⬜ Not used yet · 00:00:02:21 – 00:25:49:25 (25:47)
00:00:02:21 हमने सबसे पहले एपिसोड में यह जो रामपाल ने भगवत गीता का अपार्थ करना जो शुरू किया है वो किया है 2.10 से स्टार्ट किया है क्योंकि 2 तक उसको कुछ ऐसा लगा नहीं जो उसका अपार्थ किया जाए। हालांकि उसने अपनी भूमिका जरूर लिखी है जिसमें उसने बहुत सारी व्यर्थ की बातें कही है। मगर अगर श्लोक क्रमांक की बात करें तो 2.10 से उसने अपार्थ गलत अर्थ करना शुरू किया है भगवत गीता का। तो हमने वहीं से इस सीरीज को स्टार्ट किया और पहले एपिसोड में हमने 2.10 से 2.30 तक की बात की थी और दूसरे एपिसोड में हमने 2.31 से 2.52 तक बात की और आज हम 2.52 से 2.72 तक बात करने वाले हैं। पर जैसा कि हम सबसे पहले कुछ बुलेट पॉइंट्स बताते हैं। तो पिछले एपिसोड्स के कुछ बुलेट पॉइंट्स हम आपको बता देते हैं। यह 2.31 की जहां बात हो रही है रामपाल ने जो अपार्थ किया है उस किताब में वो हो रही है पेज प्रश्न संख्या 23 पर और यहां पर हम बुलेट पॉइंट्स ले लें तो महाभारत का युद्ध रामपाल के अनुसार धर्म युक्त धर्म युद्ध नहीं
00:01:17:25 था। धर्म युक्त युद्ध नहीं था। पहली बात। दूसरी बात यह है मतलब धर्म संस्थापना के लिए नहीं था वो। ठीक है? तो अब यहां पर एक बात आ जाती है कि रामपाल ने आगे चलकर के इन बातों को माना है कि जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म की वृद्धि होती है, मैं अवतरित होता हूं। काल धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होता है। मगर यहां पर दिखाया गया है कि यह जो युद्ध था, यह धर्म युक्त युद्ध नहीं था। तो फिर पहली बात आती है कि काल ने इसे धर्म युक्त क्यों बोला? तो यहां यह बात झूठ हो गई। इसी पंक्ति में कुछ आगे अगले पृष्ठ पर यह कह दिया गया है कि काल ने यह युद्ध करवाने के लिए हर भरसक प्रयास किया। पुरजोर प्रयास किया। झूठ और सच दोनों का आलंबन लिया। तो फिर बात वही आ जाती है कि जब काल झूठ और सच दोनों बोल रहा है। झूठ भी बोल रहा है। कई बार इनको लोग आकर के कुतर्क करते हैं कि वो अगर थोड़ा सा अपने बारे में बता रहा है तो क्या गलत है। ऐसे ऐसे बोलते बात को घुमाते हैं। मगर स्पष्ट वहां पर एक्सेप्ट किया है कि काल ने झूठ भी बोला। तो जब काल झूठ भी बोल रहा है अगले ही पन्ने पर काल यदि झूठ बोल रहा है तो कैसे पता लगाया जाए कि क्या उसने सच बोला और क्या उसने झूठ बोला तो इस हिसाब से काल की वाणी को प्रमाण
00:02:33:01 नहीं माना जा सकता पहली बात दूसरी बात ये आती है कि धर्म संस्थापना नहीं हो रही बल्कि अधर्म हो रहा है क्योंकि धर्म युक्त युद्ध नहीं है जबकि युद्ध करवाया जा रहा है मतलब जिस युद्ध से अधर्म होना है वो युद्ध क्यों करवाया जा रहा है काल के द्वारा यानी कि वो धर्म संस्थापना के लिए अवतरित नहीं काल जो है प्रकट नहीं या आता जाता नहीं है। ठीक है? दूसरी तो यह हो गई कि मैं आता जाता हूं। यह जो काल ने कहा अब बातें आती है कि धर्म युक्त युद्ध नहीं था। दूसरी इन्होंने एक बात कही है कि बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। इसमें इन्होंने पृष्ठ संख्या 23 पर कहा है बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। तो फिर इसमें बात आ जाती है कि यदि लाभ हानि को हम लाभ हानि से प्रभावित होते रहेंगे तो हम कभी मुक्त हो सकते हैं क्या? मुक्त कौन है? ईश्वर। ईश्वर के लिए ना कुछ लाभ है ना हानि है। यानी कि लाभ हानि में उसके लिए कोई अंतर नहीं। वो ईश्वर है। मगर यह कह रहे हैं कि लाभ हानि से मतलब होना चाहिए। आपको प्रभावित होना चाहिए। इसका अर्थ क्या हुआ? यह पृष्ठ संख्या 23 पर ही कह रहे हैं। तो इसका अर्थ क्या हुआ? कि भाई व्यक्ति मुक्त होगा कैसे? जब वो लाभ हानि से प्रभावित होता रहेगा।
00:03:48:04 दूसरी बात लाभ हानि से प्रभावित ना होने के लिए कहकर इन्होंने बहुत सारे श्लोकों का खंडन कर दिया। हालांकि धर्म युक्त युद्ध नहीं था। ऐसा कहकर इन्होंने अपनी भूमिका में कहा है कि महाभारत का युद्ध जो है वो धर्म युक्त युद्ध नहीं था और दो 31 में इस भगवान श्री कृष्ण ने इस युद्ध को धर्म युक्त युद्ध कहा है। यानी कि रामपाल ने दो 31 का खंडन किया। नहीं माना इस श्लोक को। यह भी आप गिनते जाइएगा। कितने श्लोक अस्वीकार किए गए रामपाल के द्वारा भगवत गीता के जो यह लोग दावा करते हैं कि 5% श्लोक जो है वो काल ने अपने मन से बोल दिए हैं। ठीक है? और 95% श्लोक बिल्कुल परफेक्ट है। वो सही है। परमात्मा का ज्ञान है उनमें। तो जो 95% श्लोक जो है उस हिसाब से अगर भगवत गीता में 700 श्लोक हैं तो उसमें से 35 श्लोक केवल ऐसे होने चाहिए जो रामपाल ने ना माने हो। बाकी के बाकी के जितने भी श्लोक हैं यानी कि 665 श्लोक उनको रामपाल को एज इट इज स्वीकारना पड़ेगा। उसमें उसमें ये नहीं कर सकता ये बात नहीं मानेंगे यहां जो लिखी है। ठीक है? मगर अभी तक जब उसने यह बात कही कि धर्म युक्त युद्ध नहीं था तो उसने दो 31 को नहीं माना। ठीक है?
00:05:03:18 इसके बाद जब उसने यह कह दिया कि बिना लाभ हानि के युद्ध करना संभव नहीं है। तो उसने बहुत सारे श्लोकों को नहीं माना है। मगर अभी तक इस सीरीज में हमने जहां तक पहुंचे हैं वहां तक कौन कौन-कौन से श्लोकों का खंडन है। दो 47 का खंडन है। इस बात के द्वारा दो 38 का खंडन है। दो 48 का खंडन है। दो 49 का खंडन है। दो 50 का खंडन है। ये वो श्लोक है जिनमें की समत्व बुद्धि लाभ हानि में जय पराजय में मृत्यु जीवन में सब में समत्व बुद्धि रखने की बात कही जा रही है। यानी कि परिणाम पर फल पर ध्यान ना देने की बात कही जा रही है। इत्यादि इत्यादि बातें की जा रही है। फल पर ध्यान ना देने के बारे में भी इसने बोला है आगे। तो इतने सारे श्लोकों का खंडन अभी तक हमें प्राप्त हो गया। कितने? पहला धर्म युक्त युद्ध नहीं था। दो 31 उसके बाद जो समत्व बुद्धि की बात कही गई है। 247 दो 38 दो 48 दो 49 दो 250 इन सब में समत्व बुद्धि की बात कही गई है। लाभ हानि में समत्व बुद्धि होनी चाहिए। जय पराजय में समत्व बुद्धि होनी चाहिए। तो इसने जब यह बात कह दी कि बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता तो इसने इन सारी इन इन श्लोकों का खंडन कर दिया। तो लगभग कितने श्लोक हो गए अभी तक हमारे पास? अभी तक हमारे पास हो गए छह श्लोक। ठीक है? यहां तक तो 50 52 तक। इसके बाद आगे जब चले तो इसने पृष्ठ संख्या 24 पर एक बात कही है
00:06:18:21 कि यदि क्षत्रिय का धर्म होता रक्षा करना, युद्ध करना तो भगवान श्री कृष्ण युद्ध छोड़कर भागते क्यों? हालांकि वह भगवान श्री कृष्ण है। हमने कई बार बताया है कि वह लीला पुरुषोत्तम है और वह ईश्वर है। ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है बल्कि वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्वनियामक है। भगवान श्री कृष्ण तो हमारे जो है वो सृष्टि के रचयिता भी है। तो क्या वो सृष्टि की रचना कर रहे हैं। तो ये कौन से धर्म में आता है? मनुष्यों के मनुष्यों के किस धर्म में आएगा? सृष्टि की रचना करना। तो इसलिए भगवान श्री कृष्ण के द्वारा किए जाने वाले जो की जाने वाली जो लीलाएं हैं उनका उदाहरण देकर के हम मनुष्यगत जो धर्म है उसका खंडन नहीं कर सकते। पहली बात। दूसरी बात ये है कि यहां पर इन्होंने ये मान लिया कि भगवान श्री कृष्ण भी क्षत्रिय थे। मगर यदि क्षत्रिय का धर्म होता यदि क्षत्रिय धर्म होता कर्म कर्म से भागना ये क्षत्रिय का धर्म होता युद्ध लड़ना तो फिर वो युद्ध से भागते क्यों? ये इसने कहा। इसका मतलब यह है कि यह मानता है कि जन्म से वर्ण होता है। कर्म से नहीं जो यह लोग कहते हैं ना कि जिसने ब्रह्म को जान लिया वही ब्राह्मण है। नहीं इसने यहां पर कर्म से इसने यहां पर जन्म से भगवान श्री कृष्ण को क्षत्रिय माना। ठीक है? क्योंकि
00:07:34:00 कर्म पे तो प्रश्न उठा रहा है वो कि वो भागे युद्ध लड़ा या नहीं लड़ा कर्म पे तो प्रश्न उठा रहा है। मगर वो क्षत्रिय किस हिसाब से कह रहा है। क्षत्रिय थे तो किस हिसाब से थे। ठीक है? तो यह बात हो गई। दूसरी आगे की बात क्या है कि काल ने युद्ध करवाने के लिए झूठ सच का सहारा लिया। तो फिर पहले तो वही बात आ गई कि कौन सी बात काल की झूठ है? कौन सी बात सच है? इसका पैरामीटर क्या है? तो फिर हम काल की किसी भी बात के आधार पे किसी को तत्वदर्शी क्यों मान ले? काल की किसी भी बात के आधार पे हम ये क्यों मान ले कि उस उस ब्रह्म की शरण में जा। हम ये वाली बात हो गई। दूसरी एक बात यह हो गई कि यह जो युद्ध करवाने के लिए झूठ सच का सहारा ले रहा है काल तो क्या उस समय लोग मर नहीं रहे थे स्वतः मौतें नहीं होती थी उस समय मृत्यु नहीं होती थी लोगों की जो उसको युद्ध करवाना पड़ रहा है और अगर युद्ध करवा के ही लोग मृत्यु को प्राप्त होने हैं तो ऐसे में फिर आज वो युद्ध क्यों नहीं करवा रहा है उसको तो प्रतिदिन कहीं ना कहीं युद्ध करवाते रहना चाहिए लगातार युद्ध होते रहना चाहिए यदि युद्ध से ही उसकी जो भूख है वो मिटनी है। पहली दूसरी बात ये आ गई। तीसरी बात यह आ गई यदि उसने चाल चली
00:08:49:08 थी वह सच झूठ का सहारा ले रहा था युद्ध करवाने के लिए तो उसको यह मानना फिर हमें ये मानना पड़ेगा कि उसके लिए उसने जो परमात्मा के बारे में इसके अनुसार जो बातें कही है काल ने वो बातें भी झूठी हो गई है ना फिर ये कैसे निर्धारण करें भाई परमात्मा के बारे में उसने ये कहा कि वो ये है वो वो है रामपाल के अनुसार तो फिर वो बातें कैसे मान ले जब वो युद्ध करवाने के लिए कह रहा हो सकता है परमात्मा के बारे में भी जो बातें यहां लिखी हुई है वो भी युद्ध करवाने जैसी युद्ध करवाने के लिए चाल हो। ठीक है? आगे चलते हैं। अच्छा इसने फिर अगली लाइन में तीनों गुणों ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति से रहित है ना कि जो व्यक्ति ये 39 से 45 तक का अर्थ समबुद्धि योग होकर कर्म बंधन से मुक्त हो जा। ठीक है? यह 39 से 45 का भी खंडन किया इसने।
00:09:46:00 कर्म बंधन से मुक्त हो जा। क्यों? क्योंकि यहां पर सम बुद्धि की बात हुई 39 से 45 में तो इसका भी खंडन किया और इसने खंडन किया और यह कहा कि तीनों गुणों विष्णु इसने क्योंकि ये ब्रह्मा विष्णु महेश को गुण मानता है। सत रज और तम तो इसने कहा कि तीनों गुणों की भक्ति से रहित हो जा। तो इनके कुछ चेले आकर के जब यह कहते हैं आप लोगों को कि भैया हम तो ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति बताते हैं तो उनको ये दे मारना उनके मुंह पे कि ये देख 24 में क्या लिखा हुआ है कि तीनों गुणों की ब्रह्मा विष्णु महेश को एक गुण मानते हैं और यहां कह रहे हैं कि तीनों गुण ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति से रहित हो जा हट जा ठीक है अच्छा दूसरी बात अगला पॉइंट आता है कि इसने यह माना है कि वेद यानी ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद यहां पर इसने कहीं नहीं कहा कि वेद माने सूक्ष्म वेद भी है। यह नहीं माना। इसने बोला वेद यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। ये मान लिया इसने। ठीक है? अ ये पष्ठ संख्या 24 चल रही है इस समय। इसके बाद क्या
00:11:01:01 है? इसी पैराग्राफ में जहां पर इसने वेद यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहा है। उसी पैराग्राफ में इसने यह बात कही है कि वो सांसारिक वस्तुओं की कामना करने वाले जो लोग हैं जो सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए है ना भोग की प्राप्ति के लिए जो भक्ति करते हैं भगवान की उनको निम्न कहा है। मतलब ऐसा कहा है कि ऐसी इस विधि का आलंबन नहीं लेना चाहिए। तो जब इस विधि का आलंबन नहीं लेना चाहिए तो जितना यह बताते हैं कि मैं वहां गया तो मेरा यह रोग ठीक हो गया रामपाल के उसमें जाकर के शरण में जाकर के मुझे पैसा मिल गया मेरे को लॉटरी लग गई मेरा यह हो गया मेरा वो हो गया पोस्टर आते हैं ये सब तो यह सारी भक्ति जो इनके यहां बताई जा रही है वो कामनाओं के लिए भक्ति बताई जा रही है तो यहां पर ये क्या कह रहे हैं कि जो सांसारिक वस्तुओं की कामना करते रहते हैं वो लोग जो है उनकाित तीनों गुणों से मिलने वाले लाभ की वाणी यानी अज्ञान से हर लिया गया है। ऐसे व्यक्तियों की साधना में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। तो यहां पर मना किया गया है। निम्न कहा गया ऐसे लोगों को। इसके आगे क्या है? इसके आगे इस पूरी जो इन्होंने खिचड़ी पकाई है इस पूरी खिचड़ी
00:12:16:12 में जगह-जगह पर अनुवाद लिखा हुआ है कि गीता अध्याय दो श्लोक 46 का अनुवाद। तो जब यह अनुवाद लिख रहे हैं तो अनुवाद का मतलब होता है कि ट्रांसलेशन यानी वर्ड टू वर्ड ट्रांसलेशन और अगर हम उसमें अपनी व्याख्या दे रहे तो वो अलग से होती है। टिप्पणी, व्याख्या, भाष्य, परपट मगर ये अनुवाद के नाम पर ही बहुत सारे ऐसे शब्द डाल रहे हैं। लगता है इनको अनुवाद का अनुवाद भी नहीं पता। इतने बड़े गवार हैं। तो यह क्या कर रहे हैं? अनुवाद के नाम पर एक एक पैराग्राफ दो दो पैराग्राफ लिख रहे हैं। ट्रांसलेशन नहीं लिख रहे उसका। तो यह भी ध्यान रखने वाली बात है। उसके बाद क्या है? आगे चलते हैं। 247 247 में इन्होंने कोई व्याख्या नहीं की है। जबकि वो एक समझाया जाने वाला श्लोक है 247 मगर इन्होंने 247 में कोई व्याख्या नहीं की है और सीधेसीधे लिख दिया है कि 247 में कहा है कि कर्म फल की इच्छा मत कर। हालांकि हमने पहले ही वहां बता दिया है कि लाभ हानि की लाभ हानि में समत्व बुद्धि ना रखने की बात कह करके इन्होंने 247 सहित बहुत सारे श्लोकों का खंडन किया है। इसके बाद 247 पर इनके तत्व ज्ञान की पिक्चर फ्लॉप हो गई और तत्व ज्ञान की
00:13:31:15 जब फिल्म पिट जाने के बाद फिर ये आगे चलते 248 से 250 तक का भाव बताते हैं। यहां पर फिर से वही बिना बिना संस्कृत शब्दों के अनुवाद के नाम पर ये शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म प्रभु की एक प्रभु की करना ही श्रेयकर है। साधना करता है। शास्त्र विरुद्ध भक्ति ये बहुत सारे उसमें ऐसे शब्द डाले जिनका श्लोक में कहीं वर्णन ही नहीं है। है ना? तत्वदर्शी संत द्वारा बताया गया भक्ति मार्ग और किसी को बुलाकर पाठ करवाना अपने यहां ये सब इन्होंने गलत बताया है। इसी पैराग्राफ में इन्होंने कहा है कि गुरुदेव के आदेश का पालन करना ही सत्य भक्ति में हितकर है। अब यहां सवाल आता है कि गुरु की व्याख्या क्या इनको पता है? गुरु वो है जो आपके आपकी अविद्या को नष्ट करे। अंधकार को नष्ट करे। तो अंधकार को नष्ट करने का मतलब यह नहीं होता है कि फलानी श्लोक संख्या में यह लिखा है या यह लिखा है। अंतत गत्वा जो प्रमाण है जो शास्त्र है उनके वचनों का आधार बताते हुए एट द एंड आपको ब्रह्म तत्व की व्याख्या करनी होगी। ब्रह्म तत्व कैसा है? वो व्याख्या यहां नहीं मिलती है। है ना? निराकार है, साकार है। इस तरह से जो तात्व व्याख्या है कि जब भगवान सृष्टि बना रहे हैं तो वह कहां खड़े होकर के बना रहे
00:14:46:18 हैं या और भी इस तरह के सवाल सवाल है कि जैसे कि आगे चलकर के इन्होंने ये कहा है कि जो आत्मा है जो सतलोक में जाकर के परमात्मा की भक्ति करती है। अंतत गत्वा वो वहां पर अनामी अनामी परमात्मा की भक्ति करके परमात्मा में लीन हो जाती है। जीवन मरण के बंधनों से छूट जाती है। तो परमात्मा में लीन होने का क्या मतलब हुआ? आत्मा और परमात्मा एक हो गए। अब आत्मा परमात्मा से तो आई नहीं है। अलग से आई है। तो सबसे पहली बात तो ये है कि वो तत्व आया कहां से? वो कहां था? उससे पहले था कि नहीं था? क्या हुआ था? दूसरी बात है जब वो कोई अलग से कोई चीज है जो इसमें जाकर के मिल रही है। पानी की एक बूंद वापस पानी में गिर रही है तो पानी की क्वांटिटी वहां बढ़ती है तो क्या आ जो परमात्मा है वो घटता बढ़ता है ये सारी तात्विक विवेचना इनकी गायब है। तो ये गुरु कहां से हुए? हां। अब आगे चलते हैं। अब इसमें दो 51 में कहा है कि सतलोक में जाकर फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। कैसे चला जाता है? भजन शास्त्रानुकूल अर्थात मतानुसार मेरे बताए अनुसार करता है जो भजन मेरे बताए अनुसार अब इसके इनके
00:16:01:20 बताए अनुसार तो ये तो सच और झूठ दोनों बोलते हैं। पहली बात दूसरी बात सतलोक में जाकर फिर वहां से आगे अनामी अर्थात जन्म मरण के रोग को समाप्त कर कर जाता है। लोक सतलोक से आगे अनामी लोक में चला जाता है। अब यहां यह बात आती है कि क्या सतलोक परमधाम नहीं है? क्या सतलोक मुक्ति धाम नहीं है? तो सतलोक का जो ईस्ट है वो कौन है? कबीर तो क्या कबीर मुक्ति दाता नहीं है? हम क्योंकि सतलोक से आगे जा रही है ना आत्मा तो मुक्ति के लिए। ठीक है। दूसरी बात क्या है कि लाभ हानि यहां पे कर्मवादी कारस्ते फलेशु कदाचना में कर्म कर फल की इच्छा मत कर। यह मानकर इसने अपनी ही बात को कंट्राडिक्ट भी कर दिया क्योंकि इसने वहां क्या माना है कि लाभ हानि के बिना युद्ध कैसे होगा हम और यहां क्या कह रहा है कि कर्म कल कर्म कर फल की इच्छा मत कर और ऐसे बहुत से श्लोकों में इसमें माना भी है आगे कंट्राडिक्शन वहां आपको दिख जाएगा तो अब सतलोक में जाकर वहां से आगे अनामी लोक में आत्मा जाकर के मुक्त हो जाती है तो क्या सतलोक परमधाम नहीं है आत्मा का बताया गया है कहीं आत्मा जो है मनुष्य के आकार में रहती है।
00:17:16:26 प्राणी मानव रूप में मानव रूप में आकार में रहता है। तो प्राणी का वास्तविक आकार क्या है? जब वो मानव के रूप में रह रहा है। है ना? तो उसका वास्तविक आकार क्या है? ये तत्व विवेचना गायब है। अच्छा इसने अब इसमें आगे माना है। बहुत जरूरी बात है। इसको ध्यान से सुनिए कि इसमें आगे इसने उदाहरण दिया है कि जो सतलोक है, अनामी लोक है, एक अलग लोक है। ठीक है? इन तीनों में कबीर ही हैं। मगर इन तीनों अलग-अलग लोकों में उनका अलग-अलग रोल है। और फिर उदाहरण दिया जैसे प्रधानमंत्री जब गृह मंत्री के का काम करने लगता है और गृह मंत्री होते हुए जब वो हस्ताक्षर करता है तो उसके हस्ताक्षर की वैल्यू उतनी नहीं होती है जितनी प्रधानमंत्री होते हुए होती है। तो यहां इसने क्या माना? एक ही व्यक्ति अलग-अलग रोल कर सकता है। एक ही तत्व अलग-अलग रोल कर सकता है और वह किसी रोल में छोटा और किसी रोल में बड़ा हो सकता है। तो ब्रह्मा विष्णु महेश के बड़ा और छोटा होने वाली लीलाओं से इसे क्या आपत्ति है? जब अपने में कबीर के द्वारा जो लीला है उसको मान रहा है। अब बात यह आती है कि अगर ये नहीं मानता है उनकी तो हम प्रश्न कर सकते हैं कि कबीर को भी हम सिद्ध कर सकते हैं कि वो पूर्ण ईश्वर नहीं है। कैसे? क्योंकि सतलोक में मुक्ति नहीं है। क्योंकि सतलोक से आत्मा आगे जाती है। तो सतलोक का ईश्वर अगर कबीर है तो मुक्ति नहीं। ये कहेंगे कि वहां
00:18:32:02 अनामी लोक में भी तो वही है। तो भैया इसी प्रकार से परम ब्रह्म में भी तो शिव है। अगर शिव कहीं पर दासत्व भाव में है तो परमात्म भाव में भी तो शिव है। वहां क्यों नहीं मानते हो? और यहां क्यों मान रहे हो? तो इसको कहते हैं अन्याय। इसको कहते हैं पक्षपात। इसको कहते हैं द्वेष। इसको कहते हैं चालाकी, धूर्तता, झूठ, धोखा। ठीक है? महाभारत में एक श्लोक है कि अन्यों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा स्वयं के लिए चाहते हैं। तो उसका खंडन है कि जब कबीर की बात आई तो तो मान लिया कि अनामी लोक में भी तो वही बैठा है। मगर जब ब्रह्मा विष्णु महेश के लिए दो तरह की बातें आ रहे हैं। तो ये नहीं मान रहे कि यहां पर वो एक लीला में दिख रहे हैं। जैसे सतलोक में कबीर लीला में दिख रहा है। मगर अनामी भी वही है। अनामी लोक में भी वही है। तो इसी प्रकार से भगवान एक लीला में दासत भाव में दिख रहे हैं। परंतु अंतत वो परम ब्रह्म भी है। मुक्ति दाता भी हैं। ठीक है? इसके बाद क्या है? इसके बाद है सतलोक में अनामी की भक्ति द्वारा मोक्ष होगा। तो यहां ये आप दिखा सकते हो। अनामी की भक्ति द्वारा मोक्ष होगा। सतलोक में जाकर के भी भक्ति करनी है। सतलोक में परमधाम नहीं है। जीवन मरण से मुक्ति नहीं है सतलोक में। ठीक है? अच्छा। ईश्वर में लीन
00:19:47:03 होने वाली बात हमने पूछ ही ली है कि आत्मा जब ईश्वर में लीन हो जाएगी तो क्या ईश्वर की क्वांटिटी बढ़ती है? हम इसके आगे है। फिर इसने 248 में फिर अपनी बात को काट दिया। जय पराजय समुद्धि का पक्ष ले लिया। अब यहां से एक बात और आती है 248 को जो इसने कहा है कि समबुद्धि रख के भक्ति कर। तो समबुद्धि रखकर जय पराजय में समबुद्धि रख के भक्ति कर। तो अब यहां क्या दिक्कत आती है? यहां पे कर्म की बात हो रही है हमारी भगवत गीता में। मगर इसने इसमें भी भक्ति की बात कर दी है। तो जब कर्म की जगह पर भी भक्ति दिखा दी इसने। तो व्यक्ति जो सामान्य कर्म करता है शास्त्र के अनुसार उस उस समय क्या भाव रखना होगा मन में यह इसने नहीं बताया क्योंकि जहां पर यह बताया गया वहां तो इसने भक्ति को डाल दिया कि समभाव रख के तू भक्ति कर तो जो कर्म करना है शास्त्रों के हिसाब से या मान लीजिए वस्त्र पहनने हैं कुछ भी करना है विवाह संस्कार होना है कोई भी संस्कार होना है कोई भी कर्म करना है तो होना तो वो शास्त्रों के हिसाब से ही है मगर तुमने जहां पर कर्म कर्म करते समय की भावना बताई है जैसे जैसे क्षत्रिय को अपना क्षत्रियत्व का पालन करना है, रक्षा करनी है। तो ये रक्षा करते समय उसके अंदर क्या भाव होगा? इसकी व्याख्या कहां है? क्योंकि यहां तो तुमने भक्ति ले लिया कि भक्ति करते समय क्या भाव होना चाहिए? तो फिर कर्म
00:21:02:14 करते समय क्या भाव होना चाहिए? यह कहां पर मिलेगा? तो ये एक और भांडा फूटा रामपाल का। इसके आगे हम चलते हैं। फल की इच्छा रखने वाला कंजूस। ये देखिए यहां पर भी अपनी बात को काट दिया। उधर क्या कह रहा है? पष्ठ संख्या 23 पर क्या कह रहा है? लाभ हानि के बिना युद्ध हो सकता है क्या? यह कह रहा है पष्ठ संख्या 23 पर और लाभ हानि के बिना नहीं हो सकता। ठीक है? और और क्या कह रहा है कि फल की इच्छा रखने वाले को कंजूस कहा है। किस में कहा है? पष्ठ संख्या 30 और उसमें श्लोक संख्या दो 49 का अनुवाद बताते समय इसने कहा है कि तत्वदर्शी संत की शरण में जाने का मार्ग खोज क्योंकि फल की इच्छा रखने वाला तो कृपण यानी कंजूस जैसा जो धन का यथार्थ अब इसने क्या किया जहां पर लाभ हानि का लाभ हानि के बिना लाभ हानि के बिना युद्ध होने का खंडन किया है वहां पे इस श्लोक का इसने खंडन वहां कर दिया और यहां पे इस श्लोक का क्योंकि पक्ष ले रहा है तो अपनी उस बात का यहां पे खंडन कर दिया तालियां
00:22:18:00 कॉमेडी शो बाय रामपाल तो इसने एक जगह कहा कि लाभानि मत रखो लाभानि के बिना युद्ध लाभहानि रखो लाभानि के बिना युद्ध नहीं हो सकता अब यहां कह रहा है कि फल की इच्छा रखने वाला तो कंजूस होता है लाभहानि में से किसी लाभ की इच्छा रखने वाला कंजूस होता है तो यहां पे खंडन कर दिया अपनी बात का खंडन करते हैं हमको रामपाल को उत्तर देने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है केवल इसकी भगवत ये जो भगवत गीता का जो भाष्य अपार्थ किया है इसको आप उठा लीजिए। कोई भी इसकी बुक उठा लीजिए। उसी में इसका खंडन है। आगे चलते हैं। केवल मोक्ष के लिए भक्ति फिर से कर्म गायब हो गया। इसने कहा कि केवल मोक्ष के लिए भक्ति कर। तो इसने फिर कर्म को गायब कर दिया। जब कर्म गायब है तो फिर हमें देखना पड़ेगा कि जब यहां पर भक्ति के लिए भगवान ने कहा है कि भक्ति इस तरह से कर। ऐसा भाव मन में रख के कर। तो फिर कर्म किस किस भाव के साथ करेंगे। ठीक है? आगे चलते हैं। क्या कहा है? सनातन परमधाम किसको कहा है? अनामय लोक को। सतलोक को नहीं कहा है। सतलोक परमधाम नहीं है। भग इनका जो भगवत गीता है गरिमा गीता की का पृष्ठ संख्या 30 उसमें दो 51 का अर्थ बताते समय इन्होंने कहा है
00:23:33:13 कि ज्ञानी उस सनातन परमधाम में चले जाते हैं जहां पर परम शांति है तथा उस सनात स्थान पर गए साधक फिर लौटकर संसार में नहीं आते। तो 251 में इन्होंने परमधाम अनामय को माना है। सतलोक को नहीं परमधाम अलग है। ठीक है? मोह रूप दलदल भांतिभांति पार कर जाएगी। हमने शुरू से ही कहा है कि व्यक्ति फंसा क्यों है? क्योंकि वह मोहित है। अविद्या से ग्रसित है। और दो 16 में क्या बताया था कि जो व्यक्ति विद्या और अविद्या को ठीक ठीक समझ लेता है। समझाता है वही तत्वदर्शी होता है। तो विद्या और ये जो अविद्या है यहां पे वही बात फिर से आ रही है। मोह रूप दलदल से पार कर जाए। मुक्ति आपकी उसी में है जब आपको ये जो कॉन्शियसनेस है रियलिटी वो आपको प्राप्त हो जाए। इसके बाद एक बात और कही है दो 52 को दो 52 में कि लोक वेद उसने कहा लोक वेद अब बात यह आती है कि यह कहता है कि ये जो हमारे चार वेद है हालांकि पहले कह चुका है वेद यानी कि ऋग यजुर साम और अथर्व। ठीक है? मगर अब यहां पे लोग इन चारों को लोकवेद इसने कह दिया दो 52 का अर्थ करते समय और अलग से कोई
00:24:48:14 सूक्ष्म वेद इसने बताया। अब बात यह आती है कि जब इसने इसको लोकवेद कहा तो लोक वेद का मतलब है लोक के अंदर वेद। अगर ग्रंथ की बात करें तो तो क्या इसका जो सूक्ष्म वेद है वो लोक के अंदर नहीं है। लोक से बाहर है। व्यक्ति उसको परलोक जाकर के पढ़ता है। स्पेसशिप में बैठता है फिर पढ़ के आता है। फिर नीचे आता है। ऐसा है क्या? तो ये भी सोचने वाली बात है। अब हम आगे चलते हैं। ये हमारे यहां तक के बुलेट पॉइंट्स हो गए एपिसोड टू के। फिर से सुन लीजिए। अगर इसको विस्तार से जानना है तो आपको वो एपिसोड देखना पड़ेगा एपिसोड टू वाला। अन्यथा संक्षिप्त विवरण हमने यहां पर आपको दे दिया। अब हम लोग आगे चलते हैं।
00:25:31:19 तो भगवत गीता दो श्लोक 46 से 53 का सारांश फिर से इसमें 46 से 53 का सारांश हां दो से भगवत गीता दो 53 तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात हाथी भांति के वचन
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→ Used in: B · Live रामपाल का गीता ज्ञान अनपढ़, गंवार और फूहड़ की पहचान BIG ANNOUNCEMENT रामपालियो... at 49:27 ↗
→ Used in: A · Live Discussion With Official Representative of Satlok Aashram #satlokashram#rampalma... at 8:23 ↗
→ Used in: A · Video जेलदर्शी की किताबों को सही सिद्ध करने आया चेलाखुद को बाबा का भगत भी सिद्ध नहीं क... at 2:45 ↗
00:25:49:25 यानी अज्ञान से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान में पूर्ण रूप से निश्चल रूप से स्थाई स्थिर हो जाएगी तब तू योग यानी यथार्थ भक्ति को प्राप्त हो
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00:26:02:27 जाएगा। अब सबसे बड़ी बात क्या है? यहां पर एक बहुत बड़ा कैची पॉइंट है। इसको नोट कर लीजिएगा भाई। टाइमिंग टाइम स्लॉट बहुत बड़ा कैची पॉइंट है। इसने क्या कहा? तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात तत्व ज्ञान प्राप्त होने
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00:26:18:19 के पश्चात भांति भांति के वचनों यानी अज्ञान से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान में पूर्ण रूप से निश्चल रूप से स्थाई स्थिर हो जाएगी तब तू योग को यानी यथार्थ भक्ति को प्राप्त हो जाएगा। यानी
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00:26:33:27 कि यथार्थ भक्ति कब प्राप्त हो रही है? तत्व ज्ञान के पश्चात। अब रामपाल के अनुसार इस दुनिया में इस संसार में तत्व ज्ञानी कौन है? कौन है तत्वज्ञानी? रामपाल के अनुसार इस संसार में तत्वज्ञानी एकमात्र रामपाल दास ही है। क्या लिखा है? 28 नंबर पृष्ठ संख्या इसने अपने बारे में बताया है। वर्तमान में यानी सन 2012 में मेरे रामपाल दास के अतिरिक्त सात अरब मनुष्यों में से कोई भी वो संत नहीं है। ठीक है? तो यानी कि ये लोग जो एक दूसरे को भगत कहते हैं, भगत कहना बंद कर दे। ये लोग भक्त नहीं है। यथार्थ भक्त नहीं है। बेवकूफ भक्त हो तुम सब के सब। क्योंकि तुम तत्वज्ञानी तो हो नहीं। या तो कहो तत्व ज्ञानी है तो रामपाल दास की बात का खंडन करो। कहो कि हम भी तत्व ज्ञानी है। हम भी तत्वज्ञानी है। कहो मूर्खता की पराकाष्ठा करो। अभी लिंक दिया जाएगा। किसी को आना हो तो आना। ठीक है। तो रामपाल दास के
00:27:49:22 के अतिरिक्त कोई भी दुनिया में तत्व ज्ञानी नहीं है। अकॉर्डिंग टू रामपाल तो यदि नहीं है तो इसका अर्थ क्या हुआ कि जो भी लोग उसके फॉलोअर्स है वो भक्त नहीं है। इसने कह दिया तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात ही तत्व ज्ञानी होने के बाद ही यथार्थ भक्ति को प्राप्त होगा। ज्ञानी तब तू भक्त बनेगा। तुम सब भक्त नहीं हो। तुम्हारे गुरु के अनुसार हां ना आप कहना मैं भक्त हूं और एक दूसरे भगत भगत कहना तब बताऊंगा भगत जी भगत जी दिमाग खराब कर रखा है आगे चलते हैं वैसे दो 52 में प्रामाणिक अर्थ क्या कहता है वो भी हम लोग पढ़ते चले जिससे कि हम हम लोगों का आत्म कल्याण भी होता
00:28:43:16 रहे जिस काल में तेरी बुद्धि मोह रूप दलदल को भांति दलदल को भांति भलीभांति पार कर जाएगी। यह हो गया। भांति भांति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल स्थिर। अब इसने क्या किया ना यहां पर तत्व ज्ञान बोला नहीं गया है। ठीक है? मगर क्या कहते हैं? इन्होंने यहां तत्व ज्ञान को डाल के अपने भक्तों को फसा दिया। यहां तत्व ज्ञान नहीं बोला है। मगर तुमने तत्व ज्ञान डाल के अपने भक्तों को फसा दिया। अपने फॉलोअर्स को फसा दिया। सब के सब भक्त भक्ति रहित है। क्योंकि कोई तत्व ज्ञानी नहीं है रामपाल के अलावा।
00:29:20:00 यह लोग बस वो भूत की तरह कॉपी पेस्ट करते रहेंगे जो इनको ट्रेनिंग प्रोटोकॉल में सिखाया जाता है। खैर अब आगे चलते हैं। [संगीत]
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रामपाल का मनमौजी गीता अर्थ #3 अध्याय 2 का #श्लोक #gita #gitagyan
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