⬜ Not used yet · 00:00:03:08 – 00:18:15:10 (18:12)
00:00:03:08 [संगीत] ठीक है। अब आते हैं अवतार वाले विषय पर। तो अवतार वाले विषय में जैसा कि मैंने आपको बता ही दिया है कि हम जैसे मैंने बताया कि अवतार फिट नहीं होता इसीलिए। ठीक है? अब अवतारवाद की चर्चा हम शुरू करते हैं सबसे पहले। तो एक तो अब ये करना है कि मैं अवतार मान नहीं रहा हूं। क्योंकि मैं जो ईश्वर की व्याख्या मान रहा हूं उसके अकॉर्डिंग फिट नहीं हो रहा। आप अवतार मानते हो। आपके अकॉर्डिंग वहां पे फिट हो रहा है। अगर मैं सही समझ पा रहा हूं तो। मुझे लग रहा है कि स्वरूप में कोई विशेष मतभेद नहीं है। आप क्योंकि व्यवहारिक वाले को आप स्वीकार कर व्यवहारिक वाले को मैं मैं मान ही रहा हूं। उसमें कोई इशू नहीं है। आप उसी व्यवहारिक के द्वारा अवतार लेना सिद्ध कर रहे हो। मैं उसी व्यवहारिक के द्वारा पूछ रहा हूं कि कैसे सिद्ध हो रहा है। मुझे करवा दो मैं मान लूंगा। मेरा इतना ही आग्रह है। ठीक है? अब उसमें पॉइंट ये है कि अब सिद्ध करना है आपको। अच्छा सिद्ध करने से पहले जो अवतार सिद्धि का पॉइंट आता है वो करने से पहले मुझे थोड़ा अवतारवाद की धारणा स्पष्ट कर दीजिए। कि अवतार से मैं समझूं क्या? जिसे आप सिद्ध करना चाहते हैं। मुझे पता हो कि वो धारणा है क्या? वैष्णव भी है उसी में बहुत सारे मत मतांतर हैं। सबके अपने-अपने परम शक्ति जिस प्रकार एक परम शक्ति जो है जीव जगत और जगदीश्वर बन के प्रकट होती है सृष्टि का निर्माण करती है व्यवहारिक जगत का निर्माण होता है जिस प्रकार तो वही शक्ति अपने जो अचिंत शक्ति है उसकी उसके द्वारा अपने आप को मनुष्य की आंखों
00:01:18:09 का विषय बनाती है यही उसका अवतार होता है उस शक्ति का कैसे कर दिया कि मतलब कैसे फॉर एग्जांपल जैसे कि अ जैसे कि आपने आजकल एप्लीकेशनेशंस वगैरह देखी होंगी। क्या कहते हैं ये कंप्यूटर इत्यादि में आती है जो एक्सिस बैंक की होती है या या फिर ये रेलवे इंक्वायरी की भी होती है। हेलो आई एम ईला करके आती है। है ना? तो ये एप्लीकेशन क्या है? ये पूरे जगत में फैली हुई है इंटरनेट के द्वारा। उसमें जो इंफॉर्मेशन दे रही है ना आपको वो जो जो एक कार्टून कररेक्टर आता है और आपसे बात करता है वो कररेक्टर तो वो कहने का तो ये है कि वो केवल कंप्यूटर की किसी एक जगह पे दिखाई दे रहा है। है ना? मगर वो मगर उसमें वो सारी क्वालिटीज हैं। वो सारी क्वालिटीज है जो पूरे जगत में है। मतलब आप उसको कहोगे कि जो इस समय जो इंफॉर्मेशन अमेरिका में हो तो वो वहां पर दे देगी। मतलब जो भी वो रिलेटेड जो वो सिस्टम जो काम कर सकता है वो सारा काम वो लीला से कहोगे तो वो कर देगी। यही उस सिस्टम का अवतार है। यही कैसे होता है? थोड़ा सा इसको यही धारणा जो है ना ये कैसे होता है? इसको थोड़ा स्पष्ट कर दीजिए। दो तीन मैंने शब्द
00:02:33:13 सुने हुए हैं आपसे कि एक तो आप बोलते हो कि चीरा लगा देता है जैसे पर्दे में कुछ दिखता है एक वो बोलते हो। अच्छा एक बार आपने बोला था कि स्वयं का सृजन कर लेता है। एक बार आपने बोला था शरीर धारण कर लेता है। तो मुझे थोड़ा स्पष्ट कर दिया कि यह जो आप उसको रूप का विषय कह रहे हो तो वो रूप का विषय कैसे बन रहा है? क्या उसमें जैसे वो प्रकृति जैसे जैसे जैसे वो पृथ्वी सूर्य इत्यादि बनाते समय हम लोगों के व्यवहार का विषय बनता है ना वहां धक्का लगता है ना मिट्टी उठाई गई दिखाई नहीं देता लेकिन दिखाई नहीं देता मगर मगर जो स्पर्श इंद्रिय है इत्यादि का तो विषय बनता है ना वहां क्योंकि जैसे मिट्टी है मिट्टी के कण चारों ओर फैले हुए अब ये प्रकृति तो फैली हुई है हम अब प्रकृति खुद से खुद से होती है इकट्ठा यानी मिट्टी कण खुद से इकटठा होते हैं ईश्वर का धक्का ईश्वर है उसका अनिमित ईश्वर है तो ईश्वर का धक्का लगा ना हम ठीक है तो ईश्वर का धक्का लगा तो जैसे ईश्वर धक्के का विषय बन रहा है ऐसे ही ऐसे ही ईश्वर नेत्रों का विषय बनता है कैसे बनता है तो कैसे धक्के का विषय कैसे बनता है अपने बल से बनता है अपने बल से बनता है
00:03:49:01 हम तो आंखों का विषय कैसे बनता है अपने बल से आपने कहा ना बल से तो बल से तो यह वस्तु यहां से यहां जाएगी ना आंखों का विषय कैसे बन रहा है जैसे वहां पर एक अचिंत शक्ति काम कर रही है कि वो जो है धक्के का विषय नहीं था धक्के का विषय बन रहा है एक अचिंत शक्ति को आपने माना ठीक है तो वैसे ही मैं बता रहा हूं कि यहां पे भी अचिंत शक्ति को मान लीजिए अब पॉइंट इसके अंदर ये आता है कि अभी खाली हम हेतु पे बात ही नहीं कर रहे अभी हम जा रहे हैं इसके ऊपर किसके धारणा के ऊपर ठीक है अवतारवाद की धारणा क्या है अब धारणा में हमें यह समझना है कि कोई वस्तु मेरे आंखों का विषय बन रही है। अगर कोई वस्तु मेरे आंखों का विषय बन रही है अर्थात उसके अंदर रूप गुण है। रूप गुण है तभी तो आंखों का विषय बन रही है। अच्छा रूप गुण जो हमें पता है वो तो रूप गुण जिसमें है वो तो प्रकृति में है। जैसे सारा ब्रह्मांड। ठीक है? प्रकृति से बना हुआ है। इसके अंदर रूप गुण है। हम इसे आंखों से देख भी पाते हैं। ठीक है? तो पॉइंट ये है कि अब मुझे थोड़ा सा ये समझा दिया क्योंकि अभी मैं धारणा पे ही हूं। अभी मैं समझ रहा हूं कि अवतारवाद है क्या। ठीक है? यह जो रूप गुण है, यह ईश्वर के अंदर आप मान रहे हो। निराकार सगुण ईश्वर के अंदर रूप गुण मान रहे हो। या फिर आप यह कह रहे हो कि ईश्वर क्या करता है? स्वयं की रचना कर लेता है। स्वयं का सृजन कर लेता है। या फिर आप ये कह रहे हो कि ईश्वर ये जिस प्रकृति
00:05:04:12 में रूप गुण है उसी प्रकृति से अपने लिए एक शरीर निर्मित करता है। आप ये कह रहे हो। क्या कह रहे हो? थोड़ा सा इसको स्पष्ट कर दो आप। जो परम तत्व है वह ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है प्रकृति के अंदर एक जगह पर जहां पर आप जो है प्रकृति की जो बाकी चीजें दिख रही है वो ना दिख के जहां प्रकृति ना दिखे जहां जो एक तरीके से जो सत्य का वो परम तत्व है मतलब एक तरीके से वो ऐसा प्रभाव उत्पन्न करे जिससे कि आपकी आंखें जो उसके आरपार देख सकती है प्रकृति को वो आरपार ना देख के एक तत्व आपको बीच में टकरा जाए वहीं से आपको जो है उसके दर्शन प्राप्त हो जाए। तो अगर आप यह कह रहे हो कि प्रकृति जो सामने है ठीक है? जैसे मेरे सामने वायु है नहीं दिख रहा। मान लो मेरे सामने ऑक्सीजन है नहीं दिख रहा। मैंने इसको कंडेंस कर दिया लिक्विड में आ गया वो। कंडेंस लिक्विड ऑक्सीजन होता है। वो मेरे को दिख रहा है। क्या आप ये कह रहे हो कि ईश्वर भी इसी प्रकार से ऐसे सामने होता है। बिखरा होता है और वो अपने आप को संयोग कर लेता है। कंडेंस कर लेता है। फिर आंखों का विषय क्या आप ये कह रहे हो? मैं यह कह रहा हूं कि जो परम सत्य है वह अविद्या के कारण माया के कारण छिपा हुआ है। अविद्या माया प्रकृति हां तो ईश्वर एक ईश्वर एक जगह ऐसा
00:06:19:27 प्रभाव उत्पन्न करता है जहां पे आपकी आंखें प्रकृति को ना प्रकृति आपकी आंखों के सामने से हट जाती है स्ट्रक्चर में वो ईश्वर का अवतार होता है। यानी आप यही कह रहे हो। देखो इस चीज को समझो क्योंकि मैं इस चीज को समझना चाहता हूं रियल में। है ना? यानी मेरे सामने कह रहे हो कि मान लो धूल मिट्टी उड़ रही है और धूल मिट्टी में से एक बीच में एक कोई गैप ऐसा कुछ बन गया। मान लो बुध के आकार का कुछ बन गया। तो ये जो बुध के आकार का बन रहा है उसमें भले ही मेरे को आउटलाइन दिख रही है। आंखें नाक वहां कुछ नहीं दिख रहा। आउटलाइन दिख रही है। तो ये जो बीच में हल्का सा हवा की वजह से किसी गैप है यही अवतार है। भले उसमें कुछ दिखे ना वो। यही यही अवतार है परंतु वो इस पर ऐसी कवरिंग करते हैं कि आपको जो है उसके प्रति वो पूरा वैसा ही मनुष्य रूप वाला चीजें दिखाई दे कवरिंग किस चीज की होती है वो अपनी माया शक्ति अचिंत शक्ति नहीं माया का मतलब तो प्रकृति होता है ना पूरी शंकराचार्य का तो वीडियो है इसके ऊपर पूरी शंकराचार्य ने बोला हुआ है ना इसके ऊपर कि माया का मतलब प्रकृति होता है प्रगति वही जिससे संसार बना हुआ है ये ब्रह्मांड बना हुआ है अचंत माया का मतलब अचंत शक्ति भी है ये भी पूरी शंकराचार्य ने बोला है वो है लेकिन लेकिन जब हम उससे किसी वस्तु का बनना बताते हैं कार्य रूप क्या है? मैं बताऊं आपको बात क्या है? मैं सरल शब्दों में आपको बताऊं कि कोई व्यक्ति अभी देख रहा है कि मेरे सामने आसमान है। ठीक है? अब भगवान ने क्या किया? ईश्वर ने क्या किया?
00:07:35:13 यहां पे एक क्या कहते हैं? कैरेक्टर बनाया जो हमारी आंखों का विषय है। उसके पार हम नहीं देख सकते। उस आसमान को नहीं देख सकते। वो हमारी आंखों के रास्ते में आ रहा है ऑन द वे। ठीक है? वो उसने अपनी अचिंत शक्ति से बनाया। जैसे उसने पूरा संसार अत्यंत शक्ति से बनाया ऐसे उसने वो कररेक्टर बनाया। अब उस कैरेक्टर के माध्यम से वो कररेक्टर वो कररेक्टर जो है जैसे क्या कहते हैं ये जो श्रवण इंद्री होती है उसका अभिवंजक होता है ना कान का ये चमड़ा तो ऐसे ही वो जो कररेक्टर होता है वो इस सर्वशक्तिमान जो व्यापक ईश्वर है उसका अभिवंजक संस्थान होता है। देखिए इसमें जो मैं नहीं समझ पा रहा हूं वो क्या है पॉइंट यही है कि जैसे ईश्वर है। ठीक है? आपने बोला अचिंत शक्ति से बनाया। यह जो अचिंत शक्ति है यह क्या है? ये संसार का निमित्त है। ठीक है? जो उपादान है वो क्या है? वो माया शक्ति है। ठीक है। उपादान माया शक्ति है और जो जिसे आप अचिंत शक्ति कह रहे हैं वो उसका निमित्त रूप होता है। ठीक है? अब इसके अंदर पॉइंट क्या आता है? पॉइंट ये आ रहा है कि जिसे मैं देख रहा हूं जो मेरी आंखों का विषय बन रहा है। ठीक है? लौकिक दृष्टांत अब जैसे समझिए
00:08:50:14 इस चीज को कि लौकिक दृष्टांत में मैं तो देखने की वस्तु किसे जानूंगा? देखने की वस्तु मैं उसे जानूंगा जैसे अगर मैं किसी इंसान को देखने की बात कर रहा हूं या मैं किसी जानवर को देखने की बात कर रहा हूं। अल्टीमेटली मैं उस जीव को देखने की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उसके शरीर को देखने की बात कर रहा हूं। है ना? मैं ये बोलता हूं कि भाई मैं मैंने शिवश जी को देखा। ठीक है? मैं अपनी फोटो देख रहा हूं। तो मैं अपनी फोटो में अपने जीव को थोड़ी देख रहा हूं। मैं तो आंख ना मुंह देख रहा हूं। अगले जन्म में मैं कोई और बनूंगा। मेरे आंख मुंह चेंज हो जाएंगे। है ना? मैं शरीर को देख रहा हूं। तो जो मैं ईश्वर को देख रहा हूं या अवतार मान लो अवतार मेरे सामने है। मैं उस अवतार को देख रहा हूं। तो जिस अवतार को मैं देख रहा हूं क्या ये ऐसा शरीर धारण करता है या क्या है? वो चीज मैं बता रहा हूं। देखिए ये जो शरीर है ये भौतिक शरीर है सारे सारे के सारे। ठीक है? वो जो शरीर है वो परम क्योंकि जहां जहां पूरे में आपको जो भौतिकता दिख रही ना जहां पे भौतिकता नहीं दिख रही वहां आपको क्या दिखेगा? जहां पर भौतिकता नहीं दिख रही वहां आपको क्या कुछ नहीं जहां भौतिकता नहीं दिख रही है वहां आपको क्या दिखेगा वहां परम तत्व दिखेगा नहीं क्यों दिखेगा परम तत्व में कुछ कुछ तब नहीं दिखेगा जब पूरे में ही भौतिकता ना दिखे मगर जब आसपास बगल में भौतिकता दिख रही होगी तब आपको क्या दिखेगा जैसे कि हम आकाश को अगर खुले में देखें तो आकाश का कोई स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा हमें परंतु जब हम बंद कमरे से देखेंगे खिड़की खोल के तो बंद जो
00:10:05:20 आकाश का एक स्ट्रक्चर दिखेगा चौकोर वो आकाश का अवतार नहीं दिखेगा दिखेगा ना मैं बताता हूं कैसे नहीं दिखेगा मैं बताता हूं दिखेगा बताइए आपने जो देखा आपने आकाश का आकार नहीं देखा क्यों क्योंकि आकाश में रूप गुण है ही नहीं इसको समझिएगा दार्शनिक चर्चा है थोड़ी बहुत दर्शन के टर्मिनोलॉजीस मैं यूज़ करूंगा आप कोशिश करना अगर आप पूरी शंकराचार्य के शिष्य हो आपको समस्या नहीं होगी इसमें अब बात आती है कि आकाश में रूप गुण है ही नहीं ठीक है चाहे मैं उसको टेलीिस्कोप से देखूं माइक्रोस्कोप से देखूं खिड़की से देखूं बंगले से देखूं कहीं से देखूं उसमें रूप गुण नहीं है वो नहीं दिखाई देगा एक बात ठीक है अब जो मुझे चौकोर दिख रहा है वो क्या दिख रहा है? वो खिड़की दिख रही है। खिड़की की आउटलाइन दिख रही है। उस खिड़की की आउटलाइन से जो मैं देख रहा हूं ना वो रियल में क्या है? वो मेरे को बादल दिख रहा है। वो मेरे को बाहर का स्ट्रक्चर दिख रहा है। है ना? वो जो मुझे है ना? वो स्पेस वो स्पेस दिख ही नहीं रहा। ये मत बोलिए कि स्पेस दिख रहा है। स्पेस दिखता ही नहीं है। स्पेस आंखों का विषय नहीं है। जो मुझे दिख रहा है वो क्या दिख रहा है? वो मुझे क्या दिख रहा है? वो जो लाइट टकरा रही है, रिफ्रेक्शन हो रहा है। वो रिफ्रेक्शन की वजह से मुझे कलर दिख रहा है। है ना? स्पेस नहीं दिख रहा। आकाश नहीं दिख रहा। क्योंकि उसमें गुण नहीं है। उसी प्रकार अगर ईश्वर में रूपण नहीं है, रूप गुण प्रकृति में है। ठीक है? तो इतना ही स्ट्रक्चर बना लो ईश्वर तो फिर भी नहीं दिखेगा ना। दिखेगा क्या आपको? आपको आपको वो दिखेगा जो आउटलाइन जो आपने प्रकृति से बनाई है। तो वो जो वो जो है ना वो जो
00:11:20:26 वो आप तत्व से उसे जो भी माने मगर जहां पे प्रकृति है चारों ओर और उसमें बीच में एक स्ट्रक्चर से जो हमें दिखाई दे रहा है मनुष्य जैसा वही ईश्वर का अवतार है। उसको आप उसको क्या है? व्यवहार अब जैसे पृथ्वी भी वास्तव में तो गोल है मगर हमें चपटी भी दिख रही है और हमारा व्यवहार भी उसके साथ चपटे जैसा है तो ऐसे ही व्यवहारिक रूप से जो ये जो हमें आकाश दिख रहा है कि नहीं दिख रहा है वो तात्विक व्याख्या है कि वो रूप रंग पृथ्वी देता हूं आपको एक एक मिनट एक मिनट एक मिनट तो जो आप जो खाली स्पेस है ना वो जो जहां से नहीं दिख रहा है मगर बंद कमरे की खिड़की से जो हमें एक स्ट्रक्चर में वो व्यवहारिक जो क्या कहते हैं बाहर का आसमान दिख रहा है प्रतीत हो रहा वही ईश्वर का अवतार है। प्रतीत होना। ईश्वर प्रकट हो गया। ये जो अवतार दिख रहा है ना आप ये कह सकते हैं कि हां भाई वो क्या कहते हैं वो आकाश नहीं दिख रहा है क्योंकि आकाश तो है ही ऐसा। मगर जो आकाश को ना आकाश को देखने में उस बंद कमरे की वजह से जो बाधा आ रही है उसके कारण व्यवहारिक रूप से जो खिड़की के द्वारा हमें आकाश दिखाई दे रहा है। वही खिड़की आकाश वो हमें जो है वार्ता व्यवहार में कहना पड़ेगा ना। मैं अभी आपसे भी कहवा सकता हूं। कई चीजों में व्यवहार में आप भी कहते हैं। वही मैं कह रहा हूं ना व्यवहारिक सत्य को जो है आप पारमार्थिक सत्य
00:12:36:02 के आधार पर काटते हैं। आर्य समाज के अभी जैसे अगर आपको जैसे जैसे जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं जैसे मैं बताऊं मैं आपको उदाहरण दे रहा हूं ना उदाहरण दे रहा हूं। ये बताइए ईश्वर सर्वव्यापक है। हम ठीक है। अब ईश्वर सर्वव्यापक है तो इसका मतलब उसका ज्ञान भी सर्व्यापक है। हां जी। हां जी बिल्कुल। ठीक है। तो फिर वो किसी देश काल परिस्थिति में क्या उसके अंदर आया? ऋषि के अंदर ऋषियों के अंदर अंतकरण दयानंद जी ने तो लिखा कि आया आता है ज्ञान देता है ईश्वर। मगर वहां पर क्यों कहा कि भैया आता है ज्ञान होता है। ये क्यों कहा? जब ज्ञान था तो जब ज्ञान से कोई जगह रिक्त है ही नहीं। तो फिर ज्ञान का आना जाना होना ये किसी विशेषत्ल की स्थिति में तो मैं मैं यही तो कह रहा हूं कि मैं यही कह रहा हूं जब आया के आने आप फिर आप ही बोल रहे हो जब मैं बोल रहा हूं तो बोलने दो ना मैं मेरा प्रश्न ये है कि जब ज्ञान आया गया नहीं तो उसके लिए आने जाने वाले शब्दों का व्यवहारिक प्रयोग क्यों हो रहा है होता है पहली बात तो ग्रंथों में भी होता है ठीक है मैं बोल देता हूं पहली बात तो ज्ञान होने की बात है ज्ञान के आने
00:13:51:03 जाने की बात नहीं होती तो आना जाना कैंसिल कर दो अभी मैं पूछ रहा हूं होना जब वो पहले से ही है तो किसी विशेष देश काल परिस्थिति में वो हो क्यों रहा है वो तो है व्यक्ति ज्ञान ही होना चाहिए क्यों हो रहा है पॉइंट ये नहीं है पॉइंट ये नहीं है पॉइंट मैं समझा देता हूं क्या है पॉइंट [संगीत] ये है पॉइंट ये है इसके अंदर कि वो रूप का [संगीत] विषय कैसे बन रहा है बात चली ना अवतार की धारणा के ऊपर भाई पॉइंट आपने एक पॉइंट बताया पॉइंट ये कि वो क्या कहा आपने आंखों का विषय कैसे बन सकता है? है ना? [संगीत] ये कहा ना आपने? जबकि पॉइंट यह है कि क्या हम व्यवहार में वो तात्विक उसके द्वारा तात्विक परिभाषा के कारण क्या हमारे व्यवहारिक शब्द दूसरे आते हैं कि नहीं? व्यवहार में उसी को हम दूसरी चीजें बोलते हैं कि नहीं। जैसे कि मैंने फिर वहां पर उदाहरण दिया। जैसे कि ज्ञान पहले मैं इसको आगे बढ़ाओ। इसको आगे बढ़ाओ। आप रुको।
00:14:52:04 जो अवतार दिख रहा है ना आप ये कह सकते हैं कि हां भाई वो क्या कहते है आकाश नहीं दिख रहा है क्योंकि आकाश तो यही है ऐसा मगर जो आकाश को ना आकाश को देखने में उस बंद कमरे की वजह से जो बाधा आ रही है उसके कारण व्यवहारिक रूप से जो खिड़की के द्वारा हमें आकाश दिखाई दे रहा है वही खिड़की आकाश वो हमें जो है वार्ता व्यवहार में ये कहना पड़ेगा ना मैं अभी आपसे भी कहवा मैं इसको आगे बढ़ाओ इसको आगे बढ़ाओ आप रुको अभी आपसे भी कहवा मैं इसको आगे बढ़ाओ इसको आगे बढ़ाओ रुको अभी आपसे भी कहवाई बंद करो समझ गया मैं इसको आगे बढ़ाओ इसको आगे बढ़ाओ आप रुको पीछे खुल गया तो आप आप हेडलाइन बदल के उत्तर दे रहे हो ना [संगीत] पॉइंट यहां पे कहां अटक रहा है पॉइंट इस अटक रहा है अभी हमारी बात इस पे चल रही है कि अवतारवाद की धारणा क्या है फिर आप फिर आप चेंज कर रहे हो
00:15:34:26 उस धारणा उस विषय के अंतर्गत बात करतेकरते हम एक जगह आकर के अटके हैं मैं आगे हूं मेरे को सुन लो मैं आगे हूं मेरे को सुन लो मैं आगे हूं मेरे को सुन लो आगे हां चलिए चलिए बताइए सेकंड जो मैं समझ पा रहा हूं सेकंड ये आ जाता है कि ईश्वर क्या करता है शरीर धारण करता है ठीक है जैसे जीव शरीर धारण करता है एक वीडियो में आपने एक लाइव में बोला भी था एक लाइव में आपने मेरे से बोला भी था कि भाई अगर जीव शरीर धारण कर सकता है तो ईश्वर सर्वशक्तिमान होकर के शरीर धारण क्यों नहीं कर सकता एक लाइव में आपने ये बात बोला भी था जो आपके सर्वसक्तिमान वाले चैनल पे डाला हुआ है ना अच्छा और जो गीता से आप प्रमाण देते हो कि सजाम्यामी जो मैं अपने आप का सृजन करता हूं। ठीक है? तो उसमें पॉइंट कि अगर अपने आप पे सृजन करेगा तो उसमें फंस जाओगे। भाई जो जिसका सृजन जो सृजित अभी-अभी बना है यानी बनने से पूर्व नहीं था। तो जो सृजित शरीर हुआ निराकार रूप में था साकार रूप में सृजित हुआ है। नया नया खुद को बनाया है। तो फिर वो अनादि स्वरूप नहीं रहेगा तो अनादि नहीं रहा तो अनंत भी नहीं रहा। अनंत नहीं रहा तो फिर नित्य नहीं रहा तो नित्य स्वरूप नहीं। ईश्वर का स्वरूप नहीं है। ईश्वर क्यों बोल रहे हो? कुर्सी बोल दो उसे। कुर्सी बोलते हो ना अभी बनी है। नष्ट हो जाएगी कल परसों। तो उसमें उसमें नित्य वाला भी दे दूर। नित्य वाला उत्तर दे दू मैं मैं पूरा कर देता हूं। ईश्वर का आभास हो रहा है। ईश्वर का आभास हो रहा है। सीधे ईश्वर को ही नहीं देख रहे हैं। ये
00:16:50:02 कह सकते हैं। जैसे जैसे जीव वाले में हो रहा है। हां। जैसे जीव में हो रहा है। जैसे आसमान में हो रहा है। जैसे सब में हो रहा है। जैसे जीव निराकार है ना? जैसे जीव आप निराकार हो। जीव आप जीव हो। जीव निराकार है। ठीक है? तो मैं हां भाई आपका रूप नहीं है। मैं कैसे देखूंगा? मैं आपको देख रहा हूं यानी आपके शरीर को देख रहा हूं। उस जो अवतार की इस धारणा को जो मैंने समझा है। जैसे एग्जांपल कहते हैं रामकृष्ण अवतार है। तो मैंने रामकृष्ण में क्या देखा? भाई रामकृष्ण का शरीर देखा जैसे रामायण में रामायण में वर्ण सब लिखा हुआ है ना जीव और ईश्वर के रूप में केवल इतना अंतर है कि जीव जो है अविद्या से ढका हुआ शरीर है और जो ईश्वर है वो अविद्या से हटा मगर माया के संयोग के बिना कोई नहीं बना है माया के माया के संयोग के बिना वो नहीं बना है माया के संयोग से ही वो भी बना क्योंकि अगर अगल-बगल माया नहीं होगी तो हमें उसका स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा। समझ रहे हैं ना? यानी माया इक्व प्रकृति। प्रकृति नहीं होगी तो स्ट्रक्चर नहीं दिखेगा। जो दिख रही है वो माया है। है ना? यानी यानी अगर हम इसे सामान्य भाषा में बोले इसे ज्यादा कॉम्प्लेक्स ना बनाए। ठीक है? अल्टीमेटली कहने का अर्थ ये है कि जैसे जीव शरीर धारण करता है वैसे ईश्वर भी शरीर
00:18:05:03 धारण करता है। उसी को अवतार बोलते हैं। बस इतना है कि वो माया से बद्ध है। जीव और वो माया से मुक्त है। जो ईश्वर का अवतार है।
✅ This part is already used · 00:18:15:10 – 00:19:01:00 (0:46)
→ Used in: A · Video भगवान की माया शक्ति से परास्त हुआ अलंकारी | अवतार सिद्धि | the final cut at 0:02 ↗
00:18:15:10 जो ईश्वर का अवतार है वो माया से मुक्त है। जी। ठीक है। ये एक नोटिसबल। यानी अभी हमारे पास में ये बहुत ही चलिए। इतनी बातचीत होते इतनी क्लेरिटी स्पष्ट हो चुकी है अवतारवाद में। कि अवतारवाद की धारणा क्या धारणा ये है कि भैया जैसे जीव धारण कर रहा है तो वो कर्मों के बंधन से कर रहा है। ठीक है? और वो अविद्या ग्रस्त है। जीव अविद्या ग्रस्त है। जो ईश्वर है वो अविद्या गग्रस्त है। जीव जो है जीव अपने मन से नहीं कर रहा है। जीव जो है बद्ध है इसलिए हो रहा है उसका और उसका कंट्रोलर कोई और है और जो ईश्वर है वो स्वयं से कर रहा है। स्वयं से कर रहा है। ठीक। बहुत बढ़िया बात। तो यानी इतना स्पष्ट है कि वो भी शरीर धारण करता है। चलिए ठीक है। अब अवतारवाद की धारणा पे हम आ चुके हैं।
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00:19:01:00 [संगीत]
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कैसे एक अलंकारी अवतार के समक्ष हुआ नतमस्तक | अवतार सिद्धि भाग 1
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