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00:00:04:04 तात्पर्य यह है कि चाहे जिस दृष्टि से देखिए समर्थ छोटे बड़े सभी विषयों के उद्भट विद्वान और परम ज्ञाता थे। वे सभी विद्याओं और कलाओं के पूर्ण थे। कलाओं से परिपूर्ण थे और संसार के इस प्रकार के पूर्ण पुरुष देवता और अवतार माने जाते हैं। ऐसे ही महापुरुषों के उपदेश और शिक्षाएं छोटे बड़े शिक्षित अशिक्षित स्त्री पुरुष और बाल वृद्ध सबके काम की होती है। श्री समर्थ के इन उपदेशों और शिक्षाओं आदि का महत्व इसलिए और भी अधिक हो जाता है कि वह बहुत ही तौली हुई और विचार पूर्ण और उनमें की अधिकांश बातें स्वयं श्री समर्थ की अनुभव की हुई होती है। गुरुदेव ने कई अपने प्रवचनों में और वक्तव्यों में बताया है कि एक आदर्श जो आचार्य गण होते हैं या मुख्य रूप से अगर शंकराचार्य की बात करें तो उनका मुख्य कार्य क्या है? आचार्य के रूप में उनका मुख्य कार्य होता है कि जो काल क्रम से विलुप्त ज्ञान विज्ञान है उसको जो है अपने तपोबल के द्वारा पुन उद्भाषित करना और
00:01:20:26 अ एक उनकी भाषा में तो मुझे नहीं याद है मगर एक उनका आता है कार्य जो उन्होंने बताया है कि सिस्टमेटिकली उसको कहते हैं वो सूत्र सूत्र शैली में देना तो काल क्रम से विलुप्त है उसको पुन्हा ित करना और जो है उसको जो है सूत्र शैली में देना। एक कार्य और है जो मुझे अभी विस्मरण हो गया है पर बहुत ही सूत्रात्मक है तो कुछ वही भाव यहां पर भी आ रहा है श्री समर्थ रामदास जी कि तोली हुई चीजें जैसे उन्होंने सूत्रात्मक शैली में जैसे गुरुदेव भगवान ने कितने सरलता से सूत्रात्मक शैली में बता दिया कि जीव की चाह का जो वास्तविक विषय है उसी का नाम सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर है। उसी का नाम भगवान ये सूत्रात्मक शैली कहते हैं। सिद्धांत समझ में आ गया। बहुत लंबी चौड़ी बातें नहीं करनी पड़ी। मेरे जानकारी में एक व्यक्ति थे जो इस के बहुत प्रबल प्रचारक थे और वो मेरे को सदैव पेन कॉपी लेकर के कृष्ण का एक्सपेंशन ये है। कृष्ण का एक्सपेंशन वो है। यह सब बातें बताने का प्रयास करते थे। एक बार उन्होंने मुझसे मेरी क्योंकि मैं गुरुदेव को गुरुदेव का अनुसरण कर रहा था उन दिनों और उनको सुनता था। उनके उनकी चीजें पढ़ता था। उनकी
00:02:36:02 बताई हुई चीजों को करने की कोशिश करता था। तो उन्होंने एक दिन मेरी योग्यता का आकलन करने के लिए मुझसे पूछ लिया कि बताओ अच्छा तुम धर्म क्या है? एक इस वाले व्यक्ति ने एक शंकराचार्य के अभी-अभी बने अल्पज्ञ शिष्य से है ना। अभी तो मुझको तब भी काफी समय हो गया। मगर उस समय जब मैं नवीन था उस रास्ते में और अल्पज्ञ था। बहुत कम सुन पाया था गुरुदेव को। उस समय एक वरिष्ठ सीनियर व्यक्ति इस का पूछ रहा है। उस समय मुझे यह भी यह दिशा भी प्राप्त नहीं हुई है कि मुझे अपने जीवन में धर्म के लिए ही समय बिताना है। यह भी नहीं है। एक गृहस्थ व्यक्ति जिसके उद्देश्य में यही है कि मकान कैसे बनना है या मकान बनना ना भी हो तो अपने जीवन को देखना है। दाल भात का इंतजाम कैसे करना है। रोटी कपड़ा और मकान इन सब में पूरा ध्यान है। उस समय पर शंकराचार्य के एक अल्पज्ञ एक अभी-अभी नवीन शिष्य से एक इस्कॉन के सात आठ 10 साल पुराने अनुगामी ने प्रश्न किया। अच्छा बताओ धर्म क्या है? तो उस नवीन शिष्य ने वहां पर उसको बता दिया सूत्रात्मक शैली में कि जीव की
00:03:51:03 चाह के वास्तविक विषय को परिभाषित कर सकने वाले वेदाद शास्त्रों द्वारा जीव की चाह के वास्तविक विषय को प्राप्त कराने के निमित्त बताई गई मर्यादा का नाम धर्म है। और जो वो स्कॉन का अनुगामी था पेन कॉपी लेके एक्सपेंशन बता रहा था। उसका मुंह इतना बड़ा खुल गया। ये क्या था? और फिर वो क्या बोलता है मालूम है? फिर वह बोलता है इतनी क्रिष्ट वाली नहीं चाहिए सरल वाली परिभाषा चाहिए धर्म की [हंसी] ठीक है तो ये होती है सूत्रात्मक शैली की उपयोगिता ऐसे सूत्रात्मक शैली में आप देखिएगा जिनके यहां पर बिखराव है वहां पर ऐसे आपको सिद्धांत नहीं मिलेंगे इतने जटिल विषयों में इतने जटिल विषयों में गए नास्तिकता को कैसे हराया जाए जीव की चाह के वास्तविक के विषय के नाम ही ईश्वर हार गई नास्तिकता विधर्मी ईश्वर को कैसे बाधित ईश्वर को कैसे हराया जाए ईश्वर वही है जो कुछ भी कर सकता है लो हार गया विधर्मी नास्तिक विधर्मी ग्रंथों को कैसे हराया जाए कि ईश्वर के विषय में केवल वही शास्त्र प्रमाणिक जिन्हें ईश्वर ने भी ना रचा हो अपुषय ग्रंथ तो ये होता है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान को फैलाना प्रचारित करना तो उसी को यहां पर कहा जा रहा है तौली हुई
00:05:06:19 विचार एक प्रश्न आता है भाई ये विशुद्ध करने की ये सूत्रात्मक शैली में देने की आवश्यकता क्या है लोग यह आरोप लगाते हैं। मुसलमान आरोप लगाता है कि भाई वेद में इतनी घुमा फिरा के बात क्यों कही गई है? उपनिषदों में इतनी घुमा फिरा के बात क्यों कही गई है? ये सूत्रात्मक शैली में देने के लिए ही आचार्य गण समय-समय पर आते हैं। उस समय के वातावरण के अनुसार सूत्रात्मक शैली में देते हैं। पर ये आवश्यकता क्यों? भगवान ने सीधे सूत्रात्मक शैली में क्यों नहीं दिया? भाई भगवान ने सूत्रात्मक शैली में ही दिया था। ब्रह्मा जी को तो केवल प्रणव मिला था। जिसको कहते हैं सूक्ष्म वेद कहते हैं ना सूक्ष्म वेद क्या है केवल प्रणव उसमें मिला लो इससे बड़ा सूत्र क्या है केवल प्रणव मगर जैसे जैसे हमारी प्रज्ञा शक्ति घटती है विकृति आती है हम प्रपंच रूपी संसार में फंसते चले जाते हैं वैसे वैसे उन सूत्रों को जो उस समय की काल परिस्थिति के अनुसार दिए गए थे उन सूत्रों को समझ पाना हमारे लिए कठिन हो कठिन हो जाता है तब जब कठिनता होती है तो उस देश काल परिस्थिति के अनुसार दोबारा पुनः उसको सूत्रों में पिरोहित करके दिया जाता है। इसलिए जैसे अपने समय में तुलसीदास जी की भी आवश्यकता थी उसी प्रकार आज रामानुजाचार्य की गद्दी पर बैठने वाले आचार्यों
00:06:21:22 की आवश्यकता है। शंकराचार्य की गद्दी पर बैठने वाले शंकराचार्यों की आवश्यकता है। आज के समय अनुसार जो है सूत्रात्मक शैली में ज्ञान विज्ञान की फिर से आवश्यकता है और आने वाले समय में जैसे जैसे और विकृति आएगी तब भी हमें आचार्यों की आवश्यकता रहेगी सूत्रात्मक शैली में देने के लिए। वरना तो फिर वेद ही पर्याप्त थे। इसी को सत्यार्थ प्रकाश लिखने की क्या आवश्यकता है? गो बैक टू द वेदास। भाई वो ले चलते हैं। हम वेद वेद गो बैक टू द वेदास। वेद को ही मानेंगे। सूत्रात्मक शैली में जो पुराण में दिया गया पुराण के बाद जो है जो और अन्य आचार्यों के ग्रंथों में दिया उनको नहीं सुनेंगे। खुद जो है वेद को गो बैक टू द वेदास। गो बैक टू द वेदास गो बैक टू द वेदास। चिल्ला चिल्ला कर फिर कहां ले जाएंगे? व्यक्ति को सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास फिर उसमें ले जाएंगे। तो कहने का मतलब तो यह है ना उनका भी कि भाई सुत्रात्मक शैली में हमने भी दिया है। मगर वही जब तुलसीदास जी दे देंगे तो वहां कहेंगे देखो देखो ये तो तुलसीदास जी का ग्रंथ पढ़ने कह रहे हैं। वेद पढ़ने की बात नहीं कह रहे हैं। और यदि उनके हिसाब से कुछ ये सब प्रश्न आते हैं कि जब सबको वेद ही पढ़ने हैं तो फिर सत्यार्थ प्रकाश क्यों लिखी जा रही बताओ? जब सबको वेद ही पढ़ने है तो सत्यार्थ प्रकाश लिखी क्यों जा रही है क्योंकि
00:07:36:28 जाहिर सी बात है कि सबको वेद नहीं समझ में आएंगे इसलिए सत्यार्थ प्रकाश भी है और जब तक लोग किसी किसी की सीमा के बाहर वेद और अन्य गढ़ ग्रंथ नहीं होंगे तब तक सत्यार्थ प्रकाश जैसे स्वरचित ग्रंथों की क्या आवश्यकता है मार्केट में तो उन्होंने उनका सत्यार्थ प्रकाश को लिखना ही इस बात का द्योतक है कि सबके लिए वेद उपनिषद सब कुछ नहीं है सबका का सब में अधिकार नहीं है। इस बात का दतक है उनके द्वारा सत्यार्थ प्रकाश की रचना करना।
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शास्त्रों में बातें घुमा फिरा कर क्यों लिखी होती हैं? DAASBODH LECTURES
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