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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] तो सभी को जय श्री राम। आप देख रहे हैं आहान कॉल ऑफ Dharma। मैं शिवश नारायण द्विवेदी पुरी शंकराचार्य जी का एक अल्पक शिष्य और हमारे साथ में हैं ध्रुव कुमार जी। यह दिशा फाउंडेशन करके एक संगठन है। उसके अंतर्गत कार्य करते हैं। और मैं अपनी बात बता दूं तो मैं अभी वाराणसी में आया हुआ हूं। हम लोग यहां पे वाराणसी में हैं और वाराणसी में जो बीएचयू है छात्रों का जिसे सागर कहा जाता है शिक्षा का सागर कहा जाता है वाराणसी में हम लोग उस के प्रांगण में जो प्रतीकात्मक रूप से काशी विश्वनाथ जी विराजमान है यहां भी तो उसी मंदिर के प्रांगण में ही हैं। तो हमारे साथ ध्रुव जी हैं जिनको कि जो कुछ सामाजिक व्यवस्था को लेकर के उनकी जो मान्यताएं हैं या जो बिलीफ्स हैं या उन्हें जो लगता है कि समाज का सुधार्थ किस प्रकार से हो सकता है तो वो उस दिशा में काम कर रहे हैं। उसके लिए उन्होंने एक दिशा छात्र संघ नाम से एक संगठन है जो जिसके वो खुद सदस्य हैं और उसमें कई सारे उनके साथी हैं और ये संगठन अभी अनरजिस्टर्ड है क्योंकि जहां तक मेरा मानना है कि भाई अगर सरकार के साथ रजिस्ट्रेशन करना है तो कुछ
00:01:17:06 रूल्स एंड रेगुलेशन सरकार की माननी पड़ेंगी और जब हमारी उन्हीं रूल्स एंड रेगुलेशंस का विरोध है हमारा तो फिर हम वहीं पर पंजीकरण कैसे करवाएं? तो इस कारण से यह अभी एक अनरजिस्टर्ड बॉडी है और उसके ही अंतर्गत यह अपना जो जो विचार हैं जो वैचारिक इनकी क्रांति है इनके अनुसार वो लाने का ये प्रयास कर रहे हैं। तो थोड़ा सा अपने आप क्रांति के बाद जो भी आपका रेवोल्यूशन आप लाना चाहते हो बदलाव परिवर्तन जो भी कह ले उसके बारे में थोड़ा सा बताइए कि आप क्या सोचते हैं? जी बेसिकली दिशा छात्र संगठन एक छात्र युवाओं का देश भर में काम कर रहा संगठन है। हम्म इसका मूल उद्देश्य सबसे पहले तो जो छात्र जो छात्रों युवाओं के सवाल है और छात्र युवाओं के जो सबसे बेसिक सवाल हैं वो शिक्षा और रोजगार का सवाल है। तो सबसे पहले जो संगठन काम करने का प्रयास करती है वो इन्हीं मुद्दों पर काम करने का प्रयास करती है। मतलब हम यह बात क्लियर कर दें कि दिशा छात्र संगठन किसी विचारधारा पे आधारित छात्र संगठन नहीं है। मतलब इसमें जुड़े सदस्य सिस्टम से लड़ाई है आप। हां। इसमें जुड़े सदस्यों की अलग-अलग विचारधारा हो सकती है। कोई किसी विचार को मान सकता है। कोई किसी विचार को मान सकता है। लेकिन संगठन की कोई विचारधारा नहीं। यह किसी विचारधारा पे आधारित नहीं है। हम लोग अपनी क्रांतिकारी विरासत को अपनी विरासत
00:02:32:09 मानते हैं। जो हमारे देश की क्रांतिकारी विरासत रहे। चाहे वो शहीद ए आजम भगत सिंह हो, चंद्रशेखर आजाद हो, राम प्रसाद बिस्मिल हो, अशफाक उल्ला खान हो, खुदीराम बोस हो, करतार सिंह सराबा हो तमाम जो ऐसे क्रांतिकारी हमारे देश में हुए हैं। हम उनकी विरासत को अपनी विरासत मानते हैं। और हम एक ऐसे समाज के लिए लड़ रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं जिसका सपना इन तमाम क्रांतिकारियों ने देखा था। मतलब 18 साल, 20 साल, 22, 25 साल में जो हजारों लाखों क्रांतिकारी इस देश में कुर्बान हो गए थे और आंखों में जिन सपनों को लेकर वे कुर्बान हुए थे। हम मानते हैं कि उनके सपने आज भी अधूरे हैं वो पूरे नहीं हुए। अभी मार्च का महीना बीता है और 23 मार्च को हम सभी जानते हैं शहीद आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का शहाद दिवस पड़ता है। तो इस दौरान हम हमने उनको याद भी किया और उनके विचारों को हमने लोगों तक पहुंचाने का काम भी किया। जी। तो, उनके शहादत के लगभग 95 साल पूरे हो चुके हैं। तो, 95 साल भी बाद भी हम देखते हैं कि जिस समाज को हम हमारे सामने आंखों के सामने देख रहे हैं, वह समाज कतई नहीं है जिसका सपना इन क्रांतिकारियों ने देखा था। हम्म। तो, उस समाज को बनाने के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं। तो, यह हमारी जो मेन ऑब्जेक्टिव अगर देखा जाए तो किससे लड़ाई है? ये हमारी लड़ाई
00:03:47:13 इस व्यवस्था से है। मतलब एक तरीके से जो शासन इस समय लागू है। हां। मतलब जो ये व्यवस्था है इस व्यवस्था में नहीं शासन ने ही व्यवस्था की हुई है ना हां बिल्कुल लेकिन हम इसके कोर में इस व्यवस्था को मानते हैं क्योंकि जैसे मतलब क्या लोकतंत्र आपको पसंद नहीं है क्या नहीं हम मानते हैं कि असल में जो हमारे देश में जो व्यवस्था है वो वास्तव में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था सिर्फ कहने भर के लिए है अगर इसको जमीन पे देखा जाए तो ये लोकतांत्रिक हमको कहीं से दिखाई नहीं देता है। अच्छा मतलब कहने का मतलब ये है कि है वो राजतंत्र वो दिख रहा है। नहीं वह राजतंत्र भी नहीं है। यहां पर पूंजी का तंत्र हावी है। हम जैसे इस व्यवस्था में मतलब कि किसी धार्मिक आईडियोलॉजी को लेकर आपका कोई काउंटर नहीं है। नहीं हम किसी जैसे हम हमारा यह मानना है कि इस देश में अलग-अलग धर्मों के लोगों को जो निजी उनका मसला है, आस्था का वो एक अलग विषय है। अलग विषय है। उसप हमारा कोई विरोध ही नहीं है। लोग व्यक्तिगत जीवन में किस धर्म को मानते हैं? किस विचार को मानते हैं? किस धारा को मानते हैं? किस पंथ को मानते हैं। इससे हमारा कोई निषेध नहीं है। यह व्यक्तिगत आजादी है लोगों की कि वह क्या मानते हो। हम ये मानते हैं कि राजनीति में धर्म का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हम हम मतलब धर्म का राजनीति एक तरीके से देखा जाए
00:05:02:16 तो जो इस समय की सरकार है हम और उसका जो कोर काम करने का तरीका है वो आपका कहीं ना कहीं उससे डायरेक्ट सीधा-सीधा विरोध है। हां मतलब एक तो आप कि जो सरकार आपने जो ये बात कही ना कि तंत्र जो है वो ठीक नहीं है। शासन व्यवस्था ठीक नहीं है। इस बिंदु पर मैं और आप एक हैं। हम हम भी वह जो तंत्र है उसको वैसा नहीं मानते हैं। हम कि वह कोई कारगर है या किसी के लिए अ वो हितकारी सिद्ध हो सकता है। परंतु एक बात मैं अब जैसे काफी सारी चीजें तो हमारी क्लियर हो ही गई है। आपका वो धार्मिक विषय है नहीं। ब्राह्मणवाद पे आपने लिखा नहीं है विरोध ऐसा कोई खास और बिलीव्स अपनेप आप कह रहे हो कि मान सकते मगर मैं फिर आपको एक यह जानना चाहूंगा आपसे कि क्या आपको नहीं लगता कि इस पूरी दुनिया में जो भी समस्या है उसकी जड़ में बिलीफ्स ही हैं। आपको ये नहीं लगता मतलब ऐसा आपने सोचा कभी कि नहीं सोचा? अगर जैसे मेरा कहने का मतलब है कि यदि मेरा सही आपका सही हो जाए आपका सही मेरा भी सही हो जाए हम तो हम लोगों में लड़ाई होने के चांसेस बहुत कम हो जाते हैं।
00:06:17:18 हम मगर है क्या कि सबका सही और गलत तय करने वाले जो पैराटर्स हैं वह अलग-अलग हैं। किसी का सही और गलत कुछ और तय कर रहा है। जो आपने कहा ना धार्मिक स्वतंत्रता हालांकि वो भी एक अलग चर्चा का विषय हो जाएगा कि धर्म किसे कहेंगे हम है ना? तो फिर भी अभी मान ले कि डूस एंड डोंट्स यह मान लें नियमावली तो किसी की मोरलिटी कुछ और है। किसी की मोरलिटी कुछ और है। सभी ने अपनी मोरल्टी को आश्रय प्रदान किया है आध्यात्म का कि हम जो मोरल्टी दे रहे हैं उससे आपको यह मिलेगा। ये क्या कहते हैं जो अंततो गत्वा मोक्ष हम तो वो जो डूस एंड डोंट्स मिले ना मोक्ष के नाम पर वो सबके अलग-अलग है और सबका मोक्ष भी अलग-अलग है। हम तो कहने का मतलब है जैसे आपने अच्छा एक जो आपने पॉइंट पकड़ा ना कि पूंजीवाद और जो है समाज का जो है नुकसान हो रहा है। वो तो आपने ठीक बात कही है। बट उसमें कोर में अगर हम जाके देखेंगे टटोल के तो सबके अपने-अपने जो अलग बिलीव्स हैं यही तो विप्लव का कारण बन रहे हैं। अगर सबकी नियमावली एक हो जाए, हां, एक नियमावली हो जाए तो लड़ाई किस बात की होगी? फिर भाई जैसे मान लीजिए कि मेरे अ बहन से विवाह करना
00:07:32:19 मेरे लिए अच्छा नहीं है। हम ठीक है? मेरे डूज़ एंड डोंट्स में डोंट वाले में आता है। हम और दूसरे के लिए बहन से विवाह करना आता है। हम ठीक है ना? तो वो डूज़ है। वो कर सकते हो आप। तो यहां पर क्या होगा कि जब वह मेरे आसपास रहेगा तो वैसी विकृति मेरे समाज में ना आए तो मुझे उससे दिक्कत होगी और मैं उसके आसपास रहूंगा तो उसके अंदर उसके यहां पर मेरी वाली विकृति ना आए तो उसको मुझसे दिक्कत होगी। तो कहीं ना कहीं संसार में युद्ध का जो कारण है उसके मूल में क्या आपको नहीं लगता कि यह जो बिलीफ्स आपने जो छूट दे दी है ना वही है? जी इसमें दो बात है जहां तक आपने बिलीफ सिस्टम की बात की है हम तो एक पॉइंट जो यहां पर आपने रखा है कि मेरे कल्चर या मेरे समाज में बहन से शादी करना मतलब अलाउड नहीं है एंड डोंट्स हां डस एंड डोंट्स मतलब डोंट्स में आता है और कुछ ऐसे समाज है जिनमें ये डज में आता है हम तो मतलब इसमें थोड़ी सी चीज ये क्लियर कर देनी जरूरी है मुझे लगता है कि जाहिर सी बात है कि किसी भी समाज में जो सगी बहन उससे शादी करना तो अलव नहीं है। किसी भी समाज में नहीं जो क्या उसको कहते हैं जो सहोदर कहें या सिबलिंग्स कहें उसमें अलव नहीं है। जहां तक कजन सिस्टर की बात आती है वो
00:08:47:22 उसी की बात आती है। तो कजन सिस्टर में जैसे वैसे तो वैसे तो यदि कोई व्यक्ति ये कहता है जैसे मान लीजिए निठारी है बिल्कुल ही उधर चले जाए निठारी गार्ड बच्चों का मांस खाए हम अब वो भी कह दे कि मेरे बिलीफ में ये है हम क्योंकि मेरे पास कोई फरिश्ता आया उसने ये कहा वो कहा और मेरे बिलीफ में अब ये है अब उसको 100 500 लोग फॉलो करने वाले भी हैं। उसके बिलीफ में वो है। हम तो वो बिलीफ के नाम पर जब वो उसको रख देगा निठारी अपनी मानसिक अभाव को जब वो बिलीफ के नाम पर रख देगा तो क्या हमें उसको भी पोषित करना चाहिए क्योंकि या फिर लड़ाई तो होनी निश्चित है क्योंकि उसके बिलीफ में वो बता रहा है कि वही है जिसके कारण वो उसे जेल भेज रहे हैं सजा दे रहे हैं ये बात है मतलब अपनी बात पूरी कर लीजिए वो कजन वाली सिस्टर वाली इसमें मैं पूरी बात कर लूं मतलब कजन सिस्टर में शादी की जहां तक बात है तो जाहिर सी बात है कि आमतौर पर यह समाज में तो है ही कि मुस्लिम कल्चर में कजन सिस्टर एक तरीके से कहें तो प्रचलित है। दूसरा जो साउथ इंडियन फैमिलीज है वहां के कल्चर में भी ये बहुत डोमिनेट करता है। मतलब इवन कि अपने मामा से शादी मैं इसको क्लियर कर दूं। ऐसा होता है जैसे किसी पिता ने ये कहा है कि सिगरेट मत पियो। है ना? मगर फिर भी बेटा पी
00:10:02:28 रहा है। यहां पर क्या है कि पिता ने सिगरेट नहीं अलऊ किया है। बेटा ऐसा कर रहा है। मगर कहीं-कहीं पर जब पिता ही ऐसा कह देगा कि सिगरेट पियो। तो वहां पर हमें वो जो बिलीफ सिस्टम है उस पर फिर बात करनी पड़ जाएगी। तो ये जो आपने बताया ना ट्रेडिशंस हैं वो अगेंस्ट द स्क्रिप्चर है। मतलब वो अपने जो पिता है उसकी आज्ञा के विरुद्ध जाकर के वो ऐसा कर रहे हैं। मतलब देखिए इसमें दो बात है। जैसे जो संस्कृति का जो मसला है जो कल्चर का मसला है ना वो धर्म से ही आता है। मतलब केवल धर्म से मतलब एग्जैक्टली धर्म से कनेक्टेड कल्चर नहीं होता है। क्योंकि अगर देखिए कोर अगर धर्म की बात होती ना संस्कृति तो जैसे हिंदू धर्म की हम बात करते हैं। हजारों संस्कृति हैं इस देश में हिंदू धर्म के अंतर्गत। इसीलिए तो विप्लव है। तो यह तो मैं कह रहा हूं। हां। ऐसा होता है कि धर्म ने यह बात कही। हम ठीक है? अब कहीं-कहीं पे धर्म ने कुछ ऐसी बात कही जिसका अर्थ कुछ अलग निकल रहा है। अब व्यक्ति ने उसको सही से जाना नहीं, परखा नहीं, समझा नहीं। या फिर मान लीजिए किसी देश काल परिस्थिति में आपत धर्म के लिए जैसे कोई आपत्ति काल है। उस और वो आज्ञा धर्म ने ही दी है। हम जैसे मान लीजिए आप बीमार पड़ गए तो आपने अल्कोहल वाली दवाई ग्रहण कर ली। हम ठीक है? यह क्या हो गया? आपत धर्म। खांसी आ रही है तो आपने कोई ऐसी दवाई ली जिसमें अल्कोहल।
00:11:18:19 अब आपने क्योंकि ले लिया तो किसी ने इसको सामान्य धर्म मान लिया। खूब मदिरापान करो, खूबसारा करो। इस हिसाब से वो जो बहुत सारी संस्कृतियां हैं जो मूल में आप अगर जाएंगे कोर में तो ऐसा नहीं है। 50 चीजें नहीं है। वर्णाश्रम है। अह क्या कहते हैं? जो मूर्ति पूजा है और ये जो बहन भाई में विवाह मान्य नहीं है। स्पष्टता स्पष्टता बहुत सारी चीजें आपको मिलेगी वहां। मतलब इसमें दो बात है। एक तो कुछ चीजें क्लियर करके थोड़ा हम लोग आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि अब जाहिर सी बात है किसी टॉपिक पर डिबेट तो डिबेट नहीं है। डिबेट है ही नहीं। तो जैसे मुझे यह लगता है मुझे क्या लगता है मतलब यह तो आप भी इस चीज को समझ सकते हैं कि जो हिंदू धर्म है उसका कोई केंद्रीय आईडियोलॉजी या केंद्रीय ग्रंथ या केंद्रीय कल्चर नहीं है। क्यों इस पर मैं क्योंकि अपनी बात पूरी कर आप पूरी कर लीजिए। मतलब आप इसमें उपनिषद को भी देखते हैं। इसमें वेद को भी देखते हैं। इसमें गीता को भी देखते हैं। इसमें स्मृतियों को भी पुराणों को भी देखते हैं। और आप देखते हैं कि एक तरफ इसमें मूर्ति पूजा का निषेध भी है और एक तरफ मूर्ति पूजा का समर्थन भी है। ठीक है। एक तरफ कई जगहों पर आपको जातिवाद के खिलाफ चीजें स्पष्ट तौर पर मिलती हैं। एक तरफ कई जगहों पर सीधे तौर पर जातिवाद को इंडोर्स करने
00:12:33:22 वाली चीजें मिलती हैं। मैं समझ गया आपकी बात। क्योंकि बहुत ज्यादा बातें कर देंगे तो सबका जवाब देने में थोड़ा सा घूम जाएंगे। हम तो मैं बताता हूं इसमें क्या है कि कोर चीजें हैं सनातन वैदिक आर्य हिंदू वही है जो वेद पे बिलीव रखे वेद को प्रमाण ना माने मतलब मैं मैं आपको बता दूं पूरी कर दूं फिर आप बता तो वेद क्या है हमारा कोर वो है कोर जो ग्रंथ आपने कहा ना कि एक ग्रंथ तो वो हमारा वेद है और उसके बाद जो वेद पर आधारित जो अन्य ग्रंथ है जो वेद का प्रतिपादन करते हैं वेद को समझने में सहायक होते हैं वेद की प्रकाश मेंय आगे अपने ज्ञान को वेद अविरुद्ध होते काम करते हैं वो हमारे गीता रामायण महाभारत इत्यादि आ जाते हैं। अब बात आती है कि वेद में यह तो एक अलग बात हो गई कि हमारे केंद्रीय ग्रंथ है कि नहीं तो हिंदू वही है सनातनी वही है जिसका वेद पर प्रमाण हो अन्यथा वो हिंदू भी सिद्ध नहीं होगा वो एक अलग चर्चा हो जाएगी हिंदू क्यों सिद्ध नहीं मगर [गला साफ़ करने की आवाज़] जब हम ये कहते हैं कि जैसे एक जगह मूर्ति पूजा है एक जगह नहीं है तो उसमें ऐसा है उसमें ऐसा है कि ईश्वर के दो स्तर है। एक पारमार्थिक और एक व्यवहारिक। जैसे कि पृथ्वी के दो स्तर हैं। एक पारमार्थिक कह ले सेटेलाइट के
00:13:48:24 जरिए दिखने वाली पृथ्वी गोल है। और एक है व्यवहारिक हम यानी कि हमारे मनुष्यों के द्वारा दिखी देखी जाने वाली जो पृथ्वी चपटी है। हम्म तो हमारा व्यवहार कैसा हो रहा है उसके साथ? जो चपटा दिख रहा है उसके अनुसार। मगर थ्योरिकली हम जानते हैं शब्द प्रमाण से हम् कि पृथ्वी जो है गोल है। है ना? उसी तरीके से ईश्वर के भी दो एस्पेक्ट हैं। हम एक व्यवहार में ना आ सकने वाला मांडकोपनिषद में लिखा है कि वो व्यवहार में आ ही नहीं सकता। तो मूर्ति कहां से बनेगी? और फिर वही व्यवहार में ना आ सकने वाला हमारे लिए व्यवहारिक बनता है। अवतार लेता है। फिर उसकी मूर्ति बनती है। तो मूर्ति पूजा आ गई। मतलब दोनों एस्पेक्ट के नजरिए से उसमें बात चली है। तो आपको दोनों एस्पेक्ट लेकर चलना होगा कि अब जैसे मान लीजिए एक छोटा सा एग्जांपल आपको दूं कि जैसे अ भूख खाना हमको भूख लगी है तो एट दी एंड हमको क्या चाहिए? कैलोरी कैलोरी का कोई आकार है क्या? हम कोई आकार नहीं है। ना ही हम हवा में मार सकते हैं हाथ पैर के कैलोरी हमें मिल जाए। हम और मगर हम कैलोरी को प्राप्त करने के लिए उसका एक अवतार है हम रोटी भोजन सगुण सागर उसको ग्रहण करते हैं क्योंकि हम व्यवहार किसके साथ कर सकते हैं जो हमारी इंद्रियों का विषय हो गया हम तो हम तो हम भोजन को ग्रहण करते हैं और कैलोरी हमें प्राप्त होती है। तो इसी प्रकार से
00:15:03:25 हम अवतार या मूर्ति पूजा करते हैं। तब हमें जो उसका जो व्यवहार जो जिसकी मूर्ति नहीं बन सकती वो रूप हमें आत्मसात होता है। एक ही भूत होते उसके हम ये तो रही बात अब जाति व्यवस्था की ये बात है कि जाति व्यवस्था दो बात दो तरीके की जाति व्यवस्था है एक है घृणाम मूलक जातिवाद जो प्रसिद्ध किया गया है दुष्प्रचार के द्वारा एक है व्यवस्था मूलक जातिवाद हम व्यवस्था मूलक जातिवाद ही हिंदू धर्म के द्वारा शास्त्रों के द्वारा वर्णित है वास्तविकता में और घृणामूलक जातिवाद नहीं है मगर होता क्या है कि जैसे जो हमारे विरोधी होते हैं हमारी संस्कृति के या जो भी कह ले जो वैमनिष्ट वो ऐसे वर्ड्स का फायदा उठाना चाहते हैं जिसका हम दूसरा मतलब भी निकाल सकते हैं। जैसे मान लीजिए इस समय हम लोग बैठे हुए हैं। ये मंदिर की छत है। हमसे नीचे इस समय कुछ लोग होंगे। अगर उनसे पूछा जाए कि शिवश और ध्रुव के कंपैरेटिवली आप क्या हो? तो उन्हें अगर वो ये कहेंगे कि मैं नीच हूं। तो यहां पे सुनने में बुरा लग रहा है। मगर वो अपनी व्यवस्था बता रहे हैं कि मैं किसी से नीचे हूं। किसी बिल्डिंग में मैं नीचे रह रहा हूं। मेरे ऊपर कोई रह रहा है। मैंने कहा मैं नीचे हूं। तो यानी मैं नीच हूं। तो वो वाला जब नीच आया तो वो व्यवस्था मूलक नीच है। मगर उसको ही अगर आप ऐसे प्रचारित कर दो आज के टाइम में नीच शब्द
00:16:18:26 एक गाली जैसा हो गया। अरे तुझे वो नीच समझते हैं। तो ये हो गया घृणाम मूलक। जैसे सेकंड क्लास और थर्ड क्लास एसी, फर्स्ट क्लास एसी ये सब व्यवस्था मूलक है। किसी को छोटा नहीं दिखाया जा रहा है। व्यवस्था है ये कि किसने किस तरह की श्रम किया है तो उस तरीके का श्रम के अनुसार मूल्य देने के बाद वो उसमें सफर कर रहा है। वहां पे कोई बड़ा-छोटा नहीं देखा जा रहा। और यह जो क्लासिफिकेशन है यह इससे ही समाज चल पाता है। अगर यह क्लासिफिकेशन होगा ही नहीं तो समाज चल नहीं पाएगा। क्लासिफाइड करना पड़ता है हमें चीजों को तब वो आगे बढ़ती है। तुम ये करोगे, तुम वो करोगे, तुम ये करोगे। तुम हेड हो, तुम जूनियर हो, तुम सीनियर हो। हर जगह हमको करना ही पड़ता है। शायद आपकी संस्था में भी प्रेसिडेंट होगा, कोई महामंत्री होगा। इस तरह से संगठन भी चलता है। तो ये व्यवस्था मूलक चीजें होती हैं जिसका समय आने पर जो विरोधी तत्व होते हैं वो इस तरह से फायदा उठाने का प्रयास करते हैं। अब तीसरी बात आती है कि पोर फिलॉसफी वेद ही क्यों? हम्। इसके बारे में बहार उपनिषद में एक बात आती है कि वेद कभी यह क्लेम नहीं करते कि उनको ईश्वर ने रचा है। क्योंकि ईश्वर के बारे में एक बात प्रसिद्ध है। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। ईश्वर किसी भी प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। सभी नियमों को बनाने वाला सर्वनियामक है। तो आप देखेंगे हमारे
00:17:34:02 हिंदू कल्चर में हिंदू मान्यता में सनातनी में हम हमारे जो ईश्वर हैं वो मोहिनी का रूप धारण करके छल भी कर देते हैं। हम है ना? हम लीलापूर्वक माखन भी चुराते हैं। यह सब करते हैं। यानी कि ईश्वर इस नियम के नीचे भी नहीं है कि वह सत्य पे ही सत्य ही बोलेगा। है ना? अच्छा दूसरी बात यह है कि अगर ईश्वर ने सब कुछ बनाया है तो उसने बुराई भी तो बनाई है। झूठ बोलने वाले भी तो उसी ने बनाए हैं। जिस जिसको हम ये मान रहे हैं कि भ ये वैदिक नहीं है या मान लीजिए कुरान है और कुरान के अनुसार हम लोग कुरान ही नहीं है। इस्लामिक नहीं है। तो उनके ईश्वर ने ही तो बनाई है ये भी हम जो वेद है वो भी तो उन्हीं के ईश्वर के उनके अनुसार और ये हमारे अनुसार हमारे ईश्वर ने ही तो बनाया। तो यह जो क्लेम है ना कि जब सब कुछ ईश्वर ने बनाया तो बुराई को भी ईश्वर ने बनाया। तो बुराई को भी ईश्वर ने बनाया तो जब ईश्वर हमें भटकाने की व्यवस्था भी कर रहा है तो उसके द्वारा दिए जाने वाले कहे जाने वाले किसी चीज पर हमारा बिलीफ नहीं है। इसीलिए हमारा बिलीफ है अपौरुषय ग्रंथ। जो वेद है वो ये क्लेम करते हैं कि उनको किसी ने भी नहीं रचा। उनका कर्ता कोई नहीं है। वो अनादि है। बस वो प्रकट होते हैं और आविर्भूत होते हैं। आविर्भाव होता है और जो है तिरोभाव होता है। इतना मात्र है। इसलिए हमारा बिलीफ उस
00:18:49:08 पे होता है वेद पे कि इसको भगवान ने बोला नहीं है। मतलब कहते हैं हम दो प्रकार के कार्य करते हैं। मैं थोड़ा समझा दूं उसको। एक होता है कि हम अपने स्वभाव के वश होकर के कर रहे हैं। स्वभावगत कार्य। उसमें हमारी बुद्धि का उपयोग नहीं होता है। जैसे कि मान लीजिए कि मेरे सामने दो लोग खड़े हैं। हमने कहा कि इसको बुलाना है कि इसको बुलाना है। तो क्योंकि मेरी इसमें बुद्धि प्रयोग हो रही है। तो मैं चाहूं तो इसको बुलाऊं, मैं चाहूं तो दूसरे को बुलाऊं। बुद्धि का उपयोग है। मगर कुछ कार्य ऐसे हैं जो हम बिना बुद्धि के मतलब उसमें बुद्धि का उपयोग नहीं होता है। जैसे सांस लेना। है ना? एक बच्चा माता के गर्भ से जन्म ले रहा है। बुद्धि है ही नहीं, मगर वो सांस ले रहा है। है ना? तो इसी तरीके से ईश्वर के जो स्वास भूत होते हैं ये वेद होते हैं। इसलिए जब ईश्वर बुद्ध के रूप में आए तो हमने उनको प्रणाम तो किया मगर यज्ञों की अवहेलना के वेद वैदिक यज्ञों की अहेलना के कारण हमने उनको उनके अनुकरण नहीं किया। सनातनी कौन है? बुद्ध की बात इसने नहीं मानी। वो सनातनी तो हमने उनको इसलिए नहीं माना क्योंकि वो भगवान मिले ही हैं। विष्णु के अवतार मिले ही हैं। मगर भगवान को भी दूर से नमस्कार है। यदि वो वेद का विरोध करें क्योंकि वेद अपौरुष है। वेद हमें भटकाने के लिए नहीं होते। ये कुछ बिलीव मतलब वो है मैंने आपको बताया वेद ही क्यों? और वेदों को मानने वाला हिंदू ही क्यों? तो वो हिंदू की व्याख्या
00:20:04:12 आ जाएगी कि हिमालय से लेकर हिंदू सरोवर के बीच का स्थान हिंदुस्तान। फिर वो उसके बहुत सारे कारण है कि हिंदू कौन हो सकता है? जो वेद को प्रमाण माने। अन्यथा वो हिंदू ही नहीं है। जी हां मतलब इसमें जैसे ये डोमेन तो काफी दार्शनिक और धार्मिक क्षेत्र में चला जाएगा। इसमें बहुत ज्यादा बात तो मैं नहीं करूंगा। मतलब थोड़ा ट्रैक पे मैं आता हूं और जो मुख्य मुद्दा यह है कि जैसे देखिए ये तो दर्शन और तमाम चीजों का विषय है क्योंकि इसमें बहुत सारी बहसें हैं। मतलब ऐसा नहीं है कि इस देश में कोई एक पंथ या कोई एक जो है विचार मान रहा है तो उसके अगेंस्ट विचार नहीं है या उसके अगेंस्ट कहने वो तो नहीं वो तो वो तो दुनिया में पोर्नर्न इंडस्ट्री भी है। उसके भी हां तो मैं वही इसको मैं कंप्लीट कर दूं क्योंकि जैसे देखिए ना इसी देश में वैष्णव भी हैं शव भी हैं शाक भी हैं बहुत सारे अलग-अलग पंथ और संप्रदाय के और आपस में बहुत चीजें होती रहती है इसी देश में रामकृष्ण के इसी देश में उसमें ये देखा जाता है तीन चीजें चाहिए मैं देखिए सर मैं इसको कंप्लीट कर दूं थोड़ा मैं मैं एक एक कुछ फिनिशिंग चीजें दे दूंगा जिससे आप समझ पाए कि तीन चीजें हमारे यहां पे चाहिए जैसे कि हम ये समझे पहले कि धर्म क्या है? हम ईश्वर क्या है? तो धर्म
00:21:19:13 वो है जो आपको मोक्ष दिलाए। सीधी सिंपल सी बात धर्म वो है जो काम आपको मोक्ष दिलाएगा। मोक्ष कैसे सिद्ध होता है? ईश्वर कैसे सिद्ध होता है? कि व्यक्ति के अंदर प्यास है। असतो मा सद्गमया तमसुमा ज्योतिर्गमया मृत्युमा मतंग। सच्चित आनंद की प्यास है। तीन तरह की प्यास है कि मैं कभी मरूं नहीं। मोटिलिटी एंडलेस जॉय और ऑल नोइंग। यह सब बनना चाहते हैं। सब कोई अंदर इनबिल्ट प्यास है। तो यह जो प्यास है इसके ही निवारण करता का नाम ईश्वर है और प्राप्त हो जाने वाली स्थिति का नाम ही मोक्ष है। ठीक है? तो अब क्या है कि जो भी बिलीव्स ऐसे हैं जो इन तीन चीजों को देंगे वह मान्य है जो इनमें से किसी एक का भी विरोध करेंगे वो मान्य नहीं है। अब कोई इसको अगर जैसे मान लीजिए कि आपका जैसे दिशा फाउंडेशन है उसकी अपनी एक कोर चीजें आपने बताई। अब मैं कहूं कि मैं दिशा छात्र संघ का ही हूं। मगर मैं तो जो है पूंजीवाद को बहुत सपोर्ट करता हूं। तो ये कैसे संभव है? दिशा छात्र संघ संघ का स्वरूपभूत लक्षण है कि भाई दिशा छात्र संघ का मतलब है पूंजीवाद से लड़ाई है ना जो मतलब एक एग्जांपल लिया मैंने तो उसी तरीके से कि अगर कोई सनातन का आलंबन लेकर के कह रहा है मूर्ति पूजा नहीं है
00:22:34:19 या वैष्णविज्म सेविज्म की बात कर रहा है ना और बात करते हुए फिर यह कह रहा है कि भैया मोक्ष है ही नहीं या ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है या धर्म शाश्वत नहीं है तो उसको फिर वहां पर वेदों से जोड़ वेद वैदिक से जोड़ के नहीं देखना चाहिए। फिर उसको वहां देखना चाहिए कि भाई यह कहीं ना कहीं जो वास्तविक वैदिक धर्म है उसके इत जाकर के बात की जा रही है। ये तीन एस्पेक्ट हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म। तो ये तीनों जहां मिलेंगे वो सनातन है। जी नहीं ठीक है। आप जो कह रहे हैं उसमें कि मेरा वो डोमेन नहीं है। तो मैं उसप बहुत टिप्पणी नहीं करूंगा। बस मैं इतना ही कहना चाह रहा हूं कि जैसे बहुत मतलब जो मेरा जो मैं जो मैं बात कहना चाह रहा था कि जैसे एक जाहिरा तौर पर कि हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति का जाहिर तौर पर कि कुछ ना कुछ समानता है तभी जाके एक पर्टिकुलर बाकी चीजों से अलग है और बाकी चीजें उससे अलग है। एक बाउंड्री तो होगी ही चीजों में लेकिन उस बाउंड्री के भीतर भी कई सारे कॉन्फ्लिक्ट हैं। कई सारे विचार हम अलग-अलग है। वह तो आप मैं वही तो कह रहा हूं। जैसे आपका ये जो है दिशा छात्र संघ अभी एक ज्यादा व्यापक हो जाए मान लीजिए तो इसमें भी कई चीजें हां मतलब दो बातें उसमें विरुद्ध होने
00:23:49:20 लगेंगी तो देखना ये पड़ेगा कि आपकी कोर चीज क्या थी और कौन सी बात उसके साथ में है कौन सी सब बात विरुद्ध है वो तो वो तो अह प्रकृति का एक वो है ना सिद्धांत कि भाई उसमें जो बिगड़ाव होना ही है आप कर दोगे फिर वो बिगड़ेगा फिर आपको रिपेयर करना है ये चीज हां तो उसमें जैसे आपका यह मानना है जैसे कई लोग ऐसे भी हैं जो इससे इधर भी चीजों को मानते हैं और अपने आप को सनातन और वैदिक तो मैं वही तो कह रहा हूं कि उसका वो सनातनी कहना सिद्ध नहीं होगा। तो ये तो फिर वही जो ऐसा कह रहे हैं और आप उनके बीच का ये डिबेट हमारी बहुत साफ सुथरी सी बात है ना तो उनके बीच का बहस हो जाएगा क्योंकि मेरा ये डोमेन नहीं है तो जो उसको समर्थन करे तो वो आकर सिद्ध करे ये बात है। तो ये तो एक अलग डोमेन हो जाएगा। वो ये कहे कि वे वेद में पूर्ति पूजा नहीं है मगर फिर भी वो भी तो हिंदू है या वो भी तो सनातनी है वो भी तो प्योर वैदिक है तो फिर हम उनसे कहेंगे कि आप सिद्ध करिए वेदों में नहीं 31 यजुर्वेद में 31 18 19 में कहा गया है कि ईश्वर अपनी माया के द्वारा विभिन्न रूपों में प्रकट होता है प्रकट हो गया मूर्ति बन गई नहीं जैसे हम हमारे भी तीन एस्पेक्ट है हम अपनी बात करें ये जो हम देख रहे हैं स्थूल शरीर ये हमारा सगुण साकार रूप है हम फिर हमारा एक सूक्ष्म शरीर होता है वो हमारा सगुण निराकार स्वरूप है जिसमें मन बुद्धि चित्त अहंकार हमारी जो ज्ञानेंद्रियां कर्मेंद्रियां ये सब होती है और
00:25:04:26 फिर हमारा एक होता है कारण शरीर सुशुप्ति वाला जहां पे कुछ नहीं होता है जब हम सुशुप्ति की दशा में होते हैं ऐसी गहरी नींद गाढ़ी नींद जहां पर ना तो भौतिक ताप की पहुंच होती है है ना कि गर्मी लग रही है कि नहीं लग रही आपको कुछ नहीं आप बस अपने स्वरूप में स्थित होते हैं कारण शरीर में हो हम तो हमारे भी तीन एस्पेक्ट है स्थूल शरीर भी है हां नहीं वो तो है मतलब मेरा जो इसमें ये कहना है कि मतलब ये जो विचार हैं, बिलीफ सिस्टम है, आस्थाएं हैं और धर्म है, संस्कृति तमाम चीजें हैं। मुख्य मसला इसके बाद, इसके अलावा जो है क्योंकि देखिए जैसे सवाल वही होता है ना कि जैसे हमेशा से अलग-अलग धर्म, अलग-अलग दर्शन, अलग-अलग विचार, अलग-अलग संस्कृतियां रही हैं। लेकिन मुख्य सवाल जो मानव जाति का है जो आज आज के दौर का सबसे मुख्य सवाल है। जैसे जो अह जो हमारे जैसे भगत सिंह ने भगत सिंह की भगत सिंह की एक पुस्तिका है मैं नास्तिक क्यों आपने शायद पढ़ी होगी जानी भी होगी तो उसमें तो भगत सिंह सीधे-सीधे धर्म और ईश्वर तमाम चीजों के खिलाफ लिखते हैं तो भगत सिंह की वह एक विचारधारा थी वही भगत सिंह के संगठन में राम प्रसाद बिस्मिल भी थे वो कट्टर आर्य समाज थे अशफाक उल्लाह खान भी थे वो इस्लामिक धर्म को मानने वाले थे लेकिन ये
00:26:20:02 सभी लोग एक साथ आकर जो एक समाज में जो आम आबादी है जनता आपके द्वारा किए जा रहे प्रयास का विरोध नहीं कर रहा हूं। मैं बस यह कह रहा हूं कि फिर भी आप एक बार को यह क्या चिंतन हमें करना चाहिए कि मूल समस्या क्या है? जैसे पत्तों पे पानी तो देते रहेंगे मगर मूल समस्या पे अगर हम ध्यान देंगे तो बदलाव ऐसा नहीं कि हम 100% कर लें मगर बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। अगर हम मूल पे देखें तो मैं बस आपका ध्यान खींचना चाह रहा हूं। मैं आप जो कर रहे हैं वो गलत नहीं कर रहे। देश की आजादी के लिए लड़े भगत सिंह वो गलत नहीं लड़े। हम मगर एक मूल समस्या ये है कि अगर हमारी बहन से विवाह करना गलत है। ठीक है? चचेरी से ही सही। मेरे बगल में आकर के कोई ऐसा रहने लगा जो चचेरी बहन से विवाह करना सिखा रहा है तो मेरी आने वाली पीढ़ी उनसे प्रभावित हो सकती है और मेरे घर में वो चीज आएगी तो मैं पहले से ही उनसे एक दूरी बनाना चाहूंगा और यहीं से चालू होती है लड़ाई युद्ध। मतलब इस पे मैं क्योंकि देखिए लड़ाई का मेन मुद्दा ये नहीं है। मैं आपको बता रहा हूं। मैं मैं आपको बता रहा हूं एक चीज़। हां। अब जैसे आपने कहा कि बहुत सारे बिलीफ सिस्टम है। मगर जब उनमें टटोला जाएगा तो जैसे कोई भी व्यक्ति जो यह दावा कर रहा है कि मैं आपको ईश्वर की बात बता रहा हूं। जितने भी बिलीफ सिस्टम है वो ये
00:27:35:06 दावा करते हैं कि मैं आपको ईश्वर से मिलवाऊंगा। मैं आपको मोक्ष दिलवाऊंगा। दोनों में से एक चीज। हम मगर जब उनसे बात की जाती है तो ये जितने भी वेद विरुद्ध बिलीफ सिस्टम है मैं खैर इस बात को ऐसे लेके नहीं चलूंगा कि आप इस चीज को ऐसे ही देखें कि नहीं हिंदू धर्मी अप्लाइड होना चाहिए या सनातनी अप्लाइड अभी मैं आपको इस ओर ध्यान खींचना चाह रहा हूं कि क्या हमारी जो ये जो डूस एंड डोंट्स की नियमावली ये एक होनी जरूरी है कि नहीं है ना मैं इस ओर ध्यान खींचना तो मैं ये कहता हूं कि जितने ऐसे बिलीफ सिस्टम है जो ये कहते हैं कि मैं आपको ईश्वर से मिलवाऊंगा मैं आपको मोक्ष दिलवाऊंगा। मैं यह देखता हूं कि वो वेद विरुद्ध जब जाते हैं, सनातन विरुद्ध जब जाते हैं तो उनकी यही बात जो है लागू सिद्ध नहीं हो पाती। हम जैसे मान लीजिए कि इस्लाम की बात करें हम वो एक जगह हैं क्योंकि उन्होंने कहीं पे कभी भी इस बारे में सोचा ही नहीं। कभी भी उन्होंने नास्तिकता के लिए कि मैं नास्तिक क्यों हूं। उन्होंने जाकर के किसी भी समर्थवान गुरु के सानिध्य में प्रश्न ही नहीं किया। ऐसा भी तो है भाई सबसे भाई भगत सिंह सबसे बड़े नास्तिक थे या बुद्ध बुद्ध बड़े नास्तिक हैं या भगत सिंह भगत सिंह कोई दार्शनिक तो थे नहीं बिल्कुल नहीं थे लेकिन दार्शनिक कौन थे बुद्ध जिन्होंने अपनी फिलॉसफी दे दी कि ईश्वर नहीं है
00:28:50:12 हम बुद्ध तो बड़ा दार्शनिक कौन हुआ बुद्ध मगर उनसे कौन टकराया शंकराचार्य शंकराचार्य टकराए और उनकी फिलॉसफी को खंडन किया और सनातन धर्म को और ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया तो जब कोई ऐसा दावा कर रहा है कि नहीं नहीं मैं आपको ईश्वर दे रहा हूं मोक्ष दे रहा हूं वेद विरुद्ध जाते हुए तो उससे सीधी बात जैसे मैंने कहा कि वेद विरुद्ध कोई भी जाएगा तो उसकी वो चीजें सिद्ध नहीं होती है। जैसे मान लीजिए इस्लाम की बात ले लें। इस्लाम कहता है मैं हमारा जो कुरान को देने वाला ईश्वर है वो ईश्वर है। अब ईश्वर का एक बहुत नॉर्मल सा पैरामीटर है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान होना चाहिए। सर्वशक्तिमान हम सर्वज्ञ का मतलब होता है सब कुछ जानने वाला। हम सर्वव्यापक का मतलब होता है जो सब जगह व्यापक है। है ना? सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान का मतलब है जिसमें सब कुछ करने का सामर्थ्य है। मगर वहीं पे वो जो कुरान का ईश्वर है वो छ 101 में या 410 में कहता है कि मैं नीचे नहीं आ सकता। मेरी कोई संतान नहीं हो सकती। ये जो कांट शब्द आ गया ना ही कांट डू इट। हम यह कांट शब्द ईश्वर के लिए नहीं आता है। तो हमारा ईश्वर है सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म। हम् ईश्वर वही है जो किसी भी
00:30:05:13 प्रकार के नियम के नीचे नहीं है। जो सभी नियमों को बनाने वाला सर्वनियामक है। तो कोई कहे कि ईश्वर अह मछली के रूप में अवतार नहीं लेगा तो वो मत्स्य बन के दिखाता है। कोई कहे कि वो जो है अह बौने के रूप में अवतार नहीं लेगा तो वामन बन के दिखाता है। कोई कहे कि वो आधा जानवर आधा इंसान नहीं नरसिंह बनता है। कोई कहे वो झूठ नहीं बोल सकता वो कृष्ण बनता है। कोई कहे कि वो सत्य नहीं बोल सकता तो वो राम बन जाता है। मतलब ईश्वर के लिए ये चीज नहीं आ सकती। ही कांट डू इट। मगर वो कह तो रहे हैं ईश्वर है। मगर फिर उसी ईश्वर को बाधित भी कर रहे हैं कि वो ये काम नहीं कर सकता। तो ये जो लिमिटेशन आ रही है इसके कारण उनका ईश्वर सिद्ध नहीं होता। फिर वो आखिर रात वाली बात है कि मोक्ष भी सिद्ध नहीं होता। तो कहने का मतलब मेरा ये था
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00:30:48:00 कि आप किसी भी फिलोसोफी को जब टटोलेंगे जो आप कह रहे हैं ना कि बहुत सारे बिलीफ्स हैं उनसे हमें क्या मतलब। मगर आप किसी भी फिलोसफी को टटोलेंगे उस फिलॉसोफी में उनके द्वारा दिलाई जा रही चीज वो है ही नहीं जो वो दावा कर रहे हैं। मतलब इसमें बात ये है ना कि मुझे ये लगता है कि समाज का जो कोर प्रॉब्लम है वो ये चीजें नहीं है। समाज का जो कोर प्रॉब्लम है जैसे हम लोग अपने दैनंदिन जीवन में जिन समस्याओं को झेलते हैं। जैसे व्यक्तिगत तौर पे हमारी सबकी एक आस्था होती है। एक बिलीफ सिस्टम होता है। एक धर्म होता है। लोग मानते हैं पूजा पाठ करते हैं। तमाम सारी चीजें करते हैं। लेकिन रोज-बरोज़ जीवन जीते हुए जिन समस्याओं से हम जूझते हैं, वो ये सारी समस्याएं नहीं होती। हम सुबह उठते हैं तो हमारे दिमाग में पहला ख्याल क्या आता है? पैसा काम पर जाना है। बच्चे हैं घर में उसको खाना खिलाना है। बच्चों की पढ़ाई है। है ना? जरूरतें [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं, दवाई है, शिक्षा है, तमाम सारी चीजें हैं। तो हमारे जीवन के जो कोर जो केंद्र है, वो इससे निर्धारित होता है। मैं वही मैं इसीलिए कह रहा हूं। मैं इस पे हम मुझे लगता है। मैं आपकी बात से असहमत नहीं हूं। आप क्या है? इसको कोर कह रहे हैं ना? अब बस मैं आपका ध्यान यहां लाना चाह रहा हूं। ये कोर नहीं है। ये उसके द्वारा निकलने वाले बाय प्रोडक्ट्स हैं। जब हम एक मत होंगे उसका अच्छा मेरा अच्छा उसका बुरा मेरा बुरा तो हमारे बीच में
00:32:03:03 जो सिस्टम्स तैयार होंगे पैसा कमाने को लेकर के स्वास्थ्य को लेकर के शिक्षा को लेकर के एक मैं इंटरप्ट करना चाहूंगा क्योंकि मुझे लगता है ना कि जैसे जब भारत में इस्लाम नहीं था हम तो क्या इसका मतलब भारत में गरीबी, भुखमरी या समस्याएं मौजूद नहीं थी? नहीं थी। मैं बताता हूं कब नहीं मैं बता रहा हूं। रामायण पढ़िए। एक नहीं रामायण में क्या समस्या थी? बता रहा हूं ना मैं आपको। बता रहा हूं। जब राम राज्य हुआ तब की बात सुनिए। हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए। ये नहीं ये क्या है? ये तो एक ये एक आस्था और बिलीफ का सवाल हो गया। है ना? क्योंकि कहीं पर लिखा हुआ है। तो इतिहास अच्छा क्योंकि उसपे मैं जाना ही नहीं चाह रहा हूं। ये आपने कैसे माना कि हमारे यहां प्रॉब्लम्स नहीं प्रॉब्लम्स थे क्योंकि उसके प्रमाण है उसके दस्तावेज हैं जैसे बुद्ध के दस्तावेज बुद्ध के समय तो इस्लाम नहीं था दस्तावेज में क्या किसी का शब्द ही है ना नहीं बुद्ध के समय तो इस्लाम धर्म नहीं था ना आप आप जो अपनी इंडियन हिस्ट्री में ये मान रहे हैं कि मुसलमान जब नहीं थे तब भी प्रॉब्लम्स थी ठीक है तो यानी आपको शब्द प्रमाण से प्राप्त है ना कि आपने देखा है नहीं बकायदा उसके शिलालेख है तो शिलालेख तो रामायण के भी नहीं रामायण के शिला क्या शिलालेख कहां पे उससे पुराने मिल जाएंगे शिलालेख जहां पे लिखा हो कि हवाएं इतनी चलती बोलते क्या किसी शिलालेख पे भाई रामायण की रामायण को प्रमाणित करने वाली बहुत से एविडेंसेस मिल वो तो जैसे
00:33:18:07 वो डोमेन ही दूसरा हो गया मैं क्या बता रहा हूं मैं बता रहा हूं इसको इसको भी हम ऐसे सिद्ध करते हैं इसको ऐसे मैं कह रहा हूं जैसे इतिहास का जो ऐसा है ना हम लोग ऐसा मैं मैं मुद्दा थोड़ा मैं मैं बता रहा हूं मैं इसको मैं क्लियर कर रहा हूं ऐसा हो रहा है कि हम अपने शब्द प्रमाण को तो चाहते हैं कि वो माना जाए मगर दूसरे का शब्द प्रमाण ना माना जाए अब इसमें शब्द प्रमाण किस आधार पे माना जाएगा वो भी चलिए इसको छोड़ दीजिए मैं सुनिए तो सुनिए तो अब इसमें क्या है शब्द प्रमाण को मानने का एक सीधा सा तरीका है हम कि आप अगर वैदिक नहीं है आप अगर सनातनी नहीं है तो आप सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में कौन माता है कौन बहन है कौन पत्नी है ये अंतर नहीं कर सकते नहीं ये तो गलत बात हां तो इसको आप जैसे अगर मैं इसको आप जैसे मैं अपनी बात बता रहा हूं बताइए मैं तो जैसे आप जिससे एसोसिएट खुद को करते हैं मैं नहीं करता हूं ठीक है लेकिन क्या आप जो कह रहे हैं क्या उसको मैं मान आप वही मैं मानता हूं तो आप मुझे बताइए मुझे बताइए आपकी आपकी नैतिकता का आधार क्या है? मेरी नैतिकता का आधार मानवता इंसानियत है। कहां से वो निश्चित हो रही है कि यह वो निश्चित वो निश्चित एक मानवीय आंतरिक स्वभाव है। यानी उससे निश्चित हो। ठीक है। तो इसका मतलब ये है कि मानव मानवीय आंतरिक स्वभाव से जो बात निकल के आए वो उसकी नैतिकता होती है। नहीं केवल आंतरिक जैसे समाज का एक पूरा एक ऐसी व्यवस्था है उसमें बहुत सारी चीजें हैं। वो कहां से निश्चित
00:34:33:10 हो रही है? नहीं उससे निश्चित जैसे सवाल ये है ना कि जैसे इंसान की जो पूरी समाज और एक पूरी इंसानियत तो कोई एक ऑथॉरिटेटिव रहेगा कि नहीं? मानने की जैसे मुझे लगता है जरूरत नहीं लगता। जैसे तो फिर इसका इसका आधार तो यही हुआ ना कि अंदर से जो निकल के आया वो मोरालिटी नहीं केवल अंदर से नहीं बहुत सारे जैसे इसमें लॉजिक है उसमें साइंस है उसमें तमाम तय की जो नैतिकता ये तय कौन करेगा? नहीं जैसे भगत सिंह की जो नैतिकता है। आप आपने अभी अपनी बताई ना तो ये तय कौन करेगा कि जैसे आपने बोला मेरी नैतिकता ये है कि मैं जो है अ क्या कहते हैं? चचेरी बहन से विवाह ना करू। दूसरा बोल रहा है मेरी नैतिकता अंदर से निकल के आ रहा है। मैं चचेरी बहन से विवाह करूं। तो इसमें सब नहीं बोल रहे जैसे उसमें भी बात हमें थोड़ा समझना पड़ेगा ना जैसे जो भगत सिंह की नैतिकता है वो कहां से आ रही है नहीं वो भी यहीं से आ रही है देखिए मैं बताता हूं मैं बता रहा हूं मैं बता रहा हूं मैं भगत सिंह तो जिस चीज का मैं उसको क्लियर कर रहा हूं ये बताइए यहां पे जो बल्ब लगा हुआ है ये कहां से आया ये बल्ब का जाहिर सी बात है आविष्कार किया गया है थॉमस अलवा एडिसन जो है ना मगर मगर चलिए किसी ने भी किया हो मगर ये किसी वैज्ञानिक ने किया वहां से आया मगर हम लोग क्या कहते हम तो परचून की दुकान से ला रहे हैं उसी तरीके से यह जो नैतिकता थोड़ी बहुत कहीं भी किसी में भी दिखाई दे रही है, भले ही वह वैदिक नहीं है। भले ही वह कह रहा है कि मैं सनातनी नहीं हूं। मगर वो जो थॉमस अलवा एडिसन का बल पूरी दुनिया में पहुंचा हुआ है ना
00:35:48:14 और उसको लग रहा है मैंने तो परचून की दुकान से खरीदा। उसको मालूम ही नहीं थॉमस अलवा एडिसन। यही बात है। इसीलिए मैं कह रहा हूं ना कि आप जब तक वैदिक नहीं होंगे, तो ये सिद्ध नहीं कर पाएंगे कि मेरे पास मजबूत आधार क्या है। सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में कौन माता है, कौन बहन है, कौन पत्नी करने मजबूत आधार? सर विज्ञान है। बताइए साइंस इस बात को साबित करती है। जैसे कजन सिस्टर में साइंस ने साबित किया है ना कि आप करते हैं तो बीमारियां से लेकर तमाम चीज़ें पैदा होती है। यह तो विज्ञान है मैं कहता हूं। इसका इसका मतलब गोद ली हुई बहन के साथ आपका विचार बदल सकता है। नहीं क्यों बदल सकता है? वहां तो साइंस अप्लाई नहीं होगा। नहीं जैसे वहां भी जैसे सवाल ये है कि समाज नहीं एक बात पे रही है। जैसे आपने कहा साइंस है तो यानी गोद ली हुई बहन के साथ आप दूसरी दृष्टि कर सकते हैं। कर सकते हैं। तो फिर वहां साइंस तो नहीं है। जैसे ह्यूमन इमोशंस काम करते हैं ना? यानी कि साइंस नहीं है उसमें। ह्यूमन इमोशंस रिलिजन से नहीं आते हैं क्योंकि सेम ह्यूमन इमोशंस मौजूद थे। मैं बता रहा हूं आपको। मैं आपसे ठोस आ देखिए ह्यूमन इमोशंस आधार है। तो ह्यूमन इमोशंस कह रहे हैं कि बच्चों को कुकर में डाल के उबाल के खाओ। नहीं कह रहे। उसके कह रहे हैं ना। नहीं वो ह्यूमन इमोशंस नहीं। तो ये आप उस पे थोप थोड़ी नहीं सकते हो। समाज के 99% का इमोशन। इसका मतलब इसका मतलब जो ज्यादा संख्या में कहेंगे वो माना जाएगा। ज्यादा संख्या की बात नहीं। आम तौर पर जो इमोशन है वही प्रिवेंट होगा। आप मुझे एक मजबूत आधार दीजिए ना। मजबूत आधार वही है कि जब समाज में रिलीजन नहीं
00:37:03:18 था तब भी ये ह्यूमन मिशन कब नहीं था? आज से 6000 साल पहले का इतिहास तुम्हें कहीं नहीं मिलता है। कब नहीं था? 6000 साल पहले का लिखित इतिहास कहीं नहीं मिलता दुनिया में। ये साबित है। नहीं। तो इससे ये हो गया कि उस समय रिलीजन था नहीं। तो लिखित इतिहास नहीं है तो आप कैसे कह सकते हैं कि रिलजन था? नहीं। नहीं नहीं। भाई हमारे तो इतिहास कह रहे हैं कि दो करोड़ वर्ष पहले का भी है। इतिहास तो लिखित है ना। पद्म पुराण में लिखित है। साल पहले का कोई लिखित ग्रंथ नहीं। भाई साहब मैं पद्म पुराण कह रहा हूं ना आपको। एक ग्रंथ में लिखा हुआ है तो एविडेंस आप फिर वही बात है ना कि आपने जापान नहीं देखा से देखते हैं ऐसे कैसे करते हैं ठीक है तो आप मुझे सिद्ध करिए ना कि आपकी कोर फिलॉसफी क्या है नहीं मैं वही बात कह रहा हूं जैसे यानी कि आप कह रहे हैं अंदर से आता है ठीक है आप बिना कपड़ों के पहली बार माता-पिता के कहने पे गए थे बाहर मतलब जैसे जब बिना कपड़ों के बच्चा बाहर जा रहा होता है मां समझाती है कि मत जाओ तो ये अंदर से क्यों नहीं आता है तो केवल रिलीजन का मसला नहीं है तो आप ह्यूमन इमोशंस अंदर से आ रहे हैं ना ह्यूमन इमोशन जैसे ह्यूमन इमोशंस केवल रिलजन से नहीं बनते हैं ना। मैं यह कह रहा हूं कि आपके पास ये जो नैतिकता है, इसका आधार क्या है? नैतिकता वही तो मैं कह रहा हूं। जैसे कोई अगर देखिए आपने मैं आपको चार पांच चीजें बताऊं। आपने एक बात कही ह्यूमन इमोशंस तो ह्यूमन इमोशंस निठारी के कुछ और हैं। आपने माने नहीं किया। एक मिनट एक प्रेग्नेंट इमोशन मैं आपको चार पांच चीजें बता दूं। फिर दूसरी बात आपने कही संख्या
00:38:18:21 कि वो 99% एक मिनट 1 मिनट भाई साहब संख्या 99% तो मैंने कहा जो सब लोग मानेंगे वो मानना पड़ेगा। तो आपने उसमें भी सहमत नहीं हुए। फिर आपने तीसरी बात कही विज्ञान तो मैंने कहा गोद ली हुई बहन के साथ क्या होगा? आपने कहा वहां भी मेरा है। तो आप कोई एक चीज लेके नहीं चल रहे हो कि ये मेरा कोर है। क्योंकि मानवल्टी का ह्यूमन इमोशंस को प्रिवेलेंट तभी समाज में किया जाता है वो इमोशंस जो मानव कौन करता है? कौन करता है? ये कोई एक दो व्यक्ति नहीं करता है। ये कौन करता है? समुदाय तो हम ऐतिहासिक रूप से तय हम क्या लेके चले कि भाई इसने जो बताया है ह्यूमन इमोशंस वो ह्यूमन इमोशंस जैसे राहुल सांकृत्यान की किताब है वो से गंगा की तरफ वोगा से गंगा की ओर यानी कि उसके ह्यूमन इमोशंस ह्यूमन इमोशंस है नहीं आप मैं इस बात को आप सुनिएगा राहुल सांकृत्यान बहुत महापंडित कहे जाते हैं बहुत बड़े विद्वान है उन्होंने एक किताब लिखी है वो से गंगा तक बकायदा उसमें उन्होंने लिखा है कि कैसे जब समाज बहुत शुरुआती दिनों में था तो आपस में शादियां विवाह होती थी एक ही परिवार में और बहुत ज्यादा डिफरेंशिएट चीजों में नहीं था। बकायदा उन्होंने घटनाओं के माध्यम से यानी कि आप यह मानते हैं कि ये ठीक ये चीज ठीक है। नहीं लेकिन सवाल है कि उस दौर में चीजें होती थी और मानवता ने उस दौर से वो निकल कर यहां तक आई है तो समाज यानी कि आपकी ये चीज बदल सकती है कल को? नहीं
00:39:34:00 तो समाज के लिए जो सबसे बेहतर होता जाता है। मानवता ह्यूमन उसको चुनता है ना? जो गलत होता जाता है उसको छोड़ता चला जाता है। जो बेहतर होता जाता है उसको चुनता चला जाता है। आप वही मैं कह रहा हूं। मैं कहां से चुनूं अपनी चीजें? वो सांकर हम देखते हैं वो अभी निश्चित कहां है जो डाटा कौन सा डाटा है डाटा जैसे दो तरह के डाटा एक तो जो विज्ञान नहीं मुझे आप नाम लेके बताइए ना मैं उसको सर्च करूं खोलूं डाटा को कि भाई यहां से मुझे अपनी ह्यूमन साइकोलॉजी मिलेगी नहीं जैसे सवाल है कि जैसे विज्ञान में मस्तिष्क के ऊपर काम होता है विज्ञान में नहीं तो वो देखिए जब आप जब आप बिना नाम के बोल रहे हैं तो वहां पे क्या हो रहा है बहुत सारे मस्तिष्क हैं किस मस्तिष्क के आधार पे मैं अपनी वो डिसाइड करूंगा मोरालिटी क्योंकि हम बहुत जैसे मोरालिटी की जो बात आ रही है ना जी जैसे मैं क्या बात कह रहा हूं। मैं ये बात कह रहा हूं कि आज की जो हमारे देश में समस्याएं हैं जो नैतिकता का सवाल है, है ना? वो सवाल आज के समाज से जुड़ता है। आज से 5000 पहले मैं ये नहीं कह रहा हूं। मैं आज के ही टाइम में कह रहा हूं कि मेरी नैतिकता कहां से सिद्ध होगी? अगर मैं वैदिक नहीं हूं, ईश्वर को मानने वाला नहीं हूं तो। तो आप वही सवाल बताइए कि जैसे जब वैदिक धर्म नहीं था तब की नैतिकता कहां से सिद्ध हो? वैदिक धर्म था हमेशा से। आप हमारे शब्द प्रमाण को मान नहीं रहे हैं। शब्द प्रमाण कैसे माना जाएगा? तो शब्द प्रमाण आप मनवा तो रहे हो। नहीं मैं शब्द चलिए चलिए भगत सिंह थे ये कैसे सिद्ध हुआ भगत सिंह थे ये तो बकायदा फोटो
00:40:49:03 हैं बकायदा शब्द प्रमाण है भाई साहब वो भगत सिंह ही थे वो कैसे बताइए शब्द प्रमाण केवल नहीं है भगत सिंह के परिवार वाले अभी वो शब्द वो शब्द हुआ ना कैसे शब्द वो कह रहे हैं कि भगत सिंह थे लड़े थे वो दिखा रहे हैं वो फोटो भगत सिंह के अरे भैया फोटो वो भगत सिंह क्रांतिकारी था इस विषय में क्या प्रमाण है तो आप नाम छोड़ दीजिए वो व्यक्ति यानी कि हमने मैं एक बात क्लियर कर दूं यानी कि कहने कहने का मतलब है हमें कहीं ना कहीं शब्द प्रमाण पे भरोसा करना पड़ता है। की बात नहीं है। तो मैं तो चलिए भगत सिंह के तो चलिए अभी 150 साल है। 500 बुद्ध का क्या शब्द प्रमाण है? तो जैसे जैसे इतिहास में तीन चीजें होती हैं। जैसे आपको मैं समझाता हूं। सबसे पहले एविडेंसेस दिखे जाते हैं जो शिलालेख मैं तो इस पे भी क्वेश्चन करूंगा कि जो तीन एविडेंस आप एविडेंस मार रहे हो। देखिए आप क्वेश्चन करेंगे ना। जैसे सवाल आपको उसे उसे आपको वो करना चाहिए ना। जैसे सुनिए मेरे उसको जवाब सबसे मिलते हैं जैसे सबसे पुराना जो लिखित प्रमाण पिता है वो 6000 साल पहले का मिलता है जो मेसापोटामिया की सभ्यता थी वहां पर उसके शिलालेख में बकायदा लिखे हुए मैं दिखा देता हूं आपको खोलिए मेसोपोटामिया की सभ्यता आप सर्च कीजिए 6000 साल पहले लिखित कार्बन डेटिंग के द्वारा सिद्ध किया गया है ठीक है बकायदा सिद्ध किया उससे क्या सिद्ध हो रहा है कार्बन डेटिंग यही तो प्रक्रिया होती है जिससे सिद्ध
00:42:04:09 करते हैं कि कोई चीज कितनी पुरानी है तो पुरानी होने से वो ये किया था वो किया पुरानी चीज़ आप लाएंगे ना लिखे तक। मैं मैं यह नहीं कह रहा। मैं यह कह रहा हूं कि उसने यह किया था कि नहीं किया था। यह कैसे पुरानी चीज़ आप लाइए? अरे भाई साहब मैं पूछ ये रहा हूं कि वहां पे बहन को बहन माना था कि नहीं माना? सवाल ही अलग है। तो सवाल तो यही हो रहा है ना। बात क्या कह रहा हूं? जब धर्म नहीं थे क्या तब नैतिकता नहीं थी? नैतिकता नहीं है धर्म के बिना ना? नहीं सवाल वही तो मैं कह रहा हूं। जब धर्म नहीं थे तब नैतिकता थी। तो वही आप मुझे जैसे मान लीजिए मेसोपोटामिया की सभ्यता है। ठीक है? आपको उसके अवशेष मिल गए। मगर ये कैसे मिला कि उन्होंने बहन को बहन नहीं माना था या उससे पहले बहन को बहन? तो अलग डोमेन की बात है। आप ये कह रहे हो ना कि जब जब धर्म नहीं था तब जो है सभ्यता थी कि नहीं थी। वो तो आज भी मैं तो वही प्रमाण तो किसी के अवशेष मैं कह रहा हूं मैं सुनिए। जैसे साउथ इंडियन से आप बात करेंगे तो वो कहेगा कि हम इस चीज को नहीं मानते हैं। तो वो अपने धर्म ऐसे तो निठारी से आप बात करेंगे वो कहेगा मैं नहीं मानता कि मांस ना खाया जाए। नहीं तो जैसे ये निठारी क्या है? किसी के मानने से समाज है जो निठारी को सपोर्ट है। तो वो जो समाज ये पूरा समाज है जो जो समाज कहता है वो माने। तो समाज सपोर्ट जो समाज कहता है वो माने समाज में एक अधिकतर जोता होती है उसकी अधिकतर जो कहते हैं वो माने सवाल है कि वो आप हर चीज से आप हर चीज से मूव कर रहे हो मैं मूव नहीं कर रहा और क्या मैं मूव नहीं आप आपने देखिए निठारी को क्यों जब मैं निठारी को
00:43:20:02 आपने आपने अपनी बात को रखने के लिए लाए तमिलियन फैमिली ठीक है पहली बात तो मेसोपोटामिया क्लियर करूं आपने कहा मेसोपोटामिया के अवशेष मिलेंगे मेसोपोटामिया के अवशेष मिलने से ये थोड़ी ना सिद्ध हो रहा है कि वहां पर नैतिकता थी कि नहीं थी कि धर्म के विषय में क्या बिलीव था नहीं कह भी नहीं सकते कि नहीं तो फिर उसके अस्तित्व होने ना होने से क्या फर्क पड़ रहा है फिर वही बात है ना कि ये चीज़ क्लियर नहीं हो रही ना कि नैतिकता केवल धर्म से आती है तो मैं सिद्ध कर रहा हूं ना आप मुझे बता दो कहां से आ रहा है कह रहा हूं ना कि जब धर्म है तभी आप मैं कह रहा हूं सब छोड़ दो आप बता दो आपके पास कहां से आ रहा है नहीं दो बात है जैसे इसमें मुद्दा थोड़ा हम लोग भटक रहे हैं जहां से सवाल मैं अभी भी यह कह रहा हूं कि समाज आपने देखिए आपने क्या कहा आपने आप एक आप समाज में मैं आपके आपके साथ ही था वहां तक। आपने ये बात कही कि भाई जहां पे हम लोग जा नहीं सकते। गति नहीं हो सकती कि भाई 6000 पहले क्या था वो कुछ कह नहीं जा सकता। आपने उसको उदाहरण दे दिया। अब मैं कह रहा हूं सबसे अच्छी चीज है आप मेरे सामने साक्षात बैठे हुए हैं। आप मुझे बता दो सामने खड़ी हुई तीन स्त्रियों में माता बहन पत्नी में अंतर करने का मूल आधार आपके पास क्या है? कौन सी किताब है या कौन सा व्यक्ति है या क्या है? जैसे हम रोज-बरोज जीते हैं समाज में। यानी कि हमारे अंदर जो हमें अच्छा लगेगा वो हम करेंगे। क्या ह्यूमन इमोशन जैसे ह्यूमन ह्यूमन इमोशन
00:44:35:27 ह्यूमन इमोशंस का एग्जैक्ट आधार क्या है? एक्सैक्ट आधार ह्यूमन के मस्तिष्क में तमाम तरीके के हॉर्मोनस तो भैया फिर निठारी का मानना पड़ जाएगा ना भेजेंगे नहीं जैसे दो बातें यहां हां बताइए ह्यूमन इमोशन या तो ये कहिए कि हम बलशाली है तो उसको भेज देंगे वो बलशाली तो हमें खा जाएगा मानवता के आम हित में है उसी को समाज प्रिविलेंस वो हित तय कौन करेगा वो हित मानव समाज मिलके तय करेगा कोई इसका मतलब जनसंख्या ज्यादा होगी वो मानव जाएगा नहीं मानव समाज करेगा समाज मानव समाज की डेफिनेशन क्या दे रहे हैं आप ये बताइए समाज जो आपस में दैनंदिन जीवन में जो मानव है इंसानियत कितने लोगों के मानने पर आप मान लोगे कि यह मानव समाज पांच जो चीज़ प्रवेट है तो हित में है तो यानी ज्यादा समाज ज्यादा लोग जो कह रहे हैं जैसे जो तार्किक होगा आम तौर पे आ रहे हैं अब आप तार्किकता पे जा रहे हैं मानव समाज तर्क को खोजता है ना तर्क को खोजता है ठीक है तो मैं आपसे तर्क ही तो पूछ रहा हूं कि आप मुझे बताइए माता बहनों पत्नी में अंतर करने का आधार तो आप सुनिए आधार में विज्ञान देगा विज्ञान आपने छोड़ दिया गोद ली हुई बहन के मामले में नहीं हां छोड़ तो दिया नहीं छोड़ा हां नहीं छोड़ा क्या छोड़ा बताइए क्योंकि दो बात है जैसे विज्ञान हमें बताता है हम कि हम एक पर्टिकुलर सामाजिक व्यवस्था में जीते हैं। है ना? और विज्ञान भाई साहब विज्ञान गोद ली हुई बहन के लिए क्या बोल रहा है? विज्ञान केवल नेचुरल प्राकृतिक विज्ञान नहीं होता। विज्ञान सामाजिक विज्ञान भी होता है। तो सामाजिक देखिए
00:45:51:06 आप देखिए क्या हो रहा है? एक लूप में फंसे हुए हैं। मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं। लूप में कैसे फंस रहे हैं? आपने कहा कि समाज फिर मैं जब समाज में पूछने गया तो आपने उसमें कहा विज्ञान कि तर्क भी है। एक मिनट 1 मिनट। तो अब जब मैं तर्क पूछ रहा हूं तो आप समाज दे समाज बोलना। जब समाज के लिए पूछ रहा हूं तो विज्ञान पूछ रहे हैं। इसमें बात ये है ना कि विज्ञान ये लूप हो गया ना समाज विज्ञान समाज विज्ञान समाज विज्ञान सामाजिक विज्ञान का भी क्षेत्र होता है और प्राकृतिक विज्ञान का भी क्षेत्र होता है। तो आप मुझे वो तर्क बता दीजिए ना किस तर्क के आधार पे आप तय कर रहे हैं सामाजिक विज्ञान हमें ये बताता है कि एक सामाजिक व्यवस्था वो सामाजिक तर्क क्या है? विज्ञान वो क्या है? तर्क ये है कि अगर हम एक समाज में एक निश्चित चीजों के लिए निश्चित नियम तय नहीं करेंगे तो समाज टूटेगा। यानी हमने नियम तय किए हैं ना। वो नियम केवल धर्म से तय नहीं होता। मैं नहीं कह रहा। आपने नियम तय किए हैं। कहां से किए? वो धर्म से नहीं किए। मैं मैं नहीं कह रहा धर्म से करो। आपने कहां से किए पूछ रहा हूं। तो मानवता के ओवरऑल अरे भाई तो आपने अपने नियम तय किए हैं उसकी का भी नियम तो किसी ने आपका कोई स्वरूप है? नियम का मैं पूछ रहा हूं। नियम का कोई स्वरूप है आपका? बिल्कुल स्वरूप है ना। वो क्या है? तो वो जैसे सवाल यह है कि जैसे जहां से धर्म का नियम कैसे तय होता है? हमारा वेद से तय होता है। वेद मनुष्य ने लिखा है ना? ना अपोरुष है। अब यह तो आपका मत है। तो वो वो भी आपका मत है। नहीं तो सवाल वही है ना कि फिर किस तो इसीलिए
00:47:06:09 इसीलिए आप आप मैं यह नहीं कह रहा आप मेरे को गलत सिद्ध करो। आप अपनी बात बताओ ना। मैं तो अपनी बात सीधी बता रहा हूं कि इंसानियत के हित में है। मानव समाज जो तय करता है। तो मानव समाज के लिए आपसे पूछ रहा हूं ना कि उसके तर्क क्या होते हैं? मानव समाज के होते हैं कि मानव समाज के जो आम हित में चीज़ भाई साहब आप मुझे तर्क बता दो ना। माता बहनों पत्नी में अंतर करने का तर्क क्यों नहीं बता वही है कि देखो आप आप क्या कह रहे हो बार-बार कि सोर्स ऑफ़ इनेशन पे चले जाओ। मगर उस सोर्स ऑफ़ इनेशन का कारण क्या था कुछ करने का वो आप नहीं बता रहे हो। आप जिस पर बात जैसे आपने कहा विज्ञान जैसे जैसे आप आपने कहा सुनिए तो जैसे आपने कहा कि विज्ञान पे चले जाओ। विज्ञान पे गए तो समाज पे चले जाओ। समाज पे गए तो विज्ञान पे जुड़ी हुई है ना? नहीं मैं जुड़ी हुई नहीं कह रहा हूं। उसमें वो वो तर्क तो बताइए। जैसे चीज़ एक दूसरे पे जानी पड़ेगी। मैं ये नहीं कह रहा मैं ये नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं उसके पास वो विज्ञान क्या था समाज के पास? नहीं जैसे मैं जैसे समाज ने निर्णय लिया कि कजन सिस्टर से विवाह नहीं करना है तो उसके पास कारण क्या था? तो समाज में परिस्थिति जैसे दो बात है जैसे एक दौर में समाज मैटरनल सोसाइटी थी। उसमें माताएं प्रिवेलेंट मान लेते आपकी बात उसमें उसमें माताएं प्रिवेलेंट थी और [गला साफ़ करने की आवाज़] उसमें पिता बच्चों के पिता कौन होंगे ये क्लियर नहीं होता था। चलिए एक एक चीज़ एक यह
00:48:21:15 आप मानते हैं एक चीज़ यह मान लेते हैं। एक मैं इसको कंप्लीट कर दूं मैं इसको कंप्लीट कर दूं क्योंकि फिर वो चीज़ हो गई। तो फिर मानव समाज ने चीजों को देखा और परिस्थितियों के अनुसार चीज़ें बदली पिता पितृसत्तात्मक सोसाइटी आई। है ना? फिर एकल विवाह का आया। बहु विवाह पहले था। फिर एकल विवाह का आया। तो समाज में परिस्थिति बदलती गई ना। तो परिस्थितियों के हिसाब से मानव समाज को जब जो चीज सबसे सही उस दौर के हिसाब से लगा उसको मानव समाज ने अपना आप मेरे प्रश्न नहीं समझ रहे प्रश्न यही है आपने आपने कहा परिस्थिति परिस्थिति के अनुसार बदला वो परिस्थिति में क्या कारण थे जो बदला और आज आपके क्या कारण है जो आप जो है ये मान रहे हो ये बताओ तो जैसे आज तो हमारे पास बहुत स्पष्ट तौर पर वो क्या हां वो बता बहुत स्पष्ट तौर पर कारण है कि एक तो जो सिबलिंग्स का मसला है वो तो मैंने बता दिया नहीं तो उसमें गोद गोद वाले में सिबलिंग चला अभी बच्ची में ये होगा हां कि जैसे जो मदर फादर मैंने आपसे पूछा इसका सुनिए मदर फादर आपने आपने अभी पांच मिनट बोला था मुझे मुझे एक बात बोलनी दीजिए इसको कंप्लीट करवा एक मैं इसको दोबारा पूछूंगा इसको दोबारा आपने ये बोला था कि जो है परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है तो पहली [गला साफ़ करने की आवाज़] बात तो क्या मैं ये मान लूं कि जो बहन के साथ विवाह ना करने की बात आज लागू है वो आपकी कल बदल सकती है। नहीं क्यों बदलेगी? आपने जैसे
00:49:36:21 बदला ना परिस्थिति के अनुसार जैसे जैसे विज्ञान 1 मिनट भाई साहब 1 मिनट 1 मिनट विज्ञान हर दिन तरक्की कर रहा है। कई बार ये होता है कि आज जो खोज की है कल उसने नियम दिया कि भैया ऐसे ऐसा हो गया है। उसके बाद अगले दिन नहीं वो खोज गलत थी। अब ये मानना है ये विज्ञान की क्वालिटी है। ठीक है? तो अब आपने कहा कि इस तरह से परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग वैज्ञानिक धारणाओं के अनुसार बदल रहा है। तो क्या मैं ये मानूं कि माता के साथ विवाह ना करना, बहन के साथ विवाह करना आपका बदल जाएगा आगे जाकर। नहीं क्यों बदलेगा? जैसे सूरज है। हां। है ना? तो क्योंकि विज्ञान बदलता है ना समाज बदलता है। नहीं नहीं हर चीज नहीं बदल जाती है ना। सूरज है। है ना? यानी कि बदलाव नहीं है। बदलाव नहीं है। यानी पूरी बात सुनिए। सूरज है। सूरज से प्रकाश की किरणें निकलती है। है ना? हम्। सूरज में एनर्जी पैदा होता है। ठीक है? ये बात विज्ञान सम्मत सिद्ध है। आज तो ये बात सिद्ध है। ये बात कल को बदल नहीं जाएगी। विज्ञान कितना भी तरक्की कर लेगा तो ये बात नहीं बदल जाएगी क्योंकि ये जो चीज यानी आप ये कह रहे हो ये बहन से विवाह ना करने वाली बात सिद्ध है। कहां सिद्ध है बताइए? दिखाइए। क्योंकि मैं आपको बता दूं मैं आपको मैं फॉर योर काइंड इनफेशन मैं आपको बता दूं। दोनों तरह की वैज्ञानिक अवधारणाएं आज भी अरे नहीं कह रहे हो। आप अपनी बात कर रहे हो। दिखाना पड़ेगा। आप दिखाओ Google पे आप थ्योरी दिखाओ।
00:50:52:07 सर्च करना पड़ेगा। ठीक है। दिखाओ। आप सर्च करिए। जेनेटिक कारण है। जेनेटिक स्वास्थ्य जोखिम है। विज्ञान यह साबित करता है और ऐसे विवाहों से पैदा होने वाले बच्चों में गंभीर बीमारियों की संभावना बहुत अधिक होती है। तो ये जेनेटिक्स क्लियर है। यानी कि इतने हिस्से में इस्लाम का पूरा खंडन है एक तरीके से। नहीं इस्लाम मानने लायक नहीं है। नहीं जैसे उसमें जो गलत विचार है उसको नहीं मानिए। इसमें मैं तो ये नहीं कह रहा हूं कि किसी चीज़ को मानने ना मानने की जरूरत है। कि दो जैसे जो गलत है उसको नहीं मान। एक बात समझिए। जो धार्मिक विचारधाराएं हैं ना वो क्लेम करती है कि हम तुम्हें सत्य बता रहे हैं। एक-एक सुनिए अक्षरस सत्य बता रहे हैं। अगर आपने उसका एक भी अक्षर ये कहा ना कि ये गलत है आंशिक रूप से तो आपने उसका ओवरऑल खंडन किया। वो सत्य की बात हो रही है। दूसरी बात मैं ये कह रहा हूं। इसमें आपने क्या सर्च किया है? विज्ञान के वह प्रमाण जो भाई-बहन में भी विवाह का समर्थन करते हैं। कुछ अनुसंधान और अध्ययनों में कजिन मैरिज के समर्थन में निम्नलिखित वैज्ञानिक और सामाजिक तर्क दिए गए हैं। यानी वैज्ञानिक जो बकायदा वैज्ञानिक और सामाजिक तर्क तो एविडेंस भी जैसे मैंने जेनेटिक्स का एविडेंस बताया ना तो ऐसा एविडेंस बताइए जो बकायदा कहता है कि नहीं जेनेटिक्स का जो एविडेंस है ये सही नहीं है। ये एविडेंस मिला है और ये सही तो मेरे भाई यहां पे कह देने से विज्ञान का कोई विज्ञान का इस्तेमाल पहली बात यहां पे भी तो वैज्ञानिक मैंने देखिए हमारी जो
00:52:07:22 जो बताई उसमें केवल विज्ञान शब्द का मैं बता रहा हूं कायदा क्या है मैं बता रहा हूं बता रहा हूं हमारी जो बात शुरू हुई थी वो यहां से हुई थी कि मैंने ये आपको काउंटर किया था कि कुछ वैज्ञानिक ऐसे भी हैं जो ये कहते हैं कि भाई बहन में विवाह संभव है वैज्ञानिक एक मिनट भाई साहब फिर आपने कहा ऐसा कोई वैज्ञानिक नहीं है तो मैंने आपको बताया कि ऐसा कि अब अब मैं मूल विषय पे दोबारा से आ जाता हूं। ये बात को हल्की करने वाले पॉइंट है। मूल विषय क्या है कि यानी कि आपका आधार जो है आपने ये विज्ञान जान लिया था। आप किस किस उम्र में जो है आपने निर्णय लिया था। मैं वैज्ञानिक तौर पर इस जो है भाई और बहन के विवाह को नहीं मानूंगा। मतलब जैसे मैंने क्या कहा क्या कहा ना कि विज्ञान एक प्राकृतिक विज्ञान एक सामाजिक विज्ञान होता है तो सामाजिक विज्ञान समाज के जो आपका निर्णय अपना समाज का है ना कि विज्ञान से लिया है तो जाहिर सी बात है एक निर्णय तो पहले समाज का ही है यानी आप वो विज्ञान उसको कहते हैं सिद्धि उसका आधार क्या है तो समाज वही तो मैंने कहा ना कि जो सामाजिक विज्ञान है वो समाज में जब इंसान लंबे समय से जीवन यापन करता है परिस्थितियों को जीता है तो उस परिस्थितियों से वो एक चीज को फॉर्मूलेट करता है गोद ली हुई बहन के लिए क्या है? वो भी एक फॉर्मूलेट करता है। वो क्या है? उसका क्या है? वो भी सामाजिक प्रमाण क्या है? उसका सामाजिक विज्ञान प्रमाण है। नहीं
00:53:22:24 भाई वैज्ञानिक प्रमाण क्या है? जैसे आपने सामाजिक विज्ञान का आधार बता सकता है ना? वो जेनेटिक्स का मसला वहां पर तो नहीं बता सकता तो फिर आधार सामाजिक विज्ञान समाज ने वो आधार क्या बताया? वही तो मैं कह रहा हूं कि समाज लंबे समय से एक प्रक्रिया में जब चलता आता है तो वो समय-समय पर भाई साहब मैं ये पूछ रहा हूं समाज का वर्तमान में गोद ली हुई बहन से विवाह ना करने का आधार क्या है? वही तो मैं बता रहा हूं। पूरी बात आप सुनिए ना। आप लंबे समय से बता रहे हैं। तो वही हर चीज़ तय होती है। जैसे एक आप यह बता रहे हैं कि परिवर्तन कब-कब होता है, कैसे होता है। आप यह नहीं बताते क्यों हो रहा है। जैसे जब तक समाज को नहीं पता था तब तक होते थे शादियां होती थी। तो आप क्या मानते हैं? सही क्या है? होना चाहिए कि नहीं। तो समाज को जब उसका तो उसका आधार क्या है? समाज समाज को पता चल गया। हां पता चल। बहन से विवाह नहीं करना है। क्यों? तो समाज को पता ये चला आधार। इसका बहुत सारी चीज़ों से किया जा सकता है। अब बहुत सारी चीज़ हो गई। अरे तो एक ज्ञान पहुंच नहीं सकता। तो कौन सा आधार चीज़ डिफाइन नहीं होता ना? कौन सी चीज़ बताइए? मैं कह रहा हूं कि जो मानव समाज के आम हित में जो चीज़ होती अरे भाई आम हित तय कौन करता है? इंसान तय करते हैं। कौन से इंसान? वो एक इंसान नहीं तय करते हैं ना। अरे तो कुछ तो उसका पैरामीटर बताओ। अमुक अमुक करेगा। जैसे एक जैसे इसको कैसे तय किया जाता है। लंबे समय से इंसान को ये समझदारी डेवलप होती है कि भाई हम ये चीज़ करते आ रहे हैं। मेरे भाई सुनिए।
00:54:38:16 अभी आपने कहा कि इंसान तय करते हैं। तो उन इंसानों की पहचान क्या होगी? नहीं पूरी बात तो सुन लीजिए। आप आप थ्योरी कर रहे हैं कि भाई आप यह कह रहे हैं तो पूरी बात आप कंप्लीट मैं मैं कर आप विषय बदल रहे हैं ना नहीं बदल रहा हूं आप ये मैं बता रहा हूं अभी बात ये हो रही है कि इंसान कौन होगा जो तय करेगा वो कैसे तय होगा नहीं पूरी पूरी बात होने आप ये कह रहे आप ये कह रहे हैं आप आप मेथड बता रहे हैं कि 2 2 करके फोर आ जाएगा ये मेथड हो गया ये 2 2 कौन करेगा वो बताइए नहीं तो पूरी बात तो पूरी होने दीजिए जी बताइए मैं जैसे पूरी बात आप सुनेंगे तभी हो पाएगी जैसे मुद्दा यहां पर ये है हम कि जैसे एक समय में समाज में जैसे जाति की जो व्यवस्था है। है ना? एक समय में समाज में बहुत क्लियर रूप से प्रिवेलेंट थे। है ना? फिर वही बात पूरी बात होने दीजिए। पूरी बात नहीं कर अरे भाई आप बार-बार इतिहास के आधार पर ये सिद्ध कर रहे हैं। आपसे प्रश्न पूछ रहे हैं। मैंने प्रश्न ये पूछा है कि आज के टाइम में आपने आज के टाइम आपने मान लिया है। इंसान आज नहीं पैदा हुए हैं। अरे भाई आप आप लाखों साल पहले आप आज ये मान रहे हो ना कि गोदवी बहन से विवाह नहीं करना है। हजारों सालों समझ है। इसमें तर्क क्या है? तर्क बता रहा हूं। यानी हजारों सालों की सोच चीज हो मान लेनी चाहिए। नहीं पहले समझ पूरी बात नहीं होने दे। आप बात विषयंतर कर रहे हो। यह तो आपका मत है। हजारों हजारों साल की
00:55:53:20 जो समझ है वो मान लेनी चाहिए बिना तर्क के। वह मेरी पूरी बात ही नहीं होने दे रहे। अरे वही तो आप तर्क बताइए ना। मैं बता रहा हूं लेकिन आप हां तर्क बता रहे हैं आप। हजारों साल की बात बता रहे हैं। बोल रहा हूं उसके बाद आप आप ठीक है। बोलिए बोलिए।
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00:56:05:10 तर्क बताइएगा। तर्क मैं तर्क ही बता रहा हूं। तर्क बताइए। तो जैसे बहुत संक्षिप्त में इस बात को खत्म करूंगा। क्योंकि ये देखिए बहुत डिबेट ऐसा हो जाएगा और मुझे नहीं लगता कि ये डिबेट इंसान इंसानी समाज के कोर हित में है। बिलकुल है। मैं बहुत उसको बहन और पत्नी में अंतर करने का मतलब है सुनिए समाज के सुनिए सुनिए मैं बता रहा हूं सुनिए सुनिए धर्मे हीना पशु भी समाना सुनिए तो मेरी बात सुनिए जो चार चीजें हैं आहार निद्रा भय मैथुन ये चार चीजें जानवरों में और इंसानों में समान है केवल एक चीज है जो अलग करती है धर्म ठीक है मुझे लगता है क्योंकि ये यहां से नहीं वो नहीं ठीक है ठीक है कोई नहीं अब पूरी कर लेते दो चीज़ है देखिए इसमें हां। मतलब मैं इसको थोड़ा-कमिनेट ही करूंगा। हां। क्योंकि देखिए, मेरे पास भी समय की कमी है और यहां से हमें निकलना भी है। जी। दो तीन चीज़ें हैं। मतलब मेरा यह मुझे बस आप अंत में ये बता दीजिए कि गोद ली हुई बहन के साथ विवाह ना करने के पीछे तर्क क्या है? जैसे आप जहां से धर्म का तर्क ला रहे हैं। मैं नहीं कह रहा। आप अपना बताइए। मैं वही कह रहा हूं कि ह्यूमन इमोशंस वो तर्क है। यानी वो ह्यूमन इमोशंस निश्चित कहां से हो रहा है? जैसे आपने कहा कि ह्यूमन इमोशन है। दूसरे का ह्यूमन इमोशन अलग है। तो ये अलग है। वो ह्यूमन इमोशन वो सिद्ध है। सिद्ध करिए
00:57:20:19 वो। कैसे हो? वो सिद्ध कैसे हो रहा है? क्योंकि जैसे ह्यूमन इमोशंस हमारे भीतर मस्तिष्क में अलग है। सिद्ध कैसे करेंगे कि वो उसके अंदर से नहीं आ रहा है। वो झूठ बोल रहा है। जैसे हमारे अंदर खुशी का इमोशंस आता है। है ना? पहले सुनिए पूरी बात सुनिए। खुशी का इमोशंस आता है। तो कैसे आता है? वो हॉर्मोन्स है जो क्या कहते हैं उसको? हम अ [गला साफ़ करने की आवाज़] जो खुशी के जो हार्मोनस है जो ऑक्स क्या तो उसको बढ़ता है मैं अभी भूल रहा हूं मतलब इस बात को देखिए मुझे लगता है कि या तो ब्रेक कर दें या तो अगर ऑनलाइन कभी पॉसिबल हो तो हम लोग कर सकते हैं। चलिए ठीक है। तो ये थी हमारी चर्चा तर्क और प्रमाण के उसमें चली है प्रकाश में। आप लोगों को कैसी लगी बताइएगा और ध्रुव जी का भी आभार जो इतनी देर उन्होंने यहां पर जो है तर्क वितर्क में वो संलग्न हुए। सभी को जय श्री राम।
00:58:30:05 [संगीत]
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