⬜ Not used yet · 00:00:02:21 – 00:24:02:00 (23:59)
00:00:02:21 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और धरातल पर कार्यों की अधिकता होने के कारण आपके समक्ष यथावत जिस तरह से पूर्व में YouTube चैनल के माध्यम से इनेटिव वीडियोस हम प्रदान कर रहे थे। उसमें थोड़ी सी रुकावट आई धरातल पर ज्यादा एक्टिव होने के कारण। परंतु जो भी हम कर रहे हैं यहां समय ना देकर के जो धरातल पर समय अधिक दे रहे हैं। धरातल पर पहले भी समय देते थे पर इस समय बहुत ज्यादा दे रहे हैं। तो उसका जो अभी जो ऐसा परिवर्तन किया तो उसके द्वारा मिलने वाले जो परिणाम है जो फल हैं वो आपको आपके लिए अत्यंत लाभदायक होंगे। आपको जब प्राप्त होंगे वो फल जब आपको सूचनाएं प्राप्त होंगी तो आपको अत्यंत हर्ष होगा।
00:01:06:26 तो सबसे पहले आ जाते हैं आज के बुलेट पॉइंट्स पर बिना विलंब के। हम तो हमने पिछले अध्याय में पिछले एपिसोड में जो चौथा अध्याय है उसके कुछ 15 श्लोकों की विवेचना कर ली थी। उसमें रामपाल ने अपनी गरिमा गीता की पृष्ठ संख्या 94 हम उसमें रामपाल ने माना है रामपाल की गरिमा गीता की खोल लीजिए रामपाल के द्वारा लिखी गई या जो भी है पता नहीं किसने लिखा है
00:02:03:18 प्रश्न संख्या 94 तो इसमें रामपाल ने सर्वप्रथम गीता जी के अध्याय चार से चार के श्लोक एक से तीन में इसने माना है कि गीता कहने वाला अर्जुन को बोल रहा है कि तू मेरा प्रिय मित्र है। अब यदि गीता बोलने वाला गीता बोलने वाले भगवान श्री कृष्ण नहीं है। कोई और एंटिटी इनके द्वारा बनाई गई जो तथाकथित इनका जो काल है वह है जो कि ब्रह्मा विष्णु महेश नहीं है, जो कृष्ण नहीं है, जो राम नहीं है, जो ईश्वर भी नहीं है, जो एक राक्षस है। तो यदि इस राक्षस यह राक्षस अर्जुन को अपना प्रिय मित्र बता रहा है। क्यों बता रहा है? भगवान श्री कृष्ण की और अर्जुन की मित्रता प्रासंगिक है। हम सब लोग जानते हैं। जग जाहिर है। परंतु ये अर्जुन को अपना प्रिय मित्र क्यों बोल रहा है? कब हुई? इनकी मित्रता कैसे हुई? इस बारे में कोई विवेचना नहीं है। कोई शास्त्र नहीं है। कुछ नहीं है। क्योंकि
00:03:18:21 वास्तविकता क्या है कि भगवान श्री कृष्ण ने ही गीता का ज्ञान दिया है। उसके बाद इसने इसमें शब्दों की चोरी भी बहुत सारी की है। हम बहुत सारी इस में चोरी की है। तो आप उसको देख सकते हैं जाकर के। कहा जो इसका जिस एपिसोड के हम बुलेट पॉइंट्स आज बता रहे हैं उस एपिसोड को आप देख लेंगे तो कई ऐसे शब्द बोले जो है ही नहीं। जैसे फॉर एग्जांपल मैं दे देता हूं। जैसे आगे अगले पैरा अगले दूसरे पैराग्राफ में ये कह रहा है कि चार के श्लोक पांच से नौ तक गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अर्जुन तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। इन सबको तू नहीं जानता मैं जानता हूं। इसके बाद इसने कहा कि मैं मनुष्यों की तरफ तरह जन्म ना लेने वाला अविनाशी आत्मा होते हुए भी यह मनुष्यों की तरह ये क्या है? अच्छा सर्व के बाद इसने कोष्टक में लिखा है 21 ब्रह्मांड।
00:04:21:25 ये दिखाइए जरा ये वाला। सर्व का अर्थ 21 ब्रह्मांड कैसे हुआ? सर्व प्राणियों का स्वामी होते हुए भी ये कौन से हिसाब से स्वामी है? सर्व प्राणियों का हम किस हिसाब से स्वामी है ये तो एक चोर टाइप का व्यक्ति है ना स्वामी तो कोई और है 21 ब्रह्मांडों के लोगों का भी ये स्वामी नहीं है स्वामी तो कोई और है कबीर है रामपाल के हिसाब से ये किस हिसाब से स्वामी हुआ ये तो चोरी डकैती करने आया हुआ व्यक्ति है इसको आप स्वामी बोल रहे मूर्खता की पराकाष्ठा हर पन्ने पर मिलती रहेगी तो इस तरह से इसने जो बहुत सारे शब्दों का हेरफेर किया है। जो है ही नहीं वो शब्द बोले हैं। है ना? जैसे मैं इसी पैराग्राफ में देखिए अंतिम लाइन में उन्हीं में से अंश अवतार रूप में श्री कृष्ण राम श्री परशुराम आदि सजामि रचता हूं। अंश अवतार कहां लिखा है इसमें? उसमें तो लिखा है मैं अपना सजाम में हम। मैं अपना सृजन करता हूं। उसमें यही कहना पड़ेगा अपने रूप का सृजन करता हूं। परंतु इसमें कहां लिखा है कि अंश अवतार का सजन करता हूं और उनमें गुप्त रूप से प्रकट होता हूं।
00:05:36:28 ये कहां लिखा है? इसकी संस्कृत कहां है? जेल वाले बाबा जी वाले बाबा मेरा गाना बजा दो। गाना बजा दो। ये रामपाल के जो फॉलोअर्स हैं वहां जाकर कहते होंगे जेल वाले बाबा मेरा गाना बजा दो। गाना बजा दो। वह गाना बजाता होगा। जेलर कहता होगा जेल वाले बाबा इसका गाना बजा दे कौन सा जनता कह रही है। बाकी फिर प्रशासन कहेगा बाकी पूरी कर दूंगा मैं। वही कसर जो रह रही है। हां नहीं वो शिवश कहेगा जेल वाले बाबा गाना बजा दो। कौन सा जनता कह रही है बाकी पूरी कर दूंगा मैं कोई कसर जो रह रही है हम
00:06:32:26 खैर आगे चलते हैं तो क्या है कि काल ब्रह्म जो मुझे अब इसमें क्या है सा अच्छा हां दो चीजें हमें माननी पड़ेगी 95वें पृष्ठ पर इसने मतलब गीता इस इस पृष्ठ के अंत से जो है इसने कहा है कि यह जो अवतार होता है साधुओं की रक्षा के लिए और असाधुओं के संहार के लिए होता है। ठीक है? जबकि यही अपने लेक्चर्स में यही लोग ढिंढोरा पीटते हैं कि जो लोग मर रहे हैं वह काल की वजह से मर रहे हैं और शास्त्र विरुद्ध भक्ति की वजह से इनके अनुसार जो शास्त्र विरुद्ध भक्ति है उसकी वजह से मर रहे हैं। तो पहले तय कर ले कि वो शास्त्र विरुद्ध जो लोग हैं जिनको धर्म और अधर्म का बोध नहीं है वह साधु है कि असाधु है धर्मी है कि अधर्मी है तो इनके अनुसार काल जो है खुद ही एक तरफ कहते हैं कि काल जो है वह आता है किस लिए लोगों को खाने के लिए लोगों को परेशान करने के लिए झूठ बोलने के लिए भ्रम में डालने के लिए इन सारे बुरे
00:07:48:00 कारणों की वजह से काल है और यहां पर क्या आ रहा है चार सार्थ के अर्थ में खुद ही कह रहा है कि वह अवतार जो होते हैं वह साधुओं की रक्षा और असाधुओं का संहार करने के लिए होते हैं। ठीक है? तो इसके अलावा धर्म स्थापना तो चार सात चार आठ चार छ इन सब श्लोकों को अमान्य मानना पड़ेगा। अगर तुम यह मानते हो कि काल अपना उल्लू सीधा करता है या उसकी भक्ति घटिया है या ये है वो है जो पंचौरा अपना छाप रखा है। ठीक है? जो बकवास कर रखी है तो इन श्लोकों को भी अमान्य मानना पड़ेगा। कौन-कौन से हैं? चार, छ, सात, आठ ये सब अमान्य मानने पड़े। चार, तीन भी अमान्य मानना पड़ेगा जिसमें कि ये कहा है कि अर्जुन तू मेरा मित्र है इसलिए तुझे बता रहा हूं। इसने कहा नहीं है कि गलत श्लोक है। क्यों भाई? अर्जुन काल का मित्र था क्या? हां?
00:08:44:28 कब हुई मित्रता? चलिए आगे चलते हैं। अब प्रश्न संख्या 95 पर आ जाते हैं। क्या हुआ है? इसमें इसने माना है कि काल अच्छा जो मुझे तत्व से जान लेता है जो मुझे तत्व से जान लेता है वह पुनः जीवन मरण को प्राप्त नहीं होता। यह भगवत गीता में कहा गया है। जो भगवत गीता के श्लोक का अर्थ है। परंतु इसने क्या लिखा है? जो मुझे तत्व से जान लेता है उस पूर्ण ज्ञानी का पुनर्जन्म नहीं होता। तो जब काल को तत्व से जान लेना ही पूर्ण ज्ञान है तो फिर काल से अलग किसी और का ज्ञान क्यों लेने जाए? क्योंकि इसने यही कहा ना कि जो मुझ काल को तत्व से जान लेता है उस पूर्ण ज्ञानी का यानी काल को तत्व से जान लेने वाला पूर्ण ज्ञानी हो गया। पुनर्जन्म नहीं होता। ठीक है? और जो तत्व से नहीं जानता है वह मेरे जाल में फंसा रह जाता है।
00:09:52:14 जो इस प्रकार तत्व से मुझे नहीं जानता है वो मेरे जान जाल में फंसा रहता फंसा रह जाता है। तो यानी कि गीता बोलने वाला ही यह कह रहा है यहां पर इसके हिसाब से भी कि जो उसको जान लेगा वो पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। और ये बात भगवान ने और भी कई जगह पर कही है कि वो ऐसा ज्ञान है जिसके बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाएगा। मेरे बारे में अपने बारे में ये बात कही है। आगे के चैप्टर्स में आएगा। तो जब भगवान ने कह दिया कि मुझे ही जानना तत्व ज्ञान है और मुझे जान लेने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता है। इसके हिसाब से काल ने कहा हमारे हिसाब से भगवान ने कहा। तो फिर क्यों जाए कबीर को जानने? जब यहां पर पूर्ण ज्ञान हो गया व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी हो गया जान के वो किसी भी रूप में जाने तुम्हारे हिसाब से बुरे रूप में जाने हमारे हिसाब से अच्छे रूप में जाने मगर यहां पर जान करके तुमने भी मान लिया कि वो पूर्ण ज्ञानी हो गया पूर्ण ज्ञानी हो गया जिसने काल को तत्व से जान लिया तो कबीर को क्यों जाने सूक्ष्म वेद क्यों पड़े हो गया खत्म यही पर हो गया इनका चैप्टर क्लोज ठीक है आगे चलते है इसके आगे इसने क्या बेवकूफी की जेल वाले बाबा ने गाना बजाया है तो क्या बजाया है? काल ब्रह्म अच्छी
00:11:07:22 आत्माओं को रचता है अर्थात पैदा करता है। अब ये बताओ आत्माओं को क्या कहते हैं? परमेश्वर रचता है क्योंकि इसने दो दूसरे अध्याय के 10व श्लोक में जो बातें की है उसमें यह माना है कि जो कबीर परमेश्वर है इनके हिसाब से वो आत्माओं को उत्पन्न करता है रचता है और यहां क्या कह रहा है कि काल ब्रह्म रचता है तो क्या काल ब्रह्म और कबीर एक ही है परमेश्वर काल ब्रह्म ही है और दूसरी बात यह है कि अच्छी आत्माओं को रचता है इसका अर्थ क्या हुआ कि वो अच्छा अच्छा है यानी कि काल ने अगर यह मानेंगे अगर अगर ये मानेंगे कि काल यहां पे जो है आत्मा जो मनुष्य रूप में जन्म लेती है। हालांकि वो अर्थ निकलेगा नहीं पर मान लेते हैं कि आत्मा जो है मनुष्य रूप में जो जन्म लेती है उसको काल रचता है। मतलब उसके शरीर को काल रचता है। तो फिर ये फिर क्या बुरे शरीर वाले जो मनुष्य है उनको काल नहीं रचता है क्या? तो अच्छी आत्माओं को रचता है। यह क्या है?
00:12:13:06 तो खैर कुल मिला के बात यह है कि आत्माओं को रचने वाला परमेश्वर इसने ही माना है। यद्यपि आत्माओं को रचने वाला कोई है ही नहीं। परंतु इस मूर्ख ने माना है कि आत्माओं को परमेश्वर ने रचा। और यहां पे ये खुद कह रहा है कि आत्माओं को कौन रचता है? काल। ठीक है? और क्या है? आकार में प्रकट नहीं होता है। अब यहां आगे कह रहा है कि यह जो है आकार में प्रकट नहीं होता है। इसका अटल अविनाशी नियम है। क्या नियम है कि अपने आकार में प्रकट नहीं होता है। मतलब दिखाई देने वाला स्वरूप नहीं प्राप्त लेता है। तो फिर खुद ही कह रहा है कि मैं अवतार लेता हूं। मैं आता हूं। मैं ये करता हूं। मैं विष्णु रूप में प्रकट हो जाता हूं। ये वो ये क्या है? हम यानी वह आकार लेता है ना साकार रूप में आकार रूप में प्रकट होता है ना तो ये पूरी माथा पीटते रहो इसके बाद आगे क्या है कि
00:13:26:05 [संगीत] 96 वे पृष्ठ पर इसने एक शब्द लिखा है अगला पृष्ठ है 96 इसमें दूसरी लाइन के अंत में इसने कहा है चार 10 का अर्थ करते समय कहा है कि काल ब्रह्म ने कहा कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं जिसने मुझे यहां 21 ब्रह्मांड के कर्मों का कर्ता अर्थात मालिक हूं ऐसा तत्व से जान लिया है देखिए तत्व से जानने को बार-बार ये सीमित कर रहा है भगवान की असीमितता अलौकिकता जो उन्होंने बताई है कि मेरे मैं तू जानता है मैं नहीं जानता मेरे जन्म कर्म दिव्य होते हैं तो उसको बार-बार ये सीमित कर रहा है कि 21 ब्रह्मांड चलो चलो ठीक है। 21 ब्रह्मांड ठीक है मान लिया। फिर आगे वह मतावलंबी हो चुके हैं। ये शब्द कहां से आ गया? वह मतावलंबी हो चुके हैं। जबकि वहां भगवत गीता में कहा गया है कि वो सिद्ध माना गया उनको जो भगवान को तत्व से जान लेंगे। मगर इसने क्या किया? इसने उसको मतावलंबी कहा है। मतावलंबी का क्या अर्थ है यहां पर लेने का? हम तो यह भी एक हर बात में बोल वचन है भैया हर बात में कहां तक क्या क्या करोगे ठीक है इसको निकाल लेता हूं क्या कहा है जिनके
00:14:41:10 राग द्वेष खत्म हो चुके हैं पहले भी जिनके राग द्वेष भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेम पूर्वक स्थित रहते थे ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं। ठीक है? मतलब सच्चिदानंद वाला जो मोक्ष होता है उसको प्राप्त कर चुके हैं। मगर यहां पर वह मतावलंबी हो चुके हैं। यह क्या है? क्या बकवास है भाई? खैर आगे चलते हैं। इसी में इसने कहा है कि ज्ञानी मुझे अच्छे लगते हैं तथा मैं ज्ञानी को ज्ञानियों को प्रिय हूं। ठीक है? इसको क्या अच्छे लगते हैं? ज्ञानी और यह ज्ञानियों को प्रिय है। और क्योंकि वह तीनों गुणों की भक्ति ना करके मेरी अर्थात ब्रह्म की भक्ति करते हैं। तो जो व्यक्ति ज्ञानी है और जिसको यहां पर क्या कहा जा रहा है? उपयुक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर तपस्वी कहा गया है। ज्ञान तपसा चार दस भगवत गीता चार 10 ज्ञान तपसा ज्ञान तपसा ज्ञान रूप तप से हम और जो
00:15:56:12 पवित्र है तो वो काल की भक्ति कैसे कर रहे हैं भाई? पहली बात तो जो का जो काल की भक्ति करने वाला वह काल की भक्ति करने वाला अज्ञानी वह अज्ञानी है। ज्ञानी कहां से हुआ? और फिर जब वो अज्ञानी है तो वो ज्ञान रूप तप से पवित्र कैसे हुआ? तपस्या से पवित्र कैसे हुआ? तप का तो ये खंडन करता है। इसी में आगे देखेंगे। तो यह भी एक झोल का ढोल में पोल और बहुत सारे यहां पर शब्द छिपए गए हैं बार-बार वो आप उसमें देख लीजिएगा जो पूरा एपिसोड है। इसके बाद इसने यहां पर देखिए देवताओं के लिए जहां शब्द आया देवताओं कि जो अपना लौकिक फल प्राप्त करने के लिए हम देवताओं का पूजन करते हैं। उनको जो देवताओं से मिलने वाली सिद्धि जल्दी प्राप्त हो जाती है। तो यह ब्रह्मा विष्णु महेश जबरदस्ती यहां बात बात में ब्रह्मा विष्णु महेश को डाल रहा है। ठीक है। इसके बाद क्या हुआ कि चार 13 में भगवान ने कहा कि समस्त कर्मों को करते हुए भी संपूर्ण सृष्टि की रचना करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। क्यों? क्योंकि उनकी कर्म फल में आसक्ति नहीं है। केवल लग रहा है कि वो कर्म कर रहे हैं। वास्तविकता
00:17:11:27 में वो कर्म कुछ वो कुछ नहीं कर रहे। सब कुछ करते हुए भी वह कुछ ना करने वाले हैं। इसलिए उनको कर्म बांधते नहीं है। ठीक है? यह चार 13 और 4 से हमें पता चलता है। पर इसने क्या किया? इसने क्या किया? कि इसने इस बारे में बात ही नहीं की है कि काल को जो है अकर्ता मानना है क्योंकि काल तो भाई अपने उल्लू सीधा करता है। काल तो अपने खाने पीने का इंतजाम करता है। तो काल ना ही कर्म फल से अनासक्त है और ना ही वो अकर्ता है। मगर इसने अपनी भगवत गीता का अर्थ करते समय इसने ये बात ही नहीं की। ठीक है? तो इस हिसाब से जो चार 13 है जिसमें गीता कहने वाले को अकर्ता कहा गया है। चार 14 है जिसमें गीता कहने वाले को क्या कहते हैं? कर्म फल से अनासक्त कहा गया है। ये दोनों ही अमान्य मानने पड़ेंगे। नोट करते जाना मैं कर रहा हूं। कितने श्लोक अभी तक अमान्य हो चुके हैं। इसकी थ्योरी के अनुसार है ना जो यह कहता है ना पांच परस ज्ञान गलत है। इसकी बैंड बजेगी कम से कम कुछ नहीं तो 80% श्लोक जो होंगे 70 से 80%
00:18:27:03 वो इसने नहीं माने हैं गीता के और कहने को कह दिया कि 5% ज्ञान गलत है। ठीक है? आगे चलते हैं। इसके लास्ट में इसी पैराग्राफ के लास्ट में इसने क्या बात मान ली है? इसलिए तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर। अब यह बताओ कि इसके पूर्वजों को तत्वदर्शी कौन मिला था? और यह बात कह कौन रहे हैं? यह बात कह कौन रहे हैं? यह बात कह रहे हैं भगवान श्री कृष्ण यानी भगवान श्री कृष्ण तब कह रहे हैं जब तक कबीर नहीं आए हैं। तो कौन तत्वदर्शी मिला था जिसने गीता की व्याख्या या जो भी व्याख्या की थी तात्विक ज्ञान की वेदों की व्याख्या तो वो कौन सा तत्वदर्शी था जिसने ज्ञान दिया था जिसके कारण जो है वो पूर्वज ये लोग दिनभर गाली देते हैं कि पूर्वजों ने गलत भक्ति की और ये वो ये भक्ति हम बता रहे हैं आज कलयुग में आज हम भक्ति बता रहे हैं तब से कोई मुक्ति नहीं हुआ है और कुछ दो चार लोग जो इनकी चपेट में आ गए हैं जेल धाम जाकर के वो मुक्त होते जेल वाले बाबा का गाना सुन के।
00:19:42:24 मगर यहां क्या कह रहा है कि तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर। ये भी मान लिया इसने चार में। तो अब इनका कोई बेवकूफ फॉलोअ आए तो उनके मुंह पे मारना। ये देख तेरे बाबा ने क्या लिखा है। जेल वाले बाबा ने गाना बजाया तेरा। तो अब पहली बात है ज्ञान यज्ञ क्या है? इसके अनुसार ज्ञान यज्ञ है। शास्त्रों का पठनपाठन और शास्त्रों के पठन पाठन से मुक्ति नहीं है। इसने अपने कई पष्ठों में कह दिया है कि पांचों यज्ञों से मुक्ति नहीं है। मुक्ति किसी और चीज से है। और तो और अभी इसने थोड़ी देर पहले ही जो भगवत गीता का ज्ञान यज्ञ कहा गया है जो 25 से 30 के बीच में उनका भी खंडन किया है। उनसे भी मुक्ति नहीं है। तो ज्ञान यज्ञ के ज्ञान को देने वाले को तत्वदर्शी कहा है। तो यदि रामपाल यह वाला तत्वदर्शी 434 का ठीक है? यदि रामपाल 434 का तत्वद है तो मुक्ति देने वाला नहीं है क्योंकि वह ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला है। हां यदि वह नाम देने वाला है तो उसका श्लोक यहां होना चाहिए। उसके बारे में श्लोक यहां होना चाहिए कि वो ये ज्ञान यज्ञ का ज्ञान नहीं ये वाला ज्ञान भी देगा। ये भी देगा ये भी देगा। वो श्लोक होना चाहिए ना प्रमाण। तुम इस श्लोक के आधार पर उसको तत्वदर्शी सिद्ध मत करो।
00:20:58:07 मोक्ष देने वाला सिद्ध मत करो। दूसरी बात यह है कि भगवान ने इसकी बेवकूफी की देखिए सीमाएं क्या है? इसने अपनी भगवत गीता में यह गरमा गीता की का कचरा करते समय और उसमें ये लिखा है कि अर्जुन को मोक्ष भी मिला। मोक्ष कैसे मिल गया? उसको तत्वदर्शी तो मिला नहीं था। अच्छा हम अगर देखें तो अर्जुन को मोक्ष मिला? बिल्कुल मिला। और जो गीता कहने वाला जो है यहां पर भगवान श्री कृष्ण गीता कहने वाले हैं और 216 में विद्या और अविद्या को जानने वाला होने के रूप में वो वहां पर तत्वदर्शी सिद्ध हो रहे हैं। विद्या और अविद्या को जानने वाला तत्वदर्शी है। वहां पर कहा गया है। ठीक है? तो भगवान श्री कृष्ण तत्वदर्शी वहां सिद्ध हो रहे हैं। तो यहां पे भगवान कहना क्या चाह रहे हैं कि तू भैया उसको तत्वदर्शी के पास जाके जान। अच्छा उस समय तत्वदर्शी था कौन? जो कह रहे हैं कि तू ततस के पास जाके जान क्या वो लगभग महाभारत के कितने वर्षों के बाद ये आए हैं कबीर कुछ नहीं तो मेरे ख्याल से दो ढाई हजार वर्ष के बाद तो आए हैं तो क्या दो ढाई हजार वर्ष के लिए कह रहे थे कि अर्जुन तू जब मैं 600 क्या कहते हैं कलयुग में जब ये कबीर आएंगे तो उससे लेना तुम ज्ञान कौन था उस समय तत्वदर्शी जिसके पास जाने को कह रहे हैं। दूसरी
00:22:13:08 बात अर्जुन गया क्या? तीसरी बात भूलक से लिख दिया है रामपाल ने कि अर्जुन को मोक्ष मिला मगर क्या यह मानता है कि अर्जुन को मोक्ष मिला मिला तो उसको ज्ञान किसने दिया ये बहुत सारी बातें यहां पर खड़ी हो जाती है एक कि तत्वदर्शी गीता कहने वाले सिद्ध है दो 16 से दूसरा कि चार 34 के अनुसार रामपाल के शब्दों में अगर कहा जाए तो तत्वदर्शी जो है चार 34 वाला तत्वदर्शी मोक्ष देने वाला नहीं है मोक्ष ज्ञान देने वाला नहीं है बल्कि यज्ञों का ज्ञान देने वाला है अगर वो साथ में नाम भी देता है रामपाल के अनुसार तो वो नाम का नाम लेने जाने वाला श्लोक यहां होना चाहिए कि भैया तू उसको उस नाम को तू तत्व दृष्टि से जाके जान किस नाम को तुझे जपना है मगर यहां ऐसी कोई बात नहीं कही गई तो मोक्ष देने वाला सिद्ध नहीं है तीसरा क्या है कि भगवत गीता चार 35 के अनुसार तत्वदर्शी जो ज्ञान देगा उसके अनुसार आपको क्या प्राप्त होगा कि पहले पूरी दुनिया में पूरी दुनिया स्वयं में दिखने लगेगी और फिर सारे समस्त संसार तुम्हें ईश्वर में दिखने लगेगा। यह ज्ञान प्राप्त होता है तत्व ज्ञान से। तो ये सारी चीजें अप्लाई नहीं होती है और तुम तत्वदर्शी नहीं बन पाते हो। तुम बन पाओगे जेल वाले बाबा।
00:23:29:06 ठीक है? तो ये है लास्ट एपिसोड के बुलेट पॉइंट्स। ठीक है? आप लोग नोट कर लीजिएगा। पूर्वजों की तरह भक्ति करना इसने मान लिया। तो अर्जुन के वह कौन से पूर्वज है जो शास्त्रानुकूल भक्ति करते थे वह बताए रामपाल का कोई नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे का नुमाइंदा अंधेरा कायम रहे बाबा जेल में रहे बाबा का गाना बजता रहे खैर आगे चलते
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रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #7 अध्याय 4 का #श्लोक #gita #gitagyan
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