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00:00:01:10 सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और एक व्यक्ति हैं जो भावतन को सपोर्ट करते हैं और भावतन की प्रामाणिकता को लेकर के भी उन्हें आपत्ति है कि हम क्यों यह बात कहते हैं तो उनको ले लेते हैं। जय श्री राम जय श्री राम जी

00:00:38:26 हां जी मैं कुछ बातें मैं कुछ बातें कहना चाहता हूं क्या आपत्ति है आपने एक आपत्ति जताई है जो हमारी फोन पर बात हो चुकी है वो मैं यहां पर रख दूं उससे फिर आगे हम लोग बात करेंगे

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00:00:52:19 आपने एक आपत्ति जताई है कि भाई हमने भागवतानंद के साथ तू तड़ाक क्यों की जिस पर कि मैंने कहा कि तू तड़ाक उसी ने प्रारंभ की थी। हमने तो ऐसा प्रकट करते हुए कि कुछ चीजों के बारे में उसे पूरी जानकारी नहीं है और उसने वीडियो बना दिए हैं तो हम वो जानकारियां ठीक कर दे रहे हैं और अब आगे इस मामले में इस बात को खींचा ना जाए। ऐसा कहते हुए हमने वीडियो बनाया। पर

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00:01:17:03 जब हमने दो-तीन वीडियो ऐसे बनाए जब सम्मान पूर्वक बात करते हुए तो करपात्री जी का एक कथन था कि स्ान को यदि वो कहते हैं ना करपात्री जी ने एक बात कही थी कि स्वान को शंख की आवाज पसंद नहीं है तो कुछ इस तरह की बात है कि कुत्तों को घी का घी हजम नहीं होता है जिस प्रकार तो हमने जो सम्मान पूर्वक बहुत बातें कही थी तो उसको समझ में नहीं आई और वो तू तड़ाक पर पहले उतरा अब बात आती है कि विरोध क्यों किया था तो विरोध इसीलिए किया था क्योंकि उसने निराधार रूप से कई लोगों पर कई लोगों पर और कई सम्मान सम्मानित लोगों पर तूतड़ाक की बात की थी और कई लोगों पर बहुत गंभीर आरोप भी लगाए थे जिसके बारे में अभी तक आज तक उसने कोई प्रमाण नहीं दिया है और जब उसने वैसे प्रमाण नहीं दिया तो कोर्ट के माध्यम से उससे पूछ लिया गया है कि प्रमाण दो यहां आकर के जो जो तुमने चीजें कही है और अब वो प्रमाण देगा वहां जाकर के तो इसमें तू तड़ाक की बात कहां से शुरू हुई है कि उसने अपमानजनक तरीके से बात करना शुरू किया उसको सम्मान वाली भाषा समझ में नहीं आई

00:02:26:09 जी बताएं। मैं दो कंडीशंस कहना चाहता हूं। जी आप क्रोधित ना होइए इसके इस डिबेट में या डिस्कशन किया डिस्कशन में मेरे मैं बात वो डिपेंड करता है। वो डिपेंड करता है कि सामने वाला किस तरह का व्यवहार कर रहा है। हां मेरा व्यवहार शांत ही होगा। मैं इसको गारंटी दे सकता हूं। और मैं मैं जब बोलता हूं आप मत काटिए। पूरा बात सुनिए। मैं मैं आपकी पूरा बात सुनता हूं। हम मेरा मेरा मुख्य आर्गुममेंट ओपिनियन देता हूं। अब तो आपने बहुत लोगों से डिबेट किया। वो कितने संप्रदाय तो कितने संप्रदाय हैं? ब्रह्मकुमारी संप्रदाय नहीं है वो संप्रदाय नहीं है हां संस्था संस्था संस्थाएं हैं हां संस्थाएं संप्रदाय प्रामाणिक होते हैं जी तो तो आपने इस कान से किया और कई संस्था या संप्रदाय से किया मेरा पॉइंट मेरा पॉइंट ये है हां मेरा

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00:03:39:25 पॉइंट ये है आपने उन सभी के प्रति दुर्भाष नहीं किया। अगर लेटेस्ट डिबेट आप देखते आप आपके हैं योगदा वाले को उन्होंने यह बात कह दिया कि आदि शंकराचार्य जी को सिर का सिर काटा दिया क्योंकि वो बौद्ध को प्रचार करते थे। निरीश्वरवाद को प्रचार करते थे। आपने आपने बड़ी विनम्रता पूर्वक उसको नमस्कार किया। कोई प्रतिक्रिया नहीं किया। यह वीडियो में है। ऐसे निग्रह आचार्य जी ने क्या कह दिया? आप ग्रहचार्य जी के प्रति इतना बातें बहुत बातें बोलते हैं। हम

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00:04:22:07 आप कह दीजिए आपने एक नाम अभी लिया है निग्रहचार्य। कौन है ये? श्री भागवत आनंद गुरु जी। नहीं वो निग्रहचार्य क्यों कहा उसको? वो भाषा तो भाषा तो ठीक नहीं होगा बिकॉज़ ही सेस ही निग्रहाचार्य सो दैट्स व्हाई आई कॉल् निग्रहचार्य नहीं निग्रचार्य क्या बताया आपने उसके बारे में सभी को कहते हैं ना उन्होंने निग्रह आचार्य है उसके स्टेटस ये निग्रह आचार्य सभी के कहने पे से आप मान लेंगे कि वो वो चीज सही है मैं आपको मानने से मैं नहीं कह रहा हूं आप कहना चाहिए था निग्राचार क्यों कहा फिर आपने उसे वो मेरा ओपिनियन है ना नहीं आपका ओपिनियन है तो आप सही ओपिनियन दीजिए नहीं तो मैं काउंटर करूंगा ना उसे वो जो आप सिद्ध कर पाए

00:05:22:28 मेरा ओपिनियन है वो निग्रह आचार्य जी है निग्रह कैसे हैं निग्रह सुनिए उनको वेद के मंत्र कहां से मिले उनको

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00:05:31:13 सपने में दीक्षा मिली जो निग्रह संप्रदाय की उस दीक्षा को उन्होंने प्रमाणित किसी से सत्यापित कराया कि भैया यह जो मेरे को एक मंत्र मिला है यह वैदिक मंत्र है कि नहीं

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00:05:43:08 कैसे कराया उन्होंने सत्यापित अच्छा ये बात भी हुई आपकी साक्षात्कार में निग्रह आचार्य जी के साथ गुरु परंपरा को लेकर ये बात हुई नहीं ये बात हुई नहीं क्योंकि उसने मना कर दिया कि हम तुम्हें क्यों बताएं हां हां उस उसी वीडियो में आप जो दो मिनट के पहले या आप बात कर रहे थे श्री सांप्रदायिकता के बारे बारे में आपने कहा कि सभी संप्रदाय प्रामाणिक है। आपने यह बात मैं यह पूछ रहा हूं आपसे कि उसको जो मंत्र मिला है वो वैदिक है। इस बात की पुष्टि कैसे हुई? भाई आप एक बात बताइए मैं मैं बता एक मिनट मेरा मेरा प्रश्न समझ लीजिए कि मान लीजिए कि मेरे सपने में कोई बुरी शक्ति अगर मंत्र दे देगी मुझे भगवान का रूप धारण करके मुझे कैसे पता कि वो भगवान ही है या फिर वो मेरे भले के लिए ही कह रहे हैं। जब वो बुद्ध के रूप में आकर के हमको भटका भटका सकते हैं तो सपने में आकर के भटका नहीं सकते क्या? तो मेरे जो मेरे जो मंत्र आ रहा है पूरी के शंकराचार्य जी ने भी कहा है कि आपको यदि सपने में कोई मंत्र इत्यादि प्राप्त होता है तो उसको किसी प्रामाणिक आचार्य से सत्यापित करवाइए। तो भागवतानंद ने किस प्रामाणिक आचार्य से उस मंत्र को सत्यापित करवाया।

00:06:58:26 प्रश्न ये है मुझे मालूम है किससे करवाया है। यदि आप उसका नाम लेंगे तो फिर उस पर अगला क्वेश्चन उठेगा। जी अच्छा इस डिबेट के लिए मैं उन नगरी निग्रह आचार्य जी को मैं श्री भागवत आनंद गुरु जी ही बोलता हूं तो आपको नहीं पता है कि वो निग्रचार क्यों है उसकी प्रामाणिकता के विषय में आपको कुछ नहीं पता है हां मैं मुझे नहीं पता है वो उन्होंने कहा कि बात बोलने दीजिए शिवस जी उन्होंने कहा कि एक निग्रह प्रवेशिका नामक एक ग्रंथ वो लिखा है उसमें का सज्ञापन होगा। अब होगा या ना होगा वो भविष्य का विषय है। इस डिबेट के लिए मैं यह कहता हूं निग्रह आचार्य जी को आप नहीं मानते जो ठीक है। होगा एक मिनट

00:07:51:25 मैं समझ रहा हूं ना आप कहां जा रहे हो? आप कह रहे हो कि सत्यापित होगा। अभी तो नहीं है ना? आप अभी उसको निग्राचार कैसे कह रहे हैं? वो उसका आधार बताइए। प्रामाणिकता बताइए। तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण है। उसकी शास्त्रीयता बताइए कि अगर उसको सपने उसको सपने में मंत्र प्राप्त हुआ है तो उस मंत्र को सत्यापित किसने किया? मेरी जानकारी में अमृतानंद सरस्वती ने उसको सत्यापित किया। यानी कि अमृतानंद सरस्वती उसका शब्द प्रमाण हो गया। शब्द प्रमाण होने का मतलब समझते हो कि अमृतानंद सरस्वती ने बताया कि हां तुम्हारे सपने में जो मंत्र आया है वो वेदोक्त मंत्र है। वेद की सीमा के अंतर है अंदर है और तुम्हें देने वाले भगवान ही है भगवती ही है। ये उन्होंने सत्यापित किया। इसका मतलब कि अमृतानंद सरस्वती धर्म के विषय में झूठ नहीं बोल सकते। परंतु वह निगमानंद को अपना गुरु बता रहे हैं। निगमानंद ने ईसा को भगवान कहा है। और यह बात भागवतानंद ने भी नहीं मानी। यानी कि जो अमृतानंद सरस्वती है उनका शब्द प्रमाण निगमानंद है और निगमंद किसी ऐसी एंटिटी को किसी ऐसे तत्व को भगवान बता रहा है जो भगवान नहीं है। यानी कि अमृतानंद सरस्वती भी किसी ऐसे तत्व को भगवान

00:09:06:28 बता सकते हैं जो भगवान नहीं है। किसी ऐसी चीज को वैदिक बता सकते हैं जो वैदिक नहीं है। और यह बात स्वयं उसने स्वीकार की है कि उन पर पूर्ण भरोसा नहीं है भागवतानंद का। भागवतानंद का यह कहना कि वह सभी संप्रदायों में अनुशासनात्मक और शास्त्र के अर्थ बताए जाने वाले विषयों में वो निग्रह करेगा। यानी कि उसकी सब में दोष दृष्टि है। प्रमाण्य बुद्धि किसी में भी नहीं है। जब वो सबका निग्रह कर रहा है। शास्त्रीय शास्त्रीय भाष्यों में शास्त्रीय अर्थ में कहां क्या लिखा है? यहां पर इसने ये गलत कहा है। सबका निग्रह एक को भी नहीं छोड़ा है। तो यदि वह सबका निग्रह कर रहा है जिससे उसने अपने मंत्र को सत्यापित कराया उसके प्रति भी दोष दृष्टि है। उसकी जो गुरु परंपरा उसके प्रति भी दोष दृष्टि है। तो फिर उसका जो मंत्र है वो सत्यापित कहां हुआ? अच्छा मैं बोलता हूं। आप सुन लीजिए। आप रामानुजाचार्य को वेदांत के आचार्य मानते हैं। आप अपना पक्ष रख लीजिए। फिर मैं बोलूंगा। मैं मैं मेरा पक्ष रखने के लिए ये बात समझ लो मेरे मेरा आवश्यक सुनिए सुनिए मैंने अपनी बात पूरी बोल ली ना ऐसे आप अपनी बात पूरी बोलिए मेरा बात के

00:10:22:00 लिए आपके जवाब आपके जवाब चाहिए इस प्रश्न के लिए क्या आप रामानुजाचार्य को या मधचार्य को वेदांत के आचार्य मानते हैं क्या क्या वो अद्वैत मानते हैं नहीं मानते हैं। यदि वो खंडन करेंगे जितने जितने अंश में वो खंडन करेंगे तो हम वहां प्रतिकार करेंगे। वो तो नहीं कर रहे। करेंगे तो हम बोलेंगे और उनको इसलिए मानते हैं कि जिसको हम मानते हैं उसने उन्हें माना है। सिंपल जिसको हम मानते हैं जो हमारा शब्द प्रमाण है शंकराचार्य उन्होंने उनको माना है। इसलिए हम मानते हैं। हमारे शब्द प्रमाण ने निग्रचार्य को भागवतानंद को निग्रचार नहीं माना है। एक यह एक अभी आपसे मैंने प्रश्न ये नहीं पूछा है। अभी आपसे मैंने प्रश्न ये नहीं पूछा है। सुनिए प्रश्न मेरा है। भागवतानंद को भागवतानंद को यदि सपने में मंत्र मिला उसको कैसे पता यह मंत्र वेदोक्त मंत्र है। देने वाली वेदोक्त भगवती है। ये उसको कैसे पता? क्योंकि सपने में बुरी शक्तियां भी आ सकती है और भगवान भी छल कर सकते हैं। दोनों चीजें इसीलिए भगवान यदि छल ना कर सकते होते

00:11:37:13 मोहिनी रूप में छल किया कृष्ण रूप में छल किया बुद्ध के रूप में छल किया तो भगवान भी भगवान छल भी कर सकते हैं। भगवान एक मिनट भगवान है तो सीधे तौर पर भगवान की वाणी को प्रमाण नहीं मानते। एक मिनट भाई साहब सीधे तौर पर भगवान की वाणी को सीधे तौर पर भगवान की वाणी को हम प्रमाण नहीं मानते हैं। इसीलिए हमारे जो प्रमाण है वह है वेदो वेद अपौरुषय धर्म ग्रंथ तो जब भगवान स्वयं आए बुद्ध के रूप में उन्होंने कहा ये धर्म नहीं है यज्ञ इत्यादि ठीक है जब उन्होंने यज्ञ से दूर किया हमारे वाले जो बुद्ध आए थे भगवान विष्णु स्वयं आए उनके रूप में और यज्ञों से उन्होंने दूर किया तो हमने जो जिन लोगों ने उनकी बात नहीं मानी वो सनातनी है आज भी अच्छा ठीक है ठीक है तो मैं कहना चाहता हूं क्या भगवान भी छल कर सकते हैं और भगवान अगर भगवान भी छल कर सकते हैं गुरु भी छल कर सकते हैं ये तो ये तो बात है अगर रामानुजाचार्य जी ने रामाचार्य जी के पास वेद आया वेदांत आया अगर उन्होंने खंडन किया गुरु परंपरा से जो शब्द प्रमाण है उसको उन्होंने

00:12:52:21 खंडन किया उसको प्रमाणित करना चल या चल या नहीं चल करना या नहीं यदि यदि रामानुजाचार्य संप्रदाय के कोई भी आचार्य सामने से आकर के शंकराचार्य जी का विरोध करेंगे और हमारे सामने हमें उसे अपेक्षित लगेगा तो हम वहां पर उनको उनका प्रतिकार करेंगे। अगर शंकराचार्य के कोई आचार्य शंकर परंपरा के कोई भी आचार्य रामानुजाचार्य परंपरा का खंडन करेंगे प्रखर हो के सामने आकर के बोलेंगे तो वहां तो उसका भी काउंटर करने का पूरा अधिकार उनको है। रामानुजाचार्य के जो परंपरा वाले हैं इससे इससे आपका मंत्र प्राप्त होना सिद्ध कैसे हो रहा है? सुनिए मेरे गलत होने सुनिए बात भटक रही है बार-बार बात भटक रही है। बात भटक रही है। प्रश्न ये पूछा जा रहा है क्या भागवतानंद के लिए भागवतानंद ने अपने चीजों को किसी से सत्यापित कराया है या नहीं? रामानुजाचार्य को वैदिक हमारे ही आचार्य जिन जो हमारे शब्द प्रमाण है उन्होंने उसे वैदिक माना है रामानुजाचार्य परंपरा को ठीक है इसलिए हम मानते हैं और आपने कहा वो छल कर सकते हैं कि नहीं छल कर सकते हैं कि नहीं बिल्कुल कर सकते हैं मगर हमारे वो शब्द प्रमाण

00:14:08:00 है हमारे अनुसार जो हमारा शब्द प्रमाण है वहां से हमारी थ्योरी शुरू होती है जैसे वेद भगवान वेद के एक मिनट भाई साहब एक मिनट भगवान वेद के रूप में भी गलत चीजें दे सकते हैं। मगर जब वह हमारे परंपरा प्राप्त गुरुजनों से प्राप्त वेद के विरुद्ध चीजें होंगी भले ही उस वेद का ठप्पा लगा होगा हम उससे नकार देंगे। इसको कहते हैं सनातन धर्म। तो गुरु परंपरा से प्राप्त वेद वेद है। शास्त्र शास्त्र है मंत्र मंत्र है। धर्म धर्म है। ब्रह्म ब्रह्म है। गुरु परंपरा से प्राप्त। ठीक है? तो हमारे वो शब्द प्रमाण है। जो चीज गुरु के द्वारा बताई गई सीमा के अंदर आएगी वो हमारे समय स्वीकार होगी। नहीं आएगी। नहीं स्वीकार होगी। अब बात ये आती है कि भागवतानंद का यह कहना है कि मुझे मंत्र प्राप्त हुआ है सपने में। उसको कैसे पता चला कि ये वैदिक मंत्र है। सवाल ये है और अगर आप बार-बार आप विषय करने के लिए रामानुजाचार्य इत्यादि की बातें लाएंगे बीच में तो मैं आपको ये कहूंगा कि मेरे गलत होने से आपका सही होना सिद्ध नहीं होता। भाई साहब आपसे सवाल किया गया है। आपसे सवाल किया गया है। मुझे बोलने दीजिए। जी हां आपने ये कहा कि गुरु परंपरा होती है और गुरु

00:15:23:06 परंपरा में गुरु सत्यापन करते हैं। सवाल ये है कि मंत्र को सत्यापित कैसे किया उसने कि ये वैदिक मंत्र है सवाल ये है यहां से इससे शुरू करिए बाद की बातें बाद में करिएगा अगर अगर इस इस दिन कोई शंकराचार्य सत्यापित करते मैंने पूछा सत्यापित करवाया है कि नहीं उसको कैसे पता है वेद वेद से वेदोक्त मंत्र है मैंने ये पूछा है सत्यापित कराया है कि नहीं पहले ये बताओ फिर आगे बढ़ते हैं जो विशिष्ट अद्वय सिद्धांत है उसको कौन कराया है कि नहीं मैंने कराया कि नहीं ये बताइए पहले आप एक-एक करके चलिए आगे सत्यापित मुझे नहीं मालूम मुझे मालूम है नहीं मालूम तो यानी कि अगर उसके मन में कोई भी उल्टी सीधी चीज आ जाएगी जिसको वो कहेगा कि वैदिक चीज आई है तो आप मान लो वैदिक है विशिष्ट वैदिक है वैदिक है अरे भाई मैंने सवाल क्या किया है मेरे सवाल का जवाब दीजिए। जी आप परंपरा को प्रश्न कर रहे हैं। आपको निग्रचार्य का निग्रहचार्य सिद्ध करना है। अगर रामानुजाचार्य जी को रामानुजाचार्य को आप वैदिक नहीं मानते तो आपकी समस्या उनसे जाकर के पूछो बताएंगे। मुझसे क्यों पूछ रहे हो? आप वैदिक नहीं मानते। आप वैदिक

00:16:38:07 नहीं मानते उन्हें। अगर आपनेचार्य और शंकराचार्य इत्यादि को अवैदिक सिद्ध भी कर दिया तब भी आपका धर्म सिद्ध थोड़ी ना होगा। अभी मैं आपसे पूछ रहा हूं। निग्र आपने जो शब्द आपने जो शब्द यूज़ किया है निग्रचार्य ये शब्द जो है वो उसके मंत्र जो आया उसका आधार वही है ना निग्राचार्य का आधार उसके पास मंत्र आया देवी का। अब उसने कैसे ये करा कि यह जो मेरे पास मंत्र आया है वो देने वाली शक्ति वैदिक है। वो मुझे भटकाना नहीं चाहती है और वो जो मंत्र है वो वैदिक है। अब इसका एक सरल रास्ता मैं आपको बताता हूं। वो जाएगा एक मिनट में मैं बता दूं दर्शकों के लिए भी मैं बता दूं। आप समझ रहे मैं बता रहा हूं ना करते एक मिनट एक मिनट एक मिनट मेरे को एक एक बात सुनिए। एक बात सुनिए। हां एक बात आप क्या रहे हैं? मैं भूल गया।

00:17:35:13 चल अच्छा बोल दीजिए। बोल दीजिए। हां बोल देता हूं आप सोच लो तब तक सुनिए इसका सरल रास्ता यह है कि भागवतानंद ने कहीं से वेद भाष्य इत्यादि या ब्रह्म सूत्र इत्यादि लेकर पढ़ा हो और देखा हो कि भैया मेरे को जो प्राप्त मंत्र और सिद्धांत है या वो शक्ति है वो इसकी सीमा के बाहर तो नहीं जा रही है स्वतंत्र रूप से उसने पढ़ा हो ठीक है अगर वो गुरु के पास नहीं जा रहा है किसी तो उसने स्वतंत्र रूप से जो ब्रह धर्म ब्रह्म के विषय में जो वैदिक वांगमय हमें प्राप्त है उसको उसने पढ़ाओ। जिसको वो पढ़ेगा जिसको वो पढ़ेगा कि इसकी सीमा से बाहर नहीं होना चाहिए मेरा सपने का मंत्र। जिसको वो पढ़ेगा उसका रचयिता उसका शब्द प्रमाण होगा। जब वह उसका शब्द प्रमाण होगा तो भागवतानंद यह नहीं कह सकता है कि यह व्यक्ति अमुक विषय में झूठ बोल रहा है। अमुक विषय में अज्ञानता कर रहा है। क्योंकि यदि वो अज्ञानी होने के कारण धर्म के विषय में गलत निर्णय दे सकता है तो जो भाष्य जिसके आधार पर तुम अपने मंत्र को सत्यापित कर रहे हो वो भाष्य भी वो गलत लिख सकता है।

00:18:42:26 तो पहली ये बात खारिज हो गई। जो भाष्य गलत लिख रहा है ब्रह्म सूत्र है या उपनिषद है या वेद है जो भी जिससे भी वह अपने मंत्र को सत्यापित कर रहा है स्वतंत्र रूप से अगर वो भाष्य नहीं पढ़ रहा है अगर वेद मंत्र भी लेने जा रहा है तो वेद मंत्रों के लिए भी वो डिपेंड करता है किसी पब्लिकेशन पर जो पब्लिकेशन उसको उपलब्ध करा रहा है अगर वो पब्लिकेशन पे डिपेंड करता है या ऑनलाइन किसी पोर्टल पर डिपेंड करता है तो वो उसका शब्द प्रमाण हो जाएगा वो घोषित कर दे मेरा शब्द है वो पोर्टल को चलाने वाला कभी झूठ नहीं बोल सकता। उसको किसी एक के प्रति यह विश्वास दिखाना होगा कि भाई हमें इस पर विश्वास है झूठ नहीं बोल सकता। तो भागवतानंद ने क्योंकि सबके प्रति निग्रह करने की दृष्टि ले रखी है। तो इस कारण से वो ये नहीं कह सकता कि भाई ऐसा कोई है जिसके जो झूठ नहीं बोल सकता जो पीछे से आ रहा है पूर्वाचार्यों से। इस कारण से उसका मंत्र सत्यापित ही नहीं हुआ। क्योंकि सब झूठ बोल सकते हैं। सबका वो निग्रह करेगा। सब झूठ बोल सकते हैं। सब अज्ञानी हो सकते हैं। तो उसके मंत्र को सत्यापित करने वाला कौन होगा? जब नहीं होगा तो उसकी ना वैदिकता सिद्ध होती है ना उसका निग्रहचार्य तो सिद्ध होता है। अच्छा एक बात जी हम उन्होंने जिन महात्माओं के या जिन शास्त्र विज्ञान

00:19:58:12 विज्ञानियों के निग्रह किया या खंडन किया वो सब शास्त्र प्रमाण से ही किया। जो शास्त्र आप सभी के पास है उसके पहली बात तो खंडन वो खंडन जो है किया है कि नहीं किया है उस भी निर्णायकता नहीं आई है उसने विरोध किया है उसने विरोध किया है अभी सामने से उसका उत्तर दिया गया कि नहीं दिया गया ये सब अलग बातें है ठीक है अब बात ये है कि शास्त्र से किया अभी बात क्या चल रही है बात ये चल रही है कि यदि उसकी सभी में दोष दृष्टि है किसी भी गुरु और गुरु परंपरा में प्रमाण्य बुद्धि नहीं है तो फिर उसने अपना मंत्र कहां से सत्यापित कराया? उसको कैसे पता ये वैदिक मंत्र है? यह पूछ रहा हूं मैं। जैसे कि अभी थोड़े दिन पहले आर्य समाज का एक व्यक्ति आया था। ठीक है? उसने हमसे पूछा कि कौन भगवान है? कौन नहीं भगवान है? पता कैसे चलेगा? क्योंकि भगवान तो आके मानव रूप में लीला भी कर रहे हैं। पता कैसे चलेगा? कौन भगवान है? कौन नहीं भगवान? बिल्कुल सही बात है। वहां पर शब्द प्रमाण बताएगा हमें। हमारा शब्द प्रमाण बताएगा यह भगवान है। तो हम मानेंगे कि भगवान है। गुरु गोविंद और ग्रंथ केवल गुरु नहीं केवल गोविंद नहीं केवल ग्रंथ नहीं तो यदि हम किसी भी शब्द प्रमाण पूरा पूरा भरोसा ही नहीं

00:21:13:18 कर रहे हैं तो कल्कि भगवान जब आएंगे तो कैसे तय करोगे कि कल्कि कोई ना कोई आचार्य तो बोलेगा ना ये कल्कि आचार की सीमा के बाहर जाके किसी को भी कल्कि मान लोगे किसी बुरी शक्ति ने थोड़ा सा वैसा लक्षण दिखा दिया भगवान वाला तो तुम मान लोगे उसको आचार्य का भी ठप्पा वहां पर जरूरी है। जैसे कि गीता है। यह मेरे पास गीता है। ठीक है? हम यह मेरे पास भगवत गीता है। ठीक है? उसने खंडन किया है। उसमें कौन सही है, कौन गलत है, एक अलग विषय है। उसने विरोध किया है। उस विरोध में कौन सही है, कौन गलत है, अलग विषय है। मगर अभी बात यह है कि यदि वह अपने आप को निग्रहचार्य कह रहा है तो उसका निग्रहचार्यत्व सिद्ध कैसे होता है? उसकी सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही है कि उसने यह कह दिया है कि मैं शास्त्रार्थ के द्वारा सबका निग्रह करूंगा। तो सबके में सब आ गया। उसकी किसी के प्रति प्रमाण बुद्धि रह नहीं गई। अब जैसे ये ये ग्रंथ है। ये मेरे लिए ग्रंथ तब है। ये मेरे लिए ग्रंथ तब है जब किसी प्रामाणिक आचार्य ने कहा कि गीता प्रेस सही ग्रंथ छाप रही भगवत गीता। तब मेरे लिए ग्रंथ है। वरना भैया गीता प्रेस इसमें ग्रंथ के नाम पर कुछ भी छाप सकती है।

00:22:29:13 और अगर मैंने कह दिया कि नहीं नहीं मैंने गुरु के बिना इस ग्रंथ को अपना प्रमाण मान लिया तो इनडायरेक्ट वे में मैंने अपना प्रमाण किसको माना? गीता प्रेस वाले को अपना प्रमाण मान लिया। अब मैं ये नहीं कह सकता कि गीता प्रेस झूठ बोल सकती है। क्योंकि अगर वो झूठ बोल सकती है तो वो इस ग्रंथ के नाम पे दो श्लोक घटा बढ़ा सकती है। कुछ झूठ लिख सकती है। ठीक है? तो गीता तो इस तरीके से यदि मैं गुरु परंपरा को छोड़ दूंगा तो फिर गीता ब्रहस्प मेरी प्रमाण बुद्धि सिद्ध होगी। फिर मेरा धर्म का निर्णायक कौन होगा? अच्छा मैं मैं प्रश्न करता हूं। आप आपने कहा कि आपके आचार्य आपके गुरु जी पूरी शंकराचार्य जी राम आचार्य परंपरा को मानते हैं। ये शब्द पर शब्द प्रमाण हो गया। शब्द से प्रमाणित हो गया। विशिष्टद्वैत परंपरा आप ये भी कहते हैं कि परंपरा प्राप्त अर्थ में पूरा पूरा भरोसा होना चाहिए। स्वतंत्र रूप से अपनी बात बताइए मुझे। मेरा मेरा गलत होना जरूरी है क्या निग्रचार के निग्राचार्य सिद्ध करने के लिए? मेरा आधार जरूरी है क्या? मेरा आधार जरूरी है क्या? आप स्वतंत्र रूप से उसके बारे में बताइए। वो निग्रचार कैसे है? आप अगर भटकाएंगे विषय को तो मैं क्या करूंगा? व्यर्थ का टाइम थोड़ी ना है। आप

00:23:46:14 भाग्य लग रहा है इनकी कहानी शुरू तभी है। भागवतानंद स्वतंत्र रूप से अपने आप को निग्राचार्य सिद्धि नहीं कर पाएगा। उसको मेरा गलत होना आवश्यक है। उसमें अब जाओ जाकर के शंकराचार्य को और रामानुजाचार्य जी को सबको कहो कि तुम अप्रामाणिक हो। अगर निग्रह ये भागवतानंद भी अप्रामाणिक है। सुन रहे है ना? रामानुज जी भी सुन रहे होंगे। अगर भागवतानंद से उसकी प्रामाणिकता पूछी जाएगी तो भागवतानंदी यह करेंगे कि रामानुजाचार्य क्यों वो हो गए प्रामाणिक कैसे हो गए सीधी सी बात है अवतार कौन है कौन नहीं है इस विषय में हमारे जो शब्द है गुरु परंपरा के वो प्रमाण है जिनको उस उस वो जो ज्ञानार्थक दर्शन जहां से हो रहा है और क्या कहते हैं जो विशुद्ध सतोगुणी माया के साथ क्या कहते हैं आलंबन लेते हो भगवान ने अपना जो रूप दिखाया है आपको

00:24:56:16 जो जो उन्होंने रूप दिखाया है आपको उसके द्वारा वो मनुष्य जैसे कृत करते हुए दिख रहे हैं। शरीर को बड़ा करना रावण भी कर रहा है। कुंभकरण भी कर रहा है। इससे पहचान होगी क्या भगवान की? नहीं। जहां पर हमारे जो शब्द प्रमाण है गुरु परंपरा से प्राप्त जो गुरु गुरुजन है उनको ज्ञानार्थक दर्शन होंगे जिस जिस व्यक्तित्व को देखकर उस वो अवतार सिद्ध होगा उसको अवतार कहा गया उस समय पे हमारे शब्द प्रमाण थे वशिष्ठ ब्रह्मा जी वो सब हमारे शब्द प्रमाण थे उन्होंने कहा राम जी वो है भगवान व्यास जी ने कहा कृष्ण जी भगवान है कृष्ण भगवान ने तो कहा ही बाकी हमें वेद देने वाले व्यास जी इत्यादि ने कहा कि वो भगवान भगवान है। तब हमने माना वो भगवान है। इस बात को समझने का प्रयास करो और निष्पक्ष होकर के विचार करना शुरू करो। तो ऐसे ही हमारे जो शब्द प्रमाण है उन्होंने ज्ञानार्थक दर्शन किए भगवान रामानुजाचार्य में। हां ये है ज्ञान अवतार भगवान के। तो इसलिए वैदिक है और उनके द्वारा दी जाने वाली जो ब्रह्म की व्याख्या है उसको लेकर के संप्रदायों में भेद है। धर्म की व्याख्या में नहीं है। सभी मूर्ति पूजक है। सभी वर्णाश्रमी

00:26:12:00 है। इसीलिए किसी को किसी के बारे में कोई कटाक्ष इत्यादि करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अपने स्व की पुष्टि सब लोग किया करते हैं अपने अपने मंचों से। मगर ये नहीं है कि एक दूसरे के प्रति अनादर करते हो या फिर तूतड़ा की भाषा बोलते हो। मगर एक व्यक्ति आता है कहता है भगवती ने मुझे जो है सपना दिया है तो उस दृष्टि से भी उसको जब आचार्य के रूप में ऐसे किसी परंपरा वाले आचार्य के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा तो वहां पर पूछा जाएगा ना कि कहां से उसने अपने मंत्र को सत्यापित कराया है हमें तो सत्यापित सत्यापन नहीं हुआ स्वतंत्र रूप से कहां से सत्यापित करा लिया उसने वो गया अच्छा वो सत्यापित कराने कहा जा रहा है निगमानंद की परंपरा में वहां पर ब्रह्म सूत्र का भाष्य कहां से आया है? शंकर भाष्य और यही कार्य कर रहा था भागवत आनंद अपनी उसमें जब उससे पूछा जाएगा कि तुम्हारी परंपरा कैसे हो रही है? तो वो कहेगा कि भैया तो वो जो है शबरी ने वो शबरी के बेर खाए थे कि नहीं खाए थे अग्नि पुराण वो ये नहीं बताएगा स्वतंत्र रूप से कि मैं भागवतानंद निग्राचार्य कैसे

00:27:22:09 अब कुछ लोग यह भी कह देंगे कि नहीं शंकराचार्य की गुरु परंपरा अगर तुम ले दे के शंकराचार्य को तुम नहीं मानते हो वैदिक होना सिद्ध कर दो वेद कैसे आए सबसे पुराना भाषण का प्राप्त है कि नहीं प्राप्त है ले आओ उससे पुराना भाष कैसे आया वेद मंत्र स्वयं को वैदिक तक नहीं कह पाओगे निग्गू के चक्कर में जो अपना धर्म और ब्रह्म दोनों नष्ट कर रहे हो अगर शंकराचार्य की परंपरा को भी प्रामाणिक नहीं मानोगे शंकराचार्य स्वयं में शब्द प्रमाण है। सीधी बात अगर उन पर भी आप जो है दोष दृष्टि रख रहे हो शंकराचार्य रामानुजाचार्य इत्यादि पर भी दोष दृष्टि यदि तुम आप रख रहे हो तो आपका वैदिक होना ही सिद्ध नहीं होगा कहां से आया वेद बीच में मध्यस्थ है ना वो हमें भागवतानंद पर निर्भर नहीं है हम अपने वेद के लिए भागवतानंद हम पर निर्भर है शंकराचार्य पर रामानुजाचार्य पर अपने उसके लिए

00:28:26:26 क्या कहते हैं यह वेद वेद इत्यादि के लिए शास्त्रों के लिए अब क्योंकि वह निग्रह कर रहा है सबका मान लो कि वो विद्या भास्कर जी को कहे कि विद्या भास्कर जी ने तो मुझे प्रमाणिक कहा है तो वो तो उनका भी निग्रह करने को तैयार बैठा है। यानी कि वो भी उसका शब्द प्रमाण नहीं है। उसी के इस निग्रह की वजह से ही उसका निग्रचार तो सिद्धि नहीं होगा। एक को उसको छोड़ना पड़ेगा कि इस परंपरा के यह आचार्य जो है सन्यासी है इनका मैं निग्रह नहीं कर सकता। शब्द ये बिल्कुल सच्ची बात बोलते हैं शब्द प्रमाण क्योंकि अगर विद्या भास्कर जी महाराज का निग्रह वो अमुक अमुक विषय में कर सकता है और उसके अनुसार अमुक अमुक विषय में विद्या भास्कर जी भी गलत हो सकते हैं। अज्ञानता कर सकते हैं। आचरण की बात नहीं कर रहा हूं। यदि शास्त्र के किसी मामले का वह गलत अर्थ दे सकते हैं विद्या भास्कर जी महाराज तो वह तुम्हारे सपने में आने वाले मंत्र गलत मंत्र को भी सत्यापित कर सकते हैं। तुमने अपने आप को निगमानंद की परंपरा से तुमने अपना मंत्र सत्यापित करवाया है। निगमंद ने खुद ईशा को भगवान कहा है। ठीक। तो जब वो ईशा को भगवान कह सकते तो तुम्हारे सपने में आने वाली परी को भगवती नहीं कह सकते।

00:29:43:03 इसी प्रकार से उसने अपनी क्या कहते हैं? भटकाया था मामले को। भागवत आनंद को हम निग्रचार मानते हैं। क्यों? यह मुझे नहीं पता है। वो आएगा बाद में आएगा। वो क्या कहते हैं? अभी छपी नहीं है। निग्रह प्रवेशिका। प्रवेशिका में क्या होगा? यहां निग्रह शब्द आया है। यहां निग्रह शब्द आया है। जिस ग्रंथ में आया उस ग्रंथ में आया है। उससे ये सवाल थोड़ी ना बदल जाएगा ये वाला कि भागवतानंद ने अपना मंत्र सत्यापित किससे कराया? उसको कैसे मालूम वैदिक है। वेद के लिए उसे किसी परंपरा प्राप्त आचार्य के पास जाना पड़ेगा। और जब जाएगा तो वो उसका शब्द प्रमाण बनेगा। शब्द प्रमाण बनेगा तो उसका निग्रह नहीं कर पाएगा। निग्रचार निग्रह संप्रदाय खत्म। और अगर यदि उसका भी वह निग्रह करेगा जिसके पास वह वेद के लिए जाएगा तो फिर उसका मंत्र सत्यापित होना सिद्ध नहीं होगा। वैदिक होना सिद्ध नहीं होगा। अपना बनाओ। सपने में आने वाली चीजें क्या होती है? जब वो अपने आप को थोड़ा बहुत वैदिक होने का दिखावा कर रहा होता है कि मैं भी सनातन धर्म का ही अर्थ बता रहा हूं। सपने सपने में आने वाले ज्ञान विज्ञान के आधार पर तो वो बनता है ब्रह्मा कुमारीज। फिर

00:30:58:09 बिना किसी दय आधार लिए बिना किसी दिव्य घटना का आधार लिए केवल यह जो संस्कृत का ज्ञान विज्ञान है इसके आधार पर जब वो अपना स्वतंत्र रूप से मत मत बताता है बनता है आर्य समाज और यदि वो ये कहना बंद कर दे कि मैं वैदिक हूं मैं वैदिक हूं कर स्वतंत्र रहा है धर्म की व्याख्या मर्म ये कहना बंद कर दे वैदिक हूं हालांकि वो पूर्ण रूप से वैदिक नहीं है मगर यदि वो यह कहना बंद कर दे कि वो वैदिक है तो वो बन जाता है इस्लाम वो वो बन जाता है बाइबल करो स्वतंत्र व्याख्या अपनी मगर वैदिक तुम अपने आप को तब कह पाओगे जब तुम्हारा कोई पीछे से शब्द प्रमाण हो

00:31:39:03 जिसने तुमको वहां दो अरब वर्ष पूर्व से लेकर के वेद मंत्र ला के दिए जिसके मंत्र पर भरोसा है उसके अर्थ पर भरोसा क्यों नहीं जिसके अर्थ पर भरोसा नहीं है उसके मंत्र पर भरोसा क्यों जिसको भी बात करनी है सामने आके बात कर ले इस विषय में करनी हो तो यही उस दिन उसने किया था उसने तो ये कहा ही नहीं था ना कि अमृतानंद सरस्वती से लिया नहीं मैं कहता कि भाई अमृतानंद सरस्वती का जो शब्द प्रमाण है निगमानंद वो तो क्या ईसा को वो बता रहा है अच्छा अब अमृतानंद ने अगर अमृतानंद सरस्वती का अगर शब्द पुराण निगमंद नहीं है तो फिर वो आचार्य कैसे हुआ जिससे तुम सिद्ध करा रहे हो? ये जो प्रमाणिकता है आपको पीछे से लेनी पड़ती है। ऐसे नहीं बनते हैं परंपरा प्राप्त आचार्य और परंपरा प्राप्त आचार्य की आवश्यकता क्या है? अभी पाला नहीं पड़ा है ना।

00:32:45:15 जाकिर नायक जब तुम्हारे श्वेता शत्रुपनिषद का अपने मन मुताबिक अर्थ बताएगा तब वहां क्या कहोगे? बता सकते हो कोई आवश्यकता नहीं है परंपरा की तब तो वहां कहोगे ना नहीं ये हमारे परंपरा प्राप्त आचार्यों ने अर्थ नहीं बताया है भाग गए चलिए ठीक है जय श्री राम सभी को दे दीजिए लिंक दे दीजिए कोई आना चाहता हो फेस दिखा के आना भाई चोरों की तरह मत आना

00:33:22:07 दे दो लिंक और रही बात ये कि तुम मुझे गलत सिद्ध कर रहे हो कर दो दुर्जन तोष आया वो क्या कहा था इसने मतानुज्ञान निग स्थान इसके लिए तो भागता है वो क्यों नहीं आता लाइव चर्चा में क्यों नहीं आया क्यों बराबरी का मौका नहीं दिया विपरीत विपरीत वातावरण में जाकर के उसका मुंह बंद कराया क्यों नहीं बराबर का मौका दिया बैठ के बाकायदा क्यों नहीं ये लो भाई माइक लगाओ हम माइक लगा रहे हैं क्यों नहीं उसने बराबरी का मौका दिया सब और सबको तो रिपोर्टरों को दे रहा है अपना इंटरव्यू क्योंकि उसको मालूम है फसा देगा तब भी उसके वहां पर जाकर उसके घर में जाकर के एक प्रश्न उससे पूछा अंत तक उसको यह कहना पड़ गया पहले उसने प्रयास किया उसने प्रयास किया था यह जो बात वो कह रहा है ना

00:34:25:18 यह जो बात वो कह रहा है कि भाई जो है हम जो है नहीं बताएंगे। हां नहीं बताएंगे। हमें स्तुति का आधार प्राप्त है। पहली बात तो मैंने उस जो वो जो उसने बात कही थी उसप तो काउंटर किया ही नहीं क्योंकि मेरे मतलब की चीजें मुझे काफी मिल गई थी। और बाद में मुझे मालूम था कि ऐसी स्थिति हो सकती है कि यहां पर एक लड़ाई का हाथापाई का वातावरण बन जाए। भाई बैग बैग देना मेरा जल्दी बैग दो।

00:35:02:28 ठीक है। तो बाद में ऐसा वातावरण बनने का वो था। इसलिए हमने कहा कि अब ठीक है। मतलब की चीजें हो गई है। अब चलते हैं यहां से। नहीं तो स्थितियां बिगाड़ करके आराम से और क्या कहते हैं उसका फायदा उठा के हो सकता है भाई हमारे साथ कोई भी वहां पर घटना घटित हमें थोड़ी ना मालूम है कौन हमारा कौन नहीं है और वो हुआ भी बदतमीजी की ना उसने लास्ट में रामानुजाचार्य ने ये किया शंकराचार्य ने ये किया इसलिए मुझे निगराचार्य मान लो अभी कल को फिर कोई और नया आकर के कहेगा मेरे को भी भगवती ने स्वप्न किया है। कालिया जिन ने भगवती का रूप बना करके मुझे स्वप्न सपना दिया है। हम

00:35:56:21 तो फिर उसको भी मान लेना आचार्य। सबको आचार्य सबका आचार्य तो ढोते फिरे और वो आचार्य बन करके सबका निग्रह करेगा। भाई जब कोई उसका शब्द प्रमाण है ही नहीं तो यह कौन सिद्ध करेगा कि उसके जो बातें हैं वैदिक है। उसको कैसे पता चला उसको वैदिक मंत्र मिला है? उसके सपने में जो भगवती आई वैदिक थी। कौन भगवान है? कौन नहीं है? इसका निर्धारण शब्द प्रमाण करता है। तो गुरु गोविंद और ग्रंथ बाकी हम वीडियो बना देंगे। जो चीजें हैं जो ये उसने कहा है ना माया मोह स्वरूप को उसने कहा है सच्चिदानंद स्वरूप सभी जितने भी प्रामाणिक आचार्य वैष्णवाचार्य भी भगवत स्वरूप जो होते हैं अवतार जो होते हैं उनको सच्चिदानंद स्वरूप होता है अग्नि पुराण में जहां पर शुद्धोधन पुत्र वाला वर्णन आया है जिसको वो कहता है कि यह भी बुद्ध विष्णु का अवतार था शुद्धोधन पुत्र क्षत्रिय वाला उसको माया मोह स्वरूप कहा है वही अग्नि पुराण में अगली पंक्ति में भगवान का स्वरूप सच्चिदानंद स्वरूप होता है। माया मोह स्वरूप नहीं होता है। और अगर यह कहो

00:37:12:07 भगवान तो माया मोह स्वरूप भी धारण कर सकता है। तो ऐसे तो फिर सारे मनुष्य भी अवतार है भगवान का। मगर भगवान के अवतार में और माया मोह स्वरूप में अंतर है। भगवान चित स्वरूप है। सच्चिदानंद स्वरूप। तो भगवान अगर माया मोह के स्वरूप में आएंगे तो हम उन्हें भगवान नहीं कहेंगे। कितनी बार आर्यवादियों की बहस में कहा है भगवान अगर अपने जो उनका स्वाभाविक लक्षण है उसके विपरीत अगर वो आएंगे जैसे रामचंद्र जी के बारे में कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम है मगर वो कृष्ण भगवान की लीलाएं अगर करने लगेंगे अपने उसी रूप से तो हम ये कहेंगे कि भगवान की कोई लीला है ये रामचंद्र जी नहीं है

00:37:53:22 ठीक है जय श्री राम जय श्री राम भैया हम आज चर्चा मैंने देखा परंपरा तो सिद्ध कोई कर ही नहीं सकता वो लोग उनकी आपने जो पूछा था ना उनसे परंपरा सिद्ध करने के लिए जो आपका निग्राचार्य जी जो भगवतानंद जी है उनके साथ आपका चर्चा हुआ उसे मैंने देखा था एक व्यक्ति कह रहा है गलत तर्क। एक मिनट। एक व्यक्ति कह रहा है गलत तर्क। भगवान जानबूझकर माया के वशीभूत होते हैं। होते हैं मगर वो स्वरूप से माया मोह नहीं होते। स्वरूप से वो होते हैं सच्चिदानंद स्वरूप। ठीक है? तो जिसने भी जिसकी भी माता जी ने उसको निष्ठा पूर्वक दूध पिलाया। वो सामने आकर के बातें रखे। कायर ना बने।

00:38:55:01 हां जी सीतू राम जी बताइए। जय श्री राम बताइए जय श्री राम चा हां जी बोलिए हेलो बोलिए

00:39:36:07 हेलो जय श्री राम जय श्री राम एक ही मैसेज बार-बार करने वाले को बैन कर दीजिएगा। बोलिए। हां बोलिए हर्ष जी बताइए। ये तो चले गए। हां भैया वही कह रहे थे कि आपका जो मैंने वीडियो देखा था ना भगवत आनंद जी के साथ जो आपका चर्चा हुआ था तो उसमें आपने पहला प्रश्न यही पूछा था कि आप अपनी परंपरा सिद्ध करें। ठीक है? और इस एक प्रश्न को उन्होंने कितने तरीका से घुमा घुमा के घुमा घुमा के अलग-अलग बात अलग-अलग वक्तव्य को सामने उन्होंने रखा। जबकि जो चार बार में चार उत्तर दे चार बार में चार उत्तर और लास्ट में हम नहीं बताएंगे जी भैया वही ये आचार्य बनेंगे ये आचार्य बनेंगे हमको राम के बारे में बताएंगे रामोना भी भाषेत होता है ये चार बार में अपनी परंपरा

00:40:51:15 के बारे में चार चीजें बता रहे हैं और एक बात बताऊं आपको इसने एक प्रश्न डाला शंगेरी ये कह रहे हैं और आपके ये कह रहे हैं। कौन सही है? मैंने कहा भाई रामानुजाचार्य ये कह रहे हैं और शंकराचार्य कह रहे कौन सही है? मैंने कहा दोनों की निष्ठा है। दोनों में जिसकी निष्ठा हो। मैंने कहा कि भाई हमारे हमारे अनुसार भी उसी तरह से सही है। तो ये व्यक्ति वहां पर ये विषय जो इसने उखाड़ा था हालांकि वो अपने आप में विषयंतर था। मगर इस व्यक्ति ने फिर एक नया विषय उखाड़ा कि फिर उनको सर्वोच्च क्यों कहते हो? क्या रामानुजाचार्य वाले रामानुजाचार्य भगवान को सर्वोच्च नहीं कहते। मैंने तो इसके लोगों को कहा है टपिया इस तटपुंजिया व्यक्ति को भी लोग परम क्यों भाई परम क्यों कह रहे हो क्यों कह रहे हो परम जब वो रामानुजाचार्य पर या भाग शंकराचार्य पर उनको सर्वोच्च कहे जाने पर आपत्ति प्रकट कर रहा है तो तुम इसको परम कैसे कह रहे हो परम का अर्थ भी तो वही है तो उन्होंने उस व्यक्ति ने केवल अपने उस परंपरा वाले प्रश्न से बचने के लिए नए-नए विषय खोदता कि तो तुम यह बता दो भाई उसने खुद ही कहा ना एक वीडियो है उसका कट करके हमने डाल रखा है

00:42:07:06 उसमें कहता है कि भाई कोई व्यक्ति अगर अंधा है उसको कहा जाए तुम अंधे हो वो कहे अरे तू भी तो लंगड़ा है तो उसके लंगड़े होने से उसका अंधा ना होना सिद्ध नहीं होता ये बात भागवतानंद ने भी कही है तो भाई मेरे को गलत सिद्ध करके तुम्हारा वो निग्रहचार्य तो कैसे सिद्ध हो रहा है और तुम कह रहे हो हम खंडन कर रहे है किस चीज से कर रहे हैं कि भैया शास्त्रों से कर रहे वो तो शास्त्र तुमने माना कैसे? अगर तुम इस शास्त्र से खंडन कर रहे हो किसी का तुमने कैसे माना कि ये शास्त्र है? कैसे माना? गीता प्रेस के कहने से मानोगे वो तुम्हारा शब्द प्रमाण हो गई। चौखंबा के कहने से मानोगे वो तुम्हारा शब्द प्रमाण हो गई। फिर गीता प्रेस झूठ नहीं बोल सकती अन्य विषयों में कहीं पे। निग्रह नहीं कर पाओगे उसका। तो ये चॉइस आपकी है कि आप अपने परंपरा प्राप्त किसी सन्यासी आचार्य को अपना शब्द पुराण बताओ या फिर गीता प्रेस को पब्लिकेशन को बनाओ।

00:43:00:02 जी भैया उन्होंने तो इस इस विषय में यही ना कहा कि उन्हें जो ग्रंथ मिला बस उसे पढ़ लिया उन्हें और फिर उसी के हिसाब से हो गए मतलब उनका प्रमाण उन छपाई वाले जो शास्त्र है शास्त्र है उनप उनप हो गया मतलब अच्छा भगवती भगवती ने कृपा पूर्वक दिया मैंने मैंने कहा भगवती ने कृपा से दिया है अगर भगवती ने दिया है तो तुम्हें सब याद होने चाहिए दो दो चीजों में दिव्य दिव्य बातें थी एक अती जन्मांतर बोला और एक भगवती से कृपा पूर्वक बोला दोनों में दिव्यता है तो तुम्हें पूरे शास्त्र तुम्हारे अंदर पहले से ही है ठीक है तो जब है तो तुम्हें सुनाने में क्या दिक्कत है सुनाना चालू कर देते 10 20 श्लोक सुनता समझ में आ जाता भाई इसको याद है पूरे सारे शास्त्र यानी कि तुम छपाई वालों पे और एक सबूत है सीधा सीधा भगवती से शास्त्र नहीं मिले हैं मोबाइल से मिले हैं देख देख के बोलता है कि नहीं बोलता है मोबाइल में जब तुम्हें भगवती से शास्त्र मिले हैं अतीत जन्मांतर से शास्त्र प्राप्त है तो तुम मोबाइल में देख देख के क्यों बोल रहे हो?

00:44:02:12 नहीं मिले। ये झूठ था और झूठ बोलने वाला आचार्य नहीं होता है। यदि भगवती ने उन्हें सचमुच में इस प्रकार से ज्ञान दिया रहता या फिर भगवान सामने में आकर के किसी को ज्ञान दे देते तो श्रुति परंपरा वाली हो जाती है ना। मतलब सुन के याद रखने वाली बात। ठीक है? तो वो तो उनके उन्होंने किया नहीं। उनके पास तो ऐसा नहीं है। उन्होंने प्रमाण दिखाते हैं। वो प्रमाण मोबाइल में देख के या कहीं पर लिखा हुआ बात को वो सामने में कोट करते हैं। खाली यदि यदि उन्हें भगवान सचमुच में आ के ज्ञान दे देते। माता भगवती सचमुच में ज्ञान दे देती तो फिर उन्हें इन सभी का आलंबन लेने का आवश्यकता ही नहीं पड़ता। वो तो एकदम प्रखरता से अपनी बात को रखते और मतलब बिना मोबाइल और बिना इफ के देखे सीधे प्रमाण मुंह से ही बता देते सीधे अरे तुम्हारी वैदिकता जब सिद्धि नहीं हो रही है तो तुम कैसे अपने आप को आचार्य बोल रहे हो सनातन का हां नया तुम पंथ बना लो मुझे सपना आया है मैं बताऊंगा धर्म ब्रह्म क्या है नया बना लो यही तो था इस्लाम वहां भी तो आया था जिब्राइल उसने ये नहीं कहा कि मैं वेदों का अर्थ तुम्हें बता रहा हूं मैं

00:45:17:13 बताऊंगा कौन सही है कौन गलत शास्त्र का अर्थ करने में उसने कहा सीधेसीधे वो सब शास्त्रों में मिलावट हो गई है अब मैं बता रहा हूं जो सही बात है भगवान की सपने में आई हुई तो जब वेद का आलंबन लेते हुए कोई ऐसा करता है सपने में आई हुई बात करता है तो बनता है ब्रह्मा कुमारी वहां भी आ रहे ब्रह्मा जी आकर के बता रहे वो कह तो रहा था कौन क्या नाम था उसका अरे वो पालम में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय वाला हम वेद को तो मान रहे हैं पर उसके अर्थ को नहीं मान रहे हैं अर्थ हम अपना देंगे ब्रह्मा जी बता रहे हैं हमें आकर के तो जब ऐसी किसी दिव्यता के आधार पर हम परंपरा प्राप्त आचार्यों का विरोध तो कर रहे हैं मगर हम अपने आप को वैदिक जरूर कह रहे हैं तो वो हो जाता है इस तरह का सनातना भाष और जब वो यह भी कहने लगता है कि नहीं हम वेद को ही नहीं मानते सीधे सीधे तो वो हो जाता है ऐसा धर्माभाष तो तुम स्वतंत्र रूप से अपने आप को कह सकते हो तब हम आएंगे तुम्हारे पास पूछेंगे क्या पूछेंगे तब जब स्वतंत्र कर दोगे जब वेद का आलंबन नहीं लोगे वेद का आलंबन लेने के लिए तुम्हें किसी के पास जाना पड़ेगा रामानुजाचार्य मधवाचार्य शंकराचार्य किसी के पास तुम्हें

00:46:32:21 जाना पड़ेगा और जब चले जाओगे तो फिर उसका निग्रह नहीं कर पाओगे समझ में आ रहा है ना ये तुमने तुम्हारा जो सबसे बड़ा ड्रॉबक है ये तथाकथित जो तुमने अपना ताश के पत्तों का महल बनाया है। इसका सबसे बड़ा ड्रॉबक है क्या? निग्रह करना। ये जो ये कहे कि तुम फंस रहे हो कि हम निग्रह करेंगे सबका। ठीक है? तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी तुम्हारा निग्रह ही है। अब अब जैसे हम मान ले हम मान ले। अच्छा पहली बात तो यही हो गई कि जब सवाल का उत्तर नहीं मिला तो हम क्यों बताएं? तो अभी तक क्यों बता रहे थे? शुरू में कह दे थे हम आपको नहीं बताएंगे आप अनाधिकारी है आप वो क्या कहा था कि जो परंपरा में दीक्षित ना हो हालांकि उस पर तो मैंने वो किया ही नहीं काउंटर मगर ठीक है अभी तक तूने क्यों बताया जब तुम फंस रहे हो तब बोल रहे हो कि नहीं बताएंगे फिर आगे वाक स्कलन वो भी बताया जब फंसे तब नहीं बताया ये क्या साफ दिख रहा है

00:47:41:15 वहां पे राम जी बताइए भागवतानंद की परंपरा क्या है? भागवतानंद का जो मंत्र है वो वैदिक है। कैसे सिद्ध हुआ बताइए? ये मैं उनकी तरफ से नहीं आया हूं। मैं मतलब अलग एक जिज्ञासा ले आया अपनी छोटी सी। नहीं जिज्ञासा है तो क्लास में आइए। भागवतानंद के पक्षधर है तो अभी बात करिए। जिज्ञासा है तो क्लास में आइए। विरोधी विरोधी है तो अभी इसमें नंबर आएगा लास्ट में इस वीडियो के। उसमें नंबर पर WhatsApp करिए। आपके साथ चर्चा सुनिश्चित होगी। आपके पक्ष को समझते हुए मैं नहीं जानता वो कौन है। मैं नहीं जानता भागवत आनंद कौन है। ठीक है? तो आप अभी अभी रहने दीजिए। इस वीडियो के लास्ट में एक नंबर आएगा। उस नंबर पर WhatsApp करिए। जिज्ञासु है तो कक्षाओं में आइए। विरोधी है तो एक दूसरा फॉर्म मिलता है वहां पर। वहां चर्चा में डिस्कशन के लिए फॉर्म मिलता है उसको काम ठीक है

00:48:38:00 जी शास्त्रवा जी जी भैया जी भैया यही है कि ये लोग अभी कभी भी अपना परंपरा तो सामने में बताएंगे नहीं और स्वयं को आचार्य पद के योग्य भी बता देंगे कि हम आचार्य हैं। मतलब परंपरा ही नहीं है। जब बिना परंपरा के ज्ञान ऑथेंटिक कैसे होगा? फिर कोई भी कोई भी ज्ञान अगर किसी को प्राप्त होता है तो उसके लिए परंपरा तो आवश्यक है ना अब रही बात ये कि अब रही बात ये कि भैया ऐसे रावण भी विद्वान था शास्त्रों का तो क्या उसको हम अपने धर्म ब्रह्म का निर्णायक मान ले हां तो इसीलिए कहा है कि भाई अपने आप को अगर आपको निग्रचार कहलवाना है तो कहलवाओ आप उसकी शास्त्रीयता प्रमाणिकता तो सिद्ध करो

00:49:26:19 जी बिल्कुल उन्हें तो बताना चाहिए मतलब अपनी परंपरा को सामने रख देना चाहिए कि एक व्यक्ति कह रहा है कि एक व्यक्ति कह रहा है कि किसी परंपरा का विरोध नहीं करते मूर्ख तुम हो। ठीक है? परंपरा क्या है? परंपरा यह है। परंपरा ने क्या कहा है? क्या नहीं कहा है? वो उस समय जो उसका जो उत्तराधिकारी है वर्तमान का शंकराचार्य वो जो कह रहा है कि शास्त्र में ये लिखा है शास्त्र में नहीं लिखा है। अगर उसको कोई विरोध कर रहा है ना तो परंपरा का विरोध है। उस परंपरा के प्रतिनिधि का जो विरोध है वो परंपरा का विरोध है। और अगर परंपरा का विरोध नहीं भी है इससे यह कहां से सिद्ध हो गया कि वो निग्राचार्य है। बात क्या हो रही है? कि तुम सब पर उंगली उठा रहे हो। तुम्हारी प्रमाणिकता पूछी जा रही है। तुम कैसे बने हो? निग्राचार्य कैसे बने? तू तड़ाक ये जो व्यक्ति आया था बोल रहा था कि भाई आप जो है तू तड़ाक क्यों करते हैं? इस व्यक्ति ने हमारे तीन वीडियोस देखे ही नहीं है। बड़े विनम्रता पूर्वक सम्मान पूर्वक मैंने कहा था भाई आपको कोई गलतफहमी हो गई जिसके चलते आपने वीडियोस बना दीजिए। बना दिए हैं। आप जो है इस बात को आगे ना बढ़ाएं। तीन वीडियोस बनाए थे। मगर

00:50:41:25 उसान को घी नहीं पचता है ना वो वाली बात है ना पचा नहीं तू तो राग पे आ गया परंपरा फिर हमने कहा ऐसी बात है तो आ जा भाई सामने हां तब से भाग रहा है लोग कह रहे थे कि भाई तुम जोधपुर चले गए वहां नहीं गए उसके गढ़ में गए जहां वो था वहां गए वहां गए ना जी भैया बिल्कुल बिल्कुल और सवाल किया फिर उत्तर किया मान लो कि मैं मैं मान लेता हूं दुर्जन से मैं जवाब नहीं दे पाया। ठीक तुमने जवाब दे दिया। आज भी उसके लोग क्या मालूम है उसके लोगों को उसकी परंपरा के विषय में जो डंके की चोट पर बोल सके। मुझे तो मालूम है भाई अपनी परंपरा के विषय में। रामानुजियों को तो मालूम है भाई अपनी परंपरा के विषय में। आज भी उसके फॉलोअर्स इस बात में परेशान है कि उसकी परंपरा क्या है? फिर भी उसकी उस प्रमाणिकता के लिए लड़ रहे हैं। अरे भाई बोलो कि अभी मैं उसको प्रमाणिक नहीं मानता हूं। ये बोलना शुरू करो।

00:51:47:18 जी भैया सबसे पहला प्रश्न का ही उन्होंने उत्तर दिया ही नहीं। उस चर्चा में जो आपने पहला प्रश्न पूछा उसी का उत्तर उन्होंने दिया नहीं। और अंत में जाते-जाते उन्होंने ये भी कह दिया कि मैं मैं क्यों बताऊं? मैं अपनी परंपरा क्यों बताऊं? हम जो तो फिर हम क्यों बताएं हम क्यों बताएं कि शबरी के शबरी के विषय में कहां क्या बोला है? गुरुदेव ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि शबरी ब्राहणी क्यों रामायण में मानसा में उन्होंने बताया है करपात्री जी ने कि किस किस प्रकार से उनका बेर ना खाना सिद्ध होता है और सीधी सी बात है ये कैसा राम दे रहे हैं समाज को ये तो इस व्यक्ति को तो कथा बुलाने का वो नहीं है इसके द्वारा कथा करवाना भी गलत होगा क्योंकि ये राम जी को आदर्श नहीं मानता है ये कहता है कि जैसे जो हम लोग लेकर करके चलते हैं ना कि रामो विग्रह धर्म राम ने जो जो किया वो वो हम कर सकते हैं जितना हम कर सकते हैं। अच्छा वहां कहता है कि राम जी तो पहाड़ उठाएंगे सेतु बनाएंगे तो तुम भी बनाओगे तो धर्म का अनुकरण ना कर पाना आपकी व्यवस्था होनी चाहिए चयन पूर्वक नहीं ठीक है तो राम जी यदि किसी अभक्ष भक्षण वहां कर

00:53:02:19 रहे हैं ब्रह्म भाव से अगर वो व्यवहारिक रूप से मान लेंगे तो फिर हम भी किसी का भी झूठा फिर खाएंगे क्योंकि राम तो धर्म है साक्षात ना और कोई मुझे नहीं लगता ऐसा संप्रदाय है जिन्होंने व्यवहारिक रूप से राम जी के बारे में मर्यादा का उल्लंघन स्वीकार किया है। सदियों से और लड़ क्यों रहे हैं? तमाम सारे दुनिया में विचारधारा है ईश्वर को लेकर के। एकमात्र हमारी हमारे पास राम है। किसी विचारधारा के पास ऐसा आदर्श नहीं है कि उसने उसी के द्वारा बताए हुए धर्म को पूरा का पूरा जिया। मोहम्मद से भी गलती होना स्वीकार किया है। हदीसों में इस जगह मोहम्मद से गलती हुई थी। यहां वो नहीं फॉलो कर पाए। हम लोग हजारों साल से लड़ रहे हैं। नहीं राम से कोई गलती नहीं हुई है। हमारे आदर्श है राम और यह व्यक्ति उनको कह रहा है कि ब्रह्म भाव से उन्होंने खा लिया। अरे ब्रह्म भाव से अगर हम कह लेंगे और उसको व्यवहारिक मान लेंगे तो ब्रह्म भाव से सुपनखा को मना क्यों करते? वैष्णो माता को मना क्यों करते? उन 16800 स्त्रियों को मना क्यों करते जिनसे उन्होंने फिर कृष्ण रूप के रूप में आकर के विवाह किया। ब्रह्म भाव को ब्रह भाव से सबको स्वीकार कर लेते। कहीं कोई दिक्कत ही नहीं थी। भगवान राम का स्वरूप

00:54:17:22 मर्यादा पुरुषोत्तम है। लीला पुरुषोत्तम नहीं है। और यदि हमें उनके मर्यादा पुरुषोत्तम को बचा के रखना है ना तो हमें निकालना पड़ेगा कि भैया आनंद रामायण में कहा जा रहा है कि उन्होंने फल फूल दिए। वहां कहीं भी झूठे बेर खिलाए। इसकी बात नहीं आ रही है। तो कहीं पर अगर का कुसुंडी रामायण में आ रहा है तो हमें मानना पड़ेगा कि यहां पर कोई दिव्य दृष्टि से देखी जा सकने वाली चीज हो रही है। व्यवहारिक रूप से मनुष्य दृष्टि से नहीं खाया। जैसे मान लीजिए कि वहां राम जी खड़े हैं। व्यवहारिक रूप से तो यही हो रहा है कि राम जी जो है राम जी को अर्पित कर रही है फल। मगर वहीं पर उसी समय दिव्य दृष्टि से राम जी उनके झूठे बेर भी खा रहे हैं। आदि दिक घटना हो गई वो। ठीक है? इस तरह से तो स्वीकार कर सकते हैं। मगर ऐसे सीधेसीधे व्यवहारिक रूप से उनका स्वीकार नहीं कर पाएंगे। जी भैया वाल्मीकि रामायण में और श्री रामचरितमानस में तो ऐसा कोई वर्णन नहीं है कि उन्होंने झूठे बेर खाए थे। इस तरह का

00:55:30:24 वहां पर तो मेर का ही उल्लेख नहीं है वहां पे ये लोग बस जब भी कोई बात कहो तो कोई ना कोई दूसरी बात ला के सवाल करते हैं। इनके पास स्वतंत्र रूप से अपने उत्तर नहीं होते। अब एक व्यक्ति कह रहा है कि रामभद्राचार्य जी की कथा पर भी वो होना चाहिए। अरे भैया राम भद्राचार्य जी की कथा पर होना अथवा ना होने से उसके द्वारा राम को अमर्यादित घोषित करना स्वीकार करोगे तुम इसका जवाब नहीं है कि राम ने ब्रह श्री राम ने ब्रह्म भाव से खा लिया तो क्यों कह रहे शास्त्र रामो विग्रह धर्मा ब्रह्म भाव से तो भगवान मोहिनी के रूप के प्रति आकृष्ट हो रहे भगवान ब्रह्म भाव से तो भगवान श्री कृष्ण सब कुछ कर रहे हैं ब्रह्मा जी सब कुछ कर रहे हैं भगवान श्री राम का जो रूप है वह साक्षात अवतार है भगवान का परंतु उसमें उन्होंने मर्यादा को स्थापित किया है

00:56:30:16 ब्रह्म भाव के नाम पर तो फिर तो कृष्ण रूप ही हो गया फिर राम रूप की विशेषता क्या रह जाएगी अलग से या कृष्ण रूप की विशेषता क्या रह जाएगी अलग से वो लीला पुरुषोत्तम है वो ब्रह्म भाव से सब कुछ कर सकते हैं श्री राम ब्रह्म भाव से साध्य कोटि के धर्म का उल्लंघन नहीं कर सकते। उन्होंने जो भी किया धर्म की सीमा में रहकर किया। ब्राह्मण का वध करना यह हमारा व्यक्तिगत धर्म है कि हम नहीं करेंगे नहीं तो पाप लगेगा। मगर समष्टि के हित से क्या है? अधर्म का नाश करना पड़ेगा। स्त्री को बचाना पड़ेगा। तो धर्म का निर्णय कर्तव्य का निर्णय एकांकी नहीं होता है। तो उन्होंने वहां पर समष्टि के भाव से जो है वध किया ब्राह्मण का। व्यक्तिगत धर्म था भीष्म पितामह का कि मैं अपनी ली हुई प्रतिज्ञा तोड़ नहीं सकता। ये व्यक्तिगत धर्म था। समष्टि का धर्म था द्रोपदी को बचाना। द्रोपदी को ना बचाना और व्यक्तिगत धर्म का आलंबन लेना। समष्टि के धर्म का आलंबन ना लेना। व्यक्तिगत धर्म को श्रेष्ठ कर देना। इस कारण से वह हमारे आदर्श नहीं है। भीष्म इतने अंश में

00:57:39:25 बार-बार प्रश्न ना करें। सेतूराम जी आप जो है फॉर्म भरे और सामना करें। जी भैया लिंक तो दिया हुआ है। ऊपर क्यों नहीं आ गए? ऊपर आ के ऊपर आ के ऊपर आ के दूसरी बातें कर रहे हैं। जी यही बात है सामने आने का रहा नहीं ऊपर में चलिए ठीक है व्यक्ति आया था और उसको जाना पड़ा क्योंकि उसके पास कुछ था नहीं सिवाय इसके कि रामानुजाचार्य जी को प्रमाणिक क्यों मानते हो मतलब हम किसी को शब्द प्रमाण के रूप में मानते हैं और उसके कारण किसी को कुछ मानते हैं तो इसलिए भागवतानंद को भी मान ले ये बात है सीधी बात

00:58:27:08 हमारे आपने बहुत अच्छा तर्क आपने बहुत अच्छा तर्क बताया था कि हमारे शब्द प्रमाण जिनको प्रमाण मान रहे हैं जिनको मतलब मान रहे हैं कि ये है इनका सिद्धांत सही है तो फिर हमारे लिए वो भी प्रमाण हो जाते हैं। जैसे कि शंकराचार्य जी ने माना है रामानुजाचार्य जी को आपने अभी कहा था तो है तो यही तो बात आता है। अब उन लोगों के पास तो अपना शब्द प्रमाण स्वयं का है नहीं पहला। मतलब उन्होंने शब्द प्रमाण किसे माना वो तो है ही नहीं पता किसी को। यदि वो किनको शब्द प्रमाण मान रहे हैं। आपने जैसे बताया कि फिर उनके गुरु जो है उन्होंने तो शायद ईसा मसीह को भी भगवान बता दिया। तो हम इनका शब्द प्रमाण ऐसे ही गलत हो जा रहा है। तो फिर हमारे शब्द प्रमाण जिनको प्रमाण मानते हैं। हमारे शब्द प्रमाण में तो कोई ऐसी गलती नहीं है। हमारे शब्द प्रमाण तो बिल्कुल परंपरागत है पहले से ही। तो फिर सच्चाई है। हम ये नहीं मानते कि जो हमारा शब्द प्रमाण है वो अमुक अमुक विषयों में अज्ञानता करता है। अमुक अमुक विषयों में झूठ बोलता है।

00:59:36:00 तो सही बताया। हमारे पास शब्द प्रमाण है। हमारे पास आचार्य परंपरा है। तो फिर उनकी बात सच है। आप अपनी आचार्य परंपरा बताएं तो आपकी बात को सच किस कसौटी पे देखा जाएगा ना कि आपकी बात सच है कि कितनी कितनी नहीं है। एक व्यक्ति कह रहा है भगवान कृष्ण को भी धर्म कहा गया है। पहली बात तो कहां कहा गया है। वह बुलाओ। दूसरी बात मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा गया है। क्या? मर्यादा मर्यादा का निर्वाह करने वाले पुरुषों में उत्तम

01:00:09:22 सबसे परम पुरुष मर्यादा का मर्यादा ब्रह्म पर लागू ही नहीं होती है मर्यादा मानवीय रूप पे ही लागू होगी ब्रह्म तो अबाध्य है बाध्यता है ही नहीं कोई मर्यादा है ही नहीं तो जो मर्यादा का शब्द आ रहा है वो मानवीय रूप के लिए आ रहा है तो मानवीय दृष्टि से वो कोई कार्य ऐसा नहीं कर सकते जिसमें में साध्य कोटि के धर्म का उल्लंघन हो जो आपको अती्द्रिय विषयों में धर्म शास्त्रों से बताया गया उन्होंने उसको जो है लांग दिया हां दिव्य दृष्टि से उन्होंने कर दिया होगा कोई दिक्कत नहीं वो घटना जैसे मैंने एक वीडियो में बोला भी है जैसे कि जो स्त्रियां है जो ये रास लीला हुई थी भगवान की उसमें सभी स्त्रियां अपनी-अपनी जगह पर सो रही थी तो व्यवहार की दृष्टि से कहीं पर भी कोई स्त्री अपने घर से गई नहीं थी। दिव्य लीला थी। दिव्य दृष्टि से देखी जा सकने वाली लीला थी कि सभी स्त्रियां अपने घर से गई। वहां रास हुआ। व्यवहार की दृष्टि से सभी स्त्रियां अपने घर में सो रही थी। तो व्यवहारिक रूप से किसी धर्म का वहां पर वो अधर्म का वो नहीं हुआ। पोषण। और आदि दैविक दृष्टि से वहां पर धर्म अधर्म है। होता ही नहीं है।

01:01:26:24 ठीक है? और सीधी बात है हमारे पास प्रमाण है। आप आए सामने बात हो रही है वो भागवतानंद निग्रचार कैसे ब्रह्म अकर्ता है। वास्तविक रूप से पारमार्थिक रूप से ब्रह्म अकर्ता है। व्यवहार में उसका कुछ करना दिखाई देता है। समस्त कर्मों को करते हुए भी तू मुझे अकर्ता जान। कैसे? क्योंकि

01:01:58:09 पारमार्थिक रूप से तो चार 24 पढ़िए भगवत गीता भगवत गीता चार 24 पढ़िए क्रिया भी वही है हवन सामग्री भी वही है प्राप्त करने वाला भी वही है हवन और प्राप्त होने वाला जो फल है वो भी वही है ब्रह्म सब कुछ ब्रह्म है तो वहां क्रिया है ही नहीं जब क्रिया ही नहीं है वहां तो वो अकर्ता हो गए ना क्रिया का भाव है तो अकर्ता ऐसे हो गए अब कर्ता कैसे हुए? व्यवहार में माय जगत में माय जगत में वो करने वाले दिख रहे हैं। ठीक है? मायिक दृष्टि से प्रपंच रूपी संसार में क्योंकि वो जानते हैं कि ये जो सब कुछ हो रहा है कि ये माया है। तो जो भी कर्म करते हुए भगवान हमको दिख रहे हैं। उन कर्मों के फल में उनकी आसक्ति नहीं है।

01:02:52:28 ठीक है? क्योंकि वह जानते हैं कि ना कर्म कर्म है ना उससे प्राप्त होने वाला फल फल है। तो वह वास्तविकता में क्या है? अकर्ता मगर व्यवहारिक रूप से वो सभी कर्मों को करने वाले भी दिख रहे हैं। बता दिया आपका उत्तर दे दिया। आपका उत्तर दे दिया और कई वीडियोस में दिया है उत्तर। चलिए ठीक है। सभी को जय श्री राम। आपको कुछ और कहना है शास्त्र जी? जी नहीं भैया यही कहना था कि उन्होंने अपनी परंपरा तो बताई नहीं और बात परंपरा नहीं बताई सीधी बात है ये जो बुक है ये हमारे लिए शास्त्र तब है जब कोई परंपरा प्राप्त प्रमाणिक आचार्य इसको शास्त्र कहे और एक बात आती है ना कि भाई हमने हमारे सारे सारे शास्त्र क्या हमने आचार्य से पढ़े नहीं हमने परंपरा प्राप्त आचार्यों से प्राप्त सिद्धांत के आलोक में शास्त्र पढ़ते हैं और जहां पर कोई भी शास्त्र विपरीत जाता हुआ दिख रहा है। वहां जाते हैं अपने उन गुरु जी के पास। गुरु जी एक शास्त्र आया मेरे पास। उसमें ऐसा ऐसा लिखा है। तो गुरुदेव बता देते हैं भाई ये शास्त्र शास्त्र ही नहीं है। उसको शास्त्र क्यों समझ रहे हो? या फिर इस शास्त्र में फलानी जो पंक्ति है वो गलत लिखी हुई है। किसी

01:04:08:04 ने अपने मन से छाप दी है। लो और या फिर इस पंक्ति का जो अर्थ तुम ग्रहण कर रहे हो वो अर्थ वो वो नहीं है जो तुम ग्रहण कर रहे हो। दूसरा अर्थ फिर वो बताते हैं। सीधी बात भगवत गीता 14 27 यही लोग होते हैं कुछ लोग जो कहते हैं कि गीता जो है वो भगवान के द्वारा बोली गई है तो फिर हम किसी और की बात क्यों मानेंगे? भगवान की बात मानेंगे। जबकि उन्हें यह नहीं पता कि जो गीता है वो खुद ही परंपरा से प्राप्त है। परंपरा के प्राप्त आचार्य जो है स्वयं वेदव्यास जी ने इसे लिखा है या फिर लिखवाया है गणेश जी के द्वारा गणेश जी से परंपरा से ना प्राप्त ग्रंथ है जब आचार्य ने रामानुजाचार्य की रामानुजाचार्य जी ने जो उसका भाष्य किया है ना पहली बात तो उसमें उन्होंने ये नहीं कहा है धर्म का विग्रह है ठीक है प्रतिष्ठित

01:05:23:22 धर्म मैं हूं और प्राप्तव्य के रूप में कहा है यद्यपि रामानुजाचार्य जी क्या कह रहे हैं शाश्वत धर्म शब्द प्राय वस्तु के साधन का वाचक है। साधन का वाचक है। साधन का वाचक है। तथापि यहां उसके पूर्वा पर के शब्द प्राप्त्य वस्तु के वाचक है। अतः वह भी उसका सहचारी होने से प्राप्त्य वस्तु को ही लक्ष्य कराने वाला है। इसी कारण धर्म शब्द का अर्थ ऐश्वर्य किया गया है। ऐश्वर्य माना है उन्होंने धर्म का अभिप्राय यहां रामानुजाचार्य जी ने। ठीक है? रामू विग्रहन धर्मा वाला नहीं है। विग्रह नहीं है। यहां विग्रह कहां आया? साक्षात विग्रह विग्रह का मतलब है पारमार्थिक रूप से व्यवहारिक रूप हो जाना विग्रह विग्रह नहीं माना उन्होंने

01:06:19:01 सामने आकर क्यों नहीं बात कर रहे त्रिपाठी जी डर लगता है क्या बचपन में माता जी ने इष्टा पूर्वक दूध नहीं पिलाया क्या और यदि यदि मेरे वचन कठोर लग रहे हो तो अपने भागवतानंद के वचन देख लीजिए। लिंक दिया हुआ है। ऊपर आ के चर्चा कर ले। वो 14 27 से उनको विग्रहवान धर्म सिद्ध कर रहे हैं। बताइए अब वो लीला पुरुषोत्तम नहीं है अगर वो धर्म के साक्षात स्वरूप होते भगवान तो कई जगह उन्होंने जो है धर्म के बाहर जाकर के चीजें की है। जो मनुष्यों का धर्म है। इसीलिए भगवान ने कहा कि लोग मुझे मनुष्य रूप में देख के मेरे ब्रह्म भाव को जान नहीं पाते। मूर्ख होते हैं।

01:07:37:06 खुद परीक्षित जी ने भी जब स्वयं सुखदेव जी से पूछा था कि भगवान इस तरह से अमर्यादित कृत कैसे कर सकते हैं तो फिर उन्होंने ये देखो लिखा है शंकराचार्य जी का आपने बोला ना आपने बोला शंकराचार्य जी का भाष्य उसमें लिखा है जो अमृत अविनाशी अव्यय निर्विकार शाश्वत नित्य धर्म स्वरूप ज्ञान योग रूप धर्म द्वारा प्राप्तव्य और एकांतिक सुख स्वरूप अर्थात व्यभचार रहित आनंदमय है उस ब्रह्म की प्रतिष्ठा में मैं हूं। कहीं यहां पर नहीं लिख रहा है कि वह विग्रहवान धर्म है। यानी व्यवहारिक रूप से वह धर्म है। यह नहीं लिखा है। अगर व्यवहारिक रूप से वह धर्म हो जाएंगे तो फिर तो भगवान क्योंकि सब कुछ कर रहा है। सब कुछ कर सकने वाला है और वो धर्म का पहले स्वरूप का अर्थ समझ लीजिए। स्वरूप किसे कहते हैं? ठीक है? जैसे माया मोह स्वरूप का जो अर्थ लिया है। तो यहां पे वो प्रतिष्ठित बताया है। सीधी सी बात है कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि कृष्ण और राम में कोई अंतर नहीं है। राम जी भी लीला कर रहे हैं। सब कुछ कर सकते हैं

01:08:52:07 और वो किसी भी प्रकार की मर्यादा का उल्लंघन कर सकते हैं। जैसे श्री कृष्ण ने किया है। ये कहना चाह रहे हो। ये इनका धर्म का बोध है इन लोगों का। यहां पर कहीं धर्म का विग्रह नहीं माना उन्होंने। उस ब्रह्म की प्रतिष्ठा में मैं हूं। ठीक है? और धर्म स्वरूप ज्ञान ज्ञान योग रूप धर्म द्वारा प्राप्तव्य उन्होंने वहां प्राप्तव्य माना है धर्म का प्राप्तव्य उस रूप में कहा गया है उनको धर्म क्योंकि धर्म जो है व्यवहार है और ब्रह्म व्यवहारिक दृष्टि से ये नहीं कह सकता कि मैं व्यवहार में मैं धर्म हूं। चलिए जय श्री राम। सभी को ठीक है हर्ष जी। जय श्री राम। जी भैया जय श्री राम भैया

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Live 1:09:56 · 02 Feb 2026

भागवतानंद का अपमान क्यों Discussion with the follower Bhagwatanand

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