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00:00:02:26 बात हो रहा है क्या? जी हो रही है। हां जी। नमस्कार आपको मेरा नाम क्या नाम है? अच्छा जी बताइए। हां जी। तो मैं मैं जैसे मैं मेरा जन्म हिंदू धर्म में हुआ था। ऐसे तो मैंने बचपन में वो हरे कृष्णा फिर राम जी श्री शिव जी सबका पूजा पाठ में करता था तो तो एक तो जब मेरा नौकरी लगा जॉब लगा तब मतलब मेरे को बोलने में कुछ समस्याएं था। मतलब जब जॉब लगा जब मेरे कॉलेज में मैं पढ़ता था या फिर जब स्कूल में पढ़ता था उस समय इसमें ध्यान नहीं दिया उतना। लेकिन जब मैंने जॉब का कर रहा था तब थोड़ा घर से मैं बाहर मतलब थोड़ा दूर आ गया। तो जब मैं जॉब कर रहा था तब मैं अपने साथ टाइम थोड़ा
00:01:17:27 स्पेंड करने लगा तब मेरे को लगा मेरे को बोलने में थोड़ा प्रॉब्लम होता है। तो मैंने इतना मतलब जो विष्णु जी का मतलब बहुत प्रेम था मुझे विष्णु जी से नारायण से कृष्ण से राम से तो इतना प्रेम था इतना मैंने उनका नाम किया कीर्तन किया उसको इतना पूजा पाठ करता था मैंने जल चराया ये लोग मेरे जो दिक्कतें हैं मेरे जॉब में भी बहुत दिक्कतें था मेरे मेरे पर्सनल लाइफ में भी बहुत दिक्कतें है ये जो बोलने का एक समस्या था मेरा वो बहुत बहुत था उस समय कोई कॉन्फिडेंस नहीं है जीवन में लोगों से बात नहीं कर पाता था इतना मतलब जो इतना भक्त है उसके साथ मतलब इतना परेशानी तो मैं बहुत दुखी हो गया उस समय तो मैं यही सोचने लगा क्या मेरा रास्ता सही है क्या ये मार्ग सच में मेरे को कुछ भी आएगा क्योंकि जो मार्ग मेरे को इस जीवन में कुछ नहीं दे सकता। वो मार्ग मुझे इस जन्म के बाद मुझे देखा इसका क्या रास्ता है?
00:02:33:06 तो उस उस दौरान मैं नास्तिक हो गया। मैं सोचने लगा भाई यही आखरी है और कोई जन्म है नहीं। तो नास्तिकता से मेरा रास्ता थोड़ा बौद्ध धर्म की तरफ गया। तो बौद्ध धर्म में आने के बाद मेरे को थोड़ा कॉन्फिडेंस आया। तब मेरे को यह समझ में आया नहीं नास्तिकता तो झूठ है क्योंकि कुछ एक्सपीरियंस तो मेरे को हुआ नास्तिकता झूठा एक जन्म के बाद भी चीजें हैं थोड़ा कॉन्फिडेंस मेरा इंप्रूव हुआ बोलने का जो तरीका था उसमें फुल सुधार तो नहीं हुआ लेकिन मेरे को थोड़ा सा मतलब रास्ता मिला कि हां ये करने से इसको पूर्ण रूप से मैं ठीक कर सकता हूं। तो मैं उसमें उसमें मैं चल रहा हूं वो थोड़ा मतलब सख्त मतलब थोड़ा टफ रास्ता है वैसे थोड़ा मतलब मेडिटेटिव टेक्निक है थोड़ा टफ है तो मैं उसमें चलने की कोशिश कर रहा हूं धीरेधीरे मेरे ख्याल से इंप्रूव होगा तो मेरा प्रश्न ये है जो जो बौद्ध मार्ग है
00:03:48:28 ये मेरे जो समस्या है मेरे जो कॉन्फिडेंस है मेरा जीवन का जो बाहर की जो समस्या है उसको देखने का जो चीजें है वो बदल के रख दिया मैं साफ साफ देख पा रहा हूं मेरे जीवन का समस्याएं क्या है इसको मैं किस तरह से सुधारूं इसको इसको इसको मैं अपने अपने जीवन का जो समस्या है उसको मैं कैसे ठीक करूं मैं मेरे ये सारे चीजों को मैंने देखना अह मतलब मेरे अंदर स्पष्ट हो गया। तो मेरा प्रश्न ये है कि मैं तो इतना जान चुका हूं ये जन्म के बाद भी मैं हूं। इतना मुझे स्पष्ट है। और मुझे ये भी स्पष्ट है कि ये जो मानव शरीर है ये बहुत ही पुण्य कर्म से मिलता है। ये भी मेरे को स्पष्ट है। तो मैं आपको इसीलिए फोन किया कि ऐसा ना हो कि मैं भी बौद्ध मार्ग में हूं। यह भी मरने के बाद भी मेरे को कुछ और करना पड़े, मुक्ति ना मिले, निर्वाण ना मिले। तो आप ऐसा कोई मार्ग दिखा सकते हो जो एकदम स्पष्ट हो। मेरे को ईश्वर दिख जाए या फिर जो भी सनातन
00:05:04:04 मतलब एकमात्र वो मार्ग है जिससे कि कोई बद्ध जीव मुक्त हो सकता है और जहां पर भी थोड़ी बहुत अच्छाई हमें प्राप्त हो रही है तो वो कहीं ना कहीं से यहीं से लिया हुआ ज्ञान विज्ञान होता है जैसे थॉमस अलवा एडिसन ने बल्ब बना दिया आविष्कार कर दिया अब वही बल्ब आपको अपने घर के पास वाली परचून की दुकान पर भी मिल रहा है। आपको मालूम ही नहीं है यहां पे आया कैसे? तो जिस मेडिटेशन की बात आप कर रहे हैं वह कॉपीड है सनातन धर्म से। अब बात आती है कि जो एक पहला आपका प्रश्न आया था सनातन धर्म के संबंध में जो यह लोक आपका सुधार नहीं पा रहा है। कुछ नहीं दे पा रहा है। तो मेरा परलोक कैसे सुधारेगा? तो इसमें बात यह है आपको कैसे पता कि आपको जो प्राप्त है वह आपकी अत्यंत दयनीय स्थिति से बेहतर नहीं है। आपने ज्ञात कैसे किया? हो सकता है कि आपको और भी बहुत कुछ दयनीय चीजें मिलने वाली थी। उससे बेटर मिला क्योंकि आपने हरे कृष्ण का जाप किया। आपके प्रारब्ध में था। एक एक मिनट मैंने आपको मैंने आपकी पूरी बात सुनी है। मैं आपको कुछ चीजें बता रहा हूं। समझ नहीं तो ये
00:06:19:08 तय करना कि अह यह तय करना कि भाई मुझे कुछ नहीं मिल रहा है। ये अपने आप में ही गलत है। जैसा कि आपने बताया कि आपको मानव जीवन ही मिला है। यही सब अपने आप में एक बहुत बड़ी वो है। अचीवमेंट। अब ये जो चीज है कि आपका जो अटक अटक करके बात करना ठीक से बात ना कर पाना और या बाद में ठीक से बात करना ही यही आपने यह माना कि मेरे जीवन का वो चीज है जिसके ना मिलने पर मैं यह मानूंगा कि यह कुछ नहीं है। यह पैरामीटर हमने खुद सेट किए हैं। भगवान धर्म मोक्ष का मतलब ये नहीं है कि आपके सारे दुख यहीं की यहीं आपसे आपको जो दैहिक आ जो तीन त्रिविध ताप हैं वो यहीं की यहीं नष्ट हो जाएंगे। धर्म का मार्ग यह है कि आपको इनसे सदा के लिए मुक्ति किस प्रकार से होगी। उस मार्ग पर आपको धर्म ले जाता है। और सदा के लिए मुक्ति तभी होगी जब आपको मोक्ष प्राप्त होगा। अब मोक्ष तो वहां पर है नहीं। जहां जो बौद्ध मान्यता है उसमें ना मोक्ष है और ना ही उसमें क्या कहते हैं वो है ईश्वर ना ईश्वर है ना मोक्ष है। तो वो फिर बातें अलग हो
00:07:34:09 जाएंगी दार्शनिक स्तर की बातें वो अलग हो जाएंगी मगर मैं कुल मिला करके कह दूं कि मेडिटेशन जो आपने वहां पर प्राप्त किया है वो यहां पर भी है और यहीं से कॉपीड होकर के वहां पहुंचा। दूसरी बात यह है कि अच्छा चलिए आपकी समस्या यह थी कि आवाज अटक रही थी और जो है अ क्या कहते हैं आवाज अटक रही थी उसके बाद आपने कॉन्फिडेंस आया तो आपकी आवाज ठीक होना शुरू हो गई। मगर यदि किसी की टांग है ही नहीं पोलियो ही है या उसकी टांग अधूरी निकली है तो क्या यह सब चीजें भी संभव हो जाती अगर वह अपना मान्यता को बदल लेते नहीं। यह सब चीजें लालाज चीजें जो हैं वह लालाज ही रहेंग वह सब ठीक नहीं होगी। तो फिर अर्थ क्या है कि जब आप ईश्वरीय मार्ग पर चलते हो तो आपके अंदर वह सामर्थ्य भगवान देता है जिससे कि आप यह समझ पाते हो कि ये सब चीजों में अपना सुख ढूंढना व्यर्थ है। इस कारण से आपको वहां वो सामर्थ्य प्राप्त होता है कि आप अपने जीवन की विषम से विषम परिस्थितियों में प्रसन्न चित्त रह पाते हो। ₹2 भी नहीं है खाने का मगर आप खुश रह पाते हो। तो आपका जो एंड ऑफ द गोल है वह यह नहीं है कि मेरी कोई भौतिक जरूरत पूरी हो जाए। आपका एंड ऑफ द गोल है खुशी वो आपको मिलती है।
00:08:50:16 अब आप अपनी खुशी को अपनी अज्ञानता वश किसी भौतिक पदार्थ से जोड़ लेते हैं जो कि संभव नहीं है उस भौतिक पदार्थ से आगे चलकर के वो शाश्वत नहीं है। वह कहीं ना कहीं आपकी ड्रॉप आउट होनी ही है। तो वो अज्ञानता वश है कि हमने किसी चीज से जोड़ लिया और फिर संयोग से कहीं पर हम गए और वहां पर जाते समय वो होना ही था जो हो गया। जैसे कोई व्यक्ति दिल्ली जा रहा है। और दिल्ली जाते टाइम किसी ने उसको कह दिया कि दिल्ली दिल्ली पहुंचोगे तुम। दिल्ली जाओगे तुम। अब उसको तो दिल्ली जाना ही था। मगर जिसने ये कहा उसकी वाणी सत्य हो गई। जब वो दिल्ली पहुंचा अरे यार उसने कहा था। दिल्ली जाऊंगा मैं। ठीक है? तो वो एक संयोग हो गया कि आपको जब आपने मान्यता को बदला तो इधर से वो कॉन्फिडेंस लेवल जो डाउन हो रहा था। और सनातन के मार्ग पर चलते हुए जीवित रहते हुए व्यक्ति जो परम सुख प्राप्त कर सकता है। बिल्कुल हर हाल में प्राप्त कर सकता है। उसके लिए कोई अपनी मान्यता को ना तो नास्तिकता की ओर ले जाने की आवश्यकता है और ना ही बौद्ध मार्ग पर। जहां पर नित्य मुक्ति है ही नहीं। नित्य ईश्वर है ही नहीं। जी बताइए। हां जी। आपने हां आपने बहुत अच्छे तर्क दिए। लेकिन मैं तर्क नहीं मैं देखना चाहता हूं। आप मेरे को मैं अगर
00:10:05:25 मेरा इसी जीवन में कोई सुधार ना आया। मैं किस तरह से मांग लूं। मान लूं कि ये ये मार्ग मेरे को सुधार किसको कहते हैं? सुधार कहते किसको हैं? एक बच्चा जो है वो ये मान रहा है कि भैया मुझे वो जो बल्ब चाहिए ना बल्ब लगा हुआ है जिसमें बिजली दौड़ रही है। मुझे उसको पकडूंगा तभी वो मैं मानूंगा मैं खुश हुआ। अब माता-पिता उसको वो बल्ब नहीं छूने दे रहे हैं क्योंकि उसमें करंट है। माता-पिता उसको वो बल्ब नहीं छूने दे रहे हैं कि उसमें करंट है। अब बच्चे को वही चाहिए। बच्चे के पर्सपेक्टिव से वो है तो आपका पर्सपेक्टिव आपने तय किया है ना कि मुझे बल्ब से ही सुख मिलेगा तो आप कह रहे हैं कि वो सुधार नहीं आया। अच्छा दूसरी बात एक सिद्धांत है कि भगवान को जिसको मुक्ति देनी होती है पहले तो वो इस दुनिया के जो उसके संसाधन है कठिन बनाता है छीन लेता है उसके संसाधन जिसको भगवान को मुक्ति देनी है वास्तव में उसका इस जीवन से मोह कैसे भंग हो तो उसके जीवन को वो कठिन बना देता है दुर्गम बना देता है कि वो धीरे धीरे धीरे धीरे उसका मोह भंग हो वहां से तो उस हिसाब से तो देखा जाए कि जो आपको भौतिक सुख प्रदान कर रहा है बहुत ही प्राथमिकता के साथ वह तो आपको फंसा रहा है।
00:11:18:19 जो आपको बहुत ज्यादा भौतिक शिक्ष सुख से ओतप्रोत करवा रहा है। सारी खुशियां प्रोवाइड करवा रहा है। जीते जी वो तो आपको फंसा रहा है। जो आपको दैहिक सुख प्राप्त करवा रहा है। तो सुख तो वही है जो आपको भक्ति से प्राप्त हो। जो आपको मुक्ति के लिए किए जाने वाले आचरण से प्राप्त हो। वही सुख सुख है जीवित रहते हुए। अन्यथा अगर और सुखों के नाम पर वो आपको दे रहा है तो वह तो आपको बंधन में डाल रहा है ना। आप तो और मोहित होंगे। अरे वाह और भोगूंगा और भोगूंगा। इस जीवन को और भोगूंगा। तो जब आप जीवन को भोगने की दृष्टि आपकी बनी रहेगी तो मुक्ति की दृष्टि कहां से आएगी? चलिए थ्योरिकली आपने मान भी लिया तो अनुभव में कैसे आएगी? है ना? ये सब बातें हैं। मुझे आप आप मुझे ऐसा कोई मार्ग बोल सकते हैं जिससे मैं राम जी या फिर नारायण या विष्णु या कृष्ण को मैं देख पाऊं। क्योंकि मैं मान लूं हां बात यह है कि नारायण नारायण शिव को प्राप्त करने के लिए उनका भजन आवश्यक है। उनका ध्यान आवश्यक है। उनका नाम जप आवश्यक है। परंतु नाम जप आवश्यक तब है जब आपको यह विश्वास हो कि वो हैं। परंतु जब आप उनके अस्तित्व को
00:12:33:20 लेकर ही संशय में होंगे तो आपका नाम जप से प्राप्त होने वाला क्या चीज होगा? संशय आत्मा विनश्यति भगवत गीता 44 40 तो आपका पहले तत्व का अस्तित्व सिद्ध होना चाहिए आपके मन में उस सिद्ध जब हो जाए जब असतो मास सदगम तमसो मा ज्योतिर्गम मृत्यु मासम गमय इसका आपको जब जवाब मिल जाए तब उसको धारणा पूर्वक जब आप धारण पूर्वक जब आप नाम जप करेंगे तब तो ना वो आपको दिखाई देंगे शिशुपाल भगवान से भगवान को मानता नहीं था अपमान करता था भगवान का परंतु उसको को भी वहां पर उन्होंने उसको भी सद्गति प्रदान कर दी। क्यों? क्योंकि इस रूप में कि तुम बहुत बुरे हो। इस रूप में मैं तुम्हारे अस्तित्व को स्वीकार कर रहा हूं। और दुनिया में धर्म और धर्म टिका इसी बात पर है कि जो अधर्म कर रहा है वो कहीं ना कहीं यह कह रहा है कि ईश्वर नहीं है। और जो धर्म कर रहा है, वह कहीं ना कहीं यह कह रहा है कि ईश्वर है। ईश्वर के ना होने और होने के बीच का ही युद्ध है ये धर्म और अधर्म का। तो शिशुपाल जो कि भगवान से नफरत करता है। उस नफरत के भी बीज में भगवान के अस्तित्व को स्वीकार करना छुपा हुआ है। इसलिए उसकी सद्गति होती है। तो जब हम उनके अस्तित्व
00:13:49:08 को लेकर के क्लियर नहीं है तो फिर उनको प्राप्त करने के निमित्त बताई जाने वाली विधि तो व्यर्थ हो जाएगी ना। तो पहले तो उनके अस्तित्व पर विश्वास करना होगा। फिर चिंतन। ठीक है? हां। तो आप वो जैसे मैंने तो अपने बचपन में या फिर जब मैं और कम उम्र था उस समय एकदम निरंतर नाम जाप करता था। कृष्ण नाम लेता था। विष्णु को नहाता था। उनका उनका चिर सरण करता था। उस समय ना मुझे दर्शन हुआ। ना मेरा मेरा जो सिचुएशन है वो चेंज हुआ। आज मैं जब बौद्ध मार्ग में हूं मेरा सिचुएशन भी चेंज हो मैंने आपको आपकी बातों के जवाब दे दिए हैं। आप दोबारा से सुनिएगा, सोचिएगा मैंने क्या कहा है। दूसरी बात कि ये चीज कहां से फिक्स हुई है कि कितनी बार नाम जप करने पर जो है दर्शन हो जाएंगे। ये किसने फिक्स किया है? अच्छा जब आप पूर्व जन्म के सिद्धांत को मानते हैं तो आपने पूर्व जन्म में पता नहीं क्या-क्या किया होगा जो राम नाम का जप करने से कट गया। जो और आपको दिक्कतें आने वाली होंगी वो कट गई। और आपका यह कैसा सिद्धांत था कि आपने जो नाम जप किया इतना उसमें आपकी जो विश्वास की दृष्टि थी वह ऐसी कैसे मान ली जाए कि वो विश्वास
00:15:04:09 विश्वास ही था जबकि थोड़ी सी बाद में जब समस्याएं आई तो आप नास्तिक हो गए। फिर बाद में बौद्धानुगामी हो गए। तो इसका मतलब यह कैसे माना जाए कि वो आपका विश्वास यही था। यह क्यों ना माना जाए कि आप वहां पर सवालिया लेकर के चल रहे थे। देखें क्या होता है। देखें क्या होता है। तो देखें क्या होता है वाली स्थिति में फिर वैसा ही रिजल्ट आता है। तो कई सारी चीजें हैं। उसमें हम लोग फिक्स नहीं कर सकते कि पांच बार नाम जब ले लो नाम ले लोगे तो हो जाएगा। पता नहीं आपके कौन से प्रारब्ध रहे हो जिसकी वजह से नहीं मिला। जब आप पूर्व जन्म में विश्वास रख रहे हैं तो यह तो मानना पड़ेगा आपको। तो कहने का तात्पर्य यह है कि भगवत गीता 9:32 में भगवान ने कहा है तू मेरी शरण में आ जा। शरण में आने का मतलब शरणागति शरणागति के लिए अस्तित्व को स्वीकार करना। तो शरण में जब गए तो तेरी प्राप्ति की रक्षा और अप्राप्ति की चिंता मैं करूंगा। मैं देखूंगा। ठीक है? तो जब आपको जो प्राप्त होने के लायक योग्य चीजें हैं अच्छा एक इसमें ये भी बात है आपने कैसे तय किया कि आपके लिए जैसे मैंने अभी बताया कि जो भौतिक सुख को वयता दे रहा है वो तो आपके प्रारब्ध उसको काट रहा है मोक्ष को। जो आपके परम कल्याण है उसको तो वो काट रहा है ना। आपको भौतिक सुख में आपको लिप्त कर रहा है जो तो आपने ये कैसे तय किया कि
00:16:19:15 आप जो है दर्शन जब कर लेंगे वो आपके लिए अपेक्षित है कि नहीं उपयोगी है कि नहीं? अगर हम बल्ब के तार को हीटर के तार में लगा देंगे तो वो तार तो जल जाएगा। तो उसके लिए आपका चित्त भी तो इतना शक्तिशाली बने कि आप जब दर्शन करें भगवान के तो आप उसको धारण कर पाए उस दर्शन को। बहुत सी चीजें हैं उसमें हम कोई प्रीफिक्स नहीं कर सकते। इसलिए यहां पे तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण होते हैं। यदि आपका शास्त्र वाक्यों में निष्ठा है तो आपका नाम जप ही भगवत स्वरूप है। उसके लिए अलग से भगवत दर्शन की इंतजार की आवश्यकता नहीं है। वो एक बाय प्रोडक्ट है कि भगवान आप पर प्रसन्न हो गए। आपको दे दिया दर्शन। मगर अपने आप में आपके जी्हा से उच्चारित होने वाला भगवान का जो नाम है, वो अपने आप में वो भगवत स्वरूप ही है। उसी में ही आपको परम सुख मिल जाएगा। बिना भगवान का दर्शन किए और यदि आप इस स्थिति में रहेंगे कि भाई मुझे विश्वास कैसे हो जब तक दर्शन नहीं होगा तो ऐसा तो उन्होंने कहीं कहा नहीं है कि भैया मैं तुम्हें पांच इतनी बार नाम ले लोगे तो मैं दर्शन दे दूंगा। दूसरी बात यह भी है कि जब हमारी दृष्टि जो है विश्वास वाली है ही नहीं तो क्या पता उन्होंने कौन से रूप में हमें दर्शन दे दियो किस समय दे दिए हम समझ ही ना पाए। दर्शन दिए भी हो
00:17:34:16 तो हम समझ ही ना पाए उसको नेगलेक्ट कर दिया। क्यों? क्योंकि भगवान ने कहा नौ शायद नौवें अध्याय में सातवें अध्याय में भगवान ने कहा कि जो मूर्ति मुझे मानव रूप रूप में देख कर के मेरे ब्रह्म भाव को नहीं ध्यान रख पाते हैं नहीं देख पाते वो मूर्ख हैं। तो अब हम भगवान को चेक करने की दृष्टि से उनका नाम जप कर रहे हैं। भगवान सामने आकर के चले भी गए। हमने सोचा कि ये तो कोई साधारण प्रक्रिया थी। बस बहुत सारी चीजें हैं। वहां पर विश्वास शरणागति का भाव होना चाहिए। तो आपको बिना उनके दर्शन के भी वह परम सुख मिलेगा जो दर्शन करने पर मिलेगा और उनको तराजू में तोलते रहेंगे तो तलते रहिए संसत्मा विनश्यति आखिर में आना तो सनातन में ही पड़ेगा सनातन के बिना उद्धार कहां है वहां तो ईश्वर है ही नहीं बौद्ध मार्ग में ईश्वर है ही कहां नास्तिक मार्ग है वो वो विष्णु तो नाइन अवतार है लेकिन लेकिन आप आप ठीक है आपको अगर कोई और सवाल लास्ट क्वेश्चन एक लास्ट क्वेश्चन लास्ट क्वेश्चन हां मेरा लास्ट क्वेश्चन ये है अगर मैं मेरे अंदर भी ये सोच आया कि अगर मैं जितना भी उपनिषद है वेद है पुराना है और बौद्ध
00:18:50:04 ग्रंथों का जितना भी ग्रंथ है उसके ओरिजिनल जो फॉर्म है उसमें अगर मैं बात करूं मतलब उसके ओरिजिनल फॉर्म में अगर मैं विद्यार्थी बनके उसका जो ज्ञान है वो वो मैं ले लूं तो क्या मुझे कुछ प्राप्त हो सकता है? कभी इससे भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता। भाई यह बताइए कि आपका जो धर्म है धर्म शास्त्र है उनका पर्यावसान किस में है? अगर बौद्ध को भी मानेंगे तो उसका पर्यावसान मुक्ति में है। तो आपका जो फल है उस पर ध्यान होना चाहिए कि मुझे मुक्ति किस-किस प्रकार से पड़े मिलेगी। तो आवश्यक नहीं है कि आप जो ओरिजिनल फॉर्म है उसी में उस टेक्स्ट को पढ़ेंगे तभी आपको मुक्ति मिलेगी। उसका जो भाष्य ट्रांसलेशन या क्या कहते हैं उसकी जो समरी दी गई है उसमें जो समीक्षा की गई है भाष्य लिखा गया उसको भी आप पढ़ेंगे प्रवचन सुनेंगे संतों की वाणियां सुनेंगे उससे भी आपको मुक्ति मिलेगी। बात यह है कि आपके चित्त में कितनी शुद्धि हो जाती है। क्योंकि चित्त में है माया के प्रति मोह और मोह को भंग करता है सत का ध्यान तो चित्त में जितनी शुद्धि होती जाएगी उतना ही आप मुक्त होते चले जाएंगे। अब इसके लिए यही आवश्यक थोड़ी ना है कि वो उसी
00:20:05:15 टेक्स्ट में जो है उस शास्त्र उस वांग्मय का अध्ययन किया जाए जो उसका ओरिजिनल स्वरूप है। फिर समरी की क्यों गई? भाष्य किए क्यों गए? कमेंट्री की क्यों गई? ट्रांसलेशन किया क्यों गया? इसलिए किया गया कि जब भी भाषा में विकृति आए तो जो विकृति आने के बाद जो स्वरूप बन गया विकृत भाषा का उस भाषा में ढला हुआ व्यक्ति भी उस तत्व को परम तत्व को जान सके जिससे कि उसको मोक्ष मिले। तो आपके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का जो पर्यावसान है ना वो इस बात में होना चाहिए कि मुझे मोक्ष किससे मिलेगा? सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की प्राप्ति किससे होगी? इससे नहीं होना चाहिए कि भगवान राम के दर्शन आज होने हैं कि नहीं होने हैं या फिर मेरा अटक अटक के बोलना आज समाप्त होना है कि नहीं होना है। मुख्य लक्ष्य है सच्चिदानंद स्वरूप की प्राप्ति। उसके साथ एकीत हो जाना। उसके साथ लीन हो जाना। अब उस रास्ते में आपको जो जो चीजें बाय प्रोडक्ट के रूप में मिल रही है उनको सहर्ष स्वीकार करिए और जो नहीं मिल रही है उनके लिए यह समझना चाहिए कि वह मेरे लिए थी ही नहीं। वह मेरे लिए नहीं है, उचित नहीं है। इसलिए भगवान मुझे नहीं दे रहे हैं। ना कि यह समझना चाहिए जब यह नहीं दिया तो वह क्या देंगे।
00:21:20:16 ठीक है। ठीक है। फिर बात होती है आपसे। ठीक है। ठीक है। ठीक है। धन्यवाद। फिर जी जय श्री राम।
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बुद्धिस्म से प्रभावित हिंदू भाई की घर वापसी
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