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00:00:02:09 तो जय श्री राम सभी को। आशा करते हैं आप सभी कुशल पूर्वक होंगे और आज की लाइव का जो टॉपिक है वो आपने देखा ही होगा। तो अ सबसे पहले जो महानुभाव हैं जो हमारे समक्ष बैठे हुए हैं। इनका परिचय बता दें कि आप स्वयं से थोड़ा सा बता दीजिए अपने बारे में दर्शकों को। जी मेरा नाम नीरज है और मैं आर्य समाज का सदस्य हूं और मैं 2018 में आर्य समाज से जुड़ा था। अच्छा जी कहां से नीरज जी आर्य समाज से? जी हां जी मैं उत्तराखंड कोर्टद से हूं। जी को जिला कोड़ी गढ़वा तो वही वही उस वहीं पे आर्य समाज से जुड़े हैं। कैसे जुड़े हैं? हां मैं यहीं से जुड़ा था। अच्छा हमारे नजदीक में आर्य समाज है। तो वहां से वहां आपका कोई पद भी है या फिर आप मतलब सिर्फ एक अनुयाई है। एक फॉलोअ नहीं पद मिला है मेरे को। क्या पद है आपका? मैं वहां पर हमारा आर्यवीर जो चल रहा है ना? आर्यवीर
00:01:17:27 तो मैं आर्य हां हां। जी। हां जी। तो मैं उसका उसकी व्यवस्था संभालता हूं। अच्छा तो वो जो कुछ शारीरिक उसको तैयार उसको लेकर के अच्छा जी वही वही ठीक है। अच्छा थोड़ा सा जब ईश्वर पे हम लोग बात कर रहे हैं तो थोड़ा सा क्या कहते हैं? ये हम समझ ले कि अ ये क्या कहते हैं? ये ईश्वर के जो ग्रंथ है वो आप वैदिक वेदों को ही मानते हैं आप पूरा प्रॉपर वेद और वेद वेद को मानते हैं। जी जी ठीक जी तो अगर हम स्टार्ट करें क्योंकि आज का टॉपिक एकदम स्पष्ट है। सर्वशक्तिमान साकार निराकार ये सब बस यही है। तो
00:02:13:13 तो आप मुझे बताएं कि आप मानते हैं कि जो आर्य समाज का जो ईश्वर है जिस ईश्वर की वो पूजा करते हैं करवाते हैं तो वो जो है सर्वशक्तिमान है। हां बिल्कुल सर्वशक्तिमान है। अच्छा जैसे सर्वज्ञ है तो सर्वज्ञ का अर्थ क्या लेते हैं आप? सर्वज्ञ नहीं सर्वज्य। नहीं ठीक है आप आप सर्वज बोल लीजिए और मैं सर्वज्ञ बोल लूंगा। आप ये बताइए उसका अर्थ क्या लेते हैं? जो आप शब्द बोल रहे हैं ना वो ज उसका सही उच्चारण ज है। देखिए अभी हमारा जो टॉपिक है ना कि कौन सही है कौन गलत है वो इस विषय में है कि सर्वशक्तिमान है कि नहीं। ये टॉपिक नहीं है कि वो ज्ञ और ज का टॉपिक होगा वो किसी दिन और बैठ लेंगे। वो तो ठीक है वो लेकिन जो मैं जो है वो बता रहा हूं आपको मैं। आप अपनी वो सर्वज्ञ का अर्थ बताइए आप मुझे करेक्ट मत करिए कि मेरा प्रोनाउंसिएशन उच्चारण सही है या गलत करिएगा जब हम उसके लिए बैठे जब हम उसके लिए बैठे ठीक है जी जी बिल्कुल सर्वज्य का अर्थ यही है कि जो सब कुछ जानता है मतलब यहां पे जो सर्व विशेषण लग रहा है उसका मतलब है सब कुछ हां क्या कोई भी ऐसी चीज है
00:03:29:03 कोई भी ऐसी चीज जो वो ना जानता हो कुछ भी भी नहीं है ऐसा जो वो ना जानता हो। हां मतलब जिसकी सीमा से बाहर कुछ है ही नहीं। कुछ भी नहीं है। कुछ भी का मतलब कुछ भी सब कुछ जानता है। बिल्कुल बिल्कुल। ठीक है। ठीक है। तो अब जब हम आते हैं कि क्या आर्य समाज का ईश्वर सर्वव्यापक है। तो यहां पे सर्वव्यापक का अर्थ क्या होता है? सर्वव्यापक का अर्थ होता है कि वो सभी जगह है। सभी व्यापक सभी में तो यहां पे भी सर्व का मतलब सब कुछ है। बिल्कुल है ना? उसकी सीमा से बाहर कुछ है ही नहीं। हां। है ना? ये हो गया सर्वव्यापक। यानी कि जो सर्व शब्द लग रहा है वो सब कुछ के लिए है जिसकी सीमा से बाहर कुछ ना हो। बिल्कुल। है ना? तो जब हम कहते हैं कि क्या आर्य समाज का ईश्वर सर्वशक्तिमान है? हम आप मानते हैं कि नहीं? हां बिल्कुल मानते हैं। हम तो क्या वो अवतार ले सकता है? ये अवतार ले सकता वाली कहानी जो प्रश्न है आपका ठीक वैसे ही है। जैसे हम
00:04:44:04 कहें कि क्या मोदी कोई पार्षद बन सकता है? क्योंकि जो ईश्वर सर्वशक्तिमान है, जो अनंत ब्रह्मांड को चला रहा है, जो अनंत ब्रह्मांड की व्यवस्था देख रहा है, वो एक छोटी सी पृथ्वी पर एक छोटी सी गैलेक्सी में छोटी सी पृथ्वी पर आकर के अवतार क्यों लेगा? और अवतार अवतार वो लेगा जो वहां पर नहीं होगा। जब ईश्वर पहले से वहां पर मौजूद है, हर जगह है। जैसा कि मैंने हमारे अभी बात हुई थी कि ईश्वर सर्वज है, सर्वव्यापक है। वो हर जगह पहले से मौजूद है तो उसको अवतार लेने की आवश्यकता क्यों है?
00:05:24:02 ठीक है। आपने दो बातें बताई है। एक वो क्योंकि पहले से है इसलिए उसका आना जाने का कोई अपाय अभिप्राय नहीं है। बिल्कुल और एक आपने बताया है कि वो क्या कहते हैं? यह उसको आवश्यकता नहीं है। हां, उसको आवश्यकता नहीं है। अच्छा तो अगर मैं आपसे ये कहूं कि मैं उदाहरण के लिए उदाहरण के लिए छोटा सा आपको बता दूं। नहीं नहीं मैं समझ गया। मैं समझ मैं समझ गया। थोड़ा सा मैं और समझा देता हूं। थोड़ा सा समझा दूं। नहीं मैं समझ गया हूं ना। फिर क्या दिक्कत है समझाने की? एक्स्ट्रा टाइम टेकिंग होगा। समझिए। हां। तो आवश्यकता वाले मामले में मेरा जो पहला मामला है वह यह है जैसे आपने बताया कि मोदी पार्षद नहीं बन सकता है ना नहीं मोदी जी को अगर कोई कहे कि भाई तुम पार्षद बनके दिखाओ तब हम तुम्हारी सशक्त तुम्हारे तुम्हारे अंदर शक्ति है अच्छा ठीक है अब ये बताइए अभी आपने कुछ दिन पहले एक फोटो वायरल हुई थी मोदी जी की जिसमें मोदी जी शायद झाड़ू लगा रहे थे हुई थी क्या हां हुई थी हां हुई हुई थी तो उन्होंने
00:06:39:15 झाड़ू लगाई हां बिल्कुल पार्षद से भी थोड़ा नीचे का कार्य किया ना झाड़ू लगा के पद तो वही था ना पद कोई भी हो वो अच्छा पद पद अच्छा जिस समय जिस समय तो हमने पद कहां बदला है हमने पद बदला क्या कि वो जब अवतार लेगा तब वो ईश्वर नहीं रहेगा उन्होंने वो कार्य किया कि नहीं जिस कार्य के बारे में आपने आपत्ति जताई थी उन्होंने पार्षद वाला कार्य पार्षद से भी निम्न स्तर का कार्य किया ना झाड़ू लगाने का? नहीं क्या उन्होंने सुनो मेरी बात क्या उन्होंने वाल्मीकि की नौकरी ली जो वाल्मीकि समाज झड़ों को मैं कहां कह रहा हूं कि वो नौकरी करे नहीं मैं कहां कह रहा हूं ईश्वर नौकरी करे आपने जो यह कहा है पार्षद का उदाहरण देकर के कि पार्षद बन सकता है क्या तो उसमें अर्थ यह है कि वो पार्षदों वाला काम क्यों करेगा यही तो बात है तो उसने तो स्वीपर का काम कर दिया चलो यह तो उदाहरण की बात है हम लोग थोड़ा सा और आगे आ जाते हैं कि
00:07:44:24 आवश्यकता और आना जाना आवश्यकता पे वैसे कई बार हम लोग बोल चुके हैं। अच्छा ये बताइए अ ईश्वर को वेद प्रदान करने की आवश्यकता क्या है? वैदिक मंत्र ईश्वर को वैदिक मंत्र प्रदान करने की क्या आवश्यकता है? जैसे एक कंपनी ने मोबाइल ल्च किया। ठीक है? अब उसको उसके अंदर मोबाइल को चलाने के जो उसके अंदर उसके सॉफ्टवेयर है। किस तरह से इस मोबाइल को संचालित किया जाएगा। किस तरह इसको चलाया जाएगा वो चीज उस किताब के अंदर पहली बात पहली बात तो पहली बात तो यह है कि यह आवश्यकता हमारी है कि हम उस मोबाइल को करेंगे कैसे और क्योंकि मोबाइल कंपनी वालों को हमें बेचना है हमें बेचना है हमसे पैसे कमाने इसलिए उसकी आवश्यकता है कि वो बताए हमें कि मोबाइल कैसे यूज़ होगा मगर क्या यह पर्सनली यह आवश्यकता आप मानते हैं कि उनकी भी है कि वह हमें बताएं पहली बात यह तो एक अलग यह एक अलग बात हो गई दूसरी बात यह है कि जो वेद का ज्ञान है जो वेद का ज्ञान है वह ज्ञान सीधे अपनी शब्द शक्ति से
00:09:00:19 हमारे माइंड में भी डाला जा सकता था डाला जा सकता है ना शब्द शक्ति से फिर उसको मंत्रों के रूप में क्यों मैं कह रहा हूं उस रूप में क्यों दिया है वो इसलिए दिया ताकि उसको उसको आसानी से कोई भी जैसे जो ये दस दस लोग होते हैं। राक्षस प्रवृत्ति के लोग होते हैं। उसको समझने के लिए एक मतलब जैसे हम कहें कि उसको मेहनत करनी पड़ेगी ताकि वो पहले व्याकरण सीखे और उसके लिए हर उसको मतलब पढ़े लिखे मतलब कि लोगों के काम को सरल बनाने के लिए लोगों के व्यवहार में आ सकने के लिए और यह जो एक तरीके से सृष्टि है इसमें व्यवहार हो सके प्रपंच हो सके इसके लिए उन्होंने वैदिक मंत्र ऐसे रूप में दिए जिसका लेन देन हो सके अन्यथा जब वह सीधे माइंड में डाल लेते अगर वह अगर वह सीधे सीधे माइंड में माइंड में ही डाल देते तो कैसा व्यवहार होता कौन वेद की वेद के ग्रंथ को खरीदने जाता वेद को जानने के लिए कोई भागदौड़ नहीं बस सीधे हो गया तो वो जो है संसार है जिसमें लीलाएं होनी है प्रपंच होना है वो होता ही नहीं सीधे माइंड में ही डाल दो मुक्ति हो गई
00:10:17:03 किसकी मुक्ति वैदिक ईश्वर का ज्ञान सीधे माइंड में डाल दो मुक्ति हो जाएगी व्यक्ति की तुरंत ज्ञानी हो जाएगा जो उसको पाना चाहेगा हां तो वो पाना चाहे के लिए उसको ऐसे उसमें आना चाहिए उसको ऐसे उसमें दिया कि जिससे कि उसके साथ व्यवहार हो सके व्यवहार में आने के लिए जो एक मिनट भाई साहब एक मिनट भाई साहब व्यवहार में आ सकने के लिए ईश्वर ने जो ज्ञान मेंटल के रूप से भी दिया जा सकता था माइंड के रूप से भी दिया जा सकता था सीधे सीधे वो ज्ञान मनुष्यों के लिए हमारे लिए व्यवहारिक हो सके। इसलिए उन्होंने वो ज्ञान मंत्रों के रूप में दिया। ठीक है? हां जी। तो क्या यह नहीं माना जा सकता कि ईश्वर का जो स्वरूप है वो हमारे व्यवहार का विषय बन सके। जो आपने बताया कि ऐसे लोग जो ईश्वर को समझ नहीं पाते ज्यादातर ऐसे ही लोग होते हैं उनके व्यवहार का विषय बन सके। उसके लिए ईश्वर अवतार ले। नहीं। जब वो कहने का मतलब है कि एक तरीके से वैदिक ज्ञान का अवतार मंत्र है प्रणव है है ना तो जब वो वैदिक ज्ञान को प्रणव के रूप में दे सकता है अवतार के रूप में व्यवहार
00:11:32:19 में आ सकने के लिए तो वो अपने स्वरूप को जो सर्व्या उसका ज्ञान भी सर्वव्यापक है उसका ज्ञान भी सर्वव्यापक है तो वो क्या कहते हैं यह जब वो वेद के ज्ञान को ईश्वर को प्राप्त करवाने वाले ज्ञान को ऐसे रूप में दे सकता है जिस रूप में देने के कारण वो मनुष्यों के व्यवहार का विषय बन सके तो सर्वत्र जो सर्वव्यापक ईश्वर है वो अपने स्वरूप का बोध कराने के लिए अपनी शिक्षा दीक्षा या जो भी है मनुष्यों के व्यवहार में आ सकने के लिए ऐसा रूप अपना बना सकता है जो मनुष्यों के व्यवहार का विषय बन सके। पहली बात तो यह तो आवश्यकता के लिए मैंने आपको एक वो दिया। दूसरा आपने बताया है आना जाना। ठीक है? यह बताइए कि हमको जब जैसे ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। ऐसे ही ईश्वर का ज्ञान भी सर्वत्र व्याप्त है ना ईश्वर के साथ-साथ। बिल्कुल बिल्कुल हर जगह है ना? तो फिर यह देने लेने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
00:12:50:09 देना लेना क्या है भाई? मेरे मेरे अंदर कोई जगह ऐसी है मेरे अंदर मैं मेरा मस्तिष्क ईश्वर से खाली तो है नहीं। मेरा मस्तिष्क ईश्वर से खाली तो है नहीं। अगर ईश्वर है तो ईश्वर का ज्ञान भी है। मेरे मस्तिष्क में भी। तो फिर ये मुझे वेद मंत्र लेने देने ये क्यों पड़ रहे हैं? ज्ञान ऐसे नहीं मिलता ना। ज्ञान के लिए ईश्वर अगर दो हमें ज्ञान जो है तीन तरीके से मिल सकता है। या तो हम वेद का स्वाध्याय करें। ठीक है? और जो उससे जो मिलते उसके जो वेद से जो रिलेटेड ग्रंथ है आर्ट्स ग्रंथ हम उनका स्वाध्याय करें। तब हम वैदिक सिद्धांतों को जान पाएंगे। या फिर जो वैदिक सिद्धांतों को जानते हैं हम उनके शरण में जाए या फिर हम अष्टांग योग या फिर हम ध्यान में जाकर के मेरी बात समझे नहीं मेरी बात समझे नहीं आप मैंने ये मैंने ये नहीं कहा वेद के मंत्र प्राप्त कैसे होते है वो मैं भी जानता हूं कैसे प्राप्त होते है वेद का ज्ञान प्राप्त वो अलग विषय विषय ये है कि जो चीज सर्वत्र व्याप्त है जो पहले से ही है उसका भी व्यवहारिक जगत में आना जाना हो सकता है कि नहीं ये विषय तो आपने कहा आपने
00:14:05:10 कहा कि ज्ञान पहले से है फिर भी उसको लेने के लिए जाना पड़ता है। यानी जो चीज ज्ञान जो ज्ञान पहले से है फिर भी उसका आना जाना सिद्ध हो रहा है। ग्रहण करने के लिए उसे जानना पड़ेगा ना। ज्ञान को जानना पड़ेगा कि ज्ञान अरे भाई साहब तो वो तो पहले से ही है ना मेरे अंदर। मेरे अंदर कैसे हो गया? मेरे अंदर नहीं है। यानी यहां पर ईश्वर नहीं है। ईश्वर है यहां पर। हां। लेकिन उसका उसके ज्ञान को जानने के लिए मुझे मेहनत करनी पड़। मैं कह रहा हूं ईश्वर है। यहां पर ईश्वर है मेरे खोपड़ी में। हां। ईश्वर के साथ उसका ज्ञान है। ईश्वर के साथ उसका ज्ञान है। तो फिर मुझे क्यों लेने जाना पड़ रहा है किसी से? मैं ये पूछ रहा हूं। जब यहां पे वो है तो मुझे लेने क्यों जाना पड़ रहा है? कोई भी चीज बिना पुरुषार्थ के नहीं मिलती। अरे तो यहां पर है कि नहीं है क्या है मिलना मिलने का क्या मतलब है जब वो यही पर है तो मिलने का क्या मतलब है ईश्वर है ईश्वर का ज्ञान भी है लेकिन वो मुझ तक मेरे अंदर वो मुझ तक नहीं पहुंच पा रहा है क्योंकि इसका मतलब अब मैं बताऊं अब मैं बताऊं हां जी मैं आपकी चीज को करेक्ट कर देता
00:15:20:14 हूं तो अगर आप कहना चाह रहे हो नहीं एक मिनट एक मिनट अब आपने कही ये वाली बात तो क्योंकि हम सनातन धर्म को मानते हैं तो फिर मुसलमानों के अंदर भी फिर वो होना चाहिए फिर वो जो अन्य धर्म के लोग हैं। मेरा यही तो प्रश्न है। मेरा यही प्रश्न है कि अगर ज्ञान सर्वत्र व्याप्त है तो फिर उसको लेना देना क्यों पड़ रहा है? आपने ये क्वेश्चन उठाया है। क्वेश्चन आपने उठाया है कि जो चीज सर्वत्र व्याप्त है, जो चीज पहले से है उसका वो आएगी जाएगी कहां पे? क्वेश्चन आपने उठाया है। मैंने नहीं उठाया। मैं तो यह बात मानता हूं कि जो चीज सर्वत्र व्याप्त है, यह एक पारमार्थिक धरातल का विषय है। मगर परमार्थ के परमार्थ के धरातल पर जो चीज सर्वत्र व्याप्त है, उसका भी आना जाना व्यवहार में सिद्ध होता है। मैं अभी बताता हूं कैसे? मैं अभी बताता हूं कैसे। हमारे पास वो ज्ञान है। मगर वो इस रूप में है कि हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है। समझ रहे हैं? मेरी बात? वह ऐसे रूप में है कि वह हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है। तो जब वह ऐसे रूप में आता है जब वह हमारी इंद्रियों का विषय बन जाता है तो उसका आना जाना कहते हैं। जैसे कि भगवान का ज्ञान है। लगता है मन में कुछ तो है कुछ तो वो सोचते भी नहीं है। नास्तिक के मन में भी होता है। सबके
00:16:35:20 मन में होता है। असतो मा सद्गमया तमसो मा ज्योतिर्मया मृत्युमा मृतम गमया यह भावना जीव मात्र में है। प्राणी मात्र में है। कीड़े में भी है। है ना? मगर ये इस पर कोई ध्यान नहीं देता है तो क्या है? वो ज्ञान तो है मगर वो ऐसे रूप में है कि अभी हमारी इंद्रियों का विषय नहीं है। ठीक है? फिर वह एक दिन जब हम परिश्रम करते हैं, पुरुषार्थ करते हैं, काम करते हैं, मेहनत करते हैं, वह ऐसे रूप में हमें मिलता है जो हमारी इंद्रियों का मन बुद्धि का विषय बन जाता है। तो मंत्र के रूप में, वेद के रूप में, वेदार्थ के रूप में, गुरुजनों से, ग्रंथों से हमको वो मिल जाता है पुरुषार्थ करने का। है ना? तो इसका मतलब यह है कि जो चीज पहले से है सर्वव्यापक है उसका भी किसी देश काल परिस्थिति में आना जाना सिद्ध होता है। इसका अर्थ यह है कि अगर ईश्वर पहले से है तो यह इस बात के लिए बाधा नहीं है कि वो आएगा जाएगा क्यों? क्योंकि वो अभी हमारे व्यवहार का विषय नहीं है। एक मिनट भाई साहब एक मिनट वो अभी हमारे व्यवहार का विषय नहीं है। इंद्रियों का विषय नहीं है। फिर एक दिन वो ऐसा रूप बनाता है जैसे जैसे वेद का ज्ञान ने रूप बनाया ना वैदिक
00:17:51:01 मंत्र ऐसे ही जब वो ऐसा रूप बनाता है जो हमारे व्यवहार का हमारी इंद्रियों का विषय बन सके तो वो बन जाता है। वो कहलाता है अवतार। ये मेरा आपको वो हो गया। अब उस वाले मामले में आपको कुछ कहना है क्या जो मैंने आवश्यकता बताई थी कि आपने कहा था कि जिससे कि लोगों के लिए व्यवहार का विषय बन सके इसलिए मंत्र दिए। ठीक है? ज्ञान नहीं दे दिया सीधे मंत्र दिए। मंत्रों के रूप में ज्ञान दिया। तो मैंने कहा कि ईश्वर भी किसी के व्यवहार का विषय बन सके, भक्ति का विषय बन सके, प्रेम का विषय बन सके इसलिए वह अवतार लेता है। तो ये आवश्यकता मैंने बताई थी। यह दो पॉइंट हो गए। आवश्यकता का मैंने बता दिया और जो सब्र सर्वत्र व्याप्त है, सदा से व्याप्त है, उसका आना जाना भी मैंने बता दिया कैसे आता जाता है। अब तीसरी चीज मैं यह कह रहा हूं एट द एंड एक बात फंस जाती है। जब हम कह रहे हैं कि सर्वज्ञ जिसकी सीमा से बाहर कुछ ना हो। जब हम कह रहे हैं सर्वव्यापक जिसकी सीमा से बाहर कुछ भी ऐसा ना हो जो वो जानता ना हो। वहां पर ये वाली बात नहीं है कि वो नाली को जानता है कि नहीं कि भैया प्रधानमंत्री है तो नाली क्यों जानेगा? नाली क्यों देखेगा? नहीं। सर्वज्ञ का
00:19:06:04 मतलब सर्वज्ञ नाली भी देखेगा, मल भी देखेगा, मूत्र भी देखेगा, सब कुछ देखेगा। ठीक? सर्वव्यापक ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री नाली में क्या करेगा? नहीं। मल में भी है, मूत्र में भी है, वो हर जगह है। वो सर्वशक्तिमान जो ईश्वर है, सर्वव्यापक है। वो ऐसी कोई जगह नहीं है जिससे वो रहित हो। हम तो फिर हम यह कैसे कह देंगे कि भैया जैसे प्रधानमंत्री अपने से निम्न स्तर का पद नहीं धारण कर सकता वो नहीं बन सकता तो वहां पर सर्व का सर्व विशेषण का जो अर्थ है वो बदल रहा है। वहां आप सीमा लगा रहे हैं। तो जब आप सर्वव्यापक का अर्थ बिना किसी भेदभाव के सर्व्यापक का अर्थ सर्वव्यापक मानते हो। जब आप सर्वज्ञ का अर्थ बिना किसी भेदभाव के सर्वज्ञ मानते हो तो सर्वशक्तिमान का अर्थ बिना किसी भेदभाव के सर्वशक्तिमान क्यों नहीं मान रहे? या फिर आप सर्व विशेषण में बाधा तो तीन चीजें हो गई। आवश्यकता बता दी। एक मिनट तीन चीजें हो गई। आवश्यकता बता दी और आना जाना बता दिया देश काल परिस्थिति में और सर्व विशेषण में बाधा है। वो करेगा क्यों? यह बाद की बात है। कर सकता है कि नहीं? क्षमता है कि नहीं? यह पूछा जा रहा है। अब बताएं।
00:20:18:02 आपने कहा सर्वशक्तिमान का अर्थ क्या समझते हैं आप? जो सब कुछ कर सकता है जो जैसे आपने सर्वज्ञ का जो अर्थ बताया जैसे आपने जो अर्थ सर्वव्यापक का बताया उसी के अनुसार सर्वशक्तिमान का अर्थ सर्वशक्तिमान का अर्थ यह नहीं होता। सर्वशक्तिमान का अर्थ यह होता है कि वह अपने कार्य करने में किसी अन्य की सहायता ना लेता हो। ठीक है? तो सर्वज्ञ का अर्थ ये होगा कि वो अपने कार्यों को जानता हो। अपनी चीजों को जानता हो। सर्वज्ञ का अर्थ ही होगा ना। अपने कार्य करने में ना लेता हो। किसी भी अपने कार्य करने में किसी अन्य की सहायता ना लेता हो। दूसरा किसी भी साधन संसाधन की सहायता ना लेता हो। वह सर्वशक्तिमान है।
00:21:06:09 यानी कि सर्व का अर्थ यह नहीं है कि वह सब कुछ कर सकता है। हां ये नहीं है। यानी सर्व विशेषण का अर्थ ये नहीं है कि वो सब कुछ कर सकता है। हां ये नहीं है। इसका अर्थ इसका अर्थ ये है यानी कि सब में नहीं वह सब में वह हम सब में शक्तिमान है। हम सबसे ज्यादा शक्तिमान है। नहीं नहीं ये ये मैं नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं वो हम सबसे ज्यादा शक्तिमान है। ठीक है? हां यानी सर्व का मतलब है कि हम सबसे ज्यादा मगर असीमित नहीं है। शक्तिमान शक्तिमान होना पर शक्ति जो जो मैंने क्या कहा भाई मैं ये कह रहा हूं अभी आप मेरी बात सुन लीजिए आप बहुत देर तक बोले ना मेरी बात सुन लीजिए दो मिनट जैसे मुझे खाना बनाने के लिए मुझे पत्नी की जरूरत पड़ती है मेरी वाइफ है घर में खाना बनाती है तो क्योंकि मैं अगर मैं बाहर काम करूं तो मुझे घर में खाना बनाने के लिए कोई चाहिए मेरे बच्चों को संभालने के लिए चाहिए फिर मैं मैं कपड़े नहीं सिल सकता अपने कपड़े मैं ये बातें जानता हूं आज आप पहली बार नहीं आए मैं जानता हूं जो आप बोल रहे हैं ये मैं जानता हूं एक एक उदाहरण दे उससे काम चल जाएगा ईश्वर को अपने किसी भी कार्य करने के लिए किसी साधन संसाधन की या किसी व्यक्ति विशेष की आवश्यकता नहीं पड़ती यमराज की आवश्यकता नहीं
00:22:21:10 पड़ती चित्रगुप्त की आवश्यकता नहीं पड़ती भाई साहब मेरा ट्रैक बदल रहा है आपका आपका ट्रैक बदल रहा है देखिए मैं ये मैं ये पूछ रहा हूं मैं ये पूछ रहा हूं कि आपने सर्व का मतलब बताया कि वो अपने सारे काम कर सके। सर्व का मतलब बताया कि जो सब सर्व का अर्थ है कि वो हम सभी में सर्वशक्तिमान है। हम सबसे ज्यादा सर्वशक्तिमान है। हमसे ज्यादा दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो उसके बराबर हो। वो सबसे ज्यादा है। ये वाला ना यही अर्थ है ना? हेलो हां जी बोलिए। मैं ये कह रहा हूं। हम सबसे ज्यादा है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। हम सब हम उसकी हमसे तुलना किसी की उसकी किसी मैं कह रहा हूं हम सबसे ज्यादा इसलिए है। एक क्लियर लाइन तो बोलिए। ठीक है। ठीक है। हम सबसे ज्यादा इसलिए मगर असीमित नहीं है। असीमित नहीं है। कुछ ऐसी चीजें हैं जो वो भी नहीं कर सकता। हां बिल्कुल। वो अवतार नहीं ले सकता। नहीं नहीं असीमित नहीं है। हम सबसे ज्यादा है पर असीमित नहीं है। ठीक है? तो जब हम कहते हैं कि जो जो नियम उसने बनाए
00:23:36:21 हैं ईश्वर ने मैंने ये कहा भाई साहब असीमित नहीं है ना क्यों खींच रहे हो बात को? ठीक है बोलिए। हां। तो सर्व का अर्थ सर्वशक्तिमान का अर्थ है ये कि वो हम सबसे ज्यादा है। मगर असीमित नहीं है। ठीक है? इसका मतलब सर्व का अर्थ यह हुआ कि हम सबसे ज्यादा मगर असीमित नहीं। सर्व का अर्थ यही तो हुआ तो सर्वज्ञ का अर्थ यह है कि वो हम सबसे ज्यादा ज्ञानी है मगर अनंत ज्ञानी नहीं है। नहीं क्यों नहीं अनंत ज्ञानी? अनंत अनंत जहां तक उसकी सर्व का अर्थ क्या ले रहे हैं? हम सबसे ज्यादा या अनंत? किसका? सर्व का अर्थ क्या लेना है? सर्व सर्वव्यापक तो सर्व का अर्थ क्या लेना है? सर्व यहां पर शक्तिमान सर्वशक्तिमान का अर्थ है कि हम सबसे मैं कह रहा हूं भाई साहब सर्व विशेषण का अर्थ क्या होता है? सब सभी में सबसे सारा सब कुछ जितना भी है। आपने अभी बताया है कि हम सबसे अधिक इसका मतलब है सर्वशक्तिमान का यहां पर बात कर रहे हैं। तो वह सभी जीवों से सर्वशक्तिमान है। मैं कह रहा हूं भाई साहब मैं कह
00:24:51:22 रहा हूं। मैं कह रहा हूं सर्व विशेषण का अर्थ क्या है? मैं आपसे सर्वशक्तिमान का अर्थ नहीं पूछ रहा हूं। मैं कह रहा हूं सर्व मैं कह रहा हूं सर्व विशेषण का अर्थ क्या है? सर्व विशेषण का अर्थ क्या है? सर्व का अलग अलग है तो दोनों जगह पर मैं कह रहा हूं अगर हम किसी शब्द को अभी सर्व के साथ लगा नहीं रहे हैं। अभी मैं आपसे ये पूछ रहा हूं। सर्व का अर्थ क्या है? वहां पर अनंत ब्रह्मांड की बात हो रही है व्यापक में। सर्वव्यापक में यहां पर भाई साहब आप मुझे सर्व का अर्थ तो बताइए सर्व का अर्थ क्या है वहां पर दोनों जगह पर सर्व का अलग-अलग अर्थ है ना जहां पर जीवों की बात हो रही है सर्वशक्तिमान में अरे भाई साहब भाई साहब सर्व का एक कोई अर्थ तो होगा सर्व के कई अर्थ है क्या सर्व के कई अर्थ है मैं सर्व का कह तो रहा हूं सर्व में यहां पर सभी जीव हो गए वहां पर सभी में अनंत ब्रह्मांड हो ये अर्थ है। अब आप पकड़ रहे हो उसको खींचने में लग मतलब सर्व का अर्थ मानते हैं कि सभी जीव सर्वशक्तिमान सभी जीवों में शक्तिमान और जब वहां सर्व क्या कहते हैं? सर्वज्ञ कहते हैं तो क्या कहते सर्वव्यापक
00:26:06:28 और सर्व तो वह सभी पदार्थ वहां पर सभी पदार्थों को उसे ज्ञान है जितना कुछ भी अनंत सृष्टि के अंदर है उन जो भी पदार्थ है उन सबका ज्ञान है सभी सभी पदार्थ अच्छा ठीक है सभी पदार्थ सभी सभी जीव जो हम जीव तो ये बताइए ये बताइए जीव जो कार्य कर सकता है वो ईश्वर भी कर सकता है कि नहीं भाई जब आप कह रहे हैं हम सबसे ज्यादा सर्वशक्तिमान है तो वो वो सब कर कर सकता है। क्षमता तो होगी। कार्य अलग है। मनुष्य जीव के कार्य अलग है। तो फिर वो सर तो फिर हमसे कंपैरिजन क्यों हो रहा है उसका? जब हमारे कार्य ही अलग है। दोनों का डिपार्टमेंट अलग है। जैसे मैं पूछ रहा हूं जैसे मैं बॉलर हूं और कोई बैट्समैन है। तो बैट्समैन का आंकलन होगा रन के आधार पे। और मेरा आंकलन होगा विकेट के आधार पर। बॉलिंग में मैंने कितने रन दिए? करेंगे तो सर तुलना नहीं करेंगे शक्तिमान कैसे पता लगेगा तुलना हो कैसे रही है जब उसके कार्य हमारे कार्य अलग है या तो या तो यह तुलना हो कि मैं अगर मैं अगर 10 किलो वजन उठा सकता हूं तो वो 50 किलो उठा सकता है इसलिए उसको हमसे ज्यादा कहा जा रहा है हमसे ज्यादा कैसे हो रहा है वो कौन सी चीज में ज्यादा हो रहा है ये बताइए हमसे ज्यादा किस चीज में हो रहा है
00:27:23:27 किस में हो रहा है किस कार्य में हमसे ज्यादा हो रहा है वह सभी प्राणियों को सभी सभी प्राणियों को जानता है कि उनके मन में भाई साहब आप देखिए देखिए मेरी बात सुनिए भाई साहब नीरज जी थोड़ा सा टू द पॉइंट रहिए टू द पॉइंट रहिए मैंने पूछा है कि जो ईश्वर है उसका एक उदाहरण दीजिए वो किस कार्य में हमसे ज्यादा है आपने कहा कि क्योंकि वो सभी जीवो में सबसे ज्यादा है इसलिए उसके सामने सर्व लगा है तो हमारे हमारे कौन सी क्षमता है सुन अरे समझ गया मैं प्रश्न तो पूरा कर दूं प्रश्न तो पूरा कर ठीक है मुझे अरे मैं समझ गया भाई साहब आपका प्रश्न नहीं वो प्रश्न ये है एक मिनट भाई साहब भाई साहब एक मिनट प्रश्न ये है कि कौन सा कार्य है आप कह रहे हो मैं समझ गया हूं इसलिए कह रहा हूं मैं वह सृष्टि की रचना करता है सृष्टि का बिगाड़ता है ठीक है मनुष्यों को बनाता है मनुष्य और उनके उनके कर्म फल को ठीक ठीक देख के उनका उनको फल देते हैं। इसीलिए मैं कह रहा था टू द पॉइंट बात करिए। मैंने पूछा है कि आपसे वो क्या-क्या करता है?
00:28:39:15 मैंने पूछा है कि कौन सी चीज में वो हमसे ज्यादा है। मनुष्य नहीं कर सकता है। ये कार्य नहीं कर सकता है। ये कार्य मनुष्य नहीं कर पाएगा। इसीलिए सृष्टि के सर्वक्तिमान सर्वशक्तिमान नहीं है। नहीं वो इसलिए सर्वशक्तिमान है क्योंकि वो वो कार्य कर सकता है जो हम नहीं कर सकते। उसमें हमसे ज्यादा क्षमता नहीं है। अरे भाई साहब आप समझ नहीं पा रहे। मैं समझ नहीं बैठा हूं। मैं समझ नहीं बैठा हूं। मैं पहले तो ये समझिए कि मैंने क्या कहा कि ईश्वर को अपने कार्य करने में किसी अन्य साधन संसाधन की या किसी अभी पॉइंट ये चल रहा है कि हम जो कार्य नहीं कर सकते वो वो कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। या फिर ये बात है कि हमसे वो ज्यादा कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। तो आप पहले इसको क्लियर करिए। दूसरी बातें मत करिए। नहीं दूसरी बात नहीं कर रहा। मैं वही बात कर रहा हूं जो मैंने पहले ही कही तो प्रश्न का उत्तर मैं मैं प्रश्न क्या पूछ रहा हूं भाई साहब मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं मैं पूछ रहा हूं कि बता रहा हूं के सर्वशक्तिमान
00:29:54:28 का अर्थ यह होता है कि वह अपने कार्य कर तो भाई साहब आप बता रहे हैं वो मुझे पूछना पड़ेगा ना समझने के लिए मेरे भाई हां तो तो आप तो मैं समझ रहा हूं मुझसे तो आप समझाना नहीं चाहते हो आप प्रश्न अलग कर रहे हो ना आप तो प्रश्न कर रहा हूं उत्तर दो उसका आप पीछे क्यों रहे हो? सुनो सुनो मैं मोटा-मोटा आपको समझा दूं। अगर आप समझना चाहते हो मोटा मोटा नहीं अभी जहां मैं आ चुका हूं वहां पे बात करो। मैं यहां पे आ चुका हूं कि वो इसलिए सर्वशक्तिमान है कि वो वो काम कर सकता है जो मैं नहीं कर सकता। इसलिए नहीं है कि मेरे अंदर जो पावर है वो उसके अंदर मुझसे ज्यादा है। अरे भाई सृष्टि की उत्पत्ति कर सकता है ईश्वर। भाई साहब मैंने क्या पूछा है आपसे? मैंने पूछा है कि वो वो काम कर सकता है जो मैं नहीं कर सकता। इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। इसलिए नहीं कि अगर मैं 10 किलो वजन उठा सकता हूं तो वो जो है 50 किलो वजन उठा सकता है। ये वाली बात नहीं है वहां पे।
00:30:56:07 इनमें से कौन सी बात है? दोबारा बोलिए अपना प्रश्न दोबारा। प्रश्न यह है कि कि जो काम हम नहीं कर सकते वह कार्य वो कर सकता है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। ठीक है? और क्या कहते हैं? ऐसा नहीं है कि हम जो कार्य जितनी क्षमता है हमारे अंदर कोई भी कार्य करने की वो क्षमता उसमें हमसे बहुत ज्यादा है। जो ईश्वर के कार्य है वह हम नहीं कर सकते। यानी कि सर्वशक्तिमान का मतलब यह है कि वह कार्य करने वाला जो जीव नहीं कर सकते।
00:31:43:13 यार घुमा फिरा के मैंने कहा आपको सर्वशक्तिमान का अर्थ यह है अपने खुद के कार्य करने में। उसका भाई साहब आपने अभी सर्व का अर्थ बताया था ना मुझे। अभी मुझे सर्व का अर्थ बताया था ना आपने? आपने सर्व का अर्थ बताया था कि नहीं? सर्व का बताया था जब आप सर्वक्तिमान कहते हैं तो सर्वशक्तिमान का मतलब है सभी जीवों में जो सबसे आप या तो कहिए कि मैं इस पर रहूंगा वो सभी जीवो वाली डेफिनेशन कट तो हम इस बात करेंगे। हां तो उस है तो अभी पूछ रहा हूं। अभी मैं पूछ रहा हूं। अब अब आप बदल रहे हो। अब आप ये कह रहे हो कि जो जो कार्य जो कार्य मनुष्य नहीं कर सकते। सुन लीजिए जो कार्य मनुष्य नहीं कर सकते वो कार्य क्योंकि ईश्वर कर रहा है इसलिए वो सर्वशक्तिमान है। जबकि आपने कहा था कि वो जो जीव जो जीव है उनसे ज्यादा वो क्षमतावान है इसलिए यानी कि जो भी कार्य करने की जीव में शक्ति है मनुष्य में शक्ति है उससे ज्यादा क्षमता वही कार्य करने की ईश्वर में है। वही कार्य करने की नहीं। मैंने क्या कहा ना मुझे अपने कार्य करने के लिए मुझे अपने भाई साहब यह तो फिर यह वाली डेफिनेशन कट कर दो ना कि वो मनुष्य जो जीवो से
00:32:58:14 ज्यादा शक्तिशाली है आप ये कहो कि जिसको कार्य करने के लिए सहायता ना लेनी पड़े वो सर्वशक्तिमान है हां हमसे ज्यादा शक्तिमान तो है ना वो हमसे तुलना करनी पड़ेगी ना उसकी क्यों नहीं करनी पड़ेगी हमसे तुलना तो वो आप तुलना बता दीजिए किस वो आप तुलना बता दीजिए किस आधार पे है किस आधार पे वो इसी आधार पर है ना मुझे अपने कार्य करने में जो मैं रोजमर्रा के कार्य करता हूं मैं मुझे सहायता लेनी पड़ती है प्रकृति की ऑक्सीजन की अपने इसका मतलब इसका मतलब ये है इसका मतलब इसका मतलब ये है समझ गया भाई साहब उसको लंबा क्यों खींचना है प्रवचन सुनने थोड़ी ना बैठे है मैं समझ गया आपकी बात है मैं कहा प्रवचन दे रहा हूं प्रवचन तो दे रहा हूं आप बताओ कहां दे रहा हूं मैं समझ गया ना आपकी बात कि ईश्वर किसी से सहायता नहीं लेता हम लोग रोज सहायता लेते हैं। बस बस बस बस तो फिर उसमें नाम गिनाने की ऑब्जेक्ट गिनाने की क्या जरूरत है? तो यही कह रहा हूं। अब तुम घुमाओ फिर आ के तो भाई उसको मैं समझना चाह रहा हूं। मैं आपने जो क्लेम किया है मैं उसको समझना चाह रहा हूं। आप समझने का प्रयास करिए। मैं समझना चाह रहा हूं। आपने जो समझाने का प्रयास किया है। ठीक है? अब उसका उत्तर दीजिए जो मैं पूछ रहा हूं। आपने जो ये वाली बात कही थी अभी इसको
00:34:13:18 मैं छोड़ रहा हूं कि सर्व का अर्थ है कि जीवो से ज्यादा। अब सर्व का अर्थ आ गया है मेन कि जो किसी से सहायता नहीं लेता है। ज्यादा और कम वाली बात नहीं है। चलो ठीक है। है ना? हां। अब सहायता वाली बात है तो यह बताइए कि आपने कहा हम प्रकृति की सहायता लेते हैं। ऑक्सीजन वगैरह की सहायता लेते हैं। अच्छा एक आपके यहां से बात धर्म धर्म स्थापना करने के लिए आपके यहां क्या माना जाता है कि ईश्वर स्वयं आता है या किसी को भेजता है? क्या है? पुण्य आत्मा महत्मा पवित्र आत्माओं को भेजता है। तो यह सहायता नहीं है। किसकी सहायता? भाई धर्म स्थापना करनी है उसे। वह किसी को भेज रहा है। क्या ले रहा है? किसकी सहायता ले रहा है? पवित्र आत्मा की। क्यों लेता पवित्र आत्मा की सहायता वो? आप ही तो कह रहे हो भेजता है। अरे तो भेज रहा है ना तो उसका कर्म है वो तो वो तो वही तो कार्य कर रहा है ना वो। भेजने में किसी की सहायता ली क्या उसने? अरे क्यों धर्म धर्म संस्थापना जो उसको धर्म संस्थापना उसको करनी है ना ईश्वर को। किसको करनी है? किसको करनी है? अरे यही तो
00:35:28:24 कार्य है उसका प्रभु धर्म संस्थापना करना उसका कार्य है ना एक मिनट भाई साहब धर्म धर्म संस्थापना उसका कार्य है कि नहीं है मैं पूछ रहा हूं मैं क्या पूछ रहा हूं भाई साहब क्लियर करिए है ना तो उसमें वो खुद नहीं कर रहा है वो किसी पवित्र आत्मा को भेज रहा है ये क्या है अभी आपने जो आपने कहा ना अभी के वो किसी को भेज रहा है तो वही वही उसका कार्य है। उसे किसी किसी की पैगंबर की जरूरत नहीं पड़ रही बीच में कि मैं उसके पास मैसेज मैसेज दूंगा तब वो किसी के पास मैसेज देगा।
00:36:08:26 भाई साहब आपने कहा था वो किसी की सहायता नहीं लेता है। ठीक है? अब आप कह रहे हैं कि वो किसी को भेजता है धर्म संस्थापना करने के लिए क्योंकि धर्म संस्थापना उसका कार्य है फिर भी वह भेजता है। यानी किसी का आलंबन लेता है वह अपना कार्य करने का। या तो यह कह दो धर्म संस्थापना उसका कार्य नहीं है या तो यह कह दो और वह किसी को भेजता नहीं है वो अपने से आते हैं अपना धर्म संस्थापना करते हैं वो नहीं भेजता नहीं देखिए मेरी बात मैं बताऊं आपको सृष्टि जो सृष्टि वो रचता है ईश्वर तो वहां पर जो वेद का जो जो ईश्वर जो ज्ञान है जो वहां के अनुकूल उसको देना है तो उसको किस जीव को कहां पर व्यवस्थित करना है। किस आत्मा को कहां भेजना है? यह कार्य उसी का है। तो यह कार्य वो करेगा और यह कार्य भाई साहब मैं मैं क्या कह रहा हूं भाई साहब? मैं क्या कह रहा हूं भाई साहब? मैं क्या कह रहा हूं? आप ये बताइए उसका धर्म संस्थापना कार्य है कि नहीं? अरे भाई साहब एक राजा है ना उसको किस मंत्री को कहां पर व्यवस्थित करना है? कौन से उसमें मैंने क्या पूछा भाई साहब? धर्म स्थापना उसका कार्य है कि नहीं?
00:37:24:02 सरल सा क्वेश्चन है। आप उसका जवाब दीजिए। पता नहीं आप क्या बता रहे हैं कि वह मंत्री है। ये क्यों बता रहे हैं? आप मुझे सरल साब मेरे मैंने सरल एक क्वेश्चन क्या ईश्वर का कार्य है धर्म संस्थापना करना या नहीं है? हां है। हां है। तो उसके लिए पवित्र आत्मा को भेजता है ना। खुद नहीं कर रहा है ना। अरे खुद ही तो कर रहा है। ये कार्य उसके द्वारा ही तो करवाया ना उसने। तो यानी कि जो भी हम किसी से मदद ले रहे हैं तो हम कह सकते हैं उसके द्वारा हम ही ने तो किया
00:37:59:01 जो उसने उसका काम क्या है? धर्म संस्था धर्म का प्रचार धर्म को मनुष्य तक जीव तक पहुंचाना उसका कार्य है। ठीक है? और वही वो कर रहा है जीवो तक कर रहा है। उसको जिस जो पवित्र आत्मा है नहीं वो देखिए जीव कर रहा है या वो कर रहा है कौन कर रहा है? यहां पर आकर के काम कर रहा है ना कोई उसका ईश्वर ही कर रहा है। निमित्त ईश्वर ही है। निमित्त ईश्वर ही है। ऐसे तो जीव भी कोई काम कर रहा है। यहां पे हम जो सहायता ले रहे हैं किसी से उन सब में ईश्वर ही है। फिर ईश्वर ही सारे काम कर रहा है। ऐसे तो जीव कुछ कर ही नहीं रहा है। फिर कुछ करता भी है जीव कि नहीं? जीव करता है ना। क्यों नहीं करता है? क्या करता है? भाई हमारी हम जो कार्य कर रहे हैं जब वह पवित्र आत्मा के रूप में आकर धर्म संस्थापना कर रहा है तो हम कह रहे हैं वो निमित्त क्योंकि ईश्वर है तो ईश्वर का ही माना जाएगा तो ऐसे तो फिर मैंने बोतल उठाई तो ये ईश्वर नहीं उठाई सब कुछ ईश्वर ही कर रहा है फिर तो कोई काम कर ही नहीं रहे हम लोग तो फिर ये वाली बात खत्म हो गई कि वो किसी की सहायता नहीं लेता भैया सबका निमित्त ईश्वर है तो सब कुछ ईश्वर ही से हो रहा है इसमें सहायता लेने की कोई बात ही नहीं है कर ही ईश्वर रहा है हर काम
00:39:19:13 अच्छा दूसरी बात एक आप वो जो ईश्वर के चार कार्य हैं वो क्या बताए थे आपने? सृष्टि की उत्पत्ति करना। सृष्टि का पालन करना और फिर उसका नष्ट कर देना। अच्छा तो जैसे अभी हमने थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि मैं प्रकृति की सहायता लेता हूं तो सृष्टि की उत्पत्ति करने में प्रकृति की सहायता लेता है क्या ईश्वर या नहीं या अपने से ही करता है मैंने कहा साधन संसाधन की आवश्यकता जैसे हमें हथौड़े हथोड़े की जरूरत पड़ती है ना कुछ कार्य करने के लिए पेचकस की जरूरत पड़ती है ना वो किसी पेचकस की या किसी औजार की आवश्यकता भाई साहब वहां पे ये पेचकस वगैरह होता है क्या जब वो सृष्टि रचना वाली बात आ रही है वहां पेचकस होता है क्या? अरे भाई साहब हम मटका वहां पे क्या होता है? वहां पे ईश्वर के अलावा क्या-क्या होता है?
00:40:18:26 तो ईश्वर के अलावा वो जो दुनिया है उसमें क्या-क्या है? पेचकस भी है वहां पे। पेचकस वगैरह है। मूल प्रकृति है वो। प्रकृति है। मतलब है ही एक तत्व। अब यह बताइए उसका आलंबन लिए बिना वह सृष्टि रच देता है या वह जो तत्व है उसका आलंबन लेता है? मैंने यह कहा कि वह किसी की साधन संसाधन की आवश्यकता नहीं लेता। अब वो प्रकृति से ही तो बनाएगा ना। भाई साहब मैंने क्या पूछा है कि वहां पे साधन संसाधन होते हैं क्या? नहीं होते। तो इसका मतलब साधन जो चीजें वहां है ही नहीं उसकी वह सहायता कहां लेगा वहां तो प्रकृति है और आप कह रहे हो वो किसी की सहायता नहीं ले मगर प्रकृति है उसकी सहायता ले रहा है संसार बनाने के लिए
00:41:10:26 जीव को उसमें भेज रहा है जीव को धर्म संस्थापना के लिए भेज रहा है हम चलिए हो गया ये इतना देख लिया अच्छा मुझे एक बात बताइए कि यह अच्छा चलो आपने इतने प्रश्न के लिए थोड़ा प्रश्न मैं कर लूं आपसे। अब भाई अब अब जो मेरे उसमें आ गया वो मैं कर लेता हूं फिर कर लेना आप। अब अब आ गया एक और बहुत रिलेटेबल है। ये बताइए ये जो ईश्वर है वो एक रस है कि नहीं? एक रस। एक रस है। एक रस मतलब सब जगह बिल्कुल बराबर बराबर समान कोई कम ज्यादा बिल्कुल नहीं ना है ना तो जरा थोड़ा सा बताइए षष्ठी कैसे बनाता है वो थोड़ा सा बताएंगे इस बारे में सृष्टि कैसे बनाता है मतलब पहले सब जगह खाली स्पेस है प्रकृति निराकार रूप में होती है फिर निराकार से वो साकार होती है मिट्टी के कण वगैरह इत्यादि के रूप में वो जो पांच तत्व उनके रूप में कैसे साकार सृष्टि कैसे बनती है पहले निराकार होती है प्रकृति भी
00:42:25:27 निराकार होती है या वो यह मिट्टी वगैरह पहले से ही होती है हमेशा। तीन चीजें अलग-अलग है। मूल प्रकृति, जीवात्मा और ईश्वर ये तीनों चीजें अलग-अलग है। ठीक? मूल प्रकृति जैसे भाप होती है। इस तरह समझ लीजिए। फिर उसमें कंपन करके उसके अणुओं को जोड़ के तब मतलब जो जो प्रकृति है वो ये जो कण वगैरह तैर रहे होते हैं ना उसमें आकाश इसमें वायुमंडल में हां क्या हां हां मतलब जो प्रकृति मिलती है वो
00:43:08:24 इसमें ना तो अग्नि है ना वायु है ना आकाश है तो मिट्टी भी नहीं है मिट्टी भी नहीं केवल स्पेस हां स्पेस है। है ना? हां बिल्कुल यही प्रकृति है ना? अच्छा तो फिर ईश्वर भी प्रकृति के साथ साथ है वही वहीं पर जहां जहां स्पेस है जो पूरा ईश्वर भी है। तो फिर क्या होता है? फिर कैसे निकलता है? पहला अणु क्या होता है? जो प्रकट होता है। प्रकट नहीं होता है। उन को जोड़ के प्रकृति का नहीं नहीं अभी तो स्पेस है ना अणु है ही नहीं ना कोई भी है ना अु है जो हमें दिखाई नहीं देते अपनी आंखों से बहुत मतलब प्रकृति निराकार रूप में नहीं है मतलब प्रकृति स्पेस जो है वो तो निराकार है मगर उसमें अणु भी तैर रहे हैं जो साकार है इतना ईश्वर निराकार है प्रकृति साकार है अच्छा ये जो मटेरियल है ये होता है पहले से अवेलेबल हां ये पहले से होता है ये मिट्टी के कण बहुत बहुत माइक्रो लेवल हां इसका मटेरियल होता है इसी से वो प्रकृति की रचना करता है। अच्छा पंच तत्वों की सूक्ष्म शरीर की मतलब
00:44:23:25 ये मटेरियल जो होता है मटेरियल जो होता है वो क्या कहते हैं ये ये जो मटेरियल होता है वो ऐसे तैर रहा होता है इतने माइक्रो लेवल पे होता है कि हमें दिखता नहीं मगर वो होता है हां है ना अच्छा और बाकी स्पेस तो है ही है स्पेस में वो स्पेस के साथसाथ जो है ईश्वर भी है और वो जो मटेरियल है उसमें भी ईश्वर वो जो मटेरियल छोटे-छोटे कण है जो ईश्वर उसमें भी व्याप्त है। हां ठीक है। अब एक चीज मैं ये कह रहा था कि जैसे अ
00:45:04:14 जब ईश्वर जैसे सूर्य बना रहा है। जैसे कि मैं इस टेबल पर कई सारी बड़ी-छोटी चीजें रखी हुई है। तो क्योंकि मेरे पास कहीं पर मैं ज्यादा हूं और कहीं पर कम हूं। तो इसलिए मैं चाहूंगा तो बड़े डब्बे को नीचे गिरा दूं। मैं चाहूंगा तो छोटे डब्बे को क्योंकि मैं तय कर सकता हूं कि कहां पर मेरी कितनी पावर लगे और मैं चाहूंगा तो गिराऊं भी नहीं। है ना? सही कह रहा हूं ना। कम ज्यादा क्योंकि मैं एक रस नहीं हूं। मेरा कहीं पे सर है और कहीं पे हाथ है। मैं एक रस नहीं हूं। है ना? अच्छा शरीर की बात कर रहे हो क्या? हां अपनी शरीर मनुष्य शरीर मनुष्य शरीर की बात कर तो मैं एक रस नहीं हूं इसलिए मैं इस टेबल पे ये तय कर सकता हूं कि कहां पर मेरी फोर्स कितनी लगे और कितनी ना लगे। ठीक है? अच्छा अब ईश्वर तो एक रस है। ठीक है? ईश्वर तो एक रस है। तो वह जब भी कहीं पर फोर्स लगाएगा तो एक समान फोर्स लगेगी।
00:46:19:27 क्योंकि फोर्स के रूप में भी ईश्वर ही है। तो फोर्स तो कम ज्यादा हो नहीं सकती। तो फिर कहीं पर सूर्य कहीं पर चंद्रमा ये सब कैसे बनेगा? फिर इच्छा से बनेगा। नहीं इच्छा से नहीं वो उसमें काम करता है ना। शक्ति के रूप में काम करता है। केवल सोचता है और हो जाता है। जहां उसको कार्य सोचता नहीं है। जहां उसको जैसा उसको व्यवस्थित करना होगा वो वहां उसको व्यवस्थित करेगा। नहीं नहीं यह नहीं पूछ रहा भाई जैसे ये एक एक बोतल है ये। ठीक है? तो क्या इसको ईश्वर का जैसे मिट्टी का कण है उसको इकट्ठा करता है। ईश्वर मट्टी कण को इकट्ठा कर रहा है और पृथ्वी बना रहा है। तो मिट्टी कण जब उसने इकट्ठा किए तो उसने ताकत वहां पर मट्टी कण को धक्का दिया।
00:47:12:09 दिया ना धक्का जिस कारण से कई सारे मिट्टी के कण एक साथ होकर के एक दिन पृथ्वी जैसा कुछ बना धक्का दिया ना ईश्वर ने ठीक है तो ये जो धक्का ईश्वर ने दिया जहां पर पृथ्वी बनाई वहां पे कम है जहां सूर्य बनाया वहां ज्यादा है और कहीं पर नहीं भी दिया है ना तो ईश्वर जब एक रस है तो तो ये कम ज्यादा कैसे हो रहा है? एक रस के होने का मतलब ये थोड़ी ना है कि वो कहीं पर भी कुछ भी कर देगा या सबको एक साथ इकट्ठा कर देगा। अनंत अनंत ब्रह्मांड है, अनंत गैलेक्सियां है, अनंत पृथ्वीया है, उसको उस हिसाब से व्यवस्थित करना होता है ना उसको। कि उसको कहां पर क्या मैं ये पूछ रहा हूं भाई साहब, मैं ये नहीं कह रहा एक रस तो वो करे ही करे। रस का मतलब ये है कि वहां हर जगह बराबर है। तो बराबर है ना? तो फिर ये शक्ति कम ज्यादा कैसे हो रही है? कहीं पर पहाड़ बन रहा है। सुनिए कहीं पर पहाड़ बन रहा है। कहीं पर नहीं बन रहा।
00:48:17:08 वो उसकी व्यवस्था है। वो अपनी वो व्यवस्था मैं समझना चाह रहा हूं ना भाई साहब। इसको इसको जो धक्का लग रहा है। सुनिए इसको जो धक्का लग रहा है वो ज्यादा लग रहा है। इसको जो धक्का लग रहा है वह कम लगेगा। और अगर वह एक समान धक्का लगाएगा तो यह अपनीप जो उसकी सुनिश्चितता होगी वह बदल जाएगी। तो वह जो फोर्स है वो फोर्स के रूप में कोई अलग से तो फोर्स है नहीं। फोर्स के रूप में तो ईश्वर स्वयं है। तो यहां पर ईश्वर कम ज्यादा हो रहा है। जबकि हम कह रहे हैं कि ईश्वर एक समान है। ये कैसे? एक समान का उस जो आप कह रहे हो ना वो अपने आप में एक समान है। ठीक है। लेकिन वो जो जो वो कर रहा है ना वो अपने हिसाब से व्यवस्थित कर रहा है उसको। अरे मेरे भाई मैंने क्या पूछा है कि ईश्वर कुछ भी करेगा दुनिया में जैसे मैं हूं मैं अगर एक समान हूं अगर मैं अपने पर कंट्रोल नहीं कर सकता कि मुझे कहां ज्यादा कहां कम होना है तो जब मैं हिलूंगा जब मैं इस टेबल पर धक्का लगाऊंगा अपना सारी बोतलें गिर जाएंगी क्योंकि मैं अपने आप को रेगुलेट नहीं कर सकता हूं। मैं अपने आप को रेगुलेट नहीं
00:49:32:14 कर सकता हूं कि मैं कहां पे ज्यादा काम करूं। कहां पर कम काम करूं और कहां पर ना करूं। तो मैं जब भी हरकत करूंगा वो एक साथ पूरी हरकत होगी। जबकि ईश्वर कहीं पर बड़ा ग्रह बना रहा है। कहीं पर छोटा ग्रह बना रहा है। कहीं पर नहीं भी बना रहा है। तो इसका मतलब इसका मतलब वो अपने आप को रेगुलेट कर पा रहा है। यानी कि वो अपने आप को कम ज्यादा कर पा रहा है। अन्यथा क्या होगा? जब भी वह हिलेगा, जब भी वह हिलेगा तो दुनिया में हर जगह हिलेगा। जब भी उसकी फोर्स लगेगी एक मिनट जब भी उसकी फोर्स लगेगी तो दुनिया में हर जगह उसकी फोर्स लगेगी। और जब उसकी फोर्स हर जगह लगेगी तो कोई क्रिएशन कैसे होगी? क्योंकि क्रिएशन तो वही होगी ना कोई ज्यादा कोई कम, कोई ऊंचा, कोई नीचा। हां। मैं आपकी बात समझ गया। देखिए ईश्वर क्या है? कणों जो कण होता है ना जो परमाणु होता है वह उसके अंदर से फोर्स लगाता है। ठीक है? और जो जो जीव है वो बाहरी फोर्स लगाता है। तो जो आप कह रहे हो ना हिलने के लिए वो जो है वो आकार वाली वस्तु क्योंकि हम साकार है हम हिलेंगे। उसके हिलने का कोई वो नहीं है क्योंकि वो तो हर जगह है। उसका
00:50:47:15 हिलने का कोई अच्छा मैं अंदर से नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूं फोर्स तो कम ज्यादा हो रही है ना। मैं परमाणु के अंदर से फोर्स कह रहा हूं। के अंदर तो अंदर ज्यादा होगी ना। वो जिस परमाणु को इकट्ठा करना चाहे जहां पर जितना मैं ये कह रहा हूं भाई साहब अच्छा वो अच्छा ठीक है ठीक है। वो जिस परमाणु को इकट्ठा करना चाहेगा वो होगा जिसको नहीं चाहेगा वो नहीं होगा। ठीक यानी कि कई कुछ परमाणुओं में वो एक्टिव हो सकता है और कुछ परमाणुओं में वो नहीं हो सकता है। फोर्स के रूप में आवश्यकता नहीं है वो क्यों लेगा उसे? हां हां तो इसका मतलब इसका मतलब अगर वो एक परमाणु में अगर वो एक परमाणु में उसकी शक्ति सक्रिय हो रही है उसको इकट्ठा करने वाली तो दूसरे परमाणु में नहीं भी हो सकती शक्ति उसकी सभी जगह है ठीक है अरे मेरे भाई जहां पर उसको व्यवस्थित करना है वो किसको व्यवस्थित करना है किसको नहीं करना है ये तो आप दावा कर रहे हो मैं उस दावे पे क्वेश्चन कर रहा हूं खोल के पूछ रहा हूं उसको जब वो परमाणु के अंदर है। ठीक? और दूसरे परमाणु के अंदर भी है। अब जब वो परमाणु के अंदर से धक्का देना स्टार्ट कर रहा है तो यहां पे तो दे रहा है। और देने देने के रूप में जो धक्का है साकार आप जो ले रहे
00:52:02:19 हो ना वो साकार उसमें ले रहे हो लेकिन ईश्वर निराकार है। वो हर उससे क्या मतलब भाई साहब? मैं धक्के को साकार कह रहा हूं क्या? हां धक्के को साकार कह रहा हूं। धक्का साकार ही लगाएगा ना। धक्का धक्का साकार लगता है। और क्या धक्का साकार होता है ईश्वर का ईश्वर का धक्का साकार होता है चलिए आप मेरी बात सुनिए आप क्या साबित करना चाह रहे हैं कि ईश्वर साकार है नहीं अभी मैं ये साबित करना चाह रहा हूं कि ईश्वर जब निर्गुण निराकार एक रस वाला है तो फिर वो सगुण निराकार कैसे हो रहा है वो ऐसे हो रहा है कि ईश्वर अवतार लेता है ईश्वर निर्गुण निराकार होते हुए भी ईश्वर सगुण निराकार का अवतार लेता है तब यह पॉसिबल हो सकता है कि दुनिया बन सकेगी। मुझे बताइए तो सनातन का अर्थ समझते हैं ना आप हम है नहीं अगर ईश्वर यहां पर ईश्वर यहां पर आएगा एक छोटी सी पृथ्वी पर आएगा तो वो एक देसी हो जाएगा। बाकी की जो व्यवस्था अनंत ब्रह्मांड की व्यवस्था है वो कौन संभालेगा उस वक्त? भाई साहब अभी जो हमारा टॉपिक है ना वो पहले मैं एक बार क्लियर कर दूं। नहीं इसका उत्तर दे रहा हूं
00:53:17:22 जो बात चल रही थी उसको एंड कर दूं जैसे पिछली सारी बातों का एंड किया है वैसे कर दूं वो कर रहा हूं तो ईश्वर जब निर्गुण निराकार है तो निर्गुण निराकार स्वरूप से सृष्टि की रचना पॉसिबल हो ही नहीं सकती वो अवतार लेता है सगुण निराकार के रूप में अवतार लेता है और अब सगुण निराकार होने के रूप में वो ये कंट्रोल करने वाला है कि वो कहां पर कम हो कहां ज्यादा हो कहां नहीं हो कहां नहीं हो का मतलब है मगर एक्टिव नहीं है फोर्स के रूप में एक्टिव नहीं है। है तो निर्गुण निराकार के रूप में सब जगह मगर फोर्स के रूप में एक्टिव नहीं है। क्योंकि अगर निर्गुण ही अपने आप को रेगुलेट एक मिनट भाई साहब मैं खत्म कर रहा हूं। अगर निर्गुण ही अपने आप को रेगुलेट करेगा तो भगवान में शाश्वतता भंग का दोष आ जाएगा। वो नित्य नहीं रह गया। बदल रहा है। परिवर्तनशील हो गया। है ना? तो भगवान निर्गुण निराकार एक रस नित्य वो तो हैं। अब उन्होंने एक और अवतार लिया। अब वो सगुण निराकार हो गए और अब वो किसी के धक्के का विषय बन रहे हैं या आपके अनुसार परमाणु के अंदर से ही धक्का लग रहा है नहीं लग रहा है वो उनके ऊपर है कहां पे वो एक्टिव हो कहां पे ना हो ये है सगुण निराकार ठीक है ये हो गया सगुण निराकार अब जो है अच्छा ये भी एक बात है सगुण निराकार
00:54:32:26 से ही एक देश वाली बात कट जाएगी कि जब ईश्वर सब जगह है तो ऐसा कैसे कर पा रहा है कि वह किसी के लिए धक्के का विषय बने और किसी के लिए ना बने। ये धक्का एक देसी है ना कि सर्व्यापक धक्का है। धक्का तो एक ही देसी है। एक देसी है। यानी कि कहीं पर वो वो है सब जगह। फिर भी वो ऐसा कर सकता है कि कहीं पर धक्के का विषय बने और कहीं पर ना बने। कार्य तो कर रहा है ना प्रकृति में। अरे भाई साहब मैंने मैंने क्या पूछा भाई साहब? मैंने ये पूछा है कि वह सर्वव्यापक है फिर भी वह किसी अणु के धक्के का विषय है और किसी अणु के धक्के का विषय नहीं है। सर्वव्यापक होते हुए भी वो इस बात को रेगुलेट कर सकता है कि कहां पर मुझे धक्के का विषय बनना है और कहां नहीं बनना है। ठीक? अब जो धक्के की बात होती है तो सीधी सी बात है कि जो भौतिक तत्व है प्रकृति तत्व है आंशिक रूप से वो यह चयन कर रहा है कि मैं इसकी बाधा बन जाऊं अगर ये इधर तैर रहा है तो ये मेरी मेरी जो इच्छा है उसके विपरीत तैरे नहीं मेरे उद्देश्य के विपरीत तैरे नहीं
00:55:48:16 जैसे अगर यह पृथ्वी का गण है तो यह इधर नहीं जा सकता क्योंकि यहां पर ईश्वर अपना धक्का लगा रहा है धक्के को पार नहीं कर सकता कि पार करके चला चला जाए। ईश्वर के पीछे पीछे पीछे पीछे ईश्वर के धक्के के पीछे पीछे इसको जाना पड़ेगा। और अगर ईश्वर यह चाहता है कि इसको इधर ले जाना है तो यह इधर ले जाएगा। यह जो कण है वो इसको पार नहीं कर सकता। यानी कि उसको जो धक्का लग रहा है कण को पृथ्वी को वो ठोस धक्का है। उसको पार नहीं कर सकती। पृथ्वी कर सकती है क्या? उसके विपरीत गमन कर सकती है। ईश्वर की ईश्वर के बल के विपरीत गमन नहीं कर सकती। ठीक? अब जो आपने कहा कि एक देश कैसे हो सकता है? तो मैंने आपको बता दिया ईश्वर अपने आप को रेगुलेट कर सकता है कि वो कहां पर धक्के का विषय बने, कहां पर ना बने। कहां पे वो किसी भौतिक पदार्थ के आवागमन की बाधा बने और कहां पर ना बने। ठीक? इसी प्रकार से जो ईश्वर है वह प्रकाश के आवागमन में जब बाधा बनता है हम हमारी आंखें कब देखती है कुछ जब उस पर प्रकाश पड़ता है और आकर के प्रकाश हमारी आंखों से टकराता है तो मान लीजिए कि मेरे प्रकाश जा रहा है पेड़ की
00:57:03:25 ओर मेरे सामने एक पेड़ है उस उस तक प्रकाश जा रहा है और मैं पेड़ को देख रहा हूं मगर प्रकाश के गमन की जो प्रकाश की जो यात्रा है प्रकाश का जो मार्ग है प्रकाश की गति में ईश्वर बाधा बन सकता है कि नहीं कि उससे टकरा के उसके दूसरी तरफ प्रकाश ना पहुंच पाए। जब ईश्वर ऐसा करता है एक देश में तो वो ईश्वर का अवतार कहलाता है। अब वो पेड़ तक नहीं जा रहा प्रकाश। मेरी आंखों और पेड़ के बीच में ईश्वर का एक ईश्वर ने सर्वव्यापक होते हुए भी एक जगह पर उसने ऐसी बाधा उत्पन्न की कि वो जो प्रकाश था वो पेड़ तक ना पहुंच के ईश्वर के उस वो जो उसने बाधा उत्पन्न की उस बाधा से टकरा के मेरी आंखों तक आ रहा है। अब जो सर्वव्यापक ईश्वर है मेरी नेत्रों का विषय भी बन गया। जैसे वो पहले किसी कण के व्यवहार का विषय बना। किसी कण के व्यवहार का विषय नहीं बना। एक मिनट ऐसे ही हां एक मिनट एक मिनट ठीक है आपके जो तर्क है वो थोड़ा ठीक है लेकिन ये फिर भी ये सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवतार लेता है क्यों कैसे क्योंकि ईश्वर सच्चिदानंद भी है सत्य चित्त आनंद सत्य वह जो कभी परिवर्तित
00:58:19:01 ना होता हो ठीक है और अगर वो परिवर्तित भाई साहब आप तो परिवर्तित कर दिए ना सगुण निराकार बना के कहां परिवर्तित कर दिए तो बताओ सृष्टि कैसे बनाई क्योंकि वह निराकार था निराकार और रहेगा अगर अरे भाई वो वो परिवर्तित नहीं होता ना एक मिनट वो परिवर्तित नहीं भाई साहब अभी बहुत अच्छे से मैंने क्या पूछा है मैंने मैंने सिद्ध कर दिया कि उसका जो वो वाला रूप है वो होते हुए भी वो दूसरे रूप में अवतरित होता है। इसी को अवतार कहते हैं। अब अगर आप ये वाला नहीं मान रहे मैं मैं ये कह रहा हूं अगर आप ये वाला नहीं मान रहे आप ये कह रहे हो कि वो सब जगह होते हुए भी एक जगह पर शरीर शरीर ले लेता है। हां बिल्कुल ले लेते हो क्यों वो उसे क्या कार्य कर ऐसा क्या कार्य अरे भाई बात क्या चल रही है पहले देखो आपने क्लेम किया है ईश्वर ईश्वर नित्य है आपने क्लेम किया मगर नित्य होते हुए भी जब वो सगुण हुआ तो वो नित्य नहीं है वहां ईश्वर ईश्वर जब सगुण हुआ है ईश्वर जब सगुण हुआ है तो वो नित्य नहीं है करने के लिए वो अवतार लेगा ये बताइए मुझे कौन करने के लिए अच्छा अच्छा अब मुझे ये बताओ
00:59:34:12 ना कि मंत्र क्यों देगा वो वेद के मंत्र क्यों देगा कौन सा कार्य करने के लिए पूछ रहा हूं वेद के मंत्र क्यों देगा वो अरे पहले मेरा सब उत्तर है उत्तर दीजिए ना तो मेरे जवाब में आपका उत्तर है मेरे जवाब में वो जो है सृष्टि में प्रपंच रूपी संसार में अपने मन के अनुसार यूं ही उसका कोई कार्य नहीं है। वो जो कार्य शरीर का देह धारण करके कर सकता है वो बिना देह धारण करके भी कर सकता है। मगर वो यूं ही करता है प्रपंच रूपी संसार को आगे बढ़ाने के लिए और अगर आप ये कह रहे हैं कि वो मंत्र कहता है वैसे मंत्र भी मंत्र भी उसकी जो व्यवहारिक दुनिया का लक्षण है। मगर जिस प्रकार वो व्यवहार में आने के लिए मंत्र देता है। मंत्र के रूप में ज्ञान को देता है। जबकि उसका ज्ञान सर्व्यापक है। फिर भी वह उसको एक देश बना के देता है। एक देश काल परिस्थिति में चार विषयों के अंतकरण में उसको प्रकट करता है। कुत्ता बिल्ली के अंतकरण में वो नहीं आता है। किसी जिसको वो चाहता है उसके अंतःकरण में आता है। कुत्ता बिल्ली को तो वैसे भी नहीं हो सकता ना क्योंकि मोक्ष को प्राप्त करने के लिए मनुष्य ही वो वो भाई साहब मान्यता है। अभी हम ये बात कर रहे हैं कि हां तो ठीक है। मोक्ष को प्राप्त करने के लिए यही मानव देह आवश्यक है। तो इसका मतलब वह सर्व्यापक होते हुए भी तय करता है
01:00:49:20 कि वह जो है कहां पर अपने ज्ञान को प्रकाशित करे। वह चुनता है। तो उसी प्रकार से जब वो मनुष्य के व्यवहार में आ सकने लायक मंत्र दे सकता है जिससे कि मनुष्य उसके साथ सरलता से व्यवहार कर सके। इसी प्रकार से वो मनुष्य के व्यवहार में आ सकने लायक ऐसा रूप धारण कर सकता है जिसके साथ लोग व्यवहार कर सके। जिन जो कि उनकी भक्ति का विषय बन सके। उनके प्रेम का उनकी आस्था का विषय बन सके। सिंपल और मजबूरी नहीं है उसकी। यह बात बहुत गलत है कि भैया उसको क्या जरूरत पड़ी? मजबूरी नहीं है। वो बिना मजबूरी के भी धर्म संस्थापना कर सकता है। उसका मन है। वो यहां पे ऐसे करना चाहता है। वो वहां पे वैसे करना चाहता है। उसके पास कोई मजबूरी नहीं है। मजबूरी हो जाएगी तो सच्चिदानंद नहीं रह जाएगा। आपने आपने कहा कि ऐसे ही ले लेता है वो अवतार। मैंने क्या कहा? जैसे आपने कहा कि मैंने बताया आपको कि जैसे वो सर्वव्यापक मंत्र सर्व्यापक ज्ञान को मंत्र के रूप में देता है। देता है कि नहीं देता है? हां देता है देता है। हां तो क्यों देता है? सीधे अपने मन में शब्द शक्ति सोचे यहां ज्ञान हो जाए आदमी को। क्यों मंत्र? क्यों प्रणव? जिससे कि यहां पर उसका लेनदेन, उसका
01:02:04:28 प्रपंच, उसका व्यवहार हो सके। जो ले रहा है वो ले सके नहीं लेना नहीं ले सके ये सब ड्रामा ये जो चल रहा है ना प्रपंच रूपी संसार का यह हो सके व्यवहार हो सके तो ऐसे ही भगवान के साथ हमारा व्यवहार हो सके इसलिए वो जो है अवतार के रूप में आता है सिंपल अच्छा अब थोड़ा सा लाइट आगे करते हैं मैं ये कह रहा हूं ईश्वर को आपका कोई प्रश्न था या यही यही प्रश्न थे जो मैंने जिनका जवाब दे दिया। कोई और प्रश्न है अवतार के विषय में? आपने कहा था ना कि मेरा प्रश्न भी ले लो। एक हां मेरा अवतार के विषय में प्रश्न है हां कि आप जो कह रहे हैं कि
01:02:54:21 मैं प्रश्न भूल गया। मुझे लगता है हो गया आपका प्रश्न। दूसरा आगे के विषय पर चलते हैं। बोलिए बोलिए। हम अब ये वाली बात आती है कि मुझे ये बताइए कि ईश्वर की हमें आवश्यकता क्या है? आर्य समाज के ईश्वर की क्या आवश्यकता है? मतलब हम उसे माने या ना माने आवश्यकता क्या है? ईश्वर को तो मानना पड़ेगा। मतलब हम उसकी भक्ति करें या ना करें उसके द्वारा जो उसको उसके निमित्त जो कर्म करने को कहे गए हैं कि भूभ स्वा मंत्र पढ़ो ये वो तो ये हमें आवश्यकता क्या है ये सब करने की
01:03:46:19 तभी तो हमें तभी तो हम सत्य को जान पाएंगे तभी तो हम वेद ज्ञान को जान पाएंगे सिद्धांतों को जान पाएंगे वरना मूर्खों की तरह वही फिर भूत प्रेत में और उल्टी सीधी बात लोग ज्ञान को जान पाएंगे क्योंकि हम क्या करेंगे? हमें मोक्ष की प्राप्ति है ना? मैं मनुष्य मोक्ष मोक्ष मिल पाएगा। अगर हम ईश्वर को मानेंगे और उसको पूजेंगे तो मोक्ष मिल पाएगा। हां। मतलब कि अगर हमने क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि कर्म कहा जाता है। कर्म करने पड़ेंगे। ईश्वर की पूजा करने से आपको कल्याण नहीं होगा। कर्म करना पड़ेगा। नहीं जो कर्म तो कर्म कर वही तो कर्म है कर्म यानी कि यानी कि जैसे मान लीजिए मैंने कर्म नहीं किया और ईश्वर की भक्ति कर ली यह भी एक कर्म है तो इससे मेरा कल्याण हो जाएगा मोक्ष हो जाएगा नहीं तीन उसमें बहुत सारी चीजें हैं। धर्म का पालन करना पड़ेगा। यज्ञ नित्य यज्ञ करना पड़ेगा। लेकिन इसका अगर मैं ईश्वर मैं ईश्वर की ईश्वर की पूजा ना करूं ईश्वर का नित्य यज्ञ ना करूं मगर अपने कर्म और धर्म का पालन करता रहूं तो वो नहीं होगा मोक्ष तब मोक्ष नहीं मिलेगा
01:05:02:09 तब नहीं मिलेगा तो यानी कि ईश्वर की जो भक्ति है कर्म कर्म हमारे कर्म हमारे तय करते हैं कि हमें कौन सी योनि मिलेगी ठीक है हमें जन्म कहां मिलेगा कर्म ये तय करते हैं भक्ति हमें ईश्वर के नजदीक ले जाएगी। हमें और क्योंकि आत्मा को ज्ञान ज्ञान की आवश्यकता मतलब मेरा कहने का मतलब यह है कि जैसे मैंने कई बुरे कार्य कर रखे हैं तो क्या भक्ति भक्ति के कारण भक्ति करने से वो जो पाप है वो नष्ट हो सकते हैं कि नहीं हो सकते? क्या है मामला? नहीं पाप कभी नष्ट नहीं होते। ईश्वर भक्ति करने से कुछ देता है कि नहीं देता है? देता है। ज्ञान देता है, मनोबल देता है। ज्ञान देता है और मनोबल देता है। हम बिल्कुल से भक्ति करने से पक्का करना हां बिल्कुल उसके उसके गुणगान करना उसको जानना मतलब ईश्वर की भक्ति करने से वो ईश्वर हमको ज्ञान देता है। ऐसा है।
01:06:10:14 मैंने क्योंकि आपके यहां पढ़ा है कि ईश्वर देता नहीं है। आपके कर्मों से कर्मों से जो होगा वह आपको मिलेगा। ईश्वर कुछ देगा नहीं आपको। नहीं हमें हमें पढ़ना पड़ेगा। उसके बारे में जानना पड़ेगा। उसका ध्यान लगाना पड़ेगा। भाई साहब ईश्वर कुछ देगा हमको कि नहीं देगा? या वो कर्मों का फल देगा। ईश्वर तो हमें हमारे कर्मों का ही फल देगा ना। यानी यानी उसकी भक्ति करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसके बताए हुए कर्म करते रह। जो हमारे कर्म अच्छे हैं वह करते रह। धर्म पर चलते रहे। कर्म भक्ति कर्म में तो आ कर्म को यानी भक्ति करने से भी मिलेगा ना। हां जो बाकी के कर्म करने से मिल रहा है। भक्ति करने से भी मिलेगा। यहां पे आप आर्य समाज के विरोध में जा रहे हैं। भक्ति करने से भगवान कुछ नहीं देंगे। ये लिखा है आपकी सत्यार्थ प्रकाश में देख लीजिए खोल के। मैं मैं भक्ति का अर्थ ध्यान से ले रहा हूं। अरे चाहे जो कर लो मिलना कुछ नहीं है। भगवान कुछ नहीं देगा। चाहे ध्यान कर लो, योग कर लो कुछ भी उल्टे खड़े हो जाओ। कुछ नहीं देगा। ईश्वर का आनंद मिलेगा। क्यों नहीं मिलेगा? ईश्वर का आनंद मिलेगा। हमारे भाई साहब भगवान देगा कि नहीं? मैं पूछ रहा हूं भगवान देगा कि नहीं?
01:07:28:00 ईश्वर का नियम ही यही है। जो कार्य करेगा उसको उसका फल देना है। उसका कार्य यही है। तो यह भक्ति करना एक जो जैसे यज्ञ कर रहे हैं या उसका नाम कर रहे हैं। आपके यहां कुछ भजन वजन भी होता है क्या ईश्वर का? यज्ञ नहीं यज्ञ अलग होता है और ध्यान अलग होता है हम और भक्ति अब भक्ति को आप ध्यान से जोड़ जोड़ रहे हो तो मैं भक्ति को नहीं भक्ति है आपके यहां कि नहीं है कैसी भक्ति आपके यहां भक्ति है कि नहीं भक्ति करते हैं ईश्वर की कि नहीं हम ध्यान करते हैं भक्ति ईश्वर का ध्यान करते हैं तो ध्यान करने जैसे हम ईश्वर का ध्यान करते हैं तो ईश्वर हमको हमारे कल्याणकारक चीजें दे देता है। हां दे नहीं दे वो वहां नहीं देता हमें हमें उसके लिए प्रेरित हमें उसके लिए प्रेरित प्रेरित करता है जैसे मुझे कुछ चाहिए तो यानी कि वो बुद्धि देता है ज्ञान देता है यानी वो ज्ञान देता है आनंद ईश्वर का आनंद प्राप्त होता है
01:08:40:24 भक्ति करने से ईश्वर का आनंद प्राप्त होता है। ध्यान करने से ध्यान करने से ईश्वर का आनंद प्राप्त होता है। हां जी। ये कहां लिखा है आपके यहां? सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है। कहां बताइए? प्रकाश निकाल रहा हूं मैं। आप बताइए तब तक पेज पेज क्रमांक अरे क्या हुआ चले गए क्या हेलो
01:09:18:09 अरे बिना बताए चले गए चलिए ठीक है आज के लिए इतना काफी है आपको काफी कुछ समझ में आया होगा चीजें भाई साहब चले गए हैं पता नहीं क्या हुआ जाने से पहले उन्होंने अलविदा भी नहीं कहा ठीक है नीरज जी इससे बहुत रोचक बातें हुई आप लोगों को समझ में आई होंगी काफी सारी चीजें और मेरा गला थक गया काफी देर से बात कर रहे हैं सभी को जय श्री राम
01:09:54:00 अच्छा रुकते हैं दो मिनट तो आप लोगों ने सर्वशक्तिमान धर्म पर हमारा जो मेन चैनल है उस पर देखा होगा आपने निर्भय के साथ हमारी काफी लंबी चर्चा हुई। बहुत इनफेटिव चर्चा है और उस पर प्रकाश डालते हुए हमने एक लाइव और किया आज का वो आप देख लेंगे बहुत अच्छे कांसेप्ट आपके काफी सारे क्लियर हो जाएंगे और
01:10:28:16 आज भी आपको काफी कुछ चीजें समझ में आई होंगी। देखिए ऐसा है कि कम ज्यादा कार्य तभी हो पाएगा जब कम ज्यादा हो शक्ति और शक्ति कम ज्यादा है मतलब ईश्वर कम ज्यादा है। इसका मतलब ईश्वर ने ऐसा रूप लिया है कि चाहे जहां वो कम ज्यादा हो सके। इसका मतलब ईश्वर ने ऐसा रूप लिया है कि वो अपने आप को परिवर्तित कर सके। तो जो उसका नित्य वाला रूप है ना जो प्राप्तव्य का विषय है उसके बाद भी दूसरी स्टेज है जो सगुण निराकार है जिसके बिना सृष्टि रचना नहीं हो सकती तो सगुण निराकार भी एक अवतार ही है सनातन शंकर जी ने एक वीडियो बनाया उसमें गुरुदेव का एक ग्रंथ दिखाया है आपको वो मैं भी दिखा रहा हूं
01:11:17:22 ये ग्रंथ है अवतार मीमांसा ठीक ठीक है? और ये ग्रंथ है अवतार रहस्य इनको आप पढ़ेंगे ना तो सगुण निराकार भी एक अवतार ही है जो मैंने कहा ना कि कहीं पे वो कोर्स का विषय बन रहा है कहीं पे नहीं। कहीं पर वो इतना ठोस बन रहा है जिसके विरुद्ध वो कण पृथ्वी इत्यादि नहीं जा सके। वो इतना ठोस बन रहा है। विरुद्ध नहीं जा सकता। तो ऐसा ठोस भी बन सकता है ना जहां पर वो प्रकाश उसके विरुद्ध ना जा सके। बस वहीं पर आंखों का विषय बन जाता है। फिर जो उसकी विद्या शक्ति है अविद्या शक्ति से संसार बनता है। मगर अविद्या के साथ साथ विद्या भी तो है। जो विद्या है उसको भी माया का एक विशुद्ध स्वरूप कहेंगे। जो यह जानती है कि बाकी का प्रपंच माया है। जो विद्या है भगवान के शरीर के जो अवयव हमें दिखते हैं तो वो उस पराशक्ति से बना होता है। जो भगवान की विशुद्ध शक्ति है उससे बना होता है। इसलिए वो मोक्ष कारक है क्योंकि भगवान क्या ज्ञान स्वरूप भी है तो विद्या शक्ति जिससे हमें मोक्ष मिलेगा जिससे हमें ज्ञान होगा।
01:12:34:00 और नास्तिकों को बुलाए बुला के लाइए ये जो सनातन सिद्धांत है उनसे टकराएं। हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि जो वो है ना समाल मददवी क्या नाम है? मुफ्ती है वो हमारे चैनल पर आए और हम उनसे एक विस्तृत चर्चा करें। ठीक है? तो ठीक है सभी को जय श्री राम जय श्री राम सभी को
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क्या आर्य समाज का ईश्वर सर्वशक्तिमान है
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