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00:00:03:01 अब जो है मैं थोड़ा सा इनके भाष्य पर बात करने वाला हूं। तो अब आप सीट की पेटियां बांध लें थोड़ा सा। बहुत रोचक चीजें आपके सामने आने वाली हैं। मैं बस दो चार उदाहरण दूंगा। बहुत ज्यादा मैं उसमें नहीं जाना चाहता हूं। और मुझे थोड़ा सा पढ़ने में असहज भी है कहीं-कहीं पर पर क्षमा करिए। भाई वो उदारता जो आपके अस्तित्व और आदर्श को नष्ट करने के लिए बाध्य करे। वह उदारता उदारता नहीं कायरता कहलाती है। इसलिए मैं पहले से ही क्षमा प्रार्थी हूं। पर अब मुझे पढ़ना पड़ रहा है। जिस तरीके से इन्होंने पढ़ करके वो एक नफरत का गेम खेला कि अवतार इसलिए नहीं हो सकता कि देखिए इन्होंने कितना गंदा गंदा लिखा है। तो अब मैं थोड़ा सा इनकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहा हूं। ठीक है? तो [गला साफ़ करने की आवाज़] दयानंद जी अपने यजुर्वेद के भाष्य में लिखते हैं अध्याय 25 मंत्र सात। उसमें लिखते हैं हे मनुष्यों तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुद्द्रियों के साथ वर्तमान अंधे सर्पों को गुद्द्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से जलों को नाभि से नीचे के भाग से जलों को नाभि के

00:01:18:02 नीचे के भाग से अंडकोष को आंडों से ठीक है घोड़े के गुप्तांग की बात भी हो रही है। वीर से संतान को यह सब बात हो रही है। ठीक है? थोड़ा पढ़ने में असहजता है। आप लोग स्वयं पढ़ें। दयानंद जी के द्वारा जो भाष्य किया गया है यजुर्वेद अध्याय 25 मंत्र सात। अच्छा इसमें कई बातें की गई हैं। एक मैं प्रश्न बता देता हूं। समीक्षा कर रहा है जो उन्होंने समीक्षा में एक प्रश्न उठाया है कि अब दयानंद जी हमें बताएं कि अंधे सर्पों को अंधे सर्पों को गुदा द्वार में घुसाने और कुटिल सर्पों को आंतों से लेने की आज्ञा क्या ईश्वर देता है? इसमें एक प्रश्न और उठाया गया है। थोड़ा पढ़ने में असहजता है और आगे भी जो आने वाले हैं उनको भी पढ़ने में असहजता है। फिर भी मैं प्रयास करूंगा आपको बताने का। अच्छा अब दयानंद कृत जो यजुर्वेद भाष्य है अध्याय 25 और मंत्र एक उसमें क्या लिखा है हे अच्छे ज्ञान की चाहना करते हुए ज्ञानी जन

00:02:23:15 वीर्य को अच्छे प्रकार धारण करने हारे बोलना मुश्किल है थोड़ा पता नहीं दयानंद जी ने कैसे लिख दिया वीर बरसाने वाली अंग वीर बरसाने वाला जो अंग है अब समझ लीजिए गुप्ता ंग की बात हो रही है। उसके मुख से चारों ओर जो केश है मुख के चारों ओर जो केश है वीर वर्षाने वाला जो अंग है गुप्तांग उसको मुख के चारों ओर जो केश है अर्थात दाढ़ी उससे वह पदार्थ अच्छे प्रकार से ग्रहण करने चाहिए। अब ये यहां क्या कहने चाह रहे हैं? दाढ़ी के आसपास जो है जो केश है और वीर से आने वाला जो वीर वाला जो पदार्थ है

00:03:06:26 दयानंदी बताएं कि दयानंद अपने दयानंद जी अपने भाष्य के द्वारा वीर्य वर्षाने वाला जो अंग है गुप्तांग है और दाढ़ी से ऐसा कौन सा ईश्वरीय ज्ञान बांट रहे हैं ठीक है यह प्रश्न उठता है यह मैं पीडीएफ डाल दूंगा जो लिखी हुई है आगे चलते हैं और क्या लिखा है [गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे पुरुष का गुप्तांग मैं यहां पर दूसरे शब्दों का उपयोग कर रहा हूं क्योंकि मुझे पढ़ने में असहजता हो रही है। जैसे पुरुष का गुप्तांग स्त्री के गुप्तांग में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है। यह है यजुर्वेद 19 76 यजुर्वेद 1976 जैसे पुरुष का गुप्तांग स्त्री के गुप्तांग में प्रवेश करता हुआ वीर्य को छोड़ता है और इससे अलग मूत्र को छोड़ता है। इससे जाना जाता है कि शरीर में मूत्र के स्थान से पृथक स्थान में वीर्य रहता है। यह वैज्ञानिक भाष्य है दयानंद जी का। तालियां बजाइए। प्रामाणिकता दयानंद जी की। यजुर्वेद 1988 क्या लिखा है? इसमें ये कर रहे हैं। हे मनुष्यों जैसे जिससे रस ग्रहण किया जाता है। वह वाणी के समान स्त्री इस पति के सुंदर अवयवों से विभक्त सिर के साथ सिर करे तथा मुख के समीप

00:04:22:04 पवित्र मुख करे। इसी प्रकार गृह आश्रम में के व्यवहार में व्याप्त स्त्री पुरुष दोनों ही वर्तें तथा जो इस रोग से रक्षक वैद्य और बालक के समान वास करने का हेतु पुरुष उपस्थेंद्रिय यहां पर गुप्तांग को बल से करने हारा होता है। वह शांति करने के समान वर्तमान में संतान उत्पत्ति का हेतु होवे। यहां मतलब बता रहे हैं कि किस प्रकार से पति को पत्नी के साथ रमण करना है। वैज्ञानिकीकरण भाष्य दयानंद जी बता रहे हैं वेदों में। ठीक है? अच्छा आगे चलते हैं। आगे है यजुर्वेद 28 32। इसमें क्या लिखा हुआ है? दयानंद जी के भाष्य में हे मनुष्यों जैसे बैल गायों को गाभिन करके पशुओं को बढ़ता बढ़ाता है वैसे गृहस्थ लोग स्त्रियों को गर्भवती कर प्रजा बढ़ावे। यजुर्वेद 216 इसमें लिखा है हे मनुष्यों प्राण और अपान के लिए दुख विनाश करने वाले छेरी आदि पशु से वाणी के लिए मेढा से और परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करें। वाणी के लिए मेंढक से भोग करिए। परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करिए। और

00:05:38:24 दुख का विनाश करने के लिए छेरी आदि पशु से भोग करिए। यह लिखा है दयानंद जी के भाष्य में है ना भोग करिए भोग बैल के साथ भोग करिए आर्य समाजियों के यहां पर ये चीजें लागू होती है मैं पूछना चाह रहा हूं आगे चलते हैं यजुर्वेद 148 स्वामी जी लिखते हैं स्त्री पति से और पति अपनी स्त्री से कहे कि हे स्त्री तू मेरे नाभि के नीचे गुेंद्रिय मार्ग से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर। अपान वायु समझते हैं फार्ट कहते हैं ना इंग्लिश में। और हिंदी में क्या कहते हैं? आप लोग समझ रहे होंगे। अपान वायु जो वायु निकलती है निचले द्वार से उसकी रक्षा करेगी कौन? पत्नी। यह कहा जा रहा है। हे स्त्री तू मेरे गु्दिय से निकलने वाली अपान वायु की रक्षा कर। आगे चलते हैं। यजुर्वेद छ 14 क्या लिखते हैं स्वामी जी? हे शिष्य मैं तेरी वाणी नेत्र नाभि जिसे मूत्रोत्सर्ग आदि किए जाते हैं। उस गुप्तांग यहां पर दूसरा शब्द लिखा हुआ है। मैं बचा के चल रहा हूं थोड़ा।

00:06:54:12 को तेरे गुद्दिय के लिए शुद्ध करता हूं। यहां पर गुरु जो है शुद्ध कर रहे हैं। गुेंद्रदिय को गुप्तांग को ये हो क्या रहा है? और वहां भाष्य में दयानंद जी यह भी लिख रहे हैं गुरु और गुरु पत्नी दोनों कर रहे हैं। शिष्य की गुप्तांग को गुेंद्रियों को शुद्ध कर रहे हैं। सफाई कर रहे हैं वहां की। यह सब शुद्ध करता हूं। ठीक है? चलिए आगे चलते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] यजुर्वेद 3021 इसमें लिखा हुआ है बंदर किसी छोटी आंखों वाले शीत प्राय देसी मनुष्यों को पीली आंखों वालों को उत्पन्न कीजिए। को गंजे को काले रंग वाले पीले नेत्रों से युक्त पुरुष को दूर कीजिए। ठीक है? यहां क्या हो रहा है? को दूर करो।

00:07:51:03 और आप एक और कहते हैं कि हमने अत्याचार किया है। उनको तो कुछ नीच कुल की की गंध इत्यादि ये सब कहा है उन्होंने कि की गंध आती है उसको दूर रखो मुझसे। यह सब स्वीकार किया है। और स्त्री पुरुष में भेद क्या दयानंद जी ने नहीं किया। वो कह रहे हैं कि जब अगर नियोग की बात करूं तो नियोग के बारे में आपको कुछ बढ़िया चीजें आपको बता दूं। सबसे पहली बात है कि नियोग का आदेश कहां पर भी दिया जा रहा है? हे विध्व नारी तू इस मरे हुए पति जो है मरा हुआ पड़ा है सामने वो विलाप कर रही है। वहां की बात है। इस मरे हुए पति की आशा छोड़ दे। छोड़ के बाकी पुरुषों में से जीते हुए दूसरे पति को प्राप्त हो। इस बात का विचार कर और निश्चय रख कि जो तुम विधवा के पुनः मतलब पति वहां सामने लेटा हुआ है मृत्यु शैया पर उसको छोड़ और आसपास जो जीवित लोग हैं उनमें से किसी को पति बना मतलब नियुक्त कर नियोग के लिए पति तो ना बना और फिर जो है उसके साथ अपना वो जो आगे की प्रक्रिया

00:09:06:07 है उसमें आप लिप्त हो जाइए यह इनका कहना है। देवर उसको कहते हैं जो विधवा का दूसरा पति होता है। इन सब चीजों का खंडन करते हैं हम और यह कह रहे कि आपके यहां पाप लिखा है। देवर उसको कहते हैं जो विधवा का दूसरा पति होता है। चाहे वह छोटा भाई हो या बड़ा भाई हो अथवा अपने वर्ण का वह अपने से उत्तम वर्ण वाला हो जिससे नियोग करे उसी का नाम देवर लो ये है देवर और ये लोग क्या कहते हैं कि हमने जो है सम्मान दिया है वो जो रानी थी लक्ष्मीबाई पद्मावती इन सब का नाम लेते हैं। में से कितनी कितनों का आप आप जो है नियोग स्वीकार करते हैं जितनों का आपने अपनी वीडियो में नाम लिया है अरे अच्छा हुआ आपकी विचारधारा उस समय नहीं थी नहीं रानी लक्ष्मीबाई और पद्मावती का आप नियोग करवा देते वहां पर उन्होंने तो जौहर कर लिया था आप कहते जौहर मत करो संतान प्राप्ति करो नियोग करके ये जो अलाउद्दीन खिलजी आ रहा है संतान प्राप्त करो भाई आप तो ये करते वहां पर नियोग करवाते आप वहां पर जहां से ईरानी लक्ष्मीबाई का नियोग करवा करवाते आप यही है ना आपके यहां पर स्त्रियों का अधिकार नियोग करवाना उनका बात

00:10:21:15 करते हैं तो कितनी ज्यादा लालसा है नियोग करवाने की देखिए आप और क्या है इसमें 11 पतियों तक बताया कि उसका क्या नाम होगा कहां से कहां तक सत्यार्थ प्रकाश पढ़ रहा हूं और देखिए संतान उत्पत्ति में असमर्थ होवे। अच्छा एक चीज और है कि अग्निव्रत जी नियोग को आपत धर्म मानते हैं। जबकि वहां पर जो दयानंद जी वो तर्क दे रहे हैं कि प्रवृत्ति होती है। प्रवृत्ति होती है व्यक्ति की जो उसके अंदर स्वाभाविक भी दिए हैं मैथुन के प्रति आकर्षण। उसकी बात की है दयानंद जी ने। तो जब उन्होंने यह बात की प्रवृत्ति होती तो यहां पर आपत धर्म तो खत्म हो गया। तो प्रवृत्ति से निवत्ति का मामला आ गया। दूसरी बात यह है कि क्या केवल संतान प्राप्ति के लिए जो एक बार रमण होगा उससे काम चल जाएगा प्रवृत्ति का उससे काम हो जाएगा। प्रवृत्ति से निवृत्ति के लिए आप जो है नियोग करवाते जा रहे हो। एक छूटा दूसरा गया, दूसरा गया, तीसरा आया, तीसरा गया, चौथा आया, चौथा गया, पांचवा आया, पांचवा गया, छठवा आया, छठवा गया, सातवा आया, सातवा गया, आठवां आया। यह धर्म लिखा हुआ है

00:11:36:24 और कितने आप लोग नियोग करवा रहे हो अपने यहां यह बता एक तरफ मांसाहार मांसाहार में आपको दिखाई नहीं दे रहा कि प्रवृत्ति से निवृत्ति के लिए हो सकता है। मगर यहां आप जो है एक से एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा तीसरे बाद चौथा व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनवा बनवाते जा रहे हो और फिर बात कर रहे हो कि भैया जो है इतना ऐसा कैसे हो सकता है कोई मांस खाने की आज्ञा कैसे दे सकता है यहां अनेक स्त्री पुरुषों का आप संबंध बनवाने की आज्ञा दे दे रहे हो अरे भाई जो सुनने में अच्छा ना लगे क्यों जोड़ रहे हो शास्त्र से क्योंकि हमें तो पहले से ही पता है ना धर्म क्या है फिर क्यों जोड़ रहे हो फिर यहां पे आप बाउंड हो जा रहे हो कि नहीं नहीं जो शास्त्र शास्त्र से धर्म धर्म पता चलेगा। एक जगह कह रहे हो कि मुझे धर्म पता है। मैं जो अच्छी चीज बताऊंगा वो धर्म शास्त्र का अर्थ होगा। और दूसरी जगह कह रहे हो कि नहीं नहीं हमें धर्म पता नहीं है। शास्त्र से धर्म पता होगा। ये क्या है? इसे कहते हैं दोगला पद।

00:12:34:02 तो भर भर के इनके में प्रमाण है। मैं और दे देता हूं। दयानंद जी के जो बहुत बढ़िया बढ़िया सुंदर वो हैं और ऐसी भी जीवनी में कई चीजें हैं। मुर्दे को निकाला मुर्दे को जांच के लिए निकाला ये किया वो सब किसी और भाग में अगर आवश्यकता पड़ी तो आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा। ऐसा भी आया है कि वो कोई कुछ व्यसन था उनको जिसका सेवन करते थे। तो यह सब चीजें भी अभी अगर आवश्यकता पड़ी तो अगले भाग में लाऊंगा। आज केवल इनके भाष्य पर ही बात होगी। वो आप देखते जाइए। ऋग्वेद हे स्त्री ऋग्वेद अह मंडल 10 सूक्त 85 और मंत्र 40 इसमें वो लिखते हैं हे स्त्री जो तेरा प्रथम पहला विवाहित पति तुझको प्राप्त होता है उसका नाम सुकुमार सुकुमारता आदि है। गुण युक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग होने से प्राप्त होता है वह गंधर्व एक स्त्री से संभोग करने से गंधर्व जो तृतीय दो के पश्चात तीसरा पति हो होता है वह अग्नि और इसी तरीके से आगे इनके नाम बताए गए हैं। 11वीं 10 तक पति हैं

00:13:49:18 वैसे ही पुरुष भी 11वीं स्त्री तक नियोग कर सकता है। 11 पुरुषों तक नियोग कर सकते हैं। और अगर बाहर जाने की वजह से नियुक्त कर रहे हैं ना कि वह चला गया कहीं तो उसमें सिस्टम यह है कि अगर आपने किसी को नियुक्त कर लिया और अगर वह जो बाहर गया वापस आ जाएगा तो जिसके जिसको आपने नियुक्त किया है उसको आप तब छोड़ दो वो वो हटा दिया जाएगा नियुक्ति से वापस पुराने वाले पति के साथ पुराने वाला पुराना व्यवहार शुरू हो जाएगा। क्या बात है मांसाहार को लेकर के आप लांछन लगाते हो जो पहली सत्यार्थ प्रकाश छपी थी अभी प्रमाणिकता परंपरा तो है नहीं आपके यहां कौन प्रमाणिक है कौन नहीं तो पहली सत्यार्थ प्रकाश में मासाहार भरभर किताब किसी दिन अगले भाग में हम लोग मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा यदि आवश्यकता पड़ी तो अभी केवल थोड़ा सा ट्रेलर दे देते हैं। है ना

00:14:40:12 ऋग्वेद मंडल 10 सूक्त 85 मंत्र 45 इसमें क्या है? वीर सेचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष तू इस विवाहित स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर इस विवाहित स्त्री में 10 पुत्र उत्पन्न कर और 11वीं स्त्री को मान हे स्त्री तू भी विवाहित पुरुष व नियुक्त पुरुषों से 10 संतान उत्पन्न कर और 11 पति को समझ बार-बार 10 11 10 11 10 11 के बिना तो काम ही नहीं चलेगा ना बताइए पत्नी को पति कह रहा है गुदा द्वार से जो अपान वायु निकलती है उसकी रक्षा कर यह भाष्य इनके वैज्ञानिक भाष्य प्रामाणिक भाष्य फिर आगे इसी तरीके से और भी भाष्य मनुस्मृति इत्यादि की भी बोलिया है तो मैं इतना पर्याप्त समझता हूं और काफी चीजें बातें बता दी है और इसके अलावा कहीं पर लिख रहे हैं शूद्र को वेद पढ़ाने चाहिए कहीं पर लिख रहे हैं नहीं पढ़ाने चाहिए यजुर्वेद 26 दो शूद्र को अनार्य लिख रहे हैं आर्य है ही नहीं शूद के लिए कोई जगह नहीं है आर्य समाज तो शूद्र का तो अस्तित्व ही मिटा देना चाहता है जो आर्य समाज है वास्तविकता में देखा जाए क्योंकि उसके अनुसार जो भी है जाएगा आर्य समाज में गायत्री मंत्र पड़ेगा जो गायत्री मंत्र पड़ेगा जनेऊ धारण करेगा जने धारण करेगा शद्र है ही नहीं ईश्वर कह रहे हैं

00:15:55:15 26 दो के अनुसार यजुर्वेद 26 दो का जो भाष्य वो किया है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सबके लिए जो वेद है वेद का उपदेश है और सब पढ़ सकते हैं तो सब पढ़ सकते हैं तो शू शद्र भी पढ़ सकता है तो शू शद्र वो है जिसका जन्म नहीं होता शूद्र वो है या तो ये मान लो कि जन्मना वर्ण व्यवस्था है तब तो माना जाएगा कि हां भाई आप जन्म से मानते हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र और तब आप कह रहे हैं कि हां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी के लिए हुआ है। और अगर कर्मणा मानते हैं तो कर्मणा तो फिर शद्र शद्र जो है उसकी गति हो ही नहीं सकती। वो तो जैसे ही उसको अधिकार प्राप्त होगा वेद पढ़ने का वैसे ही वो द्विज हो जाएगा। ठीक है? यह है इनके वैज्ञानिक भाष्य। पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि गुदा द्वार से निकलने वाली जो अपान वायु है उसकी रक्षा कर। और वो अंधा सांप पता नहीं क्या है। बैल से भोग। अब यह सब चीजें हैं जो मेरा कभी भी मंतव्य नहीं रहा है क्योंकि अगर इस तरह से हम लोग चर्चा करेंगे इन चीजों पर अंतहीन चर्चाएं चलती रहेंग बात अलग है हमारा ही पक्ष मजबूत है उसमें भी मगर बहुत लॉन्ग प्रोसेस है इसलिए मैंने कहा था तीन चीजों पर बात कर लो सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र शाश्वत धर्म जिसके पास है उसकी बात सारी मान ली जाएगी हिंदू शब्द भी मान लिया जाएगा हिंदू शब्द गलत है मान

00:17:10:16 लेंगे भाई तुम्हारा भेदभाव सही है मान लेंगे भाई चीजें सिद्ध तो करो अपनी खैर मुझे लगता है मैंने पर्याप्त चीजें दे दी है और यह सारी चीजें इनके यहां भरी पड़ी है और यह कहते हैं हमारा प्रामाणिक है सुंदरता वैज्ञानिक है और इसलिए आप हमारे को मान लो जबकि अर्थ से प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिकता से अर्थ प्रामाणिक सिद्ध होता है। ठीक है? अर्थ सुंदर होने से अर्थ की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती है। प्रामाणिक जब उसकी प्रामाणिकता सिद्ध होती है तब वो अर्थ मान्य होता है। ठीक है ना? चलिए समय देने के लिए सभी को आभार और किसी को भी अगर वैचारिक मतभेद के निमित्त चर्चा करनी हो तो वह संपर्क कर सकता है। जय श्री राम सभी को।

00:18:04:20 [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 18:06 · 03 Jul 2026

वेदों पर दयानंद भाष्य में वैज्यानिकता या अश्लीलता?

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