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00:00:02:19 तो जय श्री राम सभी को और इससे पहले कि आप लोग बहुत ज्यादा आशाएं अपनी लगाएं। पहले ही मैं एक चीज बता दूं आपको कि अभी जो हमारे बंधु हैं जो पिछली बार लाइव में आए थे और अपनी बहुत ज्यादा तरह-तरह की नवीन बातें बता के गए थे। जिन्हें सुनकर किसी व्यक्ति को चक्कर आने लगे। वह अभी आ नहीं रहे हैं। उन्होंने एक नया बहाना ढूंढ लिया है लाइव ना आने का कि हम वैष्णव निंदा करते हैं। इसलिए वो नहीं आ रहे हैं। अब वैष्णव निंदा करते हैं तो सबसे पहली बात तो यह है कि जिसको वो वैष्णव कह रहे हैं वो वैष्णव है कि नहीं यही तो तय हो रहा था लाइव में। अभी तो वह विषय आए नहीं थे। हालांकि मैं इसमें आपको कुछ जो उस दिन जो चर्चा हुई है उस चर्चा की कुछ मुख्य बातों पर प्रकाश डालूंगा। इंपॉर्टेंट वीडियो है ऐसा नहीं है। हां बट वो प्रतिपक्ष ही नहीं आ रहा है। इतना है वो आपको देखने को मिलता है। तो अ
00:01:17:22 वो नहीं आ रहे हैं। तो अब उनका कहना है कि वैष्णव निंदा करते हैं। अब निंदा मैंने क्या की? पहली बात तो यह है कि निंदा तो वह लोग भी करते हैं। भाई अब हमारे हिसाब से वो वैष्णव नहीं है। उनके हिसाब से हम वैष्णव नहीं है। है ना? हमारे हिसाब से वो सनातनी नहीं है। सनातना भाष है। वैष्णव की तो बात दूर है। और उनके हिसाब से हम वैष्णव नहीं है। तो अब बात ये है कि यदि क्योंकि हम वैष्णवों की निंदा करते हैं उनके हिसाब से तो इसलिए उससे बात नहीं की जाएगी तो इस हिसाब से तो दुनिया में कभी कोई बात होगी ही नहीं। होगी क्या? नहीं होगी। दूसरी बात यह है कि जो व्यक्ति ईश्वर अल्लाह को एक करता है वह वैष्णव है। भगवान ने कहा है शास्त्रों में श्रुति स्मृति मेरी आज्ञा है और जो मेरी आज्ञा को जो मेरी आज्ञा को फॉलो करता है मन मुखी मनमुखी आचरण नहीं करता है वो वैष्णव है। वही मेरा सच्चा भक्त है। तो ये लोग कितना मनमुखी आचरण कर रहे हैं। स्वयं ये व्यक्ति स्वीकार किया ना इसने मन की आचरण कि बिना यज्ञ पवित के मैं कह रहा हूं कर्म से ही होता है दुर्जन तोष न्याय से मान लिया जाए कर्म से ही होता
00:02:32:28 है तब भी इस व्यक्ति ने उसको भी फॉलो नहीं किया जो ये मान जो ये गलत अर्थ निकाल रहे हैं शास्त्रों का कि कर्मणा वर्ण अवस्था उसके अनुसार भी इसने उसको फॉलो नहीं किया कि मैं अपना जने कराऊ और फिर जो है शतापनिषद की बात करूं फिर ईशा उपनिषद की बात करूं नहीं किया जी एन के जी जय श्री राम आपका कैमरा ऑफ क्यों है? तो जब आप मनमुखी आचरण कर रहे हो जो अर्थ शास्त्रों का आपने स्वीकार किया उनके प्रति भी आप वो नहीं हो ईमानदार तब आप कह रहे हो कि जो है हम हम वैष्णवों की निंदा करते हैं ऐसे लोगों की निंदा करना आप जिसके अनुगत हो अमोग लीला के शिष्य है अमोग लीला जी ने आपको सिखा नहीं पाया कि श्रुति शास्त्र मत पढ़ो बिना जनेऊ के बिना यज्ञ पवीत के पूरा स्कन आपको नहीं बता पाया। तो जब आप भगवान आपने जो आज्ञा मानी है कि यह आज्ञा है भगवान की आपके अनुसार उसको भी आप फॉलो नहीं कर रहे हो और अपने आप फॉलो करने का मतलब भी बता दूं। विधि और निषेध में अंतर होता है। विधि का पालन एक बार को कर नहीं पाए कोई बात नहीं। मगर निषेध का उल्लंघन तो प्रयत्न पूर्वक कर रहे हैं ना आप।
00:03:49:01 जब वहां पर निषेध बताया गया है कि बिना जनेऊ के मत पढ़िए श्रुति शास्त्र। तो क्या आवश्यकता है भाई? श्रुति शास्त्र पढ़ने के बिना मगर सब पढ़ रहे हैं। क्या लगता है भव्य राधा कृष्ण दास ये सब है जो ये दिन भर जो मच्छर की तरह किया करते हैं इधर उधर अपने क्रियाकलाप ये सब विधिवत चलते होंगे जो इस की विधियां उन्हीं के अनुसार और विधियों का मैं ये नहीं कह रहा कि विधियों का पूर्ण आलंबन कर लो पूर्ण विधियों का एक बार को कि सामर्थ्य की कमी है नहीं हो पाया कोई बात नहीं मगर विधि निषेध का उल्लंघन क्यों कर रहे हो वहां तो सामर्थ की आवश्यकता ही नहीं है वहां तो आप कुछ ना करो वो चाहिए कुछ करना चाहिए ही नहीं वहां पर फिर भी आप वहां पर कुछ करके निषेध का उल्लंघन कर रहे हो तो पहली बात वैष्णव ईश्वर अल्लाह को एक करने वाले सिद्ध नहीं होते भगवान को अपूर्ण कहने वाले सिद्ध नहीं होते जो व्यक्ति भगवान को अपूर्ण मान रहा है जो व्यक्ति भगवान को विरोधाभासी मान रहा है वो व्यक्ति भगवान को भगवान ही नहीं मान रहा है तो भगवान को जो भगवान ही नहीं मान रहा उस उस भगवान को मानने वाले का दिखावा करने वाले को वैष्णव कैसे मान लिया जाए अपने आप। तो ये वैष्णव निंदा है। अच्छा दूसरी बात कि अगर स्वतंत्र रूप से देखा
00:05:04:02 जाए तो हमने इतनी वैष्णव निंदा इनके वाले वैष्णवों की निंदा नहीं की होगी जितनी इन्होंने हम लोगों की की है। जो इस कौन को नहीं मानते? तरह-तरह से मजाक उड़ा-उड़ा करके आदि शंकराचार्य जी की मरती हुई मां का मजाक उड़ाया। वो निंदा इनको निंदा नहीं लगी। अच्छा अगर ये कहे कि भैया उन्होंने तो उनके पास तर्क था। उनके पास रीजनिंग थी। तो रीजनिंग हमारे पास भी है। सुन लो आ के। अच्छा महाभारत का सिद्धांत है कि अपने साथ जो व्यवहार आप स्वीकार करते हैं वही व्यवहार अन्यों के साथ करें। तो आप ये चाहते हैं कि आपकी रीजनिंग तो दुनिया जाने मगर दूसरे की रीजनिंग आप नहीं जानना चाहते तो ये क्या हो गया? धर्म का विरोध। फिर भी आप वैष्णव हो। तो पहली बात तो वैष्णव हो कि नहीं यही सिद्ध नहीं होता। राघवाचार्य जी आप सन्यासी हैं। उन्होंने कह दिया ना वैष्णव है ही नहीं इस वाले। वो तो श्री संप्रदाय के हैं। वो तो आपके अनुसार जिसे आप मायावादी कहते हो वो भी नहीं है। ठीक है? अब आगे बात बात करते हैं कि जब उस दिन वो लाइव चर्चा हो गई थी इनके साथ उस दिन रात को बड़े परेशान हुए और अगले दिन हमने इनका एक संक्षिप्त वीडियो ये बताने के लिए अपने मेन चैनल पर डाला कि इन्होंने क्लेम ये किया है कि
00:06:19:08 ईश्वर में अभाव है। वो है कि नहीं है वो इन्होंने जो कहा था कि दुनिया में कोई ऐसी चीज नहीं जिसका ईश्वर के यहां अभाव ना हो तो यह ईश्वर में कमी है। ठीक है? यह सब इन्होंने कहा था। तो खैर यह बताने के लिए कि भाई इस वाले यह बोल रहे हैं कि ईश्वर में अभाव है। यह बताने के लिए संक्षिप्तीकरण करके वीडियो हमने मेन चैनल पर डाला। अब इनका मेरे पास मैसेज आ गया, कॉल आ गया कि भाई आपने जो है हमारे पक्ष को सही से प्रस्तुत नहीं किया है। उसमें जो आपने संक्षिप्त किया है। तो पहली बात तो यह है कि हमारा वहां पर ध ये दिखाना है ही नहीं कि उस चर्चा में परास्त कौन हुआ? असफल कौन हुआ? क्योंकि हमारी चर्चा समाप्त कहां पर हो रही है? हमारी चर्चा समाप्त यहां हो रही है कि आप जो है प्रमाण लेकर के आइए। यहां हमारी चर्चा समाप्त हुई है। वो वाली फिर ये बोल रहे हैं कि आपने जो है हमारा पक्ष सही से प्रस्तुत नहीं किया। तो उसमें पक्ष क्या है? हमने तो वहां से क्लेम दिखाया ना कि भाई आप यह कह रहे हैं कि ईश्वर में अभाव होगा तभी ईश्वर पूर्ण माना जाएगा। अभाव युक्त ईश्वर ही पूर्ण है। तो फिर अभाव रहित ईश्वर को क्या कहा जाएगा? जो अभाव रहित तत्व होगा उसको क्या कहा जाएगा?
00:07:34:26 जो अभाव सहित तत्व है वो पूर्ण है तो अभाव रहित तत्व है उसको क्या कहा जाएगा? पहली बात तो ये आ जाती है। ये अभी आएगी अभाव वाली बात में। तो हमारा अच्छा हमने वीडियो का टाइटल क्या दिया है वहां पर? वीडियो का टाइटल हमने ये दिया है कि क्या ईश्वर में भी अभाव है? हमने तो वहां निर्णायक नहीं बना कि स्कन वाला लड़का हार गया परास्त हो गया जवाब नहीं दे पाया ना हमने वीडियो का टाइटल दिया क्या ईश्वर में भी अभाव है हां क्योंकि ये बातें अपने आप में बड़ी वो है क्या कहते हैं एक जलेबी जैसी तो हमने वहां ये जरूर कहा कि और मेरे को वास्तविकता में सुनकर के हंसी भी आई बहुत कंफ्यूजिंग बातें हैं कि परम सत्य भी परम संशय है जो परम सत्य है वो परम संशय है परम सत्य नहीं है ये बात है ये ईश्वर में अभाव और वो दोनों एक साथ होना चाहिए। इस पर बात करेंगे होगा कि नहीं होगा? तो मैंने वहां घुमावदार बातें लिखा। मगर यह कहीं पर नहीं दिखाया कि हमारी इस चर्चा में निर्णय कुछ आया है। ऐसा कुछ नहीं है। तो फिर इनका कहना था वहां पर वो प्राइवेसी की वजह से अभी हम रिकॉर्डिंग दिखा नहीं रहे हैं। ठीक है? तो इनका फिर वहां पर एक वो आया कि भाई मैंने अपने पक्ष को रखते
00:08:50:02 हुए कि ईश्वर में भाव है। अपने पक्ष को रखते हुए मैंने वहां पर प्रमाण भी दिए थे शास्त्रों के। तो पहली बात तो यह है कि शास्त्रों के प्रमाण की बात तो अब कट चुकी है। क्यों? क्योंकि हम पीछे से चर्चा कहां से चली आ रही थी? कि शास्त्र की व्याख्या में प्रमाणिकता उसकी मानी जाएगी जिसकी व्याख्या अकाट होगी। अब तो शास्त्र प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है। दूसरी बात कि वहां पर जो प्रमाण मांगे गए थे कि आपने अपने सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण देने हैं तो शास्त्रीय प्रमाण तो मांगे ही नहीं गए आपसे अभी। आपसे तो अभी केवल ये पूछा गया था क्या कौन ये मानता है कि नहीं ये सिद्ध कर सकने वाले प्रमाण दे दो। तो इन्होंने जो प्रमाण दिए थे वो अस्पष्ट थे। चर्चा में आप देखेंगे इन्होंने एक प्रमाण दिया है ईशा उपनिषद में प्रभुपाद जी का जो भाष्य है तो उस प्रमाण में क्या हुआ था कि उसमें एक जगह उन्होंने ये लिखा है कि भाई ईश्वर में कोई कमी नहीं है तो इससे पता चलता है कि ईश्वर में अभाव भी नहीं है हम ईश्वर में यदि कोई कमी नहीं है तो ईश्वर में कोई अभाव
00:10:05:10 भी नहीं है ये पता चलता है उन्होंने मान लिया कि ईश्वर में अभाव है। उनकी इस पंक्ति से मान लिया। ईश्वर में कोई कमी नहीं है। ईश्वर में कोई अभाव नहीं है। इससे पता लग रहा है कि ईश्वर में अभाव का भी अभाव नहीं है। वाह! अच्छी बात है ना? ये इन्होंने मान लिया। तो ये इनका प्रमाण था। और दूसरा प्रमाण इन्होंने वहां दिया था चर्चा में ये बताने के लिए कि इस कौन ये मानता है? क्या दिया था कि चैतन चरितामृत में कहीं पर लिखा हुआ है कि ईश्वर के अंदर जो राधा रानी है उनसे उनसे जो प्रेम संबंध का जो रस है वो प्राप्त करने की इच्छा है। ठीक है? तो अब यहां पर ये मानना पड़ेगा कि भगवान से पूछा जाता है आप जो है आप जो है कितने क्यों अवतार लेते हो? तो भगवान कहते साधु भक्तों के उद्धार के लिए तो इसका मतलब साधु भक्तों का उद्धार करने का भी अभाव है भगवान में भगवान ने बहुत सारी रीजनिंग जगह जगह दी है शास्त्रों में मैं ऐसा इसलिए करता हूं मैं ऐसा इसलिए करता हूं हां मगर भगवान ने क्या कहा है गीता में कि मुझे मैं किसी भी कर्म में लिप्त नहीं होता हूं क्योंकि मुझे उनके जो परिणाम है उनमें कोई सरोकार नहीं उनके प्रति कोई आसक्ति नहीं है।
00:11:20:16 कहा ना इसलिए समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे करता जान क्योंकि उनके फल में कोई निष्ठा है ही नहीं उनकी आसक्ति है ही नहीं किसी भी कर्म के फल तो खैर तो ये अब बात ये आती है कि यहां ये जो दोनों इन्होंने प्रमाण दिए थे इन दोनों से स्पष्ट नहीं हो रहा था कि इस कौन ये मानता है कि भगवान में अभाव है। क्यों? कि जैसे कि मान लीजिए वहां प्रभुपाद जी ने लिखा है कि ईश्वर में कोई कमी नहीं है। हम तो अभी ये उसका अर्थ निकाल रहे हैं कि इसका मतलब है कि ईश्वर में कमी की भी कमी नहीं है। ठीक है? अच्छा इसका मतलब जब प्रभुपाद जी ये लिख रहे हैं कि ईश्वर में कमी नहीं है। उसका मतलब है कि ईश्वर जो है अभाव युक्त है। ठीक है? तो जब प्रभुपाद जी यह लिखेंगे कि ईश्वर अभाव रहित है तब क्या पंक्ति होगी? पंक्ति तो यही होगी। ईश्वर में कोई कमी नहीं है। यही होगी ना? क्या होगी?
00:12:36:09 तो यह प्रमाण स्पष्ट नहीं करता कि क्या इस कौन ये मानता है? क्योंकि उसके दोनों अर्थ निकल रहे हैं। दुर्जन तो उसने ऐसे मान रहा हूं। हालांकि अर्थ तो यही निकल रहा है कि ईश्वर में कोई कमी नहीं है। परंतु अगर दुर्जन तोष न्याय से आपकी बात को रख भी लिया जाए तब भी यह अर्थ भी तो उस पंक्ति से निकलेगा कि ईश्वर में कोई कमी नहीं है। अभाव की कमी भी नहीं है। यह अर्थ तो निकलेगा ना कि अभाव नहीं है ईश्वर में। मतलब अभाव युक्त ईश्वर के लिए अगर आप ये पंक्ति मान रहे हो कि कमी नहीं है तो अभाव रहित ईश्वर के लिए कौन सी पंक्ति होगी? हम तो पंक्ति यही होगी। तो अगर एक ही पंक्ति के दो अर्थ निकल रहे हैं तो उसमें फिर निर्णय कैसे लिया जाए कि तुम्हारा वाला पक्ष सही है उसका कहीं से तो आपको दिखाना पड़ेगा तो यह मैंने और इसी प्रकार से राधा रानी के विषय में भी था कि अगर उनको रस की आवश्यकता उन्होंने कह दिया अगर उन्होंने साधु भक्तों का उद्धार करने के लिए कह दिया तो इसका मतलब साधु भक्तों का उद्धार करने का अभाव हो गया ईश्वर में व्यवहारिक जगत की बातें है ये सब तात्विक बातें नहीं है कोई आवश्यकता नहीं है भगवान को भगवान देख लो न्याय करने के लिए सदव स्वयं आते हैं क्या न्याय होता है फिर भी दुनिया में ठीक है अब यह बातें इन्होंने वहां रखी तो मैंने जब इन्होंने
00:13:51:15 मुझसे कहा कि भाई मैंने जो वहां पर प्रमाण दिए थे आपने वो प्रस्तुत नहीं किए वो जो वीडियो बनाया था ट्रिम करके तो मैंने कहा आपने वहां पर प्रमाण दिए ही कहा था थे प्रमाण देने की बात पर ही तो हमारी चर्चा स्थगित हुई थी पुनः होने के लिए सुनिश्चित हुई थी तो इन्होंने कहा वीडियो में उन्होंने वहां कॉल रिकॉर्डिंग में कहा कि नहीं नहीं मैंने मैंने जो है वहां पे लाइव स्ट्रीम में बोला था कि वहां चैतन चरितामृत में अभाव शब्द का उपयोग हुआ है। वो रिकॉर्डेड है हमारे पास। तो मैंने कहा अगर आपने ऐसा बोला है तो मैं तुरंत अपना वीडियो डिलीट कर दूंगा। आप जल्दी मुझे टाइम स्लॉट दीजिए। है ना? तो इन्होंने काफी देर बाद मैं बोलता रहा, बोलता रहा। फिर उन्होंने मुझे टाइम स्लॉट दिया। मैंने उस टाइम स्लॉट को चेक किया जाके मुझसे गलती कैसे हो गई भाई? इनका पक्ष मैं देख नहीं पाया। तो टाइम्स लॉ को जाकर जब मैंने चेक किया तो उसमें वही बात बोल रहे हैं कि क्योंकि भगवान को राधा रानी का जो प्रेम संबंध है और जो उस रस की आवश्यकता है तो इससे सिद्ध होता है कि भगवान में भी अभाव है। मैंने कहा फिर वही बात हो गई। भगवान यदि लीला में बोल रहे होंगे तो इसलिए हमको यहां पर स्वतंत्र रूप से स्पष्ट वो चाहिए कि इस अभाव मानता है यद्यपि ये शास्त्रोक्त
00:15:06:28 शास्त्रीय प्रमाण ये भी नहीं है अगर होगा भी तो भी नहीं है फिर भी इस की ओर से वो शास्त्रीय प्रमाण नहीं दे पाए अच्छा तो ये बात तो हुई टेलीफोनिक अब इसके बाद क्या होता है कि इसके बाद क्या होता है कि अ हमारी चर्चा सेट हो गई आज के दिन 4:00 बजे होनी है और इन्होंने वहां पर मुझे नहीं दे पाए ये प्रमाण कि इन्होंने वीडियो में चैतन चरितामृत के रेफरेंस को देते हुए कहा था कि नहीं कहा था कि भैया ईश्वर में अभाव माना है कौन है? ये मुझे इस बात का प्रमाण वहां नहीं दे पाए। WhatsApp में चैट हो रही है वहां नहीं दे पाए। उसके बाद चर्चा हमारी सुनिश्चित हो गई। अब आज जब चर्चा का एग्जैक्ट टाइम आ गया भाई साहब कोई रामपाल ही है जो जुड़ने की कोशिश कर रहा है। अभी विषय आपका नहीं चल रहा है। ठीक है? तो आप बार-बार परेशान ना हो ना करें। हर्ष जी अगर आप शास्त्रवाद जी यदि आप हैं आना चाहते हैं तो आप आ सकते हैं ऑनलाइन
00:16:22:00 अगर आप उपलब्ध है तो तो ये सारी बातें हुई जब आप आज 4:00 बजे तक हो गया तो इनके पास बहुत सारे टास्क रहे होंगे मैं ऐसा समझ सकता हूं कि इनको प्रमाण ढूंढने होंगे कि इस कौन ने ऐसा कहां कहां पर माना है उसके बाद हम पूछते हैं कि जो है ड गोस्वामियों ऐसा कहां काम आना है और इसके बाद हम पूछते हैं भैया आप जो है आरसी ग्रंथों के आप प्रमाण दे दीजिए है ना तो इनको ये सब कलेक्ट करने में टास्क रहा होगा तो कलेक्ट कर रहे होंगे कर करते करते करते इनको अपने पक्ष में पक्ष की पुष्टि करने में असामर्थता जब
00:17:07:15 प्राप्त हुई होगी ऐसा हम समझ सकते हैं तब इन्होंने आखरी टाइम पे अभी 10 मिनट पहले 4 बजने से 10 मिनट पहले ही यह कहा कि आप जो है वैष्णव निंदा करते हैं। अब वैष्णव निंदा के संबंध में एक पक्ष तो मैंने यह रख दिया कि भाई वैष्णव है कौन? पहले तो ये दूसरी बात ये आती है कि क्या हमने इनके समक्ष वैष्णव निंदा की? तत रूप से वीडियो बना करके हम बात करें तो बात अलग है। मगर इनके समक्ष जो है जब ये सामने इनसे बात हो रही है तब हमने वैष्णव निंदा की है। क्या जो इनके वैष्णव है तथाकथित वैष्णव सो कॉल्ड वैष्णव नहीं की। तो इन्होंने क्या कहा कि आपने कहा कि वो जो ईस्ट ऑफ कैलाश वाले हैं उन्होंने अमोग लीला जी को मूर्ख कहा। अरे तो भैया ये तो तुम्हारे ईस्ट ऑफ कैलाश वाले से पूछ लो। उसने कहा ऐसा उनसे आप पूछिए फोन करके और वो यदि मना करेंगे तो मैं आपको प्रमाण दूंगा। मैंने कहा कर दी वैष्णव निंदा। मैंने कहा कि वो ऐसा कहते हैं। आपको बताया है मैंने। ठीक है। अच्छा यदि आपने अभी मुझको यह बताया कि मैंने आपको यह बताया कि उसने यह बताया कि वो मूर्ख है अमोग लीला जी। यदि आपने मुझे यह बताया कि मैंने आपको यह बताया कि वो दिल्ली वालों ने मुझे बताया कि अमोग लीला जी मूर्ख है
00:18:22:16 तो ये तो आपने भी कर दी वैष्णव निंदा। अगर किसी के कथन को कहीं पर बताना वैष्णव निंदा है तो आप भी तो मेरे कथन को मुझे बता रहे हो वो भी तो वैष्णव निंदा हो गई। इसीलिए कहते हैं मत पड़ो चक्कर में कोई नए टक्कर में कहां तक भागोगे है ना तो अब वैष्णव निंदा नहीं हुई तो ये व्यक्ति अभी फोन कॉल पर हमारी बात चल रही थी कोई एक मध्यस्थ भी थे बीच में जिन्होंने इनसे जो इनको लेके आए थे कि आप इनसे ये आपसे बात करना चाहते हैं और बड़े ताव में थे हां एक चीज और हुई थी कल कल मेरे पास एक चुनौती इन्होंने भिजवाई थी कि भाई अगर मैंने अपने पक्ष को सिद्ध कर दिया अद्वैत का भंजन कर दिया तो तुम प्रभुपाद की शरण में आओगे कि नहीं आओगे ये इन्होंने मुझको कहा कहलवाया तो मुझे बड़ी तेज क्रोध आया मैंने पलट के फोन किया मैंने कहा ये बताओ जिस समय तुमने ये कहा कि यदि अद्वैत का भंजन कर देंगे तो प्रभुपाद जी की शरण में आ जाओगे उसी समय तुमने ये क्यों नहीं कहा कि यदि तुमने मेरे प्रभुपाद जी का या इस की मत का भंजन कर दिया तो मैं भी तुम्हारे गुरुओं की शरण में आ जाऊंगा। यह अन्याय पूर्ण व्यवहार क्यों नहीं किया
00:19:37:18 तुमने? बताओ। जब तुम सामने वाले से अपेक्षा कर सकते हो कर रहे हो कि वो अपने मत का भंजन हो जाने की संभावना को स्वीकार करे। हम तो फिर तुम ये स्वीकार क्यों नहीं कर रहे हो कि सामने वाला भी तुमसे अपेक्षा कर सके कि तुम भी अपने मत को मत का भंजन हो जाने की संभावना को स्वीकार करोगे। यह न्याय है। यह न्याय है। जब तुम बराबरी की बात कर रहे हो कि मत का भंजन हो जाएगा तो आप यह कहो कि अगर मेरा भजन हुआ तो मैं आऊंगा। तुम्हारा भंजन हुआ तो तुम आओगे। मगर यह बराबरी नहीं है। तानाशाह है। जन्मजात तानाशाह। तो उन्होंने क्या कहा? कि अगर अद्वैत का मैंने भंजन कर दिया तो तुम प्रभुपाद जी की शरण में आओगे। अरे भाई उसी समय यह बात रखो ना कि यदि तुमने प्रभुपाद जी के मत का भंजन कर दिया इस के मत का भंजन कर दिया मैं आ जाऊंगा शंकराचार्यों की शरण में तो ये न्याय प्रिय नहीं है जहां पे ईश्वर बाधित होता है वहां पे आपको धर्म प्राप्त नहीं होता है वो लोग मीठे बहुत लगेंगे आपको मगर मर्यादा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं मिलेंगे
00:20:52:26 बहुत बढ़िया बोलेंगे मीठा मीठा हरे कृष्णा हरे कृष्णा प्रभु ईश्वर में अभाव होना ही उसकी पूर्णता है। ठीक है? ये करेंगे वो। ईश्वर में यदि किसी चीज की जरूरत नहीं है तो ये उसकी कंप्लीटनेस में बाधा आती है। लो भाई किसी चीज को वही मामा आ गए वाली बात। किसी चीज को बढ़ा चढ़ा करके बोल दो तो वो झूठ भी सत्य लगने लगे। और व्यक्ति ये सोचना भूल ही जाए। अरे यह तो पूरा का पूरा झूठ है भाई। हम जब ढूंढने निकले हैं परम सत्य को तो तुम हमें दे रहे हो परम संशय।
00:21:35:10 हम ढूंढने निकले परम सत्य को और तुम हमें दे रहे हो परम संशय। अच्छा तो ये वाली बात भी हो गई। तो मैंने ये कहा अब आफ्टर ऑल एक बात रघुकुल रीत सदा चली आई। प्राण जाई पर वचन ना जाए। राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। यह राम जी का वचन है। ये मैं नहीं बोल रहा हूं कर्ता। वो खुद अपने लिए बोल रहे हैं। किससे? कैकई माता से। क्या बोल रहे हैं? राम दो प्रकार की बातें नहीं करता। जो भी करता हूं सोच समझ के करता हूं। यानी राम जी सिखा रहे हैं। वचन बोलने से पहले सोचो समझो। तो जब आपने यहां पर आने का रुख किया। जब आपने चर्चा सुनिश्चित की उससे पहले आपने सुनिश्चित नहीं किया कि मैं वैष्णव वैष्णव अपराधी हूं ये हूं वो हूं जो अब आप आरोप लगा करके और छाता पकड़ के पतली गली से निकलने का प्रयास कर रहे हो क्योंकि अपने मत की पुष्टि नहीं हो सकती है हम तो ये सारी बातें हो गई वचन भंगता अन्याय सहष्णुता
00:22:44:24 और मिथ्याप बहाने यह सब करते हुए इन्होंने कहा कि अब मैं जो है चर्चा करने नहीं आऊंगा। अब हम कुछ जो पिछली अब क्योंकि लाइव लगा ही रखी थी। है ना अनंकेत जी लाइव हम लोगों ने पहले कर रखी थी। तो मैंने कहा कि चलो ठीक है। लाइव लगा रखी है। तो अह कुछ बातें हो जाए। तो पहले अब इतना समझ लिया कि अभी क्यों नहीं आ रहे इनसे मेरी क्या-क्या बातें हुई है कौन फोन कॉल्स पर ये हमने समझ लिया है अब जरा उस दिन की समीक्षा कर लेते हैं जो जो इन्होंने चीजें कही थी उसके बारे में जब प्रमाणिकता का विषय चल रहा है पहले उसकी बात करते हैं जो इनका तर्क ये था कि भाई मैं प्रमाणिक किसी को इसलिए मानता हूं क्योंकि वो अकाट है अकाट बातें बोलते ठीक है तो जो अकाट बातें बोलता है वो सत्यवादी भी होता है। यह कहां लिखा है? कैसे माना जाए? कोई बहुत इंटेलेक्चुअल पर्सन है, कोई बहुत अच्छा पर्सन है,
00:24:00:04 बहुत बुद्धिमान है। परंतु वो सत्य भी बोल रहा है। ये कैसे आप विश्वास करेंगे? जिस विषय में शब्द ही प्रमाण है, उस विषय में किसी की योग्यता, किसी की तार्किकता कुछ नहीं करेगी। जिस विषय में हमें मोक्ष मिलेगा गायत्री मंत्र से हरे कृष्णा मंत्र से तो इस विषय में हमने शब्द प्रमाण माना गया है हमने माना है शास्त्रों को वेदों को तो शास्त्रों से जो अपना प्रामाणिक संबंध सिद्ध करेगा वो उस विषय में हमारे लिए प्रमाणिक होगा ना कि कोई तार्किक तार्किक तो बुद्ध भी थे पर झूठ बोला वेद गलत है बोला ना अच्छा भगवान से बड़ा तार्किक है क्या कोई दुनिया में नहीं है। क्या कृष्ण के रूप में झूठ नहीं बोला? क्या मोहिनी के रूप में झूठ नहीं बोला? बुद्ध के रूप में झूठ नहीं बोला। इसका मतलब तार्किक व्यक्ति भी झूठ बोल सकता है। तो प्रामाणिकता तो आपको यह सिद्ध करनी पड़ेगी कि हमने वही बोल रहे हैं जो हमारे गुरुओं ने बोला है। अच्छा अगर मैं अगर मैं अकाट्य बातें बोल रहा हूं। तार्किक बातें बोल रहा हूं। इसका मतलब यह है कि मैं दुनिया की किसी भी किताब पर क्लेम कर सकता हूं। इस किताब का अर्थ मैं बताऊंगा और
00:25:15:10 मान लो चाहे मैं आपको फिजिक्स का अर्थ बता रहा हूं और उसमें बता रहा हूं तो इत्यादि का अर्थ यदा धर्मस ये लिखा है केमिस्ट्री का अर्थ बताने के नाम पे और मैं ये बोलने लगूं ऐसे नहीं चलेगा ना मुझे केमिस्ट्री की उस फलाने से अपनी जो प्रत्यक्ष प्रमाणिकता है वो बतानी पड़ेगी तो ये आपका पक्ष गलत था यदि मान ले कि तार्किक ता और काटता ही किसी को किसी विषय में प्रमाणिक सिद्ध कर देती है। तो फिर परंपरा क्यों छाप रहा है इस कौन? क्यों बता रहा है हमारे गुरु ये हमारे गुरु ये और जब उन गुरुओं में संबंध के बारे में प्रमाणिकता हम पूछ रहे हैं तो तुम कह रहे हो अकाटता है जब अकाटता ही आधार है तो सब छोड़ो आचार प्रस जैसे को पकड़ पकड़ सकता है फिर तो व्यक्ति क्यों पूछते हो परंपरा किसने तुम्हें बनाया आचार्य पूछते हो ना वहां ये थोड़ी ना कि उसकी बातों को काटो वो तो बाद की बात है काटेंगे मगर किसने तुम्हें बनाया आचार्य पूछते हैं ना जिसकी वेदों में निष्ठा है उसको यदि तुम यह सिद्ध करना चाहते हो कि हम तुम्हें वेदों का अर्थ बता रहे हैं तो वेदों के साथ अपने कनेक्शन को तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाणों से सिद्ध करना पड़ेगा।
00:26:30:19 उन प्रमाणों से सिद्ध करना पड़ेगा जिन प्रमाणों से जिन प्रमाणों पर सामने वाला भी प्रमाण्य बुद्धि रखता हो। दूसरी बात यदि आप कहो कि भाई मैंने अपनी तार्किकता से सूझबूझ से विवेक से बुद्धिमता से यह सब पता कर लिया कि यही व्यक्ति प्रमाणिक है तो आप समाज के लिए प्रमाणिक नहीं हो। समाज के लिए शास्त्र प्रमाणिक है। महापुरुष जिन जिन में उनका विश्वास है वह प्रमाणिक है। आप नहीं हो। तो आपकी अपनी आस्था हो गई, निष्ठा हो गई किसी के लिए कि भाई वो मेरे मैंने देखा वो अकाट है और मैंने अपनी सूझबूझ से कर लिया। तो आप उसे प्रमाणिक मत कहो। कहो मेरा विश्वास। प्रामाणिक तो तभी सिद्ध होंगे जब आप उस प्रमाण से उसकी प्रमाणिकता सिद्ध करोगे जिस प्रमाण के प्रति समाज की भी प्रमाण्य बुद्धि होगी। और समाज की प्रमाण बुद्धि शास्त्रों पे है, प्रत्यक्ष प्रमाणों पे है, वेदों पे है। ठीक है? आगे चलते हैं। तो अपनी बुद्धि से चयनित चयनित व्यक्ति में श्रद्धा को प्रमाणिक नहीं कह सकते। अपनी बुद्धि से चयनित व्यक्ति के प्रति आप विश्वास होने की बात को कह सकते हैं। ठीक है?
00:27:45:10 अब प्रमाणिकता के विषय में कुछ बात बता दूं कि नित्यानंद परिवार के जो आचार्य हैं रघुनाथ दास शास्त्री वृंदावन में उनका आश्रम है। उनसे जब मैं मिला था तो उन्होंने बताया था कि इनके यहां पर जो पूजा पद्धति होती है उसमें होता यह है कि भगवान का स्मरण करते समय गडिया संप्रदाय में भगवान का स्मरण करते समय अपना चित्रण सोचा जाता है कि मैं किस रूप में भगवान की सेवा कर रहा हूं। मंजरी के रूप में या सखा या सखा के अनुगत के रूप में तो वह जो मंजरी के रूप में भी अगर मैं कर रहा हूं तो हर परिवार के पास वो जो मंजरी का विवरण है कि उसकी आयु कितनी होगी उसके पास कौन-कौन से आभूषण होंगे उसका वस्त्र किस कैसा होगा ये सारा जो परंपरा प्राप्त जो इनके आगे प्रामाणिक गड़िया वैष्णव आचार्य उनके पास ये अभी भी पोथी पत्रे रखे हुए हैं। ठीक है? तो गिया वैष्णव से इनकी प्रमाणिकता सिद्ध इसलिए नहीं होती क्योंकि इनके पास वो मंजरी का विवरण है ही नहीं।
00:28:49:06 जो मंजरी के भाव में अपने आप को सोचना है ना कि हम वहां पर इस तरह से सेवा करेंगे। सेवा का विवरण होता है। आयु का विवरण होता है। वस्त्र का विवरण होता है। हम नाम होता है। कि कौन सा नाम मिलेगा भक्त को। तो किस भक्त को कौन सा नाम मिलना है? ये सब विवरण इनके जितने भी परिवार हैं उन परिवारों के पास परंपरा से सुरक्षित है। जो इस के पास नहीं आए क्योंकि इस ने विरुद्ध जाकर के एक वो मठ नाम से कोई संस्था गिया मठ नाम से वो चालू करके मिलती जुलती संस्था और ऐसा करते हुए अपने को चालू कर लिया। ठीक है? जिसको 64
00:29:28:07 कोई भी कोई भी प्रामाणिक व्यक्ति उसको प्रमाणिक नहीं मानता। अच्छा यह तो हो गई प्रामाणिकता की बात। इसके बाद क्या है? इन्होंने कहा कि कलयुग में सभी शूद्र हैं। यह बात भागवत में लिखी है। मगर यह बात भागवत में हमें तो नहीं मिली और हमने इनसे मांगा भी उसी समय WhatsApp इत्यादि के माध्यम से तो नहीं मिली। स्कंद पुराण में कहीं विवरण मिलता है। पहली बात तो यह है कि इसको भी उसी बात उसी रूप में लेना पड़ेगा इस बात को कि कलयुग में सभी ऐसा ऐसा हो जाएगा तो जब यह मान लिया है भविष्यवाणी कर दी है कि कलयुग में पतित हो जाएंगे लोग तो जब वो भविष्यवाणी कर दी है तब उस भविष्यवाणी के आधार पर ये बोला जा रहा है कि जब कलयुग में सभी शूद्र है पतित हो जाएंगे वो उस स्थिति को लागू करते हुए ये बात मानी जा रही है कि शद्र है शूद्र है ही यह घोषित नहीं किया है। नहीं तो भागवत पुराण में ही 12 स्कंध के दूसरे अध्याय में जो है कलयुग का विवरण चल रहा है। वहां पर पतित होने की भविष्यवाणी की जा रही है। तो जब है तो भविष्यवाणी व्यर्थ है। वो जो श्लोक है वो सब व्यर्थ
00:30:43:15 है। वहां पर भी है होना चाहिए। हो जाएंगे कलयुग में है। होने वाले हैं या है? तो इस तरीके से कंट्राडिक्शन आ जाएगा शास्त्रों में तो हमें यही मानना पड़ेगा और दूसरी एक संगति और नहीं बैठती कि व्यवहारिक रूप से शास्त्रों की रचना महाभारत काल में जो लिपिबद्ध कर रहे हैं व्यास जी कर रहे हैं। भविष्य पुराण में भी भविष्य की संभावना व्यक्त की गई है। तो ऐसे में ये जो है वाली बात है इससे तो ये होगा कि वो अभी लिखा जा रहा है। कलयुग में सभी शूद्र है। भाई उस समय कलयुग नहीं था ना जिस समय लिपिबद्ध हो रहा था। कलयुग तो आज है तो उस समय है वाली बात कैसे लिखेंगे तो यह दिक्कत है तो कई रीज्स है कि कलयुग में सभी शूद्र नहीं है। अच्छा और आगे चलते हैं। यदि सभी शूद्र है तो शूद्र का तुम जनेऊ कैसे करा रहे हो? शूद्र के जनेऊ की विधि क्या है? यहां पे भी वही आ जाएगा मनमाना आचरण। शूद्र के जनेऊ की विधि क्या है? भाई ब्राह्मण का जनेऊ होगा आठ से 11 वर्ष की आयु में। आठ से 12 वर्ष की आयु में और इसी क्रम में आगे क्षत्रिय और वैश्य का होगा। शद्र का है ही नहीं। किस आयु में होगा। इसी प्रकार से ब्राह्मण कौन सा
00:31:58:16 क्या धारण करेगा और कुछ और भी विधियां होती है जो ब्राह्मण से ब्राह्मण की अलग वैश्य की अलग शूद्र की अलग होती है तो यदि आप ये कह रहे हो कि कलयुग में सभी शूद्र है तो वहां पे संस्कार होने से पूर्व ही ये सुनिश्चित करना है कि कौन ब्राह्मण है कौन शूद्र है कौन वैश्य है कौन क्षत्रिय है संस्कार है जो यज्ञ पवीत उससे पहले ही यह सुनिश्चित करना है कि कौन ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शद्र है तो कैसे करोगे फिर जब सभी शूद्र है तो तो किसी का उपनयन होगा ही नहीं तो तुम्हारे यहां उपनयन क्यों हो रहा है तो मनमुखी हो रहा है हो रहा है ना मनमुखी तो फिर जब मनमुखी है तो फिर आ गया वैष्णव कैसे क्योंकि श्रुति स्मृति मम आज्ञा फिर वैष्णव का आ गया दूसरी बात इस बारे में ऐसा है कि हमें यह मानना होता है कि प्रायः ऐसा हो जाएगा। प्रायः लुप्त हो गया है। ठीक है? ऐसा नहीं है कि उस जमाने में किसी को ज्ञान था ही नहीं। जैसे भगवान ने कहा कि कर्म योग जो है 4.1 दो में ये ज्ञान जो है सूर्य को मैंने दिया था और उसके बाद ये लुप्त हो गया। तो वहां प्राय वाली भावना लगानी
00:33:13:27 पड़ेगी। ऐसा नहीं है वो ज्ञान है ही नहीं। लुप्त हो ही गया संसार। किसी भी आचार्य को नहीं है। किसी भी आचार्य को नहीं है। किसी भी किसी को भी कर्म योग का ज्ञान नहीं है। तो उसी महाभारत काल में ही लगभग लगभग मिलता जुलता ज्ञान अन्यों ने भी कहा है। उनको तो भगवान कृष्ण ने नहीं कहा वो ज्ञान। यानी वो ज्ञान था। समाज में था। प्रायः लुप्त जैसा हो गया है। जैसे प्रायः धर्म नष्ट हो रहा है। मगर धर्म नष्ट नहीं हो गया है। माता को माता कहा जा रहा है। बहन को बहन कहा जा रहा है। नष्ट नहीं हो गया है। मगर प्रायः लगभग लगभग खत्म हो रहा है। धीरे-धीरे ऐसे। ठीक है? तो यहां प्रायः वाली बात है। दूसरी बात
00:34:03:15 तो ये सारी चीजें हो गई। अब जरा इनके वो जो अ कुतर्क थे। भगवान में अभाव होना चाहिए। उन पर जरा बात कर लेते हैं। हां भगवान में अभाव होना चाहिए। सबसे पहली बात तो यह है कि शास्त्र का प्रमाण कहां है कि जो थोड़ा सा अपूर्ण होगा वही पूर्ण होगा। ये कहां से लिया जाए शास्त्र से? भगवान में अपूर्णता है। यह बात शास्त्र में कहां कही गई है? यह बात इन्होंने नहीं बताई। दूसरी बात यह है कि जब अभाव युक्त को हम पूर्ण कहेंगे पूर्ण तो वही है जो अभाव युक्त है तो फिर अभाव रहित को हम क्या कहेंगे उसके लिए कोई और शब्द वही वाली बात कि भैया जो है सर्वशक्तिमान का मतलब यह नहीं है कि वो सब कुछ कर सके सर्वशक्तिमान का मतलब तो यह है कि वो अपना कार्य खुद कर सके ठीक है भैया ले लो अब तुम हमें यह बता दो जो सब कुछ कर सके उसको क्या कहोगे यह भी तो बताते जाओ उसको क्या कहोगे? सर्वशक्तिमान
00:35:11:02 [हंसी] हम तो जहां व्यक्ति खत्म हो रहा होता है वहां से शुरू करते हैं ना। इधर उधर होने ही नहीं देंगे। अब सामने वाला कहता है कि सन शक्तिमान का मतलब ये नहीं है। वो सब कुछ कर सकता है। उसका मतलब वो अपने काम कुदरत ठीक है। मान लिया प्रभु। अब ये बता दो कि जो सब कुछ कर सकता है उसको क्या कहेंगे? उसको कम शक्तिमान कहेंगे। कम [हंसी] जो सिर्फ अपना काम कर सके वह सर्वशक्तिमान है और जो सब कुछ कर सके वो कम शक्तिमान है। तो इनकी चीजें बाहर आएंगी। इसी प्रकार से जिसमें अभाव है यदि वो पूर्ण है तो जिसमें अभाव नहीं है उसको क्या कहेंगे? अब तुम बदल दोगे। तुम कहोगे कि वह अपूर्ण है। जिसमें अभाव नहीं है और जिसमें अभाव है वह पूर्ण है। तो तुम्हारी जनता तुम्हारा नाटक देखेगी। खैर उस नाटक पर भी प्रहार होगा। आप थोड़ा सा इंतजार करें। अच्छा
00:36:14:28 अब आगे एक बात आती है कि जिस जो स्वरूप से ही यदि अभाव अभाव अपने आप में एक ऐसे ऐसा शब्द है जिसकी सत्ता है ही नहीं। दो6 में भगवान ने क्या कहा? असत की कभी सत्ता नहीं होती। भगवत गीता तो अभाव शब्द का मतलब है जिसका भाव है ही नहीं। ठीक है? अब आपने कहा कि भगवान में उसका अभाव होना चाहिए। ठीक है मान लिया है थोड़ी देर के लिए मान लिया है। मगर उस अभाव की पूर्ति कैसे होगी? भाई जिसका भाव ही नहीं है। जिसका अस्तित्व ही नहीं है। जिसकी सत्ता है ही नहीं। उसको आपने मान लिया। ठीक है? कि भगवान में होना चाहिए। पूर्ति कैसे करोगे? जिसकी सत्ता है ही नहीं। यदि वो आयातित आ भी जाएगा तो उसका आना सिद्ध कैसे होगा? कैसे माना जाएगा? अभाव की पूर्ति हो गई। हम अच्छा दूसरी बात अगर यह मानते हो कि किसी क्रिया, स्थिति, परिस्थिति, सामग्री का अभाव है। ठीक है। यहां तो अभाव का अभाव की बात हो रही थी अभी तक कि अभाव का अभाव भगवान में मानना
00:37:30:00 पड़ेगा कि अभाव का अभाव तो है। है ना? तो अभाव का अभाव अगर भगवान में मान लेंगे तो स्वतंत्र रूप से अभाव कोई चीज है ही नहीं। वो एक्सिस्ट ही नहीं करती। भाव जिसका भाव ना हो तो जिसका भाव नहीं है उसका अभाव अगर मान लिया मान भी लिया कि वो अभाव है तो उस अभाव की पूर्ति तो हो ही नहीं सकती। उसका वहां पर अभाव होना भी सिद्ध नहीं होगा। अभाव के अभाव का अभाव के अभाव का भाव होना यानी अभाव का अभाव होना भी सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि उसका तो अस्तित्व है ही नहीं। जिसका भाव ही नहीं है जो अपने आप में शून्य है कुछ नहीं है नथिंगनेस ठीक है हां अब कहते हैं कि फलानी चीज का अभाव है जैसे उस लड़के ने कहा कि दुनिया में ये सब काउंटर तो उस दिन हम लोग कर ही नहीं पाए थे क्योंकि बात तो यहां अटक गई थी कि तुम पहले इस से तो दिखा दो हम तब मकजमारी करें मगर बाद में हमें पता लगा कि अमोग लीला ये भी कर रहे हैं तो मैंने देखा भाई कैसे साइको बनाए जा रहे हैं इस में हां
00:38:31:27 मतलब साइको तैयार किए जा रहे हैं। भगवान में अभाव होगा। ठीक। चलो अब उनकी ही दुनिया में उतर करके उनको जवाब देते हैं। तो अब अभाव का अभाव तो हो नहीं सकता। ना तो अभाव का अभाव हो सकता है ना भाव हो सकता है। मतलब भगवान में ये नहीं माना सकता अभाव का अभाव और ना ये माना जा सकता है कि अभाव के अभाव की पूर्ति हो गई। यह भी नहीं माना सकता। अच्छा दूसरी बात यह है कि अगर किसी सामग्री का तत्व का परिस्थिति का क्रिया का अभाव मानेंगे भगवान तो यह मानना पड़ेगा कि भगवान में वो सामग्री नहीं है। भगवान में वो क्रिया नहीं है। वो परिस्थिति नहीं है। ठीक? नहीं है। तो अब वो परिस्थिति एकिस्ट करती है कि नहीं? सनातन रूप से तभी तो भगवान को उसकी आवश्यकता है। अगर एक्सिस्ट करती तो कहां करती उसका अधिष्ठान क्या है? अंतरिक्ष में लटकी हुई है या कोई और भगवान से भी परम भगवान है जिसके दिमाग में वो है जैसे मान लिया कि भगवान में रस का अभाव है जिसने कहा था रस का अभाव तो वो रस एक्सिस्ट कहां कर रहा था? भगवान से इतर क्योंकि भगवान से इतर तो कुछ है ही नहीं। है क्या? अनिकेत जी
00:39:45:06 भगवान बाहर भगवान से स्वतंत्र रूप से रस को एक्सिस्ट करना पड़ेगा ना तब तो उसका अभाव मानेंगे भगवान में और अगर हमने भगवान से स्वतंत्र हो के रस का एक्सिस्टेंस मान लिया तो उसका अधिष्ठान जो होगा वो भगवान से बड़ा ईश्वर हो गया क्योंकि भगवान का भी वो चाहिए उसे अगर स्वतंत्र रूप से रस को ही मान लिया वो एक्सिस्ट करता है वो अपने आप में तो भी वो स्वतंत्र रूप से होने के कारण भगवान का भी भगवान हो गया। अच्छा या तो ये कहे ये रस से प्राप्त होने वाला जो सुख है जो इस क्रिया से वो प्राप्त होना है। इस क्रिया की जानकारी और इस क्रिया से प्राप्त होने वाला जो सुख है वो भगवान में पहले से था। अगर नहीं था अगर आपका वो नहीं था तो उसका होना कैसे सिद्ध करोगे? फिर अधिष्ठान चाहिए होगा बाहर कि किस में है? अंतरिक्ष में किसी के मन में है वो जो सुख है कहां पे है वो एक्सिस्ट करता है कि नहीं करता अगर एक्सिस्ट नहीं करता है तो यानी कि वो सनातन नहीं है और यदि उसको आप भगवान का स्वरूप भूत अंग बना दोगे जो सनातन नहीं है तो भगवान सनातन नहीं है भगवान की नित्यता कट जाएगी जो सदा के लिए रहने वाली चीज नहीं है जिसको तुम
00:41:00:12 उत्पन्न कर रहे हो जो है ही नहीं है ना वो सनातन तो है नहीं वो उत्पन्न हो रही है क्योंकि पहले वैसे तो थी नहीं क्योंकि सत का कभी अभाव नहीं होता और असत का कभी भाव नहीं होता तो यदि रथ वाला जो सुख है वो उत्पन्न हो रहा है वो था नहीं ठीक है अगर था तो फिर कहां था अधष्ठान क्या है उसका और अगर नहीं था तो उसको यदि आप भगवान से जोड़ रहे हैं तो भगवान फिर वहां पर भगवान की जो नित्यता है वो भंग हो रही है भगवान के सनातन सिद्ध नहीं होंगे अच्छा
00:41:38:00 इसमें एक बात और माननी पड़ेगी प्रतीक की कि ईश्वर भी मुक्ति ढूंढ रहा है ईश्वर में अभाव है रस का और ईश्वर रस प्राप्त कर रहा है सृष्टि बना करके तो सृष्टि बना के ईश्वर मुक्त हो रहा है भाई हम लोग मुक्त थोड़ी ना होने ईश्वर मुक्ति पा रहा है भाई हम लोग अपने अभाव से मुक्ति पाते वो अपने अभाव से मोक्ष तो उसको भी चाहिए ईश्वर को जबकि मोक्ष क्या है जिसे प्राप्त करने के बाद कुछ और प्राप्त करना शेष नहीं रहता। तो हम तो भगवान को प्राप्त कर रहे हैं। भगवान मोक्ष को और प्राप्त कर रहे हैं। दूसरे खिचड़ी देखिए आप। अच्छा एक चीज और है कि
00:42:23:13 भगवान को रस के सुख का ज्ञान था कि नहीं था? अगर नहीं था तो सर्वज्ञ नहीं है। नहीं है ना? और यदि जो रस का सुख है वो आ रहा है जा रहा है आ रहा है जा रहा है तो एक बार आ गया चलो एक बार बना लिया फिर दोबारा सृष्टि नहीं बनेगी दोबारा कल्प कल्पांतर चालू नहीं होंगे क्योंकि उसको तो सुख मिल गया या तो फिर मानना पड़ेगा वो सुख भूल जाता है बार-बार भगवान वो सुख जो है भगवान के अंदर से समाप्त होता है हमारी तरह तो है ना भगवान क्योंकि हम फिर आखिर में बात आ जाती है भगवान में कंट्राडिक्शन मानना पड़ेगा ये कहना है इनका इनको WhatsApp किया है। भगवान को कंट्राडिक्शन मानना पड़ेगा। तो फिर आप भगवान को परम सत्य क्यों कहते हो? परम संशय कहा करो। और जीव की चाह का वास्तविक विषय सिद्ध कैसे होगा? वो ऐसे ईश्वर की सिद्धि ही नहीं होगी जो परम संशय है। परम सत्य नहीं है। दूसरी बात ऐसे ईश्वर की सिद्धि नहीं होगी। ना तो वो आप ईश्वर की सिद्धि कर पाएंगे ऐसे और ना ही धर्म की सिद्धि कर पाएंगे बना देंगे नास्तिक वो दिव्य कीर्ति वाली बात है ना
00:43:38:14 दिव्य कीर्ति से एक लड़का पूछ रहा है दुनिया में कोई शाश्वत सत्य है क्या तो दिव्य कीर्ति कह रहा है कि कोई आंसर नहीं है इसी को आंसर क्यों नहीं मान लेते हो दिव्य कीर्ति नास्तिक कोई आंसर नहीं है इसी को आंसर क्यों नहीं मान लेते हो तो यही बात है ना कि भगवान क्या है परम संशय परम कन्फ्यूजन इस कौन का भगवान है। ये अभी तक प्रतीक की बातों से पता चला। यद्यपि अभी वो प्रमाण नहीं आए सामने कि कौन ऐसा मानता है कि नहीं मानता। ठीक है? सर गोस्वामी के सर गोस्वामियों के मानने की तो बात बहुत दूर की है। मधवाचार्य जी के मानने की बात तो बहुत दूर की और फिर सनातन शास्त्रों के द्वारा मानने की बात तो बहुत दूर की है। है ना? अच्छा एक बात और है कि यह लड़का बोलता है कि अभाव होना आवश्यक है तो भैया एक ही अभाव के होना आवश्यक है। जैसे ही वो अभाव की पूर्ति हो गई फिर से वो अभाव होना आवश्यक हो जाएगा। दिक्कत तो ये है ना कि अभाव की अगर पूर्ति भी कर दोगे जैसे हमारे पास अभाव है। अब हमने अभाव मान लिया पूर्ति हो गई। अब फिर कंप्लीट हो गया ईश्वर। अब अभाव कहां है? अब ईश्वर में अभाव क्यों नहीं है? तो ईश्वर में अभाव क्यों नहीं है? ईश्वर में अभाव होने से यदि ईश्वर की पूर्णता सिद्ध होगी तो ईश्वर में जैसे ही आप अभाव को मान लोगे फिर से वो पूर्ण हो
00:44:53:15 जाएगा। फिर से उसके लिए अभाव दूसरा चाहिए होगा। तो ऐसे कर करके दुनिया के सभी अभाव उसमें फिट हो जाएंगे। फिर एक ही क्यों? फिर एक ही क्यों? तो कितने अभाव? अच्छा अगर उसने कहा रस का अभाव मानना पड़ेगा। अरे भाई क्यों साधु भक्तों का उद्धार करने का अभाव भी मान लो। गिल्ली डंडा खेलने का अभाव भी मान लो। टन टना टन टन टन टारा मूवी देखने का अभाव भी मान लो भगवान में सारे अभाव मानने पड़ेंगे एक भी अभाव नहीं अनंत अभाव और जैसे ही वो मान लिए उसके बाद फिर अभाव फिर नया भाव लाओ अभाव की तो कोई सीमा ही नहीं है ना जैसे ही आपने स्वीकार किया कि भगवान में अभाव है भगवान अब पूर्ण हो गया पूर्ण हो गया तो अब उसमें अभाव क्यों नहीं है फिर से अभाव लाओ ये है इस का सिद्धांत यही हम दिखा रहे थे वहां संक्षिप्त करके ये है पागल पागल बनाया जा रहा है भाई इस कौन पागल फैक्ट्री देख रहे हो कितने कॉन्फिडेंटली व्यक्ति बोल रहा है अपने पागलपन को कॉन्फिडेंटली ईश्वर में अभाव नहीं है ये भी तो एक अभाव है ईश्वर में अभाव नहीं है ये भी तो एक अभाव है देख रहे हो दोबारा बोलता हूं ईश्वर में अभाव नहीं है ये
00:46:08:16 भी तो एक अभाव है बस मामा आ गए मामा आ गए [हंसी] तो ये सारी बातें हैं। जी शास्त्रवादी जी जी जय श्री राम भैया जय श्री राम बहुत जबरदस्त बहुत जबरदस्त था वो वीडियो मैंने जब उसे देखा ना पूरा बहुत ही मजेदार था बहुत मजेदार वो जो भाग था जिसमें आपने उसे मंत्र के मंत्र के लिए बोल दिया कोई मंत्र [हंसी]
00:46:46:07 हां सुनाइए तो सुनाना शुरू किया तो हमने कहा था आपने जनों पहना है [हंसी] तो नहीं बहुत जबरदस्त [हंसी] हमारे मैंने देखा है कि अपना एक चैनल ऐसा है YouTube पर जिसमें लाइव एक्शन देखने को मिलता है बिल्कुल वही ऑन द स्पॉट वो नहीं होता क्या कहते नहीं होता कुछ भी बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल भैया। अरे जब आप रामपालियो से जब आप जूझ रहे थे उस समय एक व्यक्ति आए थे ना आपसे चर्चा करने के लिए जो कि दोद मिनट से अपनी ही बात को भूल जा रहे थे। याद है? ठीक है। ऐसे ही ऐसेसे लोग आते रहते हैं। अच्छा मैं तो ये बोलूंगा मैं तो ये बोलूंगा कि तकरीबन इतने ही वीडियो शिवाश भैया का हो गया होगा इस वालों के साथ। जब आए थे तो वो सब रेफरेंस भी अगर देख लेते तो भी शास्त्रों के तैयारी के साथ आते तो भी शायद जो जीत गए हरा दिए जीत गए हरा दिए बता दिया था वो कर सकते थे लेकिन कुछ है ही नहीं अगर तो फिर आदमी को हराया कैसे जाएगा या फिर जैसे वो लोग कहते हैं हराना जिसको वो लोग हराना कहते
00:48:01:10 हैं हम तो हराना भी नहीं कहते भाई हरा दिया हरा दिया उसको कहते हैं कंफ्यूज कर दिया हम लोग परम शक्ति ढूंढ रहे हैं हम लोग। परम संशय ढूंढ रहे हैं। परम कंट्राडिक्शन क्या है? भगवान परम परम भगवान भगवान परम सत्य नहीं है। शाश्वत सत्य नहीं है। परम कंट्राडिक्शन है वो ये है इनकी। अच्छा इन्होंने देखो एक चीज मेरे ऊपर आई है। जो है थोड़ा सा अग्रेशन में आ जाता हूं। तो अग्रेशन की बात यह है कि सामने वाला एक झूठी मुस्कान दिखा के बार-बार झूठ बोल रहा है। अपनी बातों से पलट रहा है और उलझा रहा है। किसी बात का स्पष्ट जवाब नहीं देना चाहता है। आप लोग कभी भी मेरे इसको देखना मेरे मेरी बातें देखना। मैं बहुत जल्दी अगर मेरा पक्ष पूछा जाएगा बहुत स्पष्ट बोलता हूं। साफ सुथरा क्योंकि उसमें मुझे मेरा यह नहीं ना मुझे झूठी जीत प्राप्त करनी जो है वही तो दूंगा मगर वो क्या करते हैं उलझाने वाली बात करते हैं जैसे कि अभी मैं वो एक ट्रिम करके और बनाया है तीन चार मिनट का वीडियो है उसमें तीन चार पार्ट है सबसे पहले इस लड़के ने कहा मैंने अब उसको बहुत
00:49:16:19 उसमें बहुत मेहनत लगी है मगर वो बहुत मतलब कोई भी इंटेलेक्चुअल पर्सन होगा तो उसके लिए बहुत बढ़िया वीडियो है तो उसमें मैंने देखा कि जब मैंने कहा ईश्वर को सृष्टि बनाने की आवश्यकता क्या है? तो इस व्यक्ति ने पांच से छह बार अपनी बातों को बदला है। पहली बार इसने बताया कि वो जो है वो अपने से बना लेता है। इसलिए उस पर दोष नहीं आएगा कि उसके अंदर कोई कमी है। मतलब पहले खुद कमी का विरोध कर रहा है। ठीक है? कि मेरे पास जैसे पेन पेन की मुझे आवश्यकता है और ये मेरे पेन अंदर से ही निकला है तो इसको यह नहीं माना जाएगा कि ये पेन जो है इसका मेरे अंदर अभाव था। तो यानी कि सबसे पहले खुद अभाव का विरोध कर रहा है। पहली बात। फिर दूसरी बात मैंने कहा क्रिया का अभाव तो है। तो फिर वो किस पे आया? कि भगवान का दोनों साथ साथ होना चाहिए। अब दोनों साथ साथ वाला आ गया। फिर मैंने उस पर काउंटर किया कि भगवान है भी और नहीं भी। दोनों साथ साथ का क्या मतलब है? भगवान है भी और नहीं भी। ये परम संशय दे रहे हैं दुनिया को।
00:50:31:20 दुनिया में जो लोग हरे कृष्णा का जाप कर रहे हैं वो लोग किसका जाप कर रहे हैं? परम संशय का। इसके अनुसार। हम तो भगवान कृष्ण का कर रहे हैं इस के अनुसार तो क्या कर रहे हैं वो अगर कोई इस के मंदिर में जाएगा तो वहां जाकर के भाई कहां है कहां है कृष्ण भगवान की मूर्ति कहां है तो वो कहेंगे यहां हो भी सकती है यहां नहीं भी हो सकती है ये जो स्थिति है यही भगवान कृष्ण है इसी पूजा [हंसी] इसी को अचिंत भी कहते हैं। इसी को अच कहते हैं। यहां खड़े भी हो सकते हैं। यहां अरे भाई कुछ तो बता दो। नहीं बस यही ऐसी पूजा करनी है। अच्छा और सुनो। अच्छा जब एक बात बताओ जब परम संशय है ही वो तो फिर तुम क्यों एक तरफ को चिपके पड़े हो? फिर क्यों लोगों का विरोध कर रहे हो? मतलब वो संशय ही है। विरोधाभास को ही तुमने स्वीकार कर लिया है। कंट्राडिक्शन को ही स्वीकार किया है। तो तुम फिर भगवान के फिर एक स्वरूप के पीछे क्यों पड़े हो? भाई भगवान कृष्ण भी हो सकते हैं। भगवान शिव भी हो सकते हैं। अगर भगवान शिव नहीं हो सकते तो फिर अभाव है शिव ना होने का। लो
00:51:47:10 फिर क्यों पकड़े पड़े हो? मतलब हम तो दुनिया को अभाव अभाव कह के उनकी सारी चीजें छुड़वा दें और फिर अपनी चीजें चिपका दे कि नहीं ये तो जड़वत है। अब ये नहीं बदलेगा। यह जड़वा था जो हम कह रहे हैं। इसको तभी बदल सकते हैं जब हम बदले तुम नहीं बदल सकते। है ना? अच्छा एक बात और है। इससे मुझे याद आया कोई एक कौन सी क्या देखा था मैंने एक फिल्म का दृश्य था। वो पूछता है के कहां पे है? तो वो ऐसे करता है। मोटरसाइकिल चला के कुछ बताता [हंसी] है। क्या कोई चीज है ना? तो मैंने कहा देखा है मैंने भी हां वो कुछ कॉमेडी सीन है वो तो इनके बारे में क्या है इस से पूछो कि भैया ये बताइए ए की स्पेलिंग क्या है जैसे कहते है ना दिस शी इज ए कैट तो इसमें जो ए शब्द आया है हां ये थ्री इडियट्स में है हां थ्री इडियट्स में वो वो होता है ना शरमन जोशी उससे वो पूछता है प्रिंसिपल कि एक मोटर कैसे स्टार्ट होती है तो कहता है अच्छा
00:53:00:00 है [हंसी] ना तो ऐसे ही वालों से अगर पूछो कि एप्पल की स्पेलिंग में सबसे पहला अक्षर क्या है? तो इस वाले कहते हैं रुको ए बी सी डी एफ जी एच के पी क्यू आर एस [हंसी] अच्छा भाई उत्तर तो दिया ही नहीं आपने अरे क्या होता है अच्छा तुम बताओ ए से होता है ना पहला अक्षर तो ए है ना बोला तो है ए बी सी डी सुनाई उसमें पहला अक्षर ए था कि नहीं था बोला ना मैंने आंसर दिया मंकी की पहली पहला अक्षर क्या है ए बी सी डी एफ जी एच आई जे के एल एन ओ पी क्यू आर एस टी यू वी डब्लू एक्स वाई जेड सब बोल दो। कुछ ना कुछ तो हो ही जाएगा।
00:53:47:08 सब कुछ बोल दो। सारे आंसर दे दो। तो पहले बोलता है कि क्योंकि वो अभाव अंदर से ही दूर हो रहा है इसलिए अभाव नहीं है। फिर बोलता है ईश्वर होना और ना होना दोनों एक साथ होना चाहिए। फिर मैं उस काउंटर करता हूं। तो तीसरे में आता है अंदर वाला ईश्वर सृष्टि करता है। बाहर वाला नहीं करता। टाइम के अंदर वाला करता है। बाहर क्रियाएं नहीं होती। उसके बाद में उस पर भी काउंटर करता हूं। इसका मतलब परम सत्य जो रूप है उसको आवश्यकता नहीं है। तो फिर आ जाता है कि नहीं नहीं उस पर भी आवश्यकता होगी। आवश्यकता होगी तो सच्चिदानंद नहीं है। फिर आ जाता है कि भैया अभाव नहीं है तो फिर ईश्वर कहता। शुरू में भाव का खुद ही विरोध कर रहा है। अच्छा क्रिया ना होने की बात कही पहले कि टाइम के बाहर कोई क्रिया नहीं है। फिर थोड़ी देर बाद कह रहा है कि टाइम के बाहर एक्सटेंशन होता है भगवान का। क्रिया आ गई। आ गई क्रिया। ऐसे करके व्यक्ति अपनी बातों से बार-बार पलट रहा है। अच्छा पहले कह रहा है 500 जीबीसी मेंबर्स वो मेरे अंतिम निर्णायक हैं। एक घंटे जूझने के बाद दो घंटे जूझने के बाद लगभग दो ढाई घंटे जूझने के बाद कह रहा है 12 मेंबर्स। भाई कैसे सिद्धांत है तुम्हारे?
00:55:02:14 तुम आए हो इस का पक्ष रखने के लिए। हां जाओ थोड़ा सा पूछ लो अपने हो बाण से। तो छह बार छह बातें कर रहा है। उलझा रहा है। कोई भी स्पष्ट जवाब दे ही नहीं रहा है। यह जवाब है। भगवान में अभाव नहीं होगा तो भगवान कैसा? अभी आने वाला था। आता तो पूछता बता का अभाव का अधिष्ठाता कौन है? भगवान में अभाव का अभाव है। यानी अभाव बाहर तो एक्सिस्ट कर रहा है। तो अधिष्ठाता कौन है? फिर उसका अभाव को तुम तत्व मान रहे हो। जबकि अभाव तो जो है ही नहीं। सामग्री का अभाव है तो सामग्री का अधष्ठाता कौन है? उस सुख का अधिष्ठान कौन है? जो सुख प्राप्त होगा रस से सो ढेर हो जाते।
00:55:54:16 आपका आपका वीडियो देखने के बाद ना मैंने भी आपका वीडियो देखने के बाद मैंने भी कुछ प्रश्न जाकर के इस से किए थे कि देखिए ये शिव निंदा जो छापा जा रहा है बहुत सी चीजें इसका उत्तर दीजिएगा मुझे कि क्यों छापा जा रहा है तो बीच लेक्चर में मैंने पूछा था दो तीन जगह तो एक जगह एक ने उत्तर दिया कि जो छाप रहा है उससे जाकर आप बात कीजिए मुझे नहीं पता हम तो खाली पढ़ा आ रहे हैं। [हंसी] दूसरे दूसरे ने कहा कि आज जो लेक्चर था जिसके ऊपर उसके ऊपर बात कीजिए। आप ये सब बात मत कीजिए। तो मतलब कि आंसर है ही नहीं। अगर देखा जाए मतलब कि एक खाली किताब पढ़ाई जा रही है। उसको हम यह नहीं कह सकते कि हम सनातन सिद्धांत पढ़ा रहे हैं। हम केवल एक किताब ले लिए उसको पढ़ा रहे हैं। खैर वो जो ट्रिम किया हुआ वीडियो है जो इसने अलग-अलग बातें कही है अपने पक्ष के उसमें। अभी वो तो ट्रिम करना बाकी है। वो जो प्रामाणिकता के ऊपर बना है। अभी वो अलग से लगा देंगे। रहने दीजिए। अलग से वीडियो एक डाल दिया जाएगा। ठीक है शास्तवा जी आप बोले कुछ बोल रहे थे हां एक बहुत जरूरी बात आपको दिखानी थी ये
00:57:09:18 देख लो ये देख लो कि क्या है समझ में आ रहा है क्या श्रीमद् भागवतम जी भैया श्रीमद् भागवतम ये देखो परमेश्वर अब ये तो मैं नहीं लिख रहा हूं ये तो इनहीं की वो है बड़ा कर दो भैया मेरा वाला कॉलम क्या लिखा है? परमेश्वर पढ़ सकते हैं आप? एक मिनट मैं बड़ा कर दूं अपना वाला पूरा।
00:57:47:06 हां ये बोल दिया मैंने। मेरा वाला लेआउट बड़ा कर दीजिए। हो गया। हां। कहां हुआ? नहीं। अभी हुआ था पहले। मेरा वाला कॉलम बड़ा कर देंगे ऑपरेटर जी
00:58:39:15 हो गया हो गया हां ये देखिए पहली लाइन क्या आ रही है पढ़ सकते परमेश्वर अर्थात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान सदैव आत्मष्ट रहने वाला है। सदैव सदैव अब यहां सदैव का मतलब सदैव माने कि ना माने हां मानो भी और मत भी मानो। है भी और नहीं भी। [हंसी]
00:59:12:26 अचिंत का मतलब ही यही है ना। आप समझो अचिंत मतलब कि जहां अटक गए वहां है भी और नहीं भी। [हंसी] मैं ये नहीं जानता कि जीवन का परमेश्वर को प्रसन्न करना करुण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान जो इस मूर्ख अज्ञानी व्यक्ति पर इतने दयालु हैं। भगवते पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान बार-बार पूर्ण कर रहे हैं। और यहां पे ये भी कह दिया कि सदैव आत्म संतुष्ट रहने वाले हैं। कहां पर लिखा है? स्कंद सात अध्याय नौ और ये किसकी व्याख्या चल रही है? 11व श्लोक की व्याख्या। उसमें क्या लिख रहे हैं? परमेश्वर अर्थात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कौन लिख रहे हैं? शीला प्रभुपाद जी का श्रीमद् भागवतम में परमेश्वर अर्थात
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01:00:02:00 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान सदैव आत्म संतुष्ट रहने वाले हैं। अतः जब उन्हें कोई भेंट अर्पित की जाती है
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01:00:08:26 तो भगवत कृपा से ये भेंट भक्त के लाभ के लिए ही होती है। क्योंकि भगवान को किसी की सेवा की आवश्यकता नहीं है। तो सृष्टि बनाना तो व्यर्थ हो गया। आवश्यकता तो सिद्ध नहीं हुई ना। उदाहरणार्थ यदि किसी मुख सुसज्जित होता हो तो दर्पण में उसके मुख का प्रतिबिंब भी सुसज्जित दिखता है। तो
01:00:43:22 अच्छा इसने एक बात और कही थी वहां पे इसने जो है जो बदलता गया है ना उसमें आप देखिए लास्ट में फिर ये बोलने लगा वृद्धि होती है। कितनी बार इसने अपने स्टेटमेंट को बदला है। अब ये बताइए जब भगवान अनंत आनंदित है, अनंत सुखी है तो वृद्धि कहां होगी? वृद्धि तो वहां होगी ना। जहां कोई सीमा होगी उसके बाहर जाके वृद्धि होगी। जब अनंत वो ऑलरेडी है कहां से होगी? बोला सुख की वृद्धि होती रहती है। रस की वृद्धि होती रहती है। वृद्धि कहां होगी? जब वो अनंत अनंतता वृद्धि कैसे हो जाएगी? अंदर ही होगी अनंतता के। उसको वृद्धि कैसे कहूं? बिल्कुल भैया। यही तो यही तो प्रश्न था भैया कि आखिर कैसे कह रहे हैं ये लोग? पहले तो अनंत भगवान है। फिर उनका वो अनंत है। उनमें अनंत आनंद है। फिर में अभाव होना ये भी उसके लिए ये भी उसकी इनकंप्लीटनेस है। अगर हम अगर हम ये कहे ईश्वर में दुनिया में कोई ऐसी चीज नहीं है जो ईश्वर को जिसकी जरूरत नहीं है तो ये ईश्वर को इनकंप्लीट बनाता है। ईश्वर मैं दोबारा यदि अभाव नहीं है ठीक है।
01:01:59:03 [हंसी] ये बात एकदम क्लियरनेस के साथ ऐसे एकदम क्लियरनेस के साथ बोल दिया। आप उसको हटा भी नहीं सकते। उसको अचिंत भी नहीं कर सकते कि नहीं भी बोला था [हंसी] उसी कारण है ऐसे ही वो आचार्य प्रशांत जो है तथाकथित वो क्या करते हैं कोई सवाल आ जाए और जवाब नहीं आता है मान लो तो चिड़चिड़ा के बात करेंगे [हंसी] हां तुमने ऐसा क्या किया है मैं तुम्हें यहां पर मुक्ति देने की बात नहीं कर रहा हूं किसी ने पूछा कि भाई भगवान है कि नहीं वो नासिकता वाला अभी चला था पूरा आधे घंटे का वीडियो बोल दिया। उस व्यक्ति ने ये नहीं बताया भगवान है कि नहीं है। किसी ने पूछा वो जाके धक्कर वाली बहस हुई थी उस बहस में किसी ने पूछ लिया इनसे सभा में कि भाई वो भगवान है कि नहीं? आधा एक घंटा हो गया। इसने क्लियर कट ये नहीं बताया भगवान है। भाई घूमते रह जाओगे। ढूंढते रह जाओगे। [हंसी]
01:03:07:13 बहुत जबरदस्त भैया। आप तो पूरा मिमिक्री कर दे रहे हो। अब कमेंट आएगा आपको कि बहुत से लोगों का कि बच्चों का मजाक उड़ाते हो आपको शोभा नहीं देता है। मायावादी ऐसे ही होते हैं। वगैरह वगैरह। मैं वो बात कह दूं कि भाई हां मुझे क्रोध आता है। मेरे धर्म को कोई क्षति पहुंचाने का प्रयास कर रहा होता है। बेवकूफ बनाने का प्रयास कर रहा होता है। मुझे क्रोध आता है। और बिल्कुल क्रोध आना चाहिए। वैसे भी ये जो दोष है पौरुष के दोष इनसे व्यक्ति मुड़ नहीं सकता है। हां इनका विषय यदि बदल दे धर्म को विषय बना दिया। ईश्वर को विषय बना दिया वही आपकी जीत है। तो भाई क्रोध तो आता है जब भैया आज तो आज नहीं कल मैंने महाभारत में ही जब भगवान श्री कृष्ण और युधिष्ठिर जी का संवाद मैं पढ़ रहा था ठीक है वैष्णव वैष्णव धर्म का जब वो बताते हैं भगवान तो उसमें स्पष्ट बताएं कि ब्राह्मणों का जो होता है ना उनका क्रोध ही उनका अस्त्र है। मतलब वो केवल बोल सकते हैं, डांट सकते हैं या अपना गुस्सा व्यक्त कर सकते हैं। बस वो शस्त्र हाथ में नहीं लेते। इस तरह का भगवान श्री कृष्ण का वचन है। तो फिर
01:04:23:03 जब भगवान मानते हैं कि क्रोध गलत नहीं है तो फिर कोई ये कैसे टिप्पणी कर सकता है कि क्रोध करना गलत है। क्रोध ये देखा जाए क्रोध किस विषय पे हो रहा है। धर्म पे हमला हो रहा है। क्रोध कर रहे हैं। और उसमें भी एक मर्यादा है। ऐसा थोड़ी ना है कि मैंने क्रोध में उसको गाली दे दी। नहीं इसका उत्तर इसका उत्तर है ना एक मिनट इसका उत्तर है ना मैं बताता हूं भगवत गीता में क्रोधा समोह समोहा विहम वो वाला जो श्लोक है उसमें प्रभुपाद जी लिख रहे हैं कि क्रोध क्यों करना चाहिए तो अभी आपने जो बताया ना लगभग उससे सिमिलर है तो किसी को ये लगे तो जाकर वो पढ़ सकता है कि क्रोध करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए एक बार ऐसे ही कोई व्यक्ति आया था बंगाली टाइप था शायद आपने उसको भी डांटा था जब उसने बोला कि इस ठीक है ना थोड़ा बहुत है कि हेरफेर कर रहा है शास्त्रों में तो चलेगा ना तो आपने डांटा था उसको कि बहन तो बहन ही उसमें थोड़ा बहुत हीन भावना नहीं बहन है तो बहन ही हम तो वहां पर बताना पड़ता है ताकि लोग समझ सके उस चीज को अगर क्योंकि प्यार से समझ नहीं रहे तो थोड़ा डांटेंगे तो एक व्यक्ति कह रहा है कि शिवा में तला जाएगा।
01:05:38:12 मैं हजारों बार नर्क में तलने को तैयार हूं अपने धर्म की रक्षा करने के लिए। बार-बार मैं धन की रक्षा करूंगा। बार-बार जन्म लूंगा और बार-बार मुझको तुम तलवा देना। ठीक है? हजारों बार क्या बात है। मैं भी मेरा जीवन यही है। बस कुछ नहीं चाहिए मेरे जीवन से। मुझे यही चाहिए। मुझे धर्म की रक्षा करनी है और इसके लिए यदि मुझे तला जा रहा है तो मुझे सहस स्वीकार है। मैं नहीं होने दूंगा अपनी आंखों के सामने ये सब। जय हो।
01:06:16:00 किस किस तरह से ये लोग कहते हैं कि नर्क में चले जाओगे। सारे नर्क में स्पष्ट लिखा अभी मैंने आपको कहा ना जो धर्म के लिए अभी है जो धर्म के लिए कुछ नहीं बचेगा ना यही सब बोलने लगेंगे अब ये सब बोलने लगेंगे कुछ नहीं मिलेगा बस नर्क में तले जाओगे इस तरह की बात बताइए वहां पे भाई वो लोग कर क्या रहे हैं बोल क्या रहे हैं उस पे भी विचार करो क्या भगवान के विषय में इस तरह की बातें बोलना और भ्रम फैलाना उससे वो बच जाएंगे नर्क ये बताओ
01:06:53:15 जी ऑपरेटर जी कुछ कह रहे हैं स्पष्ट नहीं हो रहा है। ठीक है। सभी को जय श्री राम। और वो जो ट्रिम किया हुआ वीडियो है वो आपको जल्दी ही मिल जाएगा। मेन चैनल पर ही डालेंगे उसको भी जिसमें कि वो देखिएगा आप कितने पैतरे बदले उस व्यक्ति ने। बिल्कुल भैया बिल्कुल लोग इस तरह के वाली बात भगवान के विषय में उसने जो बातें की है भगवान के विषय में जो उसने बातें की है वो डेढ़ घंटे की बातें हैं मगर वो सिर्फ तीन मिनट में पूरा सारांश है उसमें पूरा सारांश सिर्फ तीन मिनट में घूम फिर के घुमा घुमा के घुमा घुमा के 3 मिनट की बातें हैं मूल तत्व जो उसने कही है वो मैं आपको दिखा दूंगा मेन चैनल पे डालना तो देखिएगा है ना चलिए बिल्कुल बिल्कुल भैया जी भैया जय श्री राम मैंने एक वो देखी थी लाइव इनके सनातन
01:08:08:28 शंकर जी के चैनल पर तो वहां देखो कितनी अभद्रता कर रहे हैं वो आर्य समा के उल्टा सीधा गलत उनको सामान्य जो बेसिक शिष्टाचार होता है उसकी भी उसका भी ज्ञान नहीं संस्कार है ही नहीं। मैं कह तो रहा हूं जितना भगवान बाधित होता जाएगा वहां से धर्म का लोप होता चला जाएगा। क्योंकि जब सर्व सामर्थ्यवान नहीं है तो व्यक्ति के धर्म के प्रति निष्ठा नहीं होती है। यू ही अपनी बबत्ती में ही कुछ चीजें मान सकता है। कुछ चीजें नहीं मान सकता है। और ये कटिंग होते होते पहले सनातना वासी में आते हैं। फिर सनातना वासी से चले जाते हैं। धर्मी धर्मासी में धर्मासी से चले जाते हैं मानवतावासी। यही कटिंग होते होते जब आपकी भगवान के प्रति निष्ठा ही नहीं होती है तो आप उसको प्राप्त करने के निमित्त बताई जाने वाली नियमावली के प्रति निष्ठा नहीं रख पाते। आज मेरे को बहुत से जो कर्मकांड विषय हैं उनमें बहुत ज्यादा बहुत सारे ऐसे विषय है जिसमें मेरी कोई गति नहीं है। मगर मैं करता हूं। क्यों? भगवान ने कहा है। क्यों होती है निष्ठा? क्योंकि
01:09:24:04 यदा यदा धर्मस भवती भारत अभस तदात्म सजा तब होती है निष्ठा जब ईश्वर सर्वशक्तिमान होता है तब व्यक्ति के अंदर धर्म स्थापित होता है चलिए ठीक है आने के लिए आप लोगों का भी धन्यवाद जय श्री राम धन्यवाद जय श्री राम जय श्री राम
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