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00:00:06:16 देखा जाए जितने भी आपने संभता आहान जो मुख्य चैनल है आहान का उसका एक संदेश पढ़ा पीछे डिस्क्रिप्शन जो पड़ा हुआ है चैनल का डिस्क्रिप्शन उसको जब आप करके आप जाकर के पढ़ेंगे ना तो उसमें एक बात लिखी हुई है जो मैंने काफी समय पहले लिखी थी 2000 अह शायद 11 या 12 में लिखी होगी जब मैं अपने सनातन संस्कृति को नष्ट होता हुआ देखता था तो दुख होता था। मुझे दिशा नहीं मालूम थी। मेरे अंदर था कि मैं रामचंद्र जी के पथ का पथ की स्थापना अपने समाज में कर पाऊं। पर मैं दिशाहीन था। मुझे गुरु तत्व प्राप्त नहीं था। गुरु से अनभिज्ञ था। तो उस समय जो चिंता मेरी थी उस चिंता को ही मैंने इस पंक्ति में व्यक्त किया था। कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि जो क्रांतिकारी हुए यह भी स्वार्थी थे।
00:01:03:06 संसार में जितने भी लोग हैं वो सब स्वार्थी हैं। इस प्रकार से स्वार्थी है कि सबकी सबका जो भी वो कुछ कर रहे हैं, कुछ भी कर रहे हैं। उसमें उनका यह स्वार्थ निहित है कि भैया मुझे इससे खुशी प्राप्त होती है। इसलिए मैं यह कर रहा हूं। मुझे आनंद मिलता है इसलिए मैं यह करता हूं। तो वह जो है वह स्वार्थी है। तो सब लोगों की लड़ाई जो है वह मेरी होती है। मेरी लड़ाई जैसे कि किसी की किसी की लड़ाई कहां तक सीमित है? किसी की लड़ाई केवल उसके अपने शरीर तक सीमित है। कि भाई मुझे मेरे शरीर को कुछ ना हो जाए। किसी की लड़ाई उसके अपने जो परिवार है मेरी माता, मेरी बहन, मेरी पिता, मेरी पत्नी, मेरी बेटी, मेरा बेटा यहां तक सीमित है। या फिर किसी की लड़ाई उसके कुल खानदान तक सीमित है। मेरे चाचा, मेरे ताऊ, मेरे भतीजे, मेरी ब्या चुकी बहने इस तरीके से और किसी किसी की लड़ाई फिर जो उसका जो कुटुंब का वृक्ष है उसके भी बाहर जहां वो रह रहा है। उसका नगर, गली, मोहल्ला वहां तक सीमित है। फिर किसी की लड़ाई अ नगर, गली, मोहल्ला
00:02:18:07 छोड़कर के उसमें भी सीमित है। प्रदेश में अगर भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी की लड़ाई क्षेत्र क्षेत्रवाद को छोड़कर के फिर वह देशगत आ जाती है। मेरा देश भारत वहां तक सीमित है और किसी की लड़ाई पूरा संसार है। मानवता है, प्राणी मात्र है वहां तक सीमित है। तो सबकी लड़ाई के पीछे एक वर्ड तो है। चाहे वह सन्यासी हो, चाहे गस्थ हो, चाहे वह बिल्कुल कोई क्या कहूं? दुर्व्यसनी हो, स्मैक का सेवन करने वाला क्यों ना हो, सबकी लड़ाई के पीछे, सबके संघर्ष के पीछे शब्द एक ही है। मैं सबके पीछे एक ही शब्द है। मैं। बस देखना यह है कि आपका यह मैं कितना बड़ा है। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि का मैं आपसे बड़ा था। तो वह आज कहीं ना कहीं स्वतंत्रता संग्राम इत्यादि के अगर उसमें देखा जाए तो वह आदर्श माने जाते हैं और उनका मैं देशगत था और शंकराचार्य रामानुजाचार्य इनका मैं पूरे मानवता के लिए था। संसार
00:03:33:15 के लिए था। श्री रामचंद्र जी का जो मैं था पूरे संसार के लिए था। प्राणी मात्र के लिए था। तो आपका यह मैं कितना बड़ा है यह देखने वाली बात होती है। तो हमें देखने में ऐसा लगता है जो वास्तविकता में देखा जाए तो जो मोक्ष प्राप्ति के लिए कार्य कर रहा है जो धर्म की रक्षा करने के लिए कार्य कर रहा है या जो सन्यासी हो गया हमारे मन में उनके प्रति आती है एक भावना कि भैया ये भी अपने सुख के लिए ही तो कर रहे हैं। बस इनका सुख जो है इसमें ना निहित हो करके जिन चीजों में जिन निकृष्ट चीजों में हमारा सुख है उसमें ना निहित हो करके इनका जो सुख है इन विभूतियों का सुख जो है वो सन्यास में है धर्म रक्षा में है या देश की रक्षा में है मानवता की रक्षा में है इत्यादि इत्यादि में है या इनका सुख जो है ईश्वर प्राप्ति में है भगवान की भक्ति में इनका सुख है तो फिर जब दोनों का ही मूल उद्देश्य सुख है तो वो धन्य क्यों और हम जो है निकृष्ट क्यों एक विचार आता है वो महापुरुष क्यों और हम सामान्य पुरुष क्यों इसलिए क्योंकि उनका सुख जिसमें निहित है उसमें सुख देख पाना
00:04:48:24 उसमें सुख की दृष्टि रख पाना अत्यंत कठिन होता है वो भावना व्याप्त जिसने कर ली वो महापुरुष है जो यह सामाजिक प्रपंच रूपी संसार से अलग होकर के अपने सुख को किसी और में देख पाए किसी और में चिंतन कर पाए इसलिए शास्त्रों में ऐसी बात भी कही गई है और एक मैंने पता नहीं अभी कहां एक दो दिन पहले ही किसी शायद किसी आचार्य जी की वाणी सुनी थी मैंने उन्होंने कहा था और शास्त्रों में स्कंद पुराण में आया है कि यदि आप हर क्षण यदि आपकी जो जैसे होता है गसिप कहते हैं जिसे आप अपने मित्रों के साथ बैठकर के गप्पे मार रहे हैं या इधर-उधर की बातें कर रहे हैं। मगर वो इधर-उधर की बातें किस बारे में है? रामायण के बारे में, भगवत गीता के बारे में। आपकी जो चर्चा का विषय है वो क्या है? चाय पीते समय कई लोग चाय पीते होंगे। निषेध है चाय का। मगर एक हमारे जो आज का जो सामान्य जनजीवन है उसमें चाय पीना या आजकल की भाषा में कहे तो स्नैक्स खा रहे हैं पी रहे हैं या जो भी है एक सामान्य समय है मगर वहां पर भी अगर बातें कर रहे हैं तो धर्म का निर्धारण हो रहा है कि भाई ये धर्म कैसे ब्रह्म ये कैसे अद्वैत
00:06:04:04 कैसे द्वैत कैसे भगवान श्री कृष्ण चंद्र की बातें चल रही है या राम श्री रामचंद्र जी की लीलाओं की बातें चल रही है तो स्कंद पुराण मेंशन है यदि आपकी चर्चाओं का विषय भगवान भगवान है धर्म है तो आप कल्याणकारी पथ पर चल रहे हो और इसी बात को किनहीं महापुरुष की भी मैंने बात सुनी थी जिन्होंने कहा था कि यदि आप एकांत में बैठकर के भी श्री रामचंद्र इत्यादि का चिंतन कर रहे हो जहां पर आपको कोई व्यवस्था नहीं है उस समय उन्हीं का चिंतन करने की यदि आप कर रहे हो तो आप कल्याणकारी पद पर हो और जब आप ऐसे कल्याणकारी पथ पे हैं तो आप उन लोगों की दृष्टि से महापुरुष हो जाते हैं, धन्य हो जाते हैं। क्योंकि आप का बिना किसी विवशता के चिंतन में आज राम है। आपके बिना किसी व्यवस्था के चिंतन में आज कृष्ण है। धर्म है। रामो विग्रहवान धर्म। चलो मान लिया कि आपका क्या कहते हैं? विषय यह है कि हमको जो है धर्म का नाश करने वाले इत्यादि जो ये सनातना भाष है स्पॉन है आर्य समाज है या ये ब्रह्मा कुमारीज है इनको उत्तर देना है आपके अंदर वो एक जुनून है कि भाई इन्होंने ऐसी गलत बात क्यों कर दी है
00:07:19:08 जिसकी वजह से हमारे सनातन समाज को हानि हो रही है मानवता को हानि हो रही है यह बातें ये क्यों निर्गत कर रहे हैं और उसको लेकर के आपको जवाब देना है वही जवाब देने का चिंतन यद्यपि ऐसा आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति जवाब दे। मगर यदि उसको लेकर के भी चिंतन चल रहा है। आपको दिन और रात वही दिख रहा है कि मुझे जो है धर्म स्थापना के लिए जो है इसका उत्तर निकालना है। कम से कम मैं समाज को ना दे पाऊं तो अपने घर के लोगों को तो बता पाऊं। यह भ्रांति है। स्त्रियों को यज्ञ पवित नहीं कराना चाहिए क्योंकि स्त्रियों का जो संरचना है वह अमुक रूप से है। उनके लिए अमुक धर्म है और पुरुषों के लिए अमुक धर्म है। तो कितने विधिवत तरीके से सिस्टमैटिकली मैं यह बात इस बात की सिद्धांत की स्थापना कर पाऊं। इस बारे में आपका चिंतन चल रहा है। तो आप उन करोड़ों लोगों से कितने अलग हैं। कितने धन्य हैं आप। इतने स्तर पर भी कितने धन्य है आप जिनके मन में यह चिंतन चल रहा है कि Netflix पर कौन सी मूवी आई है या आज मॉल में कौन सी मूवी चल रही है या और बहुत सारे प्रपंच मैकडोनाल्ड्स पिज़्ज़ा या जो भी जिसमें भी आज सामान्य जन जीवन की आसक्ति है तो ये सोचने वाली बात है कि एन केन प्रकारन आपके मन में चिंतन किसका चल रहा है तो उन्हीं को धन्य कहा जाता
00:08:34:09 है जो इस प्रपंच रूपी संसार में जिनकी आसक्ति कम होती चली जाती है या रही नहीं जाती उनहीं को धन्य कहा जाता है। वही महापुरुष हो सकते हैं। तो भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु इनको धन्य क्यों कहा गया? क्योंकि इनकी आसक्ति किस में हो गई? इनकी आसक्ति हो गई स्वतंत्रता संग्राम में। जिनको मरने से भय ना लगा। हम इनकी आसक्ति हो गई ना उसमें। तो जो हम जैसे निकृष्ट लोग जो अपनी आसक्ति को हटा नहीं पाते हैं प्रपंच रूपी संसार से वह सामान्य रह जाते हैं और जो हटा करके और जिनका मैं बड़ा हो जाता है और मैं बड़े होने के रूप में परिणाम स्वरूप जिनका लक्ष्य बड़ा हो जाता है जिनके चिंतन का विषय वृहद होता चला जाता है वह महापुरुष और वह धन्य कहलाते हैं। है ना? तो ऐसे ही थे हमारे श्री समर्थ रामदास जी।
00:09:32:14 [संगीत]
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