा ही नहीं कि इस तरह से चिंतन कभी किया हो। बस यहां ये लिखा है। ये यहां पे ये खाना गलत है या वहां पर वो विधान दिया गया है। वो क्षत्रिय है। वो वैश्य है वो कश्यप है। इससे बाहर निकले ही नहीं हो। तुम तुम कर क्या रहे हो? कभी देखा है
00:55:02:02 अपने आप को? जो लोग वर्णाश्रमी हैं। जो लोग परंपरावादी हैं। परंपरावाद का परंपरा का जो घेरा है उसके अंदर के लोगों पर तुम कार्य करते हो केवल उसके अंदर के लोगों पर उसके बाहर जो लोग परंपरा में ही विश्वास नहीं रखते हैं भटके हुए विभिन्न सेक्स में और उसके बाहर विभिन्न विधर्म में उनको यहां इस परंपरा के घेरे के अंदर लाने का कार्य हम जैसे लोग करते हैं। तुम क्या कर रहे हो? जो वर्णाश्रमी है वो उसी में ये इसने गलत कह दिया वो उसने यहां गलत कह दिया यह है तुम्हारे चैनल का पूरा कंटेंट उठा के देख लो और वही कंटेंट वो है प्रचलित तुम्हारा बाहर से इस घेरे के अंदर तो लाओ वर्णाश्रमी तो बनाओ किसी को हमने बनाया विजय श्री को बनाया हमने हम छाती ठोक के कह सकते हैं इसीलिए उसकी रक्षा में खड़े हुए विजय श्री जैसे बहुत लोगों को हम भटके हुए हिंदुओं से लेकर के और इस घेरे में लाए। उनमें से एक विजयश्री थी जो आज हमारी गुरु बहन है बहन है और हम उसके लिए खड़े इसीलिए हुए क्योंकि आज
00:56:17:03 अगर हम इसके लिए नहीं बोलेंगे तो कल को कोई बाहर से आएगा नहीं। परंपरा निष्ठ नहीं बनेगा। वर्णाश्रम निष्ठ नहीं बनेगा। बेवकूफ मूर्ख है तू। जिसे कोई चिंता नहीं है धर्म की जो अपनी लॉलीपॉप देख रहा है बस और सुनो क्या है कि अब बात आती है कुल मिलाकर के परोक्ष भाव से कहना या अमुक आचार्य का विरोध ना करना इसमें 100 की सीधी क्या बात है यह निर्णय लेना पड़ता है उनको जिनको युद्ध लड़ना होता है किससे बोलना बोलना है, किससे नहीं बोलना है, किससे कम बोलना है, किससे बोलना ही नहीं है।
00:57:07:20 अपनी बड़ी चीज की रक्षा करने के लिए छोटी चीजों का बलिदान देना पड़ता है। समझ में आया मूर्ख? तुझको नहीं आएगा। तुझको तू इसमें भी अभी कुछ आगे अपना भूसा निकालेगा। तो भूसा भरा ही है तो क्या करें? भूसा ही निकलेगा। तुझको मतलब नहीं है धर्म से। तुझको मतलब नहीं है इस बात से कि मां को गाली देने वाले राक्षसों का वध कैसे किया जाए। कैसे एक चलता फिरता तंत्र खत्म होने के नष्ट होने के कगार पर है। तुझे इससे मतलब नहीं है। तुझे मतलब इससे है कि अमुक आचार्य ने अगर अमुक शिष्य के गुरु को कुछ कह दिया है तो उस शिष्य को बोलना चाहिए। उसको अपने व्यक्तिगत धर्म को प्रधानता देनी चाहिए। समष्टि को भूल जाना चाहिए। कुंभकरण बन जाना चाहिए। भीष्म जी बन जाना चाहिए। मगर प्रह्लाद नहीं बनना चाहिए। श्री राम नहीं बनना चाहिए। अब बात आती है कि भाई पीएन मिश्र जी का विरोध क्यों नहीं किया? मेरी जानकारी में कि जैसा कि तुम्हारे अनुसार भैया कि पीएन मिश्र जी ने शंकर के सिद्धांतों का खंडन किया और फिर भी शंकराचार्य के लोग और विशेष रूप से पूरी शंकराचार्य के लोग उस पर नहीं बोल रहे हैं। तो सेलेक्टिव पॉलिटिक्स तू अपनी
00:58:22:26 देखना भाई। और मैं यकीन के साथ कह सकता हूं जिस दिन तुझसे कभी सामना हो गया तेरी थूथड़ी तेरी ही बातों से बंद हो जाएगी। तेरी बातों से लोग ऐसा सोचते हैं कि शास्त्र है शास्त्र है। मेरे और तेरे बीच में शास्त्र की कोई बात है ही नहीं। और क्योंकि मेरे पास परंपरा है यदि कभी होगी तो उसमें मैं पहले से ही विचित हूं। ध्यान रख। तेरी परंपरा के चित्रण तो उड़ रहे हैं जो तूने बताया है। खैर मैं इस बात के बारे में नहीं मैं मेन मुद्दे पे आता हूं। पीएन मिश्र जी ने जो है शंकर शंकराचार्य के सिद्धांतों का विरोध किया है और शंकराचार्य के जो शिष्य हैं वो चुप क्यों है वो क्यों नहीं बोल रहे अच्छा पहली बात यह है कि पूरी पीठ पर ही निशाना क्यों है जहां से तुम्हें समर्थन प्राप्त है और जहां से उनको प्रश्रय प्राप्त है पीएन मिश्र जी को वहां क्यों नहीं बोल रहे हो तुम उनका नाम ले ले के उनका नाम लेके क्यों नहीं फोटो लगा के वीडियो बना रहे हो कि क्यों मुंह मौन है ज्योतिष पीठ वाले महाराज क्यों आत्म मुग्ध है? यह सब लिखो उनके लिए। यह क्या है? सेलेक्टिव पॉलिटिक्स। आगे मैं बोलता हूं। पीएन मिश्र जी की धार्मिक सामाजिक छवि क्या है?
00:59:38:09 कितने लोग उनको फॉलो करते हैं। जो वो कुछ कह देंगे तो बहुत बड़ा जो हिस्सा है जो वो प्रभावित होने लग जाए। अरे पीएन मिश्र को छोड़ दो। नित्यानंद मिश्र है कोई करपात्री जी का खूब उसने खंडन किया वही धरती घूमती वाली बात पर हम नहीं उसको समय दे पाए हाइपरक्वस्ट के चैनल पर विज्ञान दर्शन और वो जो स्वयं को पहले ऋषि वाच कहता था आर्य समाजी विज्ञान दर्शन भी आर समाजी इन लोगों ने जाकर खूब वहां पर जो है कचरा किया है कचरा फैलाया है हम नहीं समझ समय दे पाए। कलयुगी योगी ने बहुत बुरा बुरा कहा। हम नहीं समय दे पाए। तो इसका मतलब तूने तब क्यों नहीं विरोध किया था? इनके लिए क्यों नहीं बोला? क्योंकि इनसे तुम्हें कोई मतलब नहीं है। पी एन मिश्र क्योंकि तुम्हारा विरोधी है तो इसलिए पीएन मिश्र का हमने विरोध नहीं किया। उससे तुम्हें मतलब है। ये क्या है? सिलेक्टिव पॉलिटिक्स। अब दूसरी बात सुनो। कि जब हमें किसी का विरोध करना होता है तो हमें देखना होता है कि हम इसका विरोध करेंगे तो उसके परिणाम क्या-क्या होंगे। क्योंकि हमें युद्ध लड़ना है। हम वॉर में हैं। बैटल
01:00:54:04 फील्ड में है हम। तुम नहीं हो। इसलिए तुम वहां पर नंगाई कर सकते हो। अरे इसने ये क्यों नहीं किया? अरे इसने वो क्यों नहीं किया? जिसको युद्ध में लड़ना होगा वो निर्णय लेगा। किस व्यक्ति की बात का विरोध हम अपने मंच से कर दें। वह प्रसिद्ध ना भी हो। खामखा हमारे से प्रसिद्ध हो जाए। दूसरी बात कि उसकी धार्मिक छवि कितनी है? धर्म की दृष्टि से उसको कितना देखा सुना समझा जाता है। धर्म की दृष्टि से यह भी देखना होता है। फिर तीसरी बात वो भी है कि हमें अगर हमारा अभियान जो है नुकसान में जा रहा है कि नहीं जा रहा है। ऐसा तो नहीं यह करने की वजह से दूसरी हमारी जो बड़ी चीजें वो उसमें आ जाए खतरे में। ये सब चीजें सोचने की है। मगर तू छोटा है। अभी तेरी नजर लॉलीपॉप में है। वो लॉलीपॉप क्या है वो तू जाने। या तो वो वर्चस्वता लोकेशना व्यूज YouTube चैनल कुछ भी हो सकता है या फिर एक अंदर से घमंड को पोषित करना कुछ भी हो सकता है और या फिर यह सब भी ना हो या फिर यह हो मलेच्छराज का एजेंट यह भी हो सकता है। खैर तो तार्किक बुद्धि से जरा सोचो कि किसका विरोध
01:02:09:13 कैसे करना चाहिए और कब करना चाहिए उससे समष्टि तो प्रभावित नहीं हो रही है हमारे व्यक्तिगत धर्म की वजह से प्रह्लाद का व्यक्तिगत धर्म था पिता की आज्ञा मानना समष्टि में क्या था क्या किया उन्होंने और आदर्श कौन है हमारे लिए प्रह्लाद या कुंभकरण जिसने अपने व्यक्तिगत धर्म को वरीयता दे दी निर्णय कैसे करोगे अब कुंभकरण यदि अपने भाई का साथ दे दे तो उससे यह कहो अरे तुमने रावण का साथ दिया और यदि वह अपने भाई का साथ ना दे तो अरे तुमने यहां शास्त्रों का वो उल्लंघन किया तुमने भाई का साथ नहीं दिया ये हो तुम यही हो तुम और इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ इन टिपिकल विषयों का जटिल विषयों का ऐसे ही जटिल विषय क्या है हर्ष समाज जी ने क्या किया है अरे तुम लोग शूद्रों को मंदिर में नहीं जाने देते हो जाने दोगे क्या अभी अभी वो ज्योतिष पीठ वाले महाराज से पूछ रहा था। मुझे समय नहीं मिल पाया। उसका विरोध कर रहा था। कोई न्यूज़ चैनल वाला पूछ रहा था कि कोई शूद्र शंकराचार्य बना क्या? अब ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी के सामने सहज स्थिति हो गई। क्योंकि एक वृहद विषय है। उसको सुनने का समय तो है नहीं किसी के पास। उसको एक लाइन में आंसर चाहिए। शूद्र को शंकराचार्य बनने दिया क्या?
01:03:25:15 अब वहां क्या बोले? अगर नहीं बनने दिया तो यहां पे सामाजिक जो है ना क्योंकि समाज में इस समय पिरोया जा चुका है। भाई हम हिंदू किसके हिंदू किसको बनाएं? 90% लोग भटके हुए हैं। उनको अपनी बात सुनाने से पहले ही ऐसी बात कह देना जिससे कि वो बात सुनने में आस्था रखने की बजाय दूर जाने में आस्था उनकी हो जाए। ये क्या उचित होगा? वैसे ही तू करता है। असहज स्थिति में डालता है और स्वयं की असहज स्थिति में खुद मौन होता है। तूने कहा परोक्ष रूप से किया। तूने यही कहा ना कि परोक्ष रूप से अमुक आचार्य का तुमने विरोध किया तो परोक्ष रूप से किया। नाम लेकर नहीं किया। तूने ये वीडियो बनाते समय भी तो परोक्ष रूप से ही बोला है
01:04:15:25 कि लोगों को मेरे सार्वजनिक रूप से विरोध करने से आपत्ति है। कौन लोग भाई यह क्या है परोक्ष रूप नहीं तो क्या है तू खुद ही अपनी बात से ही फसता है सामना तो आ सामने तो आ कब आ रहा है अयोध्या बता चलो महाराज जी के पास विद्या भास्कर जी महाराज के साथ पास बैठकर के कर लेते हैं चल ठीक है एक बात और कह रहा हूं मैं वीडियो रिकॉर्डिंग भी नहीं करेंगे ठीक है अगर करनी है तो कर लेते हैं तेरी अगर इच्छा होगी तो कर लेते हैं वीडियो रिकॉर्डिंग अगर तू चाहेगा तो नहीं करेंगे क्योंकि तुझे पता है और मुझे पता है कि तुझे वहां पर जो मुंह देखना है पराजय का यदि वह कोई प्रतिस्पर्धा के रूप में आता है तो और यदि तुम आते हो कि भाई धर्म की रक्षा करनी है और एक चर्चा करनी है तो ठीक है उसमें तुम्हारे पक्ष को गलत साबित होना है यदि तुम्हारा पक्ष यही है जिस तरह जो ले चल रहे हो तो कब आ रहे हो बता दो आगे तुमने एक बात कही है कि जो मुस्लिमों से मिल रहा है जो गले लग रहा जो जो है मुस्लिमों से मिल रहा बागेश्वर वाले वह जो है उनसे गले कौन मिल रहा है? यह कह रहे हो ना तुम? अच्छा उनहीं बागेश्वर वालों से क्या विद्या भास्कर जी महाराज
01:05:31:01 नहीं मिले? राघवाचार्य जी महाराज नहीं मिले। उनके आश्रमों में जाओगे, मंदिरों में जाओगे तो वहां फोटो नहीं लगी है मंत्रियों के साथ मिलने की। बागेश्वर वाले बागेश्वर वालों के साथ मिलने की। तो उनका विरोध क्यों नहीं? नाम ले ले के और तुम सोचो कि तुम तो हर जगह सही हो मेरे और तुम्हारे बीच में तो तुम सही हो और विद्या भास्कर जी महाराज ने तुम्हारा समर्थन भी किया है। वो समय मिलेगा तो उनसे जो बातचीत क्या हुई बहुत मार्गदर्शन उनसे प्राप्त हुआ। समय मिलेगा तो उसको भी साझा करेंगे। पर तुम तो हर मामले में सही हो। फिर तुम्हारी पुलिस में रिपोर्ट लिखाने वाले तुमको कोर्ट में घसीट लेने वाले और तुम्हारे जान माल के दुश्मन बने हुए शिवश नारायण द्विवेदी को उन्होंने क्यों आशीर्वाद दिया शुभ आशीष दिया इसीलिए दिया भाई कि एक व्यक्ति के जो गुण है उनका सम्मान होगा अवगुण है उनका अपमान होगा और तुम भी तो अपनी कथा में यही बोलते हो कि मैं तुम्हें जो है उनके आचार्यों के प्रति अनास्थावान नहीं बना रहा हूं। मैं तो उनके उन कृत्यों के प्रति अनास्थावान बना रहा हूं जो गलत है जो शास्त्रोक्त नहीं है।
01:06:49:10 तो इसका अर्थ यही हुआ ना कि किसी अंश में यदि कोई बुराई कर रहा है मगर दूसरे अंश में कोई अच्छाई भी कर रहा है तो उसको वहां पर प्रशय दिया जा सकता है। अगर किसी अंश में कोई मुसलमान से मिल ले रहा है मगर दूसरे ही अंश में वो ईसाई क्रिश्चियन मिशनरियों से लोहा ले रहा है। अगर हमारा ऐसा तबका है अगर हमारा ऐसा एक बहुत बड़ा जन समूह है जो इसी तरह की चीजों में आस्था है तो उनको धीरे-धीरे तात्विक रूप से वेदांतवादी बनाने के लिए वही रास्ता सही मगर इन सब चीजों पर तुम्हें गौर नहीं करना और ऐसे प्रयास करने वालों को तुम सिरे से नकार दोगे फिर कहोगे कि हमने तुम्हें व्यक्ति के लिए नहीं व्यक्ति के द्वारा गलत कार्य के प्रति अनास्था किए गए गलत कार्य के प्रति अनास्था हमने जो है अनास्था उत्पन्न की है और कई अंशों में तो वह जो गलत कार्य है भी वह गलत कार्य है भी कि नहीं हुए भी है कि नहीं तो उसके उस पर भी चिंतन का विषय हो जाएगा हां तुम्हारा अस्तित्व यही है कि अगर राम जी ने सीता माता को वनवास भेजा तो अरे उसने अपनी पत्नी को वनवास भेज दिया और नहीं भेजा तो अरे उसने अपनी जनता को दुख में डाल दिया तुम्हारा अस्तित्व यही है
01:08:05:08 इतना ही अस्तित्व है तुम्हारा इसी पे तुम खड़े हुए हो भरे हुए नाक डंडा लेकर के निगचार्य अच्छा तो कुल मिलाकर के बात क्या निकली सेलेक्टिव पॉलिटिक्स तुम्हारे बारे में कितनी बार आ चुका है वो देख लो तुम्हारे निगनंद के जो प्रामाणिक संस्थान है मठ है वहां पर क्या हो रहा है इस वाले अतिथि बनकर के आ रहे हैं उसका निग्रह कर लो हां और अमुक आचार्य ने यदि पूरी शंकराचार्य जी का विरोध किया है तो वैष्णवाचार्यों का भी विरोध किया है तो जिनको तुम्हें लगता है कि जो है जिनसे तुम्हें समर्थन प्राप्त है उनका भी निग्रह कर लो। यद्यपि मैं नहीं मानता कि उनको बोलना ही आवश्यक है। कहां बोलना है, कहां नहीं बोलना है। यह रणनीतिक विषय है। विशेष तौर पर तब जब जो वातावरण में वह हमारे अनुसार नहीं है। आचार्यों के अनुसार नहीं है। उनके कहने पर चलने वाले राजा नहीं है। तो इसलिए उनको रणनीतिक क्षत्रियोचित भाव से रणनीतिक विषय में निर्णय लेना होता है। कहा मौन रहना है। बिल्कुल ठीक है। यदि विद्या भास्कर जी महाराज अमुक अमुक विषय में मौन रहेंगे बिल्कुल ठीक है। राघवाचार्य जी मौन रहेंगे या कुछ अलग तरह की बात बोलेंगे।
01:09:20:19 हां सबसे मुख्य बात क्या होती है कि वो सभी प्रामाणिक आचार्य जो होते हैं वो सारी रणनी रणनीतिक विषय में जितना हो सकता है उतना आलंबन लेते हैं। मगर कभी भी शास्त्र की व्याख्या गलत नहीं करते। कितनी बार तुमने इस बारे में बात की है जो तुम कहते हो। तो सब लोग कहते हैं शास्त्र शास्त्रज्ञ बातें करता है। शास्त्र की बातें और इसने खंडन किया है। कितनी बार तुमने पूरी शंकराचार्य जी के वचनों में शास्त्र का दोष निकाला है यहां उन्होंने शास्त्र का अर्थ गलत कर दिया। कितनी बार निकाला है? शास्त्र का गलत अर्थ कर दिया। पूरी शंकराचार्य जी ने। कितनी बार तुमने निकाला? या मैंने गलत अर्थ निकाल दिया। कितनी बार तुमने निकाला? अगर ऐसा तुम करते तब होती कि हां तुम बहुत बड़े शास्त्र हो। तुम्हारी शास्त्र की लड़ाई है ही नहीं। तुमने जो कहा कि भैया हिंदू एकता कैसे आएगी शास्त्रों को तिलांजलि देकर के तो तुम यदि किसी पर यह निराधार आरोप लगा रहे हो कि वो सम लैंगिक है वो वैभचारी है वो वैश्या है ऐसे शास्त्रों में लिखा है क्या कि फलानी स्त्री वैश्या है तो ये शास्त्रों को तिला देने की बात कहां से आ गई जबरदस्ती
01:10:33:25 तुम्हारे और ये जो मान्य आचार्य गण है पीठ पीठ है पीठाधीश्वर है इनके के बीच में शास्त्रों को लेकर के लड़ाई नहीं है। कहां पर पूरी शंकराचार्य जी ने शास्त्र की गलत विवेचना कर दी है। मूर्ख आज भी तुझे उतना ज्ञान नहीं होगा जितना शास्त्रों का अर्थ उन्हें पता होगा। जबकि भगवती तुझे स्वयं पढ़ा रही है आकर के। वही भगवती जिनको तुम्हारा गुरु जो है चलो छोड़ो किसी दिन और बात कर लेगी उस बारे में। तो सेलेक्टिव पॉलिटिक्स यदि तू मानता है कि हर बात में बोलना ही है तो फिर उनके बारे में बोल निगनंद के बारे में बोल आचार्यों के बारे में बोल तो ये सेलेक्टिव पॉलिटिक्स है और अयोध्या आ जाओ विद्या भास्कर जी के सामने बैठकर के बात करें महाराज जी के सामने बैठकर के कि भाई तुमने जो आरोप लगाए हैं इनसे क्या सिद्ध हो रहा है अगर सिद्ध नहीं हो रहा है तो सार्वजनिक क्यों किए आरोप क्यों लगाए पहले से सार्वजनिक है तो क्या और सार्वजनिक करोगे पहले से सार्वजनिकता का स्तर क्या था उपहास क्यों उड़ाया दिव्यानुभूति का वो भी पूछूंगा उनके साथ भी जिस आचार्य से मिलोगे उसके साथ ही कोई ना कोई दिव्यानुभूति होगी उसका मजाक उड़ाया
01:11:48:26 जा सकता है तो मैं वही तुम्हारा खाल खीच लूंगा निगमंद का नाम लेकर के खाल खींच लूंगा उपास उड़ाया पुराने जीवन को लेकर के भी निगमंद का उदाहरण अच्छा है तुम्हारा उदाहरण है बाई पोलर के शिकार रहे हो गालीबाज रहे हो, शायरियां करने वाले रहे हो, तुम्हारी खाल खींच लूंगा उससे। आओ यह सब शास्त्रोक्त विषय नहीं है। ये तो हम तुम्हारे ही मुंह की बातों से तुम्हारा ही खंडन कर दे रहे हैं। शास्त्रोक्त लड़ाई नहीं है। ये हां दो जगह पर तुमने किया था। करपात्री जी का खंडन सबरी और बुद्ध के विषय में। अब बात ऐसी है कि हमने उसमें भी कुछ नहीं बोला। क्यों नहीं बोला? क्यों? खंडन बहुत सारे लोग कर रहे हैं। पर किसका खंडन करना आवश्यक है, किसके विरुद्ध बोलना आवश्यक है? देखा हमने। तुम्हारे ही विषय में ले लो। बहुत अच्छा याद आया। तुम कह रहे हो कि अमुक आचार्य ने अमुक आचार्य का वो किया। तुमने कुछ नहीं कहा। अरे भैया तुम तुम्हारे लिए भी तो हम तीन चार साल से कुछ नहीं बोल रहे थे। तुम कर रहे थे ना बुद्ध। बुद्ध का खंडन और शबरी का खंडन हमने बनाया क्या वीडियो तुम्हारा? क्योंकि तुम्हारे लिए वो व्यक्ति नहीं थे जिसका अह जिसका विरोध करके कुछ लाभ प्राप्त हो। बल्कि हानि ही होगी। यह हमारी
01:13:04:04 सोच थी। क्यों? क्योंकि वर्णाश्रमी हो। परंपरा प्राप्त आचार्यों में निष्ठा है तुम्हारी। इसलिए हम मौन रहते थे। ठीक है थोड़ा बहुत अपना खेलना है खेलने दो। चोट मिंट थोड़ा सा करने दो लॉलीपॉप बाजी। मौन रहते थे। कहां बोला? यह तो सबसे बड़ा उदाहरण है। तब बोला जब तुम्हारा जो पानी है सर से ऊपर निकल गया। व्यक्तिगत नाम ले लेकर के पास उड़ाने लगे। चीजें बोलने लगे तब बोलना पड़ा। अगर ऐसा ना करते तो हम बुद्ध और जो शास्त्रीय विषय थे उसमें हमने तुमको कभी नहीं बोला था। यद्यपि उसका खंडन हम कर देंगे। यद्यपि उसका खंडन कर देंगे वो बहुत आसान है। मत सोचना कि कोई कठिन है। जो उसमें तुमने दो एक बातें बोली वो कुछ नहीं है। टटपुंजिया बातें हैं। परंतु शास्त्रों की लड़ाई वो थी। अगर हम तुम्हारा कर्पात्री जी वाले विषय में बुद्ध और शबरी के खंडन वाले में हम तुम्हारा विरोध करते। वह होती है शास्त्रों की लड़ाई। जो लोग यह कहते हैं कि शास्त्रज्ञा शास्त्र हमारे और तुम्हारे बीच में शास्त्र लड़ाई हुई नहीं। हां जब ये चीजें आ गई है कि तुम भैया करपात्री जी का खंडन जब दूसरी ओर से लड़ाई शुरू हो गई तो बुद्ध और शबरी के विषय में भी हम दे देंगे। यद्यपि वो इतना महत्वपूर्ण विषय नहीं है हमारे लिए।
01:14:19:15 जब तक आर्य समाज जैसे इस जैसे सनातनाभाष तंत्र रामपाल जैसे सनातना भाष तंत्र जो कि शास्त्रों के आधार पे और हर प्रकार से सनातन धर्म को क्षति पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में एक तटपुंजिए के द्वारा दो विषयों में शंकराचार्य का करपात्री जी का विरोध कर देने पर कर देने से हमें क्या लाभ मिल जाएगा जब तक वो लोग हैं। हम पहले उनको देखें ना भाई। यह हमने चुना कि भागवतानंद का विरोध करने से हमें क्या मिलेगा और ना करने से क्या मिलेगा। करने से जो भागवतानंद को फॉलो करने वाले वर्णाश्रमी परंपरानिष्ठ हैं उनका विरोध मिलेगा। और ना करने से क्या मिलेगा? उनका भी समर्थन मिलेगा। और उस समर्थन के द्वारा हम इन विधर्मी इन सनातना वासी तत्वों से लड़ेंगे। हम मौन रहे। शास्त्रोक्त वाली बात में हमने नहीं बोला था। अब तुमने मजबूर किया कि हम बोलेंगे। हर तरह से तुमको तुम्हारा जो वो है ना पोस्टमार्टम पोस्टमार्टम करते हो ना हर तरह से पोस्टमार्टम करेंगे। अभी निग्रह निकास का आई है। तुम्हें निगमानंद का चैप्टर खुल गया है। तुम्हारे वाकलन का चैप्टर खुल गया है। और अनेकानेक
01:15:34:26 प्रकार से ये सब सिद्ध उसमें हो गया है। स्पष्ट हो गया है कि तुम्हारी परंपरा कोई है ही नहीं। तुम्हारी जो बामा खेपा जी की परंपरा है वह तंत्र मार्ग वाली ऐसा समझ में आता है। निगमानंद जी के जो तंत्र मार्ग के गुरु हैं बामा खेपा इत्यादि ठीक है। तंत्र मार्ग में तो रामायण है नहीं। तंत्र मार्ग में तो महाभारत है नहीं। तंत्र मार्ग में तो ब्रह्मसूत्र है नहीं। तो ये सब चीजें कहां से हैं? ये सब चीजें निगमंद जी के पास आ रही हैं। शंकर परंपरा से। तो शंकर परंपरा का विरोध तुम नहीं कर सकते। करोगे तो फिर यह शास्त्र की प्रमाणिकता पर सवाल हो जाएगा। यह सबसे बड़ा है। बाकी तुम्हें शास्त्रों के आधार पर भी दे देंगे। बुद्ध और शबरी का खंडन जो तुमने किया। ठीक है? तो सेलेक्टिव पॉलिटिक्स मत करो और जो आरोप है उन पर ध्यान दो। जो शिकायतें उन पर ध्यान दो। क्या की गई है? क्या की गई है? कि सार्वजनिक रूप से असिद्ध आरोपों का के आधार पर विरोध, उपहास पुरानी बातों को लेकर के किसी की टांग खींचना और किसी का समर्थन करना। और गाली निंदनीय भाषा का प्रयोग करना यह सब आपत्ति है। इन पर बात तुम जो है अयोध्या आकर के कर सकते हो विद्या भास्कर जी के समक्ष।
01:16:50:09 ठीक है? और सेलेक्टिव पॉलिटिक्स मत करो। जिन आचार्यों का समर्थन प्राप्त है। यदि तुम्हारे अनुसार हर बात में बोलना आवश्यक है तो उनसे भी कहो कि हर बात में बोले। पूरी ज्योतिष पीठ वाले महाराज से कहो बोले और यदि अन्यथा उसमें देखने की कोशिश करो कि आचार्य कहां पर बैठे होते हैं कहां पर उन्हें बोलना होता है उन्हें असहज स्थिति में मत डालो हम नहीं चाहते कि डालो परंतु तुम्हारा सिद्धांत यदि यह है कि हर हर स्थिति में हर प्रश्न का जवाब देना है तो फिर सबसे बोलो फिर वहां से एक्टिव मत करो और इन सबसे भी पहले निगमंद का पहले पोस्टमार्टम करो बाकी हम तो कर ही रहे हैं सभी को जय श्री राम।
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वर्तमान की घटनाओं में भागवतानंद @swaminigrahacharya की अवसरवादिता
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