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00:00:00:16 जैसे आपके अनुसार क्या इस्लाम भी धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी भी धर्म है? देवता

00:00:07:15 धर्म के बाद अब्राहम आया जिसने अपनी आखरी बल से पवित्रता की शक्ति से इस्लाम धर्म से।

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00:00:18:00 कहता है कि ब्रह्मा कुमारी का जो ईश्वर है वो सर्वशक्तिमान तो सिद्ध नहीं हो रहा। परमात्मा ने स्वयं ही कहा है ना कि मैं स्वयंभूत हूं। मैं सर्वशक्तिमान हूं। लेकिन मैं अगर मनुष्य की भांति नहीं मिलेगी तो फिर मनुष्य में मुझ परमात्मा में अंतर ये जो

00:00:38:04 बाइबल है, कुरान है, जो गुरु ग्रंथ है, साहित्य है, इन सबको लिखने वाले जो है तो सभी को जय श्री राम। इस समय हम हैं भिलाई में। ब्रह्मा कुमारीज का यहां पर केंद्र है और हमारे साथ में हमारी दीदी बैठी हुई हैं और जैसा कि आप सब लोग जानते हैं विभिन्न जो धार्मिक मान्यताएं हैं उनको लेकर के हम चर्चाएं करते हैं और वो आपके समक्ष रखते हैं। तो आज हम इसी क्रम में यहां आए हुए हैं। तो सबसे पहले मैं दीदी आप अपना थोड़ा सा परिचय दे दीजिए यहां का और थोड़ा सा अपने बारे में कि आप मतलब आपका परिचय देते हुए यहां के बारे में थोड़ा सा बता दीजिए जन सामान्य को। ओम शांति

00:01:23:03 प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय की यह शाखा जो भिलाई के चरोदा पर है। संस्थान जो है वो माउंट आबू से रिले होती है। हमारा मुख्यालय माउंट आबू पर है और वहां से ही ऑल वर्ल्ड में यह सेवाएं होती हैं। वर्तमान समय मुख्यालय से जो हमारी संस्था है विश्व में वो 4500 से भी ज्यादा सेवा केंद्रों के माध्यम से मानव समाज कल्याण अर्थ सेवा कर रही है। जहां विभिन्न वर्गों से सेवा होती है। समय-समय पर यहां सामाजिक कार्यक्रम के माध्यम से सभी विश्व की आत्माओं को परमात्म संदेश दिया जाता है। परमात्म संदेश से तात्पर्य कि आज हम भिन्न धर्मों से और भिन्न जातियों से जुड़े हुए हैं। लेकिन परमात्मा जो निराकार है वह निराकार परमात्मा इस सृष्टि पर अवतरित होकर के सत्य गीता ज्ञान जो हम आत्माओं को सुना

00:02:38:12 रहे हैं और इसी गीता ज्ञान को सुनकर के जो हम आत्माओं की सद्गति होती है और फिर सृष्टि में एक नव परिवर्तन आता है वो नव परिवर्तन होता है सतयुगी सृष्टि के आरंभ से और इसके माध्यम से ही यह जो हमारे सेवा स्थान है। यह अपने राजयोग की जो सेवा देते हैं। उस राजयोग में ही हमें यहां आत्मा और परमात्मा का परिचय मिलता है और आत्मा परमात्मा के परिचय से ही हम मेडिटेशन के माध्यम से अपने अंतर जगत की यात्रा करते हैं और अंतर जगत की यात्रा करके ही हम उस परम सत्य से जुड़ पाते हैं। जहां हमें आत्मिक शांति सुख, आनंद और प्रेम की प्राप्ति होती है। अच्छा दीदी जी थोड़ा सा हमारे दर्शकों को आप बताएंगे कि ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार धर्म क्या है?

00:03:38:21 ब्रह्मा कुमारी के अनुसार से धर्म दहिक नहीं है। हम धर्म से तात्पर्य होता है धारणा। और धारणा सभी धर्मों की है। जो अपने धारणा में परिपक्व हो वही सही धर्म है। क्योंकि हमारा जो धर्म है वो है आदि सनातन देवी देवता धर्म जो सृष्टि के आदि से चला आया है। आदि सनातन आदि सनातन क्योंकि वर्तमान का जो समय चल रहा है परमात्मा के कहे अनुसार यह समय कल्याणकारी पुरुषोत्तम संगम युग का समय है और इसी संगम युग में परमात्मा एक मानव तन का आधार लेकर के ही सृष्टि की पुन स्थापना का कार्य कर रहे हैं। जिसे उन्होंने नाम दिया है प्रजापिता ब्रह्मा और इसी प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से ही यह ब्रह्मा कुमारी की जितनी भी शाखाएं हैं उसी नाम से ही चल रही है। नहीं नहीं जैसे मैंने पूछा ना कि धर्म किसे कहें? जैसे धर्म एक व्याख्या आई है भगवत गीता में कि अ तेरे लिए कर्तव्य

00:04:53:27 और अकर्तव्य की स्थिति में विषय में केवल शास्त्र प्रमाण है। तो जैसे हमको विवाह किससे करना है यह भी एक धर्म है। या विवाह करना है कि नहीं करना है यह भी एक धर्म है। पिता की आज्ञा माननी है कि नहीं माननी यह भी एक धर्म है। किसकी आज्ञा माननी है, किसकी नहीं माननी यह भी एक धर्म है। तो क्या करना है और क्या नहीं करना है। इस विषय में एकमात्र शास्त्र प्रमाण है। कहा तो यह हमारा धर्म है। तो धर्म की उपयोगिता क्या है? मतलब धर्म को हम किसी को कैसे परिभाषित करते हैं? क्या है धर्म? जैसे आपने कहा विभिन्न धर्म तो जैसे आपके अनुसार क्या इस्लाम भी धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी भी धर्म है? क्योंकि वहां पर तो धर्म शब्द नहीं मिलता। दूसरे शब्द मिलते हैं तो फिर वह धर्म क्या चीज है जो जिसके कारण हम उसको भी धर्म कह रहे हैं

00:05:55:15 इसे कैसे समझाया जाए हम इसको इस तरह से देख लेते हैं जैसे कि आपने कहा ना ईश्वर निराकार है हम फिर दूसरी तरफ हम कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है हम है ना तो निराकार है। वह किसी और शरीर का उपयोग करता है। है ना? क्या वह स्वयं से अवतरित होता है? क्या परमात्मा के बारे में जो स्वयं परमात्मा ने बताया है जी कि मैं स्वयंभू हूं। हम म स्वयं से जन्म लेने वाला। हम ना ही मैं जन्म किसी मानव रीति से जन्म लेता ना ही मैं मरता। माना वो परमात्मा जो जन्म और मृत्यु दोनों से परे है। अर्थात वो सर्वशक्तिवान है। नहीं नहीं ये तो बताया उसने परमात्मा ने कि मैं जन्म और मृत्यु से परे हूं। मगर क्या वो चाहे तो ये जो लीला रूपी संसार है प्रपंच रूपी संसार है। इसमें जैसे कि हम हम लोग हैं। हम भी आत्माएं आत्माओं के रूप में सनातन हैं। है ना? हां। है ना? मगर फिर भी हम लीला रूपी संसार में रूप लेते हैं। शरीर धारण करते हैं। है ना? तो उसी तरीके से क्या ईश्वर भी इस तरह

00:07:10:19 से शरीर धारण कर सकता है? नहीं। परमात्मा ने कहा कि मैं शरीर धारण कब करता हूं? जब मुझे इस सृष्टि का परिवर्तन करना होता है। तब मैं आकर किसी और शरीर में आता। हां। किसी अपने से जैसे हम लोग अपने से शरीर में आ रहे हैं। वैसे परमात्मा नहीं आ सकता। परमात्मा ने कहा ना तो मैं पर काया प्रवेश करता हूं। पर आया प्रवेश तो इसमें इसमें वो जो टॉपिक है ना कि दूसरे चीजों को हम धर्म कैसे कह रहे हैं या फिर धर्म क्या होता है वो उससे रिलेटेड है तो इसमें क्या है कि [संगीत] जब हमने यह कहा कि ईश्वर पर काया प्रवेश तो कर सकता है परंतु स्वयं से माता के गर्भ से प्रकट होकर नहीं दिखा सकता तो इसमें फिर एक बाधा लग रही है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रहा क्योंकि सर्व का अर्थ है सभी कार्यों को करने की शक्ति जिसमें हो वो सर्वशक्ति शक्तिमान है। जैसे हम कहे क्या ईश्वर उड़ सकता है? तो हां बिल्कुल उड़ सकता है। क्या ईश्वर गायब हो सकता है? तो गायब हो सकता है। क्या ईश्वर हर जगह हो सकता है? हां हो सकता है। क्या ईश्वर शेयर को हवा में उड़ा सकता है? बिल्कुल उड़ा सकता है। तो तभी उसको हम सर्वशक्तिमान कह रहे हैं। मगर यहां पे हम कह रहे हैं कि वो जन्म नहीं ले सकता। जी यहां हम इसको ऐसा भी कह सकते हैं हम कि

00:08:26:07 परमात्मा निराकार है और बाकी सभी जो आत्माएं हैं उनमें कोई देव आत्मा है कोई धर्म आत्मा है कोई महान आत्मा है कोई पाप आत्मा है और कोई पुण्य आत्मा है हम हम कभी भी पुण्य परमात्मा नहीं कहते या पुण्य धर्मात्मा नहीं कहते या पुण्य महात्मा त्मा नहीं कहते। परमात्मा से तात्पर्य कि वह सर्वोपरि है, सर्वोच्च है। और बाकी जो आत्माएं हैं चाहे वो देव आत्मा हो, धर्मात्मा हो, महान आत्मा हो, पुण्य आत्मा हो या पाप आत्मा हो यह हम सभी आत्माएं जो है जो माता के गर्भ से जन्म लेती हैं, मृत्यु को प्राप्त करती हैं और फिर जन्म लेती हैं। और परमात्मा जो कि निराकार है, वो इस जन्म मरण के चक्कर से परे है। नहीं नहीं वो स्वयं परमात्मा अलग है और देव आत्मा अलग नहीं वो तो है यदि वो चाहे वो चाहे तो वो कर सकता है ले सकता है जन्म या नहीं ले सकता परमात्मा चाहे तो जैसे उसका मन हुआ कि भाई मैं लीला में आऊं खेलूं कूदूं या मतलब अपने मन से ये नहीं कि उसको बाध्य है कि अभी आज जैसे हम लोग अपनी मृत्यु को कंट्रोल नहीं कर सकते

00:09:41:22 मगर वो चाहे कि मैं अपने इच्छा अनुसार जब चाहूं तब शरीर को त्यागू मैं अपनी इच्छा अनुसार जब चाहूं तब आऊं हमारे कंट्रोल में जन्म मृत्यु नहीं है। उसके कंट्रोल में है तो क्या वो इस कंट्रोल के साथ आ सकता है या नहीं? और नहीं आ सकता है। अगर मान लिया कि उसने कहा है कि मैं नहीं आ सकता। फिर उसको हम सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? परमात्मा को सर्वशक्तिमान कैसे कहेंगे? हम जैसे हम कहते हैं सर्वज्ञ। सर्वज्ञ का मतलब है ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसको ज्ञात ना हो। है ना? हम कहते हैं सर्वव्यापी। तो सर्वव्यापी का अर्थ यह है हम उसको नहीं कहते। मान लीजिए हमने कहा आप नहीं कहते हैं कई आइडियोलॉजीस कहती भी हैं। तो मान लीजिए किसी ने कहा सर्व्यापी तो सर्वव्यापी का अर्थ आएगा कि ऐसी कोई जगह नहीं है जहां पर वो व्याप्त ना हो। तो जब हम कह रहे हैं सर्वशक्तिमान तो ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वो ना कर पाए। कारण हां परंतु यहां पर एक प्रॉब्लम आ रही है कि वो जो है जन्म नहीं ले सकता। जी परमात्मा ने स्वयं भी कहा है ना कि मैं स्वयं हूं। मैं सर्वशक्तिमान हूं। लेकिन मैं अगर मैं भी जन्म ले लूं अगर मनुष्यों की भांति मैं भी जन्म ले लूं तो फिर मनुष्यों में और फिर मुझ परमात्मा में अंतर अंतर ये रह जाएगा कि मैं जब चाहूं तब मरूंगा मनुष्य जब

00:10:56:28 चाहे तब नहीं मरता है। मैं जब चाहूं तब उत्पन्न होऊंगा। मनुष्य जब चाहे तब नहीं उत्पन्न होता है। जी जो परमात्मा के ज्ञान के आधार पर जो परमात्मा से हम आत्माओं को ज्ञान मिला है तो उन्होंने जो बताया कि सृष्टि रूपी ड्रामा ये सृष्टि रूपी नाटक रंगमंच जो कि 5000 वर्ष का एक बना बनाया नाटक रंगमंच है जो एक ड्रामा की भांति चल रहा है सिर्फ ड्रामा में परमात्मा का इस सृष्टि पर आना भी नो होता है लेकिन वो होता है परकाया प्रवेश परकाया प्रवेश वो तभी करते हैं। जब कलयुग के अंत में अति धर्म ग्लानी का समय होता है तब वो परकाया प्रवेश करते हैं और फिर वो आकर के हम आत्माओं को यहां जो पुण्य आत्माएं होती है वो स्वयं अपना भी परिचय देते हैं और फिर वो यही कहते हैं कि जो गीता में लिखा हुआ है गीता में जो लिखा हुआ है यदा यदा ही धर्म से भारत धर्मस तदात्म इस सृष्टि रंगमंच पर कल कल्प में एक बार आता हूं। 5000 इसमें कल्प की बात तो नहीं आई है। हां मतलब ये पूरा वो कहते हैं जब जब धर्म की हानि होती है तबत मैं जो है अधर्म का नाश करने

00:12:12:00 के लिए साधु भक्तों के उद्धार गणी परित्राणाय साधु नाम जी है ना विनाशाय चतुष्कताम तो वो तबत मैं अपना स्वयं का सृजन करता हूं। वहां पे ये भी नहीं कहा है कि मैं परकाया में प्रवेश करता हूं। वहां पे कहा मैं सृजन करता हूं। अपने आप का स्वयं रूप बनाता हूं। तो परमात्मा ने यह भी कहा ना कि धर्म की ग्लानी केवल एक बार होती है। सतयुग और त्रेता युग में धर्म ग्लानी नहीं हुई। द्वापर और कलयुग के बीच में भी नहीं हुई। ये कलयुग अंत में हुई। नहीं नहीं दीदी वो जो विषय चल रहा है ना वो ये चल रहा है कि ईश्वर ये मनुष्यों की भांति अवतार ले सकता है कि नहीं? परगाह प्रवेश नहीं मगर मनुष्यों की भांति शरीर धारण कर सकता है कि नहीं? अगर नहीं कर सकता है वो अलग बात है। मगर नहीं कर सकता तो फिर उसकी ये जो सर्वशक्तिमत्ता है उसमें क्वेश्चन उठ जाता है। जैसे अगर दुनिया में कोई भी एक कार्य है जो वो नहीं कर पा रहा है तो उस पर फिर क्वेश्चन आ जाता है। वो सर्व शब्द हट जाएगा। फिर सर्व का मतलब तो सर्व ही है। कि वो सब कुछ कर सकते हैं। जी तो वो सब कुछ तो कर ही रहे हैं। तो वो जन्म कहां ले रहे हैं? अच्छा वो जन्म इसलिए नहीं ले रहे हैं क्योंकि वो निराकार है। तो इसका मतलब वो नहीं ले सकते ना। बाधित हो गए ना तो वो कोई परया प्रवेश तो कर रहे हैं ना नहीं तो जन्म नहीं

00:13:27:01 ले रहे ना हां जन्म नहीं ले रहे हैं जन्म मरण के चक्र से परे तो तो कहना चाहिए जो ये जो विशेषण है ना सर्व ये एक विशेषण है ये तब लग रहा है जब सर्व मतलब जिसमें सब हो गया सब हां या तो जैसे हम सर्वज्ञ कहेंगे तो हम कहें कि क्या ईश्वर ये जानता है कि नाली में कौन सा कीड़ा चल रहा है अब हम कह दे कि वो नाली में जानना उसका काम नहीं है हम कह दे वो अच्छी चीज नहीं है उसको क्यों जाने ईश्वर तो मगर वो अगर नहीं जानता है कि नाली में क्या है तो वहां पर सर्वज्ञता नष्ट हो जाएगी। यह मानना पड़ेगा कि नाली की चीजें भी उसको पता है। यानी कि अच्छी और बुरी सब चीजें उसको पता है। इसीलिए अगर कोई छोटा काम है या बड़ा काम है। अगर छोटा भी है तो भी उसको करना होना चाहिए। तभी वह सर्वशक्तिमान होगा। हम इसको एक इसको इस एक एक तरीके से और देख सकते हैं। अह हम लोग यह कैसे किसी को सिद्ध करें कि ईश्वर है। ईश्वर है। हम ईश्वर की शक्तियों को अनुभव करके ये कैसे पता चलेगा कि ये उसी की शक्ति है? जैसे जो लोग कहते हैं मैं ईश्वर को नहीं मानता। तो हम उसको क्या कहें? जिस प्रकार देखा जाए यह फैन चल रहा है हम हम इस फैन के नीचे बैठे हुए हैं जी और हमें ठंडी हवा लग रही है जी

00:14:42:09 तो हम केवल फैन को देख रहे हैं ना क्योंकि वो स्थूल है जी लेकिन हवा को तो नहीं देखा जा रहा है उसकी हम महसूस तो कर रहे हैं ना तो उसी प्रकार परमात्मा है ना तो परमात्मा को हम अनुभव करते हैं ना परमात्मा की शक्तियों को हम अनुभव करते हैं ना लेकिन परमात्मा दिखाई नहीं दे रहा है। इसका यह मतलब तो नहीं कि परमात्मा नहीं है। नहीं वह तो दिखाई देना और ना देना तो इस पर निर्भर करता है कि भगवान ने हमें जो इंद्रियां दी हैं उसमें से एक इंद्री उसने नहीं दी देखने वाली जो ईश्वर को देख सके। मान लीजिए कि ईश्वर को देख सकने वाली इंद्री नहीं दी। तो नहीं देख पा रहे। अभी वो दे दे तो हो सकता है देख ले तो उसके ऊपर उसके ऊपर वो है सामर्थ्य कि वो चाहे तो अपने आपको दिखाए। वो चाहे तो ना दिखाए। वो तो एक अलग बात है। मगर एक व्यक्ति जैसे हमने कहा पंखा चल रहा है तो पंखा चलने से सिद्ध होता है कि इसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है। उसी प्रकार से उसी प्रकार से पूरी सृष्टि का संचालन हो रहा है। तो इसका मतलब है कि कोई पीछे शक्ति है। मगर इसमें दिक्कत ये आती है कि पीछे शक्ति है तो हम उस पीछे वाली शक्ति को शक्ति माने। ईश्वर माने कि ये सोचे हो सकता है इसके भी पीछे कोई शक्ति होगी। फिर उसके भी पीछे कोई शक्ति होगी। जी। जैसे मान लीजिए शक्ति तो एक ही होगी। हां। शक्ति तो एक ही होगी ना। हां और उस शक्ति को ही हम सर्वशक्ति

00:15:57:18 भगवान का नाम देंगे ना नहीं ठीक है दे दिया मगर हम यह कैसे माने कि वह शक्ति ही हमारा गंतव्य है मतलब कि मेरा जैसे मान लीजिए भगवान है आपने कहा कि जो शक्ति सबसे लास्ट में इस पूरी सृष्टि को संचालित कर रही जिसके पीछे कोई नहीं है वही है तो वो हमारा ऐ है उसके बीच में मेरा संबंध है मेरा और उसमें यह कैसे माने जैसे मान लीजिए मान लीजिए कि इस दुनिया में कोई बहुत अमीर है। बहुत अमीर है। उसके पास बहुत पैसा है। तो मुझे क्या उससे मेरा संबंध स्थापित होना चाहिए ना। तभी तो मैं उसकी ओर आगे बढूंगा। तो वो कैसे हो?

00:16:37:22 संबंध स्थापित करना। परमात्मा कहते हैं मैं परमात्मा और हम सब उसकी संतान आत्मा। तो आत्मा का अपने पिता परमात्मा से संबंध ना होना यह तो कोई बात नहीं है। नहीं नहीं यह तो परमात्मा कह रहे हैं। फिर जो नास्तिक है ना जी हां उसको पहले मानना पड़ेगा कि परमात्मा है और ये जो कह रहा है वो सही कह रहा है। तब वो मानेगा इस बात को। नास्तिक अगर अपने मन में ये सोचे कि अगर मैंने इस सृष्टि पर जन्म लिया है। जन्म लिया है। जी तो वो माता के गर्भ से जन्म लिया हुआ है। जी है ना? लेकिन माता के गर्भ में मैं जो आत्मा आई हूं वो कहां से आई? उसका भी तो अपना कोई स्थान होगा ना। जब हम यह कहते हैं जब हम किसी से परिचय प्राप्त करते हैं तो हम कहते हैं कि भाई आप कहां से आए हैं? तो वह अपना स्थूल परिचय देते हैं। हम उनसे पुनः कहते हैं कि हम आपको पूछ रहे हैं तो वह पुनः अपने शरीर का ही परिचय देते हैं। लेकिन वो शरीर ना हो के वो एक आत्मा है। जब हम कहते कि नहीं आप एक आत्मा है तो आत्मा कहां से आई है? अब वो कहेगा कि मैं आत्मा तो भगवान के घर से आई हूं। तो अब वो भगवान रहता

00:17:53:03 कहां है? तब वो भगवान तो इस पारबह्म के पार में रहता है। अर्थात इस सृष्टि से परे रहता है। नहीं नहीं इसमें इसमें दीदी यही बात है ना जैसे किसी ने मान लिया कि आत्मा है। ठीक है। हम उससे कह रहे हैं कि अब आत्मा कहां से आई है? तो ये सवाल तो जो आपने कहा ना जो समस्त सृष्टि के पीछे संचालित करने वाली जो शक्ति है उससे भी कहा जाता है। कहा जा सकता है कि तुम कहां से आई हो? कोई देखो। कोई एक भी व्यक्ति हो सकता है ना। कोई एक ही व्यक्ति हो सकता है। अगर हम यह कहते हैं कि परमात्मा है तो परमात्मा एक ही होगा। परमात्मा एक ही होगा। आप बहुत सारी देव आत्माओं को देख लीजिए। आप बहुत सारी धर्मात्मा हो सकती हैं। महान आत्मा पुण्य आत्मा हो सकती हैं। लेकिन बहुत सारे परमात्मा नहीं हो सकते हैं। परमात्मा एक ही मेरा क्वेश्चन अलग है। मैं ये कह रहा हूं कि परमात्मा एक है। हमने मान लिया कि कोई एक शक्ति है जो इस पूरे संसार को चला रही है। ठीक है? मगर मेरा जो नाश्त वो नहीं मान मेरा मेरा उससे संबंध क्या है जो मैं उसकी पूजा करूं उसकी बातें मानू मेरा क्या संबंध है उससे ये कैसे सिद्ध होगा वो वो वो तो वो वो वो तो यह कह देगा जैसे बुद्ध बौद्ध दर्शन

00:19:08:04 जो कहता है वो कहता है भाई प्रकृति सब कुछ है प्रकृति चला रही है अपने आप चल रहा है और जो है आप यह करोगे तो यह होगा यह करोगे तो यह होगा बात खत्म कोई ईश्वरश्वर नहीं है यह नास्तिकों का दर्शन भी कहता है बौद्ध दर्शन नास्तिक दर्शन है तो अब यदि मैंने मान लिया प्रकृति चला रही ठीक है चला रही है उससे मेरा कोई रिलेशन नहीं है जब तक हम रिलेशन नहीं सिद्ध करेंगे तब तक ईश्वर सिद्ध नहीं होगा और जब तक ईश्वर नहीं सिद्ध करेंगे तब तक धर्म सिद्ध नहीं होगा और जब तक हम धर्म सिद्ध नहीं करेंगे तब तक हम ये पहचान नहीं पाएंगे कि इस्लाम और ईसाइयत को हम धर्म कहें ना कहें ये पॉइंट मतलब वहीं से कनेक्टेड है ये बात इसलिए आवश्यक है कि हम मतलब पहले ये जाने कि हम ये समझ पाए कि क्या कहते हैं कि ईश्वर सिद्ध कैसे होता है? अब जैसे हमने कहा एक्चुअली मेरी जानकारी में जो है ईश्वर नास्तिक से ही शुरू होती है सारी यात्रा। ईश्वर को सिद्ध करेंगे जब आप अगर सिद्ध करेंगे अगर सिद्ध नहीं करना केवल परमात्मा ने कहा है मान लो तो फिर तो वो वाली बात है कि जिसको मानना है मानेगा। जिसकी आस्था हो गई आपकी बातें उसको अच्छी लगी वो प्रभावित हुआ तो उसने मान लिया। मगर वो ठोस जो एक होता है ना कि फिर तस से मस ना होने वाली बात वो वाली बात नहीं हो पाएगी उसमें तो हम लोगों की जो व्याख्या है वो असुतो मा सद्गमया

00:20:23:06 तमसो मा ज्योतिर्गम मृत्यु मा मृतम गमया से शुरू होती है एक जीव के अंदर एक नास्तिक व्यक्ति के अंदर भी कभी ना मरने की प्यास है हम अखंड ज्ञानी बन जाने की प्यास है कोई आया तो कौन आया अपने आप सोचने लगे कल पाकिस्तान इंडिया में कौन जीतने वाला है अपने आप सोचने लगे और इसके साथ ही साथ सदा आनंद ंदित रहने की प्यास है। हमारे अंदर सच्चित आनंद की प्यास है। इसका मतलब जैसे हमारे अंदर ऐसी कोई प्यास नहीं है जिसका विषय इस दुनिया में ना हो। उसका निराकरण करने वाला। जैसे हम हमारे अंदर भूख है तो दुनिया में खाना है। हमारे अंदर प्यास है। दुनिया में पानी है। हमारे अंदर देखने की क्षमता है तो दुनिया में दृश्य है। सुनने की क्षमता है तो दुनिया में आवाज है। तो जिस प्रकार भूख होने से ही सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कुछ है जो आपकी भूख मिटा सकता है। प्यास होने से ही सिद्ध हो जाता है कि इस दुनिया में कोई आपकी प्यास मिटाने वाला तत्व है। उसी प्रकार से सच्चित आनंद की प्यास होने से ये कभी ना मरने की प्यास, अखंड ज्ञानी की प्यास और आनंद की प्यास। तो सच्चिद आनंद की प्यास से ही सिद्ध हो जाता है कि दुनिया में सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर का अस्तित्व है। अच्छा इस प्यास को अगर हम थोड़ा निचोड़ करके देखें तो नास्तिक भी कभी-कभी ये सोचता है कि बारिश ज्यादा हो रही है तो कम हो जाए। जबकि वो सुपर

00:21:38:07 सुप्रीम अथॉरिटी में विश्वास नहीं कर रहा है। मगर वो सोच रहा है कि बारिश कम हो जाए। और क्या कहते हैं? धूप ज्यादा पड़ रही है तो कम हो जाए। नास्तिक भी ऐसा सोच लेता है। इसका मतलब उसके अंदर भी सच्चिदानंद को ढूंढने की चाह है। और यह जो वह सोच रहा है ना यह बार-बार प्रकृति के नियमों के विपरीत है ना? तो इसका मतलब वो प्रकृति के सभी प्रकार के नियमों को तोड़ देने की चाह उसके अंदर विद्यमान है। और इसी से सिद्ध होता है कि इस संसार में कोई ऐसा है जो प्रकृति के सभी नियमों को तोड़ देता है। तो यहां से ईश्वर तो सिद्ध हो गया। मगर जो हम वो वाला ईश्वर जो प्रकृति के सभी नियमों को ना तोड़ पाए वो वाला ईश्वर यहां से सिद्ध नहीं होगा। अच्छा हां ये दिक्कत है। ईश्वर तो सिद्ध हो जाएगा मगर तब हमें कहना पड़ेगा कि हां प्रकृति के सभी नियमों को तोड़ मां की कोख से भी आएगा। राम मतलब वो एक अलग वो आ जाएगी। राम में भी आएगा कृष्ण बन के भी आएगा। अब जब हम यह डिसाइड कर लेते हैं कि क्या कहते हैं? ईश्वर क्या कहते हैं? कैसे सिद्ध हुआ? तो इससे वह ईश्वर सिद्ध हुआ जो सब कुछ कर सकता है। फिर वहां बाधित ईश्वर नहीं है। अब जब हमने यह देखा कि बाधित ईश्वर सिद्ध हुआ उसके बिना नास्तिक नास्तिक अवधारणा खत्म ही नहीं हो सकती। बाधित ईश्वर के बिना बुद्धिज्म को हराने

00:22:53:08 वाला भी सर्वशक्तिमान ईश्वर अद्वैत का ही था शंकराचार्य जी का। तो जब हमें यह पता चल जाता है कि बाधित ईश्वर ही है। अबाध्य ईश्वर ही है जो नास्तिकता को खत्म कर सकता है। अब देखते हैं कि जैसे हमने कहा कुरान भी धर्म है। तो धर्म यहां से क्या सिद्ध हुआ है? धर्म यहां से ये सिद्ध हुआ कि जीव की चाह का जो वास्तविक विषय है सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर उसको प्राप्त कराने वाली विधा का नाम धर्म है। कि आप यह करोगे तो ईश्वर प्राप्त होगा। आपका सच्चिदानंद जिसको आप खोज रहे हो और यह नहीं करोगे तो प्राप्त नहीं होगा। तो यह तो हमने सिद्ध कर लिया। अब बात यह आती है की कुरान के द्वारा प्रतिपादित होने वाला ईश्वर क्या वही है? वैसा ही है जैसा यहां से हो रहा है। तो पता चलता है कि कुरान खुद कह रही है कि मेरा ईश्वर यह नहीं कर सकता। मेरा ईश्वर वो नहीं कर सकता। बाइबल खुद कह रही है मेरा ईश्वर यह नहीं कर सकता। तो फिर उसके द्वारा बताया गया उस बाधित एंटिटी को प्राप्त कराने वाली जो विधा है। उसको फिर धर्म नहीं कह पाएंगे। ये छोटा सा मेरा वो था। इसमें थोड़ा सा प्रकाश डालें। जी चलिए किरण दीदी आप क्लियर करेंगे? हां दीदी आप आ जाइए। और अच्छे से एक्सप्लेन कर दो भाई साहब के प्रश्न उत्तर को। वो क्लिप दे दीजिए दीदी को। अच्छा

00:24:10:16 आदि भी लगा रहे हैं। ये क्या है? आदि सनातन का तात्पर्य यह है हां। कि परमात्मा ने सबसे पहले सृष्टि की शुरुआत की हां। तो जिस धर्म की स्थापना की हम वो है देवी देवता धर्म। ठीक है? सनातन नहीं है वो। वो सनातन नहीं है। खैर अभी जो बीच में मिलावट हुई इस वजह से आप यह कह सकते हैं कि सनातन नहीं है। परंतु जो हमें परमात्मा ने सत्य परिचय दिया उसमें यह कहा कि वो सनातन था ना। यह आदि सनातन देवी देवता धर्म की स्थापना परमात्मा शिव निराकार ने की। किस समय की? कलयुग के अंत और सतयुग के आदि दोनों के बीच के टाइम पे। तो जब परमात्मा ने यह सत्य धर्म की स्थापना की। उसके बाद सतयुग और त्रेता युग दो युग तक ये एक धर्म चला। जहां पर एक धर्म था, एक राज्य थी, एक मत थी, एक भाषा थी, धार्मिक, राजनैतिक सत्ता भी एक के हाथ में थी। वहां पे कोई भी प्रकार की मतभेद नहीं थी।

00:25:25:18 फिर उसके बाद जैसे ही द्वापर युग आया तो दूसरा पूर्व शुरू हुआ, द्वैत धर्म शुरू हुआ। जहां पे ऊपर से और भी आत्माएं आना शुरू की। तो वहां पे सबसे पहले फिर देवता धर्म के बाद अब्राहम आया जिसने अपनी आत्मिक बल से पवित्रता की शक्ति से इस्लाम धर्म स्थापन किया। नहीं नहीं दीदी अभी बात ये हो रही है कि धर्म क्या है? धर्म धर्म वास्तव में ये हमारे भाषा में हम ये कहते हैं धर्म अर्थात जीवन की धारणा। जिसके लिए श्री रामचंद्र जी ने भी यह कहा कि धरत पर यह धर्म ना छोड़िए। जिसके लिए उन्होंने कहा रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन ना जाए। अब अब इस पे एक सवाल आता है। जैसे श्री राम जी ने कहा है कि रघुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन ना जाए। मगर कुरान में 33 चार में लिखा हुआ है कि आपने अगर अपने मुंह से किसी को बहन बेटी या मां बोल दिया फिर भी आप उसके साथ विवाह कर सकते हो। यह सब आपके मुंह की बातें हैं। तो कहने का अर्थ यहां पे यह आ जाता है यहां पे तो मुंह की बात को बदला जा

00:26:40:21 रहा है और यहां सिखाया जा रहा है कि रकुल रही सदा चली आई प्राण जाई पर वचन रजाई हमने अभी शुरू में देखा था कि धर्म वो है ये करना है ये नहीं करना है ये नहीं करना ठीक है तो हमारा धर्म कह रहा है कि आप जो है मुंह की बात से मुकररो मत अपने वचन के पक्के रहो जी वहां पे जो कुरान कह रही है कि आप अपने धर्म अपने वचन से मुकर जाओ तो या तो ये धर्म हो सकता है या फिर ये धर्म हो सकता है जी तो धर्म का तात्पर्य यही है कि कुछ भी हो जाए अपनी बातों से हमें फिरना नहीं है। चाहे उसके लिए हमें प्राण तो कुरान धर्म नहीं है। फिर धर्म वो भी है पर वर्तमान समय हम आत्मिक शक्ति कम होने के कारण मनोबल कम होने के कारण आज हम कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। तो हमारी जो धारणा है वो खत्म हो गई। नहीं उसमें यह लिखा है जो कि आप जो है अपनी मुंह की बातों से मुकर जाओ मुकर सकते हो तो इस ये धर्म माने कि ना माने इसको बात को ना मानना ये कुछ भी करना यह धर्म नहीं तो फिर कुरान धर्म नहीं है ना फिर इस्लाम इस्लाम धर्म है बट उनकी जो बातें हैं कि कुछ भी कहो इस्लाम क्या है देखिए

00:27:56:16 ये एक उन्होंने आकर के ऊपर से जो आत्मा आई आ के जो संदेश दिया उन्होंने जो उनके मार्ग पर चली वो आत्मा उस धर्म की कहलाने लगी। ठीक है? वास्तव में कोई यहां पे हमारा जब हम आए ऊपर से तो कोई हमारा जाति नहीं थी ना कोई हमारा धर्म नहीं था। जब हम ऊपर में थे तो एक ही धर्म एक ही परमात्मा के संतान थे और हम सब एक पिता की संतान होने के नाते हम सब आपस में एक ही धर्म के थे। हम बट जब नीचे यहां आए तो नीचे की व्यवस्था के वजह से नीचे की व्यवस्था बनी रहे। उसके वजह से सब ने अपना-अपना धर्म यहां पे स्थापित किया। आपका कहने का मतलब है कुरान में मिलावट हो गई है। ये बात उसमें लिखी नहीं है। ये किसी भी धर्म में गलत संदेश नहीं दिया गया है। तो ठीक है। अब धर्म में गलत संदेश नहीं दिया गया। मगर अब पहले ये तो समझ लें कि धर्म फिर आपके अनुसार है क्या? वो आप नहीं बता रहे हैं। धर्म हमारे अनुसार जीवन की धारणा। तो जीवन की धारणा है कि चचेरी बहन से विवाह करना है कि नहीं करना है। हमारा धर्म है कि नहीं करना है? नहीं करना है। मगर वो लोग कर रहे हैं। यानी कि कर ना करना धर्म है। ना करना धर्म है ना? धर्म की उपयोगिता क्या है? फिर

00:29:11:22 क्या मिलेगा धर्म से? धर्म में चलेंगे तो शक्ति है। धर्म में चलेंगे तो शांति है। धर्म में चलेंगे तो सुख है। धर्म में चलेंगे तो प्रेम से जीवन जिएंगे। धर्म में से चलेंगे तो सच्ची आनंद की अनुभूति होगी। यानी कुल मिला के धर्म से धर्म में से ही धर्म से सच्चिदानंद मिलेगा। जी है ना? जी। तो तो बात यह है क्या कुरान के द्वारा जो मिल रहा है वो सच्चिदानंद है वो तो नहीं है जी उसके अनुसार से तो फिर उसको धर्म क्यों कहा जा रहा है अब धर्म ऐसे ही बाइबल के अनुसार भी नहीं है फिर भी उसे धर्म कह रहे हैं धर्म हर एक है लेकिन उसमें जो बातें कह दी गई उसमें मिलावट कर दिया गया उसको हम धर्म नहीं कहेंगे तो धर्म आपको पता पता कैसे चला कि दुनिया में कोई इस्लाम नाम का धर्म है? कैसे पता चला? परमात्मा ने कहा कि जब इस सृष्टि में एक धर्म था तो शांति थी। फिर यहां पे जब दूसरा आया फिर तीसरा आया, चौथा आया, पांचवा आया। ऐसे आज वर्तमान समय

00:30:27:03 इतने सारे धर्म पिताएं आए। आकर के अपने-अपने धर्म की स्थापना किए। हम तो यहां पे जितनी धर्म आत्माएं आई उतनी मत हुई। नहीं नहीं वो नहीं कह रहा। आपको पता कैसे चलता है कि दुनिया में कोई इस्लाम नाम का धर्म है। कहने का मतलब मेरा ये है कि यदि हम कुरान को हटा देंगे या कुरान आपको देने वालों को हटा देंगे तो इस्लाम का अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा आपके समक्ष। कैसे सिद्ध करूं? जब वह कुरान है, कुरान को मानने वाले लोग हैं, मुसलमान हैं। वह आपको लाकर के छाप के कुरान देते हैं। तब आप कहते हो कि दुनिया में कोई कुरान को मानने वाला इस्लाम धर्म है। जी। अब जब आप कह रहे हो कुरान जो है वो है अन ऑथेंटिक। है ना? ऑथेंटिक नहीं है। वो प्रामाणिक नहीं है। वो उसमें मिलावट हो गई। अब जब वो मिलावट एक लाइन की कर सकता है तो हो सकता है पूरी की पूरी कुरान ही मिलावट हो। जब एक लाइन की मिला जो झूठ बोल सकता है वो तो कुछ भी बोल सकता है। फिर हम उस पे बिलीव नहीं कर सकते। तो फिर हम या तो उसको मानेंगे तो पूरा मानेंगे और नहीं मानेंगे तो फिर नहीं मानेंगे। ये बात है।

00:31:29:18 ये तो बड़ा खत्म हो सकता है। नहीं बंद करके जी अगर ये हमारे पास जा ही रहे हैं तो एक हम डिबेट डिबेट बोला है। अच्छा नहीं इसको छोड़ देते हैं ना टॉपिक दूसरा ले लेते हैं। दूसरा टॉपिक ले लेते हैं। वो कट जाता है। अच्छा है ना? अच्छा यहां हम ये कह सकते हैं आप ये लगा लीजिए नहीं कोई बात नहीं उसमें नहीं जी तात्पर्य ये है यहां पे कि हम हम सब कौन है कहने का मतलब है अपमान नहीं करना है किसी का इसलिए मैं समझ रहा हूं नहीं धर्म नहीं किसी किसी समुदाय का अपमान ना हो धर्म तो कह ही नहीं सकते ना वो मैं आपसे जानना चाह रहा था मैं समझ रहा था ठीक है चलिए अच्छा एक चीज अब इसमें ये आती है कि कुल मिलाकर के चलिए वो तो छोड़ दीजिए इस्लाम है कि नहीं अब ब्रह्मा कुमारी तो धर्म ही बता रही है ना तो बात ये आता है कि ब्रह्मा कुमारी का जो ईश्वर है वो सर्वशक्तिमान तो सिद्ध नहीं हो रहा और अगर वो सिद्ध नहीं हो रहा सर्वशक्तिमान तो फिर वो जो नास्तिकता को खंडन करने वाला ईश्वर नहीं है फिर वो क्योंकि वो कहीं ना कहीं कुछ नहीं कर रहा है तो या तो वो सर्वशक्ति सर्वशक्तिमान नहीं है और या फिर जो है वो ईश्वर नहीं है। परमात्मा सर्वशक्तिमान है हम इसलिए है क्योंकि परमात्मा

00:32:44:19 सर्वशक्तिमान है। इसका मतलब ये नहीं कि वो छोटे से छोटा काम करे। पत्ता चाहे तो पत्ता हिलाए, चाहे तो पत्ता ना हिलाए, चाहे तो अ कुछ भी मरे हुए के जिंदा करे, चाहे तो जिंदा को मार दे। इसका मतलब ये नहीं कि मतलब परमात्मा सर्वशक्तिमान है तो वो अपने आप को प्रमाणित करने के लिए कुछ भी करें। नियम के विरुद्ध कोई भी कार्य परमात्मा नहीं कर सकता। मतलब परमात्मा भी नियम के नियम के बंधन में बंधे हुए हैं। परमात्मा के ऊपर भी एक समय के या कहे नियम का बंधन है। उसके ऊपर बंधन है तो वो तो बाधित हो गया। बाधित हो गया। हम लोग मुक्त होने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं और हमारा ईश्वर स्वयं बाधित है। हम मुक्त होने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। हम किससे? जीवन और मरण के चक्र से मुक्त होना चाहते हैं। केवल और परमात्मा बाकी अनंत अनंत सुख नहीं चाहिए हमें। अनंत अबाध्य नहीं दुख चाहिए। और वो वो किसी को मिल ही नहीं सकती। परमात्मा कहते हैं कि बच्चे कि जब तुम इस सृष्टि पर आते हो तो तुम्हें इस सृष्टि में जन्म मरण के चक्र में आना ही है। और मैं एक हूं जो जन्म मरण के चक्र में नहीं आता हूं। मैं इसलिए नहीं आता हूं

00:33:59:22 ताकि तुम्हें आ के मुक्ति और जीवन मुक्ति का मार्ग दिखा सकूं। शांति दे सकूं। सद्गति दे सकूं। इसलिए मैं नहीं आता हूं। चाहूं तो मैं आ सकता हूं। मेरे मेरे में उतनी क्षमता है कि मतलब वो जन्म ले सकते हैं। ले सकते हैं। बट वो कहते हैं कि मैं अगर जन्म लूंगा तो फिर मुझ में और तुझ में क्या अंतर है? मतलब ले सकते हैं। ले सकते हैं। अच्छा ठीक है। लेकिन अंतर अंतर सिद्ध हो इसके लिए परमात्मा जन्म नहीं लेते। लेते नहीं है मगर ले सकते हैं। ले सकते हैं। अच्छा ठीक है। तो ठीक है। अगर ले सकते हैं तो फिर तो ये वाली बात खत्म हो गई कि वो जन्म ले सकते हैं। जी ऐसा मानता है ना ब्रह्मा कुमारी के ये आप ऑफलाइन कह रहे हैं। जी ले सकते हैं। अच्छा ठीक है। तो एक बात उसने कही कि मैं लेता नहीं हूं। ठीक है? अब बार-बार एक बात आ रही है कि परमात्मा ने ऐसा कहा, परमात्मा ने ऐसा कहा। यह वाली बात बार-बार आ रही है। तो आपके लिए ये परम प्रमाण क्या है? वेद मानते हैं आप। वेदों को परम प्रमाण। जी। वेदों को मानते हैं परम प्रमाण?

00:35:05:06 वेदों को भी मानते हैं। हम सभी शास्त्रों को भी मानते हैं। क्योंकि सभी शास्त्रों को और वेदों को हम वेदों का पुराणों का सार जो समझा रहे हैं परमात्मा निराकार हम वर्तमान समय आकर के गीता का सार जो अभी हम बच्चों को सुना रहे हैं। जिस गीता में लिखा हुआ है कि जब जब धर्म की हानि होती है तबतब मैं सृष्टि पर आकर के सत्य धर्म की स्थापना और असत्य का महाप तो दीदी ये लिखा है ना कि वो तो क्या कहते हैं वो सजाम में हम अपना सृजन करते हैं अपने रूप का मतलब वो किसी परकाया प्रवेश नहीं करते वो स्वयं आते हैं तो स्वयं आते हैं तो कैसे आते हैं शरीर धारण करते हैं अपना रूप बनाते हैं तो रूप बना के किसी और शरीर में नहीं आते यह कह रहे हैं

00:36:00:09 रूप धारण करते हैं। का मतलब यह है कि परमात्मा मनुष्य रूप में ही आते हैं। तो दीदी इसमें ये बात आएगी कि जैसे भगवत गीता में सजाम में हम लिखा है। मैं अपना सृजन करता हूं। या तो उसकी संस्कृत हो परकाया प्रवेश की वो तो है नहीं। सजाम में हम लिखा है। अच्छा दूसरी बात ये आती है कि आप वेद और पुराणों को एज इट इज मानते हैं कि थोड़ा बहुत ऐसा समझते हैं कि कहीं पे कुछ नहीं मानना है, कहीं पे कुछ मानना है। इस तरह से नहीं ऐसा नहीं है। सभी में बातें लिखी हुई है। जो बातें लिखी हुई है उसको हम भी मानते हैं। स्वीकार। भागवत पुराण में कई जगह लिखा हुआ है कि भगवान आए, जन्म लिया, भगवान ने लीला की। बहुत सारे पुराणों में लिखा है। कई बातें वेद में भी लिखा है। कई बातें हैं। जो जन्म लिया इस बात को हम नहीं मानते क्योंकि परमात्मा जन्म यानी शास्त्रों को पूरा पूरा नहीं मानते। शास्त्रों में यह भी बातें लिखी हुई है कि परमात्मा जन्म मरण के चक्र से परे हैं। वो इसलिए लिखी है कि जैसे हमारे दो रूप हैं। एक है ये भौतिक संसार का रूप तो हमने जन्म लिया हम कब जन्मे कब मरे ये सब है। मगर एक हमारा वो परमार्थिक रूप है आत्मा का। जैसे आत्मा के लिए लिखा है नैन छिंदती शस्त्राण नैन दहति पावका

00:37:15:15 ना चैनम क्ले न शोषति मारता आत्मा का आत्मा को काट नहीं सकता कुछ नहीं हो सकता है तो एक हमारा ये पारमार्थिक रूप है तो पारमार्थिक रूप भगवान की विवेचना की गई तो वो जन्म और मरण से बाहर है हमारा भी बाहर है और एक हो गया भौतिक रूप के लीला रूपी संसार में हमने देह धारण की बाधित के रूप में और ईश्वर ने अवतार लिया अब के रूप में तो आप हमारा तो मान रही हैं मगर ईश्वर का नहीं मान खैर यह मैं कह रहा था कि जो आप शास्त्रों की व्याख्या करते हैं वेद और पुराण और गीता की तो ये आपको वेद पुराण गीता कैसे प्राप्त हुई? ये मैंने तो कभी वेद पुराण गीता मैंने पढ़ा नहीं सुना नहीं। मैं जब छोटी थी तभी से परमात्मा का मुझे परिचय मिला। ब्रह्माकुमारी संस्था का परिचय मिला। अच्छा और इसी के माध्यम से ही मुझे जो परमात्मा के महावाक्यश्वरी महावाक्य जो सुनाए जाते हैं उसमें जो महावाक्यों के द्वारा ज्ञान मुरली के द्वारा जो मुझे परमात्मा के द्वारा जितना भी शास्त्रों का भी ज्ञान इसमें थोड़ा बहुत मिला और वेदों का भी थोड़ा बहुत गीता का भी थोड़ा बहुत तो सभी का सार जो यहां पर परमात्मा हम हमको यहां सुनाते हैं। उन्हीं

00:38:30:21 के माध्यम से मैंने जो भी शास्त्रों को सुना तो मैं शास्त्रों को कोई इग्नोर भी नहीं करती। वेद पुराण को इग्नोर भी नहीं करती। बात यह है ना जैसे मानती भी हूं। जैसे वेद की लिखी हुई कोई किसी बात को यदि हम जी इस आधार पे काट दें कि ये क्या कह रहा है? इन्होंने अगर नहीं माना है तो फिर नहीं मानना है। अगर हम इस आधार पे इसको काट रहे हैं तो हमारा परम प्रमाण ये है। हम मानते इसे हैं। जैसे मान लीजिए कि आईएस आईएस का कोई आतंकवादी है। ठीक है? वो हमसे कहे वो है आतंकवादी अपराधी है। वो हमसे कहे कि पानी पिला दो यह पुण्य होता है। ठीक है? तो हमने आईएस आईएस को क्यों माना? क्योंकि हमें मालूम था कि पानी पिलाना पुण्य है। तो आईएस आईएस की बात आईएस आईएस के आतंकवादी की बात हमने मान ली। मगर हम उसको मानते नहीं हैं। हमने माना किस बात को? जिसको हम पहले से ही मानते हैं। आईएसआईएस एक माध्यम हो सकता है कि उस समय हमारे अंदर वो चीज याद दिला दी। उसने ये कर दिया। मगर हम उसको मानते नहीं। वो हमारी नजरों में क्या है? एक आतंकवादी, एक अपराधी हम उसकी बात उसकी भी कुछ बातें अच्छी हो सकती है जो इसे हम फॉलो कर ले मगर हम इसलिए फॉलो करेंगे क्योंकि हमारे पास कोई और चश्मा है यह देखने का कि क्या सही है और क्या गलत है तो यदि हम वेद को सही और गलत के लिए चश्मे के रूप में ले रहे हैं तब तो यह होता है कि हम उसे मानते हैं अगर हम यह सोच रहे हैं कि किसी और की कही हुई

00:39:45:22 बातों के आधार पर वेद का इतना मानना है इतना नहीं मानना है या पुराण का इतना मानना है इतना नहीं मानना है या गीता का इतना मानना है इतना नहीं मानना है तो इसका मतलब हम गीता को नहीं मान रहे उसको मान रहे जिसके आधार पर हम गीता का आधा अधूरा ले रहे हैं। तो एक तो यह वाली बात हो गई। दूसरी यह बात है कि फिर जब आपका परम प्रमाण मुरली है। जी है ना? तो एक तरफ हम कहते हैं कि हमारा जो ज्ञान है वो सनातन ज्ञान है। जी सनातन और मुरली हमको आ रही है। आज भी आई होगी। जी कल भी आएगी। यानी वह किसी देश काल परिस्थिति में मिलने वाला ज्ञान है। जी और हम यह कह रहे हैं कि हमारा जो ज्ञान है वो सनातन है। जी तो इसका प्रमाण कैसे माना जाएगा? फिर मतलब आपसे कोई सुपर नेचुरल पावर ये कह रही है कि मैं तुमको ज्ञान दे रही हूं। हम कह रहे हैं यही सनातन ज्ञान है। जबकि वो आज मिल रहा है। आज हमको आज से पहले वो अस्तित्व में नहीं था वो ज्ञान। है ना? और जो अस्तित्व में था सदा से था। वेद इत्यादि वह हम नहीं मान रहे हैं। हम उसके आधार पर उसकी बातों को कट कर रहे हैं। जैसे कि पुराण की कई बात आपने कहा कि यह वाली बात हम नहीं मानते हैं। वह वाली बात मानते हैं। जी तो ये एक सिचुएशन फंस जाती है। जी तो ये ऐसा है जी कि

00:41:01:18 परमात्मा शिव का कहना है कि ये जो वेद पुराण है ये भी कोई आदिकाल से चला नहीं आ रहा है। यह द्वापर युग से जो भी आत्माएं आई, महान पुरुष आए, जिन्होंने वेदों की रचना की, वह भी कोई एक मनुष्य आत्मा ही है। और अभी वर्तमान में जो हम ज्ञान मुरली सुनते हैं, ये स्वयं परमात्मा निराकार जो अभी वर्तमान में प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम से जो हमको ज्ञान दे रहे हैं। यह हमको कहते हैं कि बच्चे कि जब कोई भी आत्मा आती है सृष्टि पर हम तो वो अपने आत्मिक बल से जितना उनके पास पावर होती है उतना वो ज्ञान देती है। जिस प्रकार एक झाड़ है हम तो जैसा झाड़ होता है तो झाड़ में जो बीज होता है तो बीज को जितनी नॉलेज होगी उतनी टाल टालियां शाखा या पत्ते को नॉलेज वो तो मैं समझ गया मगर जब कोई ज्ञान उसी प्रकार मैं परमात्मा सृष्टि का बीज रूप हूं तो मुझ में जो ज्ञान है वो वर्तमान समय आकर के मैं सृष्टि के आदि मध्य अंत का ज्ञान तुम बच्चों को देता हूं और

00:42:17:01 जो वेद शास्त्र जिन्होंने भी सुनाए हैं। जिन्होंने भी बताए हैं, बनाए हैं, वह वास्तव में द्वापर युग से बने हैं। कोई सतयुग और त्रेता युग से चला नहीं। तो इसका अर्थ फिर यह हुआ कि पहली बात तो हम लोग सनातनी नहीं है। ब्रह्माकुमारीज वाले क्योंकि सनातन तो वही है सनातनी हिंदू जिसको सनातन वैदिक आर्य हिंदू। वो तो उसी को कहा जाता है जो वेदों में प्रमाण ने बुद्धि रखे। वेद, उपनिषद, पुराण और स्मृति ग्रंथ। और हम लोग कह रहे हैं कि हम जो है उनको अंतिम प्रमाण नहीं मानते। कोई और हमारे लिए अंतिम प्रमाण है। दूसरी बात यह है कि यह तो हो गया कि हम इनको नहीं मानते और हमको कोई सुपर नेचुरल पावर है। वो आके बताती है कि यह करना है। यह नहीं करना है। यह अच्छा है ये बुरा है। मगर इसमें अब ये एक लास्ट बात आती है। इसके बाद और पूरा करेंगे कि इस संसार में क्या ईश्वर की मर्जी के बिना बुराई पनप सकती है?

00:43:17:10 देखिए ईश्वर कोई बुराई को बुराइयों को प्रेरित नहीं करते बुराई करने प्रेरित नहीं उसकी मर्जी के बिना उसकी मर्जी के बिना कहने से यह समय का चक्र जो है चलता है सत्य मतलब उसका इस पर भी अधिकार नहीं है उसमें उसका किसी के ऊपर अधिकार नहीं वो हर आत्मा को स्वतंत्रता प्रदान कि जो जैसा कर्म करेगा उसके अनुसार से वह फल की नहीं ईश्वर उसको करने से रोक सकता है कि नहीं यह पावर है कि नहीं उसके पास वो रोक सकता है बट वो रोकता नहीं क्यों नहीं रोकता यानी यानी वो रोक सकता है रोक सकता है ठीक है तो इसका मतलब जो बुराई अगर अस्तित्व में आ रही है तो उसमें ईश्वर की सहमति प्राप्त है। जी सहमति है ना? बुराई आ रही है इसलिए ईश्वर की सहमति नहीं है। देखो कोई भी माता-पिता जैसे मैं कहीं पे खड़ा हूं। फॉर एग्जांपल कोई भी माता-पिता जी अपने बच्चों को जी बुरा करने की सहमति नहीं दे सकता। नहीं दे सकता। उसी प्रकार परमात्मा हमारे माता-पिता हैं। जी वो हमें कोई भी बुरा कार्य करने की सहमति या बुराइयों पे चलने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते। मगर

00:44:32:16 माता-पिता अपने सामने बच्चे को गलत करने भी तो नहीं दे सकता। नहीं दे सकता। तो वो तो हो रहा है। स्वभाव संस्कार है देखिए जब तक उनकी उपस्थिति है तब तक बच्चा गलत नहीं करता लेकिन पीछे से भी तो वो करता है। यानी कि ऐसी कोई जगह है जहां भगवान नहीं देख पा रहे हैं। भगवान देख रहे हैं। पर भगवान कहते हैं कि बच्चे मैं देख करके भी हम किसी के हाथ नहीं पकड़ सकता। यानी कि यहां भी को रोक नहीं। तो यहां भी ईश्वर बाधित है। देखिए ईश्वर बाधित है। कहने का मतलब यह नहीं है कि वो एक-एक को जा करके उंगली पकड़ के रोके। ईश्वर तो अपनी शब्द शक्ति से रोक सकता है। केवल वो स्मरण सर्वशक्तिमान है। इसका मतलब यह नहीं कि उसका वही कार्य है कि कोई गलत कर रहा है उसको रोके। कोई अच्छा कर रहा है तो उसमें खुशी मनाए। रोक सकता। नहीं नहीं बात कहने का मतलब हम कहने का एक भाव कह रहे हैं कि जैसे आपने कहा कि वह बाधित है तो बाधित होने का मतलब भगवान भगवान ऑलमाइटी अथॉरिटी सबसे ऊंची शक्ति है वो तो वो इतनी छोटी-छोटी कार्य जैसे मान ली जाए फॉर एग्जांपल मेरे यहां पे राष्ट्रपति आया हम प्रधानमंत्री आया

00:45:47:22 हम फॉर एग्जांपल मैं कहूं छोटी सी काम है एक हम मेरे घर की नल खराब हम उसको आप सुधार दीजिए। हम क्या मेरे को यह कहना अच्छा लगता है? नहीं नहीं अच्छा लगता ना। क्यों? क्योंकि वो इतना बड़ा व्यक्ति मैं तो उससे बड़ा से बड़ा कार्य करा सकती हूं ना। बिल्कुल। तो भगवान इतनी ऊंची शक्ति सर्वशक्तिवान बात है। तो उसको हम कहें कि इतनी छोटी-छोटी काम तो क्या उनसे हम ऐसी अपेक्षा रखें कि हम कुछ भी करते रहे। हम कहे कि भगवान जो नहीं नहीं अपेक्षा नहीं कह रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं। जैसे आज हमने देखा न्यूज़ पेपर में आया सामूहिक बलात्कार हो गया किसी बिटिया के साथ। ठीक है? तो क्या ये इंपॉर्टेंट एक जरूरी नहीं है कि उसको रोक दिया जाता। भगवान वहां रोक देते उसे। अगर हम कहेंगे कि भगवान की मर्जी के बिना होता है तो भगवान की फिर सर्वशक्तिमत्ता घटेगी। तो हमें मानना पड़ेगा ना कि भगवान सब कुछ करने वाले होते हुए भी वो अकर्ता है। जैसे भगवत गीता में उन्होंने कहा कि तू मुझको सब कुछ करने वाला होते हुए भी अकर्ता जान। क्यों? इसलिए कि तुझे नहीं पता है कि ये सब नाटक है। मुझे पता है कि नाटक है। ये बलात्कार बलात्कार कुछ हो ही नहीं रहा है। तो फिर मुझे फर्क नहीं पड़ता फिर उन

00:47:02:26 चीजों से। हमें दोष क्यों लगता है? क्योंकि हमारे लिए नाटक नहीं है। उसके लिए नाटक है। जिस दिन हम लोग मुक्त हो जाएंगे हमारे लिए नाटक नहीं होगा। जी तो भगवान को भगवान इसलिए नहीं रोकता है कोई भी अच्छा है बुरे में हस्तक्षेप इसलिए नहीं करता है क्योंकि उसको मालूम है जैसे हमारे हमारे घर में छोटे बच्चे होते हैं वो खामखा की चीज के लिए रोते नहीं जिद करते हैं मम्मी मुझे वही चाहिए पास में आता है अरे मम्मी ये तो बेकार है जी ये तो व्यर्थ की चीज थी मैं रो रहा था तो मम्मी को पता है वो व्यर्थ की चीज है बच्चे को पता है कि वो बहुत इंपॉर्टेंट है जी तो मम्मी रुक रही है आराम से वो नहीं जा रही है वो पिता वो है परमात्मा ठीक है तो ये तो ये हो गया कि वो क्यों नहीं रोकता क्यों हस्तक्षेप नहीं करता मगर हमारे अकॉर्डिंगली दुनिया में जो बुरा हो रहा है वो हकीकत लग रहा है हमें नहीं नहीं वो हमें हकीकत लग रहा है हम उस चीज में जी रहे हैं और परमात्मा को लग रहा है कि एक नाटक है परमात्मा को लग नहीं रहा उसको मालूम है उसको मालूम है और उसको ये पता है कि ये थोड़े समय के लिए है फिर उसके बाद हमारा जो ओरिजिनल अस्तित्व कुछ और है हां कि उसको मालूम है तू नैन चिंदती शस्त्राण नैनम दति पाव कहा है तू जो है आत्मा है तुझे कुछ हो ही नहीं सकता तू कहां कहां घबरा रहा उसको मालूम है। खैर तो इसमें बात यह थी इसका मतलब ईश्वर की नजरों में कुछ भी अच्छा बुरा होता ही नहीं है क्योंकि उसको मालूम है ये सब प्रपंच है। ठीक है? मगर

00:48:18:07 हमारी नजरों के अनुसार जो बुरा है हमारी नजरों के अनुसार जो अच्छा है तो हमारी नजरों के अनुसार जैसे अच्छे पे भगवान का कंट्रोल है वैसे ही हमारे नजरों के अनुसार बुरे पे भी भगवान का कंट्रोल है। जी है ना? अब बात यह आती है इसमें कि यदि भगवान का बुराई पे कंट्रोल है और उसके बावजूद भी बुराई हमारे अकॉर्डिंगली भगवान के अकॉर्डिंगली बुराई है ही नहीं मगर हमारे अकॉर्डिंगली जो बुराई है उस पर भगवान का यदि कंट्रोल है तो यदि बुराई फिर भी अस्तित्व में है तो इसका मतलब हमें ये मानना पड़ेगा कि जैसे सब चीजों का मूल आधार भगवान है जैसे आपने कहा कि पंखा घूम रहा है तो इसके पीछे शक्ति है। ठीक है? जैसे हमने कहा कि पेड़ हिल रहा है तो उसके पीछे शक्ति है। तो इसका मतलब हमें मानना पड़ेगा कि अगर दुनिया में बुराई भी हो रही है तो उसके पीछे भी शक्ति है। अंत समय में जाके वहां रुकना पड़ेगा एक शक्ति के आधार पे। इसका मतलब हमें मानना पड़ेगा कि भगवान सबका मूल है। बुराई भी उसके ही कारण है। तो फिर बात ये आ जाती है क्या भगवान आपसे झूठ बोल सकता है?

00:49:26:24 भगवान सत्य है। वो झूठ नहीं बोलता। बोल सकता है कि नहीं? बोल सकता है बट वो झूठ नहीं बोलता। नहीं नहीं बोल सकता है तो फिर वो ये वाली बात भी झूठ बोल दे बोल देगा कि ना कि मैं झूठ नहीं बोल बोलता। देखिए वो सर्वशक्तिमान है तो सब कुछ कर सकता है। जिस प्रकार हमने कहा कि वो सर्वशक्तिवान है तो सब कुछ कर सकता है। लेकिन वो बाधित है। वो भी समय के चक्र में बंधा हुआ है। मतलब वो झूठ वो झूठ नहीं बोल सकता। वो समस्त बुराइयों का कारण जरूर है पर वो स्वयं झूठ नहीं बोलता नहीं झूठ बोल ही सकते तो यहां भी बाधित हो गया अभी जैसे जन्म में तो जन्म ले लिया उसने मगर अगर वो झूठ बोलता तो फिर उसकी महिमा में ये नहीं गाते ना सत्यम शिवम सुंदरम सत्यम क्यों परम सत्य है जी परम सत्य तो इसलिए वो झूठ बोल ही नहीं सकता। नहीं तो वो वो वो वाला सत्य है ना जो इस प्रपंच रूपी संसार के बाहर जो हमें जो प्राप्त करना है। पर वो बोलने में भी झूठ नहीं बोल सकता। व्यवहार में भी नहीं मतलब नाटक के अंदर आके तो तो फिर तो बाधित हो गया फिर से अभी हमने जन्म दे के उसको सर्वशक्तिमान बनाया था फिर बाधित हो गया भाई अगर संसार में इतना सा भी कोई काम है जो वो नहीं कर सकता है तो फिर वो बाधित

00:50:42:00 हो गया ऐसा नहीं ये ये सवाल इसलिए पूछ रहा हूं मैं असल में जी वो उसका पॉइंट ये है कि एक हमारे बृहधारणिक उपनिषद में दो चार 10 में एक बात कही गई है हमारे जो वेद है वो अपारुषय ग्रंथ है वो अंतिम प्रमाण है उनके उनके के अलावा मतलब वो भगवान की सांस के रूप में है। भगवान हम लोग दो प्रकार के कार्य करते हैं। एक चाहकर और एक बिना चाहकर। जो हम चाहकर करते हैं उसमें हमारी बुद्धि इन्वॉल्व होती है। तो हम हम उस पर कंट्रोल होता है कि हम इसको कैसे करें। जैसे मैं मेरे सामने दो लोग बैठे हुए हैं। एक वो भाई साहब बैठे हैं। एक दीदी बैठी है। मैं चाहूं तो इनको बुलाऊं, मैं चाहूं तो इनको बुलाऊं। क्योंकि मैं चाहता हूं इसलिए मैं उसमें निर्णय ले पा रहा हूं कि इनको बुलाऊं कि इनको बुलाऊं। मगर कुछ कार्य हम ऐसे भी करते हैं जो हम बिना किसी चाह के करते हैं। ठीक है? जैसे कि सांस लेना। जी। इसमें हमारी कोई इच्छा नहीं है। बच्चा जन्म ले रहा है माता के गर्भ से तो वो सांस ले रहा है। उसमें कोई उसकी निर्णय नहीं है। अपने आप ले रहा है। स्वतः उसका नेचर है वो सांस लेना। ठीक है। इसी प्रकार से वेद जो है भगवान के स्वास रूप में प्रकट होते हैं। तो वो चैलेंजेबल नहीं है। और भगवान जब हमें चाह के कुछ देंगे तो वो चैलेंजेबल हो जाएगा। उसकी क्रेडिबिलिटी पे क्वेश्चन मार्क आ जाएगा और जो कुरान इत्यादि का

00:51:57:03 ज्ञान भी है वो भी उनका खुद का कहना है कि वह चाह कर दिया है इसलिए भी ऑथेंटिक नहीं है कुरान और बाइबल इत्यादि मगर हमारे जो वेद पुराण इत्यादि ग्रंथ है ये बिना चाह के स्वास रूप में प्रकट होते हैं तो जब हम ये कहते हैं कि भगवान आके हमको खुद बता रहे हैं तो वो तो हो सकता है हमको भटका रहे हो क्योंकि क्रिमिनल्स क्राइम कर रहे हैं वो उनकी मर्जी के बिना थोड़ी ना कर रहे हैं। राक्षस जन्म ले रहे हैं तो उनकी मर्जी के बिना थोड़ी ना ले रहे हैं। उसमें उनका कंट्रोल है। जैसे सर्वाधार का जैसे दीदी ने सबसे पहले दुनिया की समस्त सृष्टि संचालित कहां से हो रही है उसको ईश्वर बताया। तो उसमें तो क्रिमिनल्स भी तो आ गए।

00:52:34:24 मतलब जो कहने का मतलब मेरा यह था कि जो कोई सुपर नेचुरल पावर अगर हमको आके कह भी रही है कि मैं भगवान हूं। और वो भगवान ही है। मान लीजिए। हम्। नहीं तो बुद्ध के बुद्ध के रूप में विष्णु भगवान का अवतार होता है। और वह झूठ बोलते हैं। मोहिनी के रूप में वह छल करते हैं। है ना? तो हम इसलिए वेद के आगे भगवान के वाक्य को भी नहीं माना गया है। मना कर दिया। नहीं भैया वेद परम प्रमाण। तो जब हम कहते हैं कि कोई भगवान ही आकर के हमको मुरली के द्वारा मिल रहे हैं। और ये कह रहे हैं कि तुम ऐसा करो, ऐसा मत करो, ये करो, ये मत करो। तो फिर उसमें ये बात आ जाती है कि भगवान चाहकर कुछ जब कर रहे हैं और दुनिया में भगवान की मर्जी के बिना कुछ नहीं है तो इसका मतलब बुराई का भी अस्तित्व नहीं है भगवान की मर्जी के बिना तो हो सकता है कि हमें भटका भी रहे हो। कुरान में भी ये बात लिखी हुई है कि मैं कुछ लोगों को भटका देता हूं। तो जब वो किसी को भटकाने की बात स्वयं स्वीकार कर रहा है कुरान को बोलने वाला जो खुदा कहते हैं उसे है ना? तो फिर उसकी एक भी बात पे बिलीव कैसे किया जाएगा? तो कहने का अर्थ यह है मेरा कि वेद के समक्ष फिर हम किसी बोली हुई बात को प्रमाण नहीं मान सकते। इसमें आप कुछ बता दे फिर हम ऑफ करें। पहले एक मिनट हम ये कह सकते हैं कि जितने भी वेद शास्त्र उनकी

00:53:49:25 ओर घुमा लो। मत करे मत। अच्छा अच्छा जितने वेद शास्त्र है हमारे वो परमात्मा ने नहीं लिखे है वो हम मनुष्य आत्माओं ने लिखे है मनुष्य आत्माओं ने लिखे है मनुष्य आत्मा में लिखने का मतलब नहीं मैं यही से शुरू करूंगा जैसे की मुरली है दीदी आप इसको ले लीजिए प्लीज वो वो अच्छी चीज है जो आप बता रही है वो जाएगा समाज में अच्छा रहेगा एक मिनट आप कहने का मतलब आप आ जाइए ना इधर आ जाइए एक मिनट आ जाइए एक मिनट कहने का मतलब मैं आपको समझा चालू है मैं आपको नहीं

00:54:25:15 हम पढ़ते हैं और हमने पढ़ करके अब हमने उसपे चिंतन किया और चिंतन करके अगर हम उसको एक किताब की रीति से लिख देते हैं तो अब उस मेरे द्वारा जो परमात्मा ने मुझे सुनाया मैंने सुन लिया अब फिर मेरे चिंतन किया ना अब मैंने चिंतन करके उसकी किताब बना ली अब उस किताब को तो जितने लोग पढ़ेंगे तो वो सब अपनी अपनी रीति समझेंगे ना उसे तो उसी प्रकार वेद और शास्त्र भी है कि जो बाइबल है, कुरान है, जो गुरु ग्रंथ साहिब है इन सबको लिखने वाले जो है गुरु नानक जी ने कोई गुरु ग्रंथ साहिब नहीं लिखा। उन्होंने तो परमात्मा का परिचय दिया लेकिन उसको फॉलो करने वाली जो आत्माएं थी उन्होंने उनकी जीवन कहानी लिख डाली कि वो आए सृष्टि पर वो अवतरित हुए। फिर उन्होंने ऐसा नहीं वेद की वेद वेद इत्यादि की रचना नहीं की गई है। वही तो मैं कह रहा हूं। वैधानिक उपनिषद यह कहता है कि वेद इत्यादि कभी रचे नहीं गए। वह सदैव विद्यमान थे भगवान की सांस के रूप में। उनकी कभी रचना नहीं हुई। सनातन है ना? किसका? कृष्ण को माना जा रहा है। किसको? जो हम ये जो कह रहे हैं कि भगवान हमारे साथ छल कर सकते हैं या भगवान जो वेदते शास्त्र ईश्वर ईश्वर के बिना ईश्वर के बिना दुनिया में किसी चीज

00:55:40:16 का कोई चीज अस्तित्व में ही नहीं आ सकती। आप ही ने कहा कि इस संसार में फूल भी खिल रहा है तो उसका आधार भी ईश्वर है। तो अगर फूल पंखा सबका आधार ईश्वर है तो वहां पर छल और इसका आधार भी ईश्वर है। यद्यपि ईश्वर के अनुसार वो कुछ नहीं है। ईश्वर को पाप नहीं लगता क्योंकि ईश्वर जानता है तो कुछ है ही नहीं। है ना? मगर हम बच्चों की तरीके से देख रहे हैं कि भैया ये पाप है। वो वो है तो हमारे अनुसार उसका आधार भी वो है। ईश्वर है। तो अगर ईश्वर के लिए कुछ भी नहीं है। जब कुछ सच नहीं है। कुछ झूठ नहीं है तो ईश्वर तो प्रपंच रूपी संसार में आके हां तो ईश्वर तो प्रपंच रूपी संसार में आकर कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है और सब कुछ करते हुए भी उसको पाप नहीं लगेगा क्योंकि उस जानता है बलात्कार है ही नहीं चोरी है ही नहीं वो मर्डर है ही नहीं कुछ है ही नहीं है ना वो तो नाटक है सब

00:56:29:01 ठीक है कर्मों का परिणाम ही होता है ना कि हम जैसा बोलेंगे वैसा हम पाएंगे वो तो ठीक है मगर जब ईश्वर देखिए एक दो बातें अटक रही है बस एंड ही है कि यदि ईश्वर झूठ बोल सकता है तभी वो सर्वशक्तिमान है सिंपल अगर वह झूठ नहीं बोल सकता तो सर्व शब्द हटाना पड़ेगा। शक्तिमान कह दीजिए। हां कोई भी एक कार्य अगर वह नहीं कर पा रहा है तो वह सर्व शब्द हटाना पड़ेगा। या तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है या तो वो झूठ बोल सकता है। अगर वो झूठ बोल सकता है तो वो आपको आकर के सच ही बता रहा है। इसकी कोई गारंटी नहीं है। ये दिक्कत है।

00:57:05:15 अपनी भाषा में यही कहेंगे कि वेद ही परम प्रमाण है। अपौरुष है ग्रंथ जिनको ईश्वर ने भी नहीं रचा। वो कि वेद वेद के लिए ईश्वर भी नहीं कहता कि मैंने उसे रचा। आप कह रही मनुष्यों की रचना है वो उन्होंने भी नहीं रचा। वो सनातन ग्रंथ है कि कब से जब से ईश्वर है। हां वो सनातन ग्रंथ है। बस वो ये होता है कि पहले वो श्रुति के द्वारा प्रवाहित होते हैं। ऋषि उनके दर्शन करते हैं। फिर ऋषियों के माध्यम से गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा फिर आगे आकर के द्वापर में व्यास जी उन्हें लिख देते हैं। आपकी कुछ मान्यता अलग होगी। मगर ये है अगर हम यह कहेंगे ना कि ईश्वर हमको आकर खुद कह रहा है कि वो गलत है। तो ईश्वर को हमने नकारा है। पहले भी नकारा है। विष्णु भगवान बुद्ध के रूप में आए। हमने मना कर दिया। हम आपकी बात नहीं मानेंगे। वेद की महात्मा नहीं तो आज हम बुद्धिस्ट होते। हम बुद्ध बुद्धिस्ट बन जाते। सारी बातों का सार सारी बातों का सार अगर हम निकाले तो हम यही कह सकते हैं कि ब्रह्मा कुमारी में अब आ जाइए ना। अब तो एंड एंड है। अब अब मैं वो सवाल नहीं करूंगा। अब सवाल नहीं करूंगा। आ जाइए। चलिए एंड है हां बस एंड एंड उसको

00:58:17:01 अब सवाल नहीं करूंगा आ जाइए एंड देखिए अब हम हम यही कहेंगे कि ब्रह्मा कुमारी में जो दिया जाने वाला ज्ञान होगा वो ज्ञान परम सत्य है। दूसरा परमात्मा ने हमें बताया कि परमात्मा की रचना परमात्मा की सर्वप्रथम रचना देव आत्मा है और वही देव आत्मा जब इस सृष्टि पर कर्म करते-करते नीचे गिरती है तो वो साधारण मानव बन जाती है। परमात्मा ने कहा कि मेरी रचना देव आत्मा है और फिर उसके बाद धर्म आत्माएं हैं। जो द्वापर आने के बाद जब सृष्टि का संचालन बिगड़ता है तो परमात्मा समय-समय पर धर्म की आत्माओं को सृष्टि पर भेजते हैं और धर्म आत्माओं को भेज के वे पुनः उन्हें यह संदेश देते हैं कि अब आप सृष्टि पर जाकर के सृष्टि की मानव आत्माओं को बताओ कि प्रेम क्या है? सत्य क्या है? है ना? धर्म क्या है? इन सभी चीजों का ज्ञान यहां पर तो कुछ एक आत्माएं होती है जो उस मार्ग पर चलती हैं और कुछ होती है जो उस मार्ग पर नहीं चलती है जो चलती है वो उस परमात्मा के सानिध्य

00:59:32:16 में रहती है जो नहीं चलती है वो उनसे दूर हो जाती है और अंत में परमात्मा को पुनः इस सृष्टि पर अवतरित होना ही होता है क्योंकि परमात्मा ये कहते हैं कि कोई हनुमान के रूप में याद करता है कोई बुद्ध के रूप में याद करता है कोई कृष्ण के रूप में याद करता है कोई दुर्गा काली के रूप में याद करता तो यह सभी मानव देह में है और जो जन्म मरण में आता है उसे हम परमात्मा नहीं कह सकते। परमात्मा वो जो जन्म मरण से परे हो और जो जन्म वो जन्म मरण से परे है उसके कंट्रोल में अपना आना जाना ऐसा है। मैं बताऊं है क्या कि जैसे मान लीजिए ईश्वर ने एक रूप दिखाया आपको जी कि अ मान लीजिए ईश्वर सब जगह है। ठीक है? मगर हम उसको अभी माया होने के कारण माया का पर्दा होने के कारण हम उसको देख नहीं पा रहे। फिर उसने क्या किया? एक मानव की आकृति के रूप में वो जो माया का पर्दा है उसमें उसने एक चित्र बनाया चित्र। अब हम उस जो उसने जो छेद किया है ना उस चादर में माया रूपी चादर में उस चादर से हम जो देख रहे हैं उधर परम तत्व को वो भगवान है। तो परम तत्व ने अपना एक रूप आपके सामने प्रकट कर दिया। अब क्या है कि हमने कहा कि भाई वो जन्म मरण के फेर में नहीं आता है। ठीक है? नहीं आता है। भगवान ने क्या किया? भगवान आपके सामने

01:00:47:22 आ गए कृष्ण के रूप में, राम के रूप में। उन्होंने मात्र इतना किया कि जो आपको अभी तक दिखा रहे थे अपना रूप वो अब नहीं दिखा रहे। तो सांसारिक दृष्टि से क्या हुआ? भगवान का मरण हो गया। देह त्याग कर दिया। शरीर को नष्ट कर दिया। वास्तविकता में उन्होंने क्या किया है? केवल वो गायब हुए हैं। अभी तक वो गोचर थे। अब अगोचर हो गए। तो इस अगोचर वाली तरीके से कहेंगे तो वह जन्म मरण में नहीं आए और सांसारिक दृष्टि से कहेंगे तो वह जन्म मरण में आए। तो दोनों ही बातें हमारे शास्त्रों में इसलिए मिलती है। चलिए खैर दीदी ने बहुत सारा समय दिया हमको और मैं आशा करता हूं कि ये चर्चा आपको अच्छी लगी होगी। आप सभी कमेंट करके जरूर बताएं कैसी लगी आपको चर्चा और दीदी को बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने अपना काफी सारा समय दिया। आपका भी धन्यवाद कि आप हमारे सेवा स्थान पर पधारे और आज आपने परमात्मा के बारे में जानने की इच्छा जागृत की।

⬜ Not used yet · 01:01:41:03 – 01:01:47:00 (0:06)

01:01:41:03 जी तो सभी को जय श्री राम। जय श्री राम। [संगीत]

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 1:01:50 · 05 Oct 2025

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