⬜ Not used yet · 00:00:02:00 – 00:42:35:00 (42:33)
00:00:02:00 सभी को जय श्री राम। सच के आसपास वाला झूठ जब हमने पहला वीडियो बनाया था भागवत आनंद के विषय में उसके द्वारा किए जा रहे जो दुष्प्रचार है केवल उसको टारगेट करते हुए और इस बात का ध्यान रखते हुए कि हमारे और उसके बीच का जो वैचारिक संघर्ष है इसका लाभ जो विदेशों से आने वाली जो यह संस्थाएं हैं जो दीमक की तरह से सनातन को नष्ट कर रही हैं वह ना ले लें। तो हमने उसका जो टाइटल रखा था उस वीडियो का पहली बार जब भागवत के द्वारा उठाए गए प्रश्नों के निराकरण में जब हमने वीडियो बनाया था तो उसका टाइटल यही रखा था सच के आसपास वाला झूठ। अब सच के आसपास वाला झूठ क्या है? जैसे कि कोई मेरे बारे में आपको यह बताए कि मैंने शिवश नारायण द्विवेदी को देखा है। जहां वह बैठता है वहां पीछे अमुक अमुक ग्रंथ रखे होते हैं या फिर अ कुछ और चीजें रखी होती है जो कि आप लोगों को भी दिखाई दे रही हैं। और जब वो वीडियो शूट करता है तो वीडियो शूट करने के थोड़ी ही देर बाद तुरंत थोड़ी देर बाद नहीं तुरंत वो एक कैडबेरी की
00:01:17:01 चॉकलेट खाता है या फिर अमूल की आइसक्रीम खाता है और मैं यह दावे के साथ इसलिए कह सकता हूं क्योंकि मुझे मालूम है कि उसके ऑफिस में वहां क्या-क्या रखा हुआ देखा है मैंने। तो अब व्यक्ति क्योंकि उसने एक बात सत्य बताई है कि उसके पीछे क्या-क्या रखा होता है। करपात्री जी के ग्रंथ होते हैं। भगवत गीता होती है। तो क्योंकि उसने एक बात सत्य बोली है तो व्यक्ति इस बात पर ध्यान देना भूल जाता है कि उस एक सत्य बात के साथ जो उसने एक अटैच बात और बोली है वह सत्य है कि नहीं। भाई मेरे पीछे ग्रंथ रखे हैं। इस बात को मालूम होने वाला यह बात बताएगा कि मैं वीडियो शूट के बाद आइसक्रीम खाता हूं तो यह बात भी सत्य सिद्ध होगी। इसका आधार क्या है? इस संबंध में प्रमाण क्या है? क्या मेरे पीछे ग्रंथ रखे होने से यह सिद्ध हो जाता है कि मैं वीडियो शूट करने के बाद आइसक्रीम खाता हूं? या फिर जो भी मेरे बारे में इतनी सी भी जानकारी रखता है वह मेरे बारे में कोई भी बात बोलेगा तो वह मान ली जाएगी। कुछ इसी तरह के अनर्गल आरोप होते हैं भागवतानंद के द्वारा लगाए जाने वाले जो वो लोगों
00:02:32:02 पर लगाता है मिलते जुलते। वो एक बात सच बताएगा जिससे कि लोग कहेंगे हां यह बात तो सही है। हमने ऐसा देखा है। और फिर उसके साथ में यह एक झूठ अपना परोस देगा कैरी मिनाटी बनने के लिए। तो ऐसा ही एक झूठ उसने बोला था भागवतानंद ने कि विद्या भास्कर जी महाराज जैसे प्रबुद्ध जन वेदगामी वेदानुगामी शंकर मठ में जाने का प्रयास कर रहे हैं पूरी शंकराचार्य जी से मिलने के लिए गए थे परंतु वहां पर उन्हें मिलने नहीं दिया गया यह क्या है यह भी वही सच के आसपास वाला झूठ है जिस पर आज खुलासा होने वाला है तो मैं बहुत ज्यादा देर तक जो है वह जो संशय की स्थिति है रोमांच की स्थिति है वह ना बनाने की बजाय पहले ही आपको बता दूं कि जब मैं विद्या भास्कर जी महाराज के पास मिलने गया तो जो सत्यता इस सब मन में मुझे पता लगी वो यही थी कि भागवतानंद ने विद्या भास्कर जी को लेकर के एक झूठ फैलाया था कि वो पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने गए पर वहां के परिकरों ने उन्हें मिलने नहीं दिया गया विद्या भास्कर स्वामी जी ने भी ऐसा ही अनुभव बताया कि अयोध्या में शंकराचार्य जी आए थे तो हम उनका दर्शन
00:03:47:10 करने की इच्छा रखते थे। पहले तो बहुत हम आराम से मिलते जुलते थे। साथ में धर्म चर्चा भी होती थी। बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने ही नहीं दिए। ये बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने नहीं दिए। ये बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने ही नहीं दिए। ये बात विद्या भास्कर स्वामी जी ने भी हमको कही। अब ये सच के आसपास वाला झूठ कैसे है? और किस आधार पर उसने यह बात कही। वह आधार यही था कि विद्या भास्कर जी महाराज तो स्वयं गए ही नहीं थे पूरी शंकराचार्य जी के पास। हां वो कभी और अन्य अवसरों पर जाते रहे होंगे। पर जिस अवसर को आधार बनाकर के बात भागवतानंद ने सच के आसपास वाले झूठ के रूप में प्रस्तुत की है। पर पड़ोसी प्रचारित किए। उस अवसर में तो विद्या भास्कर जी महाराज स्वयं गए ही नहीं बल्कि उनके कोई शिष्य गए थे और जिनके ना मिल पाने की बात विद्या भास्कर जी ने इस इस व्यक्ति को बताई धूर्त को और इसने उसको अपने साथ अपने द्वारा मिर्च मसाला लगाकर के प्रस्तुत कर दिया। कुछ इस तरीके से कि लोगों के मन में ऐसी नकारात्मकता स्थापित हो जाए। विद्या भास्कर जी महाराज को नहीं मिलने दिया। मान्य पीठ के मान आचार्य को नहीं मिलने दिया। रामानुजाचार्य
00:05:02:26 को नहीं मिलने दिया। जगुरु रामानुजाचार्य जी को नहीं मिलने दिया। तो पहले ही लोगों के मन में इतनी नकारात्मकता स्थापित हो जाए कि बाद में जब कोई यह भी बताए कि नहीं नहीं विद्या भास्कर जी महाराज नहीं उनके शिष्य गए थे जो नहीं मिल पाए थे किनहीं कारणों। तो जब लोगों को यह सच्चाई पता भी चले बाद में तो उनकी वह नफरत उनका वह जो उनके अंदर जो नकारात्मकता है वो इतनी पुष्ट हो चुकी है उस समय तक कि वो इस सच्चाई से अब उन्हें कोई प्रभाव नहीं पड़ता हो कि भाई विद्या भास्कर जी महाराज नहीं बल्कि उनके शिष्य गए थे पूरी के शंकराचार्य जी के पास जो नहीं मिल पाए थे। पूज्य महाराज जी तो प्रामाणिक आचार्य हैं। उनकी तो खैर बात ही अलग है। ऐसा संभव ही नहीं है कि वह पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने जाएं। उन्हें मिलने नहीं दिया जाए। और उनके शिष्य भी उसी श्रेणी में आते हैं। पर ऐसा कई बार होता है गुरुदेव का इन दिनों स्वास्थ्य ठीक नहीं रह रहा है और ऐसा भी संभव हो सकता है कि कई बार गुरुदेव का स्वास्थ्य ठीक ना रहा हो जब कोई उनसे मिलने पहुंचे कोई विशेष व्यक्ति। राजनीतिज्ञों के साथ, नेताओं के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह कई बार ऐसा मैंने खुद देखा कुंभ के मेले में या अन्य अवसरों पर जब कोई प्रमुख और प्रसिद्ध राजनेता
00:06:18:02 गुरुदेव से मिलने पहुंचे परंतु नहीं मिल पाए। क्यों? क्योंकि वह असमय पहुंचे थे। इसके साथ ही साथ कुछ और भी मर्यादाएं होती हैं। जैसे कभी-कभी कुछ वरिष्ठ जिन ही है। परंतु अपने किसी शिष्य को दूत को वहां पर गुरुदेव को निमंत्रित करने के लिए अपने यहां बुलाने के लिए भेज देते हैं। और ऐसे में कई बार परिकरों को एक समस्या का सामना करना पड़ जाता है कि जो व्यक्ति संदेश लेकर के आया है गुरुदेव को वहां बुलाने के लिए उस व्यक्ति ने क्या जो आसन इत्यादि होगा जब गुरुदेव वहां जाएंगे इस संबंध में पारदर्शिता के साथ स्पष्टीकरण दिया है कि कैसे बैठेंगे कहां बैठेंगे क्योंकि ऐसा गुरुदेव के साथ हो चुका है कि कहीं वह पहुंचे और वहां पर गुरुदेव बैठ गए उनका जो आसन था सिंहासन था जिस पर वो बैठे थे वो बैठ गए वहां पर फिर उसके बाद कोई और आया और वो इस तरह से बिठा दिया गया उसको जहां पर शंकर शंकराचार्य की अवमानना हुई। तो इन सब कारणों से यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि यदि कोई विशेष व्यक्ति अपने किसी शिष्य को या दूत को भेज के गुरुदेव को आमंत्रित करवाना चाह रहा है
00:07:33:06 अपने यहां तो वहां पर वो पारदर्शिता रखी गई है कि नहीं पहले से ही यह बताया गया है कि नहीं अगर हमारे यहां गुरुदेव आएंगे तो इस इस तरह से बैठेंगे। वहां मंच पे इस तरह से विराजमान होंगे वो और दूसरे अगर कोई सज्जन आएंगे तो वह कहां विराजमान होंगे? तो अगर ऐसी पारदर्शिता नहीं होती है तो कई बार पीठ की यह समस्या होती है कि यह जो समस्या है गुरुदेव के आसन इत्यादि के विषय में जो दूत आया है जो अपने गुरु का शिष्य आया है उसको स्पष्ट रूप से बताया जाए या ना बताया जाए क्यों क्योंकि बताने में कहीं ऐसा ना हो जाए कि जिन जिन मान्य आचार्य का या जिन विशेष व्यक्तित्व वाले सज्जन का वह दूत है वह शिष्य है उनका ही खंडन जैसा प्रतीत ना हो जाए उसको दिखाई ना दे जाए तो इसलिए कई बार ऐसी व्यवस्था ऐसी संभावना ना होने की स्थिति में मौन रह जाना पड़ता है कि भाई ठीक है अगर हम कुछ ऐसा बोलेंगे कि भाई पारदर्शिता प्रस्तुत नहीं की गई है मंच पर कहां बैठेंगे आसन कहां लगेगा उनका क्या होगा और यह सब बातें अगर हम बोलेंगे तो जिन्होंने इनको भेजा है उनका खंडन जैसा ना फील हो जाए उनका अपमान ना हो जाए इनके समक्ष
00:08:48:07 ना हो जाए तो इन इन सब बातों के चलते भी कई बार वहां मौन धारण कर लेना पड़ता है। तो ऐसे कई सारे कारण हो जाते हैं जिसमें कि गुरुदेव से बहुत ही सुलभता से जो भेंट हो सकती थी वो भी कठिन दिखाई देने देने लगती। परंतु ऐसा नहीं है कि विद्वत जनों को प्रमुख आचार्यों को वहां जाने से रोका जाए। सर्वप्रथम जो मान्य आचार्य गण है उनके साथ ऐसा हो वह तो संभव ही नहीं है। हां कभी किसी के साथ अगर हुआ भी है तो केवल स्वास्थ्य के कारण ही हुआ होगा और हां जो अन्य जो समाज में जो प्रतिष्ठा रखते हैं नेता राजनेता इत्यादि उनके संबंध में ऐसा माना जा सकता है कि यदि वह ऐसे समय में आए ऐसे असमय में आए जिसमें कि जो समय गुरुदेव के विपरीत हो अनुकूल ना हो तो वह भी नहीं मिल पाए ऐसा माना जा सकता है। परंतु मान्य आचार्यों के लिए ऐसा माना जा सके ऐसा हो उनके साथ यह संभव नहीं है। अब वो तीसरा कारण मैंने आसन इत्यादि के बारे में बता ही दिया कि यदि कोई बुलाने आता है तो उस संबंध में क्या किस तरह से दृष्टिकोण रहता है। जिस कारण से कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि गुरुदेव से फिर भेंट ना हो पाए। जो दूत आया
00:10:03:10 है उसकी। तो इस तरह के कारण होते हैं जिनको कि सकारात्मक दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे तो अवश्य ही उसका जो उसके अंदर जो सकारात्मकता है वो आपको दिखाई दे जाएगी। परंतु फिर भी जब जो उक्त शिष्य थे पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज के जो पूरी शंकराचार्य जी से नहीं मिल पाए थे जब शंकराचार्य जी अयोध्या में थे तो जब वो नहीं मिल पाए थे तो इस विषय को इस घटना को जब हमने मठ में सूचित किया तो हमें वहां से यही कहा गया यही भाव वहां से प्रकट किए गए पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज के लिए भी कि इसको पौरुष का दोष ही समझे इसको उद्देश्य पूर्वक ना समझे ऐसा ही वहां से निवेदन प्रकट किया गया अच्छा अब यदि ऐसा ना होता इस पर भी बात करेंगे। यदि ऐसा ना होता और यह उद्देश्य पूर्वक ही किया होता तो अभी तो पूज्य राघवाचार्य जी महाराज के रूप में स्वयं विद्या भास्कर जी महाराज स्वयं ही वहां पर गए। पूज्य राघवाचार्य जी वहां पर गए। उनके ही प्रामाणिक शिष्य हैं। तो इसलिए यह अगर कभी संयोग से ऐसा हो भी गया तो उसको पौरुष का दोष समझते हुए उस पर ध्यान ना देने का ही निवेदन पीठ के परिकरों द्वारा भी किया गया। परंतु
00:11:18:12 पूरी बात ना बताकर इस धूर्त ने धूर्तता के साथ विद्या भास्कर जी महाराज के बारे में क्या प्रचारित किया कि विद्या भास्कर जी महाराज जैसे प्रामाणिक आचार्य जनों को भी पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने नहीं दिया जाता है। थे बाद में मिलने गए तो उनके परिक्र हमको मिलने नहीं दिए। जब बाद में मिलने गए तो उनके परिक हमको मिलने ही नहीं दिए। ये बात विद्या भास्कर स्वामी जी ने भी हमको कही। तभी तो मैं यह सोच कर हैरान था कि यदि ऐसा होता तो विद्या भास्कर जी महाराज तो महाराज तो अत्यंत निर्भीक संत हैं। वह तो बोलते प्रखर हो के अभी कुछ दिनों पूर्व उन्होंने स्कॉन के बारे में बोला था प्रखर हो के तो मुझे बड़ा आश्चर्य था इसीलिए मैं अयोध्या गया भी था कि भाई क्या वाकई में ऐसा हुआ है तो सच के आसपास वाला झूठ क्या है कि विद्या भास्कर जी महाराज को कष्ट तो था कि उनके शिष्य मिल नहीं पाए थे। परंतु उन्होंने एज इट इज यही बात जब भागवतानंद को बताई तो भागवतानंद ने उस बात को बदलकर किस तरह से समाज के समक्ष प्रस्तुत किया कि विद्या भास्कर जी महाराज स्वयं नहीं मिल पाए। दोनों बातों में अंतर है। यद्यपि उनका ना मिल पाने का भी खेद है पीठ को। उन्होंने खेद प्रकट किया कि अगर ऐसा हुआ तो परंतु ऐसा हो जाना कि प्रामाणिक आचार्य उन्हें नहीं मिलने दिया गया। तो यह धूर्तता फैलाई किसने?
00:12:34:07 इसी भागवत आनंद में और इसके साथ ही साथ जब मैं अगले ही दिन राघवाचार्य जी महाराज से मिला तो वहां पर भी इसकी इसके झूठ का पर्दाफाश हुआ। राघवाचार्य जी महाराज ने भी बताया कि वह अपने जन्मदिन के दिन संभवत पूरी के शंकराचार्य जी उसी उसी नगर में थे जहां पर विद्यावास राघवाचार्य जी महाराज थे। तो उनका उस उस दिन जन्मदिन था। तो उन्होंने किसी महापुरुष के दर्शन करने के लिए पूरी के शंकराचार्य जी के दर्शन करना ही अच्छा समझा और वहां दर्शन करने गए उन्हें दर्शन मिले भी उन्हें भेंट भी हुई। हां कुछ दो-तीन बार उन्होंने दर्शन भी प्राप्त किए तो किसी एक बार ऐसा हुआ था जब उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो संभवत खिड़की से ही प्रणाम करके वो जो है राघवाचार्य जी महाराज वहां से आ गए थे। इसके बाद पुनः जो है मिले शंकराचार्य जी महाराज से और उनके साथ मंच पर भी बैठे। मगर यह सब बातें इस व्यक्ति ने नहीं बताई। इस व्यक्ति ने इसको कैसे घुमा फिरा करके प्रस्तुत किया अपने वक्तव्यों में कि देखिए विद्या भास्कर जी महाराज को मिलने नहीं दिया जा रहा है। ऐसा ही हमें राघवाचार्य जी महाराज ने बताया। राघवाचार्य जी महाराज ने
00:13:49:27 यह भी यह बताया अगर कि एक बार वो मिल नहीं पाए थे। केवल दूर से दर्शन करके चले आए तो राघवाचार्य जी महाराज ने आगे पीछे और भी चीजें बताई है ना मगर वो यह धूर्त नहीं बोलेगा वो राघवाचार्य जी स्वयं बोलेंगे उन्होंने मुझे बताया कि ऐसा-सा हुआ पूरी के शंकराचार्य जी से मिलने का असफल प्रयास तो राघवाचार्य जी भी कर चुके हैं। राघवाचार्य स्वामी जी से हमारी निजी वार्ता हो रही थी। उन्होंने कहा कि हम तो शंकराचार्य जी का दर्शन करने के लिए गए। कई घंटे प्रतीक्षा किए। बाद में उनके परिकों ने कहा कि स्वामी जी नहीं मिलेंगे। विश्राम कर रहे हैं। बस खिड़की से देखिए और जाइए। खिड़की से दर्शन किया और ऐसे वहां जोड़ा और निकल गया। यह ठीक उसी तरह रामपाल की तरह कि कहीं पर अगर ब्रह्मा विष्णु महेश ने कह दिया कि हम भी नाशवान है या हमारा भी आविर्भाव तिरोभाव हो गए तो हो गए नाशवान हो गए वो उसके आगे पीछे उन्होंने यह भी कहा कि मैं परम ब्रह्म हूं तो उससे कोई मतलब नहीं उसी प्रकार से इसने केवल वो एक बात कि राघवाचार्य जी ने बताया कि उनको मिलने नहीं दिया गया वो एक बात पकड़ ली उसके बाद वो मंच पर भी उन्होंने मंच भी साझा किया पूरी के शंकराचार्य जी के साथ तो उसको उसने गण कर दिया इसको कहते हैं अपने नैरेटिव को क्रिएट करना। कैसे क्रिएट करना है नैरेटिव? यह शैली है नैरेटिव क्रिएट करने की। सारी बातें सत्य हैं। हमारे विपक्ष में है। फिर भी हम अपना नैरेटिव निकाल लेंगे। उसको स्थापित कर देंगे। ऐसा तोड़ मरोड़ के
00:15:05:06 उसी सत्य को प्रस्तुत करेंगे। इसी को कहते हैं सच के आसपास वाला झूठ। तो सबसे पहले तो यह है। अब इसके बाद एक बात आती है कि इसकी धूतता की पराकाष्ठा आप देख सकते हैं कि जब राघवाचार्य जी महाराज वहां पर मिलने गए अब तक ये कह रहा था कि मिलने नहीं दिया जा रहा है। तो सबसे पहले तो इसको ये रोना रोना था ना कि अरे ये मैं क्या देख रहा हूं? राघवाचार्य जी महाराज पूरी पीठ के शंकराचार्य जी से कैसे भेंट कर रहे हैं। मगर जब उन्होंने भेंट की इसने देख लिया अपनी आंखों से तो इसके सुर बदल गए। आज बड़ा अच्छा दृश्य देखने को मिला। राघवाचार्य जी वहां पुरी के शंकराचार्य जी से मिलने पहुंचे हैं। अरे भाई कैसे पहुंच गए? तुम्हारा तो क्लेम है ना कि नहीं मिलने दिया जाता है। इसका मतलब वो क्लेम झूठा है। अच्छा फिर इसने आगे क्या कहा कि चलो हमारे कारण यह शोधन हो गया। तुम्हारे कारण शोधन कैसे हो गया भाई? हर चीज का क्रेडिट यह व्यक्ति स्वयं को देता है। अगर इस के विषय में मैंने कोई कार्य किया तो उसका भी क्रेडिट चलो हमारे कह देने के कारण ही परिवर्तन आ रहा है समाज में कि लोग अन्य लोग भी कह रहे हैं अरे भैया पहली बार जब मैं इस लखनऊ टेंपल में गया था ना तो मैंने तेरा नाम भी नहीं सुना था उस समय तू है कौन
00:16:21:03 तो तू यह कैसे क्रेडिट दे रहा है कि हम जो कार्य कर रहे हैं वो तुझसे प्रेरणा मिली है राघवाचार्य जी महाराज को एक मंच पर देखने की प्रेरणा ऐसे आचार्य चार चार्यों को वैष्णवाचार्यों को शंकराचार्यों के साथ एक मंच पर देखने की प्रेरणा तो हमें गुरुदेव से मिलती है। गुरुदेव ने सदैव रामानुजाचार्य भगवान के प्रति मधवाचार्य के प्रति सभी संप्रदायों के प्रति बहुत सम्मान की दृष्टि हमें दी है। और वही हमारे अंदर है हृदय में और हम उसी दृष्टि से चलते हैं जिस जो दृष्टि गुरुदेव ने हमें दी है। पूरी के शंकराचार्य ने हमें दी है। और यही नहीं हम जब मधवाचार्य संप्रदाय के लोगों से मिलते हैं या उनको देखते हैं आचार्यों को तब भी इसी दृष्टि से देखते हैं। रामानुज परंपरा से देखते तब भी इसी दृष्टि से देखते हैं। और यही दृष्टि हमें राघवाचार्य जी महाराज से भी प्राप्त हुई थी। जब उनका इंटरव्यू है उसमें आप देखिएगा कैसे उन्होंने सभी मान्य प्रामाणिक संप्रदायों के प्रति जो है एक अच्छी दृष्टि सम्मान पूर्वक दृष्टि रखने के लिए शिक्षा दी है। तो हर बात का क्रेडिट तुझे किस प्रकार से मिल जाएगा भाई? अब तेरा कहना है कि मुझे नीचा दिखाने के लिए ही सही। तो
00:17:36:26 तू यह क्यों सोचता है कि तेरे से ही प्रभावित होकर के इस दुनिया में सारे संसार में सारे कार्य हो रहे हैं। भाई आहान की नीव में है परंपरा प्राप्त आचार्यों को एक मंच पर लाना। उन्हें कम से कम सभी लोगों को किसी ना किसी परंपरा प्राप्त आचार्य आचार्य के सानिध्य में ले जाना। हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि सबको केवल शंकराचार्य के ही सानिध्य में ले जाओ। जब हम उनके पास गए थे अभी वृंदावन तो गौडिया वैष्णव जो प्रामाणिक आचार्य जो थे उनके साथ हमने करीब एक डेढ़ घंटे वार्ता की थी उसमें अंत में हमने यही बोला था कि आप गौडिया वैष्णव से जुड़े तो प्रामाणिक से जुड़े हमने वहां यह तो नहीं कहा था नहीं आप शंकराचार्य से ही जुड़े तो हमारे काम करने का जो आधार है वही यह है कि हम सभी प्रामाणिक आचार्यों में एकत्व देखते हैं और धर्म स्थापना के लिए किसी भी प्रामाणिक आचार आचार्य से प्रत्येक सनातनी को जोड़ना ही हमारा उद्देश्य है। मगर प्रामाणिक आचार्य से स्वभोषित आचार्य या फिर तथाकथित कपोल कल्पित परंपराओं से नहीं प्रामाणिक परंपराओं से प्रामाणिक आचार्यों से और यदि इस सब के बाद भी तू अपने आप को क्रेडिट देना चाहता है कि
00:18:52:04 हां भाई मेरी ही वजह से राघवाचार्य जी वहां पहुंचे शंकराचार्य जी से भेंट करने तो तुझे कौन सा क्रेडिट किस रूप में क्रेडिट मिलना चाहिए जिस प्रकार से रावण को क्रेडिट मिलना चाहिए श्री राम के जन्म का है ना जो तू अपना ढिंढोरा पीट रहा है तो अगर तुझे क्रेडिट दिया भी जाएगा दुर्जन न्याय से तो कौन सा क्रेडिट दिया जाएगा जैसे श्री राम जी के जन्म का क्रेडिट रावण को दिया जा सकता है अन्य राक्षसों को दिया जा सकता है जिनके वध के लिए जिनसे रक्षा करने के लिए मानवता की श्री राम जी का जन्म हुआ था प्राकट्य हुआ ऐसा क्रेडिट है तेरा अगर है तो और दूसरी बात के तूने अपने इस व्यक्ति ने अपने वक्तव्य में एक बात और कही एक बहुत अच्छा दृश्य देखने को मिला क्या अच्छा दृश्य भाई राघवाचार्य जी महाराज तेरे अनुसार कहां पर गए थे किसी समलैंगिक के पास किसी वैश्यागामी के पास किसी मलेच्छराज के दूत के पास भाई पूरी पीठ के परिकों से भी तो मिले वहां पर राघवाचार्य जी महाराज आशीर्वाद दिया बहुत सौ सौहार्दपूर्ण सौहार्दपूर्ण भेंट हुई तो भैया तेरे हिसाब से तो वो दृश्य गलत है ना
00:20:08:00 और तो और पूरी के शंकराचार्य जी जो हिंदुओं के साथ छल कर रहे हैं हिंदुओं के साथ धोखा कर रहे हैं हिंदुओं की भावनाओं के साथ खेल रहे हैं वो अपनी दिव्य बातें बता करके और आत्म मुग्ध है अपने परिककरों के मुंह में धर्म अधर्म का वो निर्णय नहीं कर पा रहे हैं तुझे शर्म आ रही थी तूने अपने एक वीडियो में कहा था मुझे शर्म आती है मैं जो है लज्जित होता हूं कि मैंने कभी इस व्यक्ति का साथ दिया। ये सब बोला है ना पुरी शंकराचार्य जी के लिए। तो ऐसे गलत प्रांगण में तुम्हारे द्वारा जो मान्य आचार्य हैं हमारे द्वारा भी है। राघवाचार्य जी महाराज को देखकर तुझे प्रशंसा क्यों हो रही है? तुझे तो उनका खंडन करना चाहिए कि सम लैंगिकों के पास क्या कर रहे हैं? वह राघवाचार्य जी महाराज व्यभचारियों के पास क्या कर रहे हैं? वैशगामियों के पास क्या कर रहे हैं? गुंडों के पास क्या कर रहे हैं। आत्मों के पास क्या कर रहे हैं? घमंडी के पास क्या कर रहे हैं? मलेच्छ राज के दूतों के साथ वो क्या कर रहे हैं? क्यों? सुर बदल गए। इसको कहते हैं दोगलापन। बागेश्वर वालों से मिलने वालों के साथ वो क्या कर रहे हैं? राघवाचार्य जी महाराज भाई बागेश्वर वालों से जो मिल रहे हैं तूने क्या क्रम बताया था? कि भैया वो फलाना अब्दुल्ला मिल रहा है उससे और वो मिल रहा है उससे उससे
00:21:23:03 मिल रहा है। बागेश्वर बागेश्वर से मिल रहा है। ये और उनसे मिल रहे हैं। ये ये मिलने पर तूने कटाक्ष क्यों नहीं किया? दुख प्रकट क्यों नहीं किया? प्रशंसा क्यों कर दी? यह सब इसका दोगलापन है। और यह यह नहीं बताता है कि इसकी छाती पर कितने सांप लौटे थे। जब इसने राघवाचार्य जी महाराज को वहां शंकराचार्य जी के पास देख लिया था। ये ये नहीं बताएगा। ये तो प्रशंसा दिखाएगा भूरी भूरी। हां। खैर जो भी हो एक बात तो साफ है कि यह जो आचार्य गण है हमारे मान्य आचार्य गण कोई भी इसको महत्ता नहीं देता है। इसकी बातों को महत्ता नहीं देता है और जो इसके द्वारा कही जाने वाले वक्तव्य हैं उनकी उनको कोई भी सत्य नहीं मानता है। क्यों? क्योंकि इसने पूरी पीठ पर देखिए कितने सारे आरोप लगाए थे। राघवाचार्य जी वहीं पर गए। उन्हीं लोगों के बीच सौहार्दपूर्ण तरीके से बैठे और वापस आए। कोई आपत्ति नहीं हुई इन्हें। उनहीं ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी को उन्होंने आशीर्वाद दिया। ऋषिकेश ब्रह्मचारी जी ने उनके चरण स्पर्श किए।
00:22:29:22 [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हम [संगीत] हम
00:23:37:29 [संगीत] [प्रशंसा] क्यों भाई ये व्यक्ति ये लोग तो इसके द्वारा अपराधी घोषित है ना वही सब लोग थे वहां पर तो क्या हुआ अगर इस पर विश्वास करते होते मान्य आचार्य गण वैष्णवाचार्य गण तो क्या वो वहां जाते वो तो वैसे ही दूरी बना के रखते जैसे कि पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज ने मुझे बताया था अपनी चर्चा में बहुत मानते हैं पूरी के शंकराचार्य जी को और उन्होंने यह तक कहा कई विषयों में उन्होंने माना यह कहा वो अपनी श्रद्धा दिखाई गुरुदेव के प्रति कहा कि वर्तमान में धरती पर सबसे ज्यादा कुछ कई विषयों में उन्होंने कहा कि धरती पर सबसे ज्यादा विद्वान व्यक्ति वही है पूरी के शंकराचार्य और उन्होंने मुझे एक प्रकरण भी बताया कि नेपाल में कहीं पर
00:24:45:06 कोई कथा होनी थी या कोई कार्यक्रम होना था जहां पर विद्या भास्कर जी महाराज को बुलाया गया था और उसी कार्यक्रम में उसी कार्यक्रम में पूरी के शंकराचार्य जी के नाम से अधोक्षजानंद को भी बुलाया गया था अधोक्षजानंद पर विद्या भास्कर जी महाराज को विश्वास नहीं है कि वो शंकराचार्य तो विद्या भास्कर जी महाराज ने साफ मना कर दिया कि भाई मैं नहीं जाऊंगा ऐसे कार्यक्रम में मैं नहीं आऊंगा जहां पर पूरी के शंकराचार्य जी के नाम से आप अधोजानंद जैसे व्यक्ति को बुलाओगे। पूरी के शंकराचार्य जी के रूप में हम जो वर्तमान पूरी पीठाधीश्वर हैं। मैं नाम नहीं ले सकता हूं गुरुदेव का। वही हम उन्हीं को जानते हैं। ऐसा विद्या भास्कर जी ने बताया उन लोगों को कि पूरी के शंकराचार्य जी के रूप में हम उन्हीं को जानते हैं। बाद में वहां के पोस्टर इत्यादि प्रचार सामग्री बदलवाई गई। उसके फोटोोटो हटाई गई। तब जाकर के विद्या भास्कर जी महाराज वहां गए। इसको कहते हैं मर्यादा और इसको कहते हैं सत्य निष्ठा। उनको विश्वास नहीं था अधुजनंद पर तो वह नहीं गए दूर हो गए अधुक्षानंद से। और इसी प्रकार से यदि उन्हें विश्वास होता भागवत आनंद पर तो वो दूर
00:26:00:12 हो जाते राघवाचार्य जी महाराज और आज राघवाचार्य जी महाराज गए हैं। भगवान ने चाहा तो कुछ समय में जैसे ही संयोग होगा तो पूज्य विद्या भास्कर जी महाराज भी दिखाई देंगे। वहीं पर दोनों आचार्य गण हमें एक साथ दिखाई देंगे। शंकराचार्य और वैष्णवाचार्य तो अगर भागवतानंद की बातों को महत्ता देते ऐसे मान्य आचार्य गण तो क्या यह दृश्य हम लोगों को देख हम लोगों के लिए देख पाना संभव हो पाता जो हमने अभी दृश्य देखे तो यह बात भी क्लियर हो गई। हां यह हो सकता है कि कई विषयों में आचार्य गण कुछ कारणों से जैसे कि जो ज्योतिष पीठ वाले महाराज जी उन्होंने बोला था ना कि कई बार हमें सह लेना पड़ता तो कुछ बातों में मौन तो धारण कर सकते हैं। यह हो सकता है कि कुछ बातों में मौन हो जाए। परंतु इस पर विश्वास नहीं है। यह उन्होंने एक्शन स्पीक्स लाउडर देन वॉइस। यह कहावत है ना एक्शन स्पीक्स लाउडर देन वॉइस। तो आपके जो आचरण है कर्म है वह आपकी वॉइस से भी ज्यादा बोलते हैं। तो आचार्य गणों ने अगर कुछ बोला नहीं कई बार आचार्य गण कुछ बोलते नहीं है बल्कि कुछ ऐसा कर देते
00:27:15:20 हैं जिससे कि हमें संदेश प्राप्त हो जाते हैं। एक और ये व्यक्ति स्वयं को बहुत बड़े ज्ञानी के रूप में प्रचारित कर करता है और हो भी सकता है। भाई संस्कृत का ज्ञान है। भाषा का ज्ञान हो सकता है और वस्तुनिष्ठता से शास्त्रों का ज्ञान हो सकता है कि कहां क्या लिखा है। परंतु किस प्रमाण का उपयोग कहां पर करना है वह तर्क बुद्धि तर्कशील और किसका किस सिद्धांत का पर्यावसान कैसे लेना है वो यह सारे जो बातें हैं यह सारी बातें गुरुगम्य विद्या होती है मनुष्य चाहे चारों वेद पढ़ ले सारे पुराण पढ़ ले सारे उपनिषद पढ़ ले जप तप व्रत दान पुण्य तीर्थ यज्ञ सब कुछ व्यर्थ है अगर कोई प्रामाणिक आचार्य गुरु नहीं तो स्कंद पुराण में लिखा है। तो यह अगर सारे पढ़ भी ले रहा है तो इसकी क्योंकि गुरुगम्य विद्या नहीं है। इसका कोई गुरु नहीं है। जो जिनको ये गुरु बता रहा है उसको हम देख देखते जाइए। पोस्टमार्टम चल रहा है ना देख ही रहे होंगे निगमंद इत्यादि के विषय में। तो खैर गुरुगम्य विद्या होती है। आप पढ़ लो रट लो। मगर फिर भी चीजों को कहां कैसे समझना है उसके लिए गुरु का सानिध्य आवश्यक होता है जो इसके पास है नहीं क्योंकि स्वयंभू है। तो
00:28:32:14 यह व्यक्ति स्वयं को बड़ा विद्वान प्रचारित तो करता है। परंतु वास्तविकता यही है कि इन आचार्यों के मध्य इसकी जो स्थिति है वो बस एक ऐसे है जैसे कोई विनोद मात्र का विषय ऐसे अन्य कई आचार्य हैं। उनके यहां की मैं बात कर रहा हूं। कई अंदर के लोगों ने मुझे बताया भी है कि इसके लिए ऐसा होता है कि कोई आचार्य हैं। उनको कोई विवाद का विषय दिखाई दिया और उनको विनोद गमन है तो उन्होंने कहा भैया इसको ऐसा करो उसको भेज दो भागवत आनंद को इसको भेज दो आनंद आ जाएगा और हंसते हैं ठका मार के तो जैसे कोई नहीं अपने शान को पाल के रखता है तो कोई किसी के साथ अटखेली करनी किसी को डराना है तो जो ही टोमी छू तो इस तरह से भी ऐसे कई आचार्य गण हैं जिनके मध्य यह विनोद का विषय मात्र है और वहां के लोगों ने हमें ये चीजें बताई है कि इनकी क्या स्थिति है प्रामाणिक आचार्यों के यहां पर इनकी और इस तरह से शान की तरीके से इस तरह से पालतू शान की तरीके से उपयोग में ले लेने के बाद
00:29:47:27 वो आचार्य गण उसी तरह से मुस्कुराते हैं। वह जो हंसी होती है उनके चेहरे पर विनोद वाली कि जैसे मान लीजिए कोई फोटो आई कि यह फोटो पर विवाद हो रहा है। अच्छा इसको भागवतानंद को भेज दो आनंद आ जाएगा। तो इस तरह से भी आचार्य गणों के यहां पर होता है। तो फिर वो वैसे ही उनके चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है जैसे विष्णु भगवान की मुस्कान दिखाई देती है। जब वो अपनी शैया पर लेटे होते हैं प्रपंच रूपी संसार को रच के और जीवों को देख रहे होते हैं भटकते हुए। तो उसी तरीके से वह आचार्य गण हास्य का आनंद लेते हैं। विनोद का आनंद लेते हैं। मात्र इतनी इसकी स्थिति है प्रामाणिक आचार्यों के मध्य जो बाहर ऐसा दिखाई देगा ऐसा प्रतीत होता है कि भैया बहुत माना जाता है और वो अपने उस जो वो जो विनोद का विषय है ना उसको संरक्षित रखने के लिए कभी दो बोल बोल भी देते हैं उसके पक्ष में समय आने पर तो ऐसे भी आचार्य गण है तो इसकी स्थिति यही है अब बात ये आती है जब मैं वहां पर गया तो विद्या भास्कर जी महाराज ने मुझे बहुत स्नेह और प्रेम दिया और ऐसे प्रामाणिक आचार्य द्वारा इतनी कृपा प्राप्त हो जाना मेरे जीवन
00:31:03:18 का मतलब क्या कहूं मैं एक बड़ा अचीवमेंट होता है ना कि किसी के जीवन में होता है कि मैंने कुछ पा लिया तो ऐसा कुछ मुझे वहां जब मैं उस दिन उनके पास गया तो उन्होंने जो मुझे जो अपना स्नेह प्रेम जो प्रदान किया वह तो मेरे जीवन का एक अचीवमेंट है एक उपलब्धि जो मैं वहां जाकर के मुझे प्राप्त हुई। उन्होंने मुझे धोती दी। उन्होंने मुझे राशि भी प्रदान करी धोती बांध करके जो मुझे बाद में मिला और जाते ही मुझे जो है भोजन प्रसाद इत्यादि सब प्राप्त हुआ और बहुत मन से और समय देकर उन्होंने मेरी बातों को सुना।
00:31:48:24 [संगीत] रामपाल इत्यादि के विषय में भी उनसे बात हुई और इस के विषय में भी बात हुई कुछ अभी वो नरसिम्हा मूवी को लेकर के बात चल रही है तो उसमें भी बात हुई और हां फिर मैंने भागवतानंद के बारे में अपनी कुछ चीजें रेज की तो उसमें काफी तर्क वितर्क भी हुए वहां पर कई और भी उनके शिष्य उपस्थित थे वो भी अच्छा उनके उनके शिष्य भी उपस्थित थे। वो भी उस चर्चा को सुन रहे थे।
00:32:31:08 तो कई बार जैसे सबसे पहली बात तो मैंने यही कहा महाराज जी को कि महाराज जी वो असिद्ध आरोप लगाता है। गुप्तचरों से प्राप्त हुआ है समाचार। मगर वो कौन गुप्तचर है? वह कौन सा प्रमाण है? वह सब नहीं बताता है। असिद्ध आरोप लगाता है। जिन जिनसे किसी भी बात की पुष्टि नहीं होती है। तो महाराज जी ने महाराज जी हसे थोड़ा सा फिर बोले कि गुप्तचरों का कोई नाम थोड़ी ना बताता है। तो फिर मैंने बताया कि महाराज जी वह तो बात सही है कि गुप्तचरों का नाम नहीं बताता है। परंतु गुप्तचरों को प्रमाण के रूप में उपयोग में भी तो नहीं लिया जा सकता। गुप्तचर इसलिए होते हैं कि भाई हम प्रमाण इकट्ठा कर ले। ठीक है? गुप्तचरों ने गुप्तचरी कर दी। जैसे अभी कल परसों की बात है। यहां पर बजरंग दल वालों की टीम ने हमारा साथ भी दिया उस टीम ने। उसी टीम ने यहां पर गौ मांस का गौ मांस को इधर से उधर स्थानांतरित किया जा रहा था। गुप्तचरी से उन्हें सूचना प्राप्त हुई और उन्होंने जाकर धरपकड़ कर ली और पकड़वा दिया उनको। कोई व्यक्ति था जो अपनी जीप में धर कर ले जा रहा था। अब गुप्तचरी की सुन के ही हम कह देते कि ये व्यक्ति ऐसा करता है तो उस व्यक्ति पर कोई कारवाई हो पाती नहीं हो पाती। मगर गुप्तचरी के माध्यम से उस व्यक्ति तक पहुंचा गया और वहां पर उसको
00:33:46:21 प्राप्त किया गया। तो इस बात को सुना महाराज जी ने कि जब हमने यह वाली बात कही कि गुप्तचरों को प्रमाण के रूप में उपयोग में नहीं लिया जा सकता। महाराज जी ने सुना हमारी बात सुनी और फिर हमने बताया कि महाराज जी ने वहीं पर हमको एक बात बताई थी एक दैवीय घटना उनके संभवत उनके गुरु की जो माताजी थी वो 80 वर्ष की आयु में भी जो है अपने बालक को स्तनपान कराती थी 80 वर्ष की आयु में तो वो एक दिव्य दैय एक उनके पास सामर्थ्य था और साक्षात भगवान के दर्शन भी कराते थे ऐसा भी आचार्य श्री ने बताया तो इसी प्रकार की जो पूरी के शंकराचार्य जी की घटनाएं हैं या जिसका भी उपहास बनाना होगा भागवत आनंद को इस प्रकार की घटनाओं का आधार लेकर के आर्य समाजियों की भाषा में वो उपहास उड़ाता है। मैंने यह भी बात कही। फिर यह भी ये भी मैंने कहा महाराज जी से कि अब स्वयं कहता है कि भागवती मुझे स्वयं आकर के पढ़ाती है। स्वयं लोगों को श्राप दे देता है। फिर वह श्राप कोई कार्य नहीं कर पाता है। बहुत सी चमत्कारिक बातें बोलता है स्वयं पर वह सारी चमत्कारिक बातों को अगर उस तरह से देखा जाए तो सब
00:35:01:25 धूमिल हो जाती है। परंतु पूरी के शंकराचार्य जी की ऐसी ही बातों को लेकर के और जो है बातें बनाता है और यह जैसे दय बात विद्या भास्कर जी महाराज ने भी अपने वो गुरु और उनकी माता जी के बारे में बताई तो वो समय आने पर इन इस प्रकार से तो इन बातों का भी मजाक बना सकता है। आर्य समाजियों के दृष्टिकोण से अभी देखने लग जाइए। इन सब बातों को तुरंत मजाक बनाया जा सकता है। तो वह तो केवल कहने की शैली है। अगर केवल शैली को आप बदल दें कहने की वक्तव्य निर्गत करने की तो उसी से ही किसी भी गंभीर बात को उपस में भी बदला जा सकता है। जैसे वो शब्द है ना कि एक अच्छा अब इसको कहने का भाव अगर बदल जाए अच्छा है। अच्छा है। अब अच्छा शब्द का उपयोग किस में हुआ? हां अच्छा है। ठीक है। सही है। फिर अच्छा ये क्या हुआ कि क्रोध दिखा रहा है। अच्छा अब तुम हमारे साथ ऐसे करोगे। फिर अच्छा आश्चर्य हो गए। देखा होगा लोगों ने ये वाला सीन अच्छा है। अच्छा है। तो एक ही शब्द का केवल कहने के भाव को अगर बदल दे तो उसमें जो है वो गंभीर बात उपहास हो सकती है। उसमें विस्मयादि बोधक हो सकता है। सब हो सकते हैं। उसी शब्द का उपयोग।
00:36:17:15 तो इस बात को भी उन्होंने समझा कि वह इस तरह से उपहास जो बनाता है आचार्यों का उनकी उनसे उनके जीवन से जुड़ी हुई जो दय बातें होती है। फिर इसके बाद एक बहुत ठोस बात आई जिसमें कि आचार्य जी ने सहमति भी जताई। केवल सुनी नहीं। वो ठोस बात थी कि मैंने कहा कि वो कोई व्यक्ति है अगर और वह साधना मार्ग में आने से पहले या प्रामाणिक आचार्यों की शरण में आने से पहले उसका अमुक जीवन रहा हो, कोई गलती रही हो, कुछ किया हो उसने। परंतु वह व्यक्ति जब प्रामाणिक आचार्यों के सानिध्य में आ गया है और अपने जीवन को परिवर्तन परिवर्तित कर रहा है। तो ऐसे में यह पुराने जीवन के आधार पर उसकी टांग खींचता है। वहीं पर जब इसकी गुरु परंपरा में इसने जो निगमंद नाम बताया है उनके विषय में बहुत सारी बातें चल रही है। थियोसफिकल सोसाइटी इत्यादि सब कुछ चल रहा है। तो वहां पर खुद ही कहता है कि वो वहां वहां गए थे। वहां के हो के नहीं रह गए थे और साधना मार्ग में आने से पहले गए थे। यह सब बातें इसने बोल दी। हां। हालांकि साधना मार्ग में आने के बाद की बात है जब वो थियोसफिकल सोसाइटी गए हैं। हम मगर फिर भी अगर इसकी बात को मान लिया जाए कि साधना मार्ग में आने से पहले गए
00:37:32:16 थे। तो भाई जब यह साधना मार्ग में आने से पहले निगमानंद जी के लिए दोष दृष्टि से नहीं देखता है। साधना मार्ग में जाने से पहले को दोष दृष्टि से नहीं देखता है। तो किसी और के साधना मार्ग में जाने आने से पहले को पहले के विषयों को दोष दृष्टि से क्यों देखता है? जब आज वो व्यक्ति जीवन को सुधारना चाहता है। जब आज वो व्यक्ति प्रामाणिक आचार्य के सानिध्य में आकर के स्वयं को बदल रहा है। तो वो क्यों दोष दृष्टि से देख रहा है? और यदि देख रहा है तो वो निगमंद को क्यों नहीं देख रहा है? तो जब मैंने ये वाली बात कही तो महाराज जी ने सहमति जताई कि हां ये बात पूछने की है। तो यह बात उन्होंने हमारी इससे सहमति भी जताई और जो पहले वाली बातें हैं उसमें भी उन्होंने हमारी सारी बातें सुनी कि भाई किसी स्त्री को वैश्या बोल दे रहे हो जबकि सिद्ध करने के लिए कुछ नहीं है। तो ये सारी बातें उन्होंने सुनी। मैंने यह भी कहा कि वाकस्खलन कहता है। वाकस्खलन बोलता है कि मुझे देवी से वरदान प्राप्त है। भाई तुम दूसरों की दिव्यानुभूति पर बात कर रहे हो। तुम्हारी भी तो कुछ है चीजें। भगवती से मुझे वरदान प्राप्त है। वाक मेरा कर्म इंद्रियों से कोई गलती नहीं होगी। फिर वाकस्खलन हो जाता है। तो इस तरीके से सारी बातें उन्होंने
00:38:47:18 सुनी और मुझे बहुत समय दिया। मुझे बहुत सारा स्नेह, प्रेम, दुलार सब कुछ प्राप्त हुआ वहां से। मैं उनका सदैव ऋणी रहूंगा। इन सब बातों के लिए इतना सारा वैष्णवाचार्य परम वैष्णवाचार्य के द्वारा मुझ जैसे एक तुच्छ व्यक्ति को समय मिला और उनके द्वारा स्थापित एक मंदिर भी गए थे हम लोग वहां बहुत अच्छा दर्शन किया हमने श्री राम दरबार था और वहां पर शेषनाग भी थे और बहुत अच्छा विग्रह था भगवान का तो हमने वहां पर उनके कई और प्रामाणिक शिष्यों से भी भेंट हुई तो सब कुछ अच्छा रहा और हमने बताया बस मेरा एक निवेदन है जो मैं वहां कर नहीं पाया। आगे जाऊंगा तो करूंगा भी या फिर किसी प्रकार से अभी संपर्क में संपर्क करके जो अपनी बात पहुंचाऊंगा। इस वीडियो के माध्यम से भी बोल ही दे रहा हूं कि मुझे ऐसा लग रहा है कि महाराज जी हैं जो एक बार हमारी चर्चा जो है भागवतानंद के साथ सौहार्दपूर्ण मतलब उसमें पहले से एक वैमनसता भर के ना ले जाने वाले दृष्टिकोण के साथ एक चर्चा वो कराने का संभवत आगे भविष्य में सोच सकते हैं। ऐसा अभी वर्तमान में विचार हो तो मैं अपनी ओर से यह बात कहूंगा आचार्य जी से कि आचार्य जी आप अपने समक्ष भागवतानंद को बुलाकर
00:40:02:26 और इन विषयों में जो भी विषय प्रासंगिक है उन विषयों में उसको सामने से बिठाकर मेरी सीधे उससे एक चर्चा आप करवा दें कि वो जो यह सिद्ध आरोप जो लगा रहा है वो कितने पुष्ट है अ या फिर उसको जो और जो लेकर के प्रासंगिक प्रश्न है वो वो कितने आवश्यक है कितने महत्वपूर्ण है और उनके क्या परिणाम है उनके क्या निराकरण है इस पर फिर क्योंकि वह भाई सब पर बात कर रहा है तो थोड़ी बहुत बातें हमें भी करने का अधिकार है तो वो जो उसकी परंपरा है या उसकी ये सब चीजें जो वो कह रहा है जैसे कि परिसाधना इत्यादि दे रहा है जब वो लोगों को तो वैदिक आचार्य कैसे है मान लिया कि उसने स्वयं ने नहीं की। यद्यपि उसने आवश्यकता होना प्रकट किया अपने वीडियोस में कि मुझे उसकी आवश्यकता थी परंतु समय के कारण समय के अभाव के कारण मैं नहीं कर पाया यह वो खुद बोला दूसरी बात उसको यह मंत्र इत्यादि प्राप्त कहां से हो रहे हैं अगर प्रामाणिक हैं तो प्रामाणिक कहां से हैं प्रामाणिक नहीं है तो वो आगे क्यों प्रोसीड कर रहा है ये बहुत सी बातें मुझे नहीं लगता कि हमारे मान्य वैष्णवाचार्य हैं विद्या भास्कर जी महाराज सर के और राघवाचार्य जी महाराज सरी के वह इस तरह की सामग्री को आगे प्रदान करते होंगे और यहां तक कि इसने तो यह तक कहा है
00:41:17:27 अपने एक वीडियो में कि राघवाचार्य जी को भी ऐसी कालिया जिनो परिधना जैसी साधनाओं की आवश्यकता पड़ी थी। तो यह भी एक बात है भाई कि मुझे नहीं लगता राघवाचार्य जी महाराज एस इस साधना को मांग सकते हैं। किसी को दिलवा सकते हैं। तो यह सारी चीजें हैं। मेरा निवेदन यही रहेगा। आचार्य श्री से आगे भविष्य में मिलूंगा संपर्क में जाऊंगा कि भाई वो इनसे जो है भागवत आनंद से मेरी एक चर्चा सौहार्दपूर्ण वाली। पहले से कोई वैमनसता को एक साइड रख के है तो मगर उसको एक साइड रख के कि हम भैया आज समझने जा रहे हैं कि सामने वाला कहना क्या चाहता है। इस दृष्टि से वह चाहे यदि वैसे वह तो चाह लेंगे तो हो ही जाएगा यदि वह अब वह बात अलग है कि भागवतानंद फिर इनसे भी वही कार्य करने लगे दूर मतलब फिर इनके इनकी मानना भी करने पड़ गए वो बात अलग है कि क्योंकि भागवतानंद का मुझे भरोसा नहीं है वो किसी के भी साथ कोई भी व्यवहार कर सकता है उससे पटरी नहीं खाएगी तो और इन सब बातों का निराकरण तभी हो सकता है जब जिस समय ये सब बातें उठ रही हो तो एक के बाद एक के बाद एक वहीं की वही वहीं की वहीं हर बात आपको हर बात का निराकरण प्राप्त हो जाए। तो इस निवेदन के साथ ही मैं अपनी वाणी को विराम देते हुए वीडियो को समाप्त करता हूं। जय श्री राम। जय श्रीमन नारायण।
00:42:33:29 [संगीत]
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रामानुजाचार्य स्वामी श्री वासुदेवाचार्य विद्या भास्कर' जी महाराज से मेरी क्या वार्ता हुई
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