⬜ Not used yet · 00:00:02:26 – 00:21:52:00 (21:49)
00:00:02:26 तो सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। पुनः प्रारंभ हो चुका है जो पाखंडी के द्वारा गीता का अनर्थ किया गया है। मैं बस एक बात की चेतावनी आप लोगों को देना चाहता हूं कि आप लोग जो अपने दिमाग को पंचर करने का कष्ट सह सकते हैं। वही इस सीरीज को देखें। अन्यथा बूढ़े बच्चे और गर्भवती महिलाएं तो विशेष रूप से दूर रहे क्योंकि बहुत ज्यादा हॉरर और वैसा भी है। इस तरह का जो भयाव ऐसा कष्ट होता है इसने जो शटर घोट की है गीता का अर्थ करते समय तो आप परेशान हो जाएंगे कौन सी गलती पर मैं बात करूं। सबसे पहली बात है कि चार 13 में जो गीता कहने वाला है उसे कहा गया है अकर्ता। समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जा। अब अकर्ता इसलिए कहा जाता है क्योंकि आगे के श्लोकों में बता रहे हैं क्योंकि मेरी कर्म के फल में आसक्ति नहीं होती है। कर्मों में लिप्त नहीं होता मैं। यानी कि क्योंकि उनको कुछ भी पाना शेष नहीं है। कुछ भी ऐसा नहीं है। अगर भगवान श्री कृष्ण के अकॉर्डिंग देखें तो उनको कुछ भी शेष नहीं है कुछ प्राप्त करना। इसलिए कर्मों को करते हुए भी वह अकर्ता है क्योंकि कर्मों के जो फल प्राप्त होने उसमें उनकी बिल्कुल भी
00:01:18:00 रुचि नहीं है। आसक्ति नहीं है। तो यह तो श्री कृष्ण के भगवान के पर्सेक्टिव से तो सिद्ध हो जाता है। पर यदि इनके काल के अनुसार देखें कि समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे करता जान तो उसमें आपको काल को काल को तो पाना है। उसको तो डेली सवा लाख वो जो जीव है उनको हत्या करनी है उनको खाना है उनको पीसना है उनकी दुर्गंध लेनी है जो भी है मैल खाना है उनका तो उसको तो खाना है तो वो अकर्ता नहीं हुआ तो यह चार 13 वाला इन्होंने खा लिया चार 13 वाला बाबा जी ने चार 13 के बारे में बात ही नहीं की जिसमें कि गीता कहने वाले को अकर्ता कहा गया खैर ये इतनी लेवल की बात इनको समझ में आया तब तो उस पर बात करें इतनी गढ़ विषयों पर बात तो तब करेंगे ना जब समझ में आएंगे तो हर जगह एक ही बात ले आएंगे कि भैया तत्व ज्ञान क्या है कि उसका नाम किस प्रभु की भक्ति करनी है किस नाम को जपना है यही तत्व ज्ञान तत्व ज्ञान यही है ये हर जगह बस ये यही ले आएंगे यही इनका तत्व दर्शन है और इनको कुछ नहीं पता चार 13 का अर्थ करते समय इन्होंने जो आसक्ति रहित वाली बात है गायब कर दी अकर्ता वाली बात है वह गायब कर दी गीता वक्ता का अकर्ता होना गायब कर
00:02:33:01 दिया और ठीक से देखा जाए तो 43 पर बात ही नहीं की बहुत ज्यादा चार 24 का इन्होंने शब्द अर्थ नहीं किया क्योंकि शब्दार्थ तो इनके पल्ले पड़ेगा नहीं तो भाव यह है कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। क्योंकि वह तत्व ज्ञानी साधक शास्त्र विधि रहित मनमाना आचरण नहीं करता इसलिए उसके वचन कर्म परमात्मा के गुणगान में करने में तथा सर्व समय प्रभु चिंतन में ही लीन रहता है तो अपना पूरा घपड़ घसला इन्होंने कर दिया जबकि चार 24 में कहा जा रहा है कि
00:03:12:24 जिस यज्ञ में करने वाला भी ब्रह्म है सामग्री भी ब्रह्म है क्रिया भी ब्रह्म है तो ऐसे यज्ञ से फल स्वरूप प्राप्त होने वाला जो फल है वह भी ब्रह्म है। उसमें सब कुछ ब्रह्म ही है। यह बात कही जा रही है। यह इनके आउट ऑफ आउट ऑफ सिलेबस की बात है रामपाल के लिए। तो वो समझ कहां से पाएंगे हमारे तिरछादर्शी जी? तो यह सब बातें कर रहे हैं। अब दूसरी बात अब एक एक बात यह भी है कि यह कह रहे हैं कि जो साधक सर्व कर्म परमात्मा को साक्षी रखकर कर रहा है उसके सर्व कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। सारे कर्म परमात्मा जैसे होते हैं। और यहां पर इसने भैया जो चौथे श्लोक में 23 24 चौथे अध्याय के 23 24 वे में ब्रह्म का अर्थ परमात्मा माना है। जैसे ये ब्रह्म को कहता है वो तो काल ब्रह्म है। मगर यहां पर ब्रह्म का अर्थ इसने परमात्मा मान लिया। तो ये कह रहा है कि वेदों और गीता जी में वर्णित साधना इसने लिखा है। यहां देखिए इससे सिद्ध है कि वेदों व गीता जी में वर्णित साधना से पाप विनाश नहीं होते। भोगने पड़ते हैं। अन्य उपलब्धियां जैसे सिद्धियां व स्वर्ग महा स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है। मतलब पाप नाश नहीं होते। अब पहली बात तो यहां पर फिर वही बात है कि यह सिद्धियां प्राप्त
00:04:27:27 हो जाती है। यानी यह जो भौतिक संसार के जो फल है वह मिल जाते हैं। सांसारिक सुविधाएं आपको मिल जाती हैं। स्वर्ग महास्वर्ग भी मिल जाते हैं। परंतु पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती। अब बात यह आती है कि इन्होंने सूक्ष्म वेद के रूप में उसको भी कहा तो वेद ही है। तो फिर अगर वेद से मुक्ति नहीं मिलती तो फिर सूक्ष्म वेद से भी नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि वेद तो वो भी है। तो ये बाबा जी कुछ अपनी बातों को काउंटर करते चले हैं। खैर अब इन्होंने वेद में इन्होंने नेति नेति की बात की है कि भाई वेदों में लिखा है कि नेति नेति करके बताया जा सकता है। पूरी तरीके से नहीं बताया जा सकता। तो जब हम इनसे पूछते हैं कि भैया जब कबीर जहां पर खड़ा था वो जगह किसने बनाई तो ये भाग लेते हैं। कम से कम इनसे ज्यादा आगे तक तो हमारे आचार्य गण बहुत कोई भी जितनी भी प्रामाणिक परंपराएं हैं सब सारी ऐसी परंपराएं जो जिनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं है। जहां तक ये बात करता है। कबीर खड़ा है। अनामय अनामय लोक से आ जाता है। सतलोक में फिर वो सतलोक बनाता है। अनामय लोक किसने बनाया भाई? फिर यहां पर इनका अपमान किया इसने रजगुण ब्रह्मा सतगुण विष्णु तमगुण शिव आदि आदि देवताओं की पूजा करने
00:05:43:01 वाला वाले राक्षस को धारण किए हुए हैं। अब देखिए वही वाली बात है कि यह जो गुण है यह सीधे-सीधे इनको जो है जो भगवान है वही उनको गुण के रूप में एक व्यक्तित्व बना दे रहा है गुण को। अगर व्यक्तित्व बना देता बना दे रहा है तो यह गुण हमारे साथ भी चल रहे हैं। दूसरी बात यह भी है गुण के रूप में मतलब जो ब्रह्मा विष्णु महेश है वो सर्वव्यापी है। ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है। ब्रह्मा विष्णु महेश सर्वव्यापी है क्योंकि वो गुण है और गुण तो सब जगह व्याप्त है। सबके पास गुण है कुछ ना कुछ। दूसरी बात यह है कि गुणों से प्रभाव जो उत्पन्न होते हैं जैसे कि व्यभचार करना इत्यादि यह सब जो होते हैं तो यह काल काल में भी इसकी स्टोरी के हिसाब से रामपाल की स्टोरी के हिसाब से काल में भी व्यभचार का प्रभाव उत्पन्न हुआ था। इसका मतलब कि काल भी सतज या तम गुण से प्रभावित था। इसका अर्थ यह मानना पड़ेगा कि काल से पहले ब्रह्मा विष्णु महेश थे। रामपाल के अनुसार तो इसका अर्थ यह हो गया कि काल ने इनको नहीं बनाया। काल ने इनको उत्पन्न नहीं किया इनहीं के अनुसार। ठीक है? खैर यहां इसने अपमान किया है और फिर चार के 31 32 श्लोक में लिखता है कि चार के श्लोक 31 32 में कहा है कि गीता
00:06:58:09 अध्याय चार श्लोक 25 से 30 तक वर्णित शास्त्र साधना से बचे हुए साधक शास्त्र विधि अनुसार अर्थात नाम साधना करते हैं। जो यज्ञ का बचा हुआ जो होता है उसको यह कह रहा है कि वो जो शास्त्र विरुद्ध साधना है उससे बचे हुए जो चीजें हैं उससे बच के अब जो है उनका विरोध करके जो शास्त्र विरुद्ध साधना है वो कहां से कहां तक बताई है इसके अनुसार श्लोक 25 से 30 तक शास्त्र विरुद्ध चीजें बताई गई है कि क्या-क्या नहीं करना है तो उनसे बचा हुआ जो साधन है उसका जब आलंबन लेते हैं तो आपको फल की प्राप्ति होती है। श्लोक 25 से 30 में यज्ञ करने को कहा गया है। तो यज्ञ तो शास्त्र सम्मत साधना है। फिर यज्ञ को इसने शास्त्र विरुद्ध कैसे कह दिया? यज्ञ का अर्थ जो है भक्ति भी है। है ना? पेज नंबर 40 पे इसने 3.1 में माना है ये बात रामपाल ने इसी में गरिमा गीता की। तो क्या भक्ति शास्त्र विरुद्ध होती है। अच्छा बचे होने का अर्थ क्या है? बचा होना क्या बच गया है? कौन सा मटेरियल है जो बच गया है जो बचा है उसका अमृत पान किया जा रहा है निषेध धर्म को जानने वाले मुक्ति नाम
00:08:13:15 जप बिना यज्ञ करने को कौन बोला अगर यह यज्ञ को नाम जप से अलग मानता है तो यह किसने कहा है कि अपने इष्ट का जो नाम है या मंत्र है वह जाप नहीं करना है यदि यज्ञ करना है तो तो यज्ञ को इसने यहां पर शास्त्र के विरुद्ध खड़ा कर दिया तो यह भी एक सोचने वाली बात है कि यज्ञ शास्त्र के विरुद्ध कैसा कैसे नाम जप बिना यज्ञ निष्फल होता कहां लिखा है? यह भी बात सोचने की है कि नाम जप के बिना जो यज्ञ है वह निष्फल हो जाता है। क्योंकि यज्ञ में जो मंत्रो उच्चारण होते हैं वह अपने आप में ही नाम जप होता है। दूसरी बात यह है कि काल ने जब तप किया था तो उसने कौन सा नाम जप किया था जिससे कि वह फलित हो गया था। काल को उसने उन्होंने कबीर जी ने जो मांगा था दे दिया था ना। अगर काल ने जो तप किया और वह फलित हुआ तो इन्होंने कहा फलित किसका होता है? जो तत्वज्ञानी होता है। तो यहां से भी काल रामपाल के ही शब्दों में तत्व ज्ञानी भी सिद्ध हो जाता है। तो ये करना क्या कहना क्या चाहते हो रामपाल जी?
00:09:14:19 कह रहे हो कि वो तत्व ज्ञानी नहीं है। फिर कह रहे हो वो तत्व ज्ञानी है। तुमने अभी बताया ना शास्त्र विरुद्ध साधना से बचे हुए साधक शास्त्र विधि अनुसार नाम साधना करते हैं। और यहां पर अभी कहीं पर इनको तत्व ज्ञानी भी कहा गया था। तत्व ज्ञान के आधार पर है ना। तो वो तत्व ज्ञानी होते हैं। कौन? जो जिनको फल की प्राप्ति होती है वह तत्व ज्ञानी होते हैं। तो काल को तब के फल की प्राप्ति हो गई थी क्योंकि कबीर ने काल की बात मान ली थी। तो कबीर दास जी ने जब काल की बात मान ली तो उसको फल उसका जो किया जाने वाला यज्ञ था वो फलित हो गया। फलित हो गया तो इसका मतलब काल जो है वो तत्व ज्ञानी सिद्ध हो गया। बाबा जी के अनुसार ही काल तत्व ज्ञानी भी सिद्ध होता है। हम लोग पहले भी पहले के चैप्टर आप देखेंगे कई बार अपनी आप हसी को रोक नहीं पाएंगे। वहां पर भी कई बार काल तत्व ज्ञानी सिद्ध हुआ है। बाबा जी की किताब के अनुसार ही तो इस पर ठोको ताली। यह क्या करता है कि खुद ही ब्रह्म का अर्थ यह कई जगह पर सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा मानता है। और कहीं पर ब्रह्म का अर्थ कहेगा कि नहीं नहीं ये तो काल ब्रह्म है। ब्रह्म का मतलब काल ब्रह्म और जब बात होगी परम ब्रह्म की तो वहां परम लिखा होगा या सच्चिदानंद घन ब्रह्म की बात होगी तो वहां लिखा होगा। तो यह अपनी बात को ऐसे काटता
00:10:29:25 चलता है। इसने कई जगह किताबों में अपनी किताब में ब्रह्म का अर्थ सच्चिदानंद घन ब्रह्म भी लिया है और कई जगह इसने किताबों में अपनी में ब्रह्म का अर्थ जो है काल ब्रह्म भी लिया है। तो ठोको ताली। अच्छा अब इससे और आगे चलते हैं कि यह जो दावा करता है रामपाल तत्वदर्शी का वह करता है कि 434 में तत्वदर्शी के पास जाने को कहा है। हालांकि अगर आप दो 16 को देखेंगे तो उसमें तत्वदर्शी उसको कहा गया है जो यह बात जानता हो कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता। असत का कभी भाव नहीं होता। और यह बताने वाला वहां पर काल है दो में क्योंकि काल ने गीता बोली है रामपाल के अनुसार। इसका मतलब काल यह बात जानता है कि सत्य का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी नाश असत का कभी भाव नहीं होता और सत्य का कभी अभाव अभाव नहीं होता। तो काल ये बात जानता है क्योंकि वो अर्जुन को ये बात बता रहा है। इसका मतलब दो 16 के हिसाब से काल तत्वदर्शी सिद्ध होता है। तो कई तरीके से काल जो है तत्वदर्शी सिद्ध हो रहा है। कैसे? कि जिसकी साधना फलित हो जाती है वो भी तत्वदर्शी होता है। क्योंकि उसके पास तत्व ज्ञान है। इसीलिए उसकी साधना सिद्ध हो गई। तो काल की साधना तो सिद्ध हुई थी ना उसने तप किया था कबीर ने उसकी बात मान ली थी तो इस प्रकार से भी वह तत्वज्ञानी सिद्ध होता और भी पीछे आप रिकैप देखेंगे
00:11:45:06 तो आपको कई जगह बहुत हास्यास्पद घटनाक्रम मिलेंगे और जो यह है ना रामपाल का काल यह तत्वदर्शी सिद्ध होगा बहरहाल 434 का ये लोग बहुत डंका पीटते हैं कि तत्वदर्शी कहा गया है किसको तत्वदर्शी के पास जाने को कह रहे अच्छा तत्वदर्शी के पास जाने को क्यों कह रहे हैं? क्या जानना है? तो 433 में ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है। 434 से पहले ज्ञान यज्ञ की बात हो रही है। उसके बाद 434 में कहा जा रहा है कि विभिन्न यज्ञों के उस ज्ञान को तू तत्वदशी से जान। अब ज्ञान यज्ञ के लिए ही रामपाल लिख चुका है ज्ञान यज्ञ से भी मुक्ति नहीं होगी। पांच प्रकार के यज्ञ उनमें से किसी से भी मुक्ति नहीं होगी। तो जब ज्ञान यज्ञ से मुक्ति ही नहीं होनी है तो इसका मतलब और फिर ज्ञान यज्ञ का ज्ञान देने वाला तत्वदर्शी है गीता के अनुसार तो फिर क्या यह लोग यह भी मानते हैं कि रामपाल के द्वारा मुक्ति नहीं होगी क्योंकि तत्वदर्शी तो वो सिद्ध हो रहा है रामपाल के अनुसार जो मुक्ति का ज्ञान नहीं दे सकता। दूसरी बात यह है कि 435 में ही यह कहा गया है कि जब तू तत्वदशी की शरण में जाएगा तो वह तुमको ऐसा ज्ञान देगा जिससे पहले तू पूरे संसार में
00:13:00:28 पूरे संसार में मुझको और फिर बाद में स्वयं को देखेगा। तो यहां जो मोक्ष की जो धारणा होती है ना वो आती है। तो फिर क्या ऐसा कहीं पर आपने आज तक किसी रामपाली को देखा है क्या कि वो यह देख रहा हो कि सब जगह ईश्वर है। वो तो ईश्वर को सब जगह नहीं मानते। उसकी शक्ति को मानते हैं। वो बात अलग है कि वही सिद्धांत फेल हो जाता है। मगर ये अभ्रामिक आईडियोलॉजी से चलते हैं। तो ईश्वर को सब जगह नहीं देखते। तो फिर यहां चार 35 वाला ज्ञान कहां चला जाएगा? तत्वदर्शी तो वही ज्ञान देगा जिसमें ईश्वर सब जगह दिखाई दे। ईश्वर तो सब सब में ईश्वर दिखाई नहीं दे रहा है। तो यहां भी इनका ज्ञान पिट गया। यह सारी बातें हो गई। दूसरी बात तत्वदर्शी की बात बता दूं। रामपाल की ही किताबों में कबीर की वाणी को प्रस्तुत करते हुए तत्ववेत्ता कहा गया है वशिष्ठ जी को। ब्रह्म पुराण में तत्व ज्ञानी कहा गया व्यास जी को और अनेकानेक जगह तत्वदर्शी हमारे ऋषि महर्षियों को कहा गया है। इस शास्त्र चोर शास्त्र की चोरी करने वाला इस शास्त्र चोर रामपाल को नहीं कहा गया। है ना? तत्वदर्शी से नाम दीक्षा लेने की। अच्छा हां एक बात और है 437 में इसने फिर यह
00:14:16:04 कहा है कि तत्व ज्ञान को जानकर तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर साधना करने से साधक के पाप कर्म भस्म हो जाते हैं। मगर यहां पे तत्वदर्शी से नाम दीक्षा लेने की कोई संस्कृत अवेलेबल नहीं है। श्लोक में अपने मन से जहां जो चाहा वो ये ठोक देता है। इसके बाद आगे चलते हैं। तो इसने जो है चार 39 में क्या है कि इंद्रियों पर संयम करके उससे आगे का सूक्ष्म वेद वाला संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है। तत्व ज्ञानी कौन कौन करता है? तत्व ज्ञानी उस तत्व ज्ञान को तत्व ज्ञानी से प्राप्त करके साधक शीघ्र ही ब्रह्म साधना से होने वाली गति से दूसरी गति होने वाली परम शांति को प्राप्त हो जाता है। यह चार 39 में आ गया। तो अब इसने इंद्रियों पर संयम करने को स्वीकार कर लिया। तो यह क्या करता है? कई जगह पर इंद्रियों के संयम इंद्रियों को संयम में लाने का खंडन करता है और उसको नाम देता है कि हट योग है। अपनी इंद्रियों पर संयम करो ना ये हट योग है। तो इसका हमें अनुसरण नहीं करना है। और फिर कहीं दूसरी जगह मान भी लेता है। तो ये इनका ज्ञान है रामपाल का। यह इस किताब
00:15:31:15 को जब आप पढ़ेंगे ना तो इतनी जगह दिमाग पंचर होगा। उसने हर दूसरी लाइन में खुद को ही काटा है और किसी को नहीं काटा है। खुद को ही काटा है। ठीक है? अभी आगे देखिएगा मजा आएगा। आनंद आ जाएगा। अच्छा फिर एक इसका कुल मिलाकर के अर्थ है यह तत्व ज्ञान जो कहता है वह कहता है नाम दीक्षा को और 40 में चार 40 में क्या कहता है यह विवेकहीन यानी जिसको तत्व ज्ञान नहीं मिला यानी कि नाम नहीं मिला तो इसका मतलब है कि तत्व का मतलब है इसका मतलब नाम दीक्षा तो अब यह पूरा वैदिक वांग में उठा के दिखा दें कि तत्व ज्ञान का मतलब नाम दीक्षा कहां पर लिखा हुआ है? मैं चैलेंज दे रहा हूं पूरे रामपाली गैंग को। तत्व ज्ञान का मतलब नाम दीक्षा कहां पर लिखा हुआ है? तुम बता दो मुझे। ठीक है? तत्व ज्ञान का मतलब भागवत में श्लोक आया है। मैं वहां से आपको बता दूं कि तत्व किसे कहते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] और जब तक वो संशय समाप्त नहीं होगा कि भाई अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वो सब जगह होना चाहिए। अगर वो सब जगह नहीं है उसकी शक्ति है सब जगह
00:16:46:28 तो फिर वो शक्ति या तो बराबर हो जाएगी। फिर वही दूसरी चीजें हो जाएंगी। बहुत सारे क्वेश्चन रेज हो जाएंगे। इसको कहते हैं संशय। और इस प्रकार के संशयों का निराकरण करता है गुरु तत्व ज्ञान देकर के। यह तात्विक बातें हैं कि भाई अगर ईश्वर एक जगह खड़ा है तो पूरी दुनिया में कंट्रोल कैसे कर रहा है? अगर आप कहोगे कि मन से सोच कर कंट्रोल कर रहा है तो यानी कि उसकी सोच पूरे संसार में फैली हुई है। वो जो सोच है उसको ईश्वर के बराबर सामर्थ्यवान होना पड़ेगा। तो दो दो पदार्थ हो जाएंगे। दो तत्व हो जाएंगे। एक तो स्वयं ईश्वर और एक उसकी सोच। क्योंकि आपने उसको अलग माना है या फिर यह मान लो कि ईश्वर ही सोच के रूप में सर्वत्र व्याप्त है। तब तो मान लिया जाएगा। मगर तुम्हें तो अब्राहमिक आईडियोलॉजी फैलानी है। वो कुरान और बाइबल फैलानी है। तो तुम क्यों मानोगे ये बात? कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। तो इसलिए तुम अपनी ये अकचरी सी और घटिया टाइप की ये जो फिलोसफी है उसी को कहते रहोगे। यही तत्व ज्ञान है। मुझसे नाम दीक्षा ले लो। यह तत्व ज्ञान श्रीमद् भागवत में तत्व ज्ञान किसी और चीज को कहा गया। अपने हृदय में उत्पन्न अपने संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर। अब देखिए इसने मान लिया कि 4:42
00:18:02:09 में काल यह कह रहा है कि तू भक्ति कर और भक्ति करने के लिए कमर कर। देखिए क्या कह रहा है। विवेचन देखिए। यह कह रहा है 4:42 में एक मिनट 442 आप खोल दीजिए। 101 ये चार 42 में कह रहा है कि गीता अध्याय चार के श्लोक 42 के अनुवाद में मेरे यानी रामपाल के अनुवाद के अतिरिक्त सर्व अनुवादों ने अपने अनुवाद में लिखा है कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा जो गलत है। क्योंकि पूरे अध्याय चार में परमात्मा के तत्व ज्ञान तथा अज्ञान का विश्लेषण है। स्पष्ट किया है कि शास्त्र विरुद्ध अधूरे व मनमाने भक्ति कर्मों को तत्व ज्ञान से समझकर उनको त्याग कर पूर्ण परमात्मा द्वारा अपने मुख कमल से बताए तत्व ज्ञान को तत्वदर्शी संतों से समझकर कर्तव्य भक्ति कर्म कर। अच्छा एक बात और है जैसे यह त्यागने की जो बात करता है ना कि मेरी भक्ति मत कर और या फिर यह 25 से 30 में कह रहा है कि इन इन कर्मों को त्याग दे। तो यह जो जो त्यागने की बातें कह रहा है वहां पर त्यागने की जो संस्कृत होती है ना वह उपलब्ध ही नहीं होता है क्योंकि वहां पर तो उन कर्मों में गति करने के लिए कहा जा रहा है उनको स्वीकार करने के लिए कहा जा रहा है तो यह जो कहता है कि मुझे छोड़कर उसकी भक्ति कर
00:19:17:10 या इन कर्मों को त्याग कर यह वाला कर्म कर तो यह त्यागने वाली संस्कृत नहीं होती वहां पर ठीक है तो अ 42 40 में यह इस बात का विरोध कर रहा है कि उसने जो है युद्ध के लिए खड़ा होने की बात कही। अब देखिए इसके अनुसार काल जो है युद्ध करवाना चाहता था क्योंकि उसको अपने खाने का इंतजाम करना था। तो खान काल जो है युद्ध करने के लिए नहीं कह रहा है। भक्ति करने के लिए कह रहा है। इसका मतलब अपने खाने का इंतजाम नहीं कर रहा है। कहीं पर कहेगा कि काल को अपने खाने का इंतजाम करना है इसलिए वो युद्ध करवाना चाहता है। कहीं पर वो श्री कृष्ण पर यह दोष लगाता है कि श्री कृष्ण जो है ठीक व्यक्ति नहीं थे। वो युद्ध करवाना चाहते थे। कहीं पर वो यह कहता है कि श्री कृष्ण तो अच्छे व्यक्ति थे। वही युद्ध नहीं करवाना चाहते थे। बल्कि काल प्रेत वश उनके अंदर प्रवेश करके वो युद्ध करवाना चाहता था। क्योंकि उसको अपना काम बनाना है क्योंकि वह अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। यही सब लिखा है इसमें। यह टटपुंजिया और घटिया भाषा ही है इस संत की। इस तथाकथित संत की यही घटिया भाषा है। वो अपना उल्लू सीधा करना चाहता है। ये सब इनकी किताबों में छपा है। है ना? तो वो अपना उल्लू सीधा करना
00:20:32:16 चाहता है। काल। तो कहीं पे श्री कृष्ण को जहां विलेन बनाना होगा वहां काल वाली बात अपनी ही छुपा लेगा। जहां पर काल को विलेन बनाना होगा वहां श्री कृष्ण वाली बात छुपा लेगा। दोनों ही इसके लिए सही नहीं है। और उसके बाद जब काल से भी युद्ध लड़वाना चाहता है तो यहां पर क्या कह रहा है कि काल युद्ध लड़ने को नहीं कह रहा। भक्ति करने को कह रहा है। दूसरी बात एक बात और है यहां पर आप ध्यान दीजिए कि खड़ा हो जा वाली लाइन दिखाइए जरा बड़ी करके खड़ा हो जा। युद्ध के लिए खड़ा हो जा। तो ये कह रहा है कि ये जो अर्थ किया है ना कि युद्ध के लिए खड़ा हो जा। यह युद्ध के लिए खड़ा नहीं होना है। भक्ति के लिए खड़ा होना है। ठीक है? अब आप एक बात बताइए भक्ति क्या बैठकर नहीं हो सकती है? क्या खड़े होकर के ही भक्ति होती है? इसका विधान कहां लिखा हुआ है? जो वो यह कहेगा कि भक्ति के लिए खड़ा हो जा। युद्ध के लिए खड़ा हो जा। अब युद्ध के लिए खड़ा होना तो समझ में आता है। मगर भक्ति के लिए खड़ा हो जा।
00:21:34:16 यह कहां से निश्चित होगा? ठीक है? तो, यह जो अभी तक हम लोग पीछे पढ़ चुके तो लास्ट एपिसोड था, उसका मैंने कुछ बुलेट पॉइंट्स बताने का प्रयास किया है। अब हम बात करते हैं पांचव अध्याय की। पांचवा अध्याय खोल लीजिए। अगला
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
खुद को ही एक्सपोज कर गया पाखंडी! | भाग 7 अध्याय 4 गीता के नाम पर रामपाल का भयंकर अनर्थ
🔗 This video is made from parts of these videos
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮