⬜ Not used yet · 00:00:04:24 – 00:22:11:00 (22:06)
00:00:04:24 आपने हमारा एक फॉर्म भरा था। हां जी। तो आप चर्चा करना चाहते हैं ना? हां मैं डिबेट करना चाहता था। हम हां बट अभी आ सकते हैं आप? अभी देखिए मैं डिबेट कर लूंगा लेकिन जैसे कि मैं आपको बता दूं कि अपना थोड़ा बहुत आपके पास अभी थोड़ा 5 मिनट का टाइम है। हम हां तो जैसे कि मैं यह बताना चाहूंगा कि जैसे लाइक मैं ये नहीं रिवील करूंगा कि जैसे कि लाइक जैसे कि जैसे आप जितने आप क्वेश्चन पूछे पूछना चाह सकते हैं लेकिन पहले मैं यह बताऊंगा कि लाइक मेरी क्या आईडियोलॉजी है। हो सकता है कि पहले मैं हिंदूइज़्म को भी मानता हूं। ठीक है अभी भी मैं उसकी कुछ अच्छी चीजें ले लेता हूं। लेकिन अब मेरी आईडियोलॉजी ये है कि मैं देखिए पुनर्जन्म में थोड़ा बहुत मानता हूं और स्पिरिचुअलिटी में भी मानता हूं कि हां सुपर किस चीज से तकलीफ है वो बताइए अच्छा मैं जिस विरोधाभास है वो बता ठीक है तो मैं ये बता देता हूं मैं इस तरीके को इस चीज को पूरी तरह मानता हूं कि वेद जो है वो ह्यूमन मेड है जैसे कहा जाता है कि मंत्र दृष्टा ऋषि है जहां की निरुक्त में भी आता है और जहां आता है ये ये आपके तकलीफ का विषय नहीं है ना आपको तकलीफ इससे होनी चाहिए कि हम ये बात गलत बोल रहे हैं वो वो लिखी किसने किसने नहीं ये तकलीफ
00:01:19:25 का विषय थोड़ी ना है। हां तो आप आप भी तो यही बोल रहे हैं कि वेद जो है वो प्रकृति के और ईश्वर स्वरूप है वो मैनमेड नहीं है। मैं ये कह रहा हूं कि वो मैनमेड ही है क्योंकि कोई भी मंत्र दृष्टा ऋषि आज के टाइम पर उपलब्ध भी नहीं है परंपरा से। देखिए जैसे कि मैंने कहा कि मैं फलाने का पुत्र हूं। जैसे आपने कहा फलाने के पुत्र हूं। ठीक है? हम्म तो उस विषय में प्रमाण क्या हो सकता है? जी प्रमाण तो मतलब पुत्र की तो अलग बात हो गई ना यह तो हम वेदों पर तो बहुत लंबी लीनियर नहीं अलग बात नहीं हुई इन विषयों में तो शब्द ही प्रमाण हो सकता है ना अब आपको शब्द पे यदि भरोसा नहीं है तो वो आपका विषय है एक अलग शब्द प्रमाण पे चीजें होती है ना कई सारी कि भाई किसी ने कहा है इसलिए हम मानते हैं तो वेद वेद जो है अपौरुष है या प्रकृति ने बनाए हैं या मैनमेड है ये शब्द प्रमाण की बात है आपको सनातन धर्म की किस किस शिक्षा से दिक्कत है? भगवान को लेकर के की गई व्याख्या से दिक्कत है। धर्म को लेकर के की गई व्याख्या से दिक्कत है। यह इस पे आप बात करिए ना। समझ रहे मेरी बात? क्योंकि शब्द प्रमाण जो है अगर आपको हमारे बताए हुए शब्द प्रमाण पे यकीन नहीं है तो आपकी प्रॉब्लम है। और आपके बताए हुए शब्द प्रमाण पे यदि हमें यकीन नहीं है
00:02:34:26 तो हमारी प्रॉब्लम है। जिस विषय में शब्द ही प्रमाण हो सकता है उस विषय में दूसरा प्रमाण कैसे लाएंगे? जैसे कि मान लीजिए कि मैं बताऊं कि भैया इस गुब्बारे का कलर क्या है? ठीक। तो अब कलर क्या है? इस विषय में तो आंख ही प्रमाण हो सकती है ना कि कान से करेंगे। देखिए एक एक इस पर मैं सवाल कर सकता हूं कि आप ये कह रहे हैं कि सिर्फ इसमें शब्द प्रमाण हो सकता है क्योंकि ये परंपरा से प्राप्त आ रहा है। तो ठीक है। हम उतना पहले जा करके प्रूफ नहीं ला सकते। तो शब्द प्रमाण से हम उसको मान्यता विश्वास पर मान सकते हैं। चलिए बिल्कुल सही बात है। लेकिन जब ये कहा गया है कि जो मंत्र दृष्टा ऋषि जो वेद के थे वो ह्यूमंस ही थे और उन्होंने सिर्फ अपने तप से या फिर है ना अध्यात्म से एक्सेस किया था डायरेक्ट तो आज भी कोई इंसान ऐसा क्यों नहीं कर सकता कि डायरेक्ट वही वेद संस्कृत में एक्सेस कर रहे हो और ठीक है मैं इस मैं इस पे जो है आपसे वहां डिबेट कर लेते हैं। ठीक है? जी और आपकी बात है। इस पर हम कर लेते हैं डिबेट। जी और मेरा थोड़ा बुद्धिज्म की तरफ थोड़ा मेरा ज्यादा वो मैं आपसे पूछ लूंगा। आपकी चीजों को मैं टटोल लूंगा वन लाइव स्ट्रीम में ही। ठीक है जी। और मतलब आप बुक्स कौन-कौन से मानते हैं तो मैं क्योंकि मैं थोड़ा बहुत प्रमाण भी इकट्ठे करूंगा। थोड़ा फाइव मिनट्स दे दीजिए। क्या आप रामचरितमानस
00:03:50:19 में और पुराण में वेदांत में लाइक उपनिषद वगैरह में आप बुद्ध को मानते हैं ना? जी वैसे मैं भी कहूं तो पहले हिंदू ही हूं। हिंदू ही था लेकिन मैंने फिर छोड़ दिया था और उसके बाद मैं थोड़ा नास्तिक बना कुछ सालों के लिए और उसके बाद फिर वापस मैंने जब सारे धर्मों का अध्ययन किया उसके बाद थोड़ा बुद्धिज्म की तरफ आया। पहले थोड़ा बहुत अब्राहमिक रिलिजन की तरफ भी मेरा झुकाव हुआ था। फिर मैं बुद्धिज्म की तरफ ज्यादा आया। वह तो बुद्धिज्म भी तो नास्तिक ही है। नहीं बुद्धिज्म नास्तिक नहीं है। बुद्धिज्म में भी पुनर्जन्म है। उसमें भी स्पिरिचुअलिटी है और उसमें भी इटरनली एक्सिस्टिंग कॉन्शसनेस है जिसको कि वो गॉड नहीं कहते। इसलिए बुद्ध मौन हो गए थे। उसी में मिल जाता है। निर्वाण में जाकर के हम जहां से आए हैं। अज्ञान अविद्या स्वरूप अह हमारी अविद्या और अज्ञान से जब हम इंडिविजुअल एक्सपीरियंस करना चाहते हैं, तो हम प्रकृति में शरीर ले से कनेक्ट होते हैं और बार-बार अह अपनी इच्छाएं, डिजायर्स। ठीक है? और कर्म फल की वजह से कर्म फल का सिद्धांत भी है। जब जब बुद्धिज्म में कर्म फल का सिद्धांत है, पुनर्जन्म का सिद्धांत है तो वो नास्तिक कैसे? उसमें भी तो स्पिरिचुअलिटी आ गई ना। नास्तिक ऐसे है कि कोई एक सत्ता नहीं है जो सनातन हो। बिल्कुल है बुद्धिज्म में। मैं आपको बता देता हूं बुद्धिज्म में प्रकृति भी सनातन है। क्योंकि जो संसार है वो कल्प-कल्प से बार-बार बार-बार बनता है और बिगड़ता है। प्रकृति का जो आधिपत्य हो ईश्वर
00:05:06:04 ईश्वर का कांसेप्ट है क्या वहां? ईश्वर नहीं बोला था। बुद्धिस्ट मौन रह गए थे क्योंकि बुद्ध उस पर कंफ्यूज नहीं करना चाहते थे। तो ईश्वर नहीं है ना ईश्वर को नहीं मानते ना आप उसी को नास्तिक कहा जा रहा है ना? नहीं ईश्वर सनातन सर्वशक्तिमान सत्ता जो सब कुछ कर सकती हो वो आपके यहां नहीं है ना? जी सर्वशक्तिमान सत्ता है ना। बुद्ध जिससे हा देखिए इटरनल एक्जिस्टिंग कॉन्शियसनेस ये मैं कह रहा हूं। तो हम हमारी जो चित्त है धम पद में जो चित्त की बात हुई है उसमें यही कहा है कि आपका जो सत्त है वो जो चित्त है वो उसी का उसी का ऐसे मैं उसका किताब का शायद स्क्रीनशॉट भेजूंगा उसी का पार्ट है तो जब हम उसी का पार्ट है और जैसे कि सागर में लहरें उड़ती है और वो उसको इंडिविजुअल मान ले तो वो प्रकृति से प्रकृति और पुरुष प्रकृति से वो में आ जाती है। मतलब शरीर हम धारण कर लेते हैं और बार-बार बार-बार जब जैसे बुद्ध को एनलाइटनमेंट हो गया। उस उनको अपनी जातक कथाओं में देखेंगे। मैं ये कह रहा हूं जब बुद्ध को एनलाइटनमेंट हुआ था उस समय कोई फ्री थी कि नहीं कॉन्शियसनेस जी उनकी कॉन्शियसनेस भी है और फ्री विल भी है तो जब उनको एनलाइट एनलाइटनमेंट जो आप कह रहे हैं ना वो साक्षात्कार हुआ था हां बोध हो गया उससे
00:06:21:15 पहले जब नहीं हुआ था उस समय कोई कॉन्शियसनेस थी जो एनलाइटेंड थी मतलब बुद्ध जिस समय अज्ञानता ता को प्राप्त हो चुके हैं। उस समय ज्ञान ज्ञान को प्राप्त कौन सी कॉन्शियसनेस थी? देखिए जो हमारी कॉन्शियसनेस मतलब चित्त को कह रहा हूं मैं। मैं भी चित्त की बात कर रहा हूं। उस समय कौन सी कॉन्शियसनेस फ्री थी? जो जानती थी कि मैं जो है मुक्त हूं। निर्वाण में कौन सी कॉन्शसनेस थी उस समय? जी निर्वाण तो बुद्ध के महाप्रवाण मरने के बाद होगा ना? निर्माण मरने यानी कि वो शाश्वत सत्ता नहीं है। वो बाधित हो रही है ना समय देश काल से वो प्राप्त हो रही है। वो पहले से नहीं है। वो प्राप्त हो रही है मरने के बाद या इतने के बाद या उतने के बाद उस समय उसका अस्तित्व नहीं है। जब बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ तब अस्तित्व में आया। जी आप त्रिपिटक से आप मैं आपको इसका स्क्रीनशॉट भेजूंगा। नहीं आप मेरी बात समझ नहीं रहे। जिस समय बुद्ध स्वयं को अज्ञानी मान रहे हैं, हम बाधित हैं, उस समय फ्री कौन है? बस यह
00:07:36:19 बताइए क्योंकि सनातन सर्वशक्तिमान ईश्वर सत्ता उसको माना जाएगा जो सदा एक रस के रूप में स्थापित हो। यह थोड़ी ना कि आज आज बाधित है और कल जो है मुक्त हुआ। वो थोड़ी ना सनातन है। वो तो नियमों के अधीन हो गया ना कि जब उसने तप किया तब वह साक्षात्कार हुआ। जी कहीं आप यह आप अगर मान रहे हैं कि बुद्ध ही वह सर्वशक्तिमान सत्ता है तो मैं यह नहीं कह रहा। मैं कहां कह रहा हूं? मैं नहीं कह रहा। आप फिर मुझे बताइए कि कौन सी वो सत्ता है जो उस समय फ्री थी? फ्री फ्री का मतलब क्या है? मतलब जो कि कुछ भी कर सकती है। फ्री का मतलब जो मुक्त थी जिस जो अज्ञानता को प्राप्त नहीं थी वो कौन थी? जी अज्ञानता को तो बुद्धिज्म में यही कहा गया है ना कि आप क्या है जब इस संसार में आते हैं तो आप एक तरीके से हिप्नोटाइज हो जाते हैं और आपके जो अज्ञानता आ जाती है यानी कि आप प्राकृतिक नियमों के अधीन हो गए ना फिर तो कोई है ही नहीं जो उससे मुक्त है नहीं आप जब निर्वाण की तरफ जाते हैं तो आप संसार से अपने आप डिस्कनेक्ट तो ये बाधित हो रहा है ना कि जब आप जब आप यहां आ रहे हैं तो आप बाधित हो रहे हैं वहां जा रहे है तो मुक्त हो रहे है हां यहां आ रहे है तो हम बाधित हो जाते है बाधित हो रहे हो ना नियमों के अधीन हो रहे हो ना कि ऐसा होगा तब हम जो है मुक्त है। ऐसा होगा तब मुक्त नहीं। सदा सदा से
00:08:51:20 मुक्त का अस्तित्व नहीं है। नहीं तो फिर सनातन और उसमें दार्शनिक स्तर पर अंतर क्या रह जाएगा? अगर सदा से मुक्त वाला कांसेप्ट बुद्ध ने मान लिया होता कि हां एक चेतना है जो सदा से मुक्त रहती है। उसको वो जो भी नाम देते तो सनातन और उसमें अंतर क्या रह जाता। जी जो चेतना जो सुपर नेचुरल है इस वर्ल्ड से कंप्लीटली परे हैं वह हमेशा से ही मुक्त है वह पूरा का पूरा सागर तो यहां नहीं आ जाता उसके अंदर जो उनके जो पार्ट्स हैं जो हम सत्व हैं जो हमारे चित्त है जो कि अभी मान लो आठ 800 करोड़ लोग यहां पर यानी कि यानी कि बुद्ध जब बाधित थे उस समय भी एक जो चेतना को मुक्त माना गया था। हां मतलब वो एक ही ईश्वर को हम इंसान नहीं मान सकते कि क्या है। हम उसी के पार्ट हैं। नहीं नहीं मैं ठीक है हम पार्ट हैं उसी के तो जिस समय जब बुद्ध के रूप में वो चेतना बाधित थी उस समय वो चेतना के रूप में मुक्त भी थी। हां मतलब वो मतलब देखिए है वहीं पर संसार में है लेकिन संसार में आने के बाद क्योंकि संसारी बंधनों में माया में अविद्या से डिजायर्स से और आसक्तियों से और कर्मफल के सिद्धांत से जब हम पुनर्जन्म बार-बार लेते
00:10:06:21 हैं तो हमारे जो पास्ट लाइफ है, पहली बात तो वो सारी की सारी मेमोरीज देखिए मैं क्या कह रहा हूं? जैसे कि हमारा एक मन मान लीजिए। ठीक है? हां जी। मन है। अब हम मान लीजिए कि मैं अह एक कील ठोक रहा हूं। ठीक? लगातार कील ठोक रहा हूं। तो कील ठोकते समय मेरा जो मन है, पूरी दुनिया में घूम भी रहा है। घूम रहा है ना? हां जी। और कील ठोकने के रूप में बाधित भी है कि मुझे बार-बार कील ठोकनी है। तो क्या आपके बुद्धिज्म ने यह माना है कि जिस समय बुद्ध के रूप में वो चेतना जो है, बाधित थी, उस समय वही चेतना फ्री भी थी। जी चेतना बाधित भी थी फ्री तब होगी जब उसको बोध हो जाएगा तो फिर उसकी शाश्वतता भंग हो रही है ना सनातन सुख नहीं है ना फिर जी अभी तो बुद्ध ने कहा कि संसार में दुख है पहला आर्य सत्य क्या था अरे भाई मैं क्या कह रहा हूं बात ये हो रही है कि आपने सनातन सर्वशक्तिमान सत्ता मानी है कोई कि नहीं मानी है बात ये है तो आपकी [नाक से की जाने वाली आवाज़] चीजें तो प्रकृति के अधीन हो रही है ना कि जब जब हम ऐसा किए तो मुक्त हो गए फिर नहीं किए तो वो हो गए और अभी आप ही ने थोड़ी देर पहले कहा कि भाई जो जब सारा का सारा सागर नहीं आ जाता है बल्कि उसका अंश आता है तो जो सागर है वो अभी बचा
00:11:21:27 हुआ है ना तो वो आप कह रहे नहीं है देखिए यहां पर ड्यूलिटी को एक तरीके से बुद्धिज्म में माना जाता है कि यह प्रकृति जो है यह भी इटरनल है और वो जो सुपर नेचुरल एंटिटी है जो कि कॉन्शियस जिसमें कॉन्शियसनेस है उसका टाइम फ्लो जो है वह प्योर कॉन्शियसनेस है इस प्रकृति का जो टाइम होता है वह सिर्फ और सिर्फ पदार्थ के सिर्फ बदल बदलने की वजह से हम उसको एक टाइम की एंटिटी दे देते हैं। यह भी हमेशा से है। मेरे भाई आप मेरा प्रश्न नहीं समझ पा रहे हैं। जिस समझ रहा हूं जिस समय बुद्ध के रूप में या आपके रूप में वो एक कोई कॉन्शियसनेस है सुप्रीम कॉन्शियसनेस वो बाधित है आपके रूप में। इस समय भी वह सुप्रीम कॉन्शियसनेस अपने अस्तित्व में है या नहीं है? है और उसी जगह पर है। उसी जगह पर है। उसी जगह पे सेम जगह पे यानी कि जब आप यहां पर फंसे हुए हो एक रूप में तो आप ही एक रूप में मुक्त भी हो। देखिए ये वैसा ही है जैसे एक बच्चा कंप्यूटर पे गेम खेलने लग जाए और उसमें खो जाए। अभी उसकी मम्मी आके उसका कंप्यूटर बंद कर जाए। वापस संसार खो जाए वाली बात अलग है। और वो यह जान रहा है कि मैं गेम ही खेल रहा हूं। फिर भी वह अंदर की चीजों से प्रभावित भी हो रहा है और मैं वह यह जान रहा है की मैं गेम खेल रहा हूं। यह बात अलग है। पूरा का पूरा खो
00:12:36:28 ही गया। अपने अस्तित्व को भूल ही गया यह बात एक अलग है। हां पूरा खो जाता है वह साम्राज्य की वजह से यही तो यही अंतर है अद्वैत में और बुद्धिज्म में है। आप हम ये मान रहे हैं। हम यह मान रहे हैं कि फिल्म से कितना भी हम प्रभावित हो रहे हैं मगर हमारी एक चेतना का भाग ऐसा है जो उस समय भी यह जानता है कि ये कल्पना है। जी नहीं। बहुत सारे बहुत सारे मैं आपको लोग ऐसे मिलवा दूंगा जिनको कुछ भी अकल नहीं है। प्रज्ञा शक्ति डाउन है ना भाई वो एक अलग विषय है। मैं अलग बात कर रहा हूं। आप पता नहीं कहां जा रहे हो। मैं आपसे यह पूछ रहा हूं कि जिस समय आप बाधित हैं उस समय भी फ्री भी होती है सत्ता या नहीं होती है। अगर बाधित है तो वो सत्ता पूरी की पूरी बाधित है कि नहीं है? नहीं समझ रहे। जी मैं समझ गया हूं। आप अगर देखो अगर आपने यह मान लिया कि जिस समय बुद्ध के रूप में जो सत्ता है कॉन्शियसनेस है वो बाधित है उसी समय वही कॉन्शियसनेस फ्री भी है पूर्ण तरीके से तो अद्वैत हो गया फिर बुद्धिज्म खत्म हो गया अगर आपने ये मान लिया और जब आप यह मान लेंगे कि फ्री भी है तो वहां पे ईश्वर स्थापित हो जाएगा वो जो फ्री सत्ता है वही ईश्वर है जो सब कुछ जानती है कि मैं फ्री हूं और क्योंकि
00:13:52:07 वो फ्री है तो प्रकृति पर आध वो आधिपत्य है उसका वो कुछ भी कर सकने के लिए वो हो गई सर्वशक्तिमान हो गई क्योंकि वो फ्री है वो जानती है माया है तो माया में मैं कुछ भी कर सकता हूं तो वो फिर ईश्वर के रूप में स्थापित हो गई वो सत्ता समझ रहे हैं आप मेरी बात तो या तो पहले अंतर सेट कर लो कि हां इतना अंतर है हमारे और अद्वैत के बीच में और अगर अंतर नहीं है तो फिर अद्वैत से अलग करके बताओ कैसे होगा जी एक तो अंतर ये यहां पर अलग आ जाता है कि आपके अद्वैत में ये आप मानते हैं कि जो प्रकृति है आप इसको इटरनल मानते हैं या नहीं मानते हैं? बिल्कुल मानते हैं। अच्छा तो प्रकृति में आप बार-बार कल्प मानते हैं कि एक बार पूरा डिस्ट्रॉय हो जाता है फिर उसका रिकक्रिएशन होता है। कल्प हां रिकक्रिएशन एंड डिस्ट्रक्शन रिकक्रिएशन डिस्ट्रक्शन इनफिनिट साइकिल ये आप मानते हैं? मानते हैं? ये भी लगभग सेम ही है। बट मैं ये कह रहा हूं। आप क्या मानते हैं कि जो आप ईश्वर का ही पार्ट है अंश है आपकी चेतना या फिर आपकी आत्मा जो है वो यहां आ जाती है क्योंकि मैं ये मानता हूं अगर मैं उसको आत्मा नाम दूं जो मैं नहीं देता तो आत्मा उसी परमात्मा का अंश है और वो वहीं से जैसे सागर की एक लहर उठ के और ये मान ले कि मैं वही तो बता रहा हूं। देखिए बुद्धिज्म को आप थोड़ा अध्ययन और कर लीजिए। बुद्धिज्म ये नहीं मानता है कि कोई भी चेतना शाश्वत
00:15:08:00 रूप से मुक्त है। ठीक है? वह बार-बार प्रकृति के अधीन हो रही है और वह फिर मुक्त हो रही है। ऐसा आप मानते हैं और हम यह मानते हैं कि शाश्वत मुक्त चेतना है वो अपने अस्तित्व में सदा रहती भी है और अपने ही अंशीभूत के रूप में वो जो है लीला रूप में प्रकट होती है। जीव जगत और जगदीश्वर के रूप में समझ रहे हैं? जी मैं तो ये मानता हूं कि सुपर नेचुरल देखिए आप मानते क्या है? देखिए हमारी बात होनी है मगर अभी अ आपने यह कहा है ना कि वो नास्तिक दर्शन नहीं है तो मैं वहां पर प्रूफ कर रहा हूं नास्तिक कैसे है कोई भी सदा सुखी नहीं है आपके यहां हमारे यहां है सदा सुखी ठीक है पहले आप इसकी जांच कर लीजिए सदा सुखी है कि नहीं बुद्धिज्म में कोई अगर आपके वहां कोई सदा सुखी है तो जब आत्मा यहां पर आ गई यह बात की बात है मेरे भाई पहले आप अपनी मान्यता बताओ फिर हम लोग चेक करेंगे कि सदा सुखी है कि नहीं हम यह बाद की बात है कि किसका क्लेम वो हो रहा है कि नहीं पर क्लेम क्या है यह तो पहले तय कर लो जी पहले अंतर डिसाइड करें तभी तो हम डिबेट पर कहेंगे नहीं तो हां तो बस वो अंतर तो डिसाइड करो आप आप ये आप ये कह रहे हो कि मेरे यहां सदा सुखी है कि नहीं है ये बताओ आप
00:16:23:01 अगर सदा सुखी है तो आपने भी ईश्वर को मान लिया आपके यहां ईश्वर आ गया सदा सुखी है जो देखिए वो जो जो हम जिसका अंश है वो एज अ होल सदा सुखी है और हम जब उसमें विलीन हो जाते हैं तो भी हम सदा सुखी रहता है। लेकिन जब हम इंडिविजुअली कारण संसार में आते बुद्ध फंसे हुए थे तब सदा सुखी सत्ता थी ना वो थी और बुद्ध जब उसमें मिलेंगे तो बुद्ध भी सदा सुखी हो जाएंगे हां तो वो थी तो वो तो ईश्वर हो गया फिर सदा सुखी थी यानी कि वो बाधित नहीं थी माया से प्रभावित नहीं थी कहो हां हां माया से प्रभावित नहीं थी माया थी तो जब माया से प्रभावित नहीं थी माया से बाधित नहीं थी तो वो आकर के कुछ भी कर सकती थी माया में
00:17:05:08 जी बुद्धिज्म में तो ऐसा कभी कहा नहीं गया है कि पूरा आता है। तो फिर फिर पहले इसको आप जान लीजिए जब वो कुछ भी कर सकती होगी वो अवतारवाद हो गया। जब वह आकर के वह जो मुक्त सत्ता आप मान रहे हो जो आप मान रहे हो ना मुक्त के रूप में तो जब आपने मुक्त मान लिया कि सत्ता अभी मुक्त है जब माया से बाधित नहीं है प्रभावित नहीं है तो वो फिर कुछ भी करने के लिए फ्री हो गई ना सर्वशक्तिमान हो गई ना फिर वो फिर वो आके अवतार लेगी कंस को मार देगी लीला में वो जानती है माया है वो चाहे तो खंभा फाड़ के प्रकट होगी वो है सर्वशक्तिमान सत्ता तो आपने यह माना ही नहीं तभी तो अलग हो मान लिया होता तो अलग कैसे वो तो बाद की बातें हैं कि वह प्राप्त करने के लिए वो क्या कहते हैं नियम कानून क्या है? कर्मकांड क्या है? या आपके यहां आगे रिचुअल्स क्या है? वो बाद की बातें हैं। पहले सत्ता तो निर्धारित हो। आपने शाश्वत सत्ता नहीं मानी है। इसीलिए आप बुद्ध हो और इसीलिए हम अद्वैत है। हमने शाश्वत सत्ता मानी है कि शाश्वत आनंदित रहने वाली सत्ता है। एक्सिस्ट करती है और आपने नहीं मानी है। समझ गए? जी सर मतलब ये समझ पा रहा हूं। आप ये कहना चाह रहे हो कि सिर्फ हम अवतारवाद को नहीं मानते। आप में कि जो ईश्वर है वो अवतार ले भी आ सकता है। बस इतना डिफरेंस आ रहा है। बहुत कुछ डिफरेंस है। जब शाश्वत
00:18:20:09 सत्ता ही नहीं मानी तो ईश्वरत्व भंग हो गया। खत्म हो गया। जब ईश्वर नहीं तो वही नास्तिक है। मैं ही मैं हूं। अलग से कोई वो नहीं है। ऐसा ईश्वर जो कुछ हमें कुछ कर सकता हो जिसके भरोसे हम रह सकते हो। जिस पर हम आश्रित हैं जो सब कुछ संपूर्ण संसार का करता धर्ता है जिसने सृष्टि बनाई है जो प्रकृति पर अधिपत्य जिसका कंट्रोल है जिसका जी अब आपने एक एक सवाल अब आपने एक चीज कर दी आपने कंट्राडिक्ट कर दिया खुद को वापस हम अब आपने बोला जिसने सृष्टि बनाई है तो इसका मतलब पहले सृष्टि एक समय ऐसा था जब एक्सिस्ट नहीं कर रही थी उससे पहले आपने कहा था में अंतर है ना मेरे भाई सृष्टि का मतलब सुनो विद्या और अविद्या ये दोनों ही ब्रह्म में सदा रहती है और सुनो माया कोई अभाव पदार्थ नहीं है। माया जो है वह अभाव पदार्थ नहीं है। मतलब अभाव पदार्थ का मतलब है कि ऐसा नहीं है कि जब अविद्या जब विद्या नहीं होगी तभी अविद्या है। विद्या साथ में है तब भी अविद्या है। उसका अस्तित्व है अविद्या का वही माया है।
00:19:27:10 सृष्टि बनाना व्यवहारिक रूप से सूर्य चंद्रमा इत्यादि को गढ़ना यह व्यवहारिक सृष्टि की रचना और माया के रूप में ईश्वर की शक्ति माया माया माया में मैं अपने संसार को कल्पित करता हूं खाई बनाता हूं पुल बनाता हूं पहाड़ बनाता हूं ये सृष्टि की रचना है ठीक है जी मतलब मैं मेन डिफरेंस ये समझ रहा था अब तक क्योंकि अधिकतर हिंदू लोग यही कहते हैं कि भाई ईश्वर ने संसार को बनाया तो इससे मतलब एक समय नहीं था बट मैं बुद्धिज्म में ये हमारा ये माना जाता है गलत समझ रहे एक वो प्रकृति के रूप में मतलब वह तत्व है मगर वह किसी तरीके से व्यवहार में ना आ सकने वाले रूप में है। उसके बाद भगवान उसको व्यवहारिक रूप से बनाते हैं कि ये पहाड़ बना दिया ये सूर्य बना दिया यहां चंद्रमा टांग दो। हां फिर हम उसका यूज़ बहुत ज्यादा कर लेंगे तो वापस डिस्ट्रक्शन करेंगे। वापस उसका पुनर्निर्माण और फिर वो इंफिनिटली चल चल रहा है हमेशा। यही बुद्धिज्म में कल्प का है कि हां यही मगर आपके यहां पर शाश्वत सुखी सत्ता नहीं मानी गई दिक्कत ये है मान लेते तो ईश्वर हो जाता ईश्वर हो जाता तो अवैदिक नहीं होता फिर वो जी वही तो देखिए बुद्ध के चार आर्य सत्य में पहला ये है कि संसार में दुख है यानी कि जब वो सत्ता का एक अंश संसार में आता है तो है ना यानी वो उसमें जो
00:20:42:12 दुख है वो भी माया है वही तो व्यक्ति को बताना है। हां तो संसार में आता है तो दुख है बट संसार से जैसे ही बाहर होगा निर्वाण की तरफ तो वापस हमेशा अरे भैया ये बार-बार आप अपनी जो एक बात आपने पकड़ ली है या रट ली है उसको ही बार-बार रिपीट करने से मतलब नहीं है अपनी अपनी जो अभी चर्चा हुई है वो इस बारे में हुई है कि बुद्धिज्म शाश्वत सुख वाली सत्ता को मानता है कि नहीं शाश्वत है वही ईश्वर है समझिए मेरी बात को आप शाश्वत है वही ईश्वर है जी शाश्वत में तो मानता है बस ईश्वर का नाम नहीं दिया बुद्ध से पूछा भी गया तो कहां मान रहे हो आप शाश्वत मैं बोल तो रहा हूं कि भैया जिस समय बुद्ध के रूप में बाधित थे उस समय फ्री सत्ता थी कि नहीं और थी तो फिर वो जो फ्री सत्ता है वो तो माया से बाधित नहीं है वो तो आके माया में कुछ भी करें और जब कुछ भी करे तो फिर अवतार को भी मान लो और उसकी जो यहां पे बाधित लोग हैं वो पूजा करें हो गया हिंदू खत्म बुद्धिज्म
00:21:36:24 हम तो सत्ता मानो पहले या ना मानो पहले तो एक साइड आओ ना आप समझे तो आप थोड़ा सा बुद्धिज्म को और वह कर लो। फिर हम लोग किसी दिन रख लेते हैं। या चाहो तो अगर अभी आना है इनहीं सब चीजों को लेकर के तो आ जाओ। जी मैं एक काम करता हूं। अद्वैत को फिर से पढ़ता हूं हम और फिर मैं आपको कांटेक्ट करूंगा तब तक आप देख लीजिए। [संगीत]
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