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00:00:03:18 तो सभी को जय श्री राम। आज हमारे साथ में हमारे यहां पर हैं विजय श्री। आपने इनके बारे में कई बार चर्चाएं सुनी होंगी। कुछ विवादास विवाद भी चले बहुत सारी चीजें हुई। वो सभी आप जानते ही होंगे। बट आज यहां पर हम लोग बात करने वाले कुछ जो प्रासंगिक विषय हैं जिनके अंतर्गत हमारे धर्म की जो जो सनातन धर्म के जो मूलभूत सिद्धांत है उनका खंडन करने का प्रयास किया जा रहा है जो एक समस्या उन्होंने भी मुझे बताई तो मुझे लगा कि बल्कि हम दोनों को ही लगा कि इस पर हमें हमारी जो सामान्य चर्चाएं जो हम लोग करते हैं धर्म अधर्म को लेकर के जो चीजें डिस्कस होती है हमारे बीच में तो आज उनको हम आपको भी बताएं कि किस तरह से मतलब कौन-कौन सी चीजें हैं जो एक सामान्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से उसके पर्सपेक्टिव से दिखाई देती है। उसको समाज में यह चीजें बोली जा रही है। वो बोली जा रही हैं। तो उनको लेकर के हम आज कुछ डिस्कशन करने वाले हैं जो आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। विजय जी सभी को हर हर महादेव। जैसा कि शिवश जी ने बताया कि आज हम सिर्फ जैसी कॉन्वर्सेशन हम आपस में एक दूसरे के साथ संवाद करते हैं। बस हम इसको रिकॉर्ड करके आपके समक्ष पेश कर रहे हैं जिससे
00:01:18:21 आपको भी पता चले कि हम किन-किन विषयों पर डिस्कशन भी करते हैं और कौन-कौन से विषय आजकल सोशल मीडिया सोशल मीडिया के बाहर चल रहे हैं और यह बहुत सारे प्रश्न सिर्फ हमारे ही नहीं आप सभी के भी हैं जिसके ऊपर हम लोग आज बात करेंगे और शास्त्र की दृष्टि क्या है और कंफ्यूजनंस क्या-क्या आ जाती है उस पर भी बात करेंगे। अच्छा विजय जी मैं मतलब एक चीज मैंने देखी कि आप थोड़ा सा जैसे हम हमारे हमारा जो वो है क्या कहेंगे कार्य क्षेत्र तो हमारा कार्य क्षेत्र ज्यादातर घिरा हुआ है वर्णाश्रमियों से परंपरा व्यक्तियों से और उसमें मतलब हमारे फॉलोअर्स भी ज्यादातर वही हैं जो कहीं रामानुजाचार्य से जुड़े हुए हैं या कहीं अन्य वैष्णवाचार्य संप्रदायों से जुड़े हुए हैं या फिर अपने शंकराचार्य से जुड़े हुए हैं। जी जी तो मैंने आपकी जो प्रोफाइल है तो वो ऐसी है कि उसमें आप विदेशियों से भी जुड़ी हैं। जो नहीं कुछ जानते धर्म के बारे में वो भी आपके फॉलोअर्स हैं। सबसे ज्यादा वही है। हां। तो सबसे पहले तो मैं कहूंगा कि यह जो तथाकथित जो यह वाली संस्थाएं हैं
00:02:33:22 जो कल्ट्स टाइप के बन रहे हैं इस और आर्य समाज या ब्रह्मा कुमारीज आर्य समाज तो उतना इस वाली में नहीं है जो विदेशियों में फैल रहा हो हां आर्य समाज आर्य समाज तो खैर सिकुड़ के रह गया अपने आप में स्कॉन हुआ ब्रह्माकुमारीज हुआ और अगर अनपढ़ लोगों की बात करें पिछड़े हुए वैसे वो आपके फॉलोवर्स नहीं होंगे मगर अनपढ़ पड़ो की बात करें तो उसमें रामपाल हो गए। रामपाल वाले लोग हो गए। तो आपके जो फॉलोअर्स हैं इस तरह के कर्स की क्या इमेज है उनके मन में? जैसे सद्गुरु हो गए ये जग्गी वासुदेव वाले तो ये किस तरह से देखते हैं आपके जो फॉलोअर्स हैं? एक्चुअली होता क्या है कि सब लोग जितने हमने अपने एक्सपीरियंस में देखे कि सबको होता है कि जो अच्छी बात बोल रहे हैं। अरे ये तो अच्छी बात बोल रहे हैं। अरे इन्होंने तो मंदिर बना दिया। अरे इन्होंने तो ये कर दिया। सब एक्चुअली उतनी डेप्थ में जा नहीं पाते हैं क्योंकि उतनी डेप्थ वो खोज भी नहीं रहे हैं। पर अब जो व्यक्ति उतनी डेप्थ खोजेगा तो वो इन छोटी-छोटी ऑर्गेनाइजेशंस के साथ कभी फॉर एवर जुड़ के रह नहीं जाएगा। वो जुड़ के रह जाएगा वो इसीलिए क्योंकि अब उसकी दाल, रोटी और सम्मान सारा उसी उस क्षेत्र से आ रहा है। और पहले उसने रिसर्च की नहीं थी। क्योंकि अगर वो
00:03:48:26 उसको समझ लेगा कि ओ मूल पे क्या काम हो रहा है कि एक तो हुआ ना कि मैंने अपनी एक इमेज बनाई कि मैंने अपनी एक इमेज बनाई कि मैं ये करती हूं मैं ऐसी हूं मैं वैसी हूं। मैंने ये किया वो किया। पर वास्तव में उस इमेज के पीछे मैं क्या-क्या करती हूं उसका ज्ञान होना बहुत जरूरी है। और ऐसा नहीं है कि जो डिजिटली भी जो ऑडियंस है या यंग है या ओल्ड है सभी किसी को कुछ पता ही नहीं है। सबको बहुत कुछ पता है। हम इतनी देर में जो काम करते हैं उसको करके हम यह जाने कि एक होता है ना एक बल्क कमेंट जो होता है। पर ऐसा कभी नहीं है कि सिर्फ लोग गुणगान ही कर रहे हैं। बहुत लोग इन सब लोगों का भी खंडन करते हैं। तो उसको देख के पता चलता है कि हां लोगों को कहीं ना कहीं अंदर में वो चीजें चलती ही है क्योंकि वैसी चीजें आती हैं बार-बार हम और कुछ इस तरह के कांड इस तरह के कर देते हैं ये ऑर्गेनाइजेशनंस। हम कांड ही बोलेंगे कि नहीं भी किसी के मन में ऐसे प्रश्न आने हो तो वो प्रश्न अपने आप ही उठ जाते हैं। उठ जाते हैं। तो हां इस तरह के काफी लोग हैं। ज्यादातर मुझे लगता है कि लोगों को इनफ्लुएंस इनफ्लुएंस रहते हैं।
00:05:04:07 हां इनफ्लुएंस तो रहते हैं क्योंकि अच्छा अच्छा बजट है ना उनके पास। अच्छा उन्हें उन्हें ब्रेक करना उनके जो उनका जो ये फेथ है इन कल्ट्स पर इन तथाकथित सनातना भाषी हम लोग थोड़ा सा क्लियर कहते हैं सनातना भाषी संस्थाओं पर उनका जो फेथ है उसको ब्रेक करने में भी बड़ी दिक्कत लगती है कि कैसे एकदम से अभी इसका फेथ है उस पे हम चोट कर दे गलत कर रहे हो हां ये भी दिक्कत आती है वाली बात है कि एक व्यक्ति ने एक इमेज बना ली उसने कोई दो शब्द भी अच्छे सुने जिससे वो प्रभावित हुआ कुछ सेकंड के लिए तो अब हम उसको उसको बोल रहे हैं कि इन सब से प्रभावित मत हो तो वो अपने अच्छे पलों को याद करता है या उसके दिमाग में जो उसने उसको छोटे-छोटे जो अच्छाइयां की होती है वो उसको याद करता है उसके कंपैरेटिवली उसको भुला देता है जो वो नहीं हो पाता क्योंकि उसको लगता है कि मेजरिटी जो वो अच्छा देख रहा है केवल वही है पर उसे पता ही नहीं है। अच्छा मगर आपने एक चीज और अच्छी कही ये मैं भी अपने लोगों से कहता हूं वो थोड़ा तरीका हमारा अलग होता है। आपका बात करने का तरीका थोड़ा लाइटर है और हम मेरा थोड़ा सा बात करने का तरीका है आक्रामक एक्शन वाला। आप पहले हैं जो ऐसे बोल रहे हैं हमें और सॉफ्ट होना चाहिए। वो फिर वो हो जाता है ना वो उसको
00:06:19:10 कहते हैं रिलेटिविटी। हम हम् तो मैं कहां से देख रहा हूं फिर आपको लोग कहां से देखते हैं उस पे डिपेंड करता है। हां तो मैं क्या है यह वाली जो बात आती है ना कि आपने जो बात कही जिनकी अपनी इमेज बन गई है और उससे उनका धंधा चल रहा है या दुकानें चल रही हैं तो फिर वो उसको बचाने के लिए सारा जीवन लगाएंगे। तो यह ठीक वही है कि जैसे पूज्य गुरुदेव पुरी के शंकराचार्य जी कहते हैं कई बार जगदगुरु शंकराचार्य कि पूरे विश्व की जितनी भी समस्याएं हैं एक डेढ़ घंटे में उसको वो सॉर्ट आउट कर सकते हैं एक डेढ़ घंटे में बट जितने भी जो समुदाय हैं समूह हैं तंत्र हैं उनके जो लीडर्स हैं उनके पास आकर के गोष्ठी कर लें तो लाठी भाले की नो पर नहीं केवल सिद्धांत के द्वारा बहुत ही आसानी से पूरे समाज में शांति व्यवस्था और सुखद वातावरण निर्मित किया जा सकता है। यह गुरुदेव कहते हैं। मगर ऐसा होता क्यों नहीं है? क्योंकि वो जो लीडर्स हैं ना अपनीपनी जो चीजें करके बैठे हैं जो लीडर बने बैठे हैं वो शांति वार्ता वो कभी होने ही नहीं देंगे। वो संगोष्ठी तक पहुंचने ही नहीं देंगे। इतनी चीजें वो पहले ही क्रिएट कर देंगे। अरे तुम तो ऐसे हो, तुम तो वैसे
00:07:34:12 हो। तो ये बताओ पहले ये बताओ ये बताओ तो ऐसी स्थितियां आपके सामने ऐसी असहज स्थितियां उत्पन्न करेंगे कि वो समय आए ही ना क्यों ना आए क्योंकि किसी की तो किसी का तो जीवन ही अब ये हो गया है ना कि भ्रम फैलाओ और खाओ किसी का जीवन ही ये हो गया कि वेदों का खंडन करो और खाओ किसी का जीवन ही हो गया कि भगवान को गाली दो और खाओ या परंपरा प्राप्त आचार्यों को गाली दो और खाओ उनकी पावर भी चली गई ना परंपरा प्राप्त आचार्यों के पास ही सारी पावर आ जाएगी जब उनको पता चलेगा कि ये सब तो मतलब नाटक चल रहा है। तो जब ये शांति वार्ता होने की बात आती है जो कि नहीं हो पा रही है इसको रोकने का जो मुख्य कारण होता है दुनिया में वो यही होता है कि अगर हम इस शांति वार्ता को होने देंगे तो हमारा क्या होगा? तो भैया हमारे तो शटर डाउन हो जाएंगे। तो इसलिए हम कभी नहीं होने देंगे। क्योंकि हमारा जीवन तो ऐसे ही कटना है ना। हमने तो चैनल खोल लिया है शंकराचार्यों की बुराई करने के लिए। हां। गौतम खट्टर और मीनाक्षी रावत की बात कर रहा हूं। यह लोग क्या करते हैं? इनके कभी आपने वीडियो वायरल होते हुए देखे कि भगवान का महिमा मंडन कर रहे हो और इनका इनका वीडियो वायरल हुआ हो। इनके वीडियो कौन से वायरल होते हैं? अरे उन्होंने ये नहीं करने दिया। उन्होंने वो नहीं करने दिया। भाई सारे भड़काऊ भाषण।
00:08:50:07 तो इनका जब उसी से चल रहा है और ये तो चलो का काफी निम्न लेवल के उनके तो पे आए थे। याद है हमने आपको एक बार मैं मैं उसी पे आ रहा हूं मैं। तो, इनके तो काफ़ी अ लो लेवल का स्तर है इनका। अभी मगर इसी में जो पीक पर बैठे हुए जिनका पूरा साम्राज्य बन चुका है, तो वह कभी नहीं इस शांति वार्ता को होने देते। अब इसमें मैं ये बात आपसे जो अभी आपने बोली थी मैं ये पूछना चाहूंगा मतलब ये आर्य समाज तो कहीं का मतलब इस तरह का रहा नहीं है कि कोई इस पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाए। वो तो खुद ही सिकुड़ गया निराकार के चक्कर में। मगर जो इस है जिसने एक बहुत ही व्यवस्थित तरीके से बिजनेस मॉडल एक खड़ा किया है और वो आपको श्राद्ध भी बेच सकता है। वो आपको दीक्षा भी बेच सकता है। वो आपको हर धार्मिक चीज बेच सकता है। भगवान का श्रृंगार करने का पोर्स भी बेच सकता है। कोर्स भी बेच सकता है। दिखाता है उनको वैसे ही बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल। तो यह संस्थाओं का जो बिजनेस मॉडल है उसमें मुझे ऐसा पता लगा अभी कुछ दिनों पूर्व कि यह बिजनेस मॉडल का एक इकाई छोटी सी ऐसी भी है जो होते हमारी गुरु बहन विजय श्री जी तक आ गई तो ये थोड़ा सा दर्शकों को बताइए कि कैसे वो लोग कार्य करते कैसे इन्फ्लुएंस
00:10:05:13 कैसे अपने इन्फ्लुएंसर्स खड़ा करते हैं वो मार्केट में इस के अलग-अलग सबसे पहले हम ये चीज को जान लेते हैं कि कोई मंदिर है एक तो मंदिर का पैसा सरकारों के पास जाता है। है ना? जो दान दक्षिणा आपकी अलग से उनको आप देते हैं वो उन पर ही रह पाते हैं। तो क्या आप कभी सोच सकते हैं कि मंदिर का एक फंड होगा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए, क्रिएटर्स के लिए और अगर ऐसा फंड किसी का है तो क्या वो एक धार्मिक पारंपरिक जगह है या फिर वो एक ऑर्गेनाइजेशन है तो फिर आपको आंसर मिलता है कि वो एक ऑर्गेनाइजेशन है। उनके पास ऐसी फंडिंग है। तो जब उनके पास ऐसी फंडिंग है तो फिर वो क्रिएटर्स को रीच आउट करते हैं। जैसे कि हमें भी किया है और आप पांच छह और नाम ले लीजिए। सबने ही हमें मैसेज भेजा है और हम हर बार मना ही करते हैं। पर इस बार जैसे उनका जो मंदिर था वो मैं खुल के थोड़ा सा बता दूं थोड़ा सा ये उसमें एक वो है ना कि एक नीतिगत चलने का प्रयास कर रही हैं। मगर नीति ये भी है कि आप सच बोले। नहीं हम सच बोल और और मैं आपको थोड़ा स्पष्टता के साथ प्रकाश डाल दूं कि इस के द्वारा इनको कई बार अप्रोच किया जाता है कि उनके अमुक इवेंट का ये प्रचार करें अपने सोशल मीडिया अकाउंट से है ना ये यहां
00:11:20:16 का इवेंट का प्रचार करें वहां का प्रचार करें इसका अर्थ क्या है कि जो वहां पर भक्तगण दान देते हैं या जो भी करते हैं उसका एक हिस्सा इस बात के लिए खर्च होता है कि भले ही कोई कैसा भी हो चलिए ठीक है ये तो शंकराचार्य जी से जुड़ी हुई उनसे दीक्षित उनके अनुगत हैं। कम से कम कभी-कभी मुझे लगता इसीलिए भी मानते हैं। नहीं नहीं नहीं वो आपके प्रोफाइल का जो आंकड़ा है क्योंकि मैं अभी बता रहा हूं वो भले ही कुछ भी करता हो अपनी पर्सनल लाइफ में उससे डजंट मैटर वो आपका प्रचारक बनके घूमेगा। यह प्रयास करते हैं इस ये प्रयास करती हैं इस जैसी संस्थाएं। हां। क्यों? कि आप देखिए जानवी कोई जानवी करके है ना कोई अरे वो तो वो जो आर्य समाज का वीडियो जो आजकल नया कहती है कि नहीं भगवान ने कोई लीला नहीं दिखाई थी उस पे हम बात करेंगे कि जानवी है बोलती है भगवान निराकार है भगवान अवतार नहीं ले सकते मगर जानवी जानवी सिंह कि एक बार वो जो इसान की भी जानवी जी है जिन्होंने बोल दिया कि गीता हिंदू पुस्तक ही नहीं है हां वो वो वो तो वो तो मामला अलग था मगर ये जो है ये वो वाली है जो जो आपको नरेंद्र मोदी जी के साथ भी दिख गई हैं। है ना मेरे ख्याल से। तो ये वो हैं। अब ये इनका क्या था कि इनका सिद्धांत ये था कि भैया भगवान अवतार नहीं ले सकता। भगवान साकार स्वरूप नहीं हो सकता। मगर आज
00:12:35:22 ये भी इस वक्ता बन के दिख रही हैं। हम तो इस क्या इनको इनके इनको जब अप्रोच कर रहा है विजय जी को कि भैया हमारा तुम प्रचार करो हमारे बारे में बोलो। डजंट मैटर कि तुम शंकराचार्य वाले हो। हम डजंट मैटर कि तुम शंकराचार्य के शिष्य हो। भाई तुम इस की फिलोसफी के अकॉर्डिंग वो क्या है वो अभक्त हो आप अभक्त आपने तो भगवान विष्णु की दीक्षा नहीं ले रखी है कोई और आपके ईस्ट हैं तो ऐसे में इस के अनुसार ये अभक्त है मगर अभक्त को भी वो अपॉइंट कर रहा है किस लिए कि पैसा हम आपको दे रहे हैं आप हमारा प्रचार करिए तो ये जो जानवी सिंह जैसे और चेहरे आपको इन्फ्लुएंसर्स दिखाई देते हैं ना ऐसी संस्थाओं का प्रचार करने के रूप में वो आज आप यह सच्चाई जान लीजिए वो वो किस तरीके से जो सोशल मीडिया पर जो सक्सेसफुल अकाउंट्स होते हैं, सक्सेसफुल जो इन्फ्लुएंसर्स होते हैं उनको पैसा देकर के अपना प्रचार करवाते हैं। पैसा भी है और कोलैबोरेशन भी है। हम आपको बताते हैं क्या है। सबसे पहले आपको उनकी टीम के या फिर जिस मार्केटिंग एजेंसी को उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट दिया होता है, वो लोग आपको रीच आउट करते हैं। मैसेज करते हैं। फिर आप उनसे बात करेंगे तो वह आपको बताते हैं कि यह मंदिर है या यह समिट है। यहां पे आपको आना है। कभी-कभी आपको पूरा
00:13:50:24 खर्चा वह उठा लेते हैं और कभी-कभी आपको अपना ट्रैवल एक्सपेंस पूरा खुद उठाना पड़ता है। वहां पर आपका रहना खाना पीना प्रोग्राम्स वो सब वो फ्री कर देते हैं। बदले में उनको आपकी जो इमेज है वो मिल जाती है। आपका टाइम स्क्रीन टाइम मिल जाता है। और सोचिए जो व्यक्ति इंटरेस्टेड है उसको लगता है कि उसके बैनर के अंडर आके उसकी बहुत मतलब फेम बढ़ रहा है। पर बात यहां पे क्या है? हमें जितनी बार भी बुलाया गया हमें तो यह भी बोला था मंदिर के लिए सबसे पहले जो मंदिर था उसके अंदर हमें बोला गया कि आप बताइए कितना आपको चाहिए हम आपको पैसा देंगे आप आके हमारे साथ वीडियो बनाइए हम हम मना कर दिए फिर दोबारा एक एक और एक अलग मंदिर के लिए बोला गया तो हम उस व्यक्ति को ये चारप बार हो चुका है अभी तक क्योंकि हम इस बार एक कोई नई एजेंसी थी तो हमने उन्हें बोला कि आप मेरी एक बात सुनिए। आपको कोई भी चीज मिलती है, कुछ भी चीज है इस से रिलेटेड। आप कृपया मेरा ही नाम ब्लैक लिस्ट में डाल दीजिए कि आपका भी समय बचेगा। हमारा भी समय बचेगा। अब इसमें देखिए उन लोगों की रिसर्च कितनी मतलब खराब है। हमने तो अपने पेज पर उस कौन का जब ये क्या नाम है उसका? जानवी। मुझे
00:15:06:00 पूरा नाम नहीं पता है। एटरर्नल ट्रुथ करके जो लड़की ने ये जब हमारा पाकिस्तान और भारत का वॉर चल रहा था तो ये देवी जी बोल रही थी कि गीता तो हिंदू पुस्तक है ही नहीं। इसलिए आप लोग जो मुसलमान संप्रदाय है वहां का पाकिस्तान का उनको बोल रही थी कि आप पढ़ सकते हैं। हम तो इस पर हमने विरोध किया। उसके अंदर हमने लिखा भी था कि एस्कॉन के जो लोग हैं उनके द्वारा ये किया जाए। इस का शिष्य बोला जाएगा ना कल हम कुछ करेंगे तो वो बोलेंगे शंकराचार्य के शिष्य तो वो पोस्ट के बाद भी हमें ऑफर आए हैं तो हमें कभी-कभी हंसी आती है कि कि मतलब [हंसी] उनको उनको कोई मतलब नहीं है। वो तो अपना कोशिश आप देखिए ना सीधी सी बात है। हां अब जैसे कोई मूवी बन गई हां वो मूवी में वो मूवी के लिए अब वो मूवी के द्वारा अपना जो है वो कर प्रमोशन कराना है अब प्रमोशन कराना है किसका इस्कॉन का अब भले ही वो व्यक्ति संध्या वंदन करता हो कि नहीं करता हो भले ही वो व्यक्ति इस्कॉन के अनुसार ले लें तो 16 माला जप करता हो कि नहीं करता हो भले ही वह व्यक्ति शाकाहारी हो या मांसाहारी हो भले ही वह व्यक्ति मिलेच्छ हो भले ही वह व्यक्ति 20 फीटर हो डजंट मैटर
00:16:21:01 मगर हम उसको को रोकड़ा दे के अपना प्रचार करवा लेंगे। ये ये पॉलिसी है इस जैसी संस्थाओं की और अगर नहीं देंगे तो क्या देंगे? हम बताते हैं। आपका रहना खाना पीना और फिर हम आपको गीता देंगे और वहां पे बड़े इवेंट सेवा करवाएंगे। एक बड़े इवेंट में आपको इंट्रोड्यूस करेंगे। ये सारी चीजें कोलैब जिसको कहते हैं। अब हम क्या बताएं कि हमें तो उनकी गीता चाहिए ही नहीं। है ना? और दूसरी बात एक और है कि मतलब यह भी तो बात है ना कि हम मिसकॉन से कब उखड़े हम तो ऐसा नहीं था कि किसी ने हमें ज्ञान का प्रकाश दिया तो हम उखड़े हम उखड़े तो अपने ही कारणों से थे क्योंकि उसके पीछे भी इस कॉर्न का ही हाथ है। तो एक तरह से हमें इस कौन का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि इस कॉर्न की वो वीडियो के कारण ही आज हम लोग यहां पर हैं। मैं थोड़ा सा रिवाइज कर दूं। लगभग मेरे ख्याल से दो से ढाई वर्ष हो गए होंगे। कुछ इस के लोग थे जो इस की जो मैनपुलेटेड भगवत गीता है वह बेच रहे थे भ्रामक वाली जिसमें उसका भ्रामक अनुवाद किया गया है तो मैंने उनसे कुछ क्वेश्चंस पुट अप कर दिए थे जो उन्होंने कहा था भैया आप वहां आकर के बात करिए वो वीडियो वायरल हुआ था वो वीडियो इन तक पहुंचा इन्होंने भी उस वीडियो को सपोर्ट किया और
00:17:36:07 फिर इस तरीके से कनेक्शन में आई कनेक्शन में आई तो इनके भी जीवन में कुछ ऐसी चीजें थी जो पूर्णतया मतलब शास्त्रों की विपरीत जाती हुई दिखती थी। परंतु मैंने जैसे ही ऐसा नहीं हुआ कि जैसे ही इनसे बातचीत हुई तो मैंने इनको तुरंत बता दिया भैया आप प्रणव का उच्चारण मत करो। प्रामाणिक आचार्य गण मना करते हैं कि स्त्रियों को नहीं करना चाहिए। बहुत पेशेंस में और कभी मुझे ऐसा नहीं बोला कि आप बहुत गलत हैं या ये सारी चीजें गलत है। ऐसा कभी भी नहीं था। वो तो हम ही आपको बोलते थे। हम आपको एक बात बताते हैं। यही मुझसे पूछती थी। और पूछने पर मैं इनको रिप्लाई करता था। जैसे कि ये नास्तिक को क्या जवाब दें? तो मैंने वो जो गुरुदेव के द्वारा दी गई वो परिभाषा वो ज्यों की त्यों इनको चिपका दी थी। हां और सबसे इंटरेस्टिंग बात ये थी क्योंकि इस की इनकी वीडियो थी और हमारा विषय ऐसे था कि उससे ठीक 101 दिन पहले ही हम गए मंदिर में दर्शन करने के लिए। तो हमारा एक भाई ही है वहां पे। तो उसने बोला कि चलो कृष्ण जी के दर्शन करके आते हैं। तो नित्यानंद जी का प्राकट्य महोत्सव वो लोग मना रहे थे। हम तो वहां पर हम लोग गए और मतलब जैसे प्रवचन चलता है प्रवचन चल रहा था अब उनके जो वक्ता थे वहां पे हम उनको वक्ता ही बोलेंगे तो
00:18:51:10 वो बैठ के बोलते हैं कि दुर्गा तो जेलर है जेलर दुर्गा की पूजा करने से मोक्ष थोड़ी मिलेगा क्योंकि मोक्ष तो मिलता है परम आत्मा श्री कृष्ण की पूजा करके तो और हमारे इर्दगिर्द ज्यादातर महिलाएं हम महिलाओं को देख रहे हैं कि महिला है ना तो उसमें दुर्गा का तत्व है और ये क्या बोल रहा है और महिलाएं बैठी हैं और वहां पे जो फिरंग बैठे हैं फिरंग बोल रहे हैं हां हरे कृष्णा तो हमें तो बहुत बुरा लगा तो हमने बात की फिर हमें पता चला कि अच्छा शिव जी के बारे में यह सब बोला जाता है और फिर जो हिंदू मतलब अब वो हो गए थे तो वह हमें दिखा रहे हैं कि देखो देखो श्री कृष्ण अपने आप को यहां पे यह बोल रहे हैं यह है तो फिर जब हमने उनको अपनी तरफ से बोला जो भी हमें अल्प यू नो अल्प बुद्धि को जो पता था कि भाई कृष्ण जी ने तो वो या वो तो रुद्र अभिषेक करके जाते थे पर सामने तो स्वरूप एक ही है। ज्यादा तो मतलब हमें उतना ज्ञान भी नहीं था ना कि बात को रखना कैसे है पर हमें ये समझ नहीं आ रहा था हम और ऐसा नहीं है कि हम कृष्ण के भक्त नहीं है। हमें बहुत प्रिय है कृष्ण जी है ना तो गोवर्धन
00:20:06:12 मठ के तो हम अनुयाई हैं। तो कृष्ण भगवान हमें प्रिय क्यों नहीं होंगे? क्यों? बिल्कुल। तो ये सारी बातें चली और मेरे मन में ऐसे आग लगी और मैं चैन से बैठ ही ना पाऊं और उन्हीं दिनों में यह वीडियो आई और मुझे ऐसा लगा कि वाह कोई तो बोल रहा है। कोई तो कर रहा है। उस समय हमारी वीडियोस में हम अंतिम में थोड़ा प्रणव शक्ति प्रणव का उच्चारण ये सब कर रहे थे। समझ रहे थे चीजों को। तो उस समय हमें ये होता था कि हम कैसे बनाएं क्या बोलूं मैं पर पता नहीं है पर ठीक भी नहीं लग रहा है तो वहां से हम हटे और फिर जो जो कुतर्क वो हमें देते थे हमने आपसे वही सब पूछे कितने दिन पूछे जी जी और फिर आपने धीरे-धीरे जो हमने समझाया तो फिर हमें लगा अरे वाह और मुझे इस बात की बहुत प्रसन्नता है आज मैंने एक दिन देखा जब मैं अभी गोवर्धन मठ गया था तो ये वहां पर चातुर्मास में थी और मैंने देखा कि इनके पास कोई फोन आया था और यह नहीं जानती थी कि मैं भी देख रहा हूं। तो इनके पास कोई फोन आया था तो वे बड़ी ही कड़क आवाज में कह रही थी कि देखिए जब भी अगर इस तरह का कोई आमंत्रण कोई अप्रोच इस की ओर से अगर हो तो मुझे आप फोन मत किया करिए। मेरे सिद्धांत बड़े
00:21:21:18 क्लियर हैं। हम इस को प्रमोट नहीं करेंगे। तो मुझे बड़ा अच्छा लगा कि एक कोई व्यक्ति सिद्धांतवादी जो है अह निर्मित हुआ और उसमें मैं मैं भी कहीं ना कहीं निमित्त बना। गुरु गोविंद ग्रंथ की कृपा से हुआ यद्यपि वो उस उस यात्रा में मैं भी कहीं ना कहीं छोटा सा एक निमित्त बन गया कण का तो मुझे उस दिन बड़ी प्रसन्नता हुई और इनकी जो चीजें थी जैसे एक एक दिन की बात है मुझे याद है कि एक दिन इनका फोन आया कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि प्रणव का उच्चारण नहीं किया जाता [हंसी] तो मैंने कहा कि भाई कि आज क्योंकि आप कहते हो कि गायत्री मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए स्त्रियों को तो मैंने बंद कर दिया या महा महामृत्युंजय मंत्र नहीं पढ़ना चाहिए तो होम नहीं मतलब बंद कर दिया मेरी सहेली ने पूछा प्रणव भी नहीं बोलते हां मगर फिर इनकी किसी सहेली ने इनसे पूछा कि फिर तू प्रणव क्यों बोलती है तो इनको खटक गया कि ये क्या बात है मैं तो प्रणव बोल रही हूं हर वीडियो के अंत में बोल रही हूं प्रणव शक्ति प्रणव और ये बोलती थी और मैं मैं जानता था कि ये गलत है पर मैं उस समय नहीं बोलता था तो फिर इन्होंने मुझे पूछा कि आपने आज तक क्यों नहीं बताया मुझे प्रणव शक्ति प्रणव तो मैंने कहा गुरुदेव ने एक दिन कहा था कि सारा घी एक ही दिन में नहीं पिलाया जाता [हंसी] नहीं तो अपच हो जाती है। तो इस तरह से ये जर्नी
00:22:36:26 कुछ रही तो मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि जो है इन्हें हम प्राप्त कर पाए वापस वहां से जो उस दुनिया में इन्फ्लुएंस्ड हो गई थी। हालांकि ये इनका कुछ प्रारब्ध भी था। इनकी अंदर चीजें थी। जैसे शंकराचार्य इन्होंने जो हमारी जो बातें हुई है शंकराचार्य आदि आदि शंकराचार्य जी के लिए इनके मन के अंदर एक अलग से पहले से एक था एक निष्ठा था। हां और कहीं ना कहीं कुछ अच्छी चीजें जैसे वर्णाश्रम इत्यादि धर्म के प्रति अपनी माता इनकी माता जी का भी मैं बहुत वो करूंगा इनकी जो माता जी हैं उन्होंने इनको जो भी दिया हो मगर वर्णाश्रम धर्म जरूर इनको सिखाया था जिसकी वजह से अपने वर्णाश्रम के लिए बड़ा चिंतित रहती थी ये तो ये सब कुछ अच्छी चीजें जिसके कारण प्रारब्ध पूर्वक ये जो है ऐसे ऐसे यहां तक पहुंची खैर अब थोड़े से वो वो वाले टॉपिक पे आ जाते हैं वो जो मुख्य जो वो विषय थे ना कुछ एलगेशन लगाए जाते हैं भगवान श्री कृष्ण के विरोध में। तो अच्छा पहले मैं एक बात बता दूं कि यह जो जानवी सिंह करके है ना जानवी सिंह जानवी सिंह वही है जो भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप का खंडन करती है अपनी वीडियो में चला देंगे इस वीडियो में कहीं पे हम वो खंडन करती है और फिर फिर
00:23:51:27 वो इस के प्रचारक बन के कैसे आ सकती है कम से कम इस जो भी करता है मगर वो ईश्वर को साकार तो कहता है भगवान के विराट स्वरूप की तो फोटो लगाता है वो बात अलग है कि उसका मंत्र मंतव्य यह हो सकता है कि आगे चलकर के वो भगवान श्री कृष्ण की जगह ईसा मसीह को फिट करना चाहता हो। वो बात अलग है। परंतु अभी तो ऐसा है साकार स्वरूप और कृष्ण है। तो उसका प्रचार कैसे कर रही है वो जो ये मानती नहीं है कि भगवान श्री कृष्ण ने कोई विराट स्वरूप लिया था। ये इट्स ऑल अबाउट मनी एंड बिजनेस। ये साफ है। सबसे इंटरेस्टिंग बात हम बताते हैं। आप खुद देखिए। एक महिला जो मतलब ऐसी महिला आपको केवल इसी ऑर्गेनाइजेशन की मिल सकती है जो जनेऊ भी डालेगी जो हर तरह के प्रपंच को करेगी इसकी सहेली जाके सिर्फ स्टेज पे चिल्लाएगी कभी [हंसी] ना चिल्लाकर भी अपनी बात रखो कभी बिना चिल्लाए सिर्फ प्रभु के गुणगान की भी बात करो निराकार की ही बात कर लो निराकार की अपने ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी जो है मटके निराकार स्वरूप जो भगवान का है उसका जब उसकी जब महिमा कर रहे थे इस बार चातुर मास में क्या भाव बनते हैं? लोग समर्पित हो जाते हैं। पर उसके अलावा इनका जो टारगेट रहता है वो आपकी पारंपरिक परंपराओं
00:25:07:22 से जो आचार्य गण आते हैं जहां पे आप बोलोगे ना आई वांट टू नो द ट्रुथ कि मुझे सच जानना है कि मतलब कैसा है। है ना? कि 2 2 इज 4। मुझे इस तरह का सच जानना है तो आपको यह इन्हीं चीजों से दूर करते हैं। इस ये वीडियो के अंदर हम यह बात को जरूर रखना चाहेंगे। हम कितना लिखें, कितना बोले फिर हम बोलते हैं छोड़िए हम हमें जो वीडियो बनाना है जो सही बात है हम वो लिख देंगे। पर फिर बार-बार बात क्या आ जाती है? पर किसी को कैसे पता चलेगा कि हां ये व्यक्ति गलत है। और दूसरी बात ये है हमारी कोई पर्सनल दुश्मनी तो किसी से है नहीं। है ना? हम बात कर रहे हैं तर्क की कि यहां पे यह बात गलत बोल दी गई है। क्यों? क्योंकि आप एक कंटेंट क्रिएटर हैं और आप कंटेंट बना रहे हैं जिस विषय पे तो आप अपने आप को रिस्पांसिबल कर रहे हैं कि हमें बहुत पता है। हम जो शेयर कर रहे हैं वो सही ही होता है। लिखती भी है ना वो ऐसा। जी। तो जब आप बोल रहे हैं सही ही है। अब जितने भी आपके फॉलोअर्स हैं मैं कह रही हूं आपके 100 फॉलोअर्स हैं। वो 100 लोग आपके अनुयाय की तरह आपको देख रहे हैं। तो आप उनका जीवन क्यों पतित कर रही हैं? गलत ज्ञान देकर, गलत बातें, गलत विचार उनमें
00:26:22:26 डालकर एक ऐसी महिला जो बोले कि श्री कृष्ण की एक लीला है वस्त्र चुराने की। अब उसके वो लीला के बारे में हम लोग कल भी चर्चा कर रहे तो आप बताइएगा पर आपको एक भूमिका बताने के लिए कि श्री कृष्ण वस्त्र चुराते थे। श्री कृष्ण माखनचोर हैं। अब इन लीलाओं का मतलब क्या है? अभी हम डिस्कस करेंगे। पर वो महिला का बोलने का तरीका क्या है? श्री कृष्ण ने तो द्रोपदी को वस्त्र दिए। तो लगता है हां हां हां श्री कृष्ण ने वस्त्र दिए। वो तो बहुत मतलब पूजनीय है। महापुरुष है। है ना? जी। तो फिर उनके अंदर ऐसे वासना वाले भाव क्यों आएंगे? अब कोई इस लड़की को बताओ कि 7 साल 5 साल के बच्चे बहुत सारी शरारतें करते हैं। घर पर भी करते हैं। तो उन शरारतों को यह बोलना कि श्री कृष्ण की 60 साल की आयु में वासना के भाव आ रहे थे। और यह बोल देना कि भगवान के अंदर वासना के भाव नहीं आते हैं। तो वो मतलब अगर भगवान कपड़े किसी के अगर हटा के चुरा के रख रहे हैं तो इसका मतलब वासना है। यही सोच लेना पहले तो गलत है। फिर दूसरी बात यह है कि अब क्या हुआ है? पहले तो हमने गीता के ऊपर ज्ञान देने की वो बनाई वीडियोस कि
00:27:38:07 मेरे साथ आकर भगवत गीता सीखो जिसमें भगवत गीता कम और थिएट्रिकल हा ही ही हू हू हे है हे है ये सब ज्यादा था तो अब आप एक बात सोचिए कि ऐसी महिला जिसको पहले तो यही ज्ञात नहीं है कि जनेयू उसका संस्कार है या पुरुष का संस्कार है फिर उसको बोलो कि अगर आप इतने कॉन्फिडेंट हो तो आप अपने साथ एक टेक्निकल व्यक्ति को ले आइए। आइए आप लाइव पे मतलब बात कर लीजिए अपने प्रूफ दे दीजिए वो वो करेगी नहीं और बोलेगी कि शास्त्र पढ़ के आओ अरे पढ़ के आ रहे हैं हम तो बोल रहे हैं अपने साथ एक मतलब विद्वान को ले आओ हम और देख लेते हैं कि शास्त्रों में क्या लिखा है ऑर्गेनाइजेशंस जब आप पे ऐसे प्रेशर बना बना के बोले कि अपने पर पारंपरिक जगह जहां पे शास्त्र क्या है और उनके गढ़ विषयों को पढ़ाया समझाया सिखाया जाता है उनको बोलेंगे कि शास्त्र पढ़ के आओ तो यह तो बहुत ही फनी बात हो गई है ना? मतलब बहुत हास्यप्रद बात है कि अपने अधिकार के सामर्थ्य के ऊपर कभी प्रश्न नहीं उठाना चाहिए। पर यह वही करेंगे। उसके आगे की बात यह है कि आप बोल रहे हैं श्री कृष्ण के अंदर वासना के भाव कैसे आ जाएंगे? पहले तो आप यह बताइए कि कौन सा ऐसा सात साल का बच्चा है जिसमें वासना के भाव आ रहे हैं।
00:28:53:13 है ना? और दूसरी आपके पास अगर यह लीला चिंतन यह भाव क्या था यह करने का वो आपको ज्ञान नहीं है तो आप ज्ञान लें। अब ऐसे लोग जब कंटेंट बना रहे हैं और उनकी व्यूअरशिप बढ़ रही है और यह आप ऑडियंस के ऊपर भी बहुत डिपेंडेंट है कि जस्ट बिकॉज़ समबडी हैज़ अ लॉट ऑफ़ फॉलोअर्स या कमेंट बहुत ज्यादा है। तो हम आंखें मूंद कर उनको फॉलो मत करें। मुझे भी मत करिए। प्रश्न कीजिए कि क्या है? है क्या ठीक है नहीं है कोई मंत्र दे रहा है हम तब वो मंत्र कर लेंगे हमने वीडियो में देखा इन्होंने बोला यह संस्कार करना है कहां वीडियो में देखा यज्ञ कहां करेंगे गैस पे बलि में यज्ञ करेंगे अपना श्राद्ध कैसे मनाएंगे चावल के अंदर काले तिल डालकर बस छोड़ देंगे कोई कौवा आके खा गया तो उनकी मुक्ति हो गई नहीं खाया तो तो इस तरह की जो चीजें चल रही है इन सब चीजों इन सब चीजों से निपटने का बहुत अपना साधारण सा और बड़ा सटीक वो रहता है। खैर आपने तो अच्छा व्याख्यान दिया है। ही कम लाइट [हंसी] कम टू लाइट और हम एक बार वापस जरा श्री कृष्ण की बात पर जाते हैं क्योंकि कल हमारी चर्चा चल रही थी
00:30:08:14 इस में तो नहीं पर हां हम समझना चाहेंगे कि चलिए समझते हैं। अब ये माता जी तो देख ही रही होंगी देवी जी ये वीडियो क्योंकि इसके कट्स तो हम डाल ही देंगे। तो आइए हम भी आपको समझाते हैं कि श्री कृष्ण के जो वस्त्र चुराने की लीला है उसके पीछे का रस चिंतन लीला चिंतन क्या है ताकि है तो वो है तो वो हिंदू ही थोड़ा बहुत समझना चाहे तो समझ लें तो आप थोड़ा बहुत समझना चाहे तो समझ लें क्योंकि ना तो हमारी व्यक्तिगत आपसे कोई दुश्मनी है पर जहां पे आप धर्म का टैग लगा के सों को इधर-उधर गलत दिशा में लेके जाएंगी तो फिर हम भी धर्म का टैग लगा के बोल देंगे। यह गलत है। देखिए सबसे पहले तो सनातन के मूल पांच सिद्धांत है जो हमने अपने कई वीडियोस में बताए हैं। मैं उस पर अभी यहां पर बात नहीं करने वाला हूं। उन मूल सिद्धांतों से जो भी कोई व्यक्ति वह पांच सिद्धांतों से जो भी कोई व्यक्ति संस्था तंत्र विरुद्ध हो जाएगा तो वह कहीं ना कहीं आपको आपके धर्म से और अगर आपको आपका धर्म नहीं बोलना है सनातन धर्म नहीं बोलना है तो आपके जीवन के कल्याण से इतना तो चलेगा आपके जीवन के कल्याण से वो आपको
00:31:23:15 दूर ले जाएगा। ठीक है? अब जहां से यह जानवी जी इन्फ्लुएंस्ड हैं आर्य समाज से आर्य समाज की जो फिलॉसफी है, जो थ्योरी है उसको मानती है। यद्यपि वो कई मोड़ पर जाकर के उनके द्वारा ख्यापित होने वाला जो ईश्वर है वो बाधित हो जाता है और ईश्वर की सबसे बड़ी एक डिमांड है कि वो अबाध्य है। वो कहीं भी बाधित नहीं होना चाहिए। तो अवतार को लेने के ना लेने के चक्कर में उनका ईश्वर कहीं ना कहीं बाधित हो जाता है। जिसका वो जवाब नहीं देते हैं। फिर वो यह कहने लगते हैं कि ईश्वर को अवतार लेने की आवश्यकता क्या है? फिर मैं यह पूछता हूं कि दुनिया बनाने की आवश्यकता क्या है? वेद देने की आवश्यकता क्या है? भाई वो डायरेक्ट मन में ज्ञान दे दे। मंत्र देने की आवश्यकता क्या है? सबके अंतःकरण में ज्ञान दे दे और दिया है। फिर आवश्यकता क्या है? आवश्यकता तो उसको किसी चीज की नहीं है। ये तो उसका स्वरूपभूत लक्षण है। कारण वही है। उसको तो आवश्यकता है ही नहीं किसी चीज की। ये तो उसकी शक्ति का केवल एक लक्षण है। उसके पास आंख क्यों देखती है? क्योंकि उसके पास देखने की क्षमता है इसलिए देखती है। हां। तो इसको सरल में हम ये बता देंगे क्योंकि कुछ ऑडियंस हमारी भी होगी यहां पे। उनका कहने का यह तात्पर्य है कि आर्य समाज अवतार भगवान अवतार लेते
00:32:38:19 हैं। श्री कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनमें नहीं मानते। वो कहते हैं वो बस एक महापुरुष थे। तो जो हमारा सिद्धांत सनातन धर्म का यह है कि ईश्वर वही है जो सब कुछ कर सकता है। यह वैलिड नहीं रहता है। तो जो जहां पर भी चाहे अब्राहमिकल मतलब फिलॉसफीस हो या कोई भी आपकी जो ये ऑर्गेनाइजेशंस है ना सनातन धर्म का चोला वाली ऑर्गेनाइजेशंस आप उनके सिद्धांतों में सिर्फ एक चीज देखिए कि क्या इनका ईश्वर सब कुछ कर सकता है। अगर नहीं कर सकता है तो मामला गोलमोल है। सिंपल किसी भी गलत जो कल्ट है उसको पहचानने का बहुत साधारण सा तरीका है। जो गलत कल्ट होगा वह सनातन सर्वशक्तिमान ईश्वर के विरोध में जब बात कर रहा होगा तो उसको एक नया ईश्वर बनाना पड़ेगा और उस उसका वो जब नया ईश्वर बनेगा तो वो सनातन नहीं होगा तो वो सर्वशक्तिमान नहीं होगा। कहीं ना कहीं उसमें कटिंग आ जाएगी। जैसे इस्लाम का ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। उसकी मूर्ति पूजा नहीं हो सकती। आर्य समाज का ईश्वर अवतार नहीं ले सकता। उसकी मूर्ति पूजा नहीं हो सकती। हां, मूर्ति पूजा में नहीं मानते। इस का ईश्वर जिस प्रकार दूध से दही बन सकता है, पर दही से दूध नहीं, उसी प्रकार कृष्ण से शिव बन सकता है। मगर शिव से कृष्ण नहीं तो ये भी बाधित हो गया। वो भी सर्वशक्तिमान
00:33:53:27 है और भी बहुत सी चीजें हैं। अभी जानवी जी को तो इस में बुलाना ही था। अभी हमारे दिमाग में ये बात आई पूछिए। क्यों? हम क्योंकि चाहे वो फाउंडिंग फिलॉसफी उनकी आर्य समाज की है पर गीता के ऊपर जो प्रचार पे रील्स बनी है वो इस गीता के साथ बनी है तो ये ये कुछ सिद्धांत विहीनता होती है सिद्धांत विहीन लोग होते हैं उनके अपने कोई सिद्धांत नहीं होते हैं बस जिधर उनको वो जो उनका जो भी उनकी चीजें हैं जो भी उनकी आसक्तियां हैं वो जहां से उनको प्राप्त हो रही हैं वो उसी के अनुसार काम करने लगती है। जैसा इन्होंने बताया भाई सिद्धांत देती हैं वो आर्य समाज के भगवत गीता दिखाती है इसको। खैर ये दो ये त्रयाचरित्र क्यों है ये तो वही जाने है कि नहीं है। चिंतन पर आते हैं। हां तो अब हम लोग इस पे आ जाते हैं तो पहला पॉइंट क्या आया कि ईश्वर यदि सर्वशक्तिमान है तो उसका अवतार लेना आवश्यक है। उसका सगुण साकार स्वरूप होना आवश्यक हो जाता है। दूसरी बात ये आ जाती है कि अगर हम इस बात को ना भी माने कि उसका जो आर्य समाज का ईश्वर है वो अवतार नहीं ले सकता। मगर इतना तो मानता है कि वो सर्वव्यापक है। हां। इसमें तो कोई कंट्राडिक्शन नहीं है। सर्वव्यापक मानता है ना। तो जब कोई स्त्री दुनिया में कहीं पर भी नहा रही है, स्नान कर रही है, कुछ कुछ भी कर रही
00:35:09:01 है तो क्या आर्य समाज का ईश्वर देख रहा है कि नहीं देख रहा है? सर्व्याप्त है। तो देख रहा है ना? यानी कि उसको भी यह मानना पड़ेगा कि हमारा भी ईश्वर देखता है। तो जब उसका ईश्वर देखने पर उसने दोष नहीं माना तो सगुण साकार ईश्वर के द्वारा देखे जाने पर दोष क्यों मान लिया? हां। दुनिया में ऐसा कुछ है ही नहीं जहां ईश्वर इनवॉल्व नहीं है। आ जाना बात कर लेना। संसार में कोई माई का लाल तो ऐसा होगा जो शायद आने की सामर्थ रखता हो। कि यहां पर ईश्वर नहीं है। [हंसी] जो इन इन इन विषयों में बात करने का सामर्थ्य रखता हो तो आना भाई। कोई तो होगा आर्य समाज में ऐसा जो आकर के ये सामना करने का सामर्थ रखेगा। ये लोग बबका लेते हैं। मैं अभी कुछ दिन पहले एक मातृशक्ति है आर्य समाज थी। उनके पास गया उनके साथ बहुत देर तक वार्ता हुई। माता हम और वो शुरू में ही बातें फोर मैनी की करने लगी। बहुत सारी अच्छी-अच्छी। अरे हम शास्त्रार्थ की चुनौती देते हैं शंकराचार्यों को ये है वो है तो उनको जब तक मैंने एक घंटे जब जब तक अपनी चीजें जो उनसे प्रश्न पूछने थे पूछे और वो चर्चा YouTube पर डली हुई है। अंत में जब वो उनका ग्लूकोस लेवल बिल्कुल लो हो गया था। जो उनका वो होता है ना अंदर जो
00:36:24:12 जहां से एनर्जी जनरेट होती है बॉडी में वो उनका बिल्कुल डिप्लीट हो चुका था। ग्लूकोस लेवल बिल्कुल उस एक घंटे की चर्चा में वो हो गई थी। अब उनको अब जल्दी ग्लूकोस चाहिए। चाय के रूप में, मीठा मीठे के रूप में, चीनी के रूप में या जो भी हो ग्लूकोस उनको अब चाहिए। कार्बोहाइड्रेट्स उनको चाहिए थे। ऐसा हो गया। हां। लास्ट में वो मुझसे कहते हैं चर्चा पूरी होने के बाद जब मैंने अपना अच्छे से करना था जो कर लिया था। उसके बाद वो लोग मुझसे कहते हैं अरे हमें आपस में ये सब करने की क्या जरूरत है? हमें तो इस्लामियों से विधर्मियों से टकराना चाहिए। तो फिर आप बंद तो मैंने कहा कि भाई शुरू में आप कहते हैं कि हम मुसलमानों को शास्त्रार्थ की चुनौती दे देते हैं। तुमने क्यों कहा शंकराचार्यों को शास्त्रार्थ की चुनौती देते हैं। सही बात है। तुम लोग कहते हो कि हम विधर्मियों से लड़ते हैं, विधर्मियों से लड़ते हैं। मगर स्मारक बनाते हो तो वहां लिखते हो कि हमने यहां पे हिंदुओं को हराया था शास्त्रार्थ में। क्यों नहीं लिखते हो मुसलमानों को हराया था? हां। तुम अपनी पब्लिसिटी करते हो किस बात पे? कि हमने जो परंपरा प्राप्त आचार्य गण है, ब्राह्मण है उनको हराया। हां। और फिर चाहते हो कि तुमको हम लोग इसलिए तुमसे तुम्हारी चीजों पर काउंटर ना करें क्योंकि तुम ये पाखंड करते हो कि हम जो है विधर्मियों से लड़ते हैं। अरे भाई विधर्मी हम पर हावी होते क्यों हैं?
00:37:39:13 क्योंकि हम अपने सर्वशक्तिमान ईश्वर को को छोड़ के अलग-अलग ईश्वर बना करके और उसके नाम पर बट जाते हैं। इसलिए विधर्मी हम पर हावी होता है। इसका मैंने एक और कारण देखा है। लोगों को बहुत मोह रहता है कि वो कहीं पे आए जाए तो उनकी मतलब आचार्य की या गुरु की पूजा या उसके सम्मान से ज्यादा उन्हें यह होता है कि वो किसी जगह आए तो उनको ये सारी चीजें प्राप्त हो जाए। अब वो यह भूल जाते हैं कि आप कोई नहीं है। आप वहां जाइए, दर्शन कीजिए। जो ज्ञान प्राप्त करना है वो कीजिए। पर वो चाहते हैं कि उनके सोशल स्टेटस उन चीजों से बढ़े। तो अब ये जो ऑर्गेनाइजेशंस होती हैं ये ऐसे ही कमजोर दिल, व्यक्तित्व और बुद्धि वाले लोगों को अपना स्टार बना देते हैं। और जब व्यक्ति स्टार बन जाता है, उसका रस, उसका स्वाद उसको चिपक जाता है, उसकी वृत्ति वहां से हटती ही नहीं। बिल्कुल। तो यह संस्थाएं मतलब आपको आपके भोग के साथ अध्यात्म देने वाली चीजें करती हैं। अध्यात्म का नाटक आध्यात्म दिया। आपको ऐसा लगता है कि हम आध्यात्मिक हो रहे हैं और होता यह है कि आप ओशो बन रहे हैं। देखने में क्या लगेगा जिसे कुछ नहीं पता है। भवन चल रहा है। वाह। क्रांति की बातें चल रही हैं। अरे वाह। और ये हमेशा आपको
00:38:54:21 दहेज, फीमेल एंपावरमेंट है ना? इन सारे टॉपिक्स मतलब सिविल टॉपिक्स को आध्यात्मिक टॉपिक्स के साथ मिक्स करके आपको क्वेश्चन करने पर मजबूर कर देंगे कि आप किस कम्युनिटी से आए हैं। इंस्टेड ऑफ आपको यह रिमाइंड करवाने के लिए कि हमारी सिविल जो पूरी सोसाइटी है वो एक्चुअल में क्या है और इध्म उसका कितना बड़ा पार्ट है और गर्व से हमें बोलना चाहिए कि हम हिंदू हैं। बिलकुल बिलकुल बिलकुल अब मैं थोड़ा सा वह जो सैद्धांतिक विषय चल रहा था वह पूरा कर दूं। तो यह चीज हमने समझ ली कि भाई अह ईश्वर क्योंकि सर्वव्यापी है सर्वत्र है। दुनिया में सब कुछ जो भी घट रहा है उसका कारण है। इसलिए ईश्वर किसी किसी रूप में ऐसी लीलाएं भी करके दिखाते हैं जिससे कि हम ये समझ सके कि सब चीजों का कारण ईश्वर ही है। इसको हम जो है जड़वत होकर के मान सके। अब जड़वत होकर के मानने वाली बात क्या है कि चलो ठीक है कुछ लोगों का ध्यान निराकार में लग भी जाता है। यद्यपि वो एक अलग व्याख्या है कि ध्यान लगता किसका है? अच्छा ध्यान पर भी एक लॉजिक है। ध्यान अपन कभी सुनिए ध्यान पे एक लॉजिक है। ध्यान लगने का मतलब क्या है? ध्यान आप अगर किसी पे लगा रहे हो ये लोग कहते हैं कि वो एक देसी कैसे हो सकता है?
00:40:10:00 अगर वो सर्वत्र व्याप है तो वो एक देसी कैसे हो सकता है? वो बात अलग है कि आलू से इंसान कैसे जन्म ले सकता है? क्योंकि आर्य समाज कहता है कि जो पहला इंसान उत्पन्न हुआ तो आलू से हुआ है तिब्बत में [हंसी] तो वो अपने हिसाब से अच्छा मैंने अभी एक आर नहीं मानते हैं ये बात हम से नहीं आए मैंने अभी एक आर्य समाज के चैनल पर एक पिक्चर देखी जिसमें स्वामी दयानंद जी की तस्वीर दिखाई गई थी तो दो सांडों को पकड़ के कंट्रोल कर रहे थे अकेले हम मुझे नहीं लगता कि वो बहुत बड़े पहलवान थे कि नहीं थे मगर अगर साइंस के उससे देखेंगे तो दो सांडों सांड को एक जो सामान्य व्यक्ति है पहलवान भी नहीं है वो वो कंट्रोल नहीं कर सकता तो फिर वहां पे आप चमत्कार को यूज़ कर रहे हो कि नहीं वहां पे आप कह रहे हो ना कि हम पर चमत्कारिक रूप से हमारे अंदर बल है जिसका कारण हम सांड को कंट्रोल कर रहे हैं वो भी एक नहीं दो एक साथ तो आप चमत्कार का अपने अपने कन्वीनिएंट के अनुसार आप चमत्कार को एक्सेप्ट कर रहे हो तो खैर उस पे आ जाते हैं कि वो एक जगह कैसे आ सकता है तो ये जो सर्वत्र व्याप्त होने वाली बात है ना कि सर्वत्र व्याप्त होते हुए वे एक जगह कैसे आ सकता है? तो इसमें यह वाली बात आ जाएगी कि ईश्वर यदि सर्वत्र व्याप्त है तो फिर आप ध्यान लगाओगे किसका? सर्वत्र पे ही ध्यान लगाओ। फिर ध्यान
00:41:25:03 लगाने की बात ही नहीं रह जाती। हां। भाई ध्यान तो हम तभी लगा रहे हैं ना हमको इस चीज पे ही नजर रखनी है। इसके अगल-बगल नहीं रखनी है। यानी कि यहां जब हम ध्यान लगाने की बात कर रहे हैं तो हम सर्वत्र की बात नहीं कर रहे हैं। तो आप भी तो एक देसी ये बात कर रहे हो। या तो आप ध्यान लगाने की बात ही मत कहो। सब सब जगह देखो। दीवार भी देखो, एसी भी देखो, पंखा भी देखो, कूलर भी देखो और वो मूवी आ जाए कोई हां सब जगह व्याप्त है तो सब जगह देखो ईश्वर को। ध्यान लगाने का तो मतलब ही है कि वो एक देसी हो रहा है। इसके साथ ही साथ ये एक देसी वाली बात में एक चीज और है कि जब वो सर्वत्र व्याप्त है तो उसका एक ही शब्द कैसे हो सकता है? नाम। ये लोग कहते हैं कि प्रणव जो है वो ईश्वर का नाम है। हां। ठीक है? तो जब वो सर्वत्र व्याप्त है तो लकड़ी भी उसका नाम है। माइक भी उसका नाम है। सब कुछ उसका नाम। उसका कोई एक नाम कैसे हो सकता है? एक नाम तो तभी हो सकता है जब वो जो कुछ चीजों से वो अलग हो जाए। तो जब आपने उसको एक अलग से नाम दिया है तो ये भी तो उसका अवतार ही हो गया। ईश्वर का शब्द के रूप में। ये तो चलो हमारी ऑडियंस को ये तो इतनी डीप बात में अब क्या लेके जा? हां। तो मैं मैं इसको जरा वो हल्का हल्के हल्की वाली बातें करूंगी। ये ये जो जिसके लिए हम बोल रहे हैं उन्हें समझ आएगा। खैर साइड समझ आएगा। पर हमारे भोलेभाले फॉलोअर्स जो बस समझने आए
00:42:40:04 हैं क्या है और क्या नहीं। खैर मैं मैं एक बात करके खत्म कर दूं। तो भगवान कृष्ण के रूप में ईश्वर ने ऐसे चमत्कार करके दिखाए। वो चीजें करके बताएं जो वो आपको बताना चाहते हैं कि मैं यह भी कर सकता हूं। मैं वो भी कर सकता हूं। तो वो आपको वो बता रहे हैं। मैं सर्वत्र हूं। मैं सब कुछ देख रहा हूं। अब तुम नहीं मान रहे हो मैं देख रहा हूं तो मैं आकर तुम्हारे सामने सगुण सगुण साकार हो करके तुमको बता रहा हूं कि मैं देख रहा हूं। ये तो रहा आदि दैविक आध्यात्मिक अर्थ। अब व्यवहारिक अर्थ भी है कि भाई महिलाओं को ये सिखाना था उनको कुछ स्त्रियों को। एक बार आप सिर्फ इसी का जो हमने कल बात की थी ना मैं वही बता रहा हूं कि वो व्यवहारिक अर्थ भी है उसका। इन लीलाओं के तीन अर्थ होते हैं। आदि दैविक, आदि भौतिक और आध्यात्मिक। तो आध्यात्मिक और आदि दैविक तो हमने समझ लिए। अब जो आदि भौतिक अर्थ है यानी व्यवहारिक क्या है? तो व्यवहारिक यही था कि उन्होंने उन्हें कुछ स्त्रियों को सबक सिखाना था कि वह जो है निर्वस्त्र होकर के स्नान करती थी तो वो ना करें। मगर इसके पीछे ये भी कारण है कि वो आपको बताना चाह रहे हैं कि मैं सर्वत्रों में सब कुछ देख रहा हूं। मुझसे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। वो साधु वाली कहानी आपको याद होगी। दो शिष्य होते हैं, दो मतलब युवा होते हैं, वो जाते हैं किसी संत के पास और वो जाकर के कहते हैं हमें अपना शिष्य बना लो। संत का नाम मुझे
00:43:55:08 याद नहीं आ रहा है। शायद हमारे पुराणों में ही कोई कथा है यह। तो वह कहते हैं कि ऐसा है मैं तुम्हें दो हंस दे रहा हूं मट्टी के। इनको वहां जाके इनकी गर्दन तोड़ दो जहां तुम्हें कोई देख ना रहा हो। तो वो जाते हैं और जाते-जाते जाते जाते घूम के सबसे छिपने की कोशिश करते हैं। मगर कोई चिड़िया देख रही है। कहीं कुछ शाम को थकार के वापस आ जाते हैं और बाबा उनसे कहते हैं गुरु जी क्षमा करिए। पर यह तो हम नहीं कर सकते। क्योंकि अगर संसार में कोई नहीं देख रहा है तो मैं तो देख रहा हूं। उसको तोड़ते हुए तो ईश्वर कहीं कुछ ना देख रहा हो ऐसी कोई जगह ही नहीं है। यही बात आपको ईश्वर बता रहा है कृष्ण के रूप में आकर के कह भी रहा है भगवत गीता में कि जो लोग मुझे मानव देह में देख कर के मेरे ब्रह्मत्व को भूल जाते हैं। मेरे भगवान मेरे भगवान होने को भूल जाते हैं। वो लोग मूर्ख हैं। वो आपको शरीर धारण करके कुछ बता रहे हैं। समझा रहे हैं उसको समझने का प्रयास करिए। इस तरीके से करके अपना लाइफ का जीवन का पंचर मत करिए। [हंसी]
00:44:56:28 वही बात है कि आपको शरीर धारण करके कुछ बचा बचा बचा रहे हैं बता रहे हैं। अब सोचिए अब ये सारी भगवान आध्यात्मिक और इन सारी लीलाओं में ये जो मैंने तीन आपको बहुत जटिल वर्ड बताएं इनका चाहे इंग्लिश मीनिंग ये बता सके आदि दैविक आदि भौतिक और आध्यात्मिक मगर मैं जो है आपको एक अर्थ बता दे रहा हूं बहुत सरलता से कि ये सारी लीलाओं में ये सब अर्थ तो छुपे होते हैं मगर एक अर्थ वो है जो हर लीला में छुपा होता है और वो अर्थ क्या है ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है हमारा सारा ईश्वर अब है। अगर कोई कहे कि वो जन्म नहीं ले सकता तो वो श्री राम कृष्ण आदि के रूप में जन्म लेता है। अगर कोई कहे कि वो अपनी देह का नाश नहीं करके दिखा सकता तो वो इन्हीं रूपों में अन्य रूपों में आकर के अपनी देह का नाश करके भी दिखा देता है। अगर कोई कहे कि वो मत्स्य नहीं बन सकता। वो मछली नहीं बन सकता तो मत्स्य अवतार लेता है। कछुआ नहीं बन सकता। खून अवतार लेता है। कोई कहे कि वो जो है आधा जानवर आधा इंसान नहीं बन सकता। वो नरसिंह बन जाता है। वराह बन जाता है। और कोई अगर यह कहे कि वो झूठ नहीं बोल सकता, छल नहीं कर सकता तो वो कृष्ण बन जाता है। और अगर कोई कहे कि वो भैया केवल सत्य
00:46:12:07 नहीं बोल सकता तो वो राम बन जाता है। यह है हमारा ईश्वर जिसके सामने दुनिया के द्वारा कल्पित जितने भी ईश्वर खड़े हुए हैं सनातन के विरोध में वो सारे ईश्वर पानी मांगते नजर आते हैं। हमारे ईश्वर के सामने एक लाइन है जो नहीं लिखी जा सकती है कि दुनिया में कोई ऐसा कार्य है जिसके कारण ईश्वर के लिए कहा जाए ही कांट डू इट ये सनातन ईश्वर के लिए नहीं कहा जा सकता ही कांट डू इट और शी कांट डू इट हमारा ईश्वर सेम टाइम में पुरुष और स्त्री दोनों अवतारों में आके भी दोनों अवतारों में पूर्ण भी रहता है। बिल्कुल बिल्कुल तो कहां पे ऐसा तो कहीं नहीं मिलता है। तो जो हमने अभी एक लीला को समझा कि निराकार वह हमेशा है ही पर उस समय में एक लेसन सिखाना कि महिलाओं को क्या अपनी मर्यादा रखनी चाहिए नहाने के समय क्योंकि आगे आते हुए कितने पाप हो जाते हैं महिलाओं के साथ। आज तो वो कान्हा थे। सात आयु के बाल बच्चे थे। तो वहां से उनको सीख के क्या महिलाओं को ये चिंतन में नहीं आया होगा कि शायद कोई और भी हम पर दृष्टि डालता होगा। अगर कोई और पुरुष ही वासना से युक्त हमारे वस्त्र
00:47:27:10 उठाकर ले जाता हम क्या करते? अगर उस उस तालाब में कोई जानवर आ जाता हमें तुरंत भागना पड़ता तो हम क्या करते? तो ये सारा जो रस है ना अब इसके अंदर भाव विभोर होने के लिए तो और हमें महात्माओं के पास बैठना पड़ेगा। मेरी वाणी तो वैसी नहीं है। और हमने आपको ज्ञान दे भी नहीं पाएंगे क्योंकि हम असमर्थ है इस पर हम आपको एक मतलब छोटा सोशल चीज बता रहे हैं कि इसके पीछे का कारण यह है मूर्ख और तू कहां ये बोल रहा है कि सात आयु के सात साल की आयु के कृष्ण के अंदर वासना आ गई और यह गलत है क्योंकि उन्होंने तो द्रोपदी को वस्त्र दिए थे और अगर आप द्रोपदी को वस्त्र देने की बात कर रहे हैं और वहां पे चमत्कार की बात कर रहे हैं तो फिर आप वहां पे सात आयु के सेम भगवान कृष्ण की चमत्कारी लीला के बारे में माइनस क्यों बातें कर रहे हैं? अब एक बात और आ जाती है लास्ट में मैं अपनी ये जो बात हुई ना कि वो अच्छा फिर एक और बात थी ना उनकी कि वो माखन चोर नहीं है क्योंकि वो कुछ चुरा नहीं सकते। अरे वो तो छलियां है। हम कुछ चुरा नहीं सकते। देखिए क्या हो रहा है ना आपके ईश्वर के साथ क्या-क्या लिमिटेशंस लग रही है।
00:48:42:14 पहले तो वो आपको पहले तो वो आपके ईश्वर पर अटैक कर रहे हैं कि चोरी गंदी बात है। आपको हमने एक चीज सुनी थी हम उसको शेयर करना चाहते हैं। ऐसे बात हो रही थी महात्माओं में तो एक्चुअली गुरुदेव ने ही बोला था ये तो गुरुदेव ने बोला अरे कृष्ण क्रांतिकारी थे। सब माखन और दूध कंस के पास चला जाता है। इसीलिए चुरा लेते थे। अब बोलिए। अब वो चुरा रहे थे। वो गलत जा रहा था या वो सही था। आप भगवान पर प्रश्न चिन्ह लगाने से पहले उनकी लीला और उनके अर्थ को समझने की कोशिश करिए। बिल्कुल पहले समझिए कि ईश्वर है क्या? जीव की चाह का वास्तविक विषय ईश्वर है। हां और ये लीला को जो पुराणों की कथाएं हैं यही होता है। जब आप एक सामर्थ्यवान सामर्थ्यवान गुरु से नहीं सीखते। यही सीखते हैं क्योंकि दूसरे गुरु आपको बताते हैं तो गंदी बात लिखी है तो आप बोलते हो हां चोरी तो गलत है इसमें पर जो समर्थवान होता है वो आपको इसका लीला चिंतन इसमें गूढ़ता क्या है रहस्य क्या है इसका रहस्य क्या है वो बताता है और सनातन धर्म का सारा का सारा ज्ञान रहस्य पर ही है इसीलिए गुरु गीता में लिखा है कि मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है यदि आपका
00:49:57:20 कोई प्रामाणिक एक गुरु नहीं है। तो इसमें अब 100 की सीधी एक बात आ गई जो मैंने अभी बीच में छोड़ी थी कि जब सब कुछ भगवान है सर्वत्र भगवान है तो उसका कोई एक नाम कैसे हो सकता है? तो कहा भाई वो प्रणव प्रणव है। ये मानते हैं आर्य समाज तो वो एक नाम कैसे मानते हैं कि प्रमाण है इसका। ठीक। अब प्रमाण पे आ जाते हैं। तो प्रमाण आपको जो आप जो आप परम प्रमाण मान रहे हो वेद मिला कैसे? कहां से मिला भाई? एवं परंपरा प्राप्तिम मुंडकोपनिषद में एक से लेकर चार तक ऋषि अपनी परंपरा बता रहे हैं। जो भगवत तुल्य महात्मा गण है वो अपनी ऋषि गण अपनी परंपरा बता रहे हैं। भगवान बता रहे हैं परंपरा से प्राप्त ज्ञान होता है। पुराणों में तो भरभर के है परंपरा का बात। तो जब आप पौराणिक लीलाओं का अर्थ करने चलते तो उसमें ही लिखा है कि परंपरा से करो इनका अर्थ। तो कम से कम पौराणिक लीलाओं का अर्थ तो परंपरा से कर लो। तुम्हें अगर जहां पर नहीं मिल रहे कोई ऐसा ग्रंथ मिला जो परंपरा से नहीं लिखा है उसका अर्थ तुमने अपने मन से कर लिया चलो मान लिया हालांकि वो भी तर्क संगत नहीं है मगर कम से कम जिस बुक में लिखा है मेरा अर्थ ऐसे ही करना तो ही समझ पाओगे उस बुक का अर्थ तुम अपने मन से क्यों कर रहे हो गाइडलाइन है ना कि मेरे बुक के अंदर ये
00:51:12:21 जो वोकैबलरी है इसको समझने के लिए आपको यहां जाकर इनसे ये समझना पड़ेगा तो ही आपको समझ आएगा जैसे पीएचडी का जो सम है वो दूसरी कक्षा का टीचर आपको नहीं सिखा पाएगा। तो अब जब पुस्तक ही बोल रही है कि मुझे समझना है तो यहां जाओ पर वो व्यक्ति वहां ना जाकर उसमें अनर्गल बात उसकी कुछ बातों का दुरुपयोग करके और जो है आपको आपके ही सनातन सार्वभौम सिद्धांत जो सौंदर्य है सनातन का उससे आपको दूर कर रहा है। क्यों? अपनी दुकान चलाने का अपना शटर खोले रहने के लिए। तो कहने का अर्थ यह है सीधी सी बात है अगर आप इसको प्रमाण मानते हैं कि उसका जो शब्द है वो वो है प्रणव है ईश्वर का और यह प्रमाण है वेद में तो वो वेद आपके पास आए कहां से हैं परंपरा प्राप्त गुरुओं से तो यदि आपको उनके द्वारा दिए गए ग्रंथ पर विश्वास है तो उनके द्वारा उस ग्रंथ के बताए गए अर्थ पर विश्वास ना होना सिद्ध नहीं होता और यदि आपको उनके द्वारा बताए गए ग्रंथ के अर्थ पर विश्वास नहीं है तो उनके द्वारा दिए गए ग्रंथ पर विश्वास होना सिद्ध नहीं होता यह होता है टू स्टॉप द ट्रेन पुल द चेन
00:52:27:15 हां। तो और इससे हमें क्या सीखने को मिलता है कि जस्ट बिकॉज़ किसी के सोशल मीडिया पे बहुत सारे फॉलोवर्स हैं। व्यूज ज्यादा आ रहे हैं कमेंट में। बस प्यारप्यार वाली इमोट कॉन्स या फिर जो भी चल रहा है वह चल रहा है। तो जरूरी नहीं है कि आपके सामने कोई रील आ रही है तो उसे हम सत्य ही मान लें। मत मानिए। समझिए कि व्यक्ति कहां से आ रहा है। कौन से गुरु के पास बैठ के आ रहा है। क्या गुरु उसका यह बता रहा है। जैसे अभी तो बहुत गुरु है। एक गुरु है। अभी तो बहुत सारे हैं। तो अब एक गुरु है। वो क्या बोलते हैं? उनका एक कोर्स हमने किया था स्टार्टिंग स्टार्टिंग में जब हमारे गुरु से हम थोड़ा दूर थे। है ना? मतलब परमाचार्य से दूर थे। समझ रहे थे कि यहां क्या है? वहां क्या है? हमारा मन ही नहीं लगा कहीं। है ना? पर हमने बातें हर एक की सुनी है पर हम कहीं पे अपने आप को नतमस्तक कहीं नहीं कर पाए। अंदर से ही नहीं हुआ। मेरा प्रारब्ध है ये भी। है ना? बचा के रखा मुझे मेरे गुरु की शक्ति ने इस जन्म में कि यहां ही आना है पर दुनिया देख लो। तो अब बात ये है कि अब कुछ गुरु हैं उनका एक का कोर्स किया हमने। उसके अंदर वो शुरू कैसे करते हैं? वेदांत सिद्धांत है। वेदांत
00:53:42:26 सिद्धांत ऐसा है कि आप उसमें कभी किसी को कुछ कर ही नहीं पाओगे। कुछ बोल ही नहीं पाओगे। पर ये सारी बातें हमारे लिए इंपॉर्टेंट नहीं है। इंपॉर्टेंट है सात्विकता ये सब। अरे तो वेदांत दर्शन कब आपको सिखा रहा है कि सात्विकता इंपॉर्टेंट नहीं है। पर जिसको नहीं पता उसके दिमाग में बैक ऑफ द माइंड ये चलेगा। अब वो पैसा तो खर्च ही चुका है कोर्स करने के। तो कोर्स तो वो करेगा। चलिए अब हमें बहुत मतलब बाद में पता चला कि कोर्स के अंदर जो आइटम ऑफ मतलब जो चीजें हो रही थी वह सारी अशास्त्रीय थी क्योंकि प्रणव का उच्चारण था बार-बार बार-बार का जनेऊ भी था संभवता नहीं जनेऊ नहीं था पर ये दूसरे उनकी बात कर रही हूं मैं तो वो बार-बार उसका उच्चारण था और महिलाओं को दंडवत करना था दो तरह के थे ना उनके अरे थक गई दंडवत करके अगर मुझे ये नहीं भी कोई बताता ना कि महिलाएं दंडवत नहीं करती वो कोर्स करने के बाद हमें पता चल गया था कि ये [हंसी] बहुत मुश्किल है। अरे बाप रे। चलिए आगे बढ़ते हैं। तो अब वो व्यक्ति क्या बोलता है आपको पता है? हम कि मेरी अगर कोई ऐसी बात है जो वेद मना कर रहे हैं तो वेदों को बदल दो। अच्छा। हां। वेदों को बदल दो। वाह। और
00:54:58:02 मैंने आज तक कभी कोई वेद पढ़। कहां से? कहां से थे वो? सुनिए तो। सद्गुरु थे क्या? मैंने आज तक कभी कोई वेद पढ़े नहीं। ठीक है? पर मैं अपनी और हमें और यह बोला गया वो वीडियो है। मतलब कहीं पे आने जाने के बीच में वो मध्य में एक वो वीडियो शीट हुआ था। क्या करना है इतने वेद पढ़ के? इतनी पुस्तकें पढ़ने से क्या होगा? मैंने आज तक कोई वेद नहीं पढ़ा है। ये सब पढ़ने से कोई मतलब नहीं है। जो अपना जिस चीज पे ध्यान लगाना है वो लगाओ। तो फिर मेरा प्रश्न ये आता है आप खुद प्रश्न करिए कि तो फिर आप उतनी पुस्तकें क्यों बेच रहे हैं? हम दूसरी बात आप आप अपने से यंत्र कैसे बना दे रहे हैं और वो यंत्र दुर्गा का है। हम है ना? मतलब पीछे में मतलब बहुत सारी और भी चीजें हैं। या तो बोलो कि कोई पुस्तक मत पढ़ो और अगर बोल रहे हो कि पुस्तक मत पढ़ो तो फिर अपनी पुस्तक बेचो मत। बिल्कुल। है ना? तो इस तरह की बहुत सारी चीजें हैं और बहुत सारे कहां पे सनातन धर्म के नाम पे रजिस्ट्रेशनंस एक्चुअली अमेरिका की हुई है। मतलब कंपनी वहां की रजिस्टर्ड है। हम और काम यहां का हो रहा है। जी। जी अब इसके अंदर हम ये कभी नहीं बोलते हैं
00:56:13:10 क्योंकि सामने वाले बोल सकते हैं जितना काम आप अच्छा कर रहे हैं वो सराहनीय है। ये तो हमारी गुरुदेव भी शिक्षा गुरुदेव ने दी है कि जो जो अच्छा काम करता है उसे उतने अंश में उसकी प्रोत्साहन होना चाहिए। उसका प्रेशर दीजिए। पर जो गलत करता है अब वो गलत भी पब्लिकली कर रहा है तो हम पब्लिकली शेयर करेंगे क्योंकि हम सबके घर पर जा के तो बता नहीं सकते हैं कि अच्छा ये ऐसा नहीं बाय द वे ऐसा है अब सोचिए अगर वो व्यक्ति जो सब अच्छा कर रहा है जितने भी व्यक्ति हैं कोई व्यक्ति विशेष की बात में नहीं कर रहे हैं जितने भी ये सब व्यक्ति हैं ये जो अच्छे कार्य करते हैं वो तो करें ही करें पर साथ में ये जो विकृति डाल रहे हैं वो ना डालें तो क्या सनातन धर्म का स्वरूप होगा तो जब प्रश्न उठता कि सनातन धर्म का स्वरूप ऐसा क्यों होता जा रहा है? वो आप पारंपरिक आचार्यों से पूछते हैं और तब आप इन लोगों के पास क्यों नहीं जाते हैं जो इस स्वरूप को टेढ़ामेढ़ा करने में सबसे ज्यादा योग्य दान अपना दे रहे हैं। बिल्कुल बिल्कुल तो कुल मिलाकर के आज की जो चर्चा है अब उसको एक समराइज करूं जो मुझे याद रहे शायद बिंदुगत तरीके से। देखिए पहला तो यह है कि आप देखिए चीजें कि एक तरफ ऐसे आचार्य गण हैं जिसके जिनके
00:57:28:21 पास उपयुक्त संसाधन नहीं है। उपयुक्त लोग नहीं है। वहां मठ में गोवर्धन मठ में आज भी ऐसे लोगों को कार्य करने के लिए नहीं रखा जाता जो तीन टाइम संध्या ना करते हो। और ऐसी फंडिंग नहीं है उनके पास जो केवल उस चीज को पोषण करें। तो कहने का अर्थ है कि एक तो बिजनेस मॉडल है कि हमें अपना प्रचार कैसे कराना है कि बीफ खाने वाले से भी प्रचार करा दो। निराकार को मानने से मानने वाले से भी प्रचार करा दो। स्त्रियों का जनेऊ कराने वाले से भी प्रचार करा दो। परंपराओं को ना मानने वाले से भी प्रचार करा दो। पुराणों को ना मानने वाले से भी प्रचार करा दो। एक तरफ है इस तरह का बिजनेस मॉडल जो अपना काम कर रहा है और दूसरी तरफ है हमारे वास्तविक संत रामानुजाचार्य शंकराचार्य मधवाचार्य नारकाचार्य रामानंदाचार्य ये वास्तविक संत हैं जो अपना कार्य करने के लिए किसी को भी इस बिहाफ पे नहीं रखते कि भैया हम तुम्हें पैसे देंगे प्रायोरिटी होती है कि वो धर्म कितना है उनके अंदर धर्म या तुम कुछ भी खाने पीने वाले हो तुम मेरा काम अच्छा कर दो तुम आ जाओ ऐसा कुछ नहीं और आपको मीडिया में वो दिखता नहीं है। और मैं आपको इसका जीता जागता एक उदाहरण बता दूं कि हमारे आप गोवर्धन चैनल का आप वीडियो देखिए, YouTube चैनल देखिए। आपको दिखेगा कि बहुत सारी क्वालिटी की कमी
00:58:43:22 हो रही है। एडिटिंग में कमी आ रही है। मगर कभी भी उन्होंने इन चीजों को अपग्रेड करने के लिए वहां सिद्धांत के साथ कमी नहीं। समझौता नहीं किया। कोई भी नहीं कर। गुरुदेव जो हैं पूरी के शंकराचार्य जी मैंने अक्सर देखा कि वो चाहे तो कोई व्यक्ति माइक यहां पे लगा सकता है उनके यहां पास से पास जिससे कि उनकी जो आवाज है वो ज्यादा से ज्यादा क्लियर जाए मगर नहीं इतनी दूर माइक लगेगा यहां पे माइक रखेगा और शंकराचार्य से एक निश्चित दूरी जो होनी चाहिए सामान्य लोगों की वो होती है यद्यपि ऐसा कोई वो नहीं है बाध्यता कुछ आचार्य ऐसे भी मिलेंगे जिनके पास से पास माइक होगा ऐसा मैं खंडन नहीं कर रहा हूं मगर मगर यदि उन्होंने इसको प्रेफर किया है तो वो उसी पे चल रहे हैं। अगर उन्होंने प्रेफर किया कि भले ही आवाज थोड़ी सी डाउन हो जाए क्वालिटी और माइक मुझसे दूर रहे तो वो उसको पर एक की जो मर्यादा है जो उन्होंने जो उन्होंने जो अपनी तैयार की है तो उसको उसके साथ वो समझौता नहीं। अगर वहां पर त्रिकाल संध्या वाला व्यक्ति नहीं है तो भले ही वो कितना भी अच्छा एडिटर हो कितना भी अच्छा सिनेमेटोग्राफर हो वो वहां पर वीडियो एडिटिंग करने के लिए नहीं जाता। वो वहां पर क्या कहते हैं? सिनेमेटोग्राफी करने के लिए नहीं जाता। तो यह आचार्य हैं। यह अपना प्रचार करवाने के लिए किसी को खरीदते
00:59:59:06 नहीं है। एक तरफ ऐसे आचार्य इतना होने पर भी, फंडिंग ना होने पर भी, संसाधन ना होने पर भी आप इनमें से किसी के भी यहां कभी भी चले जाइए। रामपाल वाले क्या कहते हैं कि हमारे यहां भंडारा चलता है, भंडारा चलता है। भाई इनमें से किसी के भी यहां कभी भी जाइए, आपको भूखे पेट कोई नहीं लौटने देगा। आपको भोजन प्रसाद मिलेगा वहां। हां, बस बता दीजिएगा। यह नहीं कि हम गए थी और हम आ गए हम भूखे थे तो कहने हां तो एक तो ये है कि बिजनेस मॉडल किस तरीके से खड़े हो रहे हैं हमारे प्रामाणिक परंपराओं के अगेंस्ट में अच्छा एक बात और हम डालेंगे आज तक हमें किसी भी जो इन्होंने नाम दिया है ना सूची बना लीजिए किसी भी परंपरा से आज तक हमें एक मैसेज कॉल नहीं आई है कि आप हमारे इवेंट में आके हमें प्रमोट कीजिए आप हमारे गौशाला का प्रमोशन कीजिए आइए हम हम आपको अपनी पुस्तक देंगे। आइए हम गुरु जी के साथ आपकी फोटो खिंचवा के देंगे। आज तक हमारे गुरु अपने गुरुदेव के साथ हम स्वयं ही फोटो नहीं लिए है। क्योंकि हमें होता है कि क्या फोटो ले इनके साथ? तो ये सारे क्या आपको विद्या भास्कर जी महाराज ने कभी अप्रोच किया? क्या आपको राघवाचार्य जी महाराज ने कभी अप्रोच किया? क्या आपको कभी निम्बारकाचार्य जी महाराज ने कभी अप्रोच किया? शंकराचार्य के साथ तो है ही
01:01:14:07 है। उनकी अनुगति है। उनकी तो शिष्या है। तो वहां तो बात बता ही रही हैं। करने से तो कहने पर जो है ना आचार्य उन्हें ये सब प्रमोशन की आवश्यकता नहीं है। क्यों? क्योंकि उनकी गद्दी को कोई खरीद नहीं सकता है। और क्योंकि वो एक ऑर्गेनाइजेशन नहीं है कि अगर इतना काम नहीं करेंगे तो लोग हमें भूल जाएंगे। जो परंपराएं हैं जब आप खोजते खोजते खोजते वो एंड वाले सच पर जाना चाहेंगे ना तो आपको यही लोग मिलेंगे तब यह ऑर्गेनाइजेशन चली जाएंगे तो इसीलिए उनको इन सबका ध्यान नहीं होता उनकी फंडिंग किस में जाती है गौ सेवा उनकी फंडिंग किसमें जाती है ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए कार्य कर पाए ज्यादा से ज्यादा लोगों को मिल पाए वहां पे सिद्धांत की रक्षा होती है सिद्धांत इस बात की रक्षा नहीं होती कि हमारे पोस्टर बड़े-बड़े कौन बना रहा है कौन प्रचार कर रहा है कपड़े डिसाइड किए हम कौन से रंग की माला और कौन से रंग का वो डालेंगे कौन सी मूवी में हम आएंगे तो मैं बिंदुगत तरीके से एक बार रिवाइज कर दूं आपने आज क्या-क्या जाना सबसे पहले बिजनेस मॉडल खड़ा हो रहा है एक तरफ हमारे पारंपरिक प्रामाणिक आचार्य गण हैं परंपराएं हैं और एक तरफ ऐसी संस्थाएं हैं जो बाहर से भी बाहर की विचारधारा को यहां परोस रही हैं। सनातन के नाम पर सनातनाभास
01:02:29:13 प्रस्तुत कर रही हैं। सनातन से सनातनाभास मतलब आभास सनातन से मिलता-जुलता देखने में लगेगा है मगर वह सनातन है नहीं। तो एक बिजनेस मॉडल के रूप में यह सब फल फूल रहे हैं। दूसरा क्या है कि अपने आप को खड़ा करने के लिए इनका एक ही सिद्धांत है कि जो हमारी प्रामाणिक परंपराओं से मिलने वाली शिक्षा है उसका खंडन करो। प्रामाणिक आचार्यों का खंडन करो। तुम फल भूल जाओगे। मूर्ति पूजा का खंडन करने। अरे भगवान दूध कैसे पी सकता है? भगवान भोग कैसे खा सकता है? यार ब्राह्मणों को कुछ ना कुछ बोलते तो बिना किसी क्योंकि एक्चुअली हिस्ट्री थी क्या अच्छा ब्राह्मण को भोजन कराने से मेरी तबीयत ठीक हो जाएगी अरे ये करने से क्या हो जाएगा वो करने से क्या हो जाएगा ये है वो है मगर केक काटने से क्या हो जाएगा वो नहीं पता चलता फूंक उसमें मोमबत्ती में फूंक मारने से क्या हो जाएगा ये कभी नहीं सोचते मगर यहां ब्राह्मणों को दान देने से या आचार्यों के प्रवचन सुनने से या अमुक अमुक अमुक अमुक यज्ञ करने से क्या हो जाएगा इस सब पे जरूर बोलते हैं तो क्या है अपने आप को ख्यापित करने के लिए जो बिजनेस मॉडल्स होते हैं जो हमारे हमारे प्रामाणिक सार्वभौम और जो सनातन सिद्धांत है उनका खंडन करके अपने आप को ख्यापित करते हैं। क्योंकि एक ऐसा वातावरण है कि व्यक्ति तुरंत उधर भागता है सनसनी के चैन से सोना है तो जाग जाओ। शंकराचार्य
01:03:45:15 शंकराचार्य तुम्हें जनेऊ नहीं पहनने देंगे। इसलिए मेरे पास आओ। जनेऊ करवा लो। ये बता जनेऊ करवा लो। ठीक है? दूसरी बात ये हो गई। तीसरी बात ये हो गई। यह जो यह इस तरह के आरोप लगाते हैं भगवान श्री कृष्ण के बारे में वह हमने आपको बता दिया। इन सबका एक ही उत्तर है कि भैया ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है और ईश्वर आपको विभिन्न रूपों में आकर यह बताता है कि मैं क्या कर सकता हूं। साथ ही साथ प्रमाण तो जिसके द्वारा प्राप्त होने वाले आपको वेद पर विश्वास है उसके द्वारा प्राप्त होने वाले आपको अर्थ पर विश्वास क्यों नहीं है? यह आपसे सवाल सदैव पूछा जाएगा। क्योंकि आप भी कहीं ना कहीं यह मानते हैं इन्हीं प्रामाणिक आचार्य परंपराओं से आपको जो है वेद मिले हैं और बाकी थोड़ा सा आप बता दीजिए। मैंने कोशिश की है समराइज करने की। बाकी हम आपको इस इसके बाद हम अपनी वाणी को विराम देंगे कि आज का हमारा समय भी पूरा होने वाला है। जी तो और आप बताइएगा कैसी लगी ये चर्चा और आगे देखना चाहते हैं कि नहीं इस तरह। हां ये जरूर बताइएगा। हां तो हम आपको यही बोलेंगे कि देखिए ना तो यह ना तो हम यह बोल रहे हैं कि आप हमसे जुड़िए ना तो हम बोल रहे हैं हमें आप कुछ दीजिए ना तो हम आपको यह बोल रहे हैं कि अरे अरे तुम
01:05:00:16 यहां क्यों और हमारे पास आओ आप हमारे पास मत आइए। आप आप हमारी बातों को अगर सुन रहे हैं तो उस पर थोड़ा ध्यान दीजिए। सोचिए कि हमने आपको क्या बताया है और क्या नहीं। हम आपसे सिर्फ एक ही विनती करेंगे कि पारंपरिक आचार्यों की तरफ जाइए जिसमें भी आपकी श्रद्धा आ रही है। हम तो यह भी नहीं कह रहे हैं कि सिर्फ रामानुजा जी के पास जाइए या केवल शंकराचार्य जी के पास जाइए। आपको लिस्ट ऑफ आचार्य दे दिए हैं। और हम लोग कोशिश करेंगे बहुत जल्द कि सभी प्रामाणिक संप्रदायों की जो सुनिश्चित जानकारी हो वो भी आपको हम उपलब्ध करा पाए। हां। तो आप वहां जाइए। प्रमाणिक आचार्यों के पास बैठिए। रस, ज्ञान, भक्ति यह जो अलग-अलग करके सब अपना बिजनेस करते हैं, यह सब सोचिए। आपको यूं मिल जाएगा। यूं और आप भाग विभोर हो जाएंगे और अपना कल्याण कीजिए। एक चीज याद रखिए दीक्षा को कोई बेचा नहीं जाता। इनिशिएशन को बेचा नहीं जाता। इनिशिएशन ऑनलाइन नहीं होते हैं। और श्री कृष्ण माखन चोर भी थे। श्री कृष्ण ने वस्त्र भी चुराए थे। श्री कृष्ण सब कर सकते थे। सब करते हैं क्योंकि ईश्वर सनातन सर्वशक्तिमान ईश्वर है अबाध्य और सोशल मीडिया पे अंधा विश्वास किसी पे मत करिए हम पर भी मत करिए
01:06:16:00 अगर कुछ देख रहे हैं तो कंफर्म करने के लिए अब जाएंगे कहां विचार करिए विचार करिए जो हमने बातें कही है वो तर्कसंगत कितनी लॉजिकली सोचने का प्रयास करिए लॉजिकली और चिंतन करिए इस पे अगर फिर भी कंफ्यूजन रहे तो आपको जाना कहां पड़ेगा सोर्स के पास सोर्स आपका कौन है ये ऑर्गेनाइजेशन सोर्स नहीं है। ये तो अपनी खुद की प्रिंटिंग्स करती हैं। आप पारंपरिक आचार्य जो परंपरा प्राप्त आचार्य हैं वो उनसे आपको कन्फर्मेशन मिलेगी कि क्या विजय ने जो ये वीडियो बनाई है जिसमें वो बोल रही है कि महामृत्युंजय का जप महिलाएं नहीं कर सकती या फिर जो द्विज नहीं है जो दीक्षा में प्राप्त मंत्र है ये ये नहीं कर सकता जिसको दीक्षा प्राप्त नहीं है। क्या गुरु जी ये ठीक है या नहीं? ये आपको केवल परंपरा प्राप्त आचार्यों के पास ऐसा विशेष गढ़ फाइन टेक्निकिटीज़ आपको वहीं मिलेंगी। पीएचडी की इंफॉर्मेशन चाहिए तो क्लास वन और टू के टीचर के पास जाने का कोई मतलब नहीं है। और सेम बात आप बाकियों पर भी प्रश्न उठाइए तो कम से कम हमें इस चीज की खुशी होगी कि हमने आपको परंपरा से जोड़ा। बिल्कुल। जैसे जैसे मुझे आज खुशी है कि मैंने इनको परंपरा से जोड़ा। सुनने के लिए बहुत-बहुत आभार
01:07:31:01 और जय श्री राम। जय श्री राम। [संगीत]
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कैसे करती इस्कॉन जैसी संस्थाएँ धर्म का व्यवसायीकरण
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