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00:00:01:25 सभी को जय श्री राम। तो आप सबका स्वागत है और हम लोग अध्ययन कर रहे हैं श्रीमद् भगवत गीता का और एक एक श्लोक पर बात कर रहे हैं कि इस रामपाल नाम के व्यक्ति ने जेल में बंद अपराधी ने क्या-क्या खिलवाड़ किया है। श्रीमद् भगवत गीता में जो भगवान श्री कृष्ण ने वचन कहे उनके साथ और इसी सीरीज में हमारे दो सेशंस हो चुके हैं। कोशिश हमारी यह थी कि हम एक सप्ताह में दो बार ये रख सके जिससे कि जल्दी से पूरा एक कोर्स जैसा बन जाए कि किस श्लोक में क्या छेड़खानी की है और रामपाल के वैसे तो बहुत गिरे हुए निम्न स्तर के कुतर्क होते हैं। फिर भी आपको इससे मदद मिल सके और लगभग प्रत्येक श्लोक का उसने जो अपार्थ किया है उसका उत्तर आपको इस सीरीज में मिल जाए। आपको केवल हमारी हमारी वो प्लेलिस्ट खोलनी पड़े और वहां जाकर के देखना पड़े कि यहां पर क्या-क्या बताया गया है। इसके साथ ही साथ इसी रूप में श्रीमद् भगवत गीता का आह्वान के साथ एक अध्ययन जैसा भी हो रहा है आप लोगों का।

00:01:17:00 तो काफी रोचक है मेरे लिए। काफी रोचक है ये। बाकी आप लोगों का जो व्यू है वह आप लोग बताएंगे। सभी को जय श्री राम। सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और सभी के लिए ढेर सारा आशीर्वाद जो प्रणम है उनका उनको यथोचित आदर पूर्वक प्रणाम। और सभी का यतोचित अभिवादन

00:01:51:28 और आज एक सर्वशक्तिमान धर्म चैनल जो हमारा दूसरा है वहां पर एक बहुत ही अच्छी सुव्यवस्थित मैत्रीपूर्ण एक वार्ता हुई है। एक डिस्क डिस्कशन हुआ है। चर्चा हुई है। किस संबंध में? वर्ण व्यवस्था के संबंध में। आप लोगों को वो देखनी चाहिए। काफी अह समझने में चीजें मिलेंगी। हां, आज थोड़ी सी देर हो गई है। तो, सबसे पहले हम लोग बात कर लेते हैं।

00:02:19:22 हमने सबसे पहले एपिसोड में ये जो रामपाल ने भगवत गीता का अपार्थ करना जो शुरू किया है वो किया है। 2.10 से स्टार्ट किया है। क्योंकि 2.10 तक उसको कुछ ऐसा लगा नहीं जो उसका अपार्थ किया जाए। हालांकि उसने अपनी भूमिका जरूर लिखी है जिसमें उसने बहुत सारी व्यर्थ की बातें कही है। मगर अगर श्लोक क्रमांक की बात करें तो 2.10 से उसने अपार्थ गलत अर्थ करना शुरू किया है भगवत गीता का। तो हमने वहीं से इस सीरीज को स्टार्ट किया और पहले एपिसोड में हमने 2.10 से 2.30 तक की बात की थी और दूसरे एपिसोड में हमने 2.31 से 2.52 तक बात की और आज हम 2.52 से 2.72 तक बात करने वाले हैं। पर जैसा कि हम सबसे पहले कुछ बुलेट पॉइंट्स बताते हैं। तो पिछले एपिसोड्स के कुछ बुलेट पॉइंट्स हम आपको बता देते हैं। यह 2.31 की जहां बात हो रही है रामपाल ने जो अपार्थ किया है उस किताब में वह हो रही है पेज प्रश्न संख्या 23 पर और यहां पर हम बुलेट पॉइंट्स ले लें तो महाभारत का युद्ध रामपाल के अनुसार धर्म युक्त धर्म युद्ध नहीं

00:03:34:28 था धर्म युक्त युद्ध नहीं था पहली बात दूसरी बात यह है मतलब धर्म संस्थापना के लिए नहीं था वो ठीक है तो अब यहां पर एक बात आ जाती है कि रामपाल ने आगे चलकर के इन बातों को माना है कि जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म की वृद्धि होती है, मैं अवतरित होता हूं। काल धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होता है। मगर यहां पर दिखाया गया है कि यह जो युद्ध था, यह धर्म युक्त युद्ध नहीं था। तो फिर पहली बात आती है कि काल ने इसे धर्म युक्त क्यों बोला? तो यहां यह बात झूठ हो गई। इसी पंक्ति में कुछ आगे अगले पृष्ठ पर यह कह दिया गया है कि काल ने यह युद्ध करवाने के लिए हर भरसक प्रयास किया। पुरजोर प्रयास किया। झूठ और सच दोनों का आलंबन लिया। तो फिर बात वही आ जाती है कि जब काल झूठ और सच दोनों बोल रहा है। झूठ भी बोल रहा है। कई बार इनको लोग आकर के कुतर्क करते हैं कि वो अगर थोड़ा सा अपने बारे में बता रहा है तो क्या गलत है। ऐसे ऐसे बोलते बात को घुमाते हैं। मगर स्पष्ट वहां पर एक्सेप्ट किया है कि काल ने झूठ भी बोला। तो जब काल झूठ भी बोल रहा है अगले ही पन्ने पर काल यदि झूठ बोल रहा है तो कैसे पता लगाया जाए कि क्या उसने सच बोला और क्या उसने झूठ बोला तो इस हिसाब से काल की वाणी को प्रमाण

00:04:50:02 नहीं माना जा सकता पहली बात दूसरी बात ये आती है कि धर्म संस्थापना नहीं हो रही बल्कि अधर्म हो रहा है क्योंकि धर्म युक्त युद्ध नहीं है जबकि युद्ध करवाया जा रहा है मतलब जिस युद्ध से अधर्म होना है वो युद्ध क्यों करवाया जा रहा है काल के द्वारा यानी कि वो धर्म संस्थापना के लिए अवतरित नहीं। काल जो है प्रकट नहीं या आता जाता नहीं है। ठीक है? दूसरी तो यह हो गई कि मैं आता जाता हूं। यह जो काल ने कहा अब बातें आती है कि धर्म युक्त युद्ध नहीं था। दूसरी इन्होंने एक बात कही है कि बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। इसमें इन्होंने पृष्ठ संख्या 23 पर कहा है बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता। तो फिर इसमें बात आ जाती है कि यदि लाभ हानि को हम लाभ हानि से प्रभावित होते रहेंगे तो हम कभी मुक्त हो सकते हैं क्या? मुक्त कौन है? ईश्वर। ईश्वर के लिए ना कुछ लाभ है ना हानि है। यानी कि लाभ हानि में उसके लिए कोई अंतर नहीं। वो ईश्वर है। मगर यह कह रहे हैं कि लाभ हानि से मतलब होना चाहिए। आपको प्रभावित होना चाहिए। इसका अर्थ क्या हुआ? यह पृष्ठ संख्या 23 पर ही कह रहे हैं। तो इसका अर्थ क्या हुआ? कि भाई व्यक्ति मुक्त होगा कैसे? जब वो लाभ हानि से प्रभावित होता रहेगा।

00:06:05:06 दूसरी बात लाभ हानि से प्रभावित ना होने के लिए कहकर इन्होंने बहुत सारे श्लोकों का खंडन कर दिया। हालांकि धर्म युक्त युद्ध नहीं था। ऐसा कहकर इन्होंने अपनी भूमिका में कहा है कि महाभारत का युद्ध जो है वो धर्म युक्त युद्ध नहीं था और दो 31 में इस भगवान श्री कृष्ण ने इस युद्ध को धर्म युक्त युद्ध कहा है। यानी कि रामपाल ने दो 31 का खंडन किया। नहीं माना इस श्लोक को। यह भी आप गिनते जाइएगा। कितने श्लोक अस्वीकार किए गए रामपाल के द्वारा भगवत गीता के जो यह लोग दावा करते हैं कि 5% श्लोक जो है वो काल ने अपने मन से बोल दिए हैं। ठीक है? और 95% श्लोक बिल्कुल परफेक्ट है। वो सही है। परमात्मा का ज्ञान है उनमें। तो जो 95% श्लोक जो हैं उस हिसाब से अगर भगवत गीता में 700 श्लोक हैं तो उसमें से 35 श्लोक केवल ऐसे होने चाहिए जो रामपाल ने ना माने हो। बाकी के बाकी के जितने भी श्लोक हैं यानी कि 665 श्लोक उनको रामपाल को एज इट इज स्वीकारना पड़ेगा। उसमें उसमें ये नहीं कर सकता ये बात नहीं मानेंगे यहां जो लिखी है। ठीक है? मगर अभी तक जब उसने ये बात कही कि धर्म युक्त युद्ध नहीं था तो उसने दो 31 को नहीं माना। ठीक है?

00:07:20:19 इसके बाद जब उसने यह कह दिया कि बिना लाभ हानि के युद्ध करना संभव नहीं है। तो उसने बहुत सारे श्लोकों को नहीं माना है। मगर अभी तक इस सीरीज में हमने जहां तक पहुंचे हैं वहां तक कौन कौन-कौन से श्लोकों का खंडन है? दो 47 का खंडन है। इस बात के द्वारा दो 38 का खंडन है। दो 48 का खंडन है। दो 49 का खंडन है। दो 50 का खंडन है। यह वो श्लोक है जिनमें कि समत्व बुद्धि लाभ हानि में जय पराजय में मृत्यु जीवन में सब में समत्व बुद्धि रखने की बात कही जा रही है। यानी कि परिणाम पर फल पर ध्यान ना देने की बात कही जा रही है। इत्यादि इत्यादि बातें की जा रही है। फल पर ध्यान ना देने के बारे में भी इसने बोला है आगे। तो इतने सारे श्लोकों का खंडन अभी तक हमें प्राप्त हो गया। कितने पहला धर्म युक्त युद्ध नहीं था दो 31 उसके बाद जो समत्व बुद्धि की बात कही गई है दो 47 2 38 दो 48 दो 49 दो 50 इन सब में समत्व बुद्धि की बात कही गई है लाभ हानि में समत्व बुद्धि होनी चाहिए जय पराजय में समत्व बुद्धि होनी चाहिए तो इसने जब ये बात कह दी कि बिना लाभ के युद्ध नहीं हो सकता तो इसने इन सारी इन इन श्लोकों का खंडन कर दिया तो लगभग कितने श्लोक हो गए अभी तक हमारे पास अभी तक हमारे पास हो गए छह श्लोक ठीक है यहां तक तो 50 52 तक इसके इसके बाद आगे जब चले तो इसने पृष्ठ संख्या 24 पर एक बात कही है

00:08:35:25 कि यदि क्षत्रिय का धर्म होता रक्षा करना युद्ध करना तो भगवान श्री कृष्ण युद्ध छोड़कर भागते क्यों? हालांकि वो भगवान श्री कृष्ण है। हमने कई बार बताया है कि वो लीला पुरुषोत्तम है और वो ईश्वर है। ईश्वर किसी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है बल्कि वो सभी नियमों को बनाने वाला सर्वमक है। भगवान श्री कृष्ण तो हमारे जो है वो सृष्टि के रचयिता भी है। तो क्या वो सृष्टि की रचना कर रहे तो यह कौन से धर्म में आता है मनुष्यों के? मनुष्यों के किस धर्म में आएगा सृष्टि की रचना करना? तो इसलिए भगवान श्री कृष्ण के द्वारा किए जाने वाले जो की जाने वाली जो लीलाएं हैं उनका उदाहरण देकर के हम मनुष्यगत जो धर्म है उसका खंडन नहीं कर सकते। पहली बात। दूसरी बात ये है कि यहां पर इन्होंने ये मान लिया कि भगवान श्री कृष्ण भी क्षत्रिय थे। मगर यदि क्षत्रिय का धर्म होता यदि क्षत्रिय धर्म होता कर्म कर्म से भागना ये क्षत्रिय का धर्म होता है युद्ध लड़ना तो फिर वो युद्ध से भागते क्यों ये इसने कहा इसका मतलब यह है कि यह मानता है कि जन्म से वर्ण होता है कर्म से नहीं जो ये लोग कहते हैं ना कि जिसने ब्रह्म को जान लिया वही ब्राह्मण है। नहीं इसने यहां पर कर्म से इसने यहां पर जन्म से भगवान श्री कृष्ण को क्षत्रिय माना ठीक है? क्योंकि

00:09:51:01 कर्म पर तो प्रश्न उठा रहा है वह कि वह भागे युद्ध लड़ा या नहीं लड़ा। कर्म पर तो प्रश्न उठा रहा है। मगर वो क्षत्रिय किस हिसाब से कह रहा है? क्षत्रिय थे तो किस हिसाब से थे? ठीक है? तो ये बात हो गई। दूसरी आगे की बात क्या है? कि काल ने युद्ध करवाने के लिए झूठ सच का सहारा लिया। तो फिर पहली तो वही बात आ गई कि कौन सी बात काल की झूठ है, कौन सी बात सच है? इसका पैरामीटर क्या है? तो फिर हम काल की किसी भी बात के आधार पर किसी को तत्वदर्शी क्यों मान ले? काल की किसी भी बात के आधार पर हम यह क्यों मान ले कि उस उस ब्रह्म की शरण में जा। हम ये वाली बात हो गई। दूसरी एक बात ये हो गई कि यह जो युद्ध करवाने के लिए झूठ सच का सहारा ले रहा है काल। तो क्या उस समय लोग मर नहीं रहे थे? स्वतः मौतें नहीं होती थी। उस समय मृत्यु नहीं होती थी लोगों की जो उसको युद्ध करवाना पड़ रहा है और अगर युद्ध करवा के ही लोग मृत्यु को प्राप्त होने हैं तो ऐसे में फिर आज वो युद्ध क्यों नहीं करवा रहा है उसको तो प्रतिदिन कहीं ना कहीं युद्ध करवाते रहना चाहिए लगातार युद्ध होते रहना चाहिए यदि युद्ध से ही उसकी जो भूख है वो मिटनी है। पहली दूसरी बात ये आ गई। तीसरी बात यह आ गई यदि उसने चाल चली

00:11:06:09 थी वह सच झूठ का सहारा ले रहा था युद्ध करवाने के लिए तो उसको यह मानना फिर हमें ये मानना पड़ेगा कि उसके लिए उसने जो परमात्मा के बारे में इसके अनुसार जो बातें कही है काल ने वो बातें भी झूठी हो गई है ना फिर ये कैसे निर्धारण करें भाई परमात्मा के बारे में उसने ये कहा कि वो ये है वो वो है रामपाल के अनुसार तो फिर वो बातें कैसे मान ले जब वो युद्ध करवाने के लिए कह रहा हो सकता है परमात्मा के बारे में भी जो बातें यहां लिखी हुई है वो भी युद्ध करवाने जैसी युद्ध करवाने के लिए चाल हो। ठीक है? आगे चलते हैं। अच्छा इसने फिर अगली लाइन में तीनों गुणों ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भक्ति से रहित है ना कि जो व्यक्ति ये 39 से 45 तक का अर्थ समबुद्धि योग होकर कर्म बंधन से मुक्त हो जा। ठीक है? यह 39 से 45 का भी खंडन किया इसने।

00:12:03:01 कर्म बंधन से मुक्त हो जा। क्यों? क्योंकि यहां पर समबुद्धि की बात हुई 39 से 45 में तो इसका भी खंडन किया और इसने खंडन किया और यह कहा कि तीनों गुणों विष्णु इसने क्योंकि ये ब्रह्मा विष्णु महेश को गुण मानता है। सत रज और तम तो इसने कहा कि तीनों गुणों की भक्ति से रहित हो जाते। तो इनके कुछ चेले आकर के जब यह कहते हैं आप लोगों को कि भैया हम तो ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति बताते हैं तो उनको ये दे मारना उनके मुंह पे कि ये देख 24 में क्या लिखा हुआ है कि तीनों गुणों की ब्रह्मा विष्णु महेश को एक गुण मानते हैं और यहां कह रहे हैं कि तीनों गुण ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति से रहित हो जा मुख हट जा ठीक है अच्छा दूसरी बात अगला पॉइंट आता है कि इसने यह माना है कि वेद यानी ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद यहां पर इसने कहीं नहीं कहा कि वेद माने सूक्ष्म वेद भी है। यह नहीं माना। इसने बोला वेद यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। ये मान लिया इसने। ठीक है? अ ये पष्ठ संख्या 24 चल रही है इस समय। इसके बाद क्या

00:13:18:02 है? इसी पैराग्राफ में जहां पर इसने वेद यानी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहा है। उसी पैराग्राफ में इसने यह बात कही है कि वो सांसारिक वस्तुओं की कामना करने वाले जो लोग हैं जो सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए है ना भोग की प्राप्ति के लिए जो भक्ति करते हैं भगवान की उनको निम्न कहा है। मतलब ऐसा कहा है कि ऐसी इस विधि का आलंबन नहीं लेना चाहिए। तो जब इस विधि का आलंबन नहीं लेना चाहिए तो जितना यह बताते हैं कि मैं वहां गया तो मेरा यह रोग ठीक हो गया रामपाल के उसमें जाकर के शरण में जाकर के मुझे पैसा मिल गया मेरे को लॉटरी लग गई मेरा यह हो गया मेरा वो हो गया पोस्टर आते हैं ये सब तो यह सारी भक्ति जो इनके यहां बताई जा रही है वो कामनाओं के लिए भक्ति बताई जा रही है तो यहां पर ये क्या कह रहे हैं कि जो सांसारिक वस्तुओं की कामना करते रहते हैं वो लोग जो है उनका चित्त तीनों गुणों से मिलने वाले लाभ की वाणी यानी अज्ञान से हर लिया गया है। ऐसे व्यक्तियों की साधना में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। तो यहां पर मना किया गया है। निम्न कहा गया ऐसे लोगों को। इसके आगे क्या है? इसके आगे इस पूरी जो इन्होंने खिचड़ी पकाई है, इस पूरी खिचड़ी

00:14:33:13 में जगह-जगह पर अनुवाद लिखा हुआ है कि गीता अध्याय दो श्लोक 46 का अनुवाद। तो जब यह अनुवाद लिख रहे हैं तो अनुवाद का मतलब होता है कि ट्रांसलेशन यानी वर्ड टू वर्ड ट्रांसलेशन और अगर हम उसमें अपनी व्याख्या दे रहे तो वो अलग से होती है। टिप्पणी, व्याख्या, भाष्य, परपट मगर ये अनुवाद के नाम पर ही बहुत सारे ऐसे शब्द डाल रहे हैं। लगता है इनको अनुवाद का अनुवाद भी नहीं पता। इतने बड़े गवार हैं। तो यह क्या कर रहे हैं? अनुवाद के नाम पर एक एक पैराग्राफ दो दो पैराग्राफ लिख रहे हैं। ट्रांसलेशन नहीं लिख रहे उसका। तो यह भी ध्यान रखने वाली बात है। उसके बाद क्या है? आगे चलते हैं। 247 247 में इन्होंने कोई व्याख्या नहीं की है। जबकि वो एक समझाया जाने वाला श्लोक है 247 मगर इन्होंने 247 में कोई व्याख्या नहीं की है और सीधे-सीधे लिख दिया है कि 247 में कहा है कि कर्म फल की इच्छा मत कर। हालांकि हमने पहले ही वहां बता दिया है कि लाभ हानि की लाभ हानि में समत्व बुद्धि ना रखने की बात कह करके इन्होंने 247 सहित बहुत सारे श्लोकों का खंडन किया है। इसके बाद 247 पर इनके तत्व ज्ञान की पिक्चर फ्लॉप हो गई और तत्व ज्ञान की

00:15:48:16 जब फिल्म पिट जाने के बाद फिर ये आगे चलते 248 से 250 तक का भाव बताते हैं। जहां पर फिर से वही बिना बिना संस्कृत शब्दों के अनुवाद के नाम पर यह शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म प्रभु की एक प्रभु की करना ही श्रेयकर है। साधना करता है। शास्त्र विरुद्ध भक्ति ये बहुत सारे उसमें ऐसे शब्द डाले जिनका श्लोक में कहीं वर्णन ही नहीं है। है ना? तत्वदर्शी संत द्वारा बताया गया भक्ति मार्ग और किसी को बुलाकर पाठ करवाना अपने यहां ये सब इन्होंने गलत बताया है। इसी पैराग्राफ में इन्होंने कहा है कि गुरुदेव के आदेश का पालन करना ही सत्य भक्ति में हितकर है। अब यहां सवाल आता है कि गुरु की व्याख्या क्या इनको पता है? गुरु वो है जो आपके आपकी अविद्या को नष्ट करे। अंधकार को नष्ट करे। तो अंधकार को नष्ट करने का मतलब यह नहीं होता है कि फलानी श्लोक संख्या में यह लिखा है या यह लिखा है। अंतत गत्वा जो प्रमाण है जो शास्त्र है उनके वचनों का आधार बताते हुए एट द एंड आपको ब्रह्म तत्व की व्याख्या करनी होगी। ब्रह्म तत्व कैसा है? वो व्याख्या यहां नहीं मिलती है। है ना? निराकार है, साकार है। इस तरह से जो तात व्याख्या है कि जब भगवान सृष्टि बना रहे हैं तो वह कहां खड़े होकर के बना रहे हैं?

00:17:04:19 या और भी इस तरह के सवाल सवाल है कि जैसे कि आगे चलकर के इन्होंने यह कहा है कि जो आत्मा है जो सतलोक में जाकर के परमात्मा की भक्ति करती है। अंतत गत्वा वो वहां पर अनामी अनामी परमात्मा की भक्ति करके परमात्मा में लीन हो जाती है। जीवन मरण के बंधनों से छूट जाती है। तो परमात्मा में लीन होने का क्या मतलब हुआ? आत्मा और परमात्मा एक हो गए। अब आत्मा परमात्मा से तो आई नहीं है। अलग से आई है। तो सबसे पहली बात तो यह है कि वह तत्व आया कहां से? वो कहां था? उससे पहले था कि नहीं था? क्या हुआ था? दूसरी बात है जब वो कोई अलग से कोई चीज है जो इसमें जाकर के मिल रही है। पानी की एक बूंद वापस पानी में गिर रही है। तो पानी की क्वांटिटी वहां बढ़ती है तो क्या आ जो परमात्मा है वो घटता बढ़ता है। ये सारी तात्विक विवेचना इनकी गायब है। तो ये गुरु कहां से हुए? हां। अब आगे चलते हैं। अब इसमें दो 51 में कहा है कि सतलोक में जाकर फिर वहां से आगे अनामी लोक को चला जाता है। कैसे चला जाता है? भजन शास्त्रानुकूल अर्थात मतानुसार मेरे बताए अनुसार करता है। जो भजन मेरे बताए अनुसार। अब इसके इनके बताए अनुसार। तो ये तो

00:18:19:20 सच और झूठ दोनों बोलते हैं। पहली बात। दूसरी बात सतलोक में जाकर फिर वहां से आगे अनामी अर्थात जन्म मरण के रोग को समाप्त कर कर जाता है। लोग सतलोक से आगे अनामी लोक में चला जाता है। अब यहां ये बात आती है कि क्या सतलोक परमधाम नहीं है? क्या सतलोक मुक्ति धाम नहीं है? तो सतलोक का जो ईस्ट है वो कौन है? कबीर तो क्या कबीर मुक्ति दाता नहीं है? हम क्योंकि सतलोक से आगे जा रही है ना आत्मा तो मुक्ति के लिए। ठीक है? दूसरी बात क्या है कि लाभ हानि यहां पर कर्मवादी कार फलेचना में कर्म कर फल की इच्छा मत कर यह मानकर इसने अपनी ही बात को कंट्राडिक्ट भी कर दिया क्योंकि इसने वहां क्या माना है कि लाभ हानि के बिना युद्ध कैसे होगा हम और यहां क्या कह रहा है कि कर्म कर्म कर फल की इच्छा मत कर और ऐसे बहुत से श्लोकों में इसमें माना भी है आगे कंट्राडिक्शन वहां आपको दिख जाएगा तो अब सतलोक में जाकर वहां से आगे अनामी लोक में आत्मा जाकर के मुक्त हो जाती है तो क्या सतलोक परमधाम नहीं है? आत्मा का बताया गया है कि कहीं आत्मा जो है मनुष्य के आकार में रहती है। प्राणी मानव

00:19:34:28 रूप में मानव रूप में आकार में रहता है। तो प्राणी का वास्तविक आकार क्या है? जब वो मानव के रूप में रह रहा है। है ना? तो उसका वास्तविक आकार क्या है? यह तत्व विवेचना गायब है। अच्छा इसने अब इसमें आगे माना है। बहुत जरूरी बात है इसको ध्यान से सुनिए कि इसमें आगे इसने उदाहरण दिया है कि जो सतलोक है, अनामी लोक है एक अलग लोक है। ठीक है? इन तीनों में कबीर ही हैं। मगर इन तीनों अलग-अलग लोकों में उनका अलग-अलग रोल है। और फिर उदाहरण दिया जैसे प्रधानमंत्री जब गृह मंत्री के का काम करने लगता है और गृह मंत्री होते हुए जब वो हस्ताक्षर करता है तो उसके हस्ताक्षर की वैल्यू उतनी नहीं होती है जितनी प्रधानमंत्री होते हुए होती है। तो यहां इसने क्या माना? एक ही व्यक्ति अलग-अलग रोल कर सकता है। एक ही तत्व अलग-अलग रोल कर सकता है और वह किसी रोल में छोटा और किसी रोल में बड़ा हो सकता है। तो ब्रह्मा विष्णु महेश के बड़ा और छोटा होने वाली लीलाओं से इसे क्या आपत्ति है? जब ये अपने में कबीर के द्वारा जो लीला है उसको मान रहा है। अब बात ये आती है कि अगर ये नहीं मानता है उनकी तो हम प्रश्न कर सकते हैं कि कबीर को भी हम सिद्ध कर सकते हैं कि वो पूर्ण ईश्वर नहीं है। कैसे? क्योंकि सतलोक में मुक्ति नहीं है। क्योंकि सतलोक से आत्मा आगे जाती है। तो सतलोक का ईश्वर अगर कबीर है तो मुक्ति नहीं। अब ये कहेंगे कि वहां अनामी लोक में भी

00:20:50:02 तो वही है। तो भैया इसी प्रकार से परम ब्रह्म भी तो शिव है। अगर शिव कहीं पर दासत्व भाव में है तो परमात्म भाव में भी तो शिव है। वहां क्यों नहीं मानते हो? और यहां क्यों मान रहे हो? तो इसको कहते हैं अन्याय। इसको कहते हैं पक्षपात। इसको कहते हैं द्वेष। इसको कहते हैं चालाकी, धूतता, झूठ, धोखा। ठीक है? महाभारत में एक श्लोक है कि अन्यों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा स्वयं के लिए चाहते हैं। तो इसका खंडन है कि जब कबीर की बात आई तो तो मान लिया कि अनामी लोक में भी तो वही बैठा है। मगर जब ब्रह्मा विष्णु महेश के लिए दो तरह की बातें आ रहे हैं। तो ये नहीं मान रहे कि यहां पर वो एक लीला में दिख रहे हैं। जैसे सतलोक में कबीर लीला में दिख रहा है। मगर अनामी भी वही है। अनामी लोक में भी वही है। तो इसी प्रकार से भगवान एक लीला में दासत्व भाव में दिख रहे हैं। परंतु अंतत वो परम ब्रह्म भी हैं। मुक्ति दाता भी है। ठीक है? इसके बाद क्या है? इसके बाद है सतलोक में अनामी की भक्ति द्वारा मोक्ष होगा। तो यहां ये आप दिखा सकते हो। अनामी की भक्ति द्वारा मोक्ष होगा। सतलोक में जाकर के भी भक्ति करनी है। सतलोक में परमधाम नहीं है। जीवन मरण से मुक्ति नहीं है सतलोक में। ठीक है? अच्छा। ईश्वर में लीन होने वाली बात हमने

00:22:05:03 पूछ ही ली है कि आत्मा जब ईश्वर में लीन हो जाएगी तो क्या ईश्वर की क्वांटिटी बढ़ती है? इसके आगे फिर इसने 248 में फिर अपनी बात को काट दिया। जय पराजय समबुद्धि का पक्ष ले लिया। हां। अब यहां से एक बात और आती है 248 को जो इसने कहा है कि समबुद्धि रख के भक्ति कर। तो समबुद्धि रखकर जय पराजय में समबुद्धि रख के भक्ति कर। तो अब यहां क्या दिक्कत आती है? यहां पे कर्म की बात हो रही है हमारी भगवत गीता में। मगर इसने इसमें भी भक्ति की बात कर दी। तो जब कर्म की जगह पर भी भक्ति दिखा दी इसने तो व्यक्ति जो सामान्य कर्म करता है शास्त्र के अनुसार उस उस समय क्या भाव रखना होगा मन में ये इसने नहीं बताया क्योंकि जहां पर ये बताया गया वहां तो इसने भक्ति को डाल दिया कि समभाव रख के तू भक्ति कर तो जो कर्म करना है शास्त्रों के हिसाब से या मान लीजिए वस्त्र पहनने हैं कुछ भी करना है विवाह संस्कार होना है कोई भी संस्कार होना है कोई भी कर्म करना है तो होना तो वो शास्त्रों के हिसाब से ही है मगर तुमने जहां पर कर्म कर्म करते समय की भावना बताई है जैसे क्षत्रिय को अपना क्षत्रियत्व का पालन करना है रक्षा करनी है तो ये रक्षा करते समय उसके अंदर क्या भाव होगा इसकी व्याख्या कहां है क्योंकि यहां तो तुमने भक्ति ले लिया कि भक्ति करते समय क्या भाव होना चाहिए तो फिर कर्म करते समय क्या

00:23:20:09 भाव होना चाहिए ये कहां पर मिलेगा तो ये एक और भांडा फूटा रामपाल का इसके आगे हम चलते हैं फल की इच्छा रखने वाला कंजूस ये देखिए यहां पर भी अपनी बात को काट दिया। उधर क्या कह रहा है? पष्ठ संख्या 23 पर क्या कह रहा है? कि लाभ हानि के बिना युद्ध हो सकता है क्या? यह कह रहा है पष्ठ संख्या 23 पर और लाभ हानि के बिना नहीं हो सकता। ठीक है। और और क्या कह रहा है कि फल की इच्छा रखने वाले को कंजूस कहा है। किस में कहा है? पृष्ठ संख्या 30 और उसमें श्लोक संख्या दो 49 का अनुवाद बताते समय इसने कहा है कि तत्वदर्शी संत की शरण में जाने का मार्ग खोज क्योंकि फल की इच्छा रखने वाला तो कृपण यानी कंजूस जैसा जो धन का यथार्थ अब इसने क्या किया? जहां पर लाभहानि का लाभहानि के बिना लाभहानि के बिना युद्ध होने का खंडन किया है वहां पर इस श्लोक का इसने खंडन वहां कर दिया और यहां पे श्लोक का क्योंकि पक्ष ले रहा है तो अपनी उस बात का यहां पर खंडन कर दिया तालियां कॉमेडी

00:24:35:15 शो बाय रामपाल तो इसने एक जगह कहा कि लाभानि मत रखो लाभानि के बिना युद्ध लाभहानि रखो लाभानि के बिना युद्ध नहीं हो सकता अब यहां कह रहा है कि फल की इच्छा रखने वाला तो कंजूस होता है लाभहानि में से किसी लाभ की इच्छा रखने वाला कंजूस होता है। तो यहां पर खंडन कर दिया। अपनी बात का खंडन करते हैं। हमको रामपाल को उत्तर देने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। केवल इसकी भगवत ये जो भगवत गीता का जो भाष्य अपार्थ किया है इसको आप उठा लीजिए। कोई भी इसकी बुक उठा लीजिए। उसी में इसका खंडन है। आगे चलते हैं। केवल मोक्ष के लिए भक्ति फिर से कर्म गायब हो गया। इसने कहा कि केवल मोक्ष के लिए भक्ति कर। तो इसने फिर कर्म को गायब कर दिया। जब कर्म गायब है तो फिर हमें देखना पड़ेगा कि जब यहां पर भक्ति के लिए भगवान ने कहा है कि भक्ति इस तरह से कर ऐसा भाव मन में रख के कर तो फिर कर्म किस किस भाव के साथ करेंगे ठीक है आगे चलते हैं क्या कहा है सनातन परमधाम किसको कहा है अनामय लोक को सतलोक को नहीं कहा है सतलोक परमधाम नहीं है भग इनका जो भगवत गीता है गरिमा गीता की का पृष्ठ संख्या 30 उसमें दो 51 का अर्थ बताते समय इन्ह उन्होंने कहा है

00:25:50:16 कि ज्ञानी उस सनातन परमधाम में चले जाते हैं जहां पर परम शांति है तथा उस सनात स्थान पर गए साधक फिर लौट कर संसार में नहीं आए। तो दो 51 में इन्होंने परमधाम अनामय को माना है। सतलोक को नहीं परमधाम अलग है। ठीक है? मोह रूप दलदल भांति भांति पार कर जाएगी। हमने शुरू से ही कहा है कि व्यक्ति फसा क्यों है? क्योंकि वह मोहित है। अविद्या से ग्रसित है। और दो 16 में क्या बताया था कि जो व्यक्ति विद्या और अविद्या को ठीक ठीक समझ लेता है। समझाता है वही तत्वदर्शी होता है। तो विद्या और ये जो अविद्या है यहां पे वही बात फिर से आ रही है। मोह रूप दलदल से पार कर जाए। मुक्ति आपकी उसी में है जब आपको जो ये जो कॉन्शियसनेस है रियलिटी वो आपको प्राप्त हो जाए। इसके बाद एक बात और कही है दो 52 को दो 52 में कि लोक वेद उसने कहा लोक वेद अब बात यह आती है कि यह कहता है कि ये जो हमारे चार वेद है हालांकि पहले कह चुका है वेद यानी कि ऋग यजुर साम और अथर्व। ठीक है? मगर अब यहां पे लोक इन चारों को लोक वेद इसने कह दिया दो 52 का अर्थ करते समय और अलग से कोई

00:27:05:18 सूक्ष्म वेद इसने बताया। अब बात यह आती है कि जब इसने इसको लोक वेद कहा तो लोक वेद का मतलब है लोक के अंदर वेद। अगर ग्रंथ की बात करें तो तो क्या इसका जो सूक्ष्म वेद है वो लोक के अंदर नहीं है। लोक से बाहर है। व्यक्ति उसको परलोक जाकर के पढ़ता है। स्पेसशिप में बैठता है। फिर पढ़ के आता है। फिर नीचे आता है। ऐसा है क्या? तो ये भी सोचने वाली बात है। अब हम आगे चलते हैं। ये हमारे यहां तक के बुलेट पॉइंट्स हो गए एपिसोड टू के। फिर से सुन लीजिए। अगर इसको विस्तार से जानना है तो आपको वो एपिसोड देखना पड़ेगा एपिसोड टू वाला। अन्यथा संक्षिप्त विवरण हमने यहां पर आपको दे दिया। अब हम लोग आगे चलते हैं।

00:27:48:20 तो भगवत गीता दो श्लोक 46 से 53 का सारांश फिर से इसमें 46 से 53 का सारांश हां दो से भगवत गीता दो 53 तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात हाथी भांति के वचन यानी अज्ञान से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान में पूर्ण रूप से निश्चल रूप से स्थाई स्थिर हो जाएगी तब तू योग यानी यथार्थ भक्ति को प्राप्त हो जाएगा। अब सबसे बड़ी बात क्या है? यहां पर एक बहुत बड़ा कैची पॉइंट है। इसको नोट कर लीजिएगा भाई। टाइमिंग टाइम स्लॉट बहुत बड़ा कैची पॉइंट है। इसने क्या कहा? तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात भांति भांति के वचनों यानी अज्ञान से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा के ध्यान में पूर्ण रूप से निश्चल रूप से स्थाई स्थिर हो जाएगी तब तू योग को यानी यथार्थ भक्ति को प्राप्त हो जाएगा। यानी कि यथार्थ भक्ति कब प्राप्त हो रही है? तत्व ज्ञान के पश्चात। अब रामपाल के अनुसार इस दुनिया में इस संसार में तत्वज्ञानी कौन है? कौन है तत्वज्ञानी?

00:29:04:02 रामपाल के अनुसार इस संसार में तत्वज्ञानी एकमात्र रामपाल दास ही है। क्या लिखा है? 28 नंबर पृष्ठ संख्या इसने अपने बारे में बताया है। वर्तमान में यानी सन 2012 में मेरे रामपाल दास के अतिरिक्त सात अरब मनुष्यों में से कोई भी वो संत नहीं है। ठीक है? तो यानी कि ये लोग जो एक दूसरे को भगत कहते हैं, भगत कहना बंद कर दे। ये लोग भक्त नहीं है। यथार्थ भक्त नहीं है। बेवकूफ भक्त हो तुम सब के सब। क्योंकि तुम तत्व ज्ञानी तो हो नहीं। या तो कहो तत्वज्ञानी है तो रामपाल दास की बात का खंडन करो। कहो कि हम भी तत्व ज्ञानी है। हम भी तत्व ज्ञानी है। कहो मूर्खता की पराकाष्ठा करो। अभी लिंक दिया जाएगा। किसी को आना हो तो आना। ठीक है। तो रामपाल दास के के अतिरिक्त कोई भी दुनिया में तत्व ज्ञानी नहीं है। अकॉर्डिंग टू रामपाल तो यदि नहीं है तो इसका अर्थ क्या हुआ कि जो भी लोग उसके फॉलोअर्स है वो भक्त नहीं है। इसने कह

00:30:19:03 दिया तत्व ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात ही तत्व ज्ञानी होने के बाद ही यथार्थ भक्ति को प्राप्त होगा। ज्ञानी तब तू भक्त बनेगा। तुम सब भक्त नहीं हो। तुम्हारे गुरु के अनुसार आना आप कहना मैं भक्त हूं और एक दूसरे भगत भगत कहना तब बताऊंगा भगत जी भगत जी दिमाग खराब कर रखा है आगे चलते हैं वैसे दो 52 में प्रामाणिक अर्थ क्या कहता है वो भी हम लोग पढ़ते चले जिससे कि हम हम लोगों का आत्म कल्याण भी होता

00:31:00:18 रहे जिस काल में तेरी बुद्धि मोह रूप दलदल को भांति दलदल को भांति भलीभांति पार कर जाएगी। यह हो गया। भांतिभांति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल स्थिर अब इसने क्या किया ना यहां पे तत्व ज्ञान बोला नहीं गया है। ठीक है? मगर क्या कहते हैं? इन्होंने यहां तत्व ज्ञान को डाल के अपने भक्तों को फसा दिया। यहां तत्व ज्ञान नहीं बोला है। मगर तुमने तत्व ज्ञान डाल के अपने भक्तों को फसा दिया। अपने फॉलोअर्स को फसा दिया। सब के सब भक्त भक्ति रहित है। क्योंकि कोई तत्व ज्ञान नहीं है रामपाल के अलावा।

00:31:37:03 यह लोग बस वो ऊथ की तरह कॉपी पेस्ट करते रहेंगे जो इनको ट्रेनिंग प्रोटोकॉल में सिखाया जाता है। खैर अब आगे

⬜ Not used yet · 00:31:44:14 – 01:01:09:20 (29:25)

00:31:44:14 चलते हैं। पाप दो के श्लोक 46 से 53 का सारांश क्या है? इन श्लोकों का भावार्थ है कि वास्तव में पाप पुण्य को भूलकर अर्थात पाप पुण्य का फल इसी लोक में त्याग कर पूर्ण परमात्मा की साधना में लग जा। यदि अब यह पाप पुण्य की बात को साधना में लगने कह रहा हालांकि वहां पर कर्म करने की बात कही जा रही है। यही प्रमाण गीता के ये दूसरे श्लोकों की बात बीचबीच में अपनी वो जो वो है ना 18 66 18 66 इसका हालांकि खंडन हो गया इसी के पंक्तियों के द्वारा वो आप एपिसोड वन में देख सकते हैं या फिर सर्वशक्तिमान धर्म पर हम लोग बुलेट पॉइंट्स डालते हैं। उनमें जाकर के आप देख सकते हैं। एपिसोड वन के बुलेट पॉइंट्स वहां डाल दिए हैं। ठीक है? तो एपिसोड टू के बुलेट पॉइंट्स में है वह। तो एपिसोड टू के बुलेट पॉइंट्स का आप वो करिए, प्रतीक्षा करिए। डाल दिए जाएंगे वहां पर या फिर आप एपिसोड वन में जाकर के विस्तृत रूप से देख सकते हैं। फिर आगे क्या है कि जब तू मोह रहित हो जाएगा उसी वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा। देखिए हम लोग कहते हैं ना कि जो प्रामाणिक आचार्य है वो कौन है?

00:32:59:20 प्रामाणिक आचार्य कौन है? उसका पहला लक्षण क्या है? ब्रह्मचारी सन्यासी होना चाहिए। अथर्ववेद 11 5 16 मनुस्मृति 12वा अध्याय 112 से 114 मगर यहां पर भी जब तू मोह रहित हो जाएगा उसी वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा। वैराग्य सन्यास तत्वदर्शी का तत्वदर्शी की पहचान है। सन्यास उसके अंदर वैराग्य आ चुका होगा। पष्ठ संख्या 31 इसके बाद मत वेदी शास्त्रों के द्वारा विचलित ना रहकर एक तत्व ज्ञान पर आधारित हो जाएगी फिर तू योगी भक्त बनेगा हम

00:33:37:21 तो जो शास्त्र है ये शास्त्रों से अब यहां पर हटने की बात कर रहा है पूर्ण परमात्मा का ज्ञान हो जाने के बाद छोटे भगवानों ब्रह्मा विष्णु महेश देवी देवताओं माता तथा काल यानी ब्रह्म तथा परबह्म आदि से मन हट जा मन हटकर पूर्ण परमात्मा की भक्ति करके उसके अनामी परम पद को अर्थात सतलोक से भी आगे अनामी लोक में चला जाएगा। सतलोक से भी आगे जन्म मरण से छूट जाएगा। सतलोक में आप जन्म मरण से नहीं छूट रहे हो। इसलिए तू पूर्ण परमात्मा का भक्त बन योगी हो जा। ठीक है? ये दो दो से वो दो 53 तक की बात हो गई।

00:34:23:20 253 का अर्थ यहां क्या बताया गया है कि अर्थात तेरा पद्म परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा। अब हम बात कर रहे हैं दो 54 254 में हमारे 254 में क्या कहा गया है? पहले देख लें। अर्जुन ने प्रश्न किया है 254 में कि देखिए अर्जुन ने किससे प्रश्न किया है हे केशव यहां नाम ले रहा है क्योंकि ये लोग कहते हैं ना कि वो काल ने अपना असली रूप दिखाया था श्री कृष्ण के शरीर से बाहर निकल कर के ये भी एक ध्यान रखने वाली बात है कि जब काल अपने शरीर से बाहर निकल के उसने अपना असली रूप दिखा दिया तो वापस जब वो अंदर आया कृष्ण के तो फिर उसने केशव क्यों कहा काल क्यों नहीं कहा अगर अगर केशव और काल अलग-अलग है। उन्होंने वापस अर्जुन ने वहां पर वापस मधुसूदन हे मधुसूदन इत्यादि द्वारा संबोधित करना शुरू कर दिया था। तो इन्होंने पूछा है प्रश्न के अर्जुन ने प्रश्न किया कि पूर्ण रूप से एक पूर्ण परमात्मा में आश्रित अर्थात पूर्ण परमात्मा में स्थिर बुद्धि रखने वाले भक्त के लक्षण क्या होते हैं? उसका बोलना, चलना, बैठना आदि कैसा होता है? तो भक्ति के लक्षण बताए

00:35:38:21 जा रहे हैं। आगे के श्लोकों में भगवान ने क्या उत्तर दिया है? इन्होंने 55 से 68 एक बार में ले लिया। तो हम 55 से 68 पहले हम लोग देख लेते हैं। 55 क्या है? हे अर्जुन जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को भलीभांति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है उस काल में वह स्थित प्रज्ञ कहा जाता है। यहां स्थित प्रज्ञ की प्रज्ञ प्रज्ञ की संज्ञा दी गई है। दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में द्वेग नहीं होता। सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निष्प्रह है। यहां पर फिर से देखिए इस श्लोक का भी खंडन हुआ है वहां पर दो 56 कहां पर? जहां उसने कहा है कि लाभ हानि में इंटरेस्टेड इंटरेस्टेड होना चाहिए युद्ध लड़ते समय। है ना? दो क्या है ये? 56 ठीक है। इन्होंने फिर खंडन किया है। और यहां पर यह यह जो श्लोक है अभी देखते इसने क्या कहा है कि जो सर्वथा जिसके राग भय और क्रोध नष्ट हो गए ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है। अब इसने क्या कहा

00:36:54:15 है? गीता अध्याय दो श्लोक 55 में क्या कहा है इसने? कि जब साधक मन की उपज कामनाओं को भलीभांति त्याग देता है स्वयं संतुष्ट रहता है तब वह स्थित प्रज्ञानी निश्चल बुद्धि कहा जाता है। अब देखिए यहां पर सांसारिक लालच को त्याग देने की बात फिर से हो रही है। हो रही है ना? मगर ये लोग अपने साथ किसी को किस आधार पर जोड़ते हैं? सांसारिक लालच के आधार पे। कि उनके यहां जाओगे तो ऐसा हो जाएगा। तुम्हारे देखो तुम्हारे अगर तुम्हारे यहां सही भक्ति बता रहे हैं तो ये क्यों हो रहा है? वह क्यों हो रहा है? सांसारिक लालच है ना। तो सांसारिक लालच को त्यागने की बात यहां पर की जा रही है। दो 56 में क्या कहा है? कि जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं। वह मुनि यानी भक्त स्थिर बुद्धि कहा जाएगा। यहां पे फिर से समबुद्धि की बात हो रही है। है ना? दो सत्ता दो 25 दो 25 दो6 में।

00:37:58:16 समुद्धि की बात हो रही है। हमने बात कर ली। फिर दो 57 से 58 का श्लोक इसने अर्थ बताया है कि भौतिक जगत से प्रेम ना रखकर परमात्मा में रुचि रखता है। राग द्वेष रहित होता है। राग द्वेष रहित यानी लाभ हानि रहित तो फिर से समबुद्धि का वो हो गया। भौतिक जगत से प्रेम ना रखकर और यह लोग अपने साथ किसी को किस आधार पर जोड़ रहे हैं? भौतिक जगत की चीजें बता के देखो देखो ये तुम्हारा ये रोग हालांकि उसमें वही होता है। वो नेटवर्क मार्केटिंग वाले आपने बिजनेस देखे। मैं पहले ऐसा था, मैं काला था, मैं गोरा था, मैं ऐसा हो गया। मेरे पास एक साइकिल हुआ करती थी। मगर आज मेरे पास बहुत बड़ी कार है। ये सब जो आपने देखा होगा। उसी तरीके से नाटक ये लोग करते हैं। हालांकि मगर अगर यह लोग यहां पर यह माने भौतिक जगत से प्रेम ना रखकर परमात्मा में रुचि रखता है। राग द्वेष रहित होता है। उसी प्रकार भक्त अपनी इंद्रियों को शांत कर लेता है। यहां पर क्या हुआ? इंद्रियों को शांत करने की बात हो रही है। ये मैं क्यों दिखा रहा हूं इंद्रियों को शांत होने की बात? क्योंकि आगे इंद्रियों इंद्रियों पर नियंत्रण की बात का खंडन भी किया है भाई साहब ने। यहां पर माना है आगे वो शायद छठवा अध्याय वहां पर इंद्रियों के नियंत्रण की बात हो रही है। व्रत

00:39:13:22 उपासना का इसको अपमान करना था रामपाल को तो इसलिए वहां पर कहा कि हट हट द्वारा जो इंद्रिय जो इंद्रियों को नियंत्रित करता है वो गलत होता है। भाई कोई भक्ति में नियंत्रित करता है तो वो तो सही होता है ना। वहां यह कहा जा रहा है यदि किसी ने अपने इंद्रियों को वो किसी ने कुछ खाने पीने को त्याग दिया है निराहारी हो गया है व्रत रख रहा है कोई तो केवल इससे काम नहीं चलेगा क्योंकि उसके अभी बीज बाकी है उसकी तृष्णाओं का उसकी भूख का उसकी कामनाओं का बीज उसमें बाकी है बीज मिटता है भगवान की भक्ति से तो यह नहीं कहा गया कि व्रत रखो मत व्रत रखो मगर भगवान की भक्ति करने के साथ में यह नहीं कहा गया कि इंद्रियों पर कंट्रोल करो ही मत इंद्रियों पर कंट्रोल करो मगर भगवान की भक्ति के साथ में जिससे कि उनका जो बीज तुम्हारे अंदर रह गया है वो ना रहे मगर इस व्यक्ति ने आगे चलकर के उसका खंडन किया है कि जो व्यक्ति हट पूर्वक हठ योग हठ योग का खंडन है ये है वो है मगर यहां पर देखिए क्या हो रहा है यहां पर हठ योग का समर्थन है अगर उसको वो हठ योग कहता है तो उसका यहां समर्थन है क्यों कि भक्त अपनी इंद्रियों को शांत कर लेता है तो भक्ति साथ में होनी चाहिए तब आपका जो त्याग है इंद्रियों को शांत शांत करने का जो प्रयास है वो उचित है। केवल

00:40:28:28 इंद्रियों को प्रयास करने इंद्रियों को शांत रखने का प्रयास अनुचित है। ठीक है? आगे चलते हैं। 258 पढ़ ले इनका क्या है? 257 जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर ना प्रसन्न होता है। ना द्वेष करता है। उसकी बुद्धि स्थिर है। तो ये हमने 257 लिख देख लिया। इसका भी खंडन है लाभहानि के लिए मना करने वाला। ठीक है? समत्व बुद्धि का उसने वहां जो खंडन किया इस श्लोक को भी अमान्य घोषित कर दिया है। और कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट लेता है दो 58 में वैसे ही जब यह पुरुष इंद्रियों के विषय विषयों से इंद्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है तब उसकी बुद्धि स्थिर है। ऐसा समझना चाहिए। दोस्त में क्या कहा है रामपाल ने? इन श्लोकों में कहा है कि जो व्यक्ति हठ पूर्वक इंद्रियों को विषयों से दूर करता है उसकी स्थिति ऐसे होती है जैसे कोई व्यक्ति निराहार यानी भोजन के बिना रहता है। यहां वही वाली बात आ गई। तो हट पूर्वक नहीं करना है। कैसे करना है? है ना? हट पूर्वक नहीं करना है। कैसे करना है? भगवान की भक्ति के साथ साथ करना है। हट पूर्वक करेंगे। हट पूर्वक यानी कि

00:41:44:07 भगवान की भक्ति का आलंबन नहीं है। मगर फिर भी हम जो है अपनी इंद्रियों को शांत करने की चेष्टा कर रहे हैं। और यह भी कहा गया है कि वो लोग भी गलत है कि वो लोग दूर तो रह रहे हैं मगर चिंतन उनहीं का कर रहे हैं। जैसे हम मुझे टीवी देखना है। मुझे टीवी देखने की लालसा है। मेरी इंद्र इंद्रिय वो है कृष्णा। तो मैं नहीं देख रहा हूं। अपने आप को कंट्रोल कर रहा हूं। मगर चिंतन उसी का चल रहा है। तो भी वो हम उससे छुटकारा नहीं पाएंगे। तो भक्ति भी चाहिए और चिंतन भी उसका नहीं चाहिए। तो क्या करें? चिंतन किसका करें? भगवान का। तो इंद्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण ना करने वाले पुरुष के पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं। परंतु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। यही बात कही जा रही है कि मैंने टीवी देखना तो बंद कर दिया तो मेरे मैं विषयों से दूर हो गया मगर उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। तो जो स्थित प्रज्ञ होता है क्योंकि वह भगवान के चिंतन में लगा है। उसके चिंतन में टीवी नहीं है। उसके चिंतन में भौतिक वस्तुएं नहीं है। इसलिए उसके चिंतन में क्योंकि भगवान है इसलिए वो जो है उनसे पूर्णतया मुक्त हो जाता है उन लालसाओं से। तो स्थित पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात करके निवृत्त हो जाती है। परमात्मा में ध्यान लगा के उसकी वो उस जो आसक्ति हो रही है भौतिक

00:42:59:10 संसार से वह भी दूर हो जाती है। यह हो गया 59 का और इसने क्या कहा है 59 में कि इस प्रकार इंद्रियों को हट हट पूर्वक विषयों से रोकने से संयम तो कर लिया आसक्ति समाप्त नहीं हुई साधक की विषयों का रस यानी आनंद लेने वाली आसक्ति काल ब्रह्म से परम पर यानी अन्य परमात्मा से अब देखिए यहां पर इसने परम यहां पर इसने 59 में

00:43:41:13 259 में इसने क्या किया है? 260 में आसक्ति काल ब्रह्म से परम पर यानी अन्य परमात्मा को देखकर यानी सत्य साधना से परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है। अब देखिए यहां पे एक छोटी-छोटी सी बातें हैं जो आप ध्यान रख सकते हैं। जैसे इसने कहा कि आसक्ति काल ब्रह्म से पर यानी कि अन्य परमात्मा को तो काल ब्रह्म के लिए शब्द कौन सा है? यहां पर काल ब्रह्म से पर तो काल ब्रह्म के लिए पर कौन सा शब्द है जिसमें कि काल ब्रह्म की बात हो रही है फिर वहां पर पर लगा हुआ है वैसे पर दूसरे के लिए परे आएगा है ना पर नहीं आएगा पर तो परम के लिए आ जाएगा खैर आगे चलते हैं यहां पे कहीं भगवान ने अपनी बात की है तो इसने उसको उसमें जोड़ दिया है अ क्या कहते हैं। यहां पर परम की बात हो रही है। आगे चलते हैं। तो परमात्मा से साक्षात्कार होने पर आसक्ति से निवृत्त हो जाएगा। मुक्त हो जाएगा।

00:44:56:14 इसने मान लिया हे अर्जुन जिनको तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। अब देखिए हट योग का खंडन नहीं कर रहा है। हट योग का खंडन नहीं कर रहा है। मतलब इंद्रियों को वश में करने का खंडन नहीं कर रहा है। तो जिन्होंने तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने यदि हठ योग करके इंद्रियों को विषय विषय भोगों से रोक भी ली तो इंद्रियां तो यहां पे जो हम बात कह रहे हैं वही बात इसने भी मानी है। ठीक है? एकांत वास वन में किया। परंतु पूर्ण परमात्मा के सत्य मंत्रों की साधना के अभाव के कारण राजा तो ये सब इसने अब देखिए यहां पर इसने क्या किया है

00:45:34:22 कि इसने एक आरोप लगाया है पूर्ण परमात्मा के सत्य मंत्रों की साधना के अभाव के कारण राजा दशरथ की बेटी शांता के रूप पर आस आसक्त होकर सर्व रसों के भोग का आनंद लिया विवाह किया किसने? श्रृंगी ऋषि ने। अब यहां पर इन्होंने हालांकि इनका बात करने का तरीका तो इस व्यक्ति का निर्लज्जता वाला है ही है। खैर मगर इसने क्या कहा है? श्रृंगी ऋषि

00:46:07:19 ने विवाह का जो है विवाह किया। सर्व रसों के भोग का आनंद लिया। तो यहां पर ये खंडन कर रहा है। कि विवाह इत्यादि से दूर रहना ही उचित है। ठीक है? अब ये मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि मार्कंडेय पुराण में कोई कथा आती है जहां पर शायद ऋषि का नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। वह वन में रह रहे होते हैं। उनके पित उन्हें दिखाई दे रहे होते हैं और वो कह रहे होते हैं कि क्या कहते हैं बेटा विवाह कर ले गृहस्थ संसार क्या कहते

00:46:43:16 हैं कहीं पर इसने ऐसा किया है कि अपनी विवाह का यहां पर इसने विवाह करने का खंडन किया है और कहीं पर इसने ऐसा किया है इस व्यक्ति ने कि विवाह करने का समर्थन किया है। ठीक है? तो हम देख लेंगे अभी स्मरण नहीं आ रहा है एक्सजेक्टली कहां पर है वह बात खैर आगे चलते हैं हां दो 261 में आ गया मत पर अब देखिए मत पर ये भगवान ने कहा 261 में मत पर इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहित हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे भगवान ने स्पष्ट कर दिया मेरे परायण मगर यहां पर इसने मत पराह क्या मत पराह का अर्थ क्या हुआ है मेरे से दूसरे परमात्मा तो इसकी अगर संधि करेंगे तो क्या निकलेगा? मत परह हम तो इसमें जो है भगवान कह रहे हैं कि मेरे परायण होकर मगर यह कह रहा है कि मेरे से दूसरे परमात्मा के शरण में आकर तो यहां दूसरे शब्द की संस्कृत क्या है? परायण का पर है, मेरे का मत है। दूसरा मेरे से दूसरे परमात्मा की साधना करो।

00:47:58:28 तो यहां पर उसकी संस्कृत क्या है? मेरे से दूसरे मत पर। इसमें दूसरे शब्द की संस्कृत क्या है? तो इसने यहां पे झोल कर दिया दोबारा से। इसके बाद क्या है? भगवान ने यहां मत पराह कह के कहा है कि मेरे परायण होकर। इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियां वश में होती है उसी की बुद्धियां स्थिर हो उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है तो भगवान क्या कह रहे हैं कि इंद्रियों को वश में तो करो मगर ध्यान में मेरे परायण ध्यान में मेरे भी रहो अगर मेरे ध्यान में नहीं रहे तो तुम्हारी जो इंद्रियां है वो वश में नहीं हो पाएंगी ये आप मत परा का अर्थ देख सकते हैं मेरे परायण को इसने करा है मेरे से दूसरे परमात्मा तो इससे पूछो कौन सी डिक्शनरी में मत पहा का ये अर्थ लिखा है। ठीक है? वो डिक्शनरी दिखाए और इसकी इसको संस्कृत कितनी आती है? किसी दिन आ के संस्कृत में बात करे आ के किसी संस्कृत किसी संस्कृत को खड़ा कर देंगे। उससे बात करे आराम से हम खैर मुझे लगता नहीं है कि वो कभी बाहर आने वाला है। वो उसी में ही उसका सब हो जाएगा। काल कपाल महाकाल दो 62

00:49:14:24 इन श्लोकों में बताया गया है। अब यह रामपाल का अर्थ पढ़ रहे हैं हम दो 62 इन श्लोकों में बताया गया है कि विषयों यानी विकारों का चिंतन करने वाले व्यक्ति की उन विशेष विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उनको प्राप्त करने की कामना उत्पन्न हो जाती है। कामना पूर्ण होने की स्थिति से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूर्खता उत्पन्न होती है। और मूर्खता से स्मरण शक्ति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि यानी विवेक का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से व्यक्ति मानवता से गिर जाता है। ये स्नेहा और हम भी पढ़ ले अपना वाला। तो विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न हो जाती है। यह मतलब एग्जैक्ट वही इसने यहां लिखा है। अब देखिए ये आपको ये यहां पर अब मैं रामपाल की बात नहीं कर रहा। एक जीवन के एक विशेष विषय की बात कर रहा हूं कि हमारे जीवन में उतारचाव हो कैसे रहा है। हमको प्राप्त करनी है अविद्या। सॉरी हमको प्राप्त करनी है विद्या। अविद्या से हमें मुक्ति चाहिए। हमको प्राप्त करनी है मुक्ति। अविद्या से मुक्ति। ठीक है? तो अविद्या से मुक्ति कैसे होगी? जब हमारी जब हमारी चेतना में उतनी शक्ति होगी कि हम अविद्या से मुक्त हो सके

00:50:30:02 और विद्या को ग्रहण कर सकें। ठीक है? अब हमारी जो चेतना शक्ति है उसमें दिक्कत कहां आ रही है? मनुस्मृति बार अध्याय 37 वे श्लोक में कहा गया है कि जिन कर्मों को करते समय हमारे मन में छिपाने का भाव उत्पन्न होता है वह तामसिक होते हैं। छिपाने का भाव आपकी प्रज्ञा शक्ति को कमजोर करता है। इसलिए वो आपको दूर कर रहा है। विद्या से दूर कर रहा है। अविद्या से लिप्त कर रहा है। तो यह जो आपकी जो प्रज्ञा शक्ति है कैसे हो रही है? इफेक्टेड कैसे हो रही है? कि आप विषयों का चिंतन करते हैं। टीवी देखना है, कपड़े लाने हैं, वस्त्र पहनने हैं, चश्मा लगाना है या फिर भोग करना है। ये ये वाला फलाना आइटम मुझे आहार के रूप में खाना है। ये सब हम लोग चिंतन करते हैं। चिंतन उसका चिंतन करते रहने से उसके प्रति आसक्ति होती है। कि मुझे अब वो प्राप्त करना है। अभी तक हम सोच रहे थे वो ऐसा होता है, वह वैसा होता है। यह हो गया चिंतन। उसके बाद अब उसे प्राप्त करता है। प्राप्त करना है। मगर प्राप्त ना हो पाने की स्थिति में क्या होता है? कामना पूर्ण ना होने की स्थिति में क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूर्खता उत्पन्न होती है। मूर्खता से स्मृति भ्रम होता है। हम लोग जो बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात में पूरे दिन में कई बार कहते हैं ना भूल गया भूल गया भूल गया। ये क्या है? वही

00:51:45:08 उसी का इफेक्ट है। जो हम चिंतन कर रहे हैं। चिंतन से वो पूरी नहीं हो रही। तो हमारी मूर्खता उत्पन्न हो रही। क्रोध उत्पन्न हो रहा है। क्रोध से मूर्खता उत्पन्न हो रही है। मूर्खता से क्या उत्पन्न हो रहा है? भूल जाना तो हम लोग सोचते हैं भूल जाना बहुत छोटी सी बात है किसी मतलब कोई बात नहीं भूल भूल सकता है कोई भूल सकता है सही बात है हम सब जितने भी लोग मगर प्रपंच रूपी संसार से निकलने की जो लक्षण है वो ना भूलना ही है व्यक्ति भूलना उसका कम होता जाएगा जिसकी प्रज्ञा शक्ति का लेवल जितना ज्यादा होता जाएगा उसका जो बौद्धिक स्तर है वो बहुत बढ़ता जाएगा उसका जो भूलने का लेवल है बहुत कम होता जाएगा हम जैसे कि भूल क्या हुई अब भूल से आपके जीवन में प्रभाव प्रभाव क्या पड़ता है? आपको एक छोटा सा नुकसान बता देता हूं। कई बार रोड एक्सीडेंट जब होता है तो व्यक्ति जब किसी समय रोड एक्सीडेंट होने के बाद जब वो कहीं पर बैठा होता है तो ध्यान करता है कि उसको अपने मन में मालूम होता है। वो लोगों को कितना भी बता दे कि मैं ऐसा कर मतलब मैंने ऐसा मैंने कोई गलती नहीं की। मैंने ये नहीं किया मैंने वो नहीं किया। मगर कई बार लोगों को अपने मन में मालूम होता है कि मैं लास्ट मोमेंट पे अगर यह कर देता तो मैं बच जाता। मैं गिरता नहीं। मगर वो क्यों नहीं कर पाया? वो ब्रेक नहीं दबा पाया। उस हैंडल को सही जगह मोड़ नहीं पाया।

00:53:00:14 क्यों नहीं कर पाया? क्योंकि वो भूला और उसका एक्सीडेंट हुआ। तो इसी प्रकार से ये जो स्मरण शक्ति क्षीण हो रही है, आपकी प्रज्ञा शक्ति क्षीण हो रही है, आपकी जो चेतना शक्ति क्षीण हो रही है, इसका प्रभाव आपके जीवन में हर क्षण पड़ रहा है। इसीलिए ऐसे कार्यों को करने से बचें। जिन कामों को करते समय छिपाने का भाव उत्पन्न हो इसीलिए ऐसे भौतिक भौतिक संसार का चिंतन करने से बचे कम से कम चिंतन करें तो किसका चिंतन करें क्योंकि जैसे भगवत गीता में भगवान ने एक जगह ये भी कहा है कि जो क्या कहते हैं तू एक भी क्षण बिना कर्म किए नहीं रह सकता तो यदि आपका मन है यदि आपके पास चिंतन करने की शक्ति है तो वो चिंतन तो करेगी ही बिना चिंतन के नहीं रहेगी तो किसका चिंतन करें तो उसी चिंतन के लिए भगवान ने स्वयं का स्वरूप दिया, स्वयं का स्वयं की लीलाएं दी, अपना चरित्र दिया कि इसका चिंतन करो। जब तुम इसके चिंतन में रहोगे तो तुम्हारा उधर चिंतन नहीं होगा। आसक्ति नहीं होगी। ना प्राप्त होने की स्थिति में क्रोध नहीं होगा तो मूर्खता नहीं होगी। मूर्खता नहीं होगी तो स्मरण शक्ति नहीं होगी। बुद्धि का नाश नहीं होगा। ठीक है? अब रामपाल पे वापस आ जाते हैं। 264 से 65 में रामपाल क्या कह रहा है? ये कह रहा है कि

00:54:16:12 शास्त्र विधि अनुसार पूर्ण परमात्मा की साधना करने वाला साधक सत्य साधना से अपने वश में की हुई राग द्वेष रहित की हुई इंद्रियों द्वारा राग द्वेष रहित से वही लाभ हानि का इसने खंडन कर दिया यहां पर भी देखिए कितनी जगह अपनी बात का ही खंडन किया है ना 264 में भी राग द्वेष की बात हो रही है तो यहां पर भी इसने अपनी बात का खंडन कर दिया और अगर लाभहानि वाली बात को माने तो कम से कम अभी तक आठ नौ श्लोक हो चुके हैं जिनका खंडन किया इसने लाभ हानि वाली बात कह करके खैर आगे चलते हैं तो वाला साधक सत्य साधना से अपने वश में की हुई राग द्वेष रहित की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ यानी संसार में रहकर कर्म करता हुआ परिवार पोषण करता हुआ भी परमात्मा प्राप्ति रूपी कृपा प्रसाद को यानी पूर्ण सुखदाई मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। अब क्या हुआ? यह जो पीछे इसने विवाह का खंडन कर दिया है। यदि दशरथ यदि वह दशरथ जी की बेटी के प्रति जो श्रृंगी ऋषि थे वो जो है उनको प्राप्त हुए थे। देखिए ये बात आ गई ना? अभी पीछे हम लोग पढ़ के आए हैं। ये जरा वो पैराग्राफ दिखाइए। 32वा 32

00:55:31:15 वे पृष्ठ पर पैराग्राफ है कि एकांत ये उदाहरण श्रृंगी ऋषि ने अपनी इंद्रियों को हठ योग से रोका था। ठीक है? शंगी ऋषि ने अपनी इंद्रियों को हठ योग से रोका था। तो यह हमारे जो ऋषि मुनि होते हैं उनका अपमान करने के लिए खामखा उनका उदाहरण लेता है। खैर रोका था हट योग से। फिर भी वो जो है शांता के रूप पर आसक्त हो गए और सर्व वर्षों के भोग का आनंद लिया तो और विवाह किया यानी कि विवाह करना नहीं। विवाह करने वाला जो है वो जो है विवाह करने का मतलब है कि वो मुक्त नहीं हो सकता। उसकी उसकी इंद्रियां वश में नहीं हो सकती और वो जो है परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। मगर अगले ही पष्ठ पर 33 वे पृष्ठ पर दो 64 का या 65 का अर्थ करते समय 64 65 का अर्थ करते समय ये क्या कह रहा है कि वाला साधक सत्य साधना से अपने वश में की हुई राग द्वेष द्वेष रहित की हुई इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ यानी संसार में रहकर कर्म करता हुआ परिवार पोषण करता हुआ भी परमात्मा प्राप्ति रूपी कृपा प्रसाद को यानी पूर्ण सुखदाई मोक्ष को प्राप्त करता है। तो पहले इसने विवाह का खंडन

00:56:46:19 किया। अब यहां विवाह का समर्थन कर दिया। ये है रामपाल कॉमेडी शो तालियां और मार्कंडेय ऋषि के जो वो देता है ये क्लेम करता है वो ऋषि का नाम नहीं याद आ रहा है वहां पर रुचि नाम है शायद संभवत तो वहां पर ये कहता है कि उसके पित उसको उनको उनके पित दर्शन दे रहे थे जो ऋषि थे जो एकांत वास कर रहे थे तो पित उनको दर्शन देकर के समझाते बेटा गृहस्थ जीवन जी और वो अपने कर्मों को कर और वो यही समझा रहे होते हैं कि तू अपने कर्मों को करता हुआ भी मुक्ति को प्राप्त हो सकता है। जब वो कहते हैं कि अगर वो सारे कर्म अविद्या है तो आप मुझे अविद्या से क्यों जोड़ रहे हो? तो वो वहां पर यही भाव बताया जा रहा है कि अविद्या रूपी संसार में प्रपंच रूपी संसार में आप जो अविद्या से जुड़े हुए कर्म उनको करते हुए भी मोक्ष को प्राप्त हो सकते हो। तो वही यहां बताया जा रहा है। यहां पे इसने उसी बात को स्वीकार कर लिया। इससे जस्ट एक पृष्ठ पहले और मार्कंडेय ऋषि वाला वाली बात का उदाहरण देते हुए अपनी इस बात का खंडन कर लिया। इसको कहते हैं रामपाल द कॉमेडी शो। ठीक है?

00:57:51:01 तो मार्कंडेय ऋषि की अगर कोई कभी भी बात करे अब कि देखो मार्कंडेय ऋषि तो पित को पित को इन कर्मों की मना कर रहे हैं। मार्कंडेय पुराण की बात अगर करे मार्कंडेय पुराण की अगर कभी भी कोई रामपाल वाला बात करे और यह कहे देखो पितरों की बात ना मानने को कहा जा रहा है क्योंकि पितर उनको विवाह इत्यादि गृहस्थ आश्रम में घसीट रहे हैं और वो जो है ऋषि पहले से ही देखो मुक्ति का जीवन जी रहे हैं तो उनके मुंह पे ऐसे लोगों के मुंह पे ये दे मारना है ये यहां पर टाइम स्लॉट नोट कर लेना ये मुंह पे दे मारना है इनहीं का रामपाल लिख रहा है कि क्या लिख रहा है संसार में रहकर कर्म करता हुआ परिवार पोषण कर करता हुआ भी परमात्मा प्राप्ति रूपी कृपा प्रसाद को यानी पूर्ण सुखदाई मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। ठीक है? तो ऐसा नहीं है कि अगर गस्त हो गया कोई व्यक्ति तो वह गलत ही है। तो यानी शी ऋषि भी गलत नहीं हुए और ना ही मार्कंडेय पुराण में जो उनके जो पित्र थे वो वहां पर ऋषि हैं उनके पित्र थे जो उनको कह रहे थे बेटा तू विवाह कर ले गस्थ आश्रम में जी और हम लोग अतृप्त है हमको जो है वो कर तब भी तू अच्छे मार्ग पर आकर आगे जाएगा वो भी गलत नहीं थे ना ही शंगी ऋषि गलत है गलत कोई है तो जेलधाम निवासी रामपाल ठीक

00:59:06:08 है आगे चलते है 268 में ये कह रहा है जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला अब 268 समय ये अनुवाद कर रहा है। अब अनुवाद करते समय तत्वदर्शी संत नहीं मिला तो पहले इसकी हिंदी आनी चाहिए ना। हालांकि हम लोग 68 59 का अपना अर्थ भी पढ़ लेते हैं। नहीं 64 65 का अपना अर्थ ना जीते हुए मन और इंद्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती है। 64 65 अंतःकरण की प्रसन्नता होने पर 65वा है ये। इसके संपूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नित वाले कर्म योगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में भलीभांति स्थिर हो जाती है। हालांकि इसने जो अर्थ दिया था 64 65 में वो अर्थ सही नहीं था। संस्कृत की धज्जियां उड़ाई है उसने। ठीक है? तो यहां पर क्या कहा जा रहा 64 में परंतु अपने अधीन किए हुए अंतःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई राग द्वेष से रहित इंद्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ भी देखिए अभी आरोप लगा था ना शींगी ऋषि पर विषय विषयों में पड़ गए विषयों में विचरण करता हुआ भी अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त हो जाता है और ये बात इसने भी मान ली अपनी भाषा में

01:00:21:10 क्योंकि इसको संस्कृत आती नहीं है संस्कृत का अर्थ ये नहीं कर पाएगा ना जीते हुए मन और इंद्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं और उस अयुक्त मनुष्य के अंतकरण में यह मैं 66व का प्रामाणिक अर्थ पढ़ रहा हूं। अंतःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शांति नहीं मिलती और शांति रहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है? तो 66वें का अर्थ हमने ये पढ़ा। अब 66व में ये क्या कह रहा है? इसने 66 से 68 तक का जो अर्थ है वो एक साथ कर दिया। तो हम अपने 66 से 68 का अर्थ बाद में पढ़ेंगे। पहले इसका पढ़ ले। क्या है? क्या है? जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला। देखो भाई, अनुवाद में यह पहले अपना तत्वदर्शी घुसे देते हैं। जिसको तत्वदर्शी

01:01:09:20 संत नहीं मिला, वह परमात्मा के स्मरण में स्थिर नहीं हो सकता क्योंकि उसका मन वश में नहीं है। उस

⬜ Not used yet · 01:01:15:08 – 01:02:14:07 (0:59)

01:01:15:08 अयुक्त यानी परमात्मा पर ना टिके। अब जबरदस्ती यहां पे वो किया है क्योंकि यहां पे क्या लिखा है? ना जीते हुए मनो इंद्रिय वाले पुरुष में निश्चत्म बुद्धि नहीं होती। तो इनका यह तत्वदर्शी संत नहीं मिला। कहां से आया? पहले तो आप वर्ड टू वर्ड कम से कम पहले आप वो तो करो। आप तो हर जगह अपना प्रोपग वो प्रोपगेंडा ले चल रहे। अपना जो सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि लोगों के मन में तत्वदर्शी को डाल देना है। जिसको तत्वदर्शी संत नहीं मिला वह परमात्मा के स्मरण में स्थिर नहीं हो सकता। फिर आगे उन्होंने वही सब बातें जोड़ दी। इसमें है जिसकी इंद्रियां वश में नहीं हुई वो जो है स्थिरता को प्राप्त नहीं होगा। सुख को कैसे प्राप्त हो सकता है? और यहां पर इसने क्या कर दिया इंद्रियां वश में नहीं तत्वदर्शी संत नहीं मिला तो बात खत्म मतलब व्यक्ति वो जान ही ना पाए कि ग्रंथ क्या कह रहा है ईश्वरीय वाणी क्या कह रही है हम क्या कह रहे हैं वो सुनो आप अच्छा उस आगे इसने कहा

01:02:14:07 है क्योंकि पूर्ण संत रूपी खेवट नाव के साथ नहीं है तो उस नाव को जल में वायु हर लेती है यानी अपनी इच्छा अनुसार भटकाती है। वैसे ही पूर्ण संत के अभाव से तत्व ज्ञान ना होने से जल में नाव की भांति विषयों में विचरती हुई इंद्रियों से मन जिस इंद्रिय के साथ लगा है वह एक ही इंद्रिय उस अभक्त की बुद्धि को हर लेती है। अब

⬜ Not used yet · 01:02:43:22 – 01:08:39:06 (5:55)

01:02:43:22 यहां पर दोबारा से इंद्रियों को वश में करने का समर्थन कर रहा है। ये ठीक है? और यह जो अपने आप को पूर्ण संत पूर्ण संत कह रहा है बार-बार तो पूर्ण संत के लिए इसको तत्व ज्ञान भी तो होना चाहिए। अच्छा एक एक चीज और है। हां ये तो बड़ी अच्छी चीज मैं भूल गया। दो 64 से 65 में क्या कहा गया है कि उसके जो दुख होते हैं वो सब दुख रहित हो जाता है। वो विषयों में रहकर के भी विषयों का मतलब विषयों में रह के भी सुख को प्राप्त हो जाता है। ये दो 64 65 के अर्थ में कहा जा रहा है। मगर बात ये आती है कि ये जो रामपाल है ये तो दुख से मुक्त नहीं हुआ तो ये तत्वज्ञानी कैसे? क्योंकि इससे एक इसका वीडियो है उसमें प्रेस रिपोर्टर्स पूछ रहे हैं कि आपकी वजह से कई लोग मरे। हालांकि और भी कहा होगा उसने अर्जी लगाई थी मेरा स्वास्थ्य खराब है। बाहर आने के लिए तड़पता रहता है वो। हालांकि इसके जो फॉलोवरर्स हैं वो कहते रहते हैं वो तो लीला लीला है। हालांकि वह बाहर आने के लिए तड़पता रहता है तो उसका भी उसे दुख होगा। मगर एक दुख उसने ऑन कैमरा नोट कराया क्या कि कई लोग आपको जब पकड़ा जा पकड़े जा रहे थे तो उसमें कई लोगों

01:03:58:26 की जान चली गई या जो भी हुआ तो आप क्या कहना चाहेंगे? तो वो बोला मुझे अफसोस है। अफसोस दुख है। दुख है ना? तो दुख कैसे हो गया? वह तो तत्व ज्ञानी है। दुख नहीं होना चाहिए। तत्वदर्शी है ना? आगे चलते हैं। इसने 66 से 68 में आगे कहा है कि पूर्ण संत के अभाव पूर्ण संत के अभाव से तत्व ज्ञान ना होने से जल में नाव की भांति ये होता है। तो तत्व ज्ञान ना होने से दोबारा से नोट करिए। तत्व ज्ञान ना होने से व्यक्ति क्या करेगा? कि वो क्या कहते हैं? तत्व ज्ञान ना होने से तत्व ज्ञान नहीं है। तो इसका मतलब है तत्व ज्ञान नहीं है उसे। तत्व ज्ञान नहीं है तो इसके जितने वो है फॉलोअर्स वो तत्व ज्ञानी नहीं है इसके अनुसार तो तत्वज्ञानी नहीं है तो वह सब कौन है वो जल में नाव की भांति विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस वह एक ही इंद्रिय उस अभक्त की बुद्धि को हर लेगी तो ये जितने भी लोग हैं इनकी बुद्धि हरी गई है रामपाल के अनुसार क्यों हरी गई है इनकी इंद्र के इंद्र के द्वारा ही हरी गई है क्यों क्योंकि इनके पास तत्व ज्ञान नहीं है तत्व ज्ञानी नहीं है यह सब जिस व्यक्ति की इंद्रियां इंद्रियों के विषयों यानी विकारों

01:05:14:09 काम, क्रोध, मोह, लोभ से सब प्रकार से निग्रह की हुई है। यानी पूर्ण से संयमित है। उसी की बुद्धि स्थिर है। ये इसने मान लिया। निग्रह की हुई जो इंद्रिय है निग्रह की हुई इंद्रिय है। वही जो है मुक्त हो पाएगा। आगे मतलब वही फलदाई है। इंद्रियों का निग्रह। तो यानी यहां पर यह इंद्रियों का निग्रह करने का समर्थन कर रहा है। यह ध्यान रखिएगा। इंद्रियों का निग्रह करने का समर्थन है यहां पर कई जगह क्योंकि आगे इसने खंडन किया है। जहां व्रत उपवास की बात आएगी वहां खंडन किया है इसने। ठीक है? आगे क्या कह रहा है? अध्याय दो के श्लोक 55 से 68 में कहा है कि

01:06:01:28 जब जब भक्त इच्छाओं से रहित होकर भाग्य पर संतुष्ट है उस समय वह स्थिर बुद्धि वाला है। दुख सुख को बराबर समझने वाला है। राग द्वेष रहित है। देखिए यहां पर फिर अपनी बात का खंडन किया। लाभ हानि में बुद्धि ना रखने की बात जब भगवान कह रहे थे तो क्या कहा? यह तो काल की चाल है। अब खुद अपनी बात कुछ माननी है। परमा अपने अपनी ओर करना है डायवर्ट। तो यहां पर क्या कह रहा है? जो सुख दुख को बराबर समझता है राग द्वेष से रहित होता है। जिसने इंद्रियों का दमन कर लिया है। क्योंकि बुरे विचारों से इच्छाएं उत्पन्न होती है। फिर क्रोध और ये वो वही पूरा इसके बाद पतन निश्चित है। तत्व ज्ञानी योग युक्त है। वह शास्त्र अनुकूल भक्ति कर्म करता हुआ इंद्रियों के वश में नहीं होता। ठीक है? और तत्व ज्ञानी कौन है? केवल रामपाल तो किसकी इंद्रियां वश में है? केवल रामपाल की। और रामपाल वो है जो जेल से बाहर आने के लिए तड़पता रहता है। रामपाल वो है जो दुख जो सुखदख को बराबर नहीं समझता उसको अफसोस होता है। है ना? और भी बहुत सी चीजें। अच्छा आगे क्या कहा जा रहा है? चारों वेदों में वर्णित ज्ञान व साधना से उपरोक्त स्थिति यानी स्थिर बुद्धि नहीं हो सकती। विकार नहीं मरते। अब यहां पे सूक्ष्म

01:07:17:01 वेद आ गया। पहले क्या कहा था? वेद यानी ऋग, यजुर, साम इत्यादि। ठीक है? वेदों में वर्णित अगले पृष्ठ पर इनकी हेडिंग पढ़ लीजिए। हालांकि अगर इनके पूरे पूरे पेजेस पृष्ठों को हम पढ़ते जाएंगे तो हर पष्ठ में कूड़ा मिलेगा। मगर हम केवल जहांजहां इसने श्लोकों का अर्थ किया है वो वो पढ़ते चल रहे हैं। तो वेदों में वर्णित साधना विधि विकार से नहीं मरते। इनकी हेडिंग तो अब जब ये आपको कहे कि वेद में ये लिखा है तो आप क्या कहोगे? वेदों में वर्णित साधना से विकार नहीं मिटते। हमको वेदों के आधार पर तुम कुछ मत बताओ। क्योंकि तुमने ये कहा है कि वेदों में वर्णित साधना से हम नहीं मानते। वेदों में वर्णित साधना से विकार मिटते हैं। मगर तुम ये कह रहे हो कि वेदों में वर्णित साधना से विकार नहीं मिटते। तो तुम हमको ये मत बताओ वेदों में क्या लिखा है? ठीक है? क्योंकि वेदों में गीता जी में ज्ञान तो श्रेष्ठ है। अगले प्रश्न पर ये प्रश्न है 35वा। क्योंकि वेदों में गीता जी में ज्ञान तो श्रेष्ठ है कि जो साधक काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, राग, द्वेष रहित हो जाता है, वह पूर्ण मुक्त है। परंतु भक्ति की साधना केवल काल ब्रह्म की प्राप्ति है। तो भक्ति की साधना केवल का

01:08:32:04 मतलब जो भगवत गीता और वेद में जो भक्ति बताई गई है वो केवल काल तक की भक्ति है। उसके आगे की नहीं है।

01:08:39:06 जिससे विकार रहित नहीं हो सकता। उस परमात्मा को प्राप्त होने के योग्य मंत्र के जाप से हो सकता है। वह किसी शास्त्र में नहीं है। ठीक

⬜ Not used yet · 01:08:47:22 – 01:09:12:02 (0:24)

01:08:47:22 है? तो यह इनके मन ये मनमुखी देंगे। जो ये आपको नाम देंगे, मंत्र देंगे वो मनमुखी होगा क्योंकि वो किसी शास्त्र में नहीं है। यह भी पढ़ने लोग। यह ब्रह्म साधना की घटिया स्थिति है। यहां इसने घटिया कहा। ये सब चीजें हैं। जिसका प्रमाण स्वयं ब्रह्म भगवान देते हैं। वो आगे की बात है। आगे आएगा वो। यहां देखिए क्या कह रहा है। मेरी

01:09:12:02 भक्ति वेदों व गीता में वर्णित विधि से करता है। वह मेरे भाव में ही भावित रहता है तथा मेरे जैसे गुण वाले वाला अर्थात काल का दूसरा रूप हो जाता है। जैसे

⬜ Not used yet · 01:09:22:16 – 01:10:10:28 (0:48)

01:09:22:16 चुणक ऋषि यहां इसने माना कि जो काल की भक्ति करता है वो काल के काल का दूसरा रूप हो जाता है। काल के गुण आ जाते हैं उसमें। यानी वो भी काल बन जाता है। ठीक है? देखते जाइएगा। काल की भक्ति करने में कितना डिफरेंस आएगा? कहीं कहा जाएगा काल उन्हें खाता है। कहीं कहा जाएगा काल को वो देख नहीं सकता। वो काल काल को प्राप्त नहीं हो सकता। कहीं कहा जाएगा काल उसे सूंघता है। कहीं कहा जाएगा वो काल जैसा ही बन जाता है। ये सब देखते रहिएगा। आते हैं इसके अर्थ पर।

01:09:58:12 क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को पहले हम अपना अर्थ पढ़ रहे हैं 67 68 का क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है वैसे ही विषयों में

01:10:10:28 विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है वह एक ही इंद्रिय

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01:10:15:18 उस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है। इसलिए हे महाबाहु जिस पुरुष की इंद्रियां इंद्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई है उसी की बुद्धि स्थिर है और वह होगा कैसे भगवान की भक्ति करके अब 59 का इसने आगे अर्थ करना शुरू किया 59 से 72 तो हम पहले अपना अर्थ पढ़ लेते हैं 59 से 72 का फिर इसका पढ़ेंगे संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है उस नित्य ज्ञान स्वरूप परमानंद की प्राप्ति में स्थित प्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है। मतलब सुख में जागना रात्रि के समान है। और ज्ञान स्वरूप और जो लोगों के लिए जो रात्रि के समान है यानी कि भगवान की भक्ति में बैठना भगवान के मंदिर जाना ये सब क्या है? जो भौतिकवादी लोग होते हैं उससे उचटते हैं। तो वो क्या कहा जा रहा है? जो लोगों के लिए रात्रि है वो भगवान की भक्ति करने वाले के लिए दिन है। है ना? और जो क्या कहते हैं उनके लिए जो उनके लिए दिन है वो आपके लिए रात्रि है कुल मिला के जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र

01:11:30:24 में उसको विचलित ना करते हुए ही समा जाते हैं वैसे ही सब भोग जिस स्थित प्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना उसी में बिना ही उसमें समा जाते हैं। कर्म कर्म योग बता रहे हैं कि हमको अगर कर्म करते हुए प्राप्त करना है भगवान को तो कर्मों को कैसे अपने मैनेज करें उसमें भावना क्या होनी चाहिए तो उसमें एक मोटा पॉइंट आएगा कर्म ये सोच के करो ये सोच के नहीं लाभहानि कुछ मिलनी है कर्म ये सोच के करो ईश्वर ने कहा है ये भी मत सोचो कि ईश्वर प्रसन्न होगा ईश्वर ने कहा है तो करना है वैसे ही सब भोग स्थित प्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते वही पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है। भोगों को चाहने वाला नहीं होता है। जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्याग त्याग कर ममता रहित, अहंकार रहित और स्प्र रहित हुआ विचरता है। वही शांति को प्राप्त होता है। अर्थात

01:12:28:21 यहां पे परम शांति की बात हो रही है। अर्थात वह शांति को प्राप्त है। इसके बाद क्या है? यह ब्रह्म को प्राप्त यह ब्रह्म को प्राप्त पुरुष की स्थिति है। इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में इसी ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानंद को प्राप्त हो जाता है। अब देखते हैं इसने क्या यहां पर खिचड़ी पकाई है। ठीक है? यह हमारा दो 72 तक यह कंप्लीट हो गया दूसरा अध्याय। और अब हम इसका देखते हैं इसने क्या खिचड़ी पकाई। तो इसने दो 69 में क्या कहा है कि

01:13:14:24 रात्रि में दो प्रकार के व्यक्ति जागते हैं। एक तो सांसारिक भोगों की इच्छा वाला सोते हुए भी स्वप्न में उन्हीं में भटकता रहता है। दूसरा परमात्मा की भक्ति में लगा स्थिर बुद्धि वाला साधक रात्रि में स्वप्न में भी परमात्मा का

⬜ Not used yet · 01:13:26:24 – 01:15:47:15 (2:21)

01:13:26:24 विचार करता है। नहीं यहां ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है। रात्रि में दो लोग जागते हैं। ये कहां कहा गया इसको? तो इसने अर्थ ही बदल दिया। संपूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है हम उस नित्य ज्ञान स्वरूप परमा परमानंद की प्राप्ति में स्थित प्रज्ञ योगी जागता है। तो इसमें स्वप्न का अगर ये कह रहे हैं कि वो स्वप्न देखता है। जो सामान्य व्यक्ति है वह भोगों का स्वप्न देखता है रामपाल के अनुसार और जो स्थित प्रज्ञ है वह परमात्मा का स्वप्न देखता है रामपाल के अनुसार तो जब स्वप्न देखने की बात बार-बार हो रही है तो यहां स्वप्न की संस्कृत भी तो होनी चाहिए ऐसे ही अर्थ बदल दोगे क्या मनमाने तरीके से नहीं है फिर आगे क्या कहा जा रहा है दूसरा परमात्मा की भक्ति में लगा हुआ परमात्मा अब यहां भावार्थ क्या

01:14:33:24 है? सांसारिक अब देखिए पहली बात तो ये सांसारिक भोगों की इच्छा वाला सोते हुए भी स्वप्न में उन्हीं में भटकता है। यानी कि सांसारिक भोगों की इच्छा रखने वाला गलत है। तो यानी कि व्रत करना, सांसारिक भोगों से दूर होने की इच्छा करना, त्याग करना, सन्यास इसका यहां पर समर्थन किया। किसने? रामपाल ने। ध्यान रखिए छठवे अध्याय में इसने खंडन किया है क्योंकि संभता छवा ही है पता नहीं कहां पर किया है एक्सैक्ट नहीं पता मगर किया है कहीं पर बहुत व्रत उपवास का खंडन तो यहां पर समर्थन है ध्यान रखिएगा सांस अब ये भावार्थ बता रहा है जो सांसारिक व्यक्ति भौतिक पदार्थों की प्राप्ति के लिए दिन भर भटकता है संयमी साधक की इच्छा उन पदार्थों की नहीं होती तो भाई अगर कोई व्यक्ति व्रत रख रहा है तो तुझे क्या प्रॉब्लम है तब क्यों कह रहा है कि व्रत के लिए मना किया क्या है जब तू यहां पर व्रत उपवास को मान रहा है त्याग करना उसके बिना रहना परमात्मा की भक्ति के साथ बिना परमात्मा की भक्ति के नहीं परमात्मा में बुद्धि रखते हुए व्रत उपवास करने का खंडन क्यों कर रहा है जब तू यहां पर यह कह रहा है कि संयमी साधक उन की इच्छा उन पदार्थों में नहीं होती उसके

01:15:47:15 लिए वह दिन भी रात्रि के समान है अन्य लोग तो सांसारिक पदार्थों के लिए सजग रहते हैं परंतु स्थिर बुद्धि वाला उनसे मुख मोड़े रहता है। बहुत

⬜ Not used yet · 01:16:01:13 – 01:30:20:00 (14:19)

01:16:01:13 बड़ा पाखंडी है यह रामपाल। वह रात्रि में सोने के तुल्य विकारों से परे है। वह सोया हुआ है। हम तो व्रत का समर्थन, उपवास का समर्थन, सन्यास का समर्थन यहां पर फिर से हो गया। तत्व ज्ञान में परिचित 70 का देखिए 70 का क्या कहा जा रहा है? श्लोक 70 का अर्थ तत्व ज्ञान से परिचित स्थिर बुद्धि वाले का विश्वास ऐसा अचल होता है जैसे जल से पूर्ण रूप से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेकों नदियां समा जाती है। उनसे समुद्र विचलित नहीं होता। वैसे ही स्थिर बुद्धि वाले में भोग समा जाते हैं। यानी गृहस्ती साधक संतान उत्पत्ति भी करता है। परंतु अन्य स्त्रियों को माता बहन बेटी की दृष्टि से देखता है। अपने धर्म से गिरता नहीं है। उसमें सब भोग समा जाते हैं। वही साधक शांति को प्राप्त हो जाता है। अब देखिए इसने पिछले प्रश्न पर दशरथ की पुत्री के लिए दशरथ महाराज की पुत्री जो थी उनके लिए जो शंगी ऋषि थे जो शांता उनकी पुत्री थी उनके लिए उनके साथ विवाह करने को खंडन किया और यहां पर विवाह करने वाले व्यक्ति का भी समर्थन किया कि वो भी जो है शांति को प्राप्त हो जाता है। भोग विलास में लिप्त साधक शांति प्राप्त नहीं कर पाता।

01:17:19:22 केवल केवल भोग विलास में लिप्त ठीक है तो भोग भोग उसमें समा जाते हैं जो विषयों में विचरण करते हुए भी अपनी जो बुद्धि है वो परमात्मा में लगा के रखता है तो यहां पर इसने स्वयं ही अपनी वो दशरथ जी का जो उदाहरण दिया उस बात का खंडन किया और जो मार्कंडेय ऋषि वाला जो उदाहरण देता है उसका जो उदाहरण देता है कि उसके पित उसको कह रहे थे तुम गस्थ गस्त हो जाओ और जो है हमको तर्पण वगैरह करो श्राद्ध करो हमारा ये सब उसके पित कह कह रहे थे तो ये मना कर रहा था वहां पर वहां पर ये मना करता है कि देखो देखो वो तो विरक्त है उसको घसीट रहा है गस्थ में और यहां पर खुद कह रहा है ये व्यक्ति कि गृहस्थ साधक संतान उत्प उत्पत्ति भी करता है अन्य स्त्रियों को माता बहन बेटी की दृष्टि से देखता है अपने धर्म से गिरता नहीं है उसमें सब भोग समा जाते हैं और ऐसा साधक शांति को प्राप्त हो जाता है हो गया रामपाल के द्वारा ही रामपाल का खंडन कितनी अच्छी बात है जो पवित्र आत्मा संपूर्ण कामनाओं को त्याग करे 71 का अर्थ बताया जा रहा है जो रामपाल के अनुसार उसका जो उसने जो कचरा किया है तो जो पवित्र आत्मा संपूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममता रहित अहंकार रहित और स्प्र

01:18:34:26 रहित यानी इच्छा रहित जीवन यापन करता है वह शांति को प्राप्त हो जाता है। यहां पर भी समत्व समत्व बुद्धि की बात की गई है। ठीक है? तो यानी कि लाभ हानि का खंडन करके दो 71 श्लोक का खंडन भी हो गया। ठीक है? यहां पर भी समत्व बुद्धि की बात हो रही है। क्यों हो रही है? क्योंकि ममता रहित, अहंकार रहित, स्प्र रहित, इच्छा रहित जीवन यापन करता व शांति को प्राप्त हो जाता है। समत बुद्धि की बात हो रही है। और 72 में क्या कहा गया है? इस स्थिति को प्राप्त साधक अंत समय तक अज्ञान वश यहां पर दोबारा आ गया। देखिए मैंने कहा ना पूरे प्रकरण में जीव को प्रपंच रूपी संसार में फसाने वाली मुख्य चीज क्या है? मुख्य तत्व क्या है? अविद्या यहां पे फिर आ गया कि साधक अंत समय तक अज्ञान वश नहीं होता। अंतकाल में इसी स्थिति में रहकर ब्रह्म निर्माण वृक्षति उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है। ब्रह्म हम परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है। तो यहां पर किसकी बात हो रही है? परमेश्वर की। इसने मान लिया ब्रह्म के नाम से ब्रह्म निर्वाणम

01:19:50:02 रिच्छति उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है। अच्छा अब एक बात और आती है यहां पर इच्छति से अच्छा याद आया। देखिए इसमें कहा गया है अधिगच्छति। अधिगच्छति अब गच्छति का अर्थ क्या होना चाहिए? 72 में अधि 72वा श्लोक दिखाइए जरा अच्छा 71वा है 71वा श्लोक है जो देखिए 71 वे श्लोक में देखिए आना जाना इनको बताते हैं आना

01:20:33:04 जाना 71वा श्लोक लगाइए जरा हां ये देखिए क्या शब्द आया है अधिगच्छति ठीक है प्राप्त होता है। परमेश्वर के परमधाम को प्राप्त होता है। अधिगच्छति शांति को प्राप्त होता है। अब यहां गच्छति का अर्थ होता है जाना। तो इसने क्यों मान लिया यहां पर कि शांति को प्राप्त होता है। 271 में इनका अर्थ बता दो जरा। देखो 271 का अर्थ दिखाओ। वह शांति को प्राप्त होता है। इससे जस्ट ऊपर वाला। हां। येलो वाला। इसकी लास्ट लाइन दिखाइए। लास्ट लाइन। वह शांति को प्राप्त होता है। ये देखिए वह शांति को प्राप्त होता है। अब ये गच्छति से इन्होंने शांति को प्राप्त होना क्यों मान लिया? हम ठीक है इसको नोट करके रखिएगा। ब्रज में जो कहते हैं ना आना जाना। कम का मतलब आना और गो का मतलब जाना। अब यहां गच्छति का अर्थ क्यों मान लिया? इनसे पूछो। अधिगच्छति का अर्थ तुमने शांति को प्राप्त होना क्यों माना? शांति से जाना क्यों नहीं माना?

01:21:42:28 आगे देखिए इसने क्या किया है 72 वे के अर्थ में कि ब्रह्म निर्वाणम वृच्छति तो रिच्छति का अर्थ प्राप्त हो जाता है और ब्रह्म का अर्थ जिसने माना है उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त हो जाता है। रामपाल ने मान लिया। इसके में आइए रामपाल वाले अर्थ में आइए। रामपाल ने स्वयं 72 वे श्लोक का अर्थ करते समय ब्रैकेट में लिखा है ब्रह्म निर्वाणमति यानी ब्रह्म शब्द से इसने क्या माना उस परमेश्वर के धाम को प्राप्त होता है यानी परमेश्वर ब्रह्म का अर्थ परमेश्वर ध्यान रखने वाली बात है रामपाल ने अपनी जो भगवत गीता का अर्थ करते हुए जो किताब लिखी है गरिमा गीता की उसके पष्ठ संख्या 36 पे ब्रह्म को माना है। ब्रह्म कौन है? परमेश्वर। देख लीजिए स्क्रीन पर है आपके। इसने अपनी लुटिया खुद डुबोई है। हर पेज पे हर पृष्ठ पे अपनी लुटिया डुबोता रहता है। तो इसने मान लिया। अब आगे क्या है? दो श्लोक 69 से 72 में

01:22:58:00 लिखा है कि रात्रि में दो प्रकार के प्राणी ये अपनी उसको बड़ा बताने के लिए पता नहीं क्यों बार-बार चीजों को रिपीट भी करता है। केवल वही प्राणी इसकी इस पैराग्राफ की सेकंड लास्ट लाइन पे लाइए जरा जो नेक्स्ट पैराग्राफ है उसकी सेकंड लास्ट लाइन नीचे से दूसरी हां सेकंड लास्ट सेकंड लास्ट हां ये ये वाली ये हां इसमें देखिए क्या लिखा है इससे जस्ट ऊपर जस्ट ऊपर इस लाइन से जस्ट ऊपर हम हां ये देखिए ब्रह्म का अर्थ क्या है वह प्राणी ब्रह्म पूर्ण परमात्मा पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है तो ब्रह्म का अर्थ क्या है पूर्ण परमात्मा पूर्ण ब्रह्म ठीक है और आगे इसने अपमान किया है ब्रह्मा विष्णु महेश से काम सेक्स वस नहीं हुआ वो हम देखेंगे आगे के प्रश्नों में आगे जब अपमान किया वो एक अलग चीजें हैं ब्रह्मा विष्णु

01:24:13:01 महेश सेक्स जो है कंट्रोल नहीं हुआ तो यानी कि जो सेक्स यानी जो भोग वाला पदार्थ है यह उनसे इतर है और उन पर हावी है। यानी कि एक और कोई जो ये कहते हैं ब्रह्मा विष्णु महेश स्वयं सतरज तम है। तो जब वो स्वयं तमो तमोगुण है तो तमोगुणी तमोगुणी उससे प्रभावित थोड़ी होंगे भाई वो खुद तमोगुण तो दूसरे को प्रभावित करेंगे। स्वयं प्रभावित है यानी कि कोई और उनको कंट्रोल कर रहा है। तमोगुणी तमोगुण उनको कंट्रोल कर रहा है। तो ये तो रही इसकी वो मगर आज के लिए इतना ही। दूसरा अध्याय हमारा पूर्ण हुआ है और इसमें कुछ नहीं तो मेरे ख्याल से कम से कम 30 से 40 चीजें हमें प्राप्त हुई है। और पढ़ते अगर इसको विस्तार से तो और भी बहुत कुछ प्राप्त होता। लिंक दे दीजिए यदि कोई आना चाहे तो आ सकता है। हां यहां पे यहां पे ब्रह्म का अर्थ इसने काल नहीं माना। यही मैं कह रहा हूं। पष्ठ संख्या 36 गरिमा गीता की श्लोक 72 में ब्रह्म का अर्थ इसने काल नहीं माना है। ठीक है? इसने ब्रह्म का अर्थ पूर्ण परमात्मा माना है। और

01:25:30:08 ऊपर क्या कहते हैं? एक जगह और इसने ब्रह्म का अर्थ जो है काल नहीं माना है। इसी पृष्ठ में हां यह दो 72 में ब्रह्म का अर्थ इसने काल नहीं माना है। यही है। ठीक है? तो इसी के द्वारा ये पता चल गया ब्रह्म का अर्थ क्या है? पूर्ण परमात्मा पहली बात। और बहुत सी चीजें हैं। फिर हम बुलेट पॉइंट में नोट करेंगे अगले सेशन में। में अगला सेशन हम अगले हफ्ते ही करेंगे क्योंकि इतना समय नहीं है कि हर बार हम जो है अह बार-बार सप्ताह में दो बार हम आ जाए लाइव।

01:26:11:22 यहां इसने काल का अर्थ वो लिया है। अंत काल ही संहार करता है। खैर अगले उसमें बुलेट पॉइंट्स में हम लोग देख लेंगे। अभी कोई आना चाहता है तो आ सकता है। वैचारिक मतभेद के निमित्त किसी को आज की जो हमने यह दूसरा अध्याय समाप्त हो गया। इसका जो कचरा है इसने जो कचरा किया है रामपाल ने और आपको वो दे दिया गया है।

01:26:48:04 लाइव स्ट्रीम के लिए लिंक दे दिया गया है। अगर कोई आना चाहे तो आ सकता है। क्या क्या बातें कह रहे हैं आज भी बहुत से रोचक तथ्य हमें प्राप्त हुए हैं।

01:27:25:27 आगे तीसरा अध्याय है। उसमें भी काफी सारी बातें जानने को मिलेगी। और यदि कोई हमें सहायता करने का इच्छुक है, वह आर्थिक बल प्रदान कर सकता है। हमें यहां पर आपके सामने डिटेल्स दी जा रही हैं। चलिए ठीक है। फिर आज के लिए इतना ही और कोई आना नहीं चाहता है। फिलहाल मेरे ख्याल से किसी में इतना साहस नहीं है। किसी ने अपनी माता जी का निष्ठा पूर्वक दूध नहीं पिया है जो वो आकर के सामना कर सके और जिसकी वो भक्ति करने को कह रहा है। रामपाल के पथ पर चलने को रामपाल की खीर खाने को रामपाल की भक्ति करने को सिखा रहा है। वह आकर के यहां नहीं रख सकता है अपनी बात सामना करते हुए। यह सोचने वाली बात है। इतना बड़ा करोड़ों लोगों का इतना बड़ा ग्रुप उसमें से कोई नहीं है। कोई माई का लाल ऐसा नहीं है जो सामने आ सके। अच्छा है। यह भय होना

01:28:41:01 चाहिए। ठीक है? तो सभी को जय श्री राम। समय देने के लिए आभार आप सभी का और अगला सेशन हम फिर से अगले बुधवार को ही रखेंगे। वहां पे फिर तीसरा अध्याय हम स्टार्ट करेंगे। इसने क्या-क्या कचरा किया है वो सब हम देखेंगे। सभी को जय श्री राम। आया है क्या कोई? चेहरा दिखाएं। अरर्नव जी अरर्नव जी चेहरा दिखाएं।

01:29:32:10 महामूर्ख क्या लिखा है ये महामूर्ख रामपाल कोई जेल से वीडियो कॉल नहीं करता है। तब इनको मूर्ख बनाया जाता है। रामपाल अपनी रिहाई के लिए तरसता है भाई। ये सब उसके नाम पर अब वो चल रहा है बस

01:30:06:25 धंधा। तो ठीक है सभी को जय श्री राम। अगले सप्ताह बुधवार को मिलते हैं। एक अर्नभ सरकार करके आए हैं। पर वह अपना चेहरा दिखाने में असमर्थ हैं। संभवत कोई कारण है। जय श्री राम सभी।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Live 1:30:23 · 22 May 2025

गीता के नाम पर रामपाल के बोलबचन Ep-3 अध्याय 2.53-अध्याय 2.72 #satlokashram #rampalmaharajbooks

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