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00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] कि अवतार का लक्षण क्या है? जैसे जैसे समझिएगा कि मेरे सामने राम जी खड़े हैं। मेरे सामने रामपाल खड़ा है। ठीक है? दोनों में से ईश्वर का अवतार क्योंकि जीव और ईश्वर को तो मैं देख नहीं सकता। वो तो निराकार है। ठीक है? जो मुझे दिख रहा है वो शरीर है। तो इसमें लक्षण क्या है कि राम जी या रामपाल दोनों में से ईश्वर का अवतार है कौन? ये मैं कैसे पता करूं? इसमें इसमें इसमें शब्द ही प्रमाण है। अच्छा इसमें जैसे मुझे समझना है कि जैसे किसी जैसे किसी ने कॉपी में लिख के दिया मुझे। ठीक है? आपने मेरे को WhatsApp पे मान लो मैसेज भेजा कि दिल्ली में आप यहां हो। यहां पे एक व्यक्ति है। वो खड़ा है। आप उससे ये डॉक्यूमेंट ले लो। ठीक है? आपने मुझे बता दिया। उसका डिस्क्रिप्शन दे दिया कि फलाना फलाना ऐसा व्यक्ति है। पुलिस की वर्दी में खड़ा है। ऐसा ऐसा है। ठीक? अब मैं जब जाऊंगा उसके पास में तो मैं वेरीफाई तो करूंगा ना कि जिसका आपने लिखा है यह वही है या कोई और है। करूंगा। तो जिन पैरामीटर से मैं वेरीफाई करूंगा वही पैरामीटर उसके लक्षण है। किताब में ठीक है। किताब में किसी व्यक्ति की बात की गई है। किताब में उसी व्यक्ति की बात की जा रही है। वो जिन मा जिन पैरामीटर से चेक होगा। ठीक है? उदाहरण के लिए मैं आपको समझाता हूं। किताब में तो यह भी लिखा है कि ईश्वर है।
00:01:17:06 है ना? किताब में यह भी लिखा है कि ईश्वर सृष्टि करता है। नास्तिक को सिद्ध करने के लिए लक्षण बताते हैं ना? नास्तिक को सिद्ध करने के लिए तर्क देते हैं ना प्रमाण देते हैं। क्यों देते हैं? क्योंकि पॉइंट है उसी प्रकार से क्योंकि सामने वाला व्यक्ति ईश्वर को मान नहीं रहा है। तो जैसे ही सामने वाला व्यक्ति जब अवतार को नहीं मान रहा तो उसको बता समझने के लिए। ठीक है? इन ऑर्डर टू अंडरस्टैंड दोज़ थिंग्स। तो हमें क्या करना है? हमें बताना है कि लक्षण क्या है कि भैया मेरे सामने अगर अवतार खड़े हो कि ये वही है। जैसे कृष्ण जी के समय में भी उनका एक डुप्लीकेट आया था। कुछ पंड्रिक पुंड्रिक कुछ नाम था उसका बोल रहा हूं मैं। तो वो भी आया था। था वो भी वासुदेव पुत्र और बनके और वो मोर पंख लगा के चार हाथ ला के घूमता था। उसने भी अपने [गला साफ़ करने की आवाज़] नकली भाई बलराम सब तो उसमें भी पहचान को लेकर के उसमें उसके भी बहुत चेले क्योंकि बहुत लोग भ्रमित हुए थे। उसके भी बहुत भक्त बने थे। युद्ध हुआ था उसमें वो मारा गया था। शायद भागवत में आता नहीं था। तो बात वही है कि जो यहां शब्द में लिखा हुआ है शास्त्र में लिखा हुआ है तो वहां मैं वेरीफाई तो करूंगा ना तो मैं किन पैरामीटर से वेरीफाई करूंगा। वो जो लक्षण है वो है क्या? वो स्पष्ट कर। देखिए इसमें मैं बता दूं एक [गला साफ़ करने की आवाज़] कुछ पैराटर्स ऐसे हो सकते हैं कि भाई वो जैसे हमने मान लिया कि भाई तुम ये कर सकते हो पहाड़ उठा सकते हो या तुम यहां पे खड़े हो तुम दिल्ली में प्रकट हो सकते हो क्योंकि सर्वशक्तिमान है तो ऐसे हम लोग कह सकते हैं मगर अगर हम ये कहे
00:02:32:09 कि भाई तुम सर्वव्यापक हो ये सिद्ध करो हम तुम सर्वव्यापक हो ये सिद्ध करो हमें दिखाओ सर्व्यापक तो उसमें वो जो पैरामीटर है ना वो हमारे व्यवहार का विषय नहीं है पूरा का पूरा हम उसे जांच नहीं सकते इसलिए वहां पर हमें शब्द प्रमाण ही रुकना पड़ेगा। अपनी किसी को ईश्वर मानने का एक किसी को ईश्वर मान लेने का एक ही पैरामीटर है अगर लक्षण की बात करें कि वो सर्वशक्तिमान हो। मैं आपकी बात समझ गया। मैं हूं उत्तर इसका। अब देखो पॉइंट इसके अंदर क्या है? कि जहां तक आपने बोला कि कुछ चीजें जैसे पहाड़ उठा सकता है इत्यादि इत्यादि कुछ ऐसे पॉइंट है जिसको हम उसके लक्षणों में घटा सकते हैं। ठीक है? उदाहरण के रूप में कोई बद्ध जीव है। ठीक जीव तो व ही होता है। है ना? लेकिन कोई ऐसा जीव है जो बहुत कई जन्मों से तपस्या कर रहा है। तपश्चर्या कर रहा है और वो मुक्ति के कगार पे है। ठीक है? उसमें और जो एक डाकू चोर लुटेरा उनकी मनस्थिति में ठीक है कुछ तो अंतर होगा। कुछ तो गुणों में अंतर उनके व्यवहार में उनके ज्ञान में कुछ तो अंतर होगा। है ना? तो हमें तो जब हम किसी व्यक्ति से सिद्ध कोटि के व्यक्ति से बात करते हैं तो हमें एक अच्छा अनुभव होता है। हमें समझ में आता है कि यार ये व्यक्ति वो उसके लफंगे जैसा नहीं है। हमें समझ में आता है। ठीक है? तो उसी प्रकार से जैसे आपने
00:03:47:10 बोला कि अवतार के विषय में सारी चीजें तो नहीं जैसे सर्वव्यापकता को नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछ-कुछ चीजें लक्षण बताए जा सकते हैं। वो दो चार लक्षण जो भी आपको समझ में आए आप वो मुझे बता दो। ठीक है? एक पॉइंट। दूसरा पॉइंट आपने एक और लाइन बोला था कि आपको क्या समझ में आ रहा है? आप बता दो। मुझे क्या समझ में आ रहा है मैं बता देता हूं। मेरे दृष्टिकोण से मेरे दृष्टिकोण से मेरे सामने कोई मनुष्यधारी है। ठीक है? मेरे को मैं सोच ही नहीं पा रहा कोई ऐसा पॉइंट कि जिससे मैं डिफरेंशिएट कर दूं कि फलाना व्यक्ति इंसान नहीं है। ईश्वर है। मेरे दिमाग में कोई आ ही नहीं रहा पॉइंट। मेरे इसीलिए मैंने आपसे पूछा। हां तो मैंने वो लक्षण बता दिया। सर्वशक्तिमान अभी हम अंडरस्टैंडिंग की तरफ ही है। वी आर अभी हम अंडरस्टैंडिंग हम अवतार को समझ रहे हैं। अवतार की तरफ शरीर धारण मैंने वो लक्षण बता दिया सर्वशक्तिमान यानी वो कुछ भी कर सकता है तो ही माना जाएगा कि वो है ना यानी अगर मेरे सामने कोई ऐसा व्यक्ति है जो कुछ भी कर दे तो हम मान लूंगा कि वो ईश्वर है। अगर कुछ भी नहीं कर पा रहा कहीं अटक जा रहा है तो ठीक है। जो कुछ भी कर सकने की बात जिसकी शब्द प्रमाण से मानी जा रही हो। बात दिक्कत ये है कि कई चीजें करने के लिए वो मनुष्य उसका गवा साक्षी नहीं हो सकता। कई चीजें ऐसी है वो करने को कह दिया जाए तो मनुष्य उसका साक्षी नहीं हो
00:05:02:14 सकता। तो जब उसका साक्षी नहीं हो सकता तो इसीलिए फंस रहे हैं ना यही तो फंस रहे हैं। इसमें बात ये आती है कि अब हमें लक्षण जो है वो स्पष्ट हो चुके हैं कि यानी कहीं पर भी ईश्वर की अल्पता नहीं दिखनी चाहिए। कहीं पर भी उसके सर्वशक्तिवत्ता में बाधा नहीं आनी चाहिए। ठीक है? उसकी अपनी मर्यादा दिखनी चाहिए नहीं। दिखनी चाहिए नहीं। दिखनी चाहिए वो अलग बात है। होना नहीं चाहिए। होता है कि नहीं? हुआ दिखने को तो कुछ भी दिख सकता है। अच्छा कुछ भी दिख सकता है। तो वो चीज हुई या नहीं हुई कैसे पता चलेगा? शब्द प्रमाण। शब्द प्रमाण से नहीं। जैसे मैं ये अच्छा शब्द प्रमाण से जैसे राम जी ने जीवन में क्या-क्या किया वो तो हमें शब्द प्रमाण से पता चलेगा। ठीक है। मैं ये कह रहा हूं जैसे राम जी जैसे राम जी नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्ति थोड़ी सी हां बताइए थोड़ी सी बात बताइए बताइए। जैसे राम राम जी ने राम जी के जीवन में क्या-क्या घटा वो हमें उनके शब्द प्रमाण रामायण से पता है। ठीक है? तो पॉइंट इसके अंदर यह है कि अगर उसी में वहीं पे लिखा हुआ है कि राम जी को नहीं पता था कि सीता जी कहां है? राम जी असहाय हो गए इत्यादि इत्यादि बातें राम जी पहचान नहीं पाए कि सुग्रीव और बाली कौन इत्यादि इत्यादि बातें जो हमें सर्वजता में बाधा नजर आती है। तो क्या हम एट दैट केस पॉइंट ये है कि आप तो कह रहे हो कि ये वही राम जी और ईश्वर के अवतार हैं। लेकिन जो लक्षण बताए हैं वो मैच नहीं कर रहे हैं। उस केस में क्या होगा? हम उन्हें अवतार मानेंगे या नहीं मानेंगे? इसका थोड़ा सा स्पष्टीकरण दे
00:06:17:15 दीजिए। मैं यही कारण है ना जिस जिसके कारण रावण नहीं समझ पाया कि वो अवतार हैं। जिसके कारण कंस नहीं समझ पाया कि भगवान ही है। जिसके कारण उस समय के जो लोग थे उनकी ही समय धारा में वो तुरंत उनको देखते ही मुक्त नहीं हो पाए। क्योंकि उन्होंने उनको भगवान माना ही नहीं। भगवत गीता में भी भगवान ने कहा कि जो लोग मनुष्य देह में देख के मनुष्य देह में देख के मेरे ब्रह्म भाव को नहीं ध्यान नहीं जान पा रहे हैं वो मूर्ख लोग हैं। मगर जब उनके बारे में हमको दिव्य दृष्टि से बातें पता चली दिव्य दृष्टि के द्वारा फिर गुरु परंपरा के द्वारा हमको पता चली तो हमें पता चला कि हां ये अवतार हैं। ये अवतार ही थे जो भगवान के आए थे। और उस समय भी जो दिव्य दृष्टि रखते थे उनकी समय धारा में उन्होंने उनको अवतार माना। वो जानते हैं वहां पर ये जानते हैं कि ये सर्वज्ञ है। उनको सब वो शब्द प्रमाण से नहीं अपनी दिव्य दृष्टि से जानते हैं। ये शब्द प्रमाण से ही हमें पता चलता है कि वो है तो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त मगर वो ये जो है रोल कर रहे हैं लीला कर रहे हैं। वो उनहीं शब्द प्रमाण बात को क्लियर करते हैं। उसको क्लियर करते हैं। यानी कि वो मुक्त होते हुए भी ऐसा दिखाते हैं कि मैं मुक्त नहीं हूं। जिससे कि आप उनके साथ ज्यादा कनेक्ट हो पाऊं। हम इसमें एक पॉइंट है। इसमें छोटा सा पॉइंट
00:07:32:19 यह है कि इसमें अगर लक्षण वाली बात कट गई ना कैसे कट गई मैं समझा देता हूं थोड़ा सा। जैसे समझिए जैसे आपने बोला कि अवतार का लक्षण है कि वो सर्वज्य है। सर्वशक्तिमान है। लेकिन जब हम अवतार की जीवनी देख रहे हैं। उसकी जीवनी में हमें सर्वजता नजर नहीं आती। सर्वशक्तिमत्ता नजर नहीं आती। ठीक है? यानी उसका लक्षण घट नहीं रहा है। नजर आती है। नजर आती है। पूरा बोल देता हूं। पूरा बोल। पूरा बोल देता हूं। पूरा बोलता हूं। अब उसमें पॉइंट ये आ जाता है कि जब हम जिस पॉइंट पे पकड़ लेते हैं कि नहीं यहां पे तो देखिए यहां पे तो सर्वजिता नजर नहीं आई। यहां पे तो अल्पज्जता आई तो उस केस में आप कहते हो कि नहीं यहां पर ये जानबूझ के अपनी अल्पज्जता प्रकट कर रहे हैं। यानी ठीक है उस उस [गला साफ़ करने की आवाज़] केस में तो यानी उसी केस में कह रहा हूं कि उस एक पॉइंट पे उनका जो लक्षण है जिससे वो वो उनका अवतार होना सिद्ध हो रहा है। ठीक है? क्योंकि फिलहाल हम जो मैंने ये किया है ना वो हम इस पे नहीं कह रहे। हम शब्द प्रमाण पे बात नहीं कर रहे हैं कि रामायण में या रामचरितमानस में लिखा है राम जी अवतार है। अभी हम उसको मान नहीं रहे हैं। शब्द प्रमाण पे नहीं है हम। ठीक है? अभी वो साध्य कोटि का बात है। सिद्ध कोटि की बात नहीं है। पॉइंट इसके अंदर ये है कि अगर वहां पे एक पॉइंट में उनकी जीवनी में कहीं ना कहीं पे ये आ गया कि फलाना चीज के बारे में ना नॉलेज उन्हें नहीं पता था कि सुग्रीव और बाली में से कौन है? इन दोनों में से दो आपस में लड़ रहे हैं। इनमें से बाली कौन है? उनको नहीं पता। तो वहां
00:08:47:22 पे जो उनको उनकी जो अल्पजिता वहां पे प्रकट हो रही है। ठीक है? उस केस में आप कह रहे हो कि नहीं ये जानबूझ के वहां पर अल्पता प्रकट कर रहे हैं। यानी अगर आप जानबूझ के भी बोलो ठीक है उस केस में ये होगा कि वहां पे उस केस में ये हो रहा है कि उनका लक्षण तो प्रकट हो नहीं रहा अवतार का तो वहां पे तो वो अवतार नहीं है ये सिद्ध हो रहा है ना लक्षणों से शब्द प्रमाण से नहीं शब्द प्रमाण में तो चलो लिखा है वो हम मान नहीं रहे नहीं मान रहे अलग विषय है उसप मैं नहीं जा रहा हूं लेकिन जब हम लक्षणों की बात लक्षणों से ये सिद्ध हो रहा है कि वो नहीं है ये है मेरा पॉइंट इसको थोड़ा सा इबोरेट कर दीजिए जरा जैसे कि जैसे कि अगर ईश्वर सर्वव्यापक है तो सब जगह ईश्वर है और दुनिया में सारी दुनिया सारे स्वर ईश्वर के ही है। ईश्वर कहीं से भी कहीं किसी से अलग नहीं है। तो ऐसे में हमने केवल एक प्रणव को ही उसका दतक क्यों माना? प्रणव को ही उसका वो क्यों माना? प्रतीकात्मक तो इसका निर्णय आएगा गूंगा भी बोल सकता है। उस वो तो एक अलग चीज हो गई। मगर यह कोई सिद्धांत थोड़ी नासी
00:09:53:27 अगर कोई अगर कोई अगर कोई अगर कोई और ऐसा शब्द हुआ जो बोल सकता हो तो बोल सकते हैं अथो इति शब्द भी तो ईश्वर का है अथ भी तो इसी का है ईश्वर का ही है ना वेदों में आया क्यों नहीं उपनिषद में अगर और अगर और अगर और कोई शब्द होगा जो गूंगा भी बोल सकता होगा तो उसको भी ईश्वर ईश्वर का वो मान लोगे क्या उसको प्रणव की जगह अरे शंकर भाष में मानो क्या क्या बात कर रहे हो आप? मैं वो नहीं कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं अगर केवल इस तर्क से हम मानेंगे कि भैया वो गूंगा भी बोल सकता है। इसलिए वो ईश्वर का देवता है। उससे ईश्वर को वो वो लीजिए तो फिर हमें वहां पर ये जो भी शब्द गूंगा बोल सकता होगा जो भी ध्वनियां वो कर सकता होगा उसको भी अपनी पूजा में लेना पड़ेगा। मगर वहां पर शब्द प्रमाण वहां पर हमारा शब्द प्रमाण। मैं बात पूरी कर जोगी शब्द की बात नहीं है। आपने ये बोला कि ओम को इतनाेंस क्यों दिया? तो वो बात जोगी शब्द की बात नहीं है। आपने प्रणव के पक्ष में एक तर्क दिया है क्योंकि उसको गूंगा भी बोल सकता है। तो मैंने उसको बताया कि गूंगा और भी धनिया निकाल सकता है। फिर प्रणव ही क्यों तो उसके बारे में यही है कि उसमें शब्द प्रमाण है। तो फिर रामपाल के बगल में श्री राम जी खड़े हैं। इसमें से कौन सा ईश्वर का अवतार है? कौन सा नहीं है? तो इसके लिए शब्द प्रमाणित
00:11:12:12 आप भी कर दोगे वेद मंत्र चार ऋषियों के उसमें आए थे तो वो जो है भगवान नहीं दिए। कैसे प्रमाणित करें? उस दिन लक्षण आप पूछ रहे थे मुझसे। वहां लक्षण क्या था? वहां लक्षण क्या था? कि ईश्वर ने वो दिया मंत्र। क्या लक्षण था वहां? ईश्वर का लक्षण क्या था वहां? पहचानने के लिए। ईश्वर का लक्षण था कि जो वेद का ज्ञान दे तो कोई सा भी ज्ञान दे रखा। बिना ज्ञान दिए गुरु के ज्ञान दिए हो नहीं सकता। तो बस वही लक्षण हमारे जो अवतार हैं वो दे रहे हैं। क्या दे रहे हैं? वेद का ज्ञान, वैदिक ज्ञान, धर्म का ज्ञान, ब्रह्म का ज्ञान दे तो रहे है? ये अवतार दे रहे हैं। अरे आपने ही तो कहा कि भैया उसका लक्षण है कि वेद का ज्ञान देता है। हां। हां तो वेद का ज्ञान दिया भगवान ने। नहीं भगवान अवतार ने क्या दिया? वेद का ज्ञान? अवतार ने वेद का ज्ञान दिया। और क्या? कौन से अवतार ने दिया? श्री कृष्ण ने गीता में दिया। गीता में वेद दिए उन्होंने कौन से वेद मंत्र दिए? अरे वेद मंत्र बिल्कुल उसी फॉर्म में नहीं ज्ञान की बात हो रही है। ज्ञान दिया कि नहीं दिया? तो मैं जो बोल रहा हूं फिर अगर अगर आप मंत्र की बात कर रहे हो अगर आप मैंने कहा मैंने कहा वेद का ज्ञान मैंने तो वेद नहीं बोला। अगर आप कह रहे हो वेद का ज्ञान सुनो तो वेद ज्ञान है क्या? तो इसका मतलब आपके पास पहले से ये होना चाहिए कि वेद का ज्ञान यह है जो वेद का ज्ञान देगा वो ईश्वर है। नहीं मैं आपसे
00:12:27:15 पूछ रहा हूं कि फिर वेद ज्ञान है क्या? मैं बता रहा हूं। आपने ऋषियों के ये कहा कि ऋषियों ने उनको वेद के ज्ञान से पहचाना। यही कहा ना आपने? मैंने देखिए मैंने ये बोला कि जैसे मान लीजिए कि आधी सृष्टि में लोग हैं। ठीक है? अभी हम अभी हम फिलहाल ये ऑब्जर्व कर रहे हैं कि बिना सिखाए कोई सीखता नहीं है। ठीक है? मां-बाप बच्चे को बोलना नहीं सीख। मैं वो नहीं बात पलट जाएगी। मैं ये कह रहा हूं ऋषियों ने उनको वेद के ज्ञान से पहचाना ना कि जो वेद का ज्ञान दे रहा है वो ईश्वर है। वेद का ज्ञान हटा दिए। वेद मतलब ये होता है जो ईश्वर द्वारा उसी को हमने वेद बोला है। ठीक है? तो वो वो ईश्वर की पहचान कैसे की थी आपने? जिसने ज्ञान दिया वो ईश्वर है। तो बस ऐसे ही आपका एक विश्वास है वहां पर। अनुभव आपके अनुभव अनुमान प्रमाण है केवल विश्वास थोड़ी है। वहाँ पे वहां पर अनुमान नहीं है। वहां पे शब्द प्रमाण है। सुनो तो सुनो सुनो सुनो। वहां पर अनुमान नहीं है। वहां शब्द प्रमाण है। इसमें हमने ये निश्चित नहीं किया है। ये सिद्ध नहीं हुआ है कि वो जो ज्ञान मिला है वो मोक्ष का ही है जबकि वहां पर वो मोक्ष का कहा जा रहा है। कल्याण का हेतु कहा जा रहा है। जैसे कि हमें उससे मोक्ष प्राप्त होगा ये सिद्ध कैसे हुआ? उसका लक्षण क्या है ज्ञान का? प्रयोग से। क्या प्रयोग है बताओ? अगर कोई उसको टेस्ट करना चाहता है कि नहीं जिस ज्ञान से मोक्ष होगा नहीं होगा उसको टेस्ट कर ले। प्रत्यक्ष कर ले उसका। तो तुमने किया है। नहीं मैंने तो
00:13:42:16 नहीं किया। तो इसका मतलब लक्षण सिद्ध नहीं हो रहा। नहीं लक्षण बात यह नहीं लक्षण सिद्ध नहीं हो रहा। बात लक्षण को चेक नहीं। ऐसे तो ऐसे तो मैं भी कह सकता हूं ना कि राम जी को देख के मोक्ष प्राप्त हो जाएगा। टेस्ट कर ले। जैसे आपने कहा आपको लक्षण नहीं दिख रहे। तो ऐसा भी हो सकता है कि आप अंधे हो। अगर हम कहे कि ईश्वर चिल्ला के दिखाया। ऐसा भी हो सकता है कि हम बह रहे हो। तो हमें वहां पर शब्द प्रमाण से यह पता चल रहा है ना कि वो रोल कर रहे थे। अगर हमको विश्वास नहीं शब्द प्रमाण में तो बात अलग है। मगर जब हमको शब्द प्रमाण से पता चल रहा है कि वो वहां पर रोल कर रहे थे। वास्तविकता में सर्वज्ञ ही थे। वो वहां पर दुखी होने का रोल कर रहे थे। वास्तविकता में वो आनंदित ही थे। वास्तविकता में वो सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म का व्यवहारिक रूप ही थे। तो हम हम उस पर विश्वास कर लेते हैं। आप मत करो। आप ये मत मानो कि ये वाला ही अवतार है। ये वाला नहीं है। आप ये कहना तो शुरू करो कि अवतार ले सकता है ईश्वर। कुल मिलाकर के मैं एक एंडिंग स्टेटमेंट इस बारे में दे दूं कि भाई कौन कौन अवतार है कौन नहीं इस विषय में शब्द ही प्रमाण हो सकता है क्योंकि हम उसको काउंटर नहीं कर सकते क्योंकि कई विषयों में हम शब्द को ही प्रमाण मान रहे हैं उनके होने के विषय में भी हम इतिहास को ले रहे हैं वो इतिहास भी एक शब्द प्रमाण है उनका होना एक्सिस्टेंस उनका
00:14:57:20 अस्तित्व वो भी शब्द प्रमाण से ले रहे हैं तो फिर हम वहां जाके काउंटर नहीं कर सकते जिन शब्द प्रमाणों से हमको ये मिल रहा है कि वो थे उनहीं शब्द प्रमाणों से जब हमें ये मिल रहा है कि वो एक्टिंग कर रहे थे तो हम कह नहीं वो एक्टिंग नहीं कर रहे थे वो तो उनका वहां पर ये हो रहा था हम आपकी बात हमें दो बातों की क्लेरिटी मिल चुकी है। पहला ठीक है। फ्लोकी जी आप भी है तो थोड़ा ध्यान दीजिएगा इन विषयों पर। है ना? तो पहली बात तो हमारी इस विषय पे आया था कि अवतार की धारणा क्या है? तो हमें जो क्लेरिटी वहां से मिली थी वो ये मिली थी कि जैसे जीव शरीर धारण करता है वैसे ईश्वर भी शहीद धारण करता है। लेकिन अंतर ये होता है कि जीव जो होता है वो बद्ध होता है और जो ईश्वर जो जिस शरीर को धारण करता है जिसे हम अवतार कहते हैं वो मुक्त होता है। ठीक है? स्वभाव से वो मुक्त होता है। ये एक पॉइंट आया था। तो हमें पता चला कि अवतारवाद की धारणा क्या अच्छा इसका स्पष्टीकरण हो गया। उसके बाद पॉइंट ये था कि अवतार का लक्षण क्या है कि अगर मेरे सामने राम जी या रामपाल खड़े हो जाए तो दोनों में से ईश्वर का अवतार कौन है? कैसे पता चलेगा? तो उसमें पॉइंट ये था कि उसमें सामान्य लोग नहीं जान सकते कि ये ईश्वर के अवतार हैं। उसमें जो विशेष दिव्य दृष्टि रखने वाले गुरुजन हैं सिद्ध लोग हैं वही पहचान सकते हैं कि ये ईश्वर हैं। क्योंकि व्यवहारिक जो लक्षण है वो उसमें उस टाइप से नहीं होते। है ना? पता नहीं चलते। तो जो जो उस टाइप का ज्ञानी जो उस टाइप का व्यक्ति है सिद्ध व्यक्ति वो पहचान करके फिर वो अपने शिष्यों को बताएगा तब शिष्य जान पाएंगे कि हां ये जो है ये राजा जो
00:16:12:21 है ये अवतार है वास्तव में है ना इत्यादि बातें निकल कर के आती है [संगीत]
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चार ऋषियों को वेद का उपदेश करने वाले ईश्वर का लक्षण क्या था?
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