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00:00:02:04 तो हम लोग डिफरेंस करते हैं उसमें लेकिन डिफरेंस इसमें जरूरी है क्योंकि उसने मेहनत करी है तब उसको आईआईटी मिला है। लेकिन इसमें जन्मना वर्ण व्यवस्था ने मान लीजिए किसी की रुचि नहीं हुई। ब्राह्मण के बच्चे को ना रुचि हुई शास्त्र पढ़ने में तो मतलब होता नहीं है। डॉक्टर का बेटा जरूरी थोड़ी ना कि डॉक्टर बने। पहली बात यह है कि रुचि के ऊपर हम धर्म और अधर्म की व्याख्या नहीं करते हैं। किसी की रुचि अगर नहीं है अपनी बहन को बहन की तरह से देखने की तो क्या हम उसको वो स्वतंत्रता दे देंगे? धर्म और धर्म की व्याख्या रुचि के अनुसार नहीं होती। अगर हम वर्णा जन्मना वर्ण व्यवस्था पे ध्यान देंगे तो एक बच्चे को बचपन से ही वह संस्कार मिलते हैं जो उसके घर में उसके पूर्वज करते चले आ रहे है। उसको उस उस बच्चे के अंदर वो संस्कार जेनेटिक के द्वारा भी आते हैं और प्रायोगिक रूप से व्यवहारिक रूप से अह उसमें वो स्थापित करना भी बहुत सरल होता है। बजाय इसके कि किसी ऐसे बच्चे के अंदर जिसने जिसके यहां पे मान लीजिए कि अह रक्षा प्रणाली की शिक्षाएं ना होती हो, जहां क्षत्रिय ना हो, और उस बच्चे को जो है आप क्षत्रिय बनाने की कोशिश करेंगे, तो वहां आपकी मेहनत, वहां आपका धन और समय तीनों चीजें ऊर्जा, धन और समय तीनों चीजें अधिक होंगी। क्या कहते हैं? कंपैरेटिवली टू
00:01:17:13 अ जहां पर पहले से ही क्षत्रिय घर में वो उत्पन्न होगा, उसके अनुवांशिकता में वही चीजें होंगी। तो उसके अंदर स्थापित करने के लिए। दूसरी बात यह नहीं कहा जा रहा है कि किसी के अंदर यदि वो गुण नहीं है तब भी उसको वही मानो। वो गुण नहीं है तो उसको पतित क्षत्रिय मानो। वो गुण नहीं है तो उसको पतित ब्राह्मण मानो। और जो ब्राह्मण के अनुसार होने वाले कर्म है उनसे उसको बहिष्कृत करो। अगर कोई ब्राह्मण अपने वर्ण के अनुसार कार्य नहीं कर रहा है तो जन्मना वर्ण व्यवस्था के अनुसार उसका त्याग कर देना चाहिए। उसको फिर जो सामान्य ब्राह्मणों में नहीं गिना जाना चाहिए। पहली बात। दूसरी बात यह है कि अगर हम जो आप जिस वर्ण व्यवस्था की बात कर रहे हैं कि जिसके जिसका जो है जिसकी रूचि जिसमें हो गई जिसने जो योग्यता प्राप्त कर ली आपके अनुसार जो योग्यता उसने प्राप्त कर ली उसके अनुसार उसको मान लेना चाहिए। उसी का उसी का तो नतीजा हम झेल रहे है ना। कोई भी व्यक्ति अपने दायित्व से भागने के लिए स्वतंत्र है। अर्जुन नहीं भाग पाया। अर्जुन के मन में जब विरक्तता आई कि मैं सब छोड़ छाड़ के जंगल चला जाऊं तो भगवान ने उसको उसका धर्म याद दिलाया। तू क्षत्रिय है। तेरा कर्म है धर्म लड़ना और रक्षा करना। धर्म युक्त युद्ध मोक्ष का द्वार है एक क्षत्रिय के लिए। ये भगवान ने उसको याद दिलाया। वरना अगर कर्म
00:02:32:21 के अनुसार होती तो उसकी तो रुचि हो रही थी। ब्राह्मणत्व में वो तो सन्यासी बनने जा रहा था। रुचि हो रही थी ना। भगवान ने उसकी रुचि काट दिया। कि तेरा धर्म भागना नहीं है। युद्ध छोड़ के जाना चाहिए। नहीं है क्योंकि जन्मना वर्ण व्यवस्था उचित है। आप ही बताइए अगर दायित्व से भागने को भी हम दायित्व का नाम दे देंगे तो दायित्व से भागने का दोष क्या रह जाएगा? अगर किसी को ड्यूटी दी गई है कि तुम यहां पर जो है रक्षा करो। इस एटीएम की रक्षा करो। इस बैंक की रक्षा करो। मुसीबत आने पर वो जो है भाग गया वहां से और टमाटर बेचने लगा। उसको हम ये नहीं कह सकते कि तुम अपने दायित्व से भागे हो। क्योंकि वो कहेगा मेरा दायित्व तो टमाटर बेचना है ना करुणा वर्ण व्यवस्था के अनुसार।
00:03:16:14 तो दायित्व से भागने को भी दायित्व का नाम देना यही इसी पर आपत्ति है। उसी का उसी का वो है आज विप्लव संसार सिस्टमेटिकली चल रहा है क्या नहीं चल रहा है। राम राज्य में हवा उतनी ही चलती थी जितनी चलनी चाहिए। धूप उतनी ही निकलती थी। निकलती थी जितनी निकलनी चाहिए। कोई अकाल मृत्यु नहीं पड़ता था। कोई त्रासदी नहीं होती थी। क्यों? क्योंकि व्यवस्था थी। क्योंकि व्यक्ति वो कार्य करता था जो उसके लिए है जिसके जो उसके लिए निश्चित और आप जो व्यवस्था दे रहे हैं समाज को उसमें यही तो हो रहा है। कोई पुलिस वाला अपने दायित्व से भागने के लिए स्वतंत्र है। नौकरी छोड़ देगा। स्वतंत्र है वो। डॉक्टर अपने आप कह रहे हो इंजीनियर है। वो इंजीनियर कभी भी रेिग्नेशन देने के लिए स्वतंत्र है। भाई मगर जब व्यक्ति जन्म से होगा तो यदि वो छोड़ेगा तो उसको कृष्ण जैसे लोग याद दिलाएंगे। तेरा धर्म है रक्षा करना तू भाग नहीं सकता है ना तुझे युद्ध लड़ना ही होगा तो जहां पर आप उसको दोष याद दिला सके वो व्यवस्था अपनानी पड़ेगी ना तो मतलब ये कहना ये कहना है कि जो जन्म वर्ण व्यवस्था है वो भगवान ने दायित्व दिया है तो उसको निर्वाह पूरी जीवन भर करना है उसका जीवन
00:04:31:27 उसका निर्वाह करना ही आपके लिए श्रेष्ठतम है जो आपको दायित्व मिला है सबसे बड़ी बात क्या है कि ब्राह्मण और शूद्र के विषय विषय में एक मिथ्या फैला दी गई है। शूद्र का मतलब अपराधी और ब्राह्मण का मतलब परोपकारी। नहीं ऐसा नहीं है। अगर ऐसा था तो रावण को क्यों रावण को अभी तक ब्राह्मण लिखा गया। उसको कहां शूद्र लिख दिया गया शास्त्रों में? तो शूद्र का अर्थ है गाली बना देना। ये प्रोपेगेंडा है। शूद्र अपराधी नहीं है। शूद्र भी मनुष्य है। वो भी अच्छा हो सकता है। किसने कहा कि शूद्र एक गाली है। आज समाजियों ने ये चीज बनाई है कि शूद्र होना तो पाप है। अच्छा देखा जाए तो आर्य समाजियों के यहां पर विवाह किसका होता है? बताइए। किसका विवाह होता है? आर्य समाजियों के यहां पापियों का। क्योंकि जो लोग वहां पर लेकर के इस तरीके से पिता की आज्ञा के बिना मातृ शक्तियों को ले पहुंचते हैं विवाह करने के लिए। क्या उनका जनेऊ होता है? नहीं होता है। विवाह करा देते हैं पट से। यानी कि पापियों का अगर शूद्र पापी है। शूद्र का होना दुरा। सूद का अर्थ है दुराचारी तो जितने लोग आर्य समाज से विवाह कर रहे हैं रिकॉर्ड कर लो इस बात को जितने लोग आर्य समाज से विवाह कर रहे हैं वो सब पापी है जहां से उन्होंने विवाह किया है
00:05:47:08 उसी के अनुसार पापी हो तुम सब लोग जिन्होंने आर्य समाज से विवाह किया है सच्चाई से मुंह कब तक फेरोगे तो शूद्र होना पाप नहीं है ब्राह्मण होना निर्दोष का वो नहीं है कि भैया ब्राह्मण है तो निर्दोष है ये उसने ब्राह्मण घर में जन्म लिया है। अब यदि वो अपने दायित्व से भागेगा तो वो भी दोषी है। और जिसने शूद्र के घर में जन्म लिया अगर वो अपने दायित्व से नहीं भागेगा तो वो भी प्रणम में है। वो भी आदर्श है। समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है। ठीक है। धन्यवाद। जय सीताराम। जय श्री राम।
00:06:26:01 [संगीत]
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क्या शूद्र होना पाप है? आर्य समाज में होने वाले विवाह का की वास्तविकता क्या है?
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