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00:00:06:21 पहले मैं आपको प्रणाम करता हूं महाराज जी अ तो थोड़ा सा आप अपना अगर परिचय दर्शकों को दे दे कुछ बता दे वो लिख देगा परिचय देगा जी वो लिख देगा परिचय देगा जी वो लिख देगा परिचय देगा जी महाराज जी एक आज के युवाओं में देखते हैं एक परेशानी चल रही है कि युवा धीरे-धीरे नास्तिक होता जा रहा है। तो ये जो ईश्वर की सिद्धि है युवाओं के समक्ष क्योंकि ज्यादातर लोग जो कॉलेज जाने वाले बच्चे हैं वो आजकल क्या है भगवान को नहीं मानते। तो ऐसा कौन सा सिद्धांत उन्हें दिया जाए जो वो भगवान पर विश्वास करना शुरू कर दे कि हां भगवान है। जो भगवान को नहीं मानते ऐसा कहते हैं तो मुझे लगता है कि वो लोग भगवान को बहुत मानते हैं कि जिसकी कोई सत्ता नहीं है उसकी चर्चा हो ही नहीं सकती। जिसकी संपूर्ण सत्ता है उसकी ही चर्चा होगी। कोई यह नहीं कह सकता कि मैं आकाश से अंगूर नहीं तोडूंगा या मैं आकाश में फले हुए सेव फल नहीं खाऊंगा क्योंकि आकाश में सेव नहीं फलते। अंगूर भी नहीं फलता। [संगीत]
00:01:22:14 जो चीज होती है वही कही जाती है। इसलिए ईश्वर को जो मानते हैं वही ये कहते हैं कि मैं मान नहीं मानता हूं। बहुत बढ़िया। तो महाराज जी इसमें कई बार यह होता है कि जैसे हम लोग कॉलेजेस वगैरह में जाते हैं ना कैंप लगाते हैं ये तो उसमें क्या होता है कि वो लोग इस तरह के अनर्गल काउंटर करते हैं तो क्या हमारे पास कोई परफेक्ट ऐसा सिद्धांत नहीं है कि उसका एक का एक दिक्कत है कि तो उनमें मार्गदर्शन का अभाव है। शिक्षण प्रशिक्षण का अभाव है। अह मगर मैं महाराज जी ये चीज जानना चाह रहा था जैसे कोई एक ऐसा प्रॉपर एक कोई [संगीत] सिद्धांत कोई फंडामेंटल हमारे सनातन धर्म ने दिया हो कि हम उसको काउंटर कर सके जब जैसे आपने कहा ना कि जो चीज नहीं है उसके बारे में बात ही नहीं होगी तो इसमें वो लोग ये कह देंगे कि तुमने कोई कल्पना की हम उस कल्पना को मना कर रहे हैं। आपने कल्पना की भगवान की तो हम नास्तिक हैं। हम उसको मना कर रहे हैं। तो कोई ऐसा नास्तिक आस्तिक का जो यह वाद विवाद है जी यह बहुत पुराना है ये ऋषि ऋषि कुल में भी था जी जो नहीं मानते हैं वो नहीं मानते हैं वो तो हिरण्यकश्यपों भी कहते थे कि मैं भगवान को नहीं मानता जी और भगवान नाम की कोई चीज नहीं
00:02:37:18 है। तो कहने का मतलब यह है कि जो ये सदियों से चली आ रही है हमारे पास प्रॉपर नास्तिकता का कोई खंडन नहीं है। हमारे आचार्यों ने दिया हो। नहीं ऐसे नास्तिक आचार्य भी हुए हैं हमारे। नहीं हमारे जो जैसे हर दर्शन हमारे मान्य हैं लेकिन ऐसे भी दार्शनिक हुए हैं जो बड़े विद्वान थे लेकिन भगवान को नहीं मानते धर्म को नहीं नहीं नहीं चारवाक आदि जैसे हमारे जो शंकराचार्य आदि शंकराचार्य जी इनके द्वारा कोई ऋषि महर्षियों द्वारा दिया गया कोई ऐसा अकाट्य सिद्धांत जिससे कि हम नास्तिकों की बोलती बंद कर दे माने या ना माने उनको निरुत्तर कर दे निराधार कर दे बहुत है आदि गुरु शंकराचार्य ने वेदों पर भाष्य किया है उपनिषदों पर भाष्य किया है वेदों पर भी किया है और क्या और अनेक ग्रंथ लिखे हैं बहुत तो वह सब वही तो मैं कह रहा हूं कि गुरुकुल प्रणाली आएगी तो सारा अधूरा ज्ञान भी अजीरण करता है। तो उन्होंने कोई सिद्धांत नास्तिकों के खंडन के लिए दिया हो ऐसा कुछ बहुत कुछ है उनके जितने अद्वैत सिद्धांत के ग्रंथ हैं जी तो हमें कोई एक सिद्धांत आप दे देते वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा वो YouTube में नहीं मिल सकता। अच्छा अच्छा ठीक है। आगे बढ़ते हैं तो महाराज जी फिर अब एक चीज यह पूछ मतलब आता है कि धर्म
00:03:52:24 की क्या डेफिनेशन दें जिससे कि धर्म किसी के जीवन में अंतिम विकल्प के रूप में ख्यापित हो जाए वेद प्रणयितो धर्म अधर्मस तद विपर्यया जो वेद सम्मत कार्य है वो धर्म है और वो करना चाहिए मनुष्य को और वेद विरुद्ध जो कार्य है जी वो अधर्म है और वो नहीं करना चाहिए मनुष्य जाति को बस वेदों यही स्पष्टीकरण उसका है। जी बाकी व्याख्या बड़ी है। नहीं वो तो है मतलब वेद को तो तब हम प्रमाण के रूप में जब कोई वेद को मानता हो। अभी तो एक सामान्य सा लड़का है कोई और उसको हमें बताना है कि धर्म वेद को ना मानने वाले के लिए हमारे पास कोई उपाय नहीं है। वो नास्तिक मत है। नास्तिक मत हमेशा से रहते हैं। नहीं फिर भी हम कुछ समझा तो सकते हैं ना कि क्यों मानना चाहिए तुम्हें वेद को? क्यों मानना चाहिए तुम्हारे धर्म को? आज तक तो नहीं समझे हैं। समझाने वाले समझा रहे हैं। आदि गुरु शंकराचार्य समझाने ही आए थे। जी जी भगवान राम समझाने ही आए थे। जी जी श्री कृष्ण समझाने ही आए थे। जी तो जो समझने वाले हैं वो समझ जाते हैं और जो नहीं समझने वाले हैं वो नहीं समझते। हां तो कुछ उन्होंने ऐसा बोला होगा ना कि ये समझ लो तब जिससे कि वो समझे वो ना समझे नहीं बात अलग है। मगर हम कुछ ऐसा बताएं तो कि वो धर्म को समझ
00:05:07:27 पाए। धर्म उनके लिए क्यों आवश्यक है? धर्म का पालन अष्टादश पुराणेशु व्यासस वचनद्वयम धर्म का व्याख्याता सबसे बड़ा हमारा महर्षि व्यास है और वो कहते हैं कि अष्टादश पुराणेशु व्यासस वचनद्वयं परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीनम परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं है और दूसरे को सताने के समान कोई पाप नहीं है। परहित सरिश धर्म नहीं भाई और पर पीड़णा सम नहीं अधमाई तुलसीदास जी की भाषा में दूसरे को पीड़ा पहुंचाने जैसे कोई अधम कार्य नहीं है और परहित करने जैसा कोई अच्छा कार्य नहीं है सबसे अच्छा कार्य परहित जी जी जी मगर ये तो लक्षण हो गए ना महाराज जी धर्म की उपयोगिता अब्बास अब हमारा समय खत्म हुआ अब्बास अब हमारा समय खत्म हुआ अब्बास अब हमारा समय खत्म हो गया अब्बा हमारा समय खत्म हो बहुत-बहुत तुम्हारे दर् दर्शकों को हमारे चैनल के बहुत-बहुत आशीर्वाद और कुंभ मेले से उन सबके कल्याण की कामना तीर्थराज प्रयाग सबका सबको कल्याण करें और सब सुखी रहें
00:06:31:20 [संगीत]
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स्वयं को पुरी पीठ का शंकराचार्य बताने वाले फर्जी बाबा के पसीने क्यों छूट गए
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