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00:00:04:04 तो सभी को जय श्री राम। आप सभी को दीप मलिकोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। देखिए दीपावली का त्यौहार जब भी आता था आज से पहले तो कई बार मुझसे लोग प्रश्न पूछते थे कि दीपावली के पीछे महत्व क्या है? और मैंने देखा है कि आम जनमानस में दीपावली के पर्व को लेकर के संशय की स्थिति बनी रहती है कि यह पर्व क्यों मनाया जाता है? कहां से इसकी स्टार्टिंग हुई है और शास्त्रों में इसके बारे में क्या वर्णित है? कुछ लोग ऐसा फैलाते हैं कि इस दिन लक्ष्मी गणेश का पूजन नहीं होना चाहिए। बल्कि श्री रामचंद्र जी का ही पूजन होना चाहिए। क्योंकि इस दिन श्री रामचंद्र जी वापस आए थे। और कुछ लोग श्री रामचंद्र जी से जोड़ने पर भी आपत्ति प्रकट करते हैं कि इस त्यौहार से श्री रामचंद्र जी के घर वापस लौटने का अयोध्या वापस लौटने का कोई संबंध नहीं है। और इन सारे संशयों के बीच क्योंकि आहवान का जो बेस है वह इसी बात पर है कि संशयात्मा विनश्यति संशय जिसके मन में होता है वह ना तो इस लोक में सुखी रह पाता है ना ही परलोक में
00:01:19:10 और मेरा जीवन इसी एक श्लोक पर आधारित है। जो मैं कार्य कर रहा हूं ना संशय दूर होना चाहिए। संशय दूर होगा तभी हम वैचारिक तौर पर संगठित होंगे। क्योंकि संशय दूर होने पर अलग-अलग जो मतियां बनी हुई है, वह एक मत हो जाएंगे सबकी। तो इस कारण से सिंगल पॉइंट एजेंडा है कि संशय जो बने हुए हैं धर्म को लेकर के, भगवान को लेकर के, धर्म और अध्यात्म को लेकर के वो ज्यादा से ज्यादा लोगों में दूर हो। जिससे कि हम एक मत हो पाएं। और जैसे ही हम वैचारिक आधार पर एक होंगे वैसे ही हम व्यवहारिक आधार पर एकत्र होते हुए संगठित होते हुए अपने धर्म अपने अस्तित्व और आदर्श की रक्षा कर पाएंगे। तो जब यह संशय फैला होता है तो किस प्रकार से शत्रु हमारे गढ़ में घुसने का प्रयास करता है उसी का एक ज्वलंत उदाहरण है रामपाल। तो रामपाल भी इसी बीच घुस आता है जब यह देखता है कि इस पर्व को लेकर के अनेकों प्रकार के संशय हैं तो आपको आपकी जो मूल धारणाएं हैं उनसे पृथक करने के लिए रामपाल ने अपनी जेलधाम यात्रा से पूर्व 2014 में जो कुछ
00:02:34:14 वीडियोस बनाए थे उनमें से एक वीडियो उसने इस बारे में भी बनाया होगा कि दीपावली क्यों नहीं मनानी चाहिए और दीपावली के संबंध में आम जनमानस में या कहें कि उसकी गीता के अनुसार उसकी गीता में लिखा है कि उसको फॉलो करने वाले निम्न बुद्धि के पिछड़े हुए अशिक्षित लोग होते हैं। है ना? ऐसा उसकी गीता में लिखा है। तो उसकी गीता के अनुसार ही यह मान लिया जाए कि जिन लोगों के बुद्धि कम होती है या पिछड़े होते हैं जो उन लोगों के अंदर सनातन धर्म की जो मूल अवधारणाएं हैं उनके प्रति द्वेष भरने के लिए जहर भरने के लिए यह जो है घुस आता है हमारे गढ़ में इस संशय को देखते हुए जहां पर हम लोग संशय में हैं वहीं पर जो बाहरी व्यक्ति है वह प्रवेश करता है हमारे धार्मिक गढ़ के अंदर और फिर वहां पर हमारे ही भाइयों को हमसे दूर ले जाता है या फिर विप्लव की स्थितियां उत्पन्न करने का प्रयास करता है। कोई किसी भी प्रकार से सनातन धर्म को सनातन को मानने वाले समाज को क्षति पहुंचाने का प्रयास करता है। तो रामपाल का जो वीडियो है उस पर आधारित उसका जो तथाकथित तंत्र आजकल चल
00:03:49:20 रहा है जिस पर हमने हाई कोर्ट में याचिका लगाई हुई है जिस पर सुनवाई हो रही है। फिलहाल जो हिसार जेल जहां पर बंद है रामपाल वहां के जेलर को तलब किया गया है और उससे पूछा गया है कि भाई तुम्हारी जेल में रहते हुए रामपाल ये सब कैसे कर रहा है उसका जवाब दो आ करके तो ये तो सारी रही एक बात मगर रामपाल जो वीडियोस बना करके गया उसकी मदद के आधार पर बहुत ही घृणा मतलब घृणा से ओतप्रोत ऐसा वीडियो जिसको सुनकर के किसी भी सनातनी के कानों में ऐसा लगेगा जैसे कि किसी ने तेजाब डाल दिया हो। ऐसी ऐसी बातें बताते हुए वीडियो निर्गत किया जाता है। प्रत्येक वर्ष दीपावली के आसपास प्रत्येक वर्ष जो भी हमारे महत्वपूर्ण त्यौहार होते हैं चाहे होली हो चाहे दिवाली हो, चाहे रक्षाबंधन हो, चाहे भाईदूज हो, चाहे वो कावड़ यात्रा हो, चाहे वो महाशिवरात्रि हो, उन पर्वों के विरोध में नकारात्मक वीडियोस बना के फैलाए जाते हैं। जिससे कि पता चलता है कि यह पूरा एक बाहरी एक विदेशी एजेंडा है जो रामपाल के रूप में यहां पे काम कर रहा है हमारे हिंदू धर्म को क्षति पहुंचाने के लिए सनातन धर्म को क्षति पहुंचाने के लिए। तो
00:05:04:26 जब मैंने उसका वीडियो देखा तो मैंने कहा कि भाई जो हमारा संशय फैला हुआ है उसके बारे में भी कुछ जानकारियां उपलब्ध करा दूं और उसने जो नीचता भरी बातें कही हैं उनका भी उत्तर दे दूं। तो सबसे पहले आप यह जान लीजिए कि दीपावली हमारे यहां क्यों मनाई जाती है? इसका क्या अर्थ है? व्यवहारिक आधार क्या है? और जो हमारा स्मृतियों के अनुसार जो शास्त्रोक्त आधार है वह क्या है? तो महाराज जो प्रथु थे उन्होंने भारतीय धर धरती का उद्धार किया था और जो है फसल इत्यादि में वृद्धि हो सके। इस संबंध में कार्य करके एक तरीके से उद्धार किया था धरती का। तो सबसे पहले तो इस घटना से भी जोड़कर के दीपावली को देखा जाता है। दूसरा इससे जुड़ा हुआ है जो राक्षस राज बलि थे उन्होंने एक समय पे माता लक्ष्मी को भी अनेक देवताओं के साथ बंदी बना लिया था और फिर वामन भगवान के आने पर उन्हें जो लक्ष्मी माताएं मुक्त हुई थी और उससे संबंधित भी जो दीपावली पर्व है उसको जोड़कर के देखा जाता है हमारे यहां। इसके साथ ही साथ समुद्र मंथन से धनवंतरी भगवान
00:06:20:02 उत्पन्न हुए थे। अमृत कलश लेकर के और आयुर्वेद लेकर के और उसी क्रम में माता लक्ष्मी उत्पन्न होती हैं, प्रकट होती हैं समुद्र मंथन से। तो उस घटना से भी दीपावली महोत्सव जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही साथ धन त्रयोदशी और दीप मलिकोत्सव के बीच में जो नरक चतुर्दशी आती है उससे भगवान श्री कृष्ण द्वारा जो नरकासुर का वध है वो जुड़ा हुआ है। तो इस प्रकार से यह एक श्रंखला बन जाती है कि अह धन त्रयोदशी जिस दिन धनवंतरी भगवान उत्पन्न होते हैं और उसके बाद नरक चतुर्दशी और उसके बाद दीप मलिकोत्सव यानी कि अमावस्या के दिन और जिस दिन माता लक्ष्मी उत्पन्न हुई और जिस दिन राजा बलि के बंधन से माता लक्ष्मी को मुक्त कराया था भगवान विष्णु ने भगवान वामन के रूप में आकर के ये सारी घटनाएं आपको पद्म पुराण स्कंद पुराण भविष्य पुराण श्रीमद् भागवत पुराण इन सभी पुराणों में कल्प वेद से थोड़े बहुत दृष्ट जो घटनाक्रम है उसमें थोड़ा बहुत ऊपर नीचे के भेद से आपको यह सारी घटनाएं मिल जाएंगी। स्कंद पुराण की अगर बात करें तो स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में
00:07:35:22 अ कार्तिक मास महात्म नामक जो उसका भाग है उसमें दसवां अध्याय है जिसमें कि कार्तिक मास का महत्व चल रहा है। उसी में कार्तिक दीपावली इत्यादि के बारे में सब बताया गया। नौवा और दसवां आप पढ़ सकते हैं। जहां पर जो घटना बताई गई है वहां पर राजा बलि द्वारा जब वामन भगवान वामन भगवान ने जब राजा बलि से धरती को मुक्त करा लिया उसके बाद राजा बलि ने भगवान से वरदान मांगा था कि प्रत्येक वर्ष आप तीन दिवस के लिए इस जो प्रजा है उस पर मेरा शासन लागू करें और उस दिन प्रजा में जो है अमुक अमुक तरीके से वहां पर इस इस तरीके तरीके के महोत्सव मनाए जाए। उस महोत्सव के अनुसार वहां पर जो जनता है वह एक प्रण ले कि अब मैं असत्यवादी नहीं रहूंगी। व्यभचारी नहीं रहूंगी। जनता मतलब जनसामान्य व्यभचार से दूर हो जाए। अमुक अमुक जितने भी दोष हैं उनसे दूर हो जाए और उनके यहां पर वो महोत्सव मनाया जाए। तो प्रत्येक वर्ष जो है तीन दिवस मेरा शासन व्याप्त हो। मेरा शासन हट जाने के बाद भी। तो यह वरदान उन्होंने मांगा था। विष्णु भगवान ने वह वरदान दिया था। तो उस
00:08:50:26 वरदान के अनुसार भी ये तीन दिन जो तीन दिन जो है वो आते हैं प्रत्येक वर्ष जिसमें कि धन त्रयोदशी होता है और फिर उसके बाद नरक चतुर्दशी होती है और फिर जो है अ ये दीप मलिकोत्सव होता है। अच्छा इसके साथ ही साथ एक बात और है जो दीपावली से जुड़ती है कि श्री रामचंद्र जी जब घर वापस आ गए थे तो घर वापस आने के बाद श्री रामचंद्र जी जब अयोध्या वापस आ गए थे युद्ध विजय प्राप्त करके सीता माता को साथ लेकर के जब अयोध्या में वापस आ गए थे तो उसके बाद जो दीपावली पर्व बना था वो उसमें एक अलग ही हर्षोल्लास था। तो यह कहा जा सकता है कि दीपावली पर्व से कालांतर में अनेक प्रकार की घटनाएं जुड़ती चली गई। जैसे कि अ श्री कृष्ण भगवान द्वारा नरकासुर का वध और श्री राम जी का अयोध्या आगमन। तो इसी तो ऐसा नहीं कर सकते कि वह जो दीपावली है उससे श्री रामचंद्र जी का कोई मतलब नहीं है। मतलब यह है कि अंधकार पर प्रकाश की विजय मतलब यह है तो उसमें कहीं नरकासुर का वध हो रहा है। कहीं पर श्री राम जी का राज्य हो रहा है। कहीं पर जो है लक्ष्मी माता मुक्त हो रही है। कहीं पर लक्ष्मी माता प्रकट हो रही हैं। तो ये सारी चीजें
00:10:05:27 दीपावली से जुड़ जाती है। अब इसका जो एक व्यवहारिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है वह यह है कि जब शीतकालीन जो फसल होती है वो आ चुकी होती है लोगों के पास लोगों के घरों में एकत्र हो चुका होता है तो लोग काफी समय तक वस्त्र इत्यादि के लिए परेशान नहीं होने वाले उनकी चिंता से वस्त्र की चिंता से मुक्त हो जाते हैं तो उस रूप में भी नए वस्त्रों के रूप में और कहना चाहिए कि पूरे वर्ष का एक आर्थिक गणना होती है लोगों के यहां कि भाई हमने इस पूरे वर्ष कितना पाया कितना खोया या आगे क्या करना है यह सारी चीजें भी ऐड ऑन होती है वहीं पर और एक परिवर्तन वहां पर आ रहा होता है कि अब आगे क्या करना है अब तक हमने क्या पाया है तो इसको एक आर्थिक क्रांति के विषय पर्व के रूप में भी मनाया जाता है और इसीलिए जो राजा बलि ने जब वहां पर वरदान मांगा था तो वह तीन दिवस में वहां पर दत क्रीड़ा जो होती है जिसको आम भाषा में हम लोग जुआ भी कहते हैं उसका भी प्रावधान है कि वहां पर तरह-तरह के खेल हो, तमाशे हो और वहां पे उन दिनों जो है दत क्रीड़ा भी हो। अब दत क्रीड़ा जो होती है वो दो प्रकार
00:11:21:03 की होती है। एक ऐसी होती है जिसमें कि व्यक्ति का अपना बुद्धि अथवा बाहुबल नहीं लगता है। तो उस दत क्रीड़ा का निषेध माना गया है सर्वथा शास्त्रों के द्वारा। परंतु एक प्रकार की दूत द्वत क्रीड़ा ऐसी होती है जिसमें कि व्यक्ति की अपनी कल्पना शक्ति अपनी अह क्या कहते हैं यह बाहुबल अथवा बुद्धि बल इत्यादि का प्रयोग होता है तो उसमें निखार आता है तो एक सीमा में रहकर के द्वत क्रीड़ा इस प्रकार की जैसे कि आगे चलकर के अमुक फसल का क्या भाव होने वाला है और या फिर दो पहलवान हैं तो इसमें से कौन सा पहलवान जीत सकता है। इस प्रकार का जो दत क्रीड़ा होती है उसको यहां पर स्वीकार किया गया है। जो बिना किसी उसके केवल भाग्य के भरोसे खेला जाता है। ऐसी दत क्रीड़ा का सर्वथा निषेध किया गया है। तो यह थी पर्व की जानकारी आपके लिए और आपको अगर एक मैंने एक उदाहरण दे दिया वैसे पद्म पुराण में भी है और श्रीमद् भागवत में भी है और इसके साथ ही साथ क्या कहते हैं? स्कंद पुराण में भी है। सनत कुमार संमिता में भी है। तो इन
00:12:36:09 शास्त्रों में आपको है और स्कंद पुराण का मैंने आपको रेफरेंस भी दे दिया। अब यह तो रही यह बात कि दीपावली का शास्त्रीय विवेचन क्या है? और दीपावली से दत क्रीडा कैसे जुड़ी है और जब आप स्कंद पुराण को पढ़ेंगे वैष्णव खंड को तो वहां पर आपको वो सारी बातें भी मिल जाएंगी कि आगे चलकर के भाई दूज आती है और जो गोवर्धन पूजा आती है तो वह सब बातें भी मिल जाएंगी। तो यह तो हमने बात कर ली कि दीपावली का शास्त्रीय विधान क्या है और कहां किन-किन घटनाक्रमों से जुड़ा हुआ है और कहां पर दिया गया शास्त्रों में इसका संदर्भ भी मैंने आपको बता दिया। अब बात करते हैं रामपाल द्वारा दीपावली के खंडन स्वरूप क्या-क्या नीचता से भरी हुई बातें कही गई हैं उन पे जरा प्रकाश डाल लेते हैं। सबसे पहले तो उसने इस बात को सीमित किया है। दीपावली पर्व को किस किससे सीमित किया है कि श्री रामचंद्र जी सीता माता के साथ घर वापस आए बस उसको इसके आगे पीछे और कुछ नहीं पता है। अब जब वो वहां पर बातें कर रहा है सीता माता और राम जी के बारे में तो लोग अक्सर रामपाल के लोग आकर के मुझसे ये ऑब्जेक्शन उठाते हैं कि भाई तुम तू तड़ाक क्यों करते हो रामपाल के लिए? रामपाल जब सीता माता के बारे में बात कर रहा है, श्री राम जी के बारे में बात कर रहा है तो वहां पर तू तड़ाक कर रहा है। वो जगत के स्वामी परमेश्वर
00:13:52:16 और उनके लिए रामपाल जैसा तुच्छ व्यक्ति तू तड़ाक में बात कर रहा है और उसके लिए फिर हमें बाध्य किया जाता है कि भाई तुम कौन होते हो रामपाल के लिए तू तड़ाक में बात करने वाले तुमको संस्कार नहीं है। यह है वो है। रामपाल को संस्कार हैं। उसका उससे पहले जाने कितने पीढ़ियों पहले उसकी जाने कितनी पीढ़ियों पहले रामचंद्र जी धरती पर आकर के धर्म की स्थापना कर चुके हैं और उनके लिए यह रामपाल तूतड़ा की बातें करता है। अच्छा तूत की बातें करते-करते वो बताता भी है कि भाई दीपावली क्यों मनाई जाती है और साथ ही साथ राम जी की जो जिन कथाओं को लेकर के जो लेफ्टिस्ट लोग हैं या जो प्रक्षिप्तवादी लोग हैं या जो परंपरा विरोधी लोग हैं जो सवाल उठाते आए हैं आज तक उन्हीं सवालों को अपनी भाषा में चिपकाने का प्रयास करता है। अब सबसे पहले वह शुरू करता है कि भाई दीपावली कब मनाई थी कि करोड़ों लोगों को मारा गया था तब सीता माता को जीत करके लाए थे। तो यह करोड़ों लोगों को मारने पर जोर देता है। जब वह जेल गया था उसको पकड़ने के लिए मारे गए थे लोग उसके आसपास के लोग मारे गए थे जिनके लिए वो अफसोस प्रकट करता है। वहां पर वो ये नहीं सोचता है। वहां हालांकि अब सोचता होगा। अब तो वो
00:15:07:20 जेल जाने से पहले बोल के गया है ना जो भी बोल के गया जो भी कचरा करके गया है। जेल जाने से पहले करके गया उसी की सजा भुगत रहा है अब तक हम तो खैर उसका कहना है कि भाई बहुत लोगों को मारने के बाद सीता माता को लाया गया और फिर उसने बहुत ही बेहूदा ढंग से यह कहा कि भाई किसी की बात सुनकर के श्री रामचंद्र जी ने सीता माता को वनवास भेज दिया जबकि वो उस समय गर्भवती थी और वहां पर उसने उस इस वीडियो में इस तरीके से प्रस्तुत किया गया जैसे रामचंद्र जी को मालूम था कि सीता माता उस समय गर्भवती थी। फिर उसके बाद उसने एक बहुत ही घिनौनी बात कही। बहुत नीचता पूर्ण वक्तव्य कहा है। इतना नीचता पूर्ण वक्तव्य कि मैं क्या बताऊं? वनवास से सीता का हरण हुआ। यानी उसकी पत्नी का रावण उठा ले गया। और फिर रावण के साथ युद्ध हुआ। पुण्य आत्माओं करोड़ों व्यक्ति मारे गए वहां पर। तब सीता की वापसी हुई। तो ऐसे यह राजा के योग्य भी नहीं थे यह लोग और हम इनको भगवान मान रहे थे। एक गर्भवती औरत को अपनी को घर से बाहर निकाल देता है। कहीं मरो कहीं
00:16:22:26 जाओ कोई बात थी। फिर परीक्षा लेने की क्या जरूरत थी? और क्यों इतनी दुनिया मरवाई फिर छोड़ देता रावण के पास ही रहती हो। इसके साथ ही साथ उसने यह भी कहा है कि भाई सीता माता को एक ही पुत्र जन्म हुआ था और एक घटनाक्रम में वाल्मीकि जी ने दूसरा पुत्र जो है वहां पर प्रकट कर दिया था। तो अब सबसे पहली बात तो हमने क्या जानी कि श्री रामचंद्र जी के आगमन में सीमित नहीं है दीपावली का पर्व हां श्री रामचंद्र जी का आना भी दीपावली से जुड़ा हुआ है। पहली बात। दूसरी बात क्या है? कि सीता माता को वनवास जो भेजा गया था जो यह कह रहा है कि धोबी की बात सुनकर के भेज दिया और उसने इतनी नीचतापूर्ण बात कही है और फिर भी इसके अनुयाई आकर के इसका पक्ष लेते हैं और बताते हैं कि संस्कार क्या होते हैं। है तो इसने जो सीता माता को वनवास भेजने पर जो बात उठाई है उसके लिए मैं बता दूं सबसे पहले तो भगवान ने अगर यह कहा है कि सीता माता को वनवास भेज रहा हूं तो भगवान ने यह भी कहा है वाल्मीकि रामायण में ही कई स्थानों पर कि वह जानते हैं कि सीता माता में कोई दोष नहीं है। जबकि इस धूर्त व्यक्ति ने
00:17:38:19 बार-बार कई बार अपने वीडियो में ये बात कही कि उनको जो है सीता माता पर शक था। जबकि श्री रामचंद्र जी ने अनेकों ने अनेक बार अनेकों बार रामायण में यह बात कही है कि उन्हें सीता माता पर विश्वास था। दूसरी बात श्री रामचंद्र जी ने यह बात भी कही है कि सीता माता और उनमें कोई भेद ही नहीं है। वह अगर क्या कहते हैं? मनीषी हैं। तो सीता माता उनकी कीर्ति हैं। अभेद है उनमें। यह बात भी श्री रामचंद्र जी ने कही है। तो इस दृष्टि से देखा जाए तो श्री रामचंद्र जी अगर शक करेंगे तो किसके ऊपर करेंगे? स्वयं के ऊपर करेंगे। क्योंकि वो स्वयं में और सीता माता में अभेद दृष्टि रख रहे हैं। तो अगर वह स्वयं पर शक करेंगे। अगर श्री रामचंद्र जी स्वयं पर शक करेंगे तो क्या उन्हें अपने बारे में नहीं मालूम होगा कि मैं अपने बारे में जानता हूं कि नहीं जानता हूं कि मेरे मन में क्या चल रहा है या मैंने क्या किया क्या नहीं किया है तो इससे भी यह सिद्ध होता है कि उन्हें सीता माता सीता माता पर शक नहीं था उन्होंने लीला पूर्वक एक कार्य किया था दूसरी बात अब कुछ लोग यह कहेंगे कि भाई हम क्यों मान लें श्री रामचंद्र जी की इस बात पर कि वो अभेद देखते थे सीता माता और स्वयं में तो जब तुम उनकी इस बात को नहीं मान
00:18:53:22 रहे हो कि सीता माता और उनमें वो अभेद देखते थे तो इस बात को कैसे मान लेते हो कि उन्होंने उन्हें उस पर शक था। यह भी है। अब तुम मान लो अब तुम यह भी कह सकते हो कि भाई शक वाली बात जो है वो तो सही है और जो अभेद वाली बात है वो किसी लेखक ने जबरदस्ती लिख दी है। तो फिर तुम्हें वो रामायण लानी होगी। का जो परंपरा प्राप्त रामायण है वो दिखानी होगी जिसमें कि वो दोनों में से कोई एक बात ना हो या तुम्हारे अनुसार उसमें लिखा हो। यह बात आ जाती है। कुल मिलाकर के श्री रामचंद्र जी और सीता माता के लिए जो प्रमाण है वह रामायण ही है। और उसी रामायण में यदि भगवान श्री राम ने सीता माता की अग्नि परीक्षा ली है या फिर धोबी के कह देने पर उनको वनवास भेजा है तो उसी रामायण में उन्होंने सीता माता और स्वयं में अभेद दृष्टि भी बताई है। और उसी रामायण में उन्होंने सीता माता पर शक ना होने की बात को भी स्वीकार किया है। और उसी रामायण में श्री राम का सत्य प्रतिज्ञ होना भी लिखा है। और उसी रामायण में श्री राम का दो दो प्रकार के वचन ना बोलने वाला भी लिखा हुआ है। तो इन बातों पर भी इस धूर्त को जेलधाम निवासी को ध्यान देना चाहिए। अच्छा अब इसके आगे बात करते हैं। क्या दो पुत्र हुए थे? नहीं। वाल्मीकि रामायण में उत्तरकांड
00:20:09:08 में स्पष्ट लिखा हुआ है कि माता सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। जन्म देने के बाद प्रथम दृष्टि वाल्मीकि जी बाहर थे तो उन्होंने जाकर के देखा दोनों ही पुत्र चंद्र कमल के समान सुशोभित हो रहे थे। यह वाल्मीकि रामायण में आपको उत्तरकांड में मिल जाएगा। अब बात आती है कि सीता माता को आखिरकार वनवास भेजा क्यों? जब वो निर्दोष थी तो तो बात ऐसी होती है कि अगर दैवीय दृष्टि से देखें तो पद्म पुराण के पाताल खंड में एक हमें घटनाक्रम प्राप्त होता है जहां पर एक दो तोता और मैना आपस में रामायण की बातें कर रहे होते हैं और सीता माता छोटी होती है उस समय तो वह देखती है कि यह तो मेरी बातें कर रहे हैं क्योंकि हमारा जो टाइमलाइन है वह सीधी तो है नहीं वह सर्कुलर है तो रामायण एक बार नहीं हुई, कई बार हो चुकी है और थोड़ा-थोड़ा सा उसमें कल्प भेद है। तोता मैना वह जो रामायण है शाश्वत रामायण उसकी बातें कर रहे होते हैं तो सीता माता वो सुनती है चकित हो जाती है कि मेरी बातें कर रहे हैं। तो वो अपने पास बुला लेती है उन दोनों पक्षियों को और पूछ पूछती है कि भाई तुम किसकी बातें कर रहे हो? तो रामायण के बारे में बताते तो उनको कहती है कि मैं ही तो सीता हूं।
00:21:24:28 जिस रामायण की तुम बात कर रहे हो उसमें सीता मैं ही हूं। तो और अब तुम दोनों यहीं पर रहो तो वह उनको बंदी बनाने लगती हैं। कहती है कि वह तुम दोनों यहीं पर रहो जब तक मेरे राम नहीं आ जाते हैं। तो वो जो तोता और उसकी पत्नी थी जो वो दोनों व्याकुल हो जाते हैं कि हम स्वतंत्र रहने वाले पक्षी हैं और थोड़ा सा विरोध करते हैं सीता माता का। तो सीता माता उसकी पत्नी को बंदी बना लेती हैं और कहती हैं कि भाई तुम्हें यहीं रहना होगा। बंदी बना लेती है और तोता जो बाहर था वह रह जाता है तो उसकी पत्नी जो थी वह गर्भवती थी तो उसकी पत्नी गर्भावस्था में ही वहां दम तोड़ देती है वियोग के कारण अपने पति के तो जो तोता होता है वह भी संभवत मृत्यु को प्राप्त होता है या फिर उड़ जाता है जाने से पहले श्राप दे देता है तोता जो होता है वह कहता है कि भाई जिस प्रकार से गर्भावस्था में मैंने अपनी पत्नी का वियोग झेला है इसी प्रकार से मैं अयोध में धोबी बन के जन्म लूंगा और मेरी वाणी के कारण मेरे कहे गए वचनों के कारण तुम्हें भी अपने पति का वियोग झेलना होगा वह भी गर्भावस्था में तो एक श्राप यहां पर उनको था सीता माता को जिस श्राप का निर्वाह भगवान
00:22:40:09 को करना था भगवान को निर्वाह करना था ऐसा नहीं कि श्राप के अगेंस्ट नहीं जा सकते भगवान मगर भगवान को वहां स्थापना करनी थी कि अगर श्राप दिया गया तो वो लागू होगा भले ही वो तो पारबह्म परमेश्वर के सगुण साकार स्वरूप की पत्नी ही क्यों ना हो तो उन्होंने उस श्राप का निर्वाह किया। इसके साथ ही साथ इसी तरीके का एक श्राप विष्णु भगवान को भी लगा हुआ था भृगु ऋषि के द्वारा जब भृघु ऋषि की पत्नी का गला उन्होंने सुदर्शन चक्र से काट दिया था। संभवत उन्होंने शायद दैत्यों को संरक्षण दिया था। इस कारण से तो उसके बाद भृगु ऋषि ने उन्हें श्राप दिया था कि भाई तुम भी एक दिन अपनी पत्नी का वियोग झेगी मेरे कारण श्राप दिया था उन्होंने तो उस श्राप का निर्वाह भी यहां पर करना था तो यह तो एक मर्यादा है ना कि भाई हमें अगर हमारे बड़े जिन्होंने श्राप दिया है जो हमारे इस व्यवहारिक धरातल पर हमसे बड़े सिद्ध हो रहे हैं तो उस श्राप का निर्वाह भी हमें करना है उसका मान भी रखना है जिससे कि धर्म स्थापना हो भगवान तो किसी की किसी भी सीमा को लांग सकते हैं, तोड़ सकते हैं। तो वो उनके लिए आवश्यक नहीं था। तो ये तो उन्होंने मर्यादा की स्थापना कर दी ना यहां पर कि आप किस प्रकार से अपने से बड़ों के वचनों में बंधे हुए हैं। इसके साथ ही साथ जैसा कि
00:23:55:10 लवकुश का जन्म है वो विधि का विधान है कि वो कहां होना है? वो होना है वाल्मीकि जी के आश्रम में। तो उस कारण से भी सीता माता का वनवास जाना आवश्यक था। वाल्मीकि जी के आश्रम में जाकर के ठहरना। आवश्यक था और यह वाला जो घटनाक्रम है यह भी रामायण में उत्तरकांड में ही दिया गया है कि उन्होंने क्यों भेजा था। तो अगर उत्तरकांड को कुछ लोग प्रक्षिप्त भी कहते हैं तो उत्तरकांड की अगर इस बात को वो ले रहे हैं कि भाई उन्होंने सीता माता को वनवास भेजा तो उन्हें इस बात को भी लेना चाहिए कि सीता माता को वनवास उन्होंने क्यों भेजा यह बात उन्होंने बताई थी। किस लीला के किस लीला पूर्वक उन्होंने सीता माता को वनवास भेजा था। अच्छा इसके बाद यह घटनाक्रम हो गया। अभी भी कुछ लोग जो तर्क निष्ठ लोग होंगे वह संतुष्ट नहीं होंगे। ठीक है। अब बात आती है कि उन्हें एक मर्यादा और स्थापित करनी थी। वह मर्यादा क्या थी? मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जिन्होंने हमें सिखाया एक नारी सदा ब्रह्मचारी। अपनी पत्नी में सीमित रहना। एक पत्नी व्रत धारण करना। उन्होंने हमें वह दृष्टि दी कि अपनी पत्नी, अपनी भार्या को छोड़कर के समस्त संसार की स्त्रियां या तो तुम्हारी माताएं हैं या फिर तुम्हारी बहनें हैं या फिर तुम्हारी बेटियां हैं। यह दृष्टि
00:25:10:21 हमें भगवान श्री रामचंद्र जी ने दी है। यह दृष्टि इस्लाम ने नहीं दी। इस्लाम ने कह दिया सामान्य है। एक से चार तक विवाह कर लो। यह दृष्टि राम ने दी। राम ने कहा कि एक नारी सदा ब्रह्मचारी। एक पत्नी व्रत धारण किया। वैष्णव माता भी आई कि हमसे विवाह कर लीजिए। तो उनको भी उन्होंने कहा कि नहीं मैं एक पत्नी व्रत धारण किए हुए हूं और वह तो आई थी सुपनखा। तो यह दृष्टि हमें श्री राम ने दी है एक पत्नी व्रत धारण करने की। तो एक पत्नी व्रत धारण करने पर कौन सी स्थिति ऐसी होती है जहां पर भी आपका व्रत नहीं टूटना चाहिए। तो उनमें से एक स्थिति है अपनी पत्नी से दूर रहने की स्थिति। अगर किसी कारणवश आपकी पत्नी आपके पास नहीं है उससे दूरी है आपकी तो उस स्थिति में क्या आपको दूसरा विवाह कर लेना चाहिए? क्या दूसरी स्त्री ले आनी चाहिए? यहां पर उदाहरण भी भगवान श्री रामचंद्र को सेट करना था। उसके लिए भी माता सीता का वनवास या उनसे दूर होना आवश्यक था। तो यह भी एक लीला पूर्वक एक मर्यादा एक धर्म स्थापना करने के लिए कि आप अपनी पत्नी से भले ही दूर क्यों ना हो परंतु आजीवन उसी के लिए समर्पित होकर के जीना आपका कर्तव्य है। आपका धर्म
00:26:25:22 है। इस धर्म की स्थापना भी श्री रामचंद्र जी ने इस लीला के द्वारा स्थापित की। अच्छा अब इसके बाद एंड में सबसे जरूरी सिद्धांत और यह ऐसा सिद्धांत है जो आपके लिए आपके जीवन में प्रत्येक प्रतिदिन तो आपको जो है कहीं ना कहीं दिखाई दे ही जाएगा। क्या होता है कि अच्छे और बुरे में से अच्छे को चुनना बहुत आसान होता है और बुरे को त्यागना बहुत आसान होता है। धर्म और अधर्म में से धर्म को चुनना और अधर्म को त्यागना बहुत आसान होता है। पर तब बहुत कठिन स्थिति होती है जब दोनों और धर्म होता है। और ऐसी ही कठिन स्थिति के लिए हमारे बीच में एक आदर्श स्थापित किया भगवान श्री रामचंद्र जी ने। जब उन्होंने दोनों तरफ दिखाई देने वाले धर्म में से एक धर्म को वरीयता दी। किस आधार पर वरीयता दी वह आप सुनिए। भगवान श्री रामचंद्र जी की जो जनता थी, प्रजा थी, वो स्वधर्म निष्ठ थी। जिसका जो कर्म था वही वह करती थी। इसी कारण से राम राज्य का जो वर्णन है वहां पर यह आता है कि हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए। धूप उतनी ही निकलती थी जितनी निकलनी
00:27:41:03 चाहिए। ठंडक भी उतनी ही होती थी जितनी सुखप्रद हो। कभी अकाल मृत्यु कोई नहीं मरता था। मरता था तो उसके लिए राजा को जिम्मेदार ठहराया जाता था श्री रामचंद्र जी को और श्री रामचंद्र जी उस समस्या को हल करते थे। तो ऐसी स्वधर्म निष्ठ जो प्रजा थी वह एक प्रकार के दुख से या कष्ट से या कहे पीड़ा से संघर्ष कर रही थी कि जो स्त्रियां व्यभचारणी होती थी या जो स्त्रियां अपने पति की आज्ञा के बिना अनुमति के बिना जानकारी के बाहर कहीं और समय बिताती थी। वो माता सीता का आलंबन लेकर के उदाहरण देकर के और अपने पति पर अपनी मंतव्य की अपने पति के समक्ष अपने मंतव्य को सिद्ध करने का प्रयास करती थी और माता सीता का उदाहरण आ जाने के कारण जो घर का स्वामी होता था जो पति होता था वो कोई उत्तर नहीं दे पा रहा होता था तो यद्यपि इसका तार्किक समाधान था मगर उसको करतेकरते काफी समय लग जाना था तब तक यह जो विकृति थी फैल रही थी जिसके कारण प्रजा में कष्ट हो रहा था। तो दर्शन, विज्ञान और व्यवहार तीनों प्रकार के जो मत होते हैं उसके
00:28:56:09 सामंजस्य से निर्णय लिया जाता है। और भगवान श्री राम ने अपने रामायण में ही एक बार यह भी कहा है कि जिस राज्य में राजा की निंदा हो रही होती है, वह राजा भी अधोगामी हो जाता है। तो राजा का पहला कर्तव्य हो जाता है कि प्रजा का संरक्षण करना। अगर प्रजा किसी कारण से संघर्ष कर रही है, किसी प्रकार की कष्ट से संघर्ष कर रही है और वो जो कष्ट है वो व्यापक है तो उस कष्ट से निकालना भी राजा का ही कार्य होता था। होता है। वास्तविकता यही है। राजा का ही कार्य है। उस प्रकार के कष्ट से अह बाहर निकालना अपनी प्रजा को। तो जब प्रजा इस कष्ट का सामना कर रही थी कि जो इस प्रकार की स्त्रियां थी जो अपने पति पर जो है हावी होने का प्रयास करती थी इस आधार पर कि सीता भी तो वही रह के आई है। उसको तो कुछ नहीं कहा गया। तो इस कारण से भगवान श्री राम के समक्ष दो धर्म आ गए। एक धर्म जहां पर प्रजा परेशान है, प्रजा भी निर्दोष है। मगर प्रजा के सामने ऐसा चक्रव्यूह रचा जा रहा है जिसके कारण वह उसमें फंस करके जो है परेशान हो रही है। कष्ट को भोग रही है। प्रजा भी निर्दोष है और इधर सीता माता भी निर्दोष है। तो दोनों
00:30:11:10 तरफ धर्म है। एक तरफ पत्नी है तो पति का धर्म, एक तरफ प्रजा है तो राजा का धर्म। तो ऐसे में क्या किया जाए? अगर हम पत्नी निर्दोष पत्नी के साथ पत्नी को कष्ट नहीं देते हैं तो प्रजा कष्ट में रहती है और अगर हम निर्दोष प्रजा को कष्ट में नहीं कष्ट नहीं देते हैं तो पत्नी कष्ट में रहती है। तो ऐसे में यहीं पे भगवान श्री रामचंद्र ने सबसे बड़ा सिद्धांत हमको दिया। यह बहुत कठिन स्थिति होती है कि दो अच्छे रास्तों में से ज्यादा अच्छा चुनना और दो गलत रास्तों में से कम गलत चुनना। तो कैसे करें? तो इसी चीज को इस निर्णय को इस उदाहरण को इस दृष्टांत को प्रस्तुत करके भगवान श्री रामचंद्र जी ने हमारे समक्ष एक उदाहरण स्थापित किया। एक आदर्श स्थापित किया कि जब आपके समक्ष आपका जो व्यष्टि का धर्म है वो समष्टि के धर्म पर हावी होने लगे तो अपने व्यष्टि के धर्म का त्याग कर देना चाहिए। आपके व्यक्तिगत आत्म कल्याण के लिए आपसे जुड़ी हुई चीजें जो उसके निमित्त जो आपका धर्म है जब वह आपके उस धर्म पर हावी होने लगे जो समष्टि के लिए है जो व्यापक है तो आपको उस समय अपने व्यष्टि के अपने व्यक्तिगत आत्म कल्याण
00:31:26:12 के निमित्त जो चीजें हैं उनका त्याग कर देना चाहिए और वैसा ही भगवान श्री रामचंद्र जी ने भी किया अपने पत्नी के समक्ष जो उनका धर्म था कि उनको कष्ट नहीं देना चाहिए पत्नी की रक्षा करनी चाहिए ये उनका व्यष्टि का धर्म था मगर एक राजा होते हुए उन्हें अपनी प्रजा को कष्ट नहीं देना चाहिए यह समष्टि का धर्म धर्म था और उन्होंने समष्टि के धर्म का अनुकरण किया अनुसरण किया और अपनी निर्दोष पत्नी को भी वनवास भेज के एक उदाहरण एक मर्यादा स्थापित की कि जब आपके समक्ष दो सही रास्ते हो तो दोनों में से ज्यादा सही और दो गलत रास्ते हो तो दोनों में से कम गलत आप किस आधार पर चुनेंगे। अब देखिए दूसरे उदाहरण जो भीष्म जो भीष्म जी थे उनके समक्ष द्रोपदी का चिरण हो रहा था। तो एक अबला एक नारी की गरिमा के और सम्मान के लिए लड़ना यह धर्म है और क्षत्रिय तो थे ही तो यह धर्म था उनका उनकी रक्षा करना उनके सामने पाप हो रहा था परंतु वह चुप रहे क्यों चुप रहे क्योंकि उनका व्यष्टि का धर्म था क्या धर्म था कि उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी उन्होंने प्रतिज्ञा ली थी ये उनका व्यष्टि का धर्म था और जो द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था
00:32:41:22 और वहां पर उस द्रोपदी की रक्षा करना करना उनका समष्टि का धर्म था। मगर वह सही निर्णय नहीं ले पाए। दो गलत रास्तों में से कम गलत। अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ना भी गलत है और द्रोपदी को ना बचाना भी गलत है। मगर दोनों में से ज्यादा गलत क्या है? द्रोपदी को ना बचाना। अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ देना उतना गलत नहीं है। क्यों? क्योंकि उसका प्रभाव केवल तुम्हारे ऊपर हो रहा है। और जहां पर एक नारी का सरेआम शोषण हो रहा है। सरेआम उसकी गरिमा को भंग किया जा रहा है। वो एक समष्टि की बात है। परंतु उन्होंने वहां पर अपने आत्म कल्याण की बात पर ज्यादा ध्यान दिया कि मैं अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता। मगर वहां पर उन्होंने समष्टि के धर्म को पीछे कर दिया और व्यष्टि के धर्म को आगे कर दिया। इसी प्रकार से द्रोणाचार्य ये दोनों ही महानुभाव धर्म के मर्मज्ञ थे। मगर फिर भी यहां पर इनसे चूक हो गई कि इन्होंने अपने व्यष्टि के धर्म को आगे कर दिया। समष्टि के धर्म को पीछे कर दिया। कई तो पिता की आज्ञा मानना यह व्यक्तिगत धर्म है और पिता यदि अत्याचारी हो जाए और वहां पे भी उसकी बात मानना उसके अत्याचार में उसका साथ निभाना तो यह समष्टि का समष्टि के अनुसार यह अधर्म
00:33:57:03 है और यही उदाहरण हमको मिलता है प्रह्लाद जी से तो यहां पे अपने व्यक्तिगत धर्म का त्याग किया क्यों क्योंकि जिससे कि काल क्रम से कालांतर में हम जैसे तुच्छ उच्च प्राणियों के आने पर हमको भगवान का नाम मिल पाए नारायण नारायण हम लोग जप पाए तो जब समष्टि का धर्म हमारे व्यक्तिगत धर्म पर हावी हो जाए तो वहां पर समष्टि के धर्म को चुना का चयन होना चाहिए व्यष्टि के धर्म का नहीं यह सिद्धांत हमें श्री रामचंद्र जी ने स्थापित कर दिया कि हम अपनी निर्दोष प्रजा को कष्ट नहीं देंगे भले ही अपनी निर्दोष पत्नी को कष्ट देना पड़े। अब दूसरी जो दैय बातें हैं आध्यात्मिक और पीछे बहुत सारी चीजें हैं वो सब मैंने आपको बता ही दिया। तो ये ये जो धूर्त व्यक्ति है इसकी नीचता भरे जो वक्तव्य हैं उनका निराकरण है। दीपावली का समाधान है कि दीपावली आखिरकार मनाई क्यों जाती है और सभी को दीपावली की धन त्रयोदशी की और भाई दूज की गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं। जय श्री राम।
00:35:04:16 [संगीत]
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दीपावली पर सतलोकी गैंग का बड़ा पर्दाफाश | सच जानकर दंग रह जाएंगे!
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