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00:00:02:14 हैदर जी बोले जी भैया मैं एक लिटरेचर पढ़ रहा था तो उसमें ये लिखा हुआ था जैसा अन्न वैसा मन ठीक है तो मैं ये जानना चाहता हूं कि हमारा जो बेसिक मील्स मतलब खाना जो होता है हमारा उससे हमारे मतलब आध्यात्मिक और बौद्धिक ये दोनों में क्या फर्क पड़ता है क्योंकि अगर आदमी को आध्यात्मिक तौर पर आगे जाना है तो फिर बौद्धिक तौर पे क्या-क्या चीजें चेंज करनी पड़ती है? समझ पाए आप मेरी बात? मैं समझ रहा हूं। मैं समझ रहा हूं। बस बस हां बस यही पूछना चाहता था। आप मुझे बताएं इसके बारे में थोड़ा बहुत। ऐसा होता है ये बात हम कई बार आपको बता चुके हैं। हम कि हमारी कर्मेंद्रियों से मिलने वाली जो सूचनाएं हैं वो लगातार हमें बता रही हैं कि दुनिया में कोई मोक्ष नहीं है। कर्मेंद्रियां यानी कि 5 अप्रैल जितने भी कर्म करने वाले हमारे हम जिनसे काम करते हां जिससे हम देखते हैं सुनते हैं छूते हैं सूंघते हैं है ना बोलते

00:01:18:00 हैं तो जो कर्मेंद्र्रियों के द्वारा मिलने वाली जो हमारी सूचनाएं हैं वह लगातार हमें यह बता रही है इस भौतिक जगत से जोड़ रही है वह हमें जी और भौतिक जगत से जोड़ने के कारण हमें यह सूचना देने का प्रयास कर रही है। हमें विश्वास दिला देने का प्रयास कर रही है कि ईश्वर नहीं है। ना ही मोक्ष की कोई स्थिति है। तुम मुक्त नहीं हो सकते। तुम सत स्वरूप नहीं हो सकते। तुम सच्चिदानंद नहीं हो सकते। तुम सच्चिदानंद को प्राप्त नहीं कर सकते। ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते। बार-बार बार-बार जितनी बार वो कर्मेंद्रियां प्रभावित होती हैं, उतनी बार वो आपको कर्मेंद्रियां ही क्यों? ज्ञानेंद्रियां भी कर्मेंद्रियों के द्वारा मिलने वाला जो ज्ञानेंद्रियां हो गई ये क्या होता है? ज्ञानेंद्रियां जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। ओके। सूचना प्राप्त की जाती है। जैसे अह जैसे कर्म इंद्र हो गए। जैसे हम हाथ से लिखेंगे, किसी

00:02:33:06 को छुएंगे। ज्ञान इंद्र हो गई। जैसे कोई सूचना केवल प्राप्त करेंगे। जैसे कान कान से केवल सूचना प्राप्त कर रहे हैं और आंख आंख से केवल सूचना प्राप्त कर रहे हैं। हम जी तो अ ये हमें बार-बार भौतिक दुनिया से जोड़ती है। इसीलिए कर्मेंद्र्रियों के लिए फर्स्ट ऑफ ऑल जी

00:03:08:28 कार्य बताए गए हैं कि आप कोई भी कार्य कर कार्य करो तो ऐसे करो ऐसे करो है ना ताकि वो हमें जोड़ ना ताकि उसका जो कनेक्शन वो आपका उधर जुड़ रहा है प्रपंच रूपी संसार में जी वो कम होता चला जाए अब कुछ लोग कहते हैं जो व्यक्ति शिख नहीं करेगा शिख नहीं बांधेगा उसको क्या दर्शन नहीं देंगे? उसको क्या भगवान नहीं मिलेंगे? मैं पूछता हूं जो व्यक्ति शौच से आने के बाद हाथ नहीं धोएगा उसको क्या भगवान नहीं मिलेंगे? जी। मगर ये एक कर्मेंद्र द्वारा किया गया निग्रह है। आपका अपने ऊपर कंट्रोल किया। आपने वापस आए तो आपने हाथों को स्वच्छ किया। है ना? ये डिमांड है ना जी। कि भाई नहा धोकर पूजा करें। ऐसा करें वैसा करें तो आपके कर्मेंद्रियों को एक निश्चित कर्म में लगाया गया जिसका परवसान किस में हो जिसका परवसान आपके शरीर का इस योग बन इस योग्य बन जाने में हो कि वो जो

00:04:24:09 यह सरलता से भौतिक प्रपंच रूपी संसार जो आपको झुठलाने में लगा है आपके समक्ष भगवान भगवान के अस्तित्व को उसका प्रभाव कम रहे आपके शरीर पर और जो दिव्य ज्ञान है अध्यात्म का ज्ञान है जो प्रज्ञा शक्ति है आपकी वो इतनी सामर्थ्यवान हो जाए कि वो इस ज्ञान को ले सके इस ज्ञान के इस ज्ञान को समझ सके और उसका वो जो उधर वाला प्रभाव है वो कम हो सके इसलिए यह सारे कर्तव्य कर्म निश्चित किए गए हैं कि अपने शरीर को काम में लगाए रहो। जीवा को राम राम बोलने में लगाए रहो। है ना? इतनी बार तो दिन भर में बोल ही दो। हम उसका प्रभाव कर्म ज्ञानेंद्रियों पर पड़ जाएगा। वो उसी तरह का ज्ञान बटोरने लगेंगी। फिर हर जगह राम को देखने लगेंग। हर जगह राम को सुनने लगेंगी। सदा चिंतन चलने लगेगा राम का। यह तो रही है बात कि हम कर्मेंद्रियों का निग्रह हमें क्यों बताया जाता है। अब जैसा कि आपने कहा कि

00:05:39:15 भोजन हम भोजन का प्रभाव कैसे पड़ता है कि मैंने आपको बताया था ना कि छिपाने वाला कर्म जो होता है जी वो हमारी प्रज्ञा शक्ति पर चोट पहुंचाता है। जितनी बार छिपाएंगे दिन भर में उतनी बार हमारी प्रज्ञा शक्ति प्रभावित होती है। तो स्वयं को ऐसा बनाएं जीवन में कि हम कम से कम छिपाए। इसीलिए शास्त्रों के अनुसार

00:06:20:09 सन्यास आश्रम को सबसे सम्मानित और सबसे बड़े पद पर रखा गया है। क्यों? क्योंकि सभी आश्रमों में सन्यास आश्रम वो आश्रम है जिसमें कि व्यक्ति का जीवन अत्यंत पारदर्शी होता है। जी और आप देखिए दुनिया के सभी पाप छिपाने ना छिपाने पर टिके हैं। इसके साथ ही साथ अ यहां तक कि

00:06:53:10 पूरी तरह फॉलो नहीं भी कर पाया। मगर जहांजहां पे फॉलो किया है, जहांजहां पे कुछ वैदिक पकड़ रह पाई तो कुरान में भी इतना तो है ही कुफ्र ना करो कुफ्र। अब कुफ्र का मीनिंग क्या है? एक पर्टिकुलर मीनिंग तो ये निकाला जाता है कि भाई जो संदेश भेजा गया है जी। ईश्वर के द्वारा उस संदेश को मत झुठलाओ। उससे मत मना करो। यानी कि उसको मत छुपाओ संसार से। यही तो है जी बिल्कुल। और कुफ्र कुफ्र का और विश्लेषण क्या है? छिपाओ मत। कुफ्र मत करो का अर्थ हो गया छिपाओ मत। तो किस पर खड़ा हुआ है? फिर वो वहां पर भी छिपाने पर ही खड़ा हुआ है। तो जब हम कोई गलत कार्य करते हुए कोई भोजन प्राप्त बना हुआ भोजन गलत यानी छिपाने वाला कर्म करते हुए बनाया

00:08:09:08 गया भोजन प्राप्त किया गया भोजन जब हम ग्रहण करते हैं तो फिर वह हमारे चित्त में आ जाता है वह दोष जैसे कोई गाली बकरा है और साथ में वह समोसे तल रहा है और हमने जाके वह समोसा खाया तो गाली बकते हुए उसने किया है तो वह दोष उसमें समोसे में भी अनाज में आ गया और फिर वो आपके पास गया तो आपके पास भी आ गया वो दोष तो आपके चित्त में अशुद्धि आई प्रज्ञा शक्ति जो आप स्ट्रांग कर रहे थे आप उस पर वर्क कर रहे थे कि आपकी प्रज्ञा शक्ति दिन प्रतिदिन वो इतनी योग्य हो सके कि आप जो है यह सत्य के ज्ञान को वह ज्ञान भगवत गीता में जो कहा गया है जिसको जान लेने के बाद कुछ और जानना बाकी नहीं रह जाता उस ज्ञान को ग्रहण करने योग्य आप बन पाए तो उसमें बाधा आती है। इसीलिए ऐसा कहा गया है कि बाहर का खाइए ही मत। कोई विषम परिस्थिति पड़ गई तो बात अलग है। मगर ज्योतिष पीठ वाले जो महाराज जी हैं अब मुक्तेश्वर जी उनकी एक

00:09:24:14 दिन की जनेऊ और चोटी और घर की रोटी ऐसे वो किसी इंटरव्यू में बोल रहे थे। है ना? अच्छा। तो इसीलिए कि कोई व्यक्ति पता नहीं किस मंशा के साथ मन में विचार करता हुआ गाली बकता हुआ कुछ और के जूते पहन के करता हुआ गलत तरीके से वहां पर आचार विचार प्रकट करते हुए और खाना जब बनाएगा तो उस खाने में दोष आएगा। वह दोष आपके पास भी आ जाएगा। उपनिषदों के अनुसार जो जीव का जन्म होता है वह अन्न से ही होता है। भगवत गीता में भी अन्न से ही लिखा है जन्म। मतलब अन्न से अन्न आता है बारिश के द्वारा। अन्न उपजता है और फिर वो अन्न हमारे शरीर में जाता है। वही एक दिन जीव का रूप धारण करता है।

00:10:29:20 जो प्राण जो मनुष्य बन के जन्म लेता है ना तो इसलिए अनाज का बहुत महत्व है। जितना साफ सुथरा जितना अच्छे मन से बनाया हुआ भोजन आप ग्रहण करेंगे उतना ही आपका जो मन है वो बलिष्ठ रहेगा योग्य रहेगा और जितना आप बिना ध्यान दिए कुछ भी खा लेंगे तो कई ज्यादातर चांसेस है कि उसमें तामस प्रवृत्ति ज्यादा रहेगी। जी तामस यानी कि छिपाने वाली छिपाने वाली रहेगी तो क्या रहेगा या आपकी प्रज्ञा शक्ति घटती जाएगी जी जी बोले किरण दास

00:11:21:08 जी भैया भैया ये प्रश्न भगवत गीता से है जैसे उसमें हम चर्चा देखते हैं भगवान कृष्ण अर्जुन के बीच तो जब वो आत्मा के शाश्वत और सनातन होने की बात बताते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि युद्ध करना ही तेरा धर्म है। स्वधर्म है। और क्योंकि तुझे जो लगता है कि तू किसी को मार रहा है वास्तव में ना कोई किसी के द्वारा मारता है ना मारा जाता है। फिर वह भगवान कृष्ण ऐसे भी कहते हैं कि यदि तुझे लगता है कि शरीर रूपी देहात्मा है तो उसका तो मरना निश्चित ही है क्योंकि जन्म हुआ है तो मरेगा ही। तो इस विचार से भी तुझे युद्ध ही करना चाहिए। तो ऐसे दो विकल्प क्यों देते हैं विचार करने के भगवान कृष्ण ये प्रश्न था भैया

00:12:08:21 हां भैया अरे मैं इतनी देर से बोल रहा था जी भैया वो ऑडिबल ही नहीं था अच्छा ठीक है तो तभी मैं बार-बार बीच में पूछ रहा था ना कि ऐसा वैसा तो कोई रिप्लाई नहीं मिल रहा था। फिर ध्यान दिया तो माइक जो है मेरा ऑफ। खैर देखिए एक तरफ भगवान ने बताया है कि क्योंकि आत्मा नित्य है। उसको कोई कुछ नहीं कर सकता। जो वास्तविक स्वरूप है हमारा वो आत्मा है और आत्मा नित्य है। पहले थी अब भी है और आगे भी रहेगी। अविनाशी है। तो दो 17 से लेकर के 2 31 तक भगवान ने यही बताया है कि आत्मा को कुछ नहीं हो सकता। तो तू फिर यह क्या दिखावे का मरने का शोक कर रहा है कि मैं नहीं मारूंगा। पहली बात और यदि तू इनको शरीर ही समझ रहा है, आत्मा के गुण को नहीं जान पा रहा है, शरीर से ही देख रहा है तो तुझे इतना तो मानना पड़ेगा ना कि ये पहले नहीं थे, अभी सिर्फ है और आगे भी नहीं होंगे। यानी अगर तू इनको नहीं भी मारेगा तो

00:13:24:16 मैं आगे मृत्यु तो अपना ग्रास बनाएगी ना इन्हें जी तो इस दृष्टिकोण से भी अगर तू शरीर को ही देख रहा है आत्मा के गुण को नहीं पहचान रहा है तो तुझे मानना पड़ेगा कि अगर आज तू इनको नहीं मारता है तो आगे चलकर के मरेंगे ही इनकी मृत्यु निश्चित है तेरे ना मारने से ऐसा तो है नहीं कि अमर हो जाएंगे कभी नहीं मरेंगे और तो इसका अर्थ क्या है कि अगर शरीर की दृष्टि से भी देख तो तेरा चिंता करना व्यर्थ है। तो ये ये लाइन भी भगवत गीता में आई है कि यह पहले थे पहले नहीं थे आगे भी नहीं होंगे केवल बीच में ही है। तो ऐसे में तेरा व्यर्थ करना बेकार हो जाता है। तो शरीर के दृष्टिकोण से इसलिए व्यर्थ है क्योंकि धर्म की रक्षा के लिए तू इनको नहीं मार रहा है। जबकि आज नहीं तो कल ये लोग मरेंगे ही। और आत्मा के दृष्टिकोण से ये विकल्प है कि आत्मा तो नित्य है। यदि तू इनके वास्तविक गुण को समझ पा रहा है तो फिर तुझे शोक करने की चिंता नहीं है। ये दोनों विकल्प ऐसे कहते हैं भगवान।

00:14:39:25 जी। ठीक है। जी भैया। समझ गए ना आप? जी भैया मैं कुछ पूछ सकता हूं। हां किरण जी बोले किरण भैया मेरा तीन दिनों से बहुत बुखार है। मैं बस एक प्रश्न पूछने के लिए आया था। बहुत अच्छा बहुत अच्छा। अच्छा ये है कि आप प्रश्न पूछने आए। यह नहीं कि आपको तीन दिन से बुखार है। भैया वो कहकर मतलब चला जाता हूं तो इसलिए हां मतलब वो जानकर मतलब चला जाऊंगा इसलिए बिल्कुल बिल्कुल बताएं प्रश्न बताएं। जी वो मेरा एक निजी था और यहां आपके कुछ बात सुनकर भी दो मतलब आए मन पर मन में। तो पहला एक ये था आपने जो कहा था कि यह जो मतलब क्या कहते हैं ना उसको हां जो छिपाने का भाव आता है या बताने का भाव आता है तो इस पर एक चिंतन किया था मैंने कि अगर समझ लीजिए कि एक बालक है जो चोटी रखता है या नहीं रखता तो अगर वो मंदिर में जाएगा या जो मतलब सद्गुरु या वो सब मतलब मतलब होते हैं ना जो आध्यात्मिक

00:15:55:22 लोग तो उनके पास जाएगा तो उसको अगर मतलब दिखाएंगे उन लोगों को कि देखिए मेरा चोटी है तो उसको बहुत अच्छा लगेगा एक भाव आएगा कि हां मैम मैं उनको दिखाऊं परंतु अगर वो अपने दोस्तों के साथ अगर रहता है तो दोस्त उनका मजाक उड़ाएंगे तो उस वक्त वो उसको मतलब दिखाना नहीं चाहेगा कि नहीं भाई मेरे पास कोई चोटी नहीं है मैं भी तुम्हारे जैसा ही हूं या फिर अगर कोई गाली गलौज करता है तो मंदिर में या अच्छे जो लोग हैं उनके सामने गाली देने से वह मतलब गाली नहीं देता परंतु दोस्तों के सामने उसको देने में बहुत अच्छा लगता है और मजा आता तो अगर हम देखेंगे यह जो कार्य है कि ये जो छिपाने का भाव या बताने का जो भाव आता है उसका कारण तो व्यक्ति तो नहीं है वो स्थान और काल ही उसका कारण है ना पर वो खड़ा है अभी यही पर तो शास्त्र पर विश्वास आता है जिस आदमी को अपने शास्त्रों पर ईश्वर पर धर्म पर डंके की चोट पर विश्वास होगा वह अपनी चोटी को छुपाने के लिए उसके अंदर कभी भाव नहीं आएगा उसको लेकर के कभी उसको लज्जित फील नहीं होगा। डंके की चोट पर कह गए शिख मुझे कहां से मिली है? जहां ईश्वर का वह वचन हमें प्राप्त हुआ है। कर्मवादी कारस्ते मा फले कदाचना। ये चोटी हमें कहां से मिली है? जहां

00:17:11:06 रामो विग्रहवान हमें मिला है। तो जिसको अपने शास्त्रों के प्रति निष्ठा होगी, श्रद्धा होगी, वह अपनी शिख, सूत्र इत्यादि को लेकर के कभी भी लज्जित अनुभव नहीं कर सकता। इसीलिए आवश्यक है कि आपकी ईश्वर में निष्ठा हो और उससे पहले आवश्यक है कि आपकी सत्य की खोज में निष्ठा हो और उससे भी पहले आवश्यक है कि आपकी आपकी आत्मा की आवाज में निष्ठा हो। कहते हैं ना कि मूर्ख को ज्ञान नहीं देना चाहिए। या फिर इस तरह के कई वाक्य आते हैं कि जो व्यक्ति अडियल टाइप का हो और

00:17:57:08 मतलब या जो व्यक्ति समझना ना चाहता हो या जो व्यक्ति मूर्ख हो मूढ़मती हो उसको ज्ञान नहीं देना चाहिए तो मूढ़ मति ये कुपात्र को नहीं देना चाहिए है ना जो उसके योग्य ना हो उसको नहीं देना चाहिए अब योग्य कौन नहीं है अच्छा हर व्यक्ति या अश्रद्धावान हो श्रद्धावान को देना चाहिए अश्रद्धावान हो उसको नहीं देना चाहिए ज्ञान शास्त्र का धर्म धर्म का ब्रह्म का अच्छा तो यहां पर बात आती है कि फिर भाई अश्रद्धावान व्यक्ति तो हर वो व्यक्ति है जो ज्ञान मिलने से पहले तक अज्ञानी है तो वो अश्रद्धावान ही है हर दूसरा हर दूसरा व्यक्ति हर दूसरा व्यक्ति क्या हर पहला व्यक्ति अश्रद्धावान है शास्त्रों के प्रति तो फिर फिर किसको देने की बात यहां पे की गई है किसके प्रति श्रद्धा भाई भाई श्री कृष्ण के प्रति श्रद्धा तो तब आएगी ना जब व्यक्ति श्री कृष्ण को जानेगा। कम से कम नाम और मूर्ति विग्रह कुछ तो देखा होगा तब तो श्रद्धा आएगी। तो वो ज्ञान उसको क्यों दिया गया? तो यहां पर यह नहीं कहा जा रहा है

00:19:12:12 कि जो मूर्ख है या जो अश्रद्धावान है उसको मत दो। तो यहां पर किस मूर्ख की बात की जा रही है? किस अश्रद्धावान की बात की जा रही है? यहां पर बात की जा रही है कि हम सभी प्राणियों के अंदर हृदय में एक सवाल है जो गूंजता है और उस सवाल को हम कहते हैं असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यु मा मृतम गमय

00:19:45:15 यह सवाल ये प्रश्न ये क्वेश्चन हम सबके अंदर है जो व्यक्ति इस क्वेश्चन पर ध्यान दे रहा है, वह व्यक्ति श्रद्धावान है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा की पुकार सुन रहा है, भूखी है, प्यासी है, आ्यात्म का भोजन चाहिए उसे। भगवान की भक्ति रूपी भोजन चाहिए उसे। वो चित्कार कर रही है, परेशान है, जो व्यक्ति इसको सुन रहा है, ध्यान दे रहा है, बैठ रहा है, मनन कर रहा है, अपने में चिंतन किया। वह व्यक्ति श्रद्धावान है। वह व्यक्ति नहीं जिसने गीता नहीं पढ़ी तो गीता पढ़ने से पहले ही वह श्रद्धावान हो जाए। ना उसने श्री कृष्ण के बारे में अपने माता-पिता से जाना वो श्री कृष्ण के प्रति श्रद्धावान हो जाए। वो नहीं उसको आप बताइए। सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म कृष्णस्तु भगवान स्वयं उसको आपको बताना पड़ेगा ना तब वो श्रद्धावान बनेगा। तो यहां पर बात होती है कि श्रद्धावान कौन है? श्रद्धावान वह है जो अपनी आत्मा को सुन रहा है। उस पर विचार कर रहा है। तो बैक

00:21:01:01 टू द पॉइंट क्या है? कि जो व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज सुनेगा, अपनी आत्मा के प्रति श्रद्धावान होगा। जब आप उसको आत्मा की प्यास का विषय बताएंगे परमात्मा तो वह उसके प्रति श्रद्धावान होगा। फिर परमात्मा कहां का प्रतिपाद्य विषय है, कहां से प्रतिपादित है, कैसे परिभाषित है? तो वह शास्त्र के प्रति श्रद्धावान होगा। तो जो इस क्रम से आता है शास्त्रों तक उसको कभी अपनी शिख पर लज्जा का अनुभव नहीं होगा। दूसरी बात आपने कही गाली का उदाहरण आपने दिया तो ऐसा नहीं है गाली अपने मित्रों के बीच में देते हुए भी व्यक्ति ये जान रहा होता है ये गलत है सीधी सी बात है कि जो भी कार्य आप करें वह आप सबके सामने कर पा रहे हैं कि नहीं कर पा रहे हैं यह है छिपाने का भाव वह अपने दोस्तों के बीच में गाली दे रहा और कहीं पर नहीं दे रहा है तो इसके अंदर भय क्यों आ रहा है अगर वह यदि वह सही कार्य है तो और जो जो शास्त्रों पर श्रद्धा रखता

00:22:16:09 होगा वो ना मित्रों में भय खाएगा ना वो अपने परिजनों में भय खाएगा शास्त्रों पर विश्वास के द्वारा जिसके पास शिख आई होगी या और कोई सत्य कार्य मंदिर जाने वाला और यदि वो वहां पर भय खा रहा है तो ये उसकी अज्ञानता वश है जो उसका चुनाव नहीं और यहां पर जो भय खाना है, गाली खाना वो उसका चुनाव है। अज्ञानता वश नहीं है। वो डिसाइड कर रहा है कि गाली देना तो पाप है। बहन के सामने नहीं दे सकता, मां के सामने नहीं दे सकता। यहीं पर दे रहा हूं। और समझिए जब व्यक्ति इस तरह के कर्म करता है जो घ्रणित होते हैं त्याज्य होते हैं तो इन सब इस प्रकार के कर्मों को करने से पहले ही वह अपनी आत्मा की हत्या करता है। वह अपने आप से कहता है मैं बुरा हूं। इसलिए मेरा गाली दे देना ठीक है। कहता है कि नहीं? अपने आप को जस्टिफाई करता है कि नहीं? मैं ऐसा ही हूं। मैं तो दूंगा। जो भी व्यक्ति गलत कार्य करने जाता है, वह पहले अपने आप को गलत कार्य करने वाला स्वीकार कर

00:23:31:18 लेता है। एक दिन की बात है। एक कोई मशीन थी जो इंस्टॉल होनी थी। उस मशीन को इंस्टॉल करने के लिए एक जो लेबर क्लास का कोई लड़का है जो दिहाड़ी पर काम करते हैं दुकानों में वह आने वाला था। ठीक है? तो सुबह 10:00 बजे उसे निकलना था और मुझे आवश्यक था कि वह मशीन उसी दिन इंस्टॉल हो जाए। क्योंकि मेरे किसी मित्रव थे वहां पर जानी थी वह मशीन। और काफी दिन से पेंडिंग चल रहा था वह मामला। तो

00:24:19:25 मतलब एक दायित्व था मेरा कि मैं परेशान था कि आज के दिन मशीन इंस्टॉल हो जाए। और वो व्यक्ति मैं वहां पर शॉप पर फोन किया कि मशीन आपने निकाल दी। मतलब वहां से निकल गई घर यहां आने के लिए तो बोले कि 10:00 बजे हां यह लड़के को आपका कार्य दे दिया। ये लड़का जो फिर मैं लड़के से कोऑर्डिनेट करने लगा। लड़के से समन्वय स्थापित करने लगा कॉल के द्वारा कि भाई निकलेगी नहीं निकलेगी। तो उसने मुझे 11:00 बजे कहा कि मैं निकल चुका और जो वो शॉप से जहां पर वो इंस्टॉल होनी थी उसकी दूरी कितनी थी? मात्र 10 से 15 कि.मी. के बीच की दूरी। बस वो 11:00 बजे मुझसे बोला कि मैं निकल चुका हूं। 1:00 बजे तक नहीं पहुंचा। दो घंटे में नहीं पहुंचा। लोडर जाना था मशीन को लोड करके तो दो 1:00 बजे मैं फोन कर रहा हूं तो कह रहा बहुत जाम है। बहुत जाम है। पहुंच रहे हैं। पहुंच रहे हैं। 2:00 बजे फोन कर रहा हूं तो बहुत जाम है। पहुंच रहे हैं। पहुंच रहे हैं। बहुत सरलता से झूठ बोल रहा है। मतलब एक होता है ना कि झूठ बोलने में व्यक्ति थोड़ा घबराता है या ऐसा सोचता है कि

00:25:35:13 मैं ये ना करूं, करूं कि ना करूं। थोड़ा असमंजस वाली स्थिति होती तो समझ में आती। मगर वो तो बिल्कुल जैसे दही खाना होता है ना सिंपल तरीके से उस तरह से बोल रहा था। तो 2:00 बजे भी यही हो रहा है। 2:30 बजे भी यही हो रहा है। तो मैं समझ गया। मैंने उसके उसको ये बोला कि अपनी करंट लोकेशन भेजो जरा यह पता करने के लिए कि वो कहां पर है एक्सैक्टली। जहां वो कह रहा है वहां है कि नहीं। तो बोला मुझे लोकेशन भेजना नहीं आता। दिन भर यह लोग मोबाइल चलाया करते हैं। मगर उसको लोकेशन भेजना उस समय नहीं आता। एट द एंड वो शाम के 6:00 बजे पहुंचा। उस दिन मशीन इंस्टॉल नहीं हो पाई या शायद हो गई थी मगर रात हो गई थी। मतलब मेरी जो कहीं पर कही हुई बात थी वो उसका मोल उसका मान नहीं रह पाया था। तो लास्ट में जब वह व्यक्ति काम वगैरह करके और फिर जब मैं उससे किसी दिन मिला तो मैंने उससे यह कहा कि क्या तुम अपने जीवन में बड़ा व्यक्ति बनना चाहते हो या नहीं? बोला हां बनना चाहता हूं। तो फिर

00:26:50:14 मैंने उससे कहा कि बड़ा व्यक्ति क्यों बनना चाहते हो? अगर मैं तुमसे कहूं कि तुम दिन भर पत्थर पर सोओ। मगर जब तुम बाहर निकलो तो तुम्हारे पास वह BMW कार हो तुम्हारा बंगला लोगों को दिखाई दे रहा हो तुम्हारे सारे माता-पिता वगैरह सब सुखी हो केवल तुम ही हो जो शारीरिक कष्ट के साथ में मतलब जैसे बिल्कुल सामान्य जीवन जी रहे हो प्याज रोटी खा रहे हो सूखा खाना हां या फिर और भी बिल्कुल कठिन जो जीवन की स्थिति हो सकती है कठिन वैसी नहीं कि कोई सजा मिल रही है मगर जो एक लेबर क्लास की जीवन होता है वह जीवन तुम जी रहे हो परंतु बाहरी तुम्हारा जो अवयव है वह सब सुधर गया है लोग तुम्हें आते जाते समय मतलब देख रहे तो तुम कारों में चल रहे हो सब कुछ है बस तुम्हारा जो अभी निजी जीवन है वो लेबर क्लास का रह गया तो कैसा रहेगा तो वो कहेगा अरे मैं कोई दिक्कत नहीं भैया मैं कुछ भी मैं अपने शरीर को कोई भी कष्ट देने के लिए तैयार हूं। पर मेरे परिवार पे यह मतलब परिवार सुखी हो जाए। यह बंगला मेरा दिखने लगे। फिर मुझे कोई दिक्कत नहीं

00:28:05:15 है। मैं अपने शरीर के लिए कोई भी कष्ट प्राप्त कर लूंगा। तो मैंने कहा तो इसका अर्थ यह है कि तुम अपने शरीर के लिए नहीं तुम अपने सम्मान के लिए मेहनत कर रहे हो कि लोग एक दिन कहे लोग एक दिन तुम्हें बड़ा व्यक्ति समझे। ये युद्ध जो है वो सम्मान का है। बोला हां बिल्कुल सही। बिल्कुल सही सम्मान का है कि लोग देखें लोग कहे कि BMW में चल रहा है या फलानी में चल रहा है Thar में चल रहा है लोग ये कहे मैंने कहा इसका मतलब तुम चाहते हो कि संसार तुम्हारा सम्मान करे कि हां हां बिल्कुल चाहता हूं तो फिर मैंने उससे कहा क्या तुम स्वयं का सम्मान करते हो

00:28:48:09 तुमने यह सोच लिया है कि तुम एक निचले स्तर के व्यक्ति हो तुमने मान लिया है कि मैं बेकार का व्यक्ति हूं। बहुत आसान है मेरे लिए झूठ बोल देना। तभी तो दिन भर में तुमने मुझसे 50 झूठ बोले। जो व्यक्ति स्वयं का सम्मान करेगा वो सरलता से झूठ नहीं बोल पाएगा। उसको कठिनाई होगी झूठ बोलने में। तो यह वाली जो बातें हैं गाली इत्यादि वाली इसमें व्यक्ति पहले अपनी आत्मा की हत्या ही करता है। अपना अस्तित्व स्वीकार करता है। मैं गालीबाज हूं। मैं गाली दूंगा।

00:29:29:27 अब मेरे पास अगर भगवान श्री कृष्ण की तरह शास्त्र वो दिव्यास्त्र नहीं है तो मैं क्या वाचिक प्रतिकार भी ना करूं? पता है किसी किसने बोला है ये पता ही होगा आप लोगों को खैर मुझे नहीं पता भैया ये एक है गाली बाजाचार्य है अपने ना जी भैया समझ गए समझ गए ना समझ गए वो ये कहते हैं वो ये कहते हैं कि मैं गाली दूंगा ठीक है [संगीत]

00:30:16:02 जी भैया धन्यवाद एक और प्रश्न था जो आपने अभी कहा था ना कि कर्मेंद्रिय ज्ञानेंद्र जो होते हैं तो इंद्रिय से हम जो विषय भोग करते हैं तो उसको वहां से हटाकर भगवान की सेवा में हमें नियोजित करना चाहिए तो ये जो 10 इंद्रिय है इन द 10ों का मतलब कैसे कैसे हम उनका का व्यवहार कर सकते हैं। उसको अगर आप क्रम से बताएं जैसे जीवा से नाम जप है ना और मन से भगवान का चिंतन मनन अन्य जितनी भी कर्मेंद्रियां हैं ज्ञानेंद्रियां हैं कर्मेंद्रियां मुख्य रूप से उनका प्रवसार निग्रह में करें निग्रह निग्रह कैसे कि कार्य कोई करना है, भोजन प्राप्त करना है। है ना? तो इस तरह से करें। स्त्री संग करना है तो इस तरह से करें। विधि लगा के तो उसका पर्यावसार आत्म कल्याण में हो जाएगा। निग्रह

00:31:32:09 विधि द्वारा विधि पूर्ण निग्रह करते हुए उसको आप जब अपनी कर्मेंद्रियों का व्यवहार करेंगे कोई भी व्यवहार कुछ भी करिए तो उससे भगवान को जोड़िए स्त्री संग करिए भगवान को कैसे जोड़ा आपने विवाह भगवान जुड़ गए कि नहीं जुड़ गए जी बिना बिना विवाह के स्त्री संग अवैध वैभचार और आगे भी मनुस्मति तो कहती है कि अमुक अमुक काल में अमुक अमुक उद्देश्य के लिए ही स्त्रीषण करना चाहिए। तो ऐसे ही जीवन के हर क्षेत्र में हमारी कर्म इंद्रियों से होने वाले जो कर्म है उनके निमित्त ही भगवान ने स्वरूप लीलाओं अपने स्वरूपों अपनी लीलाओं का वर्णन किया है और कहीं ना कहीं वही वाली बात जैसे मांस अथवा जो यह मदिरा पान है यह जब आवश्यक हो जाए तो उस समय भी अपने ऐसे स्वरूप ऐसी विधि वर्णन किया है जिससे कि आप वहां भी इस कर्म को भी भगवान से जोड़ पाओ। ठीक है?

00:32:48:19 जी भैया और भैया एक मेरा तो एक निजी प्रश्न था और ये दो तो हो गए। इसको आपने ही पहले बता दिया कि वो जो कर्मवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन है कि तुम कर्म करते जाओ फल की आशा मत करो। तो इसका जो इंटरप्रिटेशन है ना यह मैंने बहुत से लोगों से सुना है। सभीियों का एक ही बात है कि कर्म तो करेंगे परंतु फल की आशा क्यों ना करें? क्योंकि अगर हम कहीं ऑफिस में या कहीं पर भी अगर कुछ काम करते हैं तो उसको अगर हमें फल नहीं मिलेगा कोई अगर रिवार्ड नहीं मिलेगा तो हमें उसकी करने की इच्छा क्यों जागेगी? अगर हम कोई ऑफिस में काम करते हैं हमें सैलरी मिलती है तो हमें आशा आएगा कि हां मुझे अभी करना है तो अगर मुझे पता चलेगा कि मैं कर्म करूंगा कुछ मुझे मिलेगा ही नहीं तो उसको तो मुझे मतलब कुछ लाभ नहीं है ना तो दिमाग में बैठ जाएगा तो मैं तो करना चाहूंगा ही नहीं तो इसका एक्चुअल इंटरप्रिटेशन मतलब एक्चुअल व्याख्या क्या होगा

00:33:51:20 इसको ऐसे समझ लीजिए कि जैसे मान लीजिए मैं पत्थर तोड़ रहा हूं तो यदि मैं इस बात पर ध्यान ना दूं कि पत्थर टूटेगा कि नहीं टूटेगा तो मैं क्या उतनी जोर से मारूंगा कि पत्थर टूट जाए। है ना? तो इसका मतलब पत्थर तोड़ने के लिए ही मारा जाएगा जब तभी पत्थर टूटेगा ना। तो फिर यहां क्यों कहा जा रहा है कि परिणाम पर ध्यान मत दो। परिणाम पर ध्यान देने का मतलब है कि वह जो भी कर्म का परिणाम हो रहा है उस परिणाम से मिलने वाला जो भोग है सांसारिक

00:34:34:09 उसमें आसक्ति उसको इस कार्य का हेतु ना मानकर भगवान को शास्त्र को उसका हेतु मानो। जैसे कि अर्जुन से कहा यह इंटरप्रिटेशन बहुत लोगों ने गलत बताई है। बहुत लोगों ने गलत बताई। आप प्रामाणिक आचार्यों का पढ़िए। वहां आपको सही आंसर मिलेगा। शंकराचार्य जी ने बोल दिया कि वहां पर यह कहा जा रहा है कि आपको कर्म करते समय यह भाव रखना चाहिए कि मैं जीतूंगा। जीतने के लिए ही लड़ना है। ऐसा नहीं है कि जीतने पर ध्यान नहीं देना है। जीतने के लिए लड़ना है। पर जीतना क्यों है? क्यों जीतना है? क्यों जीतना है? बताइए। युद्ध क्यों जीतना धर्म की स्थापना करना है। धर्म की स्थापना करना है। हां क्योंकि शास्त्र ने कहा है क्योंकि ईश्वर ने कहा है जीत करके मुझे महल मिलेगा इसलिए नहीं जीतना है। जब यह भावना आपकी आ जाती है तो आप बिल्कुल एक मशीन की तरह लड़ पाते हैं। जिसको ना जीत का लालच है ना हार का भय है। जिसको सिर्फ अपने लक्ष्य को भेद कर वापस आना है।

00:35:50:09 है ना जो समत्व हो जाता है हार और जीत में एक जैसी बुद्धि हो जाती है उसकी क्योंकि वह क्यों लड़ रहा है क्यों जीतेगा क्योंकि ईश्वर ने कहा है आगे उसको महल मिलेगा तो क्यों महल में रहेगा इसलिए नहीं कि वहां पर ठंडक मिलेगी इसलिए क्योंकि ईश्वर ने कहा है वहां रह के उसको और भी गृहस्थ आश्रम के भोग भोगने होंगे भोगेगा मगर उनसे मिलने वाले भोग की आसक्ति हो भोग के प्रति आसक्ति ना होकर उसके मन में भाव योगा मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि ईश्वर ने कहा इसको कहते हैं कर्म निवार आसक्ति नहीं रहनी चाहिए मन में तो उन कार्यों को करने का हेतु क्या होना चाहिए शास्त्र ने कहा है ईश्वर ने कहा है ना कि यह कि मैं जीतूंगा तो भोगूंगा ठीक है

00:36:47:03 भैया मेरे जी भैया धन्यवाद [संगीत] हां विश्वजीत जी बोलिए भैया जब जैसे कि आत्मा को कभी मार नहीं सकते तो फिर जब हम मतलब और मोक्ष को भी जब प्राप्त रहते भगवान के अंदर रहते हैं जब भगवान में मिले हुए रहते हैं तो फिर उसके बाद जन्म नहीं होता हम लोग का तो भैया आत्मा सबसे पहले जैसे हम लोग इंसान है सबका एक एक आत्मा है तो वह कहां से आए पहले तो सब भगवान में ही थे तो मोक्ष के स्थिति में ही सब थे और स्वर्ग और नर्क तो भैया नित्य नहीं है। ऐसा मैंने सुना है। तो भगवान के मतलब भगवान के पास जब जाते हैं मोक्ष के लिए सबका कामना रहती है। कहीं से आई नहीं है। विभिन्न भावों से भावित होकर के जो जीव भाव है ब्रह्म ही जीव भाव में परिलक्षित होता है। और भैया स्वर्ग और नर्क नित्य नहीं है क्या? नहीं। तो भैया जैसे कि हम लोग ऐसा चाहते हैं कि सबको मोक्ष मिल जाए ताकि दोबारा जन्म और मरण के चक्र में फंसना ना पड़े।

00:38:02:12 तो भगवान वह भी चीज एक बनाएं। कि मोक्ष का स्थिति मिले और यह भी बनाया कि बार-बार जैसे इंसान का जन्म होता है किसी भी प्राणी के रूप में आत्मा का जन्म होता है तो उसको कोई एक्सेप्ट क्यों नहीं करना चाहता ताकि दुख मिलता है इसीलिए क्या किसको एक्सेप्ट नहीं करना चाहता है दोबारा जैसे भैया हम लोग जन्म लेते हैं फिर जन्म लेने के समय में भी तो कष्ट होता है और मरने के समय में भी कष्ट होता है इंसान को और जो जीवन काल में भी तो अनेक प्रकार के कष्ट आते हैं झगड़ा लड़ाई होता है तो तो इन सबको कोई मतलब यह नहीं चाहता कि मेरे जीवन में ऐसा आए इसीलिए मुझको मोक्ष मिल जाए तो अब दोबारा जन्म मरण के चक्र में नहीं फंसना पड़ेगा। तो भगवान जब मोक्ष की स्थिति को भी बनाए तो फिर उस स्थिति को सब पाना चाहते हैं तो फिर इस स्थिति को कोई क्यों नहीं पाना चाहता? मतलब वो भी तो भगवान का बनाया हुआ एक रूप है। एक सिस्टम है।

00:39:02:07 भगवान का बनाया हुआ एक सिस्टम है। तो इसको पालन ना करने के प्रति भावना होना भी तो भगवान का बनाया हुआ एक सिस्टम है। फिर आपको प्रॉब्लम क्या है? जैसे भैया मतलब जैसे जैसे भगवान का बनाया हुआ इंसान अपने जीवन में गलत मृत्यु जैसे जीवन में कष्ट मिलना है, जन्म मृत्यु में कष्ट मिलना है। तो ये तो भगवान का बनाया हुआ नियम है। हम ठीक है? इसलिए आपका कहना है कि व्यक्ति को उससे मुंह नहीं फेरना चाहिए। उस कष्ट से उसे दुखी नहीं होना चाहिए। हम और जब मोक्ष मिलेगा तब मिलेगा। मगर उसको इससे भागना नहीं चाहिए। जीवन की सत्यता से व्यवहारिक सत्यता से। तो जैसे आपने यह स्वीकार किया कि ईश्वर ने कष्ट बनाया है तो आपको यह भी तो स्वीकार करने करना होगा कि जीव के अंदर की जो प्रकृति है इन त्रिविध तापों से भागने की वो भी तो भगवान ने बनाई है। फिर उसको आप क्यों विरोध कर रहे हैं? नहीं हां विरोध नहीं कर हम दोनों चीज को लेकर के चलने के लिए और भैया एक बात और दोनों चीज को ले

00:40:18:02 मैं कह तो रहा हूं दोनों चीज को ना कर ना लेकर चलने की भावना ईश्वर ने ही दी है ना हां भैया तो फिर आपके विरोध क्यों कर रहे हैं अच्छा दोनों चीज को ना लेकर चलने की भावना ईश्वर ने ही दी है कि मरने से डरो और भैया जब हम सब एक ना एक दिन मोक्ष को जीव तो मोक्ष को प्राप्त होगा ही कभी नहीं यदि इन त्रिव यदि इन त्रिविध तापों को हम एक्सेप्ट ही कर लेंगे तो काहे के लिए हमें मोक्ष की चिंता होगी काहे के लिए हम धर्म का पालन करेंगे फिर क्यों हम एक तरह से नास्तिक बन जाएंगे क्या मतलब है फिर उसका शास्त्रों का भैया एक छोटा सा प्रश्न और था कि कोई भी जीव हो एक ना एक दिन मोक्ष को जरूर प्राप्त होगा तो उस जब ऐसा समय आ जाएगा सभी जीव मोक्ष क्ष प्राप्त हो चुके होंगे। उसके बाद संसार का क्या होगा? संसार नहीं चलेगा। जीव तो फिर भगवान के पास ही रहेंगे ना मोक्ष मिल जाएगा। खुद को प्रलय काल कहते हैं। ब्रह्म के रूप में सब कुछ स्थित रहेगा। ब्रह्म में फिर समय आने पर जब दोबारा सृष्टि होगी तो फिर ब्रह्म अपनी शब्द शक्ति जो उनकी बाया शक्ति

00:41:33:08 होती है उसके द्वारा जो है संसार रच देते हैं। जी ठीक है। ठीक है भैया। धन्यवाद। किरण जी आपका हो गया है। अब मैंने तो प्रश्न पूछा ही नहीं। तो हां पूछना नहीं है तो हाथ नीचे कर लीजिए। पूछना है। मैंने पूछना है। मैंने प्रश्न पूछा ही नहीं है अभी तक। अच्छा एक मिनट जरा आपसे प्रश्न अभी तो बात हुई थी। नहीं करण दास जी से बात है। अच्छा आपसे बात नहीं हुई है। करण दास जी से बात हुई है। मैंने नाम आपका ही लिया। जी बताइए किरण किरण जी जी मेरा ये प्रश्न है कि द्वैतवादी भागवत गीता का एक श्लोक देते हैं। मतलब ज्यादातर इस वाले देते हैं कि जीव और ब्रह्म की मतलब अलग सत्ता सिद्ध करने के लिए कि मामे वांसो जीव लोक जीव भूते सनातन। वो यह सिद्ध करना चाहते हैं कि देखो जीव भी सनातन है, जगत भी सनातन है और ईश्वर तो सनातन है ही। तो तीनों की अलग-अलग सत्ता है तात्विक रूप से भी मतलब परमार्थ में भी। तो इस पर आप क्या कहेंगे?

00:42:47:13 ब्रह्म के रूप में इस मेरा भी एक सोच है। मैं वो भी बताऊंगा। ब्रह्म के रूप में सब सनातन है। ब्रह्म के रूप में सब सनातन है। उसको तीन नाम लेकर इसलिए बताया जा रहा है या दो नाम लेकर इसलिए बताया जा रहा है जिससे कि क्योंकि आप दो नामों में ही जानते हो उसे अलग-अलग ही जानते हो तो अलग-अलग के अनुसार वहां पर बताया जा रहा है हम है ना और देखने की बात एक ये भी है आप बता दीजिएगा जैसे अर्जुन जैसे अर्जुन जब उनके उनके उस स्वरूप को नहीं जान पा रहा था हम तो जब श्री कृष्ण को वो अलग देख रहा है परम ब्रह्म से हम तो कई बार भगवान ने कहा तू उस परमात्मा की शरण में जा परमात्मा क्या उनसे कोई भिन्न है क्या वही तो थे मगर वो जिस तरीके से जानता है उसी तरीके की उसी भाषा में उसको बताया जा रहा है कि तुझे उस परमात्मा की शरण में जाना है जो सर्वशक्तिमान है जो सनातन है जो समस्त भूतों का ईश्वर है स्वामी है और वो वो परमात्मा मैं ही हूं।

00:44:02:14 हम ठीक है? तो तो वो जो ये जान रहा है कि वो परमात्मा अलग है तो पहले उस परमात्मा की शरण में जाना है। इसी को तो रामपाल ही पकड़ते हैं। हम तो जिस रूप में जिस रूप में सुनने वाला श्रोता जानता है उसी रूप में उन उन तीनों चीजों को पकड़ के उसकी उनकी व्याख्या की गई। हां। और शिवशी अगर तीनों की अलग सत्ता मान ले तो तीनों ही बाधित हो जाएंगे। परमात्मा भी ब्रह्म भी सच्चिदानंद नहीं रहेगा। सब बाधित हो जाएगा। मेन बात यही है। सब कुछ सही है। ईश्वर को सर्वशक्तिमान आप सिद्ध कर दीजिए। बस हम अद्वैत का खंडन करके ईश्वर को सर्वशक्तिमान सिद्ध नहीं किया जा सकता। करेंगे यदि वह यह कहेंगे कुछ भी कर सकता है हम तो वह कहीं ना कहीं अपने ही किसी ना किसी नियम को बाधित कर देंगे। हम हम जैसे बाधित कर देंगे और फिर जब हम प्रश्न पूछेंगे ये यहां ऐसा क्यों हो रहा है? ये आपका नियम टूट रहा है यहां पे तो वो आपसे अचिंत बोलने लगेंगे। हां हां

00:45:17:27 भगवान को समझा नहीं जा सकता। यह हमने पिछली वाली क्लास में भी बात की है। हां। जैसे कि जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है पर दही से दूध नहीं उसी प्रकार कृष्ण से तो शिव बनते हैं पर शिव से कृष्ण नहीं बन सकते। तो यहां कृष्ण ही तो बाधित हो गए। हम अब जब हमने ये प्रश्न किया अरे ये तो अचिंत विषय है। हम ऐसे तो कहीं भी बोलते चले जाओ अचिंत। यह बात हां

00:45:50:12 और एक वर्ण व्यवस्था पर एक क्वेश्चन था। अब ठीक है काफी देर हो गई। एक घंटा हो गया। नेक्स्ट ले लेंगे। अब थोड़ा सा इन अन्य लोगों के प्रश्न लेकर के पूरा करें। मुझे लग रहा था कि आप ही से बात हो रही है। नहीं आपने तो बस मेरा एक ही क्वेश्चन लिया अभी तक। अच्छा देखते हैं जरा इन चार लोगों के नाम दिख रहे हैं। हर्ष जी बोले। जय श्री राम भैया जय श्री राम। जय श्री राम। भैया पूछ रहे थे एक से बात हुआ था जो हम बोले थे कि जो मांसाहार होता है अगर वो वैष्णव को दिया जाए तो द उसे सम्मान पूर्वक मतलब मतलब मना कर दे। बलि वाला जो होता है ना प्रसाद वाला भी का तो उसको सम्मान पूर्वक मना कर दे। उसे द्वेष ना रखे और फिर वो मतलब ना खाएं एक तरह से। ठीक है? तो फिर दिमाग में आता है एक बार कि भक्त राज प्रहलाद जी थे। है ना? वो तो पूरे दत्य वंश में ही थे। उनके यहां तो मतलब वो तो परम वैष्णव है। परम भागवत है। लेकिन फिर भी उनका ऐसा परिस्थिति था जिसमें मतलब भोजन

00:47:05:22 तो सात्विक था ही नहीं उसके यहां पे। उनके यहां पे तो फिर वो कैसे रहते होंगे उस समय पर? मतलब वो जब कुछ खाएंगे नहीं तो जीवित कैसे रहेंगे वहां पर तो सात्विक भोजन का तो कुछ प्रबंध तो बहुत ही सरल सवाल बहुत ही जगजाहिर प्रश्न है यह भावना आपके तब भी तो आनी चाहिए जब व्यक्ति को खाई में फेंका जा रहा है जब व्यक्ति को अग्नि में जलाया जा रहा है तब भी तो यह भावना आनी चाहिए कि वह कैसे जीवित रहेंगे अग्नि में जा रहे हैं कैसे रहे होंगे कैसे बताइए अग्नि में जाने के बाद भी वह जीवित कैसे रहे वो तो भगवान रक्षण किए उनका तो बस भगवान रक्षा किए तो बस तो मतलब ये तो एक सामान्य व्यक्ति के लिए परिस्थिति नहीं बन सकता ना मतलब वैसा परम भाव नहीं पहली बात तो ये है कि क्या आपने शब्द प्रमाण में ये जांच लिया है कि हर वक्त वहां पर केवल मास ही मिलता था जिस वस्तुनिष्ठता के साथ आपने देखा है वहां

00:48:08:09 नहीं ऐसा तो नहीं कि अगर ऐसा तो नहीं अगर प्रह्लाद मांस नहीं खाते थे तो उनके लिए उन्हें शाकाहारी भोजन मिल जाता था। नहीं जैसा कि वहां का खुद का राजा जो उसके पिता था नहीं राजा पिता का पिता का पिता का राजा है। पिता होते हुए भी बहुत सारे ऐसे कार्य है जो पिता ने नहीं किए जो वो कर सकता था। भाई नीचता की कोई पराकाष्ठा तो है नहीं। कुछ भी कर सकता है वो उसके साथ। मगर उसकी भी एक मर्यादा थी। तो यह कहां से यह कहां से उद्भाषित हो रहा है कि वो अपने जो उसका बेटा यदि शाकाहारी और वो केवल मांसाहारी है तो वो अपने बेटे को विवश करता था कि तू मांस खा नहीं किया विवश नहीं वो तो वो प्रकरण नहीं मिलता लेकिन ये बात मन में आता है कि जैसे कि उसका जो राजा था वो उसको खुद ही एक दत्य बनाना चाहता था मतलब दैत्य राज बनाना चाहता था कि वो विष्णु का पूजन छोड़ दे। उसको बहुत सारी यातनाएं दिया गया था ताकि वो अपना दैत्य वंश का जो मतलब राक्षस बन सके पूरा राक्षस मतलब विष्णु से द्रोही बने और

00:49:23:22 वो ऐसा कहीं पर मेंशन है कि वो दैत्य बनाना चाहता था। उसको उसी के लिए तो यात्रा दिया कि तुम उसको छोड़ो। विष्णु को नहीं विष्णु को छोड़ो मतलब मेरी पूजा करो। मुझे भगवान मानो। दैत्य बनाना चाहता था। यह कहीं मैंने तो अभी जाना नहीं है। और अगर बनाना भी चाहता होगा तो उसकी मर्जी कि वह किस टेक्निक का यूज़ करे। उसको दैत्य बनाने के लिए ये आवश्यक थोड़ी ना है कि उसको मांस खिला के ही शुरुआत की जाए। हो सकता है यह सोचा हो जब दैत्य बन जाएगा तब इसको मांस खिलाया करेंगे।

00:50:01:01 मांस खिलाने से ना बनाकर दैत्य बनाने से मांस खिलाना शुरू करेंगे। ये भी तो हो सकता है तो इसमें शब्द प्रमाण की आवश्यकता होगी। लेकिन वो वो ठीक है वो जो भी करे वो लेकिन इसका जो चरित्र पढ़ते हैं तो ऐसे ही मेरे को लगता है कि वो बहुत विषम परिस्थिति था और उसका जो राज्य था वो तो दैत्य का ही था ना और दैत्य लोग तो शाकाहारी खाते नहीं है। ऐसा नहीं है। दैत्य केवल मांस खाता है। ये कहीं नहीं लिखा है। मांस भी खाता है यह ठीक है मगर केवल मांस खाता है यह नहीं

00:50:43:25 अच्छा हां तो ये माना जा सकता है कि उनको मतलब सात्विक भोजन मिलता होगा हां कंध मिलते होंगे सीता माता भी तो दैत्यों के बीच में रही एक वर्ष तक तो उनको भोजन ही नहीं मिला इसका मतलब लग जाएगी हां लेकिन सीता सीता मैया के पास तो ये क्या बोलते हैं जो मंदोदरी देवी थी रावण की पत्नी वो तो खुद ही कुछ सुख सविदा भेजती थी ऐसा वर्णन मिलता है हां तो वर्णन का अभाव यहां भी है ना आप वर्णन का वो तो देखो कि वो वर्णन है कि नहीं कि मांस मांस ही मिलता था उसको उसके बाद यह माना जाएगा कि भाई भगवान ने उनकी रक्षा की मांस ना खाने की स्थिति में भी

00:51:36:21 ठीक है। अच्छा अच्छा और एक और प्रश्न था जो कि आपसे पहले पूछे थे जो अनुलोम और प्रतिलोम वर्ण व्यवस्था का जो रावण का जो कैसे ब्राह्मण माना जाए क्योंकि कहा तो जाता है कि जो शद्रा से या फिर मतलब उससे नीचे से अगर किसी से संतान उत्पन्न होता है तो उसका वर्ण उसकी माता का ही हो जाता है। तो इसके हिसाब से रावण तो राक्षस वर्ण का था वो तो माना जाएगा लेकिन रावण कैसा नहीं ऐसा नहीं है

00:52:11:06 हमने इस बारे में बताया है आपको कि द्वापर तक ऐसा था कि यदि पुरुष ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य होगा या अपने से जो जैसे ब्राह्मण क्षत्रिय से संग विवाह करेगा या क्षत्रिय वैश्य के साथ तो उत्पन्न होने वाली जो संतान है उसको पिता का वो मिल जाएगा कुल परंतु ऐसा नहीं वो श्रेष्ठतम क्षत्रिय नहीं हो पाएगा इस प्रकार से और कुछ लोगों के जो नाम लिए जाते हैं वो सामान्य

00:52:54:24 प्रक्रिया नहीं है उनके जन्म की निम्न प्रक्रिया है कुछ अयोनेज है और कुछ की तो दिव्य ही प्रक्रिया है। जैसे उस उस दिन हमने लोम ऋषि के बारे में लोमर जी के बारे में जाना था। ठीक है। बाकी आपका मेरे पास लिखा रखा है। थोड़ा सा समय निकाल करके वो आपको भेजना भी है जिसमें कि जी भैया फिगर्स है वो लिखी हुई प्रमाण लिखे हुए हैं सब है ना श्लोक स्थल से जी जी वो लोग जो आज वो भी मैं भेज दूंगा वो भी मैं भेज दूंगा बाकी इसका निस्तारण यही है कि द्वापर तक ऐसा था कि श्रवण विवाह यदि अनुलोम हो रहा है। अनुलोम विवाह हो रहा है सवर्ण तो उसमें उत्पन्न होने वाली संतान को पिता का वर्ण प्राप्त होता था। परंतु अब क्या हुआ है कि माता-पिता की प्रज्ञा शक्ति ऑलरेडी इतनी कम हो गई है कि अब जब वो प्रज्ञा शक्ति घटेगी अनुलोम विवाह से। ठीक है? तो वो फिर वो जो एक डेडलाइन होगी ना कि इतनी प्रज्ञा शक्ति के बाद भैया वो ब्राह्मण

00:54:10:04 क्षत्रिय वैश्य में नहीं आ पाएगा। है ना? तो उस डेडलाइन के अंदर क्रॉस हो जाने पर कलयुग में यह है कि अनुलोम विवाह यदि होगा अनुलोम विवाह यदि होगा तो उत्पन्न होने वाली संतान जो है वो वर्ण शंकर कहलाएगी। वर्ण संकट तो पूर्व भी है लेकिन अगर देखा जाए तो विदुर जी का भी तो द्वापर युग में ही थे उनको तो पारस कहा गया जो कि ब्राह्मण और शद्रा का कन्या उत्पन्न संतान को पारस्व कहा जाता है ना तो वो ब्राह्मण होता है और ना ही वो शद्र होता है वो पारस होता है ऐसा लिखा हुआ है विदुर जी का प्रकरण में तो विदुर जी को ब्राह्मण कहां माना गया है नहीं उनको ब्राह्मण नहीं आपने कहा ना कि पिता से उसको मान लिया जाता था द्वापर युग तक तो तो इस जगह पे तो विदुर जी का भी तो ब्राह्मण मान लिया जाता वो तो नहीं माना गया ना वही तो हम कह रहे कि वहां पे स्त्री का वर्ण भी मायने रखता है ना तो स्त्री का वर्ण रावण के केस में राक्षस ही है तो उसको रावण का तो द्वापर भी नहीं है

00:55:16:14 रावण है ना तो ये तो ये तो तब भी था ना वर्ण संकर तो मतलब ये तो सनातन नियम है ना वर्ण का वर्ण संकर वाला जो नियम है उसमें जो परंपरा प्राप्त जो चीज है वह यही है कि जो मैंने आपको अभी बताया कि अनुलोम विवाह द्वापर तक यदि होता था तो उसमें ब्राह्मण जो पिता है उसका वर्ण मिल जाता था परंतु विदुर जी के साथ नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ ये देखना पड़ेगा और इसके संबंध में जो और वस्तुनिष्ठ जानकारियां है क्या कहते हैं कि अ ये अनुलोम वाली बात कहां लिखी है? द्वापरर्तक वाली बात कहां लिखी है? तो यह मैं आपको अभी भेज दूंगा। मेरे पास लिखा हुआ है। यह मैं आपको भेज दूंगा। जी ये देखने की बात है कि विदुर जी को क्यों नहीं माना गया? अगर ऐसा था। ठीक है। वो समझने वाली बात है। मगर परंतु परंपरा प्राप्त सिद्धांत क्या है? परंपरा प्राप्त सिद्धांत यही है कि द्वापर तक अनुलोम विवाह से उत्पन्न होने वाली जो संतान थी उनके पुत्र को भी अपने पिता का वर्ण ही प्राप्त था।

00:56:32:26 यह परंपरा प्राप्त है। अब क्या होता है कि शास्त्र में कई जगह घुमा फिरा करके इस तरह की कई बातें होती है जिससे मन चकरा सकता है। इसीलिए तो गुरु होता है। है ना? तो उनके प्रति क्या भाव रखना चाहिए कि हां इसमें भी कुछ ना कुछ आंसर होगा जो हमें मिल जाएगा। तो इस भाव के साथ आप रहे आपको पहुंचा दिया। जी भैया कहने का मतलब है कि रावण को ब्राह्मण नहीं कहा जाना चाहिए था। नहीं नहीं मेरा यह कहने का या फिर या फिर यह कहने का कारण है यदि रावण को कहा गया तो विदुर जी को नहीं कहा जाना चाहिए था या विदुर जी को भी कहा जाना चाहिए था ब्राह्मण ये कहना चाहते नहीं शास्त्र में शंका इस बात की है कि यदि रावण को माना गया ब्राह्मण तो विदुर जी को क्यों नहीं माना गया अच्छा इसमें एक बात और है कि जिस तरीके से आप यह देख रहे हैं

00:57:41:15 रावण का विवाह हुआ राक्षसी के साथ है ना हेलो जी राक्षसी कौन सा वर्ण है? राक्षस एक अलग वर्ण है। ऐसा पढ़े थे कहीं। राक्षस वर्ण है मतलब हर एक जो होता है ना इसके नीचे जाएंगे तो राक्षस योनि है राक्षस वर्ण नहीं है

00:58:13:01 राक्षस योनि है हां वो तो है तो फिर इस तरह ब्राह्मण क्षत्रिय योनि भी है उसको वर्ण कैसे नहीं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य योनि नहीं है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य वर्ण है योनि मनुष्य है तो फिर इसमें लिखा हुआ है ना छंद उपनिषद पांच 10 सात में तो योनि वर्णन है ब्राह्मण योनि क्षत्रिय योनि इसमें वो तो वो तो वहां लोक व्यवहार की दृष्टि से कहा कह दिया गया उसको योनि मगर जब उसमें उसकी उस पर जाएंगे कि इसको किस रूप में लेना है योनि को तब तो वहां पर योनि तो मनुष्य हो गई भाई एक मनुष्य योनि है उससे उत्पन्न है। अब उसके अंतर्गत वो मनुष्य होते हुए ब्राह्मण योनि है तो उससे उत्पन्न है। ब्राह्मण योनि नहीं है। ब्राह्मण वर्ण का नाम है। योनि का नाम मनुष्य है। परंतु क्योंकि वो मनुष्य होते हुए ब्राह्मण योनि में उत्पन्न हुआ तो उसमें ब्राह्मण का एडजेक्टिव दे दिया गया है। वहां विशेषण दे दिया गया है। आप ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को योनि ना माने। वह वहां पर एडजेक्टिव के रूप में है कि भाई मनुष्य

00:59:28:02 होते हुए वह किस माता-पिता के गर्भ से जन्म लेगा तो ब्राह्मण योनि वहां कह दिया गया या चांडाल योनि वहां कह दिया गया डायरेक्ट मगर इसका मतलब ये थोड़ी ना है कि वो योनि का नाम है योनि का नाम है मनुष्य पशु योनि है अब उसके बाद पशु के बाद वो तो बाघ भी हो सकता है, गाय भी हो सकता है, सात्विक भी हो सकता है।

01:00:03:20 मगर मुख्य रूप से योनि का जो प्रयोग जो वो होता है उपयोग वो इसी में होता है। कि वो मनुष्य है कि पशु है कि राक्षस है कि देवता है। भैया लेकिन ऐसा तो बहुत सारा जगह हम लिखा हुआ है भगवान कृष्ण भी भागवत में बोलते हैं आपको मैं जो बात बता रहा हूं ये परंपरा प्राप्त गुरुओं के द्वारा विवेचना की गई है जो वो बता रहा हूं आपने देखा है शास्त्र में शास्त्र के अर्थ को किस रूप में लेना है ये भी तो देखना पड़ेगा ना जी भैया लेकिन तो वहां पर वहां पर योनि का अर्थ है कि ब्राह्मण माता पिता के गर्भ से जन्म जन्म लेना

01:00:56:07 वहां योनि का अर्थ ये नहीं है। योनि तो उसकी हो ही गई। अगर ब्राह्मण का मतलब ही है कि कोई मनुष्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, चंद्राल इत्यादि की बात हो रही है। हम तो उसकी योनि तो निश्चित हो ही गई कि वो मनुष्य रूप में जन्म ले रहा है। फिर भी वहां ब्राह्मण योनि इसलिए कह दिया गया कि वो इनके गर्भ से जन्म लेगा। ब्राह्मण मां के गर्भ से जन्म लेगा। वहां पर भी तो योनि यूज़ होगा। अंग का नाम भी तो योनि है भैया यहां पर जनरेशन के लिए योनि का बात ब्राह्मण के जनरेशन के लिए ब्राह्मण योनि बट वहां पर योनि का अलग मतलब आता है जैसे पशु हो गया मनुष्य हो गया ये सब पेड़ पौधे हो गए ये सब अलग अलग ये जो राक्षस योनि है ये कौन से वर्ण में आएगी

01:01:43:25 भैया हम इसमें देखे थे ना ये जो साधक संजीवनी है गीता में उसमें हम ये पढ़े थे कि हर सर हर एक का अपना अपना वर्ण पशु पक्षी में भी अपना अपना वर्ण होता है। सब इसको ये वर्ण मानेंगे इसको जैसे कि मैं वही तो आपसे पूछ रहा हूं कि राक्षस योनि में जो जिस माता से रावण के पिता की पिता का विवाह हुआ था उनकी उनका क्या वर्ण था? यह तो स्पष्ट नहीं है ना। उसमें वह तो राक्षस ही था और वर्ण तो फिर आप उसको उसके पीछे आपको पढ़ना ही नहीं चाहिए था। उसको एक दय आदि भौतिक वहां देखना चाहिए। फिर मनुष्य दृष्टि से उसको देखना ही नहीं चाहिए। वैसे भी समझ भैया भैया हम उसको समझ जाएंगे कि ये जो है राक्षस में भी कोई अलग वर्ण की होगी। ब्राह्मण वर्ण की मान लेते हैं। राक्षस में भी ब्राह्मण वर्ण होता है। तो बात ये हो गई कि जब मनुष्य की विवाह मनुष्य से हो ही नहीं रहा है। तो वहां पर तो ये वाला मामला खत्म ही हो गया ना। जो मनुष्य के ऊपर जो नियम लागू है वह वाला वो मनुष्य दृष्टि से देखी जाने वाली घटना है ही नहीं जो वहां पर मनुष्य के नियम लगे

01:02:59:15 जैसे कि वर्ण को लेकर के जो विधि निषेध यहां पर है सेम विधि निषेध जो देवताओं में है वो नहीं है वहां पर भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र है मगर वो नियम नहीं है जो यहां पर है तो फिर तो महाभारत के हिसाब से तो घटोत्कच जो था वो तो राक्षस से जो उत्पन्न है तो उसको क्षत्रिय माना जा हां तो क्षत्रिय पिता से उत्पन्न है तो माना जा सकता है क्षत्रिय क्षत्रिय कुल का लेकिन सब जगह उसे तो केवल राक्षस वर्ण है खाली राक्षस ही लिखा है राक्षस क्यों नहीं बताई गई है ना अगर कहीं वर्ण बताया गया हो विपरीत तो बताइए वर्ण ही तो नहीं बताया तो उसे तो राक्षस ही बोलेंगे तो फिर तो फिर आपको उसे क्षत्रिय मानने में क्या आपत्ति हो रही है?

01:03:55:20 क्योंकि श्रेष्ठतम मनुष्य है। मनुष्य से नीचे सबसे नीचे जो आता है मतलब एक क्या बोलते हैं? पद के हिसाब से अगर नीचे जाएगा तो शूद्र आएगा। शूद्र से नीचे जाएगा तो चांडाल उससे नीचे जाएंगे तो राक्षस। उसके नीचे जाएंगे तो पशु पक्षी। इस तरह से एक क्रमावली क्रम है। ऐसा हम कहीं पढ़े थे इसको कि इस तरह से कहां कहां पढ़ी है ये वाली ये तो कहीं तो हम पढ़े थे अभी उसका स्क्रीनशॉट नहीं है लेकिन जो राक्षस योनि है वो ये नीचे जाएगा तो नीचे जाएगा वो ठीक है नीचे जाना परंतु यदि राक्षस ये आप जन्मांतर का भेद बता रहे हैं। यह आप जन्मांतर का भेद बता रहे हैं ना। परंतु यदि वो राक्षस बनके सामने उसी जन्म में उसी समय पर एक ही समय धारा में दोनों लोग खड़े हुए हैं तो वो क्षत्रिय पिता से उत्पन्न ही तो माना जाएगा।

01:04:56:28 अब क्योंकि उसके अंदर जो लक्षण है वह राक्षस वाले ही ज्यादा परिलक्षित हो रहे हैं। ज्यादा वो राक्षस से ही दिख रहा है। इसलिए लोकाचार में उसे राक्षस ही कहा गया। इतनी सी बात है। परंतु अपना धर्म होता है। परंतु उसका वर्ण भी ऐसा नहीं बताया गया कि वो जो है वर्ण से क्षत्रिय नहीं है या ये नहीं है या वो नहीं है। क्षत्रिय क्षत्रिय जो है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ये इसी पर्टिकुलर योनि के अंतर्गत आने वाले भेद हैं। और मनुष्य राक्षस पशु यह जीव के द्वारा अमुक अमुक योनि में उत्पन्न होने वाले भेद है। जैसे दूध की तुलना

01:05:52:14 गाय के दूध की तुलना भैंस के दूध से हो सकती है। भैंस के दूध की तुलना बकरी के दूध से हो सकती है कि इनमें कितने गुण है। इनमें कितना गुण है। इनमें कितना गुण है। मगर दूध से बनने वाले प्रोडक्ट से ही दूध की तुलना नहीं होती है। दूध की तुलना पनीर से नहीं होगी। पनीर का उपयोग परवसान अलग चीज अलग चीजों में है। तो इसी प्रकार से मनुष्य और राक्षस की तुलना हो रही है। मनुष्य और देवताओं की तुलना होगी। राक्षस और देवताओं की तुलना होगी। परंतु ऐसा नहीं होगा कि मनुष्य की तुलना ब्राह्मण से हो जाए।

01:06:35:08 उसी प्रकार से यहां पर आप जो कह रहे हैं ना कि वो राक्षस था तो उसका वर्ण अलग था तो राक्षस होना एक योनि ही अलग हो गई। इसका अर्थ क्या हुआ कि वो जो मनुष्य वाला विवाह है ही नहीं। मनुष्य दृष्टि से देखा जाने वाला विवाह है ही नहीं। वो भैया। लेकिन स्कंद पुराण में जो रावण का वर्णन आता है कि उनसे जो प्रश्न पूछा गया था कि यह तो राक्षस था तो फिर राम जी को ब्रह्म हत्या का दोष कैसा लगा है ना तो फिर उसप जो जो ऋषि है वो बताते हैं कि वो ब्रह ब्रह्म के अंश से उत्पन्न हुआ था ब्राह्मण के अंश से इसलिए उसका वध करने से वो राम जी को ब्रह्म हत्या का दोष लगा जैसे कि वृतरासुर को इंद्र जब मारा था तो वो भी ब्रह्म अंश से उत्पन्न था इसलिए उसको भी ब्रह्म हत्या का दोष लगा लेकिन लेकिन वो उत्पन्न हुआ था ब्रह्म अंश से लेकिन उसको ब्राह्मण नहीं बताया गया। उसको राक्षस आपकी गलती है यहां यही आपकी गलती है। यहां पे एक किसी ने बात कही कि वो तो राक्षस था। उसको ब्राह्मण क्यों ब्रह्म हत्या का पाप क्यों लगा? तो वहां उसकी उस शंका को दूर कर दिया गया। क्योंकि

01:07:50:16 वह ब्राह्मण पिता के उससे उत्पन्न है इसलिए वह ब्राह्मण है। उसकी गलतफहमी को दूर कर दिया गया। जैसे कि आप ही की बात ले लो। आप ही ने कई बार बताया है। यह गलतफहमी युधिष्ठिर को हुई थी कि भैया वो विश्वामित्र जी वहां पर क्यों हुए? तो विश्वा तो युधिष्ठिर ने यदि ये गलतफहमी अपनी प्रकट कर दी। विश्वामित्र जी को लेकर के तो उससे वो प्रमाण थोड़ी ना हो गया। वो तो शंका के रूप में पूछा ही जा रहा है। उसका उसका निदान किया भीष्म जी भीष्म जी ने तो वो शंका के रूप में कहा गया वाक्य है। उसको आप प्रमाण के रूप में क्यों ले रहे हैं कि उसको राक्षस माना जा रहा है। ब्राह्मण ना माने नहीं नहीं वो नहीं वो नहीं इस तरह से अगर विश्वामित्र जी का बात अगर करें तो विश्वामित्र जी का में ये प्रकरण है कि जो बोल रहे हैं हर्ष आप वो विश्वामित्र जी वाला प्रसंग मत छेड़िए आप मैं ये कह रहा हूं कि यह शंका में बोला गया वाक्य है जो आपने स्कंद पुराण का वचन बताया है यह शंका में बोला गया वाक्य है यह ऐसा नहीं है कि रावण तो रावण तो इन इन सिद्धांतों के अनुसार राक्षस है। ब्राह्मण

01:09:06:02 नहीं है। तो ब्राह्मण क्यों कह रहे हैं आप उसे? तो उन्होंने बताया क्योंकि ये ब्राह्मण से उत्पन्न है इसलिए ब्राह्मण भी है। इसलिए ब्रह्मत्या का दोष लगा। जो आपने जो संदर्भ दिया है उसी संदर्भ में आपका उत्तर प्राप्त है। आपको कि ब्राह्मण से उत्पन्न होने के कारण रावण को ब्राह्मण भी माना गया है। राक्षस उसकी योनि थी और ब्राह्मण उसका रक्त था। उसका बीज था जो उसे उसके पिता से प्राप्त हुआ था।

01:09:42:04 मेरा इसमें प्रश्न उठ रहा है लेकिन शायद अभी बात से रिलेटेड है या कोई और है? नहीं यही वर्ण को लेकर के ही जो मेरा जो दिमाग में जितना सारा हम जो पढ़े है ना तो उसको उठा उठा के जो आ रहा है बीच में तो अभी हम यहां पे बोलेंगे तो लंबा चल जाएगा शायद आप सबसे पहले एक सिद्धांत को समझ लीजिए। परंपरा प्राप्त आचार्यों द्वारा बताया गया है कि द्वापर तक यदि अनुलोम विवाह होता है। प्रतिलोम नहीं अनुलोम अनुलोम विवाह होता है तो उससे उत्पन्न संतान को ब्राह्मणत्व क्षत्रियत्व अपने पिता का जो वर्ण है वो प्राप्त हो जाता है। पहली बात यह परंपरा प्राप्त सिद्धांत है। इसके समर्थन में काफी सारी बातें अभी हो गई है। कुछ और भी चीजें हैं जो लिखित में है वह हम आपको भेज देंगे। दूसरी बात यह है कि रावण के पिता का विवाह एक राक्षसी से होने को आप मनुष्य दृष्टि से ना देखें क्योंकि वह दो अलग-अलग योनियों में होने वाला विवाह है। जैसे किसी देवता से विवाह हो जाए किसी मनुष्य का देवता। अब उसको आप मनुष्य कृत ढंग से देखेंगे क्या? चलिए वो तो हम समझ गए। यह तो हम समझ गए कि अगर वो मनुष्य में नहीं वर्ण में नहीं

01:10:57:06 आता तो हम उसको अलग तरीका से देख लेंगे तो उसमें वर्ण जो अप्लाई होगा वो मनुष्य के हिसाब से वर्ण अप्लाई होगा जैसे रावण ब्राह्मण है ऋषि के पुत्र था उसको ब्राह्मण बोल इसी तरीके से कक्ष को भी इसी तरीके से घटोत्कक्ष को भी आप क्षत्रिय पिता से उत्पन्न होने के कारण क्षत्रिय के रूप में ही देखें। हां उसकी योनि उसे माता की वजह से राक्षस की प्राप्त हो गई। ठीक है? अच्छा पर भैया ये जो विवाह ये विवाह भी दय है। यह विवाह भी दय है। घटोत्कक्ष के साथ जो इनका है भीम का। ठीक है? साधारण दृष्टि से देखा जाने योग्य नहीं है। अब जैसे कई बार लोग द्रोपदी पर कहते हैं उनके पांच पति द्रोपदी अयोनिस्ट थी।

01:11:52:24 अयोनिस्ट थी ना तो उनप से वैसे ही नियम लागू नहीं होंगे जैसे मनुष्यों पे होते हैं लागू। मैंने अभी कहा ना कि देवताओं के यहां भी नियम है पर वो हमसे अलग है। ठीक है। जी वो तो हम इसको हम इस तरह से हम समझ लेंगे। लेकिन क्या बोलते हैं? यह जो राक्षस में वर्ण होता है, पशु पक्षी में भी वर्ण होता है, पौधों में भी पेड़ पौधों में भी वर्ण होता है। इसका कोई है मतलब शास्त्र में इसका कोई वर्णन होगा कहीं ना कहीं वो तो हम जानते कि उसमें

01:12:33:10 उपनिषदों में है। अगर उसका कोई रेफरेंस मिल जाता ना तो हम मतलब रेफरेंस भेज दूंगा। जी भैया तब मेरा हो जाएगा। तब हम वो लोग हम भड़ पाएंगे नहीं तो वो लोग बहुत अनर्ग प्रलाप करता रहता है। किसी व्यक्ति से प्रभावित मत होइए आप। भैया भक्ति का बल बढ़ाइए। भक्ति का बल बढ़ाइए जिससे कि मन व्यथित ना हो, विचलित ना हो, परेशान आप ना हो। किसी के भी उससे कर्म अवश्य करें। कर्म अवश्य करें। परंतु

01:13:21:13 आप रुक जाइए। मैं आपको बता रहा हूं प्रमाण। उपनिषद में चौथे अध्याय में दिया गया है। दूसरा तैत उपनिषद में दिया गया है। जैसे मनुष्य में ब्राह्मण है वैसे ही पशुओं में अज छाग है। जैसे मनुष्यों में क्षत्रिय है वैसे ही पशुओं में मेढ़ा है। जैसे मनुष्यों में वैश्य है वैसे ही पशुओं में गाय है। जैसे मनुष्यों में शूद्र है वैसे ही पशुओं में घोड़ा है। ठीक है? यह किस में दिया है? तैत्री उपनिषद अग्नि पुराण में क्या गाय गाय को तो ब्राह्मण वर्ण में माना गया है। उसमें लिखा कहां लिखा है? साधक संजीव विधि में लिखा हुआ था। लड़की है। वैसे एक मिनट बताएंगे कहां पर लिखा है ये? याद है आपको?

01:14:30:21 आपका आवाज नहीं आ रहा। साधक संजीवनी में कहां पर लिखा है? याद है आपको? चतुर वर्ण नया सिस्टम वाला उसी में एक मिनट चार 13 आपका मुख्य विषय क्या था कि रावण को लेकर के जानकारी का अभाव कि उनके पिता जो है अगर ब्राह्मण थे और आपके प्रश्न में ही आपके प्रश्न का उत्तर है। रावण को राक्षस भी कहा गया है और ब्राह्मण भी कहा गया है। तो क्योंकि वह राक्षस योनि उसको प्राप्त हुई थी माता के कारण तो वो राक्षस हुआ और क्योंकि वो ब्राह्मण पिता से उत्पन्न था तो ब्राह्मण हुआ। सर उनको ज्ञान एक मिनट उसको केवल ब्राह्मण या केवल राक्षस तो नहीं कहा गया है। उसको ब्राह्मण और राक्षस दोनों कहा गया। हां यदि उसको केवल ब्राह्मण कहा गया होता तो यह कहते हम कि उसकी वो राक्षस वाली जो चीज थी वह कैसे गण कर दी गई या उसको केवल राक्षस कहा गया होता तो हम कहते वहां ये नियम लागू क्यों नहीं हुआ

01:15:45:22 उसको ब्राह्मण क्यों नहीं वहां पे वहां वहीं पे क्योंकि योनि के अनुसार वो राक्षस है तो उसको राक्षस कहा गया वर्ण के अनुसार वो ब्राह्मण है तो ब्राह्मण कहा गया ये आपका मूल प्रश्न था अभी की रामायण में भैया वाल्मीकि रामायण में उसको कहां-कहां पे ब्राह्मण जिक्र है तो हम ये दिखा पाए रखेंगे ना इसका प्रमाण कई जगह होगा कई जगह होगा अध्ययन करिए मिल जाएगा नहीं आपको पता होगा इसलिए पूछ लिए उसमें होगा कहीं ना कहीं तो आपको याद हो एक नहीं है तो

01:16:27:15 एक जगह भी अगर ब्राह्मण दिख वाल्मीकि रामायण में तब तो नया प्रमाण इसमें स्पष्ट हो जाता है कि स्मृति का जो प्रमाण है वो त्रेता पे अप्लाई नहीं होता है। स्कंद पुराण में ही आपका उत्तर मिल गया। हालांकि रामायण में मिल जाएगा। स्कंद पुराण में मिल तो गया क्योंकि वो ब्राह्मण से उत्पन्न है इसलिए ब्राह्मण है। ब्रह्म राक्षस का उपाधि है वहां पर तो ना ब्रह्म राक्षस अलग हो गया। ब्रह्म राक्षस का अर्थ ब्रह्म ब्राह्मण और राक्षस नहीं है। ब्रह्म राक्षस का अर्थ वहां पर जो दय उसके द्वारा बनाया गया बना हुआ राक्षस है। श्राप इत्यादि के द्वारा

01:17:12:07 चार 13 में पक्षियों में कबूतर आदि ब्राह्मण बाज आदि क्षत्रिय चील आदि वैश्य और कौवा आदि शूद्र पक्षी है। इसी प्रकार वृक्षों में आदि ब्राह्मण, नीम, पीपल आदि ब्राह्मण ये हैं। हम और यहां पे गाय के बारे में तो नहीं लिखा है।

01:17:51:25 नहीं पढ़े थे उसमें था शायद। नहीं शायद नहीं यहां पर आ गया हूं मैं उस पैराग्राफ पर यहां देखिए चातुर्व्यम पद प्राणी मात्र का उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकार के नहीं होते अपितु पशु पक्षी वृक्ष आदि भी चार प्रकार के होते हैं। जैसे पक्षियों में कबूतर आदि ब्राह्मण बाज आदि क्षत्रिय चील आदि वैश्य कौवा आदि शूद्र पक्षी है। इसी प्रकार वृक्षों में पीपल आदि ब्राह्मण, नीम आदि क्षत्रिय, इमली आदि वैश्य और बबूल आदि शूद्र वृक्ष हैं। परंतु यहां चातुर्व्यम पद से मनुष्यों को ही लेना चाहिए। तो इसमें अब गाय की बात तो हुई नहीं कहीं। पशुओं की बात ही नहीं की है इन्होंने।

01:18:44:24 और आप हमको बार-बार कह रहे हैं कि साधक संजीवनी में जो है राम सुखदास जी ने गाय को ब्राह्मण कह दिया है और उसकी वजह से कम से कम हमारे 15 मिनट 20 मिनट तो एक्स्ट्रा गए हैं। अब आप हमें बताएं कि गाय कहां कहां है? हो सकता है गलती हो गया। यह आपका मनोनीत भ्रम है क्योंकि आपने गाय को ब्राह्मण के रूप में देखा होगा इसलिए आपने सोच लिया कि साधक संजीवनी में गाय को ब्राह्मण लिख दिया है राम सुखदास जी ने हां हां भैया ऐसा ही होगा और हमसे भी दोष करवा रहे हो हमें हमें वहां पर जो है राम सुखदास जी के लिए कहना पड़ रहा है कि वह हमारे लिए प्रमाण नहीं है नहीं नहीं ऐसा तो आपने कहा ही नहीं हां ऐसा बोले ही नहीं क्योंकि आप तो सभी प्रमाणिक आचार्य का मानते ही

01:19:50:00 कहीं तो हम इसको पढ़े थे ऐसा इसी वो आपका भ्रम है मनोनीत भ्रम है आपका क्योंकि आपका पहले से एक वो है कि गाय को ब्राह्मण के क्योंकि गाय सर्वश्रेष्ठ पशु है तब सर्वाधिक महत्वपूर्ण है सनातन धर्म के लिए तो उसी दृष्टि के कोण से आपने उसे ब्राह्मण माना हो। ठीक है। चलिए ठीक है। फिर आज की हम पूरी करें। हो गया काफी किरण जी आप बताएं।

01:20:26:16 ये शिवा जी जो आप कहते हो ना कि मतलब जन्म से नॉमिनेशन और करण से सिलेक्शन। तो आप ये कहते हो कि व्यवस्था होगा तो फिर पैरामीटर्स क्या होंगे कर्म के कि हम सिलेक्ट कर सके तो ये बात तो जनना पर भी लागू होता है कि सोचे हमने जन्म से नॉमिनेट कर लिया फिर कर्म कैसे चेक करेंगे क्या पैरामीटर कर्म से कैसे चेक करेंगे मतलब सोचिए किसी को आपने नॉमिनेट कर लिया कि हां यह ब्राह्मण तो फिर उसके बाद कैसे पैराटर्स मतलब कर्म के पैरामीटर्स कैसे मतलब कैसे चेक करेंगे कि ये तो चलो ब्राह्मण है अब इसके गुण कर्म कैसे चेक करेंगे वो जो काम कर रहे हो उसके ब्राह्मण का जीवन जी रहा है कि नहीं जी रहा है

01:21:19:13 ब्राह्मण का जीवन तो ऐसा कोई नियम है शास्त्रों में जहां पर कहा गया हो मतलब फिर तो सभी के अपने अपने मत अनुसार होगा ना नहीं शास्त्रों में भर भर के नियम है जब जब आप ब्राह्मण को लेने जाए तो ये ये चेक करें। ऐसा ऐसा चेक करें। उसके इतनी पीढ़ियों का चेक करें। उसके ये ये कर्म देखें। ये सब शास्त्रों में वर्णित है। उसके कुछ प्रमाण होते तो मतलब मनुस्मति में दिया गया है। मनुस्मृति में दिया गया है।

01:21:53:20 कौन सा अध्याय और श्लोक बता? मैं आपको लिखित में भिजवा दूंगा। ठीक है। वर्ण व्यवस्था वाला चैप्टर आएगा तो उसमें आएगा। अभी कोर्स चलेगा उसमें है। ये अभी मेरे पास स्टार्ट होगा धार्मिक क्लासेस। हां बस कुछ हफ्तों में ही स्टार्ट हो जाएगी। ठीक है। पर ऐसा है कि हमको कर्म तो चेक करने हैं मगर किसके करें? किसके करें? इस इसके लिए इसके लिए जन्म है। उसके बाद कर्म चेक करके उसको हम स्वीकार करेंगे कि ब्राह्मण हमारे योग्य है। ठीक है। तो कर्म चेक करने के ऊपर निर्भर है। हां। हां। मतलब योग्यता कर्म के ऊपर है। हां। योग्यता कर्म के ऊपर। अच्छा। ठीक है। ठीक है। ठीक है।

01:22:58:02 उपनिषद में है ना उसका प्रमाण चौथे अध्याय में जो आप बोल रहे थे अभी उपनिषद उपनिषद का अध्याय उसका मतलब एग्जैक्ट हो जाएगा। देखना पड़ेगा। ठीक है भैया हम खोज लेंगे तब तक कोशिश करिएगा नहीं तो फिर बताइएगा तो देख के कर लीजिए भैया जी भैया अग्नि पुराण में भी है अग्नि पुराण में भी है अग्नि पुराण में कहां पर है वृक्ष आयुर्वेद प्रकरण है कहीं पर वहां पर है ठीक है जो लकड़ी हल्की नरम और सुविधा से घड़ा जा सकती हो वह ब्राह्मण जो हल्की मजबूत और गढ़ने में दुष्कर हो वह क्षत्रिय जाति जो नरम और भारी हो वह वैश्य जाति और जो मजबूत और भारी हो वह शूद्र जाति अब देख लो इसमें पैरामीटर बदल गए और

01:24:13:10 इसमें यह भी है कि जो मजबूत भूत और भारी योग। अब सबसे ज्यादा उपयोगी लकड़ी कौन सी हो गई? शूद्र। तो लकड़ियों में सर्वश्रेष्ठ क्या हो गई मनुष्यों के लिए? शूद्र। हो गई ना? ऐसे ही देखो गाय को वैश्य कहा गया। तो वहां पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कौन सा वर्ण हो गया हमारे? हमारे लिए पशुओं में शूद्र व वैश्य

01:24:45:03 है ना? जी जी भैया ये तो मेरे को पता चल गया उसमें राक्षस का भी वर्णन है क्या देवताओं का है देवताओं में ब्रदारक उपनिषद चौथे अध्याय में दिया गया है देवताओं की वर्ण व्यवस्था ये देवताओं का तो वो लोग बोलते हैं कि वो लोग कर जब देवताओं का है तो राक्षसों का भी होगा जाहिर सी बात है। ठीक है? हम उसको देख और प्रश्न का सबसे बड़ा उत्तर तो यही है कि

01:25:26:09 यह प्रमाण तो आपको मिल ही जाएंगे कि श्री राम जी को ब्रह्म हत्या का दोष लगा तो उन्होंने वापस आकर के शिवलिंग बना के पूजा की। पाताल पद्म पुराण में है ना यह बात। ठीक है? तो रावण को ब्राह्मण भी माना गया और राक्षस भी माना गया। तो इससे ही पता चल रहा है कि ब्राह्मण और राक्षस दोनों अलग-अलग चीजें हैं। ब्राह्मण और ब्राह्मण होने के कारण उसका राक्षस होना गौ नहीं हुआ। राक्षस होने के कारण उसका ब्राह्मण होना गौ नहीं हुआ। जबकि ब्राह्मण और क्षत्रिय में क्या होगा? यदि ब्राह्मण माना जाएगा तो क्षत्रिय होना गौ हो जाएगा।

01:26:14:26 है ना जी या तो वर्ण शंकर ही हो जाएगा मगर फिर ब्राह्मण भी नहीं कहा जाएगा यदि ब्राह्मण मान लिया तो क्षत्रिय होना गौण हो जाएगा पूर्णतया गायब हो जाएगा मगर वहां नहीं हुआ रावण के केस में ऐसा वहां क्षत्रिय वो वहां ब्राह्मण होने पर ऐसा नहीं कहा गया कि वो राक्षस नहीं है या राक्षस होने पर ऐसा नहीं कहा गया कि वो ब्राह्मण नहीं है। इसी से पता चलता है कि दोनों अलग-अलग चीजें हैं। जैसे मैं मैं मनुष्य हूं और मैं ब्राह्मण भी हूं। ठीक है? तो मनुष्य मेरी योनि हो गई और ब्राह्मण मेरा वर्ण हो गया।

01:27:00:02 इसी तरीके से ब्राह्मण इसी तरीके से रावण राक्षस भी था और ब्राह्मण भी था। ब्राह्मण भी था। हम तब तो समझ आ गया। बस आप विदुर जी का एक बार प्रकरण देख लीजिएगा और उसमें पता है एक तो डाउट मेरे को ये हो गया था कि वो ब्राह्मण नहीं जो पारस उसमें लिखा हुआ है विदुर जी के लिए वो ब्राह्मण भी नहीं क्षत्रिय भी नहीं वैश्य भी नहीं ठीक है द्वजाती तो नहीं रहे तब वो जब द्वजाती नहीं रहे तब भी उनका वेद इनके बारे में लिखा आपको मैं बता दूं इनमें ज्यादातर जो घटनाएं घटनाक्रम है वह ज्यादातर तो वैसे हैं अलौकिक

01:27:39:22 उनको मनगत रूप से देखना ही नहीं चाहिए। चलिए आज के लिए हो गया मेरे ख्याल से एक घंटा 51 मिनट भी हो गया। जय घोष कर जी बोलिए जयघोष कर लीजिए हो जाएगा चलिए श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम श्री राम जय राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम राम जय जय राम धर्म की जय जय हो जय हो अधर्म का नाश हो नाश हो

01:28:34:07 प्राणियों में सद्भावना विश्व का कल्याण हो कल्याण हो गौ माता की जय हो जय हो गौ हत्या बंद हो बंद हो बंद भारत अखंड हो भारत अखंड हो हर हिंदू सेना

⬜ Not used yet · 01:28:56:16 – 01:29:13:00 (0:16)

01:28:56:16 हर हिंदू सनातन अखंड हिंदू राष्ट्र भारतवर्ष की जय हो नमः पार्वती पतय हर हर महादेव

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Video 1:29:15 · 23 Jul 2025

आह्वान कक्षाएं : प्रश्नोत्तरी सत्र Part-4

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