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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] तो सभी को जय श्री राम। मैं शिवश नारायण द्विवेदी पूरी शंकराचार्य जी का एक अल्पज्ञ शिष्य आप देख रहे हैं आहान कॉल ऑफ ध YouTube चैनल और हमारे साथ में इस समय आचार्य जी हैं। गुरुकुल कांगड़ी में हम लोग हैं। माना जाता है और हमने देखा भी है कि आर्य समाज के बहुत सारे विद्वान यहीं से पढ़कर के निकले हुए हैं और आज अलग-अलग जगह पर प्रसिद्धि पा रहे हैं। तो आज वह जो हब है जहां से आर्य समाजी विद्वान निकल रहे हैं। आज हम वहीं पर बैठे हैं और यहां के एक विद्वान हमारे साथ बैठे हैं। इन्होंने बहुत सारा कार्य किया है। पर मैं थोड़ा सा इन्हीं के माध्यम से आपको बताना चाहूंगा। सर्वप्रथम थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप अपने बारे में एक थोड़ा सा कुछ संक्षिप्त जो बताना चाहें। जी मैं पंडित लक्ष्मण वैद पथिक हूं। मैं रूप कांगड़ी में आज से 14 साल पहले यहां आया था। पाकिस्तान से मैं यहां गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में आया था। भगत सिंह का ट्रायल भी लेकर आया था वहां लाहौर हाई कोर्ट से और उसका फिर मैंने वो उर्दू में और इंग्लिश में था तो उसका हिंदी में अनुवाद किया था। और उसके बाद यहां वातावरण हरिद्वार का बहुत अच्छा लगा और यहीं रह गया और

00:01:17:06 उसके बाद धीरे-धीरे मैंने वेदों पर भी काम किया और महर्षि दयानंद सरस्वती ने जो वेद भाष्य किए तो उनके यजुर्वेद भाष्य उनको मैंने खुद टाइप किया और उसको छपवाया भी और वो हम बांट भी रहे हैं। 24 टंकारा में स्वामी दयानंद जी के दो समय जन्म जयंती पर उनका उद्घाटन वहां टंकारा गुजरात में हुआ था और वेदों के पढ़ने के बाद यह मालूम हुआ यह पता लगा तो वेद से बढ़कर कुछ भी नहीं कोई ग्रंथ उसके सामने नहीं टिकता पोरेश है परमात्मा की वो दिव्य वाणी है आकाशवाणी है वो वेद उनका कोई मुकाबला नहीं बहुत ही सुंदर परिचय बताया और बताया कि इनको विभिन्न दर्शन शास्त्र इत्यादि में अ पारंगत है और पाकिस्तान से यहां पर आए हैं लगभग 14 वर्ष पूर्व आपने बताया और यहां पर स्थापित है हरिद्वार में और इन्होंने जैसा कि बताया इन्होंने ग्रंथों पर भी बहुत काम किया है और एक तो मैंने इनका ग्रंथ देखा है अभी-अभी इन्होंने बताया यजुर्वेद का जो भाष्य है दयानंद जी का वो भाष्य इन्होंने स्वयं दोबारा से प्रकाशित करवाया है नए रूप में

00:02:33:10 तो थोड़ा सा ईश्वर के बारे में आप थोड़ा सा बताएं आचार्य जी आर्य समाज के कहता है और वेद भी यही कहता है परमात्मा निराकार है जी बाकी जितने भी मत पता है वो कहते हैं नहीं परमात्मा आकार में है अवतार भी धारण करता है आर्य समाज सिरे से इस चीज को खारिज करता है कि ईश्वर अवतार लेता नहीं है और वेद भी यही कहता है तो परमात्मा कहीं आता जाता नहीं है। उसके पास टांग नहीं लगी हुई जो कहीं इधर से गया उधर से गया। वो तो संसार में ऐसी कोई जगह ही नहीं है जहां वो मौजूद नहीं है। वो तो हर जगह है। तो फिर आने जाने के लिए तो उनको जरूरत पड़ती है जो जिनका अस्तित्व है वो आज गुरुकुल कांगड़ी में अगर बैठा हुआ है तो हर की पौड़ी पे चला जाए। फिर वहां से देहरादून चला जाए। देहरादून से दिल्ली चला जाए। ये सारा अस्तित्व का खेल है परमात्मा का इसलिए कोई अस्तित्व नहीं है। वो निराकार है। वो सर्वशक्तिमान है। अच्छा आचार्य जी इसमें एक प्रश्न आता है कि जो ईश्वर है आर्य समाज के अनुसार जैसे आपने बताया कि वो कहीं आता जाता भी नहीं है। निराकार है। तो ईश्वर हम जीवों के व्यवहार का विषय कभी बनता है कि नहीं बनता है? मनुष्यों के व्यवहार का विषय मतलब जो हमारे व्यवहार में आ सके

00:03:48:16 हम उसे समझ सके। जैसे अभी भी ईश्वर तो यहां आसपास भी है मगर अभी हमारे व्यवहार का विषय नहीं है। है ना? तो क्या कभी ऐसा होता है कि व्यवहार का विषय बने जब हमें लगे कि हां ईश्वर से हम इस समय जुड़े हुए हैं या इस ईश्वर को फील कर पाए। जी। ईश्वर को फील करने के लिए पहले तो उसकी वाणी को समझना होगा। आपको अगर कहीं किसी भी व्यक्ति को या किसी भी समाज को समझना पड़ेगा तो आपको उसको मूल जड़ में जाना पड़ेगा। जी जी। परमात्मा की वाणी जो है वो वेदों को कहा गया है। वेद सबसे पुराने ग्रंथ हैं। वेदों से सारी भाषाएं बनी है। वेद सब का आचार्य जी वो शब्द प्रमाण के अनुसार तो वो एक अलग बात हो गई। अभी जैसे हम लोग बैठे हैं ना इंद्रियों के द्वारा अंतःकरण के द्वारा या सूक्ष्म शरीर के द्वारा या स्थूल शरीर के द्वारा क्या ईश्वर हमारे व्यवहार का विषय बनता है? आर्य समाज के अनुसार

00:04:41:27 जब हम अपने शरीर से शब्द प्रमाण तो वो तो अलग चीज हो गई। जब हम अपने शरीर से जो हमारा जो पंच भौतिक शरीर है या फिर उसमें अंतःकरण है मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार है। इनमें से किसी मतलब किसी एक स्तर पर क्या हमारे हमारे शरीर के अंदर जो आत्मा रहती है, उस आत्मा में विराजमान है परमात्मा। विराजमान तो सब जगह है। ऐसा थोड़ी ना कि उस आत्मा में ही है। जब आदमी अच्छे कर्म करता है, सत्य कर्म करता है, धर्म के कर्म करता है, परोपकार के कर्म करता है, देश के हित में करता है काम। तो धीरे धीरे धीरे परमात्मा के व्यवहार में उनके आ जाता है। उनको यह फीलिंग्स आ जाती है। तो कोई ऐसी अद्भुत अदृश्य शक्ति है जो नहीं ये फीलिंग तो ठीक है कि कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो चला रही है जो अच्छा कार्य करने को मुझे प्रेरित कर रही है वो वो तो है और शब्द प्रमाण भी है। जैसे सीधे हमारे व्यवहार का विषय जैसे चार ऋषियों के अंतःकरण का विषय बना ना हां तब उसने वेद दिए वेद दिए तो ऐसे व्यवहार का विषय ईश्वर बनता है तभी तो चार ऋषियों को उसने वेद दिए ये सृष्टि के आरंभ में चार ऋषियों को इसलिए वेद दिया उस वक्त जब ये सृष्टि की रचना भी व्यक्त के अनु जी जी तो चार ऋषि जो है ये युवा अवस्था में पैदा हुए थे ना जी चारों और मतलब

00:05:57:13 तृष्ट तिब्बत जैसे आजकल पहुंचते हैं और सिंधु के किनारे ही वो आता है और मैं भी उसी सिंधु धरती से आता सिंधु पूरा पहले पंजाब कुछ नहीं था यह कश्मीर सारा सिंधु में काउंट होता था सिंधु देश में सिंधु प्रदेश में आता था तो इन चार ऋषियों को परमात्मा ने समाधि अवस्था में ये ज्ञान प्राप्त कराया था मतलब कि ईश्वर उन चार ऋषियों के व्यवहार का विषय बना उनके माध्यम से हमें पता लगा तो ये वेद वाणी जो है ये परमात्मा की वाणी है तो महाराज जी इसमें फिर ये आता है कि जैसे ईश्वर उन चार ऋषियों के व्यवहार का विषय बना जी और और किसी के व्यवहार का विषय वह नहीं बना केवल चार चार ऋषियों के उन पे हुआ यानी कि देशकृत परिस्थिति से सीमित रूप में वो व्यवहार का विषय बना व्यवहार का विषय बना उसके बाद जो है फिर महाराज मनु आए नहीं मैं दूसरी बात पूछ रहा हूं मैं ये पूछ रहा हूं कि जैसे जो ईश्वर सर्वव्यापक है है ना वो केवल चार ऋषियों के व्यवहार का विषय बन रहा है मतलब केवल चार ऋषि उसके उसके साथ व्यवहार कर पा रहे हैं उसको देख समझ पा रहे उसको जान पा फिर बताया ना बाकी अपने शिष्यों को बताया और उनहीं के माध्यम से ब्रह्मा जी को भी मिला तो जैसे ईश्वर तो सर्वव्यापक है तो फिर वो केवल चार ऋषियों

00:07:12:14 के व्यवहार का विषय कैसे बना हां ये सही सवाल आपने पूछा चार ऋषियों के ये है कि ये जो सृष्टि हम देख रहे हैं इसको एक अरब 96 करोड़ साल और कुछ लाख वर्ष हुए हैं आप गणित में भी करते हैं ये और वेद के अनुकूल भी यही है लेकिन उसमें ये भी लिखा हुआ है तो ये सृष्टि है ये पहली बार नहीं हो रही है। ऐसी मतलब कई बार हो चुकी है। अनंत समय से चली आ रही है। और उन चार ऋषि यही पवित्र आत्मा रही होंगी जब प्रलय काल आया होगा ना तब तो इसलिए परमात्मा ने उन चार ऋषियों को ही ये ज्ञान प्राप्त करवाया ताकि उन्हीं के माध्यम से फिर लोगों को मिले। नहीं मेरा प्रश्न कुछ और है। जैसे ईश्वर सब जगह है। जब वो व्यवहार में आएगा तो सबके व्यवहार में आएगा। और अगर वह केवल चार ऋषियों के व्यवहार में आ रहे हैं। सबके व्यवहार में फिर कर्म थ्योरी जो है ना सुनिए सुनिए तो मेरा प्रश्न ये है वो वो नहीं आ रहा है वो तो अच्छी बात है नहीं आना चाहिए मगर प्रश्न मेरा ये है कि ईश्वर तो सब जगह है और जितने जीव हैं सब उसमें फैले हुए हैं सब जीवात्मा है अब वो ईश्वर जो है अब है वो सर्वव्यापक मगर फिर भी वो कंट्रोल करते हुए केवल चार ऋषियों के उसमें आ रहा है व्यवहार में है ना केवल चार ऋषियों के व्यवहार में

00:08:27:15 वो आ रहा है तो क्या इसे नहीं मानेंगे कि वह एक तरीके से अभी दिखाई देने वाला स्वरूप नहीं है। परंतु फिर भी अवतार ले रहा है क्योंकि वह तो सर्वव्यापक है। अगर वह सर्वव्यापक होते हुए व्यवहार का विषय बनेगा तो सबके व्यवहार का विषय बन जाएगा। मगर वो वो ये रेगुलेट कर रहा है। वो ये निश्चित कर रहा है कि मैं केवल चार ऋषियों के ही अंतःकरण का विषय बनू। केवल चार ऋषियों के अंतःकरण का विषय बनू। तो यहां पर यह इसको एक अवतार जैसा नहीं माना जाए क्योंकि वह सर्वव्यापक है। वह एक देश हो रहा है। जब वह व्यवहार का विषय बन रहा है। है ना? तो वह एक देश रूप में व्यवहार का विषय बन रहा है। जबकि वह है सर्व्यापक तो इसको एक देशी बनने को क्या कहा जाएगा? सृष्टि के आरंभ में एक देसी सृष्टि चलाने के लिए उनको ज्ञान देने के लिए किसी को तो चुनना। वो तो अच्छी बात है। अगर आप कहेंगे उन चार को नहीं चिंता दूसरों को चुनता। वो सही बात है। वो सही बात है। सबके व्यवहार में ऐसे नहीं है। आप नहीं मैं वो नहीं कह रहा। मेरा मैं एक्चुअली दूसरा दार्शनिक प्रश्न है ये कि जब ईश्वर सर्वव्यापक है तो वो एक देशीय हो रहा है ना यहां पे व्यवहार का विषय बन रहा है ये पूछ रहा हूं मैं एक देसी वो चार लोगों के म अलग-अलग हो रहा है चार देसी एक देसी सही कह रहे हैं आप जी हो रहा है लेकिन उनको वो समाधि अवस्था में मिल रहा है ना ऐसे जागृत अवस्था में नहीं मिल रहा वो मतलब समाधि अवस्था में

00:09:42:24 वो जब ध्यान करने बैठ रहे हैं तो परमात्मा का परमात्मा का जो है ना शरीर में आना असंभव है हो ही नहीं सकता वो आत्मा में ही विराज विराजमान रहते हैं। वेद कहता है आर्य समाज भी कहता है तो परमात्मा के जो दर्शन है वह आत्मा परमात्मा को साक्षात्कार करता है। ये आंखें नहीं कर सकती। आप गीता को भी देख लीजिए जब मैं आंखों से आंखों से करने के लिए नहीं कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि जब वो सब जगह था फिर भी वो इनके उसमें आया। व्यवहार में आ गए। व्यवहार में तो यानी एक देश हुआ ना यहां पर। इनके व्यवहार में मंत्र आए ना। परमात्मा थोड़ी आया। परमात्मा के मंत्र आए ना। तो परमात्मा से ही आए हैं ये कैसे पता लगा? हम भी तो परमात्मा से आए हैं ना। हमें भी बनाया है जो ये तो परमात्मा ने बनाया है। व्यवहार में तो नहीं है। उसमें यह हुआ ना कि ईश्वर ने उनके अंतःकरण में उपदेश किया। उनके अंत बिल्कुल समाधि अवस्था में उनको मंत्र आए। अलग-अलग ऐसे नहीं एक बार में ही आए। समाधि अवस्था में ही सही। मगर ईश्वर एक देश हुआ ना वहां पर। सृष्टि के आरंभ एक देशी परमात्मा कैसे आप कह सकते हैं? एक देसी है। क्योंकि वो सिर्फ चार ऋषियों के अंतकरण में आ रहा है ना। नहीं वेद वाणी चार ऋषियों के अंतकरण में आई है ना परमात्मा तो सब में परमात्मा नहीं आया उनके अंतकरण में किन के अंतकरण परमात्मा तो मौजूद है ना पहले से आया कैसे नहीं उसने उपदेश किया ना उनको उपदेश

00:10:58:04 किया तो उन्होंने उसके लिए समाधि और ध्यान लगाया ना यानी जो समाधि और ध्यान लगाएगा उसके व्यवहार का आज भी ऐसा ही है। यानी जो समाधि और ध्यान लगाएगा उसके लिए ईश्वर एक देशी होकर उसके व्यवहार का विषय बन जाएगा। एक एक दे ईश्वर एक देसी भी तो रहता है ना मतलब एक देसी अगर मैं कर्म अच्छा कर रहा हूं तो परमात्मा मुझे वह प्रेरणा देगा तो वो मेरे लिए तो एक देसी ही होगा ना मतलब एकदेशी रूप में मतलब प्रकट होता है एक तरीके से वो आंखों वाला प्रकट नहीं अंतःकरण का जो विषय अंतकरण में जो मतलब जागृत होती है उनकी जो ध्यान शक्ति है जिसे योग बोलते हैं वो बिल्कुल हो सकता है यानी कि सर्वव्यापक होते हुए भी ईश्वर अंतःकरण का विषय बन सकता है जो व्यक्ति ध्यान समाधि लगाए उनके अंतःकरण का विषय बन सकता है। एक देश हो सकता है। एक देश उनके वो एक देश अगर एक ही आदमी करेगा तो उसको तो एक को ही मिलेगा ना वो। हां जो व्यक्ति सिद्ध होगा जो व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करेगा। जिसको वो योग्य समझेगा उसके अंतःकरण का विषय बन जाएगा। मैं आपको वही उदाहरण दे रहा था। तो वहीं पे कृष्ण ने जब अर्जुन को एक मिनट वहीं पे बगल में दूसरा व्यक्ति होगा। उसके अंतःकरण का विषय नहीं बनेगा। जो व्यक्ति जो व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर रहा है उसके अंतकरण का विषय बनेगा वो ईश्वर को पहचान भी लेगा वो

00:12:13:10 पहचान लेगा वो जान लेगा जी जी ऐसा ही है हां तो ये तो ठीक है कि वो एक देश होता है ईश्वर भाई एक देशी वो उसी के लिए होगा ना जो उसी तरह की उपासना कर्म करेगा यानी ईश्वर साधना करेगा ईश्वर जिसको चाहेगा चाहेगा ईश्वर नहीं चाहेगा ईश्वर को उसी को आत्मा को चाहना है ना अगर हम कर्म ही अच्छे आत्मा जब सही काम करेगी तब ईश्वर चाहेगा उससे अलग है। ईश्वर यदि चाहेगा जब वो देखेगा इसने योग्यता प्राप्त कर ली है तो वो उसके व्यवहार की सीमा में आ जाएगा और उसके अगल-बगल जो योग्य नहीं होंगे उनके व्यवहार की सीमा में नहीं आएगा। बिल्कुल नहीं। इसी को ईश्वर का प्रकटीकरण माना जा सकता है। हां ईश्वर का वो अंतकरण में प्रकट होना फीलिंग्स होती है। महसूस होता है उसको वो अलग ऐसे ही है ना जी जी अगर हम सबके एक आप देखो एक चीज है आप कमाने जाते हैं। ऐसे थोड़ी है सभी घर वालों को सैलरी मिल जाए। वो तो आपको ही मिलेगी ना। अब उपासना एक आदमी कर रहा है तो उसी को मिलेगी। यानी कि ईश्वर ईश्वर को जब ये समझ में आ गया कि ये व्यक्ति योग्य है तो वो चाहे तो समझ में नहीं आ गया। ईश्वर को समझ सब अरे मतलब एक व्यवहार व्यवहारिक उससे कह रहा हूं जब जिसने अच्छे कर्म किए कर्म के अनुसार ईश्वर ये डिसाइड करता है कि भाई मैं इसके व्यवहार में आ जाऊं अंतःकरण

00:13:28:19 के व्यवहार में आ जाऊं है ना और बाकी क्योंकि वो दूसरों के व्यवहार में नहीं आ रहा है तो सर्वव्यापी होते हुए भी वो एक देसी ऐसा प्रतीत होता है फिर है तो सर्वव्यापी मगर आ एक के व्यवहार में रहा है क्योंकि उसने सिद्धि प्राप्त की है एक के व्यवहार में आ रहा है यानी ईश्वर ये चाह रहा है कि मैं सबके सबके फीलिंग में ना आऊं सबके व्यवहार में ना आऊं केवल इस व्यक्ति के व्यवहार में आऊं तो वह आ जाता है वो वही तो बता रहा हूं उसी का ही तो फल है उसकी भक्ति का उसकी उपासना उसकी योग सिद्धांत का यही तो फल है अच्छा एक चीज है इसमें कि जैसे दयानंद जी लिखते हैं सत्यार्थ प्रकाश में कि जब तक ईश्वर समझाएगा नहीं ज्ञान नहीं देगा तब तक आपको कुछ ज्ञान नहीं होगा नहीं ऐसा कहीं नहीं लिखा लिखा है उसमें लिखा आप मुझे दिखा दीजिए सत्यार्थ प्रकाश हो तो आप उनका धर्म का ज्ञान मतलब जो करना है व्हाट टू डू धर्म का ज्ञान ईश्वर की प्राप्ति कहा उन्होंने कहा है भगवान की लगातार प्रभु परमात्मा की आपको निरंतर उपासना पूजा ये नहीं नहीं एक जगह उन्होंने लिखा है ईश्वर के बिना दिए ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता ये कहा उन्होंने नहीं वो चार वेदों वाली बात आप एक मिनट अगर सत्यार्थ प्रकाश आपके पास हो तो सत्यार्थ प्रकाश ले आना तो

00:14:43:22 नरेंद्र वेद की ईश्वर से होने की आवश्यकता कुछ भी नहीं है। क्योंकि मनुष्य लोग क्रमशः ज्ञान बढ़ाते जाकर मतलब अपने आप ज्ञान बढ़ाते जाकर पश्चात पुस्तक भी बना लेंगे। तो इन्होंने कहा कभी नहीं बना सकते क्योंकि बिना कारण के कार्यत का होना संभव है। जैसे जंगली मनुष्य सृष्टि को देखकर कभी भी विद्वान नहीं होते। जब तक उनको कोई शिक्षक ना मिल जाए तो विद्वान हो जाते। मतलब शिक्षक मिलने पर विद्वान हो जाता। और अब भी किसी से पढ़े बिना कोई विद्वान नहीं होता। इस प्रकार जो परमात्मा उन आदि सृष्टि के ऋषियों को वेद विद्या ना पढ़ाता और वह अन्य को ना पढ़ाते तो सब लोग अविद्वान ही रह जाते यानी ईश्वर के बिना दिए ज्ञान नहीं होगा जब तक ईश्वर ज्ञान देगा जब तभी ज्ञान वो तो आपने कहा चार ऋषियों को मिला तो उनके पूर्व जन्म में कर्म ऐसे रहे हां बस वो वही वही पूर्व जन्म के कर्म इस जन्म में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया जो ईश्वर उनको पूर्व जन्मों के प्रभाव के कारण और उन्होंने फिर उसी को ही अपनाया सब कुछ पूर्व जन्म से मिलता है ना जैसे मैंने कहा यह जो आपका शरीर है ब्राह्मण का शरीर भी पूर्व जन्म से मिलता है यह तो कुछ नहीं मैं आपको एक बात बताऊं मैं बहुत डिबेट करने के लिए देवबंद भी जाता हूं मुसलमान डिबेट करने अच्छा हां जबरदस्त क्योंकि मुझे अच्छे से आती है अच्छा अच्छा अच्छा तो अभी तक एक चीज स्पष्ट हुई कि

00:15:59:08 ईश्वर जिसको योग्य समझता है उसके वो पूर्व जन्मों के कारण या उसके कर्मों के कारण तो ईश्वर सर्वव्यापक होते हुए भी किसी जिसको उसने उसने समझा है योग कि उसके व्यवहार का विषय बनता है। अंतःकरण के व्यवहार का विषय बनता है। जी और क्योंकि वो उसके अगल-बगल के लोगों के अंतःकरण का व्यवहार का विषय नहीं बनता तो एक देश सा प्रतीत होता है। है वो सबके अंतःकरण में सबके मगर व्यवहारिक में भी वही बाहर भी वही है। सब जगह सब जगह वही सब जगह वही आपने एक यजुर्वेद एक मिनट मैं पूरा कर तो होता सब जगह है वो मगर क्योंकि उसने किसी को योग्य समझा तो वो उनके व्यवहार का विषय बन गया योग्य है ना उसी के कर्म के इसलिए इसलिए वो एक देश सा होता प्रतीत होता है और उसका आना जाना भी प्रतीत सा होता हुआ दिखाई वो पहले भी था अंतःकरण में वो पहले भी था मगर उसने जब किसी को योग्य समझा तो वो अंतःकरण का विषय बन गया व्यवहार का और जब वह व्यवहार का विषय बना तो यह प्रतीत हुआ कि भाई ईश्वर व्यवहार में आया व्यवहार से गया। यह प्रतीत हुआ ना इसको ऐसे कह सकते हैं। तो जैसे वो चाहता है कि मैं इसके द्वारा इसके अंतःकरण के द्वारा जाना जाऊं। वैसे क्या

00:17:14:09 वो ये भी कर सकता है कि मैं इसकी आंखों के द्वारा देख लिया जाऊं। नहीं ऐसा इसमें कोई प्रमाण नहीं है। वेद में तो कोई वो देखने की वस्तु नहीं है। अच्छा वेद में प्रमाण नहीं है इसलिए हम नहीं मानते। हां इसलिए नहीं अच्छा है। अच्छा ठीक है इसको तो बाद में रखते हैं। अच्छा इसमें एक चीज यह और आती है जैसे ईश्वर ने सृष्टि बनाई है तो जब जैसे ईश्वर यहां चुनाव कर रहा है कि मैं इसके अंतःकरण का विषय बनूं सबके ना बनूं क्योंकि ये योग्य है। इसी तरीके से सृष्टि बनाते हुए ईश्वर व्यवहार करता है पदार्थों के साथ। हम है ना? कि कहीं पे उसे सूर्य बनाना है। कहीं पे उसे चंद्रमा बनाना है। न्याय न्यायकारी होना। जैसे इसमें कहा दयानंद जी ने एक व्यापक दृष्टि से कहा कि अगर ईश्वर को पूरी दुनिया में न्याय करना है वो अगर वो न्यायकारी इसमें कहा तो उसका सर्वव्यापक होना जरूरी है। अगर वो एक जगह बैठा होगा तो पूरी दुनिया में न्याय नहीं कर सकता। कर सकता तो इसका मतलब व्यापक क्रिया के लिए उसका व्यापक होना आवश्यक है। है ना? हम पर वहीं पर जब न्याय करेगा तो हर एक व्यक्ति के साथ अलग-अलग न्याय होगा। किसी कर्मों के आधार पे। किसी को किसी को छोटी सी चोट पहुंचानी है। किसी को बड़ी बड़ा दंड देना है। उनके कर्मों के उनके कर्मों के आधार पे छोटी बड़ी जन्म से बीच में जवानी में

00:18:29:15 वृद्धि में तो वो उनके मतलब सर्किल जैसेजैसे घूमेगा तो इसमें ये आता है कि जैसे व्यापक जब देखा गया क्रिया को कि व्यापक रूप से न्यायकारी होने के लिए ईश्वर का सर्व्यापक होना आवश्यक है। तो उसी तरीक़े से जब छोटे-छोटे स्तर पर अलग-अलग न्याय होंगे, अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग न्याय होगा। तो वहां उतने-उतने में उसका विशेष बल शक्ति इत्यादि लगेगी। विशेष सर्वव्यापक तो लगेगी नहीं। सर्वव्यापक लग जाएगी। सबके साथ एक जैसा न्याय हो जाएगा। है ना? अलग-अलग अलग है। अलग-अलग बल, शक्ति प्रयुक्त होगी। अलग-अलग तो वो शक्ति के रूप में ईश्वर ही है या कोई और है? शक्ति के रूप में न्याय करने वाला एक ईश्वर ही है। ईश्वर है। मतलब जो जो शक्ति अलग-अलग लग रही है, कहीं पर कम, कहीं पर ज्यादा, कहीं पर कुछ और, कहीं पे कुछ और तो ये शक्ति भी ईश्वरी है। सब ईश्वरी है। तो यहां पे शक्ति के रूप में भी वो अलग-अलग रूप धारण कर रहा है। कहीं पे छोटा, कहीं पे बड़ा। इस तरह से अलग-अलग रूप धारण कर रहा है। ऐसा मान सकते हैं। जैसे जैसे मान लीजिए किसी के सर पे ईश्वर कभी रूप धारण करता ही नहीं। रूप रूप नेत्रों वाला नहीं। रूप नेत्रों वाला नहीं। ईश्वर सर्वव्यापी है। मगर किसी के सर पर ईंट गिरानी है केवल। उसके कर्मों का फल है। ईंट गिरना है। है ना? और किसी के सर पर चट्टान गिरानी है। है ना? इसी को

00:19:44:19 समुंदर में तो चट्टान गिराते टाइम वो बड़ी शक्ति के रूप में अपने आप को प्रकट करेगा और ईंट गिराने ईंट गिराते टाइम वो कम शक्ति का प्रयोग करेगा। क्योंकि इस चट्टान वाली शक्ति यहां उपयोग कर देगा तो उसको वो वाला फल मिल जाएगा। यही तो इसी को ही तो बोलते हैं ईश्वर। वो जैसेजैसे आप कर्म करके अगर आपने किसी को नहीं नहीं वो वो मैं मान रहा हूं मतलब कि ईश्वर अपने आप को अलग-अलग स्तर की अलग-अलग पैमाने की शक्ति के रूप में प्रकट कर रहा है। आवश्यकता अनुसार आवश्यकता अनुसार किसको कहां कैसा न्याय देना है। है ना? जैसे मान लीजिए कि कहीं पे पृथ्वी बनानी है और कहीं पे कुछ नहीं बनाना है। है ना? और कहीं पे क्या होना है कि कहीं पर पृथ्वी से भी बड़ा ग्रह जुपिटर बनाना है या सूर्य बनाना है। तो पृथ्वी जहां पर पृथ्वी बनेगी वहां पर वह कम बल लगाएगा और जहां पर जुपिटर या सूर्य बनेगा वहां ज्यादा बल लगाएगा। है ना? परमात्मा बल लगाता ही नहीं है ना। वो सर्वशक्तिमान का मतलब है वो सब कुछ कर सकता है लेकिन वो कभी भी प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाता। बलबल उसको लगाने की तो इच्छा मात्र से होता है। वो वो मिट्टी बनाई है। हम मिट्टी कारण है यहां। जी जी का जी लेकिन घर तो लोगों को बनाना है ना कैसे ईंट

00:20:59:20 बना रहा है कैसे कर रहा है बर्तन मिट्टी से चाहे कुछ भी बनाए छोटी बड़ी साइज कुछ भी रखे हाइट वो आदमी कर सकता है परमात्मा ने मिट्टी का एक तो परमात्मा जल का एक ही स्वरूप दिया अग्नि का एक ही स्वरूप तो दिया है तो परमात्मा का एक स्वरूप दिया तो परमात्मा फोर्स नहीं लगाता कहीं भी फ़ नहीं लगाता केवल इच्छा करता है उनकी तो इच्छा मात्र से होता है तो जैसे वेद कह रहा है उसके अनुभूति तो यहां पर यह बात आती है कि जो क्या कहते हैं जड़ पदार्थ को ईश्वर की इच्छा प्राप्त किस रूप में हुई जो उसने हरकत कर दी निर्माण के लिए ये सब सृष्टि जो है ना छोटे-छोटे कणों में अणु परमाणु आपने सुना होगा उसी से बनी है ना हां हां उसी से बनी है जैसे तो कैसे मतलब जैसे वो एक चीज प्रकृति भी मतलब तीन चीजें अनादि है अनादि काल से नहीं अनादि है जैसे ये जो कण है या मान [गला साफ़ करने की आवाज़] लीजिए एक पत्थर मान लीजिए यह यहां से यहां सरका हां तो ईश्वर क्योंकि सृष्टि बनानी थी इसलिए सरका वह ठीक है मगर ईश्वर की अगर यहां पे शक्ति आके टकराई नहीं हम तो फिर ये कैसे सरक गया ईश्वर की इच्छा हुई वो तो ठीक है मगर ये सरका कैसे इच्छा हो सरकने के लिए तो जो है ना वो दूसरा उसे पदार्थ कोई भी हो जैसे पानी है हवा

00:22:14:21 है या गंपन है कोई दूसरा ऐसा पदार्थ जो उसको धक्का देगा उसी उसी के कारण तो सरकेगा ना अपने आप थोड़ी चलेगा तो यानी ईश्वर की शक्ति काम करेगी ना वहां पे बिल्कुल करेगी ईश्वर की शक्ति तो यानी कि ईश्वर अलग-अलग जगह अलग-अलग स्तर के कार्यों के लिए अलग-अलग शक्ति के रूप में प्रकट हो रहा है एक गलत प्रकट नहीं हो रहा प्रकट आंखों वाला नहीं हो रहा अभी भी वो सही है आप मैं समझ गई ना आपको नहीं जाने मतलब मतलब जैसे जो है परमात्मा की वो ऐसे ही काम करती है रूप से कैसे जैसे आप बता रहे हैं हां मतलब अलग-अलग स्तर पे अलग-अलग कार्य करने के लिए अलग-अलग स्तर स्तर पर उस शक्ति के रूप में प्रकट हो रहा है। वहां पर जैसे पत्थर को सरकाना है तो कम शक्ति के रूप में प्रकट हो के सरका दिया। चट्टान को सरकाना है तो ज्यादा शक्ति के रूप में प्रकट हो के सरका दिया। शक्ति तो वहां माननी पड़ेगी ना। तो अभी तक आप लोगों ने जो वीडियो देखा वो हम एक दूसरे स्थान पर थे। वहां पर गर्मी के कारण थोड़ा सा टेक्निकल इश्यूज आ रहे तो अभी हम आचार्य जी के अह जो कार्यालय है वहां पर बैठे हुए हैं। अह आचार्य जी अह मतलब अभी तक हमने ये स्पष्ट किया कि सर्वव्यापी होते हुए भी ईश्वर अलग-अलग प्रकार के कार्यों के लिए करने

00:23:29:27 के हेतु से जो अलग-अलग स्तर की शक्ति के रूप में प्रकट होता है। तभी वह कार्य संभव हो पाता है। है ना? जैसे चट्टान और छोटे से पत्थर में अंतर है सरकाने का या न्याय करने के लिए भी कि न्याय करना है तो ईश्वर को सर्व्यापी होना आवश्यक है। ये बात तो सही है। मगर न्याय एक ही प्रकार का तो होना नहीं है। होना नहीं है। सबके साथ अलग-अलग कार्य क्योंकि कर्म ही अलग-अलग है तो कर्म अलग-अलग हो जाएगा। तो न्याय अलग-अलग है। तो न्याय अलग-अलग है तो न्या उसका जो न्याय को करने वाली जो शक्ति है वो अलग-अलग स्तर की होगी। अगर एक ही प्रकार की शक्ति लग जाएगी सर्वव्यापक और अनंत तो वो तो सबके साथ एक जैसा व्यवहार हो जाएगा। ऐसे नहीं होता ना। जी जी वह अलग-अलग जैसे आप किसी जज को समझ लो वहां जैसे कोई फ़ाइलें ले जाता है तो अलग-अलग हिसाब से होता है। जज तो वही होता है लेकिन उसके फ़ाइल के आधार पे या उसके जो करतूत होते हैं या कर्म होते हैं उसी के आधार पे वो दंड न्याय देता है। अलग-अलग स्तर की शक्ति के रूप में ईश्वर कार्य करता है प्रकट होकर। उनके कर्मों के आधार वो सर्वव्यापक है। उससे कुछ भी अलग नहीं है। सब उसके साथ ही जुड़े हुए हैं। उसके अंदर ही है सब। जी जी तो जैसे अह ईश्वर निश्चित देश और काल में किसी जड़ पदार्थ के व्यवहार का विषय बन रहा है। उसको इधर से उधर फोर्स के रूप में सरका रहा

00:24:45:01 है। तो वैसे क्या वो प्रकाश के मार्ग में भी बाधा बन सकता है? क्षेपक जैसे ईश्वर जब शक्ति के रूप में क्षेपक बनता है तभी कोई जो पदार्थ है वो इधर से उधर सरकेगा। हम मूव करेगा। तो शक्ति के रूप में ईश्वर को ईश्वर को छेपक बनता है। तब वो कोई पदार्थ इधर से उधर सरकता है। तो इसी प्रकार से जैसे वो पदार्थों को सरकाने के लिए क्षेपक बन रहा है। निश्चित देश और काल में उसी प्रकार से क्या वो प्रकाश के मार्ग में भी क्षेपक बन सकता है। जैसे बादल आ जाते हैं बीच में कई बार तो प्रकाश के में बाधा तो पड़ ही जाती है ना। नहीं तो वो पदार्थ तो बादल रहा ना। हम वो पदार्थ तो जड़ रहा। जड़ रहा। जड़ अपने आप काम नहीं करता। उसको शक्ति चाहिए पीछे से। जड़ की यही है तो जड़ जो भी चर अचर है संसार जी जी जी उसके लिए तो अलग-अलग सिद्धांत है ना जी मैं मैं ये पूछ रहा हूं जैसे किसी भी जड़ पदार्थ को इधर से उधर ले जाने के लिए ईश्वर बिना दिखाई देते हुए क्षेपक बन रहा है उसको एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है क्षेपक बन करके ठीक है तो जिस प्रकार से वो जड़ पदार्थों को इधर से उधर ट्रेवल करा रहा है क्षेपक बनके उसी प्रकार से प्रकाश के मार्ग में बाधा हो जाए। ऐसा छेपक बन सकता है।

00:26:00:02 वो बाधा नहीं बन सकता। बाधा यहां तो बन रहा है। कैसे? जड़ पदार्थ इधर से उधर सरका। कैसे? कि उसको एक फोर्स टकराई उससे। धक्का दिया किसी फोर्स ने। तभी तो जड़ पदार्थ इधर से उधर सरका। नहीं वो इसलिए सर कहा कि वहां वो जो जड़ है उसको तो किसी दूसरी चीज से वो मिला ना। कौन सी दूसरी? जैसे भूकंप आ गया या कोई तूफान समझ लो या चट्टान का टूटना है माना उसको कोई दूसरा कारण देना पड़ेगा ना तो वो जो भूकंप आया भूकंप भी तो ईश्वर ने ही दिया ना सब वही ईश्वर तो देगा तो पहली शक्ति प्राथमिकता से जो शक्ति है वो तो ईश्वर की माननी पड़ेगी ना हां हां उनकी तो जैसे मान लीजिए पृथ्वी है भूकंप का मतलब हिलाना पृथ्वी हिली तो पृथ्वी हिली कैसे के ईश्वर ने शक्ति के रूप में क्षेपक बनके पृथ्वी को धक्का दे दिया तो हिल गई भाई शक्ति के रूप में उसको कहीं अब सिर्फ ईश्वर नहीं करता है ना मतलब गैस है जैसे तो वो गैस वो सारे जड़ पदार्थ है ना हां जड़ पदार्थ पहली उसको प्राथमिक शक्ति तो चाहिए ना ईश्वर से बिल्कुल ईश्वर ही तो करता है ना उसको एकत्र तो वो करता है ना ये तो टूटी हुई है तो करता है तो इसका इसका मतलब वो जड़ पदार्थों के लिए देश काल की सीमा में आकर विशेष होता है वो

00:27:15:03 सर्वव्यापक है पर वो विशेष होता है विशेष कार्यों के लिए वो वो विशेष हो जाता है। ये सारी चीजें पहले आप ये समझो तो ये है जीव के लिए है ना। ये सब जीवों के लिए है। हम अपने आप तो कुछ नहीं है ना ये और परमात्मा भी जीवों के कारण ही परमात्मा को मानते हैं। लोग तो परमात्मा भी हैं। अगर ये तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति नहीं मैं वो नहीं कह रहा। मैं नहीं आप पहले इस बुनियाद को समझे ना बात को तभी तो समझेंगे ना। जी वो उन्हीं के अकॉर्डिंग काम करता है ना। काम तो कर रहा है मगर हम उस काम जैसे हम नल से पानी निकाल रहे हैं। आप नदी से पानी निकाल निकाल निकाल के अगर पीछे से पानी नहीं आएगा तो एक दिन वही ठप हो जाएगी ना। अब इसमें ये कहेंगे ये परमात्मा ने बंद कर दिया। नहीं मैं वो मैं अलग दिशा में जा रहा हूं। मैं आपने कहा कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई या ईश्वर ने न्याय किया। ये आपने माना। अब मैं उस न्याय जो उसने न्याय करने की विधा है उसको मैं थोड़ा डेप्थ में जा रहा हूं। गढ़ में जा रहा हूं कि उसने न्याय किया होगा तो कैसे किया होगा? अगर ईश्वर न्याय न्याय जीवों के साथ होता है। न्याय जीवो के साथ होता है और सृष्टि रचना जड़ पदार्थों के द्वारा होती है। वो सब से जुड़ा हुआ है ना? जुड़ा हो गया। तो अब मैं इसके अंदर जा रहा हूं कि ईश्वर अगर न्याय करता है तो सब जीवों के साथ एक जैसा न्याय तो कर नहीं सकता। नहीं करेगा ना वो और ईश्वर एक जैसा है।

00:28:30:07 ईश्वर एक जैसा है सब जगह। तो एक जैसा न्याय नहीं करना है। अलग-अलग प्रकार का न्याय करना है तो ईश्वर को अपनी अलग-अलग प्रकार की शक्ति के रूप में वहां पर उपस्थित होना पड़ेगा। तब वो अलग-अलग प्रकार का कार्य हो पाएगा संपन्न। ईश्वर तो उपस्थित कहां से होना है? वहां हाथ से तो गायब ही नहीं है ना। वो तो वहां है मौजूद ऑलरेडी। आप कहां उसको गायब करोगे जो वो उपस्थित होगा? तो फिर कैसे वो छेपक के रूप में कैसे उसने सरकाया जड़ पदार्थों को? ईश्वर है। ईश्वर पहले से है। मगर वो अभी अभी वो छेपक नहीं है। हम यहां वहां हाथ ले जा रहे हैं। ये मेरा जड़ जड़ पदार्थों से बना हुआ हाथ है। मैं इधर-उधर ले जा रहा हूं। उससे कुछ नहीं टकरा रहा। मगर यही जड़ पदार्थ में आप घुमा रहे हैं। हां तो ईश्वर कुर्सी को घुमाएगा तो ये उधर जाएगी। ईश्वर यहां भी है ना? ईश्वर यहां भी है। मगर मेरा हाथ टकरा नहीं रहा। ठीक है। टकरा टकरा नहीं रहा। मगर मगर मगर जब ईश्वर को इसी पदार्थ से षष्ठी रचना करनी है। इधर से उधर ले जाना है तो मेरा हाथ इधर-उधर नहीं घूमे। वो जिधर ईश्वर चाहता है फिर उधर ही जाएगा। तभी तो सृष्टि रचना होगी। सृष्टि रचना जड़ पदार्थों से जब ईश्वर करता है तो अगर वह क्षेपक नहीं बनेगा तो जड़ पदार्थों को पार करके अलग निकल जाएगा। नहीं ऐसे नहीं मैं जी

00:29:45:15 आपकी आत्मा आप ने देखी है कभी आत्मा नहीं देखी ना नहीं नहीं देखी ना लेकिन आपको ये पता है नहीं शरीर तो मेरा यही रहता है हम मैं ईश्वर को मानने से मना नहीं कर रहा हूं आज नहीं नहीं मैं ईश्वर को मान रहा हूं मैं आपको बता रहा हूं ये स्थूल आकार आपको किसने दिया है ये परमात्मा ने दिया लेकिन आत्मा आपको परमात्मा ने नहीं दी है ठीक है अनादि है प्रकृति भी अनादि है परमात्मा केवल उसको जोड़ता है तो ये जो जोड़ता है ये जो जोड़ता है ये ये फोर्स के रूप में काम किया क्षेपक बना ना गौर से समझ लो आप उसको देखिए हुआ क्या आपने एक प्रश्न किया कि ईश्वर अगर अह प्रकट हो रहा है उपस्थित हो रहा है तो फिर पहले कहां था आपने ये कहा ना तो मैं वो बता रहा हूं कि वो पहले भी था मगर क्षेपक नहीं था मगर जब वो जोड़ता है तो क्षेपक बनता है पदार्थों के लिए पहले भी था मगर छेपक नहीं था आप कुछ भी कर लीजिए कोई कहीं टकराएंगे नहीं मगर जब वो जोड़ता है तो वो पदार्थों के लिए क्षेपक बनता है कि चार अलग-अलग ईंट ईंटें रखी हुई है। उसको एक जगह इकट्ठा करना है। तो ईंटों के लिए वो छेपक बना। चल इधर हम है ना? एक जगह इकट्ठा हो। हम लोग किसी भी सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं तो हम उसके लिए छेपक बनते हैं ना। तभी वो सामान सरक सकता है। उसके पास अपनी तो कोई शक्ति है नहीं। तो वही मैं कह रहा हूं। जैसे वो पदार्थों के लिए क्षेपक बन रहा है सृष्टि रचना करने

00:31:00:19 के लिए। क्या वो उसी प्रकार से सूर्य के प्रकाश के मार्ग में क्षेपक बन सकता है या नहीं? नहीं बन सकता ना। पदार्थों के लिए बन सकता है। पदार्थों के लिए तो बन ही सकता है। तो यह भी तो जड़ पदार्थ ही है। सूर्य की रोशनी जड़ पदार्थ तो सूर्य की रोशनी तो बराबर आ रही है। जा कहां रही है? जो छह तक उसमें आप जो कह रहे हैं बने सूर्य की रोशनी तो 24 घंटे अवेलेबल है। लेकिन मैं पूछ रहा हूं वो बन सकता है कि नहीं? छह पक टकरा सकता है कि नहीं? नहीं टकरा सकता ना। टकरा नहीं सकता। तो सृष्टि रचना कैसे होगी? फिर जैसे ईश्वर ने इच्छा की। अब इच्छा करने के बाद यदि शक्ति है ईश्वर की और वह जाकर के टकरा रही है पदार्थों से पदार्थ बन रहे हैं। निर्मित हो रही है सृष्टि तब तो ठीक है। मगर मैंने इच्छा की मगर पदार्थों तक मेरी कोई शक्ति नहीं गई बनाने के लिए तो फिर पदार्थ कैसे बन गए? पृथ्वी कैसे बन गई? सूर्य कैसे बन गया फिर?

00:31:57:13 चलिए ठीक है। छोड़िए। नहीं नहीं ये आप जो बात पूछ रहे हैं हम तो आपको वेद के आधार पे हम तो साथ में थे नहीं ना परमात्मा। जो वेद कह रहा है उसी के अनुकूल बता रहा है। मतलब लॉजिकली लॉजिकली ये संभव है कि अह जो मैंने जो पूछा आपसे उसमें लॉजिकली तो ये आ रहा है कि जिस प्रकार से सृष्टि बनाने के लिए ईश्वर जड़ पदार्थों से टकराएगा तो प्रकाश से भी टकरा सकता है। और अगर प्रकाश से नहीं टकरा सकता तो जड़ पदार्थों से भी नहीं टकरा सकता तो फिर इसका अर्थ है कि सृष्टि भी नहीं बना सकता। अब वेद में यह लिखा है जितने भी सूर्य में प्रकाश है या जितने भी चमकीले पदार्थ हिरण्य उसका कारण वही है वह परमात्मा के कारण है ना मुसलमान भी अच्छा एक चीज और एक चीज और है एक चीज और है जैसे मैं किसी व्यक्ति को पुश करता हूं गिराता हूं है ना मान लीजिए कि कोई दुबला पतला व्यक्ति मेरे सामने तो मैंने उसको पुश किया वो मुझे संभाल नहीं पाया वो गिर गया मेरे धक्के को संभाल मैं हट्टा कट्टा हूं और मैंने खाया पिया हुआ है हम तो ये जो मेरे पास जो शक्ति है धक्का देने की हम हम अंत में इसका अधिष्ठान क्या है? अंत में वैसे तो मैं खाना खा रहा हूं तो मुझे मिल रही है। खाना कहां से मिल रहा है? सूर्य से मिल रहा है। हम सूर्य की एनर्जी से कहीं से समय सूर्य से आता है। ठीक है? तो सूर्य से आया ये इनको पेड़

00:33:12:21 पौधों को। मैंने पेड़ पौधों को खाया तो मुझे जो है एनर्जी मिल गई। उस एनर्जी से मैं किसी को पुश कर सकता हूं। मेरे पास शक्ति है। तो इस एनर्जी का आखिरी अंतिम स्त्रोत क्या है? मतलब सूर्य को यह एनर्जी कहां से मिली? सूर्य को कहां से मिली? ईश्वर से। यही तो है ना ईश्वर से मिली। ईश्वर से मिली। प्रकाश ईश्वर से मिला। इसका मतलब ईश्वर के पास ये फोर्स कर देने वाली शक्ति है। तभी तो आई मेरे पास। आप वैसे एक बात समझे ना? हां। मैंने अच्छा। ईश्वर मैं मैं समझ गया। छोड़िए। मैं समझ गया। आगे बढ़ते हैं। सुनिए। आत्मा आत्मा को ईश्वर शरीर दे सकता है जिससे वह काम करता है। परमात्मा ऐसे थोड़ी है कि पत्थर में भी प्राण डाल दे। ऐसा मुमकिन ही नहीं है। मैं ये नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं अगर आत्मा के पास शरीर है और शक्ति है। दोनों चीजें हैं। दोनों शरीर है और शक्ति अगर जैसे मैंने खाना नहीं खाया चार दिन तो मेरा शरीर बेकार हो जाएगा। बिल्कुल हो जाएगा। ये तो ये प्रकृति है ना? हां। तो मुझे शक्ति कहां से मिली? सूर्य से। सूर्य सूर्य की वजह से वो आप कहीं से भी समझ लो। लेकिन मेन कारण नहीं साइंस ये मानती है जो पौधा बड़ा होता है विज्ञान की दृष्टि से भी पौधा बड़ा होता है सूर्य से होता है सूर्य से शक्ति लेता है और सूर्य के पास शक्ति

00:34:27:25 कहां से आई तो हमें मानना पड़ेगा ईश्वर ने उसको वो ऊर्जा दी तब वो लपट बन करके वो जो है अग्नि के रूप में वो एक बड़ा गोला है और तब उससे उत्पन्न होने वाली ऊर्जा इनको मिलती है प्लांट्स को और हम इनको क्योंकि पाते हैं भोजन के रूप में तो हमें मिल जाती है। अब यह गीता में भी आपने देखा होगा गीता के तीसरे अध्याय में कर्म ब्रह्मोद भव विधि ब्रह्माक्षर समुद्भव जी तस्मात सर्वगतम नित्यंम यज प्रतिष्ठितम परमात्मा जो है वो रोज यज्ञ में लीन है ये यज से सृष्टि बनी है अब भगवान कृष्ण की बात बता रहा हूं लेकिन वेद तो पहले ही कहता है कि यज्ञ जो है इसी से सृष्टि पैदा हुई है ये हवन कुंड है उसका परमात्मा का ये सूर्य से मिलता है सूर्य हवन कुंड है परमात्मा का एक तरह मतलब सूर्य से जो परमात्मा की शक्ति शक्ति है वो सूर्य सूर्य को प्राप्त होती है। फिर सूर्य से हमको प्राप्त होती है भोजन के माध्यम से। तो इसका मतलब यह है कि यह जो शक्ति है धक्का देने वाली वो ईश्वर में है। किसी चीज को इधर से उधर सरकाने वाली शक्ति क्यों नहीं है? है ना? सर्वशक्तिमान है परमात्मा। ये शक्ति है उस पे। इसका मतलब यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर छे अभी सर्वव्यापक है पर क्षेपक नहीं है पर वो जहां पर चाहता है छेपक बन के छेपक बनने वाली शक्ति के रूप में प्रकट होता है

00:35:43:08 तभी तो पदार्थ इधर से उधर करते हैं मतलब ताकत का एक लगा रहे हैं कि वो आज नहीं हो रही है 10 साल बाद हो रही है या पांच साल बाद हो रही है वहां ऐसे क्यों हो रही है नहीं नहीं मैं ये नहीं कह रहा मैं ये कह रहा हूं कि जब भी सृष्टि निर्माण होगी जैसे मान लीजिए ये ये पदार्थ है जड़ पदार्थ ठीक है तो जब भी ईश्वर को इस जड़ पदार्थ से सृष्टि बनानी है मतलब इस जड़ पदार्थ जैसे और सारे इकट्ठा करके और गोला बनाना है एक पृथ्वी का ठीक है तो जब इस जड़ पदार्थ को कहीं सेट करना होगा तो ईश्वर इसको एक जगह से दूसरी जगह ले जाएगा ऐसे ऐसे इकट्ठा करेगा ना इकट्ठा आपने कहा जोड़ता है तो जोड़ता है तो मतलब पुश करेगा पुश करेगा तो यहां पे जो पुश हो रहा है वो एक निश्चित अनुपात में उसकी शक्ति वहां काम करेगी है ना सर्वव्यापी अगर पुश करेगा अगर सर्वव्यापी भी पुश करेगा तो सब जगह वही हरकत होगी। नहीं आप उसको मिला के क्यों बात कर रहे हैं? किसको मिला? सर्वव्यापी का अलग मकसद है। वह तो पूरे संसारक है। बस बस बस बस वो अलग-अलग भी तो काम करती है ना। अब अब क्लियर हो गया। तो इसका मतलब ईश्वर सर्वव्यापी है। पर अपनी आवश्यक मतलब इच्छा अनुसार वो निश्चित देश काल परिस्थिति में जो जड़ पदार्थ इत्यादि हैं उनसे टकराने का विषय बनती है। उनके लिए क्षेपक बनती है। शक्ति के रूप में वो बनता

00:36:58:14 है ईश्वर। अब छिपक का क्या अर्थ है? क्षेपक मतलब जिस जैसे छिपक होता है ना जो स्पेस घेरती है जो स्पेस घेरती है म स्थूलकार जो नहीं स्थूल स्थूल भी कह सकते हैं मतलब जैसे ये मेरा हाथ है ना अगर इसके बगल में कोई छेपक पदार्थ होगा तो मेरा हाथ इसको पार नहीं कर पाएगा अच्छा मतलब और क्षेपक नहीं होगा तो मेरा हाथ इसको पार कर जाएगा है ना छेपक होगा तो मेरा हाथ इसको पार नहीं कर पाएगा क्षेपक होगा तो पार पार नहीं कर पाएगा क्षेपक नहीं होगा तो पार कर जाएगा तो जब ईश्वर को सृष्टि बनानी है तो उसे छेपक बनना पड़ेगा ना पदार्थों के लिए कि भाई तू इधर से इधर चल और अगर वो क्षेपक नहीं बनेगा तो वो तो पार निकल जाएगा पदार्थ उसके

00:37:44:02 चलिए छोड़िए इसको छोड़िए दूसरा आगे चलते आगे करते आप साइंस वाली बात कह रहे हैं ना कि जैसे ये मतलब अच्छा साइंस नहीं मानती कोई बात नहीं ठीक है चलिए अच्छा अब इसमें एक बात आती है कि हमारी जो जैसे हमारे यहां विवाह होते हैं हम तो क्या हमारे यहां पर जैसे आर्य समाज में विवाह होते हैं? आजकल आर्य समाज के मंदिर हैं जगह-जगह वहां विवाह होते हैं। देते भी हैं। जी सर्टिफिकेट देते हैं। तो क्या मतलब आर्य समाज में केवल हिंदुओं का ही विवाह होता है, सनातनियों का होता है, केवल सनातनियों का ही विवाह होता है या अधर्मियों का भी होता है? विवाह तो सनातन परंपरा से ही होता है। लेकिन वह सनातनियों का ही होता है। जब कोई मतलब शुद्धि होकर आता है तो उनका भी होता है। मतलब किसी दूसरे धर्म का जैसे मुस्लिम धर्म है। कोई दूसरे धर्म से आ रहा है हिंदू बनके सनातन बनके और उसी पद्धति से वो विवाह करना चाहता है। जी जी तो उसी पद्धति से होगा। सनातन की पद्धति से होगा। मतलब आर्य समाज में उन्हीं का विवाह होता है जो धार्मिक हो। अधर्मियों का विवाह नहीं होता। कुल मिलाकर के अधर्मियों का नहीं होता। वह कन्वर्ट हो के आ गया। अधर्मी किससे ले रहे हैं? अधर्मी दूसरे

00:38:59:18 अधर्मी जो जो आर्य समाज धर्म से कांसेप्ट कर रहे हैं। नहीं नहीं नहीं अधर्मी का मतलब जो वैदिक सिद्धांतों को ना मानता हो। नहीं वैदिक वैदिक धर्म है और अधर्म जो वैदिक को धर्म को ना माने और धर्म को एक मकसद खासियत भी होती है। एक धर्म का मतलब मजहब होता है। नहीं वो मैं उसकी बात नहीं कर रहा। आप किसकी कर रहे हैं? मैं उसकी कर रहा हूं कि जो वेद वैदिक सिद्धांत को ना मानता हो, वैदिक धर्म को ना मानता हो। मैं उसकी कर रहा हूं। नहीं विवाह तो वैदिक धर्म के अनुकूल ही होगा। वो माने ना वो अलग चीज है। यानी कि अधर्मी का भी हो जाएगा। वो माने चाहे नहीं माने। वो वो आर्य समाज जबरदस्ती थोड़ी किसी का व्यवहार है। वो लोग आते हैं तभी होता है ना। वो एक अलग है। वो जैसे हमारे यहां कोई बताने वाला जैसे मैं आपको कहता हूं जी मैं वेद को मानता हूं। तो आपको बात ये माननी पड़ेगी। अगर नहीं मानते तो तो तो यानी कि ऐसे व्यक्ति का होता है जो यह कहता है मैं वेद को मानता हूं। नहीं विवाह पद्धति तो सारे आप ही मंत्र पढ़ते हैं। आपने भी शादियां करवाई होंगी। आपके पूर्वजों ने भी करवाई होंगी तो वो तो वेद मंत्रों से ही होती है। अरे दो बातें हो गई। मैं ये नहीं कह रहा कि शादियां वेद के वेद के अनुसार होती है कि नहीं? नहीं आप कह रहे अधर्मी को। अधर्मी का क्या मतलब लेते हैं आप यहां? जो वेद के सिद्धांतों को ना मानता हो।

00:40:14:24 उसका विवाह होता है कि नहीं अपने यहां आर्य समाज में? ऐसे उनका कैसे हो सकता है? अधर्मी होगा। अधर्मी तो हम तो उन्हीं को कहते हैं जो सनातन धर्म से अलग हो। जो सनातन धर्म को मानेगा वो तो वेद को डेफिनेटली मानेगा। नहीं ऐसा है ना कि जैसे सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार मूर्ति पूजा को अधर्म बताया है। इन्होंने दयानंद जी ने दयानंद जी ने नहीं बताया वेद ने बताया है। ठीक है। वेद ने बताया तो वेद ने कहा परमात्मा की मूर्ति बन नहीं सकती। उसको आप सीमित नहीं कर सकते। वो अनंत है। तो अभी हमने जाना ना कि वो सीमित शक्ति के रूप में जो है पदार्थों के विषय बन रहा है। चार ऋषियों के अंतःकरण का विषय बन रहा है। सीमित हो तो रहा है। ईश्वर सीमित हो तो रहा है। सीमित वो तो कर्म के हिसाब से उसकी तो शक्ति अलग है ना आदमी की। लेकिन परमात्मा तो एक नहीं नहीं ईश्वर सर्वव्यापक होते हुए भी सीमित रूप में अपनी प्रतीति उसकी हो रही है ना। जैसे चार ऋषियों को हुई। बगल में जो है उसको नहीं हुई। नहीं वही वो सही कह रहे हैं। पृथ्वी बनी मगर जुपिटर नहीं बना। धर्म का सिद्धांत है ना वही तो चलिए वो काफी लंबी हो गई मैं यह कह रहा हूं कि जो मूर्ति पूजक है वो अधर्मी हुआ सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार मूर्ति पूजा में आप परमात्मा दरअसल मूर्ति परमात्मा की तो बन नहीं सकती ये तो देवता नहीं मैं वो नहीं बात कर रहा हूं मैं बात कर रहा हूं कि जो मूर्ति पूजक है वो अधर्मी है ना क्यों

00:41:30:07 कहवाना चाह रहे हैं नहीं सत्यार्थ कर रहे हैं फिर अच्छा चलिए छोड़िए नहीं कहने का तात्पर्य यह है मेरा एक विचारणीय प्रश्न है कि आर्य समाज यदि मानता है कि मूर्ति पूजा बस साकार को मानते हैं पौराणिक लोग और आर्य समाज साकार को नहीं मानता वो निराकार को मानता एक मिनट एक मिनट इसको एक विचारणीय प्रश्न है बस विचार करिए कि अगर हम ये कहते हैं हमारे यहां मुसलमानों का विवाह नहीं होता है अगर मुसलमान कन्वर्ट हो गया हमारे में तो ही हम उसका विवाह करते हैं। बिल्कुल ऐसा है। इसी प्रकार से हमारे यहां क्रिश्चनों का विवाह नहीं होता। अगर क्रिश्चियन कन्वर्ट हो गया हमारे में तभी हम उसका विवाह करते हैं। इसी प्रकार से हिंदू का विवाह क्रिश्चियन के यहां मान्य नहीं है। कहीं भी नहीं है। हिंदू का विवाह मस्जिद मस्जिद में मान्य नहीं है। ठीक है? तो ये समझ में आ गया। तो अब जो व्यक्ति हमारे अनुसार अधर्मी है सत्यार्थ प्रकाश ने जिसको अधर्मी कहा यानी कि मूर्ति पूजक को उन्होंने अधर्मी कहा है। तो फिर उनका विवाह क्यों होता है? यह प्रश्न एक विचारणीय है। उनको पहले आप आर्य समाजी बनाइए। कहने का मतलब यह है आर्य समाज में उसका ही विवाह हो जो मूर्ति पूजक ना हो। जो आर्य समाज के सिद्धांतों को ही मानता हो। मगर आजकल जो आर्य समाज में शादियां हो रही हैं वो मूर्ति पूजकों की भी हो जाती हैं। जबकि मूर्ति पूजक तो अधर्मी है। उनका विवाह तो मान्य होना ही नहीं चाहिए आर्य समाज

00:42:45:10 में। ये ये एक मेरा वो था। नहीं ये आपकी आईडियोलॉजी हो सकती है। लेकिन ऐसा नहीं है। वो करते हैं। सब में होता है। कहां आर्य समाज आज रहे हैं। कौन है आर्य समाज? [हंसी] पहले तो ये बताओ कहां है आर्य समाज? ये ये एक बात आप आपने सही कही कि ये सब आय समाज है। ऊपर वाला जो है ना छोटा आधार उसको निकाल दीजिए। आय समाज मतलब कहीं से पैसा आना चाहिए बस। हां यही तो मैं कह रहा हूं कि सच्चाई तो ये है कि अच्छा एक चीज और है। आर्य समाज के अनुसार जो है कर्म से जो ब्राह्मण है वही ब्राह्मण होगा। मगर जब आर्य समाज किसी को कन्वर्ट करता है। जैसे मान लीजिए किसी को ये जो मंदिर जो आपने कहा ना आर्य समाजी तो ये मंदिर क्या करते हैं? जैसे इनके पास कोई व्यक्ति आया शादी करने के लिए। मान लीजिए वह पहले मुस्लिम था या क्रिश्चियन था तो अब उसे किसी ब्राह्मण बिटिया से विवाह कराना है करना है तो वो उसको सेम डे जनेऊ दे देते हैं। ठीक है? कि अब तुम हो गए ब्राह्मण और अब कर लो तुम इससे हुआ और सर्टिफिकेट दे देते हैं। तो ये आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। ये मतलब एक बहुत गलत दिशा में जा रहा है ना। इस तरह से समाज की कोई आसानी पहले ही कहा ना आर्य समाज जी लोग जो है कह जमाने में है लेकिन ज्ञान व्यान वो स्वामी दयानंद जी की जितनी वो गहराई है उनको कहां समझ पा रहे हैं अच्छा होना तो ये चाहिए कायदे से कि जब व्यक्ति

00:44:00:19 आए तो प्रॉपर उसको वही शिक्षा के अगर ब्राह्मण का मतलब क्या होता है जो ब्रह्म को समझे और ब्रह्म को कौन समझ सकता है जिसका अध्ययन होगा जो वेद को समझेगा जो दर्शन को समझेगा शास्त्रों को समझेगा वो होगा ना ऐसे रोड से किसी को भी उठा के लाएगा वो कहने का कहने का मतलब ये है ना आचार्य जी कि आर्य समाज मंदिरों में उन्हीं लोगों का विवाह होना चाहिए जो आर्य समाज को मानते हों। है ना? होना चाहिए। उन्हीं का होना चाहिए। आप आपके अनुसार हां। अच्छा। और जो व्यक्ति जानता ही नहीं है कि ये जहां पे मैं शादी कर रहा हूं ये कौन सी जगह है। 10,000 15,000 मिल रहे हैं वो तो उसी हिसाब से करवा रहे हैं ना। हां। तो वो वो चीज एक विचारणी है। जी जी। अच्छा अब एक चीज और यहां तक आ गए हैं।

00:44:43:03 अच्छा गैस समाज है। ठीक है। एक चीज और बस जैसे कि हमने कहा कि हम वेद वो करते हैं। वेदों का अध्ययन है और आर्य समाज वेदों को प्रायोरिटी देता है। तो आर्य समाज की गुरु परंपरा क्या है? मतलब ऋषि दयानंद जी की गुरु परंपरा क्या है? अच्छा ये थोड़ा इसमें डिटेल में जाना चाहेंगे। यही बस करें। गुरु परंपरा आप मानते किसको हैं? पहले तो ये बताओ जिनके माध्यम से हमारे पास वेदादि शास्त्र और उनका ज्ञान आया ऋषियों से ऋषियों से लेके यहां तक नहीं ऋषियों से लेके तो आ रहा है गुरु परंपरा। ये जितने भी ऋषि हैं इन्होंने काम किया है आप मतलब जैसे महर्षि व्यास हैं या पतंजलि हैं या [गला साफ़ करने की आवाज़] चार ऋषि ये हैं। उसके बाद जितने भी आए हैं ऋषि ऋषि का मतलब ये जो आर्ष ग्रंथ हो गए नहीं वो ठीक है। उनके बाद ऋषि दयानंद जी तक वो परंपरा क्या रही? कौन-कौन से गुरु रहे जिनके माध्यम से उन तक आया जैसे सत्या तो स्वामी बृजानंद जी ने दिया विजानंद जी को विजानंद जी ने किसी और से लिया होगा लेकिन उसमें ये नहीं है ना जैसे आजकल गुरु परंपरा से बने ऐसा नहीं है कोई भी आदमी कहीं से भी निकल जाता है नहीं तो इसमें जैसे लिखा है ना सत्यार्थ विकास में कि बिना पढ़ाए पढ़ नहीं सकता हां बिल्कुल तो फिर विजानंद जी ने किस प्रामाणिक व्यक्ति से पढ़ा था किसी से तो पढ़ा होगा ये तो खोज ने कहा मुझे क्योंकि ऐसा है पढ़ा तो जरूर

00:45:58:07 होंगे वो व्याकरण आचार्य थे इस विषय में क्या है ना कि कई बार ये होता है कि नहीं नहीं पढ़े तो होंगे ना बिना पढ़े थोड़ी आया नहीं पढ़े तो हैं मगर यह देखना है कि जिससे पढ़े हैं उसने जो कहा हम वही मान रहे हैं या अपने से दे दिया क्योंकि अगर जिससे हमने पढ़ा है और हम वो एज इट इज नहीं बोल रहे हैं यानी हम अपने मन का दे रहे हैं क्योंकि वो जो पढ़ा है वो अपने से पढ़ा है अपने पूर्व पूर्वाचार्य से वो पढ़े अपने पूर्व इस तरह से ऋषियों ने जो कहा वह परंपरा से आया वहां तक तो जब हमें नाम मालूम पड़ेगा कि विजानंद जी ने किससे पढ़ा था वैसे पूर्णंद जी नाम लिया जाता है पूर्णानंद जी से पढ़ा था मतलब पूर्णानंद जी को तो स्वामी दयानंद जी पढ़े थे उन्होंने तो नाम हां कुछ लोग नाम ले लेते नहीं नहीं स्वामी दयानंद को उन्होंने पढ़ाया था दयानंद सरस्वती नाम उन्होंने पूर्णंद तो पूर्णानंद जी के गुरु ये हमें नहीं देखो इतना डिटेल में हम गए नहीं कभी हम उन्हीं को ही देखते हैं और को भी हम भी स्वामी दयानंद को सिर्फ वेदों के आधार पे देखते हैं तो वेद में क्या कहते हैं एक्चुअली क्या है आचार्य जी कि जब हम ये कहते हैं ना कि भाई हमें वेद की बात माननी अब वेद में एक जगह आया है कि ईश्वर अपनी माया के द्वारा विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। बहुत सारे रूपों में प्रकट होता है। कहते हैं लेकिन उसका अर्थ गलत उसका उसका उसका अर्थ दयानंद जी कहते हैं कि वो तो जो

00:47:13:10 ये सूर्य चंद्रमा पृथ्वी इत्यादि के रूप में प्रकट हुआ है ईश्वर वैसे प्रकट नहीं होता है। ये कहते हैं दयानंद जी मगर उसी को जो मूर्ति पूजक हैं वो ये कहते हैं जो मूर्ति पूजा को मानने वाले हैं वो ये कहते हैं कि नहीं यहां पे जो है वेदों के द्वारा भद्राचार्य का देखा था मैंने यहां पर किया था यहां पर जो है मूर्ति वेदों के द्वारा मूर्ति भी अवतार भी सिद्ध हो रहा है सगुण साकार रूप स्वरूप सिद्ध हो रहा है ऐसा मूर्ति को मानने वाले भी कहते हैं तो अब इसमें ये आता है कि वेद की प्रामाणिक बात कौन बता रहा है ना वेद का सही बात क्योंकि एक ही शब्द के कई मतलब निकल रहे हैं अर्थ कई निकल कई निकल चल रहे हैं। तो इसमें से कौन सा अर्थ है जो वेद का वही अर्थ है जो ऋषियों ने माना। तो अब बात है कि ऋषि दयानंद जी से पूछते हैं कि आपने वेद किससे लिए? तो वो पूर्णंद बता पूर्णानंद ने किससे लिए? उनकी गुरु परंपरा पीछे की नहीं प्राप्त होती। तो हम ये कैसे पता पता लगाएं कि उनके पूर्वाचार्यों ने क्या कहा था जिसका अर्थ वो एज इट इज बता रहे हैं कि आप बदल करके बता रहे हैं। इसलिए परंपरा पूछ पूछते हैं कि भाई वेद को रखते हैं ना। जी जी स्वामी दयानंद सरस्वती ने खुद अपनी मतलब वहां से व्याकरण ब्रजानंद से जी से सीखा उन्होंने फिर वो खुद समाधि उपासना लगाते थे और जो भी आदमी उपासना समाधि लगाता है आपने कभी लगाई या नहीं मुझे नहीं मालूम तो आपको भी भिन्न-भिन्न

00:48:28:19 अर्थ मालूम होंगे होते हैं अर्थ आपको वो बिल्कुल ध्यान में बैठे अर्थ तो वही है ना दयानंद जी के हिसाब से वही अर्थ है ना वेद का जो उन्होंने किया है हां बिल्कुल उन्होंने उन्होंने तो सायण आचार्य वगैरह या उससे ने किया कटाक्ष की या उससे भी भिन्न हो सकता है अर्थ उन्होंने ये माना दयानंद जी ने दयानंद कि मैंने जो अर्थ किया है वो वही अर्थ है जो ऋषियों का अर्थ है और या फिर हां यही उन्होंने ये माना है कि वह जो अर्थ कर रहा हूं ऋषियों का भी अर्थ है तो यही बात है [गला साफ़ करने की आवाज़] यही बात है कि दयानंद जी ने वो वेदों का अर्थ जो बताया है वो वेद लिए किससे हैं किससे लिए हैं मतलब कि अपने पूर्वाचार्यों का अर्थ वो बता रहे हैं कि नहीं बता रहे हैं अपने मन से नहीं नहीं उन्होंने अपना ही अर्थ बनाया किसी पूर्वाचार्यों का नहीं बताया नहीं नहीं तो जब पूर्वाचार्यों का नहीं बनाया बताया अर्थ तो फिर वेद तो वहीं से लिए वेद किससे लिए उन्होंने वेद तो परंपरा से आते हैं ना श्रुति में आते हैं ना वेद हां तो यानी जिससे हमने वेद लिए उसका हमने अर्थ ठुकरा दिया अर्थों में ही तो गड़बड़ कर रखी है ना सभी ने तभी तो तो जब कोई व्यक्ति अर्थ में गड़बड़ कर रहा है तो वो तो वेद भी बदल के दे सकता है ना वेद बदला ही नहीं जा सकता क्यों वो नहीं बदला जा सकता वेद को कहीं भी आप दुनिया में किसी को इतनी ताकत नहीं है जो वेद को बदले उसकी मतलब लिखा ही ऐसी वेद की वो नहीं उसमें अष्टा विकृति बताते हैं जटामाला

00:49:44:00 घन पाठ ये होता है जो हां वो मतलब दूसरा नहीं बना सकता कोई नहीं बात ये है कि हमको कैसे पता जिस रूप में हमें आज वेद प्राप्त है ऋषियों ने वही वेद चराए थे आगे बता तो रहा हूं योग समाधि के माध्यम से उन्होंने जाना खुद लिखा है महर्षि ने वैसे तो योग समाधि के माध्यम से कोई भी दावा कर सकता है ना आचार्य जी मैंने भी योग समाधि लगाई और मैं तो कुरान उतार दूं वेदों के नाम पे नहीं ऐसे नहीं उतर सकता उसका वो भी देना वेद की आज तक बात कोई उसकी गलत साबित कर के दिखाइए। आप वैसी नहीं इसमें अभी आप यह कहो यह सही नहीं। इसमें अभी बात यह नहीं हो रही है। लॉजिकली हमने देखिए ईश्वर के प्रकट होने के विषय में बहुत सारी बात कर ली। फिर बात आ गई इस पे कि वेद ने जो कहा है वही माना जाएगा। मतलब लॉजिकली हमने खूब सारी बातें कर ली है। ईश्वर प्रकट होता है कि नहीं होता है? हमने कुरान, ग्रंथ, बाइबल, तयत, ये धम्म पद वगैरह सब पढ़ा है। इसके मुकाबले में मैंने आपको कहा जो वेद वो नहीं कह रहा वो है। वेद का जो अर्थ है वो हम वही बता रहे हैं कि नहीं बता रहे। गड़बड़ हो सकती है। हो सकती है। एक बात तो मंत्र भी तो बदल सकते हैं। मंत्र नहीं बदल सकते। ना मंत्र तो सभी के एक जैसे ही मिलेंगे आपको। चाहे सायन का उठा लो। चाहे आप मैं ये नहीं कह रहा। जैसे दयानंद जी ने जिससे वेद लिए मंत्र लिए उस पर दयानंद जी को विश्वास नहीं

00:50:59:01 है। जैसे मैं आपको कोई किताब दे रहा हूं और आपकी अच्छा विश्वास नहीं है वो तो परंपरा से मिलता है थोड़ा बहुत उसको और अच्छा करता है। अब जैसे मैंने कहा ये मैंने यजुर्वेद लिखा है। अब स्वामी दयानंद जी का भी वो लिखा हुआ है। उसको इसको आप देख लो बहुत दिन रात का फर्क है। इनकी क्वालिटी नहीं मगर किसी भी का किसी भी अर्थ में आप उनके विपरीत तो नहीं गए ना? नहीं कहीं नहीं गया मैंने ना वो एज इट इज विपरीत मगर दयानंद जी तो विपरीत जा रहे हैं ना पूर्वाचार्यों के विपरीत जा रहे हैं ना आप कह रहे हो ना नहीं अपने से दिया पूर्वाचार्यों का अर्थ नहीं दिया है इसमें तो आपने उनका ही अर्थ दिया ना किनका हां दयानंद स्वामी दयानंद जी ने पूर्व आचार्यों का क्या वो जहां सीखे होंगे उन्होंने लिखा थोड़ी था वहीं से लिया होगा उन्होंने वह समझे होंगे उन्होंने उनको और बेहतर तरीके से पेश किया हम लोग ये कैसे माने स्वामी दयानंद जी ने जहांजहां उनको गलत लगा उन्होंने खंडन किया यह सही नहीं तो उन्होंने दिए हैं उसमें उदाहरण तो वो गलत सारे को तो गलत नहीं कह सकते ना। अब देखो एक जगह वो गलत का आधार क्या था जो उन्होंने कहा उन्होंने वेद के मंत्रों को देख के कहा जैसे वो सूर्य का अर्थ एक जगह मैंने पढ़ा है ऋग्वेद में कि उसने किया है उसका अर्थ घोड़ा किया है और उसका अर्थ सेंधव सेंधव घोड़ा ये अर्थ किया है हम और उससे तो अच्छा सायण ने किया है कम से कम सूर्य अर्थ तो किया है घोड़े का तो कोई मतलब ही नहीं बनता

00:52:14:14 नहीं मगर यह वाली बात है वो ठीक है मगर पूर्वाचार्य की अगर बात पे हमें यकीन नहीं है तो पूर्वाचार्य की मिलने मिलने वाली किताब आप ये जबरदस्ती कैसे मुझे कह सकते हैं तो पूर्वाचार्य के बाद के वो विभिन्न है मैंने तो कहा ही नहीं आपने कहा ना कि अपने से दिया अर्थ उन्होंने अपने बिल्कुल अपने से दिया है तो यानी वो वाला नहीं लिया ना पूर्वाचार्यों जैसे आपने अपनी दयानंद जी पूर्वचार्य किसका है अर्थ मुझे बताओ ना किसका है अर्थ पूर्वाचार्य उनसे पूर्व आचार्य कौन है जिन्होंने कहा मैं आपकी बात को लेकर चल रहा हूं ना आपने कहा ना पूर्वाचार्यों से अर्थ नहीं लिया उन्होंने अभी आपने कहा कि इसलिए मैंने बोला पूर्व आपने कहा पूर्व आचार्यों ने जो लिखा है मैं तो आचार्य सायन की बात कर रहा हूं। आपको मैक्स मूनर की बात कर रहा हूं। दयानंद जी ने अर्थ वो वेद कहां से लिए? वेद अपने गुरु विजानंद से लिए अर्थ भी व्याकरण उन्हीं से सीखा और सब कुछ उन्होंने उनको सिखाया लेकिन उन्होंने लफ्ज तो अपने दिए हैं ना सारे तो इनका अर्थ है। यानी कि जो विजानंद जी मानते थे वही दयानंद जी ने आगे लिखा। आगे बढ़ाया। सुंदर तरीके से सरल तरीके से पढ़ाया। तो विजानंद जी के गुरु यह मुझे नहीं पता है। तो अब विजानंद जी ने वही माना कि नहीं माना जो उनके पीछे वाले ने माना जो उस तरीके से वो ऋषियों तक पहुंच रहे थे कनेक्टेड थे। तो ये कैसे पता लगेगा? अब जैसे इन्होंने दर्शन का हवाला दिया है। जी ये आप बात मेरी सुन लीजिए सिर्फ। जी जी

00:53:29:15 या शतपथ ब्राह्मण है या उपवेद है ये तो सुने ही होंगे आपने या गीता है। इन सबको आप मिलान करो और ध्यान के अर्थों को देखो तो आपको कोई ज्यादा फर्क नहीं। फर्क आता है ना यही वाला यही वाला नहीं आता है ये वाला आता है जैसे ईश्वर के प्रकट होने की जहां-जहां पर बात आती है तो दयानंद जी लिख देते हैं अलंकार में कहा गया है ये अलंकार है तो वहां पर क्या है अन्य आचार्यों ने जिनका इतिहास हमें प्राप्त है उन्होंने वहां पर ईश्वर को प्रकट होने वाला माना है और लॉजिकली भी हमने कई बार ये देख लिया कि जैसे वो जड़ पदार्थों में बाधा बनेगा वो उसी प्रकार से वो जब रोशनी के प्रकाश के मार्ग में बाधा बनेगा तो उसका दिखाई देने वाला सगुण साकार रूप हो गया अभी भी वो अगल-बगल है मगर वह केवल एक निश्चित सीमा में प्रकाश के मार्ग में बाधा बना। बाधा बना तो दिखाई दिया और अगल-बगल का नहीं दिख रहा है क्योंकि उसने यह कंट्रोल किया कि मैं केवल इसी की आंखों की जो रोशनी है उसमें बाधा बनूं जिसके कारण मैं इसको दिखाई दूं। जैसे अंतःकरण में उसने ये डिसाइड किया कि मैं केवल चार ऋषियों की ही अंतःकरण का विषय बनू और किसी का नहीं बनी। जैसे उसने यह डिसाइड किया कि मैं केवल पृथ्वी को सरकाऊं। दूसरे को ना सरकाऊं। तभी तो सृष्टि बनेगी। जैसे उसने न्याय करते समय यह डिसाइड किया कि मैं अगर ईंट गिरानी है इसके सर पे तो केवल इसी के सर पर

00:54:44:16 ईंट गिरे और किसी के सर पे ऐसा एक्सीडेंट में होते हैं 10 लोग मर जाते हैं 10 की टांग टूटती है 10 ठीक-ठाक भी होते हैं खरोच तक नहीं आता तो मतलब ईश्वर कर्मों का फल देते समय भी अपने को निश्चित कर रहा है कि मैं इस पे कार्य करूं इस पे ना करूं बिल्कुल होना चाहिए उसी प्रकार से वो जब यह डिसाइड करेगा कि मैं इतने हिस्से में रोशनी के मार्ग में बाधा बनूं उसके अगल-बगल ना बनूं तो वो दिखाई दे जाए तो यहां पे आकर के थोड़ा सा वैचारिक मतभेद होता है। खैर ठीक है। काफी लंबी चर्चा हो गई है। दो पार्ट में आचार्य जी आओ यार कुछ तो जी बहुत-बहुत आभार आचार्य जी आपने इतना समय दिया और काफी अच्छा लगा आचार्य जी बड़े ही ओपन माइंडेड हैं। जो सत्य होता है उसको स्वीकार करते हैं और जो असत्य होता है उसको ठुकराते हैं। तो जैसा कि दयानंद जी ने कहा भी है कि सत्य को हमेशा ग्रहण करो। असत्य कुछ हो। तो ये देखो कुछ भी है अब देखो सारी बातें तो आदमी जान नहीं सकता ना। जी कोई भी हो नहीं जान सकता। सारी आदमी एक ही बात जान ले तो फिर दूसरे आदमियों की तो जरूरत ही नहीं है। स्वामी जी ने लिखा है कि जरूरी थोड़ी है जो मैं लिख रहा हूं आप उसे भिन्न नहीं जा सकते। हां मतलब वो आपको सही लगे उसी को मान के बैठना है। हो सकता है आपको आगे कुछ और दिख जाए। तो इस तरह के बड़े ही अच्छे भाव रहे आचार्य जी के और हमें बड़ा मजा आया। आप लोगों को कैसा लगा

00:55:59:20 जरूर बताइएगा। जय श्री राम सभी को। जय श्री राम। [संगीत]

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