⬜ Not used yet · 00:00:02:04 – 01:09:17:00 (1:09:15)
00:00:02:04 सभी को जय श्री राम। इस व्यक्ति ने भागवतानंद ने एक वीडियो बनाया है। कुतर्कों से ओतप्रोत है जो वीडियो और उसमें जो निगमानंद ने बातें की हैं कि ईश्वर अल्लाह एक है। वर्णाश्रम का विरोध मां भगवती को अपनी पत्नी के रूप में देखना, अपनी पूजा करवाना, विदेश यात्रा इत्यादि इन विषयों में एक वीडियो बनाया। विदेश यात्रा को तो विदेश यात्रा पर तो कोई बात नहीं की उसने पर जो उससे हो सका उन विषयों में बात करते हुए कुतर्कों से ओतप्रोत एक वीडियो बनाया है। उसी का उत्तर प्रतिकार स्वरूप देने के लिए वीडियो बना रहे हैं। यह वीडियो दो भागों में क्योंकि कुछ मिलते जुलते जिन विषयों पर बात उसने अपने कुतर्कों से ओतप्रोत उस वीडियो में की है। उसी से मिलते जुलते कुछ टॉपिक हैं जहां जो उठ उठे थे तब जब यह व्यक्ति लखनऊ आया था। आपके संज्ञान के लिए मैं बता दूं कि व्यक्ति पिछले कुछ दिनों में लखनऊ आया था। दो से तीन दिन शायद यहां रुका भी था और पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज भी पहुंचे थे। इसके मंच पर मंचस्थ भी हुए थे। और वहां
00:01:17:10 पर मेरा नाम ले लेकर के कुछ मेरे ख्याल से अल्प बुद्धि या सरल बुद्धि वाले लोगों ने इससे कुछ प्रश्न किए थे और इसने वही क्या कहते हैं स्वाता सुखाय वाला उत्तर प्रस्तुत करते हुए और बाबा बाबा वाली बात कर दी वो जो नहीं वह फिल्म का दृश्य है कि जो लीडर होता है वह कहता है एक शेर सुनाया है अर्ज किया है तो उसके जो चेले छपाटे होते हैं वो वो कहने लगते हैं वाह वाह वाह वाह तो वो कहता है मां शुरू तो करने दो तो वही वाला हाल था वहां पर तो खैर तो यहां लखनऊ में जो प्रश्न हम हमारा नाम मेरा नाम लेकर के जो किए गए थे उनमें से जो मुझे जो प्रश्न याद है उनको मैंने लिया है उनका यहां पर उसने जो कुतर्कों के साथ जो उत्तर दिया था बात को घुमाते हुए या मुख्य विषय से बचते हुए तो वह हम यहां पर उत्तर दे रहे हैं। यद्यपि हमने तो बिल्कुल डंके की चोट पर कहा था कि भाई तुम बताओ कब कहां आना है तो हम आए तुम्हारे पास और वहां आकर के सामने से बात करो ये नहीं वीडियो वीडियो बहुत खेल लिया और ये हम तभी से कह रहे हैं मार्च से जब इसने पहली बार हमको कहा था कि भाई हमको
00:02:32:12 लाइव में ले लो तो हम हमने लाइव में बात ना करने की बजाय व्यक्तिगत रूप से चर्चा करने की बात रखी थी और इस विषय में एक बात मैं और क्लियर कर देना चाहता हूं कि यह जो चर्चा चर्चा वाली बात मैं रख रहा हूं कि भाई मुझे चर्चा करनी है तो चर्चा कोई इसलिए नहीं करनी है भागवतानंद से कि मुझे कोई मैत्रीपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त करना है। कोई निराकरण प्राप्त करना है। मुझे समझ में आ गया है ये व्यक्ति कितना पाखंडी और ढोंगी है। और समय के साथ-साथ अन्य जो इसके समर्थक भी रह चुके हैं उनको भी धीरे-धीरे समझ में आ रहा है। जो शेष रह गए हैं उनको भी ऐसी मतलब ऐसा भाव है कि उनको भी भविष्य में जल्दी से जल्दी वह चीजें समझ में आ जाएंगी। तो मैं फिर चर्चा क्यों करना चाहता हूं? चर्चा इसलिए करना चाहता हूं कि जिन मान्य आचार्यों से इसको प्रश्रय प्राप्त होता है या फिर जो इसका सम्मान के साथ नाम ले लेते हैं निग्रचार्य जी बोलते हैं जबकि यह आचार्यों को लतखोर तक बोल देता है तो ऐसी स्थिति में मैं इसको सम्मान देने वाले इसको प्रशय देने वाले जब आचार्यों के पास जाता हूं उनसे बात करता हूं तो वो इसकी जो रटी रटाई कहानियां है वो मुझको सुनाते हैं। जो इसने
00:03:47:13 अपनी बचाव में बातें निर्गत कर रखी हैं। वह मुझे क्या कहते हैं? वो एज इट इज वहां से कॉपी पेस्ट मुझे करते हैं। अब भाई मैं कह रहा हूं कि भाई निग्रह परंपरा क्या है? उसका क्या विवरण है? इसके गुरु का नाम क्या है? फिर उसके गुरु का नाम क्या है? फिर उसके गुरु का नाम क्या है? तो इस अगर वो निग्रह परंपरा का कोई प्रमाण नहीं है तो फिर यह व्यक्ति अपने आप को निग्रहचार्य क्यों कह रहा है? और फिर इस व्यक्ति के निग्रचार्यत्व को आप लोग समर्थन कैसे दे रहे हैं? तो अब इस विषय में यह व्यक्ति कहता है कि मैंने जो है निग्रह प्रवेशिका लिख रहा हूं 800 ग्रंथों से और वो मैं समय के साथ उत्तर दे दूंगा। तो यही उत्तर वो लोग मुझे चिपकाते हैं। फिर मैं कहता हूं कि वाकलन हो गया। जब भगवती का वरदान प्राप्त था तो वाकलन कैसे हो गया? और भी अन्य जो भूल चूक हो रही है पौरुष के दोष से वो कैसे हो रही है? जब भगवती का वरदान प्राप्त है कि तुमसे कोई गलती नहीं होगी कर्मेंद्रियों के द्वारा तो इस विषय में भी वह जो आचार्य गण होते हैं वो मौन हो जाते हैं। तो ऐसी स्थिति में अब मैं उनसे तो पीछे पड़ नहीं सकता हूं कि नहीं नहीं फिर आप जो है निग्रचार्य क्यों कह रहे हैं या फिर उनके साथ मैं वीडियो तो बना नहीं सकता हूं कि भाई इस इस विषय में जो है आचार्य मौन हो गए। तो इस कारण से क्योंकि
00:05:02:14 मैं योग्य नहीं हूं क्योंकि मैं उनसे तर्क वितर्क नहीं कर सकता हूं। उनकी बातों का मैं उत्तर नहीं दे सकता हूं। यद्यपि उनके मुख से इसकी बातें निकल रही हैं क्योंकि उनका अपना कोई चिंतन तो है ही नहीं इस विषय में कि वो निग्राचार्य की क्या परंपरा है क्या नहीं है मान लीजिए विद्या भास्कर जी महाराज ही हैं तो उनका अपना कोई चिंतन थोड़ी ना है इस विषय में कि वो निग्रह परंपरा में कौन कितने किसके कितने आचार्य हैं इस विषय में उनका अपना कोई चिंतन कोई अध्ययन इस विषय में मुझे नहीं लगता है जो निग्र आचार्य नाम से ख्यापित अपने आप को कर रहा है भागवतानंद जो इसने बोल दिया वही वो हमें हमें दे सकते हैं उसकी बोली हुई बातों को। तो अब क्या है कि उसकी बोली हुई बातों में बहुत सारे विषय ऐसे हैं जिस जिसको हम आसानी से जिनका खंडन कर सकते हैं। अब जब वो विद्या भास्कर जी अपने मुख से बोल रहे हैं तो हम वहां पर उनका खंडन नहीं कर सकते क्योंकि हम उनके स्तर के नहीं है। वो आचार्य हैं आचार्य परंपरा के तो हम उनको उत्तर नहीं दे सकते। यद्यपि इसकी बातों का मुंह तोड़ उत्तर ऐसा उत्तर कि फेविक्विक मुंह में चिपक जाए। ऐसा उत्तर हमारे पास है। पर हम जब वो बातें निर्गत हो रही होती है किसी मान्य आचार्य के मुख से तो वहां पर फिर हमें मौन हो जाना पड़ता है। तो फिर ऐसी स्थिति में हम यही कहते हैं कि आचार्य जी आप
00:06:17:15 हमारी वार्ता स्वयं आप भागवतानंद से करा दीजिए जिससे कि हम वो उत्तर प्रतिउत्तर उससे कर सकें। उससे बात संवाद कर सकें। हम तो आपके सामने बोलने लायक नहीं है। तो हम कैसे आपको बोले कि यहां पर यह आपने जो कहा है यहां पर इस पर ये दोष दिखाई देता है या आपने जो यह बात बताई है वो ये दोष दिखाई देता है। अब जैसे कि यह प्रचार जो ये वाला करता है कि मेरी परंपरा है ये है वो है 800 ग्रंथों से मैं जवाब दूंगा। जब मैंने विद्या भास्कर जी महाराज से भी पूछा था तो विद्या भास्कर जी महाराज ने भी मुझे कहा कि टेलीग्राम पे मैं आपको बहुत सारे प्रमाण उनकी परंपरा के बारे में भेज दूंगा। अभी तक तो नहीं दिया गया। मैंने उनसे यह भी पूछा कि वाकलन कैसे हो गया? उस बारे में मुझे कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ विद्या भास्कर जी महाराज से। मैंने उनसे यह भी पूछा कि जो असिद्ध आरोप लगा रहा है मनुस्मृति के वचन का विरोध करते हुए उसका क्या? तो ऐसे कई सारे अच्छा मैंने एक यह भी प्रश्न पूछा जो मैं अभी आगे इस विषय में लूंगा कि रामानुजाचार्य जी ने परम तत्व के रूप में क्या व्याख्या की है? विशिष्टा द्वैत के रूप में की है। द्वैत के रूप में की है। अद्वैत के रूप में की है। यह बात उनके जो प्रामाणिक शिष्य हैं वही बता सकते हैं। जैसे कि पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज।
00:07:33:01 अब कोई आकर के कहने लगे नहीं नहीं रामानुजाचार्य जी ने तो द्वैत की व्याख्या द्वैत बताया। विशिष्टाद्वैत नहीं बताया। या फिर रामानुजाचार्य जी ने तो अद्वैत बताया है। प्रॉपर अंतिम लक्ष्य अद्वैत बताया है। विशिष्टाद्वैत नहीं बताया। तो उस व्यक्ति की बात मान ली जाएगी। या फिर उस बात को लेकर के चिंतन होगा कि भाई दोनों की बात हो सकती है क्योंकि कोई एक ऐसी पंक्ति मिल जाएगी जिसके दो अर्थ निकल रहे हैं जिसमें अद्वैत भी है और द्वैत भी है या फिर उनके प्रामाणिक शिष्य की बात ही मानी जाएगी। तो इस तरीके से मैंने कई सारे प्रश्न पूछे तो उनकी ओर से मुझे कोई इन विषयों में प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई। ऐसे में प्रतिक्रिया प्राप्त ना होने की स्थिति में भी जब वो उसे प्रश्रय दे देते हैं या अन्य आचार्य भी जब उसे प्रशय देते हैं भागवतानंद को तो मैं उनसे डायरेक्ट सीधे तौर पर मैं भागवत अनंत तो हूं नहीं कि किसी को भी लथखोर कह दूं या किसी भी मान्य आचार्य को तू तड़ाक में बात करने लगूं। भाई मेरी तो मर्यादा है। मैं कोई अनाथ तो हूं नहीं। वो तो अनाथ है बिना बाप का। धार्मिक क्षेत्र में उसका कोई पिता नहीं है। हमारे पिता तो हैं हमारे गुरुदेव पूरी के शंकराचार्य और उन्होंने ही हमें सिखाया है कि सभी मान्य आचार्यों में अपने ही गुरु का दर्शन करो। तो हम वही कर रहे हैं। तो इसलिए एक यह समस्या है कि जब विद्या भास्कर जी महाराज
00:08:48:02 मौन है उसके बाद भी उसे निग्रचार कह रहे हैं या फिर विद्या भास्कर जी महाराज जैसे जो अन्य आचार्य या वो स्वयं जब वो उत्तर नहीं या वो उसके उसके पक्ष में उसकी बातों को निर्गत कर रहे हैं तो हम वहां पर उनसे प्रतिकार स्वरूप बात करने में असमर्थ हैं क्योंकि हम बहुत तुच्छ हैं उनके समक्ष कुछ भी नहीं है। नगण्य है तो ऐसे में वह तर्क वितर्क की स्थिति ना में असहजता होने के कारण यह एक चीज आती है कि भाई ठीक है आचार्य श्री आप हमारी बात वार्ता सीधे उससे करवा दीजिए तो वो अपना निग्रचार्य तो सिद्ध कर दे भाई वो सिद्ध कर दे कि उसने कौन से ग्रंथ में कहां लिखा है कि उसने किसी महिला पर यदि वैश्या होने का आरोप लगाया तो वैश्या सिद्ध कर दे भाई यह कहा जाता है अक्सर कि भाई वो शास्त्र सम्मत कार्य करता है किसी कोई स्त्री वैश्या है कि नहीं यह शास्त्र में नहीं लिखा है। या तो शास्त्रों में यह लक्षण लिखे होंगे कि अमुक अमुक लक्षणों से कोई स्त्री वैश्या सिद्ध होती है तो आप वैश्या कह दो किसी को नहीं तो वो लक्षण वो लक्षण उस पर लागू होते हैं कि नहीं वो दिखाई देते हैं कि नहीं ऐसी कोई व्याख्या दो या फिर केवल किसी आपके शब्द को प्रमाण मान करके किसी को
00:10:03:06 वैश्या कैसे मान लिया जाए तो मेरे और उसमें शास्त्रीय विषयों को लेकर के उतना विवाद नहीं है। विवाद है कि तुमने असिद्ध आरोप लगाए उनको सिद्ध कर दो उनको सिद्ध करो तो यह सारी बातें हैं और फिर जब तुम दूसरों पर उंगली उठा रहे हो तो फिर तुम अपना निग्रचार्यत्व इस भी सिद्ध कर दो आचार्यत्व भी सिद्ध कर दो तो सबसे पहले आप लोग ये समझ लें ये चर्चा की बात आ क्यों रही है जो लोग कुछ ऐसे प्रश्न करते हैं कि अब वो चर्चा क्यों करें जब वो चर्चा करने आया था तब तो तुमने स्वीकार नहीं किया हमने ऐसा हमने कभी भी उसकी चर्चा के प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं किया था ये ढोल में पोल वो फैलाता है और कभी भी दूसरे का पक्ष जाने बिना निर्णय आप लोग ले लेते हैं। हमने कहा था सार्वजनिक चर्चा ना करो। व्यक्तिगत चर्चा कर लो हम और चर्चा आज नहीं तो कल तो तुम्हें करनी ही पड़ेगी। कोर्ट में करोगे। ऐसे नहीं करोगे तो कोर्ट में करोगे। तुमको अपने उन वक्तव्यों के लिए क्षमा प्रार्थी होना पड़ेगा। उसके लिए तुमको दंड भोगना होगा। उसके लिए तुम्हें अपना मुख में ताला लगाना होगा। जो तुम गलत बातें बोले हो। अगर तुम 50 सही बातें बोल रहे हो, शास्त्र सम्मत बोल रहे हो तो इसका अर्थ यह नहीं है कि तुमको यह अधिकार मिल गया कि तुम कुछ भी अनर्ग प्रलाप करते रहो क्योंकि तुमने शास्त्र सम्मत कुछ बातें की है। है ना? कोई
00:11:18:09 तो होगा ना जो तुम्हें सबक सिखाएगा। तो चलो विद्या भास्कर जी महाराज के यहां नहीं आओगे या लखनऊ में तुम नहीं आओगे तो कोर्ट में तो आओगे न्यायालय में तो आओगे वहां आओ। वहां आकर के चीजें सिद्ध करो जो तुमने बोला है। तो यह बात है कि चर्चा करने की बात मैं क्यों कहता हूं। अब बात आती है कि इसने वहां पर क्या-क्या किया? कुतर्क किस तरह के पहली बात तो जो प्रश्न ही किए गए वो भी वही बहुत व्यर्थ के प्रश्न थे। या तो उनका जो शाब्दिक जो स्वरूप था वो गलत था। पंक्तिबद्ध नहीं हो पाए थे वो ठीक से। तो पहला मुझे जो स्मरण में आ रहा है वह यह है कि
00:12:04:21 अच्छा तो विद्या भास्कर जी महाराज से मुझे यह भी प्राप्त नहीं हुआ है कि जिस परंपरा से जो प्रामाणिक उसके उत्तराधिकारी हैं जो नियुक्त हैं वह बताएंगे कि मेरी परंपरा में क्या है या कोई भी एरागरा नतुरा बता देगा और यदि ऐसा है तो फिर जाकिर नायक का क्यों नहीं माना जाएगा फिर दयानंद का क्यों नहीं माना जाएगा फिर फिर भागवत आनंद का ही क्यों माना जाएगा? और कई वही वाली बात कि कई पंक्तियां शास्त्रों की ऐसी होती है जिससे दोहरे अर्थ निकल रहे होते हैं। तो उस विषय में यह मानते हुए कि दोनों ही प्रमाण हैं। क्योंकि दो अर्थ निकल रहे हैं तो दोनों ही प्रमाण मान लिए जाए। दयानंद का भी प्रमाणिक मान लिया जाए और जाकिर नायक का भी प्रमाणिक मान लिया जाए क्योंकि उसके अनुसार वो अर्थ तो निकलेगा जो वो बोल रहे हैं। मगर वह अर्थ मान्य नहीं होगा। सामान्य एक ही का अर्थ होगा हमारे अनुसार क्योंकि वह अर्थ परंपरा से प्राप्त है। तो क्योंकि शास्त्रों के अनुसार वह भी अर्थ कर रहे हैं तो उस उस सिचुएशन में यह तो नहीं कहा जाएगा। आपके अनुसार जो यह कह रहा है कि कोई भी आकर के शंकराचार्य परंपरा में क्या हुआ वो बता देगा कोई भी आकर के चाहे भले ही वह परंपरा प्राप्त हो या ना हो या फिर कोई भी आकर के रामानुजाचार्य परंपरा में क्या हुआ क्या नहीं हुआ वो बता देगा। भले ही उसने रामानुजाचार्य परंपरा का अध्ययन परंपरा से किया हो या ना किया हो। यदि इस बात को मान लेंगे तो दोहरे अर्थ वाले श्लोक अथवा
00:13:19:27 मंत्रों का जो अर्थ दयानंद या फिर ये जाकिर नायक जैसे लोग जो करते हैं फिर उनके भी अर्थ को हमें मानना पड़ेगा। चलो हम अपनी परंपरा में नहीं मानेंगे मगर हम यह नहीं कह पाएंगे कि अप्रामाणिक अर्थ है। नातस प्रतिमा अस्ति में अगर हम अर्थ निकालेंगे तो प्रतिमान भी आएगा के समान और मूर्ति भी आएगा। तो अगर वह कहे फिर हमें यह कहना पड़ेगा उनका भी अर्थ प्रामाणिक है तो एक ही चीज है जो हमें जो उनको अप्रामाणिक सिद्ध करने में हमें सहायता करती है वो है परंपरा पर परंपरा को तो यहां पर गोली मार दी जा रही है तो मैंने यह पूछा हुआ है विद्या भास्कर जी महाराज से तो अभी तक तो मुझे कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है तो अब आते हैं उन प्रश्नों पे तो पहला प्रश्न किया गया था कि निग्रह संप्रदाय काल्पनिक है ऐसा कुछ कि उसकी निग्रह परंपरा की प्रामाणिकता क्या है? हम तो उसने जवाब दिया था कि
00:14:25:18 भैया आदि शंकराचार्य स्वयं निग्र आदि निग्रचार्य की स्तुति कर रहे हैं अपनी उसमें ग्रंथों में तो अगर भागवतानंद ने यह कह दिया कि मेरी परंपरा के जो सबसे परमा परम आचार्य हैं वो अमुक देवता हैं। अमुक भगवान हैं। तो इस और फिर उस अमुक देवता अमुक भगवान की आदि शंकराचार्य जी ने स्तुति कर दी है। तो इसलिए मान लिया जाए कि निग्रचार परंपरा का अस्तित्व है। निगराचार्य परंपरा प्रामाणिक है। मैं अभी उठकर के कह दूं कि मेरे परम आचार्य शिवजी हैं और शिवजी की पूरे भारतवर्ष में पूरे विश्व में पूजा की गई है। तो बस हो गई मेरी परंपरा सिद्ध। मैंने कह दिया कि मेरी परंपरा है कैलाश परंपरा और कैलाश में रहने वाले जो कैलाश पति हैं उनकी पूजा तो सब करते हैं। फिर कैसे हमारी परंपरा को झूठा कह रहे हैं? इसी को कहते हैं सच के आसपास वाला झूठ। भगवान शिव का अस्तित्व होने से उनके द्वारा मेरे तक आने वाली जो आचार परंपरा है उसका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। उसको सिद्ध करो पहले और इसके साथ ही साथ कि उनके उनके द्वारा स्टार्ट होने वाली मेरे पास तक आने वाली परंपरा से मेरा
00:15:40:21 संबंध है कि नहीं उसको सिद्ध करो फिर इन दोनों ही धरातल पर कोई व्याख्या वहां नहीं की गई कि निग्राचार्य की पूजा आदि निग्रचार की पूजा तो वो करते हैं। मतलब कैसे बातों का पतंगड़ बनाता है भाई यह व्यक्ति और सुनने वाले सुनते भी हैं इसके कुतर्कों को। खैर ताली भी बज जाती है भाई। खैर आगे क्या हुआ है कि अच्छा एक चीज और है हमारी जो भी परंपराएं हैं यद्यपि उसमें कुछ ना कुछ बात आ सकती मगर एक ये प्रश्न यह भी बनता है कि जब इसको भगवती ने स्वप्न में मंत्र दिया है तो इसकी तो परंपरा वह कोई सिद्धि नहीं होती कि आदि शंकराचार्य से यहां तक आ रही है क्योंकि भगवान स्वयं आकर के इसको मंत्र दे रहे हैं तो इसकी परंपरा वह आदि निग्र अगर कोई आदि निग्रचार है भी तो इसकी परंपरा उन तक नहीं जाती है। इसकी परंपरा वह आदि निग्रचार तक नहीं जाती क्योंकि इसकी परंपरा तो शुरू ही भगवती से हो रही है। हां यदि भगवती को भी किसी और ने शिक्षा दी है आचार्य के रूप में फिर उस आचार्य को शिक्षा दी है तब तो वो ऐसे कनेक्ट होगी निग्रह जो जिसको ये आदि निग्रहचार्य कह रहा है। है ना? तो
00:16:56:09 इसको डायरेक्ट भगवती ने मंत्र दीक्षा दी है तो फिर वह अगर कोई आदि निग्रचार है भी तब भी उस तक इसकी परंपरा का जाना सिद्ध नहीं होता है जिसकी पूजा करने के कारण आदि शंकराचार्य के द्वारा जिसकी पूजा कर दिए जाने के कारण यह कह रहा है देखो देखो हमारी परंपरा तो सिद्ध है। दूसरी बात यह हो गई और यदि इसके पास आचार्यों से वह चीजें आ रही थी कि भाई आदि शंकराचार्य जी की कोई गुरु शिष्य परंपरा है आदि निग्राचार्य की कोई गुरु शिष्य परंपरा है कोई भगवान के रूप में जिसको इसने कहा है आदि निग्राचार्य तो जिस जो वो गुरु शिष्य परंपरा है वहां से अगर आचार्यों के द्वारा तुम तक आ रही तो भगवती की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवती के मंत्र की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर तो वह मंत्र यही माना जाएगा कि आदि निग्रचार से वह जो गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा वह जो मंत्र इत्यादि है वह तुम तक निगमानंद और निगमंद के बाद स्वामी अमृतानंद सरस्वती जो काल्पनिक कैरेक्टर अभी तक मुझे समझ में आ रहा है जो इस दुनिया में है ही नहीं अभी तक तो ऐसा ही लग रहा है होगा तो आगे फिर उससे प्रश्न किए जाएंगे कभी मिल जाए किसी को मालूम हो तो बताना भाई कहां रहते हैं कहां आश्रम है खैर तो मुझ तक वो जो परंपरा इस तक जो परंपरा आ रही है यदि वह आचार्यों के द्वारा आ रही है तो उसमें फिर भगवती का कोई रोल नहीं रह जाता। और
00:18:11:18 इस तक यदि आ रही है तो निगमानंद के गुरु तो वह हैं। शंकराचार्य इसके अकॉर्डिंग निगमानंद के अकॉर्डिंग भी उसके जो वैदिक गुरु हैं वेदोक्त गुरु वेदोक्त आचार्य तो वो परंपरा तो उनकी भी शंकराचार्य की है। वो बात अलग है कि बाद में आगे जाकर के उन्होंने कई चीजें अपने गुरु परंपरा के विरोध में ही कट डाली। वह अभी अगले वीडियो में इसका अगला भाग जो होगा उसमें बात करेंगे जिसकी उसने विवेचना की। पर
00:18:45:03 क्या कहते हैं ये तो मानना पड़ेगा ना कि अगर वेदोक्त मार्ग उन तक आया है तो वो शंकराचार्य से आया है। भाष्य वो शंकराचार्य के पढ़ते हैं उपनिषदों के। शंकराचार्यों को प्रमाणिक मानते हैं तत्व विवेचना में तो वह इस तक आया है। अगर यह आचार्यों के द्वारा अपने तक आने की बात कहेगा तो इसका आदि निग्रचार से कोई कनेक्शन सिद्ध नहीं होता। और ये अगर और ये अगर भगवती के द्वारा अपने पास तक मंत्र आने की बात कहेगा तो भगवती के ऊपर तो कोई है ही नहीं। भगवती तो स्वयंभू है तो भी इसका आदि निग्रहचार से कोई कनेक्शन सिद्ध नहीं होगा। यदि आदि निग्रहचार्य कोई है कोई भगवान के भगवान के किसी स्वरूप को कहीं पर आदि निग्रहचार्य कह दिया गया मान के चलिए तब अब दूसरी बातें आती है कुल मिलाकर के कि ना तो इनकी परंपरा का कि अगर कोई आदि निग्रचार्य है तो उनकी कोई आचार्य शिष्य परंपरा थी गुरु शिष्य परंपरा थी उसका प्रमाण और फिर उस गुरु शिष्य परंपरा से इसके जुड़े होने का प्रमाण कोई भी उपलब्ध नहीं है क्योंकि एट द एंड इसको तो मंत्र स्वप्न से प्राप्त हो रहा है तो कैसे सिद्ध करेगा यह क्या प्रमाण देगा उसके संबंध में भाई अगर इस दुनिया में Axis बैंक है
00:20:00:24 तो और मैं कह दूं कि मैं Axis बैंक का मैनेजर हूं या मालिक हूं या यह हूं या वो हूं तो मेरे कह देने मात्र से सिद्ध नहीं हो जाएगा ना कि मैं Axis बैंक का मैनेजर हूं कि मुझे स्वप्न में किसी ने आके अपॉइंट किया है। उसके लिए प्रमाण चाहिए होगा। तुम अपने स्वता सुखाय के लिए समझ लो। हां। मगर जब तुम आचार बनकर निकलोगे, लोगों को नियंत्रित करने के लिए निकलोगे, शासन करने के लिए निकलोगे, निग्रह करने के लिए निकलोगे तो फिर तुम्हारा निग्रह स्वीकार किया जाए, धर्म और अधर्म के विषय में तुम्हारी व्याख्या को प्रामाणिक माना जाए कि नहीं? फिर तुमसे सवाल होगा कि तुमको वो स्वप्न में जो दीक्षा दी इसका क्या प्रमाण है? और जिनसे तुम उसको सत्यापित कर रहे हो उनकी तो परंपरा आदि शंकराचार्य की परंपरा है। तो ऐसे कैसे? खैर यह हो जाता है। अच्छा अब इसकी दूसरी बात यह आती है कि इसने फिर अपनी परंपरा के लिए एक बात और कही जब किसी ने यह पूछा यह प्रश्न हो गया कि निग्रह परंपरा का प्रमाण क्या है? अब अगला प्रश्न यह था कि निग्रह परंपरा क्या पाखंड परंपरा है? क्योंकि उसमें ग्रंथ में जिस ग्रंथ से अपने सबसे पहला जो श्लोक इसने उठाया है कि भैया यहां देखिए निग्रह आगम के लिए लिखा हुआ है जिसमें
00:21:16:02 100 अमुक इतने उपतंत्र और इतने तंत्र हैं। तो सबसे पहली बात क्या वहां पर निग्रह परंपरा लिखा है? क्या वहां पर निग्रह संप्रदाय लिखा है? उसी शक्ति संगम तंत्र में शंकराचार्य की बहुत सारी व्याख्या दी गई है। परंपरा पूरी बताई गई है। यह इनके बाद यह आएंगे, इनके बाद ये आएंगे, इनके ये नाम होंगे, इनके ये नाम होंगे। ये सब उसमें दिया गया संप्रदाय शब्द का उपयोग भी है। जहां तक मेरी जानकारी है परंपरा शब्द का उपयोग भी है। तो इस प्रकार से निग्रह के साथ आगम क्यों लिखा हुआ है? जब संप्रदाय के साथ संप्रदाय लिखा होना ही है। शक्ति संगम तंत्र की जो शैली है उसके अनुसार किसी आचार की प्रामाणिकता के लिए या तो उसमें परंपरा लिखा हुआ है या फिर संप्रदाय लिखा हुआ है। तो आगम से संप्रदाय बोध संप्रदाय का बोध कैसे मान लिया जाए? पहली बात। दूसरी बात यह है कि जब इससे प्रश्न पूछा गया कि भैया शक्ति संगम तंत्र में निग्रह संप्रदाय को पाखंड कहा गया है क्या? तो इसने इधर-उधर की फालतू की बातें बहुत सारी कर दी। जैसे कि कि उसमें तो पंचरात्र का भी नाम आया। मगर शिवांश तो स्वयं इसको इनको जो है पंच इनको जो है विद्या भास्कर जी महाराज को प्रामाणिक मानता है।
00:22:32:07 भाई मैं किस विषय से कितने अंशों में किसी को प्रामाणिक मानता हूं। इससे तुम्हारा प्रामाणिक होना सिद्ध नहीं होता है। विद्या भास्कर जी महाराज को मैं Axis बैंक के और HDFC बैंक के विषयों में प्रामाणिक थोड़ी ना मानूंगा। या वह कहेंगे कि जाओ मेरे साइन से चेक पैसे निकाल लो। विद्या भास्कर जी महाराज के सिग्नेचर चलेंगे क्या? किसी के भी अकाउंट से पैसे निकालने के लिए वहां का जो मैनेजर होगा उसके ही साइन जब उसमें होंगे वो जब वेरीिफाइड कर देगा और जब उसको ओके कर देगा तब जाकर के उस बैंक से पैसे निकलेंगे और जिसका अकाउंट होगा उसके साइन होंगे तब वो वेरीफाई करेगा। तो विद्या भास्कर जी महाराज को अगर किसी क्षेत्र में किसी अंश में प्रामाणिक माना जाता है तो उससे तुम्हारी प्रामाणिकता सिद्ध हो गई। तो तुम तो सारी सारे विषयों के लिए यही कह दो कि मुझको तो विद्या भास्कर जी महाराज ने प्रामाणिक माना है। इसलिए तुम्हारे सारे 100 सवाल सवालों के जवाब दोस्त। सबसे पहली बात विद्या भास्कर जी ने तुम्हें प्रामाणिक नहीं भी माना है। यह भी मैं सिद्ध करूंगा। मगर अभी प्रामाणिक माना है पर बात कर रहे हैं तो पंच रात्र को क्या आदि शंकराचार्य जी ने क्या सभी संप्रदायों ने प्रामाणिक माना है अगर ऐसी बात है तो क्या उन सभी
00:23:47:20 संप्रदायों ने प्रामाणिक माना जिन सभी संप्रदायों को विद्या भास्कर जी महाराज भी प्रमाणिक बताते हैं तो तो इन सारी स्थितियों से वही वाली बात वो क्या कहा था मतानुज्ञा निग्रह स्थान हां किसी और के अमुक अमुक अंश के सिद्ध ना हो पाने के कारण तुम्हारा सिद्ध हो जाना सिद्ध नहीं होता। तुम अपने आप को सिद्ध करो ना कि अगर वहां पाखंड कहा गया है तो उसके संबंध में विवेचना दो। ये क्या है कि उसमें पंचरात्र का भी नाम आ गया तो पंचरात्र को भी मानते हैं क्या? भाई वैष्णवाचार्यों के यहां हो सकता है कि तुम्हारा शक्ति संगम तंत्र जो है मान्य ग्रंथ हो ही ना। जिसमें पंचरात्र को वो कहा गया है। तो उसके अनुसार तो तुम विद्या भास्कर जी महाराज के अनुसार ही प्रामाणिक सिद्ध नहीं होगे। शक्ति संगम तंत्र के आधार पर। अगर उसमें पंचरात्र को यह कहा गया है तो अगर उसमें वैष्णव ग्रंथों को अनादर किया गया वैष्णव ग्रंथों का लिए लिखा हुआ है कि ये सब नहीं मानना है प्रामाणिक नहीं है तो पहली बात तो ये रही दूसरी बात ये रही कि
00:24:52:02 विद्या भास्कर जी महाराज मेरे लिए प्रमाणिक हैं रामानुज परंपरा श्री परंपरा के द्वारा परम तत्व की विवेचना के विषय में वो मेरे लिए प्रणम्य है और उसके लिए उनके पास यथोचित सामग्री है ग्रंथ है उनके पूर्वाचार्यों के अकाट रूप से प्रतिपादित करने वाली परिभाषाएं हैं ईश्वर को वो सब है उनके पास इसलिए वो मेरे लिए प्रणम है इसलिए वो मेरे लिए प्रमाण है परंतु इस विषय में तो उन्होंने कोई अपनी गति नहीं बताई है कि तुम निग्रहचार चार कैसे हो या स्वप्न में दीक्षा हुई थी तो वह देख रहे थे वहां पर इस विषय में तो उन्होंने कोई विवेचना प्रदान नहीं की है। वो बस अभी तक तो यही है कि लोकाचार में आपको निग्राचार कहते हुए दिखाई देते हैं। बस उन्होंने कहां पर व्याख्या प्रतिपादित कर दी कि यह ग्रंथ पकड़ो। यहां से मैं प्रमाणित कर रहा हूं कि निग्राचार वो है। तो वह तो वही लोकाचार की दृष्टि से तुम्हें कह रहे हैं। हम तो यही मानेंगे जब तक वो कोई शास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत नहीं करते हैं। शास्त्र प्रमाणों के साथ ठीक। अच्छा अब एक बात और आ जाती है
00:26:07:22 कि कुल मिलाकर के सीधी बात यह कही गई है कि शक्ति संगम तंत्र में वो जो सातवां पटल है चतुर्थ खंड में सातवां पटल उसमें सीधे-सीधे कहा गया है कि अब मैं आठ पाखंड तंत्रों के नाम बता रहा हूं और उन आठ पाखंड तंत्रों के नाम बताते समय जो आठवां नाम बताया गया वो निग्रह आगम बताया गया है जिसके अंतर्गत अमुक इतने तंत्र और इतने उपतंत्र आते हैं। इस विषय में तुमने कोई जवाब नहीं दिया कि भैया वहां पर यह जो आठ नाम है इन आठवें नाम में नहीं आता है। यह नौवें नाम में आता है या 11व नाम में आता है? इस विषय में तुमने कुछ नहीं कहा। क्यों लिखा है वहां पर? अगर वह नहीं आता है आठ में तो आठ की गिनती करा दो फिर। क्यों नहीं कराई गिनती? मैंने तो कराई थी ना गिनती। शक्ति संगम तंत्र में चतुर्थ खंड में सप्तम पटल में लगभग 100
00:27:13:10 आठवां श्लोक है। देखिए यह आप लोगों को शायद दिख जाए। मेरे हाथ में शक्ति संगम तंत्र है। इसमें सीधा-सीधा लिखा है 108वा श्लोक। तो इसमें चतुर्थ खंड है जिसका नाम है छिनमस्ता खंड। और उसमें सातवां पटल है। उसमें 108वा श्लोक है। क्या लिखा है? इसके बाद विभिन्न प्रकार के पाखंड तंत्रों में तीन तंत्र एवं पांच उपतंत्र हैं। पाखंड तंत्र हैं। तीन तंत्र और पांच उपतंत्र हैं। ठीक है? अब इन्होंने बताते बताते बताना चालू किया है
00:27:54:04 अघोरा आगम भैरवा आगम संजीवनी आगम तीन नीलेश्वर आगम चार मृत्युंजय आगम पांच विश्वूपागम छह विरूपागम सात और निग्र आगम आठ तो यह आठ तंत्र बताए गए तो तुम्हें इस बारे में कुछ बोलना चाहिए था। तुमने बता दिया विद्या भास्कर जी तो प्रमाणिक मान विद्या भास्कर जी को प्रमाणिक मानते हो तो फिर पंचरात्र को पंचरात्र को कौन प्रमाणिक मानता है कौन नहीं मानता है इन विषयों पे तुम कूद आए अच्छा एक इसमें बात और यह आ जाती है कि शिवश नारायण द्विवेदी अगर किसी को प्रमाणिक मानता है और उसके द्वारा क्योंकि शिवश नारायण द्विवेदी अमुक को प्रमाणिक मानता है। अमुक आचार्य को प्रमाणिक मानता है और वो अमुक आचार्य तुमको प्रमाणिक मानते हैं। इसलिए किसी भी बात पर ध्यान ना देते हुए ये मान लिया जाए कि तुम प्रामाणिक हो। तुम्हारे पास स्वतंत्र रूप से अपनी शास्त्रोक्त व्याख्या नहीं है अपने आप को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए। अरे भाई शास्त्र से दिखाओ ना। यहां क्वेश्चन शास्त्र से हुआ कि आठ पाखंड तंत्रों के नाम बताए जा रहे हैं। तो तुम तुमने उस विषय
00:29:09:10 में बात क्यों नहीं की? क्योंकि तुम्हारे पास उस विषय में कोई उत्तर नहीं था। यही माना जाएगा। वो क्या कहते हैं? स्वीकृति लक्षणम मौन रह गए तुम उस विषय में बात ना करके अच्छा एक एक वीडियो और दिया गया है हमने एक वीडियो डाला था जिसमें कि तीन आचार्य जिनमें से एक विद्या भास्कर जी महाराज थे एक राघवाचार्य जी महाराज थे और एक सदानानंद जी महाराज भी थे उसमें इन सभी पूज्य विभूतियों द्वारा यह बताया गया था कि भाई इन्होंने अभी हाल ही के दिनों में सभी मतलब कई प्रामाणिक परंपराओं का नाम लिया। परंतु इन्होंने निग्रह परंपरा का नाम नहीं लिया। और मेरी जानकारी में किसी भी मान्य आचार्य ने, किसी भी प्रामाणिक आचार्य ने प्रामाणिक परंपराओं का नाम लेते समय निग्रह परंपरा का नाम नहीं लिया। भाई कहीं तो कोई ले। ठीक? तो इस विषय को दिखाते हुए हमने वो वीडियो बनाया था। अब इस पर प्रश्न किया गया कि आप वो कोई भी प्रामाणिक आचार्य आपका नाम नहीं लेता। तो इसका कटाक्ष क्या था? क्या उन्होंने यह बताते हुए वो वो बात कही है कि अब मैं आपको प्रामाणिक परंपराएं बता रहा हूं। नहीं कही है। मगर कहीं पर भी प्रामाणिक परंपराओं के समतुल्य क्या तुम्हारी निग्रह परंपरा का नाम
00:30:24:14 लिया गया है? क्या विद्या भास्कर जी महाराज ने लिया है? क्या राघवाचार्य जी महाराज ने लिया है? कहीं पर भी किसी ने भी निग्रह परंपरा का प्रामाणिक परंपराओं के साथ नाम लिया है। निग्राचार्य जी कह दिया हो, निग्राचार्य बोल दिया हो। अरे भैया मैं भी आचार प्रशांत बोल देता हूं जबकि वह तथाकथित है पर लोकाचार में है क्योंकि वही प्रासंगिक है तो निकलता है मुख से तो बोला गया मगर जब बात आती है कौन-कौन सी प्रामाणिक परंपराएं तो कुछ के नाम गिनाए गए कि भैया रामानुज परंपरा मद मद परंपरा है ना शंकराचार्य परंपरा नार्क परंपरा तो कहीं पर कोई तो इन परंपराओं के साथ में तुम्हारा नाम ले साथ में यह ध्यान रखिए कहीं पे कोई ले रहा है नहीं ले रहा है स्वतंत्र रूप से ले रहा है कि हां ये निग्रह परंपरा है नहीं ले रहा है स्वतंत्र रूप से बता रहा है कि रामानुज परंपरा के समान ही निग्रह परंपरा है नहीं बता रहा है बगल में बैठे हैं बगल में बैठे हैं मैं इन विषयों पर आऊंगा अभी आगे बोल देते कि हां जैसे रामानुज परंपरा है जैसे शंकराचार्य परंपरा है ऐसे ही निगराचार्य परंपरा है क्यों नहीं बोला इन विषयों पर
00:31:39:15 आऊंगा कि उन्होंने कई बातें जो बोली जानी चाहिए थी अगर वह इतना ही समर्थन में है नहीं बोली और कई बातें उन्होंने ऐसी भी की है जो तुम्हें पूर्ण रूप से तुम्हारा खंडन सिद्ध होता है उनके ही द्वारा जो तुम्हारे बगल में बैठे हैं तो आचार्य गण गण जो जो आचार्य गण होते हैं उनके मौन से भी काफी कुछ सीखने को मिलता है। जैसे तुम्हें सीखने को मिल गया कि ज्योति पीठ वाले महाराज जी मौन है तो इसका मतलब वो समर्थन कर रहे हैं किसका पीएन मिश्र का है ना मौन से ही समझा ना तुमने तो अब समझो खैर अब उस ट्रिपल वीडियो की बात वो जो तीन आचार्यों की उसमें जो वीडियो थी एक एक वो सदानंद जी महाराज की थी एक विद्या भास्कर जी महाराज की थी और एक उसमें थी राघवाचार्य जी महाराज की हमने वो वीडियो ये भी इसमें यह भी दिखाया था कि सदानानंद जी महाराज जी ने तो दो ही तीन दिन पहले निग्रचार्य जी करके अच्छा कार्य कर रहे हैं अमुक अमुक अंशों में और हम भी यह नहीं मानते कि भाई तुम पूरी तरीके से ही गलत कार्य करते हो और मुझे नहीं लगता कि तुम ये मानते होगे है ना कि मैं पूरी तरीके से गलत कार्य ही करता हूं तो तुम्हारे अच्छे कार्य की उन्होंने प्रशंसा की थी कि हां भाई निग्राचार्य
00:32:55:01 जी अच्छा बोल रहे हैं ये कर रहे हैं वो कर रहे हैं और उसके दो-तीन दिन बाद ही उन्होंने प्रामाणिक परंपराओं का नाम लिया तो प्रासंगिक अब ये बात आती है ना कि उन्होंने सारी परंपराओं का नाम क्यों नहीं लिया अगर तो क्या जिन जिन परंपराओं का नाम नहीं लिया वो सब आप प्रामाणिक है क्या ये वाली बात आती है वहां पूछी भी गई तुमने उसमें कुतर्क भी किया तो हां उन्होंने बहुत सारी अन्य परंपराओं का नाम भी नहीं लिया है मगर उन बहुत सारी अन्य परंपराओं का नाम कई अन्य आचार्य कई बार प्रामाणिक परंपराओं की बात करते हुए ले लेते हैं। तुम्हारा किसने लिया? दूसरी बात कि वह जो अन्य परंपराएं जिनका नाम नहीं लिया गया उनका कोई प्रासंगिक विषय नहीं था आसपास के दिनों में मगर तुम्हारा नाम तो अभी एक दो दिन पहले ही लिया गया था तो फिर उन्हें उन्हें प्रामाणिक परंपराओं का नाम लेते समय कम से कम इतनी बड़ी इतनी कालजई परंपरा है विशुद्ध परंपरा उसका नाम लेना चाहिए था कि निग्रह परंपरा भी है निग्रचार परंपरा नहीं लिया तो हमारा पॉइंट यह था यह नहीं था कि स्वतंत्र रूप से तुमको को निग्राचार्य मानते हैं कि नहीं? हमारा पॉइंट उस वीडियो में यह था कि वो क्या रामानुजाचार्य शंकराचार्य के समतुल्य ही प्रामाणिक रूप से नाम लेते हैं क्या निग्रह परंपरा का नहीं लिया और
00:34:10:12 अन्य परंपराओं का यदि नाम नहीं लिया है तो उन परंपराओं से जुड़े हुए कोई भी प्रासंगिक विषय नहीं थे। जबकि विद्या भास्कर जी महाराज के साथ तुम्हारी लगातार बात होती है और उनका जो वीडियो है जिसमें वह प्रामाणिक परंपराओं के नाम ले रहे हैं वह वीडियो बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। तो भाई उन्हें प्रामाणिक परंपराओं का नाम लेते समय यदि वह तुम्हारी परंपरा को प्रामाणिक मानते हैं तो उसमें रख देना चाहिए था। निग्रह परंपरा निगराचार्य ने जो कहा है वो किया जाएगा। आदि निगराचार्य ने पर वह खुद इस विषय को लेकर के जहां तक मुझे लगता है कि वह इस विषय को लेकर के चिंतन में होंगे कि भाई अगर यह प्रामाणिक है तो कैसे क्योंकि तुम खुद नहीं जानते हो तो वो कहां से जानेंगे तुम खुद नहीं जानते हो तुम अभी लिख रहे हो ना कहां बोल पाते हो अरे भैया वो ग्रंथ लिखो तब लिखना कुछ मोटा मोटा तो बताओ इसके गुरु ये इसके गुरु ये ऐसे ऐसे करके मैं प्रामाणिक सिद्ध होता हूं कहां सिद्ध होते हो प्रामाणिक निगमा ने जो शिक्षा दी है उसके विरुद्ध तुम शिक्षाएं दे रहे हो। निगमानंद ने जो शिक्षा दी है वो आचार्य जो जिनको वो अपना गुरु कह रहे हैं उनके विरुद्ध है। और अगर निगमानंद ने नहीं भी किया होता तो निगमानंद गुरु निगमानंद के गुरु तो शंकराचार्य सिद्ध हो रहे हैं तो तुम शंकराचार्य परंपरा
00:35:25:18 के सिद्ध हो जाओगे। तो तुम ये क्या खिचड़ी पका रहे हो फिर? अगर भगवती से तुम दीक्षा लेने के कारण तुम्हारा संप्रदाय अलग हो रहा है। शंकराचार्य का नहीं हो रहा है। तो फिर भगवती ने आदि निग्राचार्य से दीक्षा नहीं ली है। फिर वो कहां से लाओगे? उसमें आचार्य परंपरा का खेल क्या होगा? फिर भगवती तो स्वयं है ना स्वयंभू है ना या यह भी बताओ फिर क्या उन्होंने आदि नगराचार्य की परंपरा में किसी आचार्य से दीक्षा ली है तो तुम्हारा वो हो रहा है अलग हो रहा है और फिर भी तुम सत्यापन के लिए यदि आदि शंकराचार्य जी की परंपरा में जा रहे हो तब भी वो तुम्हारे गुरु सिद्ध हो रहे हैं क्या खेल है ये इन सब विषयों पर तुमने कोई वहां अपना अपनी बात नहीं कही
00:36:09:18 अच्छा हां एक एक बात इसने और कही कि तुम्हारे हिसाब से तो सदानंद अप्रामाणिक हैं। अच्छा भाई इसमें तो सीधी-सीधी पहली बात तो यह आ जाती है कि अगर कोई किसी को अगर पूरी के शंकराचार्य जी ने शंकराचार्य नहीं माना तो इसका मतलब वो अप्रामाणिक हो गए। अगर वह यह नहीं मानते कि वो शंकराचार्य हैं तो उन्होंने यह कह दिया कि वह स्वरूपानंद जी महाराज जी के शिष्य ही नहीं है। उनके साथ वह कभी खड़े ही नहीं हुए। उनकी धर्म ब्रह्म की व्याख्या भी अप्रामाणिक है। यह हो गया। भाई पहले डिसाइड कर लो कि तुम कहना क्या चाहते हो। पूरी के शंकराचार्य जी ने अगर उनको शंकराचार्य नहीं माना तो बस वो अप्रामाणिक हो गए। करपात्री जी अगर शंकराचार्य नहीं थे तो अप्रामाणिक हो गए। ऐसे नहीं होता है ना। अगर वो शंकराचार्य नहीं है तो ऐसा थोड़ी ना है कि उनको धर्म ब्रह्म का ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ। प्रामाणिक शंकराचार्य से और वह धर्म ब्रह्म का अप्रामाणिक ज्ञान दे रहे हैं। ईश्वर अल्लाह को एक कर रहे हैं क्या निगमंद की तरह या भागवत आनंद की तरह उस पर पॉलिशिंग कर रहे हैं क्या?
00:37:23:10 तो पहले जांच लो कि किस विषय में उनको नहीं माना गया है या और दूसरी एक बात और यह व्यक्ति खुद अपने ग्रंथ में लिखता है कि एक अवतार ने दूसरे अवतार को कटाक्ष कर दिया तो उससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए। हम तो यही मानते हैं भाई तुम्हारे हिसाब से तो चारों शंकराचार्य ही हैं। तो एक शंकराचार्य एक तत्व ने अगर दूसरे अपने ही स्वरूप को कुछ कह दिया तो उसमें तुम्हें क्या मतलब है? तुमने ही अपने ग्रंथ में लिखा ना कि मधवाचार्य ने शंकराचार्य को ये कह दिया अरे क्या हो गया? एक अवतार ने दूसरे अवतार को कह दिया। तो फिर इससे क्यों दिक्कत हो रही है? जब एक शंकराचार्य तुम्हारे हिसाब से दूसरा शंकराचार्य को कुछ कह दे रहा है तो हम मुंह तोड़ उत्तर है ये सब तू मिल तो सही मिलता नहीं है भागता डोलता है और महाराज जी भाई कुछ अंशों में तो अच्छा कार्य किया ही है इसमें कोई दो राय नहीं है उनहीं अंशों के कारण महाराज जी भी प्रशंसा करते हैं विद्या भास्कर जी महाराज जी उनके लाडले प्यारे हो भाई ठीक है वो तुम्हारा पक्ष ज्यों की त्यों मेरे समक्ष रखते हैं मगर अभी तक कई विषयों में उन्होंने उन्होंने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया। अच्छा एक प्रश्न वहां पर और किया गया था कि भागवतानंद से पूछा गया था कि
00:38:38:14 आप जो है प्रामाणिक आचार्यों के प्रति अनास्था उत्पन्न कर रहे हो। तो इसमें इसने कहा था मैं अनास्था आचार्यों के प्रति नहीं उनके अमुक अमुक व्यक्ति किसी व्यक्ति के प्रति नहीं मेरा व्यक्ति से विरोध नहीं है। उसके अमुक अमुक कार्य का विरोध है। यह इसने कहा था। तो इसकी जरा मीमांसा कर लेते हैं कि इस बात की क्या मीमांसा होती है। सबसे पहली बात कि जिन आचार्यों की यह इस तरह से अना विरोधाभासी बातें कर रहा है जिन आचार्यों के लिए गलत तरीके से तूतक भी बोल जाता है। वो आचार्य उनमें से ज्यादातर कौन है? सन्यासी। ठीक है? सन्यासी हैं। अब यह उनहीं आचार्यों पर दोहरी बात करने वाला करने वाले का आरोप लगा रहा है। यह उन्हीं आचार्यों पर सार्वजनिक रूप से
00:39:33:20 मोह मोह में पड़ने वाले का आरोप लगा रहा है। यह उन्हीं आचार्यों पर क्या कहते हैं? भय इत्यादि का आरोप भी लगा रहा है। तो मेरे भाई जब तुम किसी सन्यासी के जब तुम किसी सन्यासी पर यह आरोप लगा दोगे कि उसने मोह से लोभ से अथवा भय से जो है गलत बात कही या गलत कार्य किया जो उसे नहीं करना चाहिए था वो किया तो क्या उसके सन्यासत्व पर प्रश्न नहीं उठा सन्यासी कौन होता है विरक्त जिसको किसी प्रकार का कोई लालच नहीं है किसी प्रकार का कोई भय नहीं किसी प्रकार का कोई मोह नहीं है। जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो। जिसको ना हार का भय हो, ना जीत का लालच वो है सन्यासी। तो जब आप किसी सन्यासी के ऊपर ऐसे आरोप लगाते हैं कि उसने झूठ बोल दिया या उसको ज्ञान नहीं था फिर भी उसने गलत विवेचना कर दी। तो यहां पर क्या हुआ? यहां पर मिथ्या प्रचार करने वाला सिद्ध कर दिया। या वह अपने पर परि परिकरों के मोह में है तो यहां पर उसको लालची सिद्ध कर दिया। इंद्रियों के
00:40:48:24 वशीभूत सिद्ध कर दिया। तो तुमने सीधे तौर पर ना कह करके सिद्ध कर दिया कि वो सन्यासी नहीं है। और जिस पद पर वो बैठा है वो सन्यास का पद है। उसका परमाचार्य होने के रूप में उसका पहला लक्षण है सन्यास। हम लोग छाती पीट पीट कर विधर्मियों का खंडन करते हैं कि प्रामाणिक आचार्य के लिए सबसे पहला लक्षण है सन्यासी हो। दूसरा लक्षण है कि परंपरा प्राप्त ज्ञान हो। तीसरा लक्षण है कि समस्त श्रुति स्मृति शास्त्रों में सामंजस्य की शिक्षा देता हो प्रामाणिक शास्त्रों में। और पांचवा लक्षण है कि वह अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर दे जो कि हमारे शंकराचार्य हमारे वैष्णवाचार्य इत्यादि सब करते हैं और सन्यासी हैं सारे लक्षण उन पर लागू हो जाते हैं। कुछ सांप्रदायिक भेद है कुछ अंशों में जिसको लेकर के अमुक आचार्य अमुक के लिए प्रमाणिक नहीं है। अमुक आचार्य अमुक के लिए प्रमाणिक नहीं है। उतने में वह सहमत नहीं है। मगर ज्यादातर यही है कि ब्रह्म तत्व को जो लेकर की गई विवेचना है उसको लेकर के भेद है कि ब्रह्म का स्वरूप क्या होना चाहिए। मोक्ष का स्वरूप क्या होना चाहिए? मगर धर्म को लेकर के भी कोई
00:42:03:27 भी प्रमुख भेद नहीं है। धर्म धर्म को लेकर सभी वर्णाश्रमी है। सभी मूर्ति पूजक हैं। धर्म को लेकर व्यवहारिक भेद नहीं है। ठीक है? परम तत्व की विवेचना को लेकर के भेद है। तो जब तुम यही सिद्ध कर दे रहे हो कि पूरी के शंकराचार्य अमुक आचार्य अमुक आचार्य लालची हैं या उन्हें अमुक के प्रति आसक्ति है, मोह है या फिर भय है या फिर वह झूठ बोलते हैं। दोहरी बातें करते हैं। मिथ्या करते हैं। जब तुमने इस तरह का सार्वजनिक ढिंढोरा पीटना शुरू किया तो उनका सन्यासत्व ही भंग हो रहा है। तो जब हम किसी को कहेंगे जब कोई मुसलमान हमसे कह रहा होगा कि तुम्हारे यहां तो लिखा है नातस प्रथमास्त जब कोई आर्य समाज हमसे कह रहा होगा कि तुम्हारे यहां तो लिखा है नातस प्रथमास्त हैं तो हम उनको बताएंगे कि भैया जो प्रमाणिक आचार्य है मुसलमान से कहेंगे प्रमाणिक आचार्य वो होता है जो सन्यासी वो कहेगा सन्यासी कैसे भागवतानंद तो बताया है कि वो इतने अंशों में लालची है इतने अंशों में आसक्त है इतने अंशों में मोहवान है तो सन्यासी नहीं है तो प्रमाणिक नहीं है तो उनके द्वारा किया गया अर्थ प्रमाणिक नहीं है। यह इसे कहते हैं अनास्था उत्पन्न करना। पहले तो सन्यासत्व
00:43:19:15 भंग हुआ। अब दूसरी बात कि तुम व्यक्ति के किसी आचरण का विरोध कर रहे हो। जब तुमने किसी के आचार्य कौन होता है? जो शास्त्र सम्मत आचरण करता है और अपने शिष्यों में भी उसे स्थापित करता है। मगर तुम बार-बार सार्वजनिक रूप से ढिंढोरा पीट रहे हो कि अमुक आचार्य का अमुक आचरण शास्त्र सम्मत नहीं है। तो तुम यही तो बता रहे हो कि वो शास्त्र सम्मत आचरण नहीं करता है। तो तुम यही तो बता रहे हो बिना कहे कि वो आचार्य नहीं है। कहां बचोगे मेरे भाई? भले ही उनका शास्त्रों के आसपास चलने का कारण कोई रणनीति हो, कोई अभियान हो। ब्रह्म तत्व की व्याख्या क्या कभी पूरी के शंकराचार्य किसी आचार्य जिसका तूने इस तरीके से मखौल बनाया है। क्या कभी किसी ने धर्म ब्रह्म की व्याख्या गलत की? व्याख्या। क्या कभी किसी आचार्य ने कह दिया ईश्वर अल्लाह एक है। निगमानंद ने कहा भगवान ईसा अभी बताएंगे अगली वीडियो में जो तेरे परमाचार्य हैं। तो मैंने कई बार
00:44:34:16 बताया है कि आचार्यों को ब्राह्मणोचित कर्तव्य से हटकर के क्षत्रियचित कर्तव्य का पालन भी आज की स्थिति में करना पड़ रहा है। क्योंकि शासन तंत्र जो सत्ता है वह उनके अनुकूल नहीं है। प्रतिकूल है। इसलिए उनको वह कार्य भी करने पड़ रहे हैं जो छात्र धर्म में आता है। रणनीतियां बनानी पड़ रही हैं। गौशाला को बचाना है तो किसी मंत्री से संबंध बनाना पड़ रहा है। अपनी गाय माता को बचाने के लिए कि इतनी चार गौ माता तो कटने से बच जाए। मगर मूर्ख तुझ जैसा व्यक्ति इन्हीं चीजों का इन्हीं स्थितियों का फायदा उठा के उनका सार्वजनिक विरोध करेगा। और सार्वजनिक विरोध करने ऐसी स्थितियों का फायदा उठाकर के तेरे सार्वजनिक विरोध करने की वजह से उनके सन्यासत्व पर बात आएगी। उनके आचार्यत्व पर बात आएगी। हमने तो व्यक्ति का विरोध नहीं किया। हमने तो उसके अमुक कार्य का विरोध किया है। वाह भाई वाह। फिर तो मोहम्मद भी मोहम्मद का भी तूने विरोध नहीं माना जाएगा तेरे द्वारा। फिर तो तेरे द्वारा प्रभुपाद का भी विरोध नहीं माना जाएगा। उसने अमुक अमुक कार्य गलत किया है। मगर प्रभुपाद के साथ भी अच्छा संबंध रखो। सबके प्रति आस्था रखो। फिर तो तेरे अनुसार हम ऐसे नहीं होता ना भाई
00:45:50:14 जब तुम उसके कार्यों का खंडन सार्वजनिक रूप से कर रहे हो तो वह पब्लिक पर्सनालिटी है उसको लोग फॉलो करते हैं तो जब तुम उसके कार्यों की विवेचना कर रहे हो नकारात्मक रूप से तो उसके प्रति अनास्था उत्पन्न होती है व्यक्ति में उनके उनका आचार्यत्व सिद्ध नहीं होता उनका सन्यासत्व सिद्ध नहीं होता कैसी बात कर रहे हो तुम बेवकूफी भरी और फिर अब दूसरा तर्क ले लो। आरएसएस से जुड़े हुए लोग या बजरंग दल से जुड़े हुए लोग अभी वीडियो आने वाला है। शायद आ चुका होगा। धर्मांतरण को रोक रहे हैं। अच्छा कार्य नहीं है। यह मेरी मेरी सहायता कर रहे हैं। रामपाल के विषय में यह अच्छा कार्य नहीं है। हम मगर वो ऐसी चीजें भी कर रहे हैं जो शास्त्र विरुद्ध है तो तू केवल उनका विरोध करना। फिर मेरे आरएसएस मेरे द्वारा रामपाल के विषय में बजरंग दल वालों की सहायता या आरएसएस के अमुक अमुक लोगों की सहायता ले लेने पर तूने आपत्ति क्यों जताई? तू तो व्यक्ति का नहीं उसके अमुक कर्म का विरोध कर रहा है। तो आरएसएस वाले अमुक अमुक क्षेत्र में यदि वर्णाश्रम को नहीं मानते हैं या बजरंग दल वाले नहीं मानते वर्णाश्रम को या फिर वो
00:47:05:15 हिंदू शब्द को नहीं मानते मोहन भागवत ये कह देते हैं कि मैं हिंदू हिंदू शब्द प्रामाणिक नहीं है तो तू उस बात का विरोध करना। फिर तू यह कैसे कह सकता है कि शिवश नारायण द्विवेदी ने आरएसएस वालों का साथ क्यों लिया? क्योंकि तूने तो व्यक्ति का विरोध नहीं किया था। तूने तो क्या कहते हैं? उसके अमुक कार्य का विरोध किया था। ठीक। इसी प्रकार से क्या बागेश्वर वाले पिछड़े लोगों को धर्मांतरण से नहीं बचा रहे हैं? मगर उनहीं बागेश्वर वालों से बागेश्वर वालों के द्वारा विद्या भास्कर जी महाराज या राघवाचार्य जी महाराज के मिलने पर तू मौन रहता है। दोगला और पूरी के शंकराचार्य जी के मिलने पर आपत्ति जताता है। तब तू यह बात भूल जाता है कि तूने इस व्यक्ति के किसी अमुक कार्य का विरोध किया था। व्यक्ति का विरोध नहीं किया था। चलो और आगे चलते हैं। विजयाश्री की बात ले लेते हैं। भाई विजया श्री ने विजयाश्री का पुराना जीवन जो भी रहा हो आज उसने अपने आप को बदलने की बहुत सारे प्रयत्न किए और अपने आप को जितना उसके उससे हो सकता है यथासंभव उसने अपने आप को जो मर्यादाएं बताई गई है उसमें ढालने का प्रयास किया। केवल व्यवस्था वश जहां पर वह परिवर्तन नहीं कर पा रही है वहीं पर वह जो है शास्त्रों के बाहर जा रही है।
00:48:20:21 वहां पर भी प्रमाण्य बुद्धि होने के कारण तूने अपने वीडियो में कहा है ना प्रमाण्य बुद्धि प्रमाण्य बुद्धि होने के कारण उसकी धर्मज्ञता पर कोई भी शंका नहीं की जा सकती। पर फिर भी तूने कटाक्ष क्यों किया? कि ऐसी स्त्री पूरी शंकराचार्य जी के मठ में क्या कर रही है? वहां तेरी ये व्याख्या कहां गई थी कि हम व्यक्ति का विरोध नहीं उसके अमुक आचरण का विरोध करते हैं। भाई अगर वो स्ान के साथ खेलती थी पालतू पहली बात तो तूने उसके लिए क्या-क्या प्रलाप किया चुम्मा ले रही है। कोर्ट में आकर के सिद्ध करना ये सब बातें जो तूने कही है ना बाकी है अपने निष्ठा निकाली है मुख से। खैर बैक टू द पॉइंट। तो इसके साथ ही साथ यदि उसने तेरे अनुसार पुराने जीवन में जबकि भगवत गीता में लिखा है कि जो वापस आ गया उसको उसको जो है क्षम्य कर देना चाहिए क्षमा क्षमादान कर देना चाहिए उसकी चीजों को अगर वो सुधरना चाहता है तो और वो सुधरना चाह रही है। मगर पुराने अंशों के कारण वो आज के वर्तमान वर्तमान समय में पूरी के शंकराचार्य जी के मठ में उनके दर्शन करने के लिए सामान्य श्रद्धालु की भांति नहीं जा सकती। यह तूने कहा हम मगर उसके अच्छे अंश भी तो हैं कि वह
00:49:35:25 कहती है महिलाओं को जनेऊ नहीं कराना चाहिए। आर्य समाज का विरोध करती है और महिलाओं को प्रणव का उच्चारण नहीं करना चाहिए। खुद करती थी प्रणव का उच्चारण वो उसने बंद किया। अपनी पहचान तक बदल डाली और उसने अपना पेज का नाम बदल दिया। गुरुदेव से प्राप्त जो उसका नाम जो उसका पहले नाम था रिदमम कपूर गुरुदेव से प्राप्त नाम से उसने अपना नाम बदल दिया। तो उसने कुछ ऐसे कार्य भी तो किए जो धर्म के पक्ष में थे। उसने स्त्रियों के जनेऊ का विरोध किया। उसने प्रणव के स्त्रियों द्वारा प्रणव और वैदिक मंत्रों के उच्चारण का विरोध किया। हवन का विरोध किया, यज्ञ का विरोध किया। यह सब उसने अपने यहां से बताना शुरू किया।
00:50:17:22 तो यदि तूने व्यक्ति का विरोध नहीं किया था तो फिर तूने इस बात पर आपत्ति कैसे जता दी कि वो मठ में क्या कर रही है? क्योंकि उसके कुछ अंश तो धार्मिक भी है। तो इस प्रकार से अगर हम व्यक्ति का नहीं उसके आचरण का विरोध कर रहे हैं तो इस प्रकार से तो पूरी दुनिया का कोई भी व्यक्ति गलत ही नहीं सिद्ध होगा और सभी व्यक्ति हमारे लिए सम्मान के पात्र बन जाएंगे जो तेरी व्याख्या है। और दूसरी बात यह है कि यदि यही तेरी व्याख्या है तो फिर तू टिप्पणी क्यों कर रहा है? क्योंकि तेरा मंतव्य जहां पर जिस प्रकार के नियम के द्वारा सिद्ध होता है तू उसी प्रकार के नियम के अनुसार अपनी बात को वहां पर रख देता है। इसी को कहते हैं विधर्म अधर्म जो बदलता है और धर्म जो रहता है बदलता नहीं है। किसी विदेश काल परिस्थिति में जो ना बदले उसका नाम धर्म है। वह सनातन है। तेरी व्याख्या बार-बार तू ही काटता है। अब बात आती है उत्तर ना देने पर कि विद्या भास्कर जी वहां पर बैठे थे तो वह क्या-क्या बोल सकते थे। जब यह वाला विषय आया कि तुम्हें कोई भी कोई भी आचार्य जो है प्रामाणिक नहीं मानता। तुमने मुंह खोला तुमने सब कुछ कहा और हमने अपने वीडियो में क्या कहा था? कोई
00:51:32:24 भी आचार्य कोई भी प्रामाणिक आचार्य प्रामाणिक परंपराओं का नाम लेते समय निग्रह परंपरा को भूल जाता है। निग्रह परंपरा का नाम नहीं लेता है। बगल में विद्या भास्कर जी महाराज बैठे यही इसी विषय से जुड़ा हुआ प्रश्न था। कह देते जिस प्रकार रामानुजाचार्य की परंपरा है, जिस प्रकार शंकराचार्य की परंपरा है, उसी प्रकार निग्रह की भी परंपरा है। निग्रचार्य की भी परंपरा है। क्यों नहीं कहा? और वो मौन रहे, शांत रहे ना तुमने कहा जिस प्रकार शंकराचार्य की परंपरा है। हमारा प्रश्न तो सुन लेते पहले
00:52:10:00 तो वो मौन रहे। मौन रहने का अर्थ क्या हुआ कि हमारा समर्थन हुआ फिर उसमें स्वीकृति लक्षणम मौन रहने का अर्थ तो यही हुआ तो मौन रहे वो उन्होंने नहीं कहा कि जिस प्रकार रामानुज परंपरा है जिस प्रकार शंकराचार्य परंपरा है जिस प्रकार मधवाचार्य परंपरा है उसी प्रकार प्रामाणिक निग्रचार परंपरा है बोल देते बगल में बैठे थे बहुत ज्यादा दूरी पर नहीं थे या फिर तुमने तुम हमारा प्रश्न नहीं सुन पाए या फिर पूछने वाला नहीं सुन पाया आया और नहीं सुन पाया तो फिर स्वयं मियां मिट्ठू क्यों बन रहे हो? फिर क्यों खुश हो रहे हो? देता अली हमने जवाब दे दिया। फिर उनको समझाओ जो अंधभक्त हैं। भाई उसके प्रश्न का जवाब तो दिया ही नहीं गया है। अरे निर्गत करवा लेते ना। इस विषय में और एक हंसी की बात आ रही है। व्यक्ति जो है न्याय वो विष्णु भगवान की मूर्ति के विषय में कुछ आपत्तिजनक चीजें सुनाई दी। सुप्रीम कोर्ट के जज के द्वारा किसी तो यह व्यक्ति जो है बहुत हम यह करेंगे हम वह करेंगे। अरे भैया तुझको किसी ने साद ब्राह्मण नहीं माना तो तू कोर्ट चला गया तो इनके खिलाफ भी कुछ करना ऐसा कानूनी लगा दे रिटे कुछ याचिका
00:53:25:01 इत्यादि कुछ कि इन्होंने अपने इसके लिए क्षमा मांगे अपने पर्सनल अपमान के लिए लड़ेगा समष्टि के लिए नहीं लड़ेगा कौन सी लड़ाई लड़ ली समष्टि के लिए बता जब तुम अपने शाक दपीय ब्राह्मण पर उंगली उठने पर कोर्ट पहुंच सकते हो व्यक्तिगत रूप से तुम पर आक्षेप लगाए गए जो तुम्हारे हिसाब से झूठे हैं तो तुम कोर्ट पहुंच रहे हो वहां पे न्यायाधीशों को मानने लिख रहे हो ऑनरेबल ह तो फिर तुम इस बात के लिए कि विष्णु भगवान की निंदा हुई या सनातन धर्म की निंदा हुई इस बात के लिए कोर्ट क्यों नहीं पहुंच रहे हो पहुंचो और अगर कोर्ट में तुम्हें न्याय की अपेक्षा नहीं है तो फिर बाकी के मुकदमे वापस ले लो क्या दोहरी बातें हैं ये डिसाइड कर दो करना क्या है और ये जो नाटक करते हो ना कैमरे पे बैठ के हम हम ठीक है तो जिस स्कूल में जाकर के सारी पढ़ाई करते हो ना एक्टिंग की वहां के प्रिंसिपल हमसे आकर ट्यूशन ले चुके हैं समझ रहे हो ना मेरी बात सब एक्टिंग वगैरह जो करते हो बैठ के वो तुम्हारे उन्हीं अंधों को अंधों के लिए ठीक है वो एक्टिंग बहुत
00:54:40:07 गुस्सा आ रहा है ये है अरे भाई पहुंचो ना कोर्ट करो प्रदर्शन दर्शन वह कार्य करो जिसका कुछ अर्थ निकले। नाटक मत करो। हम जो कार्य करते हैं वह अर्थपूर्ण होता है। पीछे पड़ते हैं। हमसे नहीं कह सकते समष्टि का कार्य हमने नहीं किया। रामपाल के लिए याचिका लगा चुके हैं। ठीक है? और रामपाल का अड्डा यहां बंद हो चुका है। लखनऊ में। बहुत जल्द भगवान ने चाहा तो पूरे प्रदेश में और फिर पूरे भारतवर्ष में बंद होगा। ठीक है? यह होता है कार्य। अपने लिए लड़ने से पहले हम अपने धर्म के लिए लड़े और तुम अपने धर्म के लिए लड़ने से पहले अपने लिए लड़े ये अंतर है तुम में और मुझ में और नाटक करते हो वीडियो बना के हमने ये कर दिया हम वो कर दिया हम ये कर देंगे करो ना कोर्ट केस लड़ो उस केस को कैसे कह दिया हमारे सनातन धर्म का अपमान कैसे कर दिया लगा दो एक याचिका अरे नहीं सुनवाई होगी कुछ नहीं होगा स्वीकार नहीं की जाएगी कुछ नहीं होगा ठीक है कर्मण्यवादी कारस्ते मा फले कदाचन जो तुम्हारे अंदर इतनी खलबली है जो तुम दिखावा ढोंग कर रहे हो
00:55:47:18 उसको तो सिद्ध कर दो क्या वास्तविक खलबली है कि केवल वीडियो बनाने में एक्टिंग करने के लिए थी वो खलबली खैर बैक टू द पॉइंट विद्या भास्कर जी महाराज स्वयं मंचस्थ थे। वहां पर निग्रह परंपरा के बारे में बात आई। मैंने अपने वीडियो में यही पूछा था। कोई भी प्रामाणिक आचार्य प्रामाणिक परंपराओं के समतुल्य नाम नहीं लेता निग्रह परंपरा का तो वहां पर विद्या भास्कर जी महाराज नाम ले सकते थे जिस प्रकार से रामानुज परंपरा है जिस प्रकार से मद परंपरा है जिस प्रकार से शंकर परंपरा है जिस प्रकार से नार्क परंपरा है जिस प्रकार से रामानंदाचार्य परंपरा है उसी प्रकार से निग्र आचार्य परंपरा भी है बोल देते मैं जानता हूं मुझे ज्ञात है कि वह कहां तक तेरा समर्थन करेंगे जहां तक उनको धर्म सम्मत लगेगा वही तक करेंगे। हां उसके बाद यह हो सकता है कि वह अपने किसी अभियान के निमित्त मौन रह जाए जिसका उन्हें पूरा अधिकार है। ना वो विरोध करें ना वो समर्थन करें और वहां उन्होंने तेरा समर्थन नहीं किया। नहीं बोला कि रामानुजाचार्य परंपरा के जैसी निग्रचार परंपरा है। और क्या नहीं बोला? वो मंचस्थ थे। बगल में बैठे थे। अभी
00:57:02:21 दो चार दिन पहले मैंने एक वीडियो बना के बताया था कि भागवतानंद ने इस विषय में झूठ फैलाया है कि विद्या भास्कर जी महाराज पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने गए और उन्हें मिलने नहीं दिया गया। बगल में बैठे थे इस व्यक्ति ने क्यों नहीं कहलवा दिया उनसे कि हां वो गए थे। वो गए थे मिलने। अरे जब वह इसके कहने पर वीडियो बना सकते हैं कि हां शाकप ब्राह्मण होते हैं तो वह यह नहीं कह सकते कि रामानुजाचार्य परंपरा की तरह ही निग्राचार्य परंपरा है समानांतर है समतुल्य है मैं जानता हूं वो नहीं कहेंगे मगर इसके अनुसार तो वह मानते हैं ना तो क्या नहीं कह सकते थे मंच से ये घोषणा कब करने वाले हैं विद्या भास्कर जी महाराज भागवतानंद के अनुसार और ये घोषणा कब करने वाले हैं कि हां मैं खुद गया था पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने और मुझे मिलने नहीं दिया गया था। यह घोषणा कब करने वाले हैं? दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता वही। पर उन्होंने तो ऐसा नहीं कहा महामंच से। अच्छा अब एक घोषणा और वो कर सकते थे जो कि उन्होंने नहीं की। भागवतानंद के अनुसार पूरी पीठ के जो परिकर हैं मैं भी व्यभचारी हूं।
00:58:18:12 ठीक है? क्या भागवतानंद के अनुसार व्यभचार करने वाले लोग जिनका विचार सिद्ध हो चुका है उनके साथ मान्य आचार्यों को खड़े होना चाहिए बैठना चाहिए प्रश्रय देना चाहिए चलो ठीक है कोई सभा है उसमें कोई आ जाए तो बात अलग है पहले उसने किया हो नहीं किया हो मगर जब वो अपनी चीजों पर अडिग है जब वो स्वीकार ही नहीं कर रहा है ऐसी स्थिति में दोष युक्त स्थिति में क्या उसको प्रेम स्नेह या समय यह सब देना चाहिए। उन्होंने तो मुझे दिया था और ना ही उन्होंने कोई ऐसी घोषणा की है कि मैं आगे कभी पूरी शंकराचार्य जी से नहीं मिलूंगा क्योंकि पूरी के शंकराचार्य जी अपने व्यभचारी शिष्यों का समर्थन करते हैं या पूरी के शंकराचार्य जी अमुक अमुक गलत चीजें कर रहे हैं। जब तक वह इन बातों के लिए नहीं करेंगे तब तक मैं उनका बहिष्कार करता हूं। ऐसी कोई घोषणा की है क्या विद्या भास्कर जी महाराज ने? तो कब करेंगे घोषणा कर सकते थे हां शिवश नारायण द्विवेदी व्यभचारी है अमुक अमुक पूरी पीठ के परिक व्यभचारी है वो तुझ पर विश्वास करते हैं ना वो तुझे प्रामाणिक मानते हैं तू जो भी बोलता है प्रामाणिक बातें बोलता है तो यह कब बोलेंगे
00:59:33:22 वो क्यों नहीं बुलवा दिया कि अमुक अमुक स्त्री वैश्या है तूने तो यही बोला है ना तेरे अनुसार तो वैश्या है अमुक अमुक स्त्री मलेच्छराज की एजेंट है कब बोलेंगे कब घोषणा करेंगे क्यों नहीं की घोषणा उनसे प्रामाणिक सिद्ध करवा लेते और घोषणा नहीं की तो नहीं की यहां से तो मौन है अब तेरा खंडन कैसे है कि उनको उनको मेरे बारे में तेरे द्वारा पता था मैं कौन हूं क्या है तो यह भी पता होना चाहिए था कि जो मेरी बहन के तुल्य है तूने मेरे ऊपर आरोप लगाया है कि मेरे उसके साथ अनैतिक संबंध है हम उसके बाद भी उन्होंने मुझे तो ढेर सारा लाड़ प्यार दिया हां उन्होंने मुझसे ये तक कहा कि मुझे आपके प्रति वात्सल्य भाव आ रहा है। जैसे अपने बच्चे के प्रति आता है। अपनी संतान के प्रति आता है।
01:00:26:19 और मुझे मुझे जो है भेंट भी प्रदान की। उन्होंने मुझे वस्त्र पहनाया। क्यों पहनाया भाई? क्या हमारे मान्य आचार्य गण जो हैं वह क्या दुष्टरित्र व्यक्तियों का सम्मान करेंगे? प्यार करेंगे, प्रेम स्नेह करेंगे। उनके साथ सद व्यवहार करेंगे या दूरी बनाएंगे? तो ना तो उन्होंने तेरे समर्थन में ऐसी कोई घोषणा की है कि मैं शिवश नारायण द्विवेदी से पूरी पीठ से पूरी के शंकराचार्य से पूरी पीठ के परिकों से दूर होता हूं और तो और ऐसी विरोधाभासी घोषणा करने की बजाय उन्होंने तो उल्टा प्रश्न उन्होंने तो मुझे भी सुना मुझे भी स्थान दिया मुझे जहां तक अपेक्षा है कि मैं दोबारा जाऊंगा तो दोबारा वहां पर भोजन प्राप्त होगा मुझे आश्रय मिलेगा मुझे और भविष्य में कभी पूरी शंकराचार्य जी आएंगे तो पूरी शंकराचार्य जी से भी भेंट होगी सौहार्दपूर्ण और वहां के जो शिष्य होंगे पूरी पीठ के पर जिस जिनको जिन पर तूने असिद्ध आरोप लगाए हैं उन पर भी उनको भी वो आशीर्वाद देंगे तो ये सब क्या है हम तू होगा तो इसको सेलेक्टिव पॉलिटिक्स कहेगा और मैं कहूंगा कि जितने अंशों में वो तुझे अच्छा मानते हैं उतने ही अंशों में वो तेरे साथ हैं। तेरे अधर्म
01:01:42:00 में साथ नहीं है वो। ठीक है? नहीं तो करवा दे घोषणा। कि अमुक वैश्या अमुक अमुक स्त्री वैश्या है। अमुक अमुक लोग वैश्या गामी है। अमुक अमुक भाई बहन जो है अनैत के संबंध रखते हैं। करवा दे उनसे भी घोषणा और ये रामानुज परंपरा जो है वो इसी के समतुल तेरी वो तुच्छी तुच्ची निग्रह परंपरा है। क्योंकि निग्रह परंपरा कोई है ही नहीं। तो उसको टच्चा कहो या कुछ भी कहो हम तो वह ऐसा नहीं कहेंगे ना ही उन्होंने यह बात क्लियर की मंच पर आकर के मंच पर आए थे तो कम से कम यह बात तो क्लियर हो सकती थी तूने बता दिया मैंने उन्हें मैसेज किया था वो खिन्न हो रहे थे कम से कम यह बात तो क्लियर कर सकते थे कि हां मैं गया था पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने और मुझे मिलने नहीं दिया गया तो खैर उन्होंने कोई भी बात नहीं कही जो वह वहां से कह सके थे
01:02:43:08 और रही बात कि उनके द्वारा तुझे प्रमाणिक माने जाने की तो भाई वो हमारे लिए प्रणम्य है और यदि वह कोई शास्त्र की व्याख्या हमारे समक्ष रखते हैं तब जब हमारे मन में उसके प्रति जिज्ञासा हो सकती है तो तेरी कही हुई बातों को जब वो हमारे समक्ष रखेंगे तो क्या हमारी उस विषय में जिज्ञासा नहीं हो सकती हमारी जिज्ञासा है जिसका निराकरण तो वो नहीं कर रहे हैं। उन्होंने मुझसे कहा था टेलीग्राम पे मैं आपको प्रमाण भेजूंगा। मुझे अभी तक कोई प्रमाण नहीं प्राप्त हुआ। मैंने यह वाली बात भी बताई कि रामानुजाचार्य की तरफ से रामानुजाचार्य जी ने क्या कहा है? क्या उनके उनके जो प्रामाणिक शिष्य हैं रामानुजाचार्य के सिद्धांत को यथावत आगे प्रचार प्रसार कर रहे हैं कि नहीं कर रहे? इस बात का निर्णय कोई दूसरा व्यक्ति जो रामानुज परंपरा से नहीं है वह कैसे करेगा? हम
01:03:34:24 रामानुजाचार्य जी ने क्या कहा है और क्या नहीं कहा इस विषय में उसी व्यक्ति की बात प्रामाणिक मानी जाएगी जो उनका प्रामाणिक शिष्य होगा प्रामाणिक रूप से नियुक्त होगा प्रामाणिक रूप से उनका उत्तराधिकारी भी होगा उसकी बात प्रमाणिक मानी जाएगी कोई भी आके कुछ भी कहता रहे उसकी बात नहीं मानी जाएगी तो इस विषय में भी और यदि मान ली जाएगी तो कल को मैंने पूछा हमसे इसको तो प्रभुपाद के लिए भी कोई कुछ नहीं कह सकता है। जैसे इसने निगमानंद के लिए प्रलाप किया है। वो अगले वीडियो में बताऊंगा। मैं यहां भी थोड़ा सा बता देता हूं। प्रभुपाद भी सही सिद्ध हो जाएगा। प्रभुपाद के विषय में भी कोई एक आध आदमी ऐसा कहने लगेगा। अरे उनके अब के शिष्य गलत बता रहे हैं। मैं जो बता रहा हूं वो सही है। तो प्रभुपाद सही सिद्ध हो गए। मोहम्मद सही सिद्ध हो जाएगा कि मुसलमान गलत बताते हैं। मोहम्मद बहुत बढ़िया व्यक्ति थे। बहुत सही चीजें बताई थी। मगर मोहम्मद का अस्तित्व मोहम्मद था कि नहीं था? प्रामाणिक रूप से हम जिस पर विश्वास कर रहे हैं किसी व्यक्ति पर कि मोहम्मद था उसी व्यक्ति के द्वारा मोहम्मद के द्वारा मोहम्मद के बारे में बताई जाने वाली बात जानकारी को प्रामाणिक मानना होगा क्योंकि हमने तो देखा ही नहीं मोहम्मद था कि नहीं था। यदि हम मान रहे हैं कि था तो उसने क्या कहा था और क्या नहीं कहा था। जिसको हम इस विषय में प्रामाणिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं।
01:04:50:02 उसी की बात को मानना पड़ेगा। तो परंपरा ऐसे ही कहते हैं। नहीं तो मोहम्मद भी सही हो जाएगा। लगा कि आर्य समाज से लेकर के विवेकानंद तक जितने लोगों की तूने मलेच्छराज में वो की है प्रतिकार किया अच्छा किया है ऐसा नहीं है पूरी तरीके से गलती किया है बस थोड़ा सा जो मर्यादा को भूल जाते हो उसके कारण है खैर वो यहां से नहीं तो कहीं ना कहीं से तुम्हारा निग्रह तो चल ही रहा है काफी निग्रह तो हो ही चुका है अब जो बदतमीजी थी भूल गए हो कुछ कम हो गई है थोड़ा भाषा शैली भी थोड़ी नरम हुई है अभी और जब मार आगे बढ़ेगी समय की तो और निग्रह हो जाएगा तुम्हारा तो तुम निग्रह चारचार निग्रहचार्य सिद्ध हो पाओ या ना हो पाओ तुम्हारा निग्रह करने वाला शिवाश नारायण द्विवेदी जरूर सिद्ध होता जा रहा है क्योंकि अब वो मेरे से मेरे साथ तुम वो सब बातें नहीं कर रहे हैं तेरे जैसों के लिए हम वैसे ही बात करेंगे और वो सिंपिंग कर रहा है यह सब अब नहीं निकल रहा ना मुंह से पहले तो निकल रहा था विजय श्री ऊपर और नीचे बहुत कुछ है जो मेरे पास नहीं है। सब कोर्ट को जज को दिखाया जाएगा ये सब चीजें। तो खैर वह क्या बात है कि शिवश की मार की बात ही है निराली। गूंगा भी गाय कब वाली है ना?
01:06:06:21 अच्छा मैंने वाकलन का भी उनसे पूछा है कि भाई वाकलन कैसे हो रहा है? तो वाकलन के विषय में भी कोई जवाब नहीं दिया जा रहा है। इसके साथ ही साथ मैंने एक वहां पर बात हुई थी स्वान के विषय में। तो स्ान उन्होंने क्या कहा था कि भाई अगर धर्म नियंत्रित बात ये मेरी मान रहा है तो मैं तो यह मेरा स्वान है और मैं अगर इनकी बात मान रहा हूं तो मैं इनका स्ान हूं धर्म नियंत्रित बात तो इस विषय को लोग कह रहे हैं कि भाई मेरे मैंने जो तुम्हें स्ान का स्ान की बात कही थी उसका उत्तर मिल गया तो मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मेरी बात का उत्तर कैसे हुआ क्योंकि जब मैंने स्वान वाली बात बताई थी कि कई आचार्यों के लिए तुम्हारा स्तर किस प्रकार का है इस विषय में जब मैंने बोला था जहां पर स्ान शब्द भी आया था तो वहां पर मैंने यह नहीं कहा था कि विद्या भास्कर जी महाराज के यहां पर इसका स्तर स्वान के जैसा है। यह नहीं कहा था मैंने नाम नहीं लिया था। अब नाम ना लेने के लिए भी एक व्याख्या है। जब इसने यह कहा था कि माता का भ्रूण खाने वाले पापी होते हैं। तो इसने उसके बाद जब ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी बुरा मान गए इस बात का इसके अनुसार तो इसने कहा मैंने नाम लिया है क्या आपका? तो मैंने नाम लिया क्या विद्या भास्कर जी महाराज का? तो
01:07:21:22 फिर कैसे हो गया कि भैया यह मेरी शान वाली बात के निराकरण में ही हो रहा है। वह तो तुझे कितना झूठा मानते हैं। कितना निर्लज्य मानते हैं। कई अंशों में वो इस बात से भी तो सिद्ध होता है कि राघवाचार्य जी महाराज तेरे द्वारा बताए गए समलैंगिकों के पास गए वैश्यगामी गामियों के पास गए व्याभचारियों के पास गए बहन के साथ गलत संबंध रखने वालों के पास गए हैं और आशीर्वाद देके आए कृपा पूर्वक तेरे अनुसार तूने गंदगी फैलाई ना ये सारी और उन्होंने तो राघवाचार्य जी महाराज के विरोध में कुछ नहीं वक्तव्य दे दिया टिप्पणी दे दी राघवाचार्य जी महाराज के लिए कोई ऐसा संदेश नहीं निर्गत कर दिया कि भाई तुम वहां क्यों गए ऐसे ऐसे लोगों के यहां और घोषणा खुद के लिए भी नहीं की है कि मैं ऐसा ऐसासा नहीं करूंगा। तो उस उस हिसाब से तू तो झूठा और दोगला भी सिद्ध हो रहा है। जिनके द्वारा तू अपने आप को प्रामाणिक सिद्ध कर रहा है। उन्हीं के द्वारा तू अप्रामाणिक और दोगला भी सिद्ध हो रहा है। तो फिर कैसे उस इस बात का निर्णय होगा? तो सीधी सी बात है कि किसी मान्य आचार्य की वाणी का वाणी को आधार ना मानकर वहां पर फिर तू शास्त्रों की व्याख्या ले आ तर्क और प्रमाण से सिद्ध कर लेंगे कि तू कितना प्रमाणिक है हम तो यह सारी बातें थी जो वहां पर हुई थी और
01:08:36:07 अब इसके अगले भाग में हम बात करेंगे जो इसने कुतर्क किए हैं निगमानंद को लेकर के। निगमानंद जी पर जो हमने बातें कही हैं कि निगमानंद यह मानता था कि अह भगवती मेरी पत्नी है और इसने वहां को बात को घुमा दिया कि वो परमहंस सतत्व को प्राप्त हो गए थे। हम तो ये सारी जो चीजें हैं अह इन विषयों पर निगमानंद वर्णाश्रमी वर्णाश्रम का सपोर्ट करते थे या नहीं करते थे। अपनी पूजा करवाते थे कि नहीं करवाते थे। विदेश यात्रा के विषय में निगमांद की क्या स्थिति है? इन सब बातों पर हम अगले वीडियो में बात करेंगे। जय श्री राम। [संगीत]
Plans for this video (0)
No Plans yet. Press "✂️ Open Clip Cutter" to make one.
-
⬜Hindi SRT Required
YouTube Studio → Subtitles → Hindi → upload the SRT file. (Checked automatically once OAuth is connected.)
-
⬜English SRT
YouTube Studio → Subtitles → Add language → English → upload the SRT file.
-
⬜Title (per Rules)
Check the title against the RULES on honorifics, names and terms.
-
⬜Description
YouTube Studio → Details → Description. Write it as per the RULES.
-
⬜End Screen
YouTube Studio → Editor → End screen. The API does not report this, so press Done after adding it.
-
⬜Cards
YouTube Studio → Editor → Cards. The API does not report this, so press Done after adding them.
-
⬜Playlist Automatic
YouTube Studio → Details → add to Playlists. It gets ticked ✓ automatically at the next sync.
-
⬜Thumbnail
YouTube Studio → Details → Thumbnail → upload a custom thumbnail.
"Done" is your confirmation. The YouTube API does not report things like End Screen and Cards.
Playlists
Not in any public playlist (or YouTube sync has not run yet).
क्या पूज्य विद्या भास्कर जी भागवतानंद के पूर्णकालिक समर्थक हैं? लखनऊ विशेष
Description
(empty)
History
No changes yet.
✂️ Clip Cutter
⌨️ Keyboard shortcuts
Space Play/Pause · I Set start · O Set end · ←→ 1 second (Shift: 5) · ,. 1 frame · P Preview · Enter Add clip · Esc Stop
Start
End
✂ Remove (middle part: bad audio, bad section)
Move the video to that spot (click the SRT or the bar), then press "Start"/"End".
Clips () · Total
Add clips above. They will appear here; drag (⋮⋮) to reorder.
-
⋮⋮