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00:00:04:07 सभी को जय श्री राम। आशा करता हूं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। अ [गला साफ़ करने की आवाज़] जय श्री राम। जय श्री राम सभी को। तो गीता के नाम पर रामपाल के बोल वचन शायद हमारा ये फोर्थ एपिसोड है और जैसा कि हम हर एपिसोड में पिछले एपिसोड के जो बुलेट पॉइंट्स हैं वो उपलब्ध कराते हैं। तो हमने फर्स्ट एपिसोड में रामपाल ने क्योंकि गीता का अपार्थ करना शुरू किया था 2.10 से लेकर के मतलब 2.10 से उसने शुरू किया है अपार्थ तो हमने 2.10 से लेकर के 2.30 तक की समरी जो जो उसने जो शटर घोट की है श्लोकों के अर्थ में उसके बारे में बात की है एपिसोड वन में 2.30 से लेकर के 2.52 तक जो उसने शटर घोट की है झोल किया है उस पर हमने बात की है एपिसोड टू में और 2.53 से लेकर के उसने जो
00:01:19:08 2.72 तक जो अपार्थ किया है उसके बारे में हमने बात की है अ एपिसोड थ्री में। आज तीसरे अध्याय की शुरुआत होने वाली है। मगर उससे पहले जो एपिसोड थ्री के बुलेट पॉइंट्स कौन-कौन से हैं उस पर हम बात कर लें। सबसे पहला और जरूरी पॉइंट है रामपाल के अनुसार उसने जो 2.53 से लेकर के 2.72 के बीच में जो गीता का अर्थ किया है उसमें उसने कौन-कौन सी मोटी बातें ऐसी की है जो हमारे ध्यान में रखने योग्य है रामपाल वालों को भगाने के लिए दौड़ा दौड़ा कर। ठीक है? तो क्या है पहली बात? कि रामपाल के अनुसार कोई भी भक्त नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि उसने मेंशन किया है कि जिसको तत्व ज्ञान नहीं है जिसको तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। तत्व ज्ञान के बिना वह भक्ति नहीं कर सकता। वो भक्त नहीं हो सकता। तो आप जानते ही हैं रामपाल के अनुसार इस संसार में पूरे संसार में कोई भी तत्व ज्ञानी नहीं है। तो इसका अर्थ क्या है? कि उसका भक्त समझ उसका फॉलोअर मानते हुए स्वयं को भक्त कहने वाले जितने भी लोग हैं वह सब भक्त नहीं है। रामपाल के अनुसार यह मोटी बात। दूसरी बात क्या
00:02:34:09 है कि रामपाल ने जो दूसरे अध्याय की शुरुआत में एक जगह कह दिया था कि लाभ हानि के बिना कोई युद्ध हो सकता है। कोई कर्म हो सकता है भला। तो हमने उस अभी तक तीन एपिसोड में बार-बार ये बताते आए कि ये जो बात इसने कही है कि लाभ हानि के बिना कुछ नहीं हो सकता। जिसके आधार पर उसने गीता बोलने वाले को गलत कहा, गलत ठहराने की कोशिश की है कि उसने गलत ज्ञान दिया है। हालांकि वो बात और है कि जब वो गलत ज्ञान दे रहा है तो उसकी कोई भी बात तुम प्रमाण के रूप में कैसे मान रहे हो? खैर वो तो एक अलग बात है। मगर यहां पर भी उसने पाप और पुण्य के फल पर ध्यान मत दो। इस बात को स्वीकार किया है। यानी अपनी उस लाभ हानि वाली बात का खुद ही खंडन किया है। 2.46 से 2.53 के बीच में उसने क्या-क्या स्वीकार किया है? उसने मोह रहित होने की बात को स्वीकार किया है। मतलब मोह नहीं होना चाहिए। लाभ हानि में राग द्वेष में समान बुद्धि होनी चाहिए। लाभ हानि में समान बुद्धि होनी चाहिए। हम और पूर्ण परमात्मा में मन होना चाहिए। छोटे भगवान से दूर मन होना चाहिए। ये भी उसने वहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश की बात वो कर रहा है और उसके हिसाब से पूर्ण परमात्मा कबीर है। तो यहां पर ये भी हमें यहां पर पता चला यहां पर भी इसने वो जो ये लोग क्लेम
00:03:49:15 करते हैं ना हम लोग वो हम लोग तो ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति बताते हैं। तो यहां पर ये इनके मुंह पर मारना ये वाला 2.53 से लेकर 2.72 के बीच में रामपाल ने ये भी कहा है कि पूर्ण परमात्मा में मन लगाओ और ये जो भगवान है ब्रह्मा विष्णु महेश उसके अनुसार भगवान है। हालांकि वो भी भगवान सिद्ध नहीं होते मगर उनसे अपने मन को दूर हटाओ। और एक बहुत जरूरी मोटी बात क्या है कि सतलोक का प्रभु कौन है? कबीर मगर इसने इसी बीच में जो जहां जिन श्लोकों की हम बात कर रहे हैं उसी बीच में माना है कि ब्रह्म तथा परम ब्रह्म से भी आगे एक और परमेश्वर है उसके पास जाना है। सतलोक से भी आगे एक और लोक है वहां जाना है। वहां पर जाके मुक्ति होगी। तो सतलोक में मुक्ति नहीं है। यहां पर भी इसने माना। ठीक है? अच्छा सांसारिक लालच त्यागने की बात इसने फिर कही वह लाभ हानि वाली बात का अपनी बात का खंडन किया सुखदख में समान रहो यह भी बात इसने यहां पर की है इस बीच भौतिक जगत से प्रेम ना करो यह भी बात कही है इस बीच राग द्वेष रहित रहो यह भी बात कही है इसके बीच और यह जो व्रत
00:05:04:24 का खंडन करने का प्रयास करता है कि व्रत के लिए तो भगवान ने मना किया है क्यों मना किया है क्योंकि वो हट हट पूर्वक जो लोग अपनी इंद्रियों वो करते हैं तो हठ योग का मना किया है। मगर वहां भगवान का कहने का तात्पर्य है कि बिना भगवान की शरणागति हुए केवल कर्म को आधार बना के कर्म में हम अपनी जो अपने कर्मों जो इंद्रिय विषय उनसे अपने इंद्रियों को नियंत्रित कर लेंगे। इंद्रिय विषय आसक्तियों से मुक्त हो जाएंगे। उस बात को भगवान ने कहा है मगर इसने उस बात को ऐसे ले लिया है कि भगवान ने व्रत करने को उपवास रखने को ही मना कर दिया। वो खैर आगे आएगी वह वाली बात। मगर इसने यहां पर इस बीच जो यह बात कर रहा है तो इस बात कर रहा है कि इंद्रिय नियंत्रण निषेध किया है। मतलब बिना भक्ति के यह भी यह बात मानता है कि भक्ति के साथ यदि इंद्रिय नियंत्रण करने का प्रयास किया जाएगा तो पॉसिबल है। इस पर भी हम आगे बात करेंगे। आज के चैप्टर में भी ये वाली बात है। तो इसने ये माना है कि भक्ति के साथ अगर इंद्र इंद्रिय नियंत्रण करोगे तो पॉसिबल है तो अच्छा है। मगर भक्ति के बिना भगवान की शरणागति के बिना करोगे तो वो कोई लाभ का नहीं है। ठीक है?
00:06:18:02 और [गला साफ़ करने की आवाज़] परमात्मा को जानकर इसने माना कि आसक्ति रहित हुआ जा सकता है। अच्छा इसने शंगी ऋषि का उदाहरण देकर के दशरथ की जो पुत्री थी शांता उनके साथ उनके विवाह का खंडन किया है। इसी बीच और आगे के श्लोकों में खुद ही विवाह का समर्थन किया। मतलब इस बीच कहा है कि भाई वो श्रृंगी ऋषि थे। उन्होंने अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल किया हुआ था। परंतु वो अपनी इंद्रियों पर वो कंट्रोल जो था उसको रख नहीं पाए। और जो है उन्होंने हट पूर्वक क्योंकि यहां हट पूर्वक खंडन कर रहा है ना इंद्रियों का इंद्रियों पर नियंत्रण करने का वो व्रत इत्यादि वैराग्य का खंडन कर रहा है वैराग्य का नहीं मतलब हमारी जो हमारे जो सनातन की जो प्योर पद्धति है उसके अनुसार पूजा भक्ति का खंडन कर रहा है तो वहां पर उदाहरण दे रहा है कि श्रृंगी ऋषि अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं कर पाए और उन्होंने विवाह कर लिया जबकि आगे विवाह करते हुए भी गस्थ होते हुए भी विषयों में विचरण करते हुए भी व्यक्ति को मुक्त होने के योग्य बताया है। यदि वह शास्त्र अनुकूल कर्म करेगा तो वो मुक्त हो
00:07:33:06 जाएगा। तो यह भी बात बहुत ध्यान रखने की है कि इसने यहां पर विवाह का खंडन किया है मार्कंडेय ऋषि में मार्कंडेय पुराण वाली जो बात आती है जहां पे पितृ दर्शन दे रहे होते हैं। हम वहां पर पितृ भी कह रहे होते हैं कि भाई तू विवाह कर ले गृहस्थ हो जा। तो वहां पर वो पूछता है उनका जो बेटा होता है जो वो ऋषि होते हैं वहां पर वो पूछते हैं कि भाई मैं जब ऑलरेडी फ्री हूं इन सब कर्मों से तो मुझे कर्मों में लिप्त क्यों कर रहे हो तो वहां पर वो जवाब देते हैं कि तुम विषयों में रहते हुए भी इन कर्मों को करते हुए भी यह श्राद्ध आदि कर्मों को करते हुए भी मुक्त हो सकते हो वहां पर पित्र उन्हें समझाते हैं तो ये वहां पर भी विवाह का खंडन करता है और यहां पर भी विवाह का खंडन करता है जबकि इसी चैप्टर में थोड़ी देर बाद यह विवाह का समर्थन करता है। गृहस्थ होने का समर्थन करता है। यह खुद इस बात को मानता है कि गृहस्थ होते हुए भी विषयों में विचरण करते हुए भी यदि भगवान का सानिध्य होगा शास्त्र सम्मत कर्म करेगा तो वो मुक्ति के योग्य हो जाएगा। ठीक है? तो ये एक बात ध्यान रखने की है। और दो 61 में इसने एक झोल किया है। वो क्या किया है कि भगवान ने कहा मत पराह। उन्होंने कहा कि मेरे परायण होकर तो इसने उसका अर्थ निकाला है मत पराह का कि मेरे से परे। ठीक है? मत पराह का अर्थ निष् निकाला
00:08:48:12 है 261 में मेरे से परे मेरे से दूसरे परमात्मा तो यहां पे ये दिक्कत आएगी कि मेरे से दूसरे परमात्मा अगर मेरे से दूसरे परमात्मा की बात हो रही है और परह का अर्थ तुमने दूसरे कहा है तो परमात्मा का भी अर्थ तो आएगा ना वहां पर मेरे से दूसरे दूसरे का तुमने परह ले लिया हालांकि परह का अर्थ वो है नहीं और हम इसी का खंडन करेगा अगर पराह का अर्थ है तो परम का अर्थ अन्य कैसे है वो हम यहां आगे इस बात का भी प्रतिकार करेंगे। खैर मेरे से दूसरे दूसरे और परमात्मा परमात्मा की यहां पर कोई संस्कृत नहीं है। ठीक है? एक सनातन का सार्वभौम सिद्धांत आता है कि हम कैसे फंसते हैं। तो यह भी दूसरे अध्याय के श्लोकों में दिया गया है। मेरे ख्याल से 62 से 63 के बीच में है कि जब हम विषयों का चिंतन करते हैं क्योंकि हमारा मन अगर भगवान की भक्ति में नहीं लगा है तो हमारा मन कहां लगेगा? विषयों के चिंतन में। चिंतन करने से उन विषयों के प्रति आसक्ति होगी। आसक्ति के कारण प्राप्त ना हो पाने की स्थिति में क्रोध आएगा। क्रोध ना आने के कारण मूर्खता आएगी और मूर्खता के कारण स्मृति
00:10:03:15 भ्रम आएगा और हमारे जीवन में जो भी हम दुख इत्यादि या जो भी बंधन हम वो करते हैं वो स्मृति भ्रम के कारण ही है और अगर अद्वैत सिद्धांत के अनुसार देखें तो स्मृति भ्रम ही तो है अविद्या के जाल में फंस जाना तो यहां पर एक सारभम सिद्धांत भी इस बीच हमें प्राप्त होता है। हालांकि इसका रामपाल से कोई लेन देन नहीं मगर एक अच्छी चीज आई तो मैंने वह भी आपको बता दी। अच्छा इसके बाद [गला साफ़ करने की आवाज़] 2.64 से 65 के बीच इसने यह समर्थन किया। पीछे श्रृंगी ऋषि के विवाह का खंडन किया। अब यहां पर ये समर्थन कर रहा है। क्या कह रहा है? इंद्रियों को वश में करने का समर्थन है। विचरण करते हुए भी 2.64 से 65 यहां ध्यान रखिएगा। पीछे शंगी ऋषि का जो दशरथ जी की पुत्री शांता के साथ विवाह हुआ उसका खंडन कर रहा है। देखो देखो वो अपने पर कंट्रोल नहीं कर पाए। ठीक है? वहां पर उसने यह नहीं सोचा कि भाई वो विवाह करते हुए भी मुक्त हो सकते हैं। मगर यहां पे दो 6465 के अर्थ में ये माना कि उसके अनुसार जो परमात्मा है उसकी उसकी शरणागति होने पर उसके अनुसार जो बताए गए शास्त्र शास्त्रों के अर्थ है उसके अनुसार कर्म करने पर भक्ति करने पर हालांकि इसने कर्म की बात तो कहीं की नहीं है केवल भक्ति की बात की है वो भी
00:11:18:16 उसकी कबीर की तो उसके अनुसार कर्म करने पर यदि व्यक्ति विवाहित भी होगा गृहस्थ भी होगा तो मुक्ति के योग्य हो जाएगा ठीक है तो अब इसने यहां पर 64 65 में अपनी किस बात को खुद खुद ही खंडित कर दिया। खुद ही जो शंगी ऋषि का के विवाह का खंडन किया उसको उसका खंडन यहां कर दिया। और जो मार्कंडेय पुराण में पितरों का खंडन किया है इसने। है ना? इसने कई वीडियोस में किया है। तो वो जो मार्कंडेय पुराण में जो इसने पितरों का खंडन किया है। यहां पर अपनी उस अपने उस खंडन का भी खंडन यहां पर कर दिया। क्यों? कि गृहस्थ होते हुए भी विचरण करता होते हुए भी व्यक्ति मुक्त हो सकता है। फिर 66 से 68 में फिर से ढोल है। यहां पर इसने शब्द शब्दार्थ जो है नहीं है। संस्कृत के शब्द वहां पर नहीं है। मगर अपनी तरफ से पूर्ण संत के अभाव ये सब वहां पर लिख दिया है जिसका वहां पर संस्कृत में कोई वर्ण नहीं है। और इसके बाद क्या लिखा है? फिर इसने यहां पर इस इन श्लोकों में 66 से 68 के बीच में भक्ति के साथ इंद्रिय नियंत्रण का समर्थन किया है। मैं यह बार-बार क्यों कह रहा हूं कि इसने इंद्रिय नियंत्रण का समर्थन किया है। भक्ति के साथ क्योंकि इसने इसी इनहीं जो भगवान
00:12:33:18 के भाव है कि यदि तू भगवान की भक्ति नहीं कर रहा है और भगवान का चिंतन नहीं कर रहा हो मन में विषयों का चिंतन कर रहा हो अपनी इंद्रियों को तू कंट्रोल कर रहा है तो क्या होगा कि तू अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल को यथावत रख नहीं पाएगा ये भगवान कह रहे हैं तो ऐसे कंट्रोल के लिए भगवान मना कर रहे हैं कि तू चिंतन उसी उनहीं विषयों का कर और उन विषयों से अपने इंद्रियों को कंट्रोल कर ले तो इसमें उसका फायदा उठाते हुए हमारे व्रतों का उपवास का खंडन किया इसने। ठीक है? इस बात का और बार-बार खुद ही भक्ति के साथ इंद्रिय नियंत्रण को इंद्रिय नियंत्रण को यह समर्थन दे रहा है। इसलिए मैं ये बात बार-बार बता रहा हूं। अच्छा फिर एक बात आ गई 66 से 68 के बीच में केवल तत्वज्ञानी ही शास्त्र के अनुकूल कर्म करता है। ये भी बात ध्यान रखने की है। इसका अर्थ क्या है? कि रामपाल के अलावा कोई भी दुनिया में शास्त्र के अनुसार कर्म नहीं कर रहा है। क्यों नहीं कर रहा है? क्योंकि वो तत्वज्ञानी नहीं है। और रामपाल ने यह माना है कि केवल तत्वज्ञानी ही शास्त्र के अनुकूल कर्म करता है। एक दुनिया में एक है जो शास्त्र के अनुकूल कर्म कर रहा है। वो है रामपाल और वो क्या कर्म कर रहा है वो आप लोग जानते ही हैं बबीता इत्यादि को हम आगे चलिए। [गला साफ़ करने की आवाज़]
00:13:49:20 2.69 से 72 इंद्रिय नियंत्रण फिर से इसने इंद्रिय नियंत्रण को समर्थन दिया है 2.69 से 72 के बीच इसका अर्थ क्या है कि व्रत को समर्थन दिया उपवास को समर्थन दिया जिसका ये खंडन करता है आगे है ना और सांसारिक आसक्ति से मुक्त हो जाना हो जाने के लिए प्रेरित किया और यानी कि यहां पे जो हम लोग कहते हैं ना कि जो अंतिम निर्णायक कौन होता है सन्यासी तो यहां वैराग्य का इसने स्वयं समर्थन किया है। है ना? [गला साफ़ करने की आवाज़] कि वैराग्य आ जाता है जीवन में उसके तत्व ज्ञान जो जिसको होता है। आगे की चरणों में विवाह का समर्थन 2 70 में किया है। पीछे श्रृंगी ऋषि के विवाह का खंडन किया। मार्कंडेय पुराण में रुचि मुनि के विवाह का खंडन करता है। पित उसको उनको समझा रहे होते हैं। जब यहां पर विवाह का इसने प्योर समर्थन किया है। 2.70 में ध्यान रखने वाली बात है। 2.71 में फिर इसने समत्व बुद्धि का समर्थन किया। समत्व बुद्धि का समर्थन फिर लाभानि वाले अपने कथन का खंडन कर दिया। और 2.72 में इसने इसने कुछ नहीं मगर इसने एक तो सार्वभौम सिद्धांत आता है कि अविद्या से मुक्ति अज्ञानता
00:15:04:26 ही है जो आपको बंधन में डाले हुए है और अज्ञानता से मुक्ति ही आपकी मुक्ति का हेतु है। और इसका क्या झोल है? सार्वभौम सिद्धांत तो हमने सुन लिया। इसने क्या जो किया है यहां पर? इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा माना है। 2.72 में। यह ध्यान रखने योग्य बात है। क्योंकि जब हमारे आचार्य गण एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ लेते हैं जो कि अभी आगे आने वाला है आज के चैप्टर में। तो ये वहां पर कहता है कि देखो देखो इसने वहां पर तो इस शब्द का ये अर्थ लिया है। देखो देखो इसने वहां पर तो इस शब्द का ये अर्थ लिया है और यहां पर ये ले लिया। ठीक है? ये बात ध्यान रखना। तो यहां पर इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा लिया है 2.72 में
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रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #4 अध्याय 2 का #श्लोक #gita #gitagyan
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