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00:00:06:26 तो सभी को जय श्री राम। इस समय हम आए हुए हैं वृंदावन में और जैसा कि आप लोग जानते हैं कि हम विभिन्न जो धार्मिक मान्यताएं हैं उनको लेकर के जो अलग-अलग वैचारिक दृष्टिकोण है उनसे आपको अवगत कराते हैं। इसी क्रम में आज हम वृंदावन में गुरुकुल रोड पर एक गुरुकुल स्थित है। वो काफी बड़े प्रांगण में फैला हुआ है और मेरे ख्याल से दयानंद जी ने इस गुरुकुल को स्टार्ट किया है। ऐसा कुछ काफी पुराना गुरुकुल है ये। तो हमारे साथ में यहां के आचार्य हैं एक जो

00:00:42:09 थोड़ा सा आर्य समाज के सिद्धांत इस गुरुकुल के इतिहास इत्यादि के संबंध में प्रकाश डालेंगे। तो आचार्य जी सबसे पहले आपको जय श्री राम। जी आचार्य जी थोड़ा सा अपना परिचय और इस गुरुकुल के साथ आपका संबंध थोड़ा सा अवगत करा। जी जी मैं आचार्य पंकज आर्य अधिष्ठाता गुरुकुल वृंदावन मथुरा और आर्य समाज की यूथ विंग है। उसका मैं प्रांतीय मुख्य संचालक हूं। अच्छा थोड़ा सा आपका अध्ययन कहां से हुआ? कहां तक मतलब थोड़ा सा मेरा अध्ययन हुआ छठवीं से लेकर 12वीं तक माध्यमिक शिक्षा परिषद के ही विद्यालय में आदर्श लक्ष्मण इंटर कॉलेज कैंथल में। हम उसके बाद मैंने सेठ फूलचंद बांग्ला पीजी कॉलेज हाथरस से ग्रेजुएशन किया और पोस्ट ग्रेजुएशन मैंने चार बार किया हिंदी हिस्ट्री पॉलिटिकल साइंस एवं ये जो गुरुकुलय परंपरा है गुरुकुल साधु आश्रम से साहित्यचारी किया है और उसके बाद हम लोग सेवा में इसमें लगे हुए हैं। निश्चित रूप से जी जी बोलिए बोले आप निश्चित रूप से गुरुकुलों का उद्देश्य यह था कि हमारी जो प्राचीन संस्कृति है परंपरा जैसे वैदिक संस्कृति कहा गया है जो ईश्वरी ज्ञान

00:01:57:10 के आधार पर सृष्टि में पहले चार ऋषियों को जिनके नाम अग्नि वायु आदित्य अंगरा चार ऋषियों को उनके हृदय में ईश्वरी ज्ञान आया और उसी परंपरा से फिर सुरती परंपरा से गुरु ने शिष्य को सुना दिया फिर उसके शिष्य ने अपने शिष्य को सुना दिया इस प्रकार से ये परंपरा चली इसलिए वेदों को सुरती नाम दिया गया हम कि तो ये श्रुति है सुनकर के परंपरा जब स्मरण शक्तियां कम होने लगी तब कागज का आविष्कार हुआ फिर ये लिखित में प्राप्त हुआ है तो वैदिक संस्कृति वेद पर आधारित है तो बहुत ही सुंदर परिचय रहा आचार्य जी का अ आचार्य जी इसमें एक आजकल जैसे एक आप देख रहे हैं कि जैसे हमारी आजकल की जो जनरेशन है आज की पीढ़ी जो है नास्तिकता की ओर बढ़ रही है बहुत ज्यादा तो अ ईश्वर कि क्या कहते हैं यह जो वंदना की जाती है इससे उसे क्या मिलता है? मतलब ईश्वर की वंदना करने से क्या प्राप्त होता है? मतलब ऐसा कहते हैं कि ईश्वर जो है आपको जैसे ईश्वर की वंदना करने से सबसे बड़ा एक मिनट एक मिनट ऐसे लोगों का कई लोगों का मानना है कि भाई हम ईश्वर की पूजा करते हैं तो वो हम पर

00:03:12:14 जो है हमारे को हमारे पाप से मुक्त करता है या वो ऐसा माना ऐसी मान्यता होती है वो अपनी शरण में ले लेते हैं ईश्वर और जो है फिर जो है आपको जो है आपके दुख हर लेते हैं तो यह वाली मान्यता भी है तो आर्य समाज ये मानता है कि ईश्वर जो है पूजा करने से ऐसा नहीं है कि आपको कुछ दे दे। तो फिर पूजा करने का क्या लाभ? पूजा करने का लाभ कोई धन संपदा, वैभव या किसी दुख से दूर करने का नहीं है। जी निश्चित रूप से दुख जो होते हैं वो पापों से होते हैं और पाप होते हैं वृतियों से। और जैसी व्यक्ति की वृत्ति बन जाती है वैसा ही मनुष्य बनता चला जाता है। इसलिए हमारी वृत्ति खराब ना हो इसलिए हम स्तुति, उपासना और प्रार्थना करते हैं। जब वृत्ति सही होंगी तो हम अच्छे कर्म करेंगे। अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा। इसलिए महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती से पूछा कि हम ईश्वर की स्तुति क्यों करें? जब वो पापों को माफ नहीं करेगा। ईश्वर किसी को दंड को समाप्त नहीं करेगा। उसको देना है तो देना ही है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा अवश्य भोग कर्तव्यम कृतम कर्म शुभाशुभम हे अर्जुन किए हुए कर्म

00:04:27:15 शुभ और अशुभ का हमें फल प्राप्त होगा ही चाहे वो जो शुभ है उसका अच्छा कर्म फल मिलेगा और अशुभ है उसका बुरा मिलेगा लेकिन भोगना इसी जीवात्मा को पड़ेगा इसलिए स्वामी दयानंद से पूछा कि फिर स्तुति क्यों करें तो स्वामी जी उत्तर देते हैं कि पहाड़ जैसा भी दुख उसको राई के बराबर लगेगा। यदि वह तैनिक स्तुति करता है, साधना करता है। इससे बड़ा और क्या लाभ प्राप्त होगा? परमात्मा कोई धन संपदा नहीं देता है। पुरुषार्थ करो धन संपदा प्राप्त हो जाएगी। इसका सीधा सा उदाहरण है। जो लोग ईश्वर को नहीं मानते उनके पास भी धन संपदा होती है। भाई 3 अरब लोग धरती पर नास्तिक हैं। धन संपदा, गाड़ी, बंगला, कोठी सब कुछ है। यदि ईश्वर पूजा से देता तो निश्चित रूप से उनके पास क्यों है जो ईश्वर को गाली देते और नहीं मानते। इसलिए यह तो पुरुषार्थ का फल है। लेकिन स्तुति का सबसे बड़ा लाभ है कि हमारी वृत्तियां अच्छी बने। वृत्तियों से संस्कार अच्छे बने। संस्कार से कर्म अच्छे करेंगे। कर्म अच्छे करेंगे तो सुख प्राप्त होगा। तो महाराज जी एक तरीके से एक तो आपने ये कहा जो कि क्या कहते हैं जो नास्तिक हैं जी उनके पास भी धन संपदा की है तो इसमें तो जो

00:05:42:19 प्रारब्ध है कि उसने पूर्व जन्म में क्या किया उसके आधार पे उसको इस क्या मिला वो भी हो सकती है धन संपदा दुष्ट को भी प्राप्त हो सकती है महाकवि तुलसीदास प्रारब्ध के कारण भी हो सकती है। प्रारब्ध के द्वारा भी हो सकती है और उसके पुरुषार्थ नया भी कर रहा है और धन संपदा प्राप्त ये फिक्स नहीं कर सकते कि उसको पुरुषार्थ से ही मिला है। उसको प्रारब्ध और पुरुष दोनों चलते हैं साथसा दोनों साथसा मतलब फिक्स नहीं कर सकते। जी अच्छा इसमें एक चीज और है महाराज जी जैसे कि ये जो कहा गया है कि कर्मों के द्वारा पुरुषार्थ के द्वारा आपको मिलेगा और स्तुति से आपको वृत्ति सही होगी। उसको तो हम अभी देख अभी बात करेंगे वृत्ति सही होने पे। तो जो ये पुरुषार्थ मिलने की जो बात है मतलब हमें ये मानना है कि हमारे कर्मों से ही हमें जो मिलेगा वो मिलेगा। हमारे कर्मों को किए बिना नहीं मिलेगा। मतलब मैं करूंगा तो ही मुझे मिलेगा अन्यथा नहीं मिलेगा। पर इसमें एक दिक्कत आती है सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी ने यह कहा है कि ईश्वर की स्तुति करने से निराभिमानता आती है। जी निराभिमानता निराभिमानता मतलब कि इस बात का अभिमान कि मेरे करने से हो रहा है। ये तो बिल्कुल सही बात है। ये वृत्तियों में ही शामिल होगा। मैं वही कह रहा हूं। तो उसमें क्या है कि व्यक्ति जब अच्छी वृत्ति बनेगी तो निर्म अभिमानता आएगी ही। व्यक्ति यह सोचे कि

00:06:57:25 नहीं सोचे कि यह मेरे कर्मों का फल है या फिर यह सोचे कि मैंने ईश्वर की स्तुति की है और मुझे कर्म वैसे हमारा वैदिक वांग में यह कहता है आचार्य श्री कि हम कर्म करें फल की इच्छा ना करें उसमें ही आ जाएगा कि मैंने पुरुषार्थ किया है कि नहीं मैं कुछ कर रहा हूं जभी मिल रहा है ईश्वर की व्यवस्था क्या है लेकिन निर अभिमानता वृत्ति साफ होने से ही आती चली जाएगी और उस व्यक्ति के जो अहंकार आ रहा है वो ईश्वर की स्तुति से समाप्त मतलब अहंकार नहीं आना चाहिए। जी जी तो फिर हम ये क्यों कह रहे हैं कि ये जो कर जो परिणाम हमें प्राप्त हुआ है वो ईश्वर ने नहीं किया है। फिर हम उसको ये क्यों ईश्वर ने क्यों नहीं किया? जब हमारी वृत्त मैं मैं देखो सुनो फिर सुनिए जी कि हम लोग जो ईश्वर की स्तुति करते हैं या कोई धर्म कमाते हैं परोपकार करते हैं पुण्य करते हैं उसका उस तक पहुंचाने के लिए वृत्त की संस्कारों की बहुत जरूरत है बहुत सारे व्यक्ति चाहते करना पुण्य करना लेकिन वृत्ति नहीं बनती है उनकी संस्कार नहीं बनते और नहीं कर पाते चाहते हुए भी नहीं कर पाते चाहते हुए सत्संग में जाना यज्ञ में बैठना है यज्ञ चल रहा है लेकिन उनकी वृत्ति नहीं है। यज्ञ यहां चल रहा है। वो दूसरी जगह समय अपना

00:08:13:06 जो है पास कर रहे हैं। तो उस वृत्ति को बनाने के लिए उस अच्छाई को प्राप्त करने के लिए अच्छे संस्कार बनाने के लिए कि हमारी वृत्ति बने इसके लिए भी ईश्वर की स्तुति उपासना प्रार्थना बहुत आवश्यक है। नहीं ये मैं समझ रहा हूं। आपने जो कहा है ना वो तो मैं समझने का प्रयास कर रहा हूं। मतलब उसको एट द एंड पाना मतलब यह अपने मन में क्या विचार रखना है कि यह जो मुझे फल प्राप्त हुआ है यह मेरे करने से हुआ है ईश्वर की कृपा से हुआ है। तो वैसे तो ईश्वर के बारे में कर्म फल व्यवस्थापन एक मिनट अगर हम यह सोचे कि ईश्वर की कृपा से हुआ है तो दयानंद जी ने ये कहा है कि ईश्वर स्तुति करने से कुछ नहीं देता है तो कृपा भी नहीं देगा। वो तो आपके कर्मों का फल ही है। ठीक है? और अगर हम यह सोचे कि मेरे कर्मों का फल है तो दयानंद जी ने ये भी कह दिया कि निराभिमानता होनी चाहिए। नहीं तो मेरे कर्मों का फल में क्या अभिमान आएगा इसमें? तो यही तो अभिमान है कि भाई मेरे मेरे से हुआ मैंने किया। यही तो अभिमान है। अब ये मेरे को अपने कर्मों का फल मिलेगा। तो कर्तापन है ना? वही अभिमानता वही अहंकार है। कर्तापन मैंने किया। हम तो अहंकार के बिना तो शरीर ही नहीं बनेगा। हां भाई अहम होता है तभी यह शरीर तो अगर हमारा देखिए देखिए बात प्रश्न यह है कि अगर हमारा लक्ष्य निरभिमानता है

00:09:28:09 तो फिर हमें ये मानना पड़ेगा अपने आप को बताना पड़ेगा कि ईश्वर ने ही दिया ईश्वर ने ही कृपा की। अगर हम ईश्वर की कृपा नहीं मानेंगे तो हम यहां निराभिमानता नहीं ले सकते। निर्राभिमानता या अहंकार या स्वाभिमान इनमें अंतर है बहुत सा। ठीक है? स्वाभिमान होता है। हमने दूसरे के लिए किया है। परोपकार में किया है कोई और हम कह रहे हैं कि हमने यह किया है तो ये स्वाभिमान कहलाएगा। और इसी काम को हम अपने लिए करें तो यही अहंकार कहलाएगा। इसलिए स्वाभिमान शब्द आ यह तो आचार्य जी जो अह सत ही लेवल की बात है। अहंकार का मतलब है आखिर में जो अहम तत्व के लिए हमने कहा कि मैं अपने लिए कह रहा हूं कि भाई ये जैसे ये जो ये पेंटिंग है दयानंद जी की ये किस किसने बनाई? तो व्यक्ति के अंदर एक भावना तो ये आ सकती है भाई मैंने मेहनत की उससे पेंटिंग बनी। और दूसरी भावना ये आ सकती है भगवान ने कृपा की तो मैं पेंटिंग बना पाया। वैसे भगवान कृपा करता है हमारे लिए जैसे उसने बिना मांगे हमें जल दिया है। जी कोई हमने नहीं वो वो सही आप कह रहे हैं। बस दिक्कत यहां फस रही दोनों बातें हो गई। एक तो कि भगवान की कृपा से होना नहीं मानना है। ये तो क्लियर हो गया और ये भी ये भी नहीं मानना है कि मैंने किया तो किया किसने फिर पेंटिंग बनाई किसने? भगवान की कृपा और दया दो शब्द हैं।

00:10:44:14 दया जो होती है उसकी होती ही है। जैसे बहुत सारी चीजें बिना मांगे हमें मिनी शरीर मिलता है और चीजें मिलती हैं। उसमें भी हमने कर्म किया है। ज हमें मनुष्य का जीवन तो दया भी नहीं हुई। लेकिन बहुत सारी चीजें जैसे यह हमें हमने हवा नहीं मांगी उनसे ना कोई शुल्क देते हैं ना कोई पानी का शुल्क देते हैं ना सूर्य का शुल्क देते हैं। तो इस प्रकार से ये ये तो उनकी हमारे ऊपर दया हो रही है। और हमें जो ठीक-ठीक कर्मों का फल दे रहा है। ये दया भी एक दिक्कत आती है। जैसे जीव जो है संसार में आने के बाद ही फंसा है। जी पहले तो मुक्त है। नहीं वो तो पहले पहले पूर्व जन्मों में भी मुक्त है। मुक्त तो वह पूर्व जन्म में संसार में था ना संसार के बाहर तो मुक्त है ना संसार के बाहर कहां मुक्त है संसार के बाहर तो मुक्त उसके लिए एक संसार के कि मनुष्य जीवन से प्राप्त करके अष्टांग योग करने के बाद समाधि जब जीव संसार में नहीं है तो वो मुक्त अवस्था में है ना जब प्रपंच रूपी संसार में है तब वो फंसा हुआ है बंधन कहीं ना कहीं जन्म तो उसने लिया है जब कुछ नहीं होगा वो तो संसार है वही कह रहा हूं अगर वो संसार में है तो फंसा हुआ है किसी भी किसी भी जन्म में किसी भी जन्म में हो और संसार में नहीं है तो वो मुक्त है है ना तो जो हम हवा पानी वगैरह उसको

00:11:59:20 कह रहे हैं कि उसने दया दी है वो तो संसार में उसका बंधन का कारक है वो तो मुक्त था बढ़िया था बंधन का कारण है मुक्त तो तभी होगा जब एक उसकी अवधि है और मनुष्य जीवन नहीं जैसे हम ये कह रहे हैं ना कि ईश्वर ने दया दी पानी दिया तो ये हमको संसार में डाल के दे दिया है ना हम तो मुक्त थे मुक्त कहां थे तो कहां थे मुक्त होते तो फिर इतने लंबे समय के लिए सर 36,000 बार सृष्टि बने बिगड़े। नहीं नहीं इतना लंबा कार्यकाल दिया है। मैं मैं ये कह रहा हूं कि जब हम संसार में नहीं है ना जीव जी तो जीव कहां है? मुक्ति में तो है। किसी न किसी जन्म में है। वो जन्म भी तो संसार है। संसार के बाहर बंधन में तो है ही। मतलब कहने का ये है जब जब हम ये कहेंगे कि ईश्वर ने हमें आग, पानी या हवा दी, पृथ्वी दिया, दया की तबतब हमारा बंधन सिद्ध होगा। तो ईश्वर ने तो हमें बंधन में डाला। उसको दया कैसे मान लें? ये एक प्रश्न आ रहा है जिज्ञासा। इसलिए है कि उसने बिना मांगे हमें दिया। कोई प्रार्थना हमने नहीं की। तो फसाया है ना और उसने जो है उनको भी देता है जो ईश्वर स्तुति नहीं करते हैं। उपासना नहीं करते हैं। और उनको भी देता है जो ईश्वर स्तुति करते हैं। उसकी ये दया है हमारे ऊपर कि उसने सबको दे रखा है। जी बिना मांगे दिया है। दे रखा है। मगर एट द एंड उसकी वजह से हम फंस रहे हैं ना। जैसे उसने हमें शरीर

00:13:14:24 दिया बिना मांगे। फंसे तो हम अपने कर्मों से ही हैं। जब हम संसार में हमने संसार में रह के ही तो कर्म किए हैं बुरे कि बाहर भी किए हैं। संसार में रह के ही बुरे या कर्म किए हैं। तो जब हम संसार जब हम संसार में नहीं है तब तो मुक्त है ना संसार में नहीं है ये स्थिति अलग है। मोक्ष लेकिन किसी न किसी जीव के अंदर है तो बंधे हुए हैं। और बंधने का कारण हमारा ही है। हमारे कर्मों का परिणाम है। यदि हम मनुष्य जीवन प्राप्त करने के बाद और यम नियम लगा के समाधि करके और मोक्ष को प्राप्त होते हैं। बंधन दूर होते मतलब कि हम ये जो शरीर में फंसे हैं वो हमारे कर्मों का फल है और जब कर्मों का फल है जो हम शरीर में फंसे हैं और इससे मुक्ति जब हम इस शरीर में नहीं होते हैं तो हम मुक्त अवस्था में हैं। है ना? तो कहने का मतलब ये है हमको शरीर दिया भगवान ने और शरीर के अनुसार फिर पानी, हवा इत्यादि सब दे दिया। तो फिर यहां पे तो वो फंसाने वाला सिद्ध हो गया ना। फसाने वाला कैसे सिद्ध होगा? जब उनको मुक्त जो है बंधन में डाला है। बंधन में डाल के पिता है पिता कोई दंड भी देता है तो उसमें ये भावना होती है कि इसका कल्याण हो। तो यदि मगर दंड वो उस बात का देता है ना कि उसने पहले गलती की है। हां तो वो गलती कहां पे हो रही है? गलती हो रही है कि हम लोग जो है जो मनुष्य

00:14:30:00 जीवन का उद्देश्य है कि सुख प्राप्त करना। विशेष सुख प्राप्त यानी मोक्ष प्राप्त करना। नहीं नहीं गलती कहां पे हो रही है भाई उसने हमें संसार में डाला ही क्यों यही बात है संसार हमारे कर्मों के फल देने के लिए तो वो कर्म गलत वाले कहां किए थे हमने किसी न किसी जन्म में किए संसार में ना संसार में संसार से पहले तो मुक्त थे मुक्त थे अच्छा मुक्त होते तो फिर लंबी अवधि के लिए चले जाते छोड़िए उसमें लूप हो जाएगा ये ये पूछ रहा था जैसे हम ये कहते हैं कि ईश्वर मांगने से कुछ देता नहीं है मगर वेदों में ऐसी कई स्तुतियां है जो मांगा जा रहा है कि हमारे हमारे गाय की रक्षा करो, हमारे अश्व की रक्षा करो। सीधे-सीधे मांग रहे हैं। मांगने के साथसाथ जो प्रार्थना है उसकी परिभाषा कि मांगते समय पुरुषार्थ की सहाय की प्रार्थना करना। यानी पुरुषार्थ करते हुए सहाय की प्रार्थना करना। यदि आप मांग भी रहे हैं और पुरुषार्थ भी कर रहे हैं तो निश्चित रूप से मिलता भी है। ऐसे तो हम सीधे पुरुषार्थ करेंगे तो नहीं मिलेगा। सीधे पुरुषार्थ करेंगे तो हो सकता है कि गलत कर्म हो जाए हम पर सीधे भाई वृत्त हमारी सही नहीं बनी तो वो तो वो तो प्रार्थना करके पुरुषार्थ करने में भी गलत कर्म हो सकता है प्रार्थना करने पर वहां हो सकता है लेकिन कम

00:15:45:01 चांस है उससे कम चांस है इसका कहीं विवरण कि इसमें ज्यादा चांस है इसमें कम चांस है ऐसा और क्या स्तुति का फल क्या है नहीं नहीं मतलब वेदों में स्तुति का फल है किसी जैसे स्तुति कहते किसी के गुणों का बखान करना स्तुति तो ठीक है मगर अगर मांग रहे हैं ना जैसे भूभु स्वा तस वितुर्वेण्य भर्गो देवस्य धीमहि धो यो प्रचोदयात तो इसमें तो हमने मांगा बुद्धि दो हमें सद्गुरु बुद्धि दो लेकिन बुद्धि के लिए पुरुषार्थ भी किया है तो वही हम डायरेक्ट पुरुषार्थ करेंगे तो नहीं मिलेगा पर प्रार्थना कहां हुई वही तो मैं कह रहा हूं प्रार्थना की आवश्यकता क्या है वही जो पहला क्वेश्चन वही था कि भाई पूजा करने का लाभ क्या है जब हमको तो कर्मों से सब मिल जा रहा है जी जी ये दिक्कत है अच्छा ठीक है छोड़िए अह दूसरा एक चीज़ लेते हैं कि अह निराभिमानता भी क्लियर अह थोड़ा सा अगर करें कि दोनों बातें उन्होंने कह दी कि ईश्वर आपको स्तुति से कुछ नहीं देता है। मांगने से कुछ नहीं देता है। और दूसरी ओर फिर वो दयानंद जी कह रहे हैं कि भाई आपको यह नहीं सोचना है कि मैंने किया। क्योंकि निराभिमानता का अर्थ वही है मैंने ही किया। ऐसा तो नहीं कहां पर कहा? उसी में कहा है। जहां पे ये कहा है ना कि ईश्वर की स्तुति से क्या मिलता है? उसी में एक शब्द आया निराभिमानता। मेरा अभिमान तोता आया है। मतलब किसी की भी स्तुति करोगे चाहे ईश्वर की करो चाहे किसी बड़े व्यक्ति की करो निरभिमानता

00:17:00:16 आएगी ही नहीं आएगी ठीक है मगर हमें निरभिमानता पे जाना है कि ईश्वर की कृपा पे जाना है ये समझ में नहीं आ रहा एक तरफ कह रहे हैं कि हमें अपने कर्मों के फल से ही मिलेगा ईश्वर नहीं देगा एक तरफ कह रहे हैं कि ऐसा नहीं सोचना है कि हमने किया तो हमने नहीं किया तो ये मानना पड़ेगा ईश्वर ने किया एक्चुअली है क्या जो लोग ऐसा कहते हैं भगवान ने वो दिया आपने शुरू में एक बात कही थी कि ईश्वर की पूजा करने पर जो है बड़े से बड़ा दुख भी तुम्हें राय के समान लगता है। उसी को लोग ये कहते हैं अपनी मान्यता में कि ईश्वर ने माफ कर दिया। मतलब जैसे मान लीजिए कि कोई व्यक्ति है उसको कपड़े चोरी करके पहनने की आदत है। ठीक है? उसने खूब लोगों के कपड़े चुराए। फिर उसके जीवन में जब अध्यात्म आया और उसको पाप लग गया था। कपड़े चुराने वाला पाप लग गया था। अब उसको फल भोगना है। उसका उसका निर्णय हो गया कि भाई तुम्हें किसी ना किसी दिन ऐसा होगा जब तुम्हारे पास कपड़ों की कमी होगी। मगर इसी बीच क्या हुआ कि उसके पास जो है आध्यात्म आ गया। ईश्वर आ गए। उसने ईश्वर की भक्ति की खूब। तो जब उसके पास वो दौर आया जब उसके कपड़े से छिन जाएंगे। वस्त्र उसके पास नहीं होंगे। वो दौर उसको पता ही नहीं लगा। तो यहां पे उसको उसके कर्मों का फल भी मिला। परंतु वो एक तरीके से माफी भी मिल गई क्योंकि कष्ट नहीं मिला।

00:18:15:27 यह चीज है। अच्छा ठीक है। इसमें मेरा गोल ब्लडर का ऑपरेशन हुआ। अभी ताके कटवा के आया था। अभी अभी अभी सीधे चले आ रहे हैं। हां प्रहलाद जी के पास देखे गए थे। एक डेढ़ घंटा हो गया यहां पहुंचे। बस एक छोटा सा प्रश्न करके बंद कर देते हैं। है ना? ये मैं पूछ रहा था कि आर्य समाज ईश्वर को सर्वशक्तिमान तो कहता है। है ना? जी। सर्वशक्तिमान तो है ईश्वर। पर वो ये कहता है कि भाई ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। है ना? जी तो यहां पर उसकी जो शक्ति है वो बाधित हो रही है ना कि उस सर्व कार्यों को करने की शक्ति नहीं है। वह अवतार नहीं ले पा रहा है। तो सर्वशक्तिमान फिर कैसे? सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं जो कुछ भी चाहे वो करे। सर्वशक्तिमान का अर्थ होता है स्वामी दयानंद ने किया है कि अपने कार्यों में किसी की मदद नहीं लेता। और वो पांच ही कार्य करता है। संसार को बनाना, पालन करना, नष्ट करना, समय पर, जीवों को कर्मों के अनुसार फल देना और वेद का ज्ञान देना। इन पांचों कार्यों में ना सुपरवाइजर की जरूरत ना चपरासी की ना किसी मैनेजर की ना इंजीनियर की अपने कार्यों को स्वयं करता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है ये नहीं कि वो सब काम कर ले रोटी भी बना ले और कुछ भी कर ले आचार्य जी ईश्वर के अलावा कौन-कौन से तत्व हैं

00:19:31:03 एक तो प्रकृति एक जीव है हां तीन अनाद सत्ता है ईश्वर जीव और प्रकृति तो ईश्वर संसार को बनाने के लिए प्रकृति की सहायता नहीं लेता नहीं प्रकृति की सहायता लेता है तो प्रकृति तो है उसी के नियंत्रण में प्रकृति अलग कहां है? प्रकृति के बिना काम नहीं करता ना। ऐसे नहीं कि उसको कोई सुपरवाइजर की जरूरत है। प्रकृति तो उसी का तत्व है। तीन अनाथ सत्ता है। जैसे तो प्रकृति की सहायता से ऐसे तो जीव को भी प्रकृति में बांध दिया। यहां पर जीवात्मा भी है। मतलब सुपरवाइजर मतलब कि अपना कोई नुमाइंदा बना करके उससे काम ऐसे नहीं करता। जैसे हम लोग करते हैं भाई फैक्ट्री चलाते हैं तो एक मैनेजर की जरूरत है। चपरासी की जरूरत है। उसकी जरूरत है। अच्छा। ऐसे नहीं करता। वो अपने कार्यों में अच्छा किसी की मदद नहीं लेता। तो एक बात कही जाती है कि जब जब धरती पर पाप बढ़ता है तो वो अपने पुण्य आत्माओं को भेजता है। पुण्य आत्माएं तो आती रहती हैं। भेजता क्या है? वो नहीं भेजता है। नहीं ऐसा नहीं कि वो कोई जो है अवतार लेकर के आता है। नहीं मैं अवतार क्यों नहीं कह रहा? पुण्यत्मा को तो पुण्य आत्मा तो समय-समय पे आती हैं। संसार को सही करती हैं। नहीं नहीं वो राम के रूप में, कृष्ण के रूप में वो व्यवस्था नहीं देखता। हां भेजता होगा। तो मतलब वह अपना काम करा रहा है। फिर क्या भेजकर पुण्य आत्माओं को भेज के करा रहा है। वो तो सबको

00:20:46:21 यह तो वो तो ईश्वरों का ईश्वर है। हम जैसे ईश्वर जीवात्मा को भी कहा ईश्वर हम और वो ईश्वरों का ईश्वर है। तो उसके कार्यों को करने से ही उसकी स्तुति या उपासना का फल प्राप्त होता है। किसी जैसे मैं तुम्हारी स्तुति करूं हम फिर प्रार्थना करता हूं। मांगता हूं। पहले कीर्तन करता हूं फिर मांगता हूं। आपकी उपासना यह है कि आपके अधूरे कार्य उनको पूरा करो। नहीं वो उपासना नहीं जैसे जैसे ईश्वर का एक कार्य है कि भाई वो मैनेज करता है पालन और पालन में धर्म धर्म संस्थापना वो पालन थोड़ी करा रहा है। नहीं नहीं धर्म संस्थापना भी आ गया। अब पालन करने में मैनेजमेंट कोई पुण्य आत्मा क्या पालन करेगी? हम धर्म की स्थापना के लिए धर्म संस्थापना उसका कार्य नहीं है। किसका? ईश्वर का। ईश्वर का कार्य यह तो स्वतंत्र है जीव नहीं धर्म संस्थापना उसका स्वतंत्र जीव है मैं पूछ रहा हूं धर्म संस्थापना उसका कार्य है कि नहीं धर्म संस्थापना उसने नियम बनाए और नियमों में चलोगे तो कर्मों का फल देगा नहीं उसका कार्य है कि नहीं अच्छा नहीं ईश्वर का कार्य नहीं है तो उसने ही तो धर्म संस्थापना की ना फर्स्ट टाइम जब वो ऋषियों के उसमें आ के अंतःकरण में धर्म दिया धर्म संस्थापना कर दी ना ज्ञान दे दिया सिलेबस दे दिया वही तो धर्म धर्म संस्थापना है नहीं ज्ञान देना

00:22:02:04 धर्म संस्थापना जैसे मैंने मैंने ऐसा सुना था कि आर्य समाज के अनुसार वो ये जो महापुरुषों का आना ईश्वर के द्वारा व्यवस्थित बताता है कि जब जब धर्म की हानि होती है तो ईश्वर पुण्य आत्माओं को भेजता है स्वयं नहीं आता अवतार नहीं लेता हां ये तो खैर इसका श्लोक है महाभारत का धर्म संस्थापना जैसे हमने कहा कि सर्वशक्तिमान है मगर सर्व का मतलब ये नहीं है कि वो किसी सब कुछ करे मगर हम कहते हैं कि सर्वज्ञ है ईश्वर सर्वज्ञ है तो हम वहां मानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं जो ईश्वर को ना ज्ञात तो तो वो सर्वज्ञ हो गया। फिर हम कहते हैं कि वो सर्वव्यापक है। तो हम कहते हैं कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहां ईश्वर ना हो। है ना? तो यानी कि जब सर्वव्यापक में सर्व आ रहा है तो हम ले रहे हैं कि सब कुछ। सर्वज्ञ में सर्व आ रहा है तो हम सब कुछ ले रहे हैं। जब सर्वशक्तिमान में सर्व आ रहा है तो हम कह रहे हैं कि नहीं नहीं वो अपने कार्य खुद कर सकता है। इसका क्या करें? यह तो परिभाषाएं ऋषि ने दी है ऋषि दयानंद ने कि वह अपने कार्य में किसी की मदद नहीं देता। आर्य समाज के दूसरे नियम में यह शब्द मदद लेना सिद्ध हो रहा है ना वो पुण्य आत्माओं को भेज रहा है वो प्रकृति की मदद ले रहा है प्रकृति की मदद क्या प्रकृति तो उसी के नियंत्रण में तो है नियंत्रण में तो वो भी है चतुरासी ऐसे तो वो बहुत सारे प्रकृति की मदद ली है उसने हम और

00:23:17:06 प्रकृति के द्वारा इसमें जीव भी है और प्रकृति भी है दोनों से शरीर बना है ये प्रकृति का नहीं मैं कह रहा हूं जैसे वहां पर प्रकृति और जीव के अलावा कुछ है ही नहीं जो ईश्वर किसी की मदद ले पाए और जो है उसकी वो मदद ले रहा है मतलब मतलब उससे उसका भी यूज़ कर रहा है। और अगर ये कहें कि नियंत्रण में है तो नियंत्रण में तो चपरासी भी है, प्यून भी है। जी। अच्छा छोड़िए दूसरा करते हैं। एक ये वाला सवाल ले लेते हैं। एक बहुत जिज्ञासा आती है कि ईश्वर सब जगह सर्वव्यापक है। एक रस है। जो सब जगह है वो एक जगह कैसे आ सकता है? अवतार में है ना? ईश्वर तो एक रस है। तो यह दिक्कत आती है कि जैसे ईश्वर जब सब जगह समान रूप से है तो किसी एक जगह पर वह मूवमेंट यानी कि बल कैसे लगाता है? कहने का मतलब यह है कि बल में और ईश्वर में कोई अंतर तो है नहीं। शक्ति और ईश्वर एक ही है। है ना? तीसरा तत्व तो है नहीं। एक एक जड़ है प्रकृति। है ना? तो शक्ति और शक्तिमान एक है। तो जैसे कि मान लीजिए यह मान लीजिए पृथ्वी का वह है पिंड है ना तो इसमें बल लगा। इसके अंदर भी ईश्वर है। इसके बाहर भी ईश्वर है। है ना? तो ईश्वर ने अपने आप को एडजस्ट

00:24:32:21 किया कि अंदर वाला जो हिस्सा है वो एक्टिवेट ना हो। बाहर वाला एक्टिवेट हो। तभी तो पृथ्वी में बल लगेगा। है ना? तो ईश्वर जब सब जगह बराबर रूप से है तो कहीं पर कम कहीं पर ज्यादा कहीं पर बिल्कुल बल ना लगाना यह कैसे हो रहा है का हो रहा है भाई पृथ्वी जब यह है पृथ्वी ये है और ईश्वर ऐसे बल लगा रहा है तो इसके इधर जो ईश्वर है वो तो बल नहीं लगा रहा ना वो भी बल लगाएगा वो भी बल लगाएगा तो इधर ही लगेगा बल ईश्वर इधर अलग है इधर अलग है कोई नहीं अलग नहीं कह रहा हूं मैं बराबर ईश्वर ईश्वर बराबर है ईश्वर तो ठसाठस प्रोग्राम ठसा हिरण्य गर्भ समवर्ता उसके गर्भ में सारा संसार है जी जी जी जी तो उसकी तो कोई ऐसी जगह है ही नहीं जहां विद्यमानता ना हो हां तो वो जब कहां बल कहां से वो जब इधर से लगा रहा है वो जब एक रस है तो वो अपने आप को कहीं पे चालू कर रहा है ना जैसे कि मान लीजिए यह पृथ्वी है और पृथ्वी के बगल में जुपिटर है मान लीजिए ठीक है वो यहां पे धक्का दे रहा है यहां नहीं दे रहा है यहां तो धक्का दे रहा है यहां नहीं दे रहा तो यानी कि जो उसकी एक रास्ता यहां पे एक्टिवेट है। यहां पे नहीं एक्टिवेट है। ये तो भंग हो रही है एक रास्ता। मेरी समझ नहीं समझ पा रहे। मेरी बात मैं बताता हूं।

00:25:47:27 मैं एक्चुअली बिल्कुल स्वस्थ नहीं हूं। आप लंबा खींचते चले जा रहे हैं। चलिए ठीक है। कोई बात नहीं। आपने इतनी देर बात की अच्छा लगा। और ठीक है। जय श्री राम। नमस्कार। हमारा थोड़ा सा वो रहता है कि ना जैसे कि हम आप लोगों से चर्चा करते हैं तो हम ये सीखते हैं कि हम नास्तिक वो कैसे हां ना वो तो बात सही है लेकिन मैं एक्चुअली में गोल ब्लैडर का हुआ ऑपरेशन और उसके टाके कटवा के सीधा चला फिर भी एक काम और जो दिल्ली से वो दिमाग में यही चलिए कोई नहीं बिल्कुल मेरा मेरा प्रश्न बस यही था मैं समझा देता हूं आप उसको उत्तर नहीं देना आपको जैसे कि हमने कहा कि ईश्वर भैया वो जरा ये ये हेट उठाना जरा टोपी उठाना इधर लाओ हां जैसे मान लीजिए ये एक वस्तु है ठीक है ईश्वर इधर भी है और ईश्वर इधर भी है यहां सब जगह मेरे अंदर भी है बाहर भी है सब जगह है अब अब ईश्वर को सृष्टि निर्माण करना है मान लीजिए इस हेट का उसमें उपयोग है मान लीजिए तो ईश्वर को इस दिशा में इसको ले जाना है इस पिंड को ठीक है तो ईश्वर तो यहां भी है मगर यहां पे उसको नहीं ले जाना है यहां पे मैं हूं इसको कहीं कुछ नहीं करना इसको ईश्वर को केवल इस इस पिंड

00:27:03:03 को ही सरकाना है। तो ईश्वर क्या करेगा कि यहां पे तो वो क्या कहते हैं? कुछ नहीं एक्टिवेट नहीं होगा। यहां पे वो बल लगाएगा। तभी तो सरकेगा और अगर वो पूरा एक्टिवेट हो गया एक साथ पूरा एक्टिवेट हो गया तो मैं भी हिलूंगा। आप भी हिलोगे सब कुछ हिलेगा। मगर उसको सब कुछ नहीं हिलाना है। उसको केवल इस पिंड को हिलाना है। तो जब वह पिंड को हिलाएगा यानी कि यहां पर ईश्वर एक्टिवेट नहीं है। यहां पर नहीं है। केवल इस पिंड के बाहर एक्टिवेट है और उसको धक्का मार रहा है। और जब ऐसा है तो उसकी एक रास्ता भंग हो रही है। क्योंकि कहीं कम कहीं पे ईश्वर निष्क्रिय है। कहीं पे ईश्वर सक्रिय है। तो उसके एक रास्ता थी। एक समान बिल्कुल बराबर वो सब जगह है। वह भंग हो रही है। यह सवाल था मेरा। है ना? चलिए फिर बहुत अच्छी चर्चा रही। आप लोगों को काफी कुछ जानने को मिला होगा और अभी हम लोग थोड़ा सा उस पर भी बात करना चाहते थे आचार्य जी से जो क्या कहते हैं वर्ण व्यवस्था पर आचार्य जी का स्वास्थ्य खराब है। अभी ऑपरेट हुआ है इनका तो इस कारण से अभी असमर्थ हैं। संभवत भविष्य में कभी हमारी फिर से पुनः एक बार चर्चा होगी। जय श्री राम। नमोस्तु।

00:28:22:10 [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 28:24 · 25 Feb 2026

चर्चा के बीच में बिगड़ गया आचार्य जी का स्वास्थ्य

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