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00:00:01:15 सभी को जय श्री राम। आशा करते हैं आप कुशल पूर्वक होंगे और अभी आप लोगों ने चर्चा का जो थंबनेल है वो देख लिया होगा। आशीष ध्यानी जी जुड़ने वाले हैं हमारे साथ। कुछ शास्त्रों को मानने अथवा ना मानने के विषय में चर्चा है। पहले ही बता दूं आशीष ध्यानी जी जो है जो हमारे बहुत सारे धार्मिक मत हैं जैसे मूर्ति पूजा इत्यादि वर्णाश्रम इत्यादि में वो संभवत मुझे जहां तक आशा है वो समर्थन ही करते हैं। परंतु बस उनका एक कहीं पर अटक रहा है। बाकी वो शास्त्र को अंतिम प्रमाण नहीं मानते हैं रूप से तो ले लेते हैं उनको

00:00:57:20 जी जय श्री राम जय श्री राम तो थोड़ा सा अपने बारे में बताएंगे जो क्या कुछ नहीं एक जो उस दिन हमने आपका वीडियो देखा था मेरी आवाज क्यों आ रही है इको हो रही है इको असल में हम हेडफोन हेडफोन यूज़ नहीं कर रहे हैं उसको करने से कुछ नहीं तब भी नहीं तब भी आनी नहीं चाहिए तो खुले से हो रहा है क्या आ जाती है कोई बात नहीं वो हो सकता है यहां का थोड़ा मौसम वैसा है ना थोड़ा इको हो रहा होगा हल्का सा

00:01:44:12 अगर कोई आप लगा वो हटा दो वो लगा ऐसे ऐसे कोई डिस्टरबेंस नहीं हो रहा ऐसे तो आवाज क्लियर है हां अब तो क्लियर आ रही है ठीक है अब ठीक है जी थोड़ा सा आप अपने बारे में बता दीजिए वैसे तो हमारा जो अध्यात्म में रुझान है वह बचपन से ही है और ध्यान वगैरह करने के साथसाथ हमारा यह ज्ञान का जो

00:02:22:09 प्रसार है वह ब्रह्मांड में जो है अभीचल रूप से दर्ज है जो उसको प्राप्त होता आया है। जैसे सूर्य का प्रकाश है ना किसी को पता है कि सूर्य कब से उदय हुआ है ना किसी को पता है कि सूर्य कब से अस्त हो रहा है। तो उसी प्रकार ध्यान में जो हमें लगता है कि हमें स्वयं जैसे कोई बताता है कि क्या यह सही है या गलत है और कई बार आभास भी होता है। तो उसी विषय में आपका हमने एक वीडियो देखा था। उस पर हमें लगा कि उसमें जो ब्रह्मकुमारी का शायद था वो चर्चा हो रहा था। तो उसमें हमें यह लगा कि कुछ चीजें उसमें

00:03:24:24 सनातन के विरुद्ध हमें लगी तो उस पर हमें जो है हमने टिप्पणी किया था जिसके बाद आपका कॉल भी आया वो कमेंट भी आया था कि इस पर चर्चा होनी चाहिए। मुझे लगता है वो टिप्पणी इस बारे में थी कि धर्म के लिए प्रमाण स शास्त्र नहीं है बल्कि अंतःकरण से आने वाली आवाज है। हां हां उसमें जो हमने टिप्पणी किया था तो यही हमारा कहना हमने यह लिखा था कि जो ज्ञान है वो

00:04:03:03 उसे अगर देखा जाए ज्ञान को वास्तविक रूप में तो वो प्रत्यक्ष है। जो सनातन का ज्ञान है वो प्रत्यक्ष है। शास्त्रों की व्यवस्था नहीं। नहीं, हम यह नहीं कहते कि शास्त्र गलत है। हमारा कहना यह है कि अगर हम प्रत्यक्ष हो गए, अगर हम स्तर प्राप्त कर गए तो जो शास्त्रों में दर्ज है वो हमको स्वतः पता चल जाता है। हमारा कहना ये है। तो ये विरोध नहीं करते। इसको कभी हमने डिनाई कहां किया? आप अगर प्रत्यक्ष हो गए तो प्रत्यक्ष होने तक की यात्रा तो आपको शास्त्र से ही करनी होगी और प्रत्यक्ष हो गए तो फिर तो फिर सिद्ध हो गए। सिद्धि हो गई। फिर तो कोई बात ही नहीं। अब जैसे कि वही मैं कह रहा हूं। अब जैसे कि हमने जो है सही बताया आपको। हमने कभी शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है। लेकिन हम शास्त्र का विरोध भी नहीं करते हैं। क्योंकि हमारा मानना है कि जिसको अभी प्रत्यक्ष नहीं हुआ है वह शास्त्रों के अनुसार बढ़कर उस स्तर तक जा सकता है। प्रयत्न एक बात ये भी आती है। एक बात उसमें भी आती है।

00:05:18:14 और अगर हम जैसे हमने बताया एक बात इसमें ये भी आती है। जैसे हमने बताया कि आपके पीछे हेलीकॉप्टर निकल रहा है। हां हेलीकॉप्टर निकल रहा है वो निकलते रहता है। तो जैसा कि हमने बताया कि हम समझ गया आपकी आपकी बात समझ गया बस मैं उसमें एक एक पॉइंट जोड़ दूं एक बात इसमें ये भी आती है कि शास्त्र की आवश्यकता इसमें भी होती है तो उसका आलंबन लेकर के प्रत्यक्ष होने की बिना शास्त्र के व्यक्ति हो गया कोई दिक्कत नहीं हो सकता है उसके प्रारब्ध ऐसे होते हैं उसके कर्म पूर्व जन्म के कर्म इत्यादि वंश ऐसा होता है कि बिना शास्त्र के भी उसको जो है सिद्धि प्राप्त हो सकती है वो जो है ज्ञान मार्ग पर आगे बढ़ सकता कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। परंतु इसमें क्या होता है कि दो बातें एक कि जो जिनका जिनको प्रारब्ध पूर्वक नहीं प्राप्त हुआ है ज्ञान उनके लिए तो शास्त्र ही प्राथमिक है। अब वो उसके बाद अब दूसरी बात दूसरी बात यह है कि शास्त्र को सत्यापन के लिए तब भी रखना पड़ेगा क्योंकि ऐसा ना हो कि कोई व्यक्ति बोले कि मुझे प्रत्यक्ष ज्ञान हो गया है तो अब मैं बहन के साथ

00:06:33:18 विवाह कर लूं या अब मैं कुछ भी कर लूं तो वहां पर जो है शास्त्र से प्रमाण दिया जाएगा कि नहीं आप भले ही खुद दो है मगर बहन के साथ विवाह जो है वो स्वीकार नहीं है क्योंकि वो प्रत्यक्ष ज्ञान होने की आड़ में वो अधर्म भी फैला जा सकता है। इसलिए एक मर्यादा के लिए शास्त्र का आलंबन सत्यापन के लिए वो आवश्यक है। बिल्कुल। अब यह है कि नकली असली का जो खेल है जैसे कि हम देखते हैं सन्यासियों को धर्म गुरुओं को कि जो कि आजकल अधर्म गुरु से कम नहीं है कि माथे पर चंदन लगाकर और रुद्राक्ष की माला धारण करके भगवा वस्त्र पहनकर वो जो है अधर्म करते हुए भी देखे जा रहे हैं। तो वो बात सही है कि असली नकली का फर्क तो समझ में आना चाहिए ना। अब सोने को अगर देखना है कि यह पीतल नहीं है तो उसको घिसना पड़ेगा। तब पता चलेगा कि सोना सोना ही है। पीतल के ऊपर पॉलिश नहीं किया गया है। तो उसी अनुरूप हम बस कहने का यही मतलब है कि बाकी व्यक्ति के सामने वाले के ऊपर है। हां, यह जरूर हो सकता है कि किसी व्यक्ति का अगर प्रमाण किसी को प्रमाणित करना हो तो कुछ शास्त्र की शास्त्र की टिप्पणियों को लेकर उससे प्रश्न किया जाए जिससे कि वह क्या उसका क्या जवाब आता है यह देखने वाली बात

00:07:48:21 होगी। क्योंकि अगर उसने ज्ञान का स्तर प्राप्त कर लिया है तो फिर जो शास्त्रों के अनुरूप है अधिकांश रूप से वो वही चीज बोलेगा और अगर वो उससे विरुद्ध जा रहा है तो या तो कहीं ना कहीं शास्त्र में या तो त्रुटि होगी या अन्य टिप्पणियों को फिर से पूछा जाना चाहिए जिससे यह पता चल जाए कि शास्त्र में यह एक ही लाइन गलत है या यह व्यक्ति सामने वाला गलत है। नहीं तो शास्त्र में यदि हम टिप्पणी दोष की भावना ले आएंगे मान लीजिए तो फिर हमारा शब्द प्रमाण क्या रहा कितने शास्त्र पढ़ोगे नहीं नहीं हमारा देखिए हमारा हमने फिर कहा हो सकता है कि हम भी अगर 500 पेज की कोई किताब छापते हैं तो उसमें दो चार लाइनें त्रुटि पूर्वक हो सकती हैं और समाचार बिल्कुल हो सकती है मगर जब वो किताब हमारा प्रमाण हो यदि हमारे जीवन का धर्म और ब्रह्म का प्रमाण हो तो फिर उसमें हम यदि दोष ढूंढेंगे तो इसका मतलब है कि हमारे पास अच्छा अच्छे और बुरे के लिए निर्णय करने के लिए कोई और आधार है जिसके आधार पर हम ये देख रहे हैं कि वेद की ये बात गलत है ये बात सही है। अब इसके लिए तो हम आपसे यही कहेंगे कि आपको कोई शास्त्र का कोई ऐसा टिप्पणी हमसे पूछना चाहिए

00:09:03:22 क्योंकि हमने तो पढ़े नहीं है जो साफ बात बता रहे हैं। स्पष्ट बात है। अगर आपको कोई ऐसी टिप्पणी याद हो या ध्यान में आ रही हो कि जिससे कि आप अगर ये जानना चाहे कि अगर हम भी खुद देखना चाहे कि क्या शास्त्र में हर चीज सही लिखी है तो हमें भी पता चलना चाहिए कि कहीं हम तो गलत नहीं है तो आपको कोई ऐसा वो ठीक है कि शास्त्र को हम जांचेंगे कि आप गलत है कि शास्त्र गलत है वो तो बात मगर यदि आप ये कह रहे हैं कि शास्त्र में गलती हो सकती है यदि शास्त्र में गलती हो सकती है जो शास्त्र वैदिक हमें प्राप्त हुए हैं। यदि उसमें गलती हो सकती है तो फिर बात आएगी। आपने अपना धर्म कहा सनातन। ठीक है? सनातन का सनातन की परिभाषा होती है जो किसी भी देश काल परिस्थिति में ना बदले। तो आपका धर्म यदि सनातन है तो उसका पैरामीटर क्या है? कि आप जो सही समझ रहे हो वो सही और जो गलत समझ रहे हो वो गलत। उसका आधार क्या है? वो ज्ञान कहां से आ रहा है? भी शास्त्र आपके लिए अंतिम प्रमाण नहीं है। वो गलत भी हो सकते हैं। यानी कि कोई और प्रमाण है जिसके आधार पर आप शास्त्र में दोष देख सकते हो। नहीं मैं शास्त्र में देखिए आपको लग सकता है ना कि मैं शास्त्र में दोष देख रहा हूं। लेकिन मैं तो खुद कह रहा हूं मैंने

00:10:18:28 शास्त्र पढ़े ही नहीं है तो मैं उनमें दोष क्यों ढूंढूंगा? अगर मैंने उनको पढ़ा होता तब आपकी जो भावना है ना जो आपकी भावना है कि शास्त्र में कोई बात गलत हो सकती है तो यह भावना ही उस पर दोष होने का वो लगा रही है। इसीलिए मैं कह रहा हूं। मैंने यह नहीं कहा कि शास्त्र में क्या बात गलत है। मैंने यह कहा कि अगर शास्त्र ही अंतिम प्रमाण है जैसा कि आप कह रहे हो तो आपको उसकी कोई टिप्पणी हमारे सामने लानी चाहिए जिस पर कभी विवाद हुआ हो तो उससे कुछ देखने की प्रयत्न किया जा सकता है कि क्या वास्तव में ऐसा है कि नहीं है। एक बार हम भी अपने प्रत्यक्ष होकर उसका देख सके। ठीक है। वो हम देखेंगे। फिलहाल आपका धर्म कहां से स्पित हो रहा है? ये मैं कह रहा हूं। आप अगर आज इस समय सनातनी है तो वो सनातन आपको मिल कहां से रहा इस समय क्योंकि शास्त्र शास्त्र पर आधारित तो है नहीं आप तो वो सनातन स्फूट कहां से हो रहा है आपके पास सनातन ये देखिए सनातन का जो वैसे भी अर्थ होता है कि जिसका कोई ज्ञात स्रोत नहीं है सनातन सनातन का अर्थ होता है कि जो किसी भी देश काल परिस्थिति में ना बदले परिवर्तन हो परिवर्तनशील भी वो बात ठीक है

00:11:34:00 जो ना बदलने योग्य है लेकिन लेकिन इसका एक अर्थ और भी होता है कि जिसका आदि से लेकर अनंत तक कुछ भी ज्ञात नहीं है। हमें ये नहीं पता कि नहीं पता है कि आप किसी चीज को सही और किसी चीज को गलत क्यों समझ रहे हैं। आपको नहीं पता है। नहीं नहीं मैं ये कह रहा हूं कि हम आप प्रमाण मानते हो। है ना? आप प्रमाण वो नहीं कह रहा। मैं समझ गया। मैं अभी एक टिप्पणी दूंगा। मैं फिलहाल एक भावना पर वो कर रहा हूं कि आप किसी भी चीज को सही अथवा गलत किसी भी कार्य को जो जैसे कि जो अती्द्रिय विषय है जिसमें हमारी गति नहीं हो सकती प्रत्येक प्रमाण के द्वारा ऐसी खास तौर पर ऐसी चीजों में आपके लिए क्या सही है और क्या गलत है इसके लिए आपका आधार क्या होता है क्योंकि टास्क में तो टास्क को लेकर के आप अभी न्यूट्रल हो उसमें क्या है क्या नहीं है उसको लेकर के अभी आपको कुछ नहीं पता या ऐसा है कि जिन्होंने शास्त्र पढ़े जिन्होंने जो शास्त्रों को जितना थोड़ा बहुत जानते थे उन्होंने शास्त्रों से प्राप्त वो जो धर्म और अधर्म की व्याख्या है थोड़ी बहुत वो आप तक आई और आप उसके आधार पर जीवन जी रहे हो उसमें से जो जो चीजें आपको तार्किक लग रही है वो आप फॉलो भी कर रहे हो मतलब एक तरीके से अप्रत्यक्ष रूप से आप शास्त्रों

00:12:49:01 पर आधारित ही हो अब वही बात है ना कि अगर हमने कभी उनका अध्ययन किया होता शास्त्रों का तो हम ये कहने कि हमको को कोई दिक्कत नहीं होती कि हम शास्त्रों को मानते हैं। लेकिन हमने उनका अध्ययन किया ही नहीं है। तो ना हम यह कह सकते हैं कि हम उन पर आश्रित है पूर्णतया और ना हम उनका विरोध कर सकते हैं। मैं बता देता हूं। ऐसा है विरोध तो यही से आ गया ना जब आपने खुद को सनातनी भी कहा और आपने शास्त्रों पर ये भी कह दिया कि हो सकता है उसमें कोई बात गलत हो। आपको नहीं पता। यानी कि आपके आपकी शास्त्रों के प्रति प्रमाण बुद्धि नहीं है। प्रमाण बुद्धि भैया शास्त्र में जो होगा सही होगा। जैसे श्री कृष्ण भगवान ने कहा ना तस्मात शास्त्र प्रमाण भगवत गीता तो आपकी उसमें प्रमाण बुद्धि नहीं है कि तेरे लिए कर्तव्य अकर्तव्य के विषय में शास्त्र अंतिम प्रमाण और दूसरी बात अभी जो आपने कहा है कि क्या कहते हैं ये अभी अभी क्या कहा आपने अभी आंख से हाथ मिलाइए हमने यही कहा था कि हमने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है हां मैं उस बारे में बता रहा हूं। मैं मुझे ध्यान आ गया। दूसरी बात ये है जो आप

00:14:04:04 कह रहे हैं मैंने मैंने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया है। ये ठीक इस प्रकार से है। जैसे कि कोई व्यक्ति कहे कि मैं कभी थॉमस अलवा एडिसन से मिला नहीं हूं। मैंने उसका नाम नहीं जानता हूं। मैं वो कहां रहता था, कहां रहता था। मैं कुछ नहीं जानता हूं। परंतु आपके घर में क्योंकि बल्ब जल रहा है इससे सिद्ध हो रहा है कि आप थॉमस अलवा एडिशन से कनेक्टेड है। आप थॉमस अलवा एडिशन को जानते भी नहीं है। मगर आपके घर में जो बल्ब जल रहा है वो थॉमस अलवा एडिशन के कारण ही जल रहा है। वो अप्रत्यक्ष रूप से आ गया। आपने तो परचन वाले से लिया। आपको थोड़ी ना मालूम था थॉमस अलवा एडिसन ने आविष्कार किया। फिर वो आविष्कार वो परचन वाले तक पहुंचा और फिर वो आपके घर में आया। वो ठीक बात है आपकी। लेकिन उसका जो है उसका जो जो बल्ब आप बता रहे हो ना उसका एक प्रमाण है कि एडिसन ने उसका आविष्कार किया। यह तो आप भी मानते हो ना। भले हमने एडिशन को देखा नहीं है लेकिन बल्ब जो आप बता रहे हो जो दुकानों में बिक रहा है वो तो उसका आविष्कार तो एडिशन नहीं किया। ये तो सभी को मालूम है। हमको भी पता है। ऐसे कई आविष्कार होंगे। ऐसे कई आविष्कार होंगे जिसका नाम आपको नहीं पता होगा। परंतु उसका विस्तार आपके घर में होगा और आपका इस प्रकार से उसके साथ अप्रत्यक्ष रूप से रिश्ता है। बिल्कुल

00:15:19:06 तो इसी प्रकार से जो आपकी बात है ना कि हमने शास्त्र नहीं देखे डायरेक्ट आपने डायरेक्ट नहीं देखे मगर अप्रत्यक्ष रूप से क्योंकि आपके जीवन में धर्म है तो किसी और के माध्यम से माता पिता के माध्यम से गुरुओं से माता पिता ने सुना माता पिता के माध्यम से आपके जीवन में धर्म आ गया। जैसे कि कोई बच्चा है ये मुझे मेरी आवाज बार-बार रिपीट सुनाई दे रही है। वो इको का होगा थोड़ा मौसम का दिक्कत है। बीचबीच हमेशा तो नहीं हो रहा होगा। इधर तो नहीं हो रही इको। नहीं अभी ये हो रहा है। आप एक काम करिए आप एक बार लीव करके दोबारा आ जाइए। अच्छा ठीक है।

00:16:13:22 मनुष्य का विशेष विश्लेषणात्मक बुद्धि और तर्क पूर्ण विश्लेषण ही इनके लिए वही भिन्नता हां अब आ रही है आपकी सही ठीक आ रही है अगर आप दो चला रहे है दो दो फोन चला रहे हैं क्या? हां, बगल में एक लिए था। यह फोन हटा लो यहां से। उससे हो सकता है इको हो रहा हो। हां उसी से रखा हुआ है। चल तो नहीं रहा है लेकिन रखा हुआ है।

00:17:12:21 हां बोले क्या बोल रहे थे आप? तो बस मेरा केवल इतना कहना था कि अगर हमने शास्त्र नहीं भी पढ़े हैं परंतु हमने अपने माता पिता से बहन के साथ उस बहन पर दृष्टि ना डालना सीखा है हमने उनसे शौचाचार सीखा है तो इस माध्यम से वो धर्म से होने वाला जो ज्ञान है वो हमारे पास आ गया हमारे जीवन में फिर हमने अपने जीवन को उसी के अनुसार जो है ढाला इस प्रकार से बिना शास्त्र पढ़े भी हमारे जीवन में धर्म आ सकता है बिल्कुल धर्म के हमारा जो मतलब मेरा कहने का मतलब ये है कि जो ये ऐसा मानना कि क्योंकि मैंने शास्त्र नहीं पढ़े हैं इसलिए मेरा शास्त्रों पर आश्रित होना सिद्ध नहीं होता है। ये सोचना मतलब गलत है। उसी प्रकार ठीक क्योंकि मैं फलाने आविष्कारक को नहीं जानता हूं। इस कारण से मेरा और संस्कारक के साथ कोई संबंध सिद्ध नहीं होता है। तो मैंने उस चीज को आपको कहा वो वो आपकी बात ठीक है। लेकिन मैं ये कहता हूं क्या कोई शास्त्र में ये लिखा है कि प्रथम बार सूर्योदय कब हुआ था? आप बता सकते हैं इस बात को? या प्रथम बार चंद्रमा कब देखा गया था? जब सृष्टि रचना के बारे में लिखा है कि सृष्टि रचना कब हुई है? तो उसमें से सूर्य भी आ गया, चंद्रमा भी आ गया। और दूसरी

00:18:27:27 बात दूसरी बात एक बात और है। कई लोग कहते हैं कई बार लोग ये कहते हैं कि भाई भविष्य पुराण में जो है ना आजादी के बारे में क्यों नहीं लिखा है? आजादी की लड़ाई के बारे में क्यों नहीं लिखा है? भाई जो चीज धर्म के विषय से धर्म और ब्रह्म और मोक्ष के विषय से आवश्यक लगी वो चीज शास्त्र में बताई गई। जो शास्त्र है वो कोई हिस्ट्री थोड़ी ना है कि उसमें हिस्ट्री में जितनी घटनाएं घटित हुई है सबका वो विवरण जो आपके लिए आवश्यक है धर्म और ब्रह्म के लिए वो उसमें दिया गया है पर्याप्त है तो उसका सब्जेक्ट है उसका जो सब्जेक्ट है वो भी तो हमें समझना पड़ेगा ना उसका सब्जेक्ट ये नहीं है कि वो आपको हिस्ट्री जग्राफी सब चीजें एकदम बता दे वो उसका विषय है कि आपको इतनी इतनी जानकारी दे कि आपका मोक्ष सिद्ध हो सके लेकिन हमारा जो कहना हमारा जो मानना है इसीलिए मैंने कहा कि हम प्रमाण को नहीं मानते और सनातन भी प्रमाणों पर नहीं चलता है। सनातन जो केंद्रित है वो प्रत्यक्ष पर केंद्रित है। बस बस अब आप अब आप घूम फिर के आए जो हमारी मुख्य चर्चा का टॉपिक था कि आप प्रमाण को नहीं मानते उतनी देर से थोड़ा सा हम लोग इधर उधर गिरते चल रहे थे। ठीक अब आप प्रमाण भी पता होगा एक बहुत लोकप्रिय कहावत है

00:19:43:08 प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जो प्रत्यक्ष है उसको प्रमाण क्यों चाहिए? ठीक है। अब आप मुझे बता दीजिए इसका मतलब है कि आप अपने प्रत्यक्ष अनुभवों से तय करते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। हां प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष होकर जो ज्ञान प्राप्त होता है उससे विवेक जागृत जागरण होता है और विवेक से अच्छा कोई भी उपकरण नहीं है जिससे पता चले कि क्या सही है और क्या गलत है। क्या धर्म है क्या अधर्म है। ठीक ठीक ठीक। ओके। अब मुझे एक बात बताइए कि इसका मतलब आप ये मानते हैं कि जो प्रत्यक्ष देखने से जो अनुभव हो और उसके बाद जो अंदर से आवाज आए है ना उसको धर्म मानना सही उसको धर्म मानना चाहिए। ऐसा आप संदेश दे रहे हैं। नहीं नहीं अंदर की आवाज और जब बाहर की आवाज एक हो जाएगी तो उसको प्रत्यक्ष बोलते हैं। प्रत्यक्ष का मतलब ये नहीं है दो डअल वाला नहीं है। द्वैत वाला नहीं है। ये अद्वैत हो जाएगा। जिसमें कि आपका जो है आपका जो पहचान है वो मिट जाए। मैं मैं आपको बताता हूं। एक एग्जांपल बता रहा हूं। जैसे कि आप ये कह रहे हैं जैसे आपने एक किसी व्यक्ति ने एक स्त्री को देखा।

00:20:58:24 ठीक है? अब उस स्त्री के प्रति उसको देखकर उसके रूप सौंदर्य इत्यादि को देखकर उसके मन में अंदर से एक आवाज आई कि क्या करना है क्या नहीं करना है तो इस आधार पर किसी स्त्री को देखकर अंदर से आने वाली आवाज के आधार पर निर्णय करना कि क्या करना है क्या नहीं करना है ये आप उचित मानते हैं नहीं ये इसका ज्ञान से इसका सनातन से मतलब नहीं है क्योंकि जो सनातन में चेतना पर चलता है उसमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं होता है आप जो बता रहे वो माया के अधीन बात कर रहे हो स्त्री में शारीरिक शारीरिक धर्म है आपका कुछ भी नहीं है शरीर से नहीं शारीरिक धर्म है लेकिन वो केवल मायावी रूप में आपके शरीर के धर्म का मैं वही पूछ रहा हूं मैं चेतना पे आऊंगा मैं अभी आपके शरीर का धर्म पूछ रहा हूं कि आपके शरीर शरीर के धर्म का निर्धारण कहां से करते हैं आप शरीर का धर्म जो है तो स्त्री पुरुष उसमें भेद हो जाता है जब शरीर पे माया धारण कहां से करते हैं आप? अपने जेंडर से करते हैं। लेकिन अरे भाई अभी आपने कहा कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। मैं प्रत्यक्ष अनुभव करता हूं। उसके बाद जो मेरे विवेक के अनुसार आवाज आती है मैं उसको सही मानता हूं। तो इसमें जब

00:22:14:12 जब हम क्रिया ले लेंगे ना क्रिया व्यवहार जब आप व्यवहार को ले लेंगे क्रिया को ले लेंगे तो शारीरिक धर्म की बात हो गई। क्या करना है क्या नहीं करना है ये आ गया शारीरिक धर्म और जो जो ज्ञान है चेतना शक्ति जाग जाना वो तो प्राप्तव्य है वो शारीरिक धर्म थोड़ी ना है शारीरिक धर्म केवल शारीरिक धर्म जो आप बता रहे हो वो केवल स्त्री पुरुष का भेद थोड़ी ना है अगर अगर किसी के मन में नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा भाई साहब मैं ये नहीं कह रहा मैं ये कह रहा हूं कि आपके शरीर का जो धर्म है उसके लिए आप किस पर डिपेंड करते हो की मुझे ये करना है ये नहीं करना है मैं फिर बता रहा करना करने की स्थिति आई ना जब हम करेंगे तो शरीर से ही करेंगे है ना समझ गए नहीं ये आपका भेद है मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं जो आप करते हो शरीर से नहीं करते हो आप पहले मन में विचार करते हो अगर आप चाकू भी फल भी काटते हो ना तो पहले आप विचार करते हो कि हम चाकू लाए किचन से हम फल उठाएं उसके बाद आप उसको जब व्यवहार रूप में लाते हो तब आपका शरीर इनवॉल्व होता है पहले आपका विचार इन्वॉल्व आपकी चेतना इन्वॉल्व होती है पहले तो हम और जो और और जो सनातन है वो चेतना पर केंद्रित है। वो शरीर शरीर को मामला थोड़ा सा भटक रहा है। आप समझ नहीं रहे हो। आप मामला थोड़ा भटक रहा है। मैं ये कह रहा हूं

00:23:29:15 आप अपने शरीर के द्वारा की जाने वाली जो क्रियाए हैं उसमें कौन सी क्रिया करनी है, कौन सी नहीं करनी इस बात के लिए किस पर डिपेंड हो? चेतना पर डिपेंड है। अपनी चेतना पर ना? तो अब मैं फिर से बता रहा हूं। यानी कि अपनी चेतना पर डिपेंड करना आप सही मानते हो। अपनी चेतना क्या नहीं करना है? मैंने अपनी चेतना नहीं कहा। मैंने कहा चेतना के स्तर पर। तो मुझे मैं अब एक एग्जांपल आपसे पूछ रहा हूं। थोड़ा क्लियर मुझे जवाब दीजिए। मान लीजिए आपके किसी के सामने कोई स्त्री खड़ी है। उसके साथ कैसा व्यवहार करना है? उसको बहन के रूप में देखना है या पत्नी के रूप में देखना है। इस बात का निर्णय इस आधार पर वो व्यक्ति करता है। अगर आप किसी व्यक्ति को ज्ञान की ज्ञान प्राप्त हो गया है या वो चेतना के उच्चतम स्तरों की यात्रा कर चुका है। भाई साहब मैं आपसे के चेतना के स्तरों की उच्चतम जो यात्रा कर चुका है वो नहीं पूछ रहा हूं। वो निर्णय कैसे होगा? वो निर्णय का आधार क्या है? वो पूछ रहा हूं। बता तो रहा हूं। मैं बता तो रहा हूं। जब चेतना का उच्च स्तर पर वो विराजमान हो जाएगा तो उसके बाद वो विचारों द्वारा तय करता है कि मुझको क्या करना है। उसी से उसी

00:24:44:24 से उसका विवेक जागृत होता है। और जो जो मानव जीवन के उच्चतम आदर्श है उनको निरूपित करता है वो। ठीक ठीक ठीक। अब इसमें दो बातें आ गई। पहली बात तो ये है कि इसमें भाई साहब आप अपने आसपास कोई मोबाइल है ना उसको बंद करिए। मोबाइल नहीं मोबाइल तो नहीं है बंद है ना दिक्कत आ रही है ना अच्छा हो सकता है वो टावर है ना यहां पे फोन का उससे तो नहीं हो रहा कोई बात नहीं भाई साहब बात हो नहीं पाएगी आप जो है इसको बंद करिए आवाज रिपीट आ रही है हटा के देखो नेट बंद है हटा के देखो बंद है नेट बोल तो रहा हूँ नेट तो बंद है आपसे ही आ रही जय श्री राम अब सही आ रही आ रही है वो दूर वो दूर से आ रही है आ रही है उनको कहिए थोड़ा और दूर चले जाए ये फोन हटा लो जरा हो सकता है इससे कुछ क्लश कर रहे हो वो वो चला रहे हैं असल में वो उसमें देख रहे हैं अच्छा देख रहे हो इधर उधर देख रहे होंगे इधर उधर इधर उधर वाले ये लो बंद है बंद है फोन बंद कर दिया कोई नहीं वो टायल वगैरह का मशीन होगा हो सकता है तो जो आपने अभी बात कही है उसमें पहली बात तो ये है कि जो उच्चतम स्तर तक पहुंच

00:25:59:25 गए। यानी कि उच्चतम स्तर से पहुंचने के पहले की बात आपने बताई नहीं है कि धन का निर्णय कहां से होगा। पहली बात। दूसरी बात यह है कि उच्चतम स्तर पर कोई व्यक्ति पहुंचा है या नहीं पहुंचा है इस बात का निर्णय कैसे होगा? चेतना के स्तरों द्वारा होगा। उसके कौन करेगा? वो स्वयं करेगा या कोई और इसको ठप्पा कौन देगा? कि मैं मैं उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। ये आप वही तो मैं कह रहा हूं। उसका आप आचरण देख सकते हो। उसका आप मानव जीवन देख सकते हो। उसकी ज्ञान के जो है वो देख सकते हो। ज्ञान द्वारा यानी कि उसके आचरण जो है अगर अमुक अमुक आचरण होंगे तो हम मानेंगे कि इसका चेतना का स्तर उच्च है और तब वो व्यक्ति जो अपनी चेतना के स्तर के आधार पर लिए गए निर्णय के आधार पर जो धर्म अधर्म निर्णय करेगा वो जो है मान्य होगा धर्म। ठीक है? अब जो हमने उसको ये दे दिया है ना कि उसके आचरण देख सकते हो। ये आचरण कहां से निर्धारित होंगे? आचरण मैंने बताया ना कि जब आपका स्तर उच्च हो जाएगा तो फिर आपको कर्म देखने की जरूरत नहीं पड़ती है। नहीं नहीं अभी आपने कहा ना कि उसके आचरण देख के पता लगेगा कि उसका उच्चतम स्तर हो गया है कि नहीं हो गया है। तो वो आचरण

00:27:15:01 वो आचरण हमें कहां से मिलेंगे? वो आप कोई ज्ञान की बात उससे चर्चा कर सकते हो या ज्ञान का कोई आपको जो प्रश्न उत्तर हो वो आपको पता हो और उस व्यक्ति को पता ना हो आप उससे पूछ सकते हो। मतलब कोई व्यक्ति अगर बहुत इंटेलिजेंट है बहुत ज्ञानवान है तो इसका मतलब वो बहुत चरित्र का भी अच्छा होगा। ये कह रहे हो आप बिल्कुल सर बिल्कुल प्रमाणित बात है ये। बहुत है तो चरित्र का भी अच्छा होगा। नहीं नहीं बिना चरित्र के ज्ञान हो ही नहीं सकता है। यह प्रमाणित बात कैसे है? बिल्कुल प्रत्यक्ष होगा तभी चरित्र होगा और चरित्र होगा। बात कैसे माना जाए? मेरा कहना है कि जरूरी नहीं कि जो इंटेलिजेंट हो वो चरित्र का भी अच्छा होगा। आपका कहना है जो इंटेलिजेंट है वो चरित्र का भी अच्छा होगा। आप इंटेलिजेंट किस स्तर पर बोल रहे हो? दुनियावी स्तर पर बोल रहे हो। जैसे किसी पद पर सुशोभित उस पर बोल रहे हो। कई चीजें आप बताओ। यानी कि आप केवल जो तात्विक ज्ञान में जिसको हो गई होगी सिद्धि की बात अब ये बताइए कि जैसे तत्व ज्ञान आपको हुआ मान लीजिए ठीक है तो तत्व ज्ञान जब आपको हुआ है तो मुझे तो पता नहीं है तत्व ज्ञान क्या है बिल्कुल तो आप जो तत्व ज्ञान के रूप में बात बताएंगे

00:28:30:16 मैं कैसे मान लू कि तत्व ज्ञान वही है बिल्कुल आप नहीं मानोगे जब तक आप हमारे समकक्ष नहीं आओगे तब तक आपको तर्क आएंगे। इसका मतलब कोई और तय नहीं कर सकता कि आप उच्चतम स्तर पर गए हो कि नहीं गए हो। बिल्कुल यह हम स्वयं तय कर सकते हैं। यानी कि कोई व्यक्ति खुद को ही घोषित करेगा कि मैं उच्चतम स्तर पर हूं और फिर अपनी चेतना शक्ति के आधार पर अपनी चेतना शक्ति के आधार पर वो धर्म अधर्म का निर्णय कर सकता है। देखिए मैंने इसीलिए कहा जब चेतना के उच्च स्तर पर कोई भी शारीरिक क्रिया मायने नहीं रखता है। क्योंकि जब व्यक्ति प्रत्यक्ष हो जाता है तो वो रुक सा जाता है। जैसे समुद्र होता है ना वो रुक सा जाता है। सनातन होता है ना आकाश होता है ना। आकाश तत्व होता है ना रुक सा जाता है आकाश चलता ये भी आपका शब्द प्रमाण है आप समझिए मेरी बात को अगर हम लोग अगर आप ले रहे हो उसको ना प्रमाण आप ले रहे हो आप ये बात जो है ना वो रुक जाता है ये बात क्यों मानी जाए भाई कोई व्यक्ति ये कह रहा है कि मेरा सुनिए मैं बताऊं जैसे आप कह रहे हो चेतना से स्तर जिसका उच्च हो गया वो रुक जाएगा। कोई कह रहा है कि इसका मेरा चेतना स्तर ऊंचा हो गया है मैं बच्चे खाऊंगा। मैं कुकर में डाल के उबाल के बच्चे खाऊंगा। उसने तो घोषित किया मेरा चेतना स्तर ऊंचा है। तो आपकी बात क्यों मानी जाए?

00:29:46:09 आपने उसका आचरण देख लिया ना। आचरण देख लिया ना उसका। भाई साहब आचरण तो आप अभी बता ही नहीं पाए ना कि कहां से उसके आचरण देख आपने कहा वो खुद बता सकता है कि मेरा चेतना स्तर ऊंचा है कि नहीं। क्यों? आप कह रहे हो वो तो अरे वो तो उसकी स्तर से पता चल रहा है कि कोई व्यक्ति अगर मांसाहार हम तो नहीं कहता कि किसी इंसान को उबाल कर खाने की बात। मैं तो एक नहीं कह रहा हूं। मैं ये कह रहा हूं। मैं ये नहीं कह रहा आपने जो निर्णय का आधार लिया ना भाई साहब आपने निर्णय का आधार लिया है कि कोई व्यक्ति खुद ही बता सकता है कि मेरा चेतना स्तर उच्च है कि नहीं। अब चेतना स्तर को जब खुद ही घोषित आपने भी कहा थोड़ी देर पहले मैं बता रहा हूं। मैंने दिखाते हैं। ऑपरेटर एक मिनट मैं रिपीट करके दिखाता हूं। ऑपरेटर पीछे से दिखा पहले सुन लीजिए ना। नहीं नहीं कोई बात नहीं वो रिकॉर्ड हो रहा होगा हम समझ रहे हैं आप सुन लीजिए मैंने ये कहा कि जब व्यक्ति का चेतना के उच्चतम स्तरों पर विचरण हो जाता है उसके बाद उसकी जो शारीरिक प्रतिक्रियाएं और क्रियाएं होती हैं वो उसी स्तर द्वारा संचालित होती है उसमें उस व्यक्ति की बात नहीं होती और मुझ में जरा सा थोड़ा सा कण भर का भेद है आप बिल्कुल सही कह रहे हैं भेद सिर्फ इतना है यदि हम

00:31:02:04 जो सत्ता है ना शास्त्र प्रमाण की सत्ता नहीं लेंगे जिसमें लिखा है कि तत्व ज्ञानी के लक्षण ये होते हैं। ठीक अब जब तत्व ज्ञानी के लक्षण हमने देख लिए हमने देखा कि भाई साहब जो आशीष धानी जी है उनमें वो सारे लक्षण घटित हो रहे हैं तो हमने मान लिया कि इनका चेतना का स्तर उच्च है। हमने जब शब्द प्रमाण लिया तो उसके आधार पे आपके चेतना का स्तर उच्च मान लिया। क्योंकि तत्व ज्ञान तो आपको है और शब्द प्रमाण मान नहीं रहे। अगर शब्द प्रमाण है नहीं हमारे पास तो हम ये तय कैसे करेंगे कि आपका चेतना का स्तर उच्च हुआ कि नहीं हुआ तो उसके बाद फिर आपने कहा कि भाई दूसरा तय नहीं कर सकता वो स्वयं ही घोषित कर सकता है तो जब स्वयं घोषित करना है कि मेरा चेतना का स्तर उच्च है तो स्वयं घोषित करके जब कोई व्यक्ति ये कह सकता है कि भैया वो चेतना का स्तर जिसका उच्च होता है वो व्यक्ति ठहर जाता है तो दूसरा व्यक्ति चेतना का स्तर का डंका बजा के अपराध करेगा पाप करेगा और हम उसको हम उसको रोक एक मिनट हम उसको को रोक नहीं पाएंगे क्योंकि हम ही ने ये कहा है कि भैया चेतना का स्तर हम ही घोषित कर सकते हैं और आपने घोषित किया अगर चेतना का स्तर तो आप जो है बच्चे खाओ कुकर में डाल के मैं वही कह रहा हूं ना कि मैंने घोषित किया नहीं है वो स्वतः घोषित हो जाता है जैसे आपको कोई शब्द जब आप घर में फिर से दोबारा से

00:32:17:15 जब कोई चीज याद करते हो तो दो चीजें होती है। एक बार सुन लो। एक मिनट जब आप कोई चीज पढ़ते हो तो दो चीजें एक साथ घटित होती है। एक तो आपको याद करना पड़ता है और एक आपको याद रह जाता है। है ना? अगर कोई व्यक्ति रटता है तो वो उसको रटना पड़ता है कई बार और कोई व्यक्ति को किसी चीज को अगर खुद ब खुद याद हो जा रहा है तो वो रह जाता है। याद रह जाता है। वैसे आपने कहा है नहीं मैं आपसे क्षमा मांगना चाहूंगा। आपके यहां से रिपीट आवाज आ रही है। ऐसे मैं बात नहीं कर पाऊंगा। मुझे इसको यही स्थगित करना होगा। मैं फिर आता हूं। रुक जाओ एक मिनट। हां वो आपको बंद करना होगा। दूसरा फोन तो बंद है। फोन कोई नहीं है यार। फ़ कहां है?

00:33:08:24 ऐसी स्थितियों से भी आप लोगों को सामना करना कि इस तरह के विचारशील लोग जब आए आपके सामने तो हम किस तरह से बात कर सकते हैं? क्योंकि है हिंदू सनातनी है और यह दिक्कत आ रही है कि शास्त्रों के प्रति अनास्था है। शास्त्रों के प्रति प्रमाण्य बुद्धि नहीं और प्रमाण्य बुद्धि की आवश्यकता है। या तो यह कह दे कि भैया मेरी पूर्ण श्रद्धा है। उनमें उसमें जो कुछ लिखा होगा वही सही है। हां मैंने प्रारब्ध पूर्वक ये सब चीजें प्राप्त की है और जिस जिस अंश में अगर मैं शास्त्र के विपरीत पाया जाऊंगा तो वहां मुझे गलत कहे शास्त्र को नहीं।

00:33:49:10 क्या बात हां जी अब सही आ रही है हेलो जैसे हो सकता है ऊपर कुछ इको हो रहा हो अब हम नीचे आ गए हैं कमरे में बताएं पता नहीं क्या मामला है पूछ लेते हैं नहीं वो कुछ गड़बड़ है अभी इस तरह से बात नहीं हो पाएगी नेट नहीं चल रहा है आपका क्या नहीं मेरा नेट चल रहा है आपकी ओर से ना रिपीट आवाज आ रही है वो वीडियो को खराब कर रही है। पूरा कंटेंट खराब हो रहा है। अब तो सही आ रहा होगा। जय श्री राम। जय श्री राम। हां जी। जय श्री राम। अब तो आ रहा होगा सही। नहीं रिपीट आ ही रही है। आपने क्या कोई हेडफोन लगाया? क्या किया है? ना एक मिनट। मैं इससे करता हूं यार।

00:34:53:06 अब सही आ जाएगा शायद हेलो फिर आ रही है नहीं अब तो सही होगा हमने राउटर भी रिस्ट करा नहीं नहीं आप अपना ब्लूटूथ हटा लो। ब्लूटूथ से तो नहीं हो रहा। अरे ब्लूटूथ से बात नहीं कर रहे हम लोग। ना हम तो एक ही इस समय एक ही है। नहीं नहीं और कुछ नहीं चल रहा है इसमें। चलिए ठीक है फिर कभी देख लेंगे।

00:35:29:10 कोई नहीं ऐसे तो या तो टेलीफोन ही कर लेना आप। टेलीफोन की बात वो आवश्यकता अनुसार देख लेंगे। बहुत बड़ा ऐसा इशू नहीं है। ठीक है। नहीं ठीक है। ठीक है। ठीक है। ठीक है भाई तो अभी आप लोगों ने देखा अब देखिए बात ऐसी है मैं क्रम समझा देता हूं इस उसमें लूप में फंस जाता है व्यक्ति मैं समझा देता हूं कि इन्होंने कहा कि धर्म और अधर्म का निर्णय उच्चतम स्तर वाले व्यक्ति की चेतना करेगी सामान्य व्यक्ति के लिए तो इन्होंने कुछ बताया ही नहीं अब उच्चतम स्तर वाले व्यक्ति की चेतना करी तो उसका का जैसे मान लीजिए उसने कुछ ऐसा किया जो समाज को देखने में गड़बड़ लग रहा है। मान लो तो उच्चतम स्तर वाले ने वो सही किया है कि गलत किया ये कैसे तय होगा? तो उसके लिए सबसे पहले उसका उच्चतम स्तर वाला होना मान्य है कि वो है। अब उच्चतम स्तर का कौन है कि ये कह रहे हैं जिसको तत्व ज्ञान हो। खैर अभी मैंने तत्व ज्ञान वाली बातें की नहीं है। तो तत्व ज्ञान की बात है तो तत्व ज्ञान तो उसको है जिसको उच्चतम स्तर है। अगर उसका कोई टेस्ट ले सकता है इसका मतलब उसको भी उच्चतम स्तर वाला होना चाहिए। जबकि दूसरा जो व्यक्ति

00:36:44:14 जिसकी चेतना का स्तर उच्च नहीं है जो यह जानने आया कि इसकी चेतना का स्तर ऊंचा है की नहीं। उसको तो तत्व ज्ञान है नहीं तो वो निर्धारण कैसे करेगा कि यह जो बाते तत्व ज्ञान के रूप में बोल रहा है वो बातें तत्व ज्ञान ही है। समझ रहे है? तो अगर उसको इस बात की नॉलेज नहीं है कि तत्व ज्ञान है क्या तो वह निर्धारित नहीं कर सकता कि उच्चतम स्तर क्या है इसलिए एक तृतीय सत्ता होती है शास्त्रों की वो बताती है जिसको तत्व ज्ञान होगा वो ऐसा होगा वो इस तरह का आचरण करता होगा वो इस तरह का आचरण पर ये शास्त्र को मान नहीं रहे तो जब ये शास्त्र को नहीं मान रहे हैं तो किसी व्यक्ति का उच्चतम स्तर वाला होना इस प्रकार से सिद्ध होगा और यदि बिना शास्त्रों के स्वयं को उच्चतम स्तर वाला खुद से ही घोषित करने की प्रणाली को जायज मान लिया जाए तो आप जानते हैं क्या होगा निठारी हत्याकांड में क्या हुआ था या और भी बहुत सारी चीजें हैं दुनिया में घटित हो रही है वो सब कह देंगे हम उच्चतम स्तर वाले हम उच्चतम स्तर वाले क्योंकि कोई दूसरा उनको आंक नहीं सकता वो स्वयं ही ये फैसला कर सकते हैं कि हम उच्चतम स्तर वाले हैं तो इस तरीके अब बात आती है कि भाई उसके अंदर आचरण ऐसे होंगे वो लूप में फंस जाते हैं उच्चतम स्तर वाला कौन होगा जिसके आचरण अच्छे होंगे आचरण क्या-क्या होने चाहिए कैसे पता चलेगा तो शास्त्र शास्त्र तो है नहीं तो क्या-क्या होने चाहिए वो

00:37:59:18 भी उच्चतम स्तर वाला ही तय करेगा। तो उच्चतम स्तर वाला अपने आचरण तय क्यों करेगा? जबकि अभी ये डिसाइड नहीं हुआ है कि वो उच्चतम स्तर वाला है कि नहीं। समझ रहे हैं आप? जैसे कि रामपाल ने कहा कि मैं तत्वदर्शी हूं कि कहां लिखा है कि भगवत गीता में लिखा है कि भगवत गीता में तो भगवत गीता तो काल ने बोली है कि उसका अर्थ कौन समझाएगा कि तत्वदर्शी। भाई जब अगर जो भगवत गीता है वह इस बात के लिए आधार है कि कौन तत्वदर्शी है तो भगवत गीता का अर्थ अभी तत्वदर्शी बनके कोई नहीं बता सकता क्यों क्योंकि भगवत गीता से डिसाइड हो रहा है कौन तत्वदर्शी तो भगवत गीता का सही अर्थ बना करने वाले के रूप में कोई तृतीय पक्ष होना चाहिए जहां से उसका तत्वदर्शी होना सिद्ध हो और तब वो आकर के भगवत गीता का अर्थ बताए भगवत गीता का अर्थ भी स्वयं ही बता रहे हो और फिर उससे स्वयं को तत्वदशी भीित कर ले रहे हो है ना? इसी प्रकार से आचरण भी स्वयं ही बता रहे हो और फिर उनहीं आचरणों के आधार पर अपने आप को उच्च स्तरीय साबित कर ले रहे हो। तो ये लूप है। इनको आपको समझ में समझना चाहिए। 7:00 बजे एक नास्तिक के साथ चर्चा है।

00:39:09:15 7:00 बजे एक नास्तिक के साथ में चर्चा है आज और कल शाम को 7:00 बजे एक इस्लाम को फॉलो करने वाले व्यक्ति हैं। वो आने वाले हैं। तो उनके साथ रिजवान करके उनका नाम तो कल एक अच्छी चर्चा आपको देखने को मिलेगी। ठीक है? तब तक के लिए अपडेटेड रहिए। जय श्री राम। [संगीत]

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B: SARVASHAKTIMAAN DHARMA Live 39:52 · 09 Jan 2026

ज्ञान शास्त्रों से नहीं बल्कि स्वविवेक से मिलता है Discussion with Ashish Dhyani

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