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00:00:06:21 सभी को जय श्री राम। आज हम आए हैं गुरु महाराज जी के पावन सानिध्य में। इनके सानिध्य में थोड़ा सा जो ज्ञान का प्रकाश है वो प्राप्त करने का प्रयास करेंगे गुरु महाराज जी से। गुरु जी गुरु महाराज जी के चरणों में सबसे पहले आपके चरणों में मैं प्रणाम निवेदित करता हूं। जी महाराज जी थोड़ा सा अपने बारे में थोड़ा सा बताएंगे मतलब कि आपकी यात्रा जो आपकी निजी जीवन की यात्रा जो आप हम अभी अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ
00:00:42:00 अर्थात धर्म संघ का तात्पर्य है परम पूज्य प्रातः स्मरणीय धर्म सम्राट स्वामी श्री कृपात्री जी महाराज के द्वारा संस्थापित वो संस्थान जिसने अपने प्रारंभिक काल से ही राष्ट्रवाद का पोषण किया है। शास्त्रवाद का पोषण किया है। धर्म के संरक्षण में गौ संरक्षण में वर्णाश्रम स्वरूप के संरक्षण में अपना अतुल्य योगदान दिया है। उसी क्रम में पूज्यपाद वीरवती श्री प्रबल जी महाराज जिनके पावन आश्रय में हम लोगों को यह पवित्र प्रकल्पों को संचालित करने का प्रशिक्षण भी मिला, प्रेरणा भी मिली।
00:01:35:15 जहां तक शिक्षा आदि का विषय है तो अतीत है। परंतु यह सौभाग्य है कि जिस भूमि पर पूज्यपाद धर्म सम्राट स्वामी श्री कृपात्री जी महाराज को जिस भूमि को शिक्षा स्थली के रूप में धर्म सम्राट जी महाराज की शिक्षा स्थली के रूप में जाना जाता है। वह गंगा के तट पर पूज्यपाद अनंत श्री विभूषित ऋषिक कल्प पुण्य श्लोक पूज्य श्री जीवन दत्त जी महाराज के द्वारा संस्थापित वो नरवर पाठशाला हमको भी सौभाग्य से उस रज में खेलने का अवसर मिला और वहां से एक अध्यापक के रूप में धर्म संघ में प्रविष्ट हुए और ब्रह्मचर्य आश्रम के
00:02:24:26 एक सोपान को पार करते हुए अवतरी आश्रम में हम और आप एक साथ प्रयाग की धरती पर बैठे हैं। बड़ा सुंदर व्याख्यान मिला महाराज जी आपसे महाराज जी इसमें एक कई बार हम लोगों के सुनने में आता है कि ब्रह्मचर्य जो ब्रह्मचर्य आश्रम होता है वो जब पूर्ण हो जाता है उसके बाद हम आगे सन्यासत्व की ओर बढ़ सकते हैं तो क्या दो एक दो कई प्रकार के ब्रह्मचर्य होते हैं कि एक होता है कि उसके बाद गृहस्ती में जाता है व्यक्ति तो इसको थोड़ा सा प्रकाश डालिए जैसे जैसे सनातन धर्म का स्वरूप चार वर्णों के रूप में देखने में आता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तद्वत चार आश्रमों के रूप में उसका एक स्वरूप परिलक्षित होता है। पहला ब्रह्मचर्य है, दूसरा गृहस्थ है, तीसरा वानप्रस्थ है और चौथा सन्यास। शास्त्र यह कहते हैं कि आश्रमात आश्रमम ब्रजेत। उसका विभाजन जीवन के चार भाग किए गए हैं। पूरे जीवन को यदि कदाचित कोई 100 वर्ष की अवधि में विभाजित करें तो 25-25 वर्ष के चार भाग होते हैं।
00:03:39:27 और आज 100 वर्ष का ऐसा संभावित नहीं लगता तो जैसा जिसको अनुकूल लगता है। परंतु मैं सिर्फ यह कहूं कि चार भागों में पहला भाग प्रशिक्षित होने का है। शिक्षार का है। संस्कारित होने का वो ब्रह्मचर्य आश्रम है। जब तक कोई व्यक्ति शिक्षित ना होगा, प्रशिक्षित ना होगा, संस्कारित ना होगा तब तक समाज को अवदान क्या करेगा? जी इसलिए शिक्षा आश्रमात आश्रम ब्रजेत माने पहले शिक्षित संस्कारित प्रशिक्षित कुछ योग्यताएं अर्जित करे व्यक्ति पहली जीवन के पहले भाग में तो उसका योगदान देने के लिए गृहस्थ आश्रम में उसको परिपक्वता के साथ में उसका सद प्रयोग करना आवे। जी जिस भी विधा की योग्यता पाई है, जिस भी कला को उसने अर्जन किया है, उसके माध्यम से समाज की सेवा करें और पारिवारिक परिवेश में उस विद्या के प्रकाश को फैलाता हुआ और जब गृहस्थ आश्रमोचित जो दायित्व है उनको पूर्ण कर ले तो चौथा तीसरा था वानप्रस्थ अर्थात धीरे से अभी तक आपने शिक्षा किया था धनार्जन किया परिवार को संस्कार दिया। वानप्रस्थ होना माने सन्यास
00:04:55:25 होने से पहले की भूमिका। आज की परिस्थितियों में वानप्रस्थ संभव नहीं है। तो घर में ही रहो परंतु घर के एक कोने को एकांत मानो। वन के जैसा बनाओ। भवन में रह के भी वन के जैसा कैसे रहा जा सकता है भवन में रहते हुए वन में? क्योंकि वन तो आजकल है कहां? हमारे विकासवाद की अंधी दौड़ ने सबसे पहले वनों को सरोवरों को खाया है। तो उस परिस्थिति में वन कहां? तो भवन में वन की परिकल्पना कैसे होगी? जब अगली पीढ़ी अपने समग्र दायित्वों को पूर्ण करने में सक्षम लगने लग जाए। व्यापार संभाल लिया है। परिवार के दायित्व संभालने लगे हैं। और आप सब देख रहे हैं वर्तमान कालिक परिस्थितियों में उपाय समझ में आता है। जब घर में बहू आ जाए अर्थात अपना पुत्र जब पिता बन जाए तो व्यक्ति को बाबा के जैसा संयमित जीवन जीना चाहिए। एक घर में एक ही पति रहे ठीक रहता है। एक घर में एक ही पिता रहे वह ठीक रहता है। जब नया पिता आ गया है तो पुराना पिता गौण हो जाएगा। जैसे नया जामाता आ जाता है तो पुराना जामाता फूफा गौ हो जाता है। जब घर में नई
00:06:11:03 मालकिन आ जाए, बहू आ जाए तो जो पुरानी बहू है ना म जोस हो गई है उनको थोड़ा संयमित सात्विक हो जाना चाहिए। घर में रहते हुए बहुत अनावश्यक विक्षेप ना करें। उपासना में विशेषित दें। जब घर के लोग पूछे कि इस प्रकरण में क्या करना चाहिए तो मांगने परामर्श दिया जाए, सलाह दी जाए। बिना मांगे परामर्श देंगे तो उपेक्षित हो जाएंगे। तो घर भवन में रहते हुए भी वन में रहने का जैसा वानप्रस्थ और ब्राह्मण मात्र के लिए चतुर्थ अवस्था आने पर सन्यास का अधिकार है तो सन्यासी हो जाए। ब्राह्मण को तो घर में बिस्तर पर पड़े पड़े प्राण त्यागना महापाप है। एक अपराध है। ब्राह्मण तो तुर्या अवस्था में तुर्या आश्रम में ही जाते हुए अपने इस जीवन की यात्रा को पूर्ण करें। मैंने थोड़ी कड़ी बात कह दी है और बहुत आवश्यक है। ब्राह्मण में भी लिप्सा रही, ब्राह्मण में मोह रहा, आसक्ति रही तो ब्राह्मण शरीर में आने का अर्थ क्या हुआ? इसलिए यथासंभव प्रत्येक ब्राह्मण को चतुर्थ अवस्था आने पर चतुर्थ
00:07:26:04 आश्रम में प्रवेश करना ही चाहिए। ब्राह्मण को ही करना चाहिए। किसी दूसरे के लिए तो सन्यास है ही नहीं। जी जी नारायण महाराज जी मैं ये पूछ रहा था इससे अलग हटके थोड़ा सा कि क्या ब्रह्मचर्य के समय भी हम ये तय कर सकते हैं कि हमें हां ये रह गया आप जो आप जो वाले ब्रह्मचारी मतलब आप जो कहना चाह रहे थे तो एक हम क्रम बताएं आश्रमात आश्रमम ब्रजेत एक स्वाभाविक सामान्य नियम है जी ऐसा ही होना चाहिए परंतु कदाचित ब्रह्मचर्य आश्रम में रहते-रहते जन्मांतरीय संस्कार के उद्बुद्ध होने पर जी वैसा अनुभव होने लगे कि नहीं ये नाशवान संसार का कितना सेवन करना है और कब तक करना है। कितने जन्मों तक इसी एक ही ढर्रे पर लगातार भटकना है। तो फिर शास्त्र कहते हैं कि जिस समय चित्त में वैराग्य का भाव उदित हो उसी समय सन्यस्त हो जाए। ब्राह्मण माने यह जो लैंगिक सन्यास है यह केवल ब्राह्मण के लिए है और कोई विद्वत सन्यास के क्रम में सन्यास के उस भाव को जीना चाहता है कि जहां समाज से कुछ अपेक्षा नहीं है कुछ चाहिए नहीं देना ही देना है सन्यास का मतलब लेना
00:08:41:08 नहीं है इसलिए सन्यासी को स्वर्णाधिक लेना ये स्वीकार्य नहीं है जी वो बातें कह कोई आचार्य होने के नाते कहे कि हम आचार्य को अधिकृत है सब चलता है। परंतु मूलत ये ठीक नहीं है। तो जिस समय जिस समय चित्त में वैराग्य का उदय हो जाए उसी समय सन्यस्त हो जाए तो ब्रह्मचर्य आश्रम साक्षात सन्यास में भी जाया जाता है। जैसे जैसे आद्य जगतगुरु शंकराचार्य ब्रह्मचर्य आश्रम की भी अत्यंत कोमल पूर्व भूमिका में ही सीधे सन्यस्त हो गए।
00:09:21:06 ठीक है महाराज जी इसमें थोड़ा सा एक आध्यात्मिक प्रश्न एक आ रहा था कि जैसे भगवत अवतार जो होता है उसको हम नित्य मानते हैं या नहीं मानते हैं यदि नित्य नहीं मानते तो फिर उसमें ईश्वरत्व कैसे घटित होता है ये थोड़ा सा एक दार्शनिक प्रश्न ये थोड़ा उलझी हुई बात हो जाएगी और कक्षा से थोड़ी ऊपर हो जाएगी दो प्रकार की पद्धति पद्धतियां है विवेचना की और ये प्राय चली आ रही है। हम जिस पद्धति का आलंबन करके विचार करते हैं उसे कहते हैं विवर्तवाद और एक दूसरी भाव प्रस्थान की पद्धति जहां परिणामवाद चलता है। तो वेदांत विधा के दो पारिभाषिक शब्द हैं। विवर्तवाद और परिणामवाद। जी तो जब आप विवर्तवाद की बात करते हैं तो ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या जीवो ब्रह्म ना परह ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या तो यहां फिर कुछ भी शेष नहीं रह जाता है। जब आप निर्विशेष ब्रह्म की बात करते हैं तो फिर आपको कुछ भी जैसे विवर्तवाद क्या है? रस्सी
00:10:36:24 में असर्प भूत रज्जु में असर्प भूतायाम रज्ज वो सर्प नहीं वहां सर्प नहीं है रस्सी में केवल रस्सी है पर भ्रांति के कारण आपको वहां सर्प का आभास होने लगा तो है क्या बोले है तो रस्सी तो ये सर्पत्व कहां से आया सर्प प्रतीति कहां से आई बोले भ्रम के कारण भ्रांति के कारण अज्ञान के कारण हुआ तो वस्तुत ब्रह्म सत्ता में जो जगत की प्रतीति हो रही है, जगत का आभास हो रहा है, इसलिए वेदांतियों के यहां पर तीन प्रकार से विचार किया जाता है। एक व्यावहारिक सत्ता है और एक प्रातिभाषिक सत्ता है और एक पारमार्थिक सत्ता है। तो यदि हम विवर्तवाद की दृष्टि से विचार करें तो एक ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी शेष है ही नहीं। पारमार्थिक सत्य हो गया। हां हां व्यवहारिक की दृष्टि से तो फिर होता ही है। अज्ञान की निवृत्ति से पूर्व तक यह भाषित होता है। ज्ञानोत्तर दशा में कुछ शेष नहीं रह जाता है। परंतु हम परिणामवाद की दृष्टि
00:11:52:04 से विचार करते हैं। तो परिणाम का तात्पर्य परिणामवाद का तात्पर्य दूध का दधी के रूप में परिणत हो जाना। तो उस भाव प्रस्थान का सौंदर्य यह है कि अधिष्ठान दोनों का एक ही है। विवर्तवाद में भी अधिष्ठान के रूप में ब्रह्म को स्वीकार किया गया है। और परिणामवाद में भी आधार हेतु निमित्त कारण उपादान जो भी आप कहे अधिष्ठान वही ब्रह्म ही है। परंतु अंतर इतना है कि वेदांतियों ने कहा कि ब्रह्म का विवर्त है यह प्रपंच यह जगत पर भाव प्रस्थान के मानने वाले परिणामवादियों ने कहा कि नहीं नहीं ब्रह्म ही परिणत होकर के परमात्मा ही परिणत होकर के ईश्वर ही भगवान ही परिणत होकर के जगत के रूप में परिलक्षित हो रहा है। तो जब आप विवर्तवाद की बात करते हैं तो वहां उपासना के लिए अंगीकृत द्वैत को आदर द्वैत को आदर देते हुए भी अद्वैत में परिनिश्चित होना ही अभीष्ट है। जब भी आप कहोगे राम सविशेष की बात करोगे, पुस्तक की बात करोगे, वस्तु की बात करोगे, व्यक्ति की बात करोगे तो तीनों कालों का प्रयोग होने लग जाएगा। आपको महाराज दशरथ थे तो थे
00:13:07:06 तो बोलते बोलते हां राम यहां गए थे राम वहां गए थे जब भी आपने थे किया या होगा कहेंगे तो सब कालकृत परंतु ब्रह्म तो त्रिकाला बाध्य है इसलिए सत कहने का तात्पर्य अस्ति ब्रह्म के लिए सदा अस्ति प्रयोग होगा भविष्यति नहीं हो सकता अभूत नहीं हो सकता अभवत नहीं हो था ऐसा जिसके लिए प्रयोग हो रहा है वह चिंतनीय हो जाएगा। इसलिए भाव प्रस्थान की सुंदरता का समा यही कहेंगे कि विवर्तवाद की दृष्टि से ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। और परिणामवाद की दृष्टि से कहेंगे कि हर कुछ सब कुछ परमात्मा ही है। भगवान ही है। तो महाराज जी तो इसको ये मान ले कि भाव प्रस्थान व्यवहार हो गया कि व्यवहार की दृष्टि से भगवान नित्य है। इस तरह से मतलब जो अवतार है हां ये सुंदरता है विचार की ये सुंदरता है विचार जब तक हम जैसे उसमें नहीं जाएंगे पारमार्थिक दृष्टि हमें प्राप्त नहीं है जब तक तो तब तक तो भगवान जितनी बार भी अप्रकट हो गए
00:14:22:19 और फिर प्रकट हो सकते हैं। फिर तो उनका वो विनाश तो सिद्ध हो नहीं रहा है। इसलिए भगवान का आना और जाना उतरना माने आविर्भूत होना और तिरोभूत होना तिरोहित होना भगवान के अवतार आदि का जो जितना भी उल्लेख किया जाता है उसका तात्पर्य ये नहीं है कि भगवान आए और फिर चले गए कहां से आए कहां चले गए जो सर्वव्यापक परमात्मा है उसका कहां से आना जाना सधेगा वो धरा धाम को त्याग करके भगवान अपने लोक को चले गए ऐसा उसका तात्पर्य ऐसा नहीं है चले गए तो मंदिरों में फिर यहां कौन है बिल्कुल भगवान कहीं जाते नहीं है। भगवान हो गए। एक कालावधि में जिस उद्देश्य के लिए सगुण होकर के साकार होकर के अवतरित हुए उस उद्देश्य को पूर्ण करते ही भगवान दृष्टि से ओझल हो गए। जी इन चर्म चक्षुओं को नहीं दिखते। हृदय की चक्षुओं को दिखने लग जाते हैं। अवतार काल में भगवान चर्म चक्षुओं को भी दिखते हैं। परंतु जब भगवान के अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है उनका तिरोधान होने का तात्पर्य है कि अब इसके बाद जिनके हृदय पावन है उनको वो हृदय के नेत्रों से दिखाई देंगे। इन चर्म चक्षुओं से नहीं दिखाई देंगे। किसी किसी सत्पात्र को दिखेंगे। ये तात्पर्य है। ठीक है महाराज। अच्छा
00:15:37:20 महाराज जी इसमें एक एक हम गुरु परंपरा का एक प्रश्न ले लेते हैं। गुरु परंपरा की महत्व क्या है और मतलब कैसे हमारे जो सिद्धांत हैं क्योंकि आजकल क्या है ना बहुत सारी संस्थाएं हो गई हैं स्वयं को गुरु विहीन है उनका पीछे की कोई परंपरा नहीं है और वो कोई भी सिद्धांत जो है हमारे जो सनातन सिद्धांत है उनके विरुद्ध जो है भाषित कर रही हैं तो गुरु परंपरा के महत्व पर थोड़ा सा प्रकाश डालिए ये कुछ वर्षों से ऐसा चला मुझे लगता है कि पहले भी होगा थोड़ा बहुत परंतु कबीर के समय में एक बात कही गई उन्होंने कहा कि
00:16:20:02 मैं कहता आंख की देखी तुम कहते पुस्तक की लेखी और मैं कहता आंख की देखी। ये कुछ बात थोड़ी इधर उधर भी हो सकती है। पर कबीर की दूसरी वाली बात तो पक्की है। वो कहते हैं कि मैं कहता आंख की देखी। और इस धारा का आश्रय लेकर के बहुत अनेक प्रकार के जड़ बौद्धवाद के माने बौद्धवाद का तात्पर्य बहुत महात्मा बुद्ध वाले संप्रदाय की बात नहीं कर रहा हूं। बौद्धिकवाद का तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक क्रम तैयार होता चला गया। उसी में ओशो भी आ जाते हैं। उसी में आजकल के अनेक प्रकार के इनके नाम लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। अनेक प्रकार के तथाकथित ज्ञानी गुरु आचार्य न जाने कौन-कौन तैयार हो जा रहे हैं। हमारे यहां निर्मूल चिंतन का कोई आधार नहीं है। कोई आदर नहीं है। हमारे सनातन की सुंदरता यह है। आप भागवत जी देखें चाहे उपनिषद देखें। जब किसी जिज्ञासु ने किसी सक्षम समर्थ आचार्य से प्रश्न किया तो प्रश्न सुनते ही वो जो उत्तर देने के निमित्त निर्धारित किए
00:17:35:08 गए हैं समझे गए हैं जैसे उदाहरण के लिए देवर्षि नारद भगवान नारायण से प्रश्न करते हैं नर नारायण में से नारायण से प्रश्न करते हैं तो जो भी प्रश्न किया जा रहा है मान लीजिए सोनक जी महाराज सूत जी से प्रश्न कर रहे हैं अथवा विदुर जी महाराज मैत्रे से प्रश्न कर रहे अथवा अन्यत्र जहां कहीं भी हम उपलक्षण के रूप में दो तीन नाम ले रहे हैं। तो प्रश्न को सुनते ही सबसे पहले उत्तर देने वाले ये नहीं कहते कि मेरा मौलिक चिंतन है। यह मेरा मौलिक विचार है। यह मेरे मेरा अपना विचार है। वो सध्या सनातन धर्म की सुंदरता बता रहे हैं। वो कहते हैं अरे यह प्रश्न तो अमुक अमुक महापुरुष ने अमुक अमुक महापुरुष से अमुक अमुक स्थान पर तब किया था। जी वो समय भी बता रहे हैं। वो स्थान भी बता रहे हैं। पूछने वाला भी बता रहे हैं और बताने वाला भी बता रहे हैं। इससे हमारा अहंकार हर्ट नहीं होगा। अभी तो मेरी प्रामाणिकता मेरे ज्ञान की प्रामाणिकता सिद्ध होगी। कि मैं जो बताने जा रहा हूं वो मेरा नहीं है। ये हजारों लाखों वर्ष पहले अमुक महापुरुष ने अमुक महापुरुष से अमुक स्थान पर अमुक तीर्थ में और यह प्रश्न किया था। उन्होंने जो बताया
00:18:50:09 मैं तुमको बताने जा रहा हूं। ऐसा कहने से एक तो कृतज्ञता हो गई। जहां से मुझे प्रश्न का उत्तर मिला है। उस आर्ष परंपरा, ऋषि परंपरा, उस गुरु परंपरा, कुल परंपरा, आचार्य परंपरा के प्रति मैंने कृतज्ञता ज्ञापित कर दी तो मैं निर्दोष हो गया। दूसरा मैं बताने जा रहा हूं तो मेरे चित्त में कोई अभिमान नहीं आएगा कि मैंने कुछ बताया है। मेरे पास तो रखी थी वस्तु मैंने उठा के दे दी है। मेरे पास फूल था मैंने फूल दिया। फल था फल दिया। नहीं होता तो आजकल के तथाकथित बुद्धिजीवी ऐसे तैयार होते हैं। बोले नहीं नहीं ये नहीं जी मैं बता रहा हूं। यह मेरा अपना पर्सनल मेरा अपना मेरा अपना ज्ञान है। जी ऐसा कहने से एक तो आपकी अप्रामाणिकता हो जाती है। दूसरी आपको उस सामान यद्यपि ऐसा दुनिया में कोई ज्ञान नहीं है जो आप अपने से उधार लेके आए उतार करके लाएंगे। आएगा ग्रंथों से आएगा आचार्यों से आएगा किसी और से परंतु आपका अभिमान परिपुष्ट हो गया कि मैं यह मेरा है ये मैं हूं इससे अहंकार हो जाएगा और अहंकार ही पतन का कारक है। इसलिए मैं समग्र सनातन धर्म के प्रति आस्था रखने वाली वो चाहे भारत के
00:20:05:15 अंदर रहती हुई धर्म प्राण प्रजा हो चाहे भारत के बाहर रहने वाली भारत के प्रति आस्था रखने वाली प्रजा हो भारतीय भावों के प्रति आस्था रखने वाली प्रजा हो सनातन संस्कृति से प्रेम करने वाली प्रजा हो ऐसा हो सकता है भारत के भावना से भरा वो भारत में नहीं रह पा रहा है भारत से दूर जाना पड़ा है जीविका के लिए किसी अन्य कारण के लिए कारण से उन सबसे कहना चाहूंगा कि आचार्य परंपरा के रूप में, गुरु परंपरा के रूप में, आचार्य के रूप में, गुरु के रूप में यह तथाकथित कोई 100 वर्ष का, कोई 200 वर्ष का, कोई 400 वर्ष का, कोई हजार वर्ष का, कोई 2000 वर्ष का इनके चक्कर में नहीं पड़ना है। और ना ही यह विश्वास करने योग्य बात है कि वेद 5,000 साल पहले लिखे गए हैं। हमारी ये 10,000 साल पुराना है। आप सनातन धर्मियों जो सनातन धर्म में आस्था रखते हैं जो भगवान के अवतारवाद में आस्था रखते हैं जो वेदों के प्रति श्रद्धा रखते हैं उनका करोड़ों करोड़ों नहीं अरबों अरबों वर्षों का जीवन है उनके पास में अरबों वर्षों की परंपरा है तो अरबों वर्षों की परंपरा वाले ये हजार दो हजार वर्षों की वालों की नकल करेंगे तो दीन ही माने जाएंगे हिंदू सनातन धर्मी हिंदू
00:21:21:10 यदि वो ईसाइयों का अनुकरण करें इस्लाम का अनुकरण करे या किसी और का अनुकरण करें तो ऐसा लगेगा जैसे कोई सिंह का बच्चा किसी सियार से मार्गदर्शन पाने की चाह रख रहा है। किसी स्वान से मार्गदर्शन पाने की चाह रख रहा है। अच्छा महाराज जी इसी क्रम में क्या हो गया है? अब कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सीधे-सीधे कहते थे कि भाई हमें हमारी कोई गुरु परंपरा नहीं है। हम यह वेद है और जो वेद का अर्थ हम अपने मन से कर रहे हैं। तो इसमें हमारा हम उनसे वही प्रश्न करते हैं कि भाई ये वेद आपको कहां से मिले हैं जिससे मिले हैं? यदि आप उसके अर्थ पर विश्वास नहीं करते तो फिर उसके द्वारा दिए गए वेद मंत्रों पर विश्वास कैसे? और यदि वेद मंत्रों पर विश्वास है तो उसके द्वारा दिए गए अर्थ पर विश्वास दावना सिद्ध नहीं होता। मतलब किसी से आप आधी चीज बांधे आधी चीज ना बांधे ऐसा तो कर नहीं सकते। अब वेद आपको किसी परंपरा से मिले हैं। अगर जैसे जो लोग ये दावा करते हैं 20,000 साल पहले वेद उतरे तो 20,000 साल पुराना भी उनका इतिहास प्राप्त नहीं है। तो फिर वो वेद उनके पास आए कैसे? तो जिनका इतिहास प्राप्त है उनहीं से बांधना पड़ेगा। तो जब आपका वेद मंत्र आ उससे रहा है परंपरा से तो आप परंपरा के विरुद्ध जाकर के सिद्धांतों की वो सिद्धि नहीं कर सकते। तो ये हमारा थोड़ा सा
00:22:36:12 होता है। मगर अभी क्या करने लगे हैं कुछ लोग? जैसे कई ऐसे स्वषित गुरु आचार्य वगैरह हैं। वो यह दावा करने लगते हैं कि हमको जो है स्वप्न में आकर के या जो है जैसे रामपाल इत्यादि कि हमको वहां दर्शन दे दिए उन्होंने है ना ऐसे कई स्वाभूषित इस समय आचार्य बन रहे हैं। गुरु बन रहे हैं। तो वो कह देते हैं कि हमको जो है स्वप्न में आकर के अब प्रश्न लंबा होता चला जाएगा। रामपाल का नाम लिया आपने बहुत अच्छा भगवान का नाम आ गया। पर मुझे बहुत आश्चर्य इस बात का होता है। जी उस व्यक्ति को लेकर के मुझे बहुत ज्यादा चिंता नहीं और बहुत ज्यादा विचार करने का मुझे दया आती है। मैं महाराज जी एक बस पूरा कर लूं अपना एक छोटी सी बात रह गई तो उसमें फिर ये होता है कि ऐसा सिद्धांत सुन पूरी के शंकराचार्य जी ने भी बताया था यदि आपको स्वप्न में भी कुछ प्राप्त हो जाए फिर भी उसको किसी प्रामाणिक जो परंपरा आचार्य परंपरा उससे जाकर के उसको सत्यापन करवाना है। अगर नहीं करवाया तो वह आपका जो ज्ञान आपको प्राप्त हो रहा है जो आप दावा कर रहे हो कि हमको जैसे ब्रह्मा कुमारी वाले हैं वो कहते हैं हमको ब्रह्मा जी आ करके स्वयं ज्ञान देते हैं तो उसकी उन्होंने सत्यापन नहीं कराया इसलिए उसको प्रामाणिक नहीं माना जा सकता और ये नहीं माना जा सकता कि ब्रह्मा जी ही आए जब तक मतलब गुरु परंपरा पे किसी ना किसी पे आपको आश्रित होना ही पड़ेगा जो प्रामाणिक
00:23:51:15 गुरु परंपरा है और जब आप आश्रित हो गए तो आपको मानना पड़ेगा कि मैं इस गुरु परंपरा का हूं। ठीक है? तब आप अपनी स्वतंत्र गुरु परंपरा शिवश भैया इसमें प्रश्न भी आपका और उत्तर भी आपका। सारा आपने कह दिया। बहुत अच्छे ढंग से सारी बात आपने कह दी। सही बात ये है कि आप ये हमको बताना चाहते हैं आप हमको बताना चाहते हैं कि ये मुझे सपने में स्वप्न में आदेश प्राप्त हुए हैं। मान लेंगे तुम्हारी बात। मान लेंगे। हमारे यहां स्वप्न विज्ञान है। परंतु जो आप इस भाव को हमें मनवाने के लिए इतना उद्यम कर रहे हो तो जिस सत्ता ने आपको स्वप्न में आदेश दिया उस सत्ता को कृपया यह कह दो कि इन हजारों लोगों को लाखों लोगों को यह बात बता दो। ये स्वप्नादेश आप बता रहे हो। स्वप्नाभास बता रहे हो। स्वप्न के माध्यम से कुछ विशिष्ट विद्या प्राप्त तो उस प्रयत्न को तुम कर रहे हो कि साहब मुझे सपने में प्राप्त हुआ है। तुम मानो इस बात को ऐसा कर सकते हो ना तुम तो बहुत पहुंचे हुए हो कि जिनजिन लाखों लोगों को करोड़ों लोगों को हम इस स्वप्न के द्वारा प्राप्त अपूर्व ज्ञान विज्ञान को बताने में मेहनत कर रहे हैं। कोशिश कर रहे
00:25:06:16 हैं। द्रविड़ प्राणायाम कर रहे हैं। फिर भी लोग मान नहीं रहे हैं। तो ऐसा करो ना जो नहीं मान रहे हैं। प्रभु आप उनके सबके सपने में आकर बता दो तो झंझट ही खत्म हो जाएगा पर बात यह है कि अपनी अप्रामाणिकता को अपनी उच्च श्रृंखलता कोत्वाकांक्षा को अपने तर्कों के द्वारा समाज पर थोपना यह ना तुम्हारे हित में है और ना ही समाज के हित में है। यह उचित नहीं है। हम ये मानते हैं स्वप्न विज्ञान है। शास्त्रों में इसका विषद वर्णन है। परंतु जिस व्यक्ति के लिए स्वप्नादेश है वो उसका गोपन करे। जी स्वप्न का प्रकाशन भी वो आत्म कल्याण के लिए उसका प्रयोग पहले करो। लोक कल्याण की बात बाद में अपने आप हो जाएगी। जी जी तो लोक में तो स्थापित तभी कर सकते हैं जब कोई हमारी प्रामाणिक गुरु परंपरा बस यही बात है। बिल्कुल बिल्कुल जो स्वप्न के द्वारा प्राप्त स्वप्न के द्वारा प्राप्त जो ज्ञान विज्ञान है उसका भी सत्यापन कराने के लिए जो प्रतिस्थापित प्रामाणिक आचार्य परंपराएं हैं उनकी आश्रित होना चाहिए। अनुगत होना ही चाहिए। मैं इसलिए कहना चाहता हूं आपने रामपाल का नाम लिया था। जी तो मुझे बहुत आश्चर्य इस बात का होता है जो व्यक्ति अपने जीवन में पूरे जीवन में आज तक एक श्लोक शुद्ध नहीं बोल सकता एक किसी श्लोक का शुद्ध अर्थ नहीं कर सकता और थोड़े श्लोक की तो कोई बात नहीं देव वाणी है उस देव वाणी तो बिना पूर्व जन्म के पुण्य के किसी को प्राप्त नहीं हो सकती मान लीजिए जिस हिंदी भाषा
00:26:21:22 में जिस सामान्य भाषा में जिन कबीर जी के बारे में वो लोग बोलते हैं उनके द्वारा रचित दोहे शुद्ध सुना दे एक दोहा कोई शुद्ध बोल दे तो तभी तो समझ में आवे यहां कुछ है पर ऐसे लोगों के अनुसरण करने वाले भी लाखों की संख्या में है तो दया के पात्र वो नहीं है जो बरगला रहे दया के पात्र वो है जो भेड़ चाल चलते हुए पीछे पीछे भाग रहे हैं भगवान राम भगवान कृष्ण भगवान भगवान सदा शिव भगवान विष्णु भगवान सूर्य भगवान गणपति भगवान भगवती मां जगदंबा के रूप ये तुम्हारा कल्याण नहीं करेंगे अब भगवान हनुमान जी कल्याण करने में सक्षम नहीं है ये नए-नए जो पीर पैगंबर फकीर देवता और लोक देवता ये जो तैयार किए जा रहे हैं ना मरे जा रहे हैं ये धर्म के नाम पर धंधा है दुकानें हैं ये प्राइवेट लिमिटेड है जी इसलिए सनातन धर्मावलंबी जो प्रजा है धर्म प्राण जो जनता है हम तो यही कहना चाहेंगे भैया मूल देखो परंपरा देखो भाषण और आचरण दोनों में एक हो ऐसा तो कुछ चुनो ऐसा तो कुछ देखो अच्छा महाराज जी ये लोग क्या करने लगे हैं अब ऐसे खुद को इस तरह से स्वप्नादेश से आचार्य स्थापित ित करके अच्छा यह तो है कि अगर मान लीजिए सत्यापन कराया उसने अगर कि जिस परंपरा से तो उसको उसी परंपरा का माना जाएगा कि उस परंपरा से क्योंकि उसके स्वप्नादेश का सत्यापन हो रहा है तो उसी परंपरा का उसे मानना पड़ेगा। इसके बाद में कुछ ऐसे स्वयं को बता रहे हैं जैसे कि हमने अपने आप स्वप्नादेश से अपने को किसी परंपरा से जोड़ लिया सत्यापन कराया नहीं या खुद से अपना कुछ गढ़ लिया। अब उसके बाद जो है मुसलमानी पूजा पद्धति हो गई, इस्लामिक
00:27:36:28 या क्रिश्चियन पूजा पद्धति हो गई। इसको भी मिक्स कर रहे हैं वो हमारे सनातन धर्म के साथ। जैसे मतलब मैं ये पूछना चाहता हूं क्या कोई भी वैदिक आचार्य कभी जो मुसलमानी पूजा पद्धति इत्यादि वो किसी को देगा क्या? जैसे ये आपका आपका लक्ष्य बहुत विराट है। बड़ा है। आपकी अभिव्यक्ति में उदारता है। जी आप छोटे दायरे में आने लग रहे हैं। इस बात को ऐसे समझे कि व्यक्ति परिस्थितियों में फंसा हुआ किस-किस पद्धति से आवे आज किस-किस पद्धति से अपना लक्ष्य साधन कर सकता है। वो उसकी अपनी परिस्थितियां हैं। मैं कहता हूं कि जो जो वेद परंपरा का जो वेद परंपरा का उपासक है उसको तुच्छ विद्याओं में अपनी मति नहीं लगानी चाहिए मन नहीं लगाना चाहिए वहां प्रवृत्त नहीं होना चाहिए ये एक सिद्धांत की बात है जी जो वेदोपासक है देवोपासक है वेद में ऐसा क्या है जो वेदों के द्वारा सिद्ध ना होगा ऐसा क्या
00:28:52:04 है देवानुग्रह से सिद्ध ना होगा जी और फिर भी किसी को ऐसा लगता है कि जिनके अपने निजी व्यक्तिगत अनुभव है तो वो उनकी समस्या जी हैं। मेरी मेरी समझ में मैं समझता हूं जो स्वयं को वैदिक मानता है देवोपासक मानता है उसको विशुद्ध सात्विक आचार से सात्विक आचार का आलंबन लेते हुए जो अपनी आस्तिकता और सात्विकता है जो सनातन स्वरूप है आस्तिकता और सात्विकता का उसका संरक्षण करना चाहिए तो ही उनका आचार्यत्व प्रतिष्ठित होगा और प्रमाणित होगा और आदरणीय होगा और यदि कदाचित धारा से विरुद्ध जाते हैं तो फिर लांछन भी लगता है, आक्षेप भी होता है, उपेक्षा भी होती है और उपहास भी होता है। तो जो सक्षम हैं उनको अपनी आस्तिकता, सात्विकता, दैवी उपासना का, देवी उपासना का आदर करना चाहिए। तो महाराज जी जो स्वयं को कह तो रहे हैं कि मैं प्रामाणिक हूं। परंतु समय आने पर जो है फलानी इस्लामिक पूजा किसी को दे दी तो ऐसे में उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह तो उठ जाएगा। बिल्कुल लगेगा और मेरी जानकारी में ऐसे कोई लोग विशेष रूप से मेरी जानकारी में है नहीं कि वैदिक होकर के कोई उपासना
00:30:07:20 पद्धतियों में ऐसा नकारात्मक भाव लाएगा। हमारे यहां बहुत अवकाश है। आवश्यकता नहीं है 1400 साल पुरानी किसी तथाकथित उपासना का आलंबन लेने की। हमारे यहां अनादि काल से बाम मार्ग की पद्धतियों में इतनी सशक्त उपासना है। क्या करेगा कोई और? तो इस्लामी पद्धति की कोई उपासना यदि चल रही है तो कितने साल पुरानी हो गई? 1400 साल पुरानी। जहां से मोहम्मद साहब शुरू हुए हैं। जहां से कौन? मोहम्मद जी आरंभ हुए हैं जहां से तो इतना काहे 14 साल पे काहे अटकते हो? हमारी बाम मार्ग की उपासना तो अरबों साल पुरानी है। उपासना पद्धति में दक्षिण मार्ग बाम मार्ग दोनों है ना। करना ही है तो अपनी प्रामाणिक उपासनाओं में जाना चाहिए। तो ये ये किसी की व्यक्तिगत समस्या होगी। इसका सार्वजनिक स्वीकार्यता जी अच्छा महाराज जी इसमें एक चीज है कि क्या जैसे हमारी कई प्रामाणिक परंपराएं हैं जैसे श्री संप्रदाय है। एक मधु संप्रदाय है। शंकराचार्य परंपरा है हमारी। ऐसे कई हमारी प्रामाणिक परंपराएं हैं। तो क्या ऐसा संभव है कि कोई एक ऑथराइज्ड कोई सेंटर हो जहां से
00:31:22:24 इन सभी परंपराओं का नियंत्रण किया जाए। जब भी नियंत्रण करने की बात आएगी तब अधिनायकता बात आएगी, अभिमान आएगा और जैसे ही नियंत्रण की बात आएगी तो नियंत्रित होने वालों में एक समय के बाद में आक्रोश पनपेगा, विद्रोह पनपेगा। नियंत्रण का तात्पर्य ऐसा नहीं हो कि मेरे अनुसार चलो। नियंत्रण का तात्पर्य एक अवसर सनातन एक अवसर देता है। हमारे यहां हमारे सनातन धर्म की सुंदरता है कि यहां सामूहिक रूप से कोई उपासना का प्रकल्प ऐसा नहीं है कि तुमको करना ही होगा। एक घर में यदि 10 लोग हैं तो दसों के दसों अपनी अभिरुचि के अनुसार इष्ट देव का चयन कर सकते हैं। दसों के दसों जी। और एक घर में रह रहे हैं। एक राम का उपासक है, एक कृष्ण को मानता है। एक महादेव का उपासक है और एक भगवती की पूजा करता है। और सारे सनातनी है। तो एक सेंट्रलाइज करने की जब भी चाह होगी अधिनायिकता अधिनायिकतावाद आएगा और वो विद्रोह का कारण बनेगा। यहां परिवर्तन स्वतः हो। जी। परिवर्तन प्रेरणा से हो। परिवर्तन आपके अवलोकन से हो। परंतु कह करके कि एक साथ फिर
00:32:37:27 कठिन हो जाएगा। तो महाराज जी फिर मतलब जैसे एक इसमें तार तारतम्य यह है जैसे किसी ने पीएचडी कर रखी है तो पीएचडी करने वाला आज डॉक्टरेट की उपाधि लिए हुए व्यक्ति है उसने आज छुपाया है एक उसी के साथ में बैठा हुआ कोई पंचम कक्षा का या अष्टम कक्षा का अथवा जो भी दसवीं कक्षा का है तो आज जो पीएचडी होल्डर है डिग्री धारी है वो भी कभी पंचम कक्षा का अष्टम कक्षा का दशम कक्षा का व्यक्ति रहा है जी तो कक्षा वाइज कक्षा ऐसा समझे सोपान है सब पथिक हैं और अदृष्ट जितने उपासना के प्रसंग हैं सारे सारे अदृष्ट हैं। अदृष्ट में किसकी कितनी गति है ये भी सबकी भिन्न-भिन्न हो जाती है। उपासना पद्धतियां भी कक्षा के क्रम से समझी जाए। जी जी तो महाराज जी इसमें जैसे मान लीजिए एक एक तार्किक मैंने वो देखा था तार्किक दृष्टि से। आपने भी तार्किक ही दिया है। एक और मतलब देखने का एक दृष्टिकोण हो सकता है। जैसे कोई ये अगर ये दावा करे कोई कि मतलब अगर वो नियंत्रण करने वाला है मान लीजिए सभी परंपराओं में तो सबसे पहले तो उन सारी परंपराओं को उसका विधिवत गुरुगम्य विद्या से ज्ञान होना चाहिए। होना चाहिए। होना चाहिए। अब बात ये आ जाएगी कि उसमें से
00:33:52:28 उसका मत क्या है? क्योंकि सभी परस्पर कहीं ना कहीं तो एक जगह जाकर के एक दूसरे का विरोध है। तभी तो परंपरा दूसरी है। तो पहली बात तो यह उसकी अपनी परंपरा की बात आएगी कि उसका सिद्धांत क्या है? दूसरी बात सारे सिद्धांत उसको परंपरा से होने चाहिए। अब जब उसके सारे सिद्धांत उसे परंपरा से प्राप्त हैं तो फिर वो उन सब का शिष्य भी हो गया। अब जब शिष्य हो गया तो फिर गुरु पर प्रश्न कैसे उठा सकते हैं? यह भी एक बात है ना। या तो फिर स्वयं भगवान से ही उसको सारा ज्ञान मिल जाएगा। असहमति के जी असहमति के बहुत सारे कारण पनप जाते हैं आगे बढ़ते-बढ़ते और यह लगे कि आचार्य जैसे कुमारिल भट्ट हैं यही प्रतिष्ठानपुरम को केंद्र बना करके कुमारिल भट्ट ने अपना प्रायश्चित साधन किया वो बौद्ध मत का जो भी आमूलचूल ज्ञान विज्ञान रहा जो जो भी विचार रहा उसको सीखने के लिए नालंदा गए हैं। तो जिन आचार्यों से उन्होंने उनके मत को जाना है उन्हीं आचार्यों को उन्होंने अपने वैदिक मत के आधार पर पराजित भी किया है। आचार्य का
00:35:08:00 तिरस्कार करने का जो दोष है उस दोष के निमित्त उन्होंने प्रायश्चित करना चाहा और किया ही है। आचार्य यदि मार्ग से भटक रहे हैं जी तो अवलिप्त आचार्य के निग्रह का नियंत्रण का अधिकार शास्त्र देता है। उस आचार्य से पृथक होने का अधिकार इस विषय में मुझे जो बहुत सुंदर बात लगती है मुझे आदर्श के रूप में प्रह्लाद जी महाराज बहुत अच्छे लगते हैं। पिता की भूमिका में हिरण्यकश्यपु
00:35:47:27 कितना सही है। यह प्रह्लाद से अच्छा कौन बता पाएगा? जी प्रह्लाद जी महाराज जान रहे हैं कि मेरे पिता और इस समय जिनके हाथ में सत्ता है, शासक है इनका विचार अच्छा नहीं। अच्छा होता तो अनुकरण करते। इसलिए अनुकरण नहीं किया। पिताजी को प्रत्यक्षतया जान रहे हैं कि अधार्मिक है, नास्तिक है, अश्वरवादी है, अधिनायकवादी है। तथापि पुत्र का क्या कर्तव्य है? इस बात को कभी विस्मृत नहीं करते हैं।
00:36:24:00 जब भी पुत्र की भूमिका में वो अपने पिता के सामने खड़े होते हैं, दंडवत प्रणाम करते हैं। उन्होंने कभी नहीं कहा महापापी है, कैसा पिता है मैं इसे प्रणाम नहीं करूंगा। आजकल के जितने प्रहलाद तैयार हो रहे हैं, वह अपने पिताओं को हिरण्यकश्यपु से भी अधिक पतित माने बैठे हैं। और अपने आप को प्रह्लाद जी से भी बड़ा भक्त और ज्ञानी और सदाचारी माने बैठे हैं। तो मैं यह निवेदन करना चाहूं। मैं निवेदन करना चाहूं कि यदि प्रह्लाद जैसा भगवान का परम भक्त भी हिरण्यकशिप जैसे अति अत्याचारी व्यक्ति को पिता की दृष्टि से देखते हैं तो प्रणाम करते हैं तो तुम प्रह्लाद से ज्यादा बड़े आस्तिक धार्मिक सदाचारी और पुण्य आत्मा हो क्या तुम्हारे पिता हिरण्यकश्यप से भी अधिक पतित है क्या जब वो अपने कर्तव्य व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा है दूसरों को सुधारने की चेष्टाएं बहुत करता है। यह है विप्लव का कारण। हमको हमारे कर्तव्यों पर सावधानी पूर्वक सजगता पूर्वक आरूढ़ रहना चाहिए तो समाज अपने आप बहुत अच्छा हो जाएगा। तो महाराज जी जैसे अभी आपने कुमारिल भट्ट जी का और बौद्ध का बौद्धों का वो आपने उदाहरण एक दिया तो वहां तो स्थिति
00:37:39:01 ये आती है कि जब उन्होंने बौद्धों की चीजों को अच्छे से जान लिया है तब वैदिक सिद्धांतों से उनका खंडन किया है तो वहां पर तो ये आधार आवश्यक नहीं होता है कि वो उस बात का खंडन कर रहे हैं जो बात उनको उसी से पता चली है। परंतु जब जैसे हमारे शास्त्र में भी आज्ञा आई है कि यदि हमारे शास्त्रों में भी यह आज्ञा हमें प्राप्त हुई है कि यदि गुरु के आचरण जो है शास्त्रों से विहित मतलब विरुद्ध जाते हुए दिखे तो उतने अंशों में गुरु का अनुकरण नहीं करना चाहिए। परंतु इसका पहला तो यह आता है कि अनुकरण नहीं करना चाहिए। परंतु गुरु की जो व्याख्या है शास्त्रों की व्याख्या या गुरु के जो सिद्धांत है उसका विरोध हम नहीं कर सकते क्योंकि अगर उसका विरोध हम करेंगे तो हमारे पास फिर सिद्धांतों का आना हमारी स्थिति फिर वैसी ही हो जाएगी आर्य समाज ब्रह्माकुमारीज इत्यादि जैसी कि हमारा गुरु कौन है गुरु गुरु वो है जिसने विद्या दी अब जिसने विद्या दी है उस पर हमें विश्वास नहीं है क्योंकि वो हमें लग रहा है कि अमुक अमुक सिद्धांत गलत बता रहा है जब गलत बता रहा है तो हमारा शब्द प्रमाण तो सिद्ध नहीं हुआ तो इस स्थिति में यह है कि गुरु के आचरण का तो आप अनुकरण मत करो अगर वो अपनी ही बताई हुई शास्त्र अच्छा जैसे शास्त्र की भी बात तो शास्त्र कौन
00:38:54:04 से प्रमाणिक होंगे जो गुरु बताएगा वही शास्त्र प्रमाणिक होंगे। तो आचरण की भी बात है तो उसमें यह है कि गुरु ने जो शास्त्रों की व्याख्या की है उसका हम विरोध नहीं कर सकते। गुरु ने जो सिद्धांत बताए हैं उसका विरोध नहीं कर सकते। हां गुरु के आचरण उन सिद्धांतों के शास्त्रों के विरुद्ध जा रहे हैं। तो उतने अंशों में गुरु का अनुकरण ना किया जाए। एक तो ये है अब ये जो शास्त्र की आज्ञा है इसका आलंबन लेकर के क्या गुरु के सिद्धांतों को गुरु के द्वारा दी जाने वाली विद्या पर भी प्रश्न चिन्ह उठाया जा सकता है क्योंकि अगर ऐसा करेंगे तो फिर वो हमारा शब्द प्रमाण सिद्ध नहीं होगा फिर वो हमारी परंपरा सिद्ध नहीं होगी वेदों का हमारे पास आना उसके द्वारा सिद्ध नहीं होगा वही प्रश्न उठ जाएगा जैसे आर्य समाज पे उठता है तो इस पर थोड़ा सा बिल्कुल बहुत आपने लगभग लगभग प्रश्न के गर्भ में ही यद्यपि उत्तर रहता ही है तो अभी आपने बहुत स्पष्टता के साथ में प्रश्न का अंश छोटा रह गया। उत्तर आपने दे दिया है। मेरी भी भावना यही है और प्रत्येक सनातनी की भावना भी यही होगा कि आचार्य यह बात हमारे यहां तैत्रीय तैतरीय उपनिषद में एक अंतिम अर्थात जब वो जैसे समावर्तन कहते हैं समावर्तन बेला में जिसको दीक्षांत आजकल कहने लगे हैं। उस बेला में ये कहा जाता
00:40:09:08 है कि आचार्य उपदेश के रूप में कहते हैं सत्यम वद धर्मम चर स्वाध्याय स्वाध्यायन मा प्रमद मातृ देवो पितृ देवो भव उसी क्रम में एक उपदेश देते हैं कि यानी अस्माकम सुचरितानी तान एव त उपास्यानी मानवीय धरातल पर जीवन जीतेजीते कदाचित ऐसा लगा हो कि मेरे जीवन में कुछ अप्रामाणिक हो गया शास्त्रीय हो गया वो मानवचित जीवन के कारण तो वो तुम्हारे लिए अनुकरणीय नहीं है। जो हमारे सुचरित हैं। सुचरित का तात्पर्य शास्त्रोक्त हमारे आचरण में शास्त्रीयता जहांजहां सुरक्षित रही है वो वो तुम्हारे लिए परम प्रमाण है। कदाचित कभी ऐसा लगे किसी अवसर पर कि शास्त्र ऐसा कहते हैं और आचार्य का आचरण ऐसा है। दोनों में भिन्नता दिखाई दे तो कृपया वहां हमको प्रमाण ना माना जाए। शास्त्र को ही प्रमाण माना जाए। इस दृष्टि से बिल्कुल सही है। आचार्य के आचरण का तभी तक समादर और अनुकरण अपेक्षित है जब तक कि उसको शास्त्रीयता का
00:41:24:09 संरक्षण प्राप्त है। शास्त्र और आचार्य दोनों समेकित हो, सहकृत हो तो हमारे लिए परम प्रमाण होते हैं। बिना आचार्य मुख से प्राप्त शास्त्र और बिना शास्त्र के सिद्धांतों से अनुप्राणित हुए आचार्य अर्थात आचार्य चाहिए वो शास्त्रज्ञ होने चाहिए और जो शास्त्र है वो आचार्य मुख से होने चाहिए। ये दोनों का सामंजस्य दोनों का सामंजस्य होना चाहिए। बहुत सही है। जी तो बात यही आ गई आचरण को तो हम इतर जा सकते हैं। परंतु हम उसके सिद्धांत सिद्धांत नहीं जा सकते। धर्म व्याख्या से विमुख नहीं जा सकते। नहीं जा सकते। लेकिन वहां फिर हमारी अप्रामाणिकता हो। बिल्कुल यही बात है। जी। तो इसी का आलंबन लेकर के कई लोग आजकल के अपने ही गुरु का या अपने ही उन्हीं आचार्यों का जिनसे विद्या प्राप्त हुई है उन्हीं का भाई ये जो दयानंद इत्यादि ये भी तो वही थे। समय क्या है?त्वाकांक्षा
00:42:17:01 जब असीमित हो जाती है। वैसेत्वाकांक्षा महापाप नहीं है। जी कोई बहुत बुरी बात नहीं। महत्व सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा है कि जो सामान्य जीव शिवत्व पाना चाहता है। जो नर है वो नारायण होना चाहता है। जो अणु है वह महत्व होना चाहता है। बुरा नहीं है। परंतु अधकचरीत्वाकांक्षा परंपरा को दाब पर लगा देना। अपने अनुवत्तियों को दाब पर लगा देना। अपनी सारी की सारी जो सनातनी मान्यता उनको दाब पर लगाकर केवल मैं बड़ा हो जाऊं और मैं ही बड़ा हो जाऊं। सबसे ऊपर खड़ा हो जाऊं। यह जो मनोवृत्ति है यह विकार है। यह मानस रोग है। इस इसका तो कोई उपाय नहीं है। उपचार नहीं है। ये विभाजक
00:43:02:19 रेखा खींच पाना भी बहुत कठिन है। जी कहीं अंश रूप में, कहीं अंशांश रूप में, कहीं विशेष रूप में सब जगह कुछ ना कुछ विकार हैं। तो ये विकार ना होते तो फिर ये कैसे कलयुग का प्राधान्य कैसे होता? जी जब धर्म नियमों का धर्म सिद्धांतों का शास्त्र सिद्धांतों का चरण कलयुग में कहा ही गया है। और जैसा जैसा कहा गया है वैसा वैसा हो रहा है। इससे तो हमारे शास्त्र और प्रमाणित हो जाते हैं। इसलिए यह होगा के कारण्वाकांक्षा से भरे हुए अतिवां से भरे हुए जीवों की अधिकता कलयुग में बढ़ेगी। कहां पचता है? थोड़ा किसी को बोलना आता है तो कहां रुक रहा है वो? थोड़ा किसी के पास में धन आता है तो कहां टिकना परंपराओं का सम्मान कहां कर पा रहा है? तो महाराज जी से हमने जाना कि सबसे पहले अगर स्वप्न में कोई व्यक्ति कह रहा है मेरे पास कोई चमत्कारिक शक्ति आई है। उसने मुझे ज्ञान दिया है। स्वप्न में दीक्षा हुई है तो उसका सत्यापन किसी प्रामाणिक परंपरा से आवश्यक है। क्योंकि हमारे सामने तो स्वयं बुद्ध आ गए विष्णु भगवान आ गए थे तो हमने क्योंकि हमारी परंपरा प्राप्त जो ज्ञान विज्ञान था क्योंकि हमने उसको प्राथमिकता देते हम वैदिक है तो हमने उनको ना मान करके अपनी परंपरा प्राप्त
00:44:17:20 शिवास जी इस विषय में एक बात और मैं कहूंगा हम प्रत्यक्ष प्रमाण से भी अधिक सम्मान शब्द प्रमाण का करने वाले हैं। हम सनातन धर्मी चर्म चक्षु नहीं हैं। हम शास्त्र दिक हैं। शास्त्र चक्षु हैं। इसका एक प्रमाण बहुत अच्छा है। भीष्म पितामह अपने पिताजी का श्राद्ध कर रहे हैं। किसी तीर्थ में जी और बड़े भावुक हैं। आचार्य जो पद्धति के अनुसार बता रहे हैं वो करते चले जा रहे हैं। तो उन्होंने कहा कि कुसा पर पिंडदान करना है। भीष्म पितामह श्राद्ध वेला में आचार्य उपदेश से पिंडदान करने हैं। आचार्य ने कहा कि कुसा दरभ कुसा पर पिंडदान करो। तो जैसे ही पिंडदान करने चले अचानक उस बालू में से बहुत सुंदर वो जिसमें रक्त मा है अंजलि में और बहुत सुंदर वही रेखाएं वही अंगूठी दिखाई दे रही वही कंकण दिखाई दे रहा है उनके पिताजी का संतनों का हाथ आ गया और कहा कि इस पर पिंड रखो भीष्म पितामह अपने पिता का हाथ देख के एक बार को तो भावुक हो गए जी बस यही एक पल होता है जब व्यक्ति
00:45:35:15 यदि धीर नहीं है तो बहक जाएगा। जी भावुकता के कारण भीष्म पितामह को लगा कि बहक जाएंगे और पिंड उठाकर के हाथ पर रख देंगे। मन में आया कि साक्षात पिता मांग रहे हैं। तो उन्होंने पूछा आचार्य से भगवान क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा भगवन शास्त्र में तो लिखा हुआ है कि दर्भ पर ही पिंडदान का विधान है। हाथ पर तो विधान नहीं है। एक बात और कहीं कहा हे गंगानंदन आज आप सक्षम हैं। आपकी इस पवित्रता के कारण आपके पितृग साक्षात प्रकट हो गए हैं। और सोचो जब कल कलयुग आएगा तब बड़े से बड़े पुण्य आत्मा के आगे भी हाथ नहीं आ पाएगा। बड़े-बड़े धर्मात्मा के सम्मुख भी उसके पितर हाथ करके पिंडदान नहीं मांगेंगे तो ये संसार कहेगा यह पाखंड है। हम इसलिए आज आप हैं कल नहीं रहेंगे। शास्त्र आज भी है। [संगीत] शास्त्र कल भी रहेगा। शास्त्र कल भी था। इसलिए अच्छा होगा कि शास्त्र की आज्ञा का पालन किया जाए। और भीष्म पितामह ने अपने पिता के प्रत्यक्ष हाथ पर पिंडदान ना रख के कुशा पर रखा। जैसे ही कुसा पर रखा तो आनंद से भरे हुए उनके पिता ने कहा पुत्र मैं तुम्हारी शास्त्र निष्ठा से
00:46:50:21 अत्यंत प्रसन्न हूं। यदि तुम मेरे हाथ पर रखते भावुक हो के तो ये पिंडदान मुझे नहीं मिलता। मैं भुकर रह जाता हूं। जी तो अर्थात शास्त्र की अवज्ञा करके कोई व्यक्ति कुछ भी पाने की बात करता हो उसको बहुत आदर देने की और बहुत चर्चा करने की आवश्यकता नहीं। अच्छा संख्या इन्हीं की ज्यादा है। जी मनमानी करने वालों की। जी जी हम ऐसा समझते हैं भगवान कृष्ण हमारी दृष्टि में अवतारक क्रम में सबसे समीपस्थ भगवत गीता के माध्यम से उपदेश कर रहे हैं। और भगवान कृष्ण को छोड़कर के हम किसको आदर्श माने? वो कहते हैं य शास्त्र विधि उतते काम कारत कामकार माने मनमानी ढंग से तो न सिद्धिम अवापनोति न सुखम अवापनोति न पराम गतिपनोति जी जो मनमाने ढंग से कुछ भी करता है विधान का परित्याग करके व्यवहार निभाने के लिए कुछ भी करता है जी उसको ना तो सिद्धि प्राप्त होती है माने सफलता प्राप्त नहीं होती और ना सुखम माने शांति भी प्राप्ति नहीं होती और ना पराम गतिम कोई मनुष्य कुछ भी करता है उसके तीन उद्देश्य होते हैं। भाई मैं करूं तो सफलता मिल जाए। मन को शांति सुकून मिल जाए और अंत में सद्गति हो जाए।
00:48:06:02 वही तीनों नहीं मिलने हैं तो फिर क्या कर रहे हैं हम? बिल्कुल। तो अभी हमने एक क्रम से ले लेते हैं। हमने क्या जाना है गुरु परंपरा के विषय में कि यदि कोई व्यक्ति ये दावा करता है कि उसको किसी चमत्कारी शक्ति ने आकर के शिक्षा दीक्षा दे दी है। ज्ञान विज्ञान दे दिया है या स्वप्न इत्यादि में दीक्षा हो गई है उसकी तब भी उस दीक्षा को उस ज्ञान विज्ञान को किसी प्रामाणिक गुरु परंपरा से उसका सत्यापन अति आवश्यक है। पहली बात। दूसरी बात जिस परंपरा से हम उस स्वप्नादेश को सत्यापित कराएंगे उस परंपरा के हम सिद्धांतों को मानना होगा। मतलब जिससे सत्यापन कराने जा रहे हैं ऐसा नहीं कर सकते कि उसके विरुद्ध जाकर के कोई सिद्धांत नए प्रतिपादित करने लग जाए। उस परंपरा के अनुगत हमें रहना होगा। फिर दूसरी एक बात यह आई थी कि क्या एक कंट्रोल बोर्ड के द्वारा जो सभी हमारी प्रामाणिक परंपराएं हैं उनका नियंत्रण इत्यादि हो सकता है? तो नहीं हो सकता क्योंकि पहली बात तो सभी परंपराओं का जो ज्ञान विज्ञान है भाई वो गलत कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं ये बताने के लिए उनके यहां का प्रामाणिक गुरुगम्य विद्या के द्वारा हमें प्राप्त होना चाहिए। सबसे पहले तो यह आवश्यकता जो संभव नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि जब आप उनसे ज्ञान विज्ञान प्राप्त
00:49:21:08 कर भी लेंगे तो आप उनमें यह दोष नहीं दे सकते कि आप यहां सिद्धांत का विरुद्ध यहां गलत सिद्धांत बता रहे हैं। उनके आचरण पे आप कह सकते हैं प्रश्न उठा सकते कि उनका कोई एक आचरण गलत है। पर उनके द्वारा दी जाने वाली जो सिद्धांत है, दी जाने वाली जो शिक्षा है, उस पर आप उंगली नहीं उठाएंगे। उंगली उठाएंगे तो वैसे ही आपके पास वो ज्ञान कहां से आया उसकी प्रामाणिकता भंग हो जाएगी। और फिर तीसरी बात गुरुदेव ने कहा बताया कि शास्त्रों की प्रामाणिकता आचार्यों से गुरु से परंपरा प्राप्त गुरुओं से गुरुओं की प्रामाणिकता शास्त्रों से। तो ये दोनों में सामंजस्य होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि यदि जो शास्त्रों का वचन है कि जितने आचरण गुरु के शास्त्र के विरुद्ध हो उतने आचरणों का आंशिक रूप से त्याग कर देना चाहिए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि गुरु जो धर्म व्याख्या कर रहा है या गुरु जो सिद्धांत दे रहा है उसका भी आप खंडन करने लग जाओ क्योंकि धर्म व्याख्या और क्या कहते हैं सिद्धांतों में यदि आप खंडन करोगे तो वही बात आ जाएगी गुरु विरोध हो जाएगा फिर आपके पास वो शिक्षा कहां से आई ये प्रश्न फिर से खड़ा हो जाएगा तो आचरण में गुरु के जाया जा सकता है एक चीज और है गुरुदेव कि यदि हम आचरण का विरुद्ध जा भी रहे हैं तो क्या हमें अधिकार है उसकी समीक्षा करने का इत
00:50:36:09 तो हो गए हम गुरु गुरु के उन आचरणों का हमने त्याग कर दिया तो समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त होता है। मतलब ऐसा कुछ है शास्त्रीय कि जैसे गुरु के आचरण कुछ-कुछ शास्त्रों से इतर मिल रहे हैं तो फिर हम उसकी समीक्षा करने लग जाए सार्वजनिक तौर पर जो है जैसे आपने अभी प्रह्लाद जी का उदाहरण दिया तो उसमें अगर गुरु माने पिता को गुरु तुल्य माने तो वहां पर प्रह्लाद जी ने आचरणों का तो त्याग किया अपने पिता के मगर कहीं भी समीक्षा नहीं की भाई वो ऐसे हैं वो वैसे हैं ये वो नहीं किया आपने बताया कि दंडवत हमेशा प्रणाम तो हमें समीक्षा से बचना चाहिए गुरु के उन आचरणों यदि कोई व्यक्ति अपने आप को अपने आचार्य से अधिक समझदार मानता है। आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं को उनकी अपेक्षा अधिक सक्षम मानता है।
00:51:25:25 तो फिर तो स्वतंत्र कुछ भी करें। यदि आचार्य के अनुगत रहना है, आचार्य से उपकृत हो चुके हैं। उपकृत होना है जी। तो फिर अनुशासित ही रहना चाहिए। जिन जिन आचरणों का अनुकरण करना संभव ना हो उन आचरणों की उपेक्षा करनी चाहिए। बस समीक्षा नहीं करनी चाहिए। समीक्षा करने का अधिकार आपको लग रहा है कि आप हो सक्षम हो। उनसे अधिक तप आपका है। उनसे अधिक ज्ञान विज्ञान आपका है। उनसे अधिक आध्यात्मिक बल आपका है। और आप कुछ भी करो तुम्हें कौन रोक लेगा? तो फिर जो अपने आचार्य का अतिक्रमण कर गया है। जी उसे कौन रोक लेगा दुनिया में? जो ये कह रहा है कि साहब मैं मेरे पिताजी समझदार नहीं है। मेरे पिताजी को निर्णय क्या जानते हैं मेरे पिताजी? हम उसका उसकी दवा किसी के पास नहीं है। फिर और आचार्य का
00:52:22:00 अनुकरण करना यदि संभव नहीं है, अनुसरण करना यदि संभव नहीं है तो उनको तिरस्कृत करने का भी आपको कोई हक नहीं बनता है। कोई अधिकार नहीं बनता है। वैसा करना ना समाज की दृष्टि में समीचीन होगा, ना तुम्हारे व्यक्तिगत जीवन के लिए समीचीन होगा और ना ही परलोक की दृष्टि से समीचीन होगा। जी जी हट जाओ ना वहां से जिस जिस पटल पर रह के जिस केंद्र पर रह के आपके मन को प्रसन्नता नहीं हो रही है आपके मन को समाधान नहीं हो रहा है उस पटल से हट जाओ तमाशा क्यों करते हो तमाशा क्यों बनते हो हट जाना चाहिए तमाशा नहीं बना इसलिए हमने प्रहलाद की बात कही थी जी आप रहते हैं तो समाधान आपको वहां से नहीं चाहिए तो तो भी क्या जरूरत है समीक्षा करने की उत्श्रंखलता की मैं उसे समीक्षा अच्छा नहीं कहता कुछ श्रंखलता कहता हूं क्या आवश्यकता है और विवेक पूर्ण जीवन होना चाहिए आनंद पूर्ण जीवन होना चाहिए जितना जहां से मिले सारी सृष्टि में सर्वत्र गुरुत्व बिखरा हुआ है आवश्यकता शिष्यत्व की पात्रता की पात्र चाहिए जी सब कुछ भरा पड़ा है एक वृक्ष की डाली का पत्ता भी गुरुत्व से भरा हुआ है जब दत्तात्रेय भगवान 24
00:53:37:06 केंद्रों से 24 शिक्षाएं ले सकते हैं तो तुम्हें कौन सी आफत आ रही है कब देखा उन्होंने दत्तात्रेय भगवान ने कि वेश्या है। इसके तो जीवन में पवित्रता नहीं है। जितना लेना था ले लिया। आप जब एक दत्तात्रेय भगवान पृथ्वी से जल से आकाश से अग्नि से छोटे से बालक से कुंवारी कन्या से एक लोहार अयस्कार माने लोहार से सीख सकते हैं। अपने आचार्य से जितना अच्छा लग रहा है उतना सीख लो। और मैं तो कहता हूं शिक्षा भी दो प्रकार से प्राप्त होती है। विधि मुखेन निषेध मुखे जो अपने आपको लगता है कि ये सारे आचरण बहुत अच्छे हैं। सबका अनुकरण कर लो। जो अच्छाइयां है सबका अनुकरण कर लिया है क्या? जब सबका अनुकरण कर लो और कुछ लगे कि भाई ये तो ये ठीक नहीं है। तो तुम उसी समय प्रतिज्ञा करो कि जो दोष जो त्रुटि जो असावधानी मेरे पिता या मेरे गुरु में रह रही है वो असावधानी वो त्रुटि वो दोष मैं मेरे व्यक्तिगत जीवन में नहीं आने दूंगा। हो गया तुम्हारा भला निषेध मुख से शिक्षा प्राप्त वैसा जो लग रहा है ठीक नहीं है वैसा हम नहीं करेंगे तो जीवन का रस बना रहेगा प्रसन्नता बनी रहेगी आनंद बना रहेगा नहीं तो आग में झुलसे हुए फूल की तरह से बिखरे बिखरे घूमोगे ना यहां चैन पड़ेगा ना वहां चैन पड़ेगा
00:54:52:07 ये यहां घर-घर घूम घूमते हैं कि यहां चले गए वहां चले गए तो बड़ा सुख मिल रहा है तुमको जिनके यहां जाने से आपको झूठी थोड़ी देर की सम्मान और प्रशंसा मिल रहा है ना वो कुत्ते से ज्यादा कोई कीमत नहीं मानते हैं आपकी एक दरवाजे से दुत्कारा गया व्यक्ति दूसरे दरवाजे पर पुचकारा जाता है तो भी वह वैसा ही रहता है। कहते अपने अपने गुरु का सगा नहीं हो तो हमारा क्या सगा होगा? ये आपके बारे में धारणा रहती है। सावधान रहना चाहिए। जी कह बुरा ना मानो होली है महाराज जी के [हंसी] बहुत सुंदर वचन प्राप्त हुए। मार्गदर्शन प्राप्त हुआ महाराज जी का। महाराज जी बस एक लास्ट छोटा सा प्रश्न है। आजकल एक परंपरा सुनने में आ रही है। निग्रह परंपरा इसे छोड़ दीजिए। अच्छा अच्छा इसको छोड़ दें तो मैंने व्यक्ति निष्ठ मत होइए बहुत अच्छा जी जी जी बिल्कुल बिल्कुल ठीक है मैं उनको अभी भी
00:55:46:09 भागवतानंद जी के रूप में जानता हूं ये महाराज जी का बहुत सुंदर मार्गदर्शन हमें प्राप्त हुआ और कई जो असमंजस की स्थितियां थी उन पर महाराज जी के गहरे जो वचन थे उनके द्वारा प्रकाश आया तो बहुत सारे संशय दूर होंगे मुझे लगता है इस वीडियो से आप लोगों के और महाराज जी के चरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए विराम देता हूं। जय श्री राम। [संगीत]
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गुरु बड़े या शास्त्र? पूज्य ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज के साथ वार्ता #maghmelaprayagraj
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