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00:00:02:28 देखिए कुछ लोग कहते हैं कि शंकर मत वाले ज्ञान मार्गी होते हैं। शंकराचार्य शंकर मत वाले हैं और उनके हिसाब से ज्ञान मार्गी है। भक्ति मार्ग के विरोधी हैं। और शंकराचार्य दास बोध पढ़ने को दे रहे हैं। और दास बोध कह रहा है कि इसमें भक्ति मार्ग के द्वारा मुक्ति बताई गई है। क्या इस वाले कभी कहते हैं दास बोध पढ़ो जाकर के? नहीं कहते। क्या इस वाले कभी कहते हैं कि ज्ञानेश्वरी गीता पढ़ो। जो डायरेक्ट उनके संप्रदाय से संबंध ग्रंथ नहीं है उनको पढ़ने के लिए कभी इस वाले कहते हैं मैं पहली बार जब शंकराचार्य भगवान के दर्शन करने गया था। उनके दर्शन मुझे सुलभ हुए थे तो उन्होंने जब मैंने अपनी शंका उनको व्यक्त की थी तो उन्होंने मुझको शंकर परंपरा का ग्रंथ पढ़ने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने मुझे कहा था कि रामानुज संप्रदाय के महान शास्त्रार्थ के मर्मज्ञ महान शास्त्रार्थी पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी का ग्रंथ क्यों और पुराण दिग्दर्शन आप ले लीजिए और उसका अध्ययन करिए। बताइए
00:01:14:24 ये इस वाले करते हैं क्या जाकर के उनका ग्रंथ ले लो इस कार्य के लिए करते हैं क्या? यहां होता है। रामानुजियों के यहां होता है। शंकराचार्यों के यहां होता है। जहां एक दूसरे के ग्रंथ पढ़ने को दिए जाते हैं। इसलिए कहते हैं कि इस वाले तोड़ रहे हैं हिंदुओं को आपस में बांट रहे हैं। इसलिए ये कहा जाता है। वैष्णवता के नाम पर एक दूसरे से दूर कर दो। भाई को भाई से अलग कर दो।
00:01:48:26 आज भी मेरे पास वह ग्रंथ जो गुरुदेव के द्वारा बताया गया पहला ग्रंथ वो यह है और कोई ग्रंथ नहीं बताया था गुरुदेव ने यह बताया था इसको कहते हैं सिद्धांत उनको सत्य की रक्षा थी सत्य की चिंता थी कि सत्य बोलना है भले ही वह रामानुजाचार्य जी का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े रामानुज परंपरा का ग्रंथ क्यों ना पढ़ने को कहना पड़े पर उनको सत्य बोलना था सत्य निष्ठ थे। ठीक है? वहां ये भेदभाव नहीं था कि नहीं रामानुज परंपरा का ग्रंथ हम क्यों बताएं भाई? अपने ही आचार्यों का बताएं। जो सबसे उनको सुलभता से दिखाई दिया। मेरे लिए अनुकूल हो सकता है। वो ये ग्रंथ था। वो पुराण दिग्दर्शन था जो पीछे रखा हुआ है। ये
00:02:37:03 ग्रंथ मुझे मेरे गुरुदेव ने सबसे पहले पढ़ने को दिए। इस वाले इस वालों की तरह नहीं किया उन्होंने कि नहीं नहीं दूसरे के ग्रंथ मत पढ़ो दूसरे संप्रदाय के ग्रंथ मत पढ़ो इसको कहते हैं सिद्धांत और इसको कहते हैं निडरता अभय इसको ये भी कहते हैं कि पढ़ लेने दो पुराणिक दर्शन पढ़ लेने दो जिसको अपने सिद्धांत पर विश्वास होता है वो ये नहीं सोचता कि ये व्यक्ति कहीं भटक ना जाए कहीं यहां ना चला जाए कहीं वहां ना चला जाए ऐसे ही रामानुज परंपरा वाले वाले भी बताते हैं कि अमुक कार्य के लिए आप अमुक ग्रंथ पढ़ लीजिए। शंकर परंपरा बताते हैं। कई जगह संदर्भ देते हैं शंकराचार्य का और सभी परंपरा प्राप्त आचार्य अपने वक्तव्यों में अपनी वाणी में कहीं ना कहीं दूसरे संप्रदाय के आचार्यों का संदर्भ देते हुए बात करते हैं। क्यों? रामानुज परंपरा वाले क्या रामानंद परंपरा का संदर्भ देते हुए रामचरितमानस का संदर्भ देते हुए बात नहीं करते। कई बार करते हैं शंकर संप्रदाय वाले क्या रामचरितमानस जो रामानंदी परंपरा का ग्रंथ है उसका संदर्भ देते हुए बात नहीं करते हैं इस वाले नहीं करेंगे कभी भी वो हमेशा वही चिल्लाएंगे जीव गोस्वामी श्री प्रभुपाद जी और कुछ और नाम होंगे गौरंग दास जी और
00:03:52:07 चैतन्य महाप्रभु इनहीं सबके इर्दगिर्द बाकी गाड़ी घूमती रहेगी खैर कम टू द पॉइंट तो भक्ति मार्ग की निंदा करने वाले उसकी स्तुति करने लगते हैं। संसार के बंधन में पड़े हुए लोग मोक्ष की कामना करने लगते हैं। मूर्ख भी दक्ष हो जाते हैं और भक्ति मार्ग पर चलकर अभक्त भी मोक्ष प्राप्त करते हैं। इससे अनेक दोषों का नाश होता है और पतित लोग पावन हो जाते हैं। श्रवण मात्र से प्राणी प्राणी को उत्तम गति प्राप्त होती है। इसे सुनने से शारीरिक बुद्धि के अनेक भ्रम और संदेह तथा संसार के अनेक प्रकार के उद्वेग नष्ट हो जाते हैं। अधोगति का अंत हो जाता है और उनको शांति तथा समाधान मिलता है। जिसका जैसा भाव होता है उसे वैसा ही लाभ भी प्राप्त होता है। जो मन के मन में मत्सर रखकर प्रश्न करता है उसे मत्सर की ही प्राप्ति होती है। देखिए अगर वास्तविकता में देखा जाए तो लोग ज्ञान मार्ग के नाम पर भक्ति का विरोध करना कि भाई सिर्फ मतलब हमारे जो हमारी जो मुक्ति
00:05:07:13 वो ज्ञान से है इसलिए हम भक्ति नहीं करेंगे। तो यह तो ठीक नहीं है। परंतु भक्ति का नाम लेकर के ज्ञान की प्राप्ति होने के विषय में काउंटर करना या मना करना यह अपने आप में एक बहुत बड़ा कुचेष्टा कहेंगे इसे। क्यों? क्यों कहेंगे कुचेष्टा? क्योंकि परलोक की बात कहे या फिर इस्लोक की बात कहे। व्यक्ति ढूंढ तो ज्ञान ही रहा है। ज्ञान का मतलब समझ रहे हैं आप? यदि आपको रसगुल्ला खाना है, गुलाब जामुन खाना है तो क्या आपको वह जो मटेरियल है उससे मतलब है या उससे मिलने वाली जो सूचना है इंफॉर्मेशन ये मीठा है गुदगुदा है उससे मतलब है आपका मूल विषय क्या है कि आपके दिमाग को आपके मस्तिष्क को वो खोवा है जो उसके अंदर जो उसके अंदर मिठास है वह सूचना मिलनी चाहिए। अच्छा यदि आपको जो रसगुल्ले की सूचना है वह किसी कुछ ऐसा इंतजाम कर दिया जाए कि आपको जो है किसी और टेक्नोलॉजी के द्वारा वह सूचना प्राप्त होने लग जाए रसगुल्ले की तो क्या आपको रसगुल्ले की नीड रह जाएगी? नहीं रह जाएगी। तो हम आफ्टर ऑल एट दी एंड
00:06:22:14 हर चीज में ढूंढ क्या रहे हैं? इंफॉर्मेशन तो आप ज्ञान मार्ग को सर्वदा कि भाई ये ज्ञान मार्ग ही है या इस इस तरह की बातें करके ज्ञान मार्ग को सर्वदा खंडित नहीं कर सकते। क्योंकि एट द एंड भगवान को सामने देख के भी आपको सोचना चाहिए कि भगवान मेरे सामने हैं। इस बात की सूचना अंतिम लक्ष्य आपका क्या है? सूचना ज्ञान इंफॉर्मेशन आजकल देखो बहुत ये पूरा अद्वैत दर्शन आपको दिखेगा। इसमें फोन पे से लोग पैसे दे रहे हैं। लोग ले रहे हैं। बने बेवकूफ चले जा रहे हैं। ये क्या हुआ भाई कि भैया मुझे ₹50 चाहिए। व्यक्ति ने कुछ किया। एक आवाज आई टिंग टिटिंग टिटिंग और पैसे उसमें चले गए। सामने वाला खुश हो गया। अब हुआ क्या? केवल इंफॉर्मेशन मिली कि हां तुम्हारे पास पैसे आ गए। केवल इंफॉर्मेशन मिली कि तुम्हारे पैसे कट गए। इतना ही तो हुआ। इंफॉर्मेशन का आदान प्रदान हुआ। उसके अलावा उस व्यक्ति को भौतिक रूप से कुछ मिला क्या? वहां पर इंफॉर्मेशन मिल गई। व्यक्ति संतुष्ट हो गया। इसी प्रकार से यदि इंफॉर्मेशन अमुक अमुक चीजों में हमें ठंड लग रही है। हमें गर्मी लग रही है। हमें सुख हो रहा है। सुख मिल रहा है। यदि हमें इंफॉर्मेशन मिलने लग जाएगी तो क्या हमें भौतिक भौतिकता की आवश्यकता रह जाएगी?
00:07:38:02 नहीं रह जाएगी। तो हम मूल रूप से किसे ढूंढ रहे हैं? इंफॉर्मेशन को। तो सतही स्तर पर भी जब हमारे संशय निराकरण होने लगता है तो वह हृदय में संतोष पहुंचता है कि फिर वो जो भौतिक ताप हमें दिख रहे होते हैं वो कम होने लगते हैं। सामान्य व्यक्ति के स्तर से भी मैं आपको दिखा रहा हूं। बता रहा हूं। जब हमारे अंतःकरण से हमारी अंतरात्मा से निकलने वाले जो प्रश्न है और वो प्रश्न कौन से हैं वो मैं कई बार अपने वक्तव्यों में आपको बता चुका हूं। असतो मा सदगमया तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्यम गमया जब हम इस पर बात करने लगते हैं इसका जब हमें निराकरण प्राप्त होने लगता है तो हम बहुत संतोषमय हो जाते हैं। बहुत संतोषमय इतने संतोषमय हो जाते हैं कि धीरे-धीरे उस संतोष के कारण हमारे पास वो क्षमता भी आ जाती है कि कोई समसी लेकर के हमारी आंख निकाल रहा है ना आंख तब भी हम लोग उस समय विचलित नहीं होते। क्योंकि हमारे हृदय में वह संतोष होता है। एक बस इसमें कुल मिलाकर बात यह है कि हम अपने अंतरात्मा की अपने जो अंतःकरण से निकलने वाली वो आवाज है अथातो धर्म
00:08:53:08 जिज्ञासा अथातो ब्रह्म जिज्ञासा आत्म जिज्ञासा उस आवाज को हम कब सुन रहे हैं? जैसे भगवत गीता में एक बात आती है और कई शास्त्रों में एक बात आती है कि अश्रद्धावान को इसका श्रवण ना कराया जाए। जिसकी श्रद्धा नहीं है उसको इसका श्रवण ना कराया जाए। यह शास्त्रों में कई बार आया है। अच्छा तर्क तर्क की बात क्या होती है? अब जैसे हम लोग क्वेश्चन करते हैं स्कॉन वालों से तो हम कहते हैं कि भाई ये सवाल क्या है? ये सवाल क्या है? कि नहीं नहीं तुम अवक्त हो। तुमसे बात करना बेकार है। अश्रद्धावान इसलिए तुमसे बात करना बेकार है। आजकल निग्गू फॉलोवर्स निग्गू एंड कंपनी भी वही कर रही है। तो यदि अश्रद्धावान को उत्तर नहीं देना है, श्रद्धावान से बात करना व्यर्थ है तो किससे बात की जाएगी? क्योंकि जो भी व्यक्ति जब तक शास्त्र को नहीं जानता है, जब तक भगवान को नहीं जानता है, जब तक कुछ नहीं जानता है, उससे पहले तक वो अश्रद्धावान ही तो है। क्या गीता को जानने से पहले किसी व्यक्ति का गीता के प्रति भावनाएं होती है? क्या श्रद्धा की? भगवान को जानने से पहले भगवान के प्रति भावनाएं कैसे होंगी?
00:10:08:19 नहीं होती। तो इसका मतलब क्या है? फिर शास्त्रों ने क्या गलत कहा है? क्या शास्त्रों ने यह लाइन गलत लिखी है? कि अश्रद्धावान को मत पढ़ाना यह शास्त्र नहीं गलत नहीं लिखी है। इस लाइन का सही मतलब क्या है? सही इस पंक्ति का सही अर्थ क्या हो सकता है? तो वो अर्थ यह यह है कि अश्रद्धावान सभी हैं। परंतु ये आत्मा से निकलने वाले जो प्रश्न है इन प्रश्नों पर कौन ध्यान दे रहा है? असतो मा सदगमया तमसो गमया इन पर ध्यान कौन दे रहा है जो इन पर ध्यान दे रहा है उसको ये ग्रंथ आप पढ़ा सकते हैं वो श्रद्धावान है यानी कि जो अपनी आत्मा की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है भले ही उसने गीता अभी नहीं जानी है भले ही भगवान के बारे में नहीं जानता है पर वो श्रद्धावान है क्यों क्योंकि वो आत्मा की आवाज सुन रहा है वो वो खोज रहा है कि पहले मुझे मेरा गंतव्य बताओ क्या गंतव्य है अथो ब्रह्म जिज्ञासा उसके बाद उस गंतव्य तक किस प्रकार की गति के द्वारा पहुंचा जा सकता है वह बताओ अथो धर्म जिज्ञासा तो जो इस प्रकार से अपनी आत्मा की आवाज सुन रहा है वो श्रद्धावान है वो कोई
00:11:23:25 भी हो सकता है वो मच्छ भी हो सकता है अब कोई व्यक्ति है जिसको इससे मतलब ही नहीं है कि भैया ईश्वर सर्वशक्तिमान है कि नहीं अगर ईश्वर ने सृष्टि बनाई तो उस समय वो कहां था कहां खड़ा था या इन विषयों पर उसका चिंतन नहीं उसके मन से आवाज ही नहीं आ रही है। यह सब बातें वह सोच ही नहीं रहा है कि मैं 70 साल का हो जाऊंगा तो भोग कैसे करूंगा? रसगुल्ला कैसे खाऊंगा? या जो बॉडी बिल्डिंग मैं आज कर रहा हूं तो अपनी बॉडी कैसे मेंटेन करूंगा? या अगर मैं काम वासना से युक्त हूं तो उस समय अपनी लालसाओं को पूरा कैसे करूंगा? मेरे दांत टूट जाएंगे। मैं वैसा नहीं दिखूंगा। मेरे झुर्रियां आ जाएंगी। वो इन सब बातों पर जब नहीं ध्यान दे रहा है कि कुछ इसके पार भी है या यही अंत है। जब मैं अकेला पड़ जाऊंगा कोई नहीं होगा मेरे पास। उस समय मैं क्या करूंगा इन सब विषयों पर जो चिंतन नहीं कर रहा है और वह क्या क्या कर रहा है? वो यह देख रहा है कि भाई एसी है कि नहीं? टीवी है कि नहीं? मेरे पास कार है कि नहीं? स्कूटर है कि नहीं? वो इन सब चीजों पर ध्यान दे रहा है। तो और फिर आप उससे कहने जाओ कि तुम्हें पता है ईश्वर सब शक्तिमान है कि नहीं? तुम तुम क्या कहते हैं? तुमको इससे मतलब है? ईश्वर सर्वशक्तिमान से परम स्वतंत्र मोक्ष से। तो वो क्या कहेगा भैया मैं एसी लेने जा रहा हूं नया एलजी
00:12:39:10 का मुझे माफ कर तू ऐसे पकाऊ लोग आपको मिलेंगे कि नहीं पकाऊ मतलब जिनके लिए आप पकाऊ ये बातें करने वाले जिनके लिए पकाऊ है वो आपको बहुत मिलेंगे वो सब अश्रद्धावान है तो पहले उनको टटोलिए कि वो अपनी आत्मा की आवाज सुन रहे हैं कि नहीं और यदि वो सुन रहे हैं उनको उन सवालों से मतलब है तब उनको बताइए यदा यदा धर्मस गन भवती भारत अभसम तदन सजा तब उनको बताइए
00:13:14:28 भगवान की शक्ति के बारे में ईश्वर के बारे में ग्रंथ के बारे में तो इसलिए यह वाला जो एक संशय बना रहता है कि अश्रद्धावान को नहीं पढ़ाना ग्रंथ देना है या बात बतानी है भगवान की या ये ये है यह वो है ऐसे नहीं होता है। आपको यह जानना होगा कि वह अपनी आत्मा की आवाज जान सुन रहा है कि नहीं। आपको उसके प्रश्नों से समझ में आ जाएगा। ठीक है? तो अश्रद्धावान कौन है वहां पर उस परिपेक्ष में जो अपनी आत्मा की आवाज नहीं सुन रहा है। जिसको उन प्रश्नों से कोई सरोकार नहीं है। दूसरा समास गणेश स्तुति। गणनायक कर्म सिद्धि फलदायक अज्ञान और भ्रांति का नाश करने वाले बोध रूप। देखिए बोध रूप यानी ज्ञान रूप। गणेश जी को नमस्कार। बस शंकराचार्य भगवान ने क्या किया कि हम जो यह कह रहे हैं ना फाइनली हमको इंफॉर्मेशन चाहिए इंफॉर्मेशन। तो शंकराचार्य भगवान ने कह दिया फाइनली जो इंफॉर्मेशन आपको मिल रही है यह है ईश्वर का अंतिम स्वरूप। उन्होंने इस इस इंफॉर्मेशन से अलग नहीं किया भगवान को। नहीं तो नहीं तो क्या होता कि ईश्वर से भी बड़ी कोई चीज हो जाती इस दुनिया में। समझ रहे हैं? जो लोग कहते हैं ना कि हम बहुत बड़े भक्त
00:14:30:02 हैं। वह अपने ईश्वर को छोटा कर रहे हैं। उनसे बड़ा ज्ञान है जो व्यक्ति को चाहिए। और ईश्वर मात्र एक साधन बन के रह जाता है। तो शंकरा आदि शंकराचार्य जी ने क्या सिद्धांत स्थापित किया? ये जो ज्ञान तुम्हें मिल रहा है ये ईश्वर का फाइनल जो रूप जो तुमको चाहिए जो ज्ञान स्वरूप प्रबोध रूप गणेश जी को नमस्कार।
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क्या शंकराचार्य भी दूसरे संप्रदाय के आचार्यों को सुनने से रोकते हैं? DAASBODH LECTURES
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