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00:00:08:24 तुम तो सभी को जय श्री राम। जैसा कि पिछले वीडियो में हमने आपको बताया था कि निग्रह प्रवेशिका तो भागवतानंद द्वारा नहीं दी गई। वो करण अर्जुन की तरह मेरे करण अर्जुन आएंगे। आएंगे आएंगे। मेरे करण अर्जुन आएंगे। मेरे करण अर्जुन आएंगे। मेरे करण अर्जुन आएंगे। इनका भी वही चलता रहता है। आएगी आएगी आएगी। है ना? मगर हमने जरूर निग्रह निकासिका लिख लिख ली है। और निग्रह निकासिका को लिखने का यह कहेंगे कि अवसर भी इस व्यक्ति ने ही हमें प्रदान किया है। अवसर क्या कहेंगे कि कारण हो सकता है हम इस तरह से क्रमानुसार विधिवत व्यवस्थित रूप से इस बात को ना करते। मगर

00:01:25:13 इसके पीछे 100 करोड़ की बात है। 100 करोड़ रुपए की मांग की गई हमसे। 100 करोड़ रुपए जो पिछला सारा वो वृतांत हुआ जो घटनाक्रम चले उसमें इनकी जब वो कुछ कलई खुलने लगी कहीं-कहीं पर और बहुत सारे इनके ही निर्देशों के अनुसार प्रश्न कर दिए गए इनसे। भाई यह ताल टोकते थे ना मुझसे सार्वजनिक रूप से प्रश्न करो। तो सार्वजनिक रूप से प्रश्न करो। तो इनसे किया गया प्रश्न सार्वजनिक रूप से और जब प्रश्न किया गया सार्वजनिक रूप से तो इनको बड़ा बुरा लगा कि यह कैसा प्रश्न तुमने कर दिया सार्वजनिक रूप से तो सार्वजनिक रूप से कोर्ट चले गए धार्मिक सेक्टर के कैरी मिनाटी

00:02:12:02 तो वहां से हमको नोटिस भिजवा दिया। अपना एक वकील है उसको साथ रख रखा है। लोगों को डराने, प्रभाव दिखाने अथवा कभी-कभी कुछ ऐसे लोग भी मिलते ही होंगे जो इसकी अपेक्षा करत और गलत होते होंगे। उनसे उलझने या उनसे किस प्रकार से सामना करना है इन सब के बावत एक वकील रख रखा है। कोई बात होती है तो वह वकील जो है भेज देता है नोटिस-वोटिस जो भी है। तो हमको भैया ₹100 करोड़ का नोटिस प्राप्त हुआ इसकी तरफ से। तो 100 करोड़ का नोटिस प्राप्त हुआ। तो उस नोटिस में इसने शुरू में ही स्वयं को साक्त संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य बता दिया इसको भागवतानंद को। तो जब हमें नोटिस मिला सामने वाला जो व्यक्ति है जो बात पे बात बातबात पर जनेऊ की शपथ लेता फिरता है कि मैं इस बात पर भी जनेऊ हाथ में ले सकता हूं। मैं इस बात पर भी गंगा माता में उतर सकता हूं। मैं इस बात पर भी जनेऊ हाथ में ले सकता हूं। ये देखो मेरा यज्ञपवेत और वो रही भगवती कामाख्या का शिखर। ये बात तो मतलब मैं अपने यज्ञ

00:03:27:13 को छू कर ही कह दे रहा हूं और आप ही के आश्रम के पीछे गंगा जी वहां घुस जाते हैं और आप शपथ कीजिएगा कि आप स्वामी मुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार केवल गंगा जी में प्रवेश कर जाए स्वामी निश्वरानंद सरस्वती गंगा में प्रवेश कर जाए और कह दें कुछ नहीं। गंगा जी में प्रवेश करें कह देते। ऐसा कभी हुआ नहीं। जोधपुर वाली चिकित्सा पर तो हमने शपथ पूर्वक सब बात कह ही दी है। मैं कुछ वरदान देती हूं और

00:03:46:26 भगवती ने मुझे यही वरदान दिए। इस बात की भी मैं शपथ कर सकता हूं। तो

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00:03:50:28 इस बात में हमने आपको गंगा जी भूषण सारा सत्य बता दिया है। हालांकि यज्ञ पवित्र कर छूकर सौगंध करना भी दोष माना गया है शास्त्र में। लेकिन क्या करूं? ये सामने शिव पुराण स्थित है। शिव जी इस बात के साक्षी हैं। मैं गंगा जी में प्रविष्ट होकर ये शपथ पूर्वक काशी विश्वनाथ जी की नगरी में ये शपथ पूर्वक आपको कहता हूं और इस स्पष्टता के लिए अब हमको कसम शपथ भी नहीं करेंगे। क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि रोज 10 आरोप लगेंगे हमारे ऊपर। तो 10 बार हम देवी देवता की शपथ और जनेऊ छू के खाओ और गंगा जी और नर्मदा जी में घुस के कहो ये नाटक जनेऊ हाथ में जनेऊ हाथ में जनेऊ हाथ में इट्स माय पैशन जनेऊ हाथ में एक बढ़िया सी शॉर्ट फिल्म बन जाए जनेऊ हाथ में हां और जो व्यक्ति जनेऊ हाथ में ना ले बात बातबात पर वो झूठा जो बात पर जनेऊ हाथ में ले ले वो सच्चा जो मौन रहे वो झूठा जो बात पर जनेऊ हाथ में लेता रहे वो सच्चा ये सनातन शास्त्रों के नियम होंगे इनके इनको वो परिसाधना से प्राप्त हुई है ना जो वरदान वरदान तो है नहीं वो पता चलेगा आगे वरदान उसी ने दिए होंगे जनेऊ हाथ में सनातन शास्त्रों का नियम जो व्यक्ति जनेऊ हाथ में लेता फिरेगा उसकी बात सत्य जो व्यक्ति या तो जनेऊ हाथ में नहीं लेगा या मौन रहेगा उसकी बात झूठ

00:05:04:00 तो जब इसने अपने लिए ये प्रामाणिक साक्ष्य संप्रदाय का आचार्य लिख दिया और फिर हम पर कहा कि उसने यह बोला है, वह बोला है। तो हमने फिर सबसे पहले उस शब्द का ही खंडन किया क्योंकि इसने अपने आप को प्रामाणिक बोला था ना तो हमने फिर उसी पर मीमांसा की और वो मीमांसा आपके सामने निग्रह निकासिका के रूप में प्रस्तुत हो रही है। तो इसमें कुछ एक भाग यह है जिसमें हमने इस बात का खंडन किया है कि यह जो है कोई प्रामाणिकता है या मनचला खुद का स्वषित है। तो इस बात की विवेचना है और उसके बाद दूसरे खंड में जो अह न्यायिक दृष्टिकोण से जो उत्तर होना चाहिए कि भैया जो हमने किया वो क्यों किया और क्या वो इललीगल माना जाएगा माननी में आएगा तो शुरू करते हैं कि भागवतानंद गुरु को किसी भी संप्रदाय का शाक्य क्या किसी भी संप्रदाय का प्रामाणिक आचार्य क्यों ना माना जाए इस बारे में विस्त विस्तृत विवेचना निग्रह निकासिका वैसे पहले इसका नाम हम लोग कह रहे थे गप्प

00:06:19:01 प्रवेशिका है ना यह सब तो मैंने कहा कि थोड़ा सा जो लेखन वगैरह है उसमें थोड़ा हल्का वर्ड लगेगा शब्द तो इसलिए फिर निग्रह निकासिका कर दिया। खैर तो पहले हम इसके दावे समझ लेते हैं। इसने क्या-क्या दावे किए हैं। इसका पहला दावा है कि इसको मां भगवती की दिव्य योजना के द्वारा निग्रह संप्रदाय का बोध हुआ। देखिए दोनों चीजों पर क्वेश्चन है। निग्रह संप्रदाय प्रमाणिक है कि नहीं? और फिर यह उसका निग्रहचार्य है कि नहीं? तो पहली जो विवेचना है पहले खंड में उसमें इस बारे में भी बात हो रही है कि निग्रह संप्रदाय कितना प्रामाणिक है और यह उस उसके निग्रहाचार किस प्रकार से हैं अथवा नहीं है। तो सबसे पहला दावा इनका है कि इसको मां भगवती की ओर से दिव्य योजना के द्वारा निग्रह संप्रदाय का बोध हुआ जिसका विवरण शाक्त संप्रदाय के किसी ग्रंथ में मिलता है। जंगल में कठिन तपस्या द्वारा भगवती देवी को प्रसन्न करके इसने निग्रह संप्रदाय का मंत्र एवं निग्रह संप्रदाय के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाला परम अक्षर सूत्र नामक ग्रंथ प्राप्त

00:07:34:12 किया है। जिसकी व्याख्या को इसने ज्ञानवती टीका सूत्र विस्तार भाष्य नाम से प्रकाशित करवाया है। इसके द्वारा यह भी घोषणा की गई है कि एक दिव्य योजना के अंतर्गत मां भगवती के ही द्वारा इसको उन 300 ग्रंथों का अध्ययन कराया जा रहा है जिनका विवरण शाक्त मत के ग्रंथ में मिलता है जो प्रायः लुप्त हो चुके हैं। अर्थात जनसामान्य को सुलभ नहीं है। इसके साथ ही साथ विपक्षी द्वारा ये गुप्ताचार्य द्वारा यह घोषणा भी की गई है कि देवी द्वारा कराए जा रहे अध्ययन के पूर्ण हो जाने पर विपक्षी उन्हीं 300 ग्रंथों का सार 10,000 श्लोकों में लिपिबद्ध करके जनसामान्य को उपलब्ध कराएगा। विपक्षी तारापीठ एवं कामाख्या की परंपरा में आने वाले मनुष्य रूप में सुलभ गुरु के द्वारा भी अध्ययन करने की बात को स्वीकार करता है। परंतु उनके बारे में अधिक ना बताने की गुरु आज्ञा बताते हुए कोई जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदान नहीं करता है। विपक्षी की साधना से प्रसन्न होकर उसे मां भगवती द्वारा वरदान दिया गया है कि उसके द्वारा कभी कोई दुराचरण नहीं होगा क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट होने पर भी शारीरिक क्रिया पर

00:08:49:13 उसका नियंत्रण रहेगा एवं क्रियात्मक रूप से कुछ गलत होने वाला होगा तो विपक्षी की बुद्धि गलत नहीं होने देगी। उसका विवेक उसे रोक लेगा। भागवतानंद के व्यवहार से उसके द्वारा दी गई जानकारियों का सत्यापन किया जा सकता है। अर्थात भागवतानंद का निग्रहचार्य होना उसे निग्रह संप्रदाय का बोध मंत्र ग्रंथ एवं अध्ययन स्वयं मां भगवती द्वारा प्राप्त होना। इस प्रकार प्राप्त सिद्धांतों का श्रुति स्मृति शास्त्रों के साथ समन्वय होना एवं विपक्षी के द्वारा कभी भी दुराचरण ना हो पाने का वरदान इत्यादि

00:09:32:26 इन सारी जानकारियों का सत्यापन कहां से हो सकता है भाई भागवतानंद के आचरण से कि वह शास्त्रानुकूल है कि नहीं आचरण तो दूसरे भाग में एक भाग में यह है कि निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता पर कितनी स्पष्टता हमें प्राप्त है। दूसरा भाग कि निग्रह संप्रदाय के प्रामाणिक आचार्य के रूप में भागवतानंद को कैसे माना जाए। और तीसरा है कि जो यह आधार है आचार्य वाला है ना कि आचार्य के आचरण से देखो कि वह आचार्य है कि नहीं जो इसने रखा भी है और साथ ही साथ वो भगवती वाला वरदान कितना सत्य है। हां तो तीसरा इसके आचरण के अनुरूप है। इसके आचरण के आधार पर है। तीसरा वाले तीसरी वाली जो विवेचना है कि भैया इसके आचरण से क्या ये सिद्ध हो रहा है कि भगवती से इसको वरदान मिला था। ये आचार्य है शास्त्रानुकूल आचरण है इसके तो यह सब अच्छा इसके द्वारा इसकी पुस्तक अमृत वचन के 69वें अध्याय ये जो संख्याएं हैं इनमें कुछ ऊपर नीचे हो सकता है पर वहां पर है निग्रह संप्रदाय की प्रमाणिकता के अंतर्गत प्रश्न

00:10:48:07 संख्या 434 में उसे आचार्य किसने बनाया? इस प्रश्न के उत्तर में यह बताता है कि मुझे आचार्यत्व प्रदान करने के लिए मैं स्वयं अधिकृत हूं। एवं शास्त्रों द्वारा किसी को आचार्य के रूप में स्वीकार करने के निमित्त शास्त्रों के कुछ वचन प्रस्तुत करता है जो कुछ इस प्रकार है। जो शास्त्र वाक्य को ध्यान से चुनकर तथा समझकर उन पर आचरण करें। अपने आचरण से आदर्श प्रस्तुत करके उनके सदर्थ की स्थापना से अन्य जनों को भी सदाचारी बनाए। विनम्र वाणी बोलने वाले तथा सभी कार्यों का उपदेश करने वाले को आचार्य कहते हैं। अतः शास्त्र वाक्य मुझे आचार्यत्व प्रदान करते हैं। तो यहां पर इसने विवेचना कर दी कि शास्त्र वाक्य कैसे हैं? क्या है? और फिर इसने यह भी अपने आप को आचार्य आचार्यत्व प्रदान करने की बात कहकर यह स्वीकार कर लिया सारे आचरण इसमें हैं। तो यह भी इसका एक दावा है कि मैं निग्रचार क्यों हूं। निग्रह मार्ग तीन प्रकार से चलता है। शास्त्रार्थ के द्वारा विपक्षी के मत का निग्रह करके शास्त्र रक्षा करना। शास्त्र के माध्यम से विपक्षी को युद्ध में पराजित करके उसका निग्रह करना और योग मार्ग से अपनी इंद्रियों

00:12:03:10 का संयम पूर्वक निग्रह करके आत्म निग्रह करना। तो यह इन्होंने निग्रह मार्ग के बारे में बताया। जिस प्रकार वैष्णवागमों के अनुसार भगवान विष्णु की आराधना करके और वैष्णवों के सिद्धांत पर चलकर आचार्य जन वैष्णवाचार्य की उपाधि धारण करते हैं। उसी प्रकार निग्रह आगमों के अंतर्गत चलने वाले निग्रहचार्य कहे जाते हैं। ठीक है? तो अपने आप को निग्रह आगमों के अंतर्गत होने वाला घोषित करते हुए खुद ही जोड़ जोड़ते हुए और निग्रचार कहे जाते हैं। फिर भागवतानंद को किसी कोलाचार्य के द्वारा एक नियुक्ति नियुक्ति पत्र भी प्राप्त हुआ है जो इसने सार्वजनिक किया है। जिसमें कि वो उनके द्वारा कहा गया है कि प्रामाणिक है। हम इन्हें नियुक्त करते हैं। वैसे थोड़ी देर पहले हमने पढ़ा कि मुझे कोई आचार्यत्व जो है कोई प्रदान करने के लिए अधिकृत नहीं है। मैं स्वयं ही अधिकृत हूं। शास्त्र मुझे अधिकृत करते हैं। पर चलो इनका यह भी ले लिया जो कोलाचार वाला एक उपहास पूर्वक एक पत्र प्राप्त हुआ है। वो उपहास क्यों है वो भी बताऊंगा मैं। उसमें उपहास विनोद है और कुछ नहीं है। जस्ट जोक मामा मिया आई एम जस्ट जोकिंग वही है उसमें।

00:13:19:10 इसी क्रम में विपक्षी द्वारा उसकी तथाकथित दृष्टिगोचर गुरु परंपरा का एक चित्र भी सार्वजनिक किया गया है। उसमें उसे प्रमाणिक कहने वाले कोलाचार्य की ये जो चित्र है मेरी जानकारी में नहीं है कि ये चित्र जो है जो प्रमाणिक कहने वाले जो कोलाचार्य हैं उनकी परंपरा से है कि नहीं है ना क्योंकि जिसकी जो परंपरा होगी वह अपनी ही परंपरा में किसी को प्रामाणिक कह सकता है ना तो जिन गुरुओं को इसने अपने चित्र में बताया है क्या वो उस कोलाचार्य से सद्ध है उसी परंपरा में आते हैं कि नहीं जिस परंपरा के कोलाचार्य ने इनको नियुक्त किया है ये ये भी एक प्रश्न आगे आएगा इस पर विधिवत बात करेंगे तो ये कुछ 10 11 इन्होंने दावे किए जो अभी तक इन्होंने निग्रह प्रवेशिका नहीं दी है मगर हमने श्रम करके मेहनत करके इनके अलग-अलग जगह पर किए गए जो दावे हैं उन दावों को संकलित किया है कि इसने अपनी परंपरा के बारे में अपनी प्रामाणिकता को लेकर क्या-क्या खिचड़ी पकाई है उसको पहले पकड़ तो लें। पहले सामने वाले का पूर्व पक्ष तो प्राप्त हो तब तो उत्तर पक्ष रखेंगे ना। ये तो पूर्व पक्ष ही नहीं देते हैं। फलाने के सचिव ये कर रहे हैं। उनके सचिव ये कर रहे हैं। पूरी मठ

00:14:34:16 के सचिव ये कर रहे हैं। अपने सचिवों का कुछ नाम ही नहीं बताते हैं। तो अपना पूर्व पक्ष तो छुपा के रखो। मेरे गुरु कौन है? ये उन्होंने बताने को मना किया है। है ना? मेरे साथ कौन-कौन चलता फिरता है? मेरा परिकर कौन-कौन है? वह गुटखा खाता है कि नहीं? वह शराब पीता है कि नहीं? मदिरापान करता है कि नहीं? यह मैं अभी नहीं बताऊंगा। हां। मेरा विवाह कहां पे हुआ है? किस कुल खानदान में हुआ है? यह मैं अभी नहीं बताऊंगा। और दूसरों की जिनकी जिनकी जीवन शैली पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत है उसमें अपने अनुसार नियम लागू करते हुए अपने अनुसार अर्थ निकालते हुए किसी की बात कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती का कुबा जोड़ा और मैं करता रहूंगा दोषारोपण और अपनी सारी चीजें छुपा के रखूंगा दोषारोपण करोगे कैसे मैं पूर्व पक्ष तुमको दूंगा ही नहीं उत्तर पक्ष कहां से दोगे तो हम ढूंढेंगे तुम्हारा पूर्व पक्ष हम ढूंढेंगे तुम तो दोगे नहीं हम ढूंढ ढूंढेंगे। तो यह सारे जो दावे इन्होंने किए हैं, यह जो निग्रह निकासिका आपको एक छोटी सी पुस्तक प्राप्त होगी। उसमें यह जो सारे दावे किए हैं इनका विवरण बताया जाएगा कि कहां पर किए हैं और अगर वह पुस्तक आपको पीडीएफ में मिलेगी तो आपको उस वीडियो का लिंक मिल जाएगा जिस वीडियो में उसने ये ये बातें कही हैं

00:15:49:18 जो जो बातें यहां पर दावे के रूप में संकलित की गई हैं। इसके द्वारा जो अपनी प्रमाणिकता के विषय में बताया गया है। तो यह हमने देख लिया कि इसके दावे क्या-क्या हैं। अब इसके अगले भाग में हम देखेंगे इन दावों के प्रति उत्तर में जो किस प्रकार जो विवेचना की गई है और उसके अनुसार किस प्रकार यह सिद्ध होता है कि यह कोई प्रामाणिक आचार वाचार नहीं है। यह एक नंबर का दोगला और झूठा व्यक्ति है। बात बातबात में दोगलापन करता है। पक्षपात करता है। सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ करता है। झूठ बोलता है। इसका झूठ बोलना भी सिद्ध होगा। इसकी अशास्त्रीयता भी सिद्ध हो जाएगी। सब कुछ सिद्ध होगा इस विवेचना में। तो अगले भाग भाग में हम उस पर बात करेंगे। निग्रह निकासिका एक तरीके से कहा जाए तो निग्रह निकासिका जो का जो मुख्य भाग है वह अगले भाग में आपके समक्ष प्रस्तुत होगा। जय श्री राम।

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A: AHVAAN - Call Of Dharma Video 16:54 · 15 Aug 2025

निग्रह प्रवेशिका @Swami Nigrahacharya (Shri Bhagavatananda Guru) गुरु परंपरा क्या है | The Nigrah Nikasika Chapter 2

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A · Video धर्मरक्षक या अवसरवादी | @Swami Nigrahacharya (Shri Bhagavatananda Gur...
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