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00:00:02:21 तो आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे। जी बोले जी सभी को जय श्री राम। मैं मेरा प्रश्न हां प्रश्न ये है कि मैं सबसे पहले तो सनातन धर्म के बारे में यह जानना चाहता हूं कि कौन से मौलिक अधिकार के ऊपर टीका है। मतलब बेसिक से मैं जानना चाहता हूं इसके बारे में। अच्छा ठीक है। जी भैया
00:00:35:03 ऐसा है कि बेसिक जो है अगर धर्म का बेसिक पूछेंगे तो धर्म का बेसिक एक ही हो सकता है। वह है जीव की चाह के वास्तविक विषय सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को परिभाषित कर सकने वाले शास्त्रों द्वारा सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को परिभाषित कर सकने वाले शास्त्रों द्वारा सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर को प्राप्त करने के निमित्त बताई जाने वाली विधि का नाम धर्म है। यही इसका मूल है। यानी कि धर्म के मूल में है कि व्यक्ति के अंदर जो सच्चित आनंद की चाह है वह पूरी करवाने वाली विधि जो है वही धर्म है।
00:01:29:27 तो ये नॉर्मल लाइफ में एप्लीकेबल है। क्यों नहीं एप्लीकेबल है? किस तरीके से? आप जो भी ऐसा कार्य कर रहे हैं जी। जो आपको सुख प्रदान करे जी तो उसमें आप यही ढूंढ रहे हैं कि मुझे सुख मिले और ये जो सुख आप ढूंढ रहे हैं बस इसकी विधि उपयुक्त ना होने के कारण आपकी जो मंजिल है जो आपको जो सुख चाहिए वह ना मिलके आपको बाधित सुख प्राप्त हो रहा है। बाधित
00:02:10:28 और जैसेजैसे आप धर्म के रास्ते पर चलने लगते हैं, धर्म के पथ पर चलने लगते हैं तो आपकी जो अनंत सुख की खोज है वो धीरे-धीरे आपके निकट आने लगती है। तो सुख के कुछ वो होंगे कि इसको मत अब जैसे मेरे लिए किसी चीज को मैं सिर्फ एग्जांपल देना चाहूंगा कि अगर मान लो मेरे को नॉनवेज खाने में सुख मिलता है लेकिन वो गलत है तो सुख को कैसे डिफाइन करें कि ये सही सुख है
00:02:50:19 सुख को जस्ट जो एक मिनट मैं जरा अपनी जगह पे बैठ जाऊं हम देखिए नहीं ये तो बहुत साधारण सी बात है जो आपने पूछी है कि आपको नॉनवेज खाने में जैसे जी वो है आनंद आता है जी तो जी ये बाधित सुख है ना क्या ये अनंतानंद है क्या पहली बात बाधित सुख यानी कि जिसमें कोई बाधा हो ऐसा हां कितना मांस खा लेंगे आप अच्छा अच्छा हां एक वक्त के बाद मैं उससे ऊब जाऊंगा ऊब जाएंगे वो आपके लिए फिर वो अभी जो पहले जो प्यारा था वही अब वो हो जाएगा आपके लिए शत्रु पहले जो आपके आकर्षण का विषय था वही आपके अब उसका विषय हो जाएगा दूर जाने वाले है ना तो एक तो ये बात रही दूसरी बात ये है देखिए ये जो मांस खाना मैं अपना जरा कैमरा सेट कर लूं ये जो मांस खाने वगैरह वगैरह पे जो हमारे यहां पर या कहीं पर भी इस्लाम
00:04:06:00 में भी देखिए आप जितने अंशों में कहीं-कहीं पर जहांजहां पर आपको ऐसा दिखेगा कि ये चीजें सही है। तो वो वहां पर वो सनातन से मैच खाएगा। है ना? तो इस्लाम में क्या है कि कुछ लोग एक कुतर्क करते हैं। कि मांस खाना मतलब जो जिन जानवरों को खाने के लिए ही बनाया गया उनको खाना खाने में कोई आपत्ति नहीं है। यदि यह दिया जाए कारण यह दिया जाए कि भाई वह उसके अंदर जान होती है तो साइंस ने प्रूफ कर दिया कि पेड़ों के अंदर भी जान होती है। है ना? जी बिल्कुल। इसके साथ ही साथ तो अब यहां पर प्रश्न ये उठता है कि पेड़ों के अंदर भी जान होती है। तो क्या इस्लाम के अनुसार अ मांस खाना और हरी सब्जी खाना क्या
00:05:21:01 बिल्कुल समान है या कुछ थोड़ा बहुत अंतर है? तो यह मानना पड़ेगा कि इस्लाम के भी अनुसार मांस खाने में और शाकाहारी चीजें खाने में अंतर है। मांस खाते टाइम आपका अनिवार्य रूप से एक अमुक कोई आयत है उसको या कलमा है मुझे नहीं पता क्या है एक्सजेक्टली पर उसका पढ़ा जाना आवश्यक है। जी टमाटर टमाटर काटते समय आवश्यक है क्या? नहीं। नहीं। इसका मतलब इस्लाम के पर्सपेक्टिव में भी अंतर तो किया गया है। अब शाकाहार से मांसाहार की तुलना नहीं कर रहा है इस्लाम। एग्जैक्ट बराबर नहीं बता रहा। साथ ही साथ आप देखिए कि जो लोग मांस काट कर बेचने का काम कर रहे हैं इस्लाम में। जी हां हां है ना? संभवत उन्हें कुरैशी कहा जाता है। कुरैशी सही है। है ना? तो आप देखिए कि उसको सबसे ज्यादा निम्न वर्ग माना जाता है इस्लामिक समाज का। है कि नहीं? ठीक है? तो यानी कि इस्लाम भी अंतर करता है। अब ये अंतर हो क्यों रहा है? हमें ऐसा लगता है कि
00:06:37:04 अ केवल बस बिना कुछ सोचे समझे हमको बता दिया गया कि ये सही है, ये गलत है। नहीं ऐसा नहीं है। इन सब में एक मूल बात छुपी हुई है। अब जब आप इस्लाम से इस्लामिक परिवार से बिलोंग करते हैं तो फिर मैं आपको इस्लाम की दृष्टिकोण को रखते हुए भी बताऊंगा। है ना? फिर अंतर बताऊंगा कि अंतर कहां रह गया सनातन और इस्लाम में। मोटा अंतर तो आप जानते ही हैं जो हमने अपने वीडियोस में कई बार बताया है। इस्लाम के द्वारा प्रतिपादित ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। मिलने वाला मोक्ष परम स्वतंत्र नहीं है। और आलंबन लिए जाने वाले धर्म जो है वो शाश्वत नहीं है। बदलता है। ठीक है। अब बात आती है कि यह जो चीजें हैं कि यह अच्छाई है और यह बुराई है। ये ईश्वर ने किस आधार पर सेलेक्ट की कि हां ये चीज जो है बुराई में आई। इस आधार पर सेलेक्ट की है सारी बातें कुल मिलाकर के मेरे ख्याल से दूसरे अध्याय में या तीसरे अध्याय भगवत गीता भगवान ने कहा है कि जब हमारी बुद्धि खराब होती है बुद्धि खराब होने का कारण होता
00:07:52:22 है स्मरण शक्ति में जो गिरावट आती है और अगर हम हमारी सनातन की जितनी भी फिलोसफीस है उसमें अविद्या को माना गया है। कहीं ना कहीं माया को माना गया है। प्रपंच रूपी संसार को माना गया है। तो एक तरीके से हम भूल गए हैं कुछ चीजें जो हम बंधन में तो स्मृति भ्रम और भूल जाना और अविद्या ये चीजें सब लगभग आपको एक जैसा साउंड करेंगी। एक एक जैसा ध्वनित करेंगी। अब क्या है कि जितनी भी चीजें ऐसी हैं जिनके कारण हमारे मन में छिपाने का भाव उत्पन्न होता है। जितनी बार हम जीवन में छिपा रहे हैं उतनी बार वो उस पर चोट पहुंच रही है। हमारी जो प्रज्ञा शक्ति है जो पहले से ही हम बंधन में आए हैं। बंधन से मुक्ति प्रज्ञा शक्ति का इनक्रीस होना और बंधन में और लिप्त होना प्रज्ञा शक्ति का और क्षीण हो जाना। ठीक है? तो जितनी बार हम कुछ छुपाते हैं उतनी बार हमारी वह जो प्रज्ञा शक्ति है उसको चोट पहुंचती है। तो ये सारी अच्छाई और बुराई है ये डिपेंड कर रही है
00:09:07:25 छिपाने और ना छिपाने पर। जैसे अच्छा हां। जैसे कि जब हम टमाटर काटेंगे तो हमारे मन में ये भाव नहीं आएगा कि हम किसी से छिपाए। सही है। मगर यदि हम किसी पशु को काटेंगे तो हमारे मन में भाव आएगा कि हम यह ना देख ले घर के स्त्रियां ना देखें। घर के जो छोटे बालक हो वो ना देखें। है ना? कम से कम कोई भाव आए ना आए तो वो जो जानवर को काटा जा रहा है उससे छिपाने का भाव तो आएगा ही आएगा। हां। कि उसको बिना बताए हम उसका वध करें, हत्या करें या जो भी है हलाल करें। हम हालांकि हलाल और वध में बहुत अंतर है हमारे यहां। मगर एक बात आपके अनुसार मैं समझाने को प्रयास कर रहा हूं। तो यह जो छिपाने वाला यही भाव है जिसके बारे में कहा गया है मनुस्मृति में 12व अध्याय के 37 वे श्लोक में कि जिन कार्यों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो वो तामसिक यानी कि आपको दूर ले जा रहे हैं और जिन कामों को करते समय छिपाने का भाव बताने का भाव उत्पन्न हो उन कार्यों को सात्विक कहा गया है और
00:10:22:28 इसी आधार पर जो कर्म आजीविकोपार्जन के निमित्त जो कर्म किए जाते हैं। इसी आईडियोलॉजी के आधार पर वर्गीकरण हुआ है कार्यों का। जो हमारे यहां जो वर्ण व्यवस्था है उसमें जो आजीविक को पार्जन के जो माध्यम है उसमें छिपाने के भाव के आधार पर ही ये वर्गीकरण हुआ कि वो ब्राह्मण है वो क्षत्रिय वो वैश्य है वो वो है। ब्राह्मण अगर बात करें वैश्य की तो वैश्य का कार्य क्या है? कि वो पांच आप जैसे आपने बताया कि आपकी भी शॉप है हम जी जी अभी मैं प्रश्न नहीं लूंगा बस इनका होने वाला है समाप्त जैसे आपने बताया कि आपकी भी किसी चीज की शॉप है जी तो उसमें क्या है कि आप ₹500 की चीज लाएंगे आपको सामने वाले को बताना पड़ेगा मैं ये 600 की लाया हूं जी तो व्या व्यापार करते समय हमें कई बार छिपाना पड़ेगा। अन्यथा हम जो हमारा अपेक्षित मार्जिन है वो नहीं ले पाएंगे या फिर हमारा हमारा निर्वाह नहीं हो सकेगा। अब
00:11:39:00 जो क्षत्रिय है उसका कार्य क्या है? रक्षा करना युद्ध करना। जी जी तो युद्ध करते समय अपनी रणनीति को छिपाना पड़ेगा। हम कब कैसे कहां सामने वाले पर प्रहार करने वाले हैं। हम यह सुनिश्चित करके और सामने वाले को बताते हुए नहीं कर सकते। कहीं ना कहीं छिपाने का भाव उत्पन्न होगा। मगर ब्राह्मण की बात ब्राह्मण को क्यों कहा गया कि वो सबका नेतृत्व करे। क्योंकि ब्राह्मण का जो कार्य है वह है उसके अंदर जो चीजें हैं वो छिपा कर नहीं बल्कि बताकर उसे आजीव को पार्जन करना है। उसके पास ज्ञान है उसको बता के करना है। और दूसरी बात ब्राह्मण कहीं लोभवश या किसी भी कारणवश अपने ज्ञान को छिपाना छिपाना ना शुरू कर दे। इसीलिए वेतन भोगी ब्राह्मण को निषेध किया गया। वेतन के लिए मना है। शिक्षा को बेचने के लिए मना है। वेतन लेने के लिए मना है। केवल आप दक्षिणा ले सकते हो। दक्षिणा मतलब
00:12:54:20 मांग। दान के स्वरूप में जो मिला हुआ होगा उस पर निर्भर करेंगे आप। जिससे कि अगर वेतन लेगा तो क्या होगा? वेतन जब तक सुनिश्चित नहीं हो जाएगा तब तक वह अपना ज्ञान नहीं देगा। है ना कीमत जब तक सुनिश्चित नहीं हो जाएगी उसके ज्ञान की तब तक वो ज्ञान नहीं देगा तो कीमत सुनिश्चित हो जाएगी वो शद्रवत हो जाएगा या वैश्यवत अगर बेचेगा तो वैश्य हो गया ज्ञान को बेचने वाला और अगर वेतन लेगा तो शद्रवत हो गया तो ब्राह्मण के लिए सबसे जो उच्चतम बात बताई गई है वो है कि आप दान लेके अपनी शिक्षा को दीजिए लोगों को दान वो भी उनके स्वेच्छा अनुसार जो देना चाहे वो हां अब इसमें एक प्रॉब्लम और आएगी आज की आज के हिसाब से देख तो ये सारी व्यवस्था पहले ही कर दी गई क्या एक एक समस्या और आ सकती है कि
00:14:01:14 अ जब ब्राह्मण ऐसा कर रहा होगा तो उसकी पत्नी जो है उससे कहेगी भाई मेरा मेरा पति ऐसा मुझे नहीं चाहिए जो मांग कर खाता हो। हां हां ये व्यव ये समस्या आएगी ना तो ब्राह्मण के लिए पहले ही मनुस्मृति में लिख दिया गया कि तुम्हारा तुम्हें तुम्हारे लिए सम्मान विष के समान है और अपमान तुम्हारे लिए अमृत के समान है। जिससे कि ब्राह्मण को कभी ये हाथ फैलाने में समस्या ना हो। संकोच ना हो। हां। मगर ये उन ब्राह्मणों के लिए है जो अपने ब्राह्मणत्व का पालन भी कर रहे हैं। इसका दुरुपयोग ना करें लोग। मगर जो अध्ययन करा भी रहे हैं, जो ज्ञान को बांट भी रहे हैं उनके लिए है। तो दान जो है दान के ऊपर निर्भर रहने के लिए ब्राह्मण को कहा गया। तो यह एक मेन जो आधार है अच्छाई और बुराई का कि आपके मन में जितनी बार छिपाने का भाव आएगा उतनी बार आपकी प्रज्ञा शक्ति कम होगी। तो इसी प्रज्ञा शक्ति कम होने के कारण लोगों को अलग-अलग काम दिए गए हैं और अलग-अलग कार्यों के कार्यों से होते हुए उनका जो है उनकी सद्गति उन्हें प्राप्त होती है। इसमें
00:15:16:24 आप एक चीज और देखिए जैसे कंपैरेटिवली टू मैन एक जो स्त्री होती है पुरुष के कंपैरिजन में उसके जीवन में भी कई सारी वो लगाई गई है कि आप यह नहीं करिए आप गायत्री का जप नहीं करिए। मगर आप देखिए कि यहां पर भी सूक्ष्म कारण वही है। स्त्री के जीवन में पुरुष की अपेक्षाकृत छिपाने का भाव ज्यादा होता है। तो प्रज्ञा शक्ति बार-बार हिट होती है वहां। तो जिसके जिसके जीवन में सबसे कम छिपाने का भाव है उसको सबसे ज्यादा वैसा कार्य दिया गया। ब्राह्मण के जीवन में सबसे कम छिपाने का कार्य है। अगर वो शास्त्रों के अनुसू अनुसार ब्राह्मण हो जीवन को जीने का प्रयास कर रहा हो यथासंभव तो क्या होगा? कि उसकी प्रज्ञा शक्ति बहुत हाई हो जाएगी। जैसे सन्यास आश्रम सन्यास आश्रम में क्या है जो गृहस्थ होता है उसको तब भी कहीं ना कहीं कुछ छुपाना पड़ेगा भले ही ब्राह्मण हो गस्थ होता है तो उसको छिपाना पड़ेगा मगर जब सन्यास में पहुंच जाएंगे तो वो जो गृहस्थ वाला छिपाना था वो भी गया तो वहां प्रज्ञा शक्ति और उसका लेवल इसलिए अंतिम निर्णय ब्रह्मचारी सन्यासी इत्यादि को बताया गया है क्योंकि प्रज्ञा शक्ति की आवश्यकता है ज्ञान को समझने के लिए और फिर उस
00:16:31:25 ज्ञान को देने के लिए। अब बात आती है कि जो कार्य छिपाने वाले हैं मगर इस प्रपंच रूपी संसार से होकर गुजरते हुए पार पाने के लिए आवश्यक है तो उसमें क्या क्या व्यवस्था की उसमें भगवान ने विधि विधान को जोड़ दिया। जैसे कि अच्छा जब कोई व्यक्ति अनाधिकृत रूप से स्त्री संग करता है तो क्या लोगों को बताता है? नहीं नहीं बताता। परंतु विवाह जब होता है तो कार्ड बांटे जाते हैं, बैंड बजाया जाता है, बुलाया जाता है। यानी कि जो कार्य ऐसे हैं जो आवश्यक है जिनमें छिपाने का भाव हो भी तो उन कार्यों में भगवान ने ऐसे विधि विधान को जोड़ा गया कि उसकी वजह से जो प्रज्ञा शक्ति में अवनति आनी होगी उसको मतलब लीस्ट अमाउंट में किया जाए। जहां तक हो सके वहां तक उसको बचा लिया जाए। यदि बहुत आवश्यकता पड़ने पर आपके जीवन में मांसाहार आवश्यक हो गया है। प्राण की रक्षा होनी है या फिर आपका जन्म ही ऐसे परिवार में हो गया जहां मतलब प्रवृत्ति आपको मिल गई जन्म से ही है ना अब क्या किया गया कि विधि दी गई उस विधि से
00:17:47:01 क्या होगा कि आपका वो जो चेतना शक्ति पर प्रहार होना होगा वो कम होगा पहली बात जी हम दूसरी बात जी कि जो वो पशु है जो इस कारण से मानव जीवन को बचाने के लिए मानव जीवन को के सदुपयोग हेतु जिस पशु को लिया जा रहा है उसके भी कानों में उसके अंतिम क्षणों में क्या जा रहा होगा विधि युक्त मंत्र स्वर ध्वनि इत्यादि है ना जिससे कि उसके अगले जन्म की सद्गति उसको प्राप्त हो
00:18:22:13 और अंततवा व्यक्ति जो है ये जो विधि विधान भी दिया गया है इसमें क्या है कि यह जो विधि विधान दिया गया है कि भाई देखो देखो तुम्हारे यहां भी तो वेद में बलि दी गई है। इसका पर्यावसान उसके प्रोत्साहन में नहीं है। मांसाहार के इसका पर्यावसान उसकी न्यूनता में है। जैसे कि कोई व्यक्ति 10 सिगरेट पीता है और डॉक्टर ने उससे कहा कि आज से आठ सिगरेट पीना तुम। तो यहां पर आठ सिगरेट पीने का विधान नहीं बनाया है डॉक्टर ने। आठ सिगरेट कह करके वह जो 10 सिगरेट पीने वाला उसके उसमें जीवन में सिगरेट की न्यूनता ला रहा है। तो इसी प्रकार से इस विधि विधान के कारण जो व्यक्ति आज निर्दंध स्वतंत्र रूप से मांस खाता होगा। हां उस पर ये लगा दीजिए कि आप बलि देकर ही मांस खाएंगे। कितना मांस खा पाएगा वो? बहुत ही कम। हां। और उसके बाद धीरे धीरे धीरे करके उसके अंदर यह स्वतः भावना उत्पन्न होगी कि छोड़ो यार इतना झंझट इतना सब करना
00:19:37:15 पड़ता है। हम उसका विकल्प ढूंढो। यदि व्यक्ति धर्म के रास्ते पर चलेगा और धर्म के रास्ते पर चलते हुए वो मांस खाएगा उसका मांस छूट जाएगा। अगर व्यक्ति करता क्या है? हिंदू की बात कर रहा हूं। हिंदू करता क्या है? जी कि बलि के नाम पर वो कसाई की दुकान पर मिलने वाला मांस भी खा लेता है। जबकि कसाई की दुकान का मांस को मना किया गया है। 2 75 38 रामायण में मांस बेचने वाले को अपराधी कहा गया है। पापी कहा गया है। और मनुस्मृति में कसाय की दुकान से लाकर मांस खाने वाले को भी अपराधी कहा गया है। पापी कहा गया है। तो मेरे ख्याल से यह जो धर्म और अधर्म की जो व्यवस्था है वह आपको समझने में आई होगी कि छिपाने वाले भाव के ऊपर आधारित है। ठीक है। जी बिल्कुल।
00:20:32:29 [संगीत]
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आह्वान कक्षाएं : प्रश्नोत्तरी सत्र Part-1 भाग 1
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