⬜ Not used yet · 00:00:01:28 – 00:16:38:28 (16:37)
00:00:01:28 [घंटी की आवाज़] जी जी है ना सवालों का हल मुझे गुरुदेव से मिला जी सता ये सता वाली बात जो है ना ये मुझे गुरुदेव से मिली थी जी मुझे इस्लाम से लड़ते टाइम हमेशा मन में आता था कुछ तो है जो मेरे को आ नहीं रहा है जुबान पे ऐसा होता है अच्छा भैया आप जैसे ये भी मानते हैं कि जैसे मतलब कि जैसे ईश्वर जो है वो अपने स्वरूप के विरुद्ध कार्य कर सकता है या नहीं कर सकता जैसे इस वाले पे आप मानते हैं कुछ मतलब स्वरूप भूत लक्षण जैसे ही जो व्यवहारिक वाला निराकार ईश्वर है ना जैसे करपात्री जी की वो पुस्तक में लिखा था कि जैसे अगर ईश्वर का स्वरूप है कि स्वरूप के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता समझो इस बात को हम तब तक संसार की रचना ईश्वर के द्वारा अभी तक मेरी जानकारी में जो है वो तब तक हम नहीं कर पाएंगे जब तक हम माया का आलंबन नहीं लेंगे। पहली बात माया का आलंबन के बिना हम लोग संसार की रचना नहीं कर पाएंगे ईश्वर के द्वारा। जी जी तो माया का जब आलंबन ले लेंगे तो उस माया के अंदर आकर के ईश्वर जब माया ही है तो वो हमको कुछ भी फील करा सकता है। जी जी है ना जी जब उसने एक से दो ही फील करा दिया या त्रेतवाद से ले ले तो त्रेत से चार फील करा दिया तो वो कुछ भी फील करा सकता है उस माया के अंदर वो त्रतवाद वाला थोड़ा सा मतलब उसमें
00:01:17:06 वो गड़बड़ी था जैसे वो त्रतवाद [गला साफ़ करने की आवाज़] वो तीन कारण मानते हैं जैसे दुनिया में तो जैसे 10 गाड़ी है 10 मनुष्य है तो वो कार्य है वो तीन कारण मानते वो ऐसा अच्छा अच्छा अच्छा चलो ठीक है मगर ये जो जो परम तत्व है जो हमारा वाला अद्वैत का मान लो अगर इसको मान लेंगे हम जी तो क्या कहते हैं कि एक मतलब माया से जो है तो माया के अंदर आके हमें वो कुछ भी फील करा सकता है तो स्वरूप के विरुद्ध उसका स्वरूप तो वास्तविक वो है ना क्या कहते हैं नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त वो है जी जी तो वो करपात्री जी मतलब उसमें मुझे वही वहीं से डाउट हुई जैसे करपा क्योंकि ईश्वर नित्य है इसलिए खुद का विनाश नहीं कर सकता तो समझ तो ये अल्टीमेट रियलिटी है ना खुद का विनाश नहीं कर मगर जैसे जैसे जैसे हम कहें कि ईश्वर किसी की किसी की माता रियलिटी में किसी को मां बना सकता है किसी की रियलिटी में नहीं बना सकता मगर यहां तो बन रही है ना मां किसी की तो व्यवहारिक जगत में हम कहते हैं कि वो सब कुछ कर रहा है और इनका इस्लामियों का ईश्वर यहीं पे खंडित है यही नहीं कर रहा वो सब कुछ उसमें भी थोड़ा सा और आपसे थोड़ा सा समझना चाहूंगा बस हां हां जी जी उसमें भी जैसे जो वो पुस्तक मैंने
00:02:32:12 पढ़ा था ना तो उसमें नास्तिक बाद में शुरू शुरू में क्या करते हैं मतलब करपात्री जो है वो नास्तिक के सामने ईश्वर का सृष्टि बनाना सिद्ध करते हैं कि जैसे जो ईश्वर जैसे मटके वाला उदाहरण देते हैं हां कि जैसे अगर कोई घड़ा बना रहा है तो कुम्हार होगा तभी बन पाएगा मतलब बिना कर्ता के कार्य नहीं हो सकता तो वो तो और जितना मैंने अद्वैत के वही जो कंटेंजेंट वाली चीजें इन्होंने पकड़ी है जी जी जावेद अख्तर वाले उसमें तो उसमें मैंने उसमें यही था कि मैंने जो उपनिषद वगैरह पढ़े थे उसमें ये था कि क्या बोलते स्लिप हो गया पॉइंट दिमाग से कि अब जैसे हां जैसे अब ईश्वर जो है वो जो परमार्थिक ब्रह्म है और जो व्यवहारिक वाला ईश्वर है निराकार जो सर्व्यापक उसमें कि जो परमार्थिक ब्रह्म है उस वो केवल सच्चिदानंद है और और अगर उसके और वो उपाधि रहित है हम [गला साफ़ करने की आवाज़] और अगर उसके साथ कोई उपाधि जुड़ जा रही है जैसे सर्वज्य या सर्वशक्तिमान या कुछ भी कुछ भी है ना पवित्र इत्यादि अगर हम कुछ भी जोड़ रहे हैं उसके सामने तो व्यवहार के अनुसार है वो हां तो तो वो व्यवहारिक हो जाएगा अल्टीमेटली तो तो जैसे जब करपात्री जी जब ये जब ईश्वर की बात कर रहे थे कि वो नित्य है अनादि अनंत है और सृष्टि करता है पालन करता है विनाश करता है तो जब वो इस वाले ईश्वर की की के लिए कह रहे हैं
00:03:47:13 कि वो खुद का विनाश नहीं कर सकता तो ऐसा मतलब प्रतीत होता है कि वो सगुण निराकार की बात कर रहे हैं। हां बिल्कुल है ना बिल्कुल सगुण निराकार की ही बात कर रहे हैं और क्या जी जी अब उसमें ये आ जाता है कि अगर सगुण निराकार का जो स्वरूप है जिसको हम लोग भी मानते हैं तो उसमें ये आ जाता है कि सगुण निराकार अगर जैसे मान लीजिए कि अगर मैं कहता हूं जैसे सगुण निराकार ईश्वर है वो न्यायकारी है उनका जो स्वरूप है वो न्यायकारी है यानी मुझे पता चला कि वो अन्याय नहीं कर सकते अगर वो अन्यायकार कर रहे हैं तो उनका वो न्याय वाला स्वरूप है वो खंडित हो रहा है हम उसी प्रकार जैसे करपात्री जी ने उसमें उदाहरण दिया कि ये क्या कहते हैं जन्मांतर जी हां जन्मांतर से वो वैश्या को बना देंगे तो उसमें उसमें उन्होंने बहुत वो मुझे बहुत अच्छा एग्जांपल लगा क्योंकि उसमें ये पॉइंट आता है कि क्यों करपादरी जी ने मैं वही समझ रहा था कि कृपा ने ऐसा लिखा क्यों तो मैं पर्सपेक्टिव से समझ रहा था द्वैत के तो मुझे ये समझ में आया कि जैसे वहां पे ये आता है कि बाकी मैंने आचार्य जी से भी पूछा था वो जो श्रृंगेरी वाले थे मतलब वो मेरे आचार्य जी से मैंने पूछवाया था उनसे तो मुझे वो ये समझ में आया कि क्या कहते हैं कि कि जैसे अगर ईश्वर उसी जन्म में वो जो कुमारी है ऐसा नहीं कि ईश्वर वो जो वैश्य है उसके ठीक ही नहीं कर सकता वो बिल्कुल कर सकता है। उसके पास सामर्थ्य है, शक्ति है। लेकिन बात ये आ जाएगी कि अगर वो ऐसा करेगा तो वो फिर वो बात आएगी कि उसने ऐसा किया क्यों? अगर है ना अगर अगर हम
00:05:02:16 ये कहें कि नहीं कर्म फल था उसका ऐसा करने का तो फिर वो बात [गला साफ़ करने की आवाज़] आ जाएगी कि ईश्वर तो अपना जो कर्म का फल है वो क्या बोलते हैं? जाति आयु भोग के रूप में देता है तो फिर ये बीच में कैसे दिया? तो यानी एक वो प्रश्न चिन्ह आ जाएगा कि न्यायकारी वाला कर्म फल वाला कि अगर कर्म का फल इसी प्रकार से नहीं देना था तो न्यायकारी वाला पॉइंट आ जाएगा। इसीलिए जी ने वहां पे बोला कि नहीं उस जन्म में तो नहीं लेकिन जन्मांतर में दे देगा। हां हां मगर मगर इसमें पॉइंट ये है ना कि ये जो जन्मांतर देख पा रहा है ये कौन व्यक्ति है जो आस्थावान है जी जी जो ये मानता है कि ईश्वर है वही तो जन्मांतर मानेगा। भैया इसमें ये पॉइंट आ जाता है थोड़ा सा कि जैसे इसमें बात आ जाती है कि अगर हम किसी विषय पे चर्चा कर रहे हैं जैसे अवतार हो गया या इस टाइप के जो प्रश्न हो गए उस पे भी हम चर्चा कर रहे हैं तो उसमें ये होता है कि एक तो प्रत्यक्ष रूप से जान पाना है ना बिल्कुल वो हम नहीं कर रहे हैं तीन तरीके से चीज या तो हम अनुमान से जान रहे हैं तो प्रत्यक्ष जान रहे हैं तो शब्द प्रमाण से जान रहे हैं है ना उसमें आता है कि अब जैसे ईश्वर अवतार ले रहा है मैं इसको भी प्रत्यक्ष नहीं जान रहा हूं तो उस केस में फिर भी हम कहते हैं कि वो ले सकता है अनुमान से अनुमान उसी प्रकार से यहां पे जो करपात्री जी कह रहे हैं कि वो जन्मांतर में अवश्य लिख सकते हैं क्योंकि कहा तो है उन्होंने ये पॉइंट था कि बिल्कुल उन्होंने स्टेटमेंट दी है अर्थात वो क्या आधार पे रहे हैं कि अनुमान से बिल्कुल ये सिद्ध
00:06:17:20 है कि वो जन्मांतर में कर सकता है अनुमान प्रमाण से ये पॉइंट नहीं ये मैं नहीं अब वो बिल्कुल सही बात है मगर जहां मतलब मैं दूसरी बात कर रहा हूं जो व्यक्ति भौतिकवादी है जी जी उसके लिए तो जन्मांतर है ही नहीं नास्तिक के लिए हां नास्तिक के लिए जो व्यक्ति भौतिकवादी है उसके लिए जन्मांतर नहीं है। ठीक है? उसको तो पहले ईश्वर सिद्ध करना पड़ेगा। हां या बिल्कुल सही बात पकड़ी तुमने। तो ईश्वर सिद्ध करना पड़ेगा। तो जैसे उसने कहा कि क्या वो कुमारी को जी वो बना सकता है? हां। वैश्या को कुमारी बना सकता है। तो अब वैश्या का वैश्या कुमारी हो गई तो इसमें उसकी कोई शरीर की ऐसी चीज होगी जो भाई क्षति हो जाती हो जो बिल्कुल फ्रेश मिलना चाहिए हो। है ना? जी जी। तो अब अगर ईश्वर तो बना रहा है जन्मांतर से। ईश्वर ने वो बॉडी खत्म कर दी। ठीक। जी जी। और एक नई बॉडी दी उसने ईश्वर ने। ईश्वर तो बना रहा है जन्मांतर से। रियलिटी क्या है कि उसने जन्मांतर से बनाया। जी। मगर जो भौतिकवादी है जिसको जिसको जिसने अभी तक विश्वास ही नहीं किया ईश्वर पे वो अपने किन पैमानों से उसको चेक करेगा कि कुमारी हो गई कि नहीं। भाई जो शारीरिक पैराटर्स होंगे, बायोलॉजिकल टेस्ट होंगे और फिंगरप्रिंट इत्यादि होंगे। इनसे ही तो वो टेस्ट करेगा कि वही है कि नहीं। मतलब लेकिन मतलब टेस्ट क्यों करेगा भैया? मतलब
00:07:32:21 वो समझ नहीं आ जिसको जिसको जो यह दावा कर रहा है कि भाई इस लड़की को आप जो है वो बना दो। अब एक कमरे में ले गए वहां से दूसरा शरीर वापस आया। उस शरीर को नष्ट कर दिया गया। इसमें छोटा सा पॉइंट था छोटा सा अगर उसमें उसमें ये आ जाता है कि जैसे अगर हम किसी नास्तिक से बात कर रहे हैं तो सबसे पहले तो ये आ जाएगा कि क्या वो इस बात को मान रहा है कि ईश्वर कुछ भी कर सकता है या नहीं कर सकता? तो ये भी मानने से पहले क्या वो ये मान रहा है कि ईश्वर जैसा कुछ होता भी है कि नहीं होता? तो पहले हम उसको ईश्वर बनवा देंगे। अगर उसने अगर वह मान चुका है कि हां ईश्वर होता है तो बात ख़ हो गई। अगर ईश्वर मान चुका है तो बात ख़ हो गई। और उसमें यह कि करपात्री जी ने जो वहां पे नास्तिक को जो है मगर मगर जो अल्टीमेट जो अगर होगा इंटेलेक्चुअल तो वो यहां तक भी पहुंचेगा बस ये है। जैसे एक बार एक बार एक वो आया था मतलब शायद दयानंद जी में आस्था रखता होगा। एक लड़का आया था। जी जी उसने बोला करके पता नहीं कुछ गलत बात बोली कि वो यह कर सकता है कि नहीं तो मैंने मैंने बोला जी जी वो कुछ परमार्थ पे ही प्रश्न किया उसने सीधे क्या वो परमार्थ में मर सकता है जी जी तो मैंने उससे एक प्रश्न किया तुम परमार्थ पहुंचे कैसे थे अब मुझे ये बताओ परमार्थ होता क्या है बस ये बता दो होता क्या
00:08:47:22 है तो होने परमार्थ की बात करने के लिए उसको आस्तिक बनना पड़ेगा ना पहले आस्तिक बन गया हमारा काम खत्म बिल्कुल पर आस्तिक तुम बने कैसे? आस्तिक बनोगे सर्वशक्तिमान ईश्वर से ही। जी है ना? जब ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर लोगे तभी आस्तिक बन पाओगे तो तब तक तुम परमार्थ को प्रश्न नहीं कर सकते। वही चीज है जो जन्मांतर भेद से उन्होंने बॉडी दी है दूसरी तो पर ये सब दूसरे ट्रुथ हैं। ये हमारा जो व्यवहारिक ट्रुथ है वो तो यही है कि भाई हम जिसको जानते थे उसका नाम ये था। उसके यहां पे तिल था। उसकी ये फिंगरप्रिंट थी। वो सारी मैच हो रही है और अब इसके शरीर में वो क्षति नहीं है जो वैश्या के कारण क्षति पहुंच गई थी। जी जी तो भगवान ने तो जन्मांतर वेद से बनाया। हां मगर जब तक व्यक्ति भगवान को मानता नहीं है तब तक उसको ये मानना पड़ेगा कि भगवान जो जिसकी बात हो रही है ना सत्ता की जी तो उसने जो है उसके शरीर को बदल दिया। तो भैया लेकिन उसमें उस वाली पुस्तक में जो मतलब करदात्री जी ने जो नास्तिक को मनवाया है वो वो मतलब कर्ता भाव से मनवाया कि जो ईश्वर है वो जगत का कर्ता है बिना कर्ता के कार्य नहीं हो सकता उस उस भाव से उन्होंने नास्तिक को पहले मनवाया है कि भाई तुम्हें हर हाल में मानना पड़ेगा अच्छा फिर उन्होंने ये किया कि अगर अगर तुम ये बात मान गए तो फिर बात आ जाती है कि फिर अगर तुमने ये स्वीकार कर लिया कि अगर ईश्वर
00:10:02:24 ने सृष्टि बनाई है तो फिर अगर फिर आती है कि अगर कुम्हार ने घड़ा बनाया है बना दिया ठीक है मान लिया तो अगर वो बनाया है तो इससे पता चले कि कुमार में घड़ा बनाने का ज्ञान है। घड़ा बनाने का सामर्थ है। घड़ा बनाने के लिए बल है। इत्यादि बातों को ऑटोमेटिक क्योंकि इसके बिना बन नहीं सकता। उसी प्रकार से अगर ईश्वर को हमने मान लिया कि वो सृष्टि करता है तो हमने मान लिया कि उसमें बल है, उसमें ज्ञान है, उसमें इच्छा है। आदि आदि बातों को हमने स्वीकार कर लिया। तो इससे क्या होता है कि हमें इस ईश्वर के बारे में मतलब कई सारे लक्षण वक्षण मिल जाते हैं। हमें बहुत सारी बातें पता चल जाती है। सिद्धि तो मिल जाती है। जी। परंतु हम इस चीज से उसका कनेक्शन नहीं सिद्ध कर पाते व्यक्ति का जी कि आपको उस ईश्वर की आवश्यकता क्या है वो है उसने सब बनाया है वो तो मुक्ति के लिए तो उसमें ऐसा क्या आ रहा है सिद्धि से कि जो मुक्ति हो जाए उससे नहीं वो वो वाला पॉइंट आपको बहुत बढ़िया है जो आप वो इच्छा वाला बताते हो ना हां हां वो वो सच्चिदानंद वाला वो बहुत बढ़िया पॉइंट चाह का विषय तो तभी बनेगा जब वो जब वो वैसी चाहत का विषय हो और चाहत का विषय यही है कि हम अबाध्य बन जाना चाहते हैं। तो फिर मैंने थोड़ा सा विचार किया था। उसमें मैंने थोड़ा सा विचार किया तो मुझे समझ में आया कि जैसे मैंने मतलब इस चीज को समझने के लिए विचार किया था खंडन के लिए नहीं। मैंने विचार ये किया तो मुझे समझ में आया कि मेरी जो इच्छा है वो
00:11:18:04 ये नहीं कि बिजली कंट्रोल हो या बारिश रुक जाए। मेरी इच्छा ये है कि जो बारिश होने के कारण जो मुझे दुख हुआ है वो ना हो। तो वो ना हो। ये कैसे पॉसिबल है? तो इसका ईश्वर ने बताया बहुत सिंपल सशन कि शरीर छोड़ दो नहीं होगा। हम हम तो फिर फिर मैं प्रश्न करता हूं कि नहीं मुझे इस शरीर के साथ जो सुख मिल रहे हैं वो तो चाहिए लेकिन जो दुख मिल रहे हैं वो नहीं चाहिए तो ईश्वर बोलता है कि बहुत सिंपल है एक काम करो मुक्ति में आ जाओ मतलब मैं अपने लेम लैंग्वेज में बता रहा हूं खाली उस चीज को बस समझिए कि एक काम करो भाई शरीर छोड़ो मुक्ति में आओ मुक्त अवस्था में आओ तो उससे क्या होगा कि अब शरीर तो नहीं रहेगा उससे होने वाले दुख तो नहीं रहेंगे लेकिन वो जो तुम्हारी जो स्थिति रहेगी वो क्योंकि तुम उस तुमने जो योग तपस्या इत्यादि की उससे तुम्हारी जो लेवल है वो उतना ऊपर उठ चुकी है अब तुम्हें सुख है और जो सुख है वो मैं दूंगा जैसे है ना तो इस टाइप का तो मगर मगर तुम जो ये कह रहे हो ना कि दुख मतलब दुख से मुक्ति जी दुख से मुक्ति में ही छिपा हुआ है अबाध्यता मतलब दुख क्या है प्राकृतिक बाधाओं से बाधित जी जी दुख कब मिलता है हमें जैसे मैं यहां हूं वहां नहीं हो सकता ये दुख है तो दुख दुख से दुख से मुक्ति में ही निहित है प्राकृतिक बाधाओं से बाधित ना होना क्योंकि प्रकृति से हमें दुख मिलता है हां तो उसमें क्योंकि इसमें जब हमारा शरीर नहीं रहेगा क्योंकि वो आता है ना मतलब
00:12:33:15 आता है ये सांख्य में कि जैसे जब तक शरीर है तब तक जैसे त्रिविधता आपने देखा होगा जैसे तीन बार है ना तीन बार शांति शांति बोलते हैं तो त्रिता आध्यात्मिक दुख आदि भौतिक दुख और तीसरा वाला आता है तो तीन प्रकार के तो उसमें एक जो भौतिक वाला होता है वो यही होता है कि मतलब जैसे शरीर के शरीरांतर से जो प्राप्त हो रहा है एक होता है आत्मा के अंतर से शरीर के अंतर से और एक तीसरा एक और होता है जो मैं बोलूं तो जो प्राकृतिक दुख है जो मिल रहे हैं वो तो यही है कि मतलब क्या कहते हैं शरीर है इसीलिए दैविक वाला कि शरीर है इसीलिए मिल रहा है शरीर नहीं रहेगा हां तो उसकी प्राथमिक डिमांड तो यही हुई ना कि शरीर ना रहे मेरा प्राथमिक डिमांड जो है उसकी यह समझने की रही कि कोई ऐसा हो जो प्राकृतिक प्रकृति पर जिसका कब्जा हो प्राकृतिक नियमों के उसमें हो वो तो वो तो मोक्ष की स्थिति हो गई ना जब शरीर नहीं है मेरा तो बिल्कुल मैं बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल सही पॉइंट भैया मैं ये चीज कह रहा हूं कि जो आप एग्जांपल दे रहे थे ना जो जो आप वो तर्क दे रहे हो ना वो सीधी वाला वो रियल में क्या है कि वो रियल में मुक्ति की बताता है कि मुक्ति की आवश्यकता है। मुक्ति को सिद्ध करता है। मोक्ष को सिद्ध करता है। तो जब हम जब हम ये मोक्ष को सिद्ध करने वाला तर्क देते हैं तो अल्टीमेटली हम उसी दिशा में पहुंचते हैं। जो जो वहां पे बैठा हुआ ईश्वर है सच्चिदानंद जी बिल्कुल उसी के पास
00:13:48:19 पहुंचते हैं। अब उसमें होता ये है इसमें छोटा सा ये आ जाता है कि अब अब जैसे अगर मैं ये सोचूं कि मुझे प्रकृति को कंट्रोल करना है तो जैसे आज मनुष्य क्या आज मनुष्य के कंट्रोल में बिजली है आज हम बटन दबाते हैं बिजली हमारे लिए पंखा चलाती है यानी हमने बिजली को अपने कंट्रोल में किया तो उसी प्रकार हम चीजें सोचते हैं कंट्रोल लेकिन फिर भी हमें दुख है उसके बावजूद भी दुख है तो ईश्वर हमें बताता है कि तुम कितनी भी चीजों को कंट्रोल करने का ट्राई कर लो दुख फिर भी रहेगा तो दुख से तुम ये सोचो कि तुम चीजों को कंट्रोल करो इससे नहीं है दुख मतलब क्योंकि जैसे जब सृष्टि नहीं रहती है प्रलय काल में तब भी ईश्वर रहता है और ईश्वर सच्चिदानंद उस अवस्था में भी रहता है। यानी अगर वो चीजों को कंट्रोल करने वाला उस टाइम नहीं कंट्रोल कर रहा है तो भी वो सुखी है। तो यानी सुखी होने का जो कारण है वो ये कंट्रोल करना इत्यादि नहीं है। वो एक उसका स्वभाव है कि वो आनंद है। अब पॉइंट ये आ जाता है कि उसी प्रकार से जैसे जीव है वो क्या करता है कि अगर वो उस चीज से ये तो वो जीव को समझ में आता है कि नहीं यार [गला साफ़ करने की आवाज़][नाक से की जाने वाली आवाज़] भी मैं पावर गेन कर लूं, पैसा गेन कर लूं, प्रकृति कंट्रोल कर लूं। दुख फिर भी कहीं ना कहीं रह रहा है। मान लेते हैं कि प्रकृति से होने वाला दुख नहीं है। मान लेते हैं कि शरीर से होने वाला दुख है। लेकिन अंदर तो दुख है। राग, द्वेष इत्यादि किसी ने मुझे प्रेम में धोखा दिया। अब मेरा मन दुखी हो रहा है। यानी वो दुख फिर भी कहीं वो तीसरा दुख रह ही जाएगा। तीनों प्रकार के दुख जब तक शरीर है तब तक मतलब हट ही नहीं सकता। तो लास्ट में नहीं नहीं
00:15:03:20 वो वो मैं समझ रहा हूं। मगर प्रारंभिक जो है ना प्रारंभ वो तो यहां से करना पड़ेगा ना कि कोई हो जो प्राकृतिक बाधाओं के परे हो। तो वह ईश्वर है क्योंकि उसका शरीर इत्यादि नहीं है तो उसको प्रकृति का भी कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे अगर आता है तो नहीं तो मगर यह वाली प्राकृतिक बाधा से बाधित हो गया ना वो प्राकृतिक बाधाओं से परे हो मतलब ईश्वर तो हो वो मतलब परे वाला तो हो जिसको कोई दुख नहीं है। सबसे मुक्त है वो। मगर वो इस प्राकृतिक बाधा से भी बाध्य ना हो ना कि वो यहां ये कर सकता है। व्यवहार आ सकता है। व्यवहार में कर सकता है। उससे बाध्य ना हो। जैसे ये तो ये तो हमने सिद्ध करना है ना। जैसे ये जो अभी आप कह रहे हो वो तो इसी को सिद्धि वाला ही पॉइंट है कि वो कुछ भी कर सकता है वाला विषय तो इसीलिए वो तो अभी तो वो चीज अभी हम उस ऑनगोइंग स्टेप में ही थे मतलब सिद्धि वाले में तो वो जो मुक्ति वाला जो आपका तर्क है ना उस मैंने उसमें विचार किया था तो मुझे उसमें यही लगा कि भैया ने जो बात रखी हुई है वहां पे वो मुक्ति के रियल में डिमांड है वो जो मुक्ति की डिमांड से है और उस डिमांड से ही यह निश्चित हो जाता है कि कोई है जो प्राकृतिक बाधाओं से मुक्त मुक्त है। हां हां बिल्कुल बिल्कुल सही भी है। बिल्कुल सही है। है ना? तो प्राकृतिक बाधा एक ये भी है कि मैं संसार में आऊं जाऊं अपनी उस बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल अब उसमें अब
00:16:18:21 हम अब हमारी यानी मूल चाह जैसे आप कहते हो ना मूल चाह क्या है? मूल मूल जो चाह है वो हमारी ये नहीं कि हम प्रकृति को कंट्रोल करें। मूल जो चाह हमारी ये है कि मुक्ति वो मूल चाह है। यानी चाह वो मूल चाह है। तो उस चीज से सिद्धि होती है। बाकी भैया मैं आपको और समय मतलब आगे दोबारा हमारी बातचीत होती रहेगी। इसको इस तरीके से भी देखना। अच्छा
✅ This part is already used · 00:16:38:28 – 00:16:44:28 (0:06)
→ Used in: B · Video जड़ पदार्थों को ईश्वर की इच्छा किस रूप में प्राप्त हुई? अवतारवाद को निर्भय कर दे... at 0:12 ↗
→ Used in: A · Video सर्व व्यापक ईश्वर एकदेशीय कैसे हो सकता है? अवतारसिद्धि at 27:10 ↗
→ Used in: A · Video अलंकारी हेतु को अवतार का धक्का | बच्चे को अध्ययन की और आवश्यकता है at 0:03 ↗
00:16:38:28 इस विषय में तुम्हारा क्या पक्ष है कि ये जो है ईश्वर सृष्टि बनाता कैसे है
⬜ Not used yet · 00:16:44:28 – 00:23:20:00 (6:35)
00:16:44:28 यहां से क्या है सृष्टि कैसे जी उसमें भी हम लोग ये मानते हैं कि एक तो जैसे निराकार सर्व जैसे तुमने कहा ना तीन तत्व है वो तीन कारण है जो प्रत तत्व नहीं थे कारण थे तीन जी है ना जी तो तत्व क्या माने हैं आपने कितने माने हैं जी मैं बताता हूं देखिए उसमें मुख्य रूप से तो जो मुख्य रूप से तो ईश्वर जीव प्रकृति ये तीन आ जाते हैं तो तीन ही तत्व है हां मुख्य रूप से तीन है बाकी कुछ गौ माने जाते हैं जैसे दिशा काल आकाश इनको भी नित्य माना जाता है लेकिन ये कांसेप्ट मात्र है और हां द्रव्य है लेकिन द्रव्य है लेकिन वो ईश्वर जीव प्रकृति जैसे द्रव्य नहीं है गुण इनमें माने माने जाते हैं लेकिन अलग माने जाते हैं अच्छा जो हम त्रतवाद कहते हैं इसको वैसे कह सकते हैं वैचारिक तत्व जो बिल्कुल बिल्कुल सही है बिल्कुल सही वैचारिक तत्व बहुत सही वो जो दिशा काल आकाश वो वैचारिक तत्व है और ये ये एक्चुअल तत्व ऐसे कह सकते हैं अब इसमें आ जाता है कि जब हम त्रितवाद कहते हैं यानी तीन कारण मतलब वो ये तीन कारण कर पाते तीन कारण भी तीन तत्व भी हां अब इसमें कैसे है कैसे सेट है इसके अंदर यह है कि जैसे एक होता है निमित्त कारण एक होता है उपादान कारण एक होता है साधारण कारण तो निमित्त कारण में ईश्वर भी है जीव भी है जैसे है ना जैसे मैंने मटका बनाया तो यहां पे निमित्त मैं हुआ तो निमित्त कारण मैं हूं और पूरे ब्रह्मांड को ईश्वर ने बनाया तो ब्रह्मांड का निमित्त ईश्वर है ऐसा तो निमित्त में जीव भी है ईश्वर
00:18:00:00 भी है फिर उपादान उपादान अर्थात किससे बनाया जैसे मम्मी ने रोटी बनाया तो रोटी किससे बनाया आटे से बनाया तो आटा उपदान हो गया रोटी से बनाया घड़ा फिर साधारण कारण में बाकी सारी चीजें साधारण कारण है। जैसे बनाने में समय लगा, बनाने में जान लगा, बनाने में बल लगा है ना? तो वो सारी की सारी चीजें उसमें आ जाती है साधारण कारण में। हम तो वो तो तीन कारण नहीं तो इसमें एक ये दिक्कत नहीं आती कि जब वो निर्गुण निराकार है एक रस है और व्यवहार में ना आ सकने वाला है तो व्यवहार में आ कैसे रहा है? उसको एक ही मानते हैं अभी हम लोग। मतलब जो व्यवहार में ना सीखने वाला और राखने वाला ना उसको हम एक ही ईश्वर मानते हैं। तो परिवर्तन हो रहा है ना यह दिक्कत है। वो व्यवहार में नहीं आ सकता। पहला स्टेप ये है प्रलय काल में जो ईश्वर की जो स्थिति है स्टेट वो व्यवहार में ना आने वाली है। लेकिन भैया प्रलय काल में तो देखिए उसमें पॉइंट आ जाता है कि प्रलय काल में उसको व्यवहारिक रूप से जानने वाला कोई नहीं है। इसीलिए वो बात आ रही है ना। मतलब ऐसी कोई स्टेट है ही नहीं जब वो व्यवहार में ना आ सकने वाला है। जैसे अगर जैसे अगर मैं हूं मैं मैं उसको ऐसी अवस्था में हूं कि मैं उसे एक्सपीरियंस कर सकता हूं तो बिल्कुल वो रहेगा। प्रलय वही ईश्वर रहता है। मतलब वहां साक्षी नहीं है इसलिए वो व्यवहार में ना आ सकने वाला है। जी जी बिल्कुल बिल्कुल अब उसमें ये होता है कि अब जैसे हम ये मानते हैं तो मतलब
00:19:15:01 जो ईश्वर है वो फिर जो जैसे जो ये मैंने ये वाला जो पॉइंट बोला कि वो काम कर रहा है जब जी जी तो कम ज्यादा हो रहा है। उसमें क्या करेंगे? शगुण सगुण तो कम ज्यादा वाले को ही कह रहा है ना गुण तभी आ रहा है जब वो काम कर रहा है उसमें भी सगुण निर्गुण का हमारा ये रहता है कि शास्त जैसे जब निर्गुण यानी गुण रहित सगुण यानी गुण सहित तो उसमें ये होता है कि जो जो गुण ईश्वर में नहीं है जैसे नीचता धूर्तता इत्यादि मतलब जो भी है वो ईश्वर में नहीं है इसलिए निर्गुण है और सर्वजता सर्वशक्तिमत्ता इत्यादि गुण से सहित है इसलिए वो सगुण है तो स्वरूप स्वरूप भूत लक्षण क्या है उसके तो स्वरूपभूत लक्षण जो है ये पूरा दोनों मिलाकर के स्वरूप बनेगा। अच्छा इसमें एक और बात आती है कि महर्षि ने बताया कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो निर्गुण और सगुण दोनों ना हो। यानी यानी मैं भी निर्गुण हूं, सगुण भी हूं। क्यों? बहुत से गुण मुझ में है। बहुत से गुण नहीं भी है। नहीं दिक्कत ये आएगी। दिक्कत ये आती है ना कि वो एक रस वाली बात फिर कहां चली जाएगी? एक बताता हूं। एक रस वाला [गला साफ़ करने की आवाज़] एक बार थोड़ा सा वो प्रश्न को थोड़ा सा रख दीजिए तो मुझे वो रिमाइंड हो जाएगा। देखो मैंने प्रश्न बहुत सिंपल है कि ईश्वर सब जगह एक बराबर है। ये हो गया निर्गुण क्योंकि वो एक बराबर है इसलिए व्यवहार में ना आ सकने वाला है। जी जी ठीक है। अब क्या हुआ
00:20:30:12 कि अब क्या हुआ कि ईश्वर जो है ईश्वर जो है अपनी शक्ति के रूप में मतलब जो कार्य कार्य करने वाले रूप में जी जी तो अब वो सगुण निराकार वाले रूप में अब वो काम कर रहा है। अब वह जो है जहां पर ज्यादा पावर लगनी है वह ज्यादा पावर के रूप में लग रहा है और जहां कम पावर लगनी है वहां कम पावर के रूप में लग रहा है। तो यह हो गया सगुण क्योंकि अब वो व्यवहारिक हो गया है। किसी के लिए धक्के का विषय है, किसी के लिए उठाने का जो भी बल लगते हो सृष्टि रचना के लिए वो सब उनका व्यवहार का विषय हो गया है। जी जी तो अब वो व्यवहार का विषय हुआ तो ईश्वर का जो नित्य स्वरूप था जी कि वो एक रस है बिल्कुल कम ज्यादा नहीं है कहीं उसमें गड़बड़ी आ रही है उसमें भैया ये पॉइंट आता है ना कि शास्त्रों में मैंने मतलब जितना मैं बता रहा हूं कि जो एक रस वाली जो बात आती है ना ईश्वर के लिए वो इस सेंस में आती है कि एक रस हम किस पैमाने पे कह रहे हैं तो बात हम कह रहे हैं कि जैसे ईश्वर कोई देख नहीं रहा है नहीं नहीं जैसे बताता हूं जैसे मान लीजिए कि ईश्वर सर्वव्यापक है। ठीक है? तो ऐसा नहीं है कि सर्वव्यापक ईश्वर जो अमेरिका में जो व्यापक है वो वाला ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। अल्पशक्तिमान है और जो भारत में सर्वशक्तिमान है वो ज्यादा शक्तिमान है। ये ऐसा नहीं है कि भारत वाला ईश्वर तो दयालु है। पाकिस्तान वाला ईश्वर जो है
00:21:45:13 वो दयालु नहीं है। यानी गुण कहीं भी कहीं भी स्थिति में गुणों में क्योंकि हम जैसे किसी को जान रहे हैं तो कैसे जाने? उसके गुणों से ही जान रहे हैं। गुण नहीं तो काम ही खत्म। है ना? तो उसके गुणों में कहीं पे भेद नहीं आता। जब गुणों में कहीं भी भेद नहीं आता तब उस आधार पर उसको एक रस बोलते हैं। तो यहां पे होता यह है कि नहीं जैसे यहां भेद वाली जो बात आई कि उसके गुणों में भेद नहीं आता है। जी जी अब प्रॉब्लम यही है ना बस सबसे बड़ी प्रॉब्लम यहीं पर है। जी प्रॉब्लम क्या है कि अगर ईश्वर की शक्ति अलग होती जी मुसलमान की तरह। जी जी तो हम ये मान लेते कि उसमें जो है भेद नहीं आता। ठीक है। जी। अब दिक्कत क्या है कि जहां पे पहाड़ [गला साफ़ करने की आवाज़] उठाया जा रहा है जी जी मान के सपोज करिए जी तो वहां पावर ज्यादा लगेगी और जहां मटका उठाया जा रहा है मिट्टी का एक ढीला उठाया जा रहा है वहां पावर कम लगेगी। जी जी तो पावर कम ज्यादा जो लग रही है जी जी वो तो भेद है ना भैया उसमें उसमें ये बात आ जाती है ना वहां पावर है पूरी पावर है तुमने जो पहला कहा ना कि वहां अमेरिका में कम पावर वाला यहां वो है मगर जब वो कार्य कर रहा है वो कार्य नहीं कर सकता जो बराबर पावर वाला सब जगह
00:23:00:16 है वो कार्य नहीं कर सकता कार्य तो तभी करेगा जब वो भेद ला पाए अपने अंदर मतलब जो पहाड़ उठाने में जो शक्ति लग रही है मान लो अगर शक्ति का कोई पैमाना होगा जो तुम जानते होगे शायद जी जी तो का पहाड़ उठाने में जिस जो पैरामीटर है मान लो 10 10 अंक वाली शक्ति जी जी समझिए तो फिर मिट्टी का ढेला उठाने [गला साफ़ करने की आवाज़]
✅ This part is already used · 00:23:20:00 – 00:24:47:22 (1:28)
→ Used in: B · Video जड़ पदार्थों को ईश्वर की इच्छा किस रूप में प्राप्त हुई? अवतारवाद को निर्भय कर दे... at 0:21 ↗
→ Used in: A · Video सर्व व्यापक ईश्वर एकदेशीय कैसे हो सकता है? अवतारसिद्धि at 27:15 ↗
→ Used in: A · Video अलंकारी हेतु को अवतार का धक्का | बच्चे को अध्ययन की और आवश्यकता है at 0:08 ↗
00:23:20:00 में तो दो पावर वाली लगेगी और अगर नहीं लगेगी तो वो अपनी निश्चित दूरी से ज्यादा आगे जाएगी फिर अगर पहाड़ वाली ताकत उसमें लग जाएगी तो तो भेद तो लाना ही पड़ेगा तभी तो सृष्टि रचना हो पाएगी उसमें भैया ये ये बात आ जाता है ना कि उस केस में ये जो पॉइंट है ना कि इस वाले प्रश्न को एड्रेस किया है महर्षि ने तो उसमें [गला साफ़ करने की आवाज़] से ये सेम प्रश्न पूछा सत्यार्थ प्रकाश में ही है वो वाला तो उसमें वो मानते हैं उसमें वो कहते हैं कि बिल्कुल जैसे जो जीव है वो वो अपनी इच्छा से चाहे हाथ उठाए चाहे हाथ की उंगली उठाए है ना कंट्रोलोल्ड उसकी शक्ति उसी प्रकार से ईश्वर भी कंट्रोल है क्योंकि वो बुद्धिमान है वो इस प्रकार की अपना शॉर्टकट में उसको बोलते हैं तो उसमें यही बात आ सकती है कि लेकिन जो उसको एक रस मानते हैं एक रस का क्या कारण है वो वो वो मैं नहीं जा रहा हूं यहीं पे बस यही हमें क्लियर करना है जी कि जो उंगली उठा सकता है ठीक है तो वो इसलिए उठा सकता है क्योंकि उसके पास भेद है बल बल है। हां बल भी है और भेद भी है। मतलब रेगुलेट मतलब उसको कंट्रोल है। उसको अपने बल के ऊपर कंट्रोल है। कंट्रोल है। चलो ठीक है। कंट्रोल है। मगर जो जो कंट्रोल करके वो जो जो बल लगा जी जी जी 10 नंबर और दो नंबर ये दोनों अलग-अलग बल है क्वांटिटी में। ठीक है? अब ये जो बल है ये उससे अलग नहीं है। ईश्वर से है
00:24:35:01 ना? तो ये बल के रूप में ईश्वर में भेद है। ये कम बल है या ज्यादा भेद है? इसको मानते नहीं है अभी हम लोग। क्यों नहीं मानते? क्यों पता है यहां पे यहां पे वो अद्वैत की बात आती है। हां बिल्कुल
⬜ Not used yet · 00:24:47:22 – 00:27:41:00 (2:53)
00:24:47:22 सही। यहां क्या होता है? यहां अद्वैत की बात क्यों आती है? जी कि सबसे पहले तो ईश्वर सर्वव्यापक वो वाला सच्च जो सत्यम ज्ञान अनंतम ब्रह वाला। तो एक तो ये चीज हो गई। अब मैं वो बता रहा था यहां पे अद्वैत क्यों आता है कि क्या कहते हैं सबसे पहले हो गया सत्यम ज्ञानम अंतम ब्रह्म ठीक है जी जी अब अब भाई अगर आपको कुछ भी करना है ब्रह्म से कुछ भी करवाना है तो सबसे पहले उसमें चेंजेज आ जाएंगे फिर वो नित्यता भंग हो जाएगी शाश्वतता भंग हो जाएगी तो अब कैसे करें जी तो उनकी जो अभिन्न स्वरूप भूता शक्ति है माया जी जी है ना तो फिर माया से माया से एक दुनिया रचित हो गई अब इस माया से जो हम दुनिया रचित देख रहे हैं संसार आकाश खाली स्पेस पड़ा है अभी कुछ नहीं है। इस संसार में वो जो निर्गुण निराकार परमेश्वर है है ना वो है ठीक है वो सब जगह है बराबर एक रस अब क्या हुआ क्योंकि ये माया रूपी संसार है तो वो होते हुए भी उसने एक और अपना वहां पर एक और रूप प्रकट किया जो बिना दिखाई दिए मिट्टी के कणों को इकट्ठा कर देता है सूर्य को टांग देता है चंद्रमा को टांग देता है ये सब कर देता है बिना दिखाई दिए निराकार
00:26:02:24 रूप से तो यह उसका अवतार होता है पहला सगुण निराकार जी जी यह अवतार हो जाता है क्योंकि उसकी एक रास्ता भंग नहीं होनी चाहिए जो जो है वो एक रास्ता है फिर भी उसका एक अवतार हुआ और जब हमने ये अवतार मान लिया तो फिर हमारा आगे का कांसेप्ट आ जाता है कि भाई जब यह मान रहे हैं हम यहां से ये यहां आ रहा है अपनी नित्यता को छोड़ते हुए तो अवतार मानना पड़ा तो फिर हम अगला अवतार मानते हैं उस ये बात आ जाती है ना कि जैसे अगर इस वाले चीज को आप अवतार कह रहे हैं तो क्या ये केवल मतलब संप आपके संप्रदाय में माना है या फिर जो मूल मूल शास्त्र है उसमें भी माना है। ये वाला प्रश्न आ जाता है। अब शास्त्रों का अर्थ तो लिया ही है। अब वो वही अर्थ दूसरा संप्रदाय माने या ना माने आर्य समाज माने या ना माने मगर शास्त्रों का अर्थ तो लिया ही है। जैसे हां जैसे अगर आचार्यों ने भी अगर ये शास्त्र जैसे मैं बताऊं है क्या? जैसे एक जगह पे मुंडकोपनिषद में मांडक उपनिषद में कह दिया गया कि भाई ईश्वर व्यवहार में ना आ सकने वाला है। तो ये हो गया निर्गुण निराकार। जी। ठीक। अब जो है ईश्वर की वो शक्ति भी बताई गई है। अविद्या माया इत्यादि के रूप में कई कई जगह बताई गई है। है ना? तो माया हो गई। माया हो गई। अब तीसरी बात क्या हो गई कि जो है अब ईश्वर जो है उसका निर्गुण मेरे पास वो है शास्त्रों के प्रमाण लिखे हुए हैं। बाकी इस वाले विषय क्योंकि अभी मैं थोड़ा सा ध्यान नहीं
00:27:17:25 दे पा रहा हूं। हां बताता हूं। [संगीत]
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
निर्गुण ईश्वर का सगुण अवतार सिद्धि | भयभीत अलंकार समाज कॉल रिकॉर्डिंग भाग 1
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮