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00:00:01:06 मधवाचार्य परंपरा की ओर से प्रामाणिक रूप से एक विश्वविद्यालय में अध्ययन करा रहे हैं। कई ऐसी कालनीमी संस्थाएं हैं मधवाचार्य परंपरा का नाम लेकर के बहुत सारा उसमें मिलावट करके और जो है प्रस्तुत कर रही हैं। ये इसका इसका इतना इतना सरल तरीका से इसका उत्तर नहीं दे सकते। जो श्रीमद् भागवत है आपके यहां पर उसका भाष्य कौन सा पढ़ा जाता है मधवाचार वर्ण का? स्कॉन यह दावा करता है कि वह जो तात्पर्य बता रहा है ग्रंथों का वो एज इट इज बता रहा है। उसने अपनी भगवत गीता का नाम भी एज इट इज रखा है। विष्णु भी भगवान नहीं है। क्या इस प्रामाणिक रूप से मदवाचार परंपरा से जुड़ा हुआ है? प्रामाणिक रूप से चातुर्व्यमया सृष्टम गुणकर्म विभाग

00:00:48:21 तो सभी को जय श्री राम। आज बड़ा ही पावन दिन है और हम बहुत ही सौभाग्यशाली हैं जो आज हम अ पावन सानिध्य में हैं श्री मधवाचार्य जी महाराज के जो प्रामाणिक वैष्णव परंपरा में से एक मानी जाती है और हम इस समय हरिद्वार में हैं और यहां पर मधवाचार्य जी का आश्रम है और उनकी परंपरा का प्रामाणिक जो है यह मंदिर है जिसमें हम लोग बैठे हैं इस समय और हमारे साथ हैं आचार्य गौतम जी जो मधवाचार्य परंपरा के प्रामाणिक शिष्य हैं और प्रामाणिक रूप से उन्होंने अध्ययन किया है जो हमारे पूज्य अभी परलोक गमन कुछ छ वर्ष पूर्व हुआ है जिनका चित्र आप पीछे देख रहे हैं हमारे और वर्तमान में उनके उत्तराधिकारी जो हैं। वह परंपरा का नियंत्रण कार्यभार संभाल रहे हैं। तो आचार्य गौतम जी आपको सबसे पहले जय श्री राम। जय श्री राम। थोड़ा सा आप अपने से हमारे दर्शकों को अपना परिचय

00:02:04:02 थोड़ा सा दे दीजिए। जी मेरा नाम आचार्य गौतम है। मेरा परिचय मैं यदि एक लाइन में मैं यदि कहना चाहूंगा तो मैं पेजावर स्वामी जी का मैं शिष्य हूं। यह इतना ही मतलब मेरा परिचय में मैं बहुत संतुष्ट हूं क्योंकि हमारे जो हमारा जो अध्ययन है वह पूर्ण प्रज्ञा विद्यापीठ करके बेंगलुरु परजावर स्वामी जी का गुरुकुल है वहां हुआ था तो हम उस अध्ययन के बाद हमें मतलब ऐसा एक मतलब पूर्णता की ओर हम बढ़ रहे हैं मतलब इतना एक विश्वास अंदर से आ गया था तो इसके लिए बस एकमात्र कारण है हमारे जो गुरु जी हैं यहां उनके सानिध्य पर हमारा जो अध्ययन हुआ था तो वही कारण हैं। तो हम उनसे विशेष कृपा की कारण से मतलब हमने उनसे वेदांत शास्त्र का अध्ययन भी करने के लिए एक औचित्य हमें मिला। अवकाश मिला और न्याय दर्शन भी हमने वहां गुरुकुल में अध्ययन किया और संस्कृत तो है ही है। तो ऐसे ही इतना अध्ययन करने के लिए अभी भी हम मतलब जो जिस परंपरा में आए थे तो गुरु ने मतलब जो एक उपदेश हमें दिया मतलब जो अह कभी भी मतलब जो अध्ययन अध्यापन

00:03:19:08 से दूर नहीं जाना चाहिए। तो इसीलिए हम आज भी विश्वविद्यालय पर मतलब हम अध्यापक के रूप में शिक्षक के रूप में हम वेदांत दर्शन को माधव परंपरा से जो शास्त्र है उनको हम पढ़ा ही रहे हैं। हम मतलब मधवाचार्य परंपरा की ओर से प्रामाणिक रूप से एक विश्वविद्यालय में अध्ययन करा रहे हैं। व्याख्याता हैं न्याय दर्शन के और वेदांत के और यहां पर सीधे तौर पर जो यह आश्रम और मंदिर आप देख रहे हैं जहां हम इस समय बैठे हुए हैं उसकी जो प्रामाणिक कार्यकारिणी है उससे सीधे तौर पर यह सद्ध है। तो ऐसे पावन सानिध्य में मधवाचार्य जी के मंदिर में और वर्तमान के जो मधवाचार्य जी उनके द्वारा सीधे जो संचालित मंदिर आश्रम है उसके पावन सानिध्य में बैठकर के आज हम थोड़ा सा मार्गदर्शन प्राप्त करेंगे। मधवाचार्य परंपरा के आलोक में कुछ सनातन सिद्धांतों को समझने का प्रयास करेंगे। तो आचार्य जी सबसे पहली बात तो एक यह आती है कि कई ऐसी कालनीमी संस्थाएं हैं जो मधवाचार्य परंपरा का नाम लेकर के बहुत सारा उसमें मिलावट करके और जो है प्रस्तुत कर रही हैं। तो

00:04:35:03 और विशेष रूप से उनका जो एजेंडा है वह वर्ण व्यवस्था का जो एक जो हमारी जो जितने भी प्रामाणिक संप्रदाय हैं कोई भी संप्रदाय हो वर्ण व्यवस्था को लेकर के जिस तरह से सभी अटल हैं तो मधवाचार परंपरा का ही नाम लेकर के और वर्ण व्यवस्था का बिल पर आघात पहुंचाया जा रहा है। तो इसके लिए सबसे पहले तो मैं ये समझना चाहूंगा कि वर्ण व्यवस्था मधवाचार्य संप्रदाय जन्म से मानता है या कर्म से। जी तो ये बहुत ही आज का ये इस विषय पर चर्चा हो ही रहा है। केवल ये आधुनिक जो हमारे जो सनातन परंपरा के नाम से जो विचारधारा में आ रहे हैं वही नहीं है। जो सनातन संस्कृति को जो विरोध करने वाले लोग भी इसी के ऊपर चर्चा कर रहे हैं। जी जी तो इस पर इसका प्रारंभ तो सभी लोगों का मतलब जो चर्चा के लिए आधारभूत सभी लोग ये मानते हैं गीता का जो वो श्लोक है चातुर्वर्णमया सृष्टं गुणकर्म विभागशा तो यही प्रारंभ के रूप में मानते हैं तो इस पर इसकी व्याख्या करते समय एक अंश को देखना पड़ेगा हमें उसमें गुण और कर्म दो भाग लिया है तो ये दोनों क्या है एक गुण शब्द का अर्थ क्या है

00:05:50:09 गुण का मतलब वहां है स्वभाव तो यह एक स्वाभाविक वर्ण व्यवस्था को मानते हैं और कर्म मतलब जो आचरण की दृष्टि से तो इसमें क्या है एक हो गया आंतरिक विचार एक हो गया बाह्य विचार तो इसमें सामान्य रूप से हम देखें सामान्य रूप से हम जानते हैं ब्राह्मण का जो उचित धर्म क्या है जो आचार्य भी कहते हैं मतलब ब्राह्मणों का उचित धर्म है अध्यापन है अध्ययन अध्यापन है और क्षत्रियों का उचित धर्म है प्रजा पालन है और वैश्यों का उचित धर्म है वार्ता है मतलब वाणिज्य है और शूद्रों कचित कर्म है, सुश्रोष है। तो इसमें यह विभाग फिर किस आधार पर किया? मतलब जो गुण के आधार पर किया या कर्म के आधार पर किया या इसके और आगे जाके मतलब एक शब्द बोलना चाहूंगा तो मतलब जाति के आधार पर किया क्या? मतलब इन तीनों में अंतर क्या है? ये एक बार देख लेंगे तो हमें लग रहा है मतलब स्पष्ट हो जाएगा। जी जी। तो ये स्वभाव एक होता है। हर व्यक्ति का अपना ही एक स्वभाव। जीव का एक जीव योग्यता शब्द कई जगह पर आचार्य जी ने किया है तो श्रीमद आचार्य ने किया है तो उसमें क्या है जीव योग्यता पर स्त्री पुमत्व है मतलब स्त्री है पुरुष है ऐसे विभाग है पहले से और उनके मतलब जो आश्र वर्ण की व्यवस्था भी मतलब पहले

00:07:05:10 से विदित है परंतु ये सब कैसा है मतलब जीव योग्यता के आधार पर वो व्यक्ति हर बार जन्म लेता नहीं क्योंकि कई बार क्या है कर्म के वश से मतलब कई बार अलग-अलग प्रकार के जन्म लेना पड़ता है। जैसे हमने कई पुराणों में देखा है देवता जितने भी देव है मतलब जो देवता गण है वो सामान्य मनुष्य के रूप में मतलब अवतार लेते हैं क्योंकि उनको मतलब किसी वर के कारण से लेना पड़ा किसी शाप के कारण से लेना आ गया वहां कर्म आ गया वहां पे तो इसीलिए क्या है ऐसे कर्म के वजह से और दूसरी बात हमें यह देखना पड़ेगा वो जन्म लेने के वजह से ही वो उसी वर्ण के हैं मतलब ऐसे नहीं हो सकते मतलब इसमें दोनों मतलब मैं उस प्रश्न पर मैं बाद में आऊंगा मतलब जो यदि मतलब उस ब्राह्मण परिवार पर उनका जन्म हुआ तो क्या मतलब इस प्रश्न का मैं बाद में आऊंगा तो उससे पहले ये उनका स्वाभाविक दृष्टि से वो कौन है जैसे हम भीष्माचार्य को देखा वो वसु का एक अवतार है मतलब परंतु वो यहां पे मतलब किस तरीका से रह रहे हैं मतलब जो उसको देख के मतलब उस व्यक्ति की योग्यता क्या है ये हम निर्णय नहीं कर सकते एक बात है पहले और इसमें जो गुण कर्म ये दोनों परस्पर संबंध है। जी जी जब जो जिसका गुण है, स्वभाव

00:08:20:21 है उनका कर्म भी वैसे होगा। तो सामान्य रूप से आप देखिए ब्राह्मणों का स्वभाव क्या होता है? मतलब अध्ययन अध्यापन जो क्रोध कार्य से लेकर विशेष ज्ञान से संबंधित जितने भी कार्य कर रहे हैं वह सामान्य रूप से ब्राह्मण मतलब स्वभाव से हैं। तभी तो मतलब वो कर पा रहे हैं। मतलब ये कर्म को ऐसे मान सकते हैं कि प्राथमिक जो किसी को पहचान करनी है कि अरे वो अध्यापन कर रहा है। हो सकता है ब्राह्मण होगा। मगर ये इसका इसका इतना इतना सरल तरीका से इसका उत्तर नहीं दे सकते हैं। भाई ये मैं कहना चाह रहा था इसका उत्तर मैं दे रहा। इसका मैं अभी बता देता हूं। प्रश्न आ गया तो अब जैसे मान लीजिए कोई व्यक्ति ब्राह्मण परिवार पर आ गया तो उनको क्या मानना चाहिए? उनको ब्राह्मण मानना चाहिए या क्या मानना चाहिए? क्योंकि उनका वृत्ति कुछ और हो गया। मान लीजिए वो बिज़नेस कर रहा है वो तो उनका वैश्य वृत्ति मानना पड़ेगा या ब्राह्मणवत्ति मानना पड़ेगा क्योंकि उनका उन्होंने अध्ययन तो किया परंतु अध्ययन पर इतना मतलब उनको कुछ ऐसे नहीं हुआ। तो उनको मतलब जो उनका बिजनेस पर बहुत पकड़ आए तो इसीलिए तुरंत वो बिजनेस पर चले गए। को इसीलिए बिजनेस तो इस संदर्भ में उनको क्या देखना चाहिए तो इसमें एक बात और मधवाचार्य जी कहते हैं तो ब्राह्मण पर दो कैटेगरी ले आते हैं वो ब्राह्मण एक है और ब्रह्म

00:09:36:02 बंधु एक है मतलब जो ब्राह्मण परिवार पर आने के बाद भी जो ब्राह्मण धर्म को पालन नहीं करते वो ब्रह्म बंधु बनते हैं ब्राह्मण नहीं बनते और उनको वेदाधिकार को मना किया मधवाचार्य जी ने पतित हो गए हां पतित हो गए श्री शूद्र ब्रह्म बंधु नाम त्रण श्रुति गोचरा मतलब श्रुतिचर उनको बिल्कुल नहीं होना चाहिए। वो भागवत में भी है कि जो अपने कर्म से पतित हो जाएगा। पहले ही इस अध्याय में एक जगह पर है एक प्रह्लाद के संदर्भ में एक है खुद वो कहते हैं मतलब ऐसे अनेक संदर्भ यानी कि इसको कहेंगे कि वैश्यचित ब्राह्मण जो हमारे यहां पर इसको ये कहा गया है कि जो वैश्य की वृत्ति उसने ध्यान ली जन्म से ब्राह्मण है। आपके यहां ब्राह्मण बंधु कहा गया। हमारे यहां उसको गुरुदेव कहते हैं वैश्योचित ब्राह्मण। जी तो उसमें शब्दों में अंतर है उनका क्योंकि स्वभाव क्या है वैश्य का स्वभाव है तो इस वजह से उनका कर्म पर दिख जाता है ये किस स्वभाव से जुड़े हैं यह वास्तविक रूप में क्या है परंतु कई बार क्या हो जाता है यह मैं ही ये कहना चाह रहा था कर्मवश से कई बार लोग अच्छे काम करते हैं मतलब जो कोई पढ़ाई में बहुत अच्छा कर रहा है ब्राह्मण परिवार में आया है जरूरी नहीं कि मतलब ब्राह्मण होना चाहिए तो इसलिए क्या है उनका स्वभाव अंदर से किसी कर्मवश से बदलता भी है तो इसलिए हमें कोई जीव योग्यता पर कभी

00:10:51:03 प्रश्न नहीं उठना चाहिए। परंतु फिर इसका मतलब जो आजकल जो हम आचरण कर रहे हैं जो जितने भी बहुत बड़े लोग आते हैं किसी ने भी कुछ भी चुन लिया हां तो क्या है ब्राह्मण परिवार पर जो आए हैं उनके लिए अलग-अलग संस्कार करते हैं तो इसका महत्व क्या है तो ये भी एक देखना पड़ेगा क्योंकि ये भी मतलब दुराचार तो नहीं हो सकता तो इसलिए इस पर भी कोई आस्था होनी चाहिए आस्था है तो मतलब इसके इसके पीछे भी कारण रीजनिंग होगा तो इसके लिए यदि हम देखें जैसे योग दर्शन आदि पर हम देखते हैं जो योग दर्शन को लोग आजकल मतलब योग के नाम से सभी लोग शारीरिक पुष्टि के बारे में सोचते रहते हैं। वास्तविक रूप में वहां शारीरिक पुष्टि का मतलब दो सूत्र ज़्यादा से ज़्यादा बोला है महर्षि पतंजलि ने। बाकी सब आंतरिक विचार के बारे में उन्होंने कहा है। परंतु फिर शारीरिक विचार को क्यों कह रहे हैं? आजकल इतना मतलब उसका प्रभाव क्यों आ गया? क्योंकि जब तक शारीरिक दृष्टि से आप स्थिर नहीं होंगे तब तक आप मानसिक दृष्टि से स्थिर नहीं हो सकते। जैसे मान लीजिए अभी हम बैठ के बात कर रहे हैं। क्यों बैठ के क्यों बात करना था? आराम से चलके बात कर सकते थे। परंतु चलने पर मन विचलित होने का कारण है। इसलिए पहले शरीर को स्थिर करना पड़ेगा। इसी दृष्टि से शारीरिक दृष्टि से जब हम ब्राह्मण परिवार पर आते हैं तब अलग-अलग प्रकार से हमें मतलब उस संस्कार को प्राप्त करने के लिए एक योग्यता

00:12:06:12 बनती है। जी यदि उनकी जीव योग्यता भी उसी पर है तो वो सक्सेस हो जाते हैं। उसी में यदि उनके मान लीजिए कोई वैश्य के उनका स्वाभाविक गुण है परंतु वो आए क्षत्रिय परिवार पर तब उनको क्या हो जाता है? शारीरिक दृष्टि से वह दुर्बल हो गई तो उनका नहीं शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ है या उल्टा ले रहा हूं मैं मतलब यदि क्षत्रिय परिवार पर कोई वैश्य के कोई व्यक्ति आ गए या ब्राह्मण के ब्राह्मण के स्वभाव स्वभाव ब्राह्मण वाले आ गए वास्तविक रूप में क्षत्रिय कर्म पर क्या चाहिए बल चाहिए तो उनका बाहुबल मतलब ज्यादा नहीं मिला क्योंकि उनका स्वभाव ब्राह्मण वाला ब्राह्मण वाला है तो उसकी दृष्टि से उनका भाग गया परंतु उनका कर्मता मतलब थोड़ा सा राजनीतिक करने पर मतलब उसमें में आ गया तो ऐसे अपवाद भी मिल जाते हैं। इसलिए क्या है स्वाभाविक को भी देखना पड़ेगा और उस स्वाभाविक के वजह से कर्म को भी देखना पड़ेगा और उसके आधार पर जाति को भी एक सहयोग के रूप में लेना ही पड़ेगा। मगर इसमें एक चीज आएगी आचार्य जी कि स्वभाव की हम स्वभाव को पता करने के लिए हमारे पास कोई व्यवहारिक प्रमाण तो होगा नहीं। हां। है ना? व्यवहारिक रूप से कि भाई इससे पता लग रहा है इसका ये स्वभाव है। कभी-कभी कई लोग आजकल तो

00:13:21:15 ज्यादा ही लोग अपने स्वभाव को जानते ही नहीं है और अपने स्वभाव के विरुद्ध ही कोई व्यक्ति करते हैं कि काम चलना चाहिए बस भूख मिटनी चाहिए। उसके लिए पकड़ लेते हैं। वो स्वभाव के अनुसार हो सकता है जैसे मान लीजिए कि कोई ब्राह्मण कुल में जन्म ले लिया। पर उसको उसने वो एफर्ट नहीं लगाया। आलस्य इत्यादि है। उसके अंदर स्वभाव है चीजों को समझने का। मगर वो आलसी रहा और किसी तरीके से उसने कहा काम कैसे चलाएं तो हम वैश्य बन वो दुकान खोल लेते हैं। तो ये जो अब उसने वो जो दुकान खोली है वो स्वभाव वश खोली है या फिर व्यवस्था वश खोली है तो ये पहचानना भी मुश्किल हो जाएगा। बिल्कुल पहचानना मुश्किल है। मगर परंतु इसमें एक मैं इसलिए कहा था मतलब उसमें दो शब्द है। गुण भी है कर्म भी। परंतु यह जो जिस कर्म पर वो एक तरफ से समर्पक दृष्टि से पूर्ण रूप से पूर्णता की ओर जा रहा है तो इसका मतलब वो स्वभाव से थोड़ा बहुत तो जुड़ा ही रहेगा। अच्छा मतलब यदि दुकान चला रहा है तो उसका स्वभाव मानना पड़ेगा। उसमें रहेगा। इसमें कोई एग्जैक्ट मतलब हमें कुछ ऐसा पैरामीटर जिससे कि मतलब जैसे मान लीजिए किसी ने दुकान खोली है एक वर्ष हो गया तब मानना है कि इसका स्वभाव वो है कि चार वर्ष हो गया तब मानना है कि इसका स्वभाव वो है कैसे माने इसको इसमें ये देखिए

00:14:36:16 जीव योग्यता के बारे में थोड़ा विचार करना के लिए पैरामीटर रखना बहुत मुश्किल है फिर उसमें जब ऐसे जब ऐसे चीजें छूटती है ना इसी में वो जो कालनेमी है वो प्रवेश कर लेते हैं जब ऐसे कहीं पे वो चीज़ छूट जाती है ना कि भाई आपने कहा था कि जीव योग्यता तो हमें दिख रही है उसमें योग्यता वो तो दो दिन में कह देंगे कि इसका स्वाभाविक इसका मतलब जो आचार्य चाणक्य का देखिए वो किसी को भी रख के मतलब मैं राजनीति में कर सकता हूं मैं उसको उन्होंने दिखाया उन्होंने जो क्षत्रिय नहीं उनको रख के उन्होंने राजनीति वैकल्पिक वैकल्पिक वो तो आपत धर्म हो गया आपत धर्म की दृष्टि से नहीं है वो मतलब जो ये वो बात अलग हो गई मतलब एक सामर्थ्य की दृष्टि स्वभाव की दृष्टि भी यहां आ गई मतलब स्वभाव की दृष्टि से देखें जिनका मतलब जो कार्य कर रहा है। उन्हीं के पास वह स्वभाव होना चाहिए। ऐसे जरूरी नहीं है जो करा रहा है वास्तविक रूप में। कई बार क्या है ना किसी ने शुरू कर दिया। परंतु बिजनेस वो एक्चुअली क्या है वो ऊपर से उनका मतलब जो दिख रहा है वास्तविक रूप में वो नहीं कर रहा है। वो पीछे से कोई मित्र है करवा रहा है। तो इसीलिए उनका स्वभाव इस इसमें इसमें रिजल्ट लेने में बड़ी दिक्कत वाली बात हो जाएगी। अच्छा इसमें एक चीज और है। जैसे मान लीजिए चाणक्य जी ने बनाया। मान लीजिए प्रामाणिक आचार्य ने बनाया तो प्रामाणिक आचार्य के पास वो दृष्टि भी है कि कल को कल्कि

00:15:51:22 अवतार आएंगे और वो क्या कहते हैं पहचानेंगे है ना कि ये कल्कि हैं है ना जब राम आए तो किसने पहचाना ब्रह्मा जी ने पहचाना जो उस समय के प्रामाणिक आचार्य थे वशिष्ठ जी ने पहचाना है ना तो प्रामाणिक आचार्य यदि पहचान रहे हैं तब तो बात भी अलग है मगर मगर इसका क्योंकि आदेश हमें शास्त्रों से तो प्राप्त है नहीं कोई कौन पहचानेगा इस विषय में तो फिर इसी जगह पर वह काल नेम घुसपैठ करते हैं तो स्वभाव वाली बात तो है कि उसका स्वभाव है इस कारण से ही तो वो ब्राह्मण वृत्ति में नहीं जा पाया और वो जो है स्मृति में आया तो हम इसमें एक चीज आ जाएगी कि पतित तो मान सकते हैं। पतन तो मान सकते हैं मगर हम इसको व्यवहार में नहीं ले सकते कि कोई किसी शूद्र को हम आचार्य बना दें। ऐसे ये ये वही मैं बता रहा हूं। तो उसमें उसमें भागवत का जो एक प्रसंग है मुझे निर्दिष्ट रूप से मतलब उसका श्लोक की संख्या या अध्याय की संख्या तो उसमें वो खुद वो प्रह्लाद कहता है मेरे लिए यदि कोई बहुत ही प्रसिद्ध ब्राह्मण हो तो उन्होंने मतलब यदि उन्होंने अपना जो उनका कुछ गुण है मतलब जैसे हर एक जो वर्ण को देखते हैं उनका

00:17:06:28 कुछ गुण को विदित किया जैसे श्रम दम अध्ययन अध्याप न आदि कुछ गुण है वह ब्राह्मण का है। शौर्य धैर्य आदि क्षत्रिय का गुण है। और जैसे कृषि वाणिज्य आदि वैश्य का गुण है। शशिका आदि सेवा आदि का उसमें भी है। भगवत गीता में भी है। भगवत गीता में भी है। तो ये इसमें क्या है? इसमें जो जितने भी ब्राह्मणों के लिए गुण बताया है तो इसमें यदि किसी का मतलब जो यह सारे गुण होने पर भी वह कार्य पर कर्म पर वह प्रवृत्त नहीं हो रहा है उसमें सही ढंग से तो उनसे मतलब एक स्वपच है वो मेरे लिए श्रेष्ठ है स्वपच मतलब जो स्वान का मांस भक्षण करने वाले हैं तो वो भी श्रेष्ठ है तो इसका मतलब ये श्रेष्ठ तो है हां श्रेष्ठ तो है जैसे कि जैसे कि मेरे पिता हैं वो मेरी पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं तो मेरी नजरों में तो वो जो चाचा जी हैं वह श्रेष्ठ हैं जो अपने परिवार का भलन भरण पोषण कर पा रहे हैं और यहां मेरे जो पिता हैं वह मेरा भरण पोषण नहीं कर पा रहे हैं। वो शराब पी के मदिरापान करके पड़े रहते हैं। तो उस नजर उस दृष्टि से वो श्रेष्ठ हैं। है ना? आज मगर ये नहीं है कि वही मेरे पिता हो जाएंगे। हां ये नहीं चीज। तो इसके लिए क्या होगा? तो इस पर भी आचार्य जी ने ये कहा है जब यह जीव योग्यता के

00:18:22:02 आधार पर उनको एक दिन ऐसे अवसर मिलेगा वो भी मतलब और दूसरी बात मतलब ये सब मैं थोड़ा सा इस पर हटके मतलब दूसरा विषय पढ़ इसी से संबंधित क्योंकि ये सिद्धि क्यों चाहिए साधन क्यों चाहिए जी जी तो कर्म साधन या ज्ञान साधन हमारे यहां प्रामाणिक परंपरा में इसीलिए इसको जन्मांतर से माना गया कि अगर प्रामाणिक रूप से शूद्र को ब्राह्मणोचित उसका ये सब मोक्ष के लिए कर रहे हैं परंतु मोक्ष तो किसी एक वर्ण व्यवस्था के लिए नहीं है। जी जी जी बिलकुल हर वर्ण व्यवस्था वाले अपने-अपने ढंग से वह मोक्ष पर जाएंगे। मोक्ष पर कोई भेद नहीं है। सभी को मतलब जो सुख पूर्ण सुख मिलना है वो मिलेगा ही मिलेगा और उनके वहां पे सुख जो मिलेगा उनके जीव योग्यता के आधार पर मिलेगा। मतलब जो ब्राह्मण है वो ब्राह्मण के रूप में जाएगा। क्षत्रिय है वो क्षत्रिय के रूप में जाएगा। ऐसे मतलब जो वर्ण योग्यता के स्वभाव से जो ब्राह्मण है जो ब्राह्मण है जो ब्राह्मण भले ही वह शूद्र कुल में आ गया जी तो इसीलिए मतलब पारमार्थ पर जो है ये वाली जो बात है कि जो कुल शरीर से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र तय होना है इस इसके आधार पर जो आपका व्यवहार है वो विभाजित होगा और जो परमार्थ है उसमें आप जो है अपनी योग्यता के हिसाब से परमार्थ को प्राप्त करोगे। इसलिए उसमें उसमें एक

00:19:37:08 शब्द जोड़ते हैं। परंतु यह सभी लोग अपना-अपना वृत्ति पर जाने पर भी हरितोषाय मतलब जो हरितुष्टि के लिए मतलब जो करते हैं तभी मतलब वो कर्म समर्पित होगा ईश्वर पर नहीं है। तो अभी देखिए मैं यही बताना चाह रहा था मतलब जो आजकल लोग क्या चाहते हैं मतलब जो ये जो अध्ययन है केवल क्यों ब्राह्मणों के लिए क्यों उचित है बाकी लोग क्यों नहीं कर सकते हैं और बाकी जो ऐसे हर एक प्रश्न है मतलब युद्ध करना केवल राजाओं के लिए क्या है मतलब बाकी लोग क्यों नहीं कर सकते हैं ये ऐसे जो प्रश्न के लिए यही उत्तर है मतलब जो स्वधर्मे निधनम श्रेय मतलब जो अपनेपने धर्म पर ही होकर ही मतलब जो हम श्रेयस की ओर जा सकते हैं तो जरूरी नहीं कि मतलब वही धर्म मतलब मतलब दूसरा जो कर रहा है वही क्यों करना चाहिए? मैं भी वही करूंगा। मुझे भी चाहिए। उससे अव्यवस्था फैलेगी ना। हां। क्योंकि क्षत्रिय है मान लीजिए तो क्षत्रिय की धार्मिक धर्म से ड्यूटी दे दी गई कि तुम्हारा कर्म है रक्षा करना। तो यदि वो रक्षा नहीं करेगा तो हम उसको कह सकते हैं तू अपना कर्तव्य का पालन नहीं करना। मगर यदि कोई ब्राह्मण रक्षा नहीं करेगा तो हम उससे उसको नहीं कह सकते। अच्छा अगर हम मान लेंगे कि आग्रह भी नहीं होना चाहिए। मतलब जो मुझे क्या है मुझे रक्षा करके ही मतलब कोई ब्राह्मण का अध्ययन अध्यापन वृत्ति है आप वो करो आप उसको छोड़ के मतलब जो

00:20:52:09 मैं बिजनेस पर मैं लगाऊंगा मैं क्या करूंगा इस पर सोच पर मत जाइए आप तो कुल मिलाकर के अभी तक एक निष्कर्ष ये हमें प्राप्त हो रहा है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र जो स्वभाव से जो है उसमें जो शूद्र भी है उसको भी ब्राह्मण की गति मिल सकती है स्वभाव से मगर गति परमार्थ में उसको जो सद्गति है वो मिल सकती है ब्राह्मण वाले हो सकता है एक ब्राह्मण कुल में किसी ने कुल किसी कुल में जन्म लेकर के किसी जीव ने वैसे आचरण नहीं किए। स्वभावतः वो शूद्र जैसा हुआ। स्वभाव वाला या क्षत्रियचित जैसा हुआ स्वभावतः तो उसके कर्म जो थे वो ब्राह्मण वाले नहीं रहे तो उसको सद्गति वो प्राप्त नहीं हुई जो ब्राह्मण को मिलनी चाहिए। जिसमें कि स्वभाव और कर्म दोनों है ना और एक शूद्र के कुल में जन्म लेने पर भी क्योंकि स्वभावतः वो जो है ब्राह्मण था। तो इस स्वभाव का जो पर्यावसान है वह उसकी सद्गति में आएगा। व्यवहार में व्यवहार में जो शूद्र कुल का है उसका स्वाभाविक व्यवहारिक कर्म वही रहेगा जो शूद्र कुल का होगा और ब्राह्मण का व्यवहारिक कर्म वैसा ही रहेगा। जी इसमें सामान्य रूप से देखिए ऐसा नहीं करेंगे। संस्कार हम जब कराते हैं तो उस पर एक शब्द एक वाक्य ये आता है जन्मना

00:22:07:25 जाते शद्र संस्कारते ये भी एक हमारे लिए बहुत ही मतलब जिस पर में इस पर इस विचार पर मतलब बहुत ही उपयोगी वाक्य है क्योंकि जो भी जन्म लेता है वो शूद्र है मतलब जो इसमें फिर वो शूद्र वो फिर शूद्र वत है वो फिर शूद्र वत है मतलब जो शूद्र वत का मतलब क्या है संस्कार इसका उद्देश्य केवल किसी एक धर्म वर्ण का का जो पक्षपात करने पर ऊपर नीचे करने पर नहीं है ये मतलब इसका मतलब यह है वो वेदाध्यन आदि कार्यों के लिए योग्य नहीं बनेगा तो योग्य बनना चाहिए तो संस्कार होना चाहिए तो इसीलिए एक ब्राह्मण भी जब अपने उचित कार्य पर नहीं है तो उनका वेदाधिकार नहीं है यही शास्त्र का उद्देश्य है इसलिए अपने अपने धर्म पर सभी लोग होना चाहिए एक ये उदाहरण के रूप में लिया है बस ब्राह्मण का ऐसे हर धर्म का भी ये समन्वय स्वस्व कर्मणा स्वस्वर्णा एक समन्वय करने तो एक चीज हमने ने अभी स्पष्ट की है कि जन्म से आपका व्यवहार सुनिश्चित हो रहा है और जो आपका स्वभाव जो आपको पूर्व वो आपका जीव का स्वभाव है जो जीव योग्यता आपने नाम लिया उससे आपका परमार्थ सुनिश्चित हो रहा है। तो आप जो जीव योग्यता का नाम लिया आचार्य जी ने बड़ा अच्छा शब्द है। तो जीव योग्यता

00:23:23:01 के अनुसार जो आपने यहां पर जीव योग्यता के अनुसार जो कार्य किया और साधन किया भजन भजन और उपासना की तो उसके अनुसार आपका परमार्थ सिद्ध होगा। हो सकता है कि ब्राह्मण को भी एक पतित परमार्थ मिले। पतित सद्गति मिले। उनको उनको अपने मतलब जो जीवी अभी ये एक जन्म के लिए उन्होंने कर्म के वश से ये लिया है। एक वर्ण पर आए। अगले जन्म पर जरूरी नहीं कि वो इसी वर्ण इसी वर्ण पर जाएं। दूसरे वर्ण पर जाएंगे। पतित पतित हो जाएंगे तो किसी प्रताप के कारण जो है किसी को जो है उसमें मिल गया ब्राह्मण में मगर क्योंकि जीव योग्यता नहीं थी तो जीव योग्यता के ना होने के कारण उनकी जो सद्गति होनी थी जन्मांतर में वो नहीं हुई जो ब्राह्मण के अनुसार होनी थी यदि उनकी जीव योग्यता यानी स्वभाव भी होता वैसा ही और कर्म भी वैसे ही करते तो उनको सद्गति भी वैसी ही मिलती है ना मगर जीव योग्यता पर्याप्त ना होने के कारण वो पतित हुए जन्मांतर है और अगले जन्म में वह कोई और हो सकता है सुकर्म है स्ान में जन्म ले लें जरूरी नहीं कि मनुष्यों में ही चार वर्णों में ले यह भी हो सकता है और जो शूद्र है जिसके जीव योग्यता के कारण जो है उसने कर्म अच्छे किए है ना भले ही वो शूद्र कुल में जन्म लिया मगर उसने अपने आचार

00:24:38:04 विचार को अच्छा रखा मर्यादा का पालन किया साधन भजन किया तो उसको जो है गति मिल गई कौन सी जो ब्राह्मण को मिलती है वो गति मिल गई तो और ये बात हमारे आचार्यों ने भी ब्रह्मसूत्र के भाष्य में सिद्ध की है। विष्णु विष्णु धर्म पुराण है ना जो उसमें एक प्रकरण है जहां पर योग की महिमा बता रहे हैं। है ना? तो वहां बताते हैं कि एक जो शूद्र होता है उसको भी ऐसे शूद्र को भी वहां पर मुक्ति मिल जाती है। और उसको हमारे एक आचार्य हैं। उन्होंने अपने एक बात मैं बताता हूं। सेवा को सुश्रुष शूद्र धर्म है। ऐसे कहते हैं। तो

00:25:18:21 श्रीमदाचार्य कहते हैं तो ये सेवा भाव क्या है? ये केवल शूद्रों का धर्म नहीं है। ये मनुष्य का सामान्य धर्म है। क्योंकि नाना जनस्य सुश्रुष कर्तव्या कर्मते। ये वाक्य बोलते हैं। इसमें इसका मतलब यह है जो सुश्रुषा सेवा है वह नाना जनस्य सुश्रुषा मतलब देखिए इसमें कोई किसी वर्ण अपने वर्ण वालों को सेवा करो ये कहीं नहीं कहा है नाना जनस्य सुश्रुष कर्तव्या कैसे ये कर क्यों करने चाहिए करवनतेह मतलब कर के समान मतलब टैक्स के समान है ये यदि हम मतलब जो यहां भारत में जी रहे हैं तो भारत को सरकार को टैक्स देना पड़ेगा तो वैसे हम ईश्वर की कृपा से हम जी रहे हैं तो ईश्वर को क्या टैक्स देंगे हम नाना जनस्य शिष्य शिरोशा तो इसलिए हमारे गुरु जी बार-बार कहते थे सब जगह पर कहते थे जन सेवा ही जनार्दन सेवा आप पहले जन सेवा से शुरू करिए मतलब जन से जन लोगों की सेवा छोड़ के आप मतलब सीधा आप जितने भी मंत्र पाठ करिए उससे कोई मतलब नहीं क्योंकि कर्म की पूर्णता सेवा से होती है जी जी तो इसलिए सामान्य रूप से हमारे गुरुकुल पद्धति पर देखिए प्रारंभ में सेवा से ही मतलब अध्ययन को प्रारंभ करते हैं क्योंकि पहले सिखाया जाता है हमें सेवा सही बात है देखिए कर्म से चालू इसलिए करना पड़ेगा कि जैसे आप भजन करने बैठेंगे तो पहले नहाएंगे

00:26:33:27 ना एक कर्म आ गया पहले स्नान करेंगे ना पहले तो इसका मतलब यह माना जाए कि ऐसा नहीं व्यवहार में हम ऐसा नहीं कर सकते कि अगर ब्राह्मण अपने ब्राह्मणोचित कर्म को नहीं कर रहा है तो पतित ब्राह्मण माना जाएगा उसको कई उसके ब्राह्मणोचित कार्यों से अलग कर दिया जाएगा परंतु ऐसा नहीं किया जाएगा कि कोई शूद्र है या कोई वैश्य है और क्योंकि उसका मन लग रहा है तो इसलिए हम उसको जो जो है आगे चलकर के जगतुगुरु आचार्य की पदवी पर बैठाएं तो उससे विप्लव होगा। वो एक-एक स्थान का कुछ महत्व है। जी तो और एक-एक का प्रत्येक आचरण है। व्यवहार है, विचार है। जी। तो इस पर हम जब तक हम अपनी जीव योग्यता को ही हम नहीं जानते हैं तब तक किसी और के बारे में हम या किसी और के अंदर मतलब विचार में प्रवेश करना ये उचित कभी नहीं होगा। अच्छा ये मानना ये मानना ये ये आवश्यक है कि वही जो शूद्र कुल में जन्म लिया है उसका बहुत अच्छा आचरण है सब कुछ है तो उसकी जो सद्गति है उसमें कोई भेद नहीं है वो सद्गति उसको वही वाली मिल जाएगी जो किसी को भी मिलती है तो यहां पे जो ये कहा गया है कि भाई वो जो जन्म का पर्यावसान हो गया व्यवहार में जीवित मतलब जब तक हम व्यवहार में बंधन में तो जन्म के

00:27:48:28 अनुसार हम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र हैं और कर्म के अनुसार आचरण के अनुसार जीव योग्यता के कारण जो आचरण हमने किया है उसके अनुसार परमार्थ में हम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के अनुसार कोई भी गति प्राप्त कर सकते हैं। तो जन्म का जन्म का पर्यावसान व्यवहार में है और कर्म का पर्यायवसान परमार्थ में है। स्वभाव के आधार पर है। जी जी स्वभाव के आधार पर कर्म का पर्यायवसान परमार्थ में है और जन्म और जो है जन्म का पर्यावसान व्यवहार में है। ये अभी तक हमने स्पष्ट किया। तो इसका मतलब ये माना जाए कि जैसे कि हमारे यहां पर पहले कुछ संस्थाएं जो है विदेशी संस्थाएं व्यापारी बनके आ चुकी हैं और उन्होंने काफी हमारा संघर्ष रहा। ऐतिहासिक बातें हैं। तो अब क्या है कि संस्था ने दूसरा रूप लिया है और अब मैं सीधे तौर पर अगर बात करूं इस की तो उसमें क्या हो रहा है कि वो लोग क्योंकि उन्हें अपने जो विदेशी जिन लोगों को जो लोग यहां आ रहे हैं तो उनको हमारे मंदिरों में अधिकृत रूप से देखिए इसका जो वर्ण व्यवस्था का अब आज के टाइम पे जो मूल उपयोग रह गया है एक तो विवाह में रह गया है और एक इसमें रह गया है आचार्य कौन बने? पढ़ाएगा कौन? प्रामाणिक शिक्षा पूर्वाचार्यों

00:29:04:07 की कौन देगा? इन दो चीजों में रह गया। बाकी तो सब कुछ सब कुछ मिक्स हो गया है। तो अब क्या है कि हमारा जो मूल स्त्रोत होता है वो होते हैं हमारे आचार्य गद्दी आचार्य पीठ। तो अब क्या है कि जो संस्था पहले मतलब अब सेम संस्था वही नाम है कि नहीं वह तो एक अलग बात है। परंतु जो विदेशी शक्तियां हैं वो हमारे मंदिरों में हमारे मठों में हमारे आश्रमों में आचार्य गद्दी पर बैठना चाह रही जो हमारा आश्रय है। अंतिम आश्रय हमारा जीवित रहते हुए हमारे आचार्य हैं। है ना? तो उन पर वह विराजमान होना चाहते हैं जिससे कि वह पूरा एक्वायर इस बार कर सकें। तो इसलिए उनको इस बात की बहुत आवश्यकता है कि वर्ण व्यवस्था को मतलब किसी को भी कोई भी जो भी वह कर्म करने लगे उसको वो घोषित कर दिया जाए। तभी तो वह एक दिन आचार्य बन के बैठ पाएगा किसी भी पर। तो कुल मिला के वो अपने को यहां पर हमारे मठ मंदिरों में ख्यापित करने के लिए यह जो बात कर रहे हैं कि भाई जो कर्म जिसने आचरण कर दिया जरा सा भी उसके अंदर वह आचरण आ गया तो वह जो है ब्राह्मण हो गया। अब जो है वहां के लिए एलिजिबल हो गया। तो इस बात को तो हम लोग गलत माने फिर देखिए एक और बात है मैं बताता हूं मैं धर्मशास्त्र की बात है यस्मिन देशया आचार पारंपर्य क्रमागतः

00:30:21:01 धर्मशास्त्र विरुद्धस आगे कुछ वाक्य है तो इसमें क्या है जो जो आचरण परंपरा से आए हैं तो उसको वो धर्माचरण के लिए मतलब कोई विरुद्ध नहीं है तो उस वैसे आचरण को कभी छोड़ना नहीं चाहिए ये संप्रदाय का महत्व पुष्टि करते हुए वाक्य है ये क्योंकि मैं यही कहना चाह रहा था पहले भी आप देखिए मतलब जो आपको कुछ अच्छा स्वभाव मिल गया मतलब जो आपका वास्तविक रूप में आपके परिवार में कोई वैसे उस क्षेत्र के नहीं है फिर भी आपको कुछ अच्छा संस्कार अंदर से आ गया तो आप करना चाह रहे हैं तो कोई मान लीजिए कोई सेवा करने की अह स्वभाव सेवा करने का जो स्वभाव है वह उनके परिवार में नहीं था परंतु पहला व्यक्ति को आ गया सेवा करने का स्वभाव तो आप बहुत अच्छी बात है। करिए परंतु आप किसी एक जो व्यक्ति अभी वर्तमान में सेवा कर रहा है उनको हटा के वहां मैं बैठ के मैं करना चाह रहा हूं मैं ये मत सोचिए उसकी जगह हासिल करने की कोशिश मत करिए एक जगह आप अपनी आप अपनी सद्गति के लिए कार्य करिए आप अपना ही एक जगह बना लीजिए और वहां बैठ के आप उनके समान करिए मतलब ब्राह्मण कहलाने की आवश्यकता नहीं है अगर आपको सेवा कार्य करना ही है तो उसके लिए आपको ब्राह्मण का सर्टिफिकेशन की आवश्यकता थोड़ी ना है किसी की जरूरत नहीं

00:31:36:07 मतलब जो इसलिए क्या है आपकी जीव योग्यता क्या है आप जानने के लिए हम हर व्यक्ति का जीव योग्यता क्या है? हम इसकी जानने के लिए हम कोशिश कर रहे हैं। हम इतना साधना कर रहे हैं। परंतु इस पर क्या है? आप किसी भी जीव योग्यता को तो आप निराश होने की कोई जरूरी नहीं क्योंकि हर व्यक्ति का मोक्ष है। तो ये श्रीमद आचार्य कह रहे हैं। तो आपका वो जो आपको स्वभाव से जीव योग्यता से मिला है। उसका परिवसान आप मोक्ष में लगाइए। और कोई भेद नहीं है। सभी लोग समान हो गए। तो इसीलिए मतलब जो सभी उस जीव इस पर यदि मैं एक बात और कहूंगा तो वहां भी मतलब जो जीवा योग्यता के बारे में मधवाचार्य बात करते हैं क्योंकि वहां भी आनंद का वृद्धि और ह्रास होता है क्योंकि यदि मान लीजिए कोई ब्रह्मज्ञानी है ब्रह्मज्ञानी है वो अंतिम चरण पर यदि उन्होंने कर्म का थोड़ा सा प्रमाद कर दिया तो उनका मतलब जो मोक्ष पर थोड़ा सा ह्रास होता है मतलब पूर्ण आनंद लेने पर ह्रास होता है तो ये मानते हैं क्योंकि आजकल हम बहुत सारे देखते हैं हमारा कर्म फल को भोगते समय हम कई बार मतलब कुछ कर्म फल को हम सीधा भोगते हैं। कुछ को स्वप्न आदि के माध्यम से भोगते हैं। दुख तो होता ही है परंतु उसका शारीरिक दृष्टि से प्रभाव नहीं रहता है। वैसे ये सब विचार क्या है? आपको मतलब किसी भी प्रकार से आपको

00:32:51:15 जो आपकी उचित जो स्थान है सबके लिए एक ही स्थान है। ऐसे ही ईश्वर ने अलग-अलग मोक्ष नहीं बनाया। जिनके लिए एक अलग मोक्ष है उनके लिए अलग मोक्ष है। मोक्ष तो एक ही है। तो सबको जाना ही है उसमें। जी परंतु रास्ता अलग-अलग अपने रास्ता पकड़ के और आपके अंदर अगर वह वाली वृत्ति आ भी गई है तो यह आवश्यक नहीं है कि जैसे मान लीजिए आपके अंदर वृत्ति आ गई है कि भाई मैं जो है पढ़ाऊं ज्ञान दूं तो यह आवश्यक नहीं है कि उसके लिए जहां पे एलिजिबिलिटी जिस कार्य को करने के लिए ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने वाली एलिजिबिलिटी आवश्यक बताई है उसी स्थान पर आप बैठकर के पढ़ाएं। आप प्रवचन इत्यादि जो हैं जो क्या कहते हैं जो गुरुओं से प्राप्त है हमारे शास्त्रों के जो भाष्य इत्यादि के रूप में हमें प्राप्त हैं उसके माध्यम से जरूरी थोड़ी ना सीधे वेद ही पढ़ाए उसके माध्यम से आप जो है साधारण भाषा आज की जो लौकिक भाषा है उसमें जो है सामने वाले का जो ज्ञान का स्तर बढ़ा सकते हैं और जो आपके अंदर वह स्वभावगत वह आ रही है चीजें वो कर सकते हैं। परंतु आपको जिन चीजों के लिए ब्राह्मण कुल में उत्पन्न शरीर वाला ही अह निश्चित किया गया है। जिन स्थानों के लिए आपको उन्हीं स्थानों पर बैठकर के और वही कार्य जिन कार्यों के लिए कि ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाला शरीर हो मतलब स्वभाव कर्म दोनों थोड़ा सा अलग प्रकार से मैं बता रहा हूं बीच में

00:34:06:16 देखिए देखिए अभी अब किसी और को रोके आपका उद्देश्य है वास्तविक रूप में सत्कार्य करने पर जी तो कोई और कर रहा है तो उसमें कुछ गड़बड़ है या नहीं वो बात अलग है परंतु आप क्या करें उनको हटाकर मतलब वहां बैठ के आप करना चाह रहे हैं तो इस पर क्या होगा आपकी जो भावना है सत्कार्य करने की तो उस पर ह्रास हो गया मतलब जो आपका जो उद्देश्य था निस्वार्थ भाव से सत्क करना निष्काम नहीं रहा निष्काम नहीं रहा मतलब आपका सकाम बन गया आपको क्योंकि वो इच्छा नहीं होना चाहिए क्योंकि अब जितने भी देखिए अ जैसे मैं एक ये उदाहरण लूं मधवाचार्य जी जैसे मतलब जो सब जगह पर मतलब जाते थे तो या इसमें सभी को बताएंगे मतलब जो जैसे आचार्य शंकर जी हो या आचार्य रामानुज हो आचार्य बधव हो तो अब इसमें क्या है श्रद्धा आपके अंदर जो होनी चाहिए तो वो उस पर थोड़ा हरास हो गया जी इसलिए आपको जरूरी नहीं कि उसी जगह पर बैठ के करें जैसे मधवाचार्य जी जिस जगह आचार्य हैं वो सब जगह पर मतलब प्रवास में जाते थे उसमें कई बार वाद विवाद सब चलता था मतलब जो शास्त्रार्थ जी शास्त्रार्थ पर कोई हार गया तो उनको जबरदस्ती से वो

00:35:21:18 अपने धर्म पर लेकर नहीं आते थे| मतलब उनका मन है वह आते थे या नहीं है तो उनको छोड़ के आते थे तो कहीं भी जबरदस्ती नहीं किया क्योंकि यही कारण है उनका स्वभाव जैसा है वैसे वो चलेंगे वो उनको हम जबरदस्ती से कहीं भी बैठाएंगे तो उसका वो स्वभाव नहीं बन सकता है पूरी के शंकराचार्य जी पूज्य गुरुदेव जी भी मैं एक उदाहरण देते हैं कि मैं जब जगन्नाथ पुरी में दर्शन करने जाता हूं हां तो वहां की जो परंपरा है वहां का जो सिस्टम है वो यह है कि जो विग्रह का अर्चन करेगा वो वहीं का जो नियुक्त जो ब्राह्मण होगा वह करेगा तो वह उस मर्यादा का शंकराचार्य होते हुए उनके अधिकार उसमें आता है उनके अधिकार की सीमा में जगन्नाथ पुरी मंदिर जो है उन्हीं के द्वारा उसमें आता है तो वो ऐसा होते हुए भी वो उस मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते नहीं जो उसके लिए नियुक्त है वही करें हम भले ही लौकिक दृष्टि से और भी उच्च पद पर वो पहुंच गए हैं परंतु वहां की जो परंपरा है जो उसके लिए नियुक्त है वही करें बिल्कुल है ना? वो भी उसमें उसका मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। तो यही बात आपने कही कि मधवाचार्य जी कहीं जाते हैं तो जो उसका जो एक परंपरा है कि भाई तुम्हारा जो स्वभाव कह रहा है करो वही जैसे भगवान ने अर्जुन से कहा गीता में कि अब मैंने तुम्हें सारे नियम

00:36:36:21 कायदे कानून बता दिए हैं। अब तुम्हारा अपना अपना निर्णय लो क्या करना है कैसे करना है तो यह तो बहुत अच्छी तो इतना स्पष्ट हम मान लें कि अह कर्म से व्यक्ति का जीव योग्यता के आधार पर जो कर्म है व्यक्ति के उसके आधार पर उसका परमार्थ निश्चित होता है और जन्म के आधार पर उसका व्यवहार निश्चित होता है। यानी कि ऐसा नहीं कि कोई भी कुछ भी मतलब जरा सा भी कुछ भी आचरण कर देगा या बहुत आचरण भी कर देगा तब भी उसको जो है कहीं और नियुक्त कर दिया जाए और यहां वाले को कोई और आचरण करने पर जो है वहां नियुक्त कर दिया जाए। जहां नियम है वहां ज्यादा नहीं जाना चाहिए। जहां नियम नहीं है अपना ही बना लीजिए। करिए उसमें। उसमें एक दिक्कत ये भी आती है ना क्योंकि हम इतने क्योंकि कर्म जो है वो व्यक्ति की अपनी इच्छा पर निर्भर होता है। अंतत गतत्वा कि उसकी क्या इच्छा हुई कर्म करने की? तो अब इसमें क्या हो जाता है कि व्यक्ति अपने दायित्व से कभी भी भाग सकता है। और हम उसको कुछ दोष नहीं दे सकते। बिलकुल। जैसे मान लीजिए कि कोई एटीएम के बाहर खड़ा हुआ सुरक्षा कर्मचारी है। इस समय उसका जो वो है दायित्व वह है क्या कहते हैं कि मैं जो है रक्षा करूंगा। ठीक है? अब यदि वो जन्म से क्षत्रिय है और क्षत्रिय के कारण ही वहां पर सुरक्षा के लिए खड़ा है। तो अगर

00:37:51:25 वो अपनी ड्यूटी से त्यागपत्र देगा किसी संकट के समय तो उसको याद दिलाया जाएगा कैसा क्षत्रिय है तू? बिल्कुल। परंतु यदि वो अपनी ड्यूटी से त्यागपत्र दे रहा है संकट के समय और वो वैसा वो जो है कर्म आधारित व्यवस्था है वहां पर तो उसको हम याद नहीं दिला सकते क्योंकि उसकी कोई वो मौलिक वो नैतिक ड्यूटी नहीं है। नैतिक ड्यूटी नहीं परंतु मैं यही कहना चाह रहा था। उसमें उनके व्यावहारिक दृष्टि से वो देना नहीं चाहिए। हम नहीं नैतिक वो धर्म है ना कि नैतिक ऐसा नहीं करना चाहिए। दृष्टि से हम निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। इसलिए उसको के उसको वहां पे हम प्रमाण नहीं दे पाएंगे ना। अगर हम कर्म से मान लेंगे तो हम प्रमाण नहीं दे पाएंगे क्योंकि एक अगर वो धार्मिक है तो हम धर्म से उसे प्रमाण देंगे। कि भाई तू अपने कर्तव्य से भाग रहा है। जैसे मान लीजिए कि इसमें एक उदाहरण और आता है भाई पिता वाला कि एक बात आई ना शास्त्रों में कि दूसरे के सुंदर दिखने वाले धर्म से अच्छा अपना जो निकृष्ट दिखता हुआ धर्म है वो अच्छा है। तो अब जैसे मेरे पिता हैं हां वो चल नहीं पा रहे हैं या वो उतने आर्थिक वो नहीं है। है ना? आर्थिक तौर पर संपन्न नहीं है। किसी व्यक्ति के पिता हैं और दूसरे के पिता जो हैं वह एसी, टीवी, फ्रिज, कूलर यह सब है। उनके पास भौतिक रूप से संपन्न

00:39:07:03 है। तो अब दोनों की सेवा करनी है उनके उनके लड़के को। अब वो क्या कर रहा है कि करनी तो किसी की सेवा ही है। तो मेरे को यहां पे दिक्कतें आती हैं। भौतिक रूप से मैं परेशान होता हूं। तो मैं एक काम करता हूं। अपने पिता की सेवा छोड़ के उनकी सेवा कर लेता हूं। तो सेवा तो है ही है। तो दूसरे का धर्म अपना लेता हूं। तो क्या है कि अपने पिता की जब तुम सेवा करोगे भले ही आपकी वह जो संघर्षमय वह जीवन होगा मगर उससे आपको सद्गति मिलेगी और इसको छोड़कर के आप दूसरे के पिता की सेवा करोगे और भले ही वहां पर भौतिकता आपको ज्यादा मिल जाएगी परंतु आपकी जो गति होगी वो निकृष्ट हो जाएगी है ना इसको ऐसे ही मानना चाहिए जी जी तो ये एजेंडा अभी तक हमने समझा और बहुत ही गढ़ में जाकर के बहुत सारी बातें हुई हैं। हम थोड़ा सा अब आगे बढ़ेंगे। गुण गुण कर्म विभाग वाली बात तो अच्छा तो यह बात फिर स्पष्ट हो गई कि जिसकी जीवा पर जो है भगवान का नाम आ जाए उसको ब्राह्मण जैसा तो मान लो व्यवहार में पर यह नहीं कि ब्राह्मण ही मान लिया जाए है ना ऐसा नहीं है कि भाई जिसकी जीवा पर भगवान का नाम आ गया तो उसको ब्राह्मण के समान हम सम्मान कर सकते हैं किसी का भी हम स्वभाव निर्णय नहीं कर सकते हम नहीं कर सकते हम खुद का नहीं जानते उसके उसके लिए प्रयास कर रहे हैं तो हम किसी और का कैसे तो हम तो जो भौतिक रूप से प्राप्त जो हमें वो है जानकारियां उसके आधार पर निर्णय करेंगे अब

00:40:22:07 जैसे कोई व्यक्ति चाल चल रहा है भगवान का नाम लेने में कि मैं राम कह दूं और जो ब्राह्मण बनके तब तब कैसे पहचानोगे उसको है ना तो इसीलिए स्वभाव का निर्णय हम नहीं कर सकते स्वभाव से आपका वो सद्गति तय होगी परमार्थ वो ईश्वर देख रहा है कि आपने राम लिया तो क्यों लिया वो ईश्वर देख रहा है हम नहीं तय कर सकते तो इसलिए ये वाली बात भी कहना गलत हो जाता है अच्छा अब इसमें थोड़ा सा हम आगे बढ़ते हैं क्या इस प्रामाणिक रूप से मधवाचार परंपरा से जुड़ा हुआ है प्रामाणिक रूप से क्या मधवाचार्य जी के सिद्धांतों को हम इस में जाकर पढ़ सकते हैं? देखिए यही होगा। मधवाचार्य जी का जो सिद्धांत है किसी का भी सिद्धांत हो तो आपको उनको पढ़ना है तो उनका मूल ग्रंथ उन्होंने खुद जो लिखा हुआ ग्रंथ को हमें आधार के रूप में मानना पड़ेगा। नहीं मगर फिर भी उनको पढ़ाने वाले वर्तमान के आचार्यों से तो पढ़ना पड़ेगा। नहीं उसमें देखिए इसमें दो प्रकार से होगा। मैं बता रहा हूं मैं। एक हो गए उनका स्वयं का स्वयं कृत ग्रंथ स्वयं जो रचना की हुई है ग्रंथ एक हो गई उसकी व्याख्या तो किसी आचार्य ने मतलब ग्रंथ लिखा उसको मान लीजिए मैंने ही खुद मतलब किसी आचार्य ने जो लिखा हुआ ग्रंथ को लेकर मैंने व्याख्या की तो ये इस व्याख्या को जो पढ़ने पढ़ रहे हैं तो जरूरी नहीं कि वो सही ज्ञान

00:41:37:13 प्राप्त करें क्योंकि आजकल हमारे मतलब जो भारत पर यही समस्या हुई है आजकल क्योंकि मतलब जो हमारे ऋषि मुनियों ने जो वेद को दर्शाया है। मतलब सभी लोग को मतलब देखकर मतलब जो हमें सब हम सबको मतलब उपदेश किया है। उसको किसी ने मतलब जो वहां पाश्चात्य लोगों के लिए उपदेश किया और पाश्चात्य अपने मतलब जो अपनी भाषा से उसको समझकर वो खुद कुछ लिखा। उसको पढ़कर कुछ लोग आजकल आक्षेप करने लगे लग रहे मतलब भारत के ऊपर। तो ये भी है वास्तविक रूप में इसमें क्या है? ये अनुवाद होकर अनुवादित होकर उस कार्य को देखते हुए हम आक्षेप कर रहे हैं। परंतु इस पर ये देखना पड़ेगा कि प्रामाणिकता इसीलिए परंपरा है। हां इसीलिए परंपरा कौन उनका प्रामाणिक उत्तराधिकारी है उसने क्या कहा है तो उसकी बात मान्य हो जाएगी। उसके तुरंत जो आए हैं मतलब उन्होंने क्या कहा इसको कैसे मतलब व्याख्या इसलिए सामान्य रूप से हम देखते हैं मतलब जो जितने भी पीछे के जो आचार्य है कम से कम मतलब चार पांच शिष्य को रखते थे और चार पांच शिष्य भी लिख लिखने लगते हैं और इन सबको आजकल मतलब मात्र को संपादन कार्य भी चल रहा है तो इससे पता चलता सही निर्णय कैसे ले सकते हैं तो इसके एक आधार भी मिल जाएगा इसी के लिए आचार गद्दी होती है कि भाई मेरी बात को प्रामाणिक रूप से बताने वाला ये मेरा उत्तराधिकारी तो मैं वही जान रहा हूं कि प्रामाणिक रूप से उनके सिद्धांत

00:42:52:26 को पढ़ने या जानने हम इस जा सकते हैं। कभी भी अनुवाद कार्य हम जब पढ़ते हैं तब उसमें थोड़ा सा मतलब क्योंकि वो क्योंकि वो भी एक वो एक क्लेम करते हैं कि हम मधवा परंपरा से हैं और मधवा ने जो कहा था वो प्रामाणिक रूप से हम बता रहे हैं। जी मैं वही कह रहा हूं मैं। अभी हमारा चर्चा जो वर्णाश्रम से जो हुआ था वर्ण व्यवस्था से उसमें एक ही गीता का एक श्लोक को लेकर हमने मतलब जो यहां तक मतलब चर्चा चली। तो इसी श्लोक को लेकर ही मतलब पूरे भारत पर मतलब चर्चा चल रही है। इसको कौन किस प्रकार से तो मैं तो देख रहा हूं कि इसको दूषित तो सबसे ज्यादा इस ने ही किया है। अगर मैं अपनी जानकारी बताऊं मैंने और इतना ज्यादा किसी को इस श्लोक पर इतना ज्यादा उसने इसको इतना ज्यादा वो बनाया है कि भाई इशू जैसे कि इसी के ऊपर जो है हर जगह जो है बात करना बस इसी को रख देना जबकि छंदोग उपनिषद में पांचव शायद उसमें है जिसमें कि बताया गया कि पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पे इस जन्म का शरीर प्राप्त हो जाता है। है ना? तो वो उसको नहीं देखें। उपनिषद को नहीं देखेंगे। एक हमारे गुरु जी से भी हमने सुना था। वो एक बार बहुत पहले मतलब जैसे मधवाचार्य जी ने भी एक भक्ति पंथ के नाम से मतलब कुछ कराया। तो भक्ति का मतलब जो बहुत सारे

00:44:08:04 सभी आचार्यों ने मतलब भक्ति का प्राधान्यता दी गई। परंतु मधवाचार्य जी ने क्या किया? कुछ लोगों के लिए भक्ति का ही पूर्ण रूप से उनका भक्ति पर ही पूर्ण दीक्षा दी। हम्म तो ये भक्ति पर पूर्ण दीक्षा देने की जरूरी क्या है? क्या था तब उस समय तो क्योंकि यह था क्योंकि जब धर्म से हटकर बाहर निकल रहे थे उनको रोकने के लिए कुछ ना कुछ तो मतलब ऐसे प्रभावित लगाव चाहिए तो वो क्या था वो भक्ति था एक आसान रास्ता दे दिया सरल सरल कर दिया तो सरल दे दिया जिसका चित्त उसमें नहीं लग पा रहा है तो वही वाला उसमें हो जाएगा जैसे आजकल वो हो गया ना कलयुग केवल नाम आधार बिल्कुल बिल्कुल वही है तो इसलिए क्या है तो धती को आधार बना के मतलब जो कर रहे हैं तो बिल्कुल वो बात उसमें कोई आपत्ति नहीं है। परंतु हम यह ना माने कि मतलब जो वही वही अंतर हम और भक्ति का भी अलग-अलग लेवल पर पधार इसमें गीता तात्पर्य के जो उसमें प्रारंभिक जो भाग पर आचार्य कहते हैं तो पहले कर्म करने चाहिए सामान्य स्तर है और कर्म करने के बाद फिर भक्ति आ जाएगी। भक्ति को लेकर फिर कर्म करने चाहिए। और ये हो गया कर्म पहला लेवल और भक्ति और भक्ति युक्त कर्म और उसके बाद

00:45:23:08 ज्ञान और कर्म फिर भक्ति ज्ञान युक्ति फिर ज्ञान युक्त भक्ति फिर आगे निकलकर फिर प्रसाद मिलेगा जब वो प्रसाद है वो अंतिम है केवल ज्ञान से भी मुक्ति नहीं है मतलब जो प्रसाद से ईश्वर कृपा से मतलब मुक्ति ये मानते हैं तो उस दृष्टि से भक्ति का अलग-अलग स्तर है तो हम यदि पहले लेवल पर है तो नाम स्मरण से यदि भक्ति कर रहे हैं तो ये भक्ति और जो ज्ञान युक्त भक्ति ये दोनों समान नहीं हो सकता। भक्ति का स्तर है क्योंकि पूर्ण इसको इसको 10 10 नाम अपराध में से ले लेते हैं। जैसे मान लीजिए कि हम जो है नाम जप कर रहे हैं। मगर हमने अब ये मान लिया कित संध्या वंदन करना ही नहीं है या ऐसे सिद्धांत मानने ही नहीं है। उनके प्रति अवमानना की दृष्टि रखना। ये मानते हुए कि मैं उस योग्य नहीं हूं। इसलिए मैं मैं यही कर रहा हूं। इतने में ही सीमित हूं। वो तो ठीक है। मगर आप अपने मन में मान लो नहीं यही सबसे बेस्ट है और सब बेकार है। तो फिर वो शास्त्र वचनों की अवमानना हो गई तो वो 10 नाम अपराध में से एक अपराध हो जाएगा। हमारे गुरु जी हर बार वो करते थे भी करते थे भी ऐसे ही और बताते भी थे। मतलब जो उनको नाम जप करना सभी को उपदेश देते थे परंतु कभी भी यह नहीं कहते थे कि मतलब अपना धर्म छोड़ दो और आप नाम स्मरण में ही लग जाओ पूर्ण रूप से। ये बिल्कुल

00:46:38:19 सही नहीं है। अपना उचित कर्म करो। जैसे माना कोई गणी तो उनका ग्रह पर जो कार्य करने चाहिए वह पूर्ण करके ही मतलब अपना कर्तव्य करने चाहिए। तो इसीलिए अपने स्वधर्म को छोड़कर मतलब परधर्म पर कभी नहीं जाने चाहिए। वो भले ही मतलब जो ईश्वर की पूजा ही हो। अब इसमें एक चीज और आ गई है ना उसमें आ गई कि अब ये लोग लाते हैं वो सर्व धर्म सारे सभी धर्मों को त्याग कर दो। तो अब इसमें जो प्रामाणिक आचार्य गण हैं उन्होंने तो अपने-अपने हिसाब से बहुत अच्छी-अच्छी व्याख्याएं दी हैं। यह लोग इसका यह कहने लगते हैं अरे वह तो खुद ही कह रहे हैं ना सारे धर्मों को छोड़ दो तो फिर वहां पे प्रश्न उठता है सारे धर्मों को छोड़ दो। क्या माता बहनों पत्नी में अंतर करना छोड़ दें? इसको इसका भी त्याग कर दें। तो ऐसे बहुत सी चीजें अब जैसे शंकराचार्य जी हैं उन्होंने यहां पर कहा कि भाई इंद्रिय जो विषय हैं उनके प्रति जो आसक्ति रूपी धर्म है उसका त्याग कर दो और अगर आप शरण में जा रहे हो तो सब कुछ उनको ही समर्पित कर दो भगवान को हमारे जी कहते थे वैराग्य शब्द का अर्थ क्या है सभी लोग वैराग्य शब्द का अर्थ है छोड़ना ये महर्षि पतंजलि भी मतलब कहते हैं अपने योगसूत्र पर वैराग्य का मतलब छोड़ना नहीं वशीकार वश पर रखना रखना ये वैराग्य नियंत्रण नियंत्रण करना ये कहते हैं मतलब जो यदि आप घर वगैरह छोड़ के आपको वैराग्य चाहिए। घर छोड़ के

00:47:53:25 मतलब जो आप गृहस्थ आश्रम पालन कर रहे हैं तो गृहस्थ आश्रम पर ही आप घर सब छोड़ के मतलब आप जंगल में जाके मतलब जो आराम से बैठ गए आप तो मतलब मुझे वैराग्य चाहिए करके ये वास्तविक वैराग्य नहीं है। इसका नाम बोलते हैं अभाव वैराग्य। जी मतलब कुछ नहीं है तो अभी मान लीजिए हम एकादशी का दिन है व्रत करना चाह रहे हैं तो बहुत बढ़िया है अच्छी बात है परंतु हमारे घर पे कुछ भी नहीं है रोज एकादशी हो रहा है तो बोला मतलब मैं एकादशी रोज एकादशी कर रहा हूं मैं तो ऐसे अभाव वैराग्य नहीं होना चाहिए भाव वैराग्य होना चाहिए तो इस दृष्टि से क्या है मतलब आजकल मुझे कई बार फोन आ जाते हैं आपसे याद आया कि मैं जो है सन्यास लेना चाहता हूं जैसे घर में परेशानी होगी या किसी आजकल वो कन्या मोह बहुत होता है। तो जैसे किसी कन्या ने हृदय को आघात पहुंचा दिया। कुछ ऐसा कर दिया तो बस तुरंत मन में आ गया अब मैं जा रहा हूं। है ना? तो ये क्या हुआ? ये आपने कहा अभाव वैराग्य। भाव वैराग्य नहीं है। ये आपकी आपको विवशता हुई कि मैं इससे दूर रहूं इस संसार से तो आप जो है संसार से दूर जा रहे हो। हटके जा रहे हैं तो कितना हटके जाएंगे और नियंत्रण पूर्वक जाना। आपको फंसना ही पड़ेगा। इसलिए आप जब नियंत्रण करने लगेंगे तब अपने आप वो दूर वैराग्य आ जाएगा। जी जी तो यह सर्वधर्म

00:49:09:01 जो त्यागने की बात कही है इसमें मधवाचार परंपरा का क्या है? इसमें देखिए मैं क्या त्यागने को कहा है भगवान ने? इसमें जो भगवान श्री कृष्ण ने कहा भगवान वेदव्यास ने जो कहा मतलब भगवान वेदव्यास को भी हम साक्षात श्रीमन नारायण का अवतार के रूप में देखते हैं बंधु परंपरा पर मतलब जो उसमें भी हर एक जो कलयुग के कलयुग से पहले जो वेदव्यास महर्षि आते हैं वो स्वयं भगवान नहीं रहते हैं तो अभी वर्तमान जो युग है तो इसमें स्वयं वेदव्यास आकर मतलब इन्होंने रचना की हर दो-तीन युग के आगे मतलब आते तो इसलिए उनका उनका उनकी जो बात पर पूर्ण विश्वास रखते हैं तो उन्हीं के आधार बना के ही मतलब जो सारे शास्त्र बनाया है पद्वाचार्य जी ने तो इसलिए क्या है गुरु जी ने जो भी बनाया है तो उन्होंने उसमें बस एक ही बात है जो धर्म स्वधर्म को कभी छोड़ना नहीं है अपने कर्तव्य से मतलब जो हटकर कर्तव्य कर्मों से नहीं जाना कर्मों से कभी नहीं हटना इसका मतलब जो भक्ति के नाम पर कर्तव्य कर्मों से हटने की बात की जाए तो वो अनुचित बातें हैं जो ये लोग फैलाते हैं कि हमने भक्ति कर ली तो अब शास्त्र आगे वचन आपको दूसरा काम करने के लिए आपको अच्छा लगता है बिल्कुल करिए जो मैं वही बात पर आ रहा हूं जो ब्राह्मण कुल पर आया है उनको बिजनेस करने में अच्छा लगता है बिल्कुल कर सकते हैं उनके स्वभाव

00:50:24:04 वही होगा तो इसलिए उसमें उसमें रुचि हो रही है परंतु आप जो शारीरिक दृष्टि से जो मिला है उसके लिए आप जो घर पे जो आचरण है जो कम से कम जो जितना न्यूनतम आचरण है उसको तो रखने चाहिए उसको छोड़ के यदि आप सारे काम कर नहीं भी कर पा रहे तो अपने आप को पतित मानना चाहिए नहीं ना कि यह मानना चाहिए मैं जो कर रहा हूं वो सही है। जैसे कि बरसात के से बचने के लिए अगर हमने किसी के छत के नीचे वो ले लिया सहारा तो हम उसी को घर मान लें और फिर हम ये मान लें हमारा वास्तविक घर यही है वो तो घर है ही नहीं। बहुत बड़ा अपराध है। जी जी जी अच्छा थोड़ा सा आगे चलते हैं। बड़ी रोचक चल रही है। बड़ा आनंद भी आ रहा है। और मुझे लगता है हमारे दर्शकों को भी आ रहा होगा सुनने में। तो यह बात यहां से निकल के आई कि यह जो कहा जाता है इनके द्वारा कि भाई सभी धर्मों का परित्याग कर दो और केवल मेरी शरण मतलब भक्ति के नाम पर कर्तव्य कर्मों का त्याग कर देना यह नहीं कहा है भगवान ने है ना कर्तव्य कर्मों को करते हुए भक्ति करो है ना जी अच्छा अब एक प्रश्न आता है जो श्रीमद् भागवत है भागवत पुराण तो आपके यहां पर उसका भाष्य कौन सा पढ़ा जाता है मधवाचार परंपरा

00:51:39:20 उसमें प्रामाणिक जिसको माना जाता वास्तविक रूप में भागवत के लिए मधवाचार्य जी के परंपरा पर एक विजयध्वज तीर्थ महाराज जी आए हैं तो उन्होंने व्याख्यान लिखा है उस पर और परंतु दूसरी मतलब आपसे पहले मैं पहले से मैं बता रहा हूं मैं सबसे पहले मतलब व्याख्यान के रूप में उसको व्याख्यान माने या एक निर्णायक ग्रंथ माने भागवत तात्पर्य निर्णय करके मधवाचार्य जी ने एक ग्रंथ को रचना बहुत बढ़िया। उसमें उन्होंने क्या किया? हर विचार को उन्होंने नहीं लिया है। जहां पे मतलब जो विवाद नहीं है वहां उस पर बात करने की कोई जरूरी नहीं। क्योंकि जिस श्लोक बहुत स्पष्ट है तो उसको वहीं से समझ लीजिए जहां पे मतलब जो है संशयप्रद हो जाता है। क्योंकि अलग-अलग मतलब जो सामाजिक विचारों को सुनते मतलब वैसे तो मूल वाला ही पढ़िए। पर जो संशय पूर्ण है उसका इंतजाम उन्होंने कर दिया। जैसे आप आपने भी बताया था महाभारत तात्पर्य निर्णय का नाम लिया। वो भी वैसे ही है। महाभारत के लिए उन्होंने नहीं बनाया है। व्याख्यान के रूप में नहीं बनाया। एक निर्णायक ग्रंथ के रूप में उन्होंने बनाया क्योंकि जहां संशोधन करने चाहिए समझने पर संशय जैसे मान लीजिए बहुत सारे विचार हैं। हमें सीधा समझने पर हमें लगता है ये गलत है। मतलब

00:52:54:21 ऐसे वेदों पर भी ऐसे बहुत सारे वाक्य है तो इसका वेद का अपोरुषयत्व निर्णय करते समय यही लेते हैं। मतलब जो वेद ऐसे वेद वैदिक आचरण पर जैसे बताते हैं मतलब जो पुत्र काम पुत्रष्ट यजेता जो उनका मतलब पुत्रष्टि से या करने पर उनको पुत्र मिल जाता मिला नहीं तो क्या बात है तो झूठ हो गया क्या वेद मतलब जो गलत हो गया क्या अनर्थ हो गया क्या वेद अनृद्ध हो गया क्या ये सारे प्रश्न करते हैं वहां तो इसमें पूर्व पक्ष निर्णय पर पूर्व पक्ष के रूप में ये सारे प्रश्न करके उसके उत्तर समाधान ये देते हैं जी मतलब जब तक आपको वो फल मिलने के लिए कर्माशय पूर्ण नहीं होगा तब तक वो फल नहीं मिलेगा जी क्योंकि मान लीजिए हम कई बार ऐसे किसी मतलब जो ऐसे मतलब जो अंदर जो हमें एक बहुत ही मूल्य युक्त मतलब जो वस्तु को खोज रहे हैं हम तो हमने मतलब जो 90% हम चले गए हमें मिला नहीं हम वापस आ गए तो इसका मतलब हम फिर उसके ऊपर आक्षेप करते हैं कि मतलब जो इतना मैंने खोज लिया मतलब मिला नहीं मुझे तो इसका मतलब यहां कुछ है ही नहीं तो दूसरा आदमी ने जो 90% हमने खोज के मतलब वापस आ गई खोज के वापस आ गई तो उस 90% वो आराम से चल गई और बाकी उन्होंने 10% काम किया उनको को लाभ मिल गया। इसलिए है मतलब जहां तक हमें लाभ

00:54:10:00 नहीं मिलता है, फल नहीं मिलता है तब तक हमें कर्म को छोड़ना नहीं है। कर्तव्य से छोड़ना नहीं है। से छूटना नहीं है। तो ये मुख्य है वहां। जी जी इसको तो कर्मण्यवादी कारस्थे गदाचना भी कहा है और हम लोग इस बात को कई बार ऐसे देखते हैं ना कि हमें नहीं मिला। हम लोग ऐसे भी तो देख सकते हैं कि हमें क्या मिला? भाई हमें जो हम हैं क्या हमसे और पतित लोग नहीं है क्या हमसे और निकृष्ट अवस्था में लोग नहीं है इसका मतलब मैं हो सकता है कि मैंने जो ये किया है जैसे भगवान ने कहा कि तू मेरी शरण में आ जा तेरी प्राप्ति की रक्षा और अप्राप्ति की चिंता मैं करूंगा हमारे लिए क्या उचित है हमसे बेहतर भगवान जानते हैं तो हम जो प्राप्त करने जा रहे हैं हो सकता है वो हमारे लिए उचित ना हो तो भगवान ये अच्छा क्या होता है कि हमारी जो इंद्रियों की गति है वो व्यवहार में ही है तो भगवान तो तत्व से देख रहे हैं ना चीजों को वह जानते हैं ना कि इसके लिए जो है यह जो चीज के लिए प्रयास कर रहा है उचित नहीं है तो उसकी बजाय जो जो आपको सुख देने हो या जो भी भौतिक देनी हो चीजें वो आपको दे रहे हैं परंतु वो नहीं दे रहे तो इसलिए ऐसी बुद्धि रखना कि क्योंकि मैंने यज्ञ किया और यह प्राप्त नहीं हुआ तो ऐसी बुद्धि नहीं रखनी चाहिए। जैसे आप मधवाचार्य जी का जो बाकी भी व्याख्यान में देखिए जैसे गीता भाष्य गीता तात्पर्य भी उन्होंने दो-दो ग्रंथ लिखा

00:55:25:08 है गीता के ऊपर फिर भी संपूर्ण गीता पर भाष्य नहीं उसका जो अनुवाद नहीं किया है अच्छा अच्छा अच्छा मतलब जो इसमें जहां चाहिए वहां किया क्योंकि जैसे एक प्रसंग में ऐसे ले रहा हूं मैं आरुक्षर मुनेर योगम कर्म कारण मुच्छते योगारूढ़स तस क्षम कारण मुच्छते तो इसमें जो आरुक्ष मुनेर योगम मतलब जब तक आप ज्ञान योग तक पहुंचे नहीं तब तक आपको कर्म करने चाहिए जी उसके बाद आपको श्रम करने चाहिए तो श्रम का मतलब क्या है इसमें कुछ लोगों ने ऐसे व्याख्या की है मतलब जो कर्म निवृत्त जी तो कर्म निवृत्ति मतलब कर्म को छोड़ दो कर्म निवृत्ति का भी कुछ लोगों ने अलग-अलग प्रकार से अर्थ वही है सर्वधर्म प्रत्यक्ष कर्म छोड़ दो मतलब ज्ञान मिल गया तो कर्म छोड़ दो आप तो ऐसे परंतु आचार्य कहते हैं शम शब्द का वहां है समाधि अर्थ है समाधि का मतलब आपको ध्यान योग करने चाहिए कर्म कर्म तो कभी छूटेगा नहीं। कैसे छूटेगा? कुछ ना करना भी तो कर्म है। और इतना मतलब जो मैं एक पूरी शंकराचार्य बताते हैं कि मुट्ठी बंद है और खोल नहीं रहे हो। मुट्ठी बंद रखना भी एक कर्म है। एक कर्म है। ये इसलिए क्या है? कभी भी अपने कर्तव्यों से छूटना कभी नहीं है। धर्म का जो परित्याग तो सुताराम निषिद्ध है। मतलब जो किसी भी प्रकार से जी जी तो भागवत का अच्छा कुल मिलाकर के एक बात

00:56:40:09 तो स्पष्ट होती है कि भागवत की भागवत को समझने के लिए आप श्रीधर स्वामी की जो टीका है उस पर निर्भर नहीं है। आपके यहां अपनी परंपरा का अपना तात्पर्य है। भागवत तात्पर्य है। जहां भी समस्या है वह भागवत तात्पर्य के आधार पर ही देखेंगे और मतलब जो अह जो जिस परंपरा में उसमें भी मधवाचार्य जी का भी अनेक शिष्य थे उनके अनेक परंपरा चली है उसमें जिसमें हमारे महाराज जी आए थे इसी परंपरा में मतलब जो एक महान आए थे विजयध्वज तीर्थ नाम के उन्होंने मतलब जो उनका देख लेते हैं भागवत व्याख्यान है तो उसमें उनका देख लेते आप उस पर निर्भर नहीं कि आपको समझने के लिए श्रीमद् भागवत वो जो श्रीधर स्वामी जी के अपने समय के शंकराचार्य थे उनके उस पर आप निर्भर नहीं है। जबकि इस का अगर वो देखें तो वो श्रीमद् भागवत पढ़ते हैं श्रीधर स्वामी की। वो वो अपनी परंपरा जो आपकी क्योंकि अगर वो खुद को मधवाचार्य परंपरा का कह रहे हैं तो उनको यहां जो इन्होंने तात्पर्य निर्णय दिया पूज्य मधवाचार्य जी ने या फिर आप जो विजयध्वज आचार्य बता रहे हैं बहुत जो वरिष्ठ आचार्य हैं तो उनको उस पे निर्भर होना चाहिए था। जबकि वो वहां तक ना जाकर के वो निर्भर हैं। किस पर? शंकराचार्य परंपरा पे घोषित अपने आप को यहां मधुवा परंपरा पे मधवा परंपरा से संबद्ध कर रहे हैं। तो ये भी एक विचारणीय बात

00:57:55:13 हो जाती है जो क्वेश्चन रेज हो जाता है इस तो हम थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं। स्कॉन ये दावा करता है कि वो जो तात्पर्य बता रहा है ग्रंथों का वो एज इट इज बता रहा है। उसने अपनी भगवत गीता का नाम भी एज इट इज रखा है। और वो यह बताता है कि सबसे पहले ज्ञान दिया भगवान ने स्वयं भगवान ने। बीच में मधवाचार्य जी आए हैं। और अभी हम एज इट इज वही जो है जो भगवान ने दिया मधवाचार्य ने दिया। तो एज इट इज हम वही ज्ञान आपको दे रहे हैं। तो वैसे तो हमने भागवतम में यह देख ही लिया कि किस तरीके से आप मधवाचार्य परंपरा भागवतम के लिए श्रीधर स्वामी के पास नहीं जाती और क्या कहते हैं ये इस की जो तात्पर्य हां इस की जो इस के जो पूर्वाचार्य हैं जिन्हें वो अपना मानते हैं चैतन्य महाप्रभु उन्होंने श्रीधर स्वामी से ही श्री कृष्ण को समझा। यह उनकी ही किताबों में लिखा है। फिर भी वह अपने आप को मधवाचार्य परंपरा का कहते हैं और यह कहते हैं कि हम मधवाचार्य का एज इट इज ज्ञान दे रहे हैं। ठीक है? तो, यह तो एक बात रही। फिर भी एक बहुत मोटा सा उदाहरण मैं ले लेता हूं। भगवत गीता के 14वें अध्याय के 27वें श्लोक में यह आया है मधवाचार्य जी ने माना है कि जो भगवान हैं वही लक्ष्मी जी का आश्रय है। वहां माया शब्द आया है। तो माया को उन्होंने लक्ष्मी जी मानते

00:59:10:21 हुए कहा कि भगवान ही उस माया माया अर्थात लक्ष्मी जी का आश्रय है। और ये जो कहते हैं कि हम एज इट इज दे रहे हैं ज्ञान। इन्होंने वहां पर 14व अध्याय के 27व श्लोक में माया का अर्थ माना है निराकार ब्रह्म। यानी इन्होंने कहा निराकार ब्रह्म का आश्रय जो है वह भगवान है। तो यहां पे माया का अर्थ इन्होंने निराकार ब्रह्म माना और मधवाचार्य जी ने माया का अर्थ जो है लक्ष्मी जी माना प्रकृति माना है ना उसका आश्रय भगवान माना। तो क्या इतने बड़े अंतर के बाद भी हमें इसको एज इट इज मानना चाहिए। पहले तो थोड़ा सा इस अंतर के बारे में आप बताएं। पहले बात यह सोचना पड़ेगा क्योंकि अभी जो भी मतलब एज इट इज कह रहे हैं तो इसका पहले वो आप अपना मतलब जो स्थान क्या है मतलब जो ये पहले मतलब जो निर्णय करना पड़ेगा तभी तो हम एज इट इज कह सकते एज इट इज सब एज इट इज है। अब जैसे मान लेंगे अभी इसमें कुछ उपनिषदों में अलग-अलग आचार्यों का अलग-अलग अभिमत है। तो उसमें क्या है? उस वाक्य को हम किसी एक दूसरे से हम जैसे अभी शास्त्रार्थ करते हैं तो ये एक दूसरे को मना करते हैं। मतलब ये सब होता ही है। परंतु जिन्होंने बताया तो अपने अनुभव के साथ

01:00:25:27 बताया ये एक बात है। तो इसलिए अपने सीमित एक निर्णय ले सकते हैं अपने ढंग से। मैं ये नहीं कह सकता हूं आपने कैसे सोचा उसको ध्यान में रखते हुए मैं निर्णय नहीं ले सकता हूं। तो इसके आधार पर यहां आते हैं। तो इसमें क्या है देखिए तो इसलिए निराकार तो द्वेतवाद पर हो ही नहीं सकता। जी मैंने बोला निराकार होगा तो मतलब प्राकृतिक आकार नहीं है। बस इसी दृष्टि से होगा। वास्तविक रूप निराकारता नहीं हो सकती। जी जी तो फिर इसमें उस जगह पर मतलब जो ब्रह्मणो ही प्रतिष्ठा हम इस श्लोक पे आधार पर वहां पे क्या अर्थ है उसमें करने के लिए मतलब जो वहां ब्रह्म शब्द का मतलब जो निराकार ब्रह्मा ऐसे अर्थ करते हैं। तो ये माया का वो माया का अर्थ माया का अर्थ माया का अर्थ निराकार माया का अर्थ स्पष्ट रूप से मतलब जो वास्तविक रूप में क्या है मधवाचार्य जी ने माया शब्द प्रयोग कर दिया फिर उन्हीं के मतलब शिष्य ने उसी के मतलब जो परंपरा पे जैरर्थ्य मुनि ने मतलब जिस पर व्याख्या करते समय वो बोलते हैं माया का मतलब महालक्ष्मी तो माया का मतलब लक्ष्मी मतलब यहां पर लक्ष्मी माना है और यहां पर निराकार ब्रह्म माना है तो फिर हम इसको ये तो नहीं कह सकते कि मधवाचार्य जी का एज इट इज है ये नहीं मधवाचार्य जी का एज इट इज है तो तो नहीं नहीं है क्योंकि जितने भी व्याख्याकार ने मधवाचार्य जी

01:01:40:28 का साक्षात शिष्यों ने जितने भी मतलब जो इस पर बताया है वो किसी ने भी मतलब जो माया शब्द का कभी भी निराकारता पर मतलब निराकार ब्रह्म और इसमें एक निराकार वो भी ब्रह्म निराकार नहीं निराकार कोई नहीं है और माया शब्द का निराकार अर्थ को तो खुद मधवाचार्य जी खंडन करते हैं। अच्छा हां अच्छा अलग जगह पर ये इस प्रसंग में नहीं तो यहां पर एक चीज स्पष्ट होती है कि 14व अध्याय के 27व श्लोक में जो ये इस वाले दावा करते हैं कि हम एज इट इज दे रहे हैं ज्ञान तो इसका एक बहुत प्रखर उदाहरण है ये कि 14व अध्याय के 27वें श्लोक में माया शब्द का अर्थ इसॉन वालों ने निराकार ब्रह्म लिया है और वहीं पर मधवाचार्य जी ने माया शब्द का अर्थ लिया है। माता लक्ष्मी जी और इस बात का भी उन्होंने अह किसी और स्थान पर खंडन करते हैं मधवाचार्य जी कि माया जो है निराकार है। ऐसा ही नहीं निराकार नहीं है। माया शब्द का अर्थ है। हां। तो इस बात का भी मधवाचार्य जी ने खंडन किया है कि माया का अर्थ निराकार नहीं है। है ना? इस बात का भी खंडन किया है मधवाचार्य जी ने किसी और जगह। तो फिर यहां पर इसको एज इट इज कहना किसी भी

01:02:56:02 प्रकार से उचित सिद्ध नहीं होता है। जैसा कि अभी हमने बात की आचार्य जी से। जी अ ठीक है। अब इसमें एक बड़ा थोड़ा सा मुझे लगता है बचपने वाला प्रश्न है। पर क्या करूं? आवश्यकता है तो करना पड़ेगा। जो इस वाले हैं, वह अपनी भगवत गीता के 2.2 में यह लिखते हैं विष्णु भी भगवान नहीं है। विष्णु भी और इनके जो कुछ प्रचारक हैं कुछ मैं नाम नहीं ले रहा अभी वो बताते हैं कि विष्णु इतने परसेंट भगवान है। और कृष्ण और विष्णु में भी भेद कर रहे हैं। मतलब कृष्ण ही पूर्ण भगवान है। पूर्ण ऐश्वर्यवान है और विष्णु इतने परसेंट भगवान है। तो इसमें क्या मधवाचार्य जी का इसमें देखिए यदि सामान्य दृष्टि से ही मैं इसको समाधान दूं तो मधवाचार्य जी ने तो ईश्वर का मतलब परमेश्वर का परमपिता का परम ब्रह्मा का अनेक अवतारों को माना गया है। उसका मूल रूप को नारायण के रूप में माना गया है और उनके अनेक अवतारों को माना गया है। जैसे प्रारंभिक स्तर पर मतलब जो प्रजापति आदि मतलब जो अवतार के रूप में ईश्वर का ही स्वयं अवतार का रूप में माना गया है। उसके अलावा जो लौकिक अ

01:04:11:22 विचारों को मतलब जो स्पष्ट करने के लिए मतलब जो लोगों के लिए मतलब जो लौकिक विचारों पर भी मतलब जो कुछ स्पष्टता देने के लिए धर्म के बारे में क्योंकि हम केवल लौकिक पर ही हम रुक ना जाएं। हम यहां से धर्म की ओर जाएं। इस दृष्टि से भी मतलब जो अनेक अवतार लिया है जैसे भगवान श्री रामचंद्र, भगवान श्री कृष्ण। सो सभी लोग कहते हैं भगवान श्री रामचंद्र भगवान श्री कृष्ण। भगवान क्यों कहते हैं? भगवान का मतलब एक ही व्यक्ति हो सकता है जो षडेश्वर्य संपन्न है। वो डेडश्वर्य संपन्न एकमात्र व्यक्ति है वो परमेश्वर है। परम ब्रह्म। तो इसीलिए क्या है? उन्हीं के अवतार के रूप में मतलब जो मानते हैं और पूर्ण माना है। अवतार है। और अर्ध अवतार के रूप में कोई नहीं। उसमें भगवान का अंश सब जगह पर है। यह सभी लोग मानते हैं। भगवान व्यापक है तो सब जगह पर उनका अंश रहता ही है। और उसमें भी क्या है? कई बार विशेष अंश होता है। मतलब ये मानते हैं। परंतु ये ऐसे नहीं है कि मतलब जो आंशिक अवतार के रूप में बिल्कुल नहीं मानते हैं। क्यों मैं बताता हूं मैं? क्योंकि उसमें कुछ अवतार है पूर्ण अवतार के रूप में माना है। उसमें ये भगवान श्री कृष्ण है, भगवान श्री रामचंद्र है। वो सब है। मतलब और और भी अनेक अवतार हैं। परशुराम जी होंगे, वामन अवतार होगा। अवतार हो वो जो 10 और 24 अवतार होंगे वो तो होंगे ही पूर्ण और मतलब जो इसमें ये अनेक भागवत पर अनेक

01:05:26:24 प्रसंग पर मतलब जो अलग-अलग प्रकार के जो नाम आदि लेते हैं तो वो भी सृष्टि के प्रक्रिया पर प्रजापति आदि रूप को व्याप्त ये तो नारायण को भी कह रहे हैं कि कम परसेंटेज है इसमें भगवान की पूर्ण नहीं मान रहे वो मतलब जो देखिए इसका एक उदाहरण ये देते हैं मतलब जो ईश्वर का अवतार को समझाने के लिए एक उदाहरण देते हैं जैसे हम एक दीपक से दूसरा दीपक को जलाते हैं तो एक दीपक से आप 10 दीपक को जला दिया क्या मतलब पहले वाले दीपक पर मतलब जो उसके जो उसकी जो ज्वाला है वो कम हो जाते हैं क्या नहीं उस जितना पूर्ण ही रहता है ही रहता है नहीं तो ये पहले नहीं मान रहे ना विष्णु भगवान को पहले नहीं मान रहे ये कृष्ण भगवान को पहले मान रहे हैं वहां से फिर विष्णु जी इत्यादि का प्राकट्य मान रहे हैं कोई न्यूनता नहीं है यही विशेषता है ईश्वर का तभी तो अवतार है तभी तो होता है तभी तो अवतार है नहीं तो फिर आर्य समाज जी तो कहते ही हैं कि भगवान भगवान अवतार नहीं लेता। हां मतलब जैसे जो पूर्ण नहीं है वो वो भगवान नहीं है। अगर हम कम कर देंगे तो वो फिर अवतार थोड़ी ना कहलाएगा। ऋषि मुनि देवता के अंदर अंश विशेष रूप से रहता है। परंतु वो अवतार के रूप में नहीं कहा गया। नहीं कहा आंशिक कहा गया। आंशिक कहा गया। जैसे अगर हम में भी क्रेट ने कहता है मतलब जो मैं भक्तों के अंदर ही में रहता हूं मैं तो इसका मतलब वो भक्ति

01:06:42:00 के आधार पर वो रहता है वो बात अलग है। परंतु वहां ये नहीं कहा है वही मैं। और अगर हम यहां पर यह कह देंगे कि भगवान का जो यह सारे जो अवतार हैं वह इतने इतने परसेंटेज कम है या इतना परसेंटेज है तो वो अवतार माना ही नहीं जाएगा भगवान का क्योंकि भगवान का अवतार तो वही है जो पूर्ण हो केवल केवल प्रातीतिक ये है कि वो सीमित है एक होता है उसकी सीमा जो है प्रतीति अवतार होता है एक भगवान का सानिध्य होता है ये सानिध्य अलग है अवतार अलग है जैसे इसमें भी जो मूर्ति पूजन के बारे में भी बहुत जगह पर मतलब प्रश्न प्रश्न उठता है तब यह उसके लिए प्रमाण के रूप में ब्रह्मसूत्र का उदाहरण देते हैं। ना प्रतीक नहीं सहा यही उदाहरण यही प्रमाण के रूप में देते हैं। मतलब जो प्रतीक नहीं है उसके उसका कोई प्रतीक नहीं है और प्रतीक को हम उनके रूप में नहीं माना जाता है। तो ये इस पर मतलब जो इस पर भी मधवाचार्य जी यही कहते हैं वो प्रतीक नहीं है। परंतु प्रतीक ही वो नहीं है। परंतु प्रतीक ही नहीं चाहिए। ऐसे कभी किसी ने मना नहीं किया। आपको कुछ तो प्रतीक चाहिए। पहले मतलब जो जाने के लिए कुछ प्रतीक चाहिए। परंतु प्रति अब जैसे मान लीजिए हम कहीं एक जगह से दूसरे जगह पर जा रहे हैं। हमें आने जाने के लिए मतलब कोई गाड़ी चाहिए तो गाड़ी ही हमारे लिए परम जो वहां पहुंचने

01:07:57:06 का जो जगह नहीं है या उसमें परम श्रद्धेय का श्रद्धा का विषय नहीं है। हम कहीं जा रहे हैं तो वहां हमारा मुख्य विषय है। यह जाने के लिए जो रास्ते के लिए जो गाड़ी चाहिए उसको साथ में ले जाएंगे। जहां तक ले जा सकते हैं वहां तक ही ले जाएंगे। उसको फिर वहां छोड़ देंगे फिर। छोड़ना ही पड़ेगा। ऐसा नहीं कि मैं गाड़ी से गाड़ी ले आ गया हूं। ऐसे करके कहीं हम मतलब मंदिर पर जाने दर्शन करने के लिए जा रहे तो मंदिर के अंदर ही गाड़ी के साथ चले जाए। ऐसे नहीं हो सकता है। जी जी तो कहने का मतलब ये है कि विष्णु और कृष्ण में कोई अंतर नहीं है। और कृष्ण भी उतने ही हैं। पूर्ण जितने विष्णु हैं जितने विष्णु है जितने नारायण है उतने ही कृष्ण पूर्ण। तो यह जो इस तरह की व्याख्या करते हैं यह भी थोड़ा सा भ्रमित करने वाली होती है। यह समझना चाहिए। अच्छा इसमें एक चीज और है। जैसे कि ये बोल रहे हैं कि एज इट इज हम दे रहे हैं। जबकि ये कह रहे हैं कि कृष्ण जो स्वरूप है भगवान का उससे सब आगे बढ़ रही है। एक्सपेंड हो रही है। और जैसे मधवाचार्य जी ने इस विषय में क्या माना है कि कृष्ण से आगे चल रहा है मामला या नारायण स्वरूप से आगे चल रहा है। देखिए इसमें कोई किससे आगे चल रहा है यह बात ही मतलब थोड़ा सा मुझे कितना मतलब जो संबंध है मुझे

01:09:12:07 ये नहीं लग रहा क्योंकि कोई भेद ही नहीं है उसमें वो नारायण वो कृष्ण ही है हां कृष्ण ही है ये कहना कि कृष्ण से विष्णु आए या नारायण मतलब मूल रूप के मूल रूप के रूप से नारायण को मानते हैं परंतु उनको ये नहीं है कि वो केवल नारायण है वो कृष्ण भी है वो राम भी है वो राम भी है तो केवल एक यहां पे जो आया आया था जो एक उन्होंने उद्देश्य को लेकर मतलब जो लोगों के वो वो वो यह वाला जो रूप है ना जो यहां आया था जिसकी जन्माष्टमी मनाते हैं वो इसको इसी स्वरूप में भगवान को वहां पर स्थापित करते हैं और फिर कहते हैं विष्णु इनसे आए हैं बिल्कुल बिल्कुल है ना तो ऐसा तो मधवाचार्य जी ने नहीं माना नहीं किसी एक से मतलब वैसे नारायण से प्रारंभ हुआ ये भी वाक्य मिलता है मूल रूप के रूप में एक मानते हैं तो उसका मतलब मूल रूप का मतलब वो दूसरा नहीं है ऐसे नहीं मानते उसको वहां पर जब है तब आप मूल रूप अलग है, अवतार रूप अलग है। ये कह सकते हैं। परंतु दोनों में अंतर नहीं। केवल नाम अलग-अलग आ गया। और ये परसेंटेज वाली बात तो बिल्कुल भी नहीं है। कि वो विष्णु भगवान केवल इतने परसेंट भगवान है। ये इतना परसेंट भगवान में ना या किसी से बात नहीं हुई है। नहीं तो अवतारवाद का आप लोग चौपट करवा दोगे। अगर आप ये कहोगे कि इतना परसेंट क्योंकि भगवान तो वही है जो पूर्ण हो। जैसे ही आपने परसेंटेज बता दी कि इतना

01:10:27:10 परसेंट भगवान है तो वो भगवान सिद्ध ही नहीं हुआ। सुलक्षण घट और फिर जो है जो अवतार विरोधी लोग हैं वह कहेंगे अवतार नहीं लेता भगवान क्योंकि बाकी सब अवतार तो इतने परसेंट है ना तो ये बहुत बढ़िया एक रही तो कुल मिलाकर के बहुत सारी चीजें हमने जानी जैसे कि इस के द्वारा जो प्रचारित किया जाता है कि कर्म के आधार पर किसी को भी ब्राह्मण किसी को भी क्षत्रिय मूल रूप से तो ब्राह्मण ही बनाते हैं। मैंने नहीं देखा आज तक किसी को शूद्र भी घोषित किया हो ऐसी संस्थाओं ने तो कर्म के आधार पर कर्म का पर्यवसान सद्गति के लिए और उनके आगे भी जो प्रामाणिक जिसको वो कहते हैं गौड या वैष्णव इत्यादि वहां से जो डायरेक्ट जुड़े हुए कुछ लोग हैं शायद बलदेव विद्या भूषण है या और कोई हैं मैं ये एक एक संक्षिप्त बात है मतलब जो इसमें ये लोग कुछ लोग मतलब जो इसमें क्या करते हैं आजकल हम क्यों ब्राह्मण ना बने हम क्यों क्षत्रिय ना बने ये सब पूछ रहे हैं परंतु कोई क्षत्रिय हो या बाकी ब्राह्मण के ऊपर तो आक्षेप है ही है तो उनको छोड़ देते हैं। उनके नेक्स्ट अगले पर आते हैं। कोई क्षत्रिय हो या वैश्य हो कोई भी नहीं कहता है मैं शूद्र हूं। क्योंकि सभी लोगों के मन में यह है ये इसमें इस पर तारतम्य है। ये उच्चनीच भाव है। ऐसे लोग सोच रहे हैं। परंतु इसमें कोई उच्चनीच भाव नहीं है। भाव नहीं है। तो ये पहले समझना पड़ेगा। जो शब्द हैं ऊंचनीच

01:11:42:14 वाले वो व्यवस्था मूलक है। व्यवस्था मूलक वो घृणा मूलक नहीं है। जैसे हम छत के नीचे बैठे हैं तो हम नीच हो गए। इस हिसाब से छत के अनुसार तो नीच हुए ना? बिलकुल और मान लीजिए उसके ऊपर कोई रह रहा है तो उस व्यक्ति से हम नीच हैं। अब यह नीच घृणा मूलक शब्द नहीं है। जी कहते हैं मतलब जो वर्ण व्यवस्था को ऐसे मत देखिए ऐसे देखिए जो समान कक्ष पर देखिए लेफ्ट टू राइट देखिए लेफ्ट टू राइट देखिए ताकि मतलब अपना-अपना कर्तव्य एक-एक का अलग-अलग है वो कर रहे हैं। और सभी का मतलब क्या है? जब तक वो ब्राह्मण भी वेदा अध्ययन भी कर रहा है परंतु उसमें ईश्वर के प्रति समर्पणा भाव नहीं है तो श्रेष्ठ नहीं है श्रेष्ठ नहीं है वो कर्म उस कर्म से उनका कोई पुण्य मिलेगा ही नहीं निम्न है तो इसलिए परंतु ये निम्नता का निर्णय ईश्वर कर रहे हैं क्योंकि तात्विक दृष्टि से वही जानते हैं समर्पण है कि नहीं इतना हम मतलब जो उच्च नीच भाव को जीव योग्यता को निर्णय करने तक यदि हम बन जाए तो हमें मतलब जो हम यहां रह रहे नहीं हम भी खुद ईश्वर बन जाते हैं देवता तो बन ही जाएंगे कम से कम देता तो कम से कम तो क्योंकि हम जीव योग्य ्यता और जीव के स्वभाव का निर्णय नहीं कर सकते। इसलिए जो व्यवहार में हमें भौतिक भौतिक प्रमाण प्राप्त है उसके अनुसार व्यवहार होता है और क्योंकि तत्वतः ईश्वर आपके स्वभाव को आपकी जीव योग्यता को जानता है। उसके अनुसार आपका परमार्थ होता है। तो ये तो पहला चरण था जो हमने देखा था। दूसरा

01:12:57:27 हमने देखा कि ये इसमें हमने जो वर्ण व्यवस्था पर बात की तो उसमें हमने भगवत गीता चार 13 और जो ये वाली बात कही जाती जिसकी जीवा पर भगवान मेरे पास एक व्यक्ति एक दिन आया जिसकी जीवा पर भगवान का नाम हो वो जो है ब्राह्मण हो जाता तो मैंने कहा आजकल तोता भी बोलने लगा है ना वो जो मंडन मिश्र जी से शास्त्रार्थ हुआ था शंकराचार्य जी का उसमें वहां पर जब वो गए थे ढूंढने शंकराचार्य जी तो वहां पर तोता और मैना आपस में शास्त्रार्थ कर रहे थे तो भैया वो भी ब्राह्मण हो गए उनका भी जनेऊ कराओ फिर तो ये हो जाएगा तो खैर यह सब चीजें इसमें आ गई। इसके बाद हमने जाना कि मद संप्रदाय के सिद्धांतों को कुल मिलाकर के हम इस जाकर के नहीं पढ़ सकते। यह क्लियर है। ये आपको वास्तविक मधवाचार्य जी का उद्देश्य चाहिए। तो ये प्रारंभिक स्तर पर आप कुछ किसी भी माध्यम से आइए। परंतु आपको जो पूर्णता की ओर जाना है तो प्रामाणिक को प्रमाणिक विचार प्रामाणिक परंपरा प्राप्त जो उनके आचार्य उनसे ही पढ़ना चाहिए। जो अब इतना है कि हरे कृष्ण का जाप अगर कहीं सुन लिया तो उसमें करने में तो कोई आपत्ति नहीं वो तो आप करिए तो प्रामाणिक रूप से यदि मधवाचार्य जी के सिद्धांतों को आपको जानना है तो आपको जो मधवाचार्य जी की प्रामाणिक परंपरा है अभी भी सक्रिय है और अभी भी वो अपना काम कर रही है पठनपाठन

01:14:12:28 हो रहा है तो आपको उस ओर जो है मधवाचार्य जी के सिद्धांतों को जानने के लिए आगे बढ़ना चाहिए और यही इसका सार है। हमने एक चीज और जानी कि भागवत के निर्णय के लिए भागवत के अर्थ के लिए भगवान को समझने के लिए मधवाचार्य परंपरा श्रीधर स्वामी के ऊपर निर्भर नहीं है जो शंकराचार्य माने जाते हैं अपने समय के वो उनका अपना भागवत निर्णय है उनके पास और उसके बाद मधवाचार्य जी के बाद जो विजयध्वज नाम के आचार्य आए हैं उन्होंने भी प्रामाणिक व्याख्या की है। उसके ऊपर निर्भर है। वह जैसे इस वाले यह कहते हैं कि चैतन महाप्रभु ने भगवान को जाना श्रीधर स्वामी की भागवत से भागवत को समझ पाए श्रीधर स्वामी से तो इस प्रकार से इनके यहां पर नहीं है मधवाचार्य परंपरा में श्रीधर स्वामी की भाष्य पर निर्भर नहीं है मधवाचार्य परंपरा के जो अनुयाई हैं और अंतत गतवा ये जो विष्णु और कृष्ण में भी भेद कर रहे हैं नारायण और कृष्ण में भी भेद कर रहे हैं तो वो भेद मधवाचार्य परंपरा में नहीं माना गया है। ब्रह्ण उपनिषद में तो उन्होंने खुद कहा है ईश्वर के सभी अवतार पूर्ण होते हैं मधवाचार्य जी ने तो अंतत गतत्वा इस प्रकार से सार यही निकलता है कि यदि आपको विष्णु भक्ति नारायण भक्ति या उनके अवतारों की भक्ति करनी है और मधवा

01:15:28:09 संप्रदाय के सिद्धांतों के आलोक में करनी है तो आप मधवाचार्य परंपरा के प्रामाणिक लोग बैठे हुए हैं। उनसे आप संपर्क करिए। मैं इनका भी जो हमारे गौतम आचार्य जी हैं इनके बारे में भी कुछ जानकारियां डिस्क्रिप्शन में डाल दूंगा। आप बिल्कुल सीधे तौर पर आप प्रामाणिक परंपरा से जुड़िए। प्रामाणिक परंपरा के नाम पर अपने मंतव्यों की सिद्धि करने वाली किसी भी इस प्रकार की संस्था से जितनी हो सके दूरी बनाइए। वहां की जो सौंदर्य हैं जो हमारे धर्म की सीमा में आते हैं उनको प्रणाम करिए। उनका सम्मान करिए। उस उनकी अवज्ञा नहीं है। उनकी अवमानना नहीं है। परंतु सिद्धांतवादी रहिए। सिद्धांत निष्ठ रहिए। तो आप अगर कुछ थोड़ा सा कहना चाहे जी बस अंत में दो शब्द है कभी भी कर्तव्य को मत छोड़िए और आजकल हमें सनातन धर्म को मतलब बचा के रखना बहुत ही जरूरी है तो इसमें क्या है जितना आप कर पाएंगे तो उतना तो कर्म करिए जरूर तो वह भक्ति क्या है मेरे मेरे पास भक्ति है या नहीं इस पर ज्यादा विचार मत करिए जो पहले करने के लिए प्रारंभ कर दीजिए धीरे-धीरे से भक्ति आ जाएगी परंतु तो एक किसी भी विषय पर आग्रह रखना इतना ठीक नहीं होगा क्योंकि मैं मेरे पास जो मिला है उसके उचित आचरण मैं करूंगा

01:16:43:15 तो मतलब सबसे बेहतर तरीका है तो मैं किसी के मतलब जो वहां से कि मुझे वही बनना है उसका पद प्राप्त करना है कि मतलब मुझे करना है ये नहीं चाहिए तो इससे क्या है हम सामरस्यता के साथ हम समाधान के साथ अपने भी अंदर भी अपने अंदर भी मतलब जो तृप्ति के साथ हम ये सब काम कर सकते हैं तो ऐसे आप भी मतलब जैसे ऐसे धर्म कार्य को लेकर मतलब जो सनातन विचारों को लेकर मतलब जो आप ऐसे बहुत ही अच्छा कार्य कर रहे हैं। मतलब जैसे जगह-जगह पर जाके मतलब जो ऐसे बहुत ही मतलब क्षेत्र पर जाके बहुत विद्वानों से मिलके मतलब जैसे प्रामाणिक विचारों को लोगों को पहुंचाने का काम आप भी कर रहे हैं। तो आपके लिए भी बहुत-बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएं। आप सभी को सादर सभी सद्भक्तों को सादर प्रणाम। आचार्य जी का भी बहुत-बहुत आभार। उन्होंने इतना समय दिया और बहुत ही मैं कहूंगा कि बहुत कुछ जानने को मिला और मुझे मालूम है कि जो देख रहे होंगे उनको भी आज बहुत हृदय प्रफुल्लित हो जाएगा आपको सुनकर के। तो बहुत-बहुत साधुवाद इस मार्गदर्शन के लिए और आप सभी को यह चर्चा कैसी लगी अवश्य बताइएगा और फिर से मैं कहूंगा कि आपको भगवान कृष्ण की भक्ति करनी है। विष्णु की नारायण की भक्ति करनी है। पहली बात इनमें कोई भेद नहीं है। जन्म से जो वर्ण का पर जन्म से जो जन्म से वर्ण का

01:17:58:19 पर्यावसान है व्यवहार में और कर्म से वर्ण का पर्यावसान है परमार्थ में। और भक्ति के नाम पर कभी भी अपने कर्तव्य कर्मों का त्याग ना करें। और प्रामाणिक रूप से आपको यदि मधवाचार परंपरा के आलोक में भगवान नारायण की भगवान कृष्ण की भक्ति करनी है तो प्रामाणिक परंपराओं से जुड़े और कर्तव्य पर ही भक्ति जी जी भक्ति अलग नहीं है। भक्ति सब जगह पर भक्ति एक जी जी कर्तव्य कर्म भी भक्ति हां कर्तव्य कर्म भी भक्ति है। तो और अगर आपको मधवाचार परंपरा के आलोक में भगवान नारायण की भगवान श्री कृष्ण की भक्ति करनी है एज इट इज वाली एज इट इज ना वास्तविक एज इट इज वाली भक्ति करनी है तो प्रामाणिक आचार्यों से जुड़े प्रामाणिक परंपरा से जुड़े और ऐसी संस्थाएं जो इधर-उधर से कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा और भानुमती का कुबा जोड़ा ऐसी चीजें कर रही हैं। उनकी चीजें जो ग्राह हैं उनको प्रणाम करिए और उनसे बाकी जो उनकी असंगत चीजें हैं उनसे अपने आप को बचाइए। अपने परिवार को बचाइए। अपने धर्म को बचाइए। अपने राष्ट्र को बचाइए। जय श्री राम।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:19:25 · 07 Jun 2026

मध्वाचार्य परंपरा ने इस्कॉन को लेकर क्या कहा?

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