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00:00:03:03 शिव जी मेरा मतलब आपसे एक छोटा सा विरोधाभास था मतलब किस बात कहूं मैं वो कुछ दिनों पहले जो आपका चर्चा हुआ था ना निर्भय आर्य के साथ हां वहां से एक विषय को लेकर बताएं अच्छा तो मतलब ईश्वर के स्वरूप को लेकर है तो बताऊं यहां पर तो जब बोल दिया तो बताइए नहीं तो बोलते नहीं तो बात अलग थी। अच्छा ठीक है। तो मतलब जो आपने कहा था ना कि ईश्वर जो है आंखों का विषय बन जाता है तो जैसे खिड़की है और बाहर का आकाश है तो फिर दोनों में ही तो ईश्वर मतलब जो दिख रहा है वो तो ईश्वर नहीं मतलब जो शरीर ही शरीर ही दिख रहा है। ईश्वर तो नहीं दिख रहा।
00:00:55:15 माया ही दिख रहा है। दोनों के साथ प्रतीत हो रहा है कि नहीं ईश्वर जैसा? अब वो तो ईश्वर ही हमें आकर ज्ञान दे रहे हैं। उसका मैं खंडन नहीं करता। लेकिन वो वो जो प्रतीत होना है तात्विक रूप से वो वो प्रतीत हो रहा है और व्यवहारिक रूप से वो दिख रहा है। जैसे व्यवहारिक रूप से आपको कोई माता दिख रही है। हम और वो मुक्तिदायक है इसलिए उसे ईश्वर कहा जाना उचित है। हम नहीं आपने जो कहा था ना कि जो खिड़की से जो हमें आकाश दिख रहा है वो आकाश भी तो मतलब माया ही है। अरे भाई तो मैंने आपको कम शब्दों में ज्यादा बात कह दी है। उसको आप अच्छे से समझने का प्रयास करिए। मैंने कहा प्रतीत हो रहा है। मैंने कब कहा कि वही दिख रहा है। मैंने कहा प्रतीत हो रहा है ना? तो तात्विक समझ गया। तात्विक अर्थ क्या है? प्रतीत हो रहा है। व्यवहारिक अर्थ क्या है? पारमार्थिक अर्थ क्या है? प्रतीत हो रहा है। और व्यवहारिक अर्थ क्या है? ब्रह्म की दृष्टि से क्या है? कि इसको भैया मेरा जो है जो है ऐसा लग रहा है कि भगवान ने अवतार ले लिया। भगवान है हम ये ब्रह ये ब्रह्म की दृष्टि से और हमारी दृष्टि से क्या है कि हम भगवान ने अवतार लिया तो हमने भी तो कहा कि जितना
00:02:11:06 जितना किसी की माता किसी की बहन इत्यादि सब वो है तो उतना ही भगवान का अवतार लेना भी क्या कहते हैं हमने भी तो यही कहा है ना कि व्यवहार के व्यवहार में आता है और व्यवहारिक जगत तो है ही है प्रपंच का दूसरा नाम रूपी संसार का दूसरा नाम तो इतने दिन हो गए आपको जुड़े हुए व्यवहार और परमार्थ के हिसाब हिसाब से तो आपको समझ लेना चाहिए था। ये तो नहीं मुझे पता तो है लेकिन फिर भी थोड़ा सा मतलब कंफर्म कर लेते हैं। आप ये कहना चाहते हैं कि हम परमार्थ की दृष्टि से बता रहे हैं कि भगवान जो है एक देश जो व्यवहार में आते हैं लोगों के। हां हां हां परमार्थ की दृष्टि से हम यह कह रहे हैं वहां पर नहीं मतलब क्या है मैं आपको मैं पूरा ही बता देता हूं कि मैंने गुरुदेव के एक वीडियो में सुना था कि जैसे पानी है ना पानी जमकर बर्फ बन जाता है ठीक वैसे ही निर्गुण निराकार ब्रह्म तत्व ही साक्षात मतलब स्वयं को ठोस बनाकर एक जगह पर आ जाते हैं। तो यही चीज मुझे थोड़ा सा गलत लगा था कि आकाश को जैसे आप कभी भी जमा नहीं सकते। वैसे निर्गुण को भी आप डायरेक्ट कभी जमा नहीं सकते।
00:03:20:14 आकाश अगर आएगा आकाश अगर आएगा तो आकाश छूने वाली चीज तो है नहीं जैसे पानी छूने वाली चीज है। पानी तो हमारे स्पर्श का विषय हो जाएगा ना। तो यही मेरा सवाल था कि पानी बर्फ बनने से पहले भी आंखों का विषय और छूने का विषय दोनों है। तभी वह बर्फ बनने के बाद छुआ भी जा सकता है और देखा भी जा सकता है। लेकिन निर्गुण जम जाने के बाद भी देखा नहीं जाएगा और छुआ भी नहीं जा सकता। इसलिए निर्गुण का जमना भी सिद्ध नहीं होगा। नहीं तो हम बता रहे हैं आपको कैसे होगा। कि निर्गुण पहले सगुण का अवतार लेता है। ठीक है? उधर से देखेंगे तो वो निर्गुण जो है सगुण नहीं हुआ है। मगर उसने सगुण रूपी अवतार लिया है और सगुण होना ही अवतार का निरूपक है। हम अन्यथा जो है अ आप जो है अगर निर्गुण को सगुण बनाएंगे तो वो तो नित्यता उसकी भंग हो गई। शाश्वतता भंग हो गई। बदल रहा है उसका रूप परिवर्तनशील हो गया। जी जी तो उसकी तो निर्गुण निर्गुण रहते हुए भी एक और रूप बदलता है जो सगुण है। निर्गुण
00:04:35:20 सगुण में परिवर्तित नहीं होता है। समझ रहे हैं? निर्गुण सगुण में परिवर्तित नहीं होता है। वो एक और रूप बनता है जो सगुण है। हम तो यानी कि जब वो सगुण हुआ तब ऐसा नहीं है कि उसका जो निर्गुण वाला रूप था वो खत्म हो गया। समझ रहे हैं? निर्गुण यही तो विपवाद है हां तो निर्गुण जो है अपनी जगह पर है और तब सगुण सगुण जो है अवतरित अब जो सगुण अवतरित हुआ तो जो सगुण अवतरित हुआ है तो सगुण अपना कार्य में एक जगह इकट्ठा होने से पहले अथवा कुछ भी कार्य करने से पहले वो भी तो निर्गुण की तरह ही हुआ समझ रहे हैं जैसे कि ये मान लीजिए ये निर्गुण है। ठीक। इसने अपनी स्थिति को बिना छेड़े हुए एक और पहले रूप लिया पूरे संसार में फैला हुआ। तो यह भी तो सबसे पहले एक रस ही है। सबसे पहले क्या है? ये भी एक रस है। उसके बाद यह ऐसा रूप है जो कहीं पे जम जाए और कहीं पे ना जमे। ठीक। कहीं पे पृथ्वी इत्यादि के लिए धक्के का विषय बन जाए। वो समझाया कई बार। प्रकाश के मार्ग में प्रकाश के मार्ग को बाधित करने योग्य बन जाए और कहीं पे ना बने। तो अब यह जो सगुण है सगुण क्यों है? क्योंकि यह कहीं
00:05:50:24 पर अपने आप को इकट्ठा कर रहा है। कहीं पर नहीं कर रहा। इसलिए सगुण है। मगर वो इकट्ठा इत्यादि अगर ना हो तो ये भी तो एक पहले एक रस है सबसे पहले। मगर ये परिवर्तनशील है। समझ रहे हैं? ये परिवर्तनशील वो तो माया के वजह से परिवर्तनशील है। हां हां तो वो एक अलग बात है कि वो कैसे है परिवर्तनशील? वो एक अलग बात है। डायमेंशन चेंज किया। माया रूपी डायमेंशन बनाई पहले। ठीक है? वो कैसे लिया अवतार वह उस पे आएगा कि अवतार कैसे लिया तो माया से लिया है ना मगर जब हम यह व्यवहारिकता देख रहे हैं ना कि पृथ्वी को धक्का कैसे लगा तो धक्का ऐसे ही लगा कि शक्ति शक्ति पूरे में विराजमान है सगुण साकार की अब वो सगुण साकार अब सगुण निराकार अब वो सगुण निराकार कहीं पर विषय कहीं पर व्यवहार का विषय बना और कहीं पे नहीं बना अभी तक वो अदृश्य रहते हुए उसने ऐसा किया ठीक है अब वो क्या किया अब वो वो प्रकाश के मार्ग को बाधित करने लगा। वो उसने अपना ऐसा इकट्ठा हुआ कि अब वो प्रकाश के मार्ग को बाधित कर रहा है। जब वो प्रकाश के मार्ग को बाधित कर रहा है तो प्रकाश तो वहां पर हमको कुछ तो आंखों से रोशनी उसप पड़ेगी और वापस आएगी। अब बस इतनी बात रह गई कि उसमें नाक, कान, आंख ये सब कैसे दिखाई दे
00:07:05:25 रहा है? चलो ठीक है। प्रकाश वहां से टकरा के वापस आएगा। ठीक है? मगर उसमें ये जो डिजाइनिंग दिख रही है, मतलब ये शरीर के अवयव दिख रहे हैं, यह सब कैसे दिख रहे हैं? तो यहां पूरा शरीर का त्वचा जो दिख रहा है, शरीर का जो पूरा त्वचा दिख रहा है एक त्वचा दिख रही है, रंग दिख रहा है, उनके वस्त्र दिख रहे हैं, आभूषण दिख रहे हैं। ये सब दिख रहा है ना भगवान के तो वो कैसे वो विशुद्ध माया से स्वरूप होता है। तो भगवान कह रहे मैं योग माया का वो लेकर के नॉर्मल माया नहीं भटकाने वाली माया नहीं छुड़ाने वाली माया। जो निकालने वाली विशुद्ध सत्वगुणी माया विशुद्ध सत्वगुणी माया उसका आलंबन लेकर के वो अपना यह स्वरूप तैयार। ठीक है? तो इसमें जो आकाश का जो मामला था वो सिर्फ उदाहरण देना गोचर और अगोचर के लिए था। गोचर और अगोचर के लिए उदाहरण देना था कि जैसे कि क्या कहते हैं पूरे व्यवहारिक रूप से वास्तविकता तो ये है कि आकाश जो है दिख ही नहीं रहा है। मगर व्यवहारिक रूप से हम लोग व्यवहार में ये आता है कि हां हमने आकाश को देखा। ठीक है? हम आकाश को निहार रहे हैं। तो व्यवहारिक रूप से जो आकाश को निहार रहे हैं जब हमने उसको निहारना
00:08:21:06 मान लिया तब हम उदाहरण दे रहे हैं कि जब हम पूरे जो पूरी तरफ चारों तरफ जो आकाश फैला हुआ है उसको जब हम एक बंद कमरे की खिड़की से देख रहे हैं तो वो चौकोर दिख रहा है। मतलब जब हमने ये मान लिया कि आकाश दिख रहा है। अगर आकाश का दिखना ही नहीं माना तो हम वो उदाहरण हटा देंगे। दूसरा दिखाएंगे। दूसरा उदाहरण देंगे। मगर हम ये उदाहरण दे कब रहे हैं? जब हमने हमें हमने आकाश का नीला नीला आकाश का दिखना स्वीकार कर लिया वो दिखता है कि नहीं दिखता वो एक अलग बात है। हमने हमने क्या किया कि हमने मान लिया कि मान लो कोई ऐसी चीज है पूरी दुनिया में फैली हुई है। ठीक हम जो आंखों का विषय मैं आपको एक चीज मैं आपको एक चीज बताता हूं। सुनिए तो पूरी दुनिया में फैली हुई है कोई चीज। आकाश हटा दीजिए। मान लीजिए एक साड़ी है जो पूरी दुनिया में फैली हुई है। ठीक। तो अब वो साड़ी हमें चौकोर दिख सकती है क्या? नहीं दिख सकती। मगर हम बंद कमरे की खिड़की से देखेंगे तो वो क्या दिखेगी? चौकोर दिखेगी। ये उस उस सर्व्यापी साड़ी का चौकोर अवतार है। ये कहने का अभिप्राय था वहां पर। समझ रहे मेरी बात? वहां पर नहीं मैं आपको थोड़ा सा बताऊं। हां। मैं अपनी बात मैं अपनी बात पूरी कर कि वहां पर ये जो उदाहरण देना था ये तब तब
00:09:36:12 दिया हमने जब हमने क्या कहते हैं? आकाश को देखना स्वीकार कर लिया। अगर देखना स्वीकार नहीं करेंगे तो हम और कुछ ले लेंगे वहां पर। किसी और को मानक रूप में फैला देंगे सब जगह। जैसे अभी मैंने साड़ी को फैलाया और तब कहेंगे कि अब मान लो पूरी दुनिया में एक साड़ी फैली हुई है। पूरे संसार में फैली हुई है जो सब तरफ है। तो क्या उसका तो आप जो है रूप देख सकते हैं? नहीं देख सकते क्योंकि वो तो सब तरफ फैली हुई है। तो कैसे उसका उसका अवतार क्या होगा? कि हम अगर बंद कमरे की खिड़की से देखेंगे तो जो चौकोर साड़ी दिखेगी वह उसका अवतार है। उसमें उसमें साड़ी के उस अवतार में और उसमें जो साड़ी पूरे संसार में फैली हुई है उसमें और उसमें साड़ी क्या अंतर है कि वो गोचर और अगोचर ये जो है ये केवल जो है क्या कहते हैं हमें दिख रहा है चौकोर रूप में और बाकी का ढका हुआ है। यह जुड़ा हुआ उसी से है। मगर बाकी का ढका होने के कारण हमें यह एक रूप रंग में एक निश्चित रूप आकार में दिख रहा है। अब बस अवतार हो उसमें बात ये आ जाती है कि सर्वशक्तिमान अब बात ये आ जाती है कि भाई तुमने पूरा ईश्वर तो देखा नहीं। पूरी साड़ी तो देखी नहीं। ठीक है? तो ये काउंटर आ जाता है कि पूरी साड़ी नहीं देखी।
00:10:51:25 एक मिनट विनीत जी। अभी मैसेज वगैरह अभी रोक दीजिए। आपने पूरी साड़ी तो देखी नहीं तो फिर आप इसको जो है साड़ी का अवतार क्यों कह रहे हो? तो बात यह इसलिए है कि इसको हम साड़ी इसलिए कह रहे हैं। पूरी साड़ी नहीं देखी है। फिर भी हमने इसको साड़ी इसलिए कहा हां साड़ी का अंश क्यों नहीं कह रहे हो? है ना या अपूर्ण क्यों नहीं कह रहे हो। तो इसलिए कह रहे हैं क्योंकि ये जो साड़ी का हिस्सा जो हमें दिख रहा है, ये वो सब कुछ कर सकता है जो जो पूरी साड़ी कर सकती है। ठीक है? इस कारण से अवतार के रूप में उसके स्वीकार किया गया। अगर ये वो कुछ ना कर सकता होता जो पूरी साड़ी कर सकती है तो फिर हम उसको केके अवतार के रूप में स्वीकार ना करते। इसके लिए मैंने वहां पर उदाहरण भी दिया था कि इंटरनेट के जरिए जो ये एप्लीकेशनेशंस वगैरह हैं वेबसाइट्स वगैरह पूरी दुनिया में फैली हुई है। फिर एक ईरा इत्यादि के रूप में इनका अवतार होता है। जो वो सारे कार्य कर सकता है जो वो वेबसाइट पूरी दुनिया में फैली हुई कर सकती है। तो उसको उसका अवतार माना जाएगा। अगर उसको वो नॉलेज नहीं हुई जो पूरी दुनिया में फैली हुई वेबसाइट को जो नॉलेज है तो फिर उसको उसका अवतार नहीं मान सकते आप। तो जो भगवान का अवतार होता है उससे आप कहो कि अमेरिका में इस समय बारिश करवा दो वो करवा देगा क्योंकि वो उससे कनेक्टेड है। है ना? हम ये चीज
00:12:07:06 तो आप क्या कहते? जी बताइए हां हां कि मैंने अब तक जो समझा आपके इस कथन को कि जैसे निर्गुण निराकार रूप में आकाश जो स्पेस है हम आपके सभी के आसपास है लेकिन जो नीला आसमान दिखता है वो सगुण निराकार रूप है और खिड़की आ जाने से वो सगुण साकार दिखता है ऐसा ही ना हम ठीक है बस क्लियर हो गया ये ये भी तब है जब हमने ये माना कि आकाश दिख रहा है अगर आप आकाश का दिखना ही नहीं मानते जैसे उस दिन निर्भय ने काउंटर किया यदि आप आकाश का दिखना ही नहीं मानते तो उसको हटा दो। एक दूसरा उदाहरण ले लेते हैं। साड़ी को फैला दो। पूरी दुनिया में एक साड़ी से कवर कर दो। पृथ्वी से 50 क्या कहते हैं? दो-ती लाख किलोमीटर दूर। ठीक? या जो भी कुछ किलोमीटर मान लो। उसमें एक साड़ी से कवर कर दो पृथ्वी के चारों ओर। हम अब वो साड़ी पूरी पूरी पृथ्वी के चारों ओर फैली हुई है। तो हम उस पूरी साड़ी को तो देख नहीं सकते। मगर जब हम अपने बंद कमरे की खिड़की से देखेंगे उस साड़ी को तो क्या होगा? साड़ी का अवतार चौकोर हम बस उस अवतार में भगवान के अवतार में अंतर ये होगा कि जो पूरी दुनिया को कवर किए हुए जो साड़ी है
00:13:22:12 वो जो सब कुछ कर सकती है वो चौकोर साड़ी जो अंश मात्र है वो नहीं कर सकती है ना हम क्योंकि हम वो अवतार वो नहीं है मगर क्योंकि भगवान वो कर सकते हैं इसलिए वो हम जो है उनके अवतार कहलाते हैं। अगर वो ये कहे नहीं नहीं पूरे के पूरे ईश्वर ने वो काम नहीं किया उनके एक अंश ने वो काम किया है तो भैया पूरा का पूरा ईश्वर तो कभी काम करता ही नहीं है सगुण निराकार भी तो किसी एक जगह पर विषय बनता है व्यवहार का किसी दूसरी जगह नहीं करता फिर तो आप ये कह दो कि ईश्वर ने दुनिया भी नहीं बनाई क्योंकि पृथ्वी की ईश्वर है ही नहीं हां फिर तो ये कह दो ना ईश्वर है ही नहीं देखो मैं बता रहा हूं जब भी हमारा विरोध किया जाएगा उसके अ मूल में नास्तिकता निकल आएगी जैसे जैसे मान लीजिए हमारी परंपरा का विरोध करना शुरू किया। अब मान लीजिए हमने जो कहा कि भाई तुम्हारे पास वेद कहां से आए? अब उन्होंने कहा कि भाई हमारे पास जो है हमारी दो गुरुओं से पहले की वो नहीं है। ठीक। अब वो क्या पलट के कहेंगे तुम्हारे पास भी तो गोविंदपाद, गॉड पाचार्य इत्यादि या सुखदेव जी तुम्हें आए। ये सब तो तुम लीला बताते हो। उसका प्रमाण बताओ। वो भी तो ये कहेंगे। मगर बात यह है कि हमारी हिस्ट्री जो
00:14:37:22 प्राप्त हिस्ट्री प्रमाणिक हिस्ट्री तुमसे पुरानी है। तुमसे पुरानी है। तो वेदों के लिए तुम किस पर आश्रित हो गए? अगर तुम्हें हमारे अनुसार तुम जो है वेद का गलत अर्थ करते हो। मगर तुम खुद को वैदिक तो कह रहे हो ना। तो वेदों के लिए तुम्हें आश्रित तो हम पर ही होना है। अब यदि तुम हमारी भी परंपरा को खंडित कर दोगे और प्रश्न उठा दोगे तो ज्यादा ज्यादा क्या होगा? देखो हम अपने आप को निकाल लेंगे। मगर तुम्हारे दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो तुमने वेदों पर अप्रामाणिक होने का कि यह ईश्वर के हैं। इसमें कोई प्रमाण नहीं है। बस हम मान रहे हैं। ठीक है? जब आप शंकराचार्य पर भी उंगली उठा देते हो तो क्या हुआ? आपने अपनी वेदों की प्रमाणिकता पर उंगली उठा दी। और जब आपने शंकराचार्य पर उंगली उठा दी, वेदों की प्रमाणिकता पर उंगली उठा दी और आपसे कहा जाए भाई तुम तो हमारे ऊपर निर्भर कर रहे हो। तो आदमी सामने वाला कहेगा नहीं। अब जब तुमने हमारा छेड़ा तो हम भी तुम्हारा छेड़ेंगे। तो क्या कर रहे हो तुम? वैदिक धर्म को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हो ना वह बात और है हम होने नहीं देंगे वह बात एक अलग है कर तो तुम यही रहे हो ना वैदिक वैदिक धर्म को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हो क्योंकि तुम्हारे पास अपनी परंपरा नहीं है इसलिए जिसकी है उसको भी तुम नष्ट करोगे हां बिल्कुल है कि नहीं तुम्हारे पास अपने 10
00:15:52:26 गुरुओं के नाम नहीं है पीछे के इसलिए जिसके पास 1450 गुरुओं के नाम है पीछे के तुम उसके और पहले जाकर के उसकी परंपरा को नष्ट करने का प्रयास करोगे तो क्या करोगे तुम कि तुम जो है अगर तुम्हारी प्रामाणिकता पर बात आएगी तो तुम्हें कोई मतलब नहीं है तुम पूरे सनातन पर प्रहार करो तुम्हें कोई मतलब नहीं तुम पूरे वैदिक धर्म पर प्रहार करो तुम जो है उसको नष्ट करने के पीछे पड़ जाओगे तो यह होता है कि जब भी हमारे जो किसी भी विरोधी के उसमें आप मूल में जाएंगे वो नास्तिकता पर उतर आएगा जी हम ठीक है जी मैं एक छोटा सा बात कह दूं एक छोटा सा बात यही चीज आपने बहुत अच्छा कहा। यही चीज मैं उनके सिद्धांतों में भी देखता हूं कि वो अपने सिद्धांत से दूसरों का बस खंडन कर पाते हैं। लेकिन उनके सिद्धांतों से ईश्वर की सिद्धि ही नहीं होती। ना नहीं होगी। नहीं होगी ना। जब मैंने कितनी बार उसी लाइव में पूछा था कि निर्गुण सगुण कैसे बना? आज तक उत्तर नहीं है। निर्गुण सगुण कैसे बस खंडन मूलक है या फिर आपके सिद्धांत से इस बार भी सिद्धांतों की आवश्यकता है ही इसलिए कि वो ईश्वर को बात आगे नहीं बढ़ी है। अभी तो आप लिखते जाइए कि पूजा क्यों करनी
00:17:07:27 है? भक्ति क्यों करनी है? ईश्वर की ये तो बताओ। क्यों करें भक्ति? तुम तो कह रहे हो कि कुछ देगा नहीं। तो वो तो एक बिल्कुल भाई बौद्धों के यहां क्या मान्यता है? ये करोगे तो ये होगा। ये नहीं करोगे तो वो होगा। ईश्वर की कोई आवश्यकता ही नहीं है। इनके यहां भी तो ईश्वर रखा तो है। आवश्यकता तो नहीं दिख रही कोई। क्योंकि ईश्वर कुछ देगा नहीं। अच्छा। फिर एक जगह लिख दिया है कि निराभिमानता आएगी। अगर भक्ति करोगे तो निराभिमानता आएगी। तो क्या चाहते हो? व्यक्ति पहले सोचे कि मुझे करने से ही कुछ मिलेगा। ठीक? उसके बाद फिर वो निराभिमानता सोचे कि मुझे मैंने कुछ नहीं किया। ईश्वर ने दिया तो तुम पहले तय कर लो कि करना क्या है? सोचना क्या है? ईश्वर ने दिया है कि नहीं दिया है। हां बिल्कुल। भाई निरभमानता के लिए अगर भक्ति करनी है तो ये मानना पड़ेगा ना सब कुछ ईश्वर से आ रहा है। मैंने कुछ नहीं किया। तो हम जब ऐसा सोच रहे हैं तो तुम उस पर अंकुश लगा रहे हो। हम जी है ना जब हम ऐसा सोच रहे हैं कि सब कुछ भगवान ही दे रहे हैं। हम कुछ नहीं दे रहे। यही तो सुवाया जा रहा है भक्ति से हमें। हम तो आप उसका खंडन कर रहे हो। फिर कह रहे हो नहीं निराभिमानता होनी चाहिए। निरभिमानता यानी कि अहमभाव नहीं होना चाहिए। मैंने कुछ किया।
00:18:23:18 हम तो तुम तुम किसी एक बात पे ठहर ही नहीं रहे हो। मतलब जो चीज हम सोचे तो वो गलत लेकिन वो सोचे तो वो सही। हां उसी को दूसरे शब्दों में तुमने कह दिया तो ठीक है। खंडन क्यों कर रहे हो? मत करो ना भाई भगवान से ही मिलता है। व्यवहारिकता यही है कि हमने भगवान की भक्ति की तो हमें कुछ मिला। वो अंदर गुण अर्थ है, तात्विक विवेचना है। आदि दैविक आदि आध्यात्मिक अर्थ अलग है। मगर व्यवहारिक अर्थ क्या है? आदि भौतिक अर्थ क्या है? हमने भगवान से मांगा। हमको मिला। जी ये बात है। जी। ठीक है। धन्यवाद। आवाज आ रही है जी। अभी जी जैसे आप आप पढ़ रहे थे उसमें ये लिखा हुआ था कि जो यहां पे सबसे सुख समझता है वो सबसे बड़ा मूर्ख है। तो क्या हम यही ले चले कि यहां पे सिर्फ दुख ही दुख है। नहीं पूरी बात आप नहीं बता रहे हैं। क्या जो एक सुख समझता है वो पाप का कुछ बात को लेकर कह रहे हैं कि आपने पहले कहा था कि
00:19:27:15 क्या कहा था? संसार में दुख ही दुख है। संसार में दुख तो हम इसी दृष्टिकोण इसी दृष्टिकोण को ले चले। देखिए दुख का नाम संसार है। इस बात से कोई मुकर नहीं सकता है। जब तक आपको भेद बुद्धि प्राप्त है। तो कुछ नहीं होगा तो अपने वहां ना होने का दुख हो जाएगा। कुछ नहीं होगा तो अपने तब ना होने का दुख हो जाएगा। कोई मर नहीं रहा है, भूखे नहीं मर रहे हैं। कोई तकलीफ नहीं है। कोई मार नहीं रहा, कोई पीट नहीं रहा, कुछ नहीं हो रहा। तो बैठे-बैठे मैं वहां क्यों नहीं हूं? इसी बात का दुख हो जाएगा। दुख का नाम संसार है। ये बात तो सत्य है। मगर करें क्या? इसको आपको एक ताले में बंद करना होगा। जैसे कि अहम ब्रह्मास्मि इसको आपको एक ताले में बंद करना होगा। इसको आपने जान लिया जो परम तत्व है उसकी सत्ता को समझने के लिए। मगर इसको फिर एक ताले में बंद करना पड़ता है। जैसे बिटिया कल ब्याह के जाएगी। इसको आपको एक ताले में बंद करना पड़ेगा। पृथ्वी गोल है। इसको आपको एक ताले में बंद करना पड़ेगा। फिर क्या काम कैसे करें कि भैया पृथ्वी चपटी काम ऐसे। बिटिया को बिटिया का पालन पोषण कैसे करें? भावनाएं कैसे व्यक्त करें बिटिया को? कि बिटिया तो हमारी
00:20:42:21 है। कहीं नहीं जाएगी। ठीक है? उसी प्रकार से संसार में दुख ही दुख है। मगर उसको तो हमने ताले बंद कर दिया। जो सत्य है उसके बाद जो है इन चीजों पर ग्रहण इन चीजों को ग्रहण करें कि भक्ति करने से सुख प्राप्त हो सकता है इसी जीवन में। तो एक सत ही स्तर पर हमारी परतें जो होती है ना कई परतें होती हैं सोच की जैसे कि हमारे मूल में यह है कि भाई हम जो भी कार्य कर रहे हैं मोक्ष के लिए ही कर रहे हैं। सच्चिदानंद के लिए ही कर रहे हैं। जो धर्म को कर रहे हैं हम लोग सच्चिदानंद के लिए। पर शंकराचार्य जी ने इसको ही मना किया है। यह भी नहीं सोचना है कि हम मोक्ष के लिए कर रहे हैं। सोचना नहीं है। यानी कि ऊपरी सतह में जो सबसे ऊपर की सतह उसको यह नहीं बताना है। अपने मन को यह नहीं कहना है कि हम मोक्ष के लिए कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं? ईश्वर ने कहा है। एक जैसे नहीं किसी कप्तान ने कहा कि वो बरगद का पेड़ उखाड़ो। तुम उखाड़ पाओगे चाहे नहीं उखाड़ पाओगे। कप्तान ने कहा है उखाड़ना है तो उखाड़ना है तो हम उस बुद्धि से वह पेड़ उखाड़ रहे हैं। बस अगर इस तरह से चलोगे तो आप इस भवसागर को पार कर पाओगे। तो वो जो आपके जो अंतिम लेयर में जो मोक्ष बैठा हुआ है ना तो वहां तक पहुंच पाओगे। तो मोक्ष को हटा भी नहीं सकते और मोक्ष
00:21:57:22 को ऊपरी सतह सतह ही स्तर पर ला भी नहीं सकते। उसी प्रकार से यह वाला भी सत्य है कि दुख तो है संसार मगर इसके कारण अपने आप को निराशावादी हताश निराश नहीं बनाना है। ये आपने जान लिया क्योंकि आपको तात्विक विवेचना समझनी है संसार की। अब इसको एक ताले में बंद करिए। निचले स्तर की सतह में ले जाइए और ऊपरी सतह पर क्या है? नहीं यहां पर भी हम सुखी रह सकते हैं और सुखी रहते हैं। मन में मालूम है कि हम जब तक हम बंधन में तब तक हम दुख में है। सिंपल जब तक प्रपंच रूपी माया में तब तक हम दुख में है। मगर यहां पर भी भगवान का आलंबन ले लेने पर हमको जो है सुख प्राप्त होने लगता है। और उसी सुखी जीवन के साथ-साथ हम जो है एक दिन मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं। ठीक है।
00:22:43:03 हां जी भैया। जी ठीक है। देवांश जी बताएं। जय जय राम भैया आपके चरण चरणों में दंडवत प्रणाम मेरा जी मेरा भैया जैसे आप दो हफ्ते से वो वो नहीं हो पा रहा था प्रश्न उत्तर ही नहीं हो रही थी मेरे दिमाग में बहुत चल रहा था तो अच्छा हुआ कि आज हो गया मेरा एक प्रश्न था कि जैसे जैसे कहा जाता है कि हमारा सनातन धर्म है उसमें वो सबसे पुराना धर्म है इसीलिए वो सनातन है सनातन का मतलब शाश्वत लेकिन भैया जैसे हम लोग देखते हैं आजकल जैसे आप देखे होंगे आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट एएसआई ने बहुत सारी रिसर्च करी तो उन्होंने ये पाया कि ऐसे आदिवासी जो होते हैं ना स्टोन एज वाले वो उन लोगों के अवशेष दो लाख या एक लाख से एक लाख पुराने हो उनके अवशेष मिले हैं। लेकिन सनातन धर्म के ऐसे कोई अवशेष नहीं मिले कि जो एटलीस्ट दो लाख साल से पुराने हो। ठीक है ना? कोई मंदिर ऐसा मिला ना उसके बजाय बस इसीलिए वो कहते हैं कि सनातन धर्म ज्यादा से ज्यादा 5000 साल पुराना है। उससे ज्यादा पुराना है नहीं क्योंकि हमारे पास कोई प्रूफ नहीं है। ना कोई अवशेष है। मैंने आपको इस बारे में कई बार बताया है
00:23:59:06 कि आप इनपुट की बजाय आउटपुट पे ध्यान दीजिए। सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर की सिद्धि कौन कर सकता है? परम स्वतंत्र मोक्ष की सिद्धि कौन कर सकता है? मोक्ष किससे प्राप्त होना है? भाई व्यक्ति को इंटरेस्ट किसमें है? अगर हमारा बहुत पुराना है मगर मोक्ष नहीं दे रहा है। मोक्ष की बात ही नहीं कर रहा है तो क्या फायदा उसका? अब जब हमारे मोक्ष की बात वो कर रहा है। सर्वशक्तिमान ईश्वर की बात वो कर रहा है। हमारे पास शब्द प्रमाण है। शब्द प्रमाण है जो ये कह रहा है कि वो 1 लाख 1 करोड़ 97 वर्ष पुराना उसके नहीं मिले। अच्छा दुनिया में जो चीजें नहीं मिली है उन वो है ही नहीं। भाई अगर किसी भी आविष्कार का आप नाम ले लीजिए किसी भी अविष्कार का नाम ले लीजिए तो वह एक समय पर नहीं था बाद में तो हो गया इसका मतलब उसका ज्ञान पहले था ना कैसे हुआ तो जो आज नहीं ढूंढ पाई है अगर किसी दिन वो मिल गया अरे मिल गया अरे यही है पुराना लो तो इस कारण से हम अपनी मान्यताएं अपने बिलीफ अपने जो मोक्ष मार्ग है उसको प्रभावित करें तो चीज किस पर पॉइंट किस पर है कि मोक्ष की बात कौन कर रहा है? पर सर्वशक्तिमान ईश्वर
00:25:14:12 परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धन नया नई नियमावली आप बना लो ले आओ हम आपके हैं। अगर कोई लड़ाई हो रही है कि भाई तुम सनातनी नहीं अपने आप को फलाना कहो कि भैया जो है देवांश जी के द्वारा निर्मित देव धर्म देवांश धर्म या और कुछ बना लो। आप ले आओ। हम आपके विरोधी नहीं रहेंगे। तीनों चीजें हमें दे दो बस विरोध नहीं होना चाहिए उसमें इन तीन चीजों का यह जो तीन तत्व मगर यह तीन तत्व आप वेद वैदिक धर्म के बिना ले नहीं पाओगे आपको वेद की कॉपी करना ही पड़ जाएगा तो इसीलिए जो चीजें सिद्ध नहीं हो सकती ना उनकी तरफ से ना हमारी तरफ से समझ रहे हो ऐतिहासिक प्रमाणों पे हम अब मान लीजिए उन्होंने कहा कि भैया ये फलाने साइंस फलाने व्यक्ति ने इस युग में इस इस पर बात की थी ये हमारे पास वो है हमने कहा कि फलाने अब हमारे शब्द प्रमाण पर उन्हें नहीं विश्वास है। उनके शब्द प्रमाण पर हमें हमें नहीं विश्वास है। इसी पर जद्दोजहद करते रहो। कई वर्षों तक उससे होगा। तीसरी बात कि भैया सच्चिदानंद कहां है आपके पास? है ना? भैया इसी में आपने जो अभी बताया ना इसी में प्रश्न ये
00:26:29:13 आता है जैसे आप कहते हैं कि ये जो तीन चीज है सचिता ये आपका हो गया कि हमें ध्यान किस बात पे देना है अब ये दूसरा पॉइंट हो सकता है कि इन तीन चीजों पे काउंटर हो रहा है शायद नहीं नहीं नहीं ये दूसरी चीज है कई लोग ऐसा कहते हैं नहीं ये दूसरी चीज है ना वो क्लियर हो गया ना आपका इनपुट वाला पहला पहला वाला क्लियर हो गया हां ठीक अब बोलिए तो थोड़ा मुझे मैं मेहनत करता हूं ना तो थोड़ा बता तो दिया करिए कि भाई मेहनत तुम रंग लाई कि नहीं लाई। जी बिलकुल दूसरा क्वेश्चन ये था जैसे कई नास्तिक है उनका ये कहना है जैसे आपने बताया जो फिलोसफी आपने बताई उन्होंने कहा कि जो वेद है वो 5000 साल पहले आ रहे थे। ठीक है? उनका ये कहना है तो जो वेद आए वो क्योंकि वेद का कोई रचयता नहीं है तो बहुत लोगों ने लिखा होगा। जैसे आपने गेम ऑफ थ्रोनस देखा होगा। गेम ऑफ थ्रोन एक वो नहीं इमेजिनेशन यूनिवर्स बना देता है। तो इसीलिए किसी ऐसे रचयिता ने ऐसा लिख दिया वेद को जो कि बिल्कुल होता नहीं कि साइंटिफिक जिसका प्रमाण ही नहीं है। मतलब इतना ज्यादा होता नहीं मिरेकल जैसे आपने बताया वेद में सच्चिदानंद तो उन लोगों का कहना है कि ये भगवान की वाणी नहीं है। ये कई लोगों ने लिखा था जो बहुत ज्यादा ब्रिलियंट लोग थे। इसीलिए कोई इसका खंडन नहीं कर पाता है।
00:27:44:19 तो इससे क्या हो गया? अगर कोई खंडन नहीं कर पा रहा है तो फिर उसकी शब्द प्रमाण माना हमने भाई वो तर्क की पराकाष्ठा पे और प्लस हमारी श्रद्धा है हमारी श्रद्धा यह है कि ये अपौरुषय है ये दो करोड़ साल पहले के हैं और तर्क ये है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म अब हमारे अगर आपको हमारी आस्था पर यकीन नहीं है। आपको हमारे शब्द प्रमाण यकीन नहीं है। आप इन तीन चीजों को काट के दिखा दो। बस हमने तो कहा है ना कि आप नई नियमावली ले आओ ना भाई हम कहां मना कर रहे हैं सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष शाश्वत धर्म ले आओ अभी मुल्ला जी आए थे कितने घंटों लगे रहे हर चीज में वो यही कह के गए भैया आगे अगला चैप्टर चालू करो नहीं तो वो अपना रिपीट टेलीकास्ट करते रहेंगे हम जी देखिए ये जो बात है जो शब्द प्रमाण से ही सिद्ध हो सकती है उसमें ना हम कोई ऐसा पॉइंट रख सकते हैं। हमारे पास उसके पक्ष में तर्क है और हमारे पास उसके पक्ष के लिए यह है कि जो उसके विरुद्ध लाओगे वह हम खंडित कर देंगे। उसके द्वारा दिया गया जो ज्ञान विज्ञान है जो स्फुटित हो रहा है जगह वो उसके द्वारा हम कर मगर एक शब्द प्रमाण जो है कि ये ऐसा ये ऐसा था वो तो
00:28:59:22 हमें ना हम उनका मानने के लिए तैयार हो सकते हैं ना वो हमारा मानने के लिए तैयार हो। बहस उस चीज पर की जाए जिस पर वो मानने मानना पड़ जाए। जैसे कि नास्तिक के अंदर भी सच्चिदानंद की क्या है यह उन्हें मानना पड़ जाएगा। बहस ऐसी चीजों पर की जाए जिन विषयों में हम एक जगह निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं। जो विश्वास का विषय है उसमें हम निष्कर्ष कैसे प्राप्त करेंगे जो विश्वास का विषय है। उनका विश्वास है कि वेदों को जो है अभी लिखा गया हमारा विश्वास है कि दो करोड़ वर्ष हो गए। एक करोड़ 97 लाख की तो हमारी गुरु परंपरा है। अब वह गुरु परंपरा यदि आप नहीं मानते हो कि इतनी पुरानी है तो उनके ज्ञान विज्ञान को काटो ना। कौन कह रहा है? हम लोग इसलिए थोड़ी ना कहीं पर जीते हैं। इस दम पर थोड़ी ना चलते हैं कि हम पुराने हैं। हम इस दम पर चलते हैं कि हमारे पास सर्वशक्तिमान ईश्वर परम स्वतंत्र मोक्ष और शाश्वत धर्म। और यह हमारा यह जो उपयोगिता है इसकी कि वेद अपुरुष है और वेद जो है क्या कहते हैं तर्क की पराकाष्ठा है इसकी उपयोगिता में हम किस पर विश्वास कर रहे हैं जो तर्क की पराकाष्ठा पर खड़ा है जिसने ये नहीं कहा कि जो है हमको ईश्वर ने लिखा लो हम ऐसी किसी नियमावली के प्रति
00:30:15:01 श्रद्धावान है वहां पर श्रद्धा है कि वेद ने कहा कि वो पुरुष है कुरान ने नहीं कहा कुरान ने कहा मुझको अल्लाह ने लिखा बाइबल को ईश्वर ने सुनाया ठीक है तो हम तर्क की पराकाष्ठा पे हैं और फिर वहां पर विश्वास है ठीक जी जय सीताराम धन्यवाद जय श्री राम हम बस मुकुल जी
00:30:49:08 मुकुल जी के बाद वैभव जी है जी आवाज आ रही हो तो बोले नहीं तो श्री कृष्णा भैया जी जय श्री राम जय श्री राम जी मेरे दो प्रश्न थे आपसे एक तो मेरा ये है कि जैसा कि शास्त्रों में भी आता है कि स्त्री और शूद्र जो है चतुर्थ वर्ण वाले भाई हैं हमें तो उनके मतलब बहुत चीजें निषेध है जैसे शालिग्राम जी की सेवा नहीं कर सकते हैं स्त्री शूद्र आदि तो मतलब ऐसा है कि ईश्वर ने सबको एक ही तरीके से मतलब निर्माण किया तो ऐसा मतलब निषेध क्यों होता है ये थोड़ा सा करना था और दूसरा बहुत सारे वीडियोस बना चुके हैं। शॉर्ट में उत्तर दे देता हूं। यदि पहली बात तो आपकी एक जानकारी गलत है कि स्त्री और शूद्रों के लिए बहुत सारे निषेध है। सबसे ज्यादा निषेध ब्राह्मणों के लिए है। ब्राह्मण यदि मदिरापान कर लेगा तो उसको लोहे की सलाख को गर्म करके उसके साथ आलिंगन करना कि कब तक? जब तक मृत्यु ना हो जाए। ब्राह्मण को सम्मान का भूखा नहीं, अपमान का भूखा रहना है। शूद्र के लिए नहीं कहा गया। ब्राह्मण को जरूरत से ज्यादा धन नहीं बटोरना है। केवल इतना धन संचय करना है कि रोटी खा सके, जीवित रह सके। बस आप इतना भी धन नहीं ला सकते कि उसको बचा के तिजोरी में रख सके।
00:32:04:14 यह निषेध नहीं है। ब्राह्मण के लिए कहा गया है यज्ञ पवित्र हो जाने के बाद आप जो है मूत्र त्याग करेंगे तो इतनी बार मिट्टी से धोए। कोहनी तक इतनी बार मिट्टी से धोएं और उसके बाद कुल्ले इतने करें, आचमन इतने करें। यह निषेध नहीं है। पागल हो जाएगा एक सामान्य व्यक्ति जो ये सब बने फिर रहे हैं ना कि ब्राह्मण ब्राह्मण ब्राह्मण और ये सब रायता फैला रखा है। एक दो दिन जी के देख ले जीवन कितना कठिन है। बात बातबात में पतित हो जाएगा। यह हो जाएगा। इतनी नियमावली है कि व्यक्ति का पूरा दिन ही उसमें गुजरेगा। यही ध्यान रखने में कि मैं यज्ञ पवी धारण करने योग्य अपने शरीर को रख पा रहा हूं कि नहीं रख पा रहा हूं। तो जिस जिसे आप निषेध कह रहे हैं ना उसको स्वतंत्र किया गया है। यदि सब लोग यही दिन भर सोचेंगे कि मैं अपने शरीर को यज्ञ पवित्र धारण करने के लिए वेद पाठ और वेद पाठ करने और पढ़ाने के लिए शुद्ध रख पा रहा हूं कि नहीं रख पा रहा हूं। तो कोई बाहर से आ जाएगा तो क्या करेगा? भाई वो तो कुल्ले कर रहा है। बाहर से अटैक हो रहा है तो क्या करें? कुल्ले कम करो। अच्छा वो तो लड़ रहा है। अब क्या करें? तो और कुल्ले कम करो। अच्छा
00:33:19:15 वो तो जो है वैश्य है जो व्यापार कर रहा है। वो तो तराजू पर तौल रहा है। तो क्या करें? के कुल्ले और कम करो। खत्म कर दो कुल्ले। तो शूद्र आ गया। अब हम ये कह दे अब हम ये कह दे कि भैया कोई शूद्र है जो वेद पाठों के लिए उसके पास गुण है। बिल्कुल हो सकते हैं। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत क्या है कि कोई व्यक्ति अगर रॉन्ग साइड जाकर के अच्छी गाड़ी चला रहा है बिना एक्सीडेंट के तो अलऊ कर दे। जिसका जो मन हो जिसकी क्वालिटी हो उधर रॉन्ग साइड चलाए। ये होना चाहिए। ये होना चाहिए कि कोई व्यक्ति अगर रॉन्ग साइड जाकर के अच्छी गाड़ी चला रहा है तो लेफ्ट में चलने वाला जो नियम है कि नहीं साहब राइट में नहीं चलाना है। लेफ्ट में ही चलाना है। तो यह नियम खत्म कर दे। क्योंकि कुछ लोग हैं जो रॉन्ग साइड अच्छी गाड़ी चला लेते हैं एक्सीडेंट के बिना। तो नियम बनाने के लिए, अनुशासन रखने के लिए, व्यवस्था रखने के लिए चीजों का पर्यवसान है। देखिए बात यह है कि आपको इस पर ध्यान देना है कि हमको जो अधिकार और अनाधिकार दिए गए उसका परवसान किस में है? मुक्ति में। कहीं पर लिखा है क्या? किसी का ब्राह्मण बनना वो है जीवन का उद्देश्य। जीवन का उद्देश्य मोक्ष। ब्राह्मण बनना उद्देश्य नहीं है। तो फिर ब्राह्मणों
00:34:34:24 वाली चीजें क्यों चाहिए? अच्छा निषेध नहीं है। पुरुष का मांग भरना निषेध नहीं है। हम उसको क्यों नहीं सोचा आपने? पुरुष की गोद भराई निषेध नहीं है। उसको क्यों नहीं सोचा आपने? तो पहली बात तो निषेध की परिभाषा को जाने कि निषेध किसके ऊपर है? किसके ऊपर नहीं है। अब दूसरी बात एक आती है हमने बता दिया कि इनका जो पर देखिए जो ईश्वर है जो ईश्वरीय व्यवस्था है वो यह ध्यान में रखने के लिए नहीं कि आपको सांसारिक भोग कैसे कराने हैं। सिंपल वो यह ध्यान में रखकर है कि आप सांसारिक भोगों से गुजरते हुए इसको पार कैसे करो। उसने इस तरह से व्यवस्था की। अब हम लड़ रहे हैं भैया हमारे को ये वाला सांसारिक भोग नहीं दिया। हमारे को ये वाला नहीं दिया। दिक्कत ये है। तो जब हम ऐसा कह रहे हैं तो इसका मतलब हमारा मोक्ष में विश्वास नहीं है। जब हमारा मोक्ष में विश्वास नहीं है। अगर हम परम सत्य मोक्ष को स्वीकार कर लेंगे तो हम ये काउंटर कर ही नहीं सकते कि हमें हमें ये वाली सुविधा नहीं मिल रही है। ठीक है? तो जब हमारा मोक्ष में विश्वास नहीं है तो ईश्वर पर विश्वास सिद्ध नहीं होता और धर्म पर विश्वास सिद्ध नहीं होता। तब भी हमारा जो है इन बातों का निषेध अथवा होना अथवा ना होने के विषय में परेशान होना सिद्ध नहीं होता। क्योंकि हम हम तो धर्म को मानते ही नहीं है। निषेध तो उसके लिए ना जो माने
00:35:50:07 तो धर्म को मानेगा तो आधा मानेगा क्या? यह भी तो मानना है कि परम लक्ष्य तो मोक्ष है। परम लक्ष्य ब्राह्मण बनना है ही नहीं। कहां लिखा है धर्म का लक्ष्य जो है मोक्ष वो ब्राह्मण। ठीक है? और बाकी इस पर बहुत सारी विवेचना कई बार कर चुके हैं। जब अभी आहान का कोर्स शुरू हो जाएगा तो उसमें एक विधिवत एक चैप्टर है पूरा वर्णाश्रम को लेकर के। तो यह निषेध करना। अच्छा निषेध ये बताओ कोई बाहरी व्यक्ति आपके यहां पर आएगा वो कहे कि भैया जो है आपने निषेध कर रखा है अपने यहां की स्त्रियों को स्पर्श ना करने की कोई बात है क्या हम नहीं नहीं निषेध निषेध तो होगा ना विधि निषेध इत्यादि की आवश्यकता है ना जीवन में आपने निषेध कर रखा है शौच के बाद आप जो है जिस हाथ से आप जो है शौच इत्यादि जिस हाथ को उपयोग में लेते हैं उसके उससे आप खाना नहीं खाते क्यों निषेध कर रखा है निषेध विधि निषेध और क्या कहते हैं वो होना अनुमति प्राप्त होना यह सब एक अंग है सांसारिक व्यवस्था का लेफ्ट में चलो अच्छा मैं तो मैं क्या अच्छा कोई आदमी अगर वही वाली बात कि कोई शूद्र अगर गुणवान हो जाए कोई शूद्र अगर वेद के बहुत विद्वान हो जाए तो उसको नहीं हक मिलना चाहिए तो कोई आदमी अगर रोंग साइड हो दूसरी राइट
00:37:05:10 साइड में अच्छी गाड़ी चलाने लगे तो उसको क्यों नहीं हक होना चाहिए क्योंकि व्यवस्था बिगड़ जाएगी विप्लव होगा सबको छूट दे दी हम भी हम भी हम भी अच्छी चलाएंगे सब इधर उधर मारे मारे फिर रहे हैं दे धना धन एक्सीडेंट हो रहे हैं हो ही रहा है हो ही रहा है ना राम राज्य है क्या आज नहीं नहीं फिर हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए पढ़िए आप रामायण को धूप उतनी निकलती थी जितनी निकलनी चाहिए है क्या आज वैसा क्यों नहीं है क्योंकि सारी गाड़ियां जिसका जो मन आया वो रॉन्ग साइड जा रही है जिसका जो मन है साइड जा रही है। कहीं भी कोई भी मोड़ दे रहा है। सबको छूट मिली हुई है। लोकतांत्रिक शासन है। रामचंद्र जी के युग में क्या वोट पड़ते थे क्या? कौन बनेगा करोड़पति?
00:37:56:28 तो जन्म से नॉमिनेशन और कर्म से सिलेक्शन। ऐसा नहीं है। कोई ब्राह्मण अगर पतित होगा तो उसको रिजेक्ट किया जाएगा। मगर नॉमिनेशन के लिए एक स्टार्टिंग पॉइंट तो होना चाहिए ना। वह वर्णाश्रम जन्म के अनुसार है। उसके बाद उनके कर्मों के हिसाब से उनका सिलेक्शन होगा। अच्छा जितने विधि निषेध ब्राह्मण पर लागू है उतने विधि निषेध किसी पर लागू नहीं है। अगर सांसारिक दृष्टि से देखा जाए तो सबसे दयनीय जीवन ब्राह्मण का है। हां पारमार्थिक दृष्टि से देखा जाए तो सबसे उत्कृष्ट जीवन ब्राह्मण का माना जा सकता है। मगर जो भौतिकवादी व्यक्ति है जिसको इसमें निष्ठा है कि मेरे मेरे को यहां रोक दिया, वहां रोक दिया उसके लिए तो फिर सांसारिक दृष्टि से तो उसी का जीवन सबसे ज्यादा मुक्त है। कितने कुल्ले बता दिए शूद्र को? यह कुल्ले करो, वह कुल्ले करो। हालांकि करने चाहिए उसके भी बताए हैं। मगर ब्राह्मणों के बहुत बताए। बहुत नियम कायदे कानून। दिनभर मैं बता तो रहा हूं जो व्यक्ति कह रहा है ना कि मुझे शंकराचार्य बनाओगे। मुझे शूद्र मुझे ब्राह्मण बनाओगे। वो व्यक्ति पागल हो जाएगा। उसको एक दो दिन बिता दो तो। हम तो आज तक शुद्ध ब्राह्मण बन नहीं पा रहे हैं। पूरा दिन संघर्ष में बीतता है। लघु शंका से लेकर के कैसे व्यवस्था करनी पड़ती है। कैसे भागे भागे फिरते? मॉल में है तो कैसे
00:39:12:16 व्यवस्था करें लघु शंका की कुल्ला कैसे करें मिट्टी लेके साथ में चलो हैं हम तो बन नहीं पा रहे हैं और जिसको स्वतंत्रता मिली हुई है कि भाई तुम परेशान ना हो जाए जिससे कि विप्लव ना फैले तो तुम तुमको मुक्त करते हैं इन चीजों से अब ये थोड़ी ना है कि हमने जब एक व्यवस्था के लिए किसी को मुक्त किया तो वो चला आ रहा है नहीं हम तो साहब यही करेंगे हमारे अंदर गुण है तो व्यवस्था भंग होगी जिसके पास गुण नहीं होगा वो भी आएगा उसको भी टेस्ट करो एसी में लग जाओ। टेस्ट करने में लग जाओ कि किसके पास गुण है कप्तान बनने के। किसके पास गुण है विकेटकीपर बनने के। यह टेस्टिंग मैदान में शुरू कर दो। पाकिस्तान से मैच वो खेलना बंद कर दो। यह टेस्टिंग सबकी शुरू कर दो। क्या यह उचित है? मैदान में उतरने के बाद हमारा धेय यह होना चाहिए कि विकेटकीपर के गुण चेक करो। उसके गुण चेक करो। यह करो, वह करो। या धेय होना चाहिए कि हम सामने वाली टीम को हमें हराना है। हम जी तो उसी प्रकार से प्रपंच रूपी संसार में आने के बाद हमारा देह है मोक्ष सद्गति ना कि ये कि हम अपना पद परिवर्तित करवा ले ये नहीं होना चाहिए मैदान से बाहर का काम तो मैदान से
00:40:27:18 बाहर का काम क्या है कि भगवान सजन करते हैं चातुर चातुर्वर्ण मया सष्टम मैंने सृष्टि वो करके भेजते हैं मैदान में उतारते हैं कि तुम कप्तान हो तुम विकेट कीपर हो तुम ये सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि मैच को जीतना है। व्यवस्था करके व्यवस्था करके नहीं भेजेंगे तो विप्लव होगा मैदान में। हां जी ये वाली बात। ठीक है। बहुत लंबा लंबा हो गया है। बताइए और किसी का हो तो अच्छा ये मैं एक बात कह रहा हूं। यहां पे जो लोग भी आ रहे हैं। देखिए कई जो टॉपिक होते हैं रिपीट होते हैं। आप लोग यह सब चीज़ें वहां पर देखिए। आप जैसे वर्णाश्रम का आपके पास सवाल था। वैसे तो गुरुदेव ने बहुत अच्छे-अच्छे व्याख्यान भी किए हैं। उसके बाद गुरुदेव के व्याख्यानों को देखने के बाद हमारी कई लोगों से चर्चाएं हैं। वो देखिए और वर्णाश्रम पर पहले भी बहुत सारे वीडियोस बन चुके हैं। तो वो देखिए। एक एक व्यक्ति वही रिपीटेड सवाल करेगा। अनावश्यक जो है व्यर्थ समय होता है। ठीक है मुकुल जी? तो आप लोग कोशिश करिए कि जो सवाल आप ले आ रहे हैं अगर उसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका हो तो उसको भी देखते रहिए वीडियो इत्यादि। जी
00:41:40:19 जय श्री राम भैया जी जय श्री प्रणाम अभी कितने लोगों का बाकी है बस भैया लास्ट है लास्ट है ठीक है ठीक है बताइए मुझे ये समझने में थोड़ी परेशानी होती है कि सच्चिदानंद की चाल सब में है इसे ये कैसे पता लगता है कि सच्चिदानंद सच में है इससे ये कैसे पता लगता है जैसे जैसे भूख से पता लगता है कि दुनिया में भोजन है। जैसे प्यास से पता लगता है कि दुनिया में पानी है। होना सिद्ध है। अब कोई व्यक्ति अगर फिर भी इंकार करे तो उससे यह कहना पड़ेगा कि तो तुम मारना छोड़ दो जब वो नहीं है तो ऐसी चीज की आकांक्षा आप क्यों कर रहे हो जो है ही नहीं। भाई जो चीज है ही नहीं उसकी आकांक्षा यदि करोगे तो खुद को पागल घोषित कर दो। मैं अगर आकांक्षा करने लगूं अभी उड़ने वाला हाथी चाहिए मुझे तो लोग पागल घोषित करेंगे ना मुझे पागल घोषित कर लो स्वयं को अगर आप मानते हो कि सच्चिदानंद नहीं है तो क्योंकि आप ढूंढ तो वही रहे हो हां या तो आप ये सिद्ध कर दो कि सच्चिदानंद है ही नहीं कि आपके अंदर सच्चिदानंद की चाहत ही नहीं है तो वो फिर हम सिद्ध करेंगे कि है
00:42:56:21 ठीक है ना अब भैया भैया बस एक चीज बस थोड़ी सी पूछनी थी हो गया हां समझ गया भैया ज्यादा समय नहीं दूंगा बस एक एक मिनट जैसे ये पूछना था जैसे आपने कहा सब समझ में आ गया वस्ता के ऊपर लेकिन एक डाउट आता है कि जो राजा हरिश्चंद्र के टाइम की बात थी उसमें जब वो काशी के घाट पर अपने आप को बेच रहे थे तो उनकी जब अपनी पत्नी पर वो बोली लगा रहे थे तो उनको एक ब्राह्मण ने खरीदा था। ठीक है? तो ब्राह्मण कैसे खरीद सकता है? जब उसके पास पेट अपने पेट भरने की पत्नी के दिए पैसे तो किसको पत्नी को उनकी जी जी जी राजा ब्राह्मण ने अगर खरीद लिया ब्राह्मण का नियम क्या है कि आप अपनी जरूरत से ज्यादा धन संचय नहीं कर सकते अगर किसी ने कर रखा है तो वो गलत कर रखा है पहली बात तो ब्राह्मण किसी स्त्री को खरीद ही रहा है वहीं पर वो गलत हो गया ब्राह्मण को क्या जरूरत किसी स्त्री को खरीदने की भाई अगर कोई नियम है और कोई उसको तोड़ करके कर रहा है तो आदर्श थोड़ी है वो ब्राह्मण लिखा था क्या रामो विग्रह धर्म वो वाला हरिश्चंद्र के युग वाला जो ब्राह्मण जो था वह विग्रहवान धर्म था नहीं लिखा ना राम विग्रहवान धर्म लिखा है तो किसी व्यक्ति ने कुछ अनियमित
00:44:12:12 तरीके से नियम को तोड़ते हुए कुछ अगर कर भी दिया तो उसको हम थोड़ी ना अपना सिद्धांत मानेंगे सिद्धांत वो है जो शास्त्रों द्वारा स्वीकार किया गया संबंध में वचन है भीष्म पिता मां का युधिष्ठिर के लिए क्या वचन है कि पूर्व में किसी के कर देने से वह धर्म नहीं होता है। घटनाओं का घटित होना धर्म नहीं होता है। उन्हें शास्त्रों द्वारा धर्मोचित रूप में स्वीकार किया जाना धर्म होता है। ठीक है? करने को तो रावण ने भी सीता माता का धारण कर दिया था ब्राह्मण होते हुए। फिर उसको मान ले कि यह धर्म है हमारे यहां का। रावण के कृत्यों को स्वीकार थोड़ी ना किया गया शास्त्रों द्वारा। अधर्म कहा गया। तो अगर किसी ने कहीं कुछ किया तो वह हमारा सिद्धांत कैसे हो जाएगा? सिद्धांत तब होगा जब उसको सिद्धांत कहा जाए। या तो उसे आप पुरुष कहा जाए, मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाए तब उसको अनुकरणीय है। और या फिर उस सिद्धांत को सिद्धांत के रूप में बता दिया जाए। कहीं मनुस्मृति इत्यादि जैसे ग्रंथों में। ठीक है? बाकी भैया हो सकता है ऐसा भी पॉसिबल है कि किसी मर्यादा की रक्षा की दृष्टि से कि खरीदा हो या तो वो देखना पड़ेगा। देखना पड़ेगा और इसमें एक बात और भी है। इसमें एक बात और
00:45:27:13 भी है कि ब्राह्मण का यह प्रयास होना चाहिए कि उसके पास धन संचय नहीं हो। मगर जो क्या कहते हैं जो हमारे राजा हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य उनका ये कर्तव्य होता है ब्राह्मण का ध्यान रखें। दान दें। उनको इतना भरा पूरा रखें कि वो अपना जो नियमा जीवन है वो सुगमता से निकाल पाए। तो तो ऐसा भी तो उसमें पॉसिबल है कि यदि उन्हें दान दिया गया जरूरत से ज्यादा धन संचय तो उन्होंने किसी स्त्री के जीवन को बचाने के लिए किसी से किसी कष्ट से निकालने के लिए उन्होंने अपना वो जो एक्स्ट्रा धन आया था जरूरत से ज्यादा वो खर्च कर दिया लो तो बहुत सारी चीजें है ना पॉसिबिलिटीज
00:46:15:25 जी भैया बहुत-बहुत धन्यवाद ठीक है ना मैंने इस विषय में एक बात कही है जब भी कोई आपको कभी भी दोष युक्त दिखाई दे। ठीक है? जब भी आपको कभी कोई दोष युक्त दिखाई दे तो सबसे पहले उसके अधिवक्ता बन जाइए। और वह हर आखिरी कोशिश करिए जिसके द्वारा आप अपने क्लाइंट को एक कोर्ट में बचाने के लिए दलीलें पेश कर सकते हैं। आर्गुममेंट रख सकते हैं। और जब एक भी आर्गुममेंट आपको दिखाई ना दे तब मानिए कि वह दोषी है। भले ही वह आपका मित्र हो या शत्रु। शत्रु भी यदि दोष युक्त दिख रहा है तो उसके दोष को दोष मानने से पहले एक वकील की तरह सोचिए कि वो कटघरे में खड़ा हुआ एक अपराधी है और आपको उसे बचाना है अंतिम सांस से पहले। और जब कोई रास्ता ना मिले तब मानिए कि शत्रु ने वो दोष किया है जिस दोष को आप उसमें देख रहे हैं। ठीक है? तो ऐसे ही उस ब्राह्मण के विषय में भी आप सोच सकते हैं। कई सारी चीजें पॉसिबिलिटीज सत्य सनातन जी आप भी पूछ के रहेंगे।
00:47:29:10 जी भैया थोड़ा सा एक ही प्रश्न है। बताइए पूछ लीजिए पूछ लीजिए। जी भैया जय श्री राम भैया। भैया एक प्रश्न था ये कि शास्त्रों में लिखा है कि भगवान परशुराम ने जो है 21 बार क्षत्रियों का संहार कर दिया था। ठीक है। और फिर महाभारत में और भी जगह इसका है प्रसंग है कि ब्राह्मणों के द्वारा नियोग के द्वारा जो भी है थी। ठीक है तो यहां पे प्रश्न ये उठता है कि क्या परशुराम जी ने पूरा का पूरा वो खत्म कर दिया था? नहीं नहीं नहीं ऐसा नहीं है। पूरे के पूरे क्षत्रियों का नाश नहीं हुआ था। जो क्या कहते हैं अत्याचार इत्यादि अन्याय से जुड़े हुए जो थे उनका नाश हुआ था मगर काफी संख्या में हुआ था तो इसलिए उसको कहा जाता है ऐसा नहीं ऐसा नहीं क्योंकि इसमें प्रश्न ये आ गया था कि भगवान श्री राम का जो वंशावली है वो तो चलता आया उससे पहले ही वो आए थे ना हां तो ऐसा नहीं मान सकते ना जी और कृष्ण भगवान का भी चंद्रवंश ऐसे ही चलता आया तो उसमें भी ऐसा कुछ नहीं है और जब वो राम जी से मिले भी तब भी उन्होंने वो कहां कि हमने तो क्षत्रियों का नाश कर दिया था तुम
00:48:44:12 बच कैसे गए? राम जी ने कहा तो था कि तुमको सही कोई मिला नहीं है अभी तक। अब बहुत हो गया बस ब्राह्मण हो इसलिए हम जो है वो कर रहे हैं। बहुत बढ़िया कन्वर्सेशन है वो। घूसभ उन्होंने उन्होंने सेना इकट्ठा करके क्षत्रियों का नाश किया था या फिर अकेले किया था? ये तो वस्तुनिष्ठ जानकारियां देखनी पड़ेगी। अकेले किया था भैया। अकेले किया था। अकेले किया था। और वहां पर परशुराम जी लक्ष्मण जी को पराजित कर देते हैं। हां हो सकता है।
00:49:21:20 मगर मगर जो भी है मगर एक बात है कि आप ये वाली कन्वर्सेशन जब पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि हमें और ज्यादा इधर उधर दुनियादारी में फिल्में फिल्में देखने जाने की आवश्यकता नहीं है। ये दो महावीर जब आपस में टकरा रहे हैं आमनेसामने उस समय उनके डायलॉग बाजी देखो आप घूस बम्स आएंगे आपको। कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। मानस में पढ़ लीजिए उसमें भी बहुत बढ़िया लगता है। परशुराम जी जब आते हैं तब पहले तो वो लोग जो राजा दशरथ जी हैं और और क्या कहते म्यूजिक भी बहुत डेंजरस टाइप की है उनकी जो एंट्री वाली है हां राजा दशरथ जी हैं जो पहले तो वो वैसे करते हैं कि मनाने की कोशिश परशुराम जी को परशुराम जी ललकार रहे होते फिर राम जी कहते हैं ऐसा है बहुत हो चुका ब्राह्मण हूं इसलिए सुन रहा हूं इतनी देर से और फिर तुरंत जब वो आवाहन करते हैं तो बस वो बहुत रामायण में कई ऐसे ऐसे प्रसंग है वाल्मीकि रामायण में बहुत से ऐसे प्रसंग है जहां आपको गुज वम्स आएंगे। एक वह भी बहुत अच्छा प्रसंग है जब मार्मिक भी है वह कि क्या कहते हैं जब श्री राम को पता चलता है कि उनके पिता जो है शरीर को त्याग चुके हैं तब बहुत मार्मिक
00:50:37:03 दृश्य भी है और वहीं पर प्रेरणादायक भी है। जब श्री राम जी कहते हैं प्रतिज्ञा करते हैं कि अब मैं वही बनकर दिखाऊंगा जो मेरे पिता मुझे बनाना चाहते थे। मैं वही राम बनूंगा। वह भी बहुत मार्मिक दृश्य है। आप पढ़ो उसको। है ना? ठीक है। सभी के प्रश्न हो गए। बहुत-बहुत आभार सबको समय देने के लिए। इसी इसी कारण से थोड़ा सा सत्संग हो जाता है आप लोगों के साथ मेरा भी। हम तो भैया ये जो रामायण सब है वो कितने मतलब कौन-कौन सी रामायण जो है वो प्रामाणिक है एकदम जो जिस पर पूरा विश्वास होना चाहिए। क्योंकि कई लोग बोलते हैं सर वाल्मीकि रामायण प्रमाणिक है। रामायण के विरुद्ध यदि सैद्धांतिक रूप से कोई जा रही है रामायण तो वो अप्रामाणिक है। सैद्धांतिक जैसे राम जी सत्य का रामायण अप्रामाणिक है। इस राम राम जी जो है वो सत्य रामचरितमानस भी प्रमाणिक है। पूर्ण रूप से वो भी बहुत अच्छी लिखी गई है। बाकी उसमें वो स्पष्ट भी है कि अपनी बात पूरी कर श्री राम जी सत्य प्रतिज्ञ है। अब मान लो कहीं पर वो जो है छलिया कृष्ण के जैसे बना दिए गए है ना भगवान श्री कृष्ण जैसा उनका रूप दिखाया जा रहा है तो वो
00:51:52:09 जो है उसको आपको अह उसमें नहीं लेना है कि ये प्रामाणिक है जहां पर सैद्धांतिक विरोध हो देखो जो घटनाओं का वो है ना तो कल्प वेद से घटनाएं अलग-अलग कहीं-कहीं पर आपको मिल सकती हैं। है ना? परंतु जहां पर सिद्धांत का विरोध हो कि राम जी सत्य प्रति राम जी मर्यादा पुरुषोत्तम और मर्यादा पुरुषोत्तम या एक पत्नी व्रत धारी इत्यादि ऐसे सिद्धांत खंडित हो रहे हैं। राम जी का स्वरूप ही चेंज हो रहा है। जहां पर आप राम को रामू विग्रहवान धर्म नहीं कह पाओ। ईश्वर का स्वरूप तो है परंतु वो राम रामो विग्रहान धर्मा वाली लाइन जब ना आ पाए तो उस चीज में उसको त्याग देना चाहिए। ठीक है? अब जैसे काक भुसुंडी रामायण के ऊपर अपने हमारे कालिया जिन वाले चलते हैं तो काक भसुंडी रामायण में कहा कि शबरी के भेर झूठे खा लिए जबकि क्षत्रिय के अनुसार उसको नहीं खाना चाहिए था उनको ठीक है तो यानी कि वहां पर उन्होंने अपनी मर्यादा को तोड़ दिया काक भसुंडी रामायण के अनुसार तो वहां पर हमें यह मानना पड़ेगा क्योंकि हमारे गर्भ में क्या है वाल्मीकि रामायण तो काक भसुंडी रामायण का सम्मान रखते हुए उसके उन वचनों का ऐसा अर्थ हमें निकालना पड़ेगा कि जो भगवान राम का जो
00:53:07:10 मर्यादा पुरुषोत्तम वाला व्यक्तित्व है वो खंडित ना हो तो क्या करें कि उनके जो भक्ति रूपी बेर थी है ना फल जो भक्ति के रूप में वो निवेदित निवेदित करना चाहती थी वो उन्होंने स्वीकार कर लिए श्री राम ने बस हो गया ठीक है जी भैया तो इसमें मतलब कि वो जो झूठे बैर वाले प्रसंग वो बात अलग है कि वो भक्ति भाव वाला ही केंद्रित उसमें है अधिकतर हां भाव वो अपने भाव जो उनको को निवेदित करना चाहती थी कि भाई एक ही भूत हो जाने का भाव होता है ना अंशीभूत जी भगवान के साथ तो वो जो भाव था वो निवेदित करना चाहती थी जिसे झूठा भी कहा गया और उस उस भाव को उन्होंने ग्रहण किया है ना भक्तों की इच्छा पूर्ति करनी है तो अगर वो झूठा बेर खा भी लेंगे तो फिर वो मर्यादा भंग मतलब कैसे हो सकता है क्योंकि भक्त है ना वो और भगवान का एक दायित्व होता है कि भक्त जिस भाव से मुझे ध्याए मैं उसे ग्रहण कर लेता हूं वो लीला स्वरूप नहीं है ना उसमें उन्होंने भगवान होने से पहले जो मनुष्य होने का जो रूप है उसे प्राथमिकता से निभाया है। भगवान ने राम जो स्वरूप है भगवान का वो क्या कहते हैं? मनुष्य के जो कर्तव्य कर्म होते हैं उसके अनुरूप उन्होंने प्राथमिकता से निभाया
00:54:22:19 है। ठीक है? उसमें जो ईश्वर ईश्वरता प्रधान नहीं है उस रूप में उस रूप में मर्यादा मनुष्यता प्रधान रूप है कि मनुष्य का जीवन वो कैसे जीना है तो उसका अनुकरण करिए ठीक है और भगवान जो स्वीकार करते हैं पारमार्थिक रूप से तो स्वीकार करते ही है उसको व्यवहारिक से स्वीकार करना करना जरूरी है क्या भाई आदि दैविक तरीके से तो स्वीकार करते ही है भक्त ने झूठा दिया गायब हो गया वहां से लो उसको खाना ही जरूरी है खा के दिखाना ही जरूरी निवेदित हो गया हो गया गायब मान लो किसी भक्त ने प्रसाद दिया झूठा दिया ठीक अब जो है उसको जो है वो वहां से प्रसाद गायब हो गया तो ये मान लिया गया कि भैया भगवान ने स्वीकार कर लिया अब दूसरी एक बात मैं आपको कह रहा हूं कि भगवान जो अपनी भक्ति के भाव से प्रस्तुत करे उसको ग्रहण कर लेना चाहिए तो क्या सूअर का मांस भी ग्रहण कर ले
00:55:19:20 हां जी ऐसा तो मतलब कोई कैसे करेगा? नहीं ये बात गलत है। फिर जो तेरे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में शास्त्र प्रमाण इसीलिए ऐसा तो कोई क्यों नहीं करेगा? जो बंगाल में मांस नहीं चढ़ा रहे हैं। लड्डू गोपाल को मांस चढ़ा रहे हैं तो फिर चढ़ाने देना चाहिए उस हिसाब से क्योंकि भक्ति में है भाई। नहीं तो वह शास्त्र विरुद्ध हो जाएगा तो फिर वो नियम भी विरुद्ध झूठे बेर भी हैं। शास्त्र विरुद्ध झूठे वेर भी हैं। क्षत्रिय को दिए जा रहे हैं। शास्त्र विरुद्ध झूठे हैं। ठीक है? अच्छा विरुद्ध जी इसमें थोड़ा मतलब वही डाउट था। ये भी को प्रधानता देनी पड़ेगी और जो वो वाली बात है कि अगर कोई कुछ भी मेरे ऊपर को चढ़ाता है तो भगवान ने वहां बताया तो है कि क्या-क्या चढ़ाता है। ये थोड़ी ना कुछ भी चढ़ाने लोगे। भगवान तो भाव के भूखे हम रोज रोज यही सिखा रहे हैं सबको कि भैया भगवान तो भाव के भूखे के नाम पर जो है उनके ही सिद्धांतों का आप खंडन मत करो फिर हम लोग यह कह दे कि कुछ भी खा लो कुछ भी निवेदित कर दो तो पारमार्थिक दृष्टि से भगवान ग्रहण करते हैं। आपके जो शुद्ध भाव होते हैं अशुद्ध भावों को ग्रहण नहीं करते हैं। जो आपके समर्पित समर्पण
00:56:35:03 शरणागति वाले भाव होते हैं उनको वो एक्सेप्ट करते हैं। पारमार्थिक और आदि दैविक दृष्टि से हर तरह से करते हैं। मगर फिर उसमें यह आवश्यक नहीं है कि श्री राम के रूप में ही आ करके वह ऐसा कोई काम कर ले कि वो जो है जो उनका मर्यादा पुरुषोत्तम वाला जो रूप था वो जो है खंडित हो जाए। अच्छा दूसरी बात अगर वो कर लेंगे तो हम उन्हें राम नहीं मानेंगे। बताया ना आपको अब वैष्णो देवी आई। सुपनखा आई मुझे स्वीकार कर लो। अगर राम के रूप में उन्होंने कर लिया तो वो कृष्ण हो जाएंगे। उनको हम राम थोड़ी ना कहेंगे। कहेंगे क्या?
00:57:12:00 क्योंकि शास्त्र के अलग यह प्रसंग हो जाएगा इसलिए नहीं कहे। शास्त्र के अनुसार राम कौन है? एक पत्नी व्रतधारी तो यदि वो अन्य स्त्रियों को ग्रहण स्वीकार कर लेंगे अनेक रूप बना के विवाह कर लेंगे। जैसे भगवान ने किया 16,000 है ना? तो वो फिर राम उनको राम नहीं कहा जाएगा। उनको कृष्ण कहा जाएगा। कृष्ण आए थे सतयुग में। राम के रूप में उन्होंने विवाह कर लिया। लो चलिए ठीक है नारायण हां जी यदि अगले कल्प में या किसी और अन्य कल्प में अगर भगवान इस प्रकार की लीला करे राम जी स्वयं आए और अगर इस प्रकार की लीला करें तो और उस कल्प के जो रामायण होगा वो भी ऐसा ही प्रसंग उसमें लिखा होता वो तो भगवान जो वा जो राम जो राम का चरित्र है वो धर्म भी है और ब्रह्म भी है तो इसलिए इसलिए उसमें धर्म को नहीं कहा धर्म को नहीं किया जा सकता। ब्रह्म तो लीलाएं कर रहे हैं। कर सकते हैं कृष्ण के रूप में। अगर कोई ऐसा कल्प आप बताएंगे कि उसमें जो है वह राम के विरुद्ध जा रहे हैं, वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध जा रहे हैं तो उस कल्प की उस रामायण को या तो नहीं लिया जाएगा कि भैया ये प्रामाणिक बात नहीं है श्री राम के विषय में और या फिर यह माना जाएगा कि यह जो है राम नहीं है ये भगवान
00:58:27:13 ने लीला की है। कृष्ण के रूप कृष्ण भगवान ने किया है या अमुक ने किया है। ठीक है जी भैया बहुत अच्छे से मेरा डाउट भी क्लियर हो गया आपका बताने से नारायण समारंभ शंकराचार्य मध्यमादाचार्य वंदे सभी को जय श्री राम जय श्री
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निराकार या साकार? स्त्री-शूद्र निषेध क्यों? परशुराम का संहार? सत्य रामायण कौन-सी?
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