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00:00:06:24 जो ब्रह्मा कुमारीज का जो ईश्वर है वो सृष्टि निर्माण करता है क्या-क्या मतलब उसके कार्य जो करता है वो क्या करता है थोड़ा सा इस यहां बताया गया है कि जो परमात्मा है जी जी उसके तीन कारण जी स्थापना का भी पालना का भी विनाश का भी अच्छा अच्छा तो जो निराकार शिव है उत्पत्ति स्थिति संहार हां ठीक है तो जो परमात्मा है वह अपने ये तीन कार्य के लिए उन्होंने जो नियुक्त किए हैं एक मिनट आप तीनों कार्य बताइएगा क्या-क्या है स्थापना पालना और विनाश स्थापना पालना और विनाश वही उत्पत्ति स्थिति संवाद जी ठीक है तो उस कार्य के लिए तीन लोग नियुक्त हैं ब्रह्मा विष्णु महेश ब्रह्मा विष्णु महेश अच्छा अच्छा ठीक अगर ये कार्य परमात्मा का है जो ये तीनों लोग तीनों लोग करते हैं तो अब इसमें एक बात आती है कि ब्रह्मा विष्णु महेश विनाशील है विनाशी है या वो शाश्वत है तीनों ये तो कह सकते हैं वो तीनों शाश्वत है उनका विनाश नहीं होता है वो सदा तो फिर तत्व चार हो गए ईश्वर प्रकृति जीव और ब्रह्मा विष्णु महेश तो जीव प्रकृति ईश्वर और ब्रह्मा विष्णु महेश ये हो गए छह तत्व हो गए ब्रह्मा विष्णु महेश का सूक्ष्म शरीर

00:01:22:04 है नहीं तत्व तो हो गए ना छह तत्व तो हो गए ना अच्छा तो ये ये जो ब्रह्मा विष्णु महेश हैं जो जैसे मान लीजिए ब्रह्मा जी की ओर से देखते हैं तो वो बिल्डिंग बना रहे हैं। मान लीजिए एक उदाहरण ले लें कि जैसे जैसे कि प्रलय के बाद मिट्टी के कण हैं प्रकृति के तो वो उनको एकत्रित कर रहे हैं ब्रह्मा जी हम तो एकत्रित करने में एक शक्ति का उपयोग होता है। जैसे मैंने किसी को धक्का मारा तो क्योंकि मेरे अंदर खाना खाने की वजह से सूर्य सोयाने वाली जो प्लांट्स के द्वारा ईटिंग के द्वारा जो शक्ति है वो आई और मैंने किसी को पुश किया या फिर मैंने किसी को पुल किया तो जो ईश्वर है मतलब ईश्वर नहीं ब्रह्मा जी जो ईश्वर जिन जिनको यह कार्य देते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] तो उनके पास यह जो पुश और पुल करने की जो शक्ति है यह स्वयं से है या ईश्वर ने दी है यह शक्ति भी उन्होंने योग से प्राप्त हुई है। ब्रह्मा जी ने परमात्मा के ध्यान से मतलब उनका स्वरूप शाश्वत नहीं है। शाश्वत मतलब उनका स्वरूप है मगर शक्ति तो हमें चाहिए ना कोई भी कार्य करने के लिए या मतलब

00:02:37:27 मतलब ब्रह्मा जी ब्रह्मा जी के पास एक समय होता है जब शक्ति नहीं थी। है ना? और फिर वह ईश्वर से वह शक्ति प्राप्त करते हैं। प्राप्त क्योंकि ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शंकर जी तीनों को ध्यानस्थ अवस्था में दिखा रहे हैं। आप देखेंगे जब भी उनको तीनों को ध्यानस्थ अवस्था में दिखाया। तो ध्यानस्थ मतलब किसके ध्यान में वो है? किससे प्राप्ति कर रहे हैं? किसके निर्देशन पे कार्य नहीं इसमें नारद जी ने नारद पुराण में एक वो आया है श्लोक। उसमें भगवान शिव से पूछते हैं विष्णु भगवान शंकर भगवान से स्वरूप साकार वो खैर मान्यता अलग है। मगर मैं आपको बता दे रहा हूं। उसमें वह पूछते हैं कि तुम किसका ध्यान कर रहे हो? तो वह कहते हैं हे गोविंद मैं किसी का ध्यान नहीं करता। मैं तो नास्तिकों को प्रवृत्त करने के लिए केवल लीला मात्र करता हूं। मुझे किसी का ध्यान करने की आवश्यकता नहीं है। परंतु मुझे देखकर के नास्तिक भी धर्म से जुड़ जाए। प्रभावित हो जाए कि हमें भी ध्यान करना चाहिए। तो इस कारण से मैं ध्यान करता हूं। यह उनका शब्द है। खैर, इसमें यह चीज़ आती है कि उन्होंने ध्यानस्थ होकर के शक्ति प्राप्त की है। तो जैसे मान लीजिए कि ब्रह्मा जी एक जगह खड़े होकर के या जैसे पालन की बात है तो पालन की पूरी सृष्टि का पालन करते हैं तो उसमें कई सारी क्रियाएं हैं वो करनी होती हैं विष्णु

00:03:53:01 भगवान को विष्णु स्वरूप को। तो वह जो क्रियाएं करनी होती है तो विष्णु भगवान सब जगह पहुंचपहुछ के करते हैं या उनकी शक्ति कर देती है। वह खड़े रहते हैं। कैसे करते हैं? यहां भी बताया गया जो विष्णु जी का स्वरूप है तो उसमें चतुर्भुज दिखाया हम चार भुजा वाला तो विष्णु जी का जो असल कार्य है वो सतयुग से शुरू होता है जब इस सृष्टि पे सतयुग होता है हम और सतयुग में जो राज्य होता है वो लक्ष्मी और नारायण का होता है। नहीं नहीं वो ठीक है। तो लक्ष्मी नारायण का जो कंबाइंड स्वरूप है वो विष्णु है। ठीक है। उनका कार्य साकार में होता है। इस धरा पे पालना करने का। साकार में होता है। जैसे मान लीजिए कि विष्णु भगवान इस समय अ इन भारत के किसी हिस्से में हैं। साकार हैं क्योंकि है ना? तो उसी समय अमेरिका में कोई पालन की आवश्यकता पड़ी। वहां पे कुछ पुश और पुल की क्रिया होनी है। वर्क तो उस वर्क को वो कैसे करते हैं? अपनी शक्ति से केवल कर देते हैं या फिर वहां तुरंत पहुंचते हैं। देखिए परमात्मा ने जो तीनों को कार्य दिया है वो पूरी सृष्टि की पालना कर रही है और पूरी सृष्टि के स्थान मैं वही तो कह रहा हूं एक देश में या एक व्यक्ति जो भी कर रहा है वो खुद कर रहा है। उसमें उनका कोई रोल नहीं है। नहीं नहीं कहने का मतलब

00:05:08:04 यह है कि विष्णु भगवान जो हैं वो जैसे मान लीजिए एक एग्जांपल ले रहा हूं कि सृष्टि के पालन में उन्हें सोफे को पुश करना है। उसकी स्थिति सेट करनी है। पालन के उससे दृष्टिकोण से तो उन्होंने क्या किया कि वो यहां बैठे हैं और उन्होंने केवल देखा और वह पुश पुश हो गया और एक ये है कि वो उठ के खुद गए अपने हाथों से उन्होंने पुश किया तो इसमें से किस तरह से करते हैं वो पूछ रहा हूं। एक्चुअली में क्या होता है कि जैसे कि हम विष्णु जी को ले लें तो उनका कार्य भी क्या है ना बहुत बड़ा है। ये बड़े के हिसाब से बता दीजिए। जैसे जुपिटर को कहीं सेट करना ये बड़ा कार्य हो गया। मैंने बहुत छोटा इसलिए बताया कि जल्दी एग्जांपल सेट हो जाए। जुपिटर को सेट करना किसी [नाक से की जाने वाली आवाज़] अंतरिक्ष के किसी मंडल में, सौरमंडल में, किसी कक्ष में या ये ऐसा बड़ा कार्य पुष्प पुल तो होगा ना। प्राकृतिक जड़ पदार्थ हैं जब वो निर्मित होंगे तो उनकी स्थिति को स्थाई रूप से संरचना प्रदान करने के लिए कितने भी वर्षों के लिए उनको पुश या पुल करना पड़ेगा और उसमें एक फोर्स काम करेगी। तो वहां पर पुश और पुल वो बैठे-बैठे कर देते हैं या फिर वो जाते हैं खुद अपने से करते हैं। नहीं खुद क्यों करेंगे? तो केवल वो शक्ति

00:06:23:06 से जैसे यहां बताया कि जो सृष्टि पूरा चक्र चल रहा है। उनकी शक्ति मतलब सब जगह है। ये परमात्मा की शक्ति और ये सारा कुछ जो विधान चल रहे परमात्मा की नहीं वो तो इनकी है ना। इनका कार्य मेन इनको परमात्मा से मिली है। इनको तो इसका मतलब यह कहा जाए कि जो विष्णु भगवान के पास जो शक्ति है अच्छा वो शक्ति उतनी कैपेबल है जितनी परमात्मा के पास है या थोड़ी बहुत कम ज्यादा है। नहीं [नाक से की जाने वाली आवाज़] परमात्मा के पास तो सर्व परमात्मा की बैटरी कभी डाउन नहीं होती है। हर व्यक्ति उन विष्णु भगवान की होती है। सभी का सब ध्यानस्थ अवस्था है। परमात्मा तो ये भी हर 5000 साल में ब्रह्मा विष्णु महेश भी ध्यान करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं। अच्छा तो चलिए इस पर आ जाते हैं। विष्णु तो परमात्मा की शक्ति एक तरीके से पूरे उसमें संसार में व्याप्त है। वो बात अलग है कि उस शक्ति का उपयोग विष्णु भगवान कर लेते हैं। यही माना जाएगा। है ना? परमात्मा की जो शक्ति है वह पूरे में व्याप्त है। विष्णु भगवान उस शक्ति का उपयोग कर लेते हैं। और परमात्मा यह भी कहते हैं आप जैसे हर व्यक्ति अपने खुद के लिए वो ब्रह्मा भी है। वो विष्णु भी है और वो शंकर भी है। मतलब हर व्यक्ति मतलब हर व्यक्ति कुछ क्रिएट कर रहा है। तो जब वो क्रिएट कर रहा है वो ब्रह्मा है। वो तो क्रिएट कर रहा है वो विष्णु

00:07:38:24 भाई क्रिएट किया। बच्चे को जन्म दे रहे हैं तो ब्रह्मा हो तो गए। कहते तो गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देव महेश्वर चाहे आप एक संकल्प भी रच रहे हो आप एक कर्म भी कर रहे हो आप कुछ भी कर रहे हो आप ब्रह्मा हो और आप सब पालन पोषण कर रहे हो सबका देखभाल कर रहे हो बस अंतर सिर्फ इतना ही है कि हम ब्रह्मा अकॉर्डिंग टू ब्रह्मा कुमारीज ब्रह्मा विष्णु महेश के आगे हम बहुत सीमित शक्तियों वाले हैं। जिस प्रकार से ब्रह्मा विष्णु महेश ईश्वर जो अलग है शिव बाबा ब्रह्मा कुमारी के अनुसार उनके आगे वह लोग सीमित शक्तियों से युक्त है ना यही है ना हां उनके पास भी शक्ति उन्हीं से आई हमें भी उन्हीं से लेनी जी जी जी अब हम तो हमें ब्रह्मा विष्णु महेश से नहीं लेनी शक्ति तो इस सोर्स वही है सुप्रीम सोर्स वही इसका मतलब कुल मिलाकर के ईश्वर की शक्ति सब जगह व्याप्त है सब जगह क्या ईश्वर की शक्ति से ही सारा कार्य हो रहा है तो सब जगह व्याप्त हो गई हां मगर हम पे लेना है। जैसे मान लीजिए सूरज निकला मगर आप घर में हो और आप सूरज के पास जाओगे नहीं तो आपको सूरज की किरणें कैसे मिलेंगे? नहीं मैं समझ गया। मैं समझ गया। मेरा मैं दूसरी मैं दूसरे वे पे जा रहा हूं। तो अब दिक्कत एक ये आती है कि ईश्वर एक जगह है। हम एक देश है और उसकी शक्ति सब जगह है। हम है ना? और तभी दुनिया में ये सारे

00:08:54:00 कार्य हो रहे हैं। पुश और कुल वाले। तो फिर यह बात आती है कि कि शक्ति जहां पर ईश्वर नहीं है और शक्ति है तो वहां पे क्या ईश्वर की पावर कम मानी जाएगी? ईश्वर नहीं है और शक्ति है। जैसे ईश्वर मान लीजिए यहां पे है इस जगह पे और यहां से 1 किलोमीटर दूर ईश्वर नहीं है। वास्तव में ईश्वर इस धरती पे नहीं। धरती पे ना हो कहीं पे भी हो। एक देशीय तो है ना क्योंकि साकार है। साकार है तो एक देश है। किसी एक देश में है। ईश्वर तो निराकार है ना। निराकार है। हां साकार सॉरी ईश्वर निराकार है। परंतु सर्वव्यापक है कि नहीं? नहीं। नहीं है ना? तो एक देश है। और वो देश इस धरती पे नहीं है। वो इस देश परमधाम जिसको हम लोग कहते हैं वो इस सृष्टि से बहुत समझ गए। हां। तो यानी कि इस सृष्टि में ईश्वर नहीं है। वो अपने परमधाम में है। वो एक देश में है। सर्वव्यापक सर्व्यापक नहीं है। उसकी जो शक्ति है वो सब जगह है। तो अब ये मैं कह रहा हूं कि जहां पे ईश्वर बैठा है वहां पे उसका जो आधिपत्य है हम वो ज्यादा होना चाहिए क्योंकि यहां पे वो नहीं है। उसकी शक्ति मात्र है। हम या फिर पूरा दोनों जगह सेम है। वह सुप्रीम है ना

00:10:09:08 तो उसका अंतर नहीं होता कि वह कहीं है तो शक्ति है और कहीं नहीं है तो शक्ति नहीं है। ऐसा नहीं है। तो फिर अंतर क्या आ रहा है शक्ति और शक्तिमान में? आप समझिए मेरी बात को। शक्ति सर्वव्यापक है। ठीक है। निराकार शक्ति भी है। निराकार ईश्वर भी है। ईश्वर एक जगह है। शक्ति सब जगह है। शक्ति जो उससे लेनी है ना। नहीं नहीं नहीं। जो वो काम खुद कर रहा है। अभी हमारा तो रोल है ही नहीं। हम अभी जो उसके खुद के काम है उसके क्या काम जैसे आपने बताया ना उत्पत्ति स्थिति संभार इसमें शक्ति चाहिए तो उसने किस चीज की उत्पत्ति की उसने सतयुग की और स्वर्ग की उत्पत्ति की स्वर्ग की उत्पत्ति करने में पुष और पुल का वर्ग हुआ ना हां ताकत लगी ना एक शक्ति का उपयोग हुआ यानी जहां पर स्वर्ग बना जहां पर सतयुग का निर्माण हुआ वहां पे शक्ति लगी हम और वो पूरे संसार में उसकी वो निराकार रूप में शक्ति व्याप्त है। ठीक है? तो हम यह माने कि जहां पर ईश्वर की शक्ति है वहां पर उसका कंट्रोल कम है और जहां पर वह स्वयं है वहां उसका कंट्रोल ज्यादा है। क्योंकि जहां पर ईश्वर नहीं है जहां पर उसकी शक्ति नहीं है वो जहां पर ईश्वर स्वयं नहीं है वहां पर उसका कंट्रोल थोड़ा कम है। क्या हम यह माने? वास्तव में इस दुनिया में जो भी चीज चल रही है वो प्रत्येक मानव के कर्मों

00:11:24:09 के आधार पे चल रही है। नहीं नहीं वो अलग हो गया। मैं स्वर्ग की बात कर रहा हूं। जैसे स्वर्ग बनाया, सतयुग बनाया, जो भी बनाया तो उसमें ईश्वर तो यहां बैठा है, स्वर्ग बहुत बड़ा है। ठीक है? वहां पे ईश्वर की शक्ति है, ईश्वर नहीं है। तो जहां ईश्वर बैठा है, बैठा है वहां उसका कंट्रोल ज्यादा है और जहां पर वो स्वयं नहीं है। तो क्योंकि शक्ति है स्वयं तो है नहीं तो वहां कंट्रोल कम होना चाहिए। ईश्वर वास्तव में किसी चीज को कंट्रोल करता भी नहीं। भाई स्वर्ग को बना रहा है ना ये कंट्रोल हो गया ना। वो हमें ज्ञान देता है जिससे हम अपने अंदर का बदलाव करते हैं। यानी ईश्वर उत्पत्ति स्थिति संहार नहीं करता केवल ज्ञान देता है। नहीं ज्ञान से वो हमारे अंदर अच्छे-अच्छे दिव्य गुणों की उत्पत्ति करता है और दुनिया में जो स्वर्ग बनता है वो तो प्रकृति बनाएगी। प्रकृति का परिवर्तन होगा विनाश होगा तब नई दुनिया बनेगी। ईश्वर ऑर्डर नहीं करता कि स्वर्ग बनाओ, महल बनाओ। तो फिर ईश्वर उत्पत्ति नहीं करता है। करता है ना उत्पत्ति मतलब वो हमें सतयुग बनाने का ज्ञान देता है। मतलब अपने संस्कारों को हम कैसे ईश्वर प्रकृति को सतयुग बनाने का ज्ञान देता है। नहीं मनुष्य आत्माओं को तो मनुष्य बनाते हैं स्वर्ग को। मनुष्य अपने को उस युग में जाने के लायक बनाते हैं। नहीं तो वो युग जहां वो जाएंगे वो तो निर्मित कहां से कौन करता है उसे? वो तो प्रकृति करेगी। वो स्थान तो प्रकृति तो प्रकृति को ईश्वर

00:12:39:13 ने ज्ञान दिया। प्रकृति वाइब्रेशन से शुद्ध होती है। वह कार्य करने के लिए तैयार होती है। जैसे मान लीजिए कहीं भी सफाई करनी है। मतलब प्रकृति स्वर्ग अपने आप बना लेती है। हां प्रकृति मनुष्य के वृत्त प्रकृति कहने का मतलब यह हुआ ना कि ईश्वर फिर उत्पत्ति स्थिति सम्मार नहीं कर रहा है। ईश्वर आके ही ज्ञान देता है ना कि स्वर्ग बनेगा कैसे? वो तो हमको देता है ना ज्ञान कि जड़ पदार्थों को देगा। तो हमें देगा तो उसने प्रकृति तो जड़ होती है ना। तो ब्रह्मा का भी कार्य जो इस उत्पत्ति का है उसका उनका भी कार्य ऐसे ही है कि वो मनुष्य आत्माओं को नई जीवन में नहीं नहीं मैं वो नहीं कह रहा निर्माण की बात कर रहा हूं उत्पत्ति करता है कि नहीं करता है ईश्वर किस चीज की जैसे आपने बताया सतयुग और स्वर्ग की हम करता है ना तो युग तो बनेगा तो अपने आप ही ना बनेगा उसके लिए वो टाइम की बात नहीं कर रहा हूं मैं जो उसमें स्वर्ग होता है ना जैसे कि अच्छा सब कुछ होता है वायुमंडल अच्छा होता है ये सब होगा ना तो इसको सेट ईश्वर ईश्वर करता है या अपने आप सेट होता है। ये ये कह रहा हूं। इसमें तीन लोग का रोल है। तो उनको शक्ति ईश्वर ही तो दे रहा है। तो बात तो वही होगी कि उसी शक्ति से हो रहा है काम। उसकी शक्ति भी लगती है और साथ में प्रकृति और मनुष्य आत्मा तीनों का मिलके ये सतयुग का स्टार्टिंग होता है। नहीं नहीं अकेले ईश्वर के उससे नहीं होता। मतलब ईश्वर उत्पत्ति

00:13:54:21 करता है कि नहीं करता है? इसकी उत्पत्ति तो वही करता है। मगर वो हम सबके सहयोग से करता है। तो हम तो उसमें जा रहे हैं ना। मनुष्य तो उस मनुष्य का काम है उसमें जाना। अब रही बात ब्रह्मा विष्णु महेश की तो वो उनसे ही पावर लेकर के कर रहे थे। यानी कि शक्ति उनकी है। है ना? वो केवल आपने जैसे यह कहा ना कि जहां वो है उसकी शक्ति मैं आ रहा हूं। मैं उस पे आ रहा हूं। तो अब बात ये है कि जैसे उन्होंने कहा कि अ वो कर दो जाकर के स्वर्ग का निर्माण कर दो। मान लीजिए ब्रह्मा जी कर रहे हैं। ऐसा होता है। ब्रह्मा जी कर रहे हैं। तो अब ब्रह्मा जी तो सर्वव्यापी है नहीं। उन और ईश्वर की शक्ति सर्वव्यापी है तो ब्रह्मा जी जहां-जहां पर चाहेंगे वहां वहां पर वह जो है निर्माण कर लेंगे क्योंकि उसकी शक्ति सर्वव्यापी है क्योंकि उन्होंने अथॉरिटी दी है कि तुम मेरी शक्ति का इस काम में यूज़ कर सकते हो। दूसरे काम में विष्णु जी करेंगे यूज़। यही तो बात हो गई। यही है ना क्लेरिटी? तो अब बात ये आती है कि अब हमें दो तत्व प्राप्त हो गए। एक ईश्वर की शक्ति और एक स्वयं ईश्वर। हम तो ईश्वर की शक्ति सब जगह मानी हमने कि है जो पुश पुल करेगी और भी जितनी भी क्रियाएं होंगी वह सब करेगी और निराकार है। अब दोनों में क्या है? यह एकदेशीय है और यह सर्वव्यापी है। शक्ति सर्वव्यापी है। ये एकदेशीय है। अब जो सर्वव्यापी शक्ति है वो कहीं

00:15:09:25 ना कहीं कुछ अंतर होना चाहिए। तब हम यह कह सकते हैं कि यह शक्ति है और यह शक्तिमान है। कुछ भी अंतर नहीं है तो हमें कहना पड़ेगा यह भी शक्तिमान है। तो अंतर क्या है कि भाई जो स्वयं ईश्वर है वो ज्यादा होना चाहिए। जो शक्ति है वो कम होनी चाहिए। तो क्या ऐसा है कि जहां पर ईश्वर बैठा है उसका कंट्रोल ज्यादा है और जहां वो नहीं है उसका कंट्रोल कम है? यह मेरा प्रश्न है। हां जहां ईश्वर है वहांकि उसके वाइब्रेशन है तो वहां का ओरा और वहां की जो वाइब्रेशन है वो तो ज्यादा होगी और जहां पे वो नहीं वाइब्रेशन नहीं उसका कंट्रोल उसका कंट्रोल एक्चुअली जहां परमात्मा रहता है ना वहां तो कुछ कंट्रोल करना ही नहीं है। वहां कुछ ऐसी चीज ही नहीं है। करना है या नहीं करना है वो तो एक अलग बात हो गई। जैसे मैं यहां बैठा हूं। मुझे कुछ नहीं करना है। मगर मुझे मालूम मेरे सामर्थ्य में क्या-क्या है। क्या-क्या मैं कर पाऊंगा। तो वही मैं पूछ रहा हूं कि जहां परमात्मा स्वयं होता है वहां पे उसका अधिकार कम ज्यादा होता है। कंपैरेटिवली टू जहां पे वो नहीं होता उसकी शक्ति होती है वहां पे ज्यादा होता है। हां। तो इसमें जैसे हम ऐसे समझ सकते हैं जहां माता-पिता खड़े हैं हम तो वहां सब चीज एक्यूरेट चलती है। मगर जहां वो नहीं है और सिर्फ बच्चे हैं तो वहां सब चीज थोड़ी ऊपर नीचे तो चलो यानी कि ईश्वर की सत्ता समान रूप से सब जगह नहीं है। ईश्वर की सत्ता

00:16:24:28 समान रूप से सब जगह नहीं है। जैसे कि एक मात-पिता के बच्चे समान रूप से नहीं होते। उसी के बच्चे हैं। नहीं बच्चे नहीं ईश्वर की सत्ता तो सत्ता तो बच्चों के अंदर ही होगी। बच्चों के अंदर क्यों होगी? जैसे कि मान लीजिए कोई ज्वालामुखी फट रहा है। हम या फट रहा है या नहीं फटना है जो भी उसमें उत्पत्ति में आता है। इसमें बच्चों का कोई रोल नहीं है। इसमें तो प्रकृति के साथ व्यवहार है किसका? ईश्वर का। है ना? कि उसको फटना है कि नहीं फटना है। कितनी अग्नि जलवानी है, कैसा ज्वालामुखी बनवाना है। तो इसमें तो उसकी शक्ति है ना वहां पर। इसमें बच्चों का कोई काम नहीं है। तो वो मैं बता रहा हूं कि ईश्वर की जो सामर्थ्य है वो सब जगह एक जैसी है। बराबर है। उसका जो इसमें हम एक चीज बताना चाहेंगे। जी ज्वालामुखी फटना है कि नहीं फटना है। सुनामी आनी है कि नहीं आनी है? बाढ़ आनी है कि मैं ये नहीं कह रहा। प्राकृतिक आपदाओं पे मत जाइए। आपदाओं में भी दूसरे मैं वही मैं जानता हूं। आप ये कहोगे मैं वो नहीं कह रहा वो मैंने केवल एक उदाहरण लिया है मैं किसी भी क्रिया की बात कर रहा हूं दुनिया में कहीं भी कोई भी ऐसी क्रिया जहां पे मनुष्यों से कोई मतलब ही नहीं है वो तो प्रकृति प्रकृति तो भी मनुष्यों का रोल है यानी कि सतयुग बन रहा है मनुष्यों के कारण हां मनुष्यों का ही रोल है सतयुग भी मनुष्य बनाता है कलयुग भी मनुष्य बनात तो इसका मतलब ईश्वर उत्पत्ति नहीं कर रहा है ना ईश्वर उत्पत्ति का ज्ञान देता है जैसे मान

00:17:40:04 लीजिए तो मैं वही कह रहा हूं गीता में आपने देखा मैं मैं समझ गया वो थोड़ा सा ईश्वर जी ने लड़ाई मैं समझ उन्होंने बताया मैं ईश्वर केवल ज्ञान देता है। हां यानी वर्क नहीं करता। ज्ञान और शक्ति दोनों देता है। तो वही शक्ति वाला मिस हो जाता है। आपको ज्ञान दिया फिर आपको उस कार्य को करने की शक्ति दी मगर करेगा नहीं वो। ठीक है। शक्ति दे दी। अब जो मुझे शक्ति दी है तो मैं तो जहांजहां पर मैं हूं मैं वहीं पे काम कर पाऊंगा। शक्ति भले ही भगवान ने दी है। वाइब्रेशन से भी काम कर सकते हैं। एक जगह बैठे-बैठे भी पूरी दुनिया में। आप किसी भी पूरी दुनिया में अपने मानसिक जिसको कहते हैं मंसा सेवा हम लोग कहते हैं। अपने वाइब्रेशन अपने थॉट से भी आप बहुत काम कर सकते हैं। यानी कि मैं जहां पर हूं मैं जहां पर हूं और जहां पे मेरी शक्ति है हां ठीक है? ईश्वर से आई है वो शक्ति और मेरी शक्ति से मैं पूरी दुनिया में कार्य कर सकता हूं। ठीक है? हम अब जब मैं कार्य कर सकता हूं। ईश्वर ने उत्पत्त ईश्वर को उत्पत्ति इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उत्पत्ति करने की ये जो शक्ति है पूरे संसार में उन्होंने वो उन्होंने दी तो बात तो वही हो गई ना कि उनकी ही शक्ति पूरे संसार में तो उसी को तो मैं यूज़ कर रहा हूं। ये तो मैंने शुरू में कहा था आपसे उनकी शक्ति पूरे संसार में मानी है ना यूज़ कर रहा हूं। मैं उसको यूज़ कर रहा हूं। तो अब मैं फिर से पूछ रहा हूं कि जो ईश्वर की शक्ति

00:18:55:06 पूरे में है सर्वव्यापी वो ईश्वर के बराबर है या ईश्वर से थोड़ी कम है क्योंकि बराबर है तब तो वो ईश्वर से अलग है। वरना हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर स्वयं है। अगर कम है अगर वह शक्ति कम है ईश्वर से थोड़ी सी तो अलग है ईश्वर से और अगर बिल्कुल बराबर है एक पॉइंट भी अंतर नहीं है तो हमें मानना पड़ेगा कि ईश्वर ही शक्ति के रूप में सर्वव्यापक है। ये बात है। जैसे कि ईश्वर तो फिजिकल में है। जैसे हम जानते हैं वो शक्ति तो उसकी चारों तरफ है ना। वही तो मैं कह रहा हूं। अंदर है ना। मगर हम ये नहीं कह सकते कि पावरफुल कौन है? ईश्वर की ईश्वर की शक्ति। क्योंकि हम अलग कर रहे हैं। हां अलग कर रहे हैं। ऐसा होता है कि देवी भागवत में एक वाक्य आया है। शक्ति और शक्तिमान में कोई भेद नहीं होता। शक्ति शक्तिमान को द्वैत भाव में नहीं डालती। मतलब ये दो तत्व नहीं होते। जैसे मेरे हाथ ने कोई काम किया तो यह नहीं कहा जाएगा मेरे हाथ ने किया। हां मैंने नहीं किया हाथ ने किया। हां। तो उसी तरीके से मगर जब हम कहते हैं ये हाथ अलग है तो फिर कंपैरिजन आएगा कि जो काम अभी भी मैं कर सकता हूं मेरा हाथ नहीं कर सकता। तो शक्ति अलग है तो फिर ये क्वेश्चन आएगा कम ज्यादा का और शक्ति अलग नहीं है तो ये माना जाएगा ईश्वर शक्ति के रूप में सर्व्यापक है। तो मैं वो आपसे पूछ रहा हूं।

00:20:11:10 तो एक्चुअली इसमें यह बताया जाता है ना जी कि शक्ति क्या है कि आपने जैसे भोजन खाया भोजन खा के आपको क्या मिली शक्ति मिली पावर मिली ना कार्य करने की जी तो परमात्मा भी कहता है कि मैं सर्वशक्तिवान हूं तुम मेरे से शक्ति लेने वाले हो मास्टर सर्वशक्तिवान नहीं वो कहते हैं मैं उसी कहने के आधार पे जो निर्णय आ रहा है उस पर अगला मेरा अगला एक क्रम में एक प्रश्न है कि ईश्वर सबको सबको शक्ति दे रहा है। यानी उसकी शक्ति सब जगह व्याप्त है। सबको दे रहा है मगर सब ले रहे हैं कि नहीं? वो तो एक अलग कांसेप्ट हो जाएगा। सब ले रहे हैं कि नहीं ले रहे और लेने की विधि भी तो जानना पड़ेगा। वो भी एक अलग कांसेप्ट हो जाएगा। मगर वो उसकी शक्ति सब जगह है। तो क्वेश्चन यही है कि शक्ति शक्ति सब जगह नहीं शक्ति परमात्मा के पास है और हमता है। हम सब ध्यान करके उससे शक्ति खींचते हैं। जैसे छोड़ता है। हां। जैसे अब्सॉर्ब यानी कि फिर वही बात आ गई कि यानी कि जहां पर विष्णु भगवान है अगर वह यहां है तो दूसरी जगह उनका कंट्रोल नहीं है। हम नहीं है ना उनको वास्तव में कंट्रोल करना भी नहीं है ना क्योंकि सेम टाइम सारा जैसे मान लीजिए रूल्स बन गए लॉ बन गया सब चीज ऑटोमेटिक चल रही है। एक मशीन का बटन आपने दबा दिया सब चीज ऑटोमेटिक चल रही है। क्योंकि उस मशीन को चालू

00:21:26:21 होने में और बंद होने में और जो कार्य अभीष्ट है वह करने में हम् हमारी चेतना उसके साथ जुड़ी हमने उसको दबाया है और हम ये जानते हैं कितनी देर में कितना क्या काम करेगी और अगर हमारी चेतना उससे अलग हो जाए तो वो विनाशकारी हो जाएगी। जैसे रिवॉल्वर रिवॉल्वर को आप कहीं पे यूं ही किसी बच्चे को दे दो तो हत्या कर देगा वो तो बच्चा उसको नहीं मालूम अपने ही नुकसान पहुंचा ले है ना तो हमारी चेतना उस मशीन के साथ लगी होती है तब ये माना जाता है तो कहने का मतलब यही है कि वो जो प्रकृति का कार्य अपने आप हो रहा है उसमें ईश्वर का इन्वॉल्वमेंट मानना पड़ेगा ना हम मानेंगे क्योंकि सारा खेल ही प्रकृति पुरुष का है पुरुष कौन परमात्मा और प्रकृति दोनों मिलके ये सारा खेल रचा हुआ हां तो प्रकृति को अब शक्ति कहिए ये प्रकृति यानी कि यानी कि भगवान शक्ति भगवान से अलग है। भगवान उसको ऑर्डर देता है। वो काम करती है। शक्ति वास्तव में कोई फिजिकल रूप में नहीं है। कोई एक फोर्स है ना बल। वो बल कहां है? हम सबके अंदर है ना। बाहर तो नहीं है ना। जहां पे मैं वही तो बात बार बार-बार आपसे कह रहा हूं। जहां पे पहाड़ बन रहा है। सतयुग में घाटियां बन रही हैं। पेड़ उग रहे हैं। प्रकृति ऑटोमेटिक बना रही है। हां। तो उसको ऑटोमेटिक बना रही तो वो शक्ति है ना उसके पास तब तो बना रही है ना पुश और पुल दुनिया में हो रहा है तो यानी कि वो

00:22:41:27 शक्ति नाम की कोई पदार्थ है वहां पर जो वो काम क्रिया करवा रहा है ठीक है वो जो पदार्थ है शक्ति नाम का प्रकृति क्या हो गई जड़ तत्व कि ये ये ये जो है परमाणु है हां ये ये सब हो गए जड़ तत्व और शक्ति क्या हो गई कि फोर्स कि किस उनको क्या शेप देना है इसके लिए फोर्स चाहिए इन इन प्रकृति के पदार्थों को निर्मित करने के ये फोर्स चाहिए। अब ये जो फोर्स है ये या तो प्रकृति का अपना हिस्सा होना चाहिए। है ना कि वो कुछ भी अपने हिसाब से कर सकती है और या फिर ये भगवान का हिस्सा होना चाहिए। नहीं डिसाइड करते हैं। जैसे मान लीजिए लोगों मैं यह नहीं कहता हूं कि वो करते हैं कि नहीं करते। मैं यह कह रहा हूं कि अगर उनकी ही शक्ति ये सब कार्य करा रही है तो फिर शक्ति और शक्तिमान में क्योंकि आपने अंतर माना है कि शक्तिमान सब जगह नहीं है पर शक्ति सब जगह है। तो यदि आपने अंतर माना है तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर का जो सत्ता है वो सब जगह एक जैसी नहीं है। कमब है क्योंकि वो स्वयं नहीं है वहां पर। यह चीज है। अच्छा ठीक है। दूसरा करते हैं। इसको हटाते हैं।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 24:01 · 25 Jul 2026

ब्रह्मा कुमारीज का ईश्वर सर्वव्यापी है या एकदेशीय?

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B · Video ब्रह्माकुमारी के सिद्धांतों पर सारगर्भित चर्चा #ब्रह्माकुमारी #BrahmaK...
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