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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] ठीक है। तो अब आपने एक बात कही कि ईश्वर अपने सारे कार्य करता कर सकता है बिना किसी की सहायता के तो वो सर्वशक्तिमान कहा जाता है। है ना? हां। तो जब ईश्वर ईश्वर का कार्य क्या है? पूछ रहे हो मेरे से। हां। तो ईश्वर का ईश्वर का कार्य यही है सृष्टि रचना करना धारण करना फिर प्रलय करके फिर पूरा सृष्टि चक्र चलाना और जितने भी चीजें बीच में आती कर्म सिद्धांत मनुष्यों की अनुष कह रहा हूं सभी जीवों के लिए रचनाएं करना और सस्टेन करना हर चीज को बेसिक यानी उत्पत्ति उत्पत्ति स्थिति संहार और कर्म फल देना ये चार चीजें मैंने पढ़ी थी उसमें शायद है ना यही है ना हां यही है तो ये बताइए कि ईश्वर के अलावा अलावा और कौन-कौन से तत्व हैं जो एक्सिस्ट करते हैं सृष्टि रचना से पहले

00:01:06:12 वो प्रकृति अब क्योंकि आप मैं सोचा था कि सर्वशक्तिमान वाले पे आएंगे तो आप दिशा अलग ही ले जा रहे हैं। इससे क्या होगा? मतलब इसमें इससे फर्क क्या पड़ेगा? तो इससे सर्वशक्तिमान फर्क पड़ेगा ना फर्क ये पड़ेगा कि जो ईश्वर है वो प्रकृति की और जीव की सहायता ले रहा है उत्पत्ति स्थिति संहार और ये सब करने में सहायता ले रहा है वो फिर आप ये क्यों कह रहे हैं कि वो अपने से कर लेता है कौन से माना जाए कि हां हां निमित्त है तो निमित रूप से सहायता नहीं ले रहा। उपादान तो चाहिए ना ईश्वर को। मूल प्रकृति आप आज में समझ गया। आप ये कहना चाह रहे हैं कि मूल प्रकृति एक्सिस्ट कर रही है। तो मूल प्रकृति के अस्तित्व के बिना ईश्वर नहीं बना सकता। तो इससे आप वो दिखाना चाह रहे समझ रहे। दो ही चीजें वहां पे दो ही चीजें ईश्वर के अलावा है। उन दोनों चीजों का वो उपयोग कर रहा है। ये वाली बात जो कही जाती है कि ईश्वर बिना किसी की सहायता के नहीं करता। तो इसमें ये मानना पड़ेगा या तो कोई एक और ईश्वर था जिसकी सहायता उसने नहीं ली। क्योंकि जिसकी जो उपलब्ध है उसको उसको तो यूज़ कर रहा है। अगर बात करें कि जड़ जड़ यही सही सही सही पकड़ा

00:02:21:18 पॉइंट पहला वाला सही पकड़ा। एक मिनट एक मिनट जड़ का वो यूज़ कर रहा है। अगर कहे चेतन का नहीं कर रहा है तो वो अपने धर्म का जो धार्मिक ज्ञान है उसका विस्तार करने के लिए भी चेतन का यूज़ कर रहा है। पहले वो ऋषियों को देता है। ऋषियों से प्रवाह आगे बढ़ता है। चेतन का यूज़ भी हो गया। जो वो है ना उत्पत्ति स्थिति स्थिति में आ गया धर्म और धर्म के प्रवाह के लिए वो ऋषियों की ऋषियों की सहायता ले रहा है। चेतन की सहायता ले रहा है। वो खुद तो हर एक को जाकर के वेद नहीं दे रहा है। वो चार ऋषियों को दे रहा है। फिर चार ऋषि आगे काम कर रहे हैं। ठीक है। ठीक है। मैं इसका जवाब दे देता हूं। पॉइंट समझ गया मैं। तो ईश्वर जो है उपादान तो ईश्वर को चाहिए ही चाहिए। जो आप बोल रहे हो मूल प्रकृति ईश्वर उपादान चाहिए ही चाहिए। और सहायता ना लेने का क्या है? वो बताइए। सहायता ना लेने का अर्थ यानी किसी और की सहायता ना लेकर के खुद से कर रहा है वो चीजें और खुद से करने का मतलब जो है निमित्त रूप से सहायता सृष्टि बिना जीव के भाई किस चीज की सहायता नहीं लेनी जड़ की या ची की या दोनों की नहीं लेनी सहायता लेने का अर्थ गलत समझ रहे हैं क्योंकि ये तो फिर आप ये तो शुरू से ही गलत समझ रहे हैं आप ये तो आर्य समाज में कोई भी नहीं बोलता है कि ईश्वर जो है बिना मूल प्रकृति के बिना जीवात्माओं के एक्सिस्टेंस बना देता है मैं ये नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा कि आर्य समाज जी यह बोलता है कि वह बिना

00:03:36:19 प्रकृति की स बिना प्रकृति का उपयोग किए बना देता है। मुझे इस बात का अर्थ समझाइए। वह यह जो यह जो तर्क दिया जा रहा है आर्य समाज की ओर से कि वह अपने सारे कार्य बिना किसी की सहायता के अन्य आपने जो पहले वाली बात बोली थी ना वही बात है कि अन्य किसी और चेतन सत्ता और को एक्सिस्ट नहीं कर रही जिसकी सहायता लेके वो कुछ बना रहा है। जैसे उदाहरण के लिए बोतल है ईश्वर का ईश्वर का कार्य ईश्वर का कार्य स्थिति है ना स्थिति पालन स्थिति रखना मेंटेन रखना पालन उसमें धर्म की स्थापना आ गया ना ईश्वर का कार्य कि नहीं आया हम धर्म की स्थापना अब वो उसप बात चली जाएगी वो फिर दूसरा विषय हो जाएगा नहीं होगा धर्म की स्थापना का मतलब यही नहीं है कि जब जब कंस आए रावण आए तब स्थापना करनी है। कोई व्यक्ति धर्म को जानने वाला नहीं है। तब चार ऋषियों के अंतःकरण में वेद का ज्ञान देना ये भी धर्म की स्थापना मैं इसका हां मैं इसका जवाब इसे देता हूं। ईश्वर जो है समस्त आत्माओं का कल्याण चाहता है और कल्याण चाहने के लिए व्यवस्था जो बनाई कल्याण करने के लिए चाहने के लिए नहीं नहीं मैं कह रहा हूं वो सहायता ले रहा है ना चेतन की

00:04:52:07 आपने कहा चेतन की सहायता नहीं लेता है वो तो ले रहा है चेतन से अपना काम करवा रहा है ना अपना काम वही अपना काम कुछ उसका थोड़ी है धर्म की धर्म की स्थापना करना या जो भी करना वो ईश्वर का काम नहीं है वो चेतन मतलब हमारा काम बेसिकली तो वो क्या चीज है जिसके कारण ये कहा जा रहा है ये जो है ये हमारा काम है ये धर्म की स्थापना करना ईश्वर का नहीं है हम ईश्वर का नहीं है ना ईश्वर ने हमें हमारे हमें स्वतंत्र छोड़ रखा है यदि ईश्वर हस्तक्षेप करके स्थापना कर देगा तो फिर वो तो ईश्वर का काम हो जाएगा वो आपको क्या कहा है मयंक जी असल में क्या है कि आप मुझे लगता है कि मेरी कुछ चर्चाओं को देख के एक लिमिटेड क्राइटेरिया को लेकर के यहां उपस्थ उपस्थित हुए और शायद मैं वो विषय ला नहीं पाया जिसके लिए आप प्रिपेयर हो के आए हैं। मुझे ऐसा लग रहा है क्योंकि बात नहीं मैं तो चाह रहा था कि पहले से हम थोड़ा डिसाइड कर ले किस पर बात होनी है। एक एक मिनट मैं जरा पूरा बात तो सर्वशक्तिमान पे ही चल रही है ना। सर्वशक्तिमान पे ही बात चल रही है। जो सर्वशक्तिमान के [गला साफ़ करने की आवाज़] लिए तर्क दिया जा रहा है। ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है। वो तर्क मुझे वहां से संतुष्टि नहीं मिल रही है। क्योंकि ईश्वर अपने सारे कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। उसका कार्य उत्पत्ति स्थिति

00:06:07:27 अब उसी उत्पत्ति में वो जीव का भी उपयोग कर रहा है। संसार बनाने के लिए जीव का उपयोग हो रहा है। चेतन का उपयोग हो रहा है। उसके बाद स्थिति में धर्म के [गला साफ़ करने की आवाज़] लिए वो जीव का उपयोग कर रहा है। उसको बता रहा है कि ये ले भाई वेद और इसको जाकर के आगे आप बढ़ाइए। तो ये उपयोग हो गया। तो वो कौन सा फिर अंतर क्या रहा? जब वो दूसरी चीजों का जो जो भी चीज एक्सिस्ट कर रही है वो उसका उपयोग कर रहा है। उसकी सहायता ले रहा है। तो अंतर क्या रहा? तो वही है ना आप सहायता का अर्थ गलत समझ रहे हैं। वही है तौर पे सहायता का अर्थ आप यह समझ रहे कि क्या ईश्वर स्वयं से बिना मूल प्रकृति के एक्सिस्टेंस के उसके बना दे रहा है या फिर स्वयं से आत्मा मैं नहीं कह रहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि मैं सहायता का अर्थ मुझे आप इस वाक्य का अर्थ बताइए कि वो बिना किसी की सहायता के करता है वो अर्थ बताइए। मैंने सहायता सिद्ध कर दी वो सब की सहायता ले रहा है। जो भी उपलब्ध है उनकी सहायता ले रहा है वो।

00:07:01:22 वही है ना सहायता तो लेता ही है ना आप समझ ही नहीं रहे सहायता लेने का अर्थ अगर आप यह करें कि भाई कुछ एक्सिस्ट ना करे मैं मैं ये नहीं कह रहा कि मैं आप ये मत बताइए कि क्या नहीं है अच्छा मैं मैं बताता हूं चलो मैं एग्जांपल दिखा एक मिनट थोड़ा टाइम क्यों लग रहा है आप यह मत बताइए कि क्या नहीं है आप ये बताइए क्या है अपनी बात बताइए आप ठीक है तो मूल प्रकृति है जीवात्माएं जीवात्माओं के लिए जो है संसार बनाना ये है ईश्वर का एक कार्य ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए जीवात्माओं की जरूरत तो पड़ेगी शरीर में जीवात्मा को डालेगा और किसको डालेगा मूल प्रकृति से ही वह संसार बनाएगा ठीक है ये कार्य मैंने डिफाइन कर दिया ठीक है अब इस कार्य को करने के लिए ईश्वर को और किसी की सहायता की जरूरत नहीं है ईश्वर स्वयं सामर्थ्य रखता है ये कार्य करने का ठीक है मैंने पूरा एक एग्जांपल किसी और और और कौन है? जीव की सहायता ले ही ली, जड़ की सहायता ले ही ली। अच्छा यह भी हो कि चलो मेरा कंट्रोल है। अगर मैं कहूं कि मेरा कंट्रोल है सहायता करना ना करने के ऊपर। ठीक है? कि भाई मैं जीव की इच्छा के बिना भी उसका उपयोग कर सकता हूं। है ना? आप वो बात नहीं कह

00:08:16:24 पा रहे हैं। मैं आपके पक्ष की ओर से। नहीं नहीं नहीं कर। नहीं नहीं ईश्वर फिर वही बात आ जाएगी ना। ईश्वर क्यों करेगा पे ही आना पड़ेगा कि ईश्वर की अगर आत्मा है मान लीजिए जीवात्मा एक्सिस्ट नहीं कर रही है ईश्वर मूर्त प्रकृति से अपना कुछ कर रहा है नहीं सुन रहे मैं क्या कह रहा हूं आपने मेरी बात समझी नहीं आप नहीं बोलने लगे पहले ही मैंने कहा कि प्रकृति निर्णय नहीं ले सकती कि मुझे उपयोग में आना है कि नहीं आना है जीव निर्णय नहीं ले सकता है कि मुझे जन्म लेना है कि नहीं लेना तो उसका क्योंकि कंट्रोल होता है इस कारण से जीव का उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता नहीं मैं संसार नहीं बनने दूंगा मैं नहीं आऊंगा। तो इस तरीके से देखा जाए तो वो स्वतंत्र रूप से ये निर्णय लेता है कि मुझे संसार बनाना है, कैसे बनाना है, आगे क्या करना है, जीव को कैसे जन्म देना है। इस तरीके से वो बिना किसी की सहायता के क्योंकि करता है अपना कार्य इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। मैंने आपकी ओर से एक पक्ष रख दिया क्योंकि वो

00:09:12:16 क्योंकि वहां क्योंकि जीव और प्रकृति दोनों उसके अधीन होते हैं। हां होते हैं। है ना? ठीक है। जीव और प्रकृति दोनों उसके अधीन होते हैं। इस कारण से यह कहा जाता है कि उसने उनकी बिना मर्जी उनसे कोई इच्छा थोड़ी ना पूछता है वो कि भाई तुझे जाना है कि नहीं जाना है संसार है ना हम तो वहां पे जो सहायता होती है वो इच्छा पूर्वक नहीं होती। मगर दिक्कत ये है जब वो पालन करता है ना स्थिति करता है। जब वो धर्म धर्म का ज्ञान देता है पालन में स्थिति में तो वो धर्म का जब ज्ञान देता है तो वहां पर उनकी इच्छा है। कि मैं इसको आगे बढ़ाऊं कि ना बढ़ाऊं। तो यह सहायता हो गई। चेतन की सहायता यहां हो गई और जड़ की सहायता वो ले ही रहा है। नहीं आपने क्या बोला लास्ट लाइन कि भाई धर्म का ज्ञान देने के लिए ईश्वर इच्छा करता है। ये बोलना चाह रहे हैं। मैंने इच्छा कहा क्या? आप बार-बार इच्छा इच्छा में फसा के दूसरी ओर क्यों ले जा रहे हैं? मैं कह रहा हूं वो कार्य वो एक कार्य करता है कि नहीं करता? उनको ज्ञान देने का, ऋषियों को ज्ञान देने का। हां बिल्कुल। ये कार्य अनावश्यक है या फिर उसके चार कामों में से एक काम है? हां आवश्यक है।

00:10:28:19 तो चार में से किसी एक में है ना वो ये अलग से एक्सिस्ट करता है। नहीं ये ईश्वर ने बनाई ही जो दुनिया वगैरह सब बनाया है जीव कल्याण के लिए और कल्याण के लिए धर्म को देना ही पड़े। पूछा चार में से मैंने पूछा चार में से किसी एक काम में आता होगा। धर्म का ज्ञान देना। चार में से अगर आप यह चार पांच ये तो फिर आप मैंने ये बोला ही नहीं कि ये चार में ये चीजें नहीं आती है। ये फिर आप समझने की गलती कर रहे हैं। ये मैंने कभी नहीं बोला। आती है। बोल दीजिए आती है चार में से। आप ये ये सवाल पहले ही पूछ लीजिए। आप इतना लंबा लाने की जरूरत नहीं है। आप पूछ लीजिए ना मुझसे पहले से ही। मतलब अब अब आप ये टॉपिक नहीं आप जो टॉपिक चल रहा है वो नहीं डिसाइड वो ये कहेंगे। आपने पहले क्यों नहीं पूछा ये है। मतलब मैं ऐसा करके आया हूं कि आपको किस किस वे में आपसे [गला साफ़ करने की आवाज़] स्ट्रक्चर में आपसे क्वेश्चन अब इस बात पर हमारी चर्चा होगी कि मैंने पहले क्या नहीं पूछा बाद में क्या नहीं पूछा मैं पूछ रहा हूं ये जो धर्म का ज्ञान है देना है ये आवश्यक कार्य है ना हां आवश्यक है हां तो अच्छा मैं एक लाइन एक लाइन बोल देता हूं एक लाइन बोल देता हूं तो उससे थोड़ा क्लेरिटी आ जाएगी ईश्वर जितने भी कार्य करता है सारे ही आवश्यक है अनावश्यक कुछ भी नहीं करता ठीक है तो ये जो धर्म का ज्ञान देना है ये

00:11:43:20 उसके चार में से एक काम में आ गया हम इसको स्थिति में मान लेते हैं पालन में किसी में मान सब में आएगा वैसे तो किसी में मान ले सृष्टि सृष्टि रचना में मान ले क्या हां सब में ही आएगा क्योंकि ईश्वर रचना के लिए धर्म सृष्टि रचना सृष्टि रचना के लिए ये ज्ञान देना आवश्यक हो गया हां क्योंकि रचना कर रचना के लिए ज्ञान देना आवश्यक नहीं रचना कर किसके लिए रहा है जीवात्मा के लिए तो कर रहा है तो अल्टीमेटली जीवात्मा के कल्याण के फिर तो जीवात्मा के आप ना आप आप खा उसको खींच रहे हैं बात को ऐसे अगर ऐसे अगर सृष्टि रचना में ही सब कुछ आ गया तो आप पालन को भी रचना में डाल दो आप प्रलय को भी रचना में डाल दो आप कर्म फल नहीं एक मिनट आप मुझे बोलने दीजिए आप कर्म फल को भी रचना में डाल दो पता नहीं क्यों स्पष्टता से दूर रहना मैंने क्योंकि मैं मैंने ठीक है मैं मैं बोल दे रहा हूं स्पष्टता से दूर नहीं मैं इस मतलब ये जो आप बोल रहे है ना हर चीज को आवश्यक कार्यों के अंदर पूरी एक उसमें डाल के चल रहा हूं। ऐसे तीन चार पांच ऐसे ये नहीं करके चल रहा हूं। इसमें इसकी आवश्यकता भी नहीं है करने की। इसलिए मैंने बोल दिया कि आप सब आवश्यकता है। पालन

00:12:58:28 सृष्टि के पालन में धर्म का ज्ञान देना एक अंग है और उसके लिए वो चेतन की सहायता ले रहा है। कि धर्म कैसे स्थापित हो दुनिया में कि चार ऋषियों को ज्ञान दो। नहीं तो सारे नास्तिक है, जानवर हैं। धर्म नहीं है, माता कौन है, पत्नी कौन है, बहन कौन है? नहीं पता। सीधी बात धर्म का ज्ञान दे रहा है और उसके लिए सहायता ठीक है। मैंने पहले ही बता दिया सहायता किस दृष्टि से ले रहा है और किस दृष्टि से नहीं ले रहा है। मैंने एक्सप्लेन कर दिया। आप आप अंतर बता दीजिए कि मनुष्य ऐसा ऐसा काम करता है। यहां पे देखिए वो बाधित हो रहा है और देखिए ईश्वर ऐसा ऐसा नहीं करता है इसलिए बाधित नहीं होता है। अंतर बताइए उदाहरण के साथ जी मतलब समझा नहीं कैसे मनुष्य क्या कर सकता है? ईश्वर क्या कर सकता है? मैंने आपने कहा ईश्वर बिना किसी की सहायता के अपने सारे कार्य कर सकता है। ठीक है? अपने सारे कार्य कर सकता है। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। अब आप मुझे उदाहरणार्थ बताइए कि मनुष्य ने ये यहां पर देखिए मनुष्य का मनुष्य कोई भी अपना कार्य बिना किसी की सहायता के नहीं कर सकता। इसलिए मनुष्य जो है बाधित है और ईश्वर सर्वशक्तिमान है क्योंकि उसने इस इस तरीके से अपना कार्य बिना किसी की सहायता के किया। वो मुझे उदाहरणार्थ बता दीजिए। उदाहरण देते हुए। हां तो

00:14:14:19 हां जीवात्मा जैसे सृष्टि रचना ही है। जीवात्मा जो है खुद से जो है मूल प्रकृति में बल या फिर कुछ मतलब मूल प्रकृति पर इन्फ्लुएंस नहीं कर सकती। खुद से ईश्वर इन्फ्लुएंस करके जीवात्मा का ये काम है। नहीं कर सकती है। मैं वही तो बोल रहा हूं नहीं कर सकती। मनुष्य का यह काम है भाई। अभी मैं पूछ रहा हूं मनुष्य के जो जो काम है वो बिना किसी की सहायता के कर नहीं कर सकता। ऐसे करके मुझे उदाहरणार्थ बताइए। जैसे उसको सांस चाहिए सांस मनुष्य को सांस लेनी है मान लीजिए तो उसको प्रकृति चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए तो वो सांस ले पाएगा। है कि नहीं? है ना? या फिर उसको इधर उधर चलना फिरना है रोटी खानी तो उसे ईश्वर से ईश्वर के द्वारा मिलने वाली शक्ति चाहिए तो वो चल फिर पाएगा अपने भोजन पान की व्यवस्था कर पाएगा तो इस तरीके से जो मनुष्य है वो निर्भर हो गया ऐसे उदाहरण उदाहरण देते हुए अंतर करिए ईश्वर ईश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में जी और

00:15:16:19 अभी तक आप सवाल पूछने केवल मुझे अभी तक सवाल पूछने का मौका दिया नहीं अभी समझ रहे हैं आप उस मेरा क्वेश्चन अभी तक एक भी नहीं आया अब मेरा भी तो अवसर आना चाहिए क्या मैं पूछूं कुछ सवाल आप सर्वशक्तिमान पे मैं ही सर्वशक्तिमत्ता का हमारी जो बात है वो तो खत्म हो गई जो हमारी बात है वो तो रह गई

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00:15:55:00 [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 15:57 · 21 Jul 2026

क्या आर्य समाज का ईश्वर अपना कार्य करने के लिए किसी की सहायता नहीं लेता?

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A · Live सर्वशक्तिमान और अवतार Live discussion with Arya Samaji
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