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00:00:02:16 सभी को जय श्री राम। वर्तमान के श्रीमद जगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर भगवान अपने कई वक्तव्यों में अपना एक संस्मरण बताते हैं जब उनके पूज्य गुरुदेव धर्म सम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज ने उनसे कहा था कि लोग आएंगे और तुमसे कहेंगे यह कलयुग है। कुछ नहीं होने वाला। कितना भी एड़ी चोटी का जोर लगा लो किसी की बात मत सुनना लोग आएंगे तुमसे कहेंगे कुछ नहीं होगा तुम्हारे धर्म को धर्म की रक्षा करने के प्रयासों से कुछ भी बचने नहीं वाला है धर्म नष्ट होकर ही रहेगा तो करपात्री जी महाराज ये बताते हुए कहते थे पूज्य गुरुदेव जी से वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर जी से किसी की बात मत सुनना बीज की रक्षा भगवान को अभीष्ट है करते रहना तो ऐसा उन्होंने अपने अनेक जो कर्मठ शिष्य थे, समर्पित शिष्य थे, उनको कहा और इसी संदर्भ में इस वर्ष आने वाला जो वर्ष है 2026 में फरवरी के माह में माघ मेले के ठीक बाद में अह पूज्य आचार्य श्री रामशंकर शुक्ल जी कृपात्री जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य और श्रीमद
00:01:17:27 जगदगुरु शंकराचार्य जी के गुरु भाई इनके द्वारा यज्ञ पवित का आयोजन हो रहा है और पूरे भारतवर्ष से जो बटुक हैं वह इसमें अपना यज्ञ संस्कार करवाने के लिए पहुंच रहे हैं और जिनके जीवन में अतिक्रमण हो गया है जो आयु सीमा का वो भी यहां पहुंच रहे हैं। तो इसी संदर्भ में कुछ महाराज जी के वचन हमें प्राप्त होंगे आज। तो महाराज जी सबसे पहले आपको प्रणाम निवेदित आपके चरणों में। थोड़ा सा ये यज्ञ पवित्र संस्कार की महत्ता थोड़ा सा बताएं जिससे कि हमारा जो युवा वर्ग है द्विज है और शूद्रों के लिए कंठी माला धारण का भी उसमें आयोजन किया गया है जो शूद्र वर्ण से आते हैं हमारे भाई चतुर्थ वर्ण वाले तो महाराज जी थोड़ा सा यज्ञ प्रवी तो कंठी माला दोनों के बारे में ही थोड़ा सा उनकी महत्ता के बारे में बता दें
00:02:15:25 बाद तोषित विश्वेषम धर्म मार्ग प्रवर्तकम वंदे हरिहरंदम करपात्रम जगत गुरु विश्वेश माधव दंडपाणि भैरव वंदे काशी गुहाम गंगाम भवानी मणिकर्णिकाम शंकरम शंकराचार्यम केशवम बायम सूत्र भाष वंदे भगवंतो पुनः पुनः नारायण वास्तव में आप श्री के मन में शास्त्रों के प्रति जिज्ञासा एवं उनके प्रचार प्रसार का जो सद्भाव है देखने को मिल रहा है। यज्ञपवि संस्कार के संबंध में आपने बात कही। यह परंपरा प्राप्ति संस्कार प्रजा प्रते सहजम पुरस्ता भगवान ब्रह्मा जी ने सहज में इस यज्ञ पवित को ऋण मोचन की दृष्टि से पितृ ऋण देव ऋण ऋषि ऋण इन ऋणों से मुक्ति पाने की दृष्टि से इस वेद
00:03:30:28 सूत्र को इसे वेद सूत्र कहा गया। इसमें 80 हजार कर्मकांड के मंत्र और 16000 उपासना मंत्र के संयोग 96 चौवे का दाहिनी तरफ से बाई तरफ जाता अपभ्य और बाई तरफ से दाहिनी तरफ आता सभ्य दो प्रकार से पितृ कार्यों में अपशब्य देव कार्यों में सभ्य इस दृष्टि से उपवेद का धारण करना शास्त्र सम्मत शास्त्र की आज्ञा आचार्यों के अनुबंध में गहित है और द्विजात संस्कार की सिद्धि के लिए उपनयन उप का अभिप्राय है समीप नयन का अभिप्राय है वेद तो शास्त्रों के समीप जाने की दृष्टि से किया जाता है ताकि हम शास्त्र का आलोन कर पढ़कर समझकर श्रवण कर अपने जीवन में उतार सके जहां तक उपनयन के विधान है वेदों के आधार पर अलग-अलग
00:04:46:09 पंडित हैं। शिखूत्र और प्रवर आदि के आधार पर गोत्र के आधार पर वेदों की शाखाओं के आधार पर इनमें भेद प्रतीति है। कर्मकांड की विधा में शुक् रखा गया है। शास्त्रों ने संतों ने वैदुष संपन्न आचार्यों ने मान्यता दी है। उनके आधार पर वेद सम्मत यजुर्वेद के आधार पर यजु पवित श्रेष्ठतम कहा गया। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमारे परम आचार्य धर्म सम्राट अभिनव शंकर कारक ब्रह्म श्री स्वामी करपात्र महाभाग ने अपने अनुबंधों के साथ संस्कार सत्र को महत्व देते हुए अखिल भारतीय उपनयन संस्कार समिति का गठन किए थे। बहुत दिनों तक उसके आधार पर उपनयन होता चला आया। 1980 से उसी परंपरा का अनुगमन कर हम यज्ञ पवित का निबंधन ब्राह्मण
00:06:01:18 क्षत्रिय वैश्य जो अधिकारी हैं उनके उत्कर्ष के लिए करते चले आ रहे हैं। हमारे पूज्य परमाचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर श्री जगुरु शंकराचार्य भगवान के निर्देशानुसार यह यज्ञ पवित्र बहद रूप में महाराज श्री के मन में एक उत्कंठा जगी कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य संस्कारों से लुप्त हो रहे हैं। कौन कहे 16 संस्कार में गर्भाधान संस्कार से लेकर आज तक के इस संस्कार का अनुपालन हो तो कम से कम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र की रक्षा के लिए यद्यपि प्राप्त होते चले जा रहे हैं। फिर भी प्रायश्चित करा करके भगवन नाम प्रायश्चित करा करके क्योंकि जो प्रात्यस्तम आदि यज्ञ है प्रायश्चित के लिए वो कठिन है। अर्थ साध्य तो है ही है कठिन पर मंत्र साध्य भी आचार साध्य भी नहीं कहे जा सकते। इसलिए ध्यान में रखते हुए इस यज्ञ पवित्र को सामूहिक क्रम में पथक पृथक रूपों में सबको बैठा के अलग-अलग और यहां तक कि आचार्यों
00:07:17:06 का भी उनके साथ संयोजन करके इस उपनयन कार्यक्रम को सिद्धस्थ किया जा रहा है और इसी परंपरा में इसी कड़ी में 5 फरवरी को क्योंकि जनवरी में शुक्रास्त होने के कारण यह संस्कार संभव नहीं है। अन्यथा हम लोग प्रयाग क्षेत्र में भगवान बेणी माधव के धाम में जहां सारा का सारा पर्व मंडप माना जाता है। वहां ना मंडप की आवश्यकता है ना अन्य किसी बहत कर्मकांड की आवश्यकता है। प्रायश्चित करा करके शौर आदि के बाद बटों एवं ब्रात्यों का यज्ञोपवी संस्कार संपन्न किया जाता है। तो इस भावना से इसी क्रम से श्री स्वामी सदानंद आश्रम प्रयागराज में इस उपनयन का विधान फरवरी 5 2026 को उपनयन धारक व्रत अथवा बटुक सभी इकट्ठे होंगे उनके पुनः प्रायश्चित होंगे छर कर्म होंगे भगवन नाम प्रायश्चित का श्रेष्ठतम उपाय है हमारे पूरी पीठाधीश्वर महाराज श्री के द्वारा ये निर्देशित ित है।
00:08:33:10 भगवान के नाम से सकल प्रकार के प्रायश्चित हो ही जाते हैं। इस दृष्टि से प्रायश्चित कराकर उपनयन का विधान पथक प्रथक पटको के लिए अलग-अलग आचार्य और व्रात्यों के लिए समष्टि रूप में इसका आयोजन किया जा रहा है। कारण है यदि उपनयन संस्कार ही लुप्त कर दिया जाए अथवा लुप्त हो ही रहा है। विवाह की सीमा 30 वर्ष से 40 के भीतर पहुंच चुकी है। लोग उपनय रहित होते जा रहे हैं। तो आस परंतम सावित्री ना विधते शद्र अन सर्वकर 16 वर्ष के भीतर ब्राह्मण 20 वर्ष अथवा 22 वर्ष के भीतर क्षत्रिय 22 अथवा 24 वर्ष के भीतर वैश्य उपनयन के अधिकारी हैं। यदि समय का उल्लंघन हुआ तो प्रायश्चित करके वात संज्ञों का भी उपनयन किया जा रहा है। इसमें शास्त्र की कोई अवहेलना शास्त्र के विपरीत कोई आचरण नहीं है। धर्म की रक्षा बीज की रक्षा धर्म सम्राट महाराज श्री कहा करते थे।
00:09:49:01 यहां भी कर्म ना सो प्रत्यय विजते विद्यते थोड़ा भी किया हुआ पुण्य नष्ट प्राय नहीं होता। इसलिए बीज का संरक्षण आवश्यक है। जब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नहीं रह पाएंगे तो वर्णाश्रम धर्म कैसे उित होगा, कैसे उत्कर्षित होगा? और फिर सनातन धर्म की मूल शाखा ही संस्कार है और वही संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित है। इसलिए हम लोग इस कार्यक्रम को वैदिक शास्त्रों के आधार पर संतों के निर्देश पर अब आप कहेंगे सामूहिक तो हम सामूहिक एक जनेऊ में कई लोगों को नहीं बैठाते वो अलग-अलग जनेऊ दिया जाता अलग-अलग उनके हवन के लिए आचार्य होते हैं। अलग-अलग पर प्रायश्चित तो अलग-अलग किए जाता है। प्रायश्चित करके और फिर इस विधि का पालन हम लोग कर रहे हैं। यदि किसी के मन में कोई अनौचित भाव आवे भी अथवा शास्त्र की विधा का परिज्ञान ना हो अथवा सुरक्षा संरक्षण और दुजात को बचाने का प्रयास ना हो तो फिर अनर्गन
00:11:04:02 भी लोग कह सकते हैं लाभ कर सकते हैं उन बातों को ध्यान में ना रखा जाए ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य को अग्रसारित करके वर्णाश्रम धर्म की रक्षा करना हमारा स्वधर्म है इनहीं मान्यताओं शास्त्रों के आदेश संतों के निर्देश और स्वयं बौद्धिक क्षमता के आधार पर इस कार्यक्रम को अग्रसारित कर विगत वर्षों से हम लोग चल रहे हैं। इस वर्ष का आयोजन श्री स्वामी सदानंद आश्रम में है। जैसा कि अभी पूर्व में हमने बताया पांच तारीख को सभा जाएंगे। छोर कर्मा आदि अनेक प्रायश्चित होंगे। 6 फरवरी को 2026 इसी ईवी में यह उपनयन संस्कार संपन्न किया जाएगा। इसकी सूचना हमारे द्विवेदी जी पहले से दे रहे हैं। हमारे प्रथम सिंह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र हैं। वे भी लगे हैं। लोगों के मन मस्तिष्क में बातें जा रही हैं। श्री जगुरु शंकराचार्य पुर पीठाधीश्वर महाराज श्री का आशीर्वचन प्राप्त है। और इसी आधार पर हम ब्राह्मण बने, क्षत्रिय बने, वैश्य बने और शूद्र बने। इसीलिए शूद्रों के लिए भी कंठी की व्यवस्था की गई है। वे लोग कठी
00:12:19:10 धारण करेंगे। उपनयन के धारक अधिकारी लोग उपनयन धारण करेंगे और संस्कार संपन्न होंगे ताकि वेदाद शास्त्रों में प्रवेश पा सके। इन सब बातों को प्रसारित प्रचारित करना आप सजनों का ही धर्म है। भाग लेना ब्रात्यों बटों का धर्म है। इसलिए उपस्थिति देकर अपने जीवन को कृतार्थ करते हुए वर्णाश्रम सनातन धर्म की रक्षा हेतु आगे बढ़े। यही हमारे देश हमारी धर्म नीति शास्त्र की आज्ञा यही कहती है हरिश अच्छा महाराज जी जैसे कई बार एक प्रश्न आता है कि जैसे जब सामूहिक कर रहे होते हैं तो वहां पर जो विधिविधान होता है तो पर्टिकुलर किसी एक शाखा के अनुसार होता है शायद आपने बताया यजुर्वेद की शाखा है शुक्ल शाखा जी तो उसमें एक प्रश्न ये आता है कि मतलब जैसे अभी आपने बता दिया फिर भी मैं प्रश्न रख रहा हूं कोई एक सामान्य आ जाता है प्रश्न कि भाई शाखा स्व शाखा में ही हो तो वो उत्तम होता है। तो मतलब यह वाला क्या कम से कम आत्म कल्याण विधियां प्राय वही है। शाखाओं के आधार पर जी मंत्रों में वेदों के
00:13:34:14 विभाग हो जाते हैं। जी हवन आदिक प्रक्रिया वही है। जी कर्म वही है। 96 चौबे का यज्ञप सब को धारण करने के लिए है। अच्छा क्षत्रियों के लिए 94 और वैश्यों के लिए 92 पर साधारण दृष्टि से सामान्य दृष्टि से वो यज्ञ पवित आजकल बनाने में भी लोगों को सुविधा हो रही है तो बाजार में हमारे सीतापुर कई जिलों के ब्राह्मण गोवित बनाते हैं वही लोग धारण कर लेते हैं अन्यथा ये गोपी धारण करने की जो शुद्ध विशुद्ध वैज्ञानिक विधि है और नाभ्यात कट पर्यंतम उपतम धारे उधा नाभि से कमक तक की [संगीत] धारण करने का विधान है। पर जिस विधि का उचित पालन दूर दिख पड़ रहा है तो जितनी विधियां जितने शास्त्र सुविधा दे सके उसी आधार पर हम लोगों को धारण करना आवश्यक है। अन्यथा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कहा पड़ तो इसमें क्या हम यह माने कि सबसे उत्तम तो यही है कि व्यक्ति का जो व्यक्तिगत रूप से हो यदि नहीं होता है तो फिर इस तरह से हो जाए वो भी व्यक्तिगत ही है क्योंकि जो ब्राह्मण बैठेगा जी वो हवन करेगा तो
00:14:49:20 उसमें बटुक की दृष्टि से अलग-अलग आचार्य रखे जाते हैं। अच्छा अच्छा और सामूहिक दृष्टि से एक आचार्य कहतेशा नाम उपनयन धारणार्थम तो शास्त्र कहते हैं भाई ना करने दोष सूत्र अगर नहीं कोई धारण कर रहा है तो बहुत बड़ा दोष इसलिए कर लेना ही लेना ही आवश्यक है स्वशाखा नहीं मिल पा रही तो नहीं मिल पा रही लोप हो गया कई कई शाखाओं का तो लोप में भी प्राय शाखाओं में भी प्राय बहुत से विवाद बन जाते हैं जी तो उन विवादों के शमन के लिए जिसके गोत्र का कोई पता नहीं कश्यप ऋषि का गोत्र कश्यप गोत्र कह ही सकता शाखाएं नहीं मिल पाती वेद नहीं पता चलता तो शुक् उसी के आधार पर पाठों पर लिया जाता है सारे वेद उनकी शुक्लवेद शुद्ध यजुर्वेद की प्रतिष्ठा करते हैं। यज्ञ जागाद में शुक् अथवा यजुर्वेद कह लीजिए यजुर्वेद ही प्राधान्य है। इस दृष्टि से गौ पक्ष को भी मुख्य पक्ष माना जाता है। जी जी आवश्यकता एक एक वो वाली बात भी है कि जब सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो सूक्ष्म बीज रूप वेद जो तो प्रणव है प्रणव से ही चारों वेद फूटे हैं तो वहां पे एकत्व मान करके उस तरह से उसके आधार पर भी सर्वे वेदा पद्मा मनती सर्वे वेद एक
00:16:04:24 ही पद की प्रतिष्ठा करते हैं तो वो विष्णु पद है ओमकार पद है तो उसी से सबका व्यवहार चलता है लेकिन जो सामथर्व वेदों का प्राकट भी प्रणवत्मक है इसलिए प्रणव वेदों के पिता हैं गायत्री वेद की माताओं जी अच्छा महाराज जी इसमें एक और चीज है जैसे आपने बताया ना व्रत जो है प्रायश्चित पूर्वक कर लेंगे तो फिर उनका जो पर्यवसान है क्योंकि व्रत तो हो ही गए हैं तो मेरे ख्याल से उनका परवसान इसमें तो हो नहीं सकता कि वो कभी शंकराचार्य के पद तक भी पहुंचे मतलब उनका उनके आत्म कल्याण हेतु वो भ्रात हो ही गए हैं तो गायत्री के पुरुष चरण में भी उनको अधिकार नहीं है शास्त्र कहता है संध्या के क्रम में गायत्री जपे और पौराणिक अथवा तांत्रिक मंत्रों को जप करके फला देश में शौर्य नहीं है। महाराज श्री कहते हैं कि उसमें कोई किसी प्रकार का शौर्य नहीं है। फल तो मिलेगा ही जो मंदिर के भीतर गर्भगृह में नहीं जा सकते। गर्भ के बाहर प्रणाम करेंगे। जो गर्भ के प्रणाम करने के स्थान पर नहीं पहुंच पाते वो बाहर से त्रिशूल चक्र दर्शन का ही फल प्राप्त करेंगे। जी फल में किसी प्रकार की कटौती नहीं है। कल्याण से कोई भी वंचित नहीं है। यह कहने का अर्थ है। हां। कल्याण सबको
00:17:19:27 होगा। सबकी विधियां अलग-अलग हैं। उसमें इस एक कंपटीशन वाला या प्रतियोगिता वाला भाव लाने की आवश्यकता नहीं है। अच्छा एक चीज और है मैं क्लियर कर दूं। व्रत वाली जो बात है मतलब जिनकी आयु निकल चुकी है और उसके बाद वह यज्ञोपवीत करा रहे हैं तो ऐसा ऐसे लोगों का यज्ञपवित हो रहा है उनके आत्म कल्याण हेतु कि अब जो बच गया उसको बचा लिया जाए मगर इसका मतलब ये नहीं कि व्रात व्रात हो के जनेऊ कराने की विधा को प्रोत्साहित किया जा रहा है ऐसा नहीं है उसका प्रोत्साहन नहीं है केवल जो बचा है वो बचा रहे उसकी दृष्टि से व्रात्यों के लिए भी बीज की रक्षा के लिए कम से कम आपकी जो अगली पीढ़ी है उसका का जनेऊ हो जाए आप अपने आप जब स्वयं परंपरा में आपकी जनेऊ बचा रहेगा यज्ञ बचा रहेगा तो अपने पुत्र और पौत्र को देंगे और बहुत सी चीजें होती है जो पिता से प्राप्त होती हैं गुरुजनों के पास नहीं रह पाते उतने समय तक तो पिता से प्राप्त होती है इसलिए उसको रक्षित करने की दृष्टि से जा रहा है जाने का उपक्रम समाज में दिया जा रहा है। इसी आधार पर हमारा अनुमान यह है कि महाराज श्री के निर्देश से और उनके उपदेश से उनके कहे गए वचनों के आधार पर हमारा ये
00:18:35:01 अंदाज है अनुमान है कि उत्तर प्रदेश उत्तराखंड हरियाणा यहां तक कश्मीर के भी बच्चे और महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बंगाल और आसाम जी बिहार अन्य इन सब प्रांतों से बहुत से बच्चे सब हो गए थे। कम से कम उन्हें पता तो चला कि हम ब्राह्मण बहुत बड़ी बात है। तो इस सब तो बचाने के लिए अभियान और भी आचार्यों को विद्वानों को करना चाहिए। नहीं करेंगे तो लुप्तप्प्राय हो जाएगा। जी नकारात्मक विधि को पकड़ लेने से सकारात्मक विधि नहीं आ पाएगी। इसलिए हमें बचाना है और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बिल्कुल। शूद्र माताएं इनकी रक्षा भी करनी। तो आप सभी से निवेदन है जो भी आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हैं अथवा शूद्र हैं तो आप चारों के लिए यहां पर आयोजन है। ये फरवरी माह में 5 फरवरी को मुख्य आयोजन है। उससे एक दिन पहले जो आएंगे तो कुछ छौर कर्म छ को यत है। तो एकद दिन पहले से आएंगे तो प्रायश्चित पूर्वक और छौर कर्म इत्यादि होगा आपका। तो ऐसा समय लेकर के आए। हमारे चैनल पर पूरी डिटेल्स आपको मिल जाएगी वीडियो में और भी हम तरह-तरह से प्रचारित कर
00:19:50:02 रहे हैं और इस अभियान से जुड़े और किसी प्रकार के प्रश्न हो तो उसमें एक नंबर भी आपको दिया गया संपर्क सूत्र इत्यादि कोई जिज्ञासा हो कुछ जानना हो अपनी चीजों के बारे में तो उसके लिए वह संपर्क कर सकते हैं और आचार्य श्री के द्वारा प्रारंभ किया हुआ अभियान नहीं है। स्वयं श्री कृपात्री जी महाराज के द्वारा प्रारंभ किया हुआ अभियान है। और स्वयं श्री श्रीमद् जगदगुरु शंकराचार्य पूरी पीठाधीश्वर गुरुदेव भगवान के सानिध्य से ही ये आगे बढ़ा है। अपने स्वरूप को धारण किया है। तो इसलिए जब ऐसे महापुरुषों की हमें वाणी प्राप्त है उसमें तो फिर कहीं से भी दोष दृष्टि रखने का कोई स्थान रह नहीं जाता है। तो इसी के साथ आचार्य किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। बल्कि इसमें सहयोग देना चाहिए। जी जी सहयोग सहयोग की भावना होनी चाहिए। क्योंकि वैवाहिक और आपको मैं बता दूं मेरा खुद का एक एक्सपीरियंस जो मैंने अपनी आंखों से देखा है। आचार्य श्री पूरी तरीके से निशुल्क ये आयोजन करवाते हैं। किसी से भी कोई ऐसा नहीं है कि कोई मतलब अनिवार्यता के साथ कोई शुल्क वगैरह लिया जाता हो और यहां तक कि मैंने ऐसा देखा है इनका इतना सहज भाव है इस आयोजन के लिए कि जो व्यक्ति अपने से जो उसमें बर्तन इत्यादि की आवश्यकता होती है या जो छोटी कुछ चीजें
00:21:05:03 फल होते हैं या फिर भीखी डाली जाती है जो माता-पिता के द्वारा वो भी नहीं होती है। तो आचार्य श्री स्वयं से प्रयत्न पूर्वक उन सब चीजों की आवश्यकता करती है। उन्हें केवल अह बटुक चाहिए होते हैं, द्विज चाहिए होते हैं अथवा शूद्र चाहिए होते हैं। जिनका वह संस्कार होना है। यज्ञ पवित्र संस्कार या कंठीधार संस्कार। तो वो इतना मतलब क्यों कर रहे हैं? क्योंकि वही वाली बात करपाती जी ने कहा था कि बीज की रक्षा भगवान को अभीष्ट है। करते रहना। तो आप लोग भी इसमें सहयोग दें और आचार्य श्री का बारंबार हमें धन्यवाद साधुवाद देते हुए और प्रणाम निवेदित करते हुए सर्वे सुखना भवंतु सभी को जय श्री महादेव
00:21:50:00 [संगीत]
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यज्ञोपवीत संस्कार 6 फरवरी 2026 प्रयागराज
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